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Tuesday, January 31, 2012

मनमोहन ही नहीं गड़करी भी इस्तीफा दें

-भ्रष्टाचारियों को शर्मनाक संरक्षण देने के मामले में
-मनमोहन ही नहीं गड़करी भी इस्तीफा दें/
-न्यायपालिका भी तय करे अपनी सुनवायी की समय सीमा
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सर्वोच्च न्यायालय द्वारा प्रधानमंत्री कार्यालय द्वारा स्वामी की याचिका पर भ्रष्टाचार में घिरे मंत्रियों पर लम्बे समय तक मुकदमा चलाने की इजाजत न देने के मामले में प्रश्न उठाते हुए तत्काल इसकी एक निश्चित समय सीमा तय करने का जो संसद को कानून बनाने जरूरत बतायी, उससे भारतीय हुक्मरानों का शर्मनाक चेहरा बेनकाब हो गया। इसको आधार बना कर प्रधानमंत्री का इस्तीफा मांगने की भाजपा ने जो सराहनीय मांग की परन्तु भाजपा को चाहिए था कि जिस नैतिकता का आधार बना कर वह प्रधानमंत्री से इस्तीफा मांग रहे हैं, उसको देखते हुए सबसे पहले भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष गड़करी को खुद अपनी भ्रष्टाचारी सरकारों को संरक्षण देने के लिए तत्काल इस्तीफा दे देना चाहिए। जिस प्रकार से भाजपा के अध्यक्ष गडकरी सहित शीर्ष नेताओं ने भाजपा की उत्तराखण्ड सरकार के मुख्यमंत्री की संलिप्तता वाले स्टर्जिया भूमि घोटाले सहित अनैक घोटालों के उजागर होने के बाबजूद उनको शर्मनाक संरक्षण सार्वजनिक रूप से दिया। यही नहीं जब उच्च न्यायालय ने भी इस मामले में भ्रष्टाचार होने की बात पर अपनी मुहर लगायी तो उसके बाबजूद भी न तो गड़करी व नहीं भाजपा के उन तमाम नेताओं ने माफी मांगी जो ऐसी भ्रष्टाचारी कुशासक को समर्थन कर रहे थे। सर्वोच्च न्यायालय के वर्तमान टिप्पणी को अपनी जीत बताने वाले अण्णा हजारे टीम भी भले ही जनता के बीच खुद को पाक साफ बताये परन्तु इस टीम के प्रमुख सिपाहेसलार शांति भूषण भी इस स्टर्जिया प्रकरण पर भ्रष्ट सरकार के बचाव में खुद नैनीताल हाईकोर्ट में तमाम तर्क दे रहे थे। अण्णा हजारे व उनकी टीम भी उस समय बेनकाब हो गयी जब उन्होंने न जाने किस मोह से जनप्रतिनिधियों व एनजीओ के भ्रष्टाचार से त्रस्त व्यवस्था में भी इन दोनों को शर्मनाक संरक्षण देने वाले उत्तराखण्ड के जनभावनाओं को रौंदने वाले मुख्यमंत्री खंडूडी द्वारा बनाये गये लोकायुक्त का अंध समर्थन किया। यह काम देश में भ्रष्टाचार को मिटाने के लिए उनके साथ जुडने वाले लाखों लोगों के विश्वास के साथ एक प्रकार का खिलवाड़ ही है। 
रही बाबा रामदेव की जो भ्रष्टाचार के प्रतीक कालाधन को जो विदेशों में जमा है, पर देश व्यापी सराहनीय आंदोलन तो छेड़े हुए हैं परन्तु खुद अपने प्रदेश व उनके मुख्यालय के 50 किमी दूरी पर हुए इस देवभूमि को शर्मसार करने वाले स्टर्जिया भूमि घोटाले पर मूक रहे। जिस काले धन के खिलाफ बाबा रामदेव राष्ट्रव्यापी आंदोलन कर रहे हैं उस काले धन का पहाड़ विदेशों से कई हजार गुना देश में ही विधमान है, उनके खिलाफ बाबा रामदेव की आवाज तक नहीं निकल पा रही है।
कांग्रेस व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से किसी प्रकार की नैतिकता की आशा करना ही अपने आप को सरासर धोखा देने जैसी बात है। मनमोहन सिंह भी अटल बिहारी वाजपेयी की तर्ज पर घोर सत्तालोलुपु व अमेरिकी परस्त प्रधानमंत्री साबित हो चूके है। वास्तव में हालत तो यह है देश की अधिकांश व्यवस्था अब जर्जर हो चूकी है। इसके लिए कांग्रेस सहित तमाम राजनेता, नौकरशाह, मीडिया, समाजसेवी, धर्माध्यक्ष, ही नहीं अपितु न्यायपालिका भी जिम्मेदार है। न्यायपालिका ने प्रधानमंत्री को उनकी नैतिकता व दायित्व का बोध करा कर देश के हित में व अपने दायित्व का सराहनीय निर्वहन किया। परन्तु सच्चाई यह है कि खुद न्यायपालिका आज देश की जनभावनाओं व लोकशाही के अनरूप काम करने में पूरी तरह विफल रही है। यहां पर भी समय सीमा तय नहीं है। एक छोटे से विवाद में वर्षो ही नहीं पीड़ियां ही गुजर जाती है। न्याय की गुहार करने वाले प्रायः दम तोड़ देते है। हजारों हजार बेगुनाह लोग जेलों में समय पर न्याय न मिलने के कारण सड़ रहे होते है। न्यायालय जैसे महत्वपूर्ण संस्थान भी धनपशुओं के शिकंजे में जकड़ गया है। एक आम आदमी न्यायालय के दर पर न्याय की गुहार लगाने का साहस तक नहीं जुटा पाता है। इसलिए सर्वोच्च न्यायालय से गुहार है कि वह न्यायपालिका की गरिमा की रक्षा करते हुए विवादों को एक समय सीमा के अन्दर निचली आदालतों से लेकर उच्च व सर्वोच्च न्यायालय में समय सीमा तय करे। समय पर न्याय न मिलना भी एक प्रकार का अन्याय है। जिस प्रकार से न्यायाधीशों की नियुक्ति प्रतिभा के बजाय नेताओं व निहित स्वार्थ के रूप में की जाती रही, देश की भाषा के बजाय फिरंगी भाषा में की जाती रही, उससे न्याय पालिका भी आम आदमी से कोसों दूर हो गयी है। इस पूरे प्रकरण में अपनी महत्वपूर्ण सेवा देने के लिए सुब्रब्रणम स्वामी को पूरे देश की हार्दिक बधाई । जो वे अपनी जान को जोखिम में डाल कर एक एक कर भ्रष्टाचारियों व मृतप्राय व्यवस्था को न्यायालय के द्वारा बेनकाब कर रहे है।

उत्तराखण्ड में कांग्रेस सत्तासीन हुई तो महिला हो सकती है मुख्यमंत्री

उत्तराखण्ड में कांग्रेस सत्तासीन हुई तो महिला हो सकती है मुख्यमंत्री
देहरादून। (प्याउ)। प्रदेश में अगर 6 मार्च को चुनावी परिणाम कांग्रेस के पक्ष में आता है तो प्रदेश में महिला को प्रदेश की कमान सौंपे जाने के कायश लगाये जा रहे है। हालांकि अभी यह सब कहना जल्दी होगी, परन्तु इसी आशंका से कांग्रेस में मुख्यमंत्री के आधा दर्जन दावेदार चुनावी दंगल से एक दूसरे को मात देने के पाशे कदम कदम पर चल रहे थे। यह खेल चुनाव के बाद फिर तेजी से बढ़ गया है। कांग्रेस में मुख्यमंत्री के दावेदारों में जहां हरीश रावत व सतपाल महाराज का नाम सबसे उपर है। हालांकि दावेदारों में प्रदेश अध्यक्ष यशपाल आर्य, हरकसिंह रावत, सांसद विजय बहुगुणा व इंदिरा हृदेश भी मानी जा रही है। हरीश रावत , सतपाल महाराज व विजय बहुगुणा को विधायक न होने के कारण या गुटीय खिंचतान होने की संभावनाओं के कारण दूर रखने की चालें अभी से मठाधीश कर रहे हे। परन्तु जिस प्रकार से हरक सिंह रावत चुनावी भंवर में फंस चूके हैं उससे उनका चुनावी जंग से उभरना ही दुश्वार लग रहा है। वहीं यशपाल आर्य को प्रबल दावेदार माना जा रहा है। हालांकि उनका तिवारी की निकटता के कारण उन पर मुहर लगाने में प्रदेश में फिर वही खिंचतान चलने की आशंका जाहिर की जा रही है। इसी दौरान तिवारी द्वारा प्रदेश के मुख्यमंत्री बनने की इच्छा प्रकट करने के बाद कोन बनेगा कांग्रेस का मुख्यमंत्री यह प्रश्न एक प्रकार से यज्ञ प्रश्न बन गया हैं। कांग्रेसी आला नेतृत्व की रणनीति प्राय चैकान्ने वाली होती है। इसलिए माना जा रहा है कि इस बार स्पष्ट बहुमत मिलने पर कहीं प्रदेश में महिला के हाथों में प्रदेश की बागडोर कांग्रेस आला नेतृत्व सोंपने का दाव खेल सकता है।
गौरतलब है कि उत्तराखण्ड राज्य गठन करने से लेकर प्रदेश की पूरी व्यवस्था संभालने में महिलाओं ने बाजीमारी हो वहीं चुनावी जंग में भी प्रदेश की लोकशाही का परचम थामने में भी महिलायें आगे रही है। भले ही राजनैतिक दलों ने उनको अपेक्षित प्रतिनिधित्व नहीं दिया है। प्रदेश के वर्तमान चुनाव के मतदान में भी महिलाओं ने भारी मतदान किया। खासकर उत्तराखण्ड के पर्वतीय क्षेत्र में महिलायें की पूरी अर्थव्यवस्था की मेरू है। यही नहीं इस बार के चुनाव में महिलायें केवल चुनावी दंग में प्रत्याशी के रूप में मैदान में नहीं है अपितु प्रदेश में मुख्यमंत्री की दावेदार के रूप में कांग्रेस की अमृता रावत भी प्रखर दावेदार के रूप में मैदान में हैं । हालांकि कांग्रेसी नेत्री इंदिरा हृदेश भी चुनावी दंगल में उतरी है परन्तु साफ छवि का नेतृत्व देने के लिए कांग्रेसी नेतृत्व की प्रतिबद्वता को देखते हुए ऐसा नहीं लगता कि कांग्रेस इंदिरा हृदेश पर दाव लगायेगा। जिस प्रकार से कांग्रेस ने पहली महिला प्रधानमंत्री से लेकर पहली महिला राष्ट्रपति को आसीन करने का काम किया, उससे लगता है कि प्रदेश का नेतृत्व कांग्रेस आला कमान साफ छवि की अमृता रावत को अगर कांग्रेस बहुमत में आती है तो बनाने के कायश लगाये जा रहे है। हालांकि अभी चुनाव के परिणाम मतदान मशीनों में बंद है। 35 दिन बाद इसका फेसला निकलेगा परन्तु कोन बनेगा मुख्यमंत्री इसी आशंका से कांग्रेसी दिग्गज चुनावी दंगल में एक दूसरे के पर कतरने में लगे हुए थे।
2002 में प्रदेश में 52.64 फीसद महिलाओं ने मतदान कर सरकार बनाने में अपनी रुचि दिखाई । 2007 आते-आते यह आंकड़ा 6.81 फीसद बढ़ा और प्रदेश में 59.45 फीसद महिला मतदाताओं ने मताधिकार का इस्तेमाल किया। हालांकि विधानसभा सदस्य बनने की इच्छा रखने वाली महिला उम्मीदवारों की बात की जाए तो 2002 के पहले चुनावों में 72 महिलाओं में से जीत केवल चार को हासिल हुई। 2007 में यह संख्या घट गई और केवल 56 में भी केवल चार विधानसभा की देहरी पर पंहुच पायी। इस बार चुनाव में 63 महिला उम्मीदवार किस्मत आजमा रही हैं। अब प्रदेश का मतदाता इन उम्मीदवारों की किस्मत का फैसला ईवीएम मशीनों में कैद कर चुका है। अब देखना यह है कि प्रदेश की विधानसभा में महिला विधायकों की संख्या चार की लक्ष्मण रेखा लांघ पाती या नहीं। हालांकि कांग्रेस के सत्तासीन होने पर महिला मुख्यमंत्री बनने की कायश लगायी जा रही है। वहीं भाजपा में महिला मुख्यमंत्री बनाये जाने की संभावनायें कहीं दूर दूर तक नहीं है। क्योंकि भाजपा में खंडूडी जरूरी के पाश में पहले ही बंध चूकी है।

तिवारी के शिकंजे से कब मुक्त होगा उत्तराखण्ड

 तिवारी के शिकंजे से कब मुक्त होगा उत्तराखण्ड
रामनगर (प्याउ)। तिवारी द्वारा खुद को दो साल के लिए मुख्यमंत्री बनने की इच्छा प्रकट करने के बाद प्रदेष की राजनीति में एक प्रकार से भूचाल सा आ गया। इससे प्रदेष के आम मतदाताओं में एक संदेष साफ गया कि प्रदेष में कांग्रेस की सरकार बन रही है। जिस प्रकार से तिवारी ने गदरपुर, रामनगर, हल्द्वानी, देहरादून आदि स्थानों में कांग्रेसी प्रत्याषियों के पक्ष में 87 साल की उम्र में भी खुली जीप में बैठ कर प्रचार अभियान चलाया और देहरादून में मतदान किया, उससे प्रदेष की राजनीति में एक प्रकार से जलजला ही उठ गया हे। इसका अहसास प्रदेष के क्षत्रपों को अभी से होने लगा है। भले ही आला नेतृत्व प्रदेष में चुनाव परिणाम कांग्रेस के पक्ष में आने के बाद तिवारी को मुख्यमंत्री न भी बनाये परन्तु उनकी उपस्थिति को नकारने का साहस करे यह संभव नहीं है। जिस प्रकार से टिकट बंटवारे में प्रदेष की राजनीति में यकायक कांग्रेस को अपनी भृकुटी दिखा कर तीन टिकटें झटप ली, उससे नहीं लगता कि भावी मुख्यमंत्री के चुनाव के समय कांग्रेस नेतृत्व उनकी पसंद का ख्याल न रखे। खासकर रामनगर में जिस प्रकार से तिवारी ने दो दिन लगा कर अपने विरोधियों को करारा सबक सिखाया, उसकी भी चर्चा कांग्रेसी क्षेत्रों में इन दिनों है। मैने खुद तिवारी की रामनगर यात्रा के 26 जनवरी वाला रोड़ षो को करीबी से देख कर इस बात का अहसास किया कि तिवारी इस उम्र में भी राजनीति से दूर होने के लिए जहां तैयार नहीं हैं वहीं अपने विरोधियों को किसी हाल में सर उठाने का कोई अवसर नहीं देना चाहते है। इससे पहले वे अपने प्रत्याषित दाव के तहत  कांग्रेस के पक्ष में हल्द्वानी में चंद दिनों पहले तक अपनी उपेक्षा से असंतुष्ट समझे जाने वाले प्रदेश के दिग्गज वयोवृद्य नेता व प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री नारायणदत्त तिवारी के हल्द्वानी में कभी उनकी सबसे करीबी रही सहयोगी इंदिरा हृदेश के पक्ष में उनको साथ में लेकर खुली जीप में समर्थन यात्रा कर जहां भाजपा को ही नहीं कांग्रेस के दिग्गज नेताओं को हैरान कर दिया है। तिवारी की इस सक्रियता ने जहां भाजपा की प्रदेश में पुन्न सत्तासीन होने की आशाओं में तिवारी का कांग्रेस विरोध रूपि सहयोग की आश पर बज्रपात हुआ, वहीं कांग्रेस में कई महिनों से बने हरीश रावत व इंदिरा हृदेश के बीच चल रही जुगलबंदी की भी एक प्रकार से चूलें ही हिला कर रख दी। अब इंदिरा हृदेश भी प्रदेश के मुख्यमंत्री की जंग की एक मजबूत दावेदार के रूप में चुनाव परिणाम के बाद ताल ठोक दे तो कोई बड़ी बात नहीं होगी। तिवारी ने शायद इंदिरा की इसी महत्वकांक्षा को हवा दे कर अपने सबसे प्रबल विराधी हरीश रावत की हसरत पर भी ग्रहण लगाने का काम कर दिया है।
प्रदेश के हितैषियों के बीच पूरी तरह से अलोकप्रिय हो चूके तिवारी के समर्थकों की कांग्रेस के दिल्ली मठाधीशों व प्रदेश में कमी नहीं है। वे तिवारी की सक्रियता से आगामी विधानसभा चुनाव के बाद प्रदेश में कांग्रेस की सत्तासीन होने के बाद मुख्यमंत्री के पद पर कोन आसीन होगा इसको प्रभावित करने वाला कारक बनाना चाहते है। जिस प्रकार से तिवारी के नाम पर कांग्रेस आलाकमान को गुमराह करके तीन टिकटो को तिवारी के प्यादों को परोसा गया, उससे प्रदेश की जनता में ही नहीं कांग्रेसी भी गुस्साये हुए है। इन तीनों सीटों पर कांग्रेस की हार का इंतजाम तिवारी के नाम पर कांग्रेस आलाकमान को गुमराह करने वाले कांग्रेसी मठाधीशों ने ही दिया।
इसी कड़ी में तिवारी की हल्द्वानी में कभी अपनी सबसे करीबी सहयोगी रही इंदिरा हृदेश के पक्ष में रोड़ शौ में उतर कर जहां एक तीर से अपने विरोधियों को परास्त करने का काम किया वहीं अपनी सक्रियता को प्रदर्शित करके खुद को भी प्रदेश की सत्ता का एक दावेदार साबित कर दिया। जिस प्रकार से तिवारी ने हल्द्वानी में नैनीताल रोड, एसडीएम दफ्तर, रेलवे बाजार व ताज चैराहे होते हुए लाइन नम्बर 17, आजादनगर, वनभूलपूरा, मंडी बाईपास, शनि बाजार, बरेली रोड, मंगल पड़ाव, कालाढूंगी रोड, जेल रोड, नवाबी रोड होते हुए सौरभ होटल व उसके बाद कुल्यालपुरा तक पंहुचा। पूरे मार्ग पर लोगों ने तिवारी को बहुत ही उत्सुकता से देखा, यह उत्सुकता इंदिरा हृदेश के पक्ष में कहां तक परिवर्तीत होगी यह तो आगामी 6 मार्च को चुनाव परिणाम ही उजागर करेंगे। इस पूरी यात्रा में तिवारी के साथ खुली जीप में उनकी करीबी सहयोगी हल्द्वानी से कांग्रेसी प्रत्याशी इंदिरा हृदयेश, व तिवारी द्वारा कुछ महिनों से चलाये जा रहे निरंतर विकास समिति के झण्डेबरदार भी साथ थे। इस मोके पर तिवारी ने दो टूक शब्दों में कहा कि विकास की सोच केवल कांग्रेस के पास है तथा कांग्रेस ही राज्य का चहुंमुखी विकास करेगी। तिवारी के इन दो टूक ऐलान ने तिवारी की आश से फिर से प्रदेश की सत्तासीन होने की आश लगाये भाजपा के पांवों के तले जमीन खिसक गयी। इसी आश में भाजपा सरकार ने तिवारी सरकार के कार्यकाल में हुए चार दर्जन से अधिक घोटालों की जांच की आंच तक तिवारी की तरफ तक नहीं आने दी। यही नहीं तिवारी को मंचो से जिस प्रकार से भाजपा के मुख्यमंत्री खंडूडी, निशंक ही नहीं केन्द्रीय नेतृत्व भी महिमामण्डित करते हुए, इस रोड़ शो ने भाजपा को तिवारी ने ऐसा करारा सबक सिखाया कि उनके पैरों तले जमीन भी खिसक गयी। सबसे हेरानी की बात यह रही कि भाजपा ने प्रदेश में 2007 में हुआ पूरा विधानसभा चुनाव तिवारी सरकार के कुशासन के खिलाफ ही चुनाव लड़ कर जनांदेश हासिल किया था, परन्तु सत्तासीन होते हुए भाजपा की प्रदेश सरकार कदम कदम पर तिवारी के आर्शीवाद के लिए बेशर्मी से लालायित रही। भाजपा का यह व्यवहार, प्रदेश के हितों पर किये गये कुठाराघातों से आहत उत्तराखण्डियों के जख्मों पर किसी नमक छिडकने से कम नहीं था। प्रदेश की जनता किसी भी तरह से उत्तराखण्ड के हितों को रौंदने वाले तिवारी या उसके प्यादों को प्रदेश में प्रमुख पदों पर आसीन या महिमामण्डित देखना नहीं चाहती ।
सत्ता के लिए भाजपा की यह तिवारी की आरती उतारने वाले व्यवहार लोगों के गले में आज तक भी नहीं उतर रहा है। परन्तु अब तिवारी द्वारा एक ही झटके में चुनावी जंग में विकास की सोच केवल कांग्रेस के पास है तथा कांग्रेस ही राज्य का चहुंमुखी विकास करेगी का ऐलान करके भाजपा के हाथों के तोते ही उडा दिये। तिवारी ने बहुत ही चालाकी से भाजपा सरकार को भी अपने उपर उनके कार्यकाल में हुए तथाकथित घोटालों के निशाने पर ही न आने दिया व समय आते ही भाजपा सहित अपने कांग्रेस में मजबूत हो रहे विरोधियों का चक्रव्यूह ध्वस्थ करने का एक ऐसा पाशा फेंका जिसके दंश से भाजपा व कांग्रेस दोनों ही मर्माहित हैं। तिवारी ने अपने इस दाव से साबित कर दिया कि भले ही
वे बेहद बुजुर्ग हो गये हो परन्तु राजनीति के तिकडम से
वे आज भी अपने विरोधियों को पानी पिलाने का दम
रखते है।

कोटद्वार के जनाक्रोश से सहमे हैं खंडूडी सहित भाजपा नेतृत्व

-कोटद्वार के जनाक्रोश से सहमे हैं खंडूडी सहित भाजपा नेतृत्व/
-इंदिरा जैसी मात खानी पड़ सकती है खंडूडी को
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चुनाव से दो दिन पहले जिस प्रकार से कोटद्वार में भाजपा के पक्ष में सरकारी मिषनरी के भारी दुरप्रयोग  को देखकर वहां की जनता ने जिस प्रखरता से अपना आक्रोष प्रकट किया उसने प्रदेष की जनता के जेहन में सत्तामद में चूर षासकों द्वारा जनादेष को रौंदने वाला दो दषक पहले हुए गढ़वाल लोकसभा उपचुनाव के जख्मों को कुरेदकर जागृत कर दिया। इस आक्रोश की प्रतिध्वनि 30 जनवरी को जिस प्रकार से जनता ने कोटद्वार सहित प्रदेश के अन्य भागों में भारी मतदान करके किया उससे प्रदेश की सत्ता में फिर से आसीन होने के दिवास्वप्न देख रहे मुख्यमंत्री खंडूडी व भाजपा नेतृत्व की नींद हराम हो गई।
हालांकि भाजपा के मुख्यमंत्री व दिल्ली में भाजपा के आला नेतृत्व अपनी खाल बचाने के लिए मुख्यमंत्री खंडूडी के विधानसभा क्षेत्र कोटद्वार में षराब व धनबल का विरोध करने वाले कांग्रेसी प्रत्याषी सुरेन्द्र नेगी की ही षिकायत चुनाव आयोग से करके अपने आप को पाक साफ बन रहे है। परन्तु हकीकत कोटद्वार की जनता जानती है। कांग्रेसी प्रत्याषी नेगी व यहां की जनता का आरोप है कि खंडूडी को यहां से हर हाल में जीताने के लिए षासन प्रषासन का जम कर दुरप्रयोग कर रहे है। यहां पर िजिस प्रकार से षराब वितरण प्रकरण पर यह विवाद उभरा, उससे खंडूडी व पूरी भाजपा कटघरे में जनता की नजरों में घिर गयी। प्रदेष की जनता का इतिहास रहा कि यहां पर सत्तामद में जनादेष को रौंदने या हरण करने वालों को जनता करारा सबक सिखाती है। इस प्रकरण का सीधा प्रभाव पूरे प्रदेष के मतदान पर पड़ा। हर हाल में खंडूडी जरूरी का अलोकषाही राग अलापने वाली भाजपा को कोटद्वार की जनता ने ऐसा सबक सिखाया कि भाजपा नेतृत्व के चेहरे की हवाईयां उड गयी है।  गौरतलब है कि जिस प्रकार से खंडूडी ने षासन प्रषासन की मदद सेयहां से चुनावी जंग जीतने का प्रयास किया उससे उनके खिलाफ यहां जनता में भारी आक्रोश देखने में आया। इसका सीधा खमियाजा चुनाव परिणाम में सामने आये तो किसी को कोई आष्चर्य नहीं होगा। लोगों का विष्वास है कि अगर ईमानदारी से चुनाव परिणाम घोशित हुए तो यहां से खंडूडी को मुंह की खानी पड़ सकती है।
इस हार के लिए भाजपा आला नेतृत्व के साथ खुद खंडूडी ही जिम्मेदार होगे। चुनाव आयोग को यहां पर कड़ी व निश्पक्ष निगरागी  रखनी चाहिए। नहीं तो सत्तामद में चूर लोग कुछ भी करने के लिए घात लगा कर बेठे होगे। भारतीय जनता पार्टी ने चुनाव से पहले ही मुख्यमंत्री के लिए खंडूडी के नाम का ऐलान करके खुद ही अपना अलोकत्रांत्रिक चेहरा बेनकाब कर दिया है। पार्टी के अब तक के विज्ञापनों में भी जो प्रमुखता से प्रदेश के समाचार पत्रों में प्रकाशित किया जा रहा है कि खण्डूडी जरूरी है। इसी के साथ प्रदेश के प्रभारी व पूर्व भाजपा अध्यक्ष राजनाथ सिंह भी ऐलान कर चूके हैं कि यदि भाजपा सत्ता में आती है तो मुख्यमंत्री खंडूडी ही होगें। भाजपा की उक्त घोषणा लोकशाही का अपमान के साथ हमारे संविधान का भी अपमान है जिसमें साफ कहा गया कि मुख्यमंत्री चुनाव के बाद पर्याप्त बहुमत हासिल करने वाले दल के विधायक निर्वाचित होने के बाद करेंगे। कुछ साल पहले तक भाजपा, पूर्व में कांग्रेस द्वारा किये जाने वाले इस प्रकार के कार्य को अलोकतांत्रिक बताती थी। वहीं जमीनी हकीकत यह है कि कोटद्वार विधानसभा सीट से जहां से खंडूडी विधायकी का चुनाव लड़ रहे है। वहां पर उनको कांग्रेस के दिग्गज प्रत्याशी पूर्व मंत्री सुरेन्द्रसिंह नेगी से मुकाबले में इस सर्दी में भी पसीना छूट रहा है। चुनाव में अपने विरोधी को 21 पाते हुए खंडूडी ने जहां कांग्रेस के कुछ असंतुष्टों को अपने पाले में लाने की कोशिश की परन्तु कड़ा मुकाबला देख कर भाजपा नेतृत्व भी परेशान है। इसी कारण लगातार भाजपा खंडूडी पर फोकस करने वाले विज्ञापन निकाल कर किसी तरह से अपनी लाज बचाने का प्रयास कर रही है। कोटद्वार में खंडूडी की डगर कठिन देख कर ही खंडूडी को उबारने के लिए रणनीति के तहत राजनाथ सिंह को भी खंडूडी को अगर भाजपा फिर से प्रदेश में सत्तासीन होती है तो मुख्यमंत्री बनाया जायेगा की घोषणा करनी पड़ी। इंटरनेट पर गढ़वाल कुमाऊ पीपल फ्रंट ने भी भाजपा के ‘खंडूडी है जरूरी......वाले विज्ञापन पर गहरा कटाक्ष करते हुए टिप्पणी की कि खंडूडी के साथ प्रदेश को निशंग-सारंगी -उमेश फ्री....’। परन्तु मात्र अखबारी बयानबाजी से जमीनी हकीकत नहीं बदली जा सकती। प्रदेश की जनता को मालुम है कि ईमानदारी का मुखोटा पहने वाली भाजपा सरकार में खंडूडी -निशंक-उमेश-सारंगी की जुगलबंदी से प्रदेश में कितना सुशासन व भ्रष्टाचार मिटा। वेसे भी खंडूडी की लोकप्रियता का आलम यह है कि उनके मुख्यमंत्री रहते हुए प्रदेश की पांचों लोकसभाई सीट पर से भाजपा का पूरी तरह सफाया हो गया। वे कितने लोकप्रिय है कि उनको अपने विधायकी सीट धूमाकोट जो अब लैन्सीडान के नाम से जानी जा रही है वहां से चुनाव मैदान में उतरने का कांग्रेसी नेता हरक सिंह की तरह ही साहस न जुटा कर भाग खडे हुये। भाजपा व कांग्रेस के दिग्गज नेताओं द्वारा लैन्सीडान सीट से भाग खडे होने पर यहां से भाजपा व कांग्रेस का सुपड़ा साफ करने के लिए मैदान में उतरे उत्तराखण्ड रक्षा मोर्चा के प्रमुख ले. जनरल तेजपाल सिंह रावत ने इन दोनों को भगोड़ा कह कर बेनकाब किया। आज दूसरे चुनाव क्षेत्रों में उतरे ये दिग्गज अपने पार्टी के नेताओं की राजनैतिक जीवन को हाशिये में डालने के लिए उनकी विधानसभा से चुनाव मैदान में उतरे है। इसी कारण खंडूडी के कोटद्वार से चुनावी दंगल से उतरने से यहां से भाजपा के विधायक रहे एस एस रावत भी खंडूडी से खपा हैं। वहीं हरक सिंह द्वारा रूद्र प्रयाग जाने से रूद्र प्रयाग के कांग्रेसी उनके खिलाफ चुनावी दंगल में ही उतर गये है। इस प्रकार खंडूडी को कोटद्वार में अपने प्रतिद्वंदी से कमजोर देख कर भाजपा ने उनकी माली हालत में सुधारने के लिए उनको फिर से मुख्यमंत्री बनाने व खंडूडी जरूरी का टोटका चला। देखना है खंडूडी क्या बिना उन्नसी बीस करके यहां पर चुनाव जीत पाते या नहीं। हालांकि कोटद्वार से जो खबरे छन कर आ रही है कि खंडूडी का मुख्यमंत्री तो बनेगे बाद में जब पहले वे कोटद्वार से विजयी तो हों।

शेष श्री कृष्ण कृपा। हरि ¬ तत्सत्। श्री कृष्णाय् नमो।

Sunday, January 29, 2012

आखिर कब होगा भारत में गणतंत्र का सूर्योदय

आखिर कब होगा भारत में गणतंत्र का सूर्योदय/
-आजादी के 65 साल बाद भी भारत में चल रहा है वही फिरंगी तंत्र
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हम भारतीय पिफरंगियों से मिली  स्वतंत्राता की 65वीं वर्षगांठ की 26 जनवरी को गणतंत्र दिवस के नाम पर पूरे देश में बहुत ही ध्ूमधम से मना रहे है। आज भी भारत अपनी आजादी के गणतंत्रा के सूर्योदय को देखने के लिए तरस रहा है। क्या इसी चंगेजी व भारतीय अस्मिता को मिटाने वाले राज को आजादी कहते है? क्या आम जनता को लुटने वालों को गणतंत्रा के सेवक कहते है? क्या देश को गुलामी से बदतर गुलाम बनाने वाले तंत्रा को गणतंत्र कहते है? मेरा भारत आजादी के छह दशक बाद भी आज अपनी आजादी को तरस रहा है। आजादी के नाम पर पिफरंगी नाम इंडिया व  फिरंगियों की जुबान अंग्रेजी तथा देश को जी भर कर लुटने की  फिरंगी प्रवृति के अलावा इस देश को क्या मिला? आज भारत को न तो विश्व में कोई उसके नाम से पहचानता है व नहीं उसकी जुबान से। आज भी भारतीय पहचान व सम्मान को उसी बदनुमा पिफरंगी गुलामी के कलंक के नाम से जाना जा रहा है। आजादी के छह दशक बाद हमारी स्वतंत्राता के समय ही अपना सपफर नये ढ़ग से शुरू करने वाले इस्राइल, चीन व जापान आज विश्व की महाशक्तियां बन गयी है। परन्तु हम कहां खड़े हैं गुलामी के कलंक को ढोने को ही अपनी प्रगति समझ कर इतरा रहे हैं? आजादी के नाम पर यह कैसा विश्वासघात मेरे देश के साथ? अगर आज देश की शर्मनाक स्थिति को अमर शहीद सुभाषचन्द्र बोस, चन्द्र शेखर आजाद, भगतसिंह, वीर सवारकर, महात्मा गांध्ी देख रहे होते तो उनकी आत्मा भी खून के आंसू बहाने के लिए विवश होती? देश को दिया क्या यहां के हुक्मरानों ने?  देश को अमेरिका, चीन, पाकिस्तान के षडयंत्राकारियों के लिए आखेड़ का मैदान बना दिया है। आज चीन व अमेरिका अपने प्यादे पाकिस्तान, बंगलादेश व नेपाल के द्वारा हमारी गैरत को रौंद रहे है? परन्तु देश के हुक्मरान कहां सोये है?   उसी समय कुछ खबरों ने मुझे और बैचेन कर दिया। पूरे देश में मंहगाई से त्राही-त्राही मची हुई है परन्तु देश के हुक्मरान नीरो बन कर भारतीय स्वाभिमान को कलंकित करने वाले राष्ट्रमण्डलीय खेल  की तैयारियों में ही जुटे हुए है। उनको मंहगाई से त्रास्त जनता की वेदना कहीं दूर तक भी नहीं सुनाई दे रहा है। देश में सरकार व विपक्ष नाम की कोई चीज ही नहीं रह गयी है। जनता मंहगाई, भ्रष्टाचार  से त्रास्त है।
भ्रष्टाचार के आरोपों से बदरंग हुए देश की एक उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाध्ीश को बचाने के लिए जातिवाद की दुहाई दी जा रही है। देश के वरिष्ठ राजनेता के कृत्यों ने न केवल राज्यपाल की गरीमा को ध्ूल में मिटा कर बहुत ही निर्लज्जता से अपने आप को बेकसुर बता रहा है। हमारी संसद में सत्तारूढ़ दल का एक वरिष्ठ सांसद की नागरिकता पर देश की सर्वोच्च जांच ऐजेन्सी सीबीआई ही प्रश्न उठा रही है?  देश के सबसे बड़े राज्य उप्र की विधनसभा के एक सम्मानित विधयक का घर चोरी की गाडियों को छुपाने का अड्डा निकला? विधयक पर पुलिस वाहन चोरी का सतराज होने का आरोप लगा रही है?  हमारे नौकरशाहों के पास ही नहीं हमारे सेना के कई वरिष्ठ अध्किारी, इंजीनियर व चिकित्सकों के पास भी भ्रष्टाचार से सन्ना अकूत सम्पदा का भण्डार बना हुआ है। देश के अध्किांश मंत्राी ही नहीं संतरी अपने निहित स्वार्थो में लिप्त रह कर भारतीय हितों को दाव पर लगाने का आत्मघाति कृत्य भी कर रहे है। यही नहीं देश के करोड़ों बच्चों को न तो समुचित शिक्षा, चिकित्सा, सम्मान तथा न तो न्याय ही मिल रहा है? देशद्रोहियों को न्यायालय द्वारा मौत की सजा सुना देने के बाबजूद देश के हुक्मरानों का हाथ इतना कमजोर है कि वे निशाचरों को सजा नहीं दे पा रहे है। यह सब देख सुनने के बाद एक ही सवाल उठता है कि हमारा देश वास्तव में स्वतंत्रा हैं या देश में हकीकत में गणतंत्रा है?
े   परन्तु उपरोक्त कविता की पंक्तियों मेरे जेहन में दशकों से रह रह कर सर उठा कर मुझे बेचैन करती है। कहां है भारतीय गणतंत्रा? यह सवाल मुझें कापफी कचोटता है। मैं अपने आप से सवाल पूछता हॅू कि यह गणतंत्रा किसके लिए है? मैने अपनी जिन्दगी के 45 सालों में जो देखा व समझा तथा जाना उससे एक ही बात मुझे समझ में आयी कि यह भारतीय गणतंत्रा नहीं हे? इसके लिए कौन जिम्मेदार...... और कोई नहीं हम सब है। इसी आक्रोश को प्रकट करने के लिए मेने 21 अप्रेल 1989 को संसद की दर्शक दीर्घा से देश के हुक्मरानों को ध्क्किारा था। परन्तु इसके बीस साल बाद हालत बद से बदतर हो गयी है। संघ के राष्ट्रवाद का नकाब ओढ़े स्वयं सेवक ;रूपि कालनेमी वाजपेयी व आडवाणी जैसेद्ध जब राजग के कार्यकाल में इंडिया राइजिंग व साइनिंग का तोता रटन लगाने लगे तो देश भोंचंक्का व ठगा सा रह गया। कांग्रेस ने तो लगता है भारतीय स्वाभिमान को गांध्ी जी के सपनों के भारत के साथ राजघाट में दपफना दिया था। लोग कांग्रेस से निराश थे परन्तु जब जनता से संघ के स्वयं सेवको ने राष्ट्रवाद के नाम पर पदलोलुपता व जातिवाद का कलुषित तांडव एनडीए के शासक के रूप में मचाया तो देश की आम जनता की आशाओं पर बज्रपात हुआ। आज दुर्भाग्य यह है कि देश की आम जनता को देश की जुबान में सर्वोच्च न्यायालय में न तो न्याय ही मिल सकता है व नहीं सम्मान। इस देश में आज आम जनता की पंहुच से न्याय, रोजी रोटी, चिकित्सा  व शिक्षा सब बाहर हो गयी है। सबकी सब महत्वपूर्ण संस्थानों पर थैलीशाहों चंगेजों का बर्चस्व हो गया है। कौन दिलायेगा भारतीय जन को उसका अपना गणतंत्रा? हम सब उस दीमक के समान हो गये हैं जो जिस पेड़ पर निवास करता है उसी को खोखला करने में लगा रहता है? युगान्तकारी तत्वदर्शी व आजादी के परम यो(ा काला बाबा सच ही कहते थे कि देवी इस देश में अब विद्या व्यापार, सत्ता व्यापार व  ध्र्म व्यापार में तब्दील हो गया है।
आज अटल व मनमोहन सिंह की सरकारों की घोर  पदलोलुपता के कारण देश अमेरिका का अघोषित उपनिवेश पाकिस्तान की तरह बन गया है। मनमोहन जैसे  प्रधनमंत्राी के कुशासन में देश की आम जनता का मंहगाई, आतंकबाद व भ्रष्टाचार के कारण जीना  दूश्वार हो रखा है। देश में लोकशाही की हालत इतनी शर्मनाक है कि संसद की चैखट राष्ट्रीय ध्रना स्थल  जंतर  मंतर पर देश भक्तों को  देश हित में 12 घंटे लगातार भी आंदोलन करने की इजाजत यहां की लोकशाही की दंभ भरने वाली सरकार नहीं दे  रही है। देश हित की बात करने वाले बाबा राम  देव व अण्णा हजारे को प्रताडित व दमन करने में यहां की
सरकार जरा सी भी शर्म महसूस नहीं कर रही है।
  यहां आजादी तो गुलामी से बदतर हो गयी है?  कैसे मिलेगी देश की आजादी को इन चंगेजो के शिकंजे से मुक्ति? क्या आज भारत में साठ प्रतिशत लोग जो गरीबी की रेखा से नीचे जीवन बसर करने के लिए विवश है उनके लिए इस देश की आजादी का क्या अर्थ रह गया है? देश की सुरक्षा पूरी तरह से जहां विदेश शत्राु से खतरे में पड़ी हुई हैं वहीं इन हुक्मरानों से पूरी तरह लुटी जा रही है। एक नया सवेरा होगा.....विश्वास है भगवान श्री कृष्ण के बचनों पर यदा यदा ही ध्र्मस्य........। इसी आश में मैं निरंतर इन चंगैजी हुक्मरानों के खिलापफ जन जागरूकता का प्यारा उत्तराखण्ड रूपि शंखनाद कर रहा हॅॅू। शेष श्री कृष्ण कृपा, हरि ¬ तत्सत्।
श्रीकृष्णाय् नमो।

30 जनवरी 2012 को विधानसभा चुनाव में भाजपा हराओं उत्तराखण्ड बचाओ


30 जनवरी 2012 को विधानसभा चुनाव में भाजपा हराओं उत्तराखण्ड बचाओ
सभी उत्तराखण्डियों से विनम्र निवेदन है कि वे उत्तराखण्ड राज्य के हितों व लोकशाही की रक्षा के लिए प्रदेश शासन में विगत पांच सालों से सत्तासीन भाजपा के खिलाफ अपना मतदान करें
1.-क्योंकि भाजपा ने अपने 2007 के विधानसभा चुनाव में मिले जनादेश का अपमान अपनी सत्तालोलुपता व दिशाहीन कुशासन से किया।
2- प्रदेश की जनांकांक्षाओं व सम्मान के प्रतीक स्थाई राजधानी गैरसैंण गठित करने के बजाय बलात राजधानी देहरादून थोपनें का षडयंत्र किया।
3.- प्रदेश की  भाजपा सरकार के शासनकाल में मुजफरनगर काण्ड के अभियुक्तों व उनके संरक्षकों को दण्डित करने के बजाय उसके गुनाहगारों को दण्डित कराने में प्रदेश सरकार नितांत असफल रही।
4-प्रदेश भाजपा सरकार के कार्यकाल में स्टर्जिया घोटाला, जल विद्युत परियोजना घोटाला, कुम्भ घोटाला सहित अनैक शर्मनाक घोटाले हुए।
5.-प्रदेश की प्रतिभाओं की उपेक्षा कर बाहर के लोगों को प्रदेश के संसाधनों व महत्वपूर्ण पदों पर आसीन करना।
6- प्रदेश के वर्तमान मुख्यमंत्री खंडूडी द्वारा प्रदेश में सारंगी व निशंक को भाग्य विधाता थोप कर जहां प्रदेश का अपमान किया, वहीं  भ्रष्ट एनजीओ, विधायकों, मंत्रियों व मुख्यमंत्री को बहुत ही धूर्तता से लोकायुक्त से बचने का रास्ता दे कर प्रदेश के साथ विश्वासघात करने का कृत्य किया।
7-प्रदेश की भाजपा सरकार ने गत पांच सालों में सारंगी, निशंक व खंडूडी की बीन बजाते हुए प्रदेश को जहां भ्रष्टाचार व कुशासन से रौंदा वहीं प्रदेश में जातिवाद व क्षेत्रवाद के गर्त में धकेल कर प्रदेश में लोकशाही का एक प्रकार से गला ही घोंटा हैं।
इसलिए प्रदेश में लोकशाही की रक्षा के लिए व प्रदेश के हक हकूंकों की रक्षा करते हुए चहुमुखी विकास के लिए प्रदेश के वर्तमान व भविष्य पर लांश बन गयी भाजपा के कुशासन से मुक्ति के लिए 30 जनवरी को उत्तराखण्ड की सत्ता से भाजपा को उखाड फेंकने के लिए मतदान करके उत्तराखण्ड राज्य गठन के शहीदों व आंदोलनकारियों के आदर्श उत्तराखण्ड राज्य गठन के सपने को साकार करें। अपना मत केवल साफ छवि के, जनहितों में समर्पित रहे  उत्तराखण्ड के हक हकूकों के रक्षक प्रत्याशी को ही दें।
देवसिंह रावत
अध्यक्ष
उत्तराखण्ड जनता संघर्ष मोर्चा
(सन् 1994 से 2000 यानी 6 साल तक पृथक उत्तराखण्ड गठन हेतु संसद की चैखट जंतर मंतर पर निरंतर सफल धरना देने वाला एकमात्र संगठन )

Monday, January 23, 2012

ठेकेदारों के हवाले वतन साथियो


ठेकेदारों के हवाले वतन साथियो/
-देश ही नहीं अब रैली, धरना प्रदर्शन भी ठेकेदारों के हवाले /
-कांग्रेस में तो केन्द्रीय मठाधीश के कारण राहुल को झेलना पड़ा जूते का स्वागत /
-भ्रष्टाचार की जड है ठेकेदारशाही
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देहरादून (प्याउ)। भले ही आप व हम इस मुगालते में हो की हम लोकशाही में जी रहे हैं परन्तु यह सोलह आना सच है कि आज देश ठेकेदारशाही में जी रहा है। हर काम में ठेकेदारी। ठेकेदारी यानी दुसरे के काम व दाम पर भी सेंध लगाना। यानी मजदूर, गरीब व आम आदमी का शोषण। लोकशाही में जहां आम आदमी के कल्याण की बात होती है परन्तु ठेकेदारशाही में प्रायः ठेकेदार, नोकरशाह व नेताओं के बीच ही सब दुघ मक्खन बंट जाता है। सब मलायी ये तीनों ही चटक जाते है। आम जनता के लिए केवल छांस रहती है वह भी आजकल सिन्थेटिक छांस । असली छांस भी आम जनता को सुघने में नहीं मिलती। इस देश में भ्रष्टाचार की जड़ ही ठेकेदार शाही है। कहीं एनजीओ की ठेकेदारशाही तो कहीं आम दलालों की ठेकेदार शाही। इसी ठेकेदारशाही के राज में देश प्रदेश का शासन प्रशासन चलाने के लिए नियुक्त मंत्री अफसर सब एक प्रकार से ठेकेदार से बदतर काम कर रहे है। आज हर पद की नियुक्ति की एक अहम कीमत होती है। जितना मालदार पद उतनी उसकी कीमत। चाहे पद मंत्री का हो या मुख्यमंत्री का, बीट अफसर का हो या शहर के कोतवाल का। आज लगता है इस देश में सब कुछ बिक रहा है।  ईमानदार आदमी को विधायक, सांसद, प्रधान आदि का टिकट तो रहा दूर समय पर  आज रेल का टिकट भी नसीब नहीं हो पाता है। दागदार लोगों का हर पार्टी में स्वागत, बेईमान लोगों को हर पार्टी में महत्वपूर्ण पद। भाजपा हो या कांग्रेस या अन्य सब लोग मालदार आदमी या माल देने वाले आदमी को ही निहारते है। चाहे रेड़ी बंधु हो या उत्तराखण्ड के कलंक, सब जगह कोई न कोई सुषमा जेसे अभयदान देने वाले लोग उपस्थित है। कांग्रेस पार्टी में ही देखो वर्षो से पार्टी व राज्य के लिए सड़कों के लिए संघर्ष करने वाले आम कार्यकत्र्ता की कहीं पूछ नहीं परन्तु तिजोरी भरे लोग चाहे आर्येद शर्मा हो या काव आदि को पार्टी का प्रत्याशी बनाने में प्रभारी ही नहीं सांसद भी बेशर्मी से पूरी पार्टी की छवि को दाव पर लगा सकता है। प्रदेश अध्यक्ष हो या जनाधार वाले सदचरित्र नेता वे इन प्रभारियों के आगे मैमने बने रहते। इसी के कारण राहुल को देहरादून की सभा में जूते से स्वागत झेलना पड़ा। कांग्रेस आलाकमान अगर ईमानदारी से जांच कराये तो देहरादून की टिकटें कराने में प्रभारी ने क्यों पार्टी का भविष्य व छवि दाव पर लगा दी थी। पार्टी द्वारा गोचर से लेकर आला नेताओं की सभाओं में केन्द्रीय कार्यालय से मिलने वाला धन क्या प्रदेश पार्टी ने खर्च किया या केन्द्रीय नेताओं ने ही । आज प्रदेश अध्यक्ष इतना व्यथित है कि वह अपनी इस पीड़ा को इजहार करे तो किसे। चुनावी ठेकेदारों ने पार्टी का भविष्य व छवि दोनों अपने निहित स्वार्थ के लिए दाव पर लगा दी है।
चुनाव में ही नहीं रेली में भीड़ जुटाने के लिए ठेकेदारों का अपना अलग महत्व है। आज आम आदमी राजनेतिक दलों व नेताओं से इतना धृणा करता है कि उसको उनके भाषण सुनने व उनकी रेली में सम्मलित होने से भी धृणा आती है। ऐसे में अपने दलीय समर्थकों के अलावा इनकी रेली व प्रचार में आदमी कैसे जुटें इसके लिए किराये के आदमी लाने वाले ठेकेदारों की शरण में ये दल जाते है। इसका भी अपना एक महत्व होता है। इन ठेकेदारों से हर आदमी के हिसाब से ठेका दिया जाता है। इसमें सम्मलित लोगों को प्रतिदिन के हिसाब से दिहाड़ी व खाना इत्यादि का भुगतान किया जाता है। वेसे भी जब पूरा देश ही ठेकेदारी पर चल रहा हो तो चुनावी माहोल में या सभा धरना प्रदर्शन इत्यादि के लिए आदमियों के ठेकेदारों को अवसर न मिले यह कहां हो सकता है। रेली चाहे प्रधानमंत्री की हो या अदने से आम आदमी की, धरना-प्रदर्शन, सम्मेलन, आदि  राष्ट्रीय पार्टियों का हो या सामाजिक संगठनों या आम आदमी का अधिकांश को अगर भीड़ जुटानी है तो इसमें भीड़ जुटाने के लिए ठेकेदारों का ही सहारा लिया जाता है। अब ये ठेकेदार कभी वास्तव में ठेकेदार होते है परन्तु अब इन ठेकेदारों के नाम पर कई बार ऐसे आदमी भी खुद ही ठेकेदार बन जाता है जिसको बड़ा नेता भी समझा जाता है। यह सब मोटी रकम के नाम पर डकारने के लालच में। बड़ी पार्टियों के बड़े नेताओं की रेली में सब ठेकेदारी पर होता है। इसका भुगतान भी मोटा होता है। इसी कारण कई बार आला नेतृत्व का प्रभारी ही प्रदेश के दल के प्रमुख को मिलने वाली ही रकम खुद ही डकार जाता है। कांग्रेस में तो यह देखा जा रहा है कि राहुल, सोनिया या प्रधानमंत्री की रेलियों को दी जाने वाली रकम प्रदेश के नेताओं या पार्टी तक पंहुच ही नहीं रहा है। इसी पखवाडे देहरादून के पटेलनगर थाने में एक ऐसे छोटे ठेकेदार को जो दलों चुनावी लाभ पहुंचाने के लिए प्रत्याशी के समर्थन में धनबल का इस्तेमाल कर भीड़ जुटाने वाले को पुलिस ने गिरफ्तार किया है। इस ठेकेदार की गलती यह थी कि चुनावी जुलूस में भाग लेने वालों को जब पैसे का भुगतान नहीं हुआ तो भीड़ में शामिल लोगों ने आरोपित को घेर लिया। बवाल होने के बाद पहुंची पुलिस ने आरोपित को गिरफ्तार कर लिया। इस मामले में पटेलनगर थाने में मुकदमा दर्ज किया गया है। आरोपित की पहचान जावेद के रूप में हुई है। पुलिस ने बताया कि उन्हें कुछ लोगों से इस बारे में शिकायत मिली थी। एक पीड़ित ने तहरीर देकर पुलिस को बताया कि उन्हें एक प्रत्याशी के चुनावी जुलूस शामिल होने के लिए पैसा देने का वादा किया गया था। पैसा पाने के चलते वह जुलूस में शामिल हुए, मगर बाद में उन्हें भुगतान नहीं हुआ। सभी लोगों को 200 रुपये के हिसाब से पैसे मिलने थे। पैसा देने का वादा करने वाले से जब लोगों ने भुगतान के बारे में पूछा तो उसने इनकार कर दिया। इसके बाद लोगों ने आरोपित को पकड़ लिया। परन्तु बडे ठेकेदार पर कोई हाथ नहीं डाल सकता। पुलिस प्रशासन की हिम्मत ही कहां। दिल्ली में भी आये दिन रेली व सम्मेलन के नाम पर आम गरीब आदमियों का शोषण की बात उजागर होती है। ऐसी ही एक घटना देश के एक सबसे ईमानदार नेता के रूप में ख्यातिप्राप्त रहे नेता के बेटे के सम्मेलन में देखने में आयी। इन माहशय ने भी इन ठेकेदारी पर बुलाये गये लोगों को उनकी तय की गयी जब दिहाड़ी नहीं दी तो मजदूरों ने उनका आवास के बाहर ही प्रदर्शन किया। बाद में इनका भुगतान शर्माशर्मी से किया गया। आज पूरी व्यवस्था ठेकेदारों की रहमोकरम पर जी रही है। भले ही हम देश में लोकशाही को होने के भ्रम में रहे परन्तु हकीकत में देश में आज ठेकेदारी ही चल रही है वह भी बेरहम ठेकेदारी। अगर देश में आम लोगों व देश में लोकशाही बचानी है तो यहां से ठेकेदारशाही को जल्द से जल्द विदाई देनी होगी।

उत्तराखण्ड में चुनावी सर्वेक्षण के नाम पर लोकशाही का चीर हरण क्यों

उत्तराखण्ड में चुनावी सर्वेक्षण के नाम पर लोकशाही का चीर हरण क्यों
स्टार न्यूज व नीलसन द्वारा उत्तराखण्ड विधानसभा चुनाव 2012 का सर्वे परिणाम अपने आप में लोकशाही का अपमान है। एक करोड़ जनसंख्या वाले प्रदेश के चंद हजार प्रायोजित लोगों का विचार को आधार बना कर चुनाव पूर्व चुनाव को प्रभावित करने की प्रभावित करने वाला निंदनीय हथकण्डा ही है। जिसे चुनाव आयोग द्वारा तत्काल संज्ञान में लेना चाहिए। चुनाव परिणाम में 70 सदस्यीय विधानसभा में 39 प्रतिशत कांग्रेस व 40 प्रतिशत भाजपा को दिखा कर, भाजपा को 39 व कांग्रेस को 29 सीटें देने के बाद केवल अन्य को 2 सीटों पर दिखाया। जो प्रदेश की वर्तमान चुनावी समर की ताजा स्थिति को देख कर बहुत ही हास्यास्पद है। बसपा, उत्तराखण्ड रक्षा मोर्चा, उक्रांद व कई स्थानों पर दलों की हालत पतली करने वाले निर्दलीय प्रत्याशियों को केवल 2 सीटों पर रखना, इस सर्वे का मुखोटा खुद बेनकाब करने के लिए काफी है। इस सर्वे का कुल मकसद प्रदेश में सत्ता पर काबिज भाजपा के पक्ष में मतदान करने के लिए लोगों को गुमराह करना है। प्रदेश की जमीनी हकीकत यह है कि भाजपा के खुद अपने सर्वे में प्रदेश में उसका सफाया होना था जिसके कारण आनन फानन में प्रदेश का मुख्यमंत्री तक बदल दिया गया। परन्तु हालत में ज्यादा अंतर नहीं आया। प्रदेश की जनता दिशा विहिन व भ्रष्टाचार से प्रदेश को शर्मसार करने वाली भाजपा सरकार के कृत्यों को देख कर उसको हर हाल में प्रदेश की सत्ता से उखाड फेंकने के लिए मन बना चूकी है। कभी स्टार सहित दिल्ली स्थित इन चैनलों को प्रदेश की जमीनी हकीकत का भान तक नहंी रहा। ये चेनल वाले केवल अपना हित तक ही सीमित रहते है। पंचतारा संस्कृति के वाहक ये चेनल कभी आम आदमी की भावनाओं को समझ तक नहीं सके। न इनके समीक्षकों व नहीं इनके पत्रकार व इनके प्रभाववाले नेताओं को प्रदेश के जमीनी हालत का भान तक नहीं है। वर्तमान विधानसभा में सत्तासीन भाजपा के विधायकों की संख्या 35, कांग्रेस के 21 व अन्य 14 है। परन्तु स्टार न्यूज द्वारा किया गया 2012 के संभावित विधानसभा के सर्वे रिपोर्ट जो केवल दो दलों के बीच ही सारी बंदरबांट करता हुआ नजर आ रहा है वह इन दिनों चुनाव के मोर्चे से मिल रही रूझानों से कोसों दूर है।
स्टार न्यूज सहित तमाम दिल्ली के तथाकथित चैनल जब भाजपा के राज में स्टर्डिया सहित तमाम भ्रष्टाचार के प्रकरण हो रहे थे तब ये लोकशाही के तथाकथित चैथा स्तम्भ समझे जाने वाले इन चैनलों को सांप सुंघा हुआ था। अब भी चुनाव से पहले जब उत्तराखण्ड की जनता, प्रदेश की जनांकांक्षाओं को रौंदने का गुनाहगार भाजपा सरकार को उखाड़ फेंकने के लिए कमर कसे हुए हैं उस समय भाजपा की सरकार को बचाने के लिए चंद लोगों की राय को प्रदेश की जनता का संभावित रूझान बताने वाली मीडिया केवल विज्ञापन व अपनी थेली भरने की रणनीति पर ही काम कर रही है। आज की मीडिया को केवल अपने विज्ञापनों व अपने हितों का भान होता है प्रदेश की जनांकांक्षाओं से इसको कोई लेना देना नहीं। इसी मीडिया के मुंह पर उत्तराखण्ड की जनता ने गत लोकसभा चुनाव में भाजपा का प्रदेश से पूरी तरह से सफाया करके इसके तमाम पूर्वानुमानों को रौंद दिया था। यही नहीं जिस प्रकार से इस चैनल ने प्रदेश के संभावित मुख्यमंत्रियों में सर्वेक्षण में तथाकथित पंसद को दर्शाया वह सच्चाई को खुद ही बेनकाब करती है। जहां प्रदेश में लोकप्रिय हरीश रावत को पूरी तरह से हाशिये में व जनप्रिय नेता कोश्यारी को केवल 2 प्रतिशत व डा हरक सिंह रावत को 20 प्रतिशत लोगों की नजर में मुख्यमंत्री का सबसे पसंदीदा प्रत्याशी बताया गया। जबकि खंडूडी को 50 प्रतिशत प्रतिभागियों की पहली पसंद बताया।
वहीं अपनी खाल बचाने के नाम पर पंजाब मे आगामी विधानसभा चुनाव मे 2012 कांग्रेस को 68 व अकाली गठबंधन को 53 तथा अन्य को 1 सीटें दी है। जबकि गत विधानसभा में अकाली भाजपा गठबंधन के पास 68 व कांग्रेस के पास 44 तथा अन्य के खाते में 5 सीटें थी। पंजाब में पहले से एक बात साफ हो गयी कि यहां पर अकाली गठबंधन को प्रदेश की जनता सत्ता से बेदखल कर रही है।

तिवारी के दाव से भाजपा व कांग्रेसी चारों खाने चित

तिवारी के दाव से भाजपा व कांग्रेसी  चारों खाने चित/
तिवारी की यात्रा प्रदर्शन से भाजपा ही नहीं कांग्रेसी भी हैरान

हल्द्वानी(प्याउ)। कांग्रेस के पक्ष में हल्द्वानी में चंद दिनों पहले तक अपनी उपेक्षा से असंतुष्ट समझे जाने वाले प्रदेश के दिग्गज वयोवृद्य नेता व प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री नारायणदत्त तिवारी के हल्द्वानी में कभी उनकी सबसे करीबी रही सहयोगी इंदिरा हृदेश के पक्ष में उनको साथ में लेकर खुली जीप में समर्थन यात्रा कर जहां भाजपा को ही नहीं कांग्रेस के दिग्गज नेताओं को हैरान कर दिया है।  तिवारी की इस सक्रियता ने जहां भाजपा की प्रदेश में पुन्न सत्तासीन होने की आशाओं में तिवारी का कांग्रेस विरोध रूपि सहयोग की आश पर बज्रपात हुआ, वहीं कांग्रेस में कई महिनों से बने हरीश रावत व इंदिरा हृदेश के बीच चल रही जुगलबंदी की भी एक प्रकार से चूलें ही हिला कर रख दी।  अब इंदिरा हृदेश भी प्रदेश के मुख्यमंत्री की जंग की एक मजबूत दावेदार के रूप में चुनाव परिणाम के बाद ताल ठोक दे तो कोई बड़ी बात नहीं होगी। तिवारी ने शायद इंदिरा की इसी महत्वकांक्षा को हवा दे कर अपने सबसे प्रबल विराधी हरीश रावत की हसरत पर भी ग्रहण लगाने का काम कर दिया है।
प्रदेश के हितैषियों के बीच पूरी तरह से अलोकप्रिय हो चूके तिवारी के समर्थकों की कांग्रेस के दिल्ली मठाधीशों व प्रदेश में कमी नहीं है। वे तिवारी की सक्रियता से आगामी विधानसभा चुनाव के बाद प्रदेश में कांग्रेस की सत्तासीन होने के बाद मुख्यमंत्री के पद पर कोन आसीन होगा इसको प्रभावित करने वाला कारक बनाना चाहते है। जिस प्रकार से तिवारी के नाम पर कांग्रेस आलाकमान को गुमराह करके तीन टिकटो को तिवारी के प्यादों को परोसा गया, उससे प्रदेश की जनता में ही नहीं कांग्रेसी भी गुस्साये हुए है। इन तीनों सीटों पर कांग्रेस की हार का इंतजाम तिवारी के नाम पर कांग्रेस आलाकमान को गुमराह करने वाले कांग्रेसी मठाधीशों ने ही दिया।
इसी कड़ी में तिवारी की हल्द्वानी में कभी अपनी सबसे करीबी सहयोगी रही इंदिरा हृदेश के पक्ष में रोड़ शौ में उतर कर जहां एक तीर से अपने विरोधियों को परास्त करने का काम किया वहीं अपनी सक्रियता को प्रदर्शित करके खुद को भी प्रदेश की सत्ता का एक दावेदार साबित कर दिया। जिस प्रकार से तिवारी ने हल्द्वानी में नैनीताल रोड, एसडीएम दफ्तर, रेलवे बाजार व ताज चैराहे होते हुए लाइन नम्बर 17, आजादनगर, वनभूलपूरा, मंडी बाईपास, शनि बाजार, बरेली रोड, मंगल पड़ाव, कालाढूंगी रोड, जेल रोड, नवाबी रोड होते हुए सौरभ होटल व उसके बाद कुल्यालपुरा तक पंहुचा। पूरे मार्ग पर लोगों ने तिवारी को बहुत ही उत्सुकता से देखा, यह उत्सुकता इंदिरा हृदेश के पक्ष में कहां तक परिवर्तीत होगी यह तो आगामी 6 मार्च को चुनाव परिणाम ही उजागर करेंगे। इस पूरी यात्रा में तिवारी के साथ खुली जीप में उनकी करीबी सहयोगी हल्द्वानी से कांग्रेसी प्रत्याशी इंदिरा हृदयेश, व तिवारी द्वारा कुछ महिनों से चलाये जा रहे निरंतर विकास समिति के झण्डेबरदार भी साथ थे। इस मोके पर तिवारी ने दो टूक शब्दों में कहा कि  विकास की सोच केवल कांग्रेस के पास है तथा कांग्रेस ही राज्य का चहुंमुखी विकास करेगी। तिवारी के इन दो टूक ऐलान ने तिवारी की आश से फिर से प्रदेश की सत्तासीन होने की आश लगाये भाजपा के पांवों के तले जमीन खिसक गयी। इसी आश में भाजपा सरकार ने तिवारी सरकार के कार्यकाल में हुए चार दर्जन से अधिक घोटालों की जांच की आंच तक तिवारी की तरफ तक नहीं आने दी। यही नहीं तिवारी को मंचो से जिस प्रकार से भाजपा के मुख्यमंत्री खंडूडी, निशंक ही नहीं केन्द्रीय नेतृत्व भी महिमामण्डित करते हुए, इस रोड़ शो ने भाजपा को तिवारी ने ऐसा करारा सबक सिखाया कि उनके पैरों तले जमीन भी खिसक गयी। सबसे हेरानी की बात यह रही कि भाजपा ने प्रदेश में 2007 में हुआ पूरा विधानसभा चुनाव तिवारी सरकार के कुशासन के खिलाफ ही चुनाव लड़ कर जनांदेश हासिल किया था, परन्तु सत्तासीन होते हुए भाजपा की प्रदेश सरकार कदम कदम पर तिवारी के आर्शीवाद के लिए बेशर्मी से लालायित रही।  भाजपा का यह व्यवहार, प्रदेश के हितों पर किये गये कुठाराघातों से आहत उत्तराखण्डियों के जख्मों पर किसी नमक छिडकने से कम नहीं था। प्रदेश की जनता किसी भी तरह से उत्तराखण्ड के हितों को रौंदने वाले तिवारी या उसके प्यादों को प्रदेश में प्रमुख पदों पर आसीन या महिमामण्डित देखना नहीं चाहती । सत्ता के लिए भाजपा की यह तिवारी की आरती उतारने वाले व्यवहार लोगों के गले में आज तक भी नहीं उतर रहा है। परन्तु अब तिवारी द्वारा एक ही झटके में चुनावी जंग में  विकास की सोच केवल कांग्रेस के पास है तथा कांग्रेस ही राज्य का चहुंमुखी विकास करेगी का ऐलान करके भाजपा के हाथों के तोते ही उडा दिये। तिवारी ने बहुत ही चालाकी से भाजपा सरकार को भी अपने उपर उनके कार्यकाल में हुए तथाकथित घोटालों के निशाने पर ही न आने दिया व समय आते ही भाजपा सहित अपने कांग्रेस में मजबूत हो रहे विरोधियों का चक्रव्यूह ध्वस्थ करने का एक ऐसा पाशा फेंका जिसके दंश से भाजपा व कांग्रेस दोनों ही मर्माहित हैं। तिवारी ने अपने इस दाव से साबित कर दिया कि भले ही वे बेहद बुजुर्ग हो गये हो परन्तु राजनीति के तिकडम से वे आज भी अपने विरोधियों को पानी पिलाने का दम रखते हे।

Sunday, January 22, 2012

खंडूडी जेसे पदलोलुपु कुशासक की नहीं अपितु परमार जैसे कुशल नेता की जरूरत है उत्तराखण्ड को

खंडूडी जेसे पदलोलुपु कुशासक की नहीं अपितु परमार जैसे कुशल नेता की जरूरत है उत्तराखण्ड को
भाजपा के आला नेतृत्व का शर्मनाक पतन का परिचायक है ‘खंडूडी है जरूरी  का विज्ञापन। इनकी अलोकशाही प्रवृति का और दूसरा सहज उदाहरण और क्या हो सकता कि वे उत्तराखण्ड की 30 जनवरी को होने वाले  विधानसभा चुनाव के लिए  सभी समाचार पत्रों में हर दिन प्रमुखता से विज्ञापन दे रहे हैं कि खंडूडी है जरूरी।  यह विज्ञापन भाजपा नेतृत्व की उत्तराखण्ड की जनभावनाओं को रौदेने वाला ही नहीं अपितु लोकशाही का गला घोंटने वाला है। यह अधिनायकवाद का परिचायक व भाजपा के केन्द्रीय नेतृत्व की लोकशाही खंडूडी नहीं उत्तराखण्ड की जनांकांक्षाओं को साकार करना जरूरी है। उत्तराखण्ड में लोकशाही की स्थापना जरूरी हैं। जिस लोकशाही  को उत्तराखण्ड की जनता के दशकों पुराने संघर्ष व बलिदान दे कर उत्तराखण्ड राज्य के नाम से हासिल किया था, उस लोकशाही का सूर्योदय देवभूमि उत्तराखण्ड की धरती पर होने से पहले भाजपा व कांग्रेस के दिल्ली स्थित आकाओं ने अपने तिवारी, खडूडी व निशंक जेसे सत्तांध व उत्तराखण्ड की जनांकांक्षाओं को रौंदने वाले प्यादों को थोप कर पूरी तरह से ग्रहण लगा दिया है। परन्तु भाजपा के दिल्ली आकाओं को उत्तराखण्ड की उन जनांकांक्षाओं को जरूरी नहीं लगती । उनको मुजफरनगर काण्ड के अभियुक्तों को सजा देनी जरूरी नहीं लगती। भाजपा के दिल्ली में आसीन बेशर्म नेताओं को प्रदेश की जनांकांक्षाओं को साकार करने वाले स्थाई राजधानी गैरसैंण जरूरी नहीं लगती, उनको खंडूडी जरूरी लगता है। भाजपा के आला नेताओं को इतना भी ज्ञान नहीं है कि प्रदेश की जनता ने यह राज्य किसी खंडूडी, तिवारी या निशंक जेसे घोर पदलोलुप नेताओं के लिए नहीं बनाया। जिन्होंने उत्तराखण्ड के सम्मान, हक हकूकों व चरित्र को अपनी पदलोलुपता, जातिवादी-क्षेत्रवादी व भ्रष्टाचार का संरक्षण देने वाले कुशासन से रौंद दिया है। इसलिए आज उत्तराखण्ड में खंडूडी जेसे पदलोलुपु व कुशासन के प्रतीक नेता की नहीं अपितु लोकशाही को स्थापित करने की कुब्बत रखने वाले परमार जेसे नेतृत्व की जरूरत है। जो अपनी कुर्सी के लिए नहीं अपितु प्रदेश के हितों व विकास के लिए समर्पित हो।

Friday, January 20, 2012

उत्तराखण्ड से माफी मांगे टीम अण्णा

उत्तराखण्ड से माफी मांगे टीम अण्णा
अण्णा हजारे व उनकी टीम जवाब दें

आगामी विधनसभा चुनाव में टीम अण्णा उत्तराखण्ड के दौरे पर जाने से पहले उत्तराखण्ड की जनता से सार्वजनिक मापफी मांगे। क्यों वे खंडूडी सरकार द्वारा उत्तराखण्ड की जनता की आंखों में ध्ूल झोंकने के लिए बनाये गये
कमजोर लोकायुक्त का स्वागत कर रहे हैं? जबकि इस लोकायुक्त के जब तक  सभी सदस्य सहमति नहीं देंगे तब तक किसी विधयक, मंत्राी या मुख्यमंत्राी पर मामला हंी नहीं चलाया जा सकता। ंप्रस्तुत है विध्ेयक के पृष्ठ 21 पर चेप्टर 6 का वह हैरान करने वाला अंश-
INVESTIGATION AND PROSECUTION AGAINST HIGH
FUNCTIONARIES
Investigation  and  Prosecution  against high functionaries
18. No investigation or prosecution shall be initiated without obtaining
permission from the Bench of all the members with Chairperson against any of the following persons:-
(i) The Chief Minister and any other member of the Council of Ministers.
(ii) Any Member of Uttarakhand Legislative Assembly
http://uk.gov.in/files/Documents/ENGLISH_-_UTTARAKHAND_LOKAYUKTA_BILL__2011.pdf

रेल दुर्घटना बचाने वाले दीपक को को पुरस्कार सहित रेल में नौकरी भी दे सरकार

रेल दुर्घटना बचाने वाले दीपक को को पुरस्कार सहित रेल में नौकरी भी दे सरकार
15 जनवरी को प्रातः दिल्ली में कुड़ा बिनने वाले 10 वर्षीय बालक दीपक ने रेल की टूटी पटरी को देख कर अविलम्ब सम्बंधित अधिकारियों को इसकी इतला दे कर जिस अदभूत विवेक व साहस का परिचय दे कुछ देर बाद ही आने वाली पटना राजधानी  रेल के साथ होने वाली भीषण दुर्घटना को बचाने का महान कार्य किया है। भारतीय रेल व भारत सरकार को ऐसे बहादूर गरीब बच्चे को जहां बीरता का बाल पुरस्कार देने के साथ उसकी शिक्षा के साथ वयस्क होने पर रेलवे में पक्की नौकरी दे कर सम्मानित करना चाहिए। इससे न केवल उस गरीब बच्चे में भावी जीवन में समाज के हित में कार्य करने का जज्बा मजबूत होगा अपितु समाज में इस प्रकार का काम करने की भावना को लोगों में जागृत होगी।

Tuesday, January 17, 2012

-काम न धाम कैसे बने है राजनेता धन्नाशाह/

-काम  न धाम कैसे बने है राजनेता धन्नाशाह/
-नेता, समाजसेवी, संत सहित अधिकांश बने है मालामाल, आम जनता हो गयी है बेहाल
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भले ही चंद दशक पहले आजादी के संग्राम के दिनों भारत में राजनीति को वीर, चिंतक, संघर्षशील , देश व समाज के लिए अपना सर्वस्व निछावर करने वाले भारत माता के सच्चे सपूतों का का पावन कर्म क्षेत्र माना जाता था। परन्तु आज राजनीति व समाजसेवा का पेशा अकूत धन दौलत कमाने की आश से राजनीति में पदार्पण करने वालों का बर्चस्व हो गया है। देश से अंग्रेजो को खदेड़ने के लिए राष्ट्र व्यापी जनांदोलन छेडने वाले महात्मा गांधी ने राजनीति के क्षेत्र में कदम रख कर अपने तन के कपड़ों तक का त्याग कर दिया था। नेताजी सुभाष चंद बोस ने सिविल सेवा के उच्चाधिकारी का पद ही ठुकरा कर अपने आप को देश की सेवा के लिए अर्पित कर दिया। आजाद, भगतसिंह सहित लाखों महान सपूतों ने भारतीय आजादी को हासिल करने के लिए अपनी शहादत ही दे दी थी। परन्तु इनकी शहादत से हासिल आजादी के साढ़े छह दशक से कम समय में इस देश में राजनीति ही नहीं समाजसेवा, शिक्षा, चिकित्सा, धर्म व न्याय के पावन मठाधीशों का चाल, ढाल व चेहरा ही ऐसा बदल गया कि उनके पास इतना बैभव हो गया कि बड़े बडे उद्योगपति भी उनकी सम्पति के आगे बौने पड़ गये। 
आज कोई देश के अधिकांश राजनेताओं की घोषित सम्पति देखे तो उनकी आंखे फटी की फटी रह जाय। हालांकि घोषित सम्पति से 100 से हजार गुना अधिक इनकी सम्पति होने की कायश लगाया जाता है। सबसे हैरानी की बात यह है कि अधिकांश राजनेताओं के बारे में उनके क्षेत्र की आम जनता जानती है कि साधारण घरानों में जन्में इन राजनेताओं के प्रारम्भिक दिन सामान्य आम आदमी की तरह ही किसी प्रकार से संघर्षमय जीवन यापन का ही रहा। परन्तु राजसत्ता के चंद सालों बाद ही इनकी सम्पति में बिना किसी उद्यम के इसकी सम्पति करोड़ों ही नहीं अरबों में हो गयी। 
कानून का शिकंजा क्या करेगा, अपवाद के तौर पर एकाद को जनता की आंखों में धूल झोंकने के लिए भले ही कोई सजा मिली हो पर आज भी देश की जनता के आंखों के सामने पंजाब के मुख्यमंत्री बादल पर अमरिन्दर सिंह के द्वारा लगाये गये अकूत सम्पति के आरोप, भजन लाल व देवी लाल परिवार में एक दूसरे पर लगाये गये करोड़ों करोड़ सम्पति अर्जित करने के आरोप, मायावती व मुलायम सिंह पर लगे अकूत सम्पति अर्जित करने के आरोप, कर्नाटक के पूर्व मुख्यमंत्री व पूर्व मंत्री रेड्डी बंधुओं पर लगे अकूत सम्पति का अरोप, उत्तराखण्ड के पूर्व मुख्यमंत्री निशंक जो शिशु मंदिर के एक साधारण अध्यापक से आज करोड़ों की सम्पति के मालिक, करूणानिधी, राजा, मारन, जय ललिता, ठाकरे परिवार, ही नहीं राजनीति में पदार्पण करने वाले अधिकांश राजनेता चंद सालों में करोड़पति बन जाते है। भले ही वे कागचों में अपनी सम्पति हजारों या लाखों में दिखाये। दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला हो या कलमाड़ी  इन राजनेताओं की यह सूची कभी कम होने का नाम ही नहीं ले सकती। हाॅं इसमें चंद कामरेड़, ममता बनर्जी व रक्षा मंत्री ऐथोनी जैसे लोग अपवाद है। देश के विख्यात समाजवादी नेता जार्ज फर्नाडिस के पास तो करोड़ों की सम्पति अब उनके वारिसों के बीच विवाद का कारण भी बन गयी है।
5 राज्यों (उप्र-403, पंजाब,-117 उत्तराखण्ड-17, मणिपुर-60 व गोवा -40) में हो रहे चुनाव में 690 वर्तमान विधायकों में से 35 प्रतिषत यानी 239 विधायक करोड़पति है। सबसे अधिक करोड़पति विधायक पंजाब में है वहां 117 में से 78 विधायक यानी 67 प्रतिषत करोड़पति है। सबसे कम मणिपुर में विधायक करोड़पति है यहां 60 में से सबसे कम यानी 1 ही विधायक करोड़पति है। वहीं सबसे गरीब विधायकों में मणिपुर के थानगखोलन होकिप  जो राजद के चंदेल विधानसभा से विधायक है उनकी 0 सम्पति है। दूसरे नम्बर पर यानी 690 विधायकों में दूसरे नम्बर के सबसे गरीब विधायक नरेन्द्र नगर से उक्रांद के विधायक ओम गोपाल हैं जिनकी कुल सम्पति 20 हजार रूपये है। उत्तराखण्ड में 70 में से 11 विधायक यानी 16 प्रतिषत विधायक करोड़पति है। वहीं उत्तर प्रदेष में 32 प्रतिषत व गोवा में 55 प्रतिषत विधायक करोड़पति है। गोवा के निर्दलीय विधायक अनिल वासुदेव 71ए40ए84ए216 रूपये यानी 71 करोड़ की कुल सम्पति के साथ पांच राज्यों के  करोड़पति विधायकों में भी सर्वोच्च स्थान पर विराजमान है। दूसरे नम्बर पर पंजाब के अमरिन्दर सिंह  पटियाला विधानसभा के कांग्रेसी सदस्य करोड़पति हैं। इस सूची में 9 वें स्थान पर व उत्तराखण्ड की सबसे करोड़पति विधायक अमृता रावत हैं जो कांग्रेस पार्टी से वर्तमान में रामनगर विधानसभा से प्रत्याषी है। उत्तराखण्ड में उनके बाद सबसे अधिक सम्पति वाले विधायकों में दो बहुजन समाज पार्टी के विधायक हैं। बसपा के बाहदराबाद के विधायक षहजाद के पास 4.48 करोड़ व सितार गंज से बसपा के नारायण पाल के पास 3.84 करोड़ रूपये की सम्पति है।
प्रदेश की राजनीति में यकायक उभर कर कांग्रेसी मठाधीशों की कृपा से सहजपुर से कांग्रेसी प्रत्याशी बने कांग्रेसी दिग्गज व पूर्व मुख्यमंत्री तिवारी के ओएसड़ी रहे आर्येन्ö शर्मा भी चंद सालों में करोड़ों की सम्पति का मालिक होते देख कर प्रदेश के लोग हस्तप्रद हैं। ओएसडी से राजनेता के रूप से राजनैतिक सफर शुरू करने वाले आर्येद्र शर्मा के पास  नकदी 3,01,545 रुपये, पत्नी के पास 1,87,600 रुपये, बैंक डिपोजिट 77,49,369 रुपये, पत्नी के नाम 13,26,715 रुपये, आश्रितों के नाम 16,66,068 रुपये, डिवेंचर व शेयर निवेश 1,55,000 रुपये, पत्नी के नाम 7,35,065 रुपये, बीमा पालिसी व डाकघर बचत 10,84,757 रुपये, पत्नी के नाम 11,21,600, आश्रितों के नाम 50 हजार रुपये, वाहनों की कीमत एक लाख रुपये, ज्वैलरी पांच लाख रुपये, पत्नी के पास ज्वैलरी 6,10,000 रुपये, कृषि योग्य भूमि कीमत 22 लाख रुपये, बैंक कर्ज स्वयं के नाम 23,22,750 रुपये, पत्नी के नाम 6,50,000 रुपये।
अब तो यह हाल हो गया कि इस देश में संत-फकीरी  भी आज अरबपतियों को मात देने वाला बन गया है। देश में एक दो नहीं हजारों अरबपति बाबा हैं। जो त्याग, तपस्या, लोभ, मोह व सांसारिक पदार्थो की लालशा से दूर रह कर लोक परलोक सुधारने की बात करते हैं उनमें से हजारों बाबा ऐसे है जो बाबा रामदेव की तरह अरबों की सम्पति का आनन्द ले रहे है। हालत इतनी शर्मनाक हो गयी कि कई चपरासी से लेकर बाबू तक करोड़ों की सम्पति के स्वामी बने पाये गये। अधिकारियों की सम्पति का तो कोई थाह ही नहीं ।  फकीरी सा जीवन यापन करने वाले बाबाओं के पास अकूत सम्पति किसी राजनेता व उद्योगपति को भी मात करने वाली देखी जा रही है।

क्षत्रपों के बर्चस्व की जंग से परेशान है भाजपा व कांग्रेस/

 क्षत्रपों के बर्चस्व की जंग से परेशान है भाजपा व कांग्रेस/
-बागियों से अधिक भीतर घातियों से है खतरा/

रूद्रप्रयाग(प्याउ) । भले ही भाजपा व कांग्रेस के चुनावी अभियान के प्रमुख विधानसभा चुनाव 2012 में अपनी पार्टी की फतह की चुनावी सभा में ऐलान कर रहे हों परन्तु उनकी इस दंभ भरी हुंकार को अगर कोई पलीता लगा रहे हैं तो उनके ही दल के बागी प्रत्याशी जो विधानसभा चुनाव में टिकट न मिलने से चुनावी दंगल में उतरे हुए है।  परन्तु राजनैतिक दल इन बागियों से भी अधिक पार्टी के भीतरघातियों से सहमी हुई है। जहां भाजपा में निशंक बनाम खंडूडी-कोश्यारी में अंदर खाने चल रही  बर्चस्व की जंग से भाजपा के मठाधीश भी परेशान है। वहीं कांग्रेस में अगला मुख्यमंत्री बनने के लिए कांग्रेसी दिग्गजों हरीश रावत, सतपाल महाराज, विजय बहुगुणा व हरक सिंह में अंदर खाने चल रही शह और मात की जंग ने आला नेतृत्व भी सहमा हुआ है। दोनों दल पूरी ताकत से इन भीतरघातियों के दंश से उबरने का प्रयाश कर रही है परन्तु नाक की लड़ाई में प्रदेश व दलीय हितों को दाव पर लगाने में भी कोई कम कसर न छोड़ने वाले ये मठाधीश मानने का नाम नहीं ले रहे है। भले ही बाहर व मंचों में ये एक दिखे परन्तु अंदर अंदर जो कार्य एक दूसरे को मात देने का हो रहा है उससे दोनों पाटियां परेशान है। इसी कारण जहां खंडूडी, निशंक व अमृता रावत की सीटों पर कोई भी उलट फेर होने की आशंका से दल के नेता आशंकित हैं।
सबसे ज्यादा बागियों के बीच में कोई फंसे तो कांग्रेस के नेता प्रतिपक्ष डा हरक सिंह रावत, जो अपनी पंसदी विधानसभा सीट छोड़ कर दूसरे जनपद रूद्रप्रयाग में पहंुचे। वहां पर पहले से ही टिकट की आश लगा कर बेठे कांग्रेस के सबसे मजबूत महामंत्री बीरेन्द्र बिष्ट व भरत सिंह चैधरी ने उनको पूरी तरह से घेर लिया है। गौरतलब हे कि इस विधानसभा सीट से भाजपा के दिग्गज व स्वयं कांग्रेसी प्रत्याशी हरकसिंह रावत के साढ़ु भाई मातवर सिंह चुनावी मैदान में हैं। इस कारण पूरे प्रदेश में इस विधानसभा चुनाव पर सबकी नजर लगी हुई है। विद्रोहियों में भाजपा व कांग्रेस दोनों के प्रत्याशी है। अनुशासन के नाम से जाने जानी वाली भाजपा इस समय पूरी तरह से बेनकाब हो गयी। उसके सबसे साफ छवि के वरिष्ठ भाजपा नेता व पूर्व मंत्री केदारसिंह फोनिया ने पार्टी से नाता तोड़ कर बदरीनाथ से उत्तराखण्ड रक्षा मोर्चा के प्रत्याशी के रूप में चुनावी दंग में उतर कर भाजपा को सबक सिखाने के लिए कमर कस ली है। इसी विधानसभा सीट से कांग्रेसी टिकट के दावेदार रहे जिला पंचायत सदस्य नंदन सिंह बिष्ट ने भी अपने प्रबल विरोधी राजेन्द्र भण्डारी को यहां से कांग्रेसी प्रत्याशी बनाये जाने से आक्रोशित हो कर  निर्दलीय बन कर चुनाव मैदान में उतर गये है। कर्णप्रयाग से जहां भाजपा के पूर्व विधायक अनिल नौटियाल , कांग्रेस के सुरेन्द्र नेगी भी निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में उतरे है। वहीं टिहरी के प्रताप नगर से राजेश्वर पैनूली भी स्वतंत्र उम्मीदवार की तरह उतर कर भाजपा की नाक में दम किये हुए है। टिहरी के देवप्रयाग सीट के सबसे मजबूत दावेदार  रहे पूर्व मंत्री मंत्री प्रसाद नैथानी चुनावी दंगल में स्वतंत्र उम्मीदवार के तौर पर उतरे हुए है।
वहीं जनपद चमोली की थराली सीट पर भी भाजपा विधायक जीएल शाह निर्दलीय लड़ रहे हैं। यहीं से कांग्रेस के टिकट के दावेदार जिला पंचायत सदस्य महेश शंकर त्रिकोटी भी निर्दलीय चुनावी मैदान में हैं। पौड़ी जिले की यमकेश्वर सीट से पूर्व पराजित प्रत्याशी व पूर्व ब्लाक प्रमुख रेनु बिष्ट कांग्रेस से टिकट न मिलने के कारण रक्षा मोर्चा से लड़ रहीं हैं। वहीं हरिद्वार जनपद से कांग्रेस के बागी प्रत्याशी महेश शर्मा भी पार्टी की चिंता में इजाफा करने का कारण बन चूके है। उत्तरकाशी जिले में भाजपा के बागी सिटिंग विधायक राजकुमार पुरोला सीट से तथा कांग्रेस के बागी सुरेश चैहान गंगोत्री सीट से निर्दलीय चुनाव लड़ रहे हैं।
देहरादून की डोईवाला सीट पर कांग्रेसी टिकट का प्रबल दावेदार रहे एसपी सिंह निर्दलीय प्रत्यासी के रूप में मैदान में मजबूती से ताल ठोक रहे है। सहसपुर से जमीनी नेताओं को नजरांदाज कर यहां से प्रदेश में तिवारी कुशासन के प्रतीक रहे उनके ओ एसडी आर्येन्द्र शर्मा को टिकट देने से जहां अधिकांश कांग्रेसी ही नहीं यहां की जनता भी नाराज है ।
 ऋषिकेश सीट से टिकट के प्रबल दावेदार नगर पालिका अध्यक्ष निर्दलीय दीप शर्मा कांग्रेस के प्रत्याशी राजपाल सिंह खरोला को चुनौती दे रहे हैं। वहीं हरिद्वार में रानीपुर सीट पर पूर्व विधायक अंबरीष कुमार कांग्रेस टिकट न मिलने से उम्मीदवार हैं। किर्णप्रयाग सीट पर विधायक अनिल नौटियाल निर्दलीय मैदान में हैं। कांग्रेस के सुरेंद्र सिंह नेगी भी निर्दलीय लड़ रहे हैं।  इस सीट पर 2002 से भाजपा के उम्मीदवार के तौर पर चुनाव लड़ते रहे अनिल नौटियाल पहली बार निर्दलीय तौर पर चुनाव मैदान में हैं। टिहरी जिले की धनौल्टी, प्रतापनगर, नरेन्द्रनगर, देवप्रयाग सीट पर कांग्रेस और भाजपा के बागी प्रत्याशी चुनाव मैदान में हैं। दोनों दलों के दो-दो प्रत्याशी बागी होकर चुनाव मैदान में हैं। बाजपुर में कांग्रेसी विद्रोही राजकुमार निर्दलीय चुनाव मैदान में है।  किच्छा में कांग्रेस के टिकट के दावेदार रहे पूर्व चेयरमैन सुरेश अग्रवाल भी चुनाव मैदान में  हैं। वहीं सितारगंज सीट पर बसपा के बागी पूर्व चेयरमैन अनवर अहमद भी चुनाव मैदान में है। यही नहीं धनोल्टी से कांग्रेसी विद्रोही जोतसिंह बिष्ट चुनाव मैदान में ताल ठोक रहे हैं। वहीं कालाढ़ुगी से कांग्रेस के दिग्गज नेता महेश शर्मा भी चुनाव मेदान में निर्दलीय उतर कर कांग्रेसी प्रत्याशियों की नाक में नकेल डाले हुए है।

कोटद्वार में चुनावी भंवर में फंसे खंडूडी!

कोटद्वार में चुनावी भंवर में फंसे खंडूडी!/
खंडूडी को उबारने के लिए राजनाथ ने चलाया फिर मुख्यमंत्री बनाने का तुर्रा व खंडूडी  है जरूरी का दाव/

भारतीय जनता पार्टी ने चुनाव से पहले ही मुख्यमंत्री के लिए खंडूडी के नाम का ऐलान करके खुद ही अपना अलोकत्रांत्रिक चेहरा बेनकाब कर दिया है। पार्टी के अब तक के विज्ञापनों में भी जो प्रमुखता से प्रदेश के समाचार पत्रों में प्रकाशित किया जा रहा है कि खण्डूडी जरूरी है। इसी के साथ प्रदेश के प्रभारी व पूर्व भाजपा अध्यक्ष राजनाथ सिंह भी ऐलान कर चूके हैं कि यदि भाजपा सत्ता में आती है तो मुख्यमंत्री खंडूडी ही होगें। भाजपा की उक्त घोषणा लोकशाही का अपमान के साथ हमारे संविधान का भी अपमान है जिसमें साफ कहा गया कि मुख्यमंत्री चुनाव के बाद पर्याप्त बहुमत हासिल करने वाले दल के विधायक निर्वाचित होने के बाद करेंगे। कुछ साल पहले तक भाजपा, पूर्व में कांग्रेस द्वारा किये जाने वाले इस प्रकार के कार्य को अलोकतांत्रिक बताती थी। वहीं जमीनी हकीकत यह है कि कोटद्वार विधानसभा सीट से जहां से खंडूडी विधायकी का चुनाव लड़ रहे है। वहां पर उनको कांग्रेस के दिग्गज प्रत्याशी पूर्व मंत्री सुरेन्द्रसिंह नेगी से मुकाबले में इस सर्दी में भी पसीना छूट रहा है। चुनाव में अपने विरोधी को 21 पाते हुए खंडूडी ने जहां कांग्रेस के कुछ असंतुष्टों को अपने पाले में लाने की कोशिश की परन्तु कड़ा मुकाबला देख कर भाजपा नेतृत्व भी परेशान है। इसी कारण  लगातार भाजपा खंडूडी पर फोकस करने वाले विज्ञापन निकाल कर किसी तरह से अपनी लाज बचाने का प्रयास कर रही है। कोटद्वार में खंडूडी की डगर कठिन देख कर ही खंडूडी को उबारने के लिए रणनीति के तहत राजनाथ सिंह को भी खंडूडी को अगर भाजपा फिर से प्रदेश में सत्तासीन होती है तो मुख्यमंत्री बनाया जायेगा की घोषणा करनी पड़ी। इंटरनेट पर गढ़वाल कुमाऊ  पीपल फ्रंट ने भी भाजपा के ‘खंडूडी है जरूरी......वाले विज्ञापन पर गहरा कटाक्ष करते हुए टिप्पणी की कि खंडूडी के साथ प्रदेश को निशंग-सारंगी -उमेश फ्री....’।  परन्तु मात्र अखबारी बयानबाजी से जमीनी हकीकत नहीं बदली जा सकती। प्रदेश की जनता को मालुम है कि ईमानदारी का मुखोटा पहने वाली भाजपा सरकार में खंडूडी -निशंक-उमेश-सारंगी की जुगलबंदी से प्रदेश में कितना सुशासन व भ्रष्टाचार मिटा। वेसे भी खंडूडी की लोकप्रियता का आलम यह है कि उनके मुख्यमंत्री रहते हुए प्रदेश की पांचों लोकसभाई सीट पर से भाजपा का पूरी तरह सफाया हो गया। वे कितने लोकप्रिय है कि उनको अपने विधायकी सीट धूमाकोट जो अब लैन्सीडान के नाम से जानी जा रही है वहां से चुनाव मैदान में उतरने का कांग्रेसी नेता हरक सिंह की तरह ही साहस न जुटा कर भाग खडे हुये। भाजपा व कांग्रेस के दिग्गज नेताओं द्वारा लैन्सीडान सीट से भाग खडे होने पर यहां से भाजपा व कांग्रेस का सुपड़ा साफ करने के लिए मैदान में उतरे उत्तराखण्ड रक्षा मोर्चा के प्रमुख ले. जनरल तेजपाल सिंह रावत ने इन दोनों को भगोड़ा कह कर बेनकाब किया। आज दूसरे चुनाव क्षेत्रों में उतरे ये दिग्गज अपने पार्टी के नेताओं की राजनैतिक जीवन को हाशिये में डालने के लिए उनकी विधानसभा से चुनाव मैदान में उतरे है। इसी कारण खंडूडी के कोटद्वार से चुनावी दंगल से उतरने से यहां से भाजपा के विधायक रहे एस एस रावत भी खंडूडी से खपा हैं।
वहीं हरक सिंह द्वारा रूद्र प्रयाग जाने से रूद्र प्रयाग के कांग्रेसी उनके खिलाफ चुनावी दंगल में ही उतर गये है। इस प्रकार खंडूडी को कोटद्वार में अपने प्रतिद्वंदी से कमजोर देख कर भाजपा ने उनकी माली हालत में सुधारने के लिए उनको फिर से मुख्यमंत्री बनाने व खंडूडी जरूरी का टोटका चला। देखना है खंडूडी क्या बिना उन्नसी बीस करके  यहां पर चुनाव जीत पाते या नहीं। हालांकि कोटद्वार से जो खबरे छन कर आ रही है कि खंडूडी का मुख्यमंत्री तो बनेगे बाद में जब पहले वे कोटद्वार से विजयी तो हों।

Sunday, January 15, 2012

लूटरे बन गये है हुक्मरान

लूटरे बन गये है हुक्मरान
लोक तंत्र में लूटरे बन गये है हुक्मरान
जनता का हक मार कर बने हुए महान।
जनता का कर दिया जीना इन्होंने हराम
नेता व नौकरषाह के भेश में घुसे है षैतान।
धर्म व समाजसेवा के यही बने है भगवान
आम आदमी कैसे जीये, मंहगाई से परेषान।
नेता केवल चुनाव के समय दिखे इंसान
चुनाव जीतकर देष का रखे न कभी ध्यान।
कुर्सी व अपनी तिजोरी ही होती इनकी प्राण
लोकषाही आज बन गयी लूटेरों की जान।
-देवसिंह रावत
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Friday, January 13, 2012

उत्तराखण्ड सरकार के भ्रश्टाचार पर मूक रहने वाले बाबा रामदेव माफी मांगे

उत्तराखण्ड सरकार के भ्रश्टाचार पर मूक रहने वाले बाबा रामदेव माफी मांगे/
चुनावी राज्यों में अभियान यात्रा निकालने से पहले उत्तराखण्ड की जनता से /

बाबा रामदेव भी 5 राज्यों में हो रहे विधानसभा चुनाव में  इन राज्यों में भी अपना कालाधन पर चल रहे अभियान करेंगे। मेरा साफ मानना है कि कालाधन भ्रश्टाचार के कारण ही होता है और बाबा रामदेव जब अपने प्रदेष जहां उनका मुख्यालय है उस प्रदेष में भाजपा सरकार के कार्यकाल में हुए भ्रश्टाचार के मामले में षर्मनाक मूक रखे रहे, तो उनको कालाधन पर कम से कम उत्तराखण्ड की जनता के सम्मुख कालाधन पर बात करने का नैतिक अधिकार खो दिया है। जब बाबा उत्तराखण्ड सरकार के उस मंत्री जिसपर उन्होंने 1 करोड़ रूपये घूस मांगने की नापाक कोषिष की उसका नाम ही उजागर करने का साहस  तक नहीं जुटा पा रहे हैं तो उनको इस मांमले में बोलने का कोई हक नहीं है।  बाबा रामदेव ने देष व भारतीय संस्कृति के लिए प्रारम्भ में बहुत काम किया। परन्तु जनांदोलन चलाते समय अनुभवहीनता, सम्पति से अंध मोह, निश्पक्षता व नैतिक साहस न होने के कारण वे जहां रामलीला मैदान में असफल रहे, और अब तक भी। कांग्रेस हो या भाजपा सहित राजनैतिक दल ये सब पदलोलुपु व देष की सत्ता की बंदरबांट व देष को पतन के गर्त में धकेलने के अपराधी हैं परन्तु बाबा रामदेव का अपने घर के भ्रश्टाचार पर मूक रहना उनकी नैतिकता पर ही प्रष्नचिन्ह लगाता है। इस कारण देवभूमि उत्तराखण्ड में ही नहीं इस मुद्दे पर बोलने का नैतिक हक खो चूके है। उनको ही नहीं टीम अण्णा को भी उत्तराखण्ड की जनता सहित देष की तमाम उस जनता से माफी मांगनी चाहिए कि वे जनविष्वास पर खरे न उतर पर उत्तराखण्ड की भ्रश्ट सरकार के कुषासन पर मूक रहे। बाबा रामदेव को साफ समझलेना चाहिए कि भ्रश्टाचार ही कालाधन के प्राण है।

Thursday, January 12, 2012

भाजपा व कांग्रेस या 1857 तक ही सीमित न समझें विष्व की सबसे श्रेश्ट संस्कृति के ध्वज वाहक भारत को

भाजपा व कांग्रेस या 1857 तक ही सीमित न समझें विष्व की सबसे श्रेश्ट संस्कृति के ध्वज वाहक भारत को /
सबसे बड़ी देष भक्ति या धर्म
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 किसी को इस बात का भ्रम न रहे कि भारतीय संस्कृति या देष किसी कांग्रेस, भाजपा, संघ या किसी अन्य दल विषेश की  बदोलत जीवंत है। ना हीं भारत 1857 या  गांधी जी  आदि के नेतृत्व में अंग्रेजो के खिलाफ लड़े गये संघर्श ही सबकुछ है। भारतीय संस्कृति विष्व की सबसे प्राचीन जीवंत संस्कृतियों प्रमुख है जिसने विष्व को अब तक के सर्वश्रेश्ठ जीवंत मूल्य प्रदान किये। भारतीय संस्कृति तब भी विलक्षण थी जब यूरोप, अरब, अमेरिका जैसे देषो में रहने वाले लोग यायावारी व अज्ञानता के अंधेरों में भटके हुए थे।  ईसायत् या मुसलिम आदि धर्माे के उदय से कई सदियों पहले भारत उस मुकाम पर पंहुच चूका था जिस मुकाम पर ये लोग आज भी नहीं पंहुच पाये। ज्ञान का विलक्षण अथाह सागर रही भारतीय संस्कृति। इसलिए भारतीय श्रेश्ठ जन, सत्तालोलुपु  सत्तांधों व दलीय जंजाल में जकड़ने के बजाय भारतीय संस्कृति के सनातन मूल्यों यानी केवल सत् के लिए जीवन समर्पित करने की सीख देती है,। भारतीय संस्कृति जो कभी अन्याय को न सहने, सर्वभूतहितेरता, जड़चेतन में परमात्मा, दया, संस्कारवान मूल्यों की सीख देती है। कांग्रेस, भाजपा या मुगलों या फिरंगियों का उदय तो भारतीय संस्कृति के विराट जीवन का एक छोटा का काल खण्ड है। इसलिए आम भारतीयों को लोकषाही के नाम पर देष को अपनी संकीर्ण सत्तालोलुपता की गर्त में धकेलने वाले व भारतीय सस्कृति को कलंकित करने वाले इन दलों का अंध भक्त बनने के बजाय इनको सही दिषा में चलने के लिए जनअंकुष लगा पर यानी मताकुंष से इनको देषहित में कार्य करे। लोकषाही भारतीय संस्कृति की अनुपम धरोहर है जो जड़ चेतन को समान महत्व ही नहीं स्व स्वरूप समझती है। इसमें जनप्रतिनिधियों को अपना आका या मालिक न समझें इनको जनता का सेवक ही समझें, अगर ये दिषाहिन होते हैं तो इनको अविलम्ब मताकंुष से सत्ताच्युत करके देष की रक्षा करें। क्योंकि भारतीय संस्कृति ही आज पूरे विष्व को इस दिषाविहिन भौतिक जगत को परम षांति, ज्ञान व समृद्व व्यवस्था दे सकती है। इसलिए पूरे विष्व को सही दिषा देने के अपने गुरूत्तम दायित्व का निर्वाह की सभी प्रबुद्व भारतीयों से आषा करता हॅू। यही हमारा सबसे बड़ा धर्म व सबसे बड़ी देषभक्ति है।

भारतीय संस्कृति का परम मर्म

भारतीय संस्कृति का परम मर्म
भारतीय संस्कृति संस्कारवान बनाती है, जिस व्यक्ति को सत् व असत् को परखने की बुद्वि, अन्याय का विरोध करने का साहस न हो,  अपने से बड़े लोगों से बात करने की तहजीब न हो उनको भारतीय कहलाने का कोई हक नहीं। रही बात हमारी संस्कृति में जो भी द्वंद हुए चाहे वह महाभारत का हो या रावण राम संग्राम हो दोनों में स्व व पर के आधार पर नहीं अपितु धर्म व अधर्म के आधार पर लड़ा गया। हमारी संस्कृति में न्यायार्थ निज बंधु को भी दण्ड देना धर्म है व अयम् निज परोवेती .......’ का अमर संदेष को आत्मसात करने की सीख दी जाती है। यही नहीं प्रकृति भी स्व व पर पर नहीं अपितु गुण दोश के आधार पर ग्रहण करने की इजाजत देती है।  मरी हुई लांष लोग अपने प्रिय परिजन की भी हो उसका अंतिम संस्कार कर देते है और मल अपने उदर में भी हो उसका विसर्जन किया जाना चाहिए। जो इस गुढ़ रहस्य को आत्मसात न करके जाति, धर्म, क्षेत्र, भाशा, लिंग या नस्ल के नाम कर किसी का विरोध, षोशण, समर्थन व न्याय करता है वह न केवल भारतीय संस्कृति अपितु परमात्मा का भी गुनाहगार होता है। उसको प्रकृति अपने ढ़ग से दण्ड देती है। www.rawatdevsingh.blogspot.com

सोनिया को विदेषी कहने वाले भारतीय संस्कृति के दुष्मन हैं


सोनिया को विदेषी कहने वाले भारतीय संस्कृति के दुष्मन हैं
कब तक यों ही लकीर पिटते रहोगे, अंधेरी रात के,
सुबह कब की हो गयी हैं जरा आंखे तो खोल
मुझे समझ में नहीं आ रहा है कि भारतीय राजनेताओं ने सोनिया, गांधी, नेहरू परिवार के बारे में ऐसा हौव्वा खड़ा किया हुआ है कि मानों ये गांधी नेहरू परिवार सतयुग, द्वापर त्रेता व कलयुग सहित अनादिकाल से चला आ रहा है। इनके अनुसार देष में हर समस्या की जड़ गांधी नेहरू परिवार है।  देष में विदेषी आक्रांताओं (मुगल व फिरंगियों आदि) से पहले भी इस देष में समस्यायें ही समस्यायें थी, सेकड़ों सत्तांध राजाओं व पथभ्रश्ट धर्माचार्यो के कारण भारत का आम जनमानस त्रस्त था। जातिवाद, क्षेत्रवाद, लिंग, रंग व सामंती संकीर्णताओं में जड़के समाज में जड़ता सदियों से भारतीय समाज की विष्व को आलौकित करने वाली कालजयी संस्कृति को कलंकित व कमजोर करने का काम कर रही है।  भारतीय संस्कृति का मूल उदघोश स्व व पर से उपर उठ कर सत व असत के संघर्श की इजाजत देती है परन्तु दुर्भाग्य की बात है कि भारतीय संस्कृति के स्वयंभू ध्वजवाहकों ने जो अपमान सोनिया गांधी का विदेषी विदेषी कह कर किया, वह भारतीय संस्कृति को षर्मसार करने का ही कृत्य रहा। इस कृत्य का दण्ड प्रकृति ने इन गुनाहगारों को अपने ही ढ़ग से दिया। व निदंतर देती रहेगी। भले ही सोनिया गांधी ने कभी किसी को इस अपमान करने के कारण उफ तक न की हो पर भगवान दुनिया में किसी भी को इस प्रकार से सताने, अपमानित व षोशण करने वालों को दण्ड देता है। सोनिया गांधी, देष के प्रधानमंत्री रहे स्व. राजीव गांधी की धर्मपत्नी है। आम घरों में भी षादी के बाद जिस दिन से बहु अपने ससुराल में कदम रखती है, उसके बाद ससुराल ही उसका अपना होता है। हमारा कानून भी बहु को प्रताड़ित करने वालों को अपराधी मानता है। दुर्भाग्य से राजीव गांधी की  आतंकियों ने आत्मघाती हमले में निर्मम हत्या की। हमारे तमाम धर्म  षास़्त्र  भी विधवा को संरक्षण देने की सीख देते है। मुझे आषा है कि वे लोग जो अपनी असफलताओं, अक्षमता, अज्ञानता व नकारेपन को छुपाने के लिए सोनिया को विदेषी कह कर देष की जनता को गलत दिषा दे रहे हैं, क्या वे अपने घर परिवार में अपनी माॅं या बहुओं को इसी प्रकार से उनके मायके के नाम पर उनको घर से बाहर का सदस्य बता कर अपमानित करते है? क्या ग्राम सभा के चुनाव में किसी बहु को इस बात के लिए विरोध किया जाता हे कि उसका जन्म स्थान उस गांव में नहीं है? कौन किस जाति, धर्म, रंग, लिंग, क्षेत्र में जन्म लेता है यह उसके अधिकार क्षेत्र में नहीं है। यह सब परमात्मा के विधान के अनुसार होता है? इस आधार पर विरोध करना परमात्मा की प्रभुता पर रौंदने या उसको अपमानित करना ही है। ऐसे लोग मानवता, देष, समाज, गांव व घर के लिए आत्मघाती ही साबित होते हैं। सोनिया गांधी हो या कोई भी व्यक्ति हो उसका समर्थन या विरोध केवल उसके अच्छे या बुरे कार्यो के आधार पर किया जाना चाहिए। सोनिया गांधी का विरोध देष में बढ़ती हुई मंहगाई, भ्रश्टाचार, आतंकबाद सहित मनमोहन सिंह के नकारे कुषासन के लिए किया जा सकता है परन्तु उनका मायका इटली में है इस कारण उनको बार बार विदेषी -विदेषी कह कर अपमानित करने वाले भारतीय संस्कृति को रौंदने वाले ही माना जा सकता है।  जब सम्म्मान व विरोध  कार्यो के आधार पर न हो कर स्व व पर या देषी विदेषी के नाम पर या जाति-धर्म,क्षेत्र, भाशा, लिंग आदि के नाम पर किया जाने लगे तो वह अधर्म है।

Wednesday, January 11, 2012

भाजपा में दागदारों को सम्मन व ईमानदार वरिष्ठ नेता फोनिया की उपेखा

भाजपा में दागदारों को सम्मन व ईमानदार वरिष्ठ नेता फोनिया की उपेखा
देहरादून (प्याउ)। रामराज्य व सुषासन का ढपोर षंख बजाने वाली भाजपा का मुखोटा उस समय उत्तराखण्ड में पूरी तरह से बेनकाब हो गया, जब भाजपा ने अपनी षेश 22 विधानसभाई क्षेत्रों की अंतिम सूची को जारी की। एक तरफ वह उप्र में बसपा से निश्कासित भ्रश्टाचार में फंसे नेता कुषवाह को पार्टी में सम्मलित करने का कृत्य करती है वही दूसरी तरफ पार्टी देवभूमि उत्तराखण्ड में बदरीनाथ विधानसभा क्षेत्र के वर्तमान विधायक व प्रदेष के सबसे साफ छवि व वरिश्ठ अनुभवी नेता केदारसिंह फोनिया की टिकट काट ने का काम किया। देष में जनजाति नेताओं में सबसे अनुभवी व साफ छवि के वरिश्ठ नेताओं में अग्रणी केदारसिंह फोनिया को पर्यटन का मर्मज्ञ भी माना जाता है। परन्तु उनकी बेदाग व साफ छवि के कारण भाजपा के इस सरकार के मुख्यमंत्री खंडूडी व निषंक दोनों ने अपनी सरकार में उनको मंत्री पद उनकी साफ छवि व कुषल प्रषासन से अपने आप को बोना महसूस करने के कारण उत्तराखण्ड राज्य को  मजबूत साकारात्मक दिषा देने में सहायक हो सकने वाली उनकी प्रतिभा से प्रदेष को वंचित रखा गया। इस प्रकरण से साफ हो गया कि भाजपा में भ्रश्टाचार व कुषासन के लिए कुख्यात लोगों का तो पार्टी में स्वागत ही नहीं होता अपितु इसमें महत्वपूर्ण पदों पर भी आसीन किया जाता है और साफ छवि के वरिश्ठ अनुभवी केदारसिंह फोनिया, मोहनसिंह ग्रामवासी जैसे नेताओ की षासन प्रषासन में षर्मनाक उपेक्षा की जाती है।  गौरतलब हे कि भाजपा ने दो दिन पहले घोशित अपने 48 प्रत्याषियों की सूची में कई विधायकों व मंत्रियों की टिकट काटी थी उसके बाद जिस प्रकार से टिकट से वंचित किये गये कोटद्वार के विधायक षैलेन्द्र रावत के समर्थकों ने प्रचण्ड प्रदर्षन किया, उसके बाद केदारनाथ की विधायक आषा नोटियाल व प्रताप नगर के विधायक  विजय सिंह पंवार के टिकट काटने की हिम्मत भाजपा नहीं कर पायी। हालांकि इसकी चर्चा दो दिन से लगातार थी कि आषा नौटियाल व विजय सिंह पंवार की टिकट कट जायेगी। इसके बाद दोनों के समर्थकों ने निरंतर जो दवाब बनाया, वह दवाब षैलेन्द्र समर्थकों के हंगामें के बाद काम कर गया और दोनों की टिकट बच गयी। केवल टिकट दूसरी लिस्ट में काटी गयी तो प्रदेष के सबसे अनुभवी व पाक छवि के नेता केदारसिंह फोनिया की जहां टिकट काटी गयी, वहीं प्रदेष के वरिश्ठ संघ समर्पित नेता मोहनसिंह ग्रामवासी को टिकट से वंचित ही रखा गया। इसी तर्ज में हल्द्वानी से नवागंतु रेणु अधिकारी को हल्द्वानी से पार्टी का प्रत्याषी बनाया गया। वहीं उक्रांद के दो वर्तमान विधायकों दिवाकर भट्ट व ओम गोपाल रावत को भाजपा के चुनाव चिन्ह पर चुनावी समर में गठबंधन करके उतारने का भी निर्णय लिया गया।

मायावती के पास सबसे अधिक सम्पति व दूसरे नम्बर का सबसे गरीब विधायक ओम गोपाल रावत



मायावती के पास सबसे अधिक सम्पति  व दूसरे नम्बर का सबसे गरीब विधायक ओम गोपाल रावत
नई दिल्ली (प्याउ) । एडआर और नेषनल इलेक्षन वाच ने पांच राज्यों में हो रहे विधानसभा चुनाव में 690 विधायकों की (2007 से 2012)जो रिपोर्ट पेष की उसके तहत मायावती सबसे अधिक सम्पति वाली और ओम गोपाल रावत दूसरे नम्बर के सबसे गरीब विधायक है। इस सप्ताह जारी की गयी रिर्पोट के अनुसार 5 राज्यों (उप्र-403, पंजाब,-117 उत्तराखण्ड-17, मणिपुर-60 व गोवा -40) में हो रहे चुनाव में 690 वर्तमान विधायकों में से 35 प्रतिषत यानी 239 विधायक करोड़पति है। सबसे अधिक करोड़पति विधायक पंजाब में है वहां 117 में से 78 विधायक यानी 67 प्रतिषत करोड़पति है। सबसे कम मणिपुर में विधायक करोड़पति है यहां 60 में से सबसे कम यानी 1 ही विधायक करोड़पति है। वहीं सबसे गरीब विधायकों में मणिपुर के थानगखोलन होकिप  जो राजद के चंदेल विधानसभा से विधायक है उनकी 0 सम्पति है। दूसरे नम्बर पर यानी 690 विधायकों में दूसरे नम्बर के सबसे गरीब विधायक नरेन्द्र नगर से उक्रांद के विधायक ओम गोपाल हैं जिनकी कुल सम्पति 20 हजार रूपये है। उत्तराखण्ड में 70 में से 11 विधायक यानी 16 प्रतिषत विधायक करोड़पति है। वहीं उत्तर प्रदेष में 32 प्रतिषत व गोवा में 55 प्रतिषत विधायक करोड़पति है। गोवा के निर्दलीय विधायक अनिल वासुदेव 71ए40ए84ए216 रूपये यानी 71 करोड़ की कुल सम्पति के साथ पांच राज्यों के  करोड़पति विधायकों में भी सर्वोच्च स्थान पर विराजमान है। दूसरे नम्बर पर पंजाब के अमरिन्दर सिंह  पटियाला विधानसभा के कांग्रेसी सदस्य करोड़पति हैं। इस सूची में 9 वें स्थान पर व उत्तराखण्ड की सबसे करोड़पति विधायक अमृता रावत हैं जो कांग्रेस पार्टी से वर्तमान में रामनगर विधानसभा से प्रत्याषी है। उत्तराखण्ड में उनके बाद सबसे अधिक सम्पति वाले विधायकों में दो बहुजन समाज पार्टी के विधायक हैं। बसपा के बाहदराबाद के विधायक षहजाद के पास 4.48 करोड़ व सितार गंज से बसपा के नारायण पाल के पास 3.84 करोड़ रूपये की सम्पति है। मुख्यमंत्रियों में इन पांच राज्यों में मायावती सबसे अधिक 87 करोड़ रूपये ;87ए27ए42ए000द्धकी सम्पति है। वहीं पंजाब के मुख्यमंत्री के पास 9 करोड़ रूपये व उत्तराखण्ड के मुख्यमंत्री भुवनचंद खण्डूडी के पास 1.69 करोड़ रूपये (1ए69ए72ए130द्धकी सम्पति है। सबसे कम सप्पति 6 लाख रूपया मणिपुर के मुख्यमंत्री ओकराम सिंह के पास है।

Tuesday, January 10, 2012

उत्तराखण्ड विरोधी भाजपा व कांग्रेस को दुत्कारने वाले महान सपूत जनरल रावत को सलाम

-उत्तराखण्ड विरोधी भाजपा व कांग्रेस को दुत्कारने वाले महान सपूत जनरल रावत को सलाम/
-उत्तराखण्ड के हक हकूकों की रक्षा के लिए मोर्चा का सहयोग करने के बजाय टांग न खिंच कर भाजपा व कांग्रेस को मजबूत न करे उत्तराखण्डी/

 उत्तराखण्ड राज्य में दागदार छवि के लोगों को प्रदेष के संवेधानिक पदों पर आसीन करने व प्रदेष को भ्रश्टाचार के कुषासन से देवभूमि को पतन के गर्त में धकेलने की भाजपा व कांग्रेस के आला नेतृत्व की सत्तामद में चूर अहंकार के खिलाफ खुला विद्रोह करने करके उत्तराख्,ाण्ड के सम्मान की रक्षा करने का सहास तक जब पद लोलुपु खण्डूडी, हरीष रावत सतपाल महाराज, विजय बहुगुणा सहित तमाम वरिश्ठ नेता नहीं कर पाये तब तब कांग्रेस व भाजपा नेतृत्व की तमाम प्रलोभनों को ठुकरा कर भी उत्तराखण्ड के सम्मान की लाज किसी एक राजनेता ने रखी तो वह  उत्तराखण्ड रक्षा मोर्चा के अध्यक्ष ले. जनरल  तेजपाल सिंह रावत ने की।  जनरल रावत इस समय उत्तराखण्ड के सम्मान व हक हकूकों को रौंदने वाली भाजपा व कांग्रेस के दंष से जब उत्तराखण्ड की जनता त्राही त्राही करके नेतृत्व विहिन हो गयी थी ऐसे समय उत्तराखण्ड के महान चिंतक व गायक नरेन्द्र सिंह नेगी, पूर्व प्रषासनिक अधिकारी सुरेन्द्रसिंह पांगती, मेजर जनरल षैलेन्द्र राज बहुगुणा सहित तमाम उत्तराखण्ड के प्रबुद्व समर्पित लोगों की रसपरस्ती में उत्तराखण्ड के लिए एक मजबूत, समर्पित व जनांकांक्षाओं को साकार करने वाला राजनैतिक विकल्प का गठन ‘उत्तराखण्ड रक्षा मोर्चा के रूप में करके इसका नेतृत्व पूर्व सांसद व उत्तराखण्ड हितों के लिए भाजपा व कांग्रेस नेतृत्व को धिक्कारने का साहस करने वाले जांबाज ले. जनरल तेजपाल सिंह रावत को सोंपते हुए वर्तमान विधानसभा चुनाव में उत्तराखण्ड की जनता को एक नया मजबूत राजनेतिक विकल्प दे दिया है। उत्तराखण्ड रक्षा मोर्चा के गठन की सुगबुहाट से भाजपा नेतृत्व ने भ्रश्टाचार व कुषासन के प्रतीक अपने मुख्यमंत्री पद पर आसीन निषंक को हटा कर उन खंडूडी जी को ईमानदारी का तकमा देकर फिर प्रदेष की सत्ता में आसीन किया, जिन्होंने अपनी संकीर्ण जातिवादी-क्षेत्रवादी, व उत्तराखण्ड जनहितों के प्रति उदासीन सोच का परिचय दे कर प्रदेष में सबसे ईमानदार व वरिश्ठ अनुभवी केदार सिंह फोनिया या भगतसिंह कोष्यारी  के बजाय निषंक जैसे व्यक्ति को मुख्यमंत्री बना कर प्रदेष की जनता को भौंचंक्का कर दिया था। श्री खंडूडी ने अपने कार्यकाल में तिवारी के पद चिन्हों पर चल कर न तो प्रदेष में जनसंख्या पर आधारित परिसीमन का विरोध किया, नहीं उन्होंने मुजफरनगर काण्ड के अभियुक्तों को दण्डित कराने के लिए मजबूती से पहल की। यही नहीं उनके मुख्यमंत्रीत्व में इस काण्ड के खलनायकों को उत्तराखण्ड में लाल कालीनें बिछाने का षर्मनाक काण्ड भी किया गया। प्रदेष की स्थाई राजधानी गैरसैंण बनाने की जनांकांक्षाओं को अपने पूर्ववर्ती कांग्रेस सरकार के पदचिन्हों पर चलने का ही षर्मनाक कृत्य भी खंडूडी करते रहे। अपने वर्तमान कार्यकाल में खंडूडी ने जो लोकायुक्त का आधा अधूरा कानून बना कर जो जनता के विष्वास को छला उसके लिए उत्तराखण्ड उनको कभी माफ नहीं कर सकता है। दो बार जनरल रावत की मेहरवानी से राजनैतिक जीवनदान पाने वाले खंडूडी ने कभी भी उत्तराखण्ड हक हकूकों के लिए एक कदम चलने का भी काम नहीं किया जिसके लिए पृथक राज्य का गठन किया गया था।
ऐसे समय में जब जनरल तेजपाल सिंह रावत के नेतृत्व में उत्तराखण्ड रक्षा मोर्चा प्रदेष में भाजपा व कांग्रेस की चुंगल से उत्तराखण्ड के वर्तमान व भविश्य को बचाने की खुली निर्णायक जंग लड़ रहे हैं ऐसे समय में हरेक स्वाभिमानी उत्तराखण्डी का फर्ज बनता है कि वे अपने समाज व प्रदेष के हितों की रक्षा में ऐसे मोर्चे का साथ दें। उत्तराखण्ड का दुर्भाग्य है कि यहां पर षराब का प्रचलन देष के अन्य भागों की तरह हो रहा है, चुनाव में तो इसका अंधा प्रचलन होता हे। ऐसे में अपने कोटे की षराब के साथ मोर्चे का एक प्रत्याषी ब्रिगेडियर पटवाल के पकड़े जाने पर आसमान सर पर उठाने वाले क्या भाजपा व कांग्रेस की राह मजबूत नहीं कर रहे है। षराब पूरे उत्तराखण्ड क्या देष में नहीं बिकनी चाहिए। न हीं सरकार को इसका उत्पादन देष में होने देना चाहिए। पूरा देष इससे तबाह है। परन्तु चुनाव में षराब का प्रचलन पूरे देष में अंधा होता है। कोई भी दल व कोई भी प्रत्याषी इसके बिना एक चुनाव भी नहीं जीत सकता। सभी इसका प्रयोग करते। जो नहीं होना था। परन्तु मुझे आष्चर्य होता है कि जब मै देख रहा हॅू कि इस हल्के से मुद्दे को इतनी हवा देने का काम कुछ वो लोग कर रहे हैं जो कांग्रेस व भाजपा द्वारा उत्तराखण्ड के हक हकूकों पर रौदने पर मूक बने हुए है। वे खंडूडी जी से निषंक को मुख्यमंत्री बनाने, परिसीमन थोपने, गैरसैंण राजधानी न बनाने, प्रदेष के प्रबुध व वरिश्ठ लोगों की उपेक्षा कर बाहर के लोगों को उत्तराखण्ड की छाती में मूंग दलने के कृत्यों पर क्यों षर्मनाक मूक रखे हुए है। वे खंण्डूडी या अन्य नेताओं से यह क्यों नहीं पुछते कि क्यों वे उत्तराखण्डी हितों पर षर्मनाक मूक रखे हुए है।
आज हर उत्तराखण्डी का यह दायित्व है कि वे प्रदेष में भाजपा व कांग्रेस के षिकंजे से उत्तराखण्ड को मुक्त करने की दिषा में महत्वपूर्ण कार्य करने वाले  जनरल तेजपाल सिंह रावत के नेतृत्व वाले उत्तराखण्ड रक्षा मोर्चा को मजबूती प्रदान करे। उनकी छोटी गलतियों को सुधार होना चाहिए परन्तु इस समय सबसे जरूरी है भाजपा कांग्रेस से उत्तराखण्ड की रक्षा करने वाले महानायकों का मजबूती से साथ देने की न की उनकी टांग उस गलती के लिए खिंचने की जिसे अन्य सभी कर रहे है। उत्तराखण्ड में भले बहुगुणा, तिवारी, कोष्यारी, हरीष रावत, महाराज व खंडूडी जेसे पदलोलुपु व दलीय स्वार्थो के लिए समर्पित देष विख्यात नेता रहे , परन्तु ले. जनरल तेजपाल सिंह रावत जैसा उत्तराखण्ड  महान राजनेता  है जो उत्तराखण्ड के हितों की रक्षा के लिए अपने मजबूत आला सम्पर्को  व राजनीति को दाव पर लगा कर दोनों दलों को ठुकराने का साहस कर सका। यह हमारा षौभाग्य है कि प्रदेष के हितों के लिए संघर्श करने वाले जनरल तेजपाल सिंह रावत , नरेन्द्रसिंह नेगी , सुरेन्द्रसिंह पांगती व षैलेन्द्र राज बहुगुणा जैसे नेतृत्व हमारे सामने हैं। आओ उत्तराखण्ड के हक हकूकों की रक्षा करने व अपने भविश्य को संवारने के लिए भाजपा व कांग्रेस की चुंगुल से उत्तराखण्ड बचाने के लिए उत्तराखण्ड रक्षा मोर्चा के महानायक ले . जनरल तेजपाल सिंह रावत व उनके साथियों का खुला समर्थन करे। ऐसा निर्णायक समय सपूतों की टांग खिचने का नहीं अपितु पदलोलुपु कांग्रेस भाजपा के प्यादों को चुनावी बाजी में हराने का है।


भाजपा पर लगा भगवान राम का अभिशाप ?

भाजपा पर लगा भगवान राम का अभिशाप ?
 ‘सौगन्ध राम की खाते हैं हम मंदिर वहीं बनायेंगे, का नारा लगा कर सत्तासीन होने के बाद मंदिर निर्माण करना हमारे ऐजेन्डे में नहीं कहने वाले भाजपा पर लगता है अब भगवान राम कुपित है। नहीं तो सर मुंडवाते कई सालों से उनकी आषाओं पर ओले नहीं पड़ते। भगवान राम अब भी भाजपा का माफ करने को तेयार नहीं हे। इस बार 5 राज्यों के चुनाव में इन राज्यों में कमल खिलाने की आष पर इस बार कुषवाह नाम से एक प्रकार से ग्रहण लग गया। पूरे देष में भाजपा की कितनी किरकिरी हो रही है, इसका भान भाजपा के गडकरी जैसे नेताओं को नहीं है । देष में 80 सांसदों के राज्य उप्र में चुनाव में अपना परचम फहराने की आष से गड़करी ब्रिगेड ने ऐसा काम किया जिससे भाजपा की पूरे देष में जग हंसाई हो रही हे। बसपा के जिस मंत्री कुषवाहा को भ्रश्टाचार के मामलों में मायावती ने अपनी मंत्रीमण्डल से क्या हटाया कि भाजपा ने उनको अपने दल में सम्मलित कर दिया। इसके बाद भाजपा के नेताओं ने जब इस प्रकरण पर प्रष्न उठाया तो उनको अनुषासन का डण्डा दिखा कर चुप कराने का हिटलरी प्रवृति लोकषाही में भाजपा नेतृत्व ने दिखाई परन्तु उसे गोरखपुर के स्वामी आदित्यनाथ ने अपनी हंुकार से तार तार कर दिया। पूरे देष में भाजपा के भ्रश्टाचार के खिलाफ आंदोलन करने की हुंकार का जो उपहास इस प्रकरण से उडा उससे भाजपा का ग्राफ उत्तर प्रदेष में ही नहीं पूरे देष में गिर गया है। यही नहीं भारतीय जनता पार्टी भाजपा, के वरिष्ठ नेता तथा पार्टी के युवा मोर्चा के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष रामाशीष राय ने 9 जनवरी सोमवार को दल के कुछ वरिष्ठ नेताओं पर उत्तर प्रदेश में राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन में हुए कथित घोटाले के आरोपी बाबू सिंह कुशवाहा को पार्टी में शामिल करने के लिए सौदेबाजी करने का आरोप लगाया। इसके बाद आरोप लगाने वाले राय को दल से निलंम्बित किया गया। परन्तु सच्चाई जग जाहिर हो गयी। यह पहली बार नहीं कि भाजपा के आला नेता गडकरी ने ऐसे कारनामे किये । ऐसे कारनामें वह उत्तराखण्ड में कर चूके है। वे कभी भ्रश्टाचार के कई आरोपों में जनता की नजरों में घिरे उत्तराखण्ड के मुख्यमंत्री के पद से हटाने के तुरंत बाद निषंक को भाजपा का राश्ट्रीय उपाध्यक्ष बनाने का आत्मघाती काम करते तो कभी उनको पाक साफ होने का प्रमाणपत्र देते।  लगता है वर्तमान कुषवाहा प्रकरण भाजपा के लिए ताबुत का कील साबित हो रही है। कई नेता इसके खिलाफ सार्वजनिक वयान दे चूके है। संघ भी आयना दिखा चूका है। परन्तु लगता है भाजपा के षीर्श नेतृत्व की बुद्वि पर ही भगवान राम ने पर्दा डाल दिया। जो गड़करी को यह भी समझ नहीं आ रहा है कि क्या सही है और क्या गलत। क्या भ्रश्ट है व क्या पाक साफ। इसी को कहते हैं कि रामद्रोही को कहीं मुक्ति नहीं। लखनऊ में भाजपा प्रत्याषी के साड़ी वितरण प्रकरण के बाद जिस प्रकार से भाजपा की छवि बिगडी थी उसी प्रकार कुषवाहा प्रकरण अब भाजपा को राम द्रोह का दण्ड देने का काम कर रहा है।
चुनाव आयोग का उत्तराखण्ड की जनता से सौतेला व्यवहार क्यों
चुनाव आयोग ने 4 फरवरी को मुसलिम त्योहार के कारण  न केवल 4 फरवरी को होने वाला प्रथम चरण का उप्र का मतदान  , बदल कर 3 मार्च को कर दिया है अपितु चुनाव आयोग ने 4 मार्चा को 5 राज्यों की विधानसभा की मतगणना भी इस कारण 4 मार्च से बदल कर 6 मार्च को कर दी हे।  इससे एक सवाल यह उत्पन होता है कि चुनाव आयोग को हिमालयी राज्य उत्तराखण्ड के लोगों के हितों का गला घोंटते समय कोई रहम क्यों नहीं आया। उसे क्यों अपनी संवेधानिक दायित्व का बोध रहा। हिमालयी राज्य में 30 जनवरी को मतदान के समय कडाके की सर्दी रहती हैं उसको बदल कर फरवरी केअंतिम सप्ताह किया जा सकता था। परन्तु न तो चुनाव आयोग को इसका भान रहा व नहीं प्रदेश के कांग्रेसी नेतृत्व को इसका भान रहा। हालांकि खंडूडी ने इसका विरोध भी दर्ज कराया, परन्तु सामुहिक रूप से पहल करने में उत्तराखण्डी नेता असफल रहे। चुनाव आयोग अपने संवेधानिक दायित्व का सही ढ़ंग से पालन करने में इस दृष्टि से असफल रहा।  उत्तराखण्ड के नेता न तो प्रदेश में जनसंख्या पर आधारित परिसीमन को ही रूका पाये व नहीं चुनाव आयोग द्वारा 30 जनवरी को होने वाले विधानसभा चुनाव को ही रूकवा पाये। जबकि चुनाव आयोग ने मुसलमानों के एक त्योहार के लिए 4 फरवरी को होने वाले उप्र के पहले चरण के मतदान को न करा कर उसे 3 मार्च को कराने का ऐलान किया। 

टीम अण्णा से भी जनता का मोह भंग


टीम अण्णा से भी जनता का मोह भंग/
-टीम अण्णा ने लगाया अण्णा पर ग्रहण /

नई दिल्ली (प्याउ)। लगता है कि देष से भ्रश्टाचार मिटाने की हुंकार भरने वाली अण्णा हजारे व उनकी टीम से विवादों का जंजाल कम होने का नाम ही नहीं ले रहे है। जिस प्रकार से टीम अण्णा के गठन के साथ ही विवादों ने इसका पीछा नहीं छोडा था। इसका गठन होते ही जिस प्रकार से टीम अण्णा में पिता पुत्र के रूप में षांति भूशण व प्रषांत भूशण दोनों को लिये जाने को जनता ने दिल से स्वीकार नहीं किया था।  अण्णा को चाहिए था कि वह पिता व पुत्र में से केवल एक को ही इस टीम में लेते। देष में वकीलों का अकाल नहीं पड़ा हुआ था। खासकर उत्तराखण्ड के लोग स्टर्जिया भूमि प्रकरण में जिस प्रकार से षांति भूशण ने निषंक सरकार के तारनहार बन कर सामने आये वह भ्रश्टाचार से व्यथित प्रदेष की जनता टीम अण्णा में भ्रश्टाचार मिटाने वाली टीम के अहम सदस्य के रूप में षांति भूशण को मन से स्वीकार नहीं कर पा रहे थे। परन्तु उसके बाद जेसे जेसे अण्णा हजारे का आंदोलन चला और सरकार ने दमनकारी हथकण्डे अपना कर देष की जनता को सड़कों पर आने के लिए विवष कर दिया था। परन्तु इसके बाद टीम अण्णा के दिगभ्रमित आंदोलन से जनता की वह सब सहानुभूति खो दी जो उसने अण्णा के रामलीला मैदान में आयोजित अनषन प्रकरण से हासिल किया था। खासकर हिसार लोकसभा के उप चुनाव में जिस पकार से केवल कांग्रेस पर अण्णा की टीम ने निषाना साधा और अन्य भ्रश्टाचारियों के विरूद्व एक षब्द तक नहीं कहा, उससे टीम अण्णा के प्रति लोगों का विष्वास धीरे धीरे कम होता गया। इसके बाद किरण वेदी का हवाई जहाज किराया भाड़ा प्रकरण ने लोगों के विष्वास पर गहरी चोट की। भले ही टीम अण्णा के सबसे प्रभावषाली सदस्य अरविन्द केजरीवाल पर आयकर विभाग का सेवानिवृति आदि प्रकरण भी हल्का रहा हो परन्तु लोगों का वह विष्वास जो षुरू में इस टीम पर बना हुआ था वह उसकी जड़ों को कमजोर करने वाला ही साबित हुआ। इस प्रकरण की आंच अभी बुझ भी नहीं पायी थी कि तभी प्रषांत भूशण के कष्मीर वाले बयान ने लोगों के विष्वास पर मानो बज्रपात ही कर दिया। देष की राश्ट्रवादी जनता की भावना पर यह कुठाराघात असहनीय रहा। इन सब प्रकरणों पर अण्णा हजारे की प्रतिक्रिया , देष की उस जनता को जो अण्णा हजारे को देष का महानायक व वर्तमान गांधी मान कर महानायक मान रहे थे, ने पूरी तरह से देष की जनता को निराष ही किया। लोगों को आषा थी कि अण्णा हजारे महात्मा गांधी के पद चिन्हों पर चलकर व राश्ट्रवाद का सम्मान करते हुए किरण वेदी व केजरीवाल के छोटी सी भूल की निंदा करते हुए दोनों को एक एक दिन के उपवास करके प्रायष्चित करने का आदेषारूपि दण्ड देते। वहीं प्रषांत भूशण को टीम अण्णा से तब तक दूर रखते जब तक वह कष्मीर की आजादी देने वाले अपने तथाकथित बयान पर कायम रहते।  परन्तु टीम अण्णा के प्रमुख अण्णा हजारे में इतना भी नैतिक साहस नहीं रहा। वे अपने टीम के सदस्यों का उसी प्रकार बचाव करते रहे जेसे आम आदमी अपने नालायक बेटों की गलती पर गली मोहल्लों में करता रहता है। अण्णा हजारे के इस प्रवृति को देख कर लोगों के मनो में बना महापुरूश की उनकी छवि तार-तार होने लगी। देष की जनता को उनकी भली मनसा व सद चरित्र पर कहीं दूर तक संदेह नहीं था परन्तु जिस प्रकार से टीम अण्णा द्वारा एनजीओ यानी स्वयं सेवक संगठनों को जनलोकपाल के अन्तगर्त नहीं लाने की हटधर्मिता रही उससे जनता को साफ लगा कि दाल में जरूर काला है। टीम अण्णा व स्वयं अण्णा के पास इस बात को कोई सटीक जवाब नहीं था कि जब एक चपरासी से लेकर देष के प्रधानमंत्री तक को वे इसके अंदर लाना चाहते हैं तो क्यों अदने से एनजीओ को इसके अन्तर्गत लाने में किसको परेषानी हो रही है। टीम अण्णा का एनजीओ को इसके अन्तर्गत नहीं लाने की बात किसी के गले नहीं उतर रही थी। लोगों को समझमें नहीं आ रहा था कि जब एनजीओ पाक साफ हों तो उनको इसके अन्तर्गत लाने से टीम अण्णा क्यों डर रही हैं। वहीं इसके बाद रही सही कसर टीम अण्णा व अण्णा हजारे ने उत्तराखण्ड के कमजोर लोकायुक्त की सराहना करने ने कर दी। देष के प्रबुद्व जनों ने जब देखा कि उत्तराखण्ड का लोकायुक्त में तब तक विधायक, मंत्री व मुख्यमंत्री पर तब तक भ्रश्टाचार का मामला ही दर्ज नहीं किया जा सकता है जब तक सभी लोकायुक्त के सदस्य एकमत न हों। इस लोकायुक्त को देषभर में नजीर मानते हुए अण्णा व टीम अण्णा इसका खुल कर समर्थन करते हुए तनिक सी भी नहीं लज्जाये। यह देख कर टीम अण्णा के एक सदस्य की टिप्पणी मुझे हेरान कर गयी जो उन्होंने 11  को दिल्ली के जंतर मंतर पर पर मेरे द्वारा इस प्रकरण पर उनके विचार जानना चाहे। उन्होंने दो टूक षब्दों में मेरे द्वारा दिये गये, लोकायुक्त विधेयक के प्रावधानों को पढ़ते हुए का पेष किया। उन्होने सच्चाई जग जाहिर कर दी कि यह विधेयक का यह प्रावधान अण्णा हजारे ने पढ़ा ही नहीं होगा। उनको केवल मोहरा सा बनाया गया है । जो अरविन्द केजररीवाल तय करते है वहीं टीम व अण्णा कार्य करते है। भले ही यह लोकपाल विधेयक लोकसभा में पारित हो कर राज्यसभा में पारित नहीं हो पाया, इसको कमजोर बता कर उसका उपहास उडाया जा सकता है परन्तु सरकार की इसको पारित करने की प्रतिबधता को ना नुकुर करके टीम अण्णा को स्वीकार करनी चाहिए। परन्तु टीम अण्णा की गलत सलाह पर अण्णा हजारे ने जो अनषन मुम्बई में प्रारम्भ किया उसमें न तो जनता ही प्रभावित हो पायी व नहीं सरकार। इसके बाद जिस प्रकार से अण्णा ने अपना अनषन व अपने पांच राज्यों में हो रहे विधानसभाई चुनावों में कांग्रेस के खिलाफ प्रचार करने का भी ऐलान लोगों के गले नहीं उतरा। 
    देष से भ्रश्टाचार मिटाने की
हुंकार भरने वाली अण्णा हजारे व उनकी टीम को उस समय एक और करारा झटका लगा जब टीम के सबसे वयोवृद्व सदस्य व देष के पूर्व कानून मंत्री शांतिभूषण पर संपत्ति खरीदने के दौरान 1.35 करोड़ रुपए की स्टांप ड्यूटी नहीं चुकाने पर इलाहाबाद के सहायक स्टांप आयुक्त केपी पांडेय ने 27 लाख रुपए का जुर्माना लगाया गया है। हालांकि षांति भूशण ने इस फेसले के खिलाफ हाई कोर्ट में अपील करने का ऐलान किया। सहायक स्टांप आयुक्त के अनुसार पूर्व केंद्रीय मंत्री भूषण ने सिविल लाइंस इलाके में एक प्रॉपर्टी खरीदी और 7818 वर्ग मीटर क्षेत्रफल की इस संपत्ति के लिए अब तक 46,700 रुपए का भुगतान किया है। उन्हें एक महीने के अंदर बकाया राशि और जुर्माना जमा करना होगा। इसके साथ ही षांति भूशण को 29 नवम्बर 2010 से डेढ़ प्रतिशत की दर से ब्याज भी जमा करना होगा। पांडेय ने कहा कि उन्हें पूरी राशि एक महीने में जमा करनी है। ऐसा नहीं किए जाने पर विभाग आगे की कार्रवाई शुरू करेगा। विवाद की जड़ इस बंगले में 1970 में शांतिभूषण रहते थे। बाद में वह नई दिल्ली में रहने लगे। इसी पर कब्जे को लेकर उनका इसके मालिक से लम्बा विवाद हुआ। इसे लेकर लंबी कानूनी लड़ाई हुई और नवम्बर 2010 में एक समझौते के बाद उन्होंने वह संपत्ति खरीद ली। विभाग का आरोप है षांतिभूशण ने इस सम्पति का मूल्य काफी कम करके इसकी  स्टांप डयूटी चुकायी, जो अब उनके लिए जंजाल बन गया है।
कुल मिला कर टीम अण्णा के साथ साथ अण्णा हजारे के प्रति लोगों के विष्वास में जो यकायक ज्वार भाटे की तरह कमजोरी आयी उसके बाद अण्णा ने न केवल अपने तीन दिवसीय अनषन को दूसरे दिन ही समापन कर दिया अपितु चार राज्यों में चुनाव प्रचार का कार्यक्रम स्थगित करने की बात से भी टीम अण्णा काफी कमजोर हो गयी। खासकर महाराश्ट्र के मुम्बई नगरपालिका के लिए हुए चुनावों में षरद पवार को मिली विजय से साफ संदेष मिल गया था कि लोगों को प्रभावित करने के लिए टीम अण्णा कहीं तक सफल नहीं हो रहे है। इसी कारण पांच राज्यों में हो रहे चुनाव प्रचार भी बंद करना पड़ा। वेसे भी उत्तर प्रदेष, उत्तराखण्ड व पंजाब में कहीं भी अण्णा हजारे का प्रभाव वेसे भी न के बराबर दिखाई दे रहा है। खासकर उत्तराखण्ड के लोकायुक्त बिल का खुला समर्थन करके टीम अण्णा की ख्याति पर ग्रहण सा लग गया है।इसके बाद संसद के षीतकालीन सत्र में जब संसद में लोकपाल मामला षुरू होने पर भी टीम अण्णा का मुम्बई में अनषन करने की हटधर्मिता लोगों के गले नहीं उतरी। इन सब कारणों को देख कर एक ही बात स्पश्ट होती है कि देष की जनता के विष्वास के ज्वार को संभालने में सफल नही हुए अण्णा । अगर टीम अण्णा को हकीकत में देष में लोकषाही का सम्मान करने व भ्रश्टाचार से लड़ने की इच्छा है तो उनको लोकपाल बिल में एनजीओं को सम्मलित करने व सीबीआई को इसके तहत लाने की जिद्द छोड़ देनी चाहिए। जब केग बिना सीबीआई युक्त हुए देष में हर साल बडे बडे घोटाले बेनकाब करता है तो लोकपाल के अंदर सीबीआई लाने की जिद्द करना कहीं तर्क संगत नहीं दिखाई दे रही है। 

Sunday, January 8, 2012

तिवारी के नाम पर कांग्रेस आलाकमान को किया चैधरी बीरेन्द्र ने गुमराह

तिवारी के नाम पर कांग्रेस आलाकमान को किया चैधरी बीरेन्द्र ने गुमराह
आगामी विधानसभा चुनाव में तिवारी के विद्रोह का भय दिखा कर अपने निहित स्वार्थ की पूर्तिं करने के लिए तिवारी के प्यादे आयेन्द्र षर्मा को देहरादून से टिकट दिलाने का शडयंत्र करने वाले कांग्रेसी प्रभारी चोधरी बीरेन्द्र सिंह जवाब दो, उत्तराखण्ड के हितों व कांग्रेस की लुटिया डुुबोने वाले को किस खुषी में ईनाम दिया गया। आज उत्तराखण्ड का कोई स्वाभिमानी व्यक्ति तिवारी का नाम तक अपनी जुबान पर नहीं लेना चाहता है। कांग्रेस आला कमान बीरेन्द्र सिंह से जवाब मांगे कि क्यों गैर उत्तराखण्डी व तिवारी के पतन के सहयोगी को सहस्रपुर से टिकट दी गयी। आगामी चुनाव में ऐसे प्रत्याषी को हराने का काम उत्तराखण्ड का हर स्वाभिमानी व्यक्ति करेगा। कांग्रेस आलाकमान जागो, सहस्रपुर से अपना प्रत्याषी का बदलो या जनता के आक्रोष का सामना करो।