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खंडूडी से ही नहीं, अण्णा से भी निराश हुए उत्तराखण्डी

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खंडूडी से ही नहीं, अण्णा से भी निराश हुए उत्तराखण्डी/ -खंडूडी द्वारा जनता की आंखों में धूल झोंकने वाले कमजोर लोकायुक्त विधेयक का क्यों कर रहे हैं अण्णा  समर्थन/ भ्रश्टाचार को मिटाने के लिए जिस लोकायुक्त को ऐतिहासिक बता कर देष में भ्रश्टाचार मिटाने का हौव्वा  उत्तराखण्ड की खंडूडी सरकार व उनके प्यादे तथा अण्णा हजारे की टीम कर रही है क्या वे बता सकते हैं कि - भ्रश्टाचार के प्रतीक बने एनजीओ यानी स्वयं सेवी संस्थाओं को क्यों इस लोकपाल /लोकायुक्त से बाहर क्यों रखा गया ? क्या अण्णा हजारे व उनकी टीम केन्द्र सरकार द्वाराा बनाये गये ऐसे जनलोकपाल विधेयक को स्वीकार करेंगे जिसमें यह प्रावधान होगा कि जब तक लोकपाल के सभी सदस्य एकमत नही होंगे तो तब तक किसी भी भ्रश्टाचार में लिप्त सांसद, मंत्री या प्रधानमंत्री पर मामला ही दर्ज नहीं किया जायेगा? ंयदि नही ं तो फिर वे क्यों उत्तराखण्ड के भ्रश्टाचार पर अंकुष लगाने के लिए उत्तराखण्ड  के मुख्यमंत्री  द्वारा प्रदेष में इसी प्रकार का बनाये गये लोकायुक्त विधेयक का खुला  समर्थन कर रहे हैं? आज उत्तराखण्ड  की ही  नहीं ंपूरे देष क...

माॅ भारती के चरणों में ताउम्र समर्पित रहे भाषा आंदोलन के पुरोधा राजकरण सिंह

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माॅ भारती के चरणों में ताउम्र समर्पित रहे भाषा आंदोलन के पुरोधा राजकरण सिंह ‘राजकरण जी का निधन हो गया’ रंविवार 30 अक्टूबर की दोपहरी में ंजैसे ही भाषा आंदोलन के साथी व दैनिक जागरण रूद्रपुर के प्रभारी रविन्द्र सिंह धामी का फोन आया तो मुझे सहसा विश्वास ही नहीं हुआ। विश्वास होता भी कैसे ं29 अक्टूबर की सांय 4 व 5 बजे की बीच मेरी राजकरण सिंह से दूरभाष पर बात हुई । वे दीपावली के त्यौहार अपने परिजनों से मिलने अपने गांव, विष्णुपुरा-बाराबंकी उंत्तर प्रदेश गये थे। 29 अक्टूबर को सायं 4 व 5ंबजे के बीच उनसे दूरभाष पर बात हुई वे उस समय पूरे स्वस्थ व किसी काम से लखनऊं जाने की  बात कह रहे थे,, श्री  रावत के अनुसार उनका 5-6 नवम्बर को दिल्ली सीता राम बाजार आर्य समाज के किसी पदाधिकारी के बेटे की शादी में सम्मलित होने के लिए आने की बात कह रहे थे।ंमुझे कह रहे थे आप ं6 नवम्बर तक 9 नवम्बर को उत्तराखण्ड  राज्य स्थापना के अवसर पर निकलने वाले  अंक की पूरा मेटर तैयार  रखना। इस अंक को प्रकाशित करने के लिए प्यारा उत्तराखण्ड के प्रबंध सम्पादक बडे भाई महेश चन्द्रा जी ने उनका विशेष अनुरोध किय...

गरीब सुदामा फिर बना करोड़पति

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        गरीब सुदामा फिर बना करोड़पति नई दिल्ली(प्याउ)। लक्ष्मीपति के दरवार में एक बार फिर एक गरीब सुदामा करोड़पति बन गया। भले ही सतयुग का सुदामा भगवान श्रीकृष्ण द्वारा अपने चमत्कार से करोड़पति बना होे परन्तु कलयुग का सुदामा ‘सुशील’ अपनी किस्मत के साथ अपनी  प्रतिभा के ंदम पर करोड़पति बन गया। हां कलयुग का यह सुदामा भगवान श्रीकृष्ण के नहीं अपितु इस सदी के महानायक अमिताभ बच्चन के हाथों करोड़पति बना। परन्तु  अपहरण व फिरोती  के लिए कुख्यात रहे बिहार  म ें यहां क े आम लोगों को ही नहीं अपितु खुद  गरीब सुदामा से करोड़पति बने  सुशील क ो अब  अपने या अपनों में से किसी के अपहरण की आशंका हो रहीं है। मासिक 6000 रूपये का वेतन  लेने वाले  कम्प्यूटर ओपरेटर कम शिक्षक  सुशील को जहां इस पुरस्कार  से अनहोनी खुसियां  िमल रही ह ैं वहीं उनको कभी सपने में भी न सोच सकने वाली परेशानी  का  सामना भी करना पड रहा है।  गुमनामी  के अंधेरों में गरीबी का दंश झेलने के लिए मजबूर इस सुदामा को कौन बनेगा करोडपति कार्यक्रम ने आ...

महारानी की गुलामी की पालकी को कब तक ढोते रहेगे भारतीय हुक्मरान

महारानी की गुलामी की पालकी को कब तक ढोते रहेगे भारतीय हुक्मरान/ -अंग्रेजों के गुलाम देशों का सम्मेलन सम्पन्न/ भले ही विश्व में आज लोकशाही  का डंका बज रहा हो। परन्तु इसके बाबजूद संसार के 54 देंश ऐसे भी  है जो गुलामी की पहचान को बहुत ही सम्मान से वीरता के तकमे की तरह सीने पर  लगाये  घुम रहे हैं। हम यहां पर बात कर रहे है ं  ब्रिटिश के गुलाम रहे विश्व के 54 देशों के  संगठन ‘राष्ट्रमण्डल यानी कोमनवेल्थ  की। इसका 21 वां शिखर सम्मेलन इसी सप्ताह आस्ट्रेलिया में सम्पन्न हुआ। संसार का सबसे ंबड़ा लोकतंत्र कहलाने वाला भारत इस संगठन का प्रमुख सदस्य है। परन्तु स्वाभिमानी अमेरिका ने गुलामी के  इस बदनुमा कलंक के  प्रतीक कोमनवेल्थ संगठन की सदस्यता लेने से ठुकरा दिया। हालांकि अमेरिका भी एक प्रकार से ब्रिट्रेन का आधिपत्य में रहा। हजारों राष्ट्रं भक्तों की शहादत के बाद हासिल ंआजादी के बाबजूद भारत जैसे सबसे समृद्व व प्राचीन संस्कृति के ध्वजवाहक देश द्वारा गुलामी के प्रतीक वाले इस राष्ट्रमण्डल की सदस्यता ग्रहण करने में यहां के हुक्मरानों को तनिक सी भी शर्म नहीं...

भारतीय भाषाओं के पुरोधा व भारतीय संस्कृति के अमर ध्वजवाहक राजकरण सिंह का निधन

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भारतीय भाषाओं के पुरोधा व भारतीय संस्कृति के अमर ध्वजवाहक राजकरण सिंह का निधन  भारतीय भाषा आंदोलन के पुरोधा व भारतीय संस्कृति के अमर ध्वजवाहक राजकरणसिंह  नहीं रहे । गांधी, लोहिया के बाद भारतीय भाषाओं के लिए पूरे देश की मृतप्रायः आत्मा को  अपने  दो दशक लम्बे आंदोलन से झकझोरने वाले भारतीय भाषा आंदोलन के ंमहारथी  राजकरण सिंह का 30 अक्टूबर 2011की सुबह को हृदयगति रूकने से अपने गांव बिष्णुपुरा, बाराबंकी जनपद उत्तर प्रदेश में निधन हो गया। उनके छोटे  भाई नरसिंह के  अनुसार  उनका अंतिम संस्कार  उनके पैतृक श्मसान घाट में 31 अक्टूबर को सम्पन्न हुआ। उनकी चिता को मुखाग्नि उनके भतीजे ने दी। भारतीय भाषाओं व भारतीय संस्कृति के अमर ध्वजवाहक 57 वर्षीय राजकरण सिंह, भारतीय भाषाओं को संघ लोकसेवा आयोग की परीक्षाओं में अग्रेजी अनिवार्यता के बंधन से मुक्त करने के लिए देश की राजधानी दिल्ली में अपने साथी पुष्पेन्द्रसिंह चैहान के साथ ‘अखिल  भाारतीय  भाषा संरक्षण संगठन’ के बेनरतले, संघ लोक सेवा आयोग ‘यूपीएससी’ के समक्ष 16 ंसाल लम्बे  चले आंदोलन का सह...

देश व उत्तराखण्ड के हित में रेल परियोजना के उदघाटन समारोह का विरोध अनुचित

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देश व उत्तराखण्ड के हित में रेल परियोजना के उदघाटन समारोह का विरोध अनुचित  नई दिल्ली (प्याउ)।उत्तराखण्ड राज्य गठन के प्रमुख जनांदोलनकारी संगठनों ने ंकेन्द्र सरकार द्वारा ‘ऋषिकेश से कर्णप्रयाग रेलमार्ग’ को स्वीकृत करने व इस परियोजना का 6 नवम्बर को गोचर में शुभारम्भ सप्रंग सरकार की प्रमुख सोनिया गांधी द्वारा किये जाने के निर्णय का ंहार्दिक स्वागत करते हुए ंइस परियोजना का खुले दिल से स्वागत करने के  बजाय मात्र सोनिया गांधी के द्वारा शुभारंभ होने का विरोध करने ंको उत्तराखण्ड ही नहीं देश के हितों पर कुठाराघात करने वाला कदम बताया। ं राज्य आंदोलन के प्रमुख संगठनों, उत्तराखण्ड जनता संघर्ष मोर्चा, उत्तराखण्ड जनमोर्चा, उत्तराखण्ड महासभा व उत्तराखण्ड राज्य लोकमंच की तरफ से जारी एक वयान मे अफसोस जाहिर किया गया कि पहली बार आठ दशक से अधिक लंम्बे समय से ठण्डे बस्ते में दम तोड रही ऐतिहासिक ‘ऋषिकेश से कर्णप्रयाग रेलमार्ग’ निर्माण परियोजना जो राष्ट्रंीय सुरक्षा व उत्तराखण्ड के विकास की दृष्टि से मील का पत्थर साबित होगी, उसके उदघाटन समारोह के विरोध में बयानबाजी करने वाले भाजपा नेताओं से पुरजोर ...

शीतकाल के लिए केदारनाथ व यमुनोत्री के कपाट हुए बंद

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शीतकाल के लिए केदारनाथ व यमुनोत्री के कपाट हुए बंद विश्व विख्यात केदारनाथ धाम व यमुनोत्री के कपाट  शीतकाल के  लिए 28 अक्टूबर को विधिविधान से बंद कर दिये गये। शीतकाल में जहां भगवान सदाशिव केदारनाथ की विधिवत पूजा उनके शीतकालीन गद्दी ऊखीमठ के ओंकारेश्वर मंदिर में तथा  ंयमुनोत्री की शीतकालीन पूजा खरसाली में ंकी जाती है। गौरतलब है कि चंार धाम यात्रा से विश्वविख्यात भगवान बदरीनाथ धाम व केदारनाथ धाम के साथ यमुनोत्री व गंगोत्री की पावन यात्रा  शीतकाल के दोरान बंद ंहोती  है तथा देवताओं की पूजा इनके शीतकालीन स्थलों पर विधिवत की जाती है।  केदारनाथ व यमुनोत्री के बाद इसी पखवाडे बदरीनाथा व गंगोत्री धाम के कपाट भी शीतकाल के लिए बंद ंहो जायेंगें। ंसनातन धर्मावलम्बी लाखों की संख्या में देश विदेश  से हिन्दुओं के इन सर्वोच्च धामों के दर्शन पूजन के लिए हर साल यहां आते है।