-कहां गुम हो गयी हरीश रावत व हरक सिंह की हुंकार


-उत्तराखण्ड को  पदलोलुपु नेताओं से नहीं अपितु भगवान बदरीनाथ से मिलेगा न्याय/
-कहां गुम हो गयी हरीश रावत व हरक सिंह की हुंकार /
उत्तराखण्ड प्रदेश में कांग्रेस आला कमान द्वारा थोपे गये मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा की सरकार द्वारा  आज 29 मार्च को विश्वास मत में विजय बासिल करने से एक बात साफ हो गयी हैं कि कांग्रेस पार्टी में एक भी ऐसा नेता नहीं रहा जो उत्तराखण्ड की लोकशाही व जनसम्मान के लिए आवाज उठाने की हिम्मत रखता है। सबके सब पदलोलुपु है। प्रदेश गठन के लिए जिन आंदोलनकारियों ने संघर्ष किया था और जिन्होंने इसके गठन की शहादतें दी उनकी आत्मा प्रदेश की लोकशाही के लिए जिस प्रकार का शर्मनाक खिलवाड कांग्रेस व भाजपा के आलाकमानों ने तिवारी, खण्डूडी, निशंक व विजय बहुगुणा जेसे नेताओं को थोपने से रो रही होगी। 12 साल में अब तक के हुक्मरानों ने जिस प्रकार से प्रदेश की जनांकांक्षाओं को रौदने का कार्य किया उससे प्रदेश आज भी गैरसेण राजधानी न बनाये जाने, मुजफरनगर काण्ड के अभियुक्तों को दण्डित न किये जाने, प्रदेश में जनसंख्या पर आधारित विधानसभाई परिसीमन थोपने, तथा प्रदेश में जातिवाद-क्षेत्रवाद व भ्रष्टाचार की गर्त में धकेलने वाला कुशासन से प्रदेश की आशाओं पर एक प्रकार से बज्रपात ही कर दिया है।
आज जिस प्रकार से सोनिया गांधी ने प्रदेश व पार्टी के हितों को नजरांदाज करके विजय बहुगुणा को थोपा था, उस का विरोध में जिस प्रकार से दिग्गज कांग्रेसी नेता हरीश रावत ने न्याय का विगुल बजाया व इसके विरोध में जिस प्रकार से कांग्रेसी नेता हरक सिंह रावत ने हुंकारें भरी थी, वह आज विश्वास मत में न जाने कहां गायब हो गयी। कांग्रेसी आला नेतृत्व ने अपने मोहरे को यहां पर आसीन करने के लिए पहले कांग्रेस के उत्तराखण्डी दिग्गजों को आपस में लडवाया, अब विजय बहुगुणा की सरकार को विश्वास मत हासिल करने के बाद फिर भी एक दूसरे से उलझा कर अपना उल्लू सीधा कर रहे हैं सतपाल महाराज तो पहले ही आला कमान की पसंद के समर्थन में ही उतर चूके थे। उन्हें भी अपने अहं से उपर उठ कर प्रदेश की लोकशाही व सम्मान की रक्षा की बात नजर नहीं आयी।  प्रदेश की जनता जिसने भाजपा के थोपशाही को प्रदेश से उखाड फेकने का काम किया था वह अब कांग्रेस की थोपशाही को ढोने के लिए कहार बन गये अपने इन पद लोलुपु नेताओं हरीश रावत, सतपाल महाराज व हरक सिंह रावत से जरा आश लगाये बैठी थी वह आशा आज इनके कहार बनने से टूट गयी। यशपाल आर्य आदि अन्य नेताओं से विरोध की आश करना भी नाइंसाफी होगी। परन्तु भगवान बदरीनाथ न्याय करता है। देश ने देखा केसे तिवारी, खण्डूडी व निशंक के कुशासन से प्रदेश की रक्षा की गयी, आखिर भगवान जरूर न्याय करते है। गलत काम कोई भी करे भगवान के दरवार में कभी न्याय नहीं होता। कांग्रेस को भाजपा की तरह उत्तराखण्ड की लोकशाही से खिलवाड करने का दण्ड 2014 के लोकसभा चुनाव में देश के सत्ता से बनवास झेल कर चूकाना होगा। सबसे शर्मनाक बात यह है कि प्रदेश में भाजपा की तरह ही कांग्रेस में भी कोई ऐसा नेता नहीं हैं जो अपने संकीर्ण हितों से उपर उठ कर प्रदेश के हितों के लिए इन सत्तांध आलाकमानों के दंभ को ताड़ने के लिए इनको लोकशाही का आईना दिखाने का साहस कर सके। इन पदलोलुपु नेताओं को एक बात का भान रहना चाहिए कि जिस आत्म सम्मान की रक्षा के लिए हमारे पूर्वजों ने शताब्दियों का संघर्ष किया, मुगलों व फिरंगियों का अत्याचार के आगे सर न झुकाते हुए अपने आत्मसम्मान की रक्षा के लिए सत्ता को ठोकर मार कर उत्तराखण्ड की पथरिली वादियों में हर बदहाली में भी जीते रहे, परन्तु आज प्रदेश में लोकशाही के हितों व हक हकूकों की रक्षा के निर्णायक समय पर ये तथाकथित नेता अपने निहित व दलीय छुद्र स्वार्थो में अंधे हो कर अन्याय की पालकी ढोने के लिए कहार बने हुए है। इनको एक बात समझ लेनी चाहिए कि उत्तराखण्ड का समाज आत्मसम्मान की रक्षा के लिए अपना सर्वस्व बलिदान देने वाले राणा प्रताप को तो सर आंखों में रखता हैं परन्तु सत्ता के लिए अपना आत्मसम्मान रौदने वाले मानसिंहों को सदा धिक्कारता है। सबसे हेरानी व शर्मनाक बात यह है कि भाजपा की तरह कांग्रेस में भी एक भी ऐसा नेता नहीं रहा जो जनरल टीपीएस रावत की तरह कांग्रेस व भाजपा के आलाकमानों को लोकशाही का पाठ पढ़ाने के लिए ठुकराने की हिम्मत रखते हुए प्रदेश के हितों की रक्षा के लिए उत्तराखण्ड का ही दल गठित कर सके। जबकि भाजपा व कांग्रेस के तथाकथित बडे नेता धन व जनबल में टीपीएस से कई गुना बडे हैं परन्तु इनमें नैतिक बल व प्रदेश के हितों के लिए आला कमान को ठुकराने का साहस तक नहीं है।

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