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Thursday, May 31, 2012


सन्यास ले या रामजन्मभूमि अवतार ले आडवाणी
-अटल बनने की अंधी ललक रही आडवाणी के पतन का कारण
-भाजपा की दुर्दशा के लिए आडवाणी भी कम जिम्मेदार नहीं, 
-गोविन्दाचार्य को नेतृत्व सोंपे संघ, गडकरी भी पूरी तरह असफल 

भले ही पार्टी में अपने आप को अपमानजनक ढंग से अलग थलग किये जाने व संघ-भाजपा में अपने शागिर्द नरेन्द्र मोदी को प्रमुखता दिये जाने से आहत  कभी भाजपा के शिखर पुरूष रहे लालकृष्ण आडवाणी ने इस सप्ताह मुम्बई बैठक से आहत हो कर अपनी पीड़ा को अपने ब्लाग में परोक्ष रूप से इजहार करने की तह में अगर हम जायें तो हम पायेगे कि जिस भाजपा के अटल से अधिक संगठन को मजबूत करने वाले शिखर नेता की तौर पर सम्मानित व प्रधानमंत्री पद के लिए दावेदार के रूप में कई सालों से पार्टी के मुख रहे लालकृष्ण आडवाणी ही आज संघ व पार्टी की नजरों में उपेक्षित होने के लिए खुद ही जिम्मेदार हें।
पार्टी के वरिष्ट व जमीनी नेताओं के बजाय अपनी चैकड़ी डी फोर को प्रमुखता दे कर आडवाणी ने जहां  पार्टी में लोकशाही का गला घोंटा वहीं समर्पित कार्यकत्र्ताओं में भारी निराश किया। पूरे देश में सौगन्ध राम की खाते हैं मंदिर वहीं बनायेगे व राम लल्ला हम आते हैं मंदिर वहीं बनायेगे की हुंकार भरने वाले रामजन्म भूमि जनांदोलन का नेतृत्व करने वाले आडवाणी ने जब बाबरी का कलंक ध्वस्थ होने को अपने जीवन का सबसे काला दिवस कहा तो देश के लाखों आंदोलनकारी स्तब्ध व अपने को ठगे महसूस करने लगे, जब गृहमंत्री व उपप्रधानमंत्री के रूप में पाकिस्तान जा कर वहां देश के विभाजन व 10 लाख निरापराध लोगों की हत्या के मुख्य कारक कायदे आजम मोहम्मद जिन्ना की मजार में सर झुकाने के बाद जिन्ना का गुणागान करके तिवारी ने देश का सर शर्म से झुका दिया। भारतीय संस्कृति के प्रतीक उत्तराखण्ड में ही संघ के वरिष्ठ स्वयं सेवक व जमीनी नेता भगतसिंह कोश्यारी के बजाय हवाई नेता खंडूडी व निशंक को बहुसंख्यक भाजपा विधायकों की इच्छा के विरूद्ध जबरन उत्तराखण्ड में थोपना हो या कर्नाटक में जमीनी नेता येदुरिप्पा के बजाय अपने प्यादे अनन्त कुमार को आगे करना हो या संघ प्रिय भाजपा के सबसे जमीनी नेता गोविन्दाचार्य की उपेक्षा करने में अगर कोई असली दोषी हैं तो वह लाल कृष्ण आडवाणी। आडवाणी के पतन का प्रमुख कारण अगर मुझे कोई दिखाई दे रहा है तो वह है लालकृष्ण आडवाणी का अटल की तरह ढ़ुलमुल व लचीला बनने की नापाक कोशिश। रामजन्म भूमि आंदोलन के बाद उनकी छवि कट्टरपंथी की हो गयी थी, उनको इस बात का भान हो गया था कि देश में अगर प्रधानमंत्री बनना है तो उनको भी अटल की तरह ढुलमुल यानी लचीले नेता की छवि बनानी होगी। जिन्ना प्रकरण व बाबरी मस्जिद प्रकरण के बाद उनके ढुलमुल वक्तव्य इसी दिशा में उठाये गये उनके असफल कदम यही बयान कर रहे है। वे अटल बनने की अंधी चाह ने उनको न तो आडवाणी ही रखा व नहीं अटल ही बन पाये। वे त्रिशंकु बन कर अधर में लटक गये। आडवाणी के इस कदम से संघ ने जहां उनको नेता प्रतिपक्ष से हटवाया वहीं भाजपा में उनकी पकड़ धीरे धीरे कम हो गयी। जहां तक उनके काम भी ऐसे ही रहे उन्होंने भारतीय संस्कृति व जमीनी नेता उमा भारती के बजाय सुषमा स्वराज को आगे बढ़ाया। दिल्ली के जमीनी नेता मदनलाल खुराना की दुर्गति की गयी। भाजपा में कोश्यारी, शेषाद्रिचारी जैसे साफ छवि के जमीनी नेताओं के बजाय निशंक, तरूण, जैन जैसे नेताओं को आगे बढ़ाया गया। इसी कारण भाजपा का दिन प्रति दिन कांग्रेस से अधिक पतन हो रहा है। आज लालकृष्ण आडवाणी को अपने कायो्र पर गंभीरता से मनन करना चाहिए। केवल आरोप लगाने या गडकरी आदि के चंद निर्णयों को कोसने से कोई समस्या हल नहीं होगी। भाजपा में आडवाणी की स्थिति कितनी कमजोर हो गयी है यह तो लाल कृष्ण आडवाणी को उसी दिन समझ लेनी चाहिए थी कि जिस दिन भाजपा में प्रधानमंत्री के पद के दावेदार के रूप में गत लोकसभा चुनाव में प्रमुखता से प्रचारित उनको भाजपा ने इस समय नक्कार दिया और साफ शब्दों में कहा कि अभी पार्टी ने 2014 में होने वाले लोकसभा चुनाव में अपना प्रधानमंत्री पद के दावेदार का ऐलान नहीं किया। यानी आडवाणी को पार्टी अब फायर हो चूका कारतूस ही मान रही है। ऐसे में आडवाणी को चाहिए कि वह अपनी स्थिति को समझ कर या तो अविलम्ब राजनीति से सन्यास ले या अपनी भूलों को सुधार कर अपनी रामजन्मभूमि वाले अवतार में आ कर पार्टी में जननेताओं को लेकर अपनी पकड़ बनाये। अटल की तरह ढूलमूल बन कर उनकी स्थिति ठीक ‘चोबे गये छब्बे बनने दूबे बन कर लोटे की तरह ही हो गयी है। आडवाणी व उन जेसे राजनेताओं को एक बात गांठ बांधनी चाहिए कि देश की जनता देश व समाज के स्वाभिमान के लिए राणा प्रताप जैसे जंगल की खाक छानने वाले योद्धाओं को तो युगों तक अपना आदर्श मान सकती है परन्तु अपने निहित स्वार्थ के लिए कालनेमी बने लोगों को कभी स्वीकार नहीं करती। भाजपा व राष्ट्र के हित में सन्यास की उम्र की देहरी में खडे आडवानी को चाहिए की वह अपने स्वाभिमान व भाजपा के हितों की रक्षा के लिए या तो रामजन्मभूमि वाले अवतार के रूप में फिर अवतरित हो कर देश का नेतृत्व करें या सन्यास ले कर नौजवान नेतृत्व की राह के अवरोधक न बने। भाारतीय संस्कृति के ध्वजवाहकों को इस बात का भान होना चाहिए कि उनकी उम्र सन्यास की हो गयी है अब देश की बागडोर नये नेतृत्व के हाथों सोंप दें। वेसे गडकरी का पहला कार्यकाल से साबित हो गया कि वे भारतीय संस्कृति, लोकशाही व भाजपा के तथाकथित उदघोषों के अनरूप गरिमा नय नेतृत्व देने में पूरी तरह असफल रहे। उनको सही को सही व गलत को गलत कहने का न तो साहस है व नहीं दृष्टि। भाजपा में गोविन्दाचार्य जैसे नेतृत्व की आज जरूरत है, जिसको जमीनी पकड़ व दृष्टि हो। परन्तु मोदी प्रकरण से साफ हो गया कि भाजपा में भी कांग्रेस की तरह राष्ट्रवाद से अधिक  जातिवादी संकीर्णता मजबूत है।

   

Wednesday, May 30, 2012



भाजपा की तरह टीम अण्णा को भी लगा डी फोर का ग्रहण


2014 में कांग्रेस होगी सत्ता से बाहर, भाजपा बनेगी तीसरे मोर्चे की सरकार की कहार

एक तरफ भारत में मनमोहन सिंह की जनविरोधी सरकार के मंहगाई व कुशासन के खिलाफ पूरे देश में विरोधी व समर्थक दल के कई घटकों के भारत बंद चल रहा है। वहीं दूसरी तरफ अमेरिका में भाजपा के वरिष्ट नेता यशवत सिंन्हा भाजपा की 2014 में ताजपोशी के लिए अमेरिका में भी समर्थन जुटाने में लगे हुए है। अभी मेरे अमेरिकी मित्र रयाला जी ने फेस बुक के द्वारा बताया कि भाजपा के नेता यशवंत सिन्हा अमेरिका डीसी के मिनेरवा रेस्टोरेंट में भाजपा समर्थकों के साथ आगामी 2014 में भाजपा के बढ़ते प्रभाव के बारे में बता रहे है। करीब 100 करीब लोग हैं मेरा मित्र जो अमेरिका में उच्च पद पर आसीन है वो भी उनमें से एक है।  मेने उनको सलाह दी कि यशवंत सिन्हा से पूछा कि उनकी पार्टी 2014 में तीसरे मोर्चे में नितीश कुमार को प्रधानमंत्री बनाने के लिए समर्थन देंगे या किसी अन्य को। क्योंकि 2014 में कांग्रेस को तो जनता उसके कुशासन के लिए सत्ता से बेदखल कर देगी, भाजपा को तो उसमें दशकों से काबिज गु्रप फोर व मोदी समर्थकों के आपसी द्वंद ही ले डुबेगा। इसलिए आगामी 2014 में कांग्रेस जहां सत्ता से बेदखल होगी वहीं भाजपा भी केवल तीसरे मोर्चे की सरकार को बाहर से समर्थन देने के लिए मजबूर होगी। तीसरे मोर्चे यानी भाजपा व कांग्रेस के अलावा। इस का प्रधानमंत्री नितीश आदि बन सकते हैं परन्तु मुलायम किसी भी कीमत पर नहीं बनेगे।
मेने अपने मित्र को बताया कि जिस प्रकार टीम अण्णा आज अपनी विश्वसनियता उसमें काबिज अण्णा के चार प्यारों अरविन्द केजरीवाल, प्रशांत, किरण व सिसोदिया के अलोकशाही प्रवृति के कारण जनता से दूर हो रही है वेसे ही भाजपा में आडवाणी के टीम के चार महारथी सुषमा, बैकटया, जेटली व अनंन्त जिनको डी फोर के नाम से भाजपा व संघ के मठाधीश पुकारते है, की अलोकतांत्रित चैधराहट के कारण पूरी भाजपा में तेजी से उभर रहे नरेन्द्र मोदी के विशाल छवि के कोन बनेगा प्रधानमंत्री के द्वंद के टकरावट के कारण आगामी 2014 के लोकसभाई चुनाव के दंगल के कारण सत्ता के दंगल से एक प्रकार से कांग्रेस की तरह बाहर हो गयी है। भाजपा केवल इतनी रहेगी कि वह बाहर से समर्थन देगी परन्तु सत्ता में सहभागिता नहीं करेगी। यानी उसकी स्थिति कांग्रेस से भी बदतर रहेगी। सत्तासीनों का मात्र कहार रहेगी, सत्ता का भोग भी न कर पायेगी परन्तु सत्ता के कुशासन का दण्ड अवश्य भोगेगी।



Tuesday, May 29, 2012


बहुत याद आये मुझे बिछुडे हुए साथी

बहुत याद आये मुझे बिछुडे हुए साथी
कदम न मिले न मिले दिल किसी से
बहुत याद आये मुझे रूठे हुए साथी।।
हमारी नसीबी हो या कहो बदनसीबी
हमसे बिछुड गये इस सफर के साथी
कुछ हमसे खता हुई कुछ हुई हो उनसे
दोस्ती का दामन भी छिटक गया हमसे
जीवन है जग में बेगाने सफर का मेला
इस जग मेले में मिलते बिछुडते हैं साथी
सुनायें किसे अब हाल दिल का अपना
ना वो साथी रहे न जग ही रहा अपना।।
वो हंसी के फुव्वारे वो नयनों के सावन
वो मिल कर जीवन को हसंते हुए जीना।।
दुनिया की जन्नत भी बन जाती जन्नुम
जब बिछुड जाये जग से सच्चे संगी साथी।।
-देवसिंह रावत(28 मई 2012 दोपहर 12 बजे)

मनमोहन को हटा कर देश व कांग्रेसी की रक्षा करें सोनिया 
खुदगर्ज हुक्मरानों के कारण जंगल राज में तब्दील हो गया उप्र व उत्तराखण्ड

28 मई को गंगा यमुना व भारतीय संस्कृति की आत्मा समझे जाने वाले उत्तराखण्ड व उत्तर प्रदेश दोनों की विधानसभा में जो हो हल्ला हुआ उससे विधानसभा एक दिन के लिए स्थगित कर दी गयी। दोनों प्रदेश जो कुछ समय पहले तक एक ही थे। जिनकी संस्कृति गंगा यमुना की संस्कृति के रूप में एक ही है। दोनों को अलग होने के बाबजूद एक सा ही वर्तमान है। वह है दोनों प्रदेश आज देश के सबसे भ्रष्टत्तम राज्य बने हुए है। यह नम्बर कभी लालू शासनकाल के दौरान बिहार का होता था वह आज उप्र व उत्तराखण्ड का है। जहां उत्तर प्रदेश व उत्तराखण्ड की यह हालत के लिए अगर दोषी हैं तो कांग्रेस, भाजपा, सपा व बसपा। जिन्होंने अपने जनविरोधी व लोकशाही को लुटशाही बनाने के ऐजेन्डे में काम कर भारतीय संस्कृति के इस हृदय प्रदेशों को भ्रष्टाचार व पतन का गटर बना दिया। उत्तर प्रदेश में पतन का दुर्भाग्यशाली इतिहास भी उसी एनडी तिवारी के कुशासन से प्रारम्भ हुआ जिनके कुशासन से नवोदित राज्य उत्तराखण्ड की जड़ों में भ्रष्टाचार रूपि मट्ठा उडेल दिया गया। इसके बाद भाजपा ने कोई कसर नहीं छोड़ी। वहीं उप्र में अपने संकीर्ण ऐजेन्डे से बसपा व सपा के आपसी झूटे अहं की जंग ने इसे इस मुकाम पर ला खडा कर दिया कि उप्र आज जंगल राज में बदल कर रह गया है।
वहीं उत्तराखण्ण्ड की स्थिति इतनी शर्मनाक है कि मात्र 12 साल के अपने शैशव काल में यह देश का सबसे भ्रष्टतम राज्य बन गया। यहां पर भाजपा व कांग्रेस के दिल्ली के आला कमानों ने अपने निहित स्वार्थों व संकीर्ण जातिवादी ऐजेन्डे के कारण प्रदेश की लोकशाही की निर्मम हत्या ही कर दी। यहा पर अभी 12 साल के समय में भाजपा व कांग्रेस दोनों ने यहां की जनभावनाओं को ही नहीं रोंदा अपितु अपने दल के विधायकों की राय को ही रौदते हुए यहां के जन नेताओं को प्रदेश की सत्ता सौंपने के बजाय अपने तिवारी, ,खण्डूडी, निशंक व बहुगुणा जैसे प्यादों को थोपा। आज विश्व का सबसे बडा ईमानदार व शांत प्रदेश उत्तराखण्ड भ्रष्टतम राज्य बन गया है। वर्तमान समय की स्थिति यह है कि यहां पर विधानसभा का बजट सत्र का शुभारंभ के दिन ही स्वयं प्रदेश के मुख्यमंत्री पर अपनी विधायकी सीट के लिए प्रदेश भाजपा के एक विधायक की अनैतिक खरीद परोख्त का आरोप लगते हुए हो हल्ला का भैंट चढ़ गया। भाजपा सहित उत्तराखण्ड के तमाम बुद्धिजीवी इस कृत्य को प्रदेश की लोकशाही को झारखण्ड व गोवा की तरह खरीद परोख्त की मंडी में तब्दील करने का आरोप लगा कर निंदा कर रहे है। विधानसभा के बजट सत्र के शुरू दिन ही सितारगंज के पूर्व विधायक किरन मंडल के इस्तीफे से जुड़े प्रकरण पर विपक्षी दल भाजपा ने भारी हंगामा किया। विपक्षी सदस्यों ने आरोप लगाया कि सरकार में बैठे प्रभावशाली लोगों ने पल्रोभन देकर विधायक से इस्तीफा दिलाया है। सदन में चर्चा करवा कर इस प्रकरण की जांच कराई जाए। विपक्ष का हंगामा बढ़ता देख विधान सभा अध्यक्ष गोविंद सिंह कुंजवाल ने इस प्रकरण से जुड़ा विपक्ष का कार्य स्थगन प्रस्ताव खारिज कर मंगलवार सुबह 11 बजे तक के लिए विधानसभा की कार्यवाही स्थगित कर दी। प्रदेश की स्थिति दयनीय है। इसके लिए लोग वर्तमान कांग्रेस को ही नहीं भाजपा को भी दोषी मान रहे है।
उत्तर प्रदेश की वर्तमान हालात क्या है यह तो प्रदेश के राज्यपाल के विधानमण्डल के संयुक्त बैठक को 28मई को किये गये संबोधन व उसके बाद हुए सदन की हालत से ही उजागर हो जाती है। उप्र के राज्यपाल बी एल जोशी ने बिना लाग लपेटते हुए कहा कि राज्य पिछले पाच वर्षो में देश के इतिहास में सबसे बडे भ्रष्टाचार, निर्दोष लोगों के उत्पीड़न और जंगलराज का गवाह बना। राज्यपाल ने अपने 41 पृष्ठों वाले अभिभाषण में पिछले पाच साल के शासनकाल को कोसते हुए कहा कि इस दौरान जनता को पत्थर, मूर्तियों और स्मारकों के अलावा कुछ नहीं मिला। उन्होंने कहा कि इस दौरान राजनैतिक अधोपतन के चलते पूरे प्रदेश को शर्मसार कर देने वाली कई घटनाएं घटित हुई। हालांकि यह राज्यपाल का भाषण प्रदेश की वर्तमान सत्तासीन सरकार का राजनैतिक बयान भी समझा जा सकता है। परन्तु इसके बाद सदन में बसपा व सपा के विधायकों ने इसे उधम मचा कर सदन की गरीमा को शर्मसार किया उससे राज्यपाल का यह बयान पूरी तरह सच्चा साबित कर दिया। ऐसा ही हाल उत्तराखण्ड में देखने को मिला।
उप्र की पूर्व मुख्यमंत्री मायावती ने सदियों से उपेक्षित व शोषित दलित समाज के विकास व सम्मान दिलाने के नाम पर उप्र की सत्ता में आसीन हुई थी तो दलित व वंचित समाज को आश जगी थी कि उनके दुख दर्द को दूर करने वाली उनकी अपनी नेता के पास प्रदेश की बागडोर आने के बाद अब उनके दिन सुधरेंगे। परन्तु मायावती के शासनकाल में प्रदेश के लोगों का यह भ्रम भी टूटा। अपनी पूर्ण बहुमत की सरकार होने के बाबजूद न तो प्रदेश में शोषित समाज का शोषण ही रूका व नहीं उनके विकास को वह पंख ही लगे जिसकी उनको आशा थी। अगर प्रदेश में एक अजूबा हुआ वह जो आज तक अधिकांश राजनेता नहीं कर पाये वह था मायावती द्वारा जनविकास के संसाधनों से अपनी मूर्तियों से पूरे प्रदेश को एक प्रकार ढक दिया।
हालांकि राज्यपाल ने अपने संबोधन पत्र में प्रदेश में कानून एवं व्यवस्था को चुस्त दुरुस्त करके प्रदेश में अमन चैन एवं आपसी सौहार्द कायम करने को प्रदेश सरकार की सवचर््ेच्च प्राथमिकता बताते पूर्ववर्ती बसपा सरकार की विगत पाच वर्षो के लूट खसोट के एजेंडे के स्थान पर प्रदेश सरकार ने विकास का एजेंडा तैयार किया है, जो प्रदेश को प्रगति के पथ पर ले जाने का ऐलान किया।
उन्होंने सत्तारूढ़ समाजवादी पार्टी सरकार के विकास एजेंडे और भावी कार्यक्रमों का उल्लेख करते हुए किसानो, नौजवानों, छात्र छात्राओं, अल्पसंख्यकों, दलितों एवं पिछड़ो के लिए चलाई जा रही और प्रस्तावित योजनाओं की भी जानकारी दी।
यह कहते हुए कि प्रदेश की जनता मूर्ति, पत्थर व स्मारक की जगह सडक, पानी व बिजली जैसी अवस्थापना सुविधाओं की आकाक्षी है,। इसके साथ राज्यपाल के अभिभाषण के द्वारा प्रदेश की सपा सरकार ने बुंदेलखड और पूर्वाचल जैसे पिछडे इलाकों में चल रही अथवा प्रस्थावित अवस्थापना विकास की प्राथमिकता का भी उल्लेख किया। इसके साथ ही लखनऊ में यातायात को सुगम बनाने के लिए दिल्ली मेट्रो रेल कारपोरेशन से 37.5 किलोमीटर की दूरी में मेट्रो रेल चलाने के लिए 12,500 करोड़ रुपये की विस्तृत परियोजना बनाने का भी संकल्प व्यक्त किया। किसान को दुर्घटना बीमा की राशि एक लाख से बढाकर पाच लाख रुपये कर दिए जाने के निर्णय का भी ऐलान किया गया।
आज उप्र व उत्तराखण्ड में यहां के खुदगर्ज नेताओ ंके कारण दोनों प्रदेश के स्थिति बहुत ही शर्मनाक है। उत्तर प्रदेश में जहां नया नेतृत्व मिला है, लोगों को काफी आशा है परन्तु सपा के पूर्व में गुण्डा राज की दहशत आज भी लोगों के जहेन से नहीं गयी। परन्तु अखिलेश जिस प्रकार से अपना शासन चला रहे हें उससे लगता है कि वे सपा के गुण्डा प्रवृति के नेताओ ंपर शायद अंकुश लगा पायें। वहीं उत्तराखण्ड में तो लोकशाही की आश कहीं दूर दूर तक नहीं है। क्योंकि जिस प्रकार से अलोकशाही प्रवृति से यहां पर कुशासन चलाया जा रहा है उससे प्रदेश में प्रदेश की जनता की वह आश पूरी होनी दूर की कोड़ी साबित हो रही है जिसके लिए इस राज्य का गठन लोगों ने अपने लम्बे संघर्ष व बलिदान करके किया। प्रदेश की जनांकांक्षाओं को रौंदने की कोई कसर भाजपा व कांग्रेस ने इस राज्य के गठन के बाद अभी तक नहीं छोड़ी। खासकर जिस प्रकार से अपनी कुर्सी के लिए यहां के भूगोल, राजनैतिक ताकत व जनांकाक्षाओं को जनसंख्या पर आधारित परिसीमन, मुजफरनगर काण्ड के अभियुक्तों व उनके संरक्षकों को अभ्यदान देने , गैरसेंण राजधानी न बना कर, जातिवाद-क्षेत्रवाद की आड में भ्रष्टाचार का तांडव मचाने व किरण मंडल प्रकरण आदि से रौंदा जा रहा है उससे नहीं लगता की यहां पर दिल्ली आलाकमान के प्यादों को कहीं भी प्रदेश से लेश मात्र भी लगाव होगा। प्रदेश की जनता को भाजपा व कांग्रेस के अंध मोहपाश से उबर कर स्थानीय विकल्प खुद तेयार करना होगा तभी प्रदेश में लोकशाही का सूर्यादय हो सकेगा। शेष श्रीकृष्ण कृपा। हरि ओम तत्सत्। श्रीकृष्णाय् नमो।

Sunday, May 27, 2012


आईपीएल व बाॅलीवुड के गुलामों ने निकाला राजनेताओं व न्यायपालिका की तरह भारतीय लोकशाही व स्वाभिमान का जनाजा


क्रिकेट के अन्य मैचों में विजय की तरह ही आइ्रपीएल-5 में विजय के बाद जिस प्रकार से शराब की बोतलो को लहरा कर और एक दूसरे के सिर पर उडेल कर अपनी खुशी इजहार कर रहे थे। यह कहीं दूर दूर तक भारतीय संस्कृति के अनरूप नहीं है। इस विजयी जश्न से कहीं ऐसा नहीं लग रहा था कि यह विजय किसी भारतीय टीम या भू भाग की है। भारतीय संस्कृति में गंगा जल या पुष्प या अक्षत उडेल कर खुशी को प्रदर्शित किया जाता है परन्तु शराब उडेल कर जश्न मनाना न केवल भारतीय संस्कृति अपितु मानवीय संस्कृति का भी अपमान है। शराब को उडेलकर खुशी के क्षणों में एक दूसरे के उपर शराब को उडेल कर डालना पाश्चात जगत की गलत परंपरा है उसको अंधा अनुशरण करके उसे भारतीय परिवेश में भी आत्मसात करने वालों को न तो तनिक शर्म आयी व नहीं उनको इसका कहीं दूर तक भान तक होगा। भारतीय क्रिकेट बोर्ड या आईपीएल मेच में तो वेसे भी भारतीय संस्कृति, भारतीय भाषा और भारतीय संस्कारों को दफन करने का धृर्णित कृत्य इस देश की धरती में करने का दुशाहस किया जाता रहा है। भेड बकरियों की तरह खिलाडियों की बिक्री किसी गुलामों की खरीद परोख्त वाले जमाने की बदनुमा याद ही दिलाती है। इस मेचों में सट्टा, फिक्स व भेड़ बकरियों की तरह खिलाडियों की बिक्री के अलावा भारतीय भाषाओं को रौंद कर अंग्रेजी भाषा का डंका बजवाने के बाबजूद भारत की बेशर्म सरकार के ही नहीं यहां के तथाकथित बुद्धिजीवियों के कान पर भी जूॅं तक नहीं रेंग रही है।
आईपीएल-5 का ताज कोलकोता रायडर यानी बाॅलीवुड के चर्चित अभिनेता शाहरूख खान की टीम ने चैनई की धोनी के नेतृत्व वाली टीम को हरा कर जीता। शाहरूख खाॅं हो या हिन्दी सिनेमा का अन्य कोई अभिनेता या नेत्री इनको अकूत दोलत व शोहरत दोनों हिन्दी भाषा के कारण मिलती है परन्तु ये अधिकांश बडे समारोह या अन्य कार्यक्रमों में हिन्दी में बोलने के बजाय फिरंगी यानी गुलामी की भाषा अंग्रेजी में बोलने में अपनी शान समझते है। ठीक ऐसे ही भारतीय राजनेताओं की तरह ये भी अपने उस समाज व देश का अपमान करने का कृत्य करते हैं जिन्होंने इनको इतना सम्मान व दौलत दी। वेसे इस मेच में धोनी की टीम जीतती या मुकेश अम्बानी के स्वामित्व वाली मुम्बई की टीम या अन्य इसमें कोई अन्तर नहीं पड़ता। जीते कोई भी परन्तु जीत का जश्न ये सब शराब को एक दूसरे के उपर बेशर्मी से उडेल कर मनाने का ही कृत्य करते। इनको न तो भारतीय न्याय व्यवस्था की तरह भारतीय संस्कृति व लोकशाही का भान है व नही अपने स्वाभिमान का। सबसे हैरानी की बात है कि आजादी के 65 साल बाद भी देश की न्याय व्यवस्था भी देश की जनभाषा में न्याय करने व गणवेश भारतीय परिवेश के अनरूप अपनाने के बजाय वही फिरंगी भाषा व गणवेश में ही ढो कर देश के स्वाभिमान व लोकशाही का जनाजा निकाल रहे है। यही देश की त्रासदी है कि देश के हुक्मरान, नौकरशाह, न्याय, खेल सभी जगह ऐसे लोगों का शिकंजा कसा हुआ है जो गुलामी का बदनुमा कलंक स्वतंत्र भारत के माथे में लगाने की धृष्ठता व देशद्रोह करने का दुशाहस कर रहे हैं। ये तो गुलामों की तरह भाडे के टटूओं की तरह अपने आका के जय हे जय है गाने में ही अपना भाग्य समझते है। इससे अपमान इस देश की लोकशाही का दूसरा क्या होगा कि यहां पर भ्रष्टाचार को मिटाने व भारतीय संस्कृति का ध्वज वाहक होने का दंभ भरने वाले भी इंडिया का राग कह कर भारत को विस्मृत कर रहे हैं।

350 साल बाद न्यूटन की पहेली को हल कर 16वर्षीय शौर्य रे ने फेहराया विश्व में भारतीय मेधा का परचम

भारतीय प्रतिभा का लोहा सदियों से इस संसार के आम जनता ने ही नहीं अपितु विश्व के चोटी के वैज्ञानिकों ने माना। शून्य की खोज से लेकर न्यूटन की पहली को हल करने वाली भारतीय मेधा के आगे पूरा विश्व नतमस्तक है। इसी सप्ताह 26 मई को भी जर्मन में अध्यनरत 16 वर्षीय भारतीय  छात्र शौर्य रे 350 साल से अनसुलझी विश्व के महान गणितज्ञ न्यूटन की पहेली का हल करके पूरे विश्व के गणितज्ञ व वैज्ञानिकों को अचंभित कर दिया।  प्रख्यात गणितज्ञ और भौतिकविद सर आइजैक न्यूटन की एक पहेली को सुलझा कर गणितज्ञों को हैरान कर दिया है। यह पहेली 350 वर्षो से अधिक समय से गणितज्ञों के लिए अबूझ थी। विश्व विख्यात  बीबीसी ने शौर्य की उपलब्धी पर टिप्पणी करते हुए समाचार प्रकाशित किया कि ‘न्यूटन की गणित की जिस उलझी गुत्थी को बड़े-बड़े महारथी 350 साल में नहीं सुलझा सके, उसे 16 साल के एक भारतीय विद्यार्थी ने चुटकी में हल करके दिखा दिया है.
’।  वहीं ब्रिटिश अखबार डेली मेल के अनुसार, 16 वर्षीय रे ने न्यूटन की फंडामेंटल पार्टिकल डायनमिक की थ्योरी को सुलझा लिया है। अखबार के अनुसार इससे पहले इस थ्योरी को सुलझाने के लिए भौतिकविदों को कंप्यूटर की जरूरत पड़ती थी। रे द्वारा इस पहेली को हल करने से  वैज्ञानिक अब यह पता लगा सकते है कि किसी गेंद को फेंके जाने पर वह किस रास्ते से गुजरेगी और वह किस प्रकार दीवार से टकराएगी और वापस लौटेगी।
रे को इस पहेली का पता तब लगा जब उसे एक पर्यटन कार्यक्रम के तहत द्रिसडेन विश्वविद्यालय ले जाया गया था, जहां एक प्रोफेसर ने उसे इस सवाल के बारे में कहा कि इसे सुलझाया नहीं जा सकता है। रे ने इस चुनौती को स्वीकार करते हुए यह धारणा बना ली थी कि वे इस पहलियों को सुलझा कर ही दंभ लेगे। बचपन में 6 साल की उम्र से ही शौर्य  ने गणित के जटिल सवालों को हल करना शुरू कर दिया था। वह चार साल पहले कोलकाता से जर्मनी गया था। तब उसे जर्मन भाषा नहीं आती थी, लेकिन अब वह इसमें पारंगत है। उसकी प्रतिभा को देखते हुए उसे दो कक्षा की प्रोन्नति दे दी गई है। गौरतलब है कि गत माह अप्रैल में भी भारतीय वैज्ञानिक प्रतिभाओं ने विश्व में अपनी प्रतिभा का लोहा विश्व जगत को मनाया था। अप्रेल माह में ही विश्व की सबसे प्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिक संस्था राॅयल सोसायटी द्वारा विश्व के जिन छह वैज्ञानिकों को राॅयल सोसायटी की फेलोशिप के लिए चुना गया था उन छह में दो भारतीय बैंगलौर के जीव-वैज्ञानिक कृष्णास्वामी विजय राघवन और लंदन के इंपीरियल कॉलेज के प्रोफेसर तेजिंदर सिंह विर्दी भी थे। इस  संस्था के फेलोशिप से आईंसटाइन, न्यूटन और स्टीफन हॉकिंग जैसे विश्व विख्यात वैज्ञानिक भी सम्मानित रहे।

Thursday, May 24, 2012

अमेरिका व सोनिया के आंखों के तारे मनमोहन सरकार के कुशासन से देश में हाहाकार

भले ही सोनिया गांधी के नेतृत्व वाली सप्रंग सरकार की दूसरी पारी का जश्न प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह व उनके सांसद मना रहे हों परन्तु देश में इस मनमोहनी कुशासन से हाहाकार मचा हुआ है। भले ही सप्रंग सरकार की मुखिया का मोह भंग इस कुशासन के प्रतीक मनमोहन सिंह से न हो परन्तु 2014 में होने वाले लोकसभा चुनाव में देश की सत्ता से देश की जनता इसको उतार फेंकने के लिए कमर कसे हुए है। इसकी एक झलक टुडेज चाणक्य ने यूपीए सरकार को आज के दिन चुनाव होने पर केवल 100 सीटें मिलने की भविष्यवाणी से भी किया। यही भविष्यवाणी प्यारा उत्तराखण्ड समाचार पत्र में कई महिने पहले से मैं कर रहा हॅू कि 2014 में होने वाले चुनाव में कांग्रेस ही नहीं भाजपा भी देश की सत्ता में नहीं होगी व नहीं मुलायमसिंह देश की बागडोर संभालेगा। मनमोहन सिंह सरकार की हालत किस कदर देश की आम जनता की नजरों में पतली है इसका सहज अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि प्रधानमंत्री द्वारा तीन साल पूरे होने के जश्न में दी गये भोज में समर्थक दलों के मठाधीशों ने आना ही अपनी शान के खिलाफ समझा। एक प्रकार से यूपीए के सहयोगी घटक दलों की नजर में अब कांग्रेस व यूपीए गठबंधन डुबता हुआ जहाज ही प्रतीत हो रहा है। इसी कारण वे समय समय पर इससे अपने आप को दूर दिखाने की कोशिश कर रहे है। देश की जनता मनमोहन सिंह के कुशासन से किस कदर परेशान है इसका नमुना यूपीए सरकार की 22 मई को दूसरी पारी के तीसरे साल पूरे होने पर मनाये जाने वाले जश्न पर आम आदमी के दिल से निकलने वाली इस पुकार से समझी जा सकती है। अमेरिका व सोनिया गांधी के आंखों के तारे भारत को मंहगाई, भ्रष्टाचार व आतंकवाद से बर्बाद करने वाले कुशासन देने के लिए जाने जाने वाले यूपीए सरकार के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के लिए सभी देशवासी एक ही दुआ करते हैं कि हे सर्व शक्तिमान परमात्मा ऐसे कुशासक से भारत को अविलम्ब मुक्ति कराये। मनमोहन सरकार ने अटल की तरह देश की आशाओं पर ही नहीं देश के भविष्य पर अमेरिकी व कुशासन का ग्रहण लगाया।
सोनिया गांधी के पास समय था कि देश व कांग्रेस को बर्बाद होने से बचाने के लिए। उनको देश व पार्टी के हित में अविलम्ब मनमोहन सिंह को हटा कर राहुल गांधी को देश की बागडोर सोंप देनी चाहिए थी। इसके लिए वे मनमोहन सिंह को सम्मानजनक विदाई के तौर पर देश का राष्ट्रपति भी बना सकती है। प्रतिभा पाटिल की विदाई तय है और कोई भी दल वर्तमान राष्ट्रपति को दूसरे कार्यकाल के लिए राष्ट्रपति के रूप में समर्थन करने के लिए तैयार नहीं है। देश की वर्तमान राष्ट्रपति श्रीमती देवी सिंह शेखावत पाटिल का कार्यकाल अपने अंतिम दौर में है। इससे साफ हो गया कि देश को नये राष्ट्रपति मिलेगे। नया राष्ट्रपति कौन होंगे इस पर राजनैतिक दलों में इन दिनों घमासान चल रहा है। इन दिनों जो नाम आम जनता से लेकर राजनैतिक दलों के जेहन में उनमें अभी तक देश की अधिकांश जनता की पहली पसंद पूर्व राष्ट्रपति डा अब्दुल कलाम हैं। वेसे अन्य नामों में वर्तमान उपराष्ट्रपति अंसारी, वरिष्ट कांग्रेसी नेता प्रणव मुखर्जी, लोकसभाध्यक्ष मीरा कुमार व देश के अग्रणी चिंतक व राजनेता डा कर्णसिंह आदि के नाम भी चर्चाओं में है। परन्तु जिस प्रकार से कांग्रेसी आलाकमान ने अभी अभी अपने पत्ते नहीं खोले व सपा प्रमुख मुलायम सिंह द्वारा राजनेता को ही राष्ट्रपति के पद पर आसीन होना चाहिए व राजग गठबंधन के प्रमुख दल भाजपा एवम् जदयू में इस मामले में उभरे मतभेद तथा वाम दलों द्वारा प्रणव व उपराष्ट्रपति पर आपत्ति नहीं की बात से ऐसा प्रतीत होता कि राष्ट्रपति जो भी बनेगा परन्तु आपसी एकराय से राष्ट्रपति चयन का यथासंभव प्रयास होंगे। परन्तु सपा, लालु के रूख को देख कर कई बार लगता है कि राष्ट्रपति पर कोई मुस्लिम ही आसीन होगा। परन्तु कांग्रेस आलाकमान इन दिनो गहरे द्वंद में है। जिस प्रकार से कांग्रेसी आलाकमान के करीबी केन्द्रीय रक्षा मंत्री ऐथोनी के नेतृत्व वाली ऐथोनी समिति की रिपोर्ट के अनुसार मंहगाई को भी हाल में सम्पन्न हुए पांच राज्यों में हुई कांग्रेस की दुर्गति के लिए भी जिम्मेदार माना गया है। जिससे साफ हो गया कि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली सरकार, कांग्रेसी बेडे को चुनावी भंवर में पार लगाने में लाभप्रद नहीं अपितु डुबोने वाली हो गयी है। इसी संदेश को भांपते हुए राजनीति के मर्मज्ञ यह कायश लगा रहे हैं कि कांग्रेस प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को राष्ट्रपति के पद पर आसीन कर देश की जनता का गुस्सा कम करके 2014 में होने वाले लोकसभा में डुबती हुई कांग्रेसी नौका को पार लगाना चाहती है। हालांकि लम्बे समय से मनमोहन सिंह को प्रधानमंत्री पद से मुक्त करने की मांग कांग्रेसी दबे हुए स्वरों में निरंतर कर रहे है। इनकी भनक सोनिया गांधी व उनके सलाहकारों को भी है। परन्तु सोनिया गांधी, प्रधानमंत्री पद से मनमोहन सिंह की विदाई सम्मानजनक ढ़ंग से करना चाहती है। इसके लिए एक उचित अवसर कांग्रेस नेतृत्व ने उस समय खो दिया जब विश्व बेंक के अध्यक्ष पद रिक्त हुआ था। उस समय कांग्रेसी रणनीतिकारों को पंजाब विधानसभा चुनाव से पहले यह कदम उठाने से पंजाब में सत्तासीन होने की आश पर ग्रहण लगने का भय था। पंजाब में विधानसभा चुनावों में मिली पराजय के बाद अब कांग्रेसी नेतृत्व पर मनमोहन सिंह को प्रधानमंत्री पद से मुक्त करके राहुल गांधी को सत्तासीन करने का निरंतर दवाब उनके विश्वसनीय रणनीति कार दे रहे है। कांग्रेसी राजनीति के समीक्षकों को सोनिया गांधी की इस मुहिम में दो अवरोधक नजर आ रहे है। पहला अवरोधक अमेरिका बना हुआ है, जो किसी भी हाल में नेहरू-गांधी परिवार के किसी वारिस को फिर से देश की सत्ता में आसीन होना नहीं देखना चाहता। अमेरिका के लिए वर्तमान हालतों में सबसे अनुकुल प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ही हैं। जिस प्रकार से अमेरिका ने पाकिस्तान के बाद भारत में में अपनी पकड़ पूरे तंत्र में बना ली है उससे कांग्रेस आला नेतृत्व को अमेरिका की इच्छा के खिलाफ मनमोहन सिंह को प्रधानमंत्री पद से मुक्त कर राहुल गांधी को प्रधानमंत्री बनाना आसान नहीं है। सुत्रों के अनुसार मनमोहन सिंह को देश के प्रधानमंत्री पद पर आसीन करने के लिए सबसे महत्वपूर्ण अगर कोई कारण रहा तो वह है अमेरिका का दवाब।
अमेरिकी दवाब के अलावा दूसरी बाधा अगर मनमोहन सिंह को प्रधानमंत्री पद से मुक्त कर राहुल को प्रधानमंत्री बनाने के मार्ग में दूसरी कोई रूकावट है तो वह सप्रंग गठबंधन की सहयोगी दल न हो कर खुद सोनिया गांधी के अपने निकट के सलाहकार है। जिनको राहुल गांधी के प्रधानमंत्री के पद पर आसीन होने से अपनी वर्तमान प्रभावकारी स्थिति गुमनामी में खोने की आशंका है। इसी आशंका के कारण सोनिया गांधी के वर्तमान मजबूत सहयोगी, सोनिया गांधी को व कांग्रेसी बडे नेताओं के बीच ऐसा माहौल बना रहे हैं कि मनमोहन सिंह को प्रधानमंत्री के पद से मुक्त करके राहुल गांधी को प्रधानमंत्री बनाने से कांग्रेस का कोई बडा नुकसान हो जायेगा। हालत यह है कि कई जानकार तो यह भी आरोप लगा रहे हैं कि कांग्रेसी मजबूत मठाधीश नहीं चाहते कि कांग्रेस मजबूत हो और राहुल गांधी प्रधानमंत्री बने। खबर तो यह भी है कि इसी आशंका से भयभीत कई कांग्रेसी मठाधीशों ने राहुल गांधी के कांग्रेस को उप्र सहित देश में मजबूत करने के मिशन पर पानी फेरने के लिए पसीने बहाये थे। उप्र में इतनी मेहनत के बाद कांग्रेसी की हुई दुर्गति इसी आशंका को मजबूत करती है। कांग्रेसियो की इस आशंका को तब बल मिलता है जब सोनिया व राहुल गांधी को इन मठाधीशों ने जनता से बिलकुल दूर कर दिया है। जो लोग भी सोनिया व राहुल से मिलाये जाते हैं वे प्रायः इन्हीं मठाधीशों के चाटुकार होते है। न तो ये सलाहकार खुद कभी आम जनता से मिलते हैं व नहीं वे अब सोनिया व राहुल गांधी को भी जनता से अपने तिकडमों से दूर किये हुए है। अब देखना यह है कि सोनिया गांधी कैसे मनमोहन सिंह को प्रधानमंत्री से मुक्त करने के इस अवसर का लाभ उठा कर देश व कांग्रेस की रक्षा कर सरती है या अपने आत्मघाती सलाहकारों के मकड़जाल में रह कर यह अवसर भी खो देती है। वेसे सोनिया गांधी की रणनीति हे कि लालकृष्ण आडवाणी को विश्वास में लेकर भाजपा व कांग्रेस में इस मामले में सहमति बना कर राष्ट्रपति व उप राष्ट्रपति के पद को सांझा किया जाय। अगर सोनिया गांधी, मनमोहन सिंह को देश का राष्ट्रपति बनाने में सफल रहती तो मनमोहन सिंह देश के ऐसे पहले व संसार के दूसरे नेता बन जायेंगे जो प्रधानमंत्री व राष्ट्रपति दोनों पदों पर रूस के राष्ट्रपति पुतिन की तरह आसीन रहे हों।
शेष श्रीकृष्ण कृपा। हरि ओम तत्सत्। श्री कृष्णाय् नमो।

Wednesday, May 23, 2012




समाज व प्रदेश के हितों को रौंदने वाले तमाम उत्तराखण्डी  नेताओं से कहीं बेहतर हैं किरण मंडल

भले ही आज भाजपा सहित उत्तराखण्ड की मीडिया व आम जनता सितारगंज के भाजपा विधायक किरण मंडल द्वारा विधायक पद से इस्तीफा दे कर कांग्रेस में सम्मलित होने की निंदा व अनैतिक बता रहे हों, परन्तु किरण मंडल ने वो काम किया जो नित्यानन्द स्वामी, भगतसिंह कोश्यारी, नारायणदत्त तिवारी, भुवनचंद खण्डूडी , रमेश पोखरियाल निशंक व विजय बहुगुणा जैसे मुख्यमंत्री की कुर्सी पर आसीन नेता तथा मुरली मनोहर, हरीश रावत, सतपाल महाराज, के सी पंत जैसे राष्ट्रीय पटल पर अपना परमच फेहराने वाले उत्तराखण्डी नेता नहीं कर पाये।
भाजपा की विधायकी टिकट पर विजयी रहे किरण मंडल ने भले ही अपनी सीट को प्रदेश के कांग्रेसी मुख्यमंत्री बिजय बहुगुणा के लिए अपनी विधायकी से त्यागपत्र दे दिया है। इस प्रकरण के लिए लोग भले ही इसके लिए भारी दौलत व प्रलोभनों में फंसने के लिए उनकी आलौचना करे। परन्तु सितार गंज के वे लोग जो उसके समाज से हैं, आज पूरी तरह से किरण मंडल के साथ मजबूती ही तरह खडे है। खडे क्यों न हो किरण मंडल ने अपने बंगाली समाज की दशकों पुरानी भूमिधारी अधिकार दिलाने के लिए यह कुर्वानी दी। वहीं उन्होंने 70 विधायकों की भीड़ में अपने समाज के हित में व अपने हित में एक विवेकशील कदम उठा कर अपना कद अपने समाज व सितारगंज की जनता के समाने बडा कर गया। वहीं उत्तराखण्ड के तमाम नेताओं को उत्तराखण्ड की जनता द्वारा  विधायक, मंत्री, सांसद व केन्द्रीय मंत्री बनाने के लिए अपना निरंतर विजयी समर्थन देने के बाबजूद उत्तराखण्ड के नेताओं ने उत्तराखण्डी हितों के लिए कभी ईमानदारी से एक राजनैतिक चतुराई भरा कदम तक नहीं उठाया। उत्तराखण्ड का नाम ही नहीं भूगोल भी बदला गया, यहां के संसाधनों की बंदरबांट किया गया, उत्तराखण्ड में जनसंख्या पर आधारित परिसीमन बलात थोपा गया। पर क्या मजाल की इन नेताओं ने उफ तक की। उत्तराखण्ड के सम्मान को रौंदने वाले मुजफरनगर काण्ड के अभियुक्तों को संरक्षण देने व राव-मुलायम के कहारों को बेशर्मी से गले लगाने का निकृष्ठ कृत्य इन बौने कद के संकीर्ण नेताओं ने किया।
भले ही लोकशाही में किरण मंडल को जायज नहीं ठहराया जा सकता परन्तु अपने समाज के हितों के लिए उन्होंने जो अपनी विधायकी निर्णायक क्षणों में कुर्वान करके उसका पूरी कीमत वसुली, काश ऐसा विवेक उत्तराखण्ड नेताओं में होता तो आज गैरसैंण राजधानी बनी होती। प्रदेश में जातिवाद, क्षेत्रवाद व भ्रष्टाचार का सम्राज्य नहीं होता। आज मंडल के कृत्य ने उत्तराखण्ड नेताओं के चेहरे पूरी तरह से बेनकाब कर दिये कि किरण का विरोध करने वाले कभी अपने प्रदेश व समाज के हितों के लिए कभी उन्होंने किरण मंडल जेसे चतुराई भरा कार्य किया। नहीं राज्य गठन के 12 साल बाद भी केवल उत्तराखण्ड को अंध दोहन करने के अलावा इन तथाकथित राजनेताओं ने उत्तराखण्ड के लिए क्या किया? बिजय बहुगुणा सहित तमाम नेताओं ने अपने संकीर्ण स्वार्थो के लिए उत्तराखण्ड व उस उत्तराखण्डी समाज को क्या दिया जिसने दशकों लम्बा संघर्ष व बलिदान दे कर पृथक उत्तराखण्ड राज्य बनाने के लिए दिल्ली के हुक्मरानों को विवश कर दिया। बलिदानों से गठित राज्य को 12 सालों में क्या मिला तिवारी, खण्डूडी, निशंक व बहुगुणा जैसे नेता , जिनके कुशासन से सदियों से ईमानदारी के नाम से ख्याति प्राप्त उत्तराखण्ड आज देश का सबसे भ्रष्ट्रतम राज्य बन गया है। भाजपा व कांग्रेस के इन प्यादों में बंगाली समाज के रहनुमा बन कर उभरे किरण मंडल जितना भी राजनैतिक कौशल व अपने समाज के हितों के लिए कदम उठाने का साहस तक नहीं रहा।

सचिव नहीं भारत रत्न के असली हकदार है अच्युत सामंत
आनन्द कुमार व श्रीधरन
देश के राजनेताओं व बुद्धिजीवि, इन दिनों सचिन सहित कई प्रतिष्ठित व्यक्तियों को भारत रत्न देने की पुरजोर मांग उठा रहे है। परन्तु आज के समाज में कुछ ऐसे महान सपूत हैं जिन...्होंने अपने कार्यो से देश के लोगों को नयी प्रेरणा दी। इनमें उडिसा के कलिंगा इस्टीटयूट के अच्युत सामंत प्रमुख है। जिन्होंने 15 हजार गरीब आदिवासी बच्चों को निशुल्क पहली से महाविद्यालय की सआवासीय शिक्षा प्रदान कर उनके परिजनों को भी सबल कर रहे है। जो पांच वर्ष की उम्र में पिता की मौत के बाद सब्जी बेच कर एमएससी पढ़ कर संसार का सबसे बडा दूरस्थ विश्वविद्यालय बना चूके है। इस साल की विज्ञान कांग्रेस उन्हीं के इस भव्य शिक्षा मंदिर में हुई।
हालांकि बिहार के सुपर 30 के आनन्द कुमार व मेट्रो मेन श्रीधरन भी महान प्रेरणा के पूंज है। जिनको सरकार व समाज को अपना अग्रणी व प्रेरणादायक सम्मान देना चाहिए। भारत के शासकों व बुद्धिजीवियों में जरा सी बुद्धि होती तो वे इनको भारत रत्न दे कर समाज में सकारात्मक प्रेरणा देते। परन्तु सत्ता में तो आज सौदागरों का कब्जा हो गया उनको महान व्यक्तित्व की पहचान ही नहीं।
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Tuesday, May 22, 2012


ममता बनर्जी का विरोध  छवि बनाने का हथकण्डा या जनहित समर्पित नेत्री
ममता बनर्जी द्वारा अपने की दल के रेल मंत्री दिनेश त्रिवेदी द्वारा प्रस्तुत रेल बजट 2012 में की गयी रेल यात्री किराये में बृद्धि का प्रखर विरोध कर मनमोहनी सरकार को कटघरे में खड़ा करने के साथ-साथ जनता के बीच अपनी जनकल्याणकारी नेत्री की छवि बनाने में कामयाब हुई। परन्तु इस प्रकरण में दो बाते बहुत ही रहस्यमय लग रही है। इसका पहला कारण यह है कि यह रेल बजट खुद ममता बनर्जी की पार्टी तुणमूल कांग्रेस के कोटे से मंत्री बने दिनेश त्रिवेदी द्वारा  रेल बजट 2012 को प्रस्तुत किया गया। यह बात भी गले नहीं उतर रही है कि जिस ममता बनर्जी के तैवरों से आम आदमी आशंकित रहता है, उसी ममता बनर्जी की पार्टी का संासद सं मंत्री बना दिनेश त्रिवेदी ममता के व्यवहार से किस प्रकार अनविज्ञ रह सकता है। जबकि ममता बनर्जी खुद कई बार इस बात का ऐलान कर चूकी थी कि रेल किराया की बढ़ोतरी किसी कीमत पर स्वीकार नहीं की जायेगी। इस प्रवृति का जानकार मंत्री त्रिवेदी क्यों बंगाल की शेरनी को क्यों नाराज करेगे। आज इस बात का सुखद आश्चर्य है कि जनविरोधी राजनीति में ममता बनर्जी जैसी जनहितों के लिए राजनीति करने वाली नेत्री हमारे बीच में है। ममता बनर्जी ने चाहे किसी भी उदेश्य से इस जनहितों को मंहगाई से रौंदने वाली राजनीति में जीवंत है। काश ममता बनर्जी जेसे दबंग महिला हर प्रदेश में होता तो देश की तस्वीर ही बदल जाती।

संवैधानिक पदों पर दागदार छवि के लोगों को आसीन न करें बहुगुणा


संवैधानिक पदों पर दागदार छवि के लोगों को आसीन न करें बहुगुणा 
उत्तराखण्ड राज्य गठन के बाद यह प्रदेश का दुर्भाग्य रहा कि यहां पर प्रदेश के प्रतिभावान व प्रदेश के लिए समर्पित साफ छवि के व्यक्तियों के बजाय, अपने संकीर्ण निहित स्वार्थ पूर्ति के लिए अपने प्यादों को प्रदेश के महत्वपूर्ण संवैधानिक पदों पर आसीन किया जाता रहा। इससे प्रदेश के हितों पर जहां कुठाराघात हुआ वहीं प्रदेश की दिशा बद से बदतर हो गयी। प्रदेश में भ्रष्टाचार की गर्त में धकेलने का सबसे बड़ा यही कारण रहा है। इसी पतन से सबक ले कर विजय बहुगुणा सरकार को अपनी पूर्ववर्ती सरकारों की भयंकर भूल से सबक ले कर प्रदेश के हित की रक्षा में प्रदेश के संवैधानिक पदों पर योग्य व साफ छवि के उत्तराखण्ड के लिए समर्पित ईमानदार व्यक्तियों को आसीन करना चाहिए। कम से कम ऐसे व्यक्तियों को प्रदेश के महाधिवक्ता पद पर आसीन न किया जाय जिनका न्यायिक आचार ही सीबीआई व आईबी की नजरों में सम्मानजनक न हो।
सुत्रों के अनुसार हाल में जिस प्रकार से बहुगुणा सरकार में प्रदेश में सबसे महत्वपूर्ण समझे जाने वाले महाधिवक्ता पद के लिए जिस प्रकार से ऐसे व्यक्ति का नाम प्रमुखता से लिया गया जो उत्तराखण्ड के स्वाभिमान को मुजफरनगर काण्ड-94 में रौंदने वाले गुनाहगार अनन्त कुमार को कानूनी गलत संरक्षण देने के कारण सीबीआई ने दागदार की सूचि में रखा। यही नहीं इनका रिकार्ड इतना दागदार रहा कि सर्वोच्च न्यायालय ने पूर्ववर्ती भाजपा सरकार के शासनकाल में नैनीताल उच्च न्यायालय के न्यायाधीश के लिए प्रदेश सरकार द्वारा उक्त व्यक्ति की पैरवी को खारिज कर दी गयी थी। सुत्रों के अनुसार ऐसे व्यक्ति की नियुक्ति उच्च न्यायालय के न्यायाधीश के रूप में नहीं होनी चाहिए यही गोपनीय रिपोर्ट सीबीआई व आईबी ने दी थी। इसके बाबजूद ऐसे व्यक्ति को अगर प्रदेश के सबसे महत्वपूर्ण न्यायिक पद पर आसीन किया जाता है तो प्रदेश की न्याय व्यवस्था पर ही प्रश्न चिन्ह लगने के साथ साथ प्रदेश के हितों के साथ शर्मनाक खिलवाड होगा।
ऐसा नहीं कि प्रदेश सरकार के पास इस पद के लिए अन्य योग्य प्रतिभावान व्यक्ति नहीं है। सबसे योग्य दावेदारों में सर्वोच्च न्यायालय के वरिष्ठ अधिवक्ता अवतार सिंह रावत जो राज्य गठन जनांदोलन के अग्रणी संगठन उत्तराखण्ड जनता संघर्ष मोर्चा के संयोजक रहने के साथ साथ उत्तराखण्ड में निशंक सरकार के स्टर्जिया सहित कई घोटालों में बेनकाब करने का ऐतिहासिक कार्य कर चूके है। प्रदेश उच्च न्यायालय के वरिष्ट अधिवक्ता अवतार सिंह रावत की गिनती देश के सबसे ईमानदार व तेजतरार प्रतिभावान अधिवक्ताओं में होती है। वे तिवारी सरकार में अतिरिक्त महाधिवक्ता के पद पर भी आसीन रह चूके है। स्टर्जिया प्रकरण में उनकी प्रतिभा का लोहा प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री भुवनचंद खंडूडी व वर्तमान मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा ही नहीं कांग्रेसी महासचिव दिगविजय सिंह व चैधरी बीरेन्द्रसिंह भी स्वयं मान चूके है। इसके बाबजूद उनकी ईमानदार छवि के कारण उनकी प्रतिभा से अभी तक प्रदेश सरकार लाभ लेने से कतरा रही है। सबसे हैरानी की बात यह है कि प्रदेश के ऐसे प्रखर अधिवक्ता के होने के बाबजूद प्रदेश गठन के 12 सालों तक देश के ऐसे लोगों को प्रदेश के हितों का रक्षक यानी महाधिवक्ता व उनकी टीम में रखे गये जो उच्च न्यायालय व सर्वोच्च न्यायालय में प्रदेश के हितों की रक्षा करने में पूरी तरह से विफल रहे।

उत्तराखण्ड का अपमान करने से बाज आये बहुगुणा
सोनिया गांधी मांगे उत्तराखण्डियों से माफी
परिसम्पतियों के बंटवारे के लिए उत्तर प्रदेश से उत्तराखण्ड का हक मांगने इस सप्ताह उत्तर प्रदेश गये उत्तराखण्ड के मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा द्वारा दिया गया बहुत ही शर्मनाक बयान कि ‘मै उत्तराखण्ड का पंडित हॅू बडे भाई उप्र से भीख मांगने आया हॅू ’कहना   स्वाभिमानी सवा करोड़ उत्तराखण्डियों का ही नहीं अपितु उत्तराखण्ड राज्य गठन के लिए शहीद हुए आंदोलनकारियों की शहादत का भी अपमान है। इसके लिए कांग्रेस आला कमान उत्तराखण्डी जनता से माफी मांगे कि उन्होंने विजय बहुगुणा को मुख्यमंत्री बना कर न केवल उत्तराखण्ड की लोकशाही अपितु उत्तराखण्ड के स्वाभिमान को रौंदने का काम किया है। मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा को भले ही उनकी जाति के कारण ही मुख्यमंत्री पद पर कांग्रेस के संकीर्ण जातिवादी सोनिया के दरवारियों ने बनाया हो परन्तु मुख्यमंत्री की शपथ लेने के बाद वे जाति व क्षेत्र से उपर उठ कर सारे प्रदेश के मुख्यमंत्री है, उनका अपने आप को ब्राहमण बताना उत्तराखण्ड की लोकशाही का अपमान है। बहुगुणा के इस कथन को दैनिक जागरण ने प्रमुखता से अपने 5 अप्रैल 2012 को प्रकाशित किया है। गौरतलब है कि प्रदेश के मुख्यमंत्री बनने के साथ ही मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा ने जिस प्रकार से मुजफरनगर काण्ड के अभियुक्त को न्यायिक विश्वासघात करने वालों को संवैधानिक पद पर नियुक्त किया और उत्तराखण्ड राज्य गठन जनांदोलन में गोली चला कर आंदोलनकारियों की हत्या करने वाले को अपना करीबी बना रखा है उससे उत्तराखण्ड की जनता कांग्रेस को धिक्कार रही है।

बांधों, बांघों व पार्को के लिए उत्तराखण्ड को उजाडने की इजाजत किसी को नहीं

बांधों, बांघों व पार्को के लिए उत्तराखण्ड को उजाडने की इजाजत किसी को नहीं
भारतीयता को उत्तराखण्ड से अलग करके देखने वाले ही भारतीय संस्कृति के मर्म को नहीं समझ पाये है। उत्तराखण्ड समाधान खण्ड है। जहां अनादिकाल से इस सृष्टि के तमाम समस्याओं का समाधान इस सृष्टि को मिला। देवताओं को ही नहीं रिषी मुनियों व मानवों को ही नहीं स्वयं भगवान की भी यह तपस्थली रही है। इसलिए उत्तराखण्डियों को अलगाववाद की दृष्टि से देखने वाले न तो भारतीयता को जान पाये तो उत्तराखण्ड को कहां पहचान पायेंगे। उत्तराखण्ड से तो हम भू माफियाओं, लोकशाही के गला घोंटने वालों व यहां के संसाधनों को लूटने के उदेश्य से यहां पर कालनेमी की तरह घुसपेट करने वालों से दूर रखना चाहते है। इस पर किसी को मिर्ची लगती है तो उसको हमारे पास राम राम कहने के अलावा कोई इलाज व जवाब नहीं है। एक बात देश के हुक्मरानों व यहां के शासकों को ध्यान में रखना चाहिये कि उत्तराखण्ड पावन देवभूमि है यहां पर संसाधनों को लुटने व लुटाने के लिए बांधों, बाघों व अभ्याहरणों-पार्को से यहां के वासियों को बलात उजाडने की धृष्ठता करने की कोई इजाजत किसी भी कीमत पर नहीं दी जासकती है।

सोनिया का नहीं यह है उत्तराखण्ड के जनादेश का हुआ अपमान

भाजपा की तरह उत्तराखण्ड के जनादेश का बार-बार अपमान कर रही है कांग्रेस
सोनिया का नहीं यह है उत्तराखण्ड के जनादेश का हुआ अपमान
प्यारा उत्तराखण्ड की विशेष रिपोर्ट-

कांग्रेसी सुत्रों के अनुसार सोनिया गांधी इन दिनों काफी आहत है। वह उत्तराखण्डी नेताओं द्वारा विधानसभा चुनाव के बाद बहुगुणा को मुख्यमंत्री बनाये जाने का विरोध करने वाले कांग्रेसी नेताओं के विद्रोह से काफी आहत है। पर हकीकत यह है कि हाल में सम्पन्न हुए उत्तराखण्ड की विधानसभा चुनाव परिणामों के बाद जिस प्रकार से कांग्रेस आला नेतृत्व द्वारा विजय बहुगुणा को प्रदेश के बहुसंख्यक विधायकों की इच्छा के खिलाफ मुख्यमंत्री के पद पर थोपा गया। उससे प्रदेश की जनता अपने को अपमानित महसूस कर रही है। खासकर जिस जनता ने कांग्रेस आला नेतृत्व पर विश्वास करके प्रदेश में सत्तारूढ़ भाजपा के कुशासन से मुक्ति की आश से कांग्रेस को प्रदेश की सत्ता में आसीन करने के लिए जनादेश दिया। वहीं दूसरी तरफ कांग्रेस अपनी इस हिमालयी आत्मघाती भूल पर गंभीर चिंतन करने व उसमें सुधार करके जनादेश का सम्मान करने के बजाय ऐसा प्रचार कर रही है कि मुख्यमंत्री को थोपे जाने का जो भारी विरोध हुआ उससे कांग्रेस आलाकमान आहत है। इसी लिए इस विवाद के बाद तमाम कोशिशों के बाबजूद भी सोनिया गांधी न तो कांग्रेस के दिग्गज नेता हरीश रावत से ही मिली व नहीं विजय बहुगुणा की ताजपोशी के बाद पुरजोर विरोध कर रहे कांग्रेसी नेता डा हरक सिंह जो विजय बहुगुणा की सरकार को भानुमति का कुनबा आदि बोल कर खुला विद्रोह कर रहे थे, उनसे ही मिली। हाॅं केवल तथाकथित समझोतों के बाद सोमवार 16 अप्रैल को कांग्रेस में हई घमासान के बाद पहली बार मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा के विरोध करने वाले कांग्रेस के दिग्गज नेता डा हरक सिंह रावत को मिलने का समय दिया गया। वह भी 16 अप्रेल 2012 को सांय 4.30 बजे सोनिया गांधी के आवास दस जनपत में। डा हरक सिंह रावत के अलावा उस दिन सोनिया गांधी से मिलने वालों में प्रदेश में कांग्रेस का रसातल में पंहुचाने वाले केन्द्रीय महासचिव चैधरी बीरेन्द्र सिंह प्रमुख थे। वहीं प्रदेश के मुख्यमंत्री के एक प्रबल दावेदार यशपाल आर्य भी सोनिया गांधी से मिले। कांग्रेसी सुत्रों के अनुसार कांग्रेस आलाकमान इस बात से नाराज थी कि क्यों प्रदेश के विधायक सहित क्षत्रपों ने उनसे प्रदेश का मुख्यमंत्री चयन करने की गुहार लगायी और जब उन्होंने मुख्यमंत्री का चयन किया तो कांग्रेस का एक बडा बर्ग ही उनके द्वारा चुने गये नाम विजय बहुगुणा के नाम का विरोध कर रहा है। इसे कांग्रेसी नेता अनुशासनहिनता व आला नेतृत्व के खिलाफ विद्रोह की बात कह कर असल गलती को छुपाना चाहता है। आज प्रदेश की जनता कांग्रेस आलानेतृत्व से जानना चाहती है कि उन्होंने विजय बहुगुणा को मुख्यमंत्री के रूप में चयन उनकी कोन सी प्रतिभा देख कर किया। क्या सोनिया गांधी व उनके सलाहकार विजय बहुगुणा के मुम्बई उच्च न्यायालय में न्यायमूर्ति के रूप में किये गये महान सेवाओं से प्रसन्न थी, क्या वर्तमान विधासभा चुनाव में उनके लोकसभा क्षेत्र में हुई कांग्रेस की दुर्गति से प्रसन्न हो कर उनको यह सम्मानित पद सोंपा। या सोनिया गांधी ने प्रदेश की जनता द्वारा भाजपा को परास्त करने के साथ साथ खण्डूडी को कोटद्वार के विधानसभा चुनाव में परास्त करने से दुखी हो विजय बहुगुणा को मुख्यमंत्री बना कर कांग्रेस की जड़ों में मट्ठा डालने का काम किया। आज भी प्रदेश की जनता जानना चाहती है कि आखिर अधिकांश विधायकों व नेताओं की भावनाओं को रौंद कर आखिर किस गुण से प्रभावित हो कर सोनिया गांधी ने विजय बहुगुणा को प्रदेश का मुख्यमंत्री बनाया। जनता सोनिया गांधी द्वारा उनके जनादेश का जो मजाक व अपमान किया उसका जवाब आने वाले 2014 में पूरे देश से कांग्रेस का सफाया करके देगी। इसके साथ दिल्ली में रहने वाले 30 लाख उत्तराखण्डियों ने नगर निगम चुनाव में भी कांग्रेस को उत्तराखण्डी जनादेश को रोंदने के लिए दण्डित कर दिया।
सबसे हैरानी की बात है कि सन् 2002 से लेकर 2012 तक प्रदेश में हुए हर विधानसभा व लोकसभा चुनाव में प्रदेश की जनता ने जो जनादेश दिया उसमें एक ही संदेश साफ साफ छुपा हुआ था कि प्रदेश की जनता जातिवादी व भ्रष्टाचारी नेतृत्व को किसी भी कीमत पर नहीं स्वीकारती है। इसके बाबजूद कांग्रेस व भाजपा निरंतर जातिवादी राजनीति का कार्ड प्रदेश में खेलते रहे। सबसे हैरानी की बात यह है कि प्रदेश में चल रही इस आत्मघाती राजनीति का विरोध करना तो रहा दूर यहां की मीडिया व बुद्धिजीवि इस मुद्दे को नजरांदाज करके इस कलंक के लिए भाजपा व कांग्रेस को कटघरे में खडे करने वालों का ही विरोध कर रहे है। प्रदेश में जमीनी नेताओं को नजरांदाज करके भाजपा व कांग्रेस आला नेतृत्व द्वारा थोपे गये नेताओं के कारण प्रदेश में भ्रष्आचार का तांडव मचा हुआ है। कांग्रेसी मानसिकता के लोगों को असली बात तो समझ में नहीं आ रही है जो जनादेश में छुपी हुई थी,। प्रदेश की जनता प्रदेश में बलात चलाये जा रहेे जातिवादी व भ्रष्टाचारी कुशासन के खिलाफ निरंतर 2002 से निरंतर अपना जनादेश दे रहे हैं परन्तु इसके बाबजूद यहां पर भाजपा व कांग्रेस दोनों बहुत ही निर्ममता से लोकशाही का गला घोटने का कृत्य कर रहे है। 2002 में प्रदेश की जनता ने उत्तराखण्ड राज्य बनाने का ऐतिहासिक कार्य करने वाली भाजपा को प्रदेश के नाम बदल कर आपमान करने, संसाधनों की बंदरबांट व नित्यानन्द स्वामी को थोप कर लोकशाही का अपमान करने से आक्रोशित हो कर कांग्रेस को इस आशा से जनादेश दिया कि वह जनभावनाओं का सम्मान करेगी। परन्तु कांग्रेस ने भी 2002 के विधानसभा चुनाव में विजयी होने के बाद अधिसंख्यक विधायकों के मुख्यमंत्री हरीश रावत को बनाये जाने के मांग के बाबजूद जिस शर्मनाक ढ़ग से घोर उत्तराखण्ड विरोधी नारायणदत्त तिवारी को थोपा उससे जनता ने इसे कांग्रेस द्वारा किया गया जनादेश का ही अपमान माना। इसके बाबजूद जनता को आशा थी कि तिवारी जी अपने लम्बे अनुभव व प्रशासन क्षमता से प्रदेश के दूसरे यशवंत सिंह परमार बनेगी। परन्तु जनता की आशाओं पर तब बज्रपात हुआ जब तिवारी ने शासन के नाम पर यहां पर लालबतियों का ही नहीं जातिवाद-क्षेत्रवाद व भ्रष्टाचार का तांडव मचाया। उनसे मुक्ति के लिए जनता ने जो जनादेश दिया उसमें भी दूसरी नम्बर की पार्टी रहने के बाबजूद हरीश रावत ने निर्दलीय, उक्रांद व बसपा के सहयोग से सरकार बनाने का सफल प्रयास कर दिया था। वह जब तक मंजिल पर पंहुचता तब तक पूर्व मुख्यमंत्री तिवारी ने अपने दिल्ली समर्थकों के सहयोग से सोनिया गांधी को गुमराह करके सरकार बनाने के बजाय विपक्ष में बेठने का फरमान जारी करवा दिया।
इसके बाबजूद 2007 के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने भी चुने हुए अधिसंख्यक विधायकों की भाजपा के वरिष्ठ जमीनी नेता भगतसिंह कोश्यारी को मुख्यमंत्री बनाने के बजाय गैर विधायक भुवनचंद खंडूडी को बलात मुख्यमंत्री के पद पर थोप कर लोकशाही का अपमान किया। खण्डूडी ने मुख्यमंत्री बनने के बाद जो अलोकतांत्रिक व जातिवादी मानसिकता से प्रदेश की जनता ही नहीं अपितु प्रदेश भाजपा के मंत्री व विधायक ही त्राही त्राही करने लगे। उनके मुंह लगे बाहरी अधिकारी के राज से प्रदेश में भ्रष्टाचार को जो हवा मिली नजता त्रस्त हो गयी। जब अपने अधिसंख्यक विधायकों की खण्डूडी को बदलने की गुहार भाजपा आला नेतृत्व ने नहीं सुनी तो जनता ने लोकसभा चुनाव में प्रदेश की सभी पांच सीटों से भाजपा का सुपडा ही साफ कर दिया। इसके बाबजूद जब भाजपा आला नेतृत्व नहीं जागा तो विधायकों व कांेश्यारी के सामुहिक विरोध के आगे भाजपा आला नेत्त्व ने मजबूरी में प्रदेश की सत्ता से खण्डूडी को हटा दिया परन्तु अधिकांश विधायकों की कोश्यारी को मुख्यमंत्री बनाने की इच्छा को रौंदते हुए फिर खंडूडी की सबसे पहली पसंद निशंक को प्रदेश का मुख्यमंत्री बना दिया। भाजपा का जातिवादी प्रवृति देख कर पूरे प्रदेश की जनता हैरान रह गयी। निशंक के शासन में भी जो भ्रष्टाचार का तांडव मचा उसके बाबजूद जब आला कमान ने सत्ता परिवर्तन न करने की हट लगायी रखी तो मजबूरी में भाजपा नेता तेजपाल सिंह रावत ने भाजपा से इस्तीफा दे कर जनता में व्यापक आंदोलन छेड दिया। इसी आंदोलन को भुनाते हुए खंडूडी ने केन्द्रीय नेतृत्व को झांसे में ले कर फिर प्रदेश की मुख्यमंत्री की कुर्सी हथिया ली। निशंक के कुशासन व खंडूडी की अलोकशाही के बाबजूद भाजपा ने जिस संकीर्णता से फिर खंडूडी जरूरी का नारा विधानसभा चुनाव 2012 में दिया उससे आक्रोशित हो कर प्रदेश की जनता ने न केवल खंडूडी अपितु भाजपा को भी प्रदेश की सत्ता से बाहर कर दिया। जनता के इस जनादेश का एक साफ नजरिया था कि वह प्रदेश में किसी भी कीमत पर भ्रष्टाचार व जातिवादी राजनीति को स्वीकार नहीं करती। इसके बाबजूद कांग्रेस आलाकमान ने जननेताओं को दर किनारे करके आधा दर्जन भी विधायकों के साथ न होने वाले विजय बहुगुणा को मुख्यमंत्री बनाया तो जनता अपने आप को ठगी महसूस कर रही है।
जनता इस बात से भी आहत है कि क्यों प्रदेश में भाजपा व कांग्रेस के तथाकथित जमीनी नेता इतने बंधुआ मजदूर व अपने हितों के लिए खुदगर्ज बन गये है। क्यों वे प्रदेश के हितों के लिए आवाज उठाते है। आज प्रदेश के इन बोने नेतृत्व के कारण ही प्रदेश अपनी स्थाई राजधानी गैरसैंण नहीं बना पाया, प्रदेश में जनसंख्या पर आधारित विधानसभाई परिसीमन थोपा गया, मुजफरनगर काण्ड के अभियुक्तों व मुलायम के कहारों को शर्मनाक संरक्षण दिया जा रहा है, प्रदेश के संसाधनों व प्रतिभाओं को संरक्षण करने के बजाय प्रदेश के मूल संसाधनों-जल जंगल, जमीन की बंदरबांट करने के हथकण्डे अपनाये जा रहे है। इस प्रकरण से साफ हो गया है कि कांग्रेस ही नहीं भाजपा दोनोें भले ही देश की सबसे बड़ी राजनैतिक पार्टियां हो परन्तु उनका नजरिया ही नहीं उनकी पूरी कार्यप्रणाली अलोकतांत्रिक व जातिवादी तथा भ्रष्टाचार पोषक है। इन दोनों दलों को ही जनादेश का सम्मान करना तक अभी नहीं आया तो अन्य दलों से इसकी आशा करनी भी नादानी होगी।
उत्तराखण्ड किसी की जागीर नहीं है बहुगुणा जी

बहुगुणा जी कहीं से भी विधानसभा का सदस्य बने यह उनका अपना अधिकार व पसंद की बात है। परन्तु अपनी सीट जीतने के लिए वे उत्तराखण्ड की लोकशाही व नैतिक मूल्यों को दाव पर लगायें यह किसी भी सम्मानित उत्तराखण्डी को एक पल के लिए भी स्वीकार नहीं है। आज कल अफवाह है कि वे सितारगंज से विधानसभा चुनाव लड़ने की तैयारी कर रहे हैं और इसके लिए भाजपा का विधायक किरण मण्डल उनके लिए अपनी सीट कुर्वान करने के लिए मन बना चूका है। चर्चा इस बात की भी है इस क्षेत्र में हजारों लोग जो सरकारी जमीन पर बलात कब्जा करके बेठे हैं उनको यह कब्जा अवैध से वैध घोषित किया जायेगा। अगर इस शर्त या प्रलोभन पर विजय बहुगुणा कभी अपने आप को उत्तराखण्डी के बजाय बंगाली ब्राहमण बताना श्रेयकर समझ रहे हों या प्रदेश की जमीन पर बलात कब्जे को अपनी कुर्सी के लिए कुर्वान करना चाहते हैं तो यह उत्तराखण्डी जनता को किसी कीमत पर स्वीकार नहीं। प्रदेश के हक हकूकों की रक्षा के लिए उत्तराखण्ड राज्य का गठन किया गया था ना की इनको लुटाने के लिए।

Sunday, May 20, 2012

उत्तराखण्ड किसी की जागीर नहीं है बहुगुणा जी

बहुगुणा जी कहीं से भी विधानसभा का सदस्य बने यह उनका अपना अधिकार व पसंद की बात है। परन्तु अपनी सीट जीतने के लिए वे उत्तराखण्ड की लोकशाही व नैतिक मूल्यों को दाव पर लगायें यह किसी भी सम्मानित उत्तराखण्डी को एक पल के लिए भी स्वीकार नहीं है। आज कल अफवाह है कि वे सितारगंज से विधानसभा चुनाव लड़ने की तैयारी कर रहे हैं और इसके लिए भाजपा का विधायक किरण मण्डल उनके लिए अपनी सीट कुर्वान करने के लिए मन बना चूका है। चर्चा इस बात की भी है इस क्षेत्र में हजारों लोग जो सरकारी जमीन पर बलात कब्जा करके बेठे हैं उनको यह कब्जा अवैध से वैध घोषित किया जायेगा। अगर इस शर्त या प्रलोभन पर विजय बहुगुणा कभी अपने आप को उत्तराखण्डी के बजाय बंगाली ब्राहमण बताना श्रेयकर समझ रहे हों या प्रदेश की जमीन पर बलात कब्जे को अपनी कुर्सी के लिए कुर्वान करना चाहते हैं तो यह उत्तराखण्डी जनता को किसी कीमत पर स्वीकार नहीं। प्रदेश के हक हकूकों की रक्षा के लिए उत्तराखण्ड राज्य का गठन किया गया था ना की इनको लुटाने के लिए।


उत्तराखण्ड किसी की जागीर नहीं है बहुगुणा जी

बहुगुणा जी कहीं से भी विधानसभा का सदस्य बने यह उनका अपना अधिकार व पसंद की बात है। परन्तु अपनी सीट जीतने के लिए वे उत्तराखण्ड की लोकशाही व नैतिक मूल्यों को दाव पर लगायें यह किसी भी सम्मानित उत्तराखण्डी को एक पल के लिए भी स्वीकार नहीं है। आज कल अफवाह है कि वे सितारगंज से विधानसभा चुनाव लड़ने की तैयारी कर रहे हैं और इसके लिए भाजपा का विधायक किरण मण्डल उनके लिए अपनी सीट कुर्वान करने के लिए मन बना चूका है। चर्चा इस बात की भी है इस क्षेत्र में हजारों लोग जो सरकारी जमीन पर कई सालों से बलात कब्जा करके बेठे हैं उनको यह कब्जा अवैध से वैध घोषित किया जायेगा। अगर इस शर्त या प्रलोभन पर विजय बहुगुणा कभी अपने आप को उत्तराखण्डी के बजाय बंगाली ब्राहमण बताना श्रेयकर समझ रहे हों या प्रदेश की जमीन पर बलात कब्जे को अपनी कुर्सी के लिए कुर्वान करना चाहते हैं तो यह उत्तराखण्डी जनता को किसी कीमत पर स्वीकार नहीं। प्रदेश के हक हकूकों की रक्षा के लिए उत्तराखण्ड राज्य का गठन किया गया था ना की इनको लुटाने के लिए।

Friday, May 18, 2012


-खण्डूडी के बजाय किसी कमजोर प्रत्याशी को उतार कर बिजय बहुगुणा को विधानसभा में पंहुचाने का काम करेगी क्या भाजपा ?
क्या सितार गंज से लडेंगे बिजय बहुगुणा

क्या प्रदेश के मुख्यमंत्री बिजय बहुगुणा के खिलाफ भाजपा प्रदेश के आम पार्टी कार्यकर्ताओं की मांग का सम्मान करते हुए पूर्व मुख्यमंत्री भुवनचंद खण्डूडी को विधानसभा उपचुनाव में मैदान में उतारेगी भाजपा? यह सवाल सभी के दिमाग में क्रेांध राहा है परन्तु प्रदेश के राजनीति के गलियारों में यह अटकलें भी जोरों से है कि भाजपा ने मुख्यमंत्री के खिलाफ खण्डूडी के बजाय किसी कमजोर प्रत्याशी को उतार कर मुख्यमंत्री बहुगुणा को विधानसभा में निर्वाचित होने के लिए अभयदान देने का मन बना लिया है। इन खबरों में कितनी सच्चाई है यह तो भाजपा द्वारा मुख्यमंत्री के खिलाफ खण्डूडी को चुनावी दंगल में उतारने व न उतारने से ही जग जाहिर हो जायेगा?
प्रदेश में इन दिनों राजनीति का अजीब सा नजारा देखने को मिल रहा है। 18 मई को जिस समय बिजय बहुगुणा उत्तरकाशी में लोक कल्याणकारी घोषणायें कर रहे थे उसी समय प्रदेश के नेता प्रतिपक्ष भाजपा के वरिष्ठ नेता अजय भट्ट सहित तमाम नेता अपने सितार गंज विधानसभा क्षेत्र के विधायक किरण मंडल के तथाकथित गुमशुदी के बारे में कांग्रेस पर भाजपाई विधायकों को प्रलोभनों व डरा धमका कर अपने पाले में लेने के लिए कोस रहे थे। हालांकि जनभावनाओं को दरकिनारे कर कांग्रेस आलाकमान द्वारा दिल्ली से पेरासूट द्वारा उत्तराखण्ड में थोपे गये मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा के लिए 6 माह के अंदर विधानसभा का चुनाव जीतने की संवैधानिक बाध्यता को देख कर गंगोत्री, कर्णप्रयाग सहित कई विधानसभाई सीट से मुख्यमंत्री के उम्मीदवार बनने की खबरे छन कर आ कर प्रदेश की राजनीति का पारा बढ़ा रही है।
हालांकि गंगोत्री विधानसभा सीट से विजय बहुगुणा का विधानसभा चुनाव लडने के पीछे यहां के वर्तमान कांग्रेसी विधायक विजयपाल सजवान का विजय बहुगुणा का सबसे करीबी होना माना जा रहा है। वहीं कर्णप्रयाग के विधायक मेखुरी द्वारा भी मुख्यमंत्री के लिए विधानसभा सीट छोडने व मुख्यमंत्री द्वारा गैरसेंण में विधानसभा का विशेष सत्र व मंत्रीमण्डल की बैठक आयोजन करने की घोषणा को देखते हुए लोग कर्णप्रयाग सीट को भी मुख्यमंत्री की संभावित विधानसभा सीट के तौर पर देख रहे है। परन्तु इन दोनों सीटों से चुनाव लड़ने का सबसे बड़ा खतरा यह है कि इन सीटों से कांग्रेस की विधायकों की संख्या गणित डगमगा जायेगा। अगर यह सीट पर कांग्रेस के मुख्यमंत्री हारते है तो भाजपा व कांग्रेस की वर्तमान संख्या गणित बिलकुल उल्टा हो जायेगा। भाजपा 31 के बजाय 32 हो जायेगी तथा कांग्रेस 32 से 31 पर ही सीमट जायेगी। इससे कांग्रेस के हाथ से भाजपा निर्दलीयों व बसपा आदि के सहयोग से प्रदेश में सत्तासीन हो सकती है। इसी आशंका के कारण कांग्रेस के राजनीति के धुरंधरों ने अपनी पूरी ताकत किसी भाजपा के विधायक से विधानसभा सीट खाली कराने की है। इसी दृष्टि से कई भाजपा के विधायकों को टटोला जा रहा है। इसमें सबसे ज्यादा चर्चा में सहस्रपुर की विधानसभा सीट के विधायक पुण्डीर रहे। परन्तु इसी सीट पर कांग्रेस को भीतरघात की बड़ी आशंका को देखते हुए कांग्रेसी रणनीतिकारों को ऐसे जगह से चुनाव लडाने की रणनीति रही जिस पर भाजपा के प्रदेश के बडे क्षत्रप भुवनचंद खण्डूडी व भगतसिंह कोश्यारी आदि का कोई प्रभाव न हो। इस दृष्टि से सितार गंज सीट ही सबसे उपयुक्त नजर आ रही है। इसी कारण जब भाजपा के यहां के विधायक किरण मण्डल के अज्ञातवास में चले जाने से भाजपा में खलबली मच गयी। राज्यपाल से लेकर मुख्यमंत्री तक विधायक की खोज खबर करने के लिए गुहार लगायी जा रही है। परन्तु माना जा रहा है राजनैतिक परवेक्षकों को इस बात की आशंका है कि मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा भाजपा के विधायक के साथ कांग्रेस आलाकमान सोनिया गांधी से भेंट कर सकते है। उनसे आशीर्वाद लेने के बाद ही विजय बहुगुणा इस भाजपा छोड कर कांग्रेस की गोद में बैठने वाले विधायक का नाम उजागर किया जायेगा। गौरतलब है कि कुछ समय पहले बिजय बहुगुणा द्वारा खुद को बंगाली ब्राहमण बताने को भी राजनीति के समीक्षक इसी परिपेक्ष में देख रहे हैं। अब देखना यह है कि मुख्यमंत्री बिजय बहुगुणा अपने तमाम विरोधियों की चाल को धत्ता बता कर किस सीट को विधानसभा में पंहुचने के लिए चुनते है। परन्तु दिल्ली के राजनैतिक गलियारों में चर्चा यह है कि भाजपा के प्रदेश नेताओं ने विजय बहुगुणा को आसानी से विधानसभा में कदम रखने के लिए मन बना लिया है। भले ही भाजपा के नेता इस बात को ऐलान कर रहे हैं कि अगर आला कमान आदेश देगा तो खंडूडी को मुख्यमंत्री के खिलाफ उतारा जायेगा। परन्तु दोनों की राजनीति को करीबी से जानने वालों को विश्वास है कि खण्डूडी व बहुगुणा दोनों ममेरे भाई एक दूसरे के खिलाफ चुनावी दंगल में किसी भी कीमत पर नहीं उतरेंगे। राजनीति में दोनों भले ही विरोधी दलों से हों परन्तु अंदर से दोनों के बीच अदृश्य तालमेल जगजाहिर है। यही नहीं राजनैतिक गलियारे में तो यह भी चर्चा है कि भाजपा ने बिजय बहुगुणा को विधानसभा का सदस्य बनने के लिए मजबूत प्रत्याशी लडाने के बजाय कमजोर प्रत्याशी को उतारने का मन बना लिया है। पूर्व मुख्यमंत्री खंडूडी से निकट रिश्तेदारी व भगतसिंह कोश्यारी से मुख्यमंत्री की हुई मुलाकातों के बाद इन अटकलों का जोर राजनैतिक क्षेत्रों में है। यह तो समय ही बतायेगा कि बिजय बहुगुणा किस सीट से चुनाव लडते हैं और क्या खंडूडी को भाजपा उनके विरोध में चुनाव लडाती है या किसी कमजोर प्रत्याशी को उतार कर उनको विधानसभा में जाने का साफ रास्ता देती है। इन अटकलों की सच्चाई तभी उजागर होगी जब मुख्यमंत्री अपनी सीट का ऐलान करेंगे व भाजपा चुनाव दंगल में अपना प्रत्याशी खडा करेगी।



-राजधानी निर्माण हेतु केन्द्र सरकार द्वारा प्रदान की गयी धनराशि को गैरसेंण में खर्च करे बहुगुणा सरकार
गैरसंण के समर्थन में उतरे पूरे विश्व में रहने वाले लाखों उत्तराखण्डी 

उत्तराखण्ड राज्य गठन आंदोलन के अग्रणी संगठन उत्तराखण्ड जनता संघर्ष मोर्चा सहित तमाम आंदोलनकारी संगठनों ने प्रदेश के मुख्यमंत्री द्वारा गैरसेंण में मंत्रीमण्डल की बैठक व विधानसभा का विशेष सत्र के आयोजन करने की घोषणा का स्वागत करते हुए मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा से मांग की है कि केन्द्र सरकार द्वारा प्रदेश की स्थाई राजधानी बनाने के लिए प्रदान की गयी 80 करोड़ रूपये की धनराशि को अविलम्ब गैरसेंण में प्रदेश की स्थाई राजधानी की नींव रखने में खर्च करने का ऐतिहासिक कार्य करे।
उत्तराखण्ड राज्य गठन के लिए संसद पर छह साल का ऐतिहासिक सफल धरना आंदोलन करने वाले मोर्चा के अध्यक्ष देवसिंह रावत  ने मोर्चा के संयोजक सर्वोच्च न्यायालय के वरिष्ठ अधिवक्ता अवतार सिंह रावत व महासचिव जगदीश भट्ट के साथ संयुक्त अपील में कहा कि प्रदेश की जनता हर हाल में प्रदेश की राजधानी गैरसेंण में बनानी चाहती है। इसके लिए बाबा मोहन उत्तराखण्डी सहित अनैक सपूतों ने अपनी शहादत दी है।
मोर्चा के अध्यक्ष देवसिंह रावत ने कहा कि प्रदेश की इस महत्वपूर्ण मांग को पूरी करने के लिए उत्तराखण्डी संसार के हर जगह पर एकजूट हो कर प्रदेश सरकार पर दवाब डाल रहे है। उत्तराखण्ड मेें ही नहीं दिल्ली में रहने वाले 30 लाख उत्तराखण्डी समाज के अलावा  लखनऊ, मुम्बई, गुजरात, हरियाणा, पंजाब, चण्डीगढ़ के साथ अमेरिका सहित विदेशों में रहने वाले उत्तराखण्डी उत्तराखण्ड की स्थाई राजधानी गैरसेंण में बनाने के लिए निरंतर अपने स्तर से दवाब बना रहे है।
दिल्ली में उत्तराखण्ड राज्य गठन जनांदोलन के अग्रणी संगठनों की समन्वय समिति जिसमें उत्तराखण्ड जनता संघर्ष मोर्चा के देवसिंह रावत,  उत्तराखण्ड जनमोर्चा के जगदीश नेगी,, उत्तराखण्ड महासभा के हरिपाल रावत व उत्तराखण्ड राज्य लोकमंच बृजमोहन उप्रेती आदि प्रमुख हैं ने प्रदेश सरकार से प्रदेश की राजधानी गैरसेंण बनाने की पुरजोर मांग की। उन्होंने प्रदेश की बहुगुणा सरकार से अपील की कि राजधानी बनाने के लिए केन्द्र सरकार द्वारा कई सालों से प्रदान की गयी 80 करोड़ की धनराशि अविलम्ब गैरसेंण में ही खर्च की जाय।
इस मामले में दिल्ली में उत्तराखण्ड आंदोलनकारी संगठनों व म्यर उत्तराखण्ड सहित अनैक सामाजिक संगठन मिल कर मजबूत आंदोलन करने के लिए मन बना चूके है। इस दिशा में मोर्चा के अध्यक्ष देवसिंह रावत ने राजधानी गैरसेंण के लिए समर्पित संगठन म्यर उत्तराखण्ड के अध्यक्ष मोहन बिष्ट व महासचिव सुदर्शन सिह रावत ने प्रदेश की स्थाई राजधानी गैरसेंण बनाने तथा प्रदेश में बड़े बांधों को बनाये जाने के विरोध में आंदोलन तेज करने का संकल्प लिया है। इसके लिए सभी सामाजिक संगठनों को भी इस आंदोलन से जोडा जा रहा है। आंदोलनकारियों ने प्रदेश के तमाम राजनैतिक दलों से पुरजोर अपील की कि प्रदेश के स्वाभिमान, विकास व लोकशाही के प्रतीक राजधानी गैरसेंण बनाने के महान कार्य में अपनी संकीर्ण राजनैतिक रोटियां सेंकने से दूर रहें। आंदोलनकारियों ने कहा जो भी इस मांग के साथ राजनैतिक खिलवाड़ करने की धृष्ठता करेगा उसका हस्र तिवारी, खण्डूडी व निशंक की तरह ही होगा। वहीं लखनऊ से भारत की लोक जिम्मेदार पार्टी के प्रमुख नेता अधिवक्ता दानसिंह रावल ने इस आंदोलन को अपना पूरा समर्थन देने का ऐलान किया है। श्री रावल के अनुसार मुम्बई, महाराष्ट्र, गुजरात ही नहीं लखनऊ में भी उत्तराखण्डी लगातार इस मांग को पूरी करने के लिए उत्तराखण्ड सरकार पर दवाब बनाये हुए है।

Wednesday, May 16, 2012



-बांधों व जलविद्युत परियोजनाओं के बजाय भू तापीय ऊर्जा (Binary Cycle Plant ) बनी बरदान 
-भूकम्प व बांधों से बचाव कर कर ऊर्जा की जरूरतें पूरा करने वाले भू तापीय ऊर्जा ( Binary Cycle Plant  ) उत्तराखण्ड में स्थापित करं मुख्यमंत्री  बहुगुणा

पूरे विश्व में भू तापीय ऊर्जा (Binary Cycle Plant ) से पृथ्वी को भूकम्प व बडे बांधों की त्रासदी से बचाया जा सकता है इसके साथ भारी मात्रा में बिजली पैदा की जा सकती है। इस समय विश्व में अमेरिका, इटली, जापान, इंडोनेशिया, फिलिस्तीन सहित अनैक देशों में भू तापीय ऊर्जा ( Binary Cycle Plant  ) से जहां बिजली का उत्पादन किया जा रहा है वहीं भूकम्प व ज्वालामुखी के खतरे को काफी कम कर दिया है। भारत में भूकम्प की दृष्टि से सबसे संवेदनशील उत्तराखण्ड सहित हिमालयी राज्यों में जहां बडे बांध व जल विद्युत परियोजना से यहां के पर्यावरण व लोगों के विस्थापन का बडा खतरा हर पल मंडरा रहा है, अगर इन राज्यों की सरकारें अपने निहित स्वार्थ से उपर उठ कर जन व प्रदेश के हित में जरा सा भी संवेदनशील हों तो वे यहां पर बड़ी संख्या में भू तापीय ऊर्जा (Binary Cycle Plant ) लगा कर यहां पर भारी मात्रा में विजली उत्पादन कर सकते हैं और प्रदेश को भूकम्प व विस्थापन की त्रासदी से बचा सकते है।’ यह रहस्य अन्तराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त वैज्ञानिक सूर्या प्रकाश कपूर ने उत्तराखण्ड के पूर्व मुख्यमंत्री व भाजपा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष सांसद भगतसिंह कोश्यारी से भाजपा मुख्यालय से सटे हुए उनके संसदीय आवास में 16 मई बुधवार को गो भक्त स्वामी गोपाल दास मुनि के नेतृत्व में गो, गंगा व हिमालय की रक्षा करने के अभियान के तहत व्यापक समर्थन हासिल करने की गुहार लगाते हुए कही। इस शिष्ट मण्डल में गोपाल दास मुनि व वैज्ञानिक सूर्या प्रकाश कपूर के अलावा श्री कृष्ण विश्व कल्याण भारती के प्रमुख देवसिंह रावत व अन्तराष्ट्रीय कबड़डी खिलाड़ी कुलदीप पहलवान भी साथ थे। पूर्व मुख्यमंत्री भगत सिंह कोश्यारी से हुई विशेष वार्ता के समय प्रदेश के पूर्व दर्जाधारी पी सी नैनवाल, अनिल बलूनी व पूर्व मुख्यमंत्री के सहायक जगदीश भाकुनी भी उपस्थित थे।
प्राकृतिक आपदाओ के उन्मूलन के अन्तराष्ट्रीय विशेषज्ञ वैज्ञानिक के रूप में जाने जाने वाले सूर्या प्रकाश कपूर ने भाजपा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष भगतसिंह कोश्यारी से कहा कि आप उत्तराखण्ड प्रदेश के मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा से प्रदेश में बिजली उत्पादन के लिए बडे बांध या जल विधुत परियोजनाओं का अंधाधुध स्थापना करके प्रदेश के हितों से खिलवाड़ करने से रोकते हुए उन्हें भू तापीय ऊर्जा ( Binary Cycle Plant  )  प्लांट लगाने के लिए कहे। उन्होंने कहा कि उत्तराखण्ड में 700 मीटर नीचे ही बड़ी मात्रा में लावा मिलता है, इसके साथ ही यहां पर बड़ी संख्या में गर्म पानी के स्रोत भी विद्यमान है। इन स्थानों में भू तापीय ऊर्जा ( Binary Cycle Plant  ) प्लांट स्थापित करके प्रदेश को जहां भारी विजली मिलेगी वहीं भूकम्प व बडे बांधों के दंश से मुक्ति मिलेगी।
उन्होंने कहा कि यहां पर सेकड़ों की संख्या में भू तापीय ऊर्जा ( ठपदंतल ब्लबसम च्संदज ) प्लांट स्थापित किये जा सकते है। इन प्लांटों की लागत 6 करोड़ प्रति मेगावांट से लेकर बडी क्षमता के प्लांट में लागत काफी कम हो जाती है।
‘हिमालय जैसे भूकम्प की दृष्टि से संवेदनशील राज्यों में बिद्युत ऊर्जा के उत्पादन के नाम पर अंधाधुंध बन रहे बडे बांध या जल विद्युत परियोजनाओं से जहां पर्यावरण व मानवीय दृष्टि से काफी खतरनाक साबित होते हैं। वहीं इनके निर्माण से प्रकृति के साथ खतरनाक आत्मघाती खिलवाड़  किया जाता है इसके साथ हजारों लोगों को विस्थापन की त्रासदी झेलनी पड़ती है। अन्तर्राष्ट्रीय वैज्ञानिक कपूर ने कहा कि गंगा पर एक भी बांध किसी भी कीमत पर नहीं बनना चाहिए। क्योंकि गंगा की पावनता व उसके निर्मलता को बांध निर्माण से बनने वाले सुरंगों में गंगाजल को डाल कर खतरा हो जाता है। जहां तक उत्तराखण्ड की बिजली उत्पादन का, तो यह बिजली बहुत ही आसानी से भू तापीय ऊर्जा (Binary Cycle Plant  ) स्थापित करने से लगाये जा सकते है। प्रदेश सरकार को तत्काल सीमान्त जनपद चमोली के तपोवन में गर्म पानी के स्रोत पर यह प्लांट स्थापित करने चाहिए। इन प्लांटों के स्थापना  करने के लिए सभी खर्च संयुक्त राष्ट्र संघ जो प्रकृति में ग्लोबल वार्मिग बचाव अभियान के तहत खर्च कराया जा सकता है। उन्होंने कहा गो गंगा व हिमालय की रक्षा करना प्रत्येक भारतीय का प्रथम कर्तव्य है। इसी अभियान के तहत उन्होंने बताया कि गो पूरे विश्व संस्कृति की माता है। भारतीय वंश की गायों में सूर्य केतु नाडी होने के कारण इसका दुध सुनहेरा व निरोगी होता है। उन्होंने साफ शब्दों में कहा गो गंगा व हिमालय से छेडछाड करना देश द्रोह से कम नहीं है। उन्होंने स्पष्ट किया कि अमेरिका में 1800 मेगावाट क्षमता का, इटली में 1960 में में स्थापित, इंडोनेशिया में 28000 मेगावाट, जापान व फिलिस्तीन सहित कई देशों में भू तापीय ऊर्जा ( Binary Cycle Plant  ) प्लांट सुचारू रूप से चल रहे है। उन्होंने कहा विश्व में जहां भी भूकम्पीय व ज्वालामुखी के कारण तबाही होती थी अब उन स्थानों में भू तापीय ऊर्जा (Binary Cycle Plant ) लगा कर भूकम्प व ज्वालामुखी से रक्षा करके इन क्षेत्रों की ऊर्जा का विजली के रूप में दोहन कर सदप्रयोग किया जा सकता है।

Monday, May 14, 2012


सेनिकों व अर्धसैनिकों को अधिकारियों व उनकी पत्नियों द्वारा किये जा रहे शोषण से बचाओ
बढ़ रहा है सेना व अर्ध सेना में अधिकारियों व सैनिकों में तनाव 

लेह में सेना के जवान और अफसर भिड़े वहीं अभी दो माह पहले ही उप्र में पुलिस के जवानों ने अपने अधिकारियों की पिटाई कर दी थी। बड़ी मुस्किल से स्थिति को संभाला गया । चीन सीमा पर सेनिकों व अधिकारियों के बीच विवाद एक मेजर के कारनामें से भडका वहीं उप्र में यह विवाद तब भड़का जब एक अधिकारी ने जुआ खेल रहे कुछ जवानों को रोका और एक की हल्की पिटाई कर दी। इससे अन्य जवान भड़क गये और देखते देखते हजारों जवानों ने अधिकारियों की धूनाई कर दी।
इस पखवाडे अनुशासित समझी जाने वाली भारतीय सेना की एक रेजीमेंट में ऐसी घटना घटित हो गयी जिसने पूरे सेन्य जगत के अंदर पनप रहे असंतोष को ही उजागर कर दिया। भारतीय सैनिक जो अपनी जान हथेली पर रख कर दुश्मन से भीडते हैं उनकी अपनी फोज के अंदर कितनी दुर्दशा है, किस वातावरण में वे वहां पर जीते हैं। शायद इसकी खोज खबर लेने की फुर्सत भी देश के हुक्मरानों को कभी नहीं रही। फिरंगी शासनकाल की तरह ही देश की सेनाओं में आम सैनिकों का आज भी उसी तरह से शोषण होता है जिस तरह से गुलामी काल में होता था। उच्चाधिकारी सैनिकों को अपने सहायक के रूप में रख कर उनसे बुट पोलिस से लेकर घरेलु नौकरों से बदतर काम कराते है। उच्च अधिकारियों से अधिक देश की सीमाओं की रक्षा करने वाले इन जवानों का उत्पीड़न व अपमान इन अधिकारियों की पत्नियां करती है। इसी कारण आज सैनिक अपने बच्चे को इन हालतों में सेना में भरती करने के लिए तैयार नहीं होता।
 अधिकारियों और जवानों के बीच इस पखवाडे की एक रात की  घटित हुई यह घटना ने पूरे सैन्य तंत्र को हिला कर रख दिया है। सुत्रों के अनुसार चीन सीमा पर लेह से 150 किमी दूर पर यह बेहद शर्मसार करने वाली घटना तब घटित हुई जब एक जवान ने कथित रूप से एक मेजर की पत्नी के साथ र्दुव्यवहार किया, जिसके बाद मेजर ने जवान की पिटाई कर दी। 226वीं फील्ड रेजिमेंट के अधिकारी और जवान दोपहर नयोमा जनपद में दोपहर को घटित हुई। यहां फायरिंग का अभ्यास कर रहे थे। मेजर ने अन्य जवानों को उस ‘सहायक’ को किसी तरह की चिकित्सा सहायता देने की इजाजत नहीं दी, जिससे उसके सहयोगियों में गुस्सा भड़क गया और उन्होंने इस बात का विरोध किया। यह खबर रेजीमेंट के कमांडिंग आफिसर तक पहुंची, जो निकटवर्ती पुलिस गेस्ट हाउस में ठहरे हुए थे। उन्होंने तुरंत मौके पर पहुंच कर हालात को सामान्य बनाने के लिए मेजर को उनके व्यवहार के लिए डांटा। इस पर मेजर ने अपने पांच साथी अधिकारियों के साथ कमांडिंग आफिसर को जवानों के सामने पीटा। इससे जवानों का गुस्सा भड़क उठा और उन्होंने बुरी तरह अधिकारियों को डंडों से पीटा। कमांडिंग आफिसर कर्नल को तुरंत लेह अस्पताल में भर्ती कराया गया। इस घटना के बाद 40 से 50 जवानों ने मेजर के रेंक के अधिकारियों को ढूंढ-ढूंढकर पीटना शुरू किया। दो अधिकारी पास के शिविर में मिले तो उन्हें वहीं पीट दिया। इसके बाद नाराज जवानों ने शस्त्रागार पर कब्जा कर लिया है। बडी मुश्किल से इस घटना पर अंकुश लगाया गया। परन्तु इसकी गूंज से दिल्ली सेना मुख्यालय ही नहीं  दिल्ली दरवार भी हिल गया। सेना प्रमुख ने तुरंत इस घटना की जांच के आदेश दिये। एक दोषी मेजर के कारण देश की जनता के सम्मुख आया।
यह हालत केवल सेना या पुलिस में ही नहीं अधिकांश अर्ध सैनिक बलों में यही हालत है। इस हालत को बदलने के लिए भले ही कागचों में नियम बनाये गये परन्तु उनको जमीन पर ईमानदारी से लागू नहीं किये गये इसी कारण आज सैन्य जगत में भारी असंतोष है।


तिवारी की हटधर्मिता से आक्रोशित न्यायालय ने अपनाया कडा रूख

नई दिल्ली (प्याउ) । अपनी पंहुच व रूतबे की हनक से कैसे देश के तथाकथित हुक्मरानों की जमात देश के कानून व समाज को ठेगा दिखाने का काम करते है इसका एक जीता जागता उदाहरण है कांग्रेसी नेता नारायणदत्त तिवारी का पितृत्व प्रकरण पर अब तक अपनायी गयी हटधर्मिता। यह मामला उच्च न्यायालय में लम्बे समय से खुद को तिवारी का पुत्र बताने वाले शेखर नामक युवक ने दायर कर रखा है। वह खुद को अपनी मां के साथ तिवारी के अवैध सम्बंधों के कारण उत्पन्न पुत्र बता कर उसको तिवारी का पुत्र घोषित करने की गुहार न्यायालय से लगा रहा है। इसके लिए वह तिवारी का डीएनए टेस्ट की मांग कर रहा है। न्यायालय के कई बार के आदेश के बाद जिस प्रकार से तिवारी इस प्रकरण न्यायालय के कई आदेशों की अवेहला कर रहे हैं, उससे वे खुद कटघरे में खडे हो गये है। उनके इस रवैये से न केवल उच्च न्यायालय अपितु सर्वोच्च न्यायालय भी नाराज है। इसी कारण उच्च न्यायालय को डीएनए टेस्ट के लिए रक्त नमूना देने के लिए केवल 48 घण्टे का समय दिया और उनकी विदेश यात्रा पर भी प्रतिबंध लगा दिया। उच्च न्यायालय तिवारी द्वारा अपनी उपेक्षा से कितना आहत है इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि इस 86 वर्षीय वयोवृद्ध बुजुर्ग को न्यायालय ने दो टूक शब्दों से कहा कि अगर वह सहजता से न्यायालय के आदेश का पालन नहीं करते तो पुलिस की मदद से भी यह जांच करायी जा सकती है। न्यायालय के कडे रूख से लोगों में विश्वास फिर लोटने लगा कि कानून सबके लिए बराबर होता है।
अपनी राजनीति की उंची पंहुच की हनक में जिस प्रकार से तिवारी न्यायालय की इस प्रकार उपेक्षा कर रहे है उससे जनता में एक संदेश साफ जा रहा था कि न्यायालय केवल क्या कमजोर आदमियों पर भी अपना प्रभाव चलाता है। इसी जन धारणा को दूर करने के लिए न्यायालय को तिवारी के खिलाफ कड़ा रूख अपनाना पडा। वहीं जनता में तिवारी के इस हटघर्मिता से एक संदेश साफ चला गया कि तिवारी अगर पाक साफ हैं तो वे क्यों जांच से दूर भाग रहे है।  इस प्रकरण पर फरियादी शेखर व उसकी माॅं उज्जवला शर्मा के साहस की भी लोग मुक्त कठों से सराहना कर रहे हैं कि उन्होंने समाज की तमाम मान अपमान के भय से उपर उठ कर ऐसे सफेद पोश नेताओं को बेनकाब करने का साहसिक कार्य किया जिन्होंने देश के विकास के संसाधनों को अपनी वासनाओं व संकीर्णता में झोंकने का कृत्य किये। ऐसे लोगों को बेनकाब करने वोल भले ही तिवारी के समान गुनाहगार क्यों न हो परन्तु देश व समाज को कलंकित करने वाले ऐसे भैडियों को बेनकाब करने का सराहनीय कार्य करने के कारण वे समाज में माफी गवाह के समान सम्मानित किये जाने योग्य है।



उत्तराखण्ड राज्य गठन के भाग्य विधाताओं के संकीर्ण निर्णयों से ही लगा उत्तराखण्ड के वर्तमान व भविष्य पर ग्रहण

मुख्य न्यायाधीश के नैनीताल उच्च न्यायालय की  नैनीताल में स्थापित करने के निर्णय व इसकी पीठ स्थापित करने की मांग पर उठाये प्रश्न से फिर जनता के कटघरे में खडे हुए भाग्य विधाता

देहरादून (प्याउ)। उत्तराखण्ड उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश बारिन घोष के नैनीताल उच्च न्यायालय की खण्ड पीठ को देहरादून या हरिद्वार में स्थापित करने की मांग पर प्रश्न चिन्ह लगाते हुए प्रदेश के सबसे मंहगे शहर नैनीताल में उच्च न्यायालय स्थापित करने  पर भी सवाल उठा कर प्रदेश की भोली भाली जनता को राज्य गठन के समय हुए जनविश्वास के साथ इसके भाग्य विधाता बने लोगों के निर्णयों पर एक बार फिर नजर दोडाने के लिए विवश कर दिया।
उत्तराखण्ड राज्य गठन के समय प्रदेश के दूरगामी हितों के प्रति दुराग्रही व संकीर्ण सोच के कारण प्रदेश की आम जनता को कितना दण्ड भोगना पड़ता है यह उत्तराखण्ड राज्य स्थापना के समय भाग्य विधाता बने हुक्मरानों की तंगदिली सोच से आज देश का सबसे भ्रष्ट राज्य में सुमार हुए इस सबसे ईमानदार समझे जाने वाले उत्तराखण्डियों के राज्य उत्तराखण्ड की वर्तमान दुर्दशा से ही उजागर हो जाती है। मामला प्रदेश की भू सीमा में पूरे हरिद्वार जनपद मिलाने का हो या प्रदेश की स्थाई राजधानी गैरसेंण बनाने की जनता की सर्व सम्मत मांग को दरकिनारे करके नादिरशाही की तरह बलात देहरादून थोपने का हो, या प्रदेश का जनता व संघर्ष का अपना नाम उत्तराखण्ड को बलात दलीय हितों के पोषण के लिए उत्तरांचल थोपने का हो या प्रदेश के उच्च न्यायालय की स्थापना आम जनता के हित की रक्षा करने के बजाय प्रदेश के सबसे मंहगे शहर नैनीताल में स्थापित करने का हो या प्रदेश के जमीनी पकड़ वाले नेता को मुख्यमंत्री बनाने के बजाय बलात जनता की पीड़ा से अनंजान नित्यानन्द स्वामी को थोपने का हो, इन सब मामलों से साफ हो गया था कि राज्य गठन के समय प्रदेश के भाग्य विधाता जो बने थे उनको प्रदेश के दूरगामी हितों व जनहितों की कहीं दूर तक भी न तो चिंता थी व नहीं कोई प्राथमिकता थी। वे केवल अपने संकीर्ण दलीय व निहित सम्बंधों को राज्य हितों पर थोपने वाले नादिरशाह से कम नहीं थे। यह ऐसा नहीं कि कोई बिना सोचे समझे हुआ हो अपितु यह जानबुझ कर किया गया। प्रदेश की जनता की मांग थी कि प्रदेश का सामाजिक व भौगोलिक परिस्थितियों व सामाजिक तानेबाने को देखते हुए केवल राज्य में हरिद्वार जनपद का कुभ क्षेत्र को ही सम्मलित किया जाय। आज पूरे हरिद्वार जनपद को सम्मलित करने के कारण विकास के लिए उपेक्षित उप्र के इस पहाड़ी क्षेत्र उत्तराखण्ड की संकल्पना व उदेश्य ही यहां के तिवारी व खण्डूडी जैसे नक्कारे नेतृत्व की अदूरदर्शी सोच के कारण जनसंख्या पर आधारित विधानसभाई परिसीमन से रौद कर रख दिया है। ऐसा ही प्रदेश की स्थाई राजधानी गैरसेंण के मामले को लेकर भी है। जो राज्य व आंदोलन का गठन व संचालन ही उप्र के विकास से उपेक्षित पर्वतीय क्षेत्र के त्वरित विकास व संस्कृति की रक्षा के लिए बनाया गया था वह अवधारणा तत्कालीन भाग्य विधाता बने अटल बिहारी वाजपेयी सरकार से उत्तराखण्ड मामलों के स्वयंभू ध्वजवाहक मुरली मनोहर जोशी, नारायण दत्त तिवारी व केसी पंत ने मिल कर सदा के लिए जमीदोज कर दिया। प्रदेश का गठन ही इस प्रकार से किया गया कि ताकि उत्तराखण्ड कभी अपने उस महान स्वप्न को साकार न कर पाये जिसके लिए उत्तराखण्ड के सपूतों ने अपना बलिदान दे कर व मुलायम व राव जैसे जनविरोधी सरकारों के अमानवीय अत्याचार सह कर भी ऐतिहासिक संघर्ष की धधक से सरकार को राज्य गठन के लिए मजबूर किया था। उस संघर्षो से गठित राज्य का  वर्तमान ही नहीं अपितु भविष्य दोनों को राज्य गठन के समय भाग्य विधाता बने इन बोनी सोच के संकीर्ण नेताओं ने उपरोक्त गलत निर्णय थोप कर सदा के लिए जमीदोज कर दिया।
न्यायमूर्ति घोष ने देहरादून बार एसोसिएशन द्वारा सोमवार 14 मई  को  आयोजित मुख्य न्यायाधीश के सम्मान समारोह में ज्वलंत मुद्दे पर अपने बेबाक बात रखते हुए कहा कि राज्य निर्माण से पहले देहरादून में बेहतर वकीलों की फौज थी। फिर जब उच्च न्यायालय की स्थापना हो रही थी तब यह निर्णय क्यो नहीं लिया गया कि उच्च न्यायालय देहरादून या हरिद्वार में बने। मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि वह जानते हैं कि वादकारी के लिए नैनीताल बहुत मंहगा शहर है । लेकिन अब ऐसी सूरत में इस समस्या का क्या समाधान हो सकता है? उन्होने सवाल किया अब देहरादून में यदि उच्च न्यायालय की बेंच स्थापित कर दी जाएगी तो उस स्थिति में नैनीताल उच्च न्यायालय का क्या महत्व रह जाएगा। मुख्य न्यायाधीश घोष ने कहा कि यदि मान भी लिया जाए कि राजधानी में उच्च न्यायालय की बेंच स्थापित कर दी जाती है और नौ में से छह न्यायाधीश यहां बैठा दिए जाते हैं तो फिर हाईकोर्ट में क्या काम रह जाएगा। बेंच स्थापना के बाद देहरादून, हरिद्वार के साथ ही गढ़वाल के सभी जनपदों का कामकाज फिर बेंच ही निस्तारित करने लगेगी तो फिर उच्च न्यायालय की जरूरत ही कहां रह जाएगी? न्यायमूर्ति घोष ने कहा कि राज्य निर्माण से पहले देहरादून में बेहतर वकीलों की फौज थी। फिर जब उच्च न्यायालय की स्थापना हो रही थी तब यह निर्णय क्यो नहीं लिया गया कि उच्च न्यायालय देहरादून या हरिद्वार में बने। मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि वह जानते हैं कि वादकारी के लिए नैनीताल बहुत मंहगा शहर है लेकिन अब ऐसी सूरत में इस समस्या का क्या समाधान हो सकता है? मुख्य न्यायमूर्ति द्वारा उच्च न्यायालय की बैंच की मांग को जिस बेबाक ढ़ग से औचित्यहीन बता दिया, उसके बाद भले ही यह आंदोलन बद न भी हो परन्तु इससे एक बात साफ हो गयी कि राज्य गठन के समय जो भी इस प्रदेश के भाग्य विधाता बने थे उन्होंने संकीर्ण निर्णय ले कर प्रदेश के हितों पर ऐसा कुठाराघात किया जो आज प्रदेश के लिए गले की फांस बन गये है। इन आत्मघाती निर्णयों से प्रदेश का वर्तमान नेतृत्व कैसे निजात पाता यह उसके राजनैतिक कौशल पर निर्भर करता। परन्तु दुर्भाग्य यह है कि प्रदेश में कभी तिवारी जैसे घोर उत्तराखण्ड विरोधी संकीर्ण नेतृत्व यहां पर सत्तासीन होते हैं तो कभी खंडूडी, निशंक व बहुगुणा जैसे नेता भाग्य विधाता बना कर इनके राजनैतिक आकाओं द्वारा थोपे जाते है। प्रदेश की जनता कुशासन से इतनी बदहाल है व बुद्धिजीवि अपने निहित स्वार्थों में इतने अंधे हो गये हैं कि उनको इस दिशा में सोचने की भी सुध तक नहीं है। जो चंद लोग इस दिशा में काम कर भी रहे हैं व असंगठित व उपेक्षित है। अब भी समय है कि प्रदेश की जनता यहां पर जिस प्रकार से भाजपा व कांग्रेस के दिल्ली आका अपने स्वार्थो की पूर्ति के लिए यहां की लोकशाही को रोंदते हुए अपने प्यादों को यहां पर मुख्यमंत्री बना कर थोप रही है,उससे सजग होने कीं। इसके साथ इनके प्यादों की तिकडम से उत्तराखण्ड बचाते हुए प्रदेश की दिशा व दशा को सही पटरी पर स्थापित करने की।
उत्तराखण्डी स्वाभिमान, विकास व लोकशाही का प्रतीक है गैरसेंण
राजधानी गैरसेंण बनाने के मार्ग में अवरोधक न बने भ्रष्ट नेता व नौकरशाह

प्रदेश के मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा ने घोषणा की है कि 2 अक्टूबर उत्तराखण्ड के शहीदी दिवस के अवसर पर प्रदेश सरकार के मंत्रीमण्डल की बैठक गैरसैंण में आयोजित की जायेगी। गैरसैंण में वर्तमान सरकार विधानसभा का एक विशेष सत्र भी आयोजित करने का मन बना रही है। प्रदेश की स्थाई राजधानी कभी गैरसैंण बन पायेगी ? यही यज्ञ प्रश्न उत्तराखण्ड की आम जनता के मानसपटल पर रह रह कर गूंज रहा है। राजधानी गैरसंेण बनेगी या देहरादून ही रहेगी? इस बारे में प्रदेश की राजसत्ता में काबिज रहे हुक्मरान हमेशा मूक रहे। जिससे प्रदेश में उहापोह की स्थिति बनी रही। इससे प्रदेश की दिशा व दशा दोनों प्रभावित रहे। हालांकि राज्य आंदोलनकारी व शहीद ही नहीं आम जनता भी स्थाई राजधानी गैरसेंण बनाने पर राज्य गठन से पहले ही एकमत हैे। परन्तु जनहितों को दाव पर लगा कर अपनी नादिरशाही चलाने वाले सत्तालोलुपु हुक्मरान व भ्रष्ट नौकरशाही ने लोकशाही में जिस शर्मनाक ढ़ग से दीक्षित आयोग के षडयंत्र रच कर जनभावनाओं को जिस निर्ममता से रौंदा वह लोकतंत्र  के लिए किसी कलंक से कम नहीं है। आखिर एक ही बात रह रह कर लोकतंत्र में विश्वास रखने वालों के मन में क्रोंध रहा है कि आखिर यह राज्य जनता के हित व विकास के लिए बना कि इन सत्तालोलुपु नेताओं व नौकरशाहों की ऐसगाह बनाने के लिए। जनहितों को रौंदने वालों को एक पल के लिए भी लोकतंत्र में जगह नहीं होनी चाहिए। गैरसेंण आज हुक्मरानों व नौकरशाहों द्वारा ठगे गये उत्तराखण्डी जनमानस के लिए केवल एक स्थान नहीं रह गया है अपितु गैरसेंण उत्तराखण्ड की जनता के लिए स्वाभिमान, विकास व लोकशाही के जीवंत प्रतीक बन गया है। अगर प्रदेश में कोई ऐसा हुक्मरान या सरकार आती जिसको लोकशाही व जनभावनाओं का जरा सा भी भान होता तो वह सरकार प्रदेश की जनभावनाओं का सम्मान करते हुए गैरसेंण राजधानी बनाने के बजाय देहरादून थोपने का षडयंत्र रचने वाले ‘दीक्षित आयोग’ को बनाने वाले व विस्तार पर विस्तार देने वालों को लोकशाही का अपराधी मान कर उनको दण्डित करने का काम करते हुए अविलम्ब गैरसेंण राजधानी बनाने का ऐलान करता।
उत्तराखण्ड राज्य गठन व इसकी राजधानी गैरसेंण बनाने की मांग को ले कर मेरे जैसे हजारों उत्तराखण्डियों ने अपना सर्वस्व इस आंदोलन में समर्पित कर दिया था। भगवान श्रीकृष्ण की आपार कृपा, उत्तराखण्डियों के ऐतिहासिक संघर्ष, बलिदान तथा भाजपा नेतृत्व वाली राजग के प्रधानमंत्री अटल- आडवाणी की  सरकार व सोनिया गांधी के नेतृत्व वाली कांग्रेस के रचनात्मक सहयोग से उत्तराखण्ड राज्य तो बन गया परन्तु प्रदेश की राजधानी गैरसेण बनने के लिए आज राज्य गठन के मेरे जैसे असंख्य आंदोलनकारी राज्य गठन के 12 साल बाद भी निरंतर संघर्ष कर रहे है। प्रदेश की स्थाई राजधानी गैरसेंण बन जाती अगर उत्तराखण्ड में स्वामी, तिवारी, खण्डूडी, निशंक जैसे जनविरोधी नेतृत्व प्रदेश की सत्ता में आसीन रहे। प्रदेश की सत्तासीन सरकारें इस मामले में कितने संवेदनहीन रहे इसका जीता जागता उदाहरण बाबा मोहन उत्तराखण्डी जेसे महान उत्तराखण्डी सपूत को राजधानी गैरसैंण की मांग को लेकर चलाया गया एक महिने तक का आमरण अनशन भी तत्कालीन उत्तराखण्ड राज्य गठन के विरोधी रहे मुख्यमंत्री नारायणदत्त तिवारी की दम तोड़ चूकी आत्मा को नहीं जागृत कर पायी। तिवारी की इस अमानवीय हटधर्मिता के कारण बाबा मोहन उत्तराखण्डी ने गैरसैंण की मांग के लिए अपनी शहादत दे दी। बाबा मोहन उत्तराखण्डी ने अपनी इस शहादत के लिए प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री तिवारी को ही जिम्मेदार ठहराया। इस शहादत के बाबजूद न तो तिवारी की दमतोड़ चूकी आत्मा ही जागृत हो पायी व नहीं उत्तराखण्ड दिवस पर उत्तराखण्डी शहीदों के नाम पर घडियाली आंसू बहाने वाले उसके बाद सत्तासीन हुए खण्डूडी व निशंक को शहीदों की इस भावना का आदर करने की जरा सी भी नैतिकता रही।  आज उत्तराखण्ड राज्य आंदोलनकारी संगठन व म्यर उत्तराखण्ड जैसे सामाजिक संगठन ही जब भी उत्तराखण्ड की राजधानी गैरसेंण बनाने की मांग प्रदेश के हुक्मरानों से करते हैं तो ये हुक्मरान अपने दायित्व का निर्वाह करने की जगह आंदोलनकारियों का उपहास उडाने व उनको फटकार लगाने का निदनीय दुशाहस तक कर देते है। ऐसी स्थिति में तथाकथित सामाजिक संगठन जो आयोजक बने होते है, भडुओं की तरह नेताओं को गौरवान्वित करते है। प्रदेश की राजधानी गैरसैंण बने यह लोकशाही के सम्मान का प्रतीक बन गया है। जिस प्रकार जनभावनाओं को थोप कर जनविरोधी भ्रष्ट नेता व नौकरशाही अपने निहित स्वार्थो के लिए बलात राजधानी देहरादून मे ंही थोपने का प्रयास कर रहे है, उससे प्रदेश में निश्चित रूप से लोकशाही बेहद कमजोर हो गयी है।  प्रदेश में दूरस्थ व पर्वतीय क्षेत्रों में जहां के लोग उप्र में भी रह कर विकास की गंगा के दर्शन के लिए तरसते रहे, ऐसे क्षेत्रों में प्रदेश के हुक्मरानों व नौकरशाहों ने देहरादून में बैठ कर इन क्षेत्रों में विकास के द्वार खोलने का कोई ईमानदार भरी पहल तक नहीं की। इससे प्रदेश के लोग राज्य गठन के बाबजूद भी खुद को ठगा महसूस कर रहे है। लोगों में ये धारणा घर बना गयी कि देहरादून में काबिज नेता व नोकरशाह उनके विकास की गंगा को खुद हडप रहे है। इसीलिए वे गैरसेंण राजधानी बनाने की पुरजोर मांग कर रहे है। सबसे शर्मनाक स्थिति यह है कि प्रदेश के भाग्य विधाता बने राजनेता व जनता की सेव के लिए दो टके के लिए नौकरी करने वाले नोकरशाह जनभावनाओं का आदर करने के बजाय प्रदेश के मान सम्मान, विकास व लोकशाही के प्रतीक राजधानी गैरसैंण के संकल्प को साकार करने के बजाय उसके मार्ग पर अवरोधक खडे करने में उत्तराखण्डद्रोहियों की तरह लगे रहते है। केवल इस समय प्रदेश की स्थाई राजधानी गैरसेंण बनाने की मांग सांसद प्रदीप टम्टा ही कर रहे है। वहीं प्रदेश की ग्रीष्मकालीन राजधानी के लिए सांसद सतपाल महाराज अपनी पहल बनाये हुए है, उन्हीं की पहल पर इस बार प्रदेश के मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा ने जनता का दिल जीतने के लिए गैरसेंण में विधानसभा का एक सत्र करने का ऐलान किया। इस पहल का स्वागत किया जाना चाहिए परन्तु प्रदेश की स्थाई राजधानी गैरसैंण के अलावा कहीं और थोपना लोकशाही का ही नहीं उत्तराखण्डी शहीदों की शहादत को रोंदने वाला कृत्य होगा। आशा है उत्तराखण्ड के इन पदलोलुपु नेताओं को कुछ शर्म आयेगी। अपनी कुर्सी के लिए पूरे देश में हाय तोबा मचाने वाले ये राजनेता कभी उत्तराखण्ड के हक हकूकों के लिए एक पल भी ईमानदारी से काम करते तो आज उत्तराखण्ड देश का सबसे भ्रष्टतम राज्य नहीं बनता। शेष श्रीकृष्ण कृपा। हरि ओम तत्सत्। श्रीकृष्णाय् नमो।

Sunday, May 13, 2012


अब किस पर विश्वास करे भारत

तुम राम कृष्ण की बात करके देश का जागरण करते थे
भारत माॅं की दुहाई दे कर देश की रक्षा की बात करते थे 
पर देश दंग रह गया देख तुम्है भी छदमी टोपी पहने हुए
धर्मान्तरण की चाबी आरक्षण को खुले हाथों से सौंपते हुए 
अब करे विश्वास किस पर भारत, इन कालनेमियों को देख
कोई कलंक विध्वंश पर आंसू बहाये कोई जिन्ना को पूजे
हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान गाने वाले भी इंडिया राईजिंग गाये
कोई गांधी के नाम से लूटेे कोई राम कृष्ण को नकली कहे
कोई जनसेवक बन गो गंगा व भारत को मिटाने का काम करे।
-देवसिंह रावत
(13 मई 2011 रात के 11.52 मिनट पर )

Saturday, May 12, 2012


अवतार को महाधिवक्ता नहीं अपर महाधिवक्ता  बना कर मुख्यमंत्री ने उडाया उत्तराखण्ड व न्याय व्यवस्था का मजाक 

विजय बहुगुणा सरकार ने वरिष्ठ अधिवक्ता अवतार सिंह रावत को अपर महाधिवक्ता के पद पर आसीन 


देहरादून (प्याउ)। प्रदेश सरकार ने अपर महाधिवक्ता के पद पर अवतार सिंह रावत की नियुक्त करने की खबर को जिस प्रमुखता से विजय बहुगुणा सरकार ने प्रदेश के समाचार जगत में प्रकाशित कि वह अपने आप में प्रदेश सरकार के मुख्यमंत्री द्वारा महाधिवक्ता के पद पर उनके द्वारा की गयी विवादस्थ नियुक्ति की चारों तरफ हो रही आलोचना पर पर्दा डालने के लिए उठाया गया एक कदम माना जा रहा है। गौरतलब है पूर्ववर्ती प्रदेश भाजपा सरकार के स्टर्जिया जैसे भ्रष्टाचार को उच्च न्यायालय से लेकर सर्वोच्च न्यायालय में बेनकाब करने वाले अवतार सिंह रावत न केवल सर्वोच्च न्यायालय के वरिष्ठ जुझारू अधिवक्ता हैं अपितु उत्तराखण्ड राज्य गठन के प्रमुख संगठन ‘उत्तराखण्ड जनता संघर्ष मोर्चा के संयोजक भी है। उत्तराखण्ड जनता संघर्ष मोर्चा के अध्यक्ष देवसिंह रावत ने बहुगुणा सरकार द्वारा संवैधानिक पदों पर विवादस्थ लोगों को आसीन करके उत्तराखण्ड व न्याय के साथ अपने निहित स्वार्थ के लिए खिलवाड करने का आरोप लगाया। छह साल तक ऐतिहासिक धरना प्रदर्शन व आंदोलन करने वाले उत्तराखण्ड जनता संघर्ष मोर्चा के अध्यक्ष देवसिंह रावत ने कहा कि अगर कांग्रेस के दिल्ली में मठाधीश बने नेताओ ंव वर्तमान मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा में जरा सी भी नैतिकता होती या उत्तराखण्ण्ड के हितों के प्रति जरा सी भी लगाव होता तो तो वे कभी किसी विवादस्थ आदमी को संवैधानिक महत्वपूर्ण पदों पर आसीन करने की धृष्ठता नहीं करते। श्री रावत ने अफसोस जताया कि जो मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा को अपर महाधिवक्ता बनाते समय अवतार सिंह रावत की प्रतिभा के कसीदे पढ़ रहे थे, वह कसीदे उनको प्रदेश का महाधिवक्ता बनाते समय क्यों याद नहीं रहे। मोर्चा के अध्यक्ष देवसिंह रावत ने मुख्यमंत्री को याद दिलाया कि जब वे अपने घरों में मोज ले रहे थे तब उत्तराखण्ड के मान सम्मान व पृथ्क राज्य गठन के लिए  सर्वोच्च न्यायालय के प्रतिष्ठित अधिवक्ता होते हुए भी सडकों में पुलिस प्रशासन की लाठियां व जनता को संगठित कर आंदोलन को मजबूत करने में लगे हुए थे । यही नहीं अवतार सिंह रावत  राज्य आंदोलन में 1994 में अकेले ही मुलायम सिंह की दिल्ली रेली में घुस कर अपनी जान कर परवाह न करते हुए मुलायम व उनके हजारों समर्थकों के सम्मुख उनका सार्वजनिक विरोध किया। यही नहीं राज्य गठन आंदोलन में उत्तराखण्ड राज्य गठन में उत्तराखण्ड छात्र संयुक्त संघर्ष समिति, उत्तराखण्ड महिला संयुक्त संघर्ष समिति, उत्तराखण्ड महिला मंच, उत्तराखण्ड अर्ध व पूर्व सैनिक संगठन   सहित दर्जनों संगठनों को एकसुत्र में पिरोकर राज्य गठन आंदोलन को धारधार बनाया। उन्ही की सरपरस्ती में उत्तराखण्ड जनता संघर्ष मोर्चा ने 1994 से लेकर राज्य गठन के ऐलान तक 16 अगस्त 2000 तक संसद की चैखट जंतर मंतर पर निरंतर 6 साल का ऐतिहासिक सफल घरना प्रदर्शन जनांदोलन चला कर भाजपा, कांग्रेस, सपा, बसपा सहित तमाम उत्तराखण्ड राज्य गठन का विरोध व इस मांग की आड में अपनी राजनैतिक रोटियां सेकने वालों का मुंहतोड़ जवाब ही नहीं दिया अपितु उत्तराखण्ड विरोधी राजनेताओं को खदेड़ने का भी काम किया।
 हालांकि  इससे पूर्व वर्ष 2002 से 2007 में भी अवतार सिंह रावत तिवारी के नेतृत्व में आसीन कांग्रेसी राज्य सरकार के अपर महाधिवक्ता रह चुके हैं। मुख्य सचिव की अध्यक्षता में गठित संवीक्षा समिति की संस्तुति के आधार पर ही अवतार सिंह रावत का चयन किया गया है। इस समिति में प्रमुख सचिव न्याय, प्रमुख सचिव गृह, अपर सचिव न्याय एवं संयुक्त सचिव न्याय सदस्य हैं। आश्चर्य की बात तो यह है अवतार रावत की जिन प्रतिभाओं के कसीदे मुख्यमंत्री व उनका प्रशासन अब पढ़ रहा है वह कसीदे वे महाधिवक्ता के पद पर आसीन करते समय वे क्यों भूल गये। अब कहा जा रहा है कि उच्च न्यायालय, नैनीताल में राज्य सरकार का पक्ष प्रभावी ढंग से रखने के लिए मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा ने अपर महाधिवक्ता के पद पर वरिष्ठ अधिवक्ता अवतार सिंह रावत की नियुक्ति करने की बात कह रहे है। मुख्यमंत्री के अनुसार श्री रावत अनुभवी अधिवक्ता हैं और उनके अनुभवों का लाभ राज्य सरकार को मिलेगा। परन्तु मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा जो स्टर्जिया प्रकरण पर अवतार सिंह रावत की प्रतिभा की मुक्त कण्ठों से चंद महिने पहले विधानसभा चुनाव से पहले दिल्ली में प्रशंसा कर रहे थे उनको महाधिवक्ता बनाते समय क्यों विस्मरण हो गया। ऐसी ही प्रशंसा कांग्रेस के दिल्ली दरवार के बडे नेता व प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री भुवनचंद खंडूडी, भगतसिंह कोश्यारी सहित प्रदेश के अधिकांश न्यायविद कर चूके है। प्रदेश के तमाम आंदोलनकारी, सामाजिक संगठनों ने मुख्यमंत्री द्वारा महाधिवक्ता के पद पर नियुक्ति की बड़ी भत्र्सना की थी। खुद कांग्रेस के केन्द्रीय प्रभारी चैधरी बीरेन्द्रसिंह, वरिष्ठ नेता सतपाल महाराज, केन्द्रीय मंत्री हरीश रावत, प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष यशपाल आर्य, तत्कालीन नेता प्रतिपक्ष डा हरकसिंह रावत आदि ने विजय बहुगुणा से प्रदेश के महाधिवक्ता पर पर उच्च न्यायालय व सर्वोच्च न्यायालय में अपने कौशल का परचम फेहरा चूके  अवतार सिंह रावत महाधिवक्ता बनाने की सलाह दी थी। परन्तु मुख्यमंत्री ने न जाने किन निहित स्वार्थो की पूर्ति के लिए इस पद पर ऐसे व्यक्ति को आसीन किया जिसके विरोध में प्रदेश के आंदोलनकारियों ने इसका पुरजोर विरोध किया। वहीं कांग्रेसी दिग्गज भी इस प्रकरण से हैरान थे।  शायद इसी गलती पर पर्दा डालने के लिए मुख्यमंत्री ने अवतार सिंह रावत को अपर महाधिवक्ता के पद पर आसीन करने का निर्णय लिया। अब गैंद अवतार सिंह रावत के पाले में है कि वे इस प्रस्ताव को स्वीकार करते है। सुत्रों के अधिवक्ता अवतार सिंह रावत, पहले ही सरकार की इस पहल पर अपना नाखुशी जाहिर कर चूके थे। अब उनका कहना है कि पूर्ण अधिकार व सम्मान के बिना वे किसी पद को स्वीकार नहीं करेंगे। अभी उनको सरकार का प्रस्ताव नहीं मिला। उस प्रस्ताव का अध्ययन करने के बाद वे इस पर कोई टिप्पणी करेंगे। उनका कहना है कि कोई पद या सम्मान उत्तराखण्ड से बढ़ कर नहीं है। अगर उचित अधिकार होंगे तो उत्तराखण्ड के हितों की रक्षा के लिए वे सम्मान के साथ भ्रष्टाचार को बेनकाब करने के लिए यह दायित्व स्वीकार भी कर सकता हॅू। परन्तु केवल लेबन चिपकाने व किसी के हाथों की कठपुतली बनने के लिए वे किसी पद व कार्य को स्वीकार नहीं करेंगे।