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माकन को सौंप सकती है कांग्रेस दिल्ली की कमान व शीला बन सकती है केन्द्रीय मंत्री  शीला के कुशासन से आक्रोशित जनता का गुस्सा कम करने के लिए कांग्रेस चलेगी माकन का दाव  अजय माकन, विजय गोयल व अरविन्द केजरीवाल के नेतृत्व में होगा दिल्ली विधा नसभा चुनाव  अजय माकन ने केन्द्रीय मंत्रीमण्डल से इस्तीफे की यकायक आयी खबर से दिल्ली के लोगों के लिए भले ही चैंकाने वाली खबर हो। परन्तु कांग्रेस की राजनीति के मर्मज्ञ इस इस्तीफे के राजनैतिक अर्थ ढूढने में लगे हुए है। सियासी जगत में चर्चा है कि अजय माकन को दिल्ली के मुख्यमंत्री की कमान व दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षत को केन्द्रीय मंत्री बनाये जाने की प्रबल संभावनायें है। अजय माकन दिल्ली के मुख्यमंत्री के सबसे प्रबल दावेदार है। कांग्रेसी नेता अजय माकन की नजर दिल्ली के मुख्यमंत्री की कुर्सी पर लम्बे समय है। इसी साल दिल्ली के विधानसभा चुनाव को देखते हुए कांग्रेस नेतृत्व इस बात से काफी परेशान है कि मुख्यमंत्री शीला दीक्षित व प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष अग्रवाल के बीच विवाद थमने का नाम नहीं ले रहा है। राहुल गांधी स्वयं कई बार दोनों...
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गुजरात में संदिग्ध आतंकियों की मुठभैड़ पर विधवा विलाप करने वाले मानवाधिकार के पुरोधा मुजफरनगर काण्ड-94 पर मौन क्यों? पुलिस मुठभेड में एक संदिग्ध आतंकियों की मौत पर पूरे देश में आसमान सर पर उठाने वाली कांग्रेस, सपा सहित न्याय की पेरोकार व्यव स्था ने उप्र में उत्तराखण्ड राज्य गठन जनांदोलन में देश व मानवता को शर्मसार करने वाले मुजफरनगर काण्ड-1994 पर शर्मनाक मौन क्यों रखा हुआ है? इस काण्ड में इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने इसके लिए तत्कालीन उप्र के मुलायम व केन्द्र की राव सरकार को न केवल दोषी ठहराया था अपितु इसको नाजी अत्याचारों की श्रेणी में रखा गया था। इस काण्ड में सीबीआई व मानवाधिकार संगठनों ने भी उप्र के पुलिस व प्रशासन के उच्चाधिकारी अनन्त कुमार, बुआसिंह व नसीम सहित दर्जनों को दोषी माना था। राव व मुलायम की सरकारों के शह पुलिस प्रशासन ने उत्तराखण्ड राज्य गठन आंदोलनकारियों को गोलियों से भून कर मार डाला था इसके साथ सेकडों महिलाओ से सामुहिक बलात्कार करके भारतीय संस्कृति को कलंकित करने का काम किया था। इस काण्ड के 19 साल के बाद भी भारत की न्याय व्यवस्था ही नहीं सभी दलों ने शर्मनाक मौन रखा...
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अफगानिस्तान में तालिबानी दलदल में आकंठ फंसा अमेरिका  काबुल (प्याउ)। भले ही अमेरिका ने हमला करके अफगानिस्तान की सत्ता से तालिबानी शासकों को उखाड फेंका हो परन्तु अपने हजारों सैनिकों व अरबों खरब डालर यहां से तालिबानों का खात्मा के लिए पानी की तरह बहाने के बाबजूद अमेरिका तालिबानों की रीढ़ नहीं तोड़ पाया। सोमवार 10 जून को जिस प्रकार तालिबान ने अफगानिस्तान की राजधानी काबुल के अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे पर तडके मशीनगनों और बमों से हमला कर दिया। उससे तालिबानों की ताकत का एक परचम ही है। गौरतलब है कि हवाई अड्डे के समीप ही उत्तर अटलांटिक संधि संगठन (नाटो) की अगुवाई वाली सेना का ठिकाना भी है। पुलिस का कहना है कि हमलावर पुलिस की वर्दी में थे और उनका निशाना हवाई अड्डे का वह हिस्सा था जिसका इस्तेमाल सैनिक उद्देश्यों के लिए होता है।इस प्रकार के हमलों के बाद अमेरिका चाह कर भी अफगानिस्तान से बाहर नहीं निकल पा रहा है। यही हालत नाटों की भी है। तालिबानी आतंक के आगे एक प्रकार अमेरिका ने हार सी मान ली है। वह अब अफगानिस्तान से किसी प्रकार से छुटकारा चाहता है। इसके लिए वह तालिबानों से भी समझोता करने...
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आंदोलनकारियों से मुख्यमंत्री की हुई सकारात्मक वार्ता पर विरोध क्यों? मैं हैरान हॅू कि 4 जून को 12 साल बाद किसी भी उत्तराखण्ड के मुख्यमंत्री ने उत्तराखण्ड राज्य गठन जनांदोलन के आंदोलनकारी संगठनों से वार्ता करने करने की पहल क्या की कि कुछ लोगों ने ऐसा विरोध किया कि जेसे उत्तराखण्ड के हितों पर कोई डाका डाल दिया गया हों। क्या मुख्यमंत्री से मिल कर उत्तराखण्ड जनांकांक्षाओं के बारे में बात करना गलत काम है? राज्य गठन के लिए क्या जिन लोगों ने राज्य गठन के लिए अपना सर्वस्व निछावर कर दिया था उनसे वार्ता करना कोई अपराध है। क्या मुजफरनगर काण्ड-94 के गुनाहगारों को सजा अभी तक न दिये जाने के लिए राज्य गठन की अब तक की सरकारों को धिक्कारते हुए मुख्यमंत्री को इस दिशा में काम करने की बात करना, उत्तराखण्ड के खिलाफ काम है? क्या विरोध करने वाले बतायें कि मुख्यमंत्री से गैरसैंण में राजधानी बनाने की पुरजोर मांग करना गलत है? क्या उत्तराखण्ड गठन के बाद तिवारी व खण्डूडी सरकारों द्वारा रखे गये शर्मनाक मौन के कारण प्रदेश में थोपे गये उत्तराखण्ड विरोधी जनसंख्या पर आधारित विधानसभाई परिसीमन पर बात करना कोई गुन...
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राजनीति से भी सन्यास लें आडवाणाी! भले ही संघ के हस्तक्षेप व अपनी वर्तमान दयनीय स्थिति को भांपते हुए लालकृष्ण आडवाणी ने अपना इस्तीफा वापस ले लिया परन्तु उन्होंने अपने इस दाव से एक ही काम किया, वह है  मनमोहनी कुशासन को मजबूती । भले ही आडवाणी के मान जाने के बाद भाजपाई प्रसन्न होंगे परन्तु आडवाणी का यह कदम देश की लोकशाही के लिए कहीं दूर-दूर तक शुभ नहीं है। लालकृष्ण आडवाणी के इस्तीफे से बैचेन भाजपा को एक बात समझ लेनी चाहिए कि कोई भी व्यक्ति देश व समाज से बढ़ कर नहीं होता है। वह भी लालकृष्ण आडवाणी जेसे वयोवृद्ध नेता जिनको पार्टी इस सबके बाबजूद पूरा आदर दिया व अब उनकी हटघर्मिता के आगे मनोगुहार करने में लगी है, को तो अविलम्ब इस्तीफा स्वीकार कर सलाह देनी चाहिए कि आप संसदीय दल से ही नहीं राजनीति से भी तत्काल इस्तीफा दे दें। देश को किसी व्यक्ति की अंध सत्तालोलुपता के लिए बलि का बकरा नहीं बनाया जा सकता है। संघ व भाजपा को आडवाणी को दो टूक शब्दों में संदेश दे देना चाहिए कि आप अब राजनीति से सन्यास ले लें। देश को मनमोहन सिंह के कुशासन से मुक्ति दिलाने की आशा की किरण बन कर उभरे गुजरात के म...
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मेमना बने खुद को टाइगर कहने वाले मुख्यमंत्री बहुगुणा असंतुष्ट कांग्रेसी विधाययकों , सांसदों व तिवारी के प्रहारो से मुख्मंत्री की कुर्सी खतरे में देहरादून(प्याउ)। लोकतंत्र में भी खुद को टाइगर कहने वाले उत्तराखण्ड के मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा इन दिनों अपने ही असंतुष्ट कांग्रेसी विधायकों के खुले आम बगावत के कारण मेमना बनना पड रहा है। इन दिनों न केवल अपने ही दल के असंतुष्ट विधायकों से बुरी तरह से घिर गये हैं अपितु अपने सरपरस्त रहे कांग्रेस दिग्गज नेता नारायण दत्त तिवारी के वक्रदृष्टि के दंश झेल रहे है। कांग्रेस आलाकमान सोनिया गांधी व दिल्ली में अपने कांग्रेसी मठाधीश बने आकाओं से मिले अभयदान के बाबजूद उत्तराखण्ड के मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा की कुर्सी पर खतरा कम होने का नाम नहीं ले रहा है। लोकशाही में जनसेवक समझे जाने वाले जनप्रतिनिधी द्वारा खुद को टाइगर बताने से साफ हो गया कि उनको न तो लोकशाही से कोई लेना देना नहीं है व नहीं उनके दिलो दिमाग में लोकशाही के प्रति कोई सम्मान ही है। मुख्यमंत्री के टाइगरी तैवरों का माकूल प्रत्युत्तर देते हुए कांग्रसी दिग्गज व केन्द्रीय हरीश रावत ने खुद ...
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तीन धारा के होटलों से प्रेरणा ले सरकार व जनता  उत्तराखण्ड में रिषिकेश से बदरीनाथ मार्ग में व्यासी व देवप्रयाग के बीच तीन धारा पर  डेढ़ दशक से अधिक समय से हर दिन हजारों लोगों को उत्तम व पर्वतीय खाद्यानों युक्त सस्ता नाश्ता व भोजन खिलाने वाले दो दर्जन से अधिक खाने की छोटे होटलों से  छोटी-मोटी नोकरी के लिए दिल्ली, दुबई व देश विदेश में जा कर पलायन का दंश झेलने वाले 70 लाख उत्तराखण्डियों को प्रेरणा लेना चाहिए। रिषीकेश से लेकर बदरीनाथ तक कहीं ऐसे सस्ते, अच्छे खाना खाने के होटल तक नहीं है जहां आम आदमी से लेकर यहां आने वाले पर्यटकों व तीर्थ यात्रियों को कम दामों से अच्छा खाना मिलता हो। सबसे अच्छी बात यहां यह है कि यहां पर अधिकांश दाल व सब्जी इसी क्षेत्र के गांवों में उत्पादित होती है। इस तीन धारा के आस पास के स्थानीय लोगों को ही यहां पर अच्छा रोजगार मिला हुआ है। जो काम हमारी सरकार 12 साल में नहीं कर पायी वह काम तीन धारा के इन दो दर्जन होटल वाले स्थानीय भाईयों ने करके दिखाया। यहां पर अधिकांश यात्री खाना नाश्ता खाना पसंद करते है। यहां पर वो लूट खसोट नहीं है जो इस मार्ग य...