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Sunday, June 30, 2013


नक्कारे मुख्यमंत्री बहुगुणा से अधिक गुनाहगार है सोनिया 


मुख्यमंत्री बहुगुणा की अकुशलता ने और खौपनाक बना दिया उत्तराखण्ड में आयी राष्ट्रीय त्रासदी को 



सोनिया गांधी द्वारा बलात थोपे गये मुख्यमंत्री की अकुशलता का दण्ड भोग रहा है उत्तराखण्ड स
हित राष्ट्र

उत्तराखण्ड में इस पखवाडे आयी विनाशकारी प्राकृतिक आपदा को प्रदेश के मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा की अक्षम सरकार ने और भी खौपनाक बना दिया। इस त्रासदी को विकट बनाने वाले मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा व उनकी मृतप्राय सरकार से अधिक अगर कोई गुनाहगार है तो कांग्रेस की आलाकमान जिन्होने विधायक व जनता द्वारा नकारे गये व्यक्ति को प्रदेश को बलात मुख्यमंत्री के रूप में थोपा और बार बार असफल होने के बाबजूद इनको थोपे रखा है। अगर भारतीय जांबाज सैनिक(सेना/वायुसेना/भातिसीसु/आपदा)
इस राहत व बचाव में नहीं आते तो प्रदेश सरकार इस देवभूमि में फंसे लोगों का क्या दुर्दशा करती इसकी कल्पना से भी लोगों की रूह भी कांप जाती है। सैनिकों ने ही यहां फंसे 1 लाख 7 हजार से अधिक लोगों को सुरक्षित निकाला, सडके व पुल बनाये व आपदा में फंसे लोगों के लिए फरिश्ते साबित हुए। पूरा देश जहां जांबाज सैनिकों को शतःशतः नमन् कर रही है। वहीं इस त्रासदी में मृतप्राय प्रदेश सरकार के नक्कारेपन के लिए मुख्यमंत्री बहुगुणा व इस नक्कारे सरकार को संरक्षण देने वाली सोनिया गांधी को धिक्कार रहे है। 
इस त्रासदी के 15 दिन बाद भी प्रदेश के मुख्यमंत्री न तो पौने दो सो करोड लोगों की विश्व प्रसिद्ध श्रद्धा के सर्वोच्च धाम केदारनाथ जी जो इस त्रासदी का सबसे सबसे ज्यादा प्रभावित रहा और यहीं हजारों लोग इस त्रासदी में जमीदोज हो गये, वहां की धरती पर जाने का मुख्यमंत्री का एवं एक मानवीय दायित्व तक नहीं निर्वाह करके लोगों के जख्मों में नमक छिडकने का काम किया। 
इस विकट राष्ट्रीय संकट में पीडितों तक राहत पंहुचाने खुद जाने के लिए आगे आयी स्वयं सेवी संस्थाओं को सहयोग करने के बजाय उनका राह रोकने का काम करके प्रदेश के मुख्यमंत्री व उनकी सरकार ने इस त्रासदी को और विकट बना दिया। इस त्रासदी में मारे गये लोगों का अंतिम संस्कार तक समय पर न करा कर लोगों के जख्मों पर प्रदेश की मृतप्रायः सरकार ने नमक छिडकने का काम किया। प्रदेश सरकार केवल एक ही काम कर रही है वह प्रदेश में मारे गये लोगों की संख्या छुपाने में और पीडितों को राहत पंहुचाने के लिए आने वाले स्वयंसेवी संस्थाओं का रास्ता रोकने के लिए। सरकार को भय है कि कहीं इस खौपनाक हादसे की सच्चाई पूरा जग न जान जाये। 
न तो इस सरकार ने अपना दायित्व निभाया व नहीं मुख्यमंत्री व उसकी सरकार ने जनआस्थाओं का सम्मान किया व नहीं इस विश्व को झकझोर रही इस त्रासदी में सामान्य सा मानवीय व राज धर्म का ही पालन किया। इसके लिए अगर कोई गुनाहगार है तो कांग्रेस की आलाकमान सोनिया गांधी जिन्होने अपने आत्मघाति संकीर्ण सलाहकारों की सलाह पर विजय बहुगुणा जैसे व्यक्ति को प्रदेा का मुख्यमंत्री बनाया व तमाम असफलताओं के बाद भी थोपे रखा। ऐसे मुख्यमंत्री को 
कांग्रेसी आलाकमान द्वारा जनता व कांग्रेसी विधायकों दोनों द्वारा नकारे गये व्यक्ति विजय बहुगुणा को बलात मुख्यमंत्री के रूप में थोपे जाने का खमियाजा आज उत्तराखण्ड व देश को इस आपदा में भी उत्तराखण्ड सरकार की अकुशलता व दिशाहीनता का दण्ड भोगना पड़ रहा है।
हालत इतने बदतर है कि अपने मुख्यमंत्री व सरकार के इस आपदा पर भी गैर जिम्मेदाराना व अलोकतांत्रिक व्यवहार के कारण बदरीनाथ के कांग्रेसी विधायक राजेन्द्र भण्डारी को भी सार्वजनिक ढ़ग से लोकशाही का आईना दिखाना पडा। इसी कारण रूद्र प्रयाग में आक्रोशित जनता के आक्रोश का कोप भाजन बन कर मुख्यमंत्री बहुगुणा, आपदा मंत्री यशपाल आर्य व कबीना मंत्री हरक सिंह रावत को हेलीकप्टर से उल्टे पांव वापस जाना पडा। महिलाओं ने मुख्यमंत्री व उनकी सरकार को उनके निकम्मेपन के कारण चूड्डियां भेंट की। आपदा प्रबंधन व राहत पंहुचाने में प्रदेश सरकार का इतना गैरजिम्मेदाराना रवैया रहा कि बदरीनाथ जेसे विश्वविख्यात धाम में इस आपदा में फंसे 20 हजार लोगों को भी खाद्यान्न की समस्या से जुझना पडा। इससे साफ हो गया कि छोटी छोटी जगहों में फंसे लोगों को कितनी तकलीफ उठानी पडी होगी।इनकी सुध लेने की आश करना भी बहुगुणा सरकार से करना एक प्रकार से नाइंसाफी होगी। मुख्यमंत्री बहुगुणा व उनकी सरकार की संवेदनहीनता इसी बात से जगजाहिर हो गयी कि जिस दिन उत्तराखण्ड इस भयंकर त्रासदी से गुजर रहा था, देश के प्रधानमंत्री व कांग्रेस अध्यक्षा स्वयं दोनों प्रभावित क्षेत्रों का हवाई निरीक्षण कर रहे थे उसी दिन प्रदेश के मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा, आपदा प्रबंधन मंत्री यशपाल आर्य, कबीना मंत्री हरक सिंह रावत व इंदिरा हृदेश के अलावा प्रदेश के मुख्य सचिव सुभाष कुमार व वित्त सचिव राकेश शर्मा आपदा क्षेत्रों में राहत व बचाव कामों को दिशा देेने के बजाय दिल्ली में देखे गये। दिल्ली में कई कांग्रेसी आला नेताओं द्वारा उनके दिल्ली में रहने पर डपट लगाने के कारण किसी की भी इतनी हिम्मत नहीं हुई कि दिल्ली में होने के बाबजूद वे कांग्रेस के कार्यकारी आला नेतृत्व राहुल गांधी को उनके जन्म दिन पर बधाई देने के लिए उनके द्वार पर कदम रखने का साहस कर पाये। राहुल गांधी इस आपदा के बाद यकायक जिस तरह से कुछ दिनों के देश को इस दर्दनाक हालत में छोड कर ओझल होने के बाद यकायक प्रकट हो कर कांग्रेस सरकार की मोदी सहित अन्य दलों के नेताओं को प्रभावित क्षेत्रों में न जाने देने राजनीति को खुद ही उत्तराखण्ड में जा कर बेनकाब कर गये । 
जिस प्रकार से प्रदेश के मुख्यमंत्री वमंत्रियों के खिलाफ जनता में आक्रोश बढ रहा है, प्रदेश सरकार का मुख्यमंत्री भगवान के द्वार पर जाने का साहस तक नहीं कर पा रहा है। प्रदेश सरकार का नुमाइंदा जो मंदिर कमेटी का सरताज बना हुआ है वो जनआस्थाओं को रौंद कर जूते ले कर मंदिर में प्रवेश कर रहा है। लोगों को राहत देने में सरकार पूरी तरह असफल है। सरकार की अकर्मण्यता व अमानवीय रूख देख कर न केवल प्रदेश के विधानसभाध्यक्ष ही नहीं अपितु राज्यपाल भी अपनी अप्रसन्नता जाहिर कर चूके है। इसके बाबजूद सोनिया गांधी पूरी तरह से असफल हो चूके ऐसे मुख्यमंत्री को संरक्षण दे कर आहत प्रदेश व देश के जख्मों को कुरेदने का काम कर रही है। देश व प्रदेश को मर्माहित करने वाली इस त्रासदी के हजारों पीड़ितों के जख्मों व करोड़ों लोगों की जनास्था को रौदा जा रहा है। ऐसे व्यक्ति को एक पल के लिए भी प्रदेश की कमान सौपना प्रदेश को रसातल में धकेलने के समान है। इससे न केवल प्रदेश का विकास अवरूद्ध हो जायेगा अपितु प्रदेश को मिले जख्म नासूर बन जायेंगे।

Thursday, June 27, 2013


मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा 13 वें दिन भी केदारनाथ तक नहीं जा पाये 


भगवान शिव ने दिया केदानाथ धाम में जूता पहने के घुसे दर्जा धारी कांग्रेसी मंत्री को चेतावनी 

उत्तराखण्उ का एक सचिव हर दिन आ रहा है हेलीकप्टर से दिल्ली

विजय बहुगुणा थोपने के लिए माफी मांगे सोनिया 

उत्तराखण्ड आपदा में बचाव व राहत के लिए सेना को सलाम, विजय बहुगुणा सरकार को लानत

सेना के कमाण्डर फंसे यात्रियों के साथ 12 किमी पैदल चले, 


पूरा विश्व केदारनाथ में हुई विनाशकारी त्रासदी से स्तब्ध है। हजारों आदमी मारे जा चूके हैं परन्तु उत्तराखण्ड का मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा 13 वें दिन (27 जून तक ) भी केदारनाथ धाम की सुध लेने का दायित्व भी नहीं निभा पाये। वह तो भला हो भारतीय सेना का जिसने एक लाख से अधिक पीड़ितों को बचाव व राहत पंहुचायी। एक तरफ भारतीय सेना/वायुसेना/भातिसुब/आपदा प्रबंधन के जाबांज जवानो ने अपनी जान को दाव पर लगा कर उत्तराखण्उ में गत सप्ताह आयी प्राकृतिक आपदा में फंसे सवा लाख से अधिक श्रद्धालुओं को ेबचा कर पूरे देशवासियों का दिल जीत लिया वहीं उत्तराखण्ड के मुख्यमंत्री इस प्राकृतिक आपदा में सबसे ज्यादा तबाह हुए केदारनाथ धाम में 13 दिन बाद भी हेलिकप्टर के सहायता से भी वहां की धरती पर उतरने का साहस नहीं कर पा रहे है। पूरा देश भौचंक्का है कि उत्तराखण्ड के मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा आखिर क्यों इस आपदा से सबसे ज्यादा तबाह हुए संसार भर के सवा सो करोड़ भारतीयों के आराध्य धाम केदारनाथ में 13 वें ेदिन भी क्यों नहीं जा पाये है। वहां न जा पाने के कारण उन्होंने शायद मोदी को भी वहां जाने से रोका। उनको लगता कि लोग क्या कहेगे कि प्रदेश का मुख्यमंत्री तो जा नहीं पाया और सुदूर गुजरात का मुख्यमंत्री वहां चले गया। शायद इसी कारण उन्होंने मोदी को भी वहां जाने से रोक कर पूरी कांग्रेस को जनता की नजरों में खलनायक बनाने की धृष्ठता की। इससे लगता है या तो बहुगुणा अंदर से बहुत भयभीत है या किसी ज्योतिषि ने उनको डरा दिया। जो वे सुदूर पिथोरागढ़ से लेकर रूद्रप्रयाग की धरती पर तो जा रहे हैं दिल्ली भी पंहुच रहे हैं परन्तु केदारनाथ की धरती पर जाने से अंदर से साहस तक नहीं जुटा पा रहे है। उनके केदानाथ में उतर कर वहां की त्रासदी का जायजा लेने का पहला पदेन दायित्व का भी निर्वाह उन्होंने किया हो ऐसा किसी समाचार या सरकार द्वारा जारी समाचारों में पढ़ने व सुनने में नहीं आया।
वहीं उत्तराखण्ड की इस आपदा मे जहां पूरे विश्व का ध्यान लगा हुआ है। अरबों लोगों की श्रद्धा के केन्द्र केदारनाथ धाम की पावनता के साथ कांग्रेस के मुख्यमंत्री ने कितनी उपेक्षा की यह उनके दर पर अब तक न पंहुचने से साफ हो गया। होना तो यह चाहिए था कि इस आपदा में मारे गये लोगों के लिए हरिद्वार में शांति यज्ञ करने की घोषणा करने वाले मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा को सबसे पहले केदारनाथ धाम में जा कर भगवान शिव के समक्ष अपने मंत्रिमण्डल व सभी दलों के नेताओं को ले जा कर देवभूमि की जनआस्था व प्रकृति से खिलवाड़ करने के लिए माफी मांगनी चाहिए थी। ऐसा करना तो रहा दूर मुख्यमंत्री केदारनाथ भगवान का इस त्रासदी में रूद्र रूप देख कर वहां पर जाने की हिम्मत तक नहीं जुटा पा रहे है। उन्हें अंदर से शायद यह डर सता रहा है कि अगर वहां गये तो कहीं भगवान शिव फिर क्रांेधित हो गये।
भगवान बदरी केदानाथ की पावनता का उत्तराखण्ड की सरकारों को कितना खिलवाड़ किया, इसका जीता उदाहरण विजय बहुगुणा की सरकार द्वारा बदरी-केदारनाथ मंदिर समिति द्वारा जूते सहित भगवान केदारनाथ मंदिर में जाने से ही उजागर होता है। भगवान केदारनाथ में तो साक्षात भगवान शिव विराजमान है। इस घटना के बाद गणेश गोदियाल के क्षेत्र में बादल फटने की घटना को भी लोग भगवान शिव की गोदियाल को चेतावनी ही मान रहे है। इससे पहले तिवारी शासन काल में भी ऐसे ही एक ऐसे वाममार्गी को इस मंदिर समिति का अध्यक्ष बना दिया गया जो धार्मिक भावनाओं को नहीं मानते है।
मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा, उनके मंत्री व नौकरशाह कितने संवेदनहीन है यह तो उनके दिल्ली दौरे से उजागर हो गया। परन्तु प्रदेश का  मुख्यमंत्री का सबसे करीबी वरिष्ट सचिव का हर रोज दिल्ली में हवाई मार्ग से आना भी प्रदेश की नौकरशाही व प्रदेश की आपदा के प्रति उनके कार्यो को ही बेनकाब करती है। जिस हेलीकप्टर को लोगों के निकासी के लिए लगना चाहिए था, आपदा के कार्यो में लगना चाहिए था वह हेलीकप्टर को वहां का एक महत्वपूर्ण नौकरशाह हर रोज दिल्ली आने में लगाये रखता तो वहां के आपदा प्रबंधन की क्या दशा होगी। भला हो सेना वालों का जिन्हेाने लोगों का बचाव व आपदा पंहुचायी। प्रदेश सरकार के भरोसे तो ेहो गया था यह काम। वहां पर प्रदेश सरकार ने जो  प्राइवेट हेलीकप्टर किये है प्रतिदिन उनका लाखो रूपया किराया चुकाता है प्रदेश वह हेलीकप्टर प्रदेश सरकार ने नेताओं व नोकरशाहों की आपदा के नाम पर सैर सपाटे में लगा रखे है। प्राइवेट हेलीकप्टर ने किस प्रकार के राहत पीड़ितों को ेदी वह तो एक हेलीकप्टर संचालक द्वारा यात्रियों को पहले निकालने के लिए लाखों रूपया की मांग करने ेसे उजागर हो गयी। हेलीकप्टर प्रकरण में कितना चूना प्रदेश को लगेगा यह तो जांच के बाद ही पता चलेगा या आपदा के शौर में जमीदोज हो जायेगा। परन्तु एक बात स्पष्ट है आज कांग्रेस आला कमान व उनके उन सलाहकारों को ेभगवान शिव से ओर उत्तराखण्ड की जनता से विजय बहुगुणा जेसी निक्कमी सरकार थोपने के लिए माफी मांगनी चाहिए।
इस आपदा की कमान अपने हाथों में ले कर स्वयं आपदा प्रभावितों व सेना के जांबाजों का होेसला बढाने के लिए उतरे सेना के मध्य कमान के कमांडर जनरल को हमारा सलाम। सेना की मध्य कमान के जनरल आफिसर कमांडिंग इन चीफ ले. जनरल अनिल चैत ने 27 जून को बृहस्पतिवार को कुछ ऐसा ही कर दिखाया। बताया जा रहा है कि जनरल चैत पांडुकेश्वर व गोविंदघाट में फंसे 532 लोगों के जत्थे के साथ न सिर्फ 12 किमी पैदल चलकर जोशीमठ पहुंचे बल्कि विकट रास्ते में लोगों की मदद के लिए अपना कंधा भी बढ़ाया। सैन्य इतिहास में शायद यह पहला अवसर है जब इस तरह की प्राकृतिक आपदा में आर्मी कमांडर ओहदे का सैन्य अफसर भी खुद पहाड़ की पैदल पगडंडियों को नापकर आपदा प्रभावितों की मदद कर रहा है। 

Sunday, June 23, 2013

हकीकत को कोई नक्कार नहीं सकता


अपने भागीरथों व सपूतों पर नाज होता है हर समाज को

कई लोगों को इस बात से दुखी हैं कि धोनी व उन्मुक्त आदि प्रदेश में बसे आज की दुनिया के चमकते सितारे खुद को उत्तराखण्डी नहीं अपितु जिस शहर व प्रदेश में वे रहते हैं खुद को उसी का बताते हैं। व्यवहारिक दृष्टि से यह उचित भी है। क्योंकि अगर धोनी जैसे  लोग उस धरती जिसने उनको सामान्य से देश का महानायक बनाने का आसमान दिया व सम्मान दिया को अपना न बता कर अपना मूल का बतायेंगे तो, वहां के लोगों की भावनाये बेहद आहत होगी। इसलिए एक कुशल व सफल व्यक्ति के रूप में धोनी ने यही कहा व किया जो उसको करना चाहिए था। वो अपने को भले ही झारखण्ड का मानता रहा परन्तु अपनी शादी उसने उत्तराखण्डी युवती से ही की। यह है उसका असली पहचान व उत्तर। धोेनी ने कई समय अपनी असली पहचान को उजागर किया भी। हाॅं उत्तराखण्डी आपदा के बारे में धोनी ने संवेदना के वो दो शब्द तक नहीं बोले जो उनके ही कनिष्ठ साथी शेखर धवन ने कहे। उत्तराखण्डियों को आशा थी , उनको कम से कम संवेदना तो प्रकट करनी ही चाहिए थी। परन्तु धोनी बोलने से अधिक करने में विश्वास करता हैे। यह भी सम्भव है कि वह अपनी पत्नी के साथ अपने ट्रस्ट द्वारा भारत आने पर कुछ करने ेका मन बना चूका हो। धोनी गुपचुप काम करने के लिए जाना जाता है।
  पर हकीकत तो यह हैे कि मात्र कहने से कुछ नहीं होता,। इसांन जो होता है । कहीं रहने या धर्म व नाम बदलने के बाद भी लोग दिल से स्वीकार नहीं करते । धोनी हो या कोई अन्य वे उत्तराखण्ड मूल के हैं। इस सच को चाहे धोनी या उन्मुक्त आदि कोई कितना भी नकार लें परन्तु हकीकत को ही जनता स्वीकार करती है। धोनी क्या इस हकीकत तो न तो ओबामा ही बदल पाया राष्ट्रपति बनने के बाद भी । भारत के विभाजन की पुरजोर मांग करके  पाक गये लाखों मुस्लिमों को वहां की धरती में आज भी मुजाहिर कह कर अपमानित किया जाता है। इसी प्रकार का दर्द श्रीलंका में कई एक शताब्दी पहले गये तमिलों को आज भी श्रीलंका स्वीकार नहीं कर पा रहा है। ये दुनिया उसको उसी नजर से आंकलन करती है। जेसे अंग्रेज हिन्दुस्तानियों को ब्लेक डाग से अधिक अंग्रेज नहीं मानते थे, हिटलर यहुदियों को किस नजर से देखता रहा,  खुद को उत्तराखण्डी न मानने व समझने वाले उत्तराखण्डियों के भ्रम को मुलायम सिंह यादव ने उत्तराखण्ड राज्य गठन जनांदोलन के प्रारम्भिक दौर में मैदान से खदेड़ने का बयान दे कर ही दूर कर दिया था। खुद को मुस्लमान मानने वाले अहमदिया व शिया मुस्लमानों के साथ पाकिस्तान में कैसे सलूक होता है। कमजोर आदमी को सदैव असुरक्षा का भय होता है। न जाने किन परिस्थितियों में धोनी आदि ने झारखण्डी समाज में अपना स्थान बनाया। झारखण्ड ने उनको जो नाम दिया, सम्मान व दौलत दिया और अपनत्व दिया हो सकता है धोनी के खुद को झारखण्डी कहने से झारखण्डियों की भावना जरूर आहत होती। यह मनोविज्ञानिक सत्य है कि हमेशा कमजोर वर्ग व व्यक्ति अपनी पहचान छुपाता है और जो समाज सम्पन्न व समृद्ध है उसका ंअंधानुशरण करता है। परन्तु अपनो की उन चमकते सितारों से दो शब्द अपनत्व की आश लगाना भी मानवोचित प्रवृति है। हर इंसान को इसका ध्यान रखना चाहिए। हाॅं ये अभी युवा अवस्था में है। लड़कपन में इंसान को उतनी सुध नहीं होती जितनी वयस्क लोगों में।
वैसे उत्तराखण्ड से अपने व अपने परिजनों की जीवन पालन के लिए अपने गांव से बाहर देश प्रदेश में नौकरी व रोजगार करने के लिए जाने वालों के दिलों में अपनी धरती , अपने लोगों व समाज के प्रति जो अथाह प्रेम रहता है उसका एकाशं भी अपने घर गांव में रहने वाले लोगों में देखने को नहीं मिलता है। पलायन करने वाले चाहे अपने गांव से निकल कर उत्तराखण्ड के कस्बों में रहते हो या दिल्ली, मुम्बई आदि महानगरों तथा अमेरिका, लंदन आदि विदेश में रहते हो, इनका दिल व दिमाग हमेेशा अपनी धरती के लिए धड़कता है। उत्तराखण्ड के बारे में तो यही हकीकत है कि यहां का 5 दशक पहले तक उत्तराखण्ड के गांवों में विद्यालय, पंचायती भवन, प्रतिभावान गरीब बच्चों की शिक्षा, चिकित्सालय खोलना, नहर, सड़क ही नहीं रोजगार व इलाज कराने का काम लाहौर, करांची, दिल्ली, लखनऊ रहने वाले उत्तराखण्डी मूल के लोगों ने अपना पेट काट कर किया। आज की पीढ़ी ने इतनी प्रबुद्ध हो गयी कि इन भागीरथों के योगदान को नकारने का काम करने लगी। इससे बडा दुर्भाग्य क्या हो सकता है। इसके साथ एक सच्चाई यह भी है कि चमकते हुए हर सितारे पर उसका अपना परिवार, समाज व देश गर्व तो करता है परन्तु उसकी असफलता पर उसको अकेेले ही दर्द सहने के लिए छोड़ने का काम भी करते है। 

सनातनी परंपराओं से खिलवाड़ न करें मुख्यमंत्री विजय बहुगुणाः शंकराचार्य माधवाश्रम


शांति यज्ञ नहीं सभी मृतक श्रद्धालुओं का अग्नि संस्कार, पिण्डदान, श्राद्ध व तर्पण होना आवश्यक

श्री केदारनाथ मंदिर परिसर के शुद्धिकरण  तक ऊखीमठ में हो सतत् पूजाः शंकराचार्य माधवाश्रम 

श्री केदानाथ में शंकराचार्य की कोई समाधि नहीं, झूठ न फेलाये मीड़िया

शंकराचार्य माधवाश्रम आश्रम जोशीमठ में 2000 से अधिक श्रद्धालुओं को आश्रय व भोजन देने में जुटा

शंकराचार्य माधवाश्रम के शिष्यों ने लुघियाना, मुजफरनगर व दिल्ली से कई ट्रक राहत सामाग्री बांटी जायेगी व चिकित्सा ट्रस्ट कोटेश्वर ने पीडितों के भेजी दवाईयां

कोटेश्वर(प्याउ) संसार भर के हिन्दुओं के सर्वोच्च धर्माचार्य शंकराचार्य माधवाश्रम जी महाराज ने उत्तराखण्ड के मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा को आगाह किया कि वे इस त्रासदी में मारे गये हजारों श्रद्धालुओं का अग्नि, पिण्ड, तर्पण व श्राद्ध संस्कार कराने के बजाय शांति यज्ञ करा कर सनातन धर्म से खिलवाड़ न करें। शंकराचार्य ने कहा कि अगर अकाल मृत्यु वाले का अंतिम संस्कार सनातनी परंपरा से नहीं किया गया तो वह प्रेत बन कर भटकता रहता है।
उत्तराखण्ड में इस सप्ताह आये भयंकर त्रासदी के बाद पीड़ितों का दुख दर्द बांटने व सनातनी परंपराओं की रक्षा के लिए केदारघाटी के मुख्य तीर्थ कोटेश्वर महादेव में पंहुच कर प्यारा उत्तराखण्ड के सम्पादक देवसिंह रावत से दूरभाष पर प्रदेश की बहुगुणा सरकार द्वारा प्रदेश में इसी पखवाडे हुई त्रासदी के बाद मुख्यमंत्री द्वारा शांति यज्ञ कराने पर अपनी तीब्र प्रतिक्रिया प्रकट करते हुए कही।  शंकराचार्य ने उत्तराखण्ड के मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा सहित सभी सनातन धर्मियों को सनातनी परंपराओं का स्मरण कराते हुए बताया कि प्राकृतिक आपदाओं में मरने वालों के लिए भी सनातनी परंपराओं के अनुसार ही अंतिम संस्कार का विधान है। शंकराचार्य माधवाश्रम जी महाराज ने कहा कि भगवान केदारनाथ धाम में आयी इस त्रासदी में मारे जाने वालों के जो शव प्रशासन ने सुरक्षित रखे है। उनका शव सनातनी परंपरा के अनुसार उनके परिजनों को सौपना चाहिए। परिजनों को इन अकाल मृत्यु के ग्रास बने स्वजनों के शवों का अग्नि संस्कार, पिण्डदान, तर्पण, श्राद्ध के लिए शव उनके परिजनों को सौंपे। शंकराचार्य ने कहा कि गृहस्थी सनातन धर्मियों के शव को दफनाना या नदी में प्रवाह किसी भी स्थिति में नहीं करना चाहिए। इसके साथ इस प्रकार के हादसों में जिन लोगों के शव नहीं मिले हैं उनके परिजनों को भी मृतक का प्रतिकात्मक पुतला बना कर उसका अग्नि संस्कार, पिण्ड, तर्पण व श्राद्ध संस्कार करना चाहिए।
सनातन धर्म के सर्वोच्च धर्माचार्य शंकराचार्य ने आश्चर्य प्रकट किया कि उत्तराखण्ड जैसे देवभूमि के मुख्यमंत्री को सनातनी मर्यादाओं का इतना भी ज्ञान नहीं है तो वह क्या देवभूमि की रक्षा करेगे ? शंकराचार्य माधवाश्रम ने प्रदेश के मुख्यमंत्री का आगाह किया कि लम्बे समय से उत्तराखण्ड सनातनी परंपराओं व तीर्थो की मर्यादाओं का  जो हनन किया जा रहा है उसी कारण इस प्रकार की त्रासदी का दंश प्रदेश व देश को झेलने के लिए मजबूर होना पडता है।
इससे पहले 22 जून को भी मोक्षभूमि उत्तराखण्उ में आयी प्रलयंकारी त्रासदी पर गहरा दुख प्रकट करते हुए शंकराचार्य माधवाश्रम जी महाराज ने भगवान केदानाथ की सत्त पूजा ऊखीमठ में कराने की जरूरत बतायी। दूरभाष से प्यारा उत्तराखण्ड के सम्पादक देवसिंह रावत से अपने विचार प्रकट करते हुए शंकराचार्य माधवाश्रम जी महाराज ने कहा कि जिस प्रकार से मीडिया केदारनाथ में आदिगुरू शंकराचार्य की समाधि बहने के बारे में जानकारी दे कर लोगों को गुमराह कर रहा है, वह निन्दनीय है। शंकराचार्य माधवाश्रम जी महाराज ने स्पष्ट किया कि आदि गुरू शंकराचार्य का निधन नहीं अपितु वे सदेह नंदी पर जटाजूट हो कर आरूढ़ हो कर शिवलोक में गमन कर गये। फिर उनकी केदारनाथ में समाधि बनाना व उसमें शिवलिंग स्थापित करना अपने आप में गलत था।
वर्तमान तबाही से काफी दुखी शंकराचार्य माधवाश्रम जी महाराज ने देश विदेश के तमाम समर्थ श्रद्धालुओं व स्थानीय नागरिकों से अनुरोध किया कि वे इस त्रासदी से पीड़ितों को आश्रय, भोजन, पानी व वस्त्रादि दे कर साहयता में हाथ बंटायें।
शंकराचार्य महाराज ने केदारनाथ धाम में हुई त्रासदी से यहां भगवान केदारनाथ की पूजा में पड रहे व्यवधान को देखते हुए स्थिति के सामान्य होने तक पूजा को ऊखीमठ स्थित भगवान केदारनाथ की शीतकालीन गद्दी- औकारेश्वर मंदिर में ही पूजा होनी चाहिए। शंकराचार्य माधवाश्रम के शिष्य वशिष्ट जी ने बताया कि शंकराचार्य माधवाश्रम के शिष्य वशिष्ट जी ने बताया कि शंकराचार्य माधवाश्रम जी महाराज के शिष्य लुधियाना-पंजाब, उप्र-मुजफरनगर, दिल्ली सहित पूरे देश से कई ट्रक राहत सामाग्री उत्तराखण्ड त्रासदी के पीड़ितों के लिए पंहुच रही है। इसके साथ कोटेश्वर शंकराचार्य माधवाश्रम जी धर्मार्थ चिकित्सालय से महंत शिवानन्द जी महाराज ने जिलाधिकारी रूद्रप्रयाग को इस त्रासदी के पीड़ितों को बांटने के लिए सौपी है। इसके अलावा जोशीमठ में शंकराचार्य माधवाश्रम जी महाराज के आश्रम में 2 हजार से अधिक श्रद्धालुओं को आश्रय व भोजन आदि से सत्कार किया जा रहा है।

Saturday, June 22, 2013

जीर्णोधार की जरूरत नहीं है केदारनाथ धाम की 


अपितु इस क्षेत्र  की पावनता बचाने की जरूरत

किसी पीड़ित गांव या सडक-पुल आदि को गोद लें मोदी व अन्य सरकारें



शांति यज्ञ के साथ प्रायश्चित यज्ञ करके बांध व शराब से बर्बाद करने वाले कृत्यों को रोकने का संकल्प भी ले मुख्यमंत्री बहुगुणा

गुजरात के मुख्यमंत्री मोदी ने प्राकृतिक आपदा का साक्षी रहा केदानाथ धाम के पुनर्निणाम की जो पेशकश की वह भले ही स्वागतयोग्य है। परन्तु केदारनाथ की पावनता देख कर सनातन धर्मी न तो प्रदेश सरकार व नहीं भारत सरकार से  तथा न हीं किसी अन्य सरकारों से इसकी पुनर्निमाण की याचना करता है। इस मूल मंदिर को कोई खतरा नहीं है। केवल मंदिर के अंदर व बाहर सफाई की जरूरत है। इस प्राचीन धाम की जब जरूरत होगी भगवान शिव सनातनी धर्मियों से खुद ही करा सकता है। श्रीबदरीनाथ केदारनाथ समिति इसमें सक्षम है। केदारनाथ में अगर कुछ जरूरत है तो वह मंदिर के चारों तरफ विनाश के कारण बने मलवे की सफाई करके यहां पर किसी प्रकार के व्यवसायिक गतिविधियों को पुन्न प्रारम्भ न करने की। अंधी व्यवसायिकता से मंदिर की पावनता पर ग्रहण लगा दिया था। जिस प्रकार से मंदिर की पावनता पर यहां पर राजनीति की दखल व धनलोभी कर्मचारियों व मठाधीशों के कारण हो रही है। जिस प्रकार से यहां पर सनातनी परंपरा का निर्वाह करने के बजाय नेताओं व थेलीशाहों के लिए भगवान के दर पर विशेष स्वागत व दर्शन में पक्षपात होता है उस पर तत्काल रोक लगनी चाहिए। मंदिर की पावनता हर कीमत पर रक्षा की जानी चाहिए। 1947 क्या 1950 तक केदारनाथ में किसी प्रकार की व्यवसायिक गतिविधियां या मंदिर के नजदीक आवास धर्मशालायें नहीं थी। अब इतना अवैध निर्माण करके वहां की पावनता को दुषित करने का काम किया गया जिससे भगवान शिव का रूष्ट होना स्वाभाविक ही है। इस त्रासदी में अकाल मारे गये लोगों की आत्मशाति के लिए प्रदेश के मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा द्वारा किया रहा शांति यज्ञ के साथ साथ विजय बहुगुणा व उनकी सरकार प्रायश्चित यज्ञ करते हुए प्रदेश में पतित पावनी गंगा यमुना आदि नदियों में बलात बनाये जाने वाले बांधों व शराब का गटर बनाने तथा प्रदेश के हक हकूकों के साथ शर्मनाक खिलवाड करने वाले कृत्यों को रोक दें और इसके लिए सच्चे मन से भगवान से माफी मांगते हुए जनसेवा का संकल्प लें । तभी यह शांति यज्ञ सार्थक होगा नहीं तो यह यज्ञ के परिणाम भी भयंकर होंगे।
गौरतलब है कि इसी सप्ताह उत्तराखण्ड में आयी विनाशकारी आपदा में केदारनाथ धाम में जो खौपनाक त्रासदी हुई उससे पूरा देश गमगीन है। जहां इससे उबरने के लिए सेना के हजारों जवान 55 से अधिक हेलीकप्टरों की सहायता से फंसे हुए 70 हजार से अधिक यात्रियों को निकाल कर बचाव कर रहे है। वहीं इस त्रासदी से चमत्कारिक ढ़ग से बच गये केदारनाथ मंदिर में इस आपदा के निशान चारों तरफ दिखाई दे रहे है। चारों तरफ लांशे पड़ी हुई है। एक प्रकार से केदारनाथ का मूल मंदिर छोड़ कर अधिकांश धर्मशालायें आदि नष्ट हो गयी है। मोदी सहित कोई भी प्रदेश का मुख्यमंत्री, उद्यमी या संस्थायें अगर सच में इस त्रासदी से पीड़ित लोगों की सेवा करना चाहते है तो इस क्षेत्र की एक एक रोड़ व एक एक नष्ट हो गये गांवों को गोद ले सकते है। परन्तु न तो उत्तराखण्ड सरकार व नहीं केन्द्र व नहीं गुजरात सहित किसी भी सरकार व संस्था को केदारनाथ मंदिर से किसी भी प्रकार का छेड़ छाड करने का हक नहीं। यह कोई सोमनाथ आदि मंदिर नहीं। इस केदारनाथ धाम में स्वयं भगवान शिव का वास व रक्षक है। वहां किसी को भी श्मशानवासी भगवान शिव के एकांत में खलल डालने की इजाजत नहीं है। जो भी ऐसी धृष्ठता करेगा उसको इसका खमियाजा भोगना पडेगा। वेसे कांग्रेसे की सरकार ने मोदेी को ेकेदारनाथ न जाने दे कर जनता की नजरां में खुद को गुनाहगार साबित कर ही दिया। जिस तत्परता से मोदी खुद व अपने कई दर्जन हेलीकप्टरों को आपदा कार्य में जुटाना चाहते थे उनका सहयोग न ले कर विजय बहुगुणा सरकार ने पीड़ितों के साथ साथ प्रदेश के साथ खिलवाड़ ही किया। कम से कम देहरादून तक कुछ और हजार फंसे हुए यात्री पंहुच जाते। परन्तु कांग्रेस की राजनीति के शिकार हो गये। जो तस्वीर इस लेख में लगायी गयी है वह सन्1882 की है। तब भी सैकडों साल से भगवान केदारनाथ का मंदिर यथावत खडा था आज इस विनाशकारी त्रासदी में जीवंत खडा है। परन्तु बुद्धिहीन पत्रकार भगवान शिव शक्ति द्वारा रक्षित इस पावन धाम के सुरक्षित रहने का कारण इस विनाशकारी तबाही में बह कर आये बडे पत्थर बता रहे है।इन नादानों को इतना भी समझ में नहीं आ रहा है जो इन पत्थरों को मीलों दूर बहा कर ला सकता है वह क्या इस पत्थरों के आगे बेबश पड गया। इन नास्तिकों को लगता है इसे भगवान शिव का साक्षात चमत्कार कहने से उनकी जीभ कहीं छोटी न पड़ जाय। 

उत्तराखण्ड त्रासदी पर तिहाड़ के केदियों की भी आत्मा जागी पर राहुल गांधी बच्चन, खान बंधु व धोनी मौन क्यों?


सोनिया गांधी द्वारा बलात थोपे गये मुख्यमंत्री की अकुशलता का दण्ड उत्तराखण्ड सहित पूरे देश को भोगना पडा


उत्तराखण्ड में इसी पखवाडे आयी विनाशकारी प्राकृतिक आपदा में मारे गये देश भर के हजारों तीर्थ यात्रियों की दर्दनाक मौत व केदारनाथ, गोरीकुण्ड, अगस्त्यमुनि, उत्तरकाशी, चमोली, पिथोरागढ में हुई भारी त्रासदी से ़तिहाड़ जेल के केदियों को झकझोर कर रख दिया। तिहाड़ जेल के केदियों व कर्मचारियों ने उत्तराखण्ड त्रासदी में 13 लाख रूपये का राहत योगदान देने का निर्णय लिया। परन्तु तिरूपति, शिरड़ी , लालबाग के राजा व सत् सांई जैसे धनकुवैर धर्मार्थ ट्रस्टों के मठाधीशों की आत्मा अभी सोई हुई है। उनको नहीं सुनाई दिया मानवता का यह करूण क्रंदन। देश की जनता हैरान है कि इस छोटी छोटी घटनाओं पर इंटरनेटी दुनिया में घडियाली आंसू बहाने वाले अमिताभ बच्चन, शाहरूख, आमिर व सलमान जैसे सिने अभिनेता कहां गये। क्यों मौन है अभी धोनी, तेंदुलकर जैसे नामी आदि खिलाड़ी। देश हैरान है कि कल तक संडकों पर देश के लिए आंसू बहाने वाले केजरीवाल कहाॅं है? क्या उनको यह भीषण प्राकृतिक आपदा जिससे पूरा देश पीड़ित है दिखाई नहीं दे रहा है। देश आहत है परन्तु कांग्रेस के कार्यकारी आला कमान राहुल गांधी न तो कहीं नजर आ रहे हैं व नहीं उनका कोई बयान तक आ रहा है। भारतीय सेना का जांबाज नौजवान दिन रात अपनी जान पर खेल कर राहत व बचाव काम में जूटे हुए है। देश के अनेक राज्यों के मुख्यमंत्री व मंत्री उत्तराखण्ड से अपने अपने प्रदेश के लोगों को सुरक्षित निकालने के लिए राहत अभियान का संचालन कर रहे हैं। परन्तु केन्द्र की मनमोहन सरकार को इस आपदा को राष्ट्रीय आपदा घोषित करने के अपने दायित्व का निर्वाह करने में भी शर्म आ रही है। बाबा रामदेव ही नहीं भाजपा कांग्रेस, सपा और सेना व अर्ध सैनिक बल इस राहत में अपना योगदान दे रहे हैं। परन्तु बोलीवुड व क्रिकेट के बेताज बादशाह न जाने कहां खो गये।
कांग्रेसी आलाकमान द्वारा जनता व कांग्रेसी विधायकों दोनों द्वारा नकारे गये व्यक्ति विजय बहुगुणा को बलात मुख्यमंत्री के रूप में थोपे जाने का खमियाजा आज उत्तराखण्ड व देश को इस आपदा में भी उत्तराखण्ड सरकार की अकुशलता व दिशाहीनता का दण्ड भोगना पड़ रहा है। हालत इतने बदतर है कि अपने मुख्यमंत्री व सरकार के इस आपदा पर भी गैर जिम्मेदाराना व अलोकतांत्रिक व्यवहार के कारण बदरीनाथ के कांग्रेसी विधायक राजेन्द्र भण्डारी को भी सार्वजनिक ढ़ग से लोकशाही का आईना दिखाना पडा। इसी कारण रूद्र प्रयाग में आक्रोशित जनता के आक्रोश का कोप भाजन बन कर मुख्यमंत्री बहुगुणा, आपदा मंत्री यशपाल आर्य व कबीना मंत्री हरक सिंह रावत को हेलीकप्टर से उल्टे पांव वापस जाना पडा। महिलाओं ने मुख्यमंत्री व उनकी सरकार को उनके निकम्मेपन के कारण चूड्डियां भेंट की। आपदा प्रबंधन व राहत पंहुचाने में प्रदेश सरकार का इतना गैरजिम्मेदाराना रवैया रहा कि बदरीनाथ जेसे विश्वविख्यात धाम में इस आपदा में फंसे 20 हजार लोगों में खाद्यान्न की समस्या से जुझना पडा। इससे साफ हो गया कि छोटी छोटी जगहों में फंसे लोगों को कितनी तकलीफ उठानी पडी होगी।इनकी सुध लेने की आश करना भी बहुगुणा सरकार से करना एक प्रकार से नाइंसाफी होगी। मुख्यमंत्री बहुगुणा व उनकी सरकार की संवेदनहीनता इसी बात से जगजाहिर हो गयी कि जिस दिन उत्तराखण्ड इस भयंकर त्रासदी से गुजर रहा था, देश के प्रधानमंत्री व कांग्रेस अध्यक्षा स्वयं दोनों प्रभावित क्षेत्रों का हवाई निरीक्षण कर रहे थे उसी दिन प्रदेश के मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा, आपदा प्रबंधन मंत्री यशपाल आर्य, कबीना मंत्री हरक सिंह रावत व इंदिरा हृदेश के अलावा प्रदेश के मुख्य सचिव सुभाष कुमार व वित्त सचिव राकेश शर्मा आपदा क्षेत्रों में राहत व बचाव कामों को दिशा देेने के बजाय दिल्ली में देखे गये। दिल्ली में कई कांग्रेसी आला नेताओं द्वारा उनके दिल्ली में रहने पर डपट लगाने के कारण किसी की भी इतनी हिम्मत नहीं हुई कि दिल्ली में होने के बाबजूद वे कांग्रेस के कार्यकारी आला नेतृत्व राहुल गांधी को उनके जन्म दिन पर बधाई देने के लिए उनके द्वार पर कदम रखने का साहस कर पाये।
कांग्रेस के युवा नेता राजपाल बिष्ट इस बात के लिए काफी चिंतित है कि इस आपदा में उत्तराखण्ड के आपदा ग्रस्त क्षेत्रों में सड़क मार्ग व पुलों के टूटने से इन क्षेत्रों की समस्यायें और विकराल हो गयी है। इन हजारों पीड़ित उत्तराखण्डियों की तरफ न अभी सरकार का ध्यान है व नहीं मीडिया का।

अगर चोराबरी ताल की तरह कभी टिहरी आदि बांधों में बादल फट गये तो कोन बचायेगा महाविनाश? 


चोराबरी ताल (गांधी सरोवर) में बादल फटने के बाद मची केदारनाथ में भारी तबाही 


चोराबरी ताल (गांधी सरोवर) में बादल फटने के बाद केदारनाथ धाम में जो प्रलयंकारी तबाही हुई, इससे पूरा देश स्तब्ध है। हजारों लोग पलक झपकते ही इस महाकाल में समा गये। इस विनाशकारी त्रासदी को देखने के बाद मन में प्रश्न उठ रहा है कि अगर इसी प्रकार के बादल कभी टिहरी सहित प्रदेश में बने बांधों में फट गये तो प्रदेश सहित पूरे देश में कितनी विनाशकारी त्रासदी होगी इसकी कल्पना से ही रूह कांप जाती है। सबसे हैरानी की बात है कि जब से गंगा यमुना की उदगम स्थली में पर्यावरणविदों, भूकम्पीय वेताओं व देश के लाखों लोगों के विरोध के बाबजूद प्रदेश की सरकारों ने यहां पर टिहरी जैसे बांधों का निर्माण किया। कुछ सालों से टिहरी, उत्तरकाशी सहित पूरे क्षेत्र में बादल फटने आदि प्राकृतिक आपदाओं की बाढ़ सी आ गयी है। इसके पीछे यहां पर विकास के नाम पर बांधों को निर्माण, सुरंगों व सडकों के निर्माण में भारी बारूद विस्फोटों का इस्तेमाल करना है। हिमालय के इस सबसे संवेदनशील पर्वत श्रृखला में जानी जाती है। इस पर्वत श्रंृखला की घाटी में अनेक बांध बना कर यहां पर पानी का भारी जल दवाब बढाने के साथ यहां के पर्यावरण व प्रकृति संतुलन से भारी खिलवाड़ ऊर्जा के नाम किया जा रहा है। जो भारी विनाश का आमंत्रण से कम नहीं है। टिहरी, देव प्रयाग, रिषिकेश , हरिद्वार से लेकर गंगा किनारे बसे अधिकाश शहरों में कितनी तबाही होगी इसकी कल्पना करने की फुर्सत न तो दो टके के लालच में अंधे हो चूके उत्तराखण्ड को सेकडों बांधो को बना कर जल समाधि देने को उतावले यहां की सरकार, नेताओं, नोकरशाहों व उनके प्यादों को ही है  व नहीं देश के दिशाहीन हुक्मरानों को ही हे। चीन से लगी सीमा पर बनाये गये बांध रूपि विनाशकारी बमों का निर्माण कर इस संवेदनशील हिमालयी प्रदेश के साथ साथ देश के हितों के साथ एक प्रकार का खतरनाक खिलवाड है।
गौतलब है कि केदारनाथ से 3.5 किमी 13700 मीटर ऊंचाई पर स्थित चोराबरी ग्लेसियर के तल पर स्थित चोराबरी ताल में बादल फटने के बाद जो विनाशकारी त्रासदा केदारनाथ में आयी उससे हजारों लोग मारे गये है, हजारों प्रभावित हो गये। महात्मा गांधी की अस्थि राख जबसे इस चोराबरी ताल में विसर्जित की गयी तो तब से लोग इसे गांधी सरोवर के नाम से पुकारते है। यहां से हिमालय की पावन कैलाश पर्वत का मनोहारी दृश्य दिखाई देता है। केदानाथ के निकट बहने वाली मंदाकिनी की उदमस्थली का प्राकृतिक सौदर्य भी देखते बनता है। इसके साथ ही यहां के समीप दुद्य गंगा व मधु गंगा जलप्रपात भी देखने योग्य स्थल हैं। रिषिकेश से 250 किमी पर स्थित गोरीकुण्ड है। गोरीकुण्ड से 14 किमी पर भगवान केदानाथ का पावन धाम केदारनाथ है। 

Friday, June 21, 2013

श्री केदारनाथ की त्रासदी में पीउि़तों की साहयता के लिए आये श्रद्धालुः शंकराचार्य माधवाश्रम जी महाराज

श्री केदारनाथ की स्थिति सुधरने तक ऊखीमठ में हो सतत् पूजाः शंकराचार्य माधवाश्रम 


श्री केदानाथ में शंकराचार्य की कोई समाधि नहीं, झूठ न फेलाये मीड़िया

हजारों लोगों के मारे जाने व केदारनाथ के रावल यानी मुख्य पूजारी लिंग
की कोई जानकारी न मिलने से चिंतित शंकराचार्य 

शंकराचार्य माधवाश्रम आश्रम जोशीमठ में 2000 से अधिक श्रद्धालुओं को आश्रय व भोजन देने में जुटा

शंकराचार्य माधवाश्रम चिकित्सा ट्रस्ट कोटेश्वर ने पीउितों के भेजी दवाईयां

मोक्षभूमि उत्तराखण्उ में आयी प्रलयंकारी त्रासदी पर गहरा दुख प्रकट करते हुए शंकराचार्य माधवाश्रम जी महाराज ने भगवान केदानाथ की सत्त पूजा ऊखीमठ में कराने की जरूरत बतायी। दूरभाष से प्यारा उत्तराखण्ड के सम्पादक देवसिंह रावत से 22 जून को अपने विचार प्रकट करते हुए शंकराचार्य माधवाश्रम जी महाराज ने कहा कि जिस प्रकार से मीउि़या केदारनाथ में आदिगुरू शंकराचार्य की समाधि बहने के बारे में जानकारी दे कर लोगों को गुमराह कर रहा है, वह निन्दनीय है। शंकराचार्य माधवाश्रम जी महाराज ने स्पष्ट किया कि आदि गुरू शंकराचार्य का निधन नहीं अपितु वे सदेह नंदी पर जटाजूट हो कर आरूढ़ हो कर शिवलोक में गमन कर गये। फिर उनकी केदारनाथ में समाधि बनाना व उसमें शिवलिंग स्थापित करना अपने आप में गलत था।
वर्तमान तबाही से काफी दुखी शंकराचार्य माधवाश्रम जी महाराज इस बात से भी चिंतित थे कि न तो मीड़िया व नहीं कोई सरकारी ऐजेन्सी केदारनाथ के मुख्या पूजारी लिंग के बारे में कोई जानकारी मिल रही है।
शंकराचार्य माधवाश्रम जी महाराज ने देश विदेश के तमाम समर्थ श्रद्धालुओं व स्थानीय नागरिकों से अनुरोध किया कि वे इस त्रासदी से पीड़ितों को आश्रय, भोजन, पानी व वस्त्रादि दे कर साहयता में हाथ बंटायें।
शंकराचार्य महाराज ने केदारनाथ धाम में हुई त्रासदी से यहां भगवान केदारनाथ की पूजा में पड रहे व्यवधान को देखते हुए स्थिति के सामान्य होने तक पूजा को ऊखीमठ स्थित भगवान केदारनाथ की शीतकालीन गद्दी- औकारेश्वर मंदिर में ही पूजा होनी चाहिए। शंकराचार्य माधवाश्रम के शिष्य वशिष्ट जी ने बताया कि पंच केदारों में पांच लिंग मुख्य होते है। लिंग के प्रमुख केदारनाथ के कपाट  खोलने व बंद करने के अवसर पर विशेषरूप से उपस्थित होते है। परन्तु इस आपदा के बाद न तो प्रशासन ने व नहीं मीडिया उनके बारे में कोई खबर तक नहीं ले पायी।


लोकशाही का सबक आस्टेªलिया के प्रधानमंत्रियों से सीखें मनमोहन सहित भारतीय नेता


एक तरफ आस्टेªलिया में आयी विनाशकारी बाढ़ आने पर वहां के तत्कालीन प्रधानमंत्री केविन रूड्ड ने भारतीय प्रधानमंत्री मनमोहन व अन्य भारतीय नेताओं की तरह मात्र हवाई सर्वेक्षण रूपि सैर सपाटा करने का काम नहीं किया अपितु आस्टेªलिया के तत्कालीन प्रधानमंत्री केविन रूड्ड ने राहत कामों में हाथ बटाते हुए एक बाढ़ पीड़ित का भारी बक्सा अपने सर पर रख कर उनको सुरक्षित स्थान पर पंहुचाने का काम किया। यह होता है लोकशाही में जनप्रतिनिधी का दायित्व जो खुद को जनता का सेवक समझे न की भारतीय प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह सहित तमाम नेताओं की तरह खुद को जनता का सेवक नहीं अपितु जनता को अपना गुलाम समझते है। देखों उत्तराखण्ड के केदारनाथ सहित अनैक स्थानों में इसी सप्ताह आयी विनाशकारी त्रासदी को जमीन पर उतर कर लोगों का दुख दर्द बांटने के बजाय हवाई सर्वेक्षण करके अपने दायित्व का इति समझा। प्रधानमंत्री तो रहे दूर अभी तक केदारनाथ धाम में प्रदेश के आपदा मंत्री व मुख्यमंत्री भी नहीं गये।
गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी को 22 जून को केदारनाथ जाने की मंशा की भनक लगते ही खुद केदारनाथ न जाने के कारण अपनी नजरों में अपराधबोध से ग्रसित उत्तराखण्ड के मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा व उनकी सरकार ने तुगलकी फरमान जारी किया कि नरेन्द्र मोदी भी प्रधानमंत्री की तरह ही हवाई सर्वेक्षण करे, केदारनाथ में उतरे नहीं। शायद विजय बहुगुणा व उनके कांग्रेस के दिल्ली आसीन नेताओं को भय है कि अगर नरेन्द्र मोदी केदारनाथ में उतर गया तो देश की जनता में देश के प्रधानमंत्री व उत्तराखण्ड के मुख्यमंत्री क्या मुख दिखायेंगे। इस आपदा के समय भी इस प्रकार की राजनैतिक संकीर्णता का दाव चल कर कांग्रेसी मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा पूरी तरह से बेनकाब हो चूके है। इस विपदा में गुजरात के भी हजारों श्रद्धालु फंसे हुए है। वेसे भी केदारनाथ पूरे विश्व के जगदीश्वर हैं, आराध्य है। फिर क्यों भगवान शंकर की चरणों में नमन् करने से किसी भक्त को रोकना वेसे भी घोर अपराध है। जब हरक सिंह आदि के केदारनाथ में उतरने से व्यवधान नहीं हुआ तो मोदी उतर जाता तो क्या आसमान फट जाता। इस आपदा में प्रदेश सरकार को राजनीति की संकीर्ण रोटियां नही सेकनी चाहिए और आस्ट्रेलिया के पूर्व प्रधानमंत्री से लोकशाही का सबक सिखना चाहिए।

Thursday, June 20, 2013

राष्ट्रीय आपदा घोषित कर, राहत राशि प्रदेश सरकार को न देकर सेना को ही दी जाय


पूरे प्रदेश में मुख्यमंत्री व सरकार के खिलाफ जनता व तीर्थ यात्रियों में भारी आक्रोश

मुख्यमंत्री सहित प्रदेश के किसी भी जनप्रतिनिधी व अधिकारी को विदेश दोरे पर 1 साल का प्रतिबंध लगाया जाय

प्रदेश में पर्यावरण संतुलन से खिलवाड करने वाले सभी निर्माणाधीन बांधों को रोका जाय


पावन देवभूमि को शराब का गटर बनाने व धारी देवी जैसे तहस नहस करने से रोका जाय

देहरादून। (प्याउ)। उत्तराखण्ड में 16-17 जून को आये विनाशकारी त्रासदी में हजारों लोगों के मरने की आशंका व्यक्त की जा रही है। पूरे देश के अधिकांश राज्यों के हजारों लोग यहां फंसे हुए है, पीड़ित है और मारे जा चूके है। इसलिए सरकार को तत्काल इसे राष्ट्रीय आपदा घोषित करके इसका राहत व बचाव का पूरा दायित्व निभा रही सेना को ही केन्द्र सहित पूरे विश्व से मिलने वाली राहत राशि को पूरी तरह से अक्षम साबित हो चूकी उत्तराखण्ड की सरकार को न दे कर सेना को ही दी जाय। क्योंकि प्रदेश सरकार का पूरा तंत्र नाकाम साबित हो चूका है। प्रदेश में बन रही तमाम जल विद्युत परियोजनाओं को जो इस गंगा यमुना की धरती के पर्यावरण संतुलन से खिलवाड़  कर रहे हैं इनको तत्काल बंद कर देना चाहिए। इसके अलावा यहां के जनआस्था के धारी देवी सहित तमाम स्थलों की पावनता की रक्षा करना चाहिए। पावन देवभूमि को पर्यटन के नाम पर विलाशता व शराब का गटर बनाने के लिए तुली सरकार को इस बात को भी संज्ञान में रखना चाहिए कि जिस दिन धारी देवी को डूबोने के लिए सरकार ने बांध निर्माण कम्पनी को वहां ंसे मूर्ति उठाने की इजाजत दी उसी के तत्काल बाद यहां इस प्रकार की त्रासदी का सामना करना पडा।
प्रदेश शासन प्रशासन का उत्तरकाशी भूकम्प के बाद से अब तक के तमाम प्राकृतिक आपदा को निपटने व पीड़ितों को राहत देने में अक्षमता व निष्पक्षता पर गंभीर प्रश्नचिन्ह लगातार लगे है। इसी सीमान्त प्रदेश की सडकों व पुलों आदि को तत्काल युद्धस्तर पर ठीक करने की जरूरत है। प्रदेश सरकार पहले ही 3 साल तक इनको निर्माण करने की बात कह रही है। इस लिए सीमान्त जनपद में मोटर मार्ग व पुलों को युद्धस्तर पर तत्काल ठीक नहीं किया गया तो यहां का जनजीवन पूरी तरह ठप्प हो जायेगा व देश की सुरक्षा पर ग्रहण लग सकता है। निष्पक्ष राहत कार्य करने व सभी पीड़ितों को राहत देने के लिए सेना की त्वरित व निष्पक्ष कार्य प्रणाली पर किसी को शंका नहीं है। प्रदेश की जनता का न तो अब प्रदेश की सरकार पर व नहीं यहां के मुख्यमंत्री पर कोई विश्वास ही रहा। प्रदेश के मुख्यमंत्री की अक्षमता के कारण न तो नौकरशाही पर उनका नियंत्रण रहा व नहीं उनको प्रदेश के हितों से कहीं दूर दूर तक वास्ता नहीं है। वे अपना अधिकांश समय दिल्ली में गुजारने को ही प्राथमिकता देते है। प्रदेश के लोग कांग्रेस आला कमान सोनिया गांधी को ऐसे अकुशल व संवेदनहीन प्रदेश  सरकार का नेतृत्व देने पर कोस रहे है।  कहने को प्रदेश सरकार ने इस आपदा पर तीन दिन का शोक घोषित कर दिया है। परन्त प्रदेश में सुगबुगाहट है कि प्रदेश के मुख्यमंत्री का स्वीटजरलेण्ड का विदेशी दोरे पर अगले ही सप्ताह जा रहे हैं। केन्द्र सरकार व सर्वोच्च न्यायालय को प्रदेश की गंभीर स्थिति को देखते हुए उत्तराखण्ड के सभी नेताओं व नौकरशाहों पर एक साल तक किसी प्रकार के विदेश दोरे पर प्रतिबंध लगाना चाहिए। सर्वोच्च न्यायालय से मिली 

Wednesday, June 19, 2013


विनाषकारी आपदा से तबाह केदारनाथ जाने के बजाय दिल्ली में प्रधानमंत्री से सहायता की गुहार लगाने आये मुख्यमंत्री, आपदा मंत्री व रूद्रप्रयाग के विधायक


रूद्रप्रयाग में मुख्यमंत्री बहुगुणा, आर्य व हरक सिंह का हुआ भारी विरोध 

प्रदेश के एक मंत्री को लगाई कांग्रेसी प्रभारी ने दिल्ली आने पर डांट 

राहुल गांधी को जन्म दिवस की बधाई देने का साहस नहीं कर पाये दिल्ली में पंहुचे नेता


मुख्यमंत्री सहित वरिश्ठ नेताओं  के दिल्ली में आने पर लोग हैरान

केन्द्र सरकार ने दिये 1000 करोड़ की सहायता


दिल्ली में बनाया उत्तराखण्ड निवास में एक अस्थाई नियंत्रण कक्ष,


प्रधानमंत्री राहत कोषा से प्रत्येक मृतक को 2 लाख व घायलों को 50 हजार 


नई दिल्ली।  उत्तराखण्ड में आयी विनाशकारी तबाही से सबसे प्रभावित स्थान केदारनाथ या उत्तरकाशी में डेरा डाल कर शासन प्रशासन को आपदा राहत पंहुचाने में तेजी लाने का काम तथा इस आपदा से पीड़ितों का ढाढश बढाने के बजाय उत्तराखण्ड के मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा, आपदा प्रबंधन मंत्री यशपाल आर्य व प्रदेश सरकार में कबीना मंत्री रूद्रप्रयाग के विधायक डा हरक सिंह रावत के साथ-साथ प्रदेश के प्रमुख सचिव सुभाष कुमार व मुख्य सचिव वित्त राकेश शर्मा,के साथ प्रधानमंत्र.ी सेे आपदा पर सहायता लेने के लिए दिल्ली में आ धमके। जबकि प्रदेश कबीना मंत्री इंदिरा हृदेश भी दिल्ली में है।
दिल्ली में प्रदेश की एक बडे नेता को दिल्ली में उत्तराखण्ड की प्रभारी ने इस बात के लिए डांट लगायी कि प्रदेश की हालत इतनी दयनीय है और तुम लोग दिल्ली में घूम रहे हो। इसकी खबर सुन कर दिल्ली में एक दर्जन के करीब कांग्रेस के दिग्गज किसी नेता ने राहुल गांधी को उनके जन्म दिवस पर बधाई देने की हिम्मत तक नहीं की।
 प्रदेश से मिल रही खबरों के अनुसार प्रदेश की जनता प्रदेश के इन हवाई सरकार से असंवेदनशीलता से बेहद नाराज है। इसका एक नमुना सबसे प्रभावित जनपद रूद्रप्रयाग में 19 जून को तब देखने को मिला जब प्रदेश के मुख्यमंत्री बहुगुणा, आपदा मंत्री यशपाल आर्य व स्थानीय विधायक कबीना मंत्री हरक सिंह रावत होलिकप्टर से रूद्रप्रयाग में उतरे। यहां पर इनको उतरते देख कर प्रदेश की त्रासदी पर भी संवेदनहीन हुए इन नेताओं का जनता ने चुडियां भेंट करते व भारी विरोध करते हुए हेलीपेड़ से ही बेरंग हेलीकप्टर से वापस लोटने के लिए मजबूर कर दिया। लोग इस बात से हैरान है कि चुनाव में वोटों के लिए दूर दराज के गांवों में भी पैदल जाने वाले ये नेता आज प्रदेश में आयी इस भयंकर त्रासदी में लोगों की सुध लेने पैदल केदारनाथ आदि जगह जाने के बजाय होलीकप्टर से पर्यटकों की तरह धूम रहे है। वहीं जनता को उत्तरकाशी भूकम्प से लेकर तमाम आपदा में यहां की सरकारों ने पीड़ितों को कितनी राहत पंहुचायी और कितनी बंदरबांट की। प्रदेश की जनता चाहती है कि केन्द्र सरकार प्राकृतिक आपदा की राशि प्रदेश सरकार को देने के बजाय सेना को दे ताकी सेना मजबूती से व कम समय मेें सड़कों व राहत सामाग्री पीड़ितों को ईमानदारी से बांट सके। प्रदेश की जनता को स्थानीय प्रशासन पर भरोसा नहीं रहा। प्रदेश के प्रभावित पर्वतीय क्षेत्रों में जाने के बजाय क्षेत्र के सांसद व नेता देहरादून व रिषिकेश में घूम कर खाना पूर्ति कर रहे हैं।
यह खबर जिसने भी सुनी वह हस्तप्रद रह गया कि आपदा से कराह रहे प्रदेश की सुध लेने के लिए दिन रात पीड़ितों के बीच में जाने व फंसे हुए लोगों को निकालने व उन तक खाद्यान पंहुचाने के बजाय प्रधानमंत्री से मिलने दिल्ली आ धमके। े प्रदेश प्रशासन के पास आज भी सबसे ज्यादा तबाह केदारनाथ धाम व रामबाडा तक पंहुच नहीं पाया। अगर सेना व स्थानीय लोग हाथ नहीं बंटाते तो पीड़ित फंसे व घायल यात्रियों ऐसे संवेदनहीन सरकार के कारण क्या दुर्दशा होती इसकी कल्पना करके भी रूह कांप जाती है।
उत्तराखण्ड आंदोलनकारी साथी बृजमोहन उप्रेती, जगदीश भट्ट, हुकमसिंह कण्डारी, अनिल पंत व किशोर रावत  सहित तमाम आंदोलनकारियों ने प्रदेश सरकार के इन कर्णधारों के ऐसे समय ेदिल्ली में आने पर हैरानी प्रकट की। वहीं एनडीटीवी के न्यूज सम्पादक सुशील बहुगुणा ने भी एनडीटीवी पर चर्चा में डा हरकसिंह रावत से भी यही बात कही कि दिल्ली में प्रेस कांफ्रेंस करने के बजाय मुख्यमंत्री बहुगुणा उत्तरकाशी या केदारनाथ में टेंट लगा कर वहां से प्रदेश की प्राकृतिक आपदा के राहत कार्यो को तेज करते तो वह बेहतर होता।
मेने उत्तराखण्ड निवास में आपदा मंत्री यशपाल आर्य से दो टूक शब्दों में कहा कि इस समय आपकों प्रभावित क्षेत्र में होना चाहिए था, दिल्ली आना लौकिक दृष्टि से कहीं भी उचित नहीं है। मेने यशपाल आर्य से कहा कि गत वर्ष जब उत्तरकाशी सहित प्रदेश में प्राकृतिक आपदा इसी मौसम में आयी थी उस समय भी बहुगुणा सरकार के कई मंत्री व विधायक विदेश में सैर को गये। आज एक साल बाद जब उत्तराखण्ड में इतनी विनाशकारी प्राकृतिक आपदा में हजारों लोगों का जीवन मरण की कोई खबर नहीं है। पौने लाख के करीब लोग सड़क मार्ग अवरूद्ध होने के कारण जहां तहां बिना खाना खाये खुले आसमान के नीचे फंसे हुए है, ऐसे समय में मुख्यमंत्री, आपदा मंत्री व सबसे प्रभावित क्षेत्र के विधायक प्रदेश के वरिष्ठ अधिकारियों के साथ दिल्ली आ धमके।  वह भी आज सूचना ्रप्रद्योगिकी के जमाने में। आज विडियो काॅफे्रंसिंग व दूरभाष का सदप्रयोग करने के बजाय दिल्ली आना वह भी आपदा में केन्द्रीय सहायता लेने के लिए। समाचार चैनलों के द्वारा  देश के साथ-साथ स्वयं कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी व प्रधानमंत्री ने भी इस त्रासदी के मंजर को अपनी आंखों से हवाई सर्वेक्षण करके।
स्वयं मुख्यमंत्री ने उत्तराखण्ड निवास में आयोजित प्रेस वार्ता में बतायी कि इसी सर्वेक्षण के बाद  उत्तराखण्ड में आई दैवीय आपदा से राहत प्रदान करने के लिए प्रधानमंत्री डाॅ. मनमोहन सिंह ने एक हजार करोड़ रुपये की तत्काल सहायता मंजूर की है। साथ ही आपदा में मृतक व्यक्तियों के परिजनों को दो-दो लाख तथा घायलों को 50-50 हजार रुपये की सहायता की घोषणा भी प्रधानमंत्री ने की।
मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा ने बताया कि 19 जून की सांय 5 बजे प्रधानमंत्री आवास में प्रधानमंत्री डाॅ. मनमोहन सिंह से मुलाकात कर उन्हें प्रदेश की स्थिति से अवगत कराया। उनके साथ प्रदेश के आपदा प्रबंधन मंत्री यशपाल आर्य, रुद्रप्रयाग के विधायक एवं कृषि मंत्री हरक सिंह रावत और मुख्य सचिव सुभाष कुमार भी उपस्थित थे।
प्रेस वार्ता में मुख्यमंत्री ने उत्तराखण्ड सरकार ने नई दिल्ली स्थित उत्तराखण्ड निवास में एक अस्थाई नियंत्रण कक्ष स्थापित करने का भी ऐलान किया।  राज्य सूचना अधिकारी नितिन उपाध्याय को इसका प्रभारी बनाया गया है। नियंत्रण कक्ष का फोन न- 011-23010158 फैक्स- 011-23016146 तथा मोबाईल नं-9990831003 एवं 9718972333 हैं।
मुख्यमंत्री की प्रेसवार्ता के समय उनके साथ प्रदेश कांग्रेस कमेटी के प्रवक्ता धीरेन्द्र प्रताप, महासचिव विजय सारस्वत तथा प्रमुख सचिव सुभाष कुमार व मुख्य सचिव वित्त राकेश शर्मा, विशेषकार्याधिकारी एस.डी.शर्मा भी उपस्थित थे।

Tuesday, June 18, 2013

आडवाणी ही हैं राजग को बिखराव के सूत्रधार 


मनमोहनी कुशासन को प्राणुवायु देगी जदयू


नई दिल्ली(प्याउ)। रेल मंत्री जोशी के इस्तीफे के बाद दिल्ली के राजनैतिक दलों में जदयू के केन्द्रीय मंत्रीमण्डल में सम्मलित होने की अटकलें जोरों पर थी । परन्तु 17 जून को मंत्रीमण्डल में विस्तार के बाद इस पर उमड़ रहे बादल छट गये। भले ही जदयू केन्द्रीय मंत्रीमण्डल में भले ही सम्मलित नहीं हुआ हो परन्तु वह बाहर से मनमोहन सरकार के संकटमोचक बनेगे। गौरतलब है कि  मुलायम की सपा की कभी भी केन्द्रीय सरकार से समर्थन वापस की आशंका को दूर करने के लिए कांग्रेस नेतृत्व ने जदयू से मिला अघोषित समर्थन किसी प्राणवायु से कम नहीं है। अब साफ है कि जदयू द्वारा भाजपा नेतृतव वाला राजग गठबंधन छोडने के ऐलान के साथ ही मनमोहन सरकार की अस्थिरता का भय भी दूर हो गया। परन्तु नीतीश व कांग्रेस का संभावित गठजोड़ में क्या गुल खिलायेगा?  यह तय है कि नीतीश कुमार की यह तिकड़म भले ही उनको सियासी कुछ फायदा दे दे परन्तु जनता की नजरों में उनकी विश्वसनीयता पर गहरा प्रश्न चिन्ह लग गया है। इसके अलावा एक बात भी चर्चाओं में है कि भले ही नीतीश इस प्रकरण के खलनायक बन गये हों परन्तु असली सुत्रधार लालकृष्ण आडवाणी है जो अपने पदलोलुपता के लिए भाजपा में ही नहीं राजग के घटक दलों मे इस प्रकार के अलगाव को हवा दे रहे है। जिस प्रकार से आडवाणी के इस्तीफे के प्रकरण के बाद जदयू ने मोदी का विरोध व आडवाणी का समर्थन किया, और इसके बाद रविवार को 17 साल पुराने गठ बंधन को तोडने के बाद लालकृष्ण आडवाणी ने गोवा फेसले को इसके लिए जिम्मेदार बताया । ये सभी कारक चीख चीख कर आडवाणी के मोदी को रोकने का चक्रव्यूह को ही बेनकाब कर रहा है। 

अमेरिका व रूस की नाक बना सीरिया, तबाह


प्यारा उत्तराखण्ड की विशेष रिपोर्ट-


अमेरिका व रूस की नाक बनने के कारण आज सीरिया तबाही के कगार पर है। एक तरफ सीरियाई विद्रोहियों को अमेरिका शह दे रहा है वहीं सीरिया के राष्ट्रपति को रूस पहले की तरह मजबूती से साथ दे रहा है। हालत यह है कि रूस व अमेरिका की हथियारों की दुकान जम कर चल रही है। मारे जा रहे हैं तो सीरिया के ही लोग। एक तरफ अमेरिका इराक,लीबिया व अफगानिस्तान की तरह सीरिया में अपना कब्जा जमाना चाहता है। वहीं दूसरी तरफ रूस अपने मित्र देश रहे सीरिया का साथ दे रहा है। इसी कारण  अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा और उनके रूसी समकक्ष ब्लादिमीर पुतिन के बीच  उत्तरी आयरलैंड में आयोजित जी-8 शिखर सम्मेलन में भी सामने आये।सीरिया में कई महिनों से सरकार व अंमेरिकी समर्थक विद्रोहियों के बीच जिस प्रकार खुला युद्ध छिडा हुआ है उसमें अब अमेरिका इराक की तरह सीधा हस्तक्षेप करने के लिए उतारू हो रहा है। वहीं सीरिया में हजारों लोग इस युद्ध में मारे गये हैं और सीरिया का पूरा विकास अवरूद्ध ही नहीं तहस नहस हो गया है। 

-आंध्र प्रदेश में कांग्रेसी जडों में मट्ठा डाला सोनिया व मनमोहन ने


-तेलंगाना न बना कर और जगन मोहन को जेल में बंद करके

ेहैदराबाद(प्याउ)। वादा करके भी तेलंगाना न बनाना और  जगन मोहन रेड्डी को सत्तामद में प्रताडित करने की कांग्रेस नेतृत्व की आत्मघाति भूल से कांग्रेस की सदैव पक्षध्र रही आंध््रप्रदेश के लोग कांग्रेस बेहद आक्रोशित है।
वंशवाद से दशकों तक संचालित हो रही कांग्रेस को जगन रेड्डी से परहेज क्या रहा यह तो सोनिया गांध्ी व उनके सलाहकार ही बता सकते है। परन्तु आम जनता इसे मनमोहन को प्रधनमंत्राी बनाने की तरह ही सोनिया गांध्ी की भयंकर भूल मानती है। पूरे प्रदेश में भ्रष्टाचार में आकंठ डूबे जगनमोहन रेड्डी के प्रति सहानुभूति की लहर है वहीं तेलंगाना क्षेत्रा में कांग्रेस का नाम लेवा कोई वजनदार नेता भी आज कांग्रेस के पास नहीं है। आम जनता में कांग्रेस के विश्वासघात पर गहरा आक्रोश है। गौरतलब है कि तेलंगाना बनाने का जो वादा कांग्रेस ने दिया था उस पर मुकर कर कांग्रेस ने अपनी जड्डों में एक प्रकार से मट्ठा ही डाल दिया है। इससे आक्रोशित हो कर तेलंगाना क्षेत्रा के कांग्रेसी विधयक व सांसदों ने भी कांग्रेस से इस्तीपफा दे दिया है। परन्तु क्या मजाल है कि सत्तामद में चूर कांग्रेसी नेतृत्व इस दिशा में अपने हित में ही कदम उठाने के लिए तैयार नहीं है। इसी सप्ताह तेलंगाना के मुद्दे पर विधनसभा घेराव भी किया गया। वहीं अभी तक एक हजार से अध्कि आंदोलनकारी इस राज्य गठन के लिए अपनी शहादत दे चूके हैं। परन्तु जनता की इस प्रबल मांग को कांग्रेस सहित देश की तमाम सरकारें पता नहीं क्यों सुनने में असपफल रही। देश के हुक्मरानों का जनभावनाओं को नजरांदाज करने की प्रवृति देश व लोकशाही के हित पर किसी कुठाराघात से कम नहीं है। 

चिकित्सा संस्थान को भूमि आवंटन प्रकरण  बनेगी निशंक व तिवारी के गले की फांस


नैनीताल (प्याउ)। उत्तराखण्ड के प्रथम निर्वाचित मुख्यमंत्री नारायण दत्त तिवारी व मुख्यमंत्री रहे भाजपा नेता रमेश पोखरियाल इन दिनों गैरकानूनी तरीके से सौंग नदी के किनारे की जमीन हिमालय आयुव्रेदिक योग एवं प्राकृतिक चिकित्सा संस्थान के लिए बिना कोई स्टांप शुल्क दिए मुफ्त में दिलाने के विवाद में बुरी तरफ से घिर गये है। सुत्रों के अनुसार इस आर्युवेदिक  चिकित्सा संस्थान से निशंक की बेटी भी जुडी हुई है।  एक तरफ उच्च न्यायालय में इस प्रकरण पर एक याचिका पर न्यायालय ने निशंक सहित सम्बंधित पक्षों से जवाब तलब किया है। वहीं अण्णा आंदोलन के अग्रणी वरिष्ठ अधिवक्ता एवं आम आदमी पार्टी से जुड़े प्रशांत भूषण ने प्रदेश के इन दोनों मुख्यमंत्री रहे नेताओं को इस प्रकरण पर सीधा आरोप लगाया है। गौरतलब है कि प्रशान्त भूषण के पिता व देश के पूर्व कानून मंत्री शांति भूषण के  रमेश पोखरियाल से काफी नजदीकी सम्पर्क है। यही नहीं स्टर्डिया प्रकरण में भी शांतिभूषण निशंक की ढाल बने थे। इससे जानकारों ने अण्णा के भ्रष्टाचार आंदोलन में इन दोनों पिता पुत्र की भूमिका पर भी सवाल खडे किये थे। परन्तु इस गंभीर सवाल का सामना करने का साहस भी न तो अण्णा में रहा व नहीं केजरीवाल में। न हीं स्वयं प्रशांत भूषण व शांतिभूषण इसका खण्डन तक कर पाये।
इस बार इस भूमि आवंटन का मामला हाइ्र कोर्ट में एक जनहित याचिका के रूप में उठा इसमें  पूर्व मुख्यमंत्री निशंक पर वर्ष 2005 में तत्कालीन मुख्यमंत्री एनडी तिवारी से संबंधों का लाभ उठाते हुए गैरकानूनी तरीके से सौंग नदी के किनारे की जमीन हिमालय आयुव्रेदिक योग एवं प्राकृतिक चिकित्सा संस्थान के लिए बिना कोई स्टांप शुल्क दिए मुफ्त में दिलाने और इस संस्थान को निशंक की बेनामी संपत्ति होने का आरोप लगाया है। इस संस्था को श्यामपुर (ऋषिकेश) में 15 एकड़ भूमि निरूशुल्क आवंटित की थी। इस संस्था में निशंक की बेटी, भतीजी व अन्य करीबी प्रबंधन पदाधिकारी थे।
नैनीताल में आये आप पार्टी के नेता प्रशांत भूषण ने पत्रकार वार्ता में उत्तराखण्ड के इस भूमि आवंटन घोटाले की तुलना महाराष्ट्र में गडकरी को कांग्रेस सरकार द्वारा पहुंचाए गए फायदे और बीसीसीआई में नरेंद्र मोदी व अरुण जेटली तथा शरद पवार व राजीव शुक्ला जैसे गठजोड़ की एक कड़ी बताया। प्रशांत भूषण ने इस मामले की जांच केन्द्रीय जांच व्यूरों से कराने की मांग की। इसके साथ ही उन्होंने इस संस्थान की को दी गयी जमीन का आवंटन भी रद्द करने की पुरजोर मांग की। सुत्रों के अनुसार वर्तमान विजय बहुगुणा सरकार पर जिस प्रकार से तिवारी व निशंक ने जम कर इन दिनों प्रहार किये उसे देख कर इस पुराने मामले का उठना अपने आप में राजनीति का भी बू आ रही है।  हालांकि इस याचिका की सुनवाई के दौरान संयुक्त पीठ ने निशंक और प्रमुख सचिव राजस्व एवं चिकित्सा शिक्षा के साथ ही मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया, गढ़वाल विवि, हिमालयन मेडिकल कालेज को नोटिस जारी कर 4 सप्ताह में जवाब देने के निर्देश दिए हैं। यह मामला भले ही राजनैतिक प्रतिद्वंदता के कारण उजागर हुआ हो परन्तु इस प्रकरण से प्रदेश के इन नेताओं का असली चेहरा जनता के सामने तो आ गया। 

मनमोहन जैसे हवाई नेताओं को संगठन व सरकार में मुख्य पदों पर आसीन करने से हुई देश व कांग्रेस की दुर्गति


कांग्रेस संगठन व सरकार में लम्बे सम किया जा रहा है नजरांदाजया जा रहा हे नजरांदाज


नई दिल्ली, (प्याउ)। भले ही सोनिया गांधी के नेतृत्व वाली कांग्रेस आगामी लोकसभा चुनाव 2014 के लिए नयी कार्यकारणी का गठन कर फिर से सत्तासीन होने के दीवास्वप्न देख रही हो परन्तु देश की जनता मनमोहनी सरकार के कुशासन से इतने त्रस्त हैं कि वह इसको आगामी लोकसभा चुनाव में उखाड फेंकने का मन बना चूकी है। सोनिया गांधी जब तक कांग्रेस सरकार व संगठन में मनमोहन जैसे हवाई नेताओं को वरियता दे कर जमीनी नेताओं को नजरांदाज करती रहेगी तब तक कांग्रेस सत्तासीन नहीं हो पायेगी।
सोनिया गांधी के नेतृत्व में चलने वाली मनमोहनी सरकार के कुशासन से त्रस्त नेहरू, इंदिरा ही नहीं नरसिंह राव व राजीव गांधी के कार्यकाल में भी उत्तराखण्ड को हमेशा कांग्रेस में महत्वपूर्ण स्थान केन्द्रीय मंत्रीमण्डल में मिलता रहा। परन्तु जबसे सोनिया गांधी के हाथों में कांग्रेस की कमान आयी तब से उत्तराखण्ड की शर्मनाक उपेक्षा कांग्रेस केन्द्रीय सरकार व संगठन दोनों में करती रही। इसकी तस्वीर कांग्रेस द्वााा घोषित कांग्रेस कमेटी व मनमोहन सिंह की सरकार में स्पष्ट झलकता है। लगता है कांग्रेस नेतृत्व को उनके सलाहकार उनको जमीनी नेताओं से दूर व जनता से कटे हुए नेताओं को सरकार व संगठन में लेने की सलाह देते रहते। कांग्रेस ने अपनी नयी कार्यकारणी का 16 जून को घोषित की। कांग्रेस अध्यक्षा सोनिया गांधी व उपाध्यक्ष राहुल गांधी द्वारा बनायी गयी इस कार्यकारणी में अहमद पटेल को कांग्रेस अध्यक्षा के राजनैतिक सचिव, मोतीलाल बोरा को कांग्रेस का कोषाध्यक्ष व जर्नाजन द्विवेदी महासचिव के पद पर बरकरार रखने में सफल रहे जो इन तीनों की कांग्रेस नेतृत्व पर मजबूत पकड़ दर्शाती  है। 12 महासचिव व 42 सचिव वाली भारी भरकम कांग्रेस की नयी कार्यकारिणी में अम्बिका सोनी को महासचिव बनाया गया, उनको हिमाचल, कश्मीर व उत्तराखण्ड का प्रभार दिया गया। उत्तराखण्ड के लोगों ने चोधरी वीरेन्द्रसिंह को उत्तराखण्ड के प्रभारी पद से मुक्त करने पर राहत की सांस ली। जिस प्रकार भाजपा की सरकार के दोरान अनिल जैन व थावर गहलोत ने प्रदेश की जनभावनाओं का अनादर करके वहां नेतृत्व थोपना व प्रदेश की यर्थाथ स्थिति से आला नेतृत्व को गुमराह किया वेसे ही काम चैधरी वीरेन्द्रसिंह ने अपने कार्यकाल में उत्तराखण्ड में किया। इससे जहां उन्होंने ऐसे लोगों को आगे बढाते हुए थोपा जिनका प्रदेश के जनसरोकारों से कहीं दूर दूर तक कोई वास्ता ही नहीं रहा।
नयी कार्यकारणी में  उत्तराखण्ड से राहुल गांधी टीम के युवा नेता प्रकाश जोशी को अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी में सचिव बनाया गया। सतपाल महाराज के बाद पहली बार किसी उत्तराखण्ड के नेता को कांग्रेस की कार्यकारणी में सचिव पद पर आसीन किया गया। सबसे हैरानी की बात यह है कि इंदिरा गांधी के जमाने में सेक्रेटरी जनरल रहे हेमवती नन्दन बहुगुणा, के सी पंत व नारायण दत्त तिवारी के बाद हरीश रावत व सतपाल महाराज जैसे पूरे देश में व्यापक प्रभाव रखने वाले दिग्गज नेताओं को कांग्रेस नेतृत्व ने महासचिव जैसे ताकतवर पदों पर आसीन करने की जरूरत तक महसूस नहीं की। ऐसा नहीं की कांग्रेस ने केवल केन्द्रीय संगठन में उत्तराखण्डियों को नकार रही है अपितु गत लोकसभा चुनाव में  प्रदेश की सभी  पांचों संसदीय सीटों से कांग्रेसी उम्मीदवारों को जीता कर प्रदेश से भाजपा का पूरी तरह से सफाया करने का जिस उत्तराखण्ड ने किया उसको केन्द्रीय मंत्रीमण्डल में महत्वपूर्ण कबीना मंत्री का स्थान देने की नैतिकता भी कांग्रेस नेतृत्व को नहीं रहीं। हाॅं बाद में जब पूरे प्रदेश में जब कांग्रेस आला नेतृत्व द्वारा उत्तराखण्ड के साथ सौतेले व्यवहार की कडी भत्र्सना हुई तो उन्होंने बाद में हरीश रावत को पहले राज्य मंत्री व बाद में जल संसाधन जैसा हल्का समझा जाने वाला मंत्रालय दिया। वहीं हिमाचल से कांग्रेस के एक सांसद विजय होने पर वहां से 2 कबीना व एक राज्य मंत्री बनाया गया। यही नहीं सात संसदीय सीट वाले प्रदेश दिल्ली से तीन-तीन सांसदों को केन्द्रीय मंत्रीमण्डल में स्थान दिया गया उत्तराखण्ड में ऐसे विजय बहुगुणा को मुख्यमंत्री थोपा गया जिनको न तो प्रदेश के कांग्रेस पार्टी के विधायक ही स्वीकार कर रहे हैं व नहीं प्रदेश की जनता ने। प्रदेश की जनता में विजय बहुगुणा की छवि कैसी है इसका नमुना उनके संसदीय क्षेत्र टिहरी में उनके द्वारा खाली किये गये सीट से उनके मुख्यमंत्री रहते हुए भी उनके बेटे को जीत नसीब नहीं हो पायी। यही नहीं गत माह सम्पन्न हुए स्थानीय निकाय चुनाव में प्रदेश की जनता ने कांग्रेस को जो करारा जवाब दिया। उसके बाबजूद कांग्रेसी नेतृत्व द्वारा प्रदेश में मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा को बनाये रखना से साफ हो गया कि कांग्रेस नेतृत्व को न तो प्रदेश की 5 लोकसभा सीटों की जरूरत है व नहीं 35 उत्तराखण्डी प्रभाव वाली लोकसभा सीटों पर कांग्रेस की हार होनी निश्चित है।
कांग्रेस की घोषित नयी कार्यकारणी में जिन 12 महामंत्रियों के नाम की घोषणा की गयी उनके विभागों की भी घोषणा कर दी गयी। 12 महामंत्रियों व उनके प्रभार इस प्रकार से है। दिग्विजय सिंह को उप्र के प्रभार से हटा कर अब आंध्र प्रदेश, गोवा व  कर्नाटक का दायित्व सोंपा गया। वहीं अंबिका सोनी को हिमाचल, जम्मू-कश्मीर, उत्तराखंड और सीपीओ,  शकील अहमद को  दिल्ली,हरियाणा, पंजाब, चंडीगढ़, सीपी जोशीः को असम, बिहार, पश्चिम बंगाल व अंडमान निकोबार, बीके हरिप्रसाद को  छत्तीसगढ़, झारखंड, ओडिशा, गुरुदास कामत को  गुजरात, राजस्थान, दादरा-नगर हवेली व दमन-द्वीव, लोइजेमो फलेरो को अरुणाचल प्रदेश, मणिपुर, मेघालय, मिजोरम, नागालैंड, सिक्किम, त्रिपुर, मधुसूदन मिस्त्री को उत्तर प्रदेश, सेंट्रल इलेक्शन कमिटी तथा अजय माकन को  कम्युनिकेशन, पब्लिकेशन का दायित्व सोंपा गया। इसके साथ ही कांग्रेस के भावी आलाकमान राहुल गांधी सारे फ्रंटल संगठन देखेंगे। उनके साथ दो  सचिव प्रभात किशोर ताबियाड़, व सूरज हेगड़े को भी नियुक्त किया गया।
कांग्रेस में सबसे महत्वपूर्ण समझी जाने वाली 21 सदस्यीय कार्यसमिति में अंबिका सोनी, बीके हरिप्रसाद, डॉ. सीपी जोशी, दिग्विजय सिंह, गुलाम नबी आजाद, गुरुदास कामत, हेमा सेतिया, जनार्दन द्विवेदी, मधुसूदन मिस्त्री, मोहन प्रकाश, मोतीलाल वोरा, मुकुल वासनिक, शकील अहमद, कुमारी सुशीला को शामिल किया गया है। निकट भविष्य में कुछ महत्वपूर्ण नेताओं को कार्य समिति में सम्मलित करने के उदेश्य से कुछ स्थान खाली रखे गये।
कांग्रेस की स्थाई कार्यसमिति में स्थायी आमंत्रित सदस्यों में डॉ. करण सिंह, एमएल फोतेदार, मोहसिना किदवई, मुरली देवड़ा, ऑस्कर फर्नांडिस, पी. चिदंबरम, आरके धवन,अमरिंदर सिंह, बेनी प्रसाद वर्मा, केएस राव, एमवी राजशेखरन,  एसएम कृष्णा, शिवाजीराव देशमुख को शामिल हैं। इसके अलावा विशेष आमंत्रित सदस्यों में अनिल शास्त्री, जी. संजीव रेड्डी, रशीद मसूद व  राजबब्बर हैं।

भाषा आंदोलन को रौंदने का दण्ड भोग रहे हैं अटल व आडवाणी


सत्तासीन हो कर भाषा के लिए अटल आडवाणी ने किये दो कार्य
1-संयुक्त राष्ट्र संघ में हिन्दी बोल कर, भारत में हिन्दी की जडों को काटने का काम
2-भाषा आंदोलन को कुचलने जैसे जघन्य कार्य

नई दिल्ली (प्याउ)। सत्तामद में चूर हो कर भाषा आांदोलन को रौंदने के अभिशाप का दण्ड भोग रहे हैं अटल व लालकृष्ण आडवाणी’ । जैसे ही संसद की चैखट पर चल रहे भारतीय भाषा आंदोलन में भाषा आंदोलन के पुरोधा पुष्पेन्द्र चोहान ने आडवाणी की दयनीय स्थिति पर हो रही चर्चा पर यह दो टूक बात कही तो एक पल के लिए आंदोलनकारी सन्न रह गये। सन्न रहना भी था क्योंकि अटल व लालकृष्ण आडवाणी की ही नहीं भारतीय जनता पार्टी की छवि भारतीय भाषा व संस्कृति के मूल्यों के लिए संघर्ष करने वाले राष्ट्रवादी नेताओं की दशकों से बनी हुई है। श्री चैहान ने कहा कि कांग्रेस सहित अन्य दलों की सरकारों ने तो भारतीय भाषाओं की जडों में मट्ठा तो डालने का काम तो किया ही लेकिन भारतीय भाषाओं व राष्ट्रवाद के पुरोधा बन कर जो दो काम अटल व आडवाणी ने किये उससे आज भी देश स्तब्ध है। राजग गठबंधन में सत्तासीन होते ही अटल आडवाणी की सरकार ने भाषा के लिए अब तक दो किये दो महत्वपूर्ण कार्य पहला -संयुक्त राष्ट्र संघ में हिन्दी बोल कर,भारत में हिन्दी की जडों को काटने का काम करना तथा दूसरा -भाषा आंदोलन को कुचलने जैसे जघन्य कार्य करा प्रमुख है। श्री चैहान ने कहा कि सत्तासीन होते ही अटल व आडवाणी की सरकार को भारतीय भाषाओं में नहीं अपितु अंग्रेजी में ही इंडिया इज राइजिंग नाउ और साइनिंग नाउ का खुमार चढ़ा हुआ था। इसी सत्तामद में चूर हो कर भारतीय भाषाओं के ऐतिहासिक आंदोलन को कुचलने का निकृष्ठ काम करके अटल-आडवाने ने राष्ट्र के साथ अक्षम्य अपराध किया और यही कृत्य उनकी वर्तमान दुर्दशा व शर्मनाक पतन का प्रमुख कारण है।

अपने इस रहस्य को खुद ही खोलते हुए भाषा आंदोलन के पुरोधा पुष्पेन्द्र चैहान ने कहा कि भाजपा के शीर्ष नेता अटल व लालकृष्ण आडवाणी दोनों ने जिस शर्मनाक ढ़ग से राजग शासनकाल में सत्तासीन होते ही 1988 से संघ लोकसेवा आयोग के द्वार पर 14 साल से चल रहे भारतीय भाषाओं के उस आंदोलन को रौंदने का काम किया, जिसमें खुद अटल बिहारी वाजपेयी व लालकृष्ण आडवाणी समर्थक बन कर प्रमुखता से इसमें सम्मलित हुए थे और संसद से लेकर सड़क में इस आंदोलन का खुला समर्थन करते थे। प्रधानमंत्री बनने के बाद अटल बिहारी वाजपेयी व उप प्रधानमंत्री -गृहमंत्री बनने के बाद लालकृष्ण आडवाणी ने देश से अंग्रेजी की गुलामी को दूर करते हुए पूरे तंत्र में हिन्दी सहित भारतीय भाषाओं को स्थापित करने के बजाय सन्2002 में भारतीय भाषाओं के आंदोलन को ही सत्तामद में चूर हो कर पुलिसिया दमन से उखाड़ फेंकने का शर्मनाक कृत्य किया। इस पर भारतीय भाषा आांदोलनकारियों ने जब संघ लोक सेवा आयोग के द्वार के समीप ही धरना दिया तो इसमें सम्मलित पूर्व प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह ने भी तत्कालीन प्रधानमंत्री वाजपेयी से जब उनके इस आंदोलन में भाग लेने की याद दिलाते हुए इस धरना स्थल को पुलिसिया दमन से तबाह करने पर प्रश्न किया तो वाजपेयी निरूत्तर हो गये। यह अलग बात है कि स्वयं विश्वनाथ प्रताप सिंह भी प्रधानमंत्री बनने से पहले इस आंदोलन स्थल में इस आंदोलन मे बेठे थे परन्तु प्रधानमंत्री होने पर वे भी इस मामले को नजरांदाज कर गये। भाषा आंदोलन के लिए संसद से लेकर सडक तक ऐतिहासिक संघर्ष करने वाले भाषा आंदोलन के पुरोधा पुष्पेन्द्र चैहान ने बेहद दुखी मन से कहा कि कि संघ लोकसेवा आयोग के द्वार पर 1988 से 2002 तक चलने वाला आंदोलन यह सामान्य धरना या आंदोलन स्थल नहीं था। यह देश को अंग्रेजी की गुलामी से मुक्त करने का एक जीवंत तपस्थली रही। पूर्व राष्ट्रपति ज्ञानी जैलसिंह के संरक्षण में चले इस आंदोलन में यहां पर स्वयं वाजपेयी व आडवाणी ही नहीं अपितु पूर्व राष्ट्रपति ज्ञानी जेल सिंह, वीपीसिंह, देवीलाल, चतुरानन्द मिश्रा, पासवान,मदन लाल खुराना सहित 40 से अधिक सांसद व कई पूर्व राज्यपाल, साहित्यकार, समाजसेवी, सक्रिय रूप से भाग लेेते थे। यही नहीं यहां पर देश के अग्रणी सम्पादकों ने भी भी इस आंदोलन के समर्थन में यहां पर धरने में बेठे थे। यह धरना आजादी के बाद सभी वरिष्ट राजनेताओं, वरिष्ठ पत्रकारों, बुद्धिजीवियों, समाजसेवियों के लिए देश से अंग्रेजी की गुलामी से मुक्त करने का प्रेरणा ज्योति बन चूका था। राष्ट्रवाद के इस प्रखर आंदोलन की मांग को स्वीकार करने के बजाय अटल व आडवाणी ने सत्तामद में चूर हो कर 2002 में तपस्थली को पुलिसिया दमन से रौंदवा कर राष्ट्र की लोकशाही, स्वाभिमान व मूल्यों पर अक्षम्य कुठाराघात किया।
भाषा आंदोलन के पुरोधा चैहान के तर्को में मुझे सच्चाई नजर आयी। क्योंकि जिस भारतीय संस्कृति के स्वयं भू ध्वजवाहक होने का दम्भ संघ पोषित भारतीय जनता पार्टी के शीर्ष नेता अटल व आडवाणी सत्तासीन होने से पहले सड़कों से लेकर संसद में करते थे, उसी भारतीय संस्कृति की संवाहिका हिन्दी सहित तमाम भारतीय भाषाओं को देश के शासन प्रशासन तंत्र में स्थान दिलाने के लिए 1988 से संघ लोकसेवा आयोग पर चलाये ऐतिहासिक आंदोलन को पूरी तरह से तबाह कर दिया था।
हालांकि मेरे मन में डेढ़ दशक पहले ही इनकी पदलोलुप छवि बेनकाब हो चूकी थी। मुझे भाषा आंदोलन के पुरोधा पुष्पेन्द्र चैहान के कथन पर सच्चाई नजर आयी। वेसे मेरे मन में पहले से थाा कि अटल व आडवाणी की जो वर्तमान दयनीय हालत है उसके लिए भगवान राम व गो द्रोह के साथ साथ कश्मीर व आतंकी पाक पर अपने राष्ट्र को दिये गये वचनों को रौंदना प्रमुख है। यही नहीं संसद हमला, कंधार, कारगिल व एफबीआई प्रकरण का दंश देश के विश्वास पर कुठाराघात करते रहे। जिस प्रकार से भारत के वाल्कों सहित नवरत्न उद्यमों को औने पौने दामों पर निजी क्षेत्र के हाथों में सौंपने, ताबूत घोटाला, बंगारू घूस प्रकरण व रक्षा मंत्री को अमेरिका द्वारा अपमानित करने वाले शार्मनाक प्रकरण पर अटल आडवाणी का शर्मनाक मौन रखने से भी जनता के विश्वास को अटल व आडवाणी की राजग सरकर के कृत्यों ने पूरी तरह से हिला दिया।
श्री चैहान के इस कथन में सत प्रतिशत सच्चाई है। हालांकि अटल व आडवाणी के नेतृत्व में दोनों ने जमीनी राष्ट्र समर्पित बलराज माधोक, गोविन्दाचार्य, कल्याणसिंह, उमा भारती, मदन लाल खुराना जैसे दिग्गज जननेताओं को अपनी पदलोलुपता व संकीर्ण स्वार्थ के लिए हाशिये में धकेलने तथा सुषमा, जेटली, अनन्त, नायडू, जैसे नेताओं को पार्टी के महत्वपूर्ण पदों पर थोप कर जनता से पार्टीी को दूर कराने का काम किया। वहीं आडवाणी ने भारत विभाजन के दोषी जिन्ना की स्तुति कर अपनी अवसरवादिता को खुद ही बेनकाब किया। कुल मिला कर भाजपा को भी कांग्रेस की तरह ही देश की जनता की आशाओं में वज्रपात करने का गुनाहगार बनाया तो अटल आडवाणी ने अपने शासनकाल में।
इस प्रकरण पर मुझे याद आते हैं महान रहस्यमयी शक्तियों के स्वामी काला बाबा का कथन कि काल की लाठी में कभी आवाज नहीं होती और काल कभी लाठी उठा कर किसी को मारने नहीं आता। गौरतलब है कि कभी इंदिरा, अटल, वीपी व नरसिंह राव जिन काला बाबा के दर पर उनके आशीर्वाद लेते थे और जो अपनी रहस्मय विलक्षण शक्तियों से देश के हुक्मरानों व आम जनमानस को अचम्भित करने वाले काला बाबा के कथन व उनका दिव्य चेहरा मुझे बार-बार अन्याय के खिलाफ संघर्ष करने की नयी ऊर्जा व शक्ति प्रदान करता है।

प्रकृति से खिलवाड़ करने से मचा उत्तराखंड में प्राकृतिक आपदा का तांडव


-धारी देवी डुबोने व प्रदेश में सैकड़ों बांध बनाकर प्रकृति से खिलवाड़ करने को उतारू सरकार

-केदारनाथ में भारी तबाही  उफान से 60 लोग लापता, प्रदेश में पोने दो सो होटल व मकान बहे

-उत्तरकाशी रूद्रप्रयाग, टिहरी, चमोली, पिथोरागढ़ व देहरादून में चारों तरफ मची अति वर्षा से तबाही

एक तरफ सरकार विकास के नाम पर लाखों लोगों की आस्था के केन्द्र माॅं धारी देवी की मंदिर को श्रीनगर में अलकनन्दा पर बनने वाले बांध में डूबोने को उतारू है। वहीं प्रकृति उत्तराखण्ड में मानसून से पहले ही अतिवर्षा से भारी तांडव मचा रही है। प्रदेश में पाने दो सो से अधिक मकान ध्वस्थ हो गये। 5 दर्जन से अधिक लोग काल कल्वित हो गये है। 50 हजार लोग जहां तहां फंसे हुए है। केन्द्र सरकार के सहयोग से प्रदेश सरकार तीन दिन बाद 10 होलीकप्टरों से प्रभावित क्षेत्रों में राहत सामाग्री पंहुचायेंगे।  देवभूमि में इस तांडव को लोग प्रदेश की जनआस्था व प्रकृति  से खिलवाड कर रही प्रदेश सरकार के कुशासन से नाराज प्रकृति का प्रकोप मान रहे हैं। वहीं प्रदेश के बुद्धिजीवी भी इस बात से हैरान है कि जब से प्रदेश के शासन में मुख्यमंत्री के रूप में विजय बहुगुणा आसीन हुए तब से उत्तराखण्ड में प्रकृति का तांडव लगातार जारी है। गत वर्ष भी चार धाम यात्रा व इसी इसी मौसम में जो भारी तांडव मचा, उससे लोग सहमें हुए है। हालांकि पहले भी प्रदेश में प्राकृतिक आपदायें होती रहती परन्तु जिस प्रकार का तांडव इन दोनों सालों में देवभूमि में प्रकृति मचा रही है उससे लोगों में यह धारण घर बना गयी है कि विजय बहुगुणा का मुख्यमंत्री बनना प्रदेश के लिए किसी विपदा से कम साबित नहीं हो रहा है। जबसे प्रदेश में विकास के नाम पर बांध का निर्माण सरकारों ने पर्यावरणविदों के भारी विरोध के बाबजूद किया तब से इस गंगा यमुना की पावन धरती पर बादल फटने व अतिवर्षा के कारण प्राकृतिक आपदाओं की बाढ़ ही आ गयी है। ऐसा लग रहा है भगवान शिव, शक्ति ही नहीं भगवान बदरीनाथ सहित प्रकृति भी कुपित है इनके कृत्यों से । गंगा यमुना की उदगम स्थली उत्तराखण्ड में आयी विनाशकारी मूसलाधार वर्षा से हरिद्वार से दिल्ली सहित तमाम तटवर्ती शहरों में बाढ़ की आशंका बढ़ गयी है और प्रशासन ने लोगों को सजग रहने के लिए कह दिया है। वहीं उत्तराखण्ड के मुख्यमंत्री 16 जून तक भारी वर्षा में दिल्ली में थे। दिल्ली में मोसम खराब व वर्षा होने के कारण वायुमार्ग से मुख्यमंत्री नहीं जा पाये। 17 जून को वे देहरादून के लिए पंहुच पाये। वहीं केलाश मानसरोवर यात्रा भी रोक दी गयी।
दूसरी तरफ उत्तराखण्ड में तीन दिनों से हो रही मूसला धार वर्षा के कारण भारी तांडव मचा हुआ है। सुत्रों के अनुसार केदारनाथ के समीप  वासुका ताल में भारी बरसात के कारण आये उफान से कम से कम 60 लोग के बहने की आशंका है। कम से कम 100 घर इसके नीचे दब गये है। रामवाड़ा में भी भारी तबाही,बूढा केदार में भी कई दुकाने बही।  प्रशासन ने सेना व वायुसेना की मदद की गुहार लगायी।
वहीं उत्तरकाशी, चमोली,रूद्रप्रयाग,देहरादून व पिथोरागढ़ में भारी वर्षा से एक दर्जन से अधिक लोगों की दर्दनाक मौत हो गयी। समाजसेवी जगदीश भट्ट ने दूरभाष में बताया कि झूलाघाट में महाकाली नदी ने विकराल रूप    धारण करने से स्थानीय लोग सहमें हुए है। श्री भट्ट के अनुसार यह सब गोरी गंगा पर बने एनएचपीसी के डाम से पानी छोडने से हुआ । उत्तरकाशी में 8, रुद्रप्रयाग में 5 दर्जन लोग लापता हैं,  अल्मोड़ा में 4, देहरादून में 10, देवाल ,टिहरी व पिथोरागढ़ में 7  लोग अतिवर्षा के शिकार हो गये है। प्रदेश में 3 दिन से लगातार हो रही मूसलाधार अतिवर्षा ने 88 साल पुराना रिकार्ड तोड दिया है। उत्तरकाशी में बर्षा ने तांडव मचा दिया है। यहां नागरिक प्रशासन की मदद के लिए सेना को तेनात कर दिया गया है।  पिथोरागढ़ में धारचूला में काली नदी में बहा युवक, रूद्रप्रयाग जनपद के अगस्त्यमुनि के सिल्ली में झूला पुल बहा, गंगा समेत प्रदेश की तमाम नदियों का जलस्तर बढ़ा बारिश का 88 साल का रिकार्ड टूटा सेना को बुलाया, गौरीकुंड में खड़ी बस और पांच छोटे वाहन बहे केदारनाथ, रामबाड़ा और गौरीकुंड व सोनप्रयाग में भी तबाही मची हुई है। टिहरी के धनौल्टी में भी बादल फटने से तबाही की खबर है। कर्णप्रयाग, रूद्रप्रयाग, श्रीनगर सहित अलकनन्दा के विकराल रूप धारण करने से नदी के किनारों में बने कई होटल व दुकाने बह गयी। अलकनन्दा, भागीरथी ही नहीं मंदाकिनी, पिण्डर, गोला व रामगंगा सहित तमाम नदियों में उफान मचा हुआ है।
बांध कम्पनी ने धारी देवी मंदिर को डूबाने के लिए 16 जून की सांयकाल अलकनंदा में भारी उफान आने की आड में माॅं धारी देवी की मूर्ति को अस्थाई मंदिर में भारी पुलिस प्रशासन की उपस्थित में रख दिया है। गौरतलब है धारी देवी मंदिर को डूबाने के लिए बांध निर्माण कम्पनी, प्रदेश सरकार की शह पर लम्बे समय से इसे पावन तीर्थ को डूबाने को उतारू था। परन्तु जनआस्था से जुडे इस स्थान को डूबाने का निरंतर भारी विरोध को देखते प्रशासन व बांध निर्माण कम्पनी अपने इरादों में सफल नहीं हुए। परन्तु मानसून से आयी इस अतिवर्षा की आड में बांध निर्माण कम्पनी ने सरकार की शह पर अपने इरादों को अंजाम दिया। इससे लोगों की धार्मिक आस्था को गहरा धक्का लगा। हालांकि बांध निर्माण कम्पनी ने आहत जनता की भावनाओं को मरहम लगाने के लिए धारी देवी की मूर्ति को धारी देवी के निकट और ऊंचे स्थान में एक ना धारी मंदिर बना रही है। अभी धारी देवी की मूर्ति को अस्थाई मंदिर में स्थापित किया गया है।
 इस अतिवर्षा से जहां उत्तराखण्ड में चार धाम यात्रा व हेमकुण्ड यात्रा रूकी, सीमान्त जनपद चमोली में अलकनन्दा व पिंडर आदि सभी नदियों में भारी उफान, गोविन्दघाट -फांगरिया पुल बहा, पार्किग के साथ कई बाहन बहे,  लामबगड में 100 मीटर राजमार्ग बहा, उत्तरकाशी में भागीरथी का तांडव,4 बाहन बहे,  जोशीवाडा में 50 से अधिक मकान बहे,  विशनपुर में दिल्ली वाली धर्मशाला बही, इसमें रूकने वाले 300 यात्रियों को सुरक्षित बचा लिया गया। पिथोरागढ़ में काली नदी ने तांडव मचा रखा है। इस अतिवर्षा से चार धाम व हेमकुण्ड के दर्शन के लिए आाने वाले 25 हजार से अधिक श्रद्धालु जहां तहंा सडकों में फंसे हुए है।
शेष श्रीकृष्ण कृपा। हरि ओम तत्सत्। श्रीकृष्णाय् नमो। 

Sunday, June 16, 2013


आखिर कब तक थोपी जायेगी देश में अंग्रेजी की गुलामी 


देश को अंग्रेजी की गुलामी से मुक्ति के लिए निर्णायक संघर्ष मे सम्मलित हो राष्ट्रभक्त


देश के स्वाभिमान व लोकशाही की रक्षा के लिए देश का पूरा शासन प्रशासन देश की भाषा में राजकाज हो न की अंग्रेजी भाषा में। देश को भले ही अंग्रेजो ंसे मुक्ति 15 अगस्त 1947 को मिल गयी हो परन्तु हो परन्तु आज 65 साल बाद भी देश के हुक्मरानों ने देश को अंग्रेजी भाषा का गुलाम बना रखा है। देश की लोकशाही को कार्यपालिका, न्यायपालिका व विधायिका में अंग्रेजी की गुलामी थोपे रख कर न केवल आजादी के महान शहीदों व स्वतंत्रता संग्राम सैनानियों का घोर अपमान किया जा रहा है अपितु देश की आजादी को बंधक बना दिया गया है।

उसको देश के अग्रेजी मानसिकता के स्वयंभू गुलाम हुक्मरानों की नालायकी के कारण संसार की प्राचीन, समृद्ध, सर्वश्रेष्ठ व सबसे ज्यादा बोली जाने वाली संस्कृत, हिन्दी, तमिल आदि भाषाओं के बाबजूद उन्हीं अंग्रेजों की भाषा अंग्रेजी की गुलामी शर्मनाक ढ़ग से देश पर थोप कर देश के स्वाभिमान व लोकशाही को रौंदने का राष्ट्रद्रोही कृत्य किया जा रहा है।
1947 से आज तक देश की आजादी को अंग्रेजी गुलामी से मुक्त कराने के लिए निरंतर समय समय पर देशभक्तों ने जो संघर्ष का अलख जगाया उसके बाबजूद देश के हुक्मरानों की अंग्रेजी की खुमारी अभी तक नहीं टूट रही है। इसके बाबजूद 1947 से लेकर आज तक हजारों देशभक्त देश से अंग्रेजी से मुक्त करने व भारतीय भाषाओं में शासन प्रशासन चलाने के लिए संघर्ष रत है। इसी दिशा में गांधी जी, नेताजी सुभाष चन्द्र बोस, पुरूषोत्तम दास टन्डन, लोहिया जी के नेतृत्व में देश ने समय समय पर इस दिशा में देश को अंग्रेजी गुलामी से मुक्त करने के लिए ‘अंग्रेजी में काम न होगा, फिर से देश गुलाम न होगा’ के नारों से देश में व्याप्त अंग्रेजी गुलामी से मुक्त कराने का ऐतिहासिक प्रयास किया।
इसी दिशा में सैकडों सपूतों ने अलग अलग क्षेत्रों में अंग्रेजी की गुलामी के वर्चस्व को चुनौती देने का महत्वपूर्ण कार्य किया।
1988 में संघ लोकसेवा आयोग में भारतीय कार्यपालिका की प्राणवायु देने वाली संघ लोकसेवा आयोग के समक्ष अंग्रेजी भाषा की गुलामी से मुक्त करने के लिए भाषा आंदोलन के पुरोधा पुष्पेन्द्र चैहान व स्व. राजकरण सिंह के नेतृत्व में सकडों साथियों ने ऐतिहासिक डेढ़ दशक का आंदोलन किया।
इसी दिशा में दिल्ली आई आईटी में शोध हिन्दी में लिखने के लिए डा श्याम रूद्र पाठक ने, आयुर्विज्ञान संस्थान में मेडिकल की प्रारभ्मिक परीक्षाओं को हिन्दी में कराने के लिए ओम प्रकाश हाथ पसारिया, रूड़की इंजीनियरिग में मुकेश जैन एवं इंजीनियरिंग में विनोद गौतम सहित अनैक देशभक्त महान साथियों ने अंग्रेजी के वर्चस्व को चुनोती दे कर भारतीय भाषाओं की राह प्रशस्त किया।
आज दिल्ली में भी जहां 4 दिसम्बर 2012 से सोनिया गांधी के आवास पर सर्वोच्च न्यायालय व उच्च न्यायालय में भारतीय भाषाओं में न्याय दिलाने के लिए डा श्याम रूद्र पाठक व गीता मिश्रा जी निरंतर धरना दे रहे है। परन्तु न तो कांग्रेस आला कमान के कान में जूं रेंगी व नहीं मनमोहन सरकार के।
यह शर्मनाक स्थिति को देख कर और देश में व्याप्त अंग्रेजी की गुलामी के मोहपाश मं बंधी देश के हुक्मरानों व जनता को जगाने के लिए मजबूर हो कर 1988 से 14 साल तक संघ लोकसेवा आयोग पर ऐतिहासिक संघर्ष चलाने वाले भारतीय भाषा आंदोलन ने भाषा आंदोलन के पुरोधा पुष्पेन्द्र चैहान व महासचिव देवसिंह रावत 21 अप्रेल 2013 को संसद की चैखट, राष्ट्रीय धरना स्थल जंतर मंतर पर अखण्ड धरना शुरू कर दिया है। इस धरने में महात्मा गांधी जी के साथ कई वर्षो तक रहने वाले एकमात्र पोते कानू गांधी, जय प्रकाश नारायण सहित भाषा आंदोलन के अग्रणी पुरोधा देश के अग्रणी पत्रकार हबीब अख्तर, अध्यक्ष डा बलदेव बंशी, उप्र के पूर्व दर्जाधारी मंत्री व रंगकर्मी यशवंत निकोसे, यूनीवार्ता के पूर्व समाचार सम्पादक बनारसीसिंह,भाषा वरिष्ठ आंदोलनकारी विनोद गौतम व ओमप्रकाश, श्याम जी भट्ट, सतीश मुखिया, बी एस चोहान, डीएस राठौर, नवीन सिसोदिया , सरदार महेन्द्रसिंह,,चन्द्रवीर सिंह, अखिलेश गौड़, बीडी दिवाकर, जगदीश भट्ट, रामहित नन्दन, हरिराम तिवारी, हरपाल जी, विजय गौतम, मुरार कण्डारी, हुकम सिंह कण्डारी व श्रीमती झूनझूनवाला सहित सैकडों देशभक्त इस आंदोलन में भाग ले रहे है। आज भारत माता आपकी राह देख रही है कि कब मेरे सपूत मुझे इस अंग्रेजी की बेडियों से मुक्त कराते हैं।

Saturday, June 15, 2013


चंगैजी ठेकेदारी प्रथा से श्रमिकों व कर्मचारियों को लुटवा रही है सरकार 


प्रधानमंत्री आवास पर श्रमिकों व कर्मचारियों को शोषण से मुक्त कराने के लिए पीड़ित कर्मचारियों ने बोला धावा 

कर्मचारियों व श्रमिकों को लूटने के तीन दोषी सरकार, अधिकारी व ठेकेदार 

नई दिल्ली(प्याउ)। सरकार आज भ्रष्ट ठेकेदारों व उच्चाधिकारियों की मिली भगत से देश में जंगेजी ठेकेदारी प्रथा को निजी क्षेत्र व सरकारी क्षेत्र में बलात थोप कर करोड़ों मजदूर व कर्मचारियों का बंधुआ मजदूरों से बदतर शोषण करा रही है। चंगैजी ठेकेदारी प्रथा के कारण आज हर महिने कर्मचारियों का आधा वेतन ठेकेदार, अधिकारियों व नेताओं डकार रहे हैं। वहीं उससे 12 से 18 घण्टों का काम ले कर श्रमिक हितों का गला घोंटा जा रहा है। 
14 जून को सायंकाल बड़ी संख्या से दिल्ली नगर निगम में वर्षो से बंधुआ मजदूरों से बदतर स्थिति में काम कर रहे चतुर्थ श्रेणी के कर्मचारियों ने यकायक प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के आवास पर धावा बोल कर उनसे न्याय की गुहार लगायी। अचानक दिल्ली नगर निगम के कर्मचारियों की जायज मांगों व सरकारी नगर निगम में हो रहे वर्षो से शोषण से प्रधानमंत्र.ी कार्यालय भी शर्मसार हुआ। दिल्ली नगर निगम में हजारों कर्मचारियों को जो चोकीदार, सफाई कर्मचारी आदि चतुर्थ श्रेणी के पदों पर वर्षो से अस्थाई रूप से काम कर रहे है। उनको न तो नियमित ही किया जा रहा है। उनको वेतन भी कम मिल रहा है। यही नहीं चोकीदार से तो 12 से 17 घण्टों की नोकरी ली जा रही है। जिसके लिए उसको न कोई अतिरिक्त वेतन दिया जा रहा है और कर्मचारियों के अधिकारों का खुला उल्ंाघन किया जा रहा है। 
किसी प्रकार से कर्मचारियों के नेता ईश्वर भारद्वाज सहित आंदोलनकारी कर्मचारियों को मना कर पुलिस प्रशासन के बल पर वहां से वापस जंतर मंतर पर भेज दिया गया। जंतर मंतर पर दिल्ली नगर निगम के ये पीड़ित कर्मचारी कई महिनों से अपनी मांगों को लेकर लोकहित मोर्चे के बेनर तले धरना दे रहे है। विगत सप्ताह से कर्मचारियों की मांगों के समर्थन में आमरण अनशन भी चल रहा था। अनशनकारियों की हालत नाजुक देख कर आक्रोशित कर्मचारियों ने पहले प्रधानमंत्री आवास पर धावा बोला। वहां से आने के बाद जब जंतर मंतर पर कर्मचारी आये तो उन्होंने वहां पर सभा की। इसी दौरान दिल्ली नगर निगम के चिकित्सकों का एक दल अनशनकारियों के स्वास्थ्य की जांच करने धरना स्थल पर आया, इसी दोरान कर्मचारियों ने अनशनकारियों की स्थित नाजुक होने के बाबजूद दिल्ली नगर निगम के वरिष्ठ अधिकारियों के कान में जूं तक नहीं रेंगी तो कर्मचारियों ने संसद मार्ग की जाम कर दिया। सडक जाम होते देख कर पुलिस प्रशासन ने कर्मचारियों को हटाना चाहा परन्तु आक्रोशित कर्मचारियों ने पुलिस प्रशासन से नगर निगम के वरिष्ठ अधिकारियों को धरने पर बुलाने की मांग की। स्थिति को भापंते हुए नई दिल्ली के पुलिस उपायुक्त ने दिल्ली नगर निगम के उच्चाधिकारी को तुरंत धरने पर आ कर कर्मचारियों की मांग सुनने का आग्रह किया। पुलिस प्रशासन द्वारा स्थिति की जानकारी पा कर दिल्ली नगर निगम के उच्चा अधिकारियों का एक शिष्टमण्डल धरना स्थल पर आया और उसने कर्मचारियों को आश्वासन दिया कि वह उनकी मांगों पर गंभीरता से विचार करके जल्द ही कर्मचारियों के हित में महत्वपूर्ण कदम उठायेगे। अधिकारियों के आश्वासन को लागू करने की मांग को लेकर कर्मचारियों का अनशन व धरना जंतर मंतर पर जारी है।