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Monday, February 27, 2012

25 हजार डाकमत पत्रों के बेरंग आने से भाजपा में मचा हडकंप

25 हजार डाकमत पत्रों के बेरंग आने से भाजपा में मचा हडकंप
देहरादून (प्याउ)। 25 हजार से अधिक संख्या में डाकमतों का बिना मतदान के वापस पंहुचने की खबर से पोस्टल मतों को अपनी वापसी का मजबूत आधार मानने वाली भाजपा में हडकंप ही मच गया। डाकमत पत्रों पर कांग्रेस ने जिस प्रखरता से सजग हो कर इस बार उठाया उससे पोस्टल मतों में पूर्व की तरह इनका प्रयोग करने में सम्बंधित अधिकारियों ने सावधानी बरती। इस बार प्रदेश में डाक मतों खासकर सैन्य डाकमतों की गडबड़ी के आशंका से कांग्रेस ने चुनाव आयोग से लेकर पूरे तंत्र पर सजग प्रहरेदारी कर रही है उससे किसी भी अधिकारी द्वारा इसमें नाहक ही अपनी टांग फंसाने के बजाय इससे दूरी रखना ही बेहतर समझा होगा। इस लिए इस बार पोस्टल मतों में इस प्रकार की धांधली बड़ी संख्या में होने की आशंका काफी कम हो गयी है।  चुनाव आयोग द्वारा पोस्टल मतों के बेरंग वापसी का ऐलान करने के बाद भाजपा की प्रतिक्रिया मे ंझल्लाहट साफ नजर आ रहा है कि भाजपा 25985 पोस्टल नामित मतदाता तक नहीं पंहुचे पोस्टल मतों तथा 55221 पोस्टल बैलेट की स्थिति स्पष्ट नहीं होने तक 6 मार्च को होने जा रही मतगणना को रोक देने की मांग तक कर दी।  भाजपा को जहां इसमें कांग्रेसी षडयंत्र की बू आ रही है वह अब चुनाव आयोग पर को भी कटघरे में खडा करने की कोशिश कर रहा है।  भाजपा की हडकंप का कारण  25 हजार से अधिक मतपत्रो ंका बेंरग लोट आना है।  गौरतलब है कि इस चुनाव में प्रदेश में सर्विस एवं चुनाव ड्यूटी से जुड़े 1,20,778 वोट हैं। जिसमें सेना,अर्धसैनिक व अन्य के 1,02,220 वोट हैं एवं 20.558 चुनाव कर्मचारियों के वोट हैं। जो 24 फरवरी तक 25,057 सर्विस वोट एवं 14,515 चुनाव ड्यूटी के वोट राज्य निर्वाचन आयोग से प्राप्त हुए हैं। जिनकी कुल संख्या 39,572 है। साथ ही 25,985 वोट बैरंग आए। शेष 56,221 वोटों की वास्तविक स्थिति का स्पष्ट नहीं होना । वेसे बेरंग लोट आये डाकमतों को जहां सैन्य परिजनो का इस लिस्ट में होने के साथ साथ इन चुनाव की निष्पक्षता पर चुनाव आयोग से लेकर शासन प्रशासन की कड़ी नजर लगना भी माना जा रहा है। कोई अधिकारी इस बार अपनी टांग नाहक ही नहीं फंसाना चाहता है। भाजपा की हैरानी का कारण यह भी है कि इन्हीं मतपत्रों के भरोसे वह चुनावी जंग में फंसी अपनी नौका को पार लगाने की आश लगाये हुए हैं।

देश में पहली बार डाकमत भी बने चुनाव में निर्णायक

देश में पहली बार डाकमत भी बने चुनाव में निर्णायक/
- उत्तराखण्ड की 70सदस्यीय विधानसभा में 32 सीटों पर निर्णायक होंगें डाकमत
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 देश में पहली बार किसी विधानसभा के भाग्य का फेसला वहां के डाकमत पत्र करेंगे। देश में पहली बार पूरे प्रदेश स्तर पर डाकमतों के लिए सियासी जंग छिडी। देश में पहली बार मीडिया को भी डाकमतों की शक्ति का अहसास व चर्चा सुनने को मिली। खुद पहली बार डाकमतों की शक्ति का अहसास निर्वाचन आयोग को भी हुआ। पहली बार देश के राजनेताओ ंका ध्यान डाकमत पत्रों की तरफ गया। सियासी दलों का पहली बार सैन्य डाकमतों की महता का अहसास हुआ। इस बार उत्तराखण्ड में रिकार्ड तोड़  सवा लाख डाक मत पत्र जारी किये गये। पहली बार देश के अब तक के चुनाव में किसी भी प्रदेश का भाग्य का फेसला पोस्टल मतों के द्वारा होने का हब्बा राजनेताओं में ही नहीं आम जनता में भी छाया हुआ है।  डाक मत पत्रों की महता का पता इसी बात से चलता है कि 70 सदस्यीय विधानसभा में से 32 सीटों के भाग्य का फेसला इन्हीं मतपत्रों पर टिका हुआ है।  भाजपा जहां इन्हीं डाकमतों के भरोसे सरकार फिर से बनाने का सपना बुन रही है तथा कांग्रेस इन्हीं मतपत्रों को अपनी प्रदेश की सत्ता में आसीन होने के सपने पर ग्रहण लगने का कारण मान रही है। इससे एक बात उभर कर सामने आयी कि कांग्रेस जहा इन डाकमत मत्रों को केसे हासिल किया जाय इसके प्रति उदासीन रही वहीं भाजपा कई चुनाव में इनका अधिक से अधिक प्रयोग करने का महारथ हासिल कर चूकी है।
डाकमत पत्रों का महत्व प्रदेश में इसलिए भी बढ़ जाता है क्योंकि पर्वतीय क्षेत्रों की विधानसभा सीटों में हार जीत का फैसला काफी कम अंतर से होता है। इस बार 32 विधानसभा क्षेत्रों के भाग्य के फेसला इन्हीं  डाक मतों के द्वारा होने की आशंका से कांग्रेस के बाद अब भाजपा भी आशंकित है। 30 जनवरी को हुए विधानसभा चुनाव  2012 के चुनाव के बाद प्रदेश की राजनेतिक दलों का पूरा ध्यान प्रदेश में सवा लाख के करीब डाकमत पत्रों पर
लग गया।
मुख्य निर्वाचन कार्यालय के सुत्रों के अनुसार  पोस्टल बैलेट के जरिए हुए मतदान का प्रतिशत 31 प्रतिशत का आंकड़ा पार कर चुका है। जो राज्य गठन के बाद से कभी भी हुए डाक पत्र मतदान से सबसे अधिक है। 2007 के विधानसभा चुनाव में 81319 सर्विस मतदाताओं में केवल 15564 ने ही यानी 19 प्रतिशत पोस्टल बैलेट के जरिए ही वोट डाले गए थे। 2009 के लोकसभा चुनाव में भी  93326 पोस्टल मतदाओं में से 19265 ने यानी 21 प्रतिशत पोस्टल मतपत्रों से मतदान  किया गया।  प्रदेश में विधानसभा चुनाव 2012 में सर्विस एवं चुनाव ड्यूटी से जुड़े 1,20,778 वोट हैं। जिसमें सेना,अर्धसैनिक व अन्य के 1,02,220 वोट हैं एवं 20.558 चुनाव कर्मचारियों के वोट हैं। उत्तराखंड निर्वाचन कार्यालय नें पौड़ी के पोस्टल मतदाताओं के लिए 22727, पिथौरागढ़ के लिए 15306, चमोली के लिए 13158, देहरादून के लिए 9743 और अल्मोड़ा के लिए 6799 पोस्टल मतपत्र भेजे थे। इसके अलावा प्रदेश में 20558 ऐसे सर्विस मतदाता है जो चुनाव ड्यूटी पर थे और उन्होंने भी पोस्टल मत दिया है। डाक मतपत्र प्रदेश के चुनावों में काफी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते रहे हैं। विधानसभा वार देखा जाए तो प्रदेश के 5 विधानसभा क्षेत्रों में डाक मतपत्रों की संख्या 5 हजार से ज्यादा है। 4 विधानसभा क्षेत्रों में तीन से चार हजार, 9 विधानसभा  क्षेत्रों में दो से तीन हजार, 16 विधानसभा क्षेत्रों में एक से दो हजार और 36 विधानसभा क्षेत्रों एक हजार से नीचे है।
इस साल 30 जनवरी को सम्पन्न हुए विधानसभा 2012 के चुनाव के मतदान के लिए डाक मतदान के लिए 24 फरवरी तक 25,057 सर्विस वोट एवं 14,515 चुनाव ड्यूटी के वोट राज्य निर्वाचन आयोग से प्राप्त हुए हैं। जिनकी कुल संख्या 39,572 है। साथ ही 25,985 वोट बैरंग आए। शेष 56,221 वोटों की वास्तविक स्थिति का स्पष्ट नहीं हुई इससे प्रदेश में सत्तासीन होने की आश लगाये हुए भाजपा की आशाओं पर एक प्रकार से ग्रहण ही लग गया है।  पहली बार कांग्रेस को डाकमतों के महत्व का 2008 के लोकसभा उपचुनाव में पता चला। जब डाकमतों के कारण कांग्रेस ने जीती हुई बाजी हार दी थी। 2008 में जनरल भुवनचंद खंडूड़ी के मुख्यमंत्री बनने के बाद उनके इस्तीफा देने से रिक्त हुई पौड़ी लोकसभा के उपचुनाव में कांग्रेस प्रत्याशी सतपाल महाराज सीधे मतदान की गणना में लगभग 20 हजार मतों से जीत गए थे जबकि डाकमतों की मतगणना में वह तत्कालीन भाजपा  प्रत्याशी ले. जनरल तेजपाल सिंह रावत से 6 हजार मतों से  पराजित हो गये। हालांकि इससे पहले 2007 के विधानसभा  चुनाव में भी नरेंद्रनगर विस क्षेत्र में सीधे मतो की गणना में जीत चुके सुबोध उनियाल डाकमतों की गणना के बाद उत्तराखंड क्रांति दल के ओमगोपाल से मात्र 4 मतों से हार गए थे  पर इस विवाद पर लोगों ने ज्यादा ध्यान नहीं दिया। यह विवाद न्यायालय में में लटका रहा ।नहीं तो डाकमतों का भाजपा इससे पहले चुनाव में लाभ उठाती रहती थी। इसी कारण कांग्रेस नेता सतपाल महाराज ने सबसे पहले इस मामले को प्रमुखता से उठाया, हालांकि कई लोग उनकी इस पहल का पहले मजाक भी उडाते देखे गये परन्तु जब इस बात की गहराई में जा कर देखा गया कि प्रदेश की इन चुनाव में 32 सीटों का भाग्य पोस्टल मतदान बदल सकते हैं तो कांग्रेस ने कमर कसते हुए सर्वोच्च न्यायालय के वरिष्ठ अधिवक्ता अवतार सिंह रावत के द्वारा केन्द्रीय चुनाव आयोग में गुहार लगायी, सभी प्रत्याशियों की दिल्ली स्थित कांग्रेस वार रूम में इस पर चिंतन भी हुआ। अब सबकी नजर 6 मार्च को होने वाली मतगणना पर लगी हुई है। इसी के बाद इन मतपत्रों की शक्ति का सही पता चल पायेगा। परन्तु यह सच है कि डाकमतों की शक्ति से सभी सियासी दल आशंकित हैं।
शेष श्री कृष्ण कृपा। हरि ओम तत्सत्। श्रीकृष्णाय् नमो।

Saturday, February 25, 2012

अपने हक हकूकों व सम्मान के लिए जागृत हो उत्तराखण्डी

अपने हक हकूकों व सम्मान के लिए जागृत हो उत्तराखण्डी
नई दिल्ली(प्याउ)।  ’उत्तराखण्ड समाज को अपनी दलगत, जातिगत व क्षेत्रवादी संकीर्णता से उपर उठ कर अपने प्रदेश की समग्र विकास, संस्कृति के साथ साथ अपने हक हकूकों की रक्षा के लिए सामुहिक रूप से संगठित होना चाहिए। इसके साथ सामाजिक संगठनों को चाहिए कि वे उत्तराखण्ड, दिल्ली सहित देश के हर प्रांत में मुख्य धारा के विकास में अपना योगदान देते हुए उत्तराखण्डी समाज के हित के प्रति समाज को राजनैतिक जागरूक करने की अपनी महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वहन करे।’  यह विचार
‘उत्तराखंड के सामाजिक एंव राजनितिक जीवन पर प्रवासी उत्तराखंडियों की भूमिका’ नाम विषय पर दिल्ली  में आयोजित एक विचार गोष्ठी में उभर कर सामने आये। 25 फरवरी को दिल्ली के गढ़वाल भवन में दोपहर में आयोजित इस गोष्ठी में  उत्तराखण्ड के अग्रणी जनकवि बली सिंह ‘चीमा’बली का जनगीत ‘तय करो आदमी की और हो या आदमखोर की तरफ.....’ से इस गोष्ठी का समापन हुआ। इस गोष्ठी की अध्यक्षता उत्तराखण्ड परिवर्तन पार्टी के अध्यक्ष पीसी तिवारी  ने की तथा संचालन म्यर उत्तराखण्ड के अध्यक्ष मोहनसिंह बिष्ट ने की। सभा में पत्रकार सुरेश नौटियाल, उत्तराखण्ड राज्य गठन आंदोलन के अग्रणी संगठन उत्तराखण्ड जनता संघर्ष मोर्चा के अध्यक्ष व प्यारा उत्तराखण्ड के सम्पादक देवसिंह रावत, दिल्ली नगर निगम की पार्षद व भाजपा नेत्री उषा शास्त्री, कार्यकारी सम्पादक चारू तिवारी, जनसंघर्षो से जुड़े पत्रकार भूपेन सिंह, उत्तराखण्ड चिंतन के के एम पाण्डे, महासचिव प्रेम सुन्दरियाल, भूपाल सिंह बिष्ट, समाजसेवी हरिपाल नेगी, अखिल भारतीय उत्तराखण्ड महासभा के गिरीश बलूनी, सार्थक प्रयास से उमेश पंत, प्रबंधन विशेषज्ञ प्रकाश पंत, देवेन्द्र बिष्ट, भाजपा नेत्री श्रीमती गुसांई, पत्रकार रावत,  युवा नेता दीपक बिष्ट, सहित अनैक प्रतिष्ठित लोगों ने अपने विचार प्रकट किये। इस सभा में समाजसेवी विक्रम सिंह रावत, म्यर उत्तराखण्ड के महासचिव सुदर्शन सिंह रावत, हरीश रावत, पत्रकार सतेन्द्र रावत, हुकमसिंह कण्डारी, कवि पृथ्वीसिंह केदारखण्डी व दिनेश ध्यानी, सहित अनैक प्रतिष्ठित लोग उपस्थित थे।

Friday, February 24, 2012

जब चुनाव में हुआ कांग्रेसी नेता का हेलीकाप्टर से हरण ...........

जब चुनाव में हुआ कांग्रेसी नेता का हेलीकाप्टर से हरण ...........
मुख्यमंत्री के लिए कांग्रेस में शह ओर मात का आत्मघाती खेल से बेखबर आलाकमान

अभी तक लोगों ने आदमी या कुर्सी का हरण होते हुए सुना होगा। परन्तु उत्तराखण्ड की हाल में सम्पन्न हुई विधानसभा चुनाव में कांग्रेसी महारथियों में अपने प्रतिद्वंदियों को मात देने की कितनी मारामारी थी इसका सबसे हैरान कर देने वाली घटना थी प्रदेश के मुख्यमंत्री के एक बडे नेता का हेलीकाप्टर से हरण। इस प्रकार का हरण हुआ कि नेता की बड़ी सभायें लगी थी उनको वहां पंहुचाने के बजाय उनको दूर देहरादून भेज दिया गया। इस सब से अनजान जब नेता को इस बात का भाान हुआ तो वह माथा पकड कर बैठ गये। सभायें भी नहीं कर पाये व परेशानी अलग। बाद में पता चला कि प्रदेश के बडे नेता के कहने पर ही उनको सभाओं में ले जाने के बजाय देहरादून पठाया गया।
उत्तराखण्ड की जनता के भाजपा के कुशासन से मोहभंग को भांपते हुए जहां कांग्रेसियों क्षत्रपों ने विधानसभा चुनाव 2012 चुनाव से पहले ही प्रदेश का मुख्यमंत्री खुद को बनाने के लिए टिकट बंटवारे से पहले व चुनाव के दौंरान ऐसे आत्मघाती काम किये जिससे कांग्रेस की हालत भी भाजपा की तरह ही दयनीय हो गयी। चुनाव की रणभेरी बजने के समय से जहां भाजपा ने जहां जनता के भाजपा के कुशासन से हुए मोह भंग को लुभाने के लिए प्रदेश का मुख्यमंत्री निशंक से बदल कर खंडूडी की ताजपोशी कर दी वहीं
कांग्रेस पार्टी के प्रदेश कांग्रेस पार्टी में उत्तराखण्ड में मुख्यमंत्री बनने की ऐसी होड़ लगी कि कांग्रेस का भट्टा ही गोल हो गया। अगर जनता में भाजपा के प्रति आक्रोश नहीं होता तो कांग्रेस पार्टी को मुंह दिखाने की कहीं जगह भी नहीं मिलती। एक तरफ सोनिया गांधी व राहुल गांधी प्रदेश से लेकर देश के अन्य प्रदेशों में कांग्रेस को सत्तासीन करने के लिए दिन रात एक किये हुए है वहीं उत्तराखण्ड में चुनावी दिनों कांग्रेसी क्षत्रपों में एक दूसरे को मात देने व एक दूसरे के समर्थकों को हराने के लिए भीतरघात में लगे हुए थे। वहीं कांग्रेस आला कमान का विश्वासी प्रदेश प्रभारी एक गुट के आका की तरह अन्य क्षेत्रप की तरह व्यवहार कर रहा था। प्रभारी ने देहरादून में कांग्रेसी नेताओं को दर किनारे करके एक क्षत्रप के इशारे पर टिकट ही नहीं तमाम बडे नेताओ ंकी बैठके उनकी के क्षेत्र में करा रहे थे। वहीं कोटद्वार में जहां पार्टी का मजबूत प्रत्याशी सुरेन्द्रसिंह नेगी ने प्रदेश के मुख्यमंत्री की हालत पतली कर रखी थी वहां पर बडे नेताओं की बैठक तक नहीं लगा रहे थे। जीत सकने वाले पार्टी के समर्पित नेताओं को टिकट के लिए ही मोहताज कर दिया गया। यही नहीं प्रदेश के आला नेता जिनकी तीन चार चुनावी बड़ी सभायें लगी हुई थी वे जिस हेलीकाप्टर में वे  तराई सहित कुमाऊं मण्डल तीन चार सभाओं  में जाने के लिए उडे तो होलीकाप्टर ने उनको सभा स्थल में ले जाने के बजाय देहरादून ले गया। वहां पर उतर कर वे जेसे तेसे लोटे पर उस दिन की उनकी तीन चार बडी सभायें नहीं हो पायी। यही नहीं चुनाव परिणाम आने से पहले दिल्ली में बैठ कर मुख्यमंत्री बनने की जीतनी लांबिग ये क्षत्रप कर रहे हैं अगर उसका आधी मेहनत पार्टी को जीताने के लिए करते तो कांग्रेस प्रदेश में कम से कम 45 सीटें जीत सकती थी। अब मुश्किल से सत्ता में  बहुमत के आसपास रहेगी।

Thursday, February 23, 2012

उत्तराखण्ड के सरकारी तंत्र की अकर्मण्यता से भौंचंक्के खंडूडी खूब बरसे

उत्तराखण्ड के सरकारी तंत्र की अकर्मण्यता से भौंचंक्के खंडूडी खूब बरसे

‘मैं महिने एक दो बार ही  एक दो दिन के लिए दिल्ली आता हूॅं  इस दौरान भी आप लोग अपनी जिम्मेदारी तक नहीं निभाते, मैं कितनी बार बार बेल बजाने के बाबजूद कोई इस तरफ ध्यान तक नहीं दे रहा है। आप लोग करते क्या यहां?  यहां पर पत्रकार लोग बैठे है आप लोगों ने मुझे बताया तक नहीं?  यह उत्तराखण्ड के सरकारी तंत्र से पीड़ित आम आदमी के शब्द नहीं अपितु उत्तराखण्ड के मुख्यमंत्री भुवनचंद खंडूडी के शब्द है। जो वे अपने ही कार्यालय के अधिकारियों व कर्मचारियों द्वारा उनकी उपेक्षा करने से बेहद आहत हो कर इन लापरवाह कर्मियों को बुरी तरह से डपट रहे थे।
 इस प्रकरण का प्रत्यक्ष दर्शी होने के कारण  मैं भी दंग रह गया कि जिस प्रदेश के कर्मचारी मुख्यमंत्री की इतनी उपेक्षा करते हों उस प्रदेश में आम जनता के प्रति नोकरशाही की क्या रवैया होगा। उत्तराखण्ड प्रदेश में 11 सालों में सरकारी अमला कितना अकर्मण्य व उदासीन हो गया है इसका एक छोटा सा नमुना देख कर प्रदेश के मुख्यमंत्री भुवनचंद खंडूडी भी खुद भौचंक्के रह गये। हुआ यों कि प्रदेश के मुख्यमंत्री 23 फरवरी को दिल्ली पंहुचे। दिल्ली के उत्तराखण्ड निवास में दूसरी मंजिल पर स्थित मुख्यमंत्री सूट में  दिल्ली प्रवास के दौरान निवास करते है। इस मुख्यमंत्री आवास कक्ष के साथ ही उनका कार्यालय भी होता है। मुख्यमंत्री कक्ष के साथ ही बने स्वागत कक्ष में उनसे मिलने वालों को बिठाया जाता। यहां पर आज दोपहर को मैं भी वहां पर पंहुच कर कई समाचार चैनलों के पत्रकारों के साथ चाय पिते हुए बात चीत कर ही रहा था तो तभी वहां पर मुख्यमंत्री से मंत्रणा करके उनके कक्ष से उत्तराखण्ड सरकार के सलाहकार एल के जोशी बाहर आये तो मै अपने अन्य साथी पत्रकारों से उनका परिचय ही करा रहा था कि तभी मेने देखा कि  मुख्यमंत्री खंडूडी यकायक जिस कक्ष में हम थे उसमें आ कर अपने अधिकारियों व कर्मचारियों को डपटने लगे। यकायक हुई इस घटना से वहां पर उपस्थित पत्रकार, अधिकारी सभी सन्न रह गये। प्रदेश के मुख्यमंत्री खंडूडी से मेरे भले ही तमाम उनकी प्रदेश को दिशा देने वाले काम न करने से मतभेद रहे हों परन्तु वे सेना के वरिष्ठ अधिकारी रहने के कारण अनुशासन के पाबंद हैं। उनकी यह हनक सारे कर्मचारियों में थी परन्तु उनका खुद का कार्यालय उनकी कितनी परवाह करता है इसको देख कर वे खुद भौचंक्के रह गये। पर इतना है कि उनके आसपास रहने वाले उनके अधिकारियों का न तो समाज के प्रति मेल जोल रहता है व नहीं वे मुख्यमंत्री को सही सलाह तथा उनको सही जानकारी तक देते है। इसी का कारण रहा खण्डूडी की जनता के समक्ष अपार सही छवि के बाबजूद वे न तो जनता के विश्वास पर खरे उतर सके व नहीं वे जनांकांक्षाओं को ही साकार कर सके। उनके आसपास कितने आत्मघाति रणनीतिकार है जिन्होंने उनको कोटद्वार से चुनावी समर में उतार कर भंवर में फंसाने का काम किया। एक अच्छे नेता को चाटुकारों व अव्यवहारिक लोगों के बजाय अपने आसपास साफ छवि के दूरदर्शी व्यवहारिक लोगों को रखना चाहिए।

Wednesday, February 22, 2012

वाररूम में खुद हुए बेनकाब कांग्रेसी महारथी

वाररूम में खुद हुए बेनकाब कांग्रेसी महारथी/
भीतरघात नहीं होता तो उत्तराखण्ड में 70 में से कांग्रेस 45 से अधिक सीटे जीतती/
 ‘खोदा पहाड़ निकला चूहा’ साबित हुआ वाररूम में उत्तराखण्ड कांग्रेस प्रत्याशियों की बैठक
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नई दिल्ली (प्याउ)। वाररूम यानी व्यूह रचना कक्ष, प्रायः वाररूम का प्रयोग सेना में किया जाता है। जहां सेना नायक अपने कमांडरों के साथ युद्ध की रणनीति बनाते है। शायद इस शब्द को राजनीति में भी  राजनीति के चोधरियों ने अपने अपने दलों की अंतिम रणनीति या गुप्त नीति बनाने के लिए अपना लिया हो। मेरे कानों में यह शब्द वेसे जब देश पर युद्ध के बादल मंडराने लगते थे तब सुनाई देता था। परन्तु कुछ महिनों पहले मुझे पता चला कि कांग्रेस का कोई वार रूम है। भाजपा का वाररूम कहां हैं यह तो मुझे नहीं पता, आम राजनीति का राजनैतिक समझ रखने वाला आदमी भी कहेगा शायद झण्डेवालन या नागपुर  में होगा। क्योंकि भाजपा में अतिम व मुख्य रणनीति संघ ही बनाता है।
 ऐसा ही यदि कोई पूछे कि कांग्रेस का वार रूम कहां है तो अधिकांश प्रबुद्ध लोग कहेंगे कि दस जनपत। क्योंकि कांग्रेस का अंतिम निर्णय 10 जनपत यानी वहां पर रहने वाली कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी करती है। यह शतः प्रतिशतः सही भी है। परन्तु कांग्रेस का वाररूम 10 जनपत नहीं  अपितु 15 रकाबगंज रोड दिल्ली में यानी मायावती जी की पार्टी बसपा के केन्द्रीय मुख्यालय के ठीक सामने है।  कांग्रेस के वार रूम में कहते हैं मीडिया और आम आदमी के लिए भी प्रवेश निषेद्ध है। ऐसा मुझे तब बताया गया जब एक दिन में किसी मित्र के साथ वहां पर कुछ पल के लिए गया। आज 22 फरवरी दोपहर 3 बजे भी कांग्रेस के वार रूम में  उत्तराखण्ड प्रदेश में हाल में सम्पन्न हुए विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के तमाम प्रत्याशियों की पोस्टल बेलेट पेपर की समस्या के निदान के लिए विशेष बैठक बुलायी गयी। मैं अपने  पत्रकार मित्रों के साथ वहां पर पंहुचा तो देखा की वहां पर कांग्रेस के उत्तराखण्ड के तमाम कांग्रेसी प्रत्याशी एक एक करके पंहुच रहे थे। 15 रकाबगंज वाली विशाल कोठी, जिस पर कोई बोर्ड या प्लेट तक नहीं लगी है वहां पर लगे सुरक्षा कर्मी उनके पास वार रूम की 3 बजे वाली बैठक के सम्मलित होने वाले लोगों का नाम वालों को ही अंदर जाने दे रहे थे। प्रदेश के प्रभारी व कांग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव चैधरी वीरेन्द्र सिंह, केन्द्रीय कृर्षि राज्य मंत्री हरीश रावत, सांसद विजय बहुगुणा, प्रदेश अध्यक्ष यशपाल आर्य, नेता प्रतिपक्ष हरक सिंह रावत सहित अधिकांश विधायक प्रत्याशी पंहुचे हुए थे। इनके अलावा सर्वोच्च न्यायालय के वरिष्ठ अधिवक्ता अवतार सिंह रावत, कांग्रेस अधिवक्ता सेल के प्रमुख अधिवक्ता मलिक, मेजर जनरत पंत व समाजसेवी के सी पाण्डे भी उपस्थित थे। सभा में सम्मलित एक विधायक प्रत्याशी ने जब इस वार रूम में आयोजित इस बैठक में कांग्रेस के इन रणनीतिकारों का हल्कापन देखा तो वह झल्लाते हुए बोले इतनी दूर क्या इसी लिए बुलाया गया। कोई ठोस रणनीति नहीं, इस सभा में सम्मलित एक प्रतिष्ठित व्यक्ति ने टिप्पणी की कि अगर ऐसे लोग प्रदेश का शासन संभाल कर क्या दिशा देंगे यह उनके समझ से बाहर है। उनके अनुसार अधिकांश सम्मलित प्रत्याशियों के हाव भाव व चेहरे मुरझाये हुए थे, उत्साह उनमें कहीं दूर दूर तक नहीं दिखाई दे रहा था।  न हीं वार रूम में प्रदेश प्रभारी व अध्यक्ष तथा न किसी के सम्बोधन ही प्रेरणादायक या उत्साहजनक रहा। कुल मिला कर प्रदेश में सरकार बनाने वाला उत्साह कहीं दूर तक इन प्रतिनिधियों में दिखाई ही नहीं दिया। कुल मिला कर कांग्रेस के प्रभारी द्वारा सुदूर उत्तराखण्ड से प्रत्याशियों को दिल्ली बुला कर कोई ऐसी मंत्रणा तक या दिशा निर्देश तक नहीं दिया गया जिसकी आश में वे वार रूम में पंहुचे। इस बैठक के प्रति आयोजक कितने गंभीर थे, इस बैठक में 5 में से तीन सांसद सतपाल महाराज, प्रदीप टम्टा व के सी बाबा ही नहीं दिखे।  सतपाल महाराज जो स्वयं देश की रक्षा समिति के अध्यक्ष होने के साथ साथ इस मुद्दे पर सबसे अधिक प्रखर भी हैं। वहीं सांसद प्रदीप टम्टा व केसी बाबा की इन चुनाव में जिस प्रकार से शर्मनाक उपेक्षा प्रदेश प्रभारी की जानकारी में निरंतर की जा रही है उससे दोनों सांसद ही नहीं उनके समर्थक भी अपने आप को अपमानित महसूस कर रहे है। देहरादून में राहुल गांधी की प्रथम चुनावी रेली में ही दोनों सांसदों को मंच पर जहां आसीन नहीं किया गया वहीं उनको चुनाव की अधिकांश महत्वपूर्ण समितियों में नजरांदाज किया गया। जहां तक कांग्रेसी नेता पोस्टल मतों पर भले ही हल्ला मचा रहे हों परन्तु अपने अपने क्षेत्र में व केन्द्रीय स्तर पर पोस्टल मतों को हासिल करने के लिए कोई रणनीति बनाने के बारे में सोचे भी नहीं । कहने को प्रदेश कांग्रेस कमेटी में दो जनरल स्तर के ले.जनरल नेगी व मेजर जनरल पंत को विशेष आमंत्रित सदस्य बनाया गया हो परन्तु उनका मार्गदर्शन तक इस दिशा में नहीं लिया गया। निस्तेज प्रभारी, अपनो के भीतरघात से मर्माहित प्रदेश अध्यक्ष के अलावा इस बैठक में आपस में एक ही गुस्सा अधिकांश वरिष्ठ कांग्रेसी नेता प्रकट कर रहे थे कि अगर प्रदेश के दिग्गज कांग्रेसी भीतरघात नहीं करते तो 70 सदस्यीय विधानसभा में कांग्रेस उत्तराखण्ड में कम से कम 45 सीट जीतती। हालांकि इसके बाबजूद सभी इस बात के लिए आश्वस्त थे कि कांग्रेस प्रदेश मेें सरकार बना रही है। 
इस बैठक में सम्मलित अधिकांश प्रत्याशियों को इस बात का भले ही संतोष होगा कि उन्होंने कांग्रेस का वार रूम देख तो लिया। नहीं तो कांग्रेस के अधिकांश नेता इस वार रूम में झांक भी नहीं सकते। यहां पर कांग्रेस के वरिष्ठ व विशेष रणनीतिकार ही कांग्रेस आला नेतृत्व के मार्गदर्शन को कैसे अमलीजामा पहनाना है इस रणनीति की व्यूह रचना होती होगी। हालांकि यहां पर प्रायः  प्रणव मुखर्जी, मोती लाल बोरा, एंथोनी, अहमद पटेल, दिग्विजय सिंह, गुलाम नबी आजाद,  जर्नाजन द्विवेदी जैसे नेता ही मंत्रणा करते होगे। अब कपिल सिब्बल भी शायद इस टीम में सम्मलित होगे। राहुल गांधी द्वारा कांग्रेस की कमान संभालने के बाद उनकी टीम का यहां पर दखल बड़ गया होगा।

Tuesday, February 21, 2012

-सरकारी सेवा में केवल सरकारी विद्यालय से पढ़े को मिले नियुक्ति

उत्तराखण्ड में सरकारी विद्यालयों में शिक्षा व्यवस्था के पतन के लिए जिम्मेदार है  हुक्मरान/
-मुख्यमंत्री खण्डूडी की विधानसभा क्षेत्र में  हुए प्रकरण पर खंडूडी   का शर्मनाक मौन क्यो?
-सरकारी सेवा में केवल सरकारी विद्यालय से पढ़े को मिले नियुक्ति
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 गत सप्ताह मेरे पास मेरे राज्य आंदोलन के साथ श्याम प्रसाद खंतवाल ने एक चैकाने वाला पत्र दिया। पत्र प्रदेश के मुख्यमंत्री भुवनचंद खंडूडी के  चुनाव क्षेत्र का है। जहां पर उनकी सरकार के कारनमों का एक ऐसा कच्चा चिट्ठा उजागर हुआ जो प्रदेश की शिक्षा व्यवस्था से खिलवाड़ करने वाले हुक्मरानों का पूरा चेहरा ही बेनकाब कर देता है पत्र में क्षेत्र की जनता की तरफ से कहा गया कि हम समस्त क्षेत्रवासी आपका ध्यान जनपद पौड़ी गढ़वाल के विकास खंड जयरीखाल, ब्लाक के अंर्तगत जूनियर हाई स्कूल-असनखेत की तरफ दिलाना चाहते हैं। यहाॅ पर रबच मशीन द्वारा दिनांक 24.12.2011 को धनश्याम खंतवाल पब्लिक स्कूल तक जाने के लिए निजी सड़क बनाते हुए बिना अनुमति की सरकारी जूनियर हाई स्कूल की दीवार ही गिरा दी गयी। प्रदेश में चुनाव आचार संहिता लगने के दौरान यहां पर अनुदान द्वारा इस प्राइवेट स्कूल का ग्राउॅड बनाया जा रहा था।  इस ग्राउड को बनाने के लिए जिसके लिए 50 (पचास) लाख रूपये आये है। जबकि इस स्कूल में 100 कम छात्र पढ़ रहे हैं।  जिस सरकारी स्कूल की दिवार तोड़ी गई उसका  उच्चीकरण स्थानीय विधायक  जनरल टी.पी.एस रावत द्वारा 2006-07 में किया गया था और उसके बाद नौंवी एवं दसवीं की कक्षाएं केवल एक साल ही चली। परन्तु इसके बाद मेजर जनरल भुवन चन्द्र खंडूरी की सरकार ने रहस्यमय ढ़ग से इस सरकारी  स्कूल का उच्चीकरण बंद करा दिया। 2008 में पुनः जूनियर हाई स्कूल बना दिया श्री खंतवाल के अनुसार इस सरकारी स्कूल के खुलने से यहां के गरीब बच्चे जो इस प्राइवेट स्कूल की मंहगी फीस देने में असमर्थ होने के कारण हाई स्कूल नहीं कर सकते थे वे भी इस स्कूल में पढ़ कर दसबीं पास कर सकते थे। परन्तु न जाने क्यों जनरल खंडूडी की सरकार ने इस गरीबों की आशा का सूर्य बने इस विद्यालय का उच्चीकरण रद्द कर दिया। राज्य आंदोलन के साथी श्याम प्रसाद खंतवाल का कहना है कि लोगों में यह धारणा फेली हुई है कि इस प्राइवेट स्कूल के हितों की रक्षा के लिए यह सरकारी स्कूल बंद कर गरीब बच्चों के भविष्य के साथ खिलवाड़ किया गया। गौरतलब है कि इस प्राइवेट स्कूल में वर्तमान में भी 100 से कम छात्र है। स्वयं सरकारी नीतियों के कारण बेरोजगारी का सितम झेल रहे श्याम प्रसाद खंतवाल अपनी बच्ची को इस स्कूल में दाखिला दिलाने व उसकी फिस माफी के लिए गुहार लगायी जिसे स्कूल प्रशासन ने ठुकरा दिया। श्याम प्रसाद खंतवाल ने कहा कि एक तरफ खंडूडी सरकार ने सरकारी स्कूल बंद किये वहीं आम आदमी को प्राइवेट स्कूल में मोटी फीस देने के लिए मजबूर किया जा रहा है। यहां के गरीब आदमियों के पास धनाभाव के कारण बच्चों की 100 रूपये फीस भी देना बड़ा भारी होता है। श्री खंतवाल के अनुसार चुनावी आचार संहिता के अनुसार इस स्कूल में मैदान बनाने का काम किया गया जिसमें सरकारी स्कूल की दिवार तोड़ दी गयी।  सबसे चैकान्ने वाली बात यह है कि इस प्राइवेट स्कूल को किस ने 50 लाख रूपये अनुदान देने का काम किया। स्वयं राज्य आंदोलनकारी खंतवाल ने इस पूरे प्रकरण की शिकायत जिलाधिकारी पोड़ी को लिखित में करते हुए सरकारी स्कूल व पुराने रास्ते को ध्वस्थ करने वाले प्रकरण को उजागर किया वहीं इस प्राइवेट स्कूल के हित साधने के लिए दिये गये 50 लाख रूपये के अनुदान करने वाली संस्था की जांच की मांग की। इसी प्रकरण से प्रदेश के हुक्मरानों द्वारा आम जनता के हितों को अपने निहित स्वार्थो के लिए खिलवाड करने वाला प्रकरण भी उजागर हुआ।
 इस स्कूल के प्रांगण में बिल्कुल स्कूल के कमरों के दरवाजों के साथ-साथ गाड़ी मोटर, एवं गांव के घोडे़ खच्चर आदि पशुओं और आम जनता का आना-जाना स्कूल के अंदर से लगातार हो रहा है। जबकि जनता इस स्कूल के उच्चीकरण की मांग करती आ रही है। प्राईवेट स्कूल में गरीब जनता द्वारा बच्चों को पढ़ाना बड़ा मुश्किल है। एक तरफ तो सरकार गरीब बच्चों को निःशुल्क शिक्षा देने कि लिए करोड़ों रूपये खर्च कर रही है और दूसरी तरफ प्राईवेट स्कूलों का बढ़ावा दे रही है। यह स्कूल इस बात का प्रमाण है। इसके साथ-साथ गांव में आने-वाला पुराना रास्ता भी ध्वस्त कर दिया गया। जिस पर लाखों रूपये कुछ समय पहले दुरस्त करके के लिए लगाये गए थे। उसे मलबे में दबा दिया गया।
पिछले सप्ताह मैने उत्तराखण्ड कांग्रेस के अध्यक्ष यशपाल आर्य से दिल्ली के उत्तराखण्ड निवास में भैंट करते हुए प्रदेश सरकार आने पर प्रदेश की राजधानी गेरसैंण, मुजफरनगरकाण्ड के अभियुक्तों को दण्डित कराने, प्रदेश की जमीनों को कोडियों के भाव उद्योग व एनजीओं को लुटवाने, भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने व प्रदेश की पटरी से उतर चूकी शिक्षा व्यवस्था को पटरी पर लाने के लिए सरकारी सेवा केवल उन्हीं को मिलेगी जो सरकारी स्कूलों से पढ़ेंगे और अध्यापकों के बच्चे सरकारी स्कूलों में पढ़ाये जाने का कड़ा कानून बनाने की मांग की। इस दौरान यमुनौत्री से कांग्रेस विधायक केदारसिंह रावत व सर्वोच्च न्यायालय के वरिष्ठ अधिवक्ता भी उपस्थित थे। इन सभी बिन्दुओं पर यशपाल आर्य ने सहमति प्रकट करते हुए प्रदेश की बदहाली को दूर करने के लिए मजबूत कदम उठाने का आश्वासन दिया। हाल में सूचना के अधिकार के तहत कार्यकत्र्ता एस एस नेगी को मिली सरकारी जानकारी के अनुसार प्रदेश के 14847 प्राथमिक विद्यालयों में कार्यरत 34 हजार प्राथमिक अध्यापकों में से केवल 1617 बच्चे ही सरकारी स्कूलों में पढ़ रहे है। इससे सहज अनुमान लगाया जा सकता हे कि प्रदेश में शिक्षा की स्थिति दिन प्रति दिन क्यों बदहाल हो रही है। उत्तराखण्ड में 14847 प्राइमरी, 4067 जूनियर हाई स्कूल,, 837 हाई स्कूल और 1118 इण्टर कालेज हैं । सुत्रों के अनुसार जिनमें कुल 11783 शिक्षकों के पद खाली है। हाई स्कूल तथा इण्टर कालेजों में गणित, विज्ञान और अंग्रेजी जैसे विषयों के शिक्षक नहीं है। सबसे चैकान्ने वाले तथ्य यह है कि राज्य में हर साल लगभग 25 हजार बच्चे स्कूल छोड़ रहे हैं। सन 2009 से लेकर 2011 तक कुल 15665 प्राइमरी स्कूलों के 1084624 विद्यार्थियों में से 21309 ने स्कूल छोड़ दिया। केवल हरिद्वार में ही दो वर्षों में प्राइमरी स्कूलों में बच्चों की संख्या में बढोत्तरी हुई है। सवाल यह है कि भारत में कभी जिस उत्तराखण्डी शिक्षा का सिक्का कायम था आज वह कैसे पटरी से उतर गया। राज्य के शिक्षा विभाग से एक सूचना के अधिकार के तहत  समाजसेवी एस एस नेगी को मिली जानकारी समाचार पत्रों द्वारा सार्वजनिक हुई उसके अनुसार राज्य के कुल 34 हजार प्राइमरी शिक्षकों के केवल 1617 बच्चे ही प्राइमरी स्कूलों में पढ़ रहे हैं। इससे स्पष्ट है कि उन्हें अपने एवं अपने समकक्ष अध्यापकों की योग्यता पर भरोसा नहीं है। यही वजह है कि अधिकांश सरकारी स्कूलों के अध्यापक केवल रोजगार की मजबूरी में स्कूलों में पढाघ् तो रहे है परंतु अपने बच्चों को वहां पढाने से परहेज कर रहे हैं।  जिले बागेश्वर में शिक्षकों केसबसे कम 29 बच्चे सरकारी स्कूलों में पढ़ रहे हैं। इसके बाद रुद्रप्रयाग में 45, देहरादून में 95, हरिद्वार में 115, अल्मोडा में 195, ऊधम सिंह नगर में 179, चमोली में 167, पौडी में 177, पिथौरागढ़ में 241 और नैनीताल में शिक्षकों के 225 बच्चे सरकारी विद्यालयों में पढ़ रहे हैं।  इसके अलावा केन्द्र सरकार के सर्वशिक्षा अभियान समेत विभिन्न प्रयासों के बावजूद राज्य में हर साल लगभग 25 हजार बच्चे स्कूल छोड़ रहे हैं।
अगर प्रदेश में विधानसभा चुनाव के बाद प्रदेश की सरकार ने इस गंभीर विषय पर कोई ठोस कदम उठाते हुए प्रदेश में शिक्षा व्यवस्था को सुधारने के लिए युद्ध स्तर पर काम नहीं किया तो आने वाले समय में स्थिति सरकार के काबू से बाहर हो जायेगी।
प्रदेश सरकार को प्रदेश की आम गरीब जनता के हित में एक कानून स्पष्ट बनाना होगा कि प्रदेश के सरकारी शिक्षकों, जनप्रतिनिधियों व सरकारी कर्मचारियों को जहां अपना बच्चा सरकारी स्कूल में ही पढ़ाना होगा। वहीं प्रदेश की सरकारी नौकरी में उन्हीं प्रत्याशियों को वरियता दी जायेगी जो सरकारी विद्यालयों से पढ़े हो। अगर ये दोनों कानून बन जायेगे तो प्रदेश की पटरी से नीचे उतर चूकी शिक्षा व्यवस्था चमत्कारिक रूप से जींदा हो जायेगी। असनखेत स्कूल प्रकरण व प्रदेश के अध्यापकों के खुद के बच्चे सरकारी स्कूलों में न पड़ने वाली घटना भले अलग अलग हो परन्तु इसकी कडियां जोड़ कर जो तस्वीर बनाती है वह प्रदेश कीपटरी से उतर चूकी शिक्षा व्यवस्था की हकीकत को बयान करती है। शेष श्रीकृष्ण कृपा। हरि ओम तत्सत्।

पत्रकार चंद्रिका के हत्यारों को सजा देने की मांग

पत्रकार चंद्रिका के हत्यारों को सजा देने की मांग
मध्य प्रदेश में खनन माफियाओं द्वारा की गयी पत्रकार चंद्रिका व उनके पूरे परिवार की हत्या पर दिल्ली के पत्रकार व समाजसेवी भी दिल्ली में लामबंद हो कर दोषियों को शीघ्र गिरफार कर कड़ी सी कड़ी सजा देने की मांग कर रहे है। दिल्ली में संसद की चैखट पर 21 फरवरी को राष्ट्रीय धरना स्थल पर पत्रकार देवसिंह रावत व अग्रणी समाजसेवी हरिराम तिवारी ने इस घटना की कड़ी भत्र्सना करते हुए मांग की कि अगर दोषियों को शीघ्र गिरफतार करने में प्रदेश की भाजपा सरकार असफल रहती है तो इसके खिलाफ दिल्ली में एक व्यापक आंदोलन छेड़ा। जायेगा। मजदूर नेता हरिराम तिवारी इस बात से उद्देल्लित थे कि जिस प्रकार से भ्रष्टाचारियों द्वारा देश के विभिन्न भागों में खुद को बचाने के लिए एक के बाद एक हत्यायें की जा रही है उससे पूरे देश की आम अवाम में आतंक व गुस्सा दोनो ंछाया हुआ है। श्री तिवारी ने कहा जिस प्रकार से उत्तर प्रदेश में मायावती सरकार में हुए शर्मनाक घोटालों में एक के बाद एक हत्यायें हो रही है वह काफी चिंता की बात हे। उन्होंने कहा कि सरकार जहां अपराध व भ्रष्टाचार पर अंकुश तो लगा नहीं पा रही है वहीं वह एक तरफ इस घोटालों को पर्दाफाश करने वालों व इन भ्रष्टाचारियों को बेनकाब किये जाने वाली महत्वपूर्ण सुत्रों को भी हटाया जा रहा है।  उन्होंने देश के तमाम लोगों से अपील की कि वे देश से भ्रष्टाचारियों व अपराधियों को मुक्त करने के लिए एकजूट हो कर इस प्रकार की हर हत्या करने वाले अपराधियों को सजा दिलाने के लिए आंदोलन में सम्मलित हो कर एक मजबूत भारत बनाने के लिए काम करें।

दिल्ली नगर निगम चुनाव में उत्तराखण्डियों ने भी कसी कमर


दिल्ली नगर निगम चुनाव में उत्तराखण्डियों ने भी कसी कमर

नई दिल्ली(प्याउ)। इसी साल होने वाले दिल्ली नगर निगम के चुनाव में दिल्ली में रहने वाले 30 लाख आबादी का प्रतिनिधित्व करने वाला बहुसंख्यक उत्तराखण्डी समाज भी दिल्ली नगर निगम के चुनाव में ताल ठोकेगे। दिल्ली प्रदेश की राजनीति में यहां पर बहुसंख्यक समाज व यहां के स्थापित समाज को एक प्रकार से राजनीति में ही नहीं शासन प्रशासन से दूर रखा गया हे। इसका अहसास इस बात से ही हो जाता है कि यहां पर दिल्ली सरकार में आसीन कांग्रेस सरकार में शीला दीक्षित के मत्रीण्डल में उनके अपने समाज के अलावा दिल्ली के अन्य समाज का प्रतिनिधित्व ना के बराबर है। ऐसा ही कभी भाजपा के शासनकाल में होता था। दिल्ली में दो दशकों से यहां की राजनीति में अन्य समाजों में जबसे खुद की भागेदारी की भावना जागृत हुई उसके बाद दिल्ली का राजनैतिक समीकरण बदल गया है। क्या कारण है कि 1.50 करोड़ जनसंख्या वाली दिल्ली में 30 लाख जनसंख्या का प्रतिनिधित्व करने वाले उत्तराखण्डी समाज को हाशिये में धकेला जाता है। इसके लिए जहां यहां पर दिल्ली देहात, उत्तराखण्डी, पूर्वांचली लोगों की उपेक्षा का कारण साफ है कि यहां के आर्थिक सम्राज्य पर इन समाज का बर्चस्व ना के बरा बर रहा। अब जब से लोगों में चेतना जागृत हुई, तब से इन समाजों को हिस्सेदारी देने देने का झांसा अधिकांश दल कर रहे हैं। जहां तक उत्तराखण्डी समाज में अब नैतृत्व उभर रहा है। जहां भाजपा में प्रथम विधायक व जिलाध्यक्ष रहे मुरारी सिंह पंवार, तीन बार से दिल्ली में निरंतर विधायक रहने वाले मोहनसिंह बिष्ट, दिल्ली प्रदेश के सचिव वीरेन्द्र जुयाल, पार्षद जगदीश मंमगाई, लक्ष्मी धस्माना, ऊषा शास्त्री व पार्षद हरीश अवस्थी जेसे स्थापित हो चूके नेता हैं वहीं कांग्रेस में दिल्ली में पहली बार कांग्रेस में जिलाध्यक्ष बने उत्तराखण्डी नेता लक्ष्मण सिंह रावत, दो बार विधायक की टिकट ले चूके दीवान सिंह नयाल, पार्षद मुकुंदीराम भट्ट, दिल्ली प्रदेश पीसीसी के सदस्य एम एस रावत, दिल्ली प्रदेश के सचिव हरिपाल रावत, व प्रदेश महिला कांग्रेसी उमा भट्ट जैसे नाम हैं।
इस सप्ताह मुझे मयूर बिहार से कांग्रेसी नेता रावत व कालका जी से बाली मनराल ने कांग्रेसी टिकट की दावेदारी करने का ऐलान किया। रविवार 19 फरवरी को रात को कालका जी से दूरभाष से वहां पर रहने वाले अग्रणी समाजसेवी सुरेश काला जी ने कहा कि कालका जी में बहुसंख्यक उत्तराखण्डी समाज भी इस साल होने वाले नगर निगम के चुनाव में मजबूती से दावेदारी करेगा। कालका जी क्षेत्र में कई सालों से गढ़ कुमाउ बदरीकेदार समिति के बैनरतले यहां का समाज एकजूट है। यहां पर राज्य आंदोलन के अग्रणी आंदोलनकारी रामप्रसाद पोखरियाल व बाली मनराल समाज की इस भावना का प्रतिनिधित्व करने के लिए तैयार है। दोनों में से जिसको भी कांग्रेस अपना प्रत्याशी बनायेगी उसके समर्थन में पूरा समाज लामबंद हो जायेगा। इसी ही तेयारी इन दिनो भाजपा के नेता भी कर रहे है। इस दिशा में भाजपा व कांग्रेस में समाज के कई उभरते हुए लोग जुड़े हुए है जो इस समय पार्षद की दावेदारी कर सकते है। भाजपा में जहां मयूर बिहार क्षेत्र में डा विनोद बछेती तो । कांग्रेस से नई दिल्ली क्षेत्र से बृजमोहन उपे्रेती जैसे युवा भी चुनावीं दंगल में उतर सकते हैं।
हालांकि दिल्ली विधानसभा चुनाव में कांग्रेस व भाजपा ने दिल्ली की राजनीति में उपेक्षित पड़े इस समाज को एक प्रकार से नजरांदाज किया हुआ है। भाजपा ने हालांकि टिकट देने में कांग्रेस को गत चुनावों की तरह करारी मात दी है। वहीं दिल्ली में पहला उत्तराखण्डी विधायक भी मुरारी सिंह पंवार भी भाजपा से ही रहे। वहीं दिल्ली में वर्तमान तीन कार्यकाल से करावल नगर विधानसभा सीट से निरंतर भाजपा के विधायक के रूप में उत्तराखण्डी समाज का एकलोता वर्तमान विधायक मोहनसिंह बिष्ट है। वहीं पार्षद के रूप में दिल्ली में जहां खुशहालमणि घिल्डियाल ही सबसे लम्बे समय तक उत्तराखण्डियों का प्रतिनिधित्व करते रहे। आज भाजपा में आधा दर्जन के करीब निगम पार्षद हैं इनमें जगदीश ममगांई, हरीश अवस्थी,लक्ष्मी धस्माना, ऊषा शास्त्री सतेश्वरी जोशी, नीमा भगत, कांग्रेस से केवल मुकुन्दी राम भट्ट, हालांकि दिल्ली की राजनीति में सबसे अहम् पद पर कांग्रेस वरिष्ठ नेता व दिल्ली के शिक्षा मंत्री के रूप में प्रतिष्ठित रहे साफ छवि के नेता कुलानन्द भारतीय आसीन रहे। जो सम्मान दिल्ली की राजनीति में कुलानन्द भारतीय को सभी राजनेतिक दलों व समग्र उत्तराखण्डी समाज में मिला वह सम्मान आज तक कोई राजनेता हासिल नहीं कर पाया।
वेसे दिल्ली में उत्तराखण्डी समाज को जो मजबूती व अपनत्व दिल्ली नगर निगम के सर्वशक्तिमान कमीश्नर बहादूर राम टम्टा ने दी, वह किसी दूसरे नेता व नौकरशाह को आज तक हासिल नहीं हुई। बहादूर राम टम्टा ने न केवल कमीश्नर रहते हुए उत्तराखण्डी लोगों को संरक्षण दिया अपितु सेवानिवृत के बाद पृथक उत्तराखण्ड राज्य गठन व इसके विकास के लिए समाज का नेतृत्व भी किया। हालांकि दिल्ली पुलिस में कमीशनर हीरा सिंह बिष्ट व शिक्षा विभाग में बीडी भट्ट जी के योगदान को आज भी उत्तराखण्डी समाज मुक्त कण्ठों से सराहना करते है। इसके साथ दिल्ली में उत्तराखण्डी समाज के कार्यरत लोगों में शिक्षा के प्रसार के लिए आचार्य जौधसिंह रावत तथा घरेलू कर्मचारियों के अधिकार के लिए संघर्ष करने के लिए को लोग आज भी याद करते है।
सबसे हैरानी यह है कि दिल्ली में उत्तराखण्डी समाज के कई राष्ट्रीय नेता देश की राजनीति में विराजमान है परन्तु जो उत्तराखण्डी समाज को प्रतिनिधित्व दिल्ली प्रदेश की राजनीति में भाजपा व कांग्रेस में मिलना चाहिए था वह अभी तक नहीं मिली। इस बारे में लोगों में कई प्रकार की भ्रांतिया हैं कुछ लोगों का मानना है कि दिल्ली में उत्तराखण्ड समाज के नेताओं की अपने समग्र समाज के हित में न तो सोच समझ ही है व नहीं उनका दिल्ली की राजनीति में पकड़ ही है। वहीं दूसरी तरफ कुछ लोगों का मानना है कि दिल्ली में इसीलिए उत्तराखण्डी नेता समाज के लोगों को इसलिए मजबूत नहीं करना चाहते हैं कि इससे उनको अपने अस्तित्व पर खतरा नजर आता। इसके अलावा दिल्ली के मजबूत उत्तराखण्डी नेताओं का यहां से उत्तराखण्ड पलायन जैसे अदूरदर्शी सोच भी काफी हद तक जिम्मेदार मानी जा सकती। उत्तराखण्ड बनने पर दिल्ली में राजनीति करने वाले मजबूत उत्तराखण्डी नेताओं जो यहां दिल्ली की राजनीति में भी अपने दिलों में जाने पहचाने ही नहीं स्थापित नाम रहे उनका उत्तराखण्ड की राजनीति में स्थापित होने का मोह भी दिल्ली में उत्तराखण्डी समाज में वर्तमान में नेतृत्व शून्यता का महत्वपूर्ण कारण रहा है। खासकर दशकों तक भाजपा के वरिष्ठ नेता व पार्षद रहे खुशहाल मणि घिल्डियाल, राज रावत, तो कांग्रेस के मदन बिष्ट व धीरेन्द्र प्रताप नामों के अलावा नया नाम भाजपा की दीप्ती रावत का भी नाम है, जो अभी तक प्रदेश में स्थापित नहीं हो पायी। हालांकि इस दिशा में कोशिश भाजपा नेता उदय शर्मा, पूरण चंद नैनवाल ने भी किया। पूरण डंगवाल भी अभी तक उक्रांद, कांग्रेस होते हुए बसपा के सफर के बाबजूद सफल नहीं हुए। अगर ये लोग जो दिल्ली की राजनीति में अच्छी दखल रखते हैं दिल्ली में राजनीति जमीन पर साकार होने की कोशिश करते तो लगता है कि दिल्ली में ये यहां के अन्य नेताओं की अपेक्षा अधिक आसानी से स्थापित हो सकते थे। परन्तु सफलता केवल किशोर उपाध्याय व सुरेन्द्र जीना को विधायक बन कर प्रदेश की राजनीति में स्थापित होने की मिली। इसके अलावा अनैक नाम है। उसके अलावा हालांकि भाजपा ने इस मामले में कांग्रेस को काफी पीछे छोड़ दिया हे। इस सबसे हट कर दिल्ली की राजनीति में सबसे अधिक कब्जा कई दशकों से पंजाबी समाज का है। क्या भाजपा व क्या कांग्रेस , यही नहीं नौकरशाही में भी सारा दबदबा पंजाबी लाबी का हे। इसीकारण दिल्ली की अर्थव्यवस्था पर फलने फूलने का सबसे अधिक मौका भी पंजाबी समाज को ही मिला। आजादी से पहले पाकिस्तान बनने के बाद पाकिस्तान से आये पंजाब प्रांत के लोगों का भी दबदबा आज साफ दिल्ली की राजनीति में देखने को मिलता है। परन्तु आजादी के 65 साल बाद आज दिल्ली की जमीनी व राजनैतिक दोनों तस्वीर में आमूल परिवर्तन हो चूका है। आज दिल्ली केवल उत्तराखण्डियों या किसी अन्य समाज के नाम पर राजनीति नहीं की जा सकती है परन्तु यह भी सही है कि दिल्ली में रहने वाले बहुसंख्यक समाज हो या अल्पसंख्यक समाज किसी की भी उपेक्षा न तो अब की जानी चाहिए। लोकशाही का यही वरदान है यही प्राण है । दिल्ली एक लघु भारत है इसमें जाति धर्म के नाम से या क्षेत्र के नाम पर लोकशाही को बंधक बनाने की अब किसी को इजाजत नहीं दी जा सकती है। इसलिए भाजपा व कांग्रेस सहित तमाम दलों का पहला नैतिक दायित्व हे कि दिल्ली की राजनीति में सभी समाज, धर्म व भाषा के लोगों का बिना भेदभाव से उचित प्रतिनिधित्व प्रदान करने का अवसर दे। शेष श्रीकृष्ण कृपा। हरि ओम तत्सत्। श्रीकृष्णाय् नमो।

ईरान को तबाह करने से अमेरिका को रोक पायेगा नपुंसक विश्व?

ईरान को तबाह करने से अमेरिका को रोक पायेगा नपुंसक विश्व?
-परमाणु चैधरियों की दादागिरी से सहमा विश्व!

ईरान द्वारा किया गया परमाणु शक्ति प्रदर्शन के बाद अमेरिका व उनके मित्र राष्ट्र किसी भी कीमत पर अब ईरान को भी इराक, लीबिया व अफगानिस्तान की तरहज तबाह करने का मन बना चूके है। अमेरिकी मित्र किसी भी कीमत पर ईरान को अपने विरोध में सर उठाये खड़ा देखना नहीं चाहते। इस्राइल की सुरक्षा का हवाला दे कर ईरान को भी इराक व लीबिया की तर्ज पर कब्जा करके यहां के संसाधनों को जहां लूटने के लिए अपने प्यादों को यहां पर सत्तासीन किया जायेगा। यह दुनिया इराक व लीबिया पर हुए हमले की तरह ही नपुंसकों की तरह मूक रह कर विश्व सम्मान को रौंदने के इस कृत्य को देख कर अमेरिका की दया की भीख मांगेगी।
इसी पखवाड़े ईरान ने अपने परमाणु रिएक्टर में पहली बार देश में ही संवर्दि्धत परमाणु ईंधन रॉड लगाने का खुद ही विश्व के समक्ष जैसे खुलाशा किया अमेरिका सहित विश्व के स्वयंभू परमाणु चैधरियों ने ईरान को धमकाते हुए उस पर प्रतिबंध लगाने का ऐलान कर दिया। जहां ईरान अपने परमाणु कार्यक्रम को शांतिपूर्ण प्रयोग में लाने की बात कह रहा है वहीं परमाणु चैधरियों की जमात अपने अलावा पूरे विश्व में किसी को भी परमाणु शक्ति का किसी भी प्रकार का प्रयोग में लाने के अधिकार को ही सिरे से नकार रहे है। आज सवाल यह है कि क्या विश्व में कोई देश परमाणु शक्ति का मानवीय कल्याण के लिए उपयोग भी नहीं कर सकता। क्या इस कल्याणकारी ताकत का प्रयोग केवल पूरा विश्व इन स्वयंभू परमाणु चैधरियों की दया पर रहेगी। आखिर अमेरिका ब्रिटेªन, फ्रांस, रूस व चीन जैसे चैधरियों को किसने यह अधिकार दिया कि वे खुद तो पूरे विश्व को तबाह करने वाले हथियार रखे, पूरे विश्व की शांति नष्ट करें। सारे संसार में अपनी ताकत के बल पर गरीब व पिछडे देशों के संसाधनों की खुली लूट खसोट करे और अगर कोई अन्य देश अपने संसाधनों का व अपने सामथ्र्य से परमाणु शक्ति का कल्याणकारी उपयोग करता है तो उसको विश्व शांति का दुश्मन बता कर उसको रौंदने का काम करे। क्या संयुक्त राष्ट्र संघ इन परमाणु शक्ति सम्पन्न चैधरियों के हाथों का मोहरा है? जब भारत ने भी परमाणु ताकत हाशिल की थी तब भी इन स्वयंभू चैधरियों ने विश्व भर से भारत पर प्रतिबंध लगाया था। विश्व में अमन, ज्ञान व परम शांति का अनादि काल से संदेश देने वाले भारत पर प्रतिबंध लगाने वाले ये देश व इनका इतिहास ही पूरे विश्व की शांति को तबाह करने का है। खुद अमेरिका ने आतंकबाद के खात्मे के नाम पर आज अफगानिस्तान, ईराक, लीबिया ही नहीं विश्व के 75 देशों में अपनी ताकत के दम पर शांति को रौंद रखा हे। चीन के दमन से तिब्बती आज भी कराह रहे है। वहीं फ्रांस, रूस व ब्रिटेन के दमन के निशान आज भी विश्व में विद्यमान है। माना परमाणु बम विनाशकारी है। इसका दुरप्रयोग विनाशकारी है। परन्तु संसार में केवल इन परमाणु चैधरी ही इस हथियार को रखेंगे और नहीं, यह विधान बनाने वाले ये कौन होते है। ईरान पर परमाणु बम से इस्राइल को तबाह करने की बात कही जा रही है। ईरान के हुक्मरान दिमाग से पैदल भी नहीं है उन्हें मालुम है कि इस्राइल व उसके आका अमेरिका उसको पूरी तरह से तबाह कर देगे। पूरा अरब इस्राइल की शक्ति से त्राही त्राही कर रहा है। चंद अमेरिका द्वारा पोषित आतंकियो को छोड़ कर किसी की हिम्मत नहीं कि इस्राइल की तरफ आंख भी उठा सके। फिर पूरे विश्व में संभावित विरोधियों को सफाया करने की अमेरिका व उसके मित्र राष्ट्रो की प्रवृति किसी भी रूप में संसार में मान्य नहीं हैं ।  ईरान ने भी पश्चिमी देशों पर विज्ञान, विशेष तौर पर परमाणु तकनीक पर एकाधिकार जमाने का आरोप लगाया है। ईरान द्वारा परमाणु शक्ति सम्पन्न बनने वाले इस पूरे कार्यक्रम का जहां सीधा प्रसारण किया गया वहीं पूरे देश में ईरानियों ने इसे ईरानी गौरव के तौर पर आत्मसात किया।  ईरान के सरकारी टीवी चैनल से इस समारोह का सीधा प्रसारण दिखाया गया जिसमें ईरान के राष्ट्रपति ने कहा, ईरान ने 3000 नए सेंट्रीफ्यूज बनाए हैं और अधिकतर देश में बने हैं. बिना मदद के ईरान में ही हजारों वैज्ञानिक काम कर रहे हैं। ये पूरी मानवता की उपलब्धी है।  हम इन्हें अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी के निरीक्षण में रखेंगे और सभी सदस्यों से जानकारी को सांझा करेंगे.।
अमेरिकी व उनके समर्थकों पर कड़ा प्रहार करते हुए राष्ट्रपति अहमदीनेजाद ने कहा कि उन्होंने 80 अरब डॉलर एक परमाणु बम पर खर्च करते हैं और एक बम से पाँच लाख लोग मर सकते हैं। पश्चिमी देश कई बार पृथ्वी को ध्वस्त कर सकते हैं. क्या इसी को प्रगति कहते हैं? वे कहते हैं बात करना चाहते हैं. वे हमें मेज पर बुलाकर चाहते हैं कि हम हस्ताक्षर कर दें...क्या इसे बातचीत कहते हैं? उन्होंने जोर दे कर कहा कि ईरान का परमाणु कार्यक्रम केवल शांतिपूर्ण मकसदों के लिए है।वहीं अमेरिकी समर्थक लाबी को भय है कि ईरान इससे परमाणु हथियार बना कर इन्हें इस्राइल व उसके खिलाफ दुरप्रयोग करेगा। इसी कारण वह किसी भी प्रकार से ईरान को परमाणु शक्ति सम्पन्न होता देख नहीं सकता है। अमरीका और इसराइल ईरान पर परमाणु हथियार कार्यक्रम चलाने का आरोप लगाते हैं जबकि ईरान इसका खंडन करता है. हथियार बनाने लायक यूरेनियम कम से कम 85 प्रतिशत संवर्दि्धत होना चाहिए। ईरान ने घोषणा की है उसने परमाणु संवर्द्धन के प्रयासों में 3000 अतिरिक्त सेंट्रीफ्यूज लगाए हैं और अब उसके पास ऐसे 9000 परमाणु उपकरण हैं।
ईरान में 1979 में हुई इस्लामिक क्रांति के बाद विश्व को झकझोरने वाले इस समारोह में राष्ट्र के नाम संबोधन में ईरान के राष्ट्रपति महमूद अहमदीनेजाद ने अमेरिका और पश्चिमी देशों को घमंडी ताकतें हैं और उन्हें सबक सिखाना होगा ।  अपने संबोधन में राष्ट्रपति अहमदीनेजाद ने कहा कि परमाणु का मतलब सिर्फ बम ही नहीं होता। ईरान अपनी ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के लिए परमाणु कार्यक्रम पर आगे बढ़ रहा है और उसे अब रोका नहीं जा सकता। अहमदीनेजाद ने कहा कि हमने आईएईए (अंतर्राष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा संगठन) से मदद मांगी थी लेकिन उसने मदद नहीं की तो हमने खुद ही परमाणु ईधन विकसित कर लिया। ज्ञान और विज्ञान पर किसी एक देश का एकाधिकार नहीं हो सकता। ईरान आगे बढ़ रहा है और घमंडी ताकतें उसे अब नहीं रोक सकती। ईरान के खिलाफ दुष्प्रचार हो रहा है लेकिन उससे अब कुछ नहीं होगा। अमेरिका अब ताकतवर नहीं है, दुनिया अब बदल रही है, घमंडी ताकतों का एकाधिकार अब नहीं चलेगा।  इस धमकी के बाद अमेरिकी नौसेना अपने युद्धक बेड़ों के साथ हरमुज स्ट्रेट को पार कर आगे बढ़ गए। अमेरिका, इजराइल का मानना है कि ईरान एटमी हथियार बना रहा है। ये सारी तैयारी इजराइल पर हमले के लिए है। वहीं ईरानियों के अलावा कई तटस्थ लोगों का भी आरोप है कि यह सब अमेरिका सहित पश्चिमी देशों द्वारा ईरान के तेल भण्डारों पर भी ऐन केन प्रकार से कब्जा करने की कार्यवाही ही है। क्योंकि ईरान दुनिया का चैथा सबसे बड़घ तेल उत्पादक देश है। इराक, कुवैत के तेल कुओं पर कब्जे वाला फॉर्मूला अमेरिका यहां भी आजमाना चाहता है। लेकिन रूस, चीन और भारत का साथ नहीं मिलने की वजह से वह सीधी कार्रवाई नहीं कर पा रहा है। क्यों नाराज है ईरान ईरान पर एटमी तैयारियों का आरोप लगाते हुए अमेरिका के प्रभाव वाले यूरोपीयन संघ ने ईरान से तेल आयात पर प्रतिबंध लगा दिया था। दूसरी तरफ ईरान खुद ही यूरोपीय देशों ब्रिट्रेन, नीदरलैंड, इटली, स्पेन, यूनान, पुर्तगाल और फ्रांस की तेल आपूर्ति बंद करने का मन बना चूका है।
तेहरान में इस विश्व को उद्देलित करने वाले समारोह के दौरान पहली परमाणु संवर्दि्धत रॉड रिएक्टर में डालने के बाद राष्ट्रपति महमूद अहमदिनेजाद ने कहा, ईरान के खिलाफ कुप्रचार, प्रतिबंधों के प्रस्ताव और दबाव लाया गया लेकिन इससे ईरान को कोई फर्क नहीं पड़ा है. वे (पश्चिमी देश) नहीं चाहते की ज्ञान और प्रगति पूरी दुनिया तक फैले. जो देश तरक्की करना चाहता है उसे इन दबावों और रूकाबटों के खिलाफ लड़ना पड़ेगा.।पश्चिमी देशों पर ईरानी विज्ञानिकों की हत्या का आरोप लगाते हुए ईरानी राष्ट्रपति अहमदीनेजाद ने कहा, ‘समय बदल गया है...ये साम्राज्यों का समय नहीं है. लोग बदल गए हैं, संस्कृति बदल गई है. जब ईरान की बात होती है तो वे (पश्चिमी देश) कहते हैं सभी विकल्प खुले हैं. तो खुले हो...मेरी सलाह है कि वे अपना रुख बदलें...हमारे परमाणु कार्यक्रम का विरोध करना बंद करें.। वहीं ईरान के राष्ट्रपति महमूद अहमदीनेजाद ने घोषणा की है ईरान अपने कार्यक्रम के तहत इस्तेमाल किए जा रहे परमाणु उपकरणों को अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (आईएईए) के निरीक्षण के लिए रखेगा और आईएईए के सभी सदस्य देशों के साथ परमाणु जानकारी सांझा करेगा। गौरतलब है कि ईरान के अनुसार इन रॉड्स में 20 प्रतिशत संवर्दि्धत यूरेनियम ईंधन है. ईरान ने नई पीढ़ी के आधुनिक सेंट्रीफ्यूज इस्तेमाल करने की भी घोषणा की है जो पहले इस्तेमाल में लाए जाने वाले सेंट्रीफ्यूज से तीन गुना बेहतर हैं।
अब ईरान के लिए निर्णायक घडियों का सामना करने का समय है। देर न सबेर उसे इस्राइल ही नहीं अमेरिकी हमले का मुकाबला करना पडेगा। या तो अमेरिका सीधा हमला करेगा या ईरान में ही लीबिया व इराक की तरह विरोध को प्रायोजित करके ईरान को तबाह किया जायेगा। परन्तु अमेरिका अब किसी भी कीमत पर ईरान को इस रूप में देखने के लिए तैयार नहीं। आज रूस व चीन भले ही अमेरिका का विरोध कर रहे हैं परन्तु जब अमेरिका सीधा प्रहार करेगा तो ये दोनों देश किसी भी तरह उसका सीधा मुकाबला नहीं करेगे, इन दोनों की नपुंसकता इराक व लीबिया प्रकरण से पूरी तरह उजागर हो चूकी है। भारत जेसे देश में काबिज अमेरिकी परस्त नेतृत्व से इसकी आश भी करना मूर्खतापूर्ण होगा। शेष श्रीकृष्ण कृपा। हरि ओम तत्सत्। श्रीकृष्णाय् नमो।

Monday, February 20, 2012

टीपीएस ने लगायी भाजपा व कांग्रेस की सत्तालोलुपु आशाओं पर ग्रहण

टीपीएस ने लगायी भाजपा व कांग्रेस की सत्तालोलुपु आशाओं पर ग्रहण
देहरादून(प्याउ)। भले ही उत्तराखण्ड की राजनीति में कई राष्ट्रीय दिग्गज भाजपा व कांग्रेस में दशकों से राजनीति कर रहे हों परन्तु दोनों स्थापित दलों में अपने चंद समय की राजनीति में सेना से ले. जनरल के उच्च पद से सेवानिवृत के बाद राजनीति में आये तेजपाल सिंह रावत ने जो अपनी उपस्थिति जमायी, उससे आज भाजपा व कांग्रेस दोनों की सत्तालोलुपु आशाओं पर एक प्रकार का ग्रहण सा लग गया है। आज चुनाव परिणाम 6 मार्च को आयेगे परन्तु टीपीएस को अपने पाले में लेने के लिए जहां कांग्रेस में खुली जंग नेताओं में छिडी हुई हैं वहीं भाजपा में भी अंदर खाने में टीपीएस को फिर से भाजपा के समर्थन में खडे होने के लिए लामबंदी चल रही है।
    भले ही चुनाव परिणाम 6 मार्च को आयेगे परन्तु भाजपा की तरह अब कांग्रेस में भी मुख्यमंत्री के संभावित दावेदार अपने ही दल के संभावित विरोधी पर सीधे व परोक्ष रूप से वार करने से कतई हिचकिचा नहीं रहे है।  हालांकि भाजपा में तो चुनावी जंग में एक दूसरे को मुख्यरूप से खंडूडी व निशंक खेमे ने एक दूसरे की लुटिया डुबाने मे क्या कारनामे किये इसको प्रदेश के दिग्गज सहित भाजपा के आला नेताओं में भी एक दूसरे की कारस्तानी के पुलिंदा ये दोनों पंहुचा चूके है। इनके चुनाव परिणाम आने से पहले ही एक दूसरे पर आरोप प्रत्यारोप से हेरान आला कमान ने दोनो को दिल्ली बुला कर जो डपट लगाई की इन कागची शेरों की हवाई उडी हुई है।
वहीं अब कांग्रेस में लग रहा है सरकार उनकी बनेगी। एक दूसरे को चुनावी समर में ही पता साफ करने की रणनीति पर भले कांग्रेसी भाजपाईयों से पीछे केसे रहते तो उन्होंने भी कोई कसर नहीं छोड़ी। यही नहीं राहुल गांधी के उतारे गये अपने प्रत्याशियों के विरूद्ध भी कांग्रेस के बड़े नेताओं ने जिस प्रकार से विद्रोही उम्मीदवारों को खुली साहयता दी उससे आला कमाल काफी नाराज हे। यह नाराजगी इनको अपने मुख्यमंत्री बनने के मंसूबों पर ग्रहण लगाने वाला लग सकता हे। अब चुनाव परिणाम आने को एक पखवाड़ा ही रह गया तो सभी गोटियां बिठाने की रणनीति पर लगे हुए है। अपने संभावित समर्थक बन सकते निर्दलीयों से सम्पर्क साधा ही नहीं जा रहा है उनके समर्थन व विरोध में बयान बाजी भी की जा रही है। सबसे चैकाने वाला बयान उत्तराखण्ड विधानसभा चुनाव में राष्ट्रीय पार्टियों भाजपा व कांग्रेस को क्षेत्रीय ताकत बन कर नींद हराम करने वाले उत्तराखण्ड रक्षा मोर्चा के सभावित विजय होने वाले प्रत्याशियों को ले कर हो रही है। रक्षा मोर्चा अध्यक्ष रिटार्यड लेफ्टिनेंट जनरल टीपीएस रावत को कांग्रेस के पाले में खड़ा करने को लेकर जहां केंद्रीय राज्य मंत्री हरीश रावत तमाम तरह के बयान दे रहे हैं वहीं सतपाल महाराज उन्हें किसी तरह कांग्रेस में दोबारा शामिल करने के पक्ष में नहीं हैं।
इसी सप्ताह हरीश रावत ने टीपीएस रावत के पक्ष में बयान देकर टीपीएस को लेकर उठे बवाल को और भड़का किया है। जानकार जानते हैं कि समय बदलते केसे राजनेताओं का चेहरा व पसंद बदल जाती है। पहले टीपीएस महाराज के ही सिपाहे सलार थे, तिवारी सरकार के कबीना मंत्री थे, अपने ही मंत्री के खिलाफ सदन में जब हरीश रावत समर्थक लाबी ने बबाल खडा किया तो पूरे प्रदेश में कांग्रेस की आपसी लड़ाई जग जाहिर हो गयी। उसके बाद तिवारी व सोनिया की पहली पसंद टीपीएस को भांपते हुए सतपाल महाराज ही नहीं प्रदेश के अधिकांश कांग्रेसी नेताओं से टीपीएस के सम्बंध काफी दूर हो गये। हालत यह हो गयी कि उनको बड़ी मुश्किल से अपनी विधायकी सीट पर जीत हाशिल हुई। नेता प्रतिपक्ष के मुद्दे पर उन्होंनेे जिस प्रकार से हरकसिंह रावत को आसीन करने का दो टूक विरोध सोनिया गांधी से किया, जब सोनिया गांधी ने उनके विरोध को दर किनारे करते हुए हरकसिंह रावत को ही नेता प्रतिपक्ष बनाया तो विरोध स्वरूप टीपीएस रावत ने 2007 में कांग्रेस का विधायक होने के बावजूद उन्होंने धुमाकोट सीट भाजपा के मौजूदा मुख्यमंत्री भुवन चंद्र खंडूड़ी के लिए खाली कर दी और भाजपा का दामन थामा। सुत्रों का मानना है भाजपा खेमे में कोश्यारी गुट के प्रभाव में व खंडूडी को केन्द्र द्वारा थोपे जाने के कारण कोई भी भाजपा विधायक अपनी सीट छोड़ना नहीं चाहता था, इस कारण खंडूडी को छह माह के अंदर विधानसभा में विधायक निर्वाचित होने की समय सीमा खत्म होने पर जिस संकट से टीपीएस ने उबारा उसी का ईनाम भाजपा ने उनको 2009 में लोकसभा के उप चुनाव में उतारा। हालांकि टीपीएस सतपाल महाराज से पराजित हो गए। उसके बाद जब भाजपा में निशंक सरकार के भ्रष्टाचार के खिलाफ भाजपा नेतृत्व ने शर्मनाक मौन रखा हुआ था, खंडूडी व कोश्यारी को निशंक ने आला नेतृत्व को वशीकरण करके अपने मोह में ले लेने के बाद पार्टी व सरकार में पूरी तरह से अलग थलग फेक दिया था, ऐसे समय में फिर स्टार्जिया व जल विधुत घोटाले में घिरी भाजपा सरकार को कटघरे में खडा करते हुए टीपीएस ने अपने सिपाहे सलार राजेन्द्र भण्डारी व रघुवीर सिंह बिष्ट को लेकर जो जनांदोलन उत्तराखण्ड के अग्रणी लोक गायक नरेन्द्र सिंह नेगी व पूर्व प्रशासनिक अधिकारी सुरेन्द्रसिंह पांगती तथा जनरल रावत, काला व बहुगुणा सहित अनैक बुद्धिजीवियों को लेकर चलाया उससे भाजपा नेतृत्व घबरा गया। भाजपा नेतृत्व को इस बात से खंडूडी खेमे ने गुमराह किया कि ये सब खंडूडी के लोग है। अगर खंडूडी को मुख्यमंत्री नहीं बनाया गया तो प्रदेश से भाजपा का लोकसभा की तरह सफाया हो जायेगा।  अगर उस समय मुख्यमंत्री नहीं बदला जाता तो प्रदेश में भाजपा की संभावित शर्मनाक स्थिति शायद बच जाती। परन्तु उत्तराखण्ड की लोकशाही निशंक के प्रहारों से मर्माहित हो जाती।
इसी कारण भाजपा ने आनन फानन में विधानसभा के देहरी में खडे उत्तराखण्ड में अपना मुख्यमंत्री बदल कर न केवल प्रदेश की जनता को अपितु देश को भी चैंका दिया। वहीं निशंक को नेपेथ्य में डालने के बजाय निशंक को राष्ट्रीय उपाध्यक्ष जैसे ही बनाया टीपीएस के पास उत्तराखण्ड रक्षा मोर्चा बनाने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचा । इसी को लेकर टीपीएस ने पूरे प्रदेश में ऐसा झंझावत खडा किया कि उसकी आंधी में भाजपा कांग्रेस ही नहीं उक्रांद भी भयभीत हो गयी। चुनाव परिणाम भले ही कुछ रहे परन्तु टीपीएस ने एक संदेश प्रदेश में दे दिया कि केवल वही एक नेता है जो भाजपा व कांगे्रस की शिंकजे से जकडे उत्तराखण्ड को बचा सकता है।  लोकसभा चुनाव के बाद भाजपा ने खंडूड़ी की जगह निशंक को सीएम बनाया। इसके बाद भाजपा में टीपीएस को अहमियत मिलनी बंद हो गई। उसी समय टीपीएस ने भाजपा से अलग होकर रक्षा मोर्चा का गठन किया।
आज जहां सतपाल महाराज को इस बात का अफसोस है कि उत्तराखण्ड की राजनीति में टीपीएस को खडा करने व मंत्री बनाने के बाबजूद टीपीएस ने उनसे विश्वासघात किया। यही नहीं सतपाल महाराज को इस बात का भी काफी गुस्सा है कि हरीश रावत व टीपीएस रावत दोनों उनके परिवारिक मनमुटाव को हवा देने की राजनीति कर रहे है। उनका साफ मानना है कि एक दूसरे के परिवारिक विवाद को हवा देना किसी भी अर्थ में नैतिक नहीं है। वहीं हरीश रावत खेमे को इस बात की संतुष्टि है कि मुख्यमंत्री पद पर बनने के उनके प्रबल विरोधी सतपाल महाराज का एक मजबूत विरोधी को वे कांग्रेस में ला कर अपनी स्थिति मजबूत कर सकते हे। दोनों गुटों के बीच में अभी चुनाव परिणाम है। चुनाव परिणाम भले कुछ भी रहे परन्तु टीपीएस आज प्रदेश की राजनीति का ऐसा नाम हो गया है जिसके कारण भाजपा व कांग्रेस दोनों ही परेशान है। वहीं उत्तराखण्ड की जनता को टीपीएस के नेतृत्व में प्रदेश में एक ऐसा शसक्त मोर्चा देने की आश है जो भाजपा व कांग्रेस के शिकंजे से उत्तराखण्ड को मुक्ति दिला कर शहीदों के सपनों का उत्तराखण्ड बना सकते है। आज कांग्रेस में ही नहीं भाजपा में भी जनरल रावत के विद्रोह के मुद्दों को आज उनके तत्कालीन विरोधी भी सही ठहरा रहे है। जो विकल्प उक्रांद कई दशक बाद भी नहीं दे सका वही विकल्प रक्षा मोर्चा ने छह माह में उत्तराखण्ड के लोगों में आशा जागृत कर दी।

Sunday, February 19, 2012

शिवमहारात्रि का परम कल्याण का दिव्य रहस्य

वन्दे उमापतिं सुरगुरुं वन्दे जगत्कारणम् ।
वन्दे पन्नगभूषणं मृगधरं वन्दे पशूनां पतिम् ।।
वन्दे सूर्य शशाङ्क वह्निनयन वन्दे मुकुन्द प्रियम् ।
वन्दे भक्तजनाश्रयं च वरदं वन्दे शिवं शङ्करम् ।।
शिवमहारात्रि  का  परम कल्याण का दिव्य रहस्य
अनन्तकोटी ब्रहमाण्ड का कल्याणकारी हरि हर के एकारूप भगवान शिव की पावन शिवमहारात्रि पर हम उनके पावन चरणों में हरपल नमन् करते हुए अपना शेष जीवन सबके कल्याण के लिए समर्पित करने का संकल्प लें। क्योंकि भगवान शिव की सच्ची पूजा व भक्ति उपवास, देवालय में पूजन कीर्तन ही नहीं अपितु इन सबसे बड़ कर है सृष्टि में हर जड़ चेतन को शिव रूप मानते हुए उनके कल्याण के लिए भगवान शिव की तरह अपने आप को हर पल समर्पित करना। सर्वभूत्हितेरता व वासुदेव सर्वम् यानी सभी जड़ चेतन को परमेश्वर का स्वरूप मानते हुए उनका सम्मान व उनके हित में सदैव रत रहना ही सवसे बड़ी तपस्या, भक्ति व पूजा तथा यही सबसे परम् धर्म है। भगवान, अल्ला, वाहे गुरू व ईसा का नाम या पूजन करके किसी दूसरे जीव से धृणा, शोषण, दमन, हत्या व दुख देना ही सबसे बड़ा ईशद्रोह है। यही सनातन धर्म है। यही धर्म का सार है। आओ हम इसस परम सत्य को आत्मसात करके शेष जीवन को आनन्दमय बनायें। यह ध्यान रहे मनसा, वाचा व कर्म से किसी का अहित करना भी हिंसा व सबकी खुशी में अपनी खुशी देखना ही सबसे बड़ी पूजा है। दूसरों का शोषण करके व दूसरों का हित मार कर धर्नाजन व संग्रह करने वाले सबसे बड़े अपराधी है। आओ इसी पल हम सब संकल्प लें न हम इसी पावन पर्व के इसी पल से संकल्प लें की न हम किसी से अन्याय करेंगे व नहीं किसी पर भी हो रहे अन्याय को सहन करेंगे। यही सदाचार है यही परमधर्म है। इसी से भ्रष्टाचार, अज्ञानता, राग द्वेष, हिंसा सभी मिटेगी और इसी से परम कल्याणकारी रामराज्य की स्थापना होगी। -देवसिंह रावत (शिवरात्रि 20 फरवरी 2012, प्रातः 9बजे)

Saturday, February 18, 2012

देश व समाज से विश्वासघात है अन्याय को मूक सहना

देश व समाज से विश्वासघात है अन्याय को मूक सहना
विरोध हमेशा नीतिगत व संस्कारित ही नहीं  सत्य पर आधारित मर्यादित होना चाहिए, जो व्यवहार हम दूसरों से अपने साथ किये जाने पर सहज ही स्वीकार नहीं कर सकते हैं उसी प्रकार का व्यवहार हमें किसी दूसरे के साथ कभी नहीं करना चाहिए। सत्य व नैतिकहीन कृत्य हमेशा मानव को पथभ्रष्ट बना कर पूरी व्यवस्था को आरजकता के गर्त में डालता है। इसी के साथ सत्य व अन्याय को निहित स्वार्थ के साथ मूक रह कर सहना भी कायरता के साथ अधर्म है। यह देश समाज के साथ विश्वासघात ही नहीं उसकी नींव पर कुठाराघात करना भी है। - देवसिंह रावत www.rawatdevsingh.blogspot.com

पत्रकार ही नहीं पत्रकार संस्थान व जनता भी जिम्मेदार है पत्रकारिता के पतन के लिए

पत्रकार ही नहीं पत्रकार संस्थान व जनता भी जिम्मेदार है पत्रकारिता के पतन के लिए 
आज ईमानदार पत्रकार व निष्पक्ष लिखने वाले पत्रकार की किसी भी समाचार पत्र में कोई जगह नहीं हे। आज समाचार पत्र या चैनल का मालिक पत्रकारिता के लिए समर्पित या देश-समाज, लोकशाही, नैतिकता व जनहित की रक्षा के लिए नहीं अपितु अपना व्यापार, प्रभाव व दौलत बढ़ाने के लिए पत्रकारिता को अपना मोहरा बनाना चाहता है। ऐसी स्थिति में उसे अपने व्यवसाय व प्रभाव को बढाने वाले नेताओं, नौकरशाहों व उद्यमियों का भरपूर दोहन करने वाले चाटुकार चाहिए होता है न की निष्पक्ष लिखने वाले कलम के सिपाई पत्रकार की जरूरत होती है। अगर ऐसे व्यापारी को भय होता है कि अगर उसने सही खबरे प्रकाशित अपने समाचार संस्थान में प्रकाशित करायी तो व्यवस्था भी उसके तमाम अवैध कारोबार की कमर तोड़ सकती है। इसलिए आज पत्रकारिता में पत्रकारों की नहीं चाटुकारों व दोहन करने वालों को ही स्थान दिया जाता है। इसीकारण आज दम तोड़ चूकी व्यवस्था में भी धारदार पत्रकारिता किसी भी स्थापित समाचार जगत में नहीं दिखाई दे रही है।
भ्रष्टाचार की प्रतीक सरकारी विज्ञापनों को ही अगर बंद कर दिया जाय तो देश में पत्रकारिता में एक प्रकार से 99 प्रतिशत भ्रष्टाचार पर अंकुश लग जायेगा। सरकारी विज्ञापन की आड़ में देश में भ्रष्टाचार की आंधी चल रही है। इसलिए सरकारी विज्ञापन को अविलम्ब बंद कर दिया जाय और डीएबीपी के तमाम कर्मचारियों व उनके रिश्तेदारों के समाचार पत्रों की जांच करने के साथ इनकी सम्पति की भी जांच की जानी चाहिए।
आज समाज के पतन के लिए लोग ही जिम्मेदार हैं जो लोग सही अर्थोेे में कहीं ईमानदारी से पत्रकारिता करना च.ाहते हैं उनको न तो कोई संस्थान नौकरी देना चाहता है व अगर कोई अपना अखबार ही निकाल कर इस दिशा में मजबूती से कदम उठाये तो समाज उसको न तो सहारा देता है व साथ। जब ईमानदारी से काम करने वाला पत्रकार समाज के लिए अपना सबकुछ दाव पर लगाकर समाज द्वारा अपनी उपेक्षा व दलाल टाइप के पत्रकारों व भ्रष्टाचारियों को सम्मान करते हुए देखता हे तो उसका साहस जवाब दे देता है। बहुत कम ही ऐसे लोग निकल पाते हैं जो पूरी कुव्यवस्था से टकरा कर अपने आप को तबाह करने का जोखिम लेते है। भ्रष्ट पत्रकारिता के लिए नेता, नौकरशाह व समाजचार जगत से अधिक जनता भी जिम्मेदार है। अगर जनता सही पत्रकार का सम्मान करना व साथ देने का काम करे तो देश में भ्रष्टाचार का खात्मा होने में देर नहीं लगेगी। ईमानदार व मूल्यों के लिए अपने आप को दाव पर लगाने वाला पत्रकार जब समाज से उपेक्षा व असहयोग पाता है तो उसकी संघर्ष करने की शक्ति कुंद हो जाती है।

Friday, February 17, 2012

खुदा का नाम हो

खुदा करे की तुम्है ं हर एक मुकाम हासिल हो,
जुबाॅं पर तेरे ऐ दोस्त सदा खुदा का नाम हो
जब याद आये मेरी तो तेरे लबों पर मुस्कान हो
मिले कभी भी जिन्दगी में तो हम अंजान से न हों
- देवसिंह रावत (18 फरवरी 2012 प्रातः 9 बजे)

आजादी के सूर्यादय के लिए तरसता भारत



आजादी के सूर्यादय के लिए तरसता भारत
आखिर 15 अगस्त 1947
से गंगा और यमुना का
कितना पानी गंगा सागर में
मिल चूका है पर
हम आजादी को हासिल
करके के कई दशकों बाद भी,
भारत आजादी के सूर्यादय के लिए
दशकों बाद भी तरस रहा है
भारत अपने नाम व जुबान का भी
अपने ही देश में तरस रहा है।
आजादी के नाम पर मिली देश को
इंडिया, इंग्लिश व इंडियागेट की गुलामी
 हम इतने महान आज हो गये कि
भारत को भारत कहने के लिए भी
अपने ही देश में तरस गये
गुलामी के मोह में इतने
इतने नपुंसक बन गये है हम
आज भी वंदेमातरम् कहने वाले भी
बच्चों को टाई पहनवा कर
देशप्रेम में गुलामी का पाठ पढ़ा रहे हैं
हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान का जाप करके
सत्ता की चैखट पर नाक रगड़ने वाले भी
इंडिया इंज साइंनिग व राइजिंग नाव
कह कर अपनी पीठ खुद थपथपा रहे हैं
इंडिया, इग्लिश व इंडिया गेट का गीत
गा कर महारानी को सलाम ठोक रहे हैं
माना फिरंगी के प्यादों ने बनाया हमे गुलाम
पर स्वयं सेवक भी क्यों बन गये सियार।
आज भारत को आजाद करना है
इन कालनेमियों व फिरंगियों के प्यादे से
भारत को जो इंडिया बोले ऐसे गुलामों से
जो शहीदों की शहादत को अपमान करे
ऐसे राष्ट्रमण्डल के दुलारे स्वानों से
देश पर फिरंगी कलंक लगाने वालों से
-देवसिंह रावत (18 फरवरी 2012 प्रातः 9.53 बजे)

Thursday, February 16, 2012

उत्तराखण्ड में उप मुख्यमंत्री पद बनाना अव्यवहारिक व अनावश्यक है

उत्तर प्रदेश जेसे बडे राज्य में भी उप मुख्यमंत्री नहीं बनाये जाते । फिर उत्तराखण्ड जैसे छोटे व विकास के लिए तरसते हुए राज्य में उप मुख्यमंत्री पद बनाना अव्यवहारिक व अनावश्यक है। ऐसे खबरों को न कान दें व न प्रचार करें। इनकी बात पर प्रतिक्रिया करना ही इनकी मंशा को हवा देना है। प्रदेश में ऐसे कोई नेता नहीं चाहिए जो क्षेत्र, जाति व धर्म के नाम पर राजनीति करें व प्रदेश के शासन व भविष्य को तबाह करे। उत्तराखण्ड के लोगों ने उत्तराखण्ड राज्य की मांग की किसी को प्रदेश लूटने के लिए राजनीति करने के लिए। जिनको गैरसैंण राजधानी बनाने से वहां पर सुविधाओं का अभाव लगता है उनकी उत्तराखण्ड की राजनीति व शासन में एक पल की भी जरूरत नहीं है। उत्तराखण्ड के मूल हितों के खिलाफ क्षेत्रवाद व जातिवाद तथा दलगत की अंध समर्थन करने वाले उत्तराखण्ड में एक इंच भी जगह नहीं है। वे माफ करें उत्तराखण्ड को।

खंडूडी को हराने पर सोनिया बना सकती है सुरेन्द्र नेगी को मुख्यमंत्री

खंडूडी को हराने पर सोनिया बना सकती है सुरेन्द्र नेगी  को मुख्यमंत्री
प्यारा उत्तराखण्ड। कोटद्वार विधानसभा सीट से कांग्रेस के वरिष्ठ नेता व पूर्व मंत्री सुरेन्द्र सिंह नेगी ने वर्तमान मुख्यमंत्री भुवनचंद खण्डूडी को चुनावी समर में हरा दिया तो कांग्रेस आलाकमान उनको प्रदेश का मुख्यमंत्री बना सकते है। गौरतलब हे कि कोटद्वार के 30 जनवरी को हुए चुनाव में कांग्रेस के जमीनी नेता सुरेन्द्रसिंह नेगी ने भाजपा प्रत्याशी भुवनचंद खडूडी को ऐसी कड़ी टक्कर दी कि भाजपा को पूरा चुनाव प्रचार प्रदेश के हितों व मुद्दो से हटा कर केवल खंडूडी है जरूरी का राग छेडने के लिए मजबूर होना पड़ा। हालत थी कि खण्डूडी हर हाल में यहां से विजय होने के लिए पूरा तंत्र भी जिस प्रकार से झोंका हुआ था उससे वहां जनता में भारी आक्रोश था और कई बार टकराव हुआ। शराब व धनबल का खुला दुरप्रयोग करने के अलावा यहां पर शराब के मामले में भाजपा का एक नेता भी पकड़ा गया। खुपिया सुत्र व निष्पक्ष सर्वेक्षण भी इस सीट पर खण्डूडी की जीत पर संदेह प्रकट करते हुए यहां से कांग्रेस प्रत्याशी की विजय निश्चित मान रहे है। इसी आशंका से भयभीत होकर खण्डूडी समर्थकों ने यहां पर भाजपा के नेता निशंक पर भीतरघात का आरोप लगाया। चुनावी समीक्षकों को खण्डूडी खेमे के इस विलाप से अधिक कोटद्वार जेसे विधानसभा सीट से जो सुरेन्द्र सिंह नेगी का मजबूत किला था वहां से चुनावी दंगल में उतर कर अपनी सीट को खतरे में डालने की खण्डूडी की राजनैतिक निर्णय पर आश्चर्य है। परन्तु प्रदेश के चुनावी विशेषज्ञों को इस बात की आशंका है कि कहीं हारी हुई चुनावी जंग का पाशा पलटने के लिए खण्डूडी जी पोस्टल वोट का सहारा पहले की तरह न ले लें । हालांकि कांग्रेस ने इस समय पोस्टल वोट पर चुनाव आयोग से गुहार लगा कर पहले की तरह खुला नहीं छोड़ा हुआ है।
जहां तक प्रदेश में हुए चुनाव में भारी मतदान के बाद एक बात साफ उभर रही है कि प्रदेश में भाजपा सरकार का बोरिया विस्तर बंध चूका है। हाॅ मुख्यमंत्री कौन बनेगा। मुख्यमंत्री की दौड़ में कांग्रेस में दो ही प्रमुख मजबूत दावेदार है हरीश रावत व सतपाल महाराज। हालांकि इस दौड़ में यदाकदा हरकसिंह रावत, यशपाल आर्य, विजय बहुगुणा, इंदिरा हृदेश व अमृता रावत का भी नाम उछाला जा रहा है। परन्तु 2014 में लोकसभा चुनाव की महता को देख कर कांग्रेस दागदार व अविश्वसनिय, लोगों पर दाव नहीं लगायेगी। हालांकि कई निहित स्वार्थ के लोग आम जनता की नजर में दागदार लोगों को आसीन कराने के लिए कांग्रेस आलाकमान को गुमराह करने की बात कर रहे है। परन्तु आला कमान प्रदेश की भ्रष्टाचार रहित शासन प्रशासन की आश लगाने वाले बहुसंख्यक समाज को नजरांदाज करके दागदार लोगों को आसीन करने की धृष्ठता करना कांग्रेस को भी तिवारी, खंडूडी व निशंक को आसीन करने की भूल करने पर जनता द्वारा जनांदेश से दण्डित करने का खमियाजा 2014 के लोकसभा चुनाव में उठाना ही पडेगा। वेसे कांग्रेसी रणनीति के जानकारों को इस बात से हेरानी है कि अज्ञानी लोग ही कांग्रेस में मुख्यमंत्री के पद पर विवाद को हौव्वा बना रहे हैं या कुछ गैर कांग्रेसी रणनीति के लोग इसको लेकर चर्चा कर रहे है। कांग्रेस अगर बहुमत में आती है तो विधायक दल की बैठक में एक पंक्ति का प्रस्ताव पास होता है कि सभी विधायक एकमत से कांग्रेस आला कमान को विधानसभा मण्डल दल का नेता चुनने के लिए अधिकृत करता है। कांग्रेस नेतृत्व जिस को भी अपने विश्वास का काबिल समझता है उसे अपना भरत बनाती है। वैसे ही जेसे भाजपा नेतृत्व भी अधिकांश विधायकों की राय को नजरांदाज करके कोश्यारी या साफ छवि के नेता को मुख्यमंत्री बनाने के बजाय खण्डूडी या निशंक या कभी स्वामी जी को मुख्यमंत्री थोप देती रही। कांग्रेस व भाजपा दोनों अलोकत्रांत्रिक ढ़ग से प्रदेश की लोकशाही को रौंदते हें। दोनों दलों का प्रदेश के हित में कौन सबसे अधिक जनहित में सुशासन देने वाला होगा यह न हो कर प्रदेश के हितों को उनके लिए कौन ज्यादा दोहन करायेगा, कौन उनकी तिजोरी भरेगा यह महत्वपूर्ण होता है।
परन्तु जबसे सोनिया गांधी के हाथों में कांग्रेस की कमान आयी तब से वह ऐसे निर्णय भी लेती है जिसकी आम लोग कल्पना भी नहीं करते। इसी के तहत लोग कायश लगा रहे हैं कि यदि सुरेन्द्रसिंह नेगी कोटद्वार से भाजपा के मुख्यमंत्री खंडूडी को पटकनी देते हैं तो सोनिया गांधी उनकी वरिष्ठता, तटस्थता, जमीनी व अनुभव देखते हुए उनको प्रदेश के मुख्यमंत्री बना सकती है। इसी परिपाटी में  ही अगर सोनिया गांधी प्रदेश में किसी महिला को मुख्यमंत्री बनाने की सोचती है तो वह साफ छवि की पूर्व मंत्री अमृता रावत का भी   ्रपदेश का मुख्यमंत्री बना सकती है।

महाराष्ट्र नगरपालिका चुनाव परिणाम से उजागर हुआ लोकशाही से चुनाव आयोग का मजाक

महाराष्ट्र नगरपालिका चुनाव परिणाम से उजागर हुआ लोकशाही से चुनाव आयोग का  मजाक
नई दिल्ली (प्याउ)। देश में इन दिनों 5 राज्यों के चुनाव के साथ साथ महाराष्ट्र की 9 नगरमहापालिका के चुनाव हो रहे हे। महाराष्ट्र के 9 नगर महा पालिका के चुनाव परिणाम चुनाव होने के चंद दिनों में यानी 17 फरवरी को इस समय घोषित किये जा रहे है। वहीं तीन राज्यों मणिपुर, पंजाब व उत्तराखण्ड के चुनाव एक महिने व 5 दिन तक लटकाये इस लिए जा रहे हैं कि ताकि उप्र व अन्य राज्य में होने वाले चुनाव प्रक्रिया को ये परिणाम प्रभावित न कर पाये। इससे बड़ा मजाब दूसरा क्या हो सकता हे। महाराष्ट्र महानगर पालिका के चुनाव इन छोटे राज्यों से कम महत्वपूर्ण नहीं है, आज चुनाव चाहे नगर पालिका के हों, या नगरनिगम या त्रिस्तरीय पंचायत या लोकसभा या विधानसभा के सभी जगह के परिणाम लोगों के मन को प्रभावित करते है। एक हवा बनाने का काम करते हें कि वहां लोग अमूक पार्टी के पक्ष में चल रहे हैं या लहर इस पार्टी की है। ये चुनाव परिणाम उस हवा को प्रभावित करने का काम करता है जो चुनाव आयोग के अनुसार मतदाता को प्रभावित करते हे। यदि चुनाव आयोग को इन पांच राज्यों का चुनाव परिणाम एक साथ निकालना था तो उसने महाराष्ट्र में हो रहे चुनाव परिणामों को भी साथ ही घोषित करने थे। या जिन राज्यों में चुनाव हो चूके हैं वहां भी इतना लम्बा चुनाव परिणाम लटकाने का अब औचित्य नहीं रहा। अगर वे चुनाव परिणाम प्रभावित कर सकते हैं तो महाराष्ट्र महानगरपालिका के चुनाव परिणाम कैसे प्रभावित नहीं कर सकते। आज सवाल स्थानीय निकाय या विधानसभा का नहीं है सवाल है आज सूचनाक्रांति के बाद कहीं व किसी भी स्तर के चुनाव परिणाम दूसरे जगह हो रही चुनाव प्रक्रिया को प्रभावित करती है। वैसे भी महाराष्ट्र महानगरपालिका के चुनाव में प्रदेश के करोड़ों लोग उसी तरह से भाग लेते हैं जिस तरह से लोकसभा व विधानसभा चुनाव में। यह महाराष्ट्र की जनता का जनमत की पूर्ण अभिव्यक्ति है। जो कई छोटे राज्यों से बड़ कर है। ऐसे में चुनाव आयोग द्वारा इस को नजरांदाज करना एक प्रकार से लोकशाही का उपहास उडाने से कम नहीं है। अपनी इस कृत्य के कारण जहां चुनाव आयोग पर धार्मिक  तुष्टिकरण करने का आरोप भी लगा वहीं अब शायद इसी भूल को सुधारने के लिए कहीं चुनाव आयोग 6 मार्च को होने वाली मतगणना को 8 मार्च को होली के त्यौहार के नाम पर 10 मार्च को न कर दे।
 जहां 5 राज्यों का चुनाव 28 जनवरी से लेकर 3 मार्च तक होने हैं, मतगणना पहले 4 मार्च को होनी थी परन्तु चुनाव आयोग ने उत्तर प्रदेश में 4 फरवरी को होने वाले प्रदेश के प्रथम चरण के त्योहार के कारण न केवल प्रथम चरण का मतदान की तिथि को बदल कर 3 मार्च करने के साथ पूर्व में घोषित 5 राज्यों के विधानसभा के चुनाव परिणाम 4 मार्च के बजाय उसे बदल कर 6 मार्च को कर दिया।  परन्तु उत्तराखण्ड जैसे हिमालयी व दुर्गम प्रदेश में भरे हिमपात में चुनाव 30 जनवरी में भारी ठण्ड में कराने के बजाय फरवरी के अंतिम सप्ताह में कराने की पुरजोर मांग को सुनने की भी चुनाव आयोग ने अलोकतांत्रिक रूख अपनाते हुए भारी शीतलहर में ही चुनाव प्रक्रिया पूरी कर दी।
वहीं पोस्टल मतों पर अभी तक चुनाव आयोग पुरानी ही लकीर पिट रहा है जब मतदान के एक सप्ताह के अंदर मतगणना हो जाती थी। चुनाव आयोग को चाहिए कि वह 35 दिन लम्बे मतगणना के परिणाम को देखते हुए पूरी चुनाव प्रक्रिया को प्रभावित करने वाले लाखों पोस्टल मतों का सहारा लेकर जनादेश का हरण करने वालों के खेल की इजाजत न दे। इसके लिए नये कानून का निर्माण या दिशा तय करे।
चुनाव आयोग को सजग रहना चाहिए। हालांकि चुनाव आयोग की शक्ति से कालेधन पर काफी अंकुश लगा, परन्तु अधिकांश पार्टियों व उम्मीदवारों ने बहुत ही धूर्तता से जी भर कर धन, शराब व अन्य औछे हथकण्डों का प्रयोग किया। चुनाव आयोग को बहुत गंभीरता से चुनाव प्रक्रिया को संचालित करना चाहिए।


Wednesday, February 15, 2012

प्रखर राज्यगठन आंदोलनकारी मनमोहन तिवारी की पावन स्मृति को शतः शतः नमन्

प्रखर राज्यगठन आंदोलनकारी मनमोहन तिवारी की पावन स्मृति को शतः शतः नमन्
उत्तराखण्ड राज्य गठन जनांदोलन के प्रखर आंदोलनकारी मनमोहन पाठक नहीं रहे। 15 फरवरी की प्रातः जेसे ही मैने फेसबुक को खोल कर अपने मित्रों के संदेश पढ़ना शुरू किया तो, मुझे हल्द्वानी से अधिवक्ता चन्द्र शेखर करगती का मनमोहन तिवारी के आकस्मिक देहान्त की खबर पढ़ कर सन्न रह गया। 40 साल की उम्र में ही नैनीताल हाईकोर्ट में वकालत करने वाले मनमोहन तिवारी राज्य गठन जनांदोलन के प्रारम्भिक दिनों जब हमारा अनिश्चित कालीन धरना संसद की चैखट जंतर मंतर पर चल रहा था, उस समय वे कुमाऊं विश्वविद्यालय के छात्र नेता तरूण पंत के साथ मोहन पाठक व मोहन तिवारी भी पंहुचे थे। इसी दौरान उन्होंने संसद की दर्शक दीर्घा से उत्तराखण्ड राज्य गठन के समर्थन में नारे लगा कर इस आंदोलन को मजबूती दी। इस प्रकरण में वे जेल भी गये। 1994 में ये घटना हुई। मुझे मालुम है कि संसद में नारेबाजी करना कितना, साहसिक कार्य होता है, मैने भी खुद देश को अंग्रेजियत की गुलामी से मुक्ति के लिए 21 अप्रेल 1989 को जिस दिन कर्नाटक की हैगड़े सरकार को बर्खाश्त करके वहां पर राष्ट्रपति शासन लगाया गया था।
मनमोहन तिवारी से इन राज्य गठन के बाद एकाद बार भी टेलीफोन से बात हुई। वह भी मेरे उद्यमी मित्र के सी पाण्डे जी के द्वारा। पिछले सप्ताह भी पाण्डे जी बता रहे थे कि स्व. मनमोहन तिवारी दिल्ली में आ कर मुख्यमंत्री खंडूडी से उनके दिल्ली प्रवास के दौरान मिले थे । आज जब मुझे मनमोहन तिवारी जी के निधन की खबर मिली तो मैने सांय के सी पाण्डे जी से दूरभाष पर बात की। वे लखनऊ में चुनावी अभियान में गये थे, उनको जब मैने इस बारे में पता किया तो उन्होने कहा उन्हें मालुम नहीं। इसके बाद उन्होंने तुरंत मनमोहन तिवारी के भाई की धर्मपत्नी से इस खबर की पुष्टि की। श्री पाण्डे भी सन्न थे। पिछले ही सप्ताह मनमोहन तिवारी उनसे दिल्ली में मिले थे।
मैं उत्तराखण्ड राज्य गठन जनांदोलन के अग्रणी संगठन उत्तराखण्ड जनता संघर्ष मोर्चा, (जो संसद के समक्ष निरंतर 6 साल तक धरना प्रदर्शन के साथ उत्तराखण्ड राज्य आंदोलन के प्रतीक के रूप में उत्तराखण्ड सहित देश विदेश के लोगों में जाना जाता रहा) का अध्यक्ष रूपि सिपाई होने के कारण एक एक कर अपने आंदोलन के साथियों के आकस्मिक निधन से व्यथित हॅू। उत्तराखण्ड राज्य गठन जनांदोलन में पौड़ी, खटीमा-मसूरी, मुजफरनगरकाण्ड, नैनीताल, श्रीयंत्र, देहरादून में आंदोलन के दौरान शहीदों की शहादत का दर्द के साथ साथ राज्य गठन के बाद प्रथम निर्वाचित मुख्यमंत्री तिवारी के कार्यकाल में प्रदेश की स्थाई राजधानी गैरसैंण बनाने के लिए आमरण अनशन के दौरान शहीद हुए बाबा मोहन उत्तराखण्डी हो या आंदोलनकारियों पर दर्ज मुकदमों को वापस लेने की मांग को लेकर शहीद हुए आंदोलनकारी स्व. कठैत की शहादत हो या प्रदेश में शराब निलामी को रौकने के लिए अपनी शहादत देने वाले आंदोलनकारी साथी निर्मल पण्डित का विछोह आज भी रह रह कर मुझे व्यथित कर रहा है। राज्य गठन आंदोलन के साथी नरेन्द्र भाकुनी का अंतिम संस्कार तो हमने अपने हाथों से दिल्ली में भरे दिल से किया। राज्य गठन आंदोलन में आजादी के महान क्रांतिकारी नायक भवानीसिंह रावत के सुपुत्र एस एस रावत उर्फ पीटीआई वाले रावत व इडिया टुडे के पत्रकार प्रहलाद गुसांई का देहांत भी व्यथित करने वाला रहा। राज्य गठन आंदोलन के अग्रणी साथी रहे इन्द्रमणि बडोनी, विपिन त्रिपाठी से पहले राज्य गठन आंदोलन के अग्रणी महिला नेत्री कोशल्या डबराल का निधन की वेदना सही। कई अन्य साथी इस राह में बिछुड गये।
आज भी जब मै राष्ट्रीय धरना स्थल जंतर मंतर पर जाता हॅू तो वह मेरी तपस्थली मुझे बार बार राज्य गठन के उन 6 सालों (1994 से 2000) की याद रह रह कर दिलाती है। मानो शहीदों की आत्मा मुझे धिक्कार रही हो कि प्रदेश में तिवारी, खंडूडी व निशंक जेसे सत्तांध राज कर रहे हैं जो मुलायम-राव से अधिक उत्तराखण्डी हितों को रौंद रहे है। क्यों आज भी उत्तराखण्डी जनता इन सत्तालोलुपुओं द्वारा मुजफरनगरकाण्ड के अभियुक्तों को दण्डित न करने पर, गैरसैंण राजधानी बन बनाने पर, प्रदेश में जनसंख्या पर आधारित परिसीमन थोपने पर, प्रदेश की संसाधनों की बंदरबांट व प्रदेश को भ्रष्टाचार की गर्त में धकेलने पर मूक हैं। क्यों आज उत्तराखण्ड में जनप्रतिनिधी प्रदेश के हितों को रौंद रहे है। आंदोलन के साथी मनमोहन तिवारी के इसी सप्ताह निधन से इस जख्म को और कुरेद दिया है। भगवान उनकी आत्मा को अपने श्रीचरणों में स्थान दे। एक बार फिर उत्तराखण्ड के मान सम्मान व विकास के लिए चले राज्य गठन जनांदोलन में अपना महत्वपूर्ण योगदान देने वाले अपने साथी मनमोहन तिवारी की स्मृति को अपने सभी आंदोलनकारी साथियों की तरफ से शतः शतः नमन् करता हॅू।

Monday, February 13, 2012

भारत की तरह नपुंसक बैठकर नहीं अपितु आतंकियों को मुहतोड़ जवाब देगा इस्राइल

-भारत की तरह नपुंसक बैठकर नहीं अपितु आतंकियों को मुहतोड़ जवाब देगा इस्राइल
-ईरान के लिए ताबूत की कील साबित होगी कार विस्फोट प्रकरण

दिल्ली व जार्जिया में इसी सप्ताह सोमवार को हुए हमले के बाद इस्राइल व ईरान के बीच सम्बंध बहुत ही खतरनाक मौड़ में पहुंच गये है। इस घटना से पहले ही ईरान द्वारा परमाणु अस्त्रों के निर्माण के कारण तनावपूर्ण स्थिति में पंहुचे सम्बंधों की विस्फोटक स्थिति में पंहुचने की आषंका से पूरा संसार सहमा हुआ है। गौरतलब है कि इस्राइल कोई भारत जैसा देष नहीं कि जिस पर कोई भी आतंकी हमला करे व वह मात्र दोशी का नाम ले कर मूक हो जाये। इस्राइल अपने गुनाहगारों को वह संसार के किसी भी कौने में कहीं भी छिपे हों उनको उनकी मांद में मारने का काम करने के लिए विख्यात है। इसका अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि इस्राइल ने अपने एक सिपाई को बधक बनाये जाने पर फिलिस्तीन की ईट से ईंट बजा दी थी, दूसरी तरफ भारत की सर्वोच्च सदन संसद पर पाक के हमले के बाद भी नपुंसकों की तरह विधवा विलाप करता रहा है। इसी नपुंसकता को देख कर पाक व अमेरिकी परस्त आतंकियों ने संसद, लालकिला, मुम्बई, अक्षर धाम सहित देष की राजधानी को अपने नापाक हमलों के बाबजूद आज भी अपने दोशियों को चिन्हित करने के बाबजूद फांसी की सजा प्राप्त दोशियों को मौत की सजा देने का साहस तक नहीं कर पा रहा है। वहीं इस्राइल अपने एक नागरिक व सम्मान के लिए कहीं भी दोशियों का सफाया करने में अपने जाबांज मौसाद को इजाजत देता है। सबसे अहम सवाल यह है कि पहले ही ईरान को तबाह करने का बहाना ढूढ रहे अमेरिका को अपने मित्र इस्राइल पर हुआ यह हमला किसी बरदान से कम साबित नहीं होगा। गौरतलब है अफगानिस्तान, इराक, लीबिया व पाक को तबाह करने के बाद पष्चिमी देष ईरान पर भी अपनी नजरे गडाये हुए है। अब इस्राइल पर हुए इस कार हमले को इस्राइल न केवल मुंहतोड़ जवाब देगा अपितु ऐसी आषंका भी प्रकट की जा रही है यह प्रकरण इस्राइल के लिए ताबूत का कील साबित होगी।
वर्तमान तनाब की कड़ी में आग का काम किया दिल्ली में इस्राइली दूतावास की कार में हुए बम विस्फोट ने । दिल्ली व जार्जिया में सोमवार 13 फरवरी को इस्राइली राजनियकों की कार  पर हुए आतंकी हमलों को इस्राइल ने इस्राइल पर किया गया आतंकी हमला माना और इसके लिए इस्राइली प्रधानमंत्री नेतन्याहू ने कहा, ‘‘दिल्ली और जार्जिया  दोनों मामलों में ईरान शामिल है और उसने हमलों के लिए हिजबुल्ला की मदद की।’’इस्राइली विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता यिगल पालमोर ने कह ,कि इसा्रइली राजनयिकों को उस वक्त निशाना बनाया गया है, जब हिजबुल्ला के उपनेता इमाद मुगनियाह के मारे जाने की चैथी बरसी है। वह एक कार बम हमले में मारे गए थे।  दिल्ली में  प्रधानमंत्री आवास के 500 मीटर दूरी पर हुई इस विस्फोट से पूरा विष्व सहम गया।  प्रधानमंत्री के आवास सात रेसकोर्स रोड से मात्र 500 मीटर दूर दिन में सवा तीन बजे हुई इस घटना के बारे में दिल्ली पुलिस आयुक्त बी के गुप्ता ने कहा कि इस्राइली उच्चायोग के कार के पिछले हिस्से में संभवतः चुंबकीय उपकरण लगाकर विस्फोट किया गया और इसके लिये संभवतरू रिमोट कंट्रोल उपकरण का उपयोग किया गया है। घटना की जांच की जिम्मेदारी दिल्ली पुलिस की विशेष शाखा को सौंपी गयी है। ‘इस हमले में इस्राइल दूतावास की यह कार ‘109 सीडी 35 ’’ नंबर की टोयटा इनोवा धू धू कर जलने लगी ।
वहीं दूसरी तरफ पुलिस को दी गयी एक अहम  प्रत्यक्षदर्शी के अनुसार औरंगजेब रोड क्रासिंग के पास कार में एक मोटर साइकिल सवार ने चुंबकीय उपकरण लगाया जिसके बाद कुछ ही मीटर आगे बढ़ने पर कार में हल्का विस्फोट हुआ और उसमें आग लग गई।
इस्राइली दूतावास की एक कार में मिशन के निकट ही आज दोपहर बाद विस्फोट हो गया जिसमें दूतावास के तीन कर्मचारी घायल हो गये।कार का चालक, जो भारतीय नागरिक है और दूतावास की एक महिला कर्मचारी घायल हुए हैं । एक अन्य कार में चल रहे दो अन्य लोग भी मामूली घायल हुए हैं ।
सोमवार को ही इस्राइल पर हो रही दूसरी आतंकी घटना को अंजाम होने से पहले ही नश्ट करके किसी दुर्घटना से बचा गया। जार्जिया की राजधानी तिबलिसी में भी इस्राइली दूतावास के एक वाहन में बम पाया गया, जिसे निष्क्रिय कर दिया गया । इस्राइल ने इसमें ईरान का हाथ होने का आरोप लगाया है।
प्रधानमंत्री के आवास सात रेसकोर्स रोड से मात्र 500 मीटर दूर दिन में सवा तीन बजे हुई इस घटना के बारे में दिल्ली पुलिस आयुक्त बी के गुप्ता ने कहा कि इस्राइली उच्चायोग के कार के पिछले हिस्से में संभवतरू चुंबकीय उपकरण लगाकर विस्फोट किया गया और इसके लिये संभवतः  रिमोट कंट्रोल उपकरण का उपयोग किया गया है। घटना की जांच की जिम्मेदारी दिल्ली पुलिस की विशेष शाखा को सौंपी गयी है।
इस पर कड़ी प्रतिक्रिया करते हुए इस्राइली विदेश मंत्री आविगडोर लिबरमैन ने कहा, ‘‘यह दिखाता है कि इस्राइल और उसके नागरिकों को देश के भीतर एवं बाहर आतंक का सामना करना पड़ा रहा है। हम रोजाना इससे निपटते हैं। हम जानते हैं कि हमले के लिए जिम्मेदार लोगोें की शिनाख्त कैसे की जाती है।’’
इस्राइली विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता यिगल पालमोर ने कहा, ‘‘हम इस बात की इजाजत नहीं देंगे कि आतंकवाद हमारे एजेंडे को प्रभावित करे।’’
आतंकी घटना संसार के किसी भी कौने में हो उसकी निंदा की जानी चाहिए। चाहे आतंक अमेरिका फेलाये या ईरान या पाकिस्तान या इस्राइल। परन्तु परमाणु बम के निर्माण से उपजे तनाव के बाद अमेरिका व उसके मित्र देषों के साथ ईरान के सम्बंध बेहद खतरनाक मोड़ पर पंहुच जायेगे। हो सकता है अमेरिका इस प्रकरण की आड़ में ईरान को इराक, लीबिया आदि बनाने की नापाक कोषिष न करे। अब भारतीय हुक्मरानों को इस प्रकरण से अपने आत्मसम्मान की कैसे रक्षा की जाती है इसको सिखना होगा। षेश श्रीकृश्ण कृपा । हरि ओम तत्सत्। श्री कृश्णाय नमो।

19 वर्शीय किरण नेगी के अपहरण के विरोध में जंतर मंतर पर उत्तराखण्डियों का विरोध प्रदर्षन


19 वर्शीय किरण नेगी के अपहरण के विरोध में जंतर मंतर पर उत्तराखण्डियों का विरोध प्रदर्षन
दिल्ली पुलिस के नक्कारेपन से आक्रोषित जनता

नई दिल्ली(प्याउ)। अज्ञात लोगों द्वारा 9 फरवरी को  अगवा की गयी उत्तराखण्ड मूल की 19 वर्शीय किरण नेगी का पांच दिन गुजर जाने के बाद भी सुराग पाने मे दिल्ली पुलिस के नक्कारापन्न को देख कर आक्रोषित लोगों ने राश्ट्रीय धरना स्थल जंतर मंतर पर 13 फरवरी की सांय 6 बजे मोमबती जला कर विरोध मार्च किया। वहीं दूसरी तरफ अपुश्ट सुत्रों के अनुसार दिल्ली पुलिस इस अपहरण को सुलझाने के लिए कई दस्ते बना कर पूरे प्रकरण को सुलझाने में दिन रात लगी है। इस प्रकरण के विरोध में नजफगढ़ क्षेत्र की आम जनता की अगुवायी में संसद के समीप हुए इस विरोध प्रदर्षन में जहां बड़ी संख्या में उत्तराखण्डी समाज के अग्रणी समाजसेवियों, राजनेताओं, पत्रकारों के साथ दिल्ली के प्रबुद्वजनों ने भाग लिया। प्रदर्षनकारी जहां दिल्ली पुलिस द्वारा 5 दिन बीत जाने के बाबजूद अपराधियों व अगुवा की गयी लड़की का सुराख तक न निकाल पाने के लिए दिल्ली पुलिस हाय हाय और गृहमंत्री व दिल्ली की मुख्यमंत्री के खिलाफ जमकर नारेबाजी कर रहे थे। प्रदर्षनकारियों में बड़ी संख्या में महिलायें भी सम्मलित थी। इस घटना के बारे में जानकारी देते हुए म्यर उत्तराखण्ड के प्रमुख मोहनसिंह बिश्ट ने बताया कि ंदिल्ली के छावला नजफगढ़ निवासी 19 वर्शीय किरन नेगी सुपुत्री उम्मरसिंह नेगी को ऑफिस से घर आते वकत 9 फरवरी 2012 सायं करीब 8 .30 बजे को कुतुब विहार (छावला) नजफगढ़ से उस समय एक बिना नम्बर प्लेट लगी हुए कार सवारों ने अगवा किया जब वह अपने सहेलियों के साथ घर वापस आ रही थी। सरेआम हुई इस घटना से क्षेत्र मे रह रहे सभी समुदायों के सेकडों लोगो ने नजफगड़ थाने व रोड़ पर निरंतर प्रदर्षन करके दोशियों को पकड़ने व अगुवा लड़की को बरामद करने की लगातार मांग की।
अगवा की गयी उत्तराखण्ड के पौड़ी जनपद मूल की 19 वर्शीय किरण नेगी की खबर सुनते ही जहां दिल्ली में नजफगढ़ क्षेत्र की आम जनता आक्रोषित हैं वहीं राश्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में रहने वाले 30 लाख उत्तराखण्डियों में भारी हलचल दिखाई दे रही है। इस घटना के विरोध में संसद के समक्ष 13 फरवरी को सांय 6 बजे सेकड़ों लोगों ने घण्टों तक जंतर मंतर पर प्रदर्षन किया उससे साफ हो गया कि अगर समय रहते दिल्ली पुलिस ने इस प्रकरण के दोशियों को दबोचते हुए अगुवा की गयी 19 वर्शीय किरण नेगी की सकुषल बरामदगी नहीं की तो आने वाले समय में दिल्ली को अपने राज्यगठन जनांदोलन से झकझोरने वाला दिल्ली का बृहद उत्तराखण्डी समाज सड़कों पर उतरने के लिए विवष हो जायेगा। इस प्रकरण में जहां क्षेत्र के लोगों के साथ दिल्ली प्रदेष भाजपा, जद यू, कांग्रेस से जुड़े नेताओं के अलावा उत्तराखण्ड राज्य गठन जनांदोलन के प्रमुख आंदोलनकारी संगठन के प्रमुख लोगों के अलावा बड़ी संख्या में समाजसेवी संगठनों के लोग भाग लिया, उससे साफ लगता है कि अगर दिल्ली पुलिस ने इस घटना को हल्के मे लिया तो दिल्ली में एक बड़ा आंदोलन सडकों पर होने से नहीं रोका जा सकेगा।  इस विरोध प्रदर्षन में जहां दिल्ली प्रदेष जदयू के प्रदेष अध्यक्ष ठाकुर बलबीर सिंह, भाजपा के उत्तराखण्ड सरकार के दर्जाधारी पीसी नैनवाल, उत्तराखण्ड राज्य गठन के प्रमुख संगठन उत्तराखण्ड जनता संघर्श मोर्चा के अध्यक्ष व पत्रकार देवसिंह रावत,  दिल्ली प्रदेष भाजपा के पूर्व सचिव उदय षर्मा, भाजपा पंचायती प्रकोश्ठ के संयोजक विजय सत्ती, म्यर उत्तराखण्ड के मोहन सिंह बिश्ट, सुदर्षन रावत, दीपक पंत, विनोद षाही, अन्नू चैहान  व भूपाल बिश्ट, पत्रकार चारू तिवारी, विनोद रावत, सतेन्द्र रावत, अखिल भारतीय उत्तराखण्ड महासभा के जयसिंह रावत, नन्दन वोरा मुडेपी, समाजसेवी मोहनसिंह रावत, सार्थक प्रयास के उमेष पंत, हिन्द मजदूर सगठन के विक्रम रावत, कांग्रेसी नेता बिश्ट, नौएडा से योगेन्द्र षर्मा, राजेन्द्र सजवाण, डेसू कलोनी से श्री नेगी जी, साहित्यकार जयपालसिंह रावत व उत्तराखण्ड लोकमंच के दिनेष ध्यानी, उत्तराखण्ड महासभा के अनिल पंत, गुसांई, उत्तराखण्ड क्लब के नरेन्द्र बत्र्वाल,रौतेला, राहुल पोखरियाल, गणेष सजवान, समाजसेवी श्रीमती रावत, कांग्रेसी नेता गेंदालाल व बलवंत सिंह रावत सहित सैकड़ों लोगों ने इस प्रदर्षन में भाग लिया। आंदोलनकारियों ने ऐलान किया कि अगर दिल्ली पुलिस षीघ्र ही इस प्रकरण के अपराधियों को नहीं पकड़ती है तो आक्रोषित जनता मुख्यमंत्री व गृहमंत्री के आवास पर प्रदर्षन करेगा।

Saturday, February 11, 2012

संघ पर ग्रहण लग गया है नेतृत्व का सत्तालोलुपु सजातीयता नेताओं से अंध मोह

-संघ पर ग्रहण लग गया है नेतृत्व का सत्तालोलुपु सजातीयता नेताओं से अंध मोह
 -खंडूडी व निषंक की खुली जंग ने गुनाहगार है संघ व भाजपा आला नेतृत्व
गुटवाजी से अधिक खतरनाक भाजपा में चल रही जातिवादी प्रवृति को क्यों नजरांदोज कर रहा है संघ
प्यारा उत्तराखण्ड।

सुना है कि इन दिनो उत्तराखण्ड में खंडूडी व निषंक गुटों में हो रही आत्मघाति सियासी जंग के कारण प्रदेष विधानसभा चुनाव में डूबचूकी भाजपा की नौका की आषंका से भयभीत हो कर भाजपा की मातृ संगठन संघ के कर्णधारों की कुम्भकर्णी नींद टूट गयी है। संघ ने अपने विष्वस्थ स्वयंसेवकों को प्रदेष की गुटवाजी से त्रस्त पार्टी को फिर पटरी पर लाने के लिए विषेश अभियान षुरू करा ही दिया है। परन्तु प्रदेष भाजपा की वर्तमान षर्मनाक स्थिति को देख कर इसके षर्मनाक पतन पर करीब से नजर रखने वाले इसके लिए प्रदेष भाजपा के बौने नेतृत्व से अधिक खुद संघ व भाजपा के केन्द्रीय नेत्त्व को जिम्मेदार मान रहे है। अगर समय पर संघ व भाजपा नेतृत्व प्रदेष में जातिवादी मानसिकता के बौने नेतृत्व को स्थापित करने व उनकी इस जातिवादी मानसिकता पर अंकुष लगाता तो आज भाजपा पर ऐसा कलंक नहीं लगता। सवाल यह है कि जब भाजपा का प्रदेष नेतृत्व वहां के साफ छवि के जमीनी संघ समर्पित अनुभवी नेताओं को एक एक करके नकारते हुए उपेक्षा कर रहा था तो उस समय संघ व भाजपा का केन्द्रीय नेतृत्व क्यों कानों में अंगूुली डाल कर धृतराश्ट की तरह मूक बना हआ था। क्यों अधिकांष विधायकों के जनसमर्थन के बाबजूद साफ छवि के जनप्रिय वरिश्ट नेता भगतसिंह कोष्यारी को प्रदेष का मुख्यमंत्री बनाने के बजाय खंडूडी को केन्द्र से उठा कर प्रदेष में थोपा गया। फिर जब खंडूडी की अलोकषाही व जातिवादी प्रवृति के खिलाफ उसके अधिकांष मंत्रिमण्डल व संगठन ने आवाज उठायी तो क्यों फिर उन्हीं की पसंद सजातिय व्यक्ति निषंक को प्रदेष की कमान सोंपी गयी। क्या प्रदेष पर संघ व भाजपा के केन्द्रीय नेतृत्व को जातिवाद के मोह में इतना संकीर्ण बना दिया था कि उनको प्रदेष में भगतसिंह कोष्यारी, केदारसिंह फोनिया, मोहनसिंह ग्रामवासी जैसे वरिश्ट व त्रिवेन्द्रसिंह रावत जैसे संघ निश्ट नेता कहीं दिखाई नहीं दिये। क्या संघ व भाजपा नेताओं की आंखों के तारे निषंक जैसे स्वनाम धन्य नेता केसे बन गये? अब विधानसभा चुनाव में भी इसी प्रवृति को देख कर जहां भाजपा का केन्द्रीय नेतृत्व कुषवाह जेसे बसपा नेताओं को भाजपा में स्वागत करते हैं परन्तु उनके पास केदारसिंह फोनिया जैसे साफ छवि के वरिश्ट जनजाति नेता को टिकट देने के लिए जीगर तक नहीं रहा। वहीं जिस प्रदेष के मुख्यमंत्री होते हुए खंडूडी ने प्रदेष की जनांकांक्षाओं व प्रदेष के हितों पर अपने व अपने चेहते निषंक के कार्यकाल में कुठाराघात कराया उसी खंडूडी की कोटद्वार से हो रही षर्मनाक हार से बचाने के लिए प्रदेष में ‘खंडूडी है जरूरी का षर्मनाक राग अलाप कर अपने घोर जातिवादी मानसिकता को ही उजागर कर प्रदेष की लोकषाही का एक षर्मनाक ढ़ग से मजाक ही उठाया। जहां तक प्रदेष के हितों पर कांग्रेसी मुख्यमंत्री तिवारी की तरह  ही खंडूडी ने जनसंख्या पर आधारित परिसीमन थोपकर, प्रदेष मे बाहर से लाये गये नौकरषाह का तांडव मचा कर, प्रदेष की जनांकांक्षाओं व विकास के प्रतीक राजधानी गैरसेंण न बनाने, मुजफरनगर काण्ड के अभियुक्तों को दण्डित न करा कर तथा प्रदेष में जातिवादी, क्षेत्रवादी व भ्रश्टाचारी त्रन्त्र पर अंकुष न लगा कर लोगों के विष्वास के साथ छलावा किया। रही सही कसर उन्होंने निषंक को प्रदेष का मुख्यमंत्री बनाने में लगा कर पूरी कर दी। दुबारा मुख्यमंत्री बनने के बाद खंडूडी ने जिस प्रकार से भ्रश्ट जनप्रतिनिधियों व एनजीओ को बचाने वाले प्रवधान वाला लोकायुक्त बना कर फिर प्रदेष की जनता को छला। ऐसे व्यक्ति को उत्तराखण्ड में जरूरी बता कर संघ पोशित भाजपा ने प्रदेष की लोकषाही के साथ षर्मनाक खिलवाड़ किया। जब संघ पोशित सरकार में देवभूमि उत्तराखण्ड में षराब व षिक्षा दोनो मंत्रालय हरि की नगरी के विधायक के पास ही एक साथ सोंप दी गयी थी तब संघ की यह मूच्र्छा क्यों नहीं टूटी? जब प्रदेष में मातृ सदन के योगी ने गंगा बचाने के लिए अपने प्राण बलिदान दे दिये तब संघ की अपनत्व के मोह की खूमार क्यों नहीं टूटी? प्रदेष में केसे दागदारों को महत्वपूर्ण दायित्व व साफ छवि के नेताओं की उपेक्षा हुई तब संघ क्यों नहीं जागा? जब प्रदेष से राज्य सभा का सांसद तरूण विजय जैसे यष्वषी बनाये जा रहे थे तब संघ ने षेशादिचारी के नाम पर क्यों नहीं जागा? जब भगवान राम को धोखा दिया गया, जब इंडिया इंज राइजिंग का राग छेडा गया, जब पंजाब विधानसभा में खालिस्तानी नेता को श्रद्वाजलि देने में भाजपाई सम्मलित रहे तब क्यों संघ का विवेक नहीं जागा। तब संघ को क्यों अपने जनदायित्व का विष्वास नहीं हुआ जब अटल-आडवाणी व प्रमोद की तिकड़ी के षासन में देष की लाभकारी वाल्कों जेसी कम्पनियों को कोडियों के भाव बेचा गया। जब क्यों सघ नहीं जागा जब पाक के गुर्गो द्वारा संसद पर हुए हमले के बाद अमेरिका की गीडद भभकी पर अटल बिहारी मूक   बने रहे? जब भाजपा में लाखों लोगों का कत्लेआम का अपराधी जीना की आरती उतारी जा रही थी तब संघ क्यों नहीं जागा? दूसरों को अनुषासन का पाठ पढ़ाने वालों को खुद अपने जीवन में भी इनका पालन करना चाहिए।
 गौरतलब है कि लोकसभा चुनाव 2009 में प्रदेष भाजपा के षासन के बाबजूद 5 में से 5 लोकसभा सीटों से भाजपा के सफाया होने के बाद संघ पोशित भाजपा में जिस षर्मनाक ढ़ग से रमेष पोखरियाल निषंक को सत्तासीन किया गया, उससे साफ हो गया था कि भाजपा का सुषासन, रामराज्य व राश्ट्रवाद केवल हवाई नारे हैं असल में भाजपा केवल जातिवादी संकीर्ण मानसिकता की ही ध्वजवाहक है। जिस षर्मनाक जातिवादी, क्षेत्रवादी व भ्रश्टाचारी कुषासन से प्रदेष की आम जनता नारायण दत्त तिवारी के मुख्यमंत्रित्व वाले कुषासन से त्रस्त थे, उससे बदतर कुषासन भाजपा ने प्रदेष की जनता को सुषासन देने के नाम पर खंडूडी व निषंक के मुख्यमंत्रित्व में प्रदेष की जनता को दिया।  खंडूडी व निषंक के कार्यकाल में भी प्रदेष के अधिकांष महत्वपूर्ण मंत्रालय ही नहीं षासन प्रषासन के अधिकांष प्रभावकारी पदों पर जातिविषेश के लोगों को ही आसीन किया गया। प्रदेष के प्रतिभाषाली लोगों की षर्मनाक उपेक्षा करके बाहर के लोगों को प्रदेष के षासन प्रषासन पर काबिज किया गया। प्रदेष सरकार के मंत्रीमण्डल से लेकर दायितवधारी, न्यायपालिका से लेकर षासन प्रषासन में जो घोर जातिवाद का तांडव मचाया गया उससे प्रदेष की जनता व उसके भविश्य के साथ एक जबरदस्त खिलवाड किया गया। प्रदेष में  भगतसिंह कोष्यारी, केदारसिंह फोनिया, मोहनसिंह ग्रामवासी,, ले.जनरल तेजपालसिंह रावत, मुन्नासिंह चैहान आदि बहुसंख्यक समाज व प्रतिभावान नेताओं की ऐसी षर्मनाक उपेक्षा की गयी, उससे प्रदेष की जनता में एक बात घर बना गयी कि भाजपा में राश्ट्रवाद व सुषासन के नाम पर केवल जातिवाद का ही सम्राज्य स्थापित होता है। इस अविष्वास को बनाये रखने के लिए न केवल प्रदेष भाजपा के खंडूडी व निषंक जैसे प्यादे ही नहीं अपितु भाजपा का ऐसा मुखौटे को बेनकाब करता हुआ  इसी कारण आज प्रदेष में जमीनी व साफ छवि के उपेक्षित बहुसंख्यक समाज के स्वाभिमानी नेता एक एक कर भाजपा का दामन छोड़ रहे हैं। इसके कारण भाजपा का कांग्रेस से निकृश्ठतम संकीण जातिवादी सोच का स्थापित करना है। काष भाजपा अपने घोशित राश्ट्रवाद, सुषासन व रामराज्य पर ही कायम रहती। लोग कांग्रेस के कुषासन व भ्रश्ट तंत्र से आहत हैं परन्तु भाजपा का घोर जातिवादी पोशण के कारण यहां पर न केवल उत्तराखण्ण्ड में बहुसंख्यक समाज के सदचरित्र व पार्टी के अनुभवी वरिश्ठ केदारसिंह फोनिया, मोहनसिंह ग्रामवासी, रतनसिंह गुनसोला, ले. जनरल तेजपाल सिंह रावत, मुन्ना सिंह चैहान जैसे कद्दावर नेता या तो गुमनामी में पार्टी में रह कर अपमान झेल रहे हैं तथा फोनिया, जनरल रावत व मुन्ना सिंह चैहान ने तो पार्टी को तिल्लाजलि ही दे दी है। यह केवल देवभूमि उत्तराखण्ड में ही नहीं अपितु राश्ट्रीय स्तर पर है भाजपा के अन्य उपेक्षित समाज के नेता कल्याणसिंह, उमा भारती, गोविन्दाचार्य के साथ क्या सलूक किया गया। सुशमा, जैसे नेत्रियों को आज नेता प्रतिपक्ष तक बना दिया गया। देष में सबसे बडे सामाजिक व राजनैतिक चिंतक व जमीनी नेता गोविन्दाचार्य को इसी कारण भाजपा व संघ ने बनवास दिया है क्योंकि वे भाजपा में देष के सभी समाज को स्थापित करना चाहते थे। इसी से आहत हो कर संघ व भाजपा नेतृत्व ने उनको राजनीति से दूर करके देष के भविश्य को संवारने वाला एक बडे नेता को दूर करने का अक्षम्य अपराध किया। भाजपा व संघ नेतृत्व को एक बात का भान होना चाहिए कि देष, विष्व या हिन्दुत्व तभी मजबूत होगा जब यहां जातिवाद-क्षेत्रवाद को दरकिनारे करके देष के सभी समाजों को गले लगा कर प्रतिभावन सदचरित्र लोगों को देष व समाज की बाडगोर दी जाय। देष का इतिहास साक्षी है कि जाति, क्षेत्र, रंग, नस्ल, लिग के नाम पर किया गया भेदभावी षोशण ही अपने सहित अपने कत्र्ता के नाष का मूल कारण बना। इसलिए संघ अगर वास्तव में देष व भारतीय संस्कृति का ध्वज वाहक बनाना चाहता है तो उसे अपनी इस धृतराश्ट्री भूल को सुधारते हुए प्रतिभावान सभी समाज के लोगों को बिना जातिवादी संकीर्णता से आगे बढाना चाहिए। इसके साथ इस बात को भी ध्यान में रखना चाहिए कि देष किसी कांग्रेस, भाजपा या संघ की बैषाखियों का मोहताज नहीं, इस देष में भारतीय संस्कृति हजारों सालों से  अपने जीवंत मूल्यों के कारण आज भी तमाम झंझावतों को झेलते हुए कालजयी बनी हुई है। भीश्म पितामह, कर्ण व दोर्णाचार्य आदि के पतन से एक बात ही सबको सीख लेनी चाहिए कि असत व अधर्म के मार्ग पर रह कर हम चाहे कितने भी बली व नेक क्यों न हो हमें हार का ही सामना करना पडेगा। इसलिए देष के हित में सर्व भूतहिते रता व सत्य न्याय के पथ के अनुगामी ही बनना चाहिए। भारतीय संस्कृति कभी स्व व पर के द्वंद की इजाजत नहीं देती अपितु हमेषा सत्य व असत के द्वंद का रणघोश की इजाजत देती है। संघ को इस बात भी भान होना चाहिए कि उनके स्वयंसेवकों द्वारा किये गये विष्वासघात से आज भी देष की जनता मर्माहित है। देष की जनता को कांग्रेस ने तो ठगा ही परन्तु भाजपा का विष्वासघात असहनीय है। देष की जनता कथनी से करनी पर विष्वास करती है वरियता देती है। इससे साफ हो गया कि संघ व भाजपा से भी देष के समाज का अब मोह भंग कांग्रेस की तरह ही हो गया। इसके लिए संघ नेतृत्व का धृतराश्ट्र की तरह अपनत्व के मोह में मूक समर्थन करना ही रहा। अगर संघ आज भी अपनी भूलों को सुधारने का निर्णय लेने के लिए तैयार है तो हो सकता है आहत समाज का विष्वास वह फिर से अर्जित करे। नहीं तो लाखों लोगों के बलिदान व संघर्श का यह संघ रूपि तेज भाजपा के निहित स्वार्थी व जातिवादी नेताओं की उदर पूर्ति की भैंट चढ़ कर नश्ट हो जायेगा। फेसला संघ को करना है कि उनको देष समाज व भारतीयता से प्यार करना है या केवल जातीयता के मोह में बंघ संकीर्ण सतांधों की उदरपूर्ति। षेश श्रीकृश्ण कृपा। हरि ओम तत्सत्।     

Friday, February 10, 2012

30 जनवरी के बाद के जारी पोस्टल मतदान पत्र होंगे निरस्त

30 जनवरी के बाद के जारी पोस्टल मतदान पत्र होंगे निरस्त
उत्तराखण्ड में राजनैतिक तिकड़मियों द्वारा भारी मतदान से घबरा कर, अपनी हार को जीत में बदलने के लिए डाकमत पत्रों को दुरप्रयोग करने की खबर आ रही है, उस पर सर्वोच्च न्यायालय के वरिश्ठ अधिवक्ता व उत्तराखण्ड में भाजपा की भ्रश्ट सरकार के स्टर्जिया सहित कई प्रकरणों को उच्च न्यायालय से सर्वोच्च न्यायालय में बेनकाब करने वाले अवतार सिंह रावत ने प्यारा उत्तराखण्ड से एक विषेशवार्ता में दो टूक षब्दों में कहा कि प्रदेष मे विधानसभा के लिए हुए मतदान के दिन 30 जनवरी को ही जारी हुए डाकपत्र मतदान पत्र ही सही माने जा सकते है। उन्होंने कहा कि आजादी के बाद बनाये जनप्रतिनिधी चयन कानून बनाते समय कानूनविदों को इस बात का भान भी नहीं था कि भविश्य में इस प्रकार की विषेश परिस्थितियां आ सकती है कि जिसमें मतदान के एक महिने से अधिक समय तक चुनाव परिणाम घोशित नहीं किये गये। सामान्य स्थिति में जहां पोस्टल मतदान को मतगणना के दिन तक मतगणना केन्द्र तक पंहुचने पर मतगणना में सम्मलित करने की इजाजत देता है।  परन्तु अब मणिपुर, उत्तराखण्ड व पंजाब जेसे राज्यों में जहां मतदान 30 जनवरी तक सम्पन्न हो चूका है वहां एक महिने 5 दिन बाद यानी 6 मार्च को उप्र आदि राज्य की विधानसभा चुनाव की भी मतगणना एक साथ होनी है। ऐसे में इन प्रदेषों की अधिकांष सीटों पर भारी मतदान व अधिकांष सीटों पर कड़ी टक्कर होने से जनादेष की रक्षा करना । चुनाव आयोग का नैतिक दायित्व हो जाता है। ऐसे में चुनाव आयोग को उन तमाम लोकषाही के दुष्मनों के कृत्यों से जनादेष की रक्षा करना चाहिए। प्रदेष में भारी मतदान से घबराकर कुछ मजबूत लोग जनादेष को प्रभावित करने के लिए इस पोस्टल मतदान का दुरप्रयोग महिने भर करके जनादेष की निर्मम हत्या करना चाहते है। सर्वोच्च न्यायालय के अग्रणी कानूनविद अवतार सिंह रावत ने कहा कि वे इस मामले को लेकर चुनाव आयोग के संज्ञान में ला रहे है। आषा है चुनाव आयोग लोकषाही की रक्षा करने के अपने दायित्व का निर्वाह करते हुए प्रदेष में मतदान के दिन ही जारी किये गये डाक मतदान प्रपत्र को ही मतगणना में सम्मलित करेंगे। प्रदेष में हुई मतदान के बाद जारी किये गये मतदाता प्रपत्रों को निरस्त करके जनादेष के हरण माना जायेगा। गौरतलब है कि सर्वोच्च न्यायालय से लेकर नैनीताल उच्च न्यायालय में कानूनी मामलों को सुलझाने में वरिश्ठ अधिवक्ता अवतार सिंह रावत का लोहा न भाजपा, कांग्रेसी ही नहीं अपितु षासन प्रषासन में भी माना जाता  हे। उन्होंने साफ कहा कि चुनाव आयोग को इन विशम परिस्थितयों के अनुसार जनादेष की रक्षा करने के लिए कानूनों को नई दिषा देनी चाहिए। उन्होने जोर दे कर कहा कि अगर जनादेष का पालन संविधान की भावना के अनरूप नहीं होता तो न्यायालय के दरवाजे पर दस्तक दी जायेगी।

Thursday, February 9, 2012

तिवारी व उनके प्यादों से लोकषाही व भारतीय संस्कृति को कलंकित होने से बचाये कांग्रेस

तिवारी व उनके प्यादों से लोकषाही व भारतीय संस्कृति को कलंकित होने से बचाये कांग्रेस /
बेषर्मी की हद कर तिवारी को स्टार प्रचारक बनाने की मांग करके
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देहरादून(प्याउ)। एक तरफ कांग्रेस कर्नाटक की भाजपा सरकार के तीन मंत्रीयों के कुकर्मो का कड़ी भत्र्सना करके उप्र के चुनावी जंग में बढ़त हासिल करने में दिन रात जुटी हुई है वहीं दूसरी तरफ उत्तराखण्ड में अपनी कुकृत्य व कुषासन से उत्तराखण्ड की धरती को ही नहीं हेदारबाद राजनिवास को षर्मसार करने वाले नारायणदत्त तिवारी को फिर से उप्र के चुनावों में स्टार प्रचार बनाने की उनको बर्बादी की गर्त में धकेलने के लिए दोशी माने जाने वाले निहित स्वार्थी लोग कर रहे है। यह तो कांग्रेस आला नेतृत्व की बुद्विमता रही कि उप्र व उत्तराखण्ड में अपने कुषासन व इन्हीं प्रकार की बेषर्म कृत्यों से कांग्रेस को पतन के गर्त में धकेलने वाले तिवारी से राज्यपाल की गरीमा को हेदारबाद प्रकरण से कलंकित करने के बाद तिवारी से एक प्रकार से कोई संवाद तक स्थापित नहीं किया। यह आला नेतृत्व का साहसिक निर्णय रहा जिसके भय से उत्तराखण्ड सहित तमाम निहित स्वार्थी कांग्रेसियों को भी दिन के उजाले व सार्वजनिक मंचों से देष की संस्कृति व लोकषाही को कलंकित करने वाले तिवारी को दूर रख कर समाज में एक सही संदेष दिया। परन्तु दूसरी तरफ भाजपा जो अपने आप को भारतीय संस्कृति व सुचिता -सुषासन की ध्वज वाहक होने का दावा करती है उसके षासन में खंडूडी व निषक दोनों के कुषासन में तिवारी को भाजपा के राश्ट्रीय नेतृत्व के साथ सार्वजनिक मंचों में ऐसे तिवारी को मंचासीन करके देवभूमि व भारतीय संस्कृति को कलंकित करने का काम किया। देष की संस्कृति व समाज आज भी रावण जेसे महाविद्वान को आज भी हजारों साल बाद भी माफ नहीं कर पायी। इसलिए जब तब दोशी व्यक्ति हृदय से अपनी गलत कृत्यों के लिए प्रायष्चित व सदमार्ग ग्रहण नहीं करता तब तक उसको सार्वजनिक मंचों पर आसीन करना संस्कृति व समाज का गला घोंटने वाला कृत्य है। इसलिए तिवारी जो आज भी अपने कृत्यों में ही लिप्त है। उन्हें गुनाहगारों को पोशित करने का काम कर रहे है। जिनके संग रह कर उन्होंने ये कलंकित कृत्य किया।
कांग्रेस आलाकमान की आंखों में धूल झोंककर दिल्ली के ऐसे ही षर्मसार करने वाले मठाधीष के साथ शडयंत्र रच कर उत्तराखण्ड की विधानसभा चुनाव में तीन टिकट झटक कर कांग्रेस की आषाओं पर ग्रहण लगाने का काम किया। अब ऐसे ही प्यादे जो तिवारी के नाम पर व अथाह सम्पति के बल पर देहरादून की सहजपुर विधानसभा सीट से टिकट हडप ली थी। ऐसे लोगों को जिनको देष व समाज की छवि तथा लोकषाही को कमजोर करने के कृत्य में जो लोग सम्मलित रहे उनको देष व प्रदेष का भाग्य विधाता बनाने वाले लोकषाही के कलंक ही नहीं गुनाहगार भी होते है। इसके लिए कांग्रेस आलाकमान को चाहिए कि तिवारी जैसे नेताओं व उनके प्यादों को लोकषाही का भाग्य विधाता बनाने वालों को दण्डित करने का काम करके देष की संस्कृति व लोकषाही की रक्षा करनी चाहिए।

सपा, बसपा व भाजपा के लिए आसान नहीं है वर्तमान विधानसभा चुनाव, अप्रत्याषित परिणाम होगे उप्र के विधानसभा चुनाव के

उप्र चुनावी जंग की आंच जंतर मंतर तक 
-सपा, बसपा व भाजपा के लिए आसान नहीं है वर्तमान विधानसभा चुनाव, अप्रत्याषित परिणाम होगे उप्र के विधानसभा चुनाव के
आजकल उप्र विधानसभा की 403 सीटों के लिए आम चुनाव हो रहा है। इसके परिणाम मणिपुर, पंजाब व उत्तराखण्ड की विधानसभा चुनाव परिणामों के साथ ही 6 मार्च को घोशित हो जायेंगे। परन्तु भले ही चुनावी जंग का असली मैदान उप्र में हों परन्तु देष की राजधानी दिल्ली में लोकषाही के सर्वोच्च सदन ‘संसद’ की चैखट पर स्थित राश्ट्रीय धरना स्थल ‘जंतर मंतर’ पर भी इन दिनों राजनेताओं, पत्रकारों, समाजसेवियों के बीच रह रह कर इन चुनावों पर गहरा विचार विमर्ष होता रहता है। आज 9 फरवरी की सांय जब में जंतर मंतर पर पंहुचा तो वहां पर से आम धरना प्रदर्षन वाले जा चूके थे। धरना स्थल पर चल रही चाय की दुकान पर देष के दलित राजनीति के मर्मज्ञ ताराचंद गौतम बैठे थे। आज उस समय चंद पत्रकार, समाजसेवी व टीसी गौतम के अलावा मै व मेरे साथी मोहन सिंह रावत भी थे। चर्चा पर भाग लेते हुए जब गौतम जी ने कहा कि इस समय उप्र के चुनाव परिणाम चैकन्ने वाले होगे। उनके अनुसार उप्र में 18 प्रतिषत दलित में 8-9 प्रतिषत जाटव मतों को छोड़ कर सारे दलित मायावती से अधिक अब कांग्रेस के साथ हैं। वही 18 प्रतिषत ब्राहमण समाज आज भाजपा व कांग्रेस के साथ है। मायावती के साथ उन्हीं स्थान पर साथ हो सकता है जहां बसपा के ब्राहमण प्रत्याषी है। 20 प्रतिषत मुस्लिम समाज का आज अधिकांष भागेदारी कांग्रेस के साथ है। दूसरे स्थान पर सपा के साथ होंगे। बसपा में बहुत कम और भाजपा में ना के बराबर। इसके अलावा 35-40 प्रतिषत के करीब उप्र की जनसंख्या का प्रतिनिधित्व करने वाला ओबीसी समाज एक बड़ा तबका जो 8 प्रतिषत जाट जो केवल जाट प्रतिनिधियों के साथ ही खड़ा रहेगा। जो दस प्रतिषत से कम ठाकुर मतदाता है वह अब कांग्रेस व भाजपा में थोड़ा बहुत बंटेगा। टीसी गौतम इस बात से हैरान थे कि देष के पत्रकारों को जमीनी राजनीति के गणित का ज्ञान तक नहीं है और वे देष की जनता को भ्रमित करने वाली खबरें प्रकाषित कर रहे है। उनके अनुसार उप्र के चुनाव में ब्राहमण व दलित समाज का अधिकाष मत सपा को नहीं पड़ता। वहीं इस बार अमर सिंह के सपा से दूर जाने से व मोहन सिंह के अपमान करने से रहा सहा ठाकुर समाज का मत भी सपा के साथ नहीं पडेगा। मुस्लिम मतदाता को इस समय रूझान फिर से कांग्रेस की तरफ बढ़ने से सपा को नुकसान होगा। उनके हिसाब से सपा को केवल अपने 8 प्रतिषत यादव मतदाताओं का अधिकांष मत ही हासिल होंगे। इस समय उसको, इस कारण जो मीडिया जमीनी तत्थयों को जाने बीना दिल्ली में बैठ कर सपा को प्रदेष में प्रथम स्थान पर दिखा रहा है उसे जमीनी सच्चाई का भान तक नहीं है। सपा के कुषासन के दंष आज भी लोगों के जेहन से नहीं उतरे है। इसलिए सपा के साथ गैर यादव ओबीसी, दलित, ब्राहमण समाज का एक प्रकार से दूरी होगी। मुस्लिम व ठाकुर मतदाताओं की भी दूरी होगी। मुलायम सिंह के षासन को जहां गुण्डा राज के नाम से आज भी उनके विरोधी चिल्लाते रहते। वहीं मायावती का मतदाता आज उससे खिसक रहा है, जाटव छोड़ कर अधिकांष दलित उससे दूरी बनाये हुए है। जाटव मतों का धु्रवीकरण भी चुनाव आयोग की नादानी के कारण हुआ। मायावती व हाथियों की मूर्तियों को ढ़कने के कारण समाज में मायावती के प्रति सहानुभूति बढ़ीं परन्तु उसका कुषासन लोगों की नजरों में मुलायम के कुषासन का प्रतिक बन गया है। भाजपा के कृत्य ही आज भाजपा को पतन के गर्त में धकेलना के लिए काफी है। कांग्रेस ने अगर समझदारी से ये सही चुनावी पाषे चलाये तो चुनावी जंग को जीत सकती है।
टीसी गौतम के नाम से जाने जाने वाले ताराचंद गौतम देष में दलित राजनेताओं में अग्रणी रहे जगजीवन राम के सबसे करीबी साहयकों व उनकी पार्टी के राश्ट्रीय सचिव भी रहे । खुद आज देष की अग्रणी दलित नेत्री व उप्र की मुख्यमंत्री मायावती भी जब कहीं नहीं थी, वामसेफ के कार्यक्रमों में हिस्सा लेती थी, जगजीवन राम की पार्टी से दिल्ली में पार्शद के चुनाव में टिकट लेने के लिए इन्हीं गौतम जी के पास आयी थी। यही नहीं जगजीवन राम के निधन के बाद खुद गौतम जी ने मायावती के सांसद चुनाव का मार्गदर्षन भी किया था।
आज की जमीनी समीकरणों के गहन विषलेशण के बाद मैं इस चर्चा अपने सुधि मित्रों के समक्ष पेष करता हैू कि वे इन बिन्दुओं पर गौर करके अपने विचार भी हमें प्रेषित करेंगे।

उप्र के चुनाव में