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Sunday, June 30, 2013


नक्कारे मुख्यमंत्री बहुगुणा से अधिक गुनाहगार है सोनिया 


मुख्यमंत्री बहुगुणा की अकुशलता ने और खौपनाक बना दिया उत्तराखण्ड में आयी राष्ट्रीय त्रासदी को 



सोनिया गांधी द्वारा बलात थोपे गये मुख्यमंत्री की अकुशलता का दण्ड भोग रहा है उत्तराखण्ड स
हित राष्ट्र

उत्तराखण्ड में इस पखवाडे आयी विनाशकारी प्राकृतिक आपदा को प्रदेश के मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा की अक्षम सरकार ने और भी खौपनाक बना दिया। इस त्रासदी को विकट बनाने वाले मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा व उनकी मृतप्राय सरकार से अधिक अगर कोई गुनाहगार है तो कांग्रेस की आलाकमान जिन्होने विधायक व जनता द्वारा नकारे गये व्यक्ति को प्रदेश को बलात मुख्यमंत्री के रूप में थोपा और बार बार असफल होने के बाबजूद इनको थोपे रखा है। अगर भारतीय जांबाज सैनिक(सेना/वायुसेना/भातिसीसु/आपदा)
इस राहत व बचाव में नहीं आते तो प्रदेश सरकार इस देवभूमि में फंसे लोगों का क्या दुर्दशा करती इसकी कल्पना से भी लोगों की रूह भी कांप जाती है। सैनिकों ने ही यहां फंसे 1 लाख 7 हजार से अधिक लोगों को सुरक्षित निकाला, सडके व पुल बनाये व आपदा में फंसे लोगों के लिए फरिश्ते साबित हुए। पूरा देश जहां जांबाज सैनिकों को शतःशतः नमन् कर रही है। वहीं इस त्रासदी में मृतप्राय प्रदेश सरकार के नक्कारेपन के लिए मुख्यमंत्री बहुगुणा व इस नक्कारे सरकार को संरक्षण देने वाली सोनिया गांधी को धिक्कार रहे है। 
इस त्रासदी के 15 दिन बाद भी प्रदेश के मुख्यमंत्री न तो पौने दो सो करोड लोगों की विश्व प्रसिद्ध श्रद्धा के सर्वोच्च धाम केदारनाथ जी जो इस त्रासदी का सबसे सबसे ज्यादा प्रभावित रहा और यहीं हजारों लोग इस त्रासदी में जमीदोज हो गये, वहां की धरती पर जाने का मुख्यमंत्री का एवं एक मानवीय दायित्व तक नहीं निर्वाह करके लोगों के जख्मों में नमक छिडकने का काम किया। 
इस विकट राष्ट्रीय संकट में पीडितों तक राहत पंहुचाने खुद जाने के लिए आगे आयी स्वयं सेवी संस्थाओं को सहयोग करने के बजाय उनका राह रोकने का काम करके प्रदेश के मुख्यमंत्री व उनकी सरकार ने इस त्रासदी को और विकट बना दिया। इस त्रासदी में मारे गये लोगों का अंतिम संस्कार तक समय पर न करा कर लोगों के जख्मों पर प्रदेश की मृतप्रायः सरकार ने नमक छिडकने का काम किया। प्रदेश सरकार केवल एक ही काम कर रही है वह प्रदेश में मारे गये लोगों की संख्या छुपाने में और पीडितों को राहत पंहुचाने के लिए आने वाले स्वयंसेवी संस्थाओं का रास्ता रोकने के लिए। सरकार को भय है कि कहीं इस खौपनाक हादसे की सच्चाई पूरा जग न जान जाये। 
न तो इस सरकार ने अपना दायित्व निभाया व नहीं मुख्यमंत्री व उसकी सरकार ने जनआस्थाओं का सम्मान किया व नहीं इस विश्व को झकझोर रही इस त्रासदी में सामान्य सा मानवीय व राज धर्म का ही पालन किया। इसके लिए अगर कोई गुनाहगार है तो कांग्रेस की आलाकमान सोनिया गांधी जिन्होने अपने आत्मघाति संकीर्ण सलाहकारों की सलाह पर विजय बहुगुणा जैसे व्यक्ति को प्रदेा का मुख्यमंत्री बनाया व तमाम असफलताओं के बाद भी थोपे रखा। ऐसे मुख्यमंत्री को 
कांग्रेसी आलाकमान द्वारा जनता व कांग्रेसी विधायकों दोनों द्वारा नकारे गये व्यक्ति विजय बहुगुणा को बलात मुख्यमंत्री के रूप में थोपे जाने का खमियाजा आज उत्तराखण्ड व देश को इस आपदा में भी उत्तराखण्ड सरकार की अकुशलता व दिशाहीनता का दण्ड भोगना पड़ रहा है।
हालत इतने बदतर है कि अपने मुख्यमंत्री व सरकार के इस आपदा पर भी गैर जिम्मेदाराना व अलोकतांत्रिक व्यवहार के कारण बदरीनाथ के कांग्रेसी विधायक राजेन्द्र भण्डारी को भी सार्वजनिक ढ़ग से लोकशाही का आईना दिखाना पडा। इसी कारण रूद्र प्रयाग में आक्रोशित जनता के आक्रोश का कोप भाजन बन कर मुख्यमंत्री बहुगुणा, आपदा मंत्री यशपाल आर्य व कबीना मंत्री हरक सिंह रावत को हेलीकप्टर से उल्टे पांव वापस जाना पडा। महिलाओं ने मुख्यमंत्री व उनकी सरकार को उनके निकम्मेपन के कारण चूड्डियां भेंट की। आपदा प्रबंधन व राहत पंहुचाने में प्रदेश सरकार का इतना गैरजिम्मेदाराना रवैया रहा कि बदरीनाथ जेसे विश्वविख्यात धाम में इस आपदा में फंसे 20 हजार लोगों को भी खाद्यान्न की समस्या से जुझना पडा। इससे साफ हो गया कि छोटी छोटी जगहों में फंसे लोगों को कितनी तकलीफ उठानी पडी होगी।इनकी सुध लेने की आश करना भी बहुगुणा सरकार से करना एक प्रकार से नाइंसाफी होगी। मुख्यमंत्री बहुगुणा व उनकी सरकार की संवेदनहीनता इसी बात से जगजाहिर हो गयी कि जिस दिन उत्तराखण्ड इस भयंकर त्रासदी से गुजर रहा था, देश के प्रधानमंत्री व कांग्रेस अध्यक्षा स्वयं दोनों प्रभावित क्षेत्रों का हवाई निरीक्षण कर रहे थे उसी दिन प्रदेश के मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा, आपदा प्रबंधन मंत्री यशपाल आर्य, कबीना मंत्री हरक सिंह रावत व इंदिरा हृदेश के अलावा प्रदेश के मुख्य सचिव सुभाष कुमार व वित्त सचिव राकेश शर्मा आपदा क्षेत्रों में राहत व बचाव कामों को दिशा देेने के बजाय दिल्ली में देखे गये। दिल्ली में कई कांग्रेसी आला नेताओं द्वारा उनके दिल्ली में रहने पर डपट लगाने के कारण किसी की भी इतनी हिम्मत नहीं हुई कि दिल्ली में होने के बाबजूद वे कांग्रेस के कार्यकारी आला नेतृत्व राहुल गांधी को उनके जन्म दिन पर बधाई देने के लिए उनके द्वार पर कदम रखने का साहस कर पाये। राहुल गांधी इस आपदा के बाद यकायक जिस तरह से कुछ दिनों के देश को इस दर्दनाक हालत में छोड कर ओझल होने के बाद यकायक प्रकट हो कर कांग्रेस सरकार की मोदी सहित अन्य दलों के नेताओं को प्रभावित क्षेत्रों में न जाने देने राजनीति को खुद ही उत्तराखण्ड में जा कर बेनकाब कर गये । 
जिस प्रकार से प्रदेश के मुख्यमंत्री वमंत्रियों के खिलाफ जनता में आक्रोश बढ रहा है, प्रदेश सरकार का मुख्यमंत्री भगवान के द्वार पर जाने का साहस तक नहीं कर पा रहा है। प्रदेश सरकार का नुमाइंदा जो मंदिर कमेटी का सरताज बना हुआ है वो जनआस्थाओं को रौंद कर जूते ले कर मंदिर में प्रवेश कर रहा है। लोगों को राहत देने में सरकार पूरी तरह असफल है। सरकार की अकर्मण्यता व अमानवीय रूख देख कर न केवल प्रदेश के विधानसभाध्यक्ष ही नहीं अपितु राज्यपाल भी अपनी अप्रसन्नता जाहिर कर चूके है। इसके बाबजूद सोनिया गांधी पूरी तरह से असफल हो चूके ऐसे मुख्यमंत्री को संरक्षण दे कर आहत प्रदेश व देश के जख्मों को कुरेदने का काम कर रही है। देश व प्रदेश को मर्माहित करने वाली इस त्रासदी के हजारों पीड़ितों के जख्मों व करोड़ों लोगों की जनास्था को रौदा जा रहा है। ऐसे व्यक्ति को एक पल के लिए भी प्रदेश की कमान सौपना प्रदेश को रसातल में धकेलने के समान है। इससे न केवल प्रदेश का विकास अवरूद्ध हो जायेगा अपितु प्रदेश को मिले जख्म नासूर बन जायेंगे।

Thursday, June 27, 2013


मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा 13 वें दिन भी केदारनाथ तक नहीं जा पाये 


भगवान शिव ने दिया केदानाथ धाम में जूता पहने के घुसे दर्जा धारी कांग्रेसी मंत्री को चेतावनी 

उत्तराखण्उ का एक सचिव हर दिन आ रहा है हेलीकप्टर से दिल्ली

विजय बहुगुणा थोपने के लिए माफी मांगे सोनिया 

उत्तराखण्ड आपदा में बचाव व राहत के लिए सेना को सलाम, विजय बहुगुणा सरकार को लानत

सेना के कमाण्डर फंसे यात्रियों के साथ 12 किमी पैदल चले, 


पूरा विश्व केदारनाथ में हुई विनाशकारी त्रासदी से स्तब्ध है। हजारों आदमी मारे जा चूके हैं परन्तु उत्तराखण्ड का मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा 13 वें दिन (27 जून तक ) भी केदारनाथ धाम की सुध लेने का दायित्व भी नहीं निभा पाये। वह तो भला हो भारतीय सेना का जिसने एक लाख से अधिक पीड़ितों को बचाव व राहत पंहुचायी। एक तरफ भारतीय सेना/वायुसेना/भातिसुब/आपदा प्रबंधन के जाबांज जवानो ने अपनी जान को दाव पर लगा कर उत्तराखण्उ में गत सप्ताह आयी प्राकृतिक आपदा में फंसे सवा लाख से अधिक श्रद्धालुओं को ेबचा कर पूरे देशवासियों का दिल जीत लिया वहीं उत्तराखण्ड के मुख्यमंत्री इस प्राकृतिक आपदा में सबसे ज्यादा तबाह हुए केदारनाथ धाम में 13 दिन बाद भी हेलिकप्टर के सहायता से भी वहां की धरती पर उतरने का साहस नहीं कर पा रहे है। पूरा देश भौचंक्का है कि उत्तराखण्ड के मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा आखिर क्यों इस आपदा से सबसे ज्यादा तबाह हुए संसार भर के सवा सो करोड़ भारतीयों के आराध्य धाम केदारनाथ में 13 वें ेदिन भी क्यों नहीं जा पाये है। वहां न जा पाने के कारण उन्होंने शायद मोदी को भी वहां जाने से रोका। उनको लगता कि लोग क्या कहेगे कि प्रदेश का मुख्यमंत्री तो जा नहीं पाया और सुदूर गुजरात का मुख्यमंत्री वहां चले गया। शायद इसी कारण उन्होंने मोदी को भी वहां जाने से रोक कर पूरी कांग्रेस को जनता की नजरों में खलनायक बनाने की धृष्ठता की। इससे लगता है या तो बहुगुणा अंदर से बहुत भयभीत है या किसी ज्योतिषि ने उनको डरा दिया। जो वे सुदूर पिथोरागढ़ से लेकर रूद्रप्रयाग की धरती पर तो जा रहे हैं दिल्ली भी पंहुच रहे हैं परन्तु केदारनाथ की धरती पर जाने से अंदर से साहस तक नहीं जुटा पा रहे है। उनके केदानाथ में उतर कर वहां की त्रासदी का जायजा लेने का पहला पदेन दायित्व का भी निर्वाह उन्होंने किया हो ऐसा किसी समाचार या सरकार द्वारा जारी समाचारों में पढ़ने व सुनने में नहीं आया।
वहीं उत्तराखण्ड की इस आपदा मे जहां पूरे विश्व का ध्यान लगा हुआ है। अरबों लोगों की श्रद्धा के केन्द्र केदारनाथ धाम की पावनता के साथ कांग्रेस के मुख्यमंत्री ने कितनी उपेक्षा की यह उनके दर पर अब तक न पंहुचने से साफ हो गया। होना तो यह चाहिए था कि इस आपदा में मारे गये लोगों के लिए हरिद्वार में शांति यज्ञ करने की घोषणा करने वाले मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा को सबसे पहले केदारनाथ धाम में जा कर भगवान शिव के समक्ष अपने मंत्रिमण्डल व सभी दलों के नेताओं को ले जा कर देवभूमि की जनआस्था व प्रकृति से खिलवाड़ करने के लिए माफी मांगनी चाहिए थी। ऐसा करना तो रहा दूर मुख्यमंत्री केदारनाथ भगवान का इस त्रासदी में रूद्र रूप देख कर वहां पर जाने की हिम्मत तक नहीं जुटा पा रहे है। उन्हें अंदर से शायद यह डर सता रहा है कि अगर वहां गये तो कहीं भगवान शिव फिर क्रांेधित हो गये।
भगवान बदरी केदानाथ की पावनता का उत्तराखण्ड की सरकारों को कितना खिलवाड़ किया, इसका जीता उदाहरण विजय बहुगुणा की सरकार द्वारा बदरी-केदारनाथ मंदिर समिति द्वारा जूते सहित भगवान केदारनाथ मंदिर में जाने से ही उजागर होता है। भगवान केदारनाथ में तो साक्षात भगवान शिव विराजमान है। इस घटना के बाद गणेश गोदियाल के क्षेत्र में बादल फटने की घटना को भी लोग भगवान शिव की गोदियाल को चेतावनी ही मान रहे है। इससे पहले तिवारी शासन काल में भी ऐसे ही एक ऐसे वाममार्गी को इस मंदिर समिति का अध्यक्ष बना दिया गया जो धार्मिक भावनाओं को नहीं मानते है।
मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा, उनके मंत्री व नौकरशाह कितने संवेदनहीन है यह तो उनके दिल्ली दौरे से उजागर हो गया। परन्तु प्रदेश का  मुख्यमंत्री का सबसे करीबी वरिष्ट सचिव का हर रोज दिल्ली में हवाई मार्ग से आना भी प्रदेश की नौकरशाही व प्रदेश की आपदा के प्रति उनके कार्यो को ही बेनकाब करती है। जिस हेलीकप्टर को लोगों के निकासी के लिए लगना चाहिए था, आपदा के कार्यो में लगना चाहिए था वह हेलीकप्टर को वहां का एक महत्वपूर्ण नौकरशाह हर रोज दिल्ली आने में लगाये रखता तो वहां के आपदा प्रबंधन की क्या दशा होगी। भला हो सेना वालों का जिन्हेाने लोगों का बचाव व आपदा पंहुचायी। प्रदेश सरकार के भरोसे तो ेहो गया था यह काम। वहां पर प्रदेश सरकार ने जो  प्राइवेट हेलीकप्टर किये है प्रतिदिन उनका लाखो रूपया किराया चुकाता है प्रदेश वह हेलीकप्टर प्रदेश सरकार ने नेताओं व नोकरशाहों की आपदा के नाम पर सैर सपाटे में लगा रखे है। प्राइवेट हेलीकप्टर ने किस प्रकार के राहत पीड़ितों को ेदी वह तो एक हेलीकप्टर संचालक द्वारा यात्रियों को पहले निकालने के लिए लाखों रूपया की मांग करने ेसे उजागर हो गयी। हेलीकप्टर प्रकरण में कितना चूना प्रदेश को लगेगा यह तो जांच के बाद ही पता चलेगा या आपदा के शौर में जमीदोज हो जायेगा। परन्तु एक बात स्पष्ट है आज कांग्रेस आला कमान व उनके उन सलाहकारों को ेभगवान शिव से ओर उत्तराखण्ड की जनता से विजय बहुगुणा जेसी निक्कमी सरकार थोपने के लिए माफी मांगनी चाहिए।
इस आपदा की कमान अपने हाथों में ले कर स्वयं आपदा प्रभावितों व सेना के जांबाजों का होेसला बढाने के लिए उतरे सेना के मध्य कमान के कमांडर जनरल को हमारा सलाम। सेना की मध्य कमान के जनरल आफिसर कमांडिंग इन चीफ ले. जनरल अनिल चैत ने 27 जून को बृहस्पतिवार को कुछ ऐसा ही कर दिखाया। बताया जा रहा है कि जनरल चैत पांडुकेश्वर व गोविंदघाट में फंसे 532 लोगों के जत्थे के साथ न सिर्फ 12 किमी पैदल चलकर जोशीमठ पहुंचे बल्कि विकट रास्ते में लोगों की मदद के लिए अपना कंधा भी बढ़ाया। सैन्य इतिहास में शायद यह पहला अवसर है जब इस तरह की प्राकृतिक आपदा में आर्मी कमांडर ओहदे का सैन्य अफसर भी खुद पहाड़ की पैदल पगडंडियों को नापकर आपदा प्रभावितों की मदद कर रहा है। 

Sunday, June 23, 2013

हकीकत को कोई नक्कार नहीं सकता


अपने भागीरथों व सपूतों पर नाज होता है हर समाज को

कई लोगों को इस बात से दुखी हैं कि धोनी व उन्मुक्त आदि प्रदेश में बसे आज की दुनिया के चमकते सितारे खुद को उत्तराखण्डी नहीं अपितु जिस शहर व प्रदेश में वे रहते हैं खुद को उसी का बताते हैं। व्यवहारिक दृष्टि से यह उचित भी है। क्योंकि अगर धोनी जैसे  लोग उस धरती जिसने उनको सामान्य से देश का महानायक बनाने का आसमान दिया व सम्मान दिया को अपना न बता कर अपना मूल का बतायेंगे तो, वहां के लोगों की भावनाये बेहद आहत होगी। इसलिए एक कुशल व सफल व्यक्ति के रूप में धोनी ने यही कहा व किया जो उसको करना चाहिए था। वो अपने को भले ही झारखण्ड का मानता रहा परन्तु अपनी शादी उसने उत्तराखण्डी युवती से ही की। यह है उसका असली पहचान व उत्तर। धोेनी ने कई समय अपनी असली पहचान को उजागर किया भी। हाॅं उत्तराखण्डी आपदा के बारे में धोनी ने संवेदना के वो दो शब्द तक नहीं बोले जो उनके ही कनिष्ठ साथी शेखर धवन ने कहे। उत्तराखण्डियों को आशा थी , उनको कम से कम संवेदना तो प्रकट करनी ही चाहिए थी। परन्तु धोनी बोलने से अधिक करने में विश्वास करता हैे। यह भी सम्भव है कि वह अपनी पत्नी के साथ अपने ट्रस्ट द्वारा भारत आने पर कुछ करने ेका मन बना चूका हो। धोनी गुपचुप काम करने के लिए जाना जाता है।
  पर हकीकत तो यह हैे कि मात्र कहने से कुछ नहीं होता,। इसांन जो होता है । कहीं रहने या धर्म व नाम बदलने के बाद भी लोग दिल से स्वीकार नहीं करते । धोनी हो या कोई अन्य वे उत्तराखण्ड मूल के हैं। इस सच को चाहे धोनी या उन्मुक्त आदि कोई कितना भी नकार लें परन्तु हकीकत को ही जनता स्वीकार करती है। धोनी क्या इस हकीकत तो न तो ओबामा ही बदल पाया राष्ट्रपति बनने के बाद भी । भारत के विभाजन की पुरजोर मांग करके  पाक गये लाखों मुस्लिमों को वहां की धरती में आज भी मुजाहिर कह कर अपमानित किया जाता है। इसी प्रकार का दर्द श्रीलंका में कई एक शताब्दी पहले गये तमिलों को आज भी श्रीलंका स्वीकार नहीं कर पा रहा है। ये दुनिया उसको उसी नजर से आंकलन करती है। जेसे अंग्रेज हिन्दुस्तानियों को ब्लेक डाग से अधिक अंग्रेज नहीं मानते थे, हिटलर यहुदियों को किस नजर से देखता रहा,  खुद को उत्तराखण्डी न मानने व समझने वाले उत्तराखण्डियों के भ्रम को मुलायम सिंह यादव ने उत्तराखण्ड राज्य गठन जनांदोलन के प्रारम्भिक दौर में मैदान से खदेड़ने का बयान दे कर ही दूर कर दिया था। खुद को मुस्लमान मानने वाले अहमदिया व शिया मुस्लमानों के साथ पाकिस्तान में कैसे सलूक होता है। कमजोर आदमी को सदैव असुरक्षा का भय होता है। न जाने किन परिस्थितियों में धोनी आदि ने झारखण्डी समाज में अपना स्थान बनाया। झारखण्ड ने उनको जो नाम दिया, सम्मान व दौलत दिया और अपनत्व दिया हो सकता है धोनी के खुद को झारखण्डी कहने से झारखण्डियों की भावना जरूर आहत होती। यह मनोविज्ञानिक सत्य है कि हमेशा कमजोर वर्ग व व्यक्ति अपनी पहचान छुपाता है और जो समाज सम्पन्न व समृद्ध है उसका ंअंधानुशरण करता है। परन्तु अपनो की उन चमकते सितारों से दो शब्द अपनत्व की आश लगाना भी मानवोचित प्रवृति है। हर इंसान को इसका ध्यान रखना चाहिए। हाॅं ये अभी युवा अवस्था में है। लड़कपन में इंसान को उतनी सुध नहीं होती जितनी वयस्क लोगों में।
वैसे उत्तराखण्ड से अपने व अपने परिजनों की जीवन पालन के लिए अपने गांव से बाहर देश प्रदेश में नौकरी व रोजगार करने के लिए जाने वालों के दिलों में अपनी धरती , अपने लोगों व समाज के प्रति जो अथाह प्रेम रहता है उसका एकाशं भी अपने घर गांव में रहने वाले लोगों में देखने को नहीं मिलता है। पलायन करने वाले चाहे अपने गांव से निकल कर उत्तराखण्ड के कस्बों में रहते हो या दिल्ली, मुम्बई आदि महानगरों तथा अमेरिका, लंदन आदि विदेश में रहते हो, इनका दिल व दिमाग हमेेशा अपनी धरती के लिए धड़कता है। उत्तराखण्ड के बारे में तो यही हकीकत है कि यहां का 5 दशक पहले तक उत्तराखण्ड के गांवों में विद्यालय, पंचायती भवन, प्रतिभावान गरीब बच्चों की शिक्षा, चिकित्सालय खोलना, नहर, सड़क ही नहीं रोजगार व इलाज कराने का काम लाहौर, करांची, दिल्ली, लखनऊ रहने वाले उत्तराखण्डी मूल के लोगों ने अपना पेट काट कर किया। आज की पीढ़ी ने इतनी प्रबुद्ध हो गयी कि इन भागीरथों के योगदान को नकारने का काम करने लगी। इससे बडा दुर्भाग्य क्या हो सकता है। इसके साथ एक सच्चाई यह भी है कि चमकते हुए हर सितारे पर उसका अपना परिवार, समाज व देश गर्व तो करता है परन्तु उसकी असफलता पर उसको अकेेले ही दर्द सहने के लिए छोड़ने का काम भी करते है। 

सनातनी परंपराओं से खिलवाड़ न करें मुख्यमंत्री विजय बहुगुणाः शंकराचार्य माधवाश्रम


शांति यज्ञ नहीं सभी मृतक श्रद्धालुओं का अग्नि संस्कार, पिण्डदान, श्राद्ध व तर्पण होना आवश्यक

श्री केदारनाथ मंदिर परिसर के शुद्धिकरण  तक ऊखीमठ में हो सतत् पूजाः शंकराचार्य माधवाश्रम 

श्री केदानाथ में शंकराचार्य की कोई समाधि नहीं, झूठ न फेलाये मीड़िया

शंकराचार्य माधवाश्रम आश्रम जोशीमठ में 2000 से अधिक श्रद्धालुओं को आश्रय व भोजन देने में जुटा

शंकराचार्य माधवाश्रम के शिष्यों ने लुघियाना, मुजफरनगर व दिल्ली से कई ट्रक राहत सामाग्री बांटी जायेगी व चिकित्सा ट्रस्ट कोटेश्वर ने पीडितों के भेजी दवाईयां

कोटेश्वर(प्याउ) संसार भर के हिन्दुओं के सर्वोच्च धर्माचार्य शंकराचार्य माधवाश्रम जी महाराज ने उत्तराखण्ड के मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा को आगाह किया कि वे इस त्रासदी में मारे गये हजारों श्रद्धालुओं का अग्नि, पिण्ड, तर्पण व श्राद्ध संस्कार कराने के बजाय शांति यज्ञ करा कर सनातन धर्म से खिलवाड़ न करें। शंकराचार्य ने कहा कि अगर अकाल मृत्यु वाले का अंतिम संस्कार सनातनी परंपरा से नहीं किया गया तो वह प्रेत बन कर भटकता रहता है।
उत्तराखण्ड में इस सप्ताह आये भयंकर त्रासदी के बाद पीड़ितों का दुख दर्द बांटने व सनातनी परंपराओं की रक्षा के लिए केदारघाटी के मुख्य तीर्थ कोटेश्वर महादेव में पंहुच कर प्यारा उत्तराखण्ड के सम्पादक देवसिंह रावत से दूरभाष पर प्रदेश की बहुगुणा सरकार द्वारा प्रदेश में इसी पखवाडे हुई त्रासदी के बाद मुख्यमंत्री द्वारा शांति यज्ञ कराने पर अपनी तीब्र प्रतिक्रिया प्रकट करते हुए कही।  शंकराचार्य ने उत्तराखण्ड के मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा सहित सभी सनातन धर्मियों को सनातनी परंपराओं का स्मरण कराते हुए बताया कि प्राकृतिक आपदाओं में मरने वालों के लिए भी सनातनी परंपराओं के अनुसार ही अंतिम संस्कार का विधान है। शंकराचार्य माधवाश्रम जी महाराज ने कहा कि भगवान केदारनाथ धाम में आयी इस त्रासदी में मारे जाने वालों के जो शव प्रशासन ने सुरक्षित रखे है। उनका शव सनातनी परंपरा के अनुसार उनके परिजनों को सौपना चाहिए। परिजनों को इन अकाल मृत्यु के ग्रास बने स्वजनों के शवों का अग्नि संस्कार, पिण्डदान, तर्पण, श्राद्ध के लिए शव उनके परिजनों को सौंपे। शंकराचार्य ने कहा कि गृहस्थी सनातन धर्मियों के शव को दफनाना या नदी में प्रवाह किसी भी स्थिति में नहीं करना चाहिए। इसके साथ इस प्रकार के हादसों में जिन लोगों के शव नहीं मिले हैं उनके परिजनों को भी मृतक का प्रतिकात्मक पुतला बना कर उसका अग्नि संस्कार, पिण्ड, तर्पण व श्राद्ध संस्कार करना चाहिए।
सनातन धर्म के सर्वोच्च धर्माचार्य शंकराचार्य ने आश्चर्य प्रकट किया कि उत्तराखण्ड जैसे देवभूमि के मुख्यमंत्री को सनातनी मर्यादाओं का इतना भी ज्ञान नहीं है तो वह क्या देवभूमि की रक्षा करेगे ? शंकराचार्य माधवाश्रम ने प्रदेश के मुख्यमंत्री का आगाह किया कि लम्बे समय से उत्तराखण्ड सनातनी परंपराओं व तीर्थो की मर्यादाओं का  जो हनन किया जा रहा है उसी कारण इस प्रकार की त्रासदी का दंश प्रदेश व देश को झेलने के लिए मजबूर होना पडता है।
इससे पहले 22 जून को भी मोक्षभूमि उत्तराखण्उ में आयी प्रलयंकारी त्रासदी पर गहरा दुख प्रकट करते हुए शंकराचार्य माधवाश्रम जी महाराज ने भगवान केदानाथ की सत्त पूजा ऊखीमठ में कराने की जरूरत बतायी। दूरभाष से प्यारा उत्तराखण्ड के सम्पादक देवसिंह रावत से अपने विचार प्रकट करते हुए शंकराचार्य माधवाश्रम जी महाराज ने कहा कि जिस प्रकार से मीडिया केदारनाथ में आदिगुरू शंकराचार्य की समाधि बहने के बारे में जानकारी दे कर लोगों को गुमराह कर रहा है, वह निन्दनीय है। शंकराचार्य माधवाश्रम जी महाराज ने स्पष्ट किया कि आदि गुरू शंकराचार्य का निधन नहीं अपितु वे सदेह नंदी पर जटाजूट हो कर आरूढ़ हो कर शिवलोक में गमन कर गये। फिर उनकी केदारनाथ में समाधि बनाना व उसमें शिवलिंग स्थापित करना अपने आप में गलत था।
वर्तमान तबाही से काफी दुखी शंकराचार्य माधवाश्रम जी महाराज ने देश विदेश के तमाम समर्थ श्रद्धालुओं व स्थानीय नागरिकों से अनुरोध किया कि वे इस त्रासदी से पीड़ितों को आश्रय, भोजन, पानी व वस्त्रादि दे कर साहयता में हाथ बंटायें।
शंकराचार्य महाराज ने केदारनाथ धाम में हुई त्रासदी से यहां भगवान केदारनाथ की पूजा में पड रहे व्यवधान को देखते हुए स्थिति के सामान्य होने तक पूजा को ऊखीमठ स्थित भगवान केदारनाथ की शीतकालीन गद्दी- औकारेश्वर मंदिर में ही पूजा होनी चाहिए। शंकराचार्य माधवाश्रम के शिष्य वशिष्ट जी ने बताया कि शंकराचार्य माधवाश्रम के शिष्य वशिष्ट जी ने बताया कि शंकराचार्य माधवाश्रम जी महाराज के शिष्य लुधियाना-पंजाब, उप्र-मुजफरनगर, दिल्ली सहित पूरे देश से कई ट्रक राहत सामाग्री उत्तराखण्ड त्रासदी के पीड़ितों के लिए पंहुच रही है। इसके साथ कोटेश्वर शंकराचार्य माधवाश्रम जी धर्मार्थ चिकित्सालय से महंत शिवानन्द जी महाराज ने जिलाधिकारी रूद्रप्रयाग को इस त्रासदी के पीड़ितों को बांटने के लिए सौपी है। इसके अलावा जोशीमठ में शंकराचार्य माधवाश्रम जी महाराज के आश्रम में 2 हजार से अधिक श्रद्धालुओं को आश्रय व भोजन आदि से सत्कार किया जा रहा है।

Saturday, June 22, 2013

जीर्णोधार की जरूरत नहीं है केदारनाथ धाम की 


अपितु इस क्षेत्र  की पावनता बचाने की जरूरत

किसी पीड़ित गांव या सडक-पुल आदि को गोद लें मोदी व अन्य सरकारें



शांति यज्ञ के साथ प्रायश्चित यज्ञ करके बांध व शराब से बर्बाद करने वाले कृत्यों को रोकने का संकल्प भी ले मुख्यमंत्री बहुगुणा

गुजरात के मुख्यमंत्री मोदी ने प्राकृतिक आपदा का साक्षी रहा केदानाथ धाम के पुनर्निणाम की जो पेशकश की वह भले ही स्वागतयोग्य है। परन्तु केदारनाथ की पावनता देख कर सनातन धर्मी न तो प्रदेश सरकार व नहीं भारत सरकार से  तथा न हीं किसी अन्य सरकारों से इसकी पुनर्निमाण की याचना करता है। इस मूल मंदिर को कोई खतरा नहीं है। केवल मंदिर के अंदर व बाहर सफाई की जरूरत है। इस प्राचीन धाम की जब जरूरत होगी भगवान शिव सनातनी धर्मियों से खुद ही करा सकता है। श्रीबदरीनाथ केदारनाथ समिति इसमें सक्षम है। केदारनाथ में अगर कुछ जरूरत है तो वह मंदिर के चारों तरफ विनाश के कारण बने मलवे की सफाई करके यहां पर किसी प्रकार के व्यवसायिक गतिविधियों को पुन्न प्रारम्भ न करने की। अंधी व्यवसायिकता से मंदिर की पावनता पर ग्रहण लगा दिया था। जिस प्रकार से मंदिर की पावनता पर यहां पर राजनीति की दखल व धनलोभी कर्मचारियों व मठाधीशों के कारण हो रही है। जिस प्रकार से यहां पर सनातनी परंपरा का निर्वाह करने के बजाय नेताओं व थेलीशाहों के लिए भगवान के दर पर विशेष स्वागत व दर्शन में पक्षपात होता है उस पर तत्काल रोक लगनी चाहिए। मंदिर की पावनता हर कीमत पर रक्षा की जानी चाहिए। 1947 क्या 1950 तक केदारनाथ में किसी प्रकार की व्यवसायिक गतिविधियां या मंदिर के नजदीक आवास धर्मशालायें नहीं थी। अब इतना अवैध निर्माण करके वहां की पावनता को दुषित करने का काम किया गया जिससे भगवान शिव का रूष्ट होना स्वाभाविक ही है। इस त्रासदी में अकाल मारे गये लोगों की आत्मशाति के लिए प्रदेश के मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा द्वारा किया रहा शांति यज्ञ के साथ साथ विजय बहुगुणा व उनकी सरकार प्रायश्चित यज्ञ करते हुए प्रदेश में पतित पावनी गंगा यमुना आदि नदियों में बलात बनाये जाने वाले बांधों व शराब का गटर बनाने तथा प्रदेश के हक हकूकों के साथ शर्मनाक खिलवाड करने वाले कृत्यों को रोक दें और इसके लिए सच्चे मन से भगवान से माफी मांगते हुए जनसेवा का संकल्प लें । तभी यह शांति यज्ञ सार्थक होगा नहीं तो यह यज्ञ के परिणाम भी भयंकर होंगे।
गौरतलब है कि इसी सप्ताह उत्तराखण्ड में आयी विनाशकारी आपदा में केदारनाथ धाम में जो खौपनाक त्रासदी हुई उससे पूरा देश गमगीन है। जहां इससे उबरने के लिए सेना के हजारों जवान 55 से अधिक हेलीकप्टरों की सहायता से फंसे हुए 70 हजार से अधिक यात्रियों को निकाल कर बचाव कर रहे है। वहीं इस त्रासदी से चमत्कारिक ढ़ग से बच गये केदारनाथ मंदिर में इस आपदा के निशान चारों तरफ दिखाई दे रहे है। चारों तरफ लांशे पड़ी हुई है। एक प्रकार से केदारनाथ का मूल मंदिर छोड़ कर अधिकांश धर्मशालायें आदि नष्ट हो गयी है। मोदी सहित कोई भी प्रदेश का मुख्यमंत्री, उद्यमी या संस्थायें अगर सच में इस त्रासदी से पीड़ित लोगों की सेवा करना चाहते है तो इस क्षेत्र की एक एक रोड़ व एक एक नष्ट हो गये गांवों को गोद ले सकते है। परन्तु न तो उत्तराखण्ड सरकार व नहीं केन्द्र व नहीं गुजरात सहित किसी भी सरकार व संस्था को केदारनाथ मंदिर से किसी भी प्रकार का छेड़ छाड करने का हक नहीं। यह कोई सोमनाथ आदि मंदिर नहीं। इस केदारनाथ धाम में स्वयं भगवान शिव का वास व रक्षक है। वहां किसी को भी श्मशानवासी भगवान शिव के एकांत में खलल डालने की इजाजत नहीं है। जो भी ऐसी धृष्ठता करेगा उसको इसका खमियाजा भोगना पडेगा। वेसे कांग्रेसे की सरकार ने मोदेी को ेकेदारनाथ न जाने दे कर जनता की नजरां में खुद को गुनाहगार साबित कर ही दिया। जिस तत्परता से मोदी खुद व अपने कई दर्जन हेलीकप्टरों को आपदा कार्य में जुटाना चाहते थे उनका सहयोग न ले कर विजय बहुगुणा सरकार ने पीड़ितों के साथ साथ प्रदेश के साथ खिलवाड़ ही किया। कम से कम देहरादून तक कुछ और हजार फंसे हुए यात्री पंहुच जाते। परन्तु कांग्रेस की राजनीति के शिकार हो गये। जो तस्वीर इस लेख में लगायी गयी है वह सन्1882 की है। तब भी सैकडों साल से भगवान केदारनाथ का मंदिर यथावत खडा था आज इस विनाशकारी त्रासदी में जीवंत खडा है। परन्तु बुद्धिहीन पत्रकार भगवान शिव शक्ति द्वारा रक्षित इस पावन धाम के सुरक्षित रहने का कारण इस विनाशकारी तबाही में बह कर आये बडे पत्थर बता रहे है।इन नादानों को इतना भी समझ में नहीं आ रहा है जो इन पत्थरों को मीलों दूर बहा कर ला सकता है वह क्या इस पत्थरों के आगे बेबश पड गया। इन नास्तिकों को लगता है इसे भगवान शिव का साक्षात चमत्कार कहने से उनकी जीभ कहीं छोटी न पड़ जाय। 

उत्तराखण्ड त्रासदी पर तिहाड़ के केदियों की भी आत्मा जागी पर राहुल गांधी बच्चन, खान बंधु व धोनी मौन क्यों?


सोनिया गांधी द्वारा बलात थोपे गये मुख्यमंत्री की अकुशलता का दण्ड उत्तराखण्ड सहित पूरे देश को भोगना पडा


उत्तराखण्ड में इसी पखवाडे आयी विनाशकारी प्राकृतिक आपदा में मारे गये देश भर के हजारों तीर्थ यात्रियों की दर्दनाक मौत व केदारनाथ, गोरीकुण्ड, अगस्त्यमुनि, उत्तरकाशी, चमोली, पिथोरागढ में हुई भारी त्रासदी से ़तिहाड़ जेल के केदियों को झकझोर कर रख दिया। तिहाड़ जेल के केदियों व कर्मचारियों ने उत्तराखण्ड त्रासदी में 13 लाख रूपये का राहत योगदान देने का निर्णय लिया। परन्तु तिरूपति, शिरड़ी , लालबाग के राजा व सत् सांई जैसे धनकुवैर धर्मार्थ ट्रस्टों के मठाधीशों की आत्मा अभी सोई हुई है। उनको नहीं सुनाई दिया मानवता का यह करूण क्रंदन। देश की जनता हैरान है कि इस छोटी छोटी घटनाओं पर इंटरनेटी दुनिया में घडियाली आंसू बहाने वाले अमिताभ बच्चन, शाहरूख, आमिर व सलमान जैसे सिने अभिनेता कहां गये। क्यों मौन है अभी धोनी, तेंदुलकर जैसे नामी आदि खिलाड़ी। देश हैरान है कि कल तक संडकों पर देश के लिए आंसू बहाने वाले केजरीवाल कहाॅं है? क्या उनको यह भीषण प्राकृतिक आपदा जिससे पूरा देश पीड़ित है दिखाई नहीं दे रहा है। देश आहत है परन्तु कांग्रेस के कार्यकारी आला कमान राहुल गांधी न तो कहीं नजर आ रहे हैं व नहीं उनका कोई बयान तक आ रहा है। भारतीय सेना का जांबाज नौजवान दिन रात अपनी जान पर खेल कर राहत व बचाव काम में जूटे हुए है। देश के अनेक राज्यों के मुख्यमंत्री व मंत्री उत्तराखण्ड से अपने अपने प्रदेश के लोगों को सुरक्षित निकालने के लिए राहत अभियान का संचालन कर रहे हैं। परन्तु केन्द्र की मनमोहन सरकार को इस आपदा को राष्ट्रीय आपदा घोषित करने के अपने दायित्व का निर्वाह करने में भी शर्म आ रही है। बाबा रामदेव ही नहीं भाजपा कांग्रेस, सपा और सेना व अर्ध सैनिक बल इस राहत में अपना योगदान दे रहे हैं। परन्तु बोलीवुड व क्रिकेट के बेताज बादशाह न जाने कहां खो गये।
कांग्रेसी आलाकमान द्वारा जनता व कांग्रेसी विधायकों दोनों द्वारा नकारे गये व्यक्ति विजय बहुगुणा को बलात मुख्यमंत्री के रूप में थोपे जाने का खमियाजा आज उत्तराखण्ड व देश को इस आपदा में भी उत्तराखण्ड सरकार की अकुशलता व दिशाहीनता का दण्ड भोगना पड़ रहा है। हालत इतने बदतर है कि अपने मुख्यमंत्री व सरकार के इस आपदा पर भी गैर जिम्मेदाराना व अलोकतांत्रिक व्यवहार के कारण बदरीनाथ के कांग्रेसी विधायक राजेन्द्र भण्डारी को भी सार्वजनिक ढ़ग से लोकशाही का आईना दिखाना पडा। इसी कारण रूद्र प्रयाग में आक्रोशित जनता के आक्रोश का कोप भाजन बन कर मुख्यमंत्री बहुगुणा, आपदा मंत्री यशपाल आर्य व कबीना मंत्री हरक सिंह रावत को हेलीकप्टर से उल्टे पांव वापस जाना पडा। महिलाओं ने मुख्यमंत्री व उनकी सरकार को उनके निकम्मेपन के कारण चूड्डियां भेंट की। आपदा प्रबंधन व राहत पंहुचाने में प्रदेश सरकार का इतना गैरजिम्मेदाराना रवैया रहा कि बदरीनाथ जेसे विश्वविख्यात धाम में इस आपदा में फंसे 20 हजार लोगों में खाद्यान्न की समस्या से जुझना पडा। इससे साफ हो गया कि छोटी छोटी जगहों में फंसे लोगों को कितनी तकलीफ उठानी पडी होगी।इनकी सुध लेने की आश करना भी बहुगुणा सरकार से करना एक प्रकार से नाइंसाफी होगी। मुख्यमंत्री बहुगुणा व उनकी सरकार की संवेदनहीनता इसी बात से जगजाहिर हो गयी कि जिस दिन उत्तराखण्ड इस भयंकर त्रासदी से गुजर रहा था, देश के प्रधानमंत्री व कांग्रेस अध्यक्षा स्वयं दोनों प्रभावित क्षेत्रों का हवाई निरीक्षण कर रहे थे उसी दिन प्रदेश के मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा, आपदा प्रबंधन मंत्री यशपाल आर्य, कबीना मंत्री हरक सिंह रावत व इंदिरा हृदेश के अलावा प्रदेश के मुख्य सचिव सुभाष कुमार व वित्त सचिव राकेश शर्मा आपदा क्षेत्रों में राहत व बचाव कामों को दिशा देेने के बजाय दिल्ली में देखे गये। दिल्ली में कई कांग्रेसी आला नेताओं द्वारा उनके दिल्ली में रहने पर डपट लगाने के कारण किसी की भी इतनी हिम्मत नहीं हुई कि दिल्ली में होने के बाबजूद वे कांग्रेस के कार्यकारी आला नेतृत्व राहुल गांधी को उनके जन्म दिन पर बधाई देने के लिए उनके द्वार पर कदम रखने का साहस कर पाये।
कांग्रेस के युवा नेता राजपाल बिष्ट इस बात के लिए काफी चिंतित है कि इस आपदा में उत्तराखण्ड के आपदा ग्रस्त क्षेत्रों में सड़क मार्ग व पुलों के टूटने से इन क्षेत्रों की समस्यायें और विकराल हो गयी है। इन हजारों पीड़ित उत्तराखण्डियों की तरफ न अभी सरकार का ध्यान है व नहीं मीडिया का।

अगर चोराबरी ताल की तरह कभी टिहरी आदि बांधों में बादल फट गये तो कोन बचायेगा महाविनाश? 


चोराबरी ताल (गांधी सरोवर) में बादल फटने के बाद मची केदारनाथ में भारी तबाही 


चोराबरी ताल (गांधी सरोवर) में बादल फटने के बाद केदारनाथ धाम में जो प्रलयंकारी तबाही हुई, इससे पूरा देश स्तब्ध है। हजारों लोग पलक झपकते ही इस महाकाल में समा गये। इस विनाशकारी त्रासदी को देखने के बाद मन में प्रश्न उठ रहा है कि अगर इसी प्रकार के बादल कभी टिहरी सहित प्रदेश में बने बांधों में फट गये तो प्रदेश सहित पूरे देश में कितनी विनाशकारी त्रासदी होगी इसकी कल्पना से ही रूह कांप जाती है। सबसे हैरानी की बात है कि जब से गंगा यमुना की उदगम स्थली में पर्यावरणविदों, भूकम्पीय वेताओं व देश के लाखों लोगों के विरोध के बाबजूद प्रदेश की सरकारों ने यहां पर टिहरी जैसे बांधों का निर्माण किया। कुछ सालों से टिहरी, उत्तरकाशी सहित पूरे क्षेत्र में बादल फटने आदि प्राकृतिक आपदाओं की बाढ़ सी आ गयी है। इसके पीछे यहां पर विकास के नाम पर बांधों को निर्माण, सुरंगों व सडकों के निर्माण में भारी बारूद विस्फोटों का इस्तेमाल करना है। हिमालय के इस सबसे संवेदनशील पर्वत श्रृखला में जानी जाती है। इस पर्वत श्रंृखला की घाटी में अनेक बांध बना कर यहां पर पानी का भारी जल दवाब बढाने के साथ यहां के पर्यावरण व प्रकृति संतुलन से भारी खिलवाड़ ऊर्जा के नाम किया जा रहा है। जो भारी विनाश का आमंत्रण से कम नहीं है। टिहरी, देव प्रयाग, रिषिकेश , हरिद्वार से लेकर गंगा किनारे बसे अधिकाश शहरों में कितनी तबाही होगी इसकी कल्पना करने की फुर्सत न तो दो टके के लालच में अंधे हो चूके उत्तराखण्ड को सेकडों बांधो को बना कर जल समाधि देने को उतावले यहां की सरकार, नेताओं, नोकरशाहों व उनके प्यादों को ही है  व नहीं देश के दिशाहीन हुक्मरानों को ही हे। चीन से लगी सीमा पर बनाये गये बांध रूपि विनाशकारी बमों का निर्माण कर इस संवेदनशील हिमालयी प्रदेश के साथ साथ देश के हितों के साथ एक प्रकार का खतरनाक खिलवाड है।
गौतलब है कि केदारनाथ से 3.5 किमी 13700 मीटर ऊंचाई पर स्थित चोराबरी ग्लेसियर के तल पर स्थित चोराबरी ताल में बादल फटने के बाद जो विनाशकारी त्रासदा केदारनाथ में आयी उससे हजारों लोग मारे गये है, हजारों प्रभावित हो गये। महात्मा गांधी की अस्थि राख जबसे इस चोराबरी ताल में विसर्जित की गयी तो तब से लोग इसे गांधी सरोवर के नाम से पुकारते है। यहां से हिमालय की पावन कैलाश पर्वत का मनोहारी दृश्य दिखाई देता है। केदानाथ के निकट बहने वाली मंदाकिनी की उदमस्थली का प्राकृतिक सौदर्य भी देखते बनता है। इसके साथ ही यहां के समीप दुद्य गंगा व मधु गंगा जलप्रपात भी देखने योग्य स्थल हैं। रिषिकेश से 250 किमी पर स्थित गोरीकुण्ड है। गोरीकुण्ड से 14 किमी पर भगवान केदानाथ का पावन धाम केदारनाथ है।