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Sunday, September 30, 2012


हरक सिंह रावत का  विकल्प मानकर  कांग्रेस में कण्डारी को लाये क्या बहुगुणा?

डा हरक सिंह रावत के मजबूत प्रभाव से विरोधी थाम रहे हैं भाजपा का दामन

रूद्रप्रयाग जनपद में एक ही महीने में पूरा राजनैतिक नक्शा ही बदल गया है। यहां पर दो दशक से लम्बे समय तक भाजपा का झण्डा उठाने वाले पूर्व कबीना मंत्री रहे मातवर सिंह कण्डारी आजकल कांग्रेसी बन कर सोनिया व बहुगुणा की जय जय कार करते नजर आ रहे हैं। वहीं एक दशक तक पूरे कांग्रेस संगठन को चलाने वाले, कांग्रेस के वरिष्ठ दिग्गज नेता आर के धवन, चैधरी बीरेन्द्रसिंह व हरीश रावत के कभी करीबी रहे दिग्गज कांग्रेसी नेता बीरेन्द्र बिष्ट इन दिनों भाजपाई हो कर कांग्रेस की जड़ो में मट्ठा डाल रहे है। यह राजनैतिक रंग बदलने का तूफान लगता है यहीं पर थम नहीं रहा है। अभी यहां के आम लोगों व भाजपा के दिग्गज भी इसी बात से परेशान है कि भाजपा में दो दशक से अधिक समय तक रहे कद्दावर नेता मातवर सिंह कण्डारी यकायक बिना किसी बडे प्रकरण के कांग्रेस में क्यों सम्मलित हो गये। उनका भाजपा में सम्मलित क्या टिहरी उपचुनाव में कांग्रेसी प्रत्याशी साकेत की चुनावी नैया को पार लगाने के लिए बडी पतवार समझ कर किया गया या प्रदेश में आसीन बहुगुणा सरकार को कांग्रेस के अंदर से मिलने वाली संभावित चुनौती की धार को पहले से कुंद करने रूप में लिया गया। यह जगजाहिर है कि बहुगुणा के मुख्यमंत्री बनने पर हरीश रावत से भी अधिक मुखर हो कर किसी ने विरोध किया तो वह मुख्यमंत्री के प्रबल दावेदार डा हरक सिंह रावत ने । भले ही तत्कालीन राजनैतिक मजबूरियों या कांग्रेसी आला नेतृत्व के कडे रूख के कारण यह विद्रोह भले ही थम गया हो परन्तु भविष्य में इसी प्रकार की आशंका से बहुगुणा व उनके सिपाहेसलार हर समय आशंकित है। इसी आशंका को निर्मूल बनाने के लिए रूद्रप्रयाग से डा हरकसिंह को प्रबल टक्कर दे सकने वाले भाजपा क्षत्रप को कांग्रेस में सम्मलित किया गया। यह धारणा कहां तक सही है यह तो स्वयं बहुगुणा, मातवर सिंह कण्डारी या डा हरक सिंह जानते होंगे परन्तु राजनीति में हर कदम से भावी राजनीति की तस्वीर समझने वाले इसको सामान्य घटना या मात्र साकेत की नौका को चुनावी भंवर से पार लगाने वाली घटना मानने के लिए तैयार नहीं।
इन दिनों वहां खुली चर्चा है कि रूद्रप्रयाग में कांग्रेसी क्षत्रप सतपाल महाराज के हनुमान समझे जाने वाले मजबूत कांग्रेसी नेता भरत चैधरी का भी अब कांग्रेस से मोह भंग हो गया है। उनकी भी भाजपा में सम्मलित होने की खुली चर्चायें हैं। इन दोनों कांग्रेसी नेताओं ने हालांकि विधानसभा चुनावों में कांग्रेस में विधानसभा का टिकट न मिलने पर विद्रोही प्रत्याशी के रूप में चुनाव लडा था। अब भरत चैधरी के भी भाजपा में सम्मलित होने पर बीरेन्द्र सिंह बिष्ट भी खुद को सहज महसूस नहीं कर पा रहे होंगे क्योंकि रूद्रप्रयाग से मिले मतों की दृष्टि से बीरेन्द्र सिंह बिष्ट पर भरत चैधरी भारी पड़ सकते हैं क्योंकि निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में ं भरत सिंह चैधरी को 7988 मत व वीरेंद्र सिंह बिष्ट ने 3754 मत हासिल हुए थे। हालांकि रूद्रप्रयाग की विधानसभा सीट इस समय कांग्रेस के पास हैं, परन्तु कांग्रेस के दिग्गज प्रांतीय नेता डा हरक सिंह रावत के यहां से विधायक होने से इस सीट पर कांग्रेसी टिकट की आश लगाने वाले अन्य कांग्रेसी नेताओं को इस बात का विश्वास हो गया कि  अब अगले विधानसभा चुनाव में इस सीट से उनको टिकट मिलना नामुंकिन है। इन्हें आशंका है कि इस सीट से उसी को टिकट मिलेगी जिसको डा हरक सिंह रावत चाहेंगे। नेताओं को इस बात का भी विश्वास है कि भले ही डा हरकसिंह रावत रूद्रप्रयाग से लेन्सीडान की तरह ही फिर चुनाव न लड कर डोईवाला या किसी अन्य सीट से चुनावी दंगल में उतर सकते है। परन्तु इस सीट पर लैन्सीडान सीट की तरह टिकट वितरण में उनकी ही चलेगी। भले ही सतपाल महाराज के संसदीय क्षेत्र में आने वाली यह विधानसभा सीट हो परन्तु लैन्सीडान की तरह यह यहां पर सतपाल महाराज के बजाय डा हरक सिंह रावत के निर्णायक रहने की आशंका है। गौरतलब है कि जिस प्रकार से रूद्रप्रयाग विधानसभा सीट से डा हरक सिंह रावत के करीबी कांग्रेसी नेत्री लक्ष्मी राणा को भी इस सीट का सबसे मजबूत प्रत्याशी माना जा रहा था । अगर उस सीट से डा हरक सिंह रावत को कहीं अन्य सीट से प्रत्याशी बनाया जाता तो इस सीट से लक्ष्मी राणा को टिकट मिलना तय माना जा रहा था। ऐसी स्थिति में कांग्रेसी प्रत्याशियों को कांग्रेसी टिकट वितरण प्रणाली व अपने आकाओं की कमजोर स्थिति को देख कर उन्होंने भाजपा में सम्मलित होना ही श्रेयकर समझा। परन्तु भाजपा से कांग्रेस में सम्मलित हुए पूर्व कबिना मंत्री मातवरसिंह कण्डारी के कांग्रेस में सम्मलित होने से स्थिति और जटिल हो गयी है। अब यहां से टिकट की दावेदारी में मातवरसिंह कण्डारी व डा हरकसिंह रावत के बीच में होगी। हालांकि डा हरक सिंह यहां से भले ही चुनाव न लडें फिर भी मातवरसिंह कण्डारी उनके रिश्ते में बडा साढू भाई होने के बाबजूद दोनों में टकराव होना निश्चित माना जा रहा है। क्योंकि डा हरक सिंह रावत पर अपने करीबी समर्थक को टिकट दिलाने का भारी दवाब होगा। देखना है अगले चुनाव तक कांग्रेस की राजनीति में ऊंट किस करवट बदलता है। वहीं प्रदेश की राजनीति के जानकार मातवरसिंह कण्डारी को  कांग्रेस में लाने की घटना को सरकार के खिलाफ भविष्य में होने वाले किसी विद्रोह का पहले से जवाब देने का बहुगुणा सरकार के प्रबंधकों का दाव भी मान रहे है। यह अप्रत्यक्ष रूप से हरकसिंह रावत पर दवाब बनाने की रणनीति का हिस्सा भी हो सकता है।




जर्मन की तरह एक अखण्ड भारत बनेगा भारत, पाक व बंगलादेश ?

भगत सिंह चैक के नाम से जाना जायेगा अब लाहौर चैराहा

अखण्ड भारत की आजादी के महानायक शहीदे आजम भगतसिंह के सम्मान में अखण्ड भारत के ही एक हिस्से रहे पाकिस्तान ने अपने प्रसिद्ध लाहौर चैक का नाम भगतसिंह चैक रखने का निर्णय लिया। गौरतलब है कि 1947 से पहले अखण्ड भारत देश के आजादी के बाद तीन देश बने। ये 1947 में भले ही भारत, पाकिस्तान के नाम से जाने गये। अखण्ड भारत का विभाजन जहां अंग्रेजी हुकुमत ने दूसरे विश्व युद्ध के नायक रहे मित्र देशों के प्रमुख अमेरिका की विश्व में अपना परचम फेहराने की रणनीति का एक खतरनाक हिस्सा था। अखण्ड भारत के विभाजन के लिए अंग्रेजों ने यहां के धर्मांध जिन्ना जैसे लोगों को अपना मोहरा बना कर धर्म के आधार पर मुसलमानों के लिए 14 अगस्त 1947 पाकिस्तान बनाया। वहीं गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस ने हिन्दु बाहुल्य शेष भारत को धर्मनिरपेक्ष भारत के रूप में 15 अगस्त 1947 को स्वतंत्रता हासिल की। इस धर्म के आधार पर हुए विभाजन के कारण अखण्ड भारत के 10 लाख से अधिक निर्दोष भारतीयों का निर्ममता से कत्ल किया गया। अंग्रेजों व कट्टरपंथी धर्मांध नेतृत्व द्वारा मुसलिमों को अलग देश पाकिस्तान गठन करने की मूल धारणा उस समय तार तार हो गयी जब आजादी के ढाई दशक बाद ही पाकिस्तान से बंगलादेश अलग हो कर तीसरे देश के रूप भारत की सहायता से अस्तित्व में आया।
आजादी के बाद अखण्ड भारत के इन तीन देशों का दुर्भाग्य यह है कि अभी तीनों देशों में फिरंगी अंग्रेजी भाषा की गुलामी बद से बदतर जारी है। तीनों देशों में न तो अपनी आजादी का असली इतिहास ही समान रूप से है व नहीं सांझी संस्कृति होने के बाद इन तीनों देशों का अपना कोई स्वाभिमान ही है। ये तीनों देश अंग्रेजी सम्राज्य के प्रतीक काॅमनवेल्थ संगठन के सदस्य बने है। यही नहीं इन तीनों देश पर आज अमेरिका का शिकंजा बुरी तरह से जकड़ा हुआ है।
यही नहीं ये तीनों देश एक दूसरे को अपना सबसे बडा दूश्मन मान कर आपस में एक सांझी विरासत होने के बाबजूद एक दूसरे के खिलाफ जहर उगलते रहते हैं और यही नहीं एक दूसरे को कमजोर करने के लिए हर उपलब्ध अवसर को हाथ से नहीं गंवाते है। इसी कारण तीनों देश विश्व के बससे गरीब देशों में जाने जाते है। ऐसे माहौल में पाकिस्तान सरकार द्वारा जिस लाहौर की जेल में मार्च 1931 में शहीदे आजम भगत सिंह को फांसी दे दी गई उसी लाहौर का शदमान चैक को अब भगत सिंह चैक के नाम से जाना जाएगा। यह चैराहा वही स्थान है जहां भगतसिंह को फांसी दी गयी। जहां बाद में चैराहा बनाया गया। पाक सरकार के इस निर्णय का  स्थानीय निवासियों के साथ साथ अखण्ड भारत के तीनों देशों के प्रबुद्ध जनों ने शहीद भगतसिंह की जन्म दिवस के आस पास यह कार्य करने के लिए पाक प्रशासन को धन्यवाद दिया। आज भी तीनों देशों में कुछ ऐसे लोग भी हैं जो फिर से अखण्ड भारत के सपने को साकार करने के लिए खुद को समर्पित किये हुए हैं। काश एक दिन ऐसा आयेगा जब तीनों देशों की जनता फिरंगी सल्तनत के झांसे में आ कर तीन देश बना कर अखण्ड भारत को तबाह करने की भूल को सुधारने का काम करके फिर से अखण्ड भारत का निर्माण करेंगे। ऐसा अखण्ड भारत जहां धार्मिक कट्टरता को कोई स्थान न हो और सब मिल कर फिर से भारत को विश्व का सिरमौर बनाने में जुट जांय। आज भी पूरा विश्व इस बात से विज्ञ है कि जिस दिन भारत, पाक व बंगलादेश एक देश के रूप में पूरे विश्व में अपनी उपस्थिति दर्ज करायेगा उस दिन पूरे विश्व में जहां भारत अमन चैन की राह दिखाने वाली महाशक्ति बनेगा अपितु इसके साथ विश्व को अमेरिका व चीन के शिकंजे से भी मुक्त करने का सपना भी साकार कर पायेगा। इसके लिए जरूरत है तीनों देशों के बीच कट्टपंथियों व अवसरबादी संकीर्ण राजनेताओं से इस क्षेत्र पर लगे ग्रहण को दूर करने की।


भारत को लूटने वाले खुद लुट पीट कर जायेंगे सदा।।


क्यो परेशान हो साथी , क्या नेता रावण से कम दिखते तुम्हे
लंका नहीं, अब तो रावण  संसद ही नहीं हर घर में बसते है। 
ताडिका, सूर्पनखा व शिखण्डी ही अब भाग्य विधाता बने हैं।
जेबकतरे भी देखो आज यहां ईमानदार पहरेदार बने हुए हैं। 
पर सत्तांध इन दुर्योधनो, कंसों, रावणों को कोई तो बता दे
लंका ढहती है जरूर एक दिन, खुद रावण के ही पापों से 
बेनकाब होते हैं यहां पर जयचंद जेबकतरे कालनेमी सदा।
लूटेरे व लूटेरों के दलालों को नसीहत है यही मेरी साथी
महाकाल यहां देख रहा है हर पल पाप पाखण्ड तुम्हारे।
भारत को लूटने वाले खुद लुट पीट कर जायेंगे सदा।।
-देवसिंह रावत 

Saturday, September 29, 2012


स्व. शिवप्रसाद पुरोहित जैसे निष्काम कर्मयोगी ही होते है धर्म व समाज के नींव के पत्थरः शंकराचार्य माधवाश्रम जी महाराज 

 29 सितम्बर को अग्रणी समाजसेवी शिव प्रसाद पुरोहित को सर्व समाज ने दी भावभीनी श्रद्धांजली 

नई दिल्ली(प्याउ)। ‘स्व. शिवप्रसाद पुरोहित जैसे निष्काम कर्मयोगी  धर्म व समाज के नींव के पत्थर होते हैं। जिस समाज में ऐसे समर्पित लोग होते हैं उनके रचनात्मक जनहितकारी निष्काम कार्यो से समाज हमेशा समृद्ध, खुशहाल व धर्मवान बनता है। उनके आकस्मिक निधन से भारतीय संस्कृति का एक सच्चा ध्वजवाहक हमारे बीच में नहीं रहा, भगवान उनकी दिव्य आत्मा को अपने श्रीचरणों में समर्पित रखे ।‘ यह भावपूर्ण श्रद्धांजलि रूपि आर्शीवाद ज्योतिष्पीठाधीश्वर शंकराचार्य माधवाश्रम जी महाराज ने अग्रणी समाजेसेवी व अपने अनन्य शिष्य शिव प्रसाद पुरोहित की श्रद्धांजलि समारोह में कही। इस श्रद्धांजलि सभा का आयोजन 29 सितम्बर को दोपहर पौने चार बजे दिल्ली के गढ़वाल भवन में अनैक अग्रणी सामाजिक संगठनों द्वारा दिवंगत शिवप्रसाद पुरोहित के करीबी मित्र कांग्रेसी नेता बृजमोहन उप्रेती,  भाजपा नेता डा विनोद बछेती व पत्रकार देवसिंह रावत के संयुक्त प्रयास से  किया । गौरतलब है कि 12 सितम्बर को दिवंगत हुए अग्रणी समाजसेवी व शंकराचार्य माधवाश्रम धर्मार्थ चिकित्सालय ट्रस्ट के महासचिव शिवप्रसाद पुरोहित के आकस्मिक निधन होने से उनके परिजन ही नहीं अपितु उनके मित्र, सहयोगी व शंकराचार्य माधवाश्रम जी महाराज के अनुयायी स्तब्ध व शोकाकुल है। इस श्रद्धांजलि सभा का संचालन करते हुए उत्तराखण्ड जनता संघर्ष मोर्चा के अध्यक्ष देवसिंह रावत ने दिवंगत पुरोहित को सहृदय व सदैव जनहित के रचनात्मक कार्यो में समर्पित रहने वाला कर्मयोगी, बताते हुए उनका संक्षिप्त जीवनवृत श्रद्धांजलि सभा में रखा। इस सभा के शुभारंभ में सभी समाजसेवियों ने अपनी भावभीनी श्रद्धांजलि देते हुए उनके चित्र पर पुष्प अर्पित किये।
सभा में अपनी श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए दिल्ली प्रदेश भाजपा के सचिव वीरेन्द्र जुयाल, उत्तराखण्ड महासभा के दिनेश ध्यानी, रूद्रप्रयाग जनविकास समिति के अध्यक्ष करण बुटोला, भाजपा नेता डा. विनोद बछेती, उत्तराखण्ड मानवाधिकार संगठन के अध्यक्ष एस के शर्मा, भाजपा नेता पूरण चन्द्र पंत, उत्तराखण्ड आर्य समाज के सतेन्द्र प्रयाशी, उत्तराखण्ड महासभा के रामेश्वर गोस्वामी, उत्तराखण्ड के अग्रणी संगीतकार राजेन्द्र सजवान, कवि व समाजसेवी पृथ्वीसिंह केदारखण्डी ने अपनी श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए दिवंगत पुरोहित जी को एक सहृदय कर्मयोगी व सच्चा इंसान बताया जो अपना जीवन समाजसेवा में समर्पित कर गये।
इस श्रद्धांजलि सभा मे उपस्थित होने वालों में सर्वोच्च न्यायालय के वरिष्ठ अधिवक्ता व उत्तराखण्ड सरकार के अतिरिक्त महाधिवक्ता अवतार सिंह रावत, समाजसेवी मोहन बिष्ट, उत्तराखण्ड जनता संघर्ष मोर्चा के महासचिव जगदीश भट्ट व उपाध्यक्ष पत्रकार सतेन्द्र रावत, उत्तराखण्ड महासभा के अनिल पंत, भाजपा नेता विजय सत्ती, संदीप बर्थवाल व जयेन्द्र भण्डारी, उत्तराखण्ड के पूर्व मुख्यमंत्री भगतसिंह कोश्यारी के निजी सचिव जगदीश भाकुनी, कांग्रेसी नेता नन्दन सिंह रावत, रूद्रप्रयाग जनविकास समिति के महासचिव द्वारिका प्रसाद भट्ट, गोकुल सिंह राणा, समाजसेवी मनोहर निराला,  समाजसेवी मोहन सिंह रावत, समाजसेवी धर्मपाल कुमंई, उत्तराखण्ड क्लब के अध्यक्ष देवेन्द्र खत्री, आनन्द मेहरा व रौतेला, पत्रकार इन्द्रचंद रजवार व डा बिहारी लाल जलंधरी, समाजसेवी परमवीर सिंह रावत, संगीतकार नरेन्द्र पांथरी, अखिल भारतीय उत्तराखण्ड महासभा के शिव प्रसाद मुण्डपी, कैलाश कुकरेती, कांग्रेसी नेता पृथ्वीपाल पर्नवाल, साहित्यकार ललित केशवान, भाष्कर नौटियाल, श्री जदली, साहिबाबाद से आये समाजसेवी दिगमोहन नेगी,राकंपा के छात्र महासचिव दीपक द्विवेदी, बिल्डर चंदन सिंह गुसांई, समाजसेवी पंचमसिंह रावत, मनीष सक्सेना, योगेन्द्र पाण्डे, राजेन्द्र प्रसाद किमोठी, नोएडा सेक्टर 56  से आये समाजसेवी श्री किमोठी सहित अनैक समाजसेवी उपस्थित थे। श्रद्धांजलि सभा में उपस्थित दिवंगत शिवप्रसाद पुरोहित की धर्मपत्नी श्रीमती पुष्पा पुरोहित व बेटा नीरज पुरोहित के अलावा उनके परिजन भी उपस्थित थे।
गौरतलब है कि 12 सितम्बर 2012 की रात को दिल्ली के साकेत स्थित के मैक्स अस्पताल में  आकस्मिक निधन हो गया था। उनका अंतिम संस्कार 13 सितम्बर को हरिद्वार में गंगा के पावन घाट पर किया गया। उनकी चिता को मुखाग्नि उनके इकलोते सुपुत्र नीरज पुरोहित ने दी। उनके शोकाकुल परिवार में उनकी धर्म पत्नी पुष्पा, उनका इकलोता बेटा नीरज व विवाहित बेटी पूनम किमोठी है। वे संसद भवन के समीप तपेदिक उन्मूलन संस्थान में कार्यरत थे व वहीं पर दशकों से सपरिवार निवास कर रहे थे। वे शंकराचार्य माधवाश्रम जी महाराज के अनन्य भक्त थें। उनकी समाजसेवी व समर्पित निष्टा को देख कर ही शंकराचार्य माधवाश्रम जी ने उनको भगवान बदरीनाथ केदारनाथ मार्ग पर रूद्रप्रयाग के समीप पावन कोटेश्वर में शंकराचार्य माधवाश्रम धर्मार्थ चिकित्सालय के भव्य निर्माण व संचालन का महासचिव का गुरूतर दायित्व का निर्वहन कई सालों से कर रहे थे। वे जनसेवा के मिशन में इस कदर समर्पित रहते थे कि उनको अपने परिवार, खाना पीना का भी भान नहीं रहता। आज उनकी इसी तपस्या से जहां कोटेश्वर में इस दुर्गम पर्वतीय क्षेत्र में श्री शंकराचार्य माधवाश्रम धर्मार्थ चिकित्सालय संचालित है। यहां पर सीमान्त व दुरस्थ क्षेत्र के चिकित्सा सुविधा के लिए तरस रहे लोगों  को चिकित्सा सुविधाओं का लाभ मिल रहा है। नहीं तो इस क्षेत्र की जनता को इलाज के लिए देहरादून व दिल्ली के दूरस्थ शहरों में मजबूरी में आना पड़ता है। आज स्व. शिवप्रसाद पुरोहित के समर्पित समाजसेवी तपस्या व  शंकराचार्य जी के आशीर्वाद से यहीं पर देश के अपोलो सहित कई बडे चिकित्सालयों के अनुभवी योग्य चिकित्सक यहां पर अपनी सेवायें दे रहे हैं और लोगों को एक्सरे, खून आदि सभी जांच यहीं पर मिलती है व महिला चिकित्सकों से युक्त इस चिकित्सालय में सस्ती दवाईयों के साथ अनैक प्रकार के रोगों का आप्रेशन भी हो रहे है। यहां पर अब तक हजारों लोग इस चिकित्सालय से लाभांन्वित हो चूके है। उनकी सहृदयता व समाजसेवा में निरंतर समर्पित रहने की प्रवृति के कारण  उन पर शंकराचार्य माधवाश्रम के साथ साथ भोले जी महाराज व माता मंगला का विशेष स्नेह रहा।
 उनकी इस निस्वार्थ समाजसेवी भावना से देश के दिग्गज नेता हेमवती नन्दन बहुगुणा उनसे अत्यधिक स्नेह रखते थे। उत्तराखण्ड के पूर्व मुख्यमंत्री भुवनचंद खण्डूडी उनके निस्वार्थ सेवा भाव से उनको अपना छोटा भाई से अधिक मानते थे। उनका उत्तराखण्ड के अधिकांश राजनेताओं से ही नहीं देश के अधिकांश राजनेताओं, उद्यमियों, अधिकारियों, समाजसेवियों व आम आदमियों से गहरा अपनत्व है। उत्तराखण्ड राज्य गठन आंदोलन के समर्पित सिपाई के तरह में सदैव समर्पित रहे। राज्य गठन आंदोलन में श्रीयंत्र काण्ड में शहीद हुई यशोधर बेंजवाल उनके साले थे। दिवंगत पुरोहित जी ने  तपेदिक से पीडि़त उत्तराखण्डियों को इस रोग से निजात दिलाने के लिए तपेदिक ऐसोशिएशन उत्तराखण्ड का गठन भी कुछ साल पहले किया। यही नहीं उनके प्रयास व मार्ग दर्शन से देहरादून में इसी ऐसोशियशन की महासचिव पूनम किमोठी ने 2011 में  राष्ट्रीय स्तर का एक विशाल सम्मेलन गत वर्ष देहरादून में आयोजित
किया था। जनसेवा में ताउम्र समर्पित समाजसेवी शिवप्रसाद पुरोहित के आकस्मिक निधन से न केवल उनके परिजन अपितु उनके मित्र व समाज बेहद शोकाकुल है।

Friday, September 28, 2012



स्वाभिमान व लोकशाही की रक्षा के लिए कांग्रेस को उप चुनाव में हरायें जनता 

उत्तराखण्ड की स्वाभिमानी जनता से विनम्र निवेदन है कि आगामी 10 अक्टूबर को टिहरी लोकसभा उपचुनाव में कुशासन के प्रतीक व देश को मंहगाई, भ्रष्टाचार व आतंकवाद से पतन के गर्त में धकेलने वाले कांग्रेस को करारा सबक सिखाने के लिए उसके प्रत्याशी को न केवल हरायें अपितु उसको मजबूत टक्कर देने वाले विरोधी प्रत्याशी को अपना मत दे कर कांग्रेस की हार सुनिश्चित करें। क्योंकि मजबूत टककर देने वाले प्रत्याशी की बजाय  इस उपचुनाव में अन्य को मतदेना एक प्रकार से कांग्रेसी प्रत्याशी को ही मजबूत करने वाला मत माना जायेगा। राजनीति में कई राजनैतिक दल कई प्रकार के हथकण्डे  अपना कर अपने विरोधियों को कमजोर करने के लिए ऐसे प्रत्याशियों को चुनाव मैदान में उतारते हैं जो मतों को विभाजन कराये। इसलिए इस उपचुनाव का अर्थ ही  एक है कि प्रदेश की जनता कांग्रेस के कुशासन का समर्थन कर रही है या नहीं। इसलिए इस लोकसभा के चुनाव के मुहाने पर खड़े देश को उत्तराखण्ड की जनता साफ बता दें कि वह कांग्रेस के वर्तमान कुशासन के खिलाफ है। जिस प्रदेश या प्रदेश की जनता सत्तासीनों के गलत कृत्यों का विरोध और अच्छे कार्यो का विरोध नहीं करती है वह प्रदेश, देश व समाज कभी विकास व शांति को नहीं प्राप्त कर सकता है। सत्तासीन कांग्रेस हो या भाजपा या अन्य दल जो भी सत्तासीन हो कर जनतंत्र को कमजोर करे उसे हराना भी लोकशाही की रक्षा करना है। यहां सवाल साकेत बहुगुणा का नहीं है, वे तो टिकट मिलने के बाद ही आम जनता से रूबरू हो पाये। उनका विरोध या समर्थन पर बहस नहीं। वे तो मोहरे हैं कांग्रेस पार्टी के, जिस पार्टी के दिल्ली के मठाधीशों ने अपनी पार्टी के अधिकांश विधायकों व जनांकांक्षाओं को दरकिनारे करके अपने निहित स्वार्थ के लिए जबरन विजय बहुगुणा को मुख्यमंत्री के रूप में थोपा। विजय बहुगुणा द्वारा संसदीय सीट से इस्तीफा देने के बाद कांग्रेस ने अपने वरिष्ठ नेताओं को दरकिनारे करके बहुगुणा के राजनीति में नौशिखिये बेटे साकेत को चुनावी दंग में उतार दिया। यह चुनाव प्रदेश की लोकशाही पर ग्रहण लगा रही कांग्रेस व उत्तराखण्ड समर्थकों के बीच में है। यह चुनाव उत्तराखण्ड के हक हकूकों को रौद रही बिजय बहुगुणा की सरकार के कृत्यों से उत्तराखण्ड बचाने के लिए जनता को अपना हक व स्वाभिमान बचाने का अवसर के रूप में है। साकेत के बारे में जनता क्या सोचे जो अभी कभी भी उत्तराखण्ड के दुखदर्द में इस प्रकार से सामने तक नहीं आया, आज जब सांसद बनने का मौका आया तो उन्हें उत्तराखण्ड याद आया। अब राजनीति में आये  हैं तो पांच सात साल बाद जनता उनके कार्यो के अनुसार उन पर विचार कर सकती है, अभी तो वे प्रतीक है कांग्रेस पाटी व विजय बहुगुणा के कुशासन के जो यहां की लोकशाही पर किसी ग्रहण से कम नहीं है।
यह विधानसभा या लोकसभा के  आम चुनाव नहीं अपितु एकाद सीट के रिक्त होने पर हो रहे उपचुनाव है। इसलिए इस सीट से केवल उसी प्रत्याशी को मत दें जो कांग्रेस को प्रबल टक्कर दे रहा हो। जनता को चाहिए कि जो भी सत्तासीन हो कर जनहितों को रौंदने का काम करे उसे लोकशाही का करारा सबक सिखाना ही लोकशाही की रक्षा करना प्रत्येक नागरिक का पहला दायित्व है।
यह ऐसी स्थिति है जब उत्तराखण्ड की लोकशाही को कांग्रेस का केन्द्रीय नेतृत्व अपने अधिकांश विधायकों की राय को दरकिनारे करके विजय बहुगुणा को मुख्यमंत्री बलात थोप कर रौंद रहा है। वहीं जनसेवा में लगे प्रदेश के वरिष्ट नेताओं को दरकिनारे करके फिर विजय बहुगुणा के राजनीति में नौशिखिया बेटे को टिहरी से सांसद का प्रत्याशी बना कर प्रदेश के स्वाभिमान व लोकशाही को रौद रही है। ऐसे में इस उपचुनाव भले ही देश की वर्तमान राजनैतिक परिदृश्य में कोई परिवर्तन नहीं होगा। परन्तु उत्तराखण्ड की स्वाभिमानी जनता को चाहिए कि वह इस उप चुनाव में अपने स्वाभिमान व प्रदेश की लोकशाही को सत्तामद व धनमद में चूर हुए कांग्रेस के मठाधीशों व उनके प्यादे बने उत्तराखण्ड के भाग्य विधाता बने हुक्मरानों को चुनाव में करारी हार दे कर सबक सिखाये। यहां पर एक बात का ध्यान रहे कि यह चुनाव न तो प्रदेश की विधानसभा व नहीं देश की लोकसभा में नयी सरकार के गठन के लिए है। देश लोकसभा चुनाव की देहरी में खडा है। यह चुनाव देश की राजनीति परिदृश्य में कोई परिवर्तन भले ही न कर पाये परन्तु यह चुनाव उत्तराखण्ड की जनता व यहा पर लोकशाही के जीवंत होने का एक ऐतिहासिक परिणाम है। जो इतिहास दशकों पहले गढ़वाल लोकसभा उप चुनाव में  सत्तांध कांग्रेस के नेतृत्व को करारी हार का तमाचा जड़ कर उत्तराखण्ड की जनता ने सिखाते  हुए खुद को उत्तराखण्डी सपूत मानने वाले हेमवती नन्दन बहुगुणा के राजनैतिक भविष्य की रक्षा करने का ऐतिहासिक कार्य किया था। उस सबक से सीख न ले कर फिर कांग्रेस ने उत्तराखण्डियों की गैरत को ललकारने की धृष्ठता की। आज उत्तराखण्ड की जनता को दिखाना है कि धनबल व सत्तामद में लोकशाही को रौदने वाले दुशासनों को चुनाव में पराजित करके यह दिखाना है कि उत्तराखण्ड में किसी लोकशाही को रौदने वालों की कोई जगह नहीं है। यह केवल उत्तराखण्ड की जनता से नहीं अपितु देश में बंगाल सहित समस्त देश में जहां भी इस प्रकार के उपचुनाव हो रहे हैं वहां की जनता को मनमोहन सिंह के कुशासन के खिलाफ जनाक्रोश का परिचय देने व देश की लोकशाही की रक्षा करने के लिए कांग्रेस को हरायें और जो भी दल कांग्रेस को सबसे बडी टक्कर दे रहा है उसके प्रत्याशी के पक्ष में मतदान करें। धनबल व सत्तामद में चूर कुशासकों को उत्तराखण्ड की जनता बहुत जागृत है। वह जनादेश का हरण धन, सत्ता, शराब व हवाई बातों से करने की हुंकार भरने वालों को करारा सबक सिखा रही है। उत्तराखण्डियों से निवेदन है जो भी प्रत्याशी धनबल या प्रलोभन दे रहे हैं ये संसाधन या धन उनका नहीं अपितु इसी प्रदेश का है, उस पर इनका नहीं उत्तराखण्डियों या समाज का हक है। ये इन प्रलोभनों से हमारे भविष्य का सौदा करने को तुले है इसलिए इनको इनकी भाषा में जवाब दे कर संसाधनों का सदप्रयोग करें और इन धनपशुओं को चुनाव में हरा कर करारा सबक सिखायें।

Sunday, September 23, 2012



अण्णा के बाद अरविन्द गौड़ ने दिखाया टीम केजरीवाल को जनांदोलनों का आईना

23 सितम्बर को जंतर मंतर पर प्रदर्शन कर रहे अरविन्द केजरीवाल व उनकी टीम को उस समय गहरा झटका तब लगा जब इस प्रदर्शन के दौरान जंतर मंतर पर देश के जनांदोलनों पर गहरी पकड़ रखने वाले पुरोधा  अरविन्द गौड़ ने दो टूक शब्दों में अण्णा की तरह ही किसी राजनैतिक दल में न जुडने से साफ तौर पर मना कर दिया। सुत्रों के अनुसार देश के अधिकांश जनांदोलनों में अपनी सक्रिय भागेदारी व अपने ज्वलंत नाटकों के प्रभावशाली मंचन से हजारों लोगों को जागृत कर आंदोलनों को मजबूती देने वाले अरविन्द गौड़ रामलीला मैदान में हुए अण्णा के ऐतिहासिक आंदोलन तक भ्रष्टाचार के खिलाफ इस आंदोलन कर रही टीम के प्रमुख नेतृत्वकारी सदस्य थे। परन्तु कुछ माह से वे टीम अण्णा में चल रही गतिविधियों को देख कर श्री गौड़ ने खुद को एक प्रकार से अलग कर लिया। देश के अग्रणी पत्रकार एसपी सिंह के सहयोगी पत्रकार रहे अरविन्द गौड़ यदाकदा कुछ समय के लिए आंदोलन के दौरान यहां पर आम आदमियों के साथ जंतर मंतर पर एक कोने से आंदोलन की दिशा व दशा देखने जरूर आते। 23 सितम्बर को भी जब वे अपने नाटय मंच के कई साथियों के साथ चाय की चुस्कियां ले रहे थे तो तभी इंडिया अगेंस्ट करप्शन के एक वरिष्ठ कार्यकत्र्ता ने उनको मंच पर चलने का आग्रह किया। जब अरविन्द ने विनम्रता से मना किया तो उस कार्यकत्र्ता ने चुपचाप अपने एक अन्य साथी को मंच पर अरविन्द गौड के उपस्थित होने की खबर भिजवा दी। अण्णा सहित अनैक साथियों द्वारा राजनैतिक विकल्प बनाने के अरविन्द व साथियों की घोषणा के बाद खुद को अरविन्द केजरीवाल से अलग होने की खुली घोषणा के बाद एक एक साथी को अपने साथ जोड़ने के लिए दिन रात एक कर रही अरविन्द केजरीवाल व उनके साथियों के लिए अरविन्द गौड जेसे संघर्षशील साथी को जोड़ कर अपनी टीम को और मजबूती देने की आश किसी बड़ी खुशी से कम नहीं थी। यह सुनते ही इंडिया अगेन्सट करप्शन में प्रमुख नेता व केजरीवाल के सबसे करीबी सहयोगी मनीष सिसोधिया मंच से उठ कर सामने सबसे पीछे खडे अरविन्द गौड़ के पास आ कर उनसे गले मिले और उनको मंच की तरफ ले गये। मंच से पहले ही जब अरविन्द गौड़ ने दो टूक शब्दों में कहा कि मैं आंदोलन में साथ हॅू परन्तु अब आप लोगों ने राजनैतिक पार्टी बना रहे हैं इसलिए मैं किसी राजनैतिक दल के साथ नहीं दे सकता हॅू। अरविन्द गौड़ से अण्णा की तरह दो टूक उतर सुन कर मनीष सिसोदिया भी अवाक रह गये। अरविन्द गौड़ ने अपनी आंदोलन के साथ प्रतिबद्धता की बात दोहराते हुए उनसे विदा ले कर फिर जंतर मंतर के एक कोने में चाय के दुकान के समीप आ कर अपने अन्य साथियों के साथ खडे हो गये। जब प्यारा उत्तराखण्ड ने उनसे इस भरत मिलाप के बारे में जानना चाहा तो उन्होने दो टूक शब्दों कहा कि उन्होंने बता दिया कि वे किसी राजनैतिक दल के साथ नहीं है। वे जनांदोलनों से जडे हैं व जुडे रहेंगे।


दिल्ली की शीला सरकार की शह पर दिल्ली मे बिजली की खुली लूटः केजरीवाल

केजरीवाल द्वारा एफडीआई के विरोध में एक शब्द न बोलने पर लोग भोंचंक्के

पैसे ही नहीं वोट भी पैड़ में नहीं उगते हैं प्रधानमंत्री जी

प्रधानमंत्री देश को गुमराह कर रहे हैं

बिजली बिलों में खुली लूट के विरोध में बिजली के बिल न जमा करें दिल्लीवासी

दिल्ली में बिजली कम्पनियों द्वारा सरकार की सह पर खुली लूट पर भाजपा भी मूक

कुछ माह बाद ही अण्णा फिर हमारे साथ होेगे

देश में भ्रष्टाचार के खिलाफ अण्णा हजारे की अगुवाई में कुछ माह पहले देशव्यापी आंदोलन कर रहे अरविन्द केजरीवाल ने राजनैतिक विकल्प देने के ऐलान के बाद  अण्णा हजारे द्वारा उनसे जुदा होने के बाद अपने पहले  प्रदर्शन में जंतर मंतर पर 23 सितम्बर को अपनी उपस्थिति दर्ज करायी। इंडिया अगेंस्ट करप्शन के बैनरतले आयोजित इस प्रदर्शन में दिल्ली में बिजली की  हो रही खुली लूट के लिए बिजली कंपनियों के साथ दिल्ली प्रदेश की मुख्यमंत्री को सीधे रूप से जिम्मेदार ठहराया। इसके साथ भाजपा को भी इस पर शर्मनाक मौन रखने के लिए कटघरे पर खडा किया। वहीं इस प्रदर्शन में अरविन्द व उनके किसी साथी द्वारा मंच पर देश में मनमोहन सिंह सरकार द्वारा किये जा रहे अमेरिकी की खुदरा व्यापार में कदम रखने वाली वालमार्ट जैसी कम्पनियों की राह खोलने के लिए ‘एफडीआई’ पर मूक रहने  से जहां अचंभित हुए , कई लोग अरविन्द एवं साथियों के एनजीओ को विदेशी सहायता व संरक्षण मिलने के कारण इस मुद्दे पर मूक रहने के कायश लगा रहे थे।
इस प्रदर्शन से साफ हो गया कि केजरीवाल के साथ कौन कौन हैं और अण्णा हजारे के साथ कौन है। इस प्रदर्शन में अरविन्द केजरीवाल, मनीष सिसोदिया, प्रशांत भूषण, गोपाल राय व कुमार विश्वास के अलावा संजय सिंह ने भी इस रेली में अपने उदघोष में जहां शीला की सह पर बिजली कंपनियों की दिल्ली में खुली लूट पर गर्जना की वहीं राजनैतिक विकल्प बनाने के अरविन्द केजरीवाल के संकल्प पर अपनी उपस्थिति से मुहर लगा दी। वहीं इस प्रदर्शन के समय जंतर मंतर पर उपस्थित अपने वरिष्ठ साथी व जनांदोलनों के पुरोधा अरविन्द गौड़ द्वारा उनके मंच पर उपस्थित होने यानी साथ देने के निवेदन को अण्णा हजारे की तरह राजनैतिक दल से दूर रहने की दो टूक शब्दों  में ठुकराने से निराश हुए।
वहीं अरविन्द केजरीवाल ने अण्णा को अपना आदर्श मानते हुए आशा प्रकट की कि कुछ ही माह बाद अन्ना हजारे उनके साथ होंगे। इस अवसर पर अरविन्द ने प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को देश को गुमराह करने का आरोप लगाते हुए दो टूक शब्दों में कहा कि पैसे ही नहीं वोट भी पेड़ पर नहीं लगते है।
इस प्रदर्शन मेंश्री केजरीवाल ने सीधे दो टूक सवाल किया कि दिल्ली में जब वितरण निजी कंपनियों को सौंपा गया तब बिजली विभाग की करीब 2000 करोड़ रूपये की सरकारी संपति टाटा और रिलायंस को मात्र 1 रूपया प्रति महीना किराये पर क्यों दी गई। उन्होंने बिजली वितरक कंपनियों पर धोखाधडी कर कंपनियों को हो रहे नुकसान की भरपायी के लिए बिजली दरों में 50-70 प्रतिशत तक बढाने की मांग कर दी थी।
जिस पर दिल्ली बिजली नियामक आयोग(डीईआरसी) के तत्कालीन अध्यक्ष  बरजिंदर सिंह ने, वितरण कंपनियों के अकाउन्ट्स की जांच कराई और उसमें कई धांधलियां पकड़ी। उन्होंने बिजली के दाम बढ़ाने की मांगों को खारिज करते हुए दिल्ली बिजली नियामक आयोग(डीईआरसी) के तत्कालीन अध्यक्ष  बरजिंदर सिंह ने, उल्टा इन कंपनियों को बिजली के दाम 23 प्रतिशत घटाने के आदेश तैयार किया । उन्होने  बिजली कंपनियों द्वारा पिछले 5 साल से बिजली के दाम गलत बढाये। दिल्ली बिजली नियामक आयोग(डीईआरसी) के तत्कालीन अध्यक्ष  बरजिंदर सिंह को उन पर गाज गिराते देख कर दोनों बिजली कंपनियां मुख्यमंत्री शीला दीक्षित से गुहार लगायी। जनहितों की रक्षा करने के अपने दायित्व को पूरा करने के बजाय दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित ने बिजली कंपनियों का पक्ष लेते हुए दिल्ली बिजली नियामक आयोग(डीईआरसी) के तत्कालीन अध्यक्ष  बरजिंदर सिंह को उक्त आदेश को पारित करने से रोक दिया। यह मामला जब दिल्ली हाई कोर्ट में पंहुचा तो न्यायालय ने दिल्ली सरकार और बिजली कंपनियों को इस कृत्य के लिए लताड़ लगायी। उच्च न्यायालय ने डीईआरसी को एक नया आदेश तैयार करने को कहा। दुर्भाग्यवश तब तक डीईआरसी के अध्यक्ष बरजिंदर सिंह सेवानिवृत हो गये। दिल्ली बिजली नियामक आयोग(डीईआरसी) के नये अध्यक्ष पी सुधाकर ने एक नया आदेश तैयार किया और 2011-12 के लिए बिजली के दाम में 200 प्रतिशत तक बढ़ाने की मंजूरी दे दी। जबकि पूर्व अध्यक्ष बरजिंदर के हिसाब से दिल्ली में बिजली के दाम 23 प्रतिशत  कम होने चाहिए थे। आज सबसे बडा सवाल यही है कि सुधाकर ने ऐसा क्यों किया?
इसका खुलाशा करते हुए प्रदर्शन में बंटे इंडिया अगेंस्ट करपशन के ‘शीला दीक्षित और बिजली कंपनियों की लूट’ के पर्चे के साथ  अरविन्द केजरीवाल ने खुद जंतर मंतर पर उपस्थित जनसमुदाय व मीडिया के समक्ष आरोप लगाया कि बिजली कंपनियां जनहित को रौंदकर अपने हितों की रक्षा करने वाले अधिकारियों को सेवानिवृत के बाद अपने संस्थान में बडे पदों पर आसीन करते है।  दिल्ली बिजली नियामक आयोग(डीईआरसी) के अध्यक्ष रहे वरजिंदर सिंह ने बिजली कंपनियों के लूट के खेल पर चोट करने व अधिकारियों को उनके झांसे में फंसने से बचाने के लिए दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित से उनके संस्थान का कोई भी चियरमेन या सदस्य सेवानिवृत के बाद प्राइवेट कम्पनी में नौकरी करने से रोकने के लिए कानून बनाने की मांग की थी। परन्तु शीला दीक्षित ने भ्रष्टाचार पर अंकुश लगा सकने वाला यह कानून बनाने से साफ मना कर दिया। केजरीवाल ने दो टूक शब्दों में कहा कि इससे साफ प्रतीत होता है कि सुधाकर जैसे अधिकारियों को ऐसी कंपनियों में सेवानिवृत के बाद कपंनी के हितों की रक्षा का ईनाम कंपनी में बडे पद पर आसीन करके दिया जायेगा। इसके साथ इन कंपनियों के खातों की हर हाल कैग से जांच कराने की मांग की जिसको सरकार ने ही नजरांदाज कर दिया।
अरविन्द केजरीवाल ने इस बिजली के बिल के नाम पर हो रही खुली लूट के भुक्त भोगी कई उपभोगताओं को जनसमुदाय व मीडिया के सम्मुख प्रस्तुत करते हुए इस लूट का पूरी तरह से पर्दाफाश किया। इसके तहत जिन मध्यवर्गीय परिवारों का पहले महीने में 210 यूनिट बिजली का बिल 474 रूपये आता था उनको अब 1089 रूपये देने पड़  रहे है। 300 यूनिट उपभोग करने वाले परिवार को अब 1555 रूपये का भुगतान करना पड़ रहा है। श्री केजरीवाल ने इस अवसर पर मंच पर इन बिजली कंपनियों के एक कर्मचारी को मंच पर आमंत्रित किया, जिसने खुद इस बिजली के अनापशनाप बिल में हो रही धांधली केे गौरख धंधे का खुलाशा किया। केजरीवाल ने अपने संबोधन में इस लूट में भाजपा की मिली भगत का अरोप लगाते हुए प्रश्न उठाया कि बरजिंदरसिंह मामले में भाजपा की जानबुझ कर रखी शर्मनाक चुप्पी ही इस बात का सबसे बडा सबूत है।
इस अवसर पर अरविन्द केजरीवाल ने दिल्ली के नई दिल्ली महानगर पालिका क्षेत्र में 25 प्रतिशत सस्ती बिजली देने पर भी प्रश्न उठाते हुए कहा कि इस एनडीएमसी क्षेत्र में देश के बडे उद्योगपति, नेता और अधिकारी रहते हैं उन अमीरों को सस्ती बिजली देने व दिल्ली के अन्य क्षेत्रों में रहने वाले गरीबों को मंहगी दरों पर बिजली देने के लिए सरकारों को कड़ी फटकार लगायी।
इस अवसर पर अरविन्द केजरीवाल ने उपस्थित जनसमुदाय से बिजली के दरों में खुली लूट के खिलाफ बिजली के बिल जमा न करने के आवाहान के साथ इन दोषी कम्पनियों के खिलाफ आंदोलन के शुभारंभ का ऐलान किया। इस के बाद सेकडों आंदोलनकारी गुपचुप तरीके से दिल्ली के मुख्यमंत्री शीला दीक्षित व सोनिया गांधी के अवास पर धरना देने पंहुचे।

Saturday, September 22, 2012



ऊखीमठ त्रासदी के लिए प्रशासन जिम्मेदार 

-ऊखीमठ क्षेत्र के  मंगोली गांव के ऊपर के पहाड़ पर हो रहे विनाशकारी साबित हुए भूस्खलन का वैज्ञानिक सर्वेक्षण कराने व इसका ट्रीटमेंट कराने की जिलाधिकारी, मुख्यमंत्री व प्रधानमंत्री से  2002 से मंगोली गांव के मूल निवासी ख्यातिप्राप्त भू वैज्ञानिक बलबीर सिंह धर्मवान की निरंतर पुरजोर मांग को  प्रशासन द्वारा घोर उपेक्षा करने के कारण  13 सितम्बर को हुई इस त्रासदी के लिए प्रशासन को ही एकमात्र जिम्मेदार मानते है।

अगर शासन प्रशासन ने ऊखीमठ क्षेत्र में विनासकारी साबित हुए मंगोली गांव के ऊपर पर्वत श्रृखला के भूस्खलंन का भूसर्वेक्षण व ट्रीटमेंट कराने की 2002 से जिला अधिकारी, मुख्यमंत्री व प्रधानमंत्री से भू गर्भ वैज्ञानिक बलबीर धर्मवान की लगातार लगायी जा रही गुहार को समय पर सुना होता तो आज 13 सितम्बर की रात आयी इस क्षेत्र में विनासकारी तबाही से हुए 60 से अधिक लोगों की मौत, 70 से अधिक तबाह हुए मकानों, अरबों रूपये मूल्य की खेत खलिहानों आदि की तबाही से बचा जा सकता था। 

ऊखीमठ में इसी माह बादल फटने के बाद हुए भूस्खलन से जो विनासकारी तबाही हुई उसके लिए अगर कोई जिम्मेदार है तो यहां का बेहद उदासीन व भ्रष्ट प्रशासन। जिसने उनके 2002 से उनके द्वारा लगातार इस भूस्खलन के लिए जिम्मेदार पर्वत श्रृखला का सर्वेक्षण कराने की मांग को नजरांदाज किया। निकम्मे प्रशासन ने न तो इस क्षेत्र का सर्वेक्षण किया व नहीं यहां हो रहे भूस्खलन का ट्रीटमेंट। इसी पर्वत से हुई भूस्खलन के कारण मंगोली ग्रामसभा में 28 लोगों व समीपवर्ती क्षेत्र में 32 अन्य लोगो ंकी मौत हुई।‘ यह टूक आरोप 13 सितम्बर को ऊखीमठ क्षेत्र के तबाह हुए गांवों की विनाशकारी हालत को देख कर दिल्ली लोटे भू वैज्ञानिक बलबीरसिंह धर्मवान ने प्यारा उत्तराखण्ड समाचार पत्र से व्यथित होकर कही।
उन्होने दो टूक शब्दों में कहा कि जितना धन राजनेता व नौकरशाह अब ऊखीमठ क्षेत्र में 13 सितम्बर की रात को भूस्खलन से हुई त्रासदी के बाद यहां पीडि़तों के झूठे हमदर्द बन कर घडियाली आंसू बहाने के नाटक करने के लिए हेलीकाॅप्टर से यात्रा करने आदि में लगा रहे है, उससे कम खर्च में इस तबाही का कारण बने मंगोली गांव के ऊपर की वर्षो से भूस्खलन हो रही पर्वत श्रृंखला का भूगर्भीय सर्वेक्षण व ट्रीटमेंट कराकर 13 सितम्बर की रात आयी इस क्षेत्र में विनासकारी तबाही से हुए 60 से अधिक लोगों की मौत, 70 तबाह हुए मकानों, अरबों रूपये मूल्य की खेत खलिहानों आदि की तबाही से बचा जा सकता था। उन्होने अफसोस प्रकट किया कि यहां शासन प्रशासन में बैठे लोगों को न तो आम लोगों की जानमाल की चिंता है व नहीं अपने दायित्व का भान। यही नहीं वे जनहित के किसी भी संवेदनशील कार्य तक करने के लिए समय पर कहीं तैयार नहीं है। उन्होंने कहा कि शासन प्रशासन में आसीन लोगों का ध्यान अपने दायित्व के निर्वहन से अधिक अब प्राकृतिक आपदा के धनराशि की बंदरबांट पर है। अगर प्रशासन ने उनकी गुहार समय पर सुन ली होती तो आज इस लोगों को यह बुरे दिन नहीं देखने पड़ते। इसमें रूद्रप्रयाग पीडब्ल्यूडी विभाग ने जो यहां पर भूस्खलन क्षेत्र का ट्रीटमेंट करने का जो अपने दायित्व नहीं निभाकर अक्षम्य अपराध किया, उसका खमियाजा यहां की जनता व प्रशासन आज भूगत रहा है।
 उन्होंने कहा आज इस त्रासदी के बाद जिलाधिकारी व प्रशासन भारतीय भूगर्भ विभाग से सर्वेक्षण कराने की बात कह रहे हैं क्यों प्रशासन के पास इस बात का कोई जवाब हे कि विगत दस सालों से इसकी मांग को उन्होंने क्यों ठुकरा कर पाच दर्जन से अधिक लोगों को मौत के मुंह धकेला।
13 सितम्बर की रात को आये विनाश के बाद इस क्षेत्र में जब वे गये तो राहत के नाम पर राजनेताओं व नौकरशाही की हवाई पिकनिक से पीडि़त जनता काफी परेशान ही नहीं दुखी भी है। जिस प्रकार से मुख्यमंत्री विजय, सांसद सतपाल महाराज व प्रदेश के आपदा प्रबंधन मंत्री यशपाल आर्य ने हेलीकाॅप्टर से रा.इंटर कालेज के मैदान में बने हेलीपेड़ में उतर कर त्रासदी से तबाह गांवों का जायजा लेने के बजाय मात्र 100 मीटर की दूरी पर वहां पर तमाम पीडि़त, घायलों आदि को शासन प्रशासन द्वारा बुलवा कर अपना कत्र्तव्य इति समझा। हाॅं भाजपा के तीनों पूर्व मुख्यमंत्रियों भगतसिंह कोश्यारी, भुवनचंद खण्डूडी व रमेश पोखरियाल निशंक ने अलग अलग तबाह हुए क्षेत्र में जा कर वहां का जायजा लिया। देखा तो यह जा रहा है कि प्रायः नेता या अधिकारी जो भी लोगों का दुख दर्द लेने के नाम पर यहां पर आ रहा है वह अपने साथ किसी फोटोग्राफर को ला कर लोगों के साथ अपनी फोटो खिंचवा कर अपना दायित्व पूरा कर रहा है। यही नहीं उत्तरकाशी में प्राकृतिक आपदा के पीडि़त लोगों को उचित राहत देने के नाम पर ‘भजन आदि करने की सलाह देने वाले प्रदेश के मुख्यमंत्री को अपने बेटे को चुनाव लड़ाने में भारी व्यवस्तता के कारण यहां लोगों की सुध लेने का समय है ही कहां। हाॅं ऊखीमठ त्रासदी के पीडि़तों को सरकार से अधिक शांतिकुज का दिन रात चलने वाला लंगर अधिक राहत पंहुचा रहा है। जो सरकारी खाना हेलीकाप्टर द्वारा लाया जा रहा है उसको आदमी क्या कुत्ते तक बदबू मारने के लिए खाने के लिए तैयार नहीं है।
रूद्रप्रयाग जिला मुख्यालय से 45 किमी दूरी पर स्थित ऊखीमठ के समीपवर्ती क्षेत्र में 13 सितम्बर हो बादल फटने व भूस्खलन से भारी तबाही हुई।  इसके कारण गिरीया मनसूना  में 3, मंगोली में 10, चुन्नी में 18, ब्राह्मण खोली 4, राशन डिप्पो में 4 नेपाली मजदूर,बोधे 4, जुजा 12, व प्रेम नगर 5 लोक 13 सितम्बर को आयी प्राकृतिक त्रासदी में कालकल्वित हो गये। यह सब ऊखीमठ-मनसूना मोटर मार्ग में मंगोली गांव के ऊपर के कई सालो ंसे पहाड़ टूटने व उससे हो रहे भूस्खलन का समय पर ट्रीटमेंट न किये जाने के कारण हुआ। भू वैज्ञानिक व मंगोली गांव के समाज सेवी ने शासन प्रशासन को इससे आगाह किया। उनकी इस चेतावनी को 14 नवम्बर 2002 को अमर उजाला में वर्षा से मंगोली गांव में भूस्खलन के खतरे व  25नवम्बर 2002 में दैनिक जागरण में मंगोली गांव इस भूस्खलन से होने वाले खतरे की खबरे प्रकाशित करके जनता व प्रशासन को आगाह किया। यही नहीं  5 फरवरी 2005 को भू बैज्ञानिक बलबीर धर्मवान ने प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री व  जिलाधिकारी रूद्रप्रयाग को पत्र लिख कर किया आगाह कि प्रशासन 12-13 नवम्बर 2002 की रात्रि को आये मंगोली गांव के ऊपरी पहाड पर हुए भूस्खलन की अनदेखी कर रहा है। 6 फरवरी 2005 को भू वैज्ञानिक की 2 साल बाद भी इस पहाड पर हो रहे भूस्खलन की उपेक्षा करने की खबर को दैनिक जागरण व अमर उजाला ने प्रकाशित की।  14 नवम्बर 2007 को भू वैज्ञानिक बलबीर धर्मवान ने प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर सरकारी तंत्र द्वारा आपदा प्रबंधन के कार्य के प्रति बेहद उदासीन होने का आरोप लगाया।  30 मई 2008 जिलाधिकारी रूद्रप्रयाग द्वारा भू वैज्ञानिक बलबीर धर्मवान को उनके प्रधानमंत्री को प्रशासन द्वारा मंगोली गांव के ऊपर स्थित पर्वत पर हो रहे भूस्खलन की उपेक्षा करने वाले  पत्र का जवाब ( संख्या 2852/41-02(2007-2008) दिनाॅंक 30 मई 2008) दिया। 10 जून 2010 को इस क्षेत्र का भू सर्वेक्षण कराने की मांग को लेकर भू वैज्ञानिक धर्मवान का जिलाधिकारी रूद्रप्रयाग को प्रार्थना पत्र लिखा।
20-6-2010 को अमर उजाला समाचार पत्र ने प्रमुखता से मंगोली गांव के भूगर्भीय सर्वेक्षण कराने की वैज्ञानिक धर्मवान की बात को प्रकाशित किया।  25 अक्टूबर 2010 को भू वैज्ञानिक बलबीर सिंह धर्मवान ने फिर जिलाधिकारी को मंगोली गांव के ऊपर स्थित भूस्खलन हो रहे पर्वत से उत्पन्न खतरे के निदान हेतु पूरे क्षेत्र का वैज्ञानिक सर्वेक्षण कराने की मांग के प्रति शासन प्रशासन की उदासीनता से खिन्न हो कर 28 जनवरी 2011 से आमरण अनशन की चेतावनी युक्त पत्र दिया।
जब प्रशासन द्वारा 2002 से उनके आग्रहों को नजरांदाज करने का का कृत्य किया और उससे 13 सितम्बर को ऊखीमठ क्षेत्र में भारी तबाही हुई। इससे व्यथित हो कर भू वैज्ञानिक श्री धर्मवान ने 19 सितम्बर 2012 को 13 सितम्बर की रात को आयी इस क्षेत्र में भारी प्राकृतिक त्रासदी में 60 लोगों के भूस्खलन में मारे जाने के बाद पुन्न इस क्षेत्र में भूस्खलन का वैज्ञानिक व इंजीनियरिग ट्रीटमेंट करने की अपनी दस साल पुरानी मांग को दोहराते हुए जिला अधिकारी रूद्रप्रयाग को फिर पत्र लिखा।

सरकार ने इस त्रासदी के पीडि़त परिवारों को जहां 5400 रूपये वर्तन खाने के लिए दिये। वहीं  एक लाख मकान क्षतिग्रस्त होने पर व 3 लाख मृतक आश्रित को देने का ऐलान किया। यहां पर इस त्रासदी से 70 परिवार बेघर हुए , करीब 400 लोग सुरक्षित ठिकाने की तलास में ,107 परिवार को मदद की जरूरत है। वैज्ञानिक धर्मवान के अनुसार अधिकांश त्रासदी इस क्षेत्र में जुलाई माह में नहीं अपितु अगस्त सितम्बर में होती है।


Wednesday, September 19, 2012



साल में 6 गैस सिलेण्डर देने के मनमोहनी सरकार फरमान से तुगलक भी होते शर्मसार

देश व दल की बागडोर मनमोहन सिंह जैसे गैर राजनैतिक व्यक्तियों के हाथों में सोंपने का दण्ड भोगने के लिए अभिशापित है देश

प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह, कांग्रेस का आला नेतृत्व सोनिया-राहुल व उसके करीबी मंत्री-संतरी बने दरवारी देश की  जनता से कितने कटे हुए है इसका खुलाशा खुद मनमोहन सरकार द्वारा रसोई गैस पर सब्सिडी खत्म करने के नाम से देश की आम जनता के हितों को रौंदने वाला साल में 6 गैस सिलेण्डर सब्सिडी युक्त देने का आत्मघाती तुगलकी ऐलान है। मनमोहन सिंह सरकार की इस जनविरोधी कदम के खिलाफ न केवल देश की आम जनता,यूपीए समर्थक दल,सहित पूरा विपक्ष सडकों में आंदोलनरत है।   मनमोहन सिंह व उनके अमेरिकी परस्त मंत्रियों व सलाहकारों को इतना भी भान नहीं है कि यह भारत है अमेरिका नहीं जहां आदमी अपने परिवार के साथ रहता है एकाकी नहीं। गौरतलब है कि अमेरिका सहित पश्चिमी देशों में अधिकांश लोग एकाकी जीवन जीते है। बच्चे ही नहीं अधिकांश लोग पति पत्नी तक साथ नहीं रह कर एकाकी जीवन जीते है। लगता है कि अमेरिकी मोह में सत्तांध हुए प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह, योजना आयोग के उपाध्यक्ष मोंटेक, वित्त मंत्री चिदम्बरम व कपिल सिब्बल लोग जो देश की आम जनता से कटे लोग जब देश का भाग्य विधाता बन जाते है तो उस देश को इसी प्रकार के कुशासन को झेलना पड़ता है। यही नहीं खुद देश की सरकार का नेतृत्व कर रही कांग्रेस पार्टी का नेतृत्व सोनिया गांधी व राहुल गांधी  ही नहीं अपितु उसके सबसे ताकतवर संगठन महासचिव जर्नाजन द्विवेदी, अहमद पटेल व चोधरी बीरेन्द्र सिंह जैसे आम जनता से कटे हुए व देश की जमीनी हकीकत से कौसों दूर पंचतारा संस्कृति में जीने वाले लोगों के कारण देश की आजादी से लेकर देश के निर्माण के लम्बे अनुभवों युक्त पार्टी को भी इतनी सी भी सुझ नहीं रही कि वह अपनी अमेरिकी मोह में अंधी सरकार को 6 सिलेण्डर का आत्मघाती तुगलकी निर्णय लेने पर कड़ी फटकार लगा कर उसे कम से कम प्रति महिने 1 सिलेण्डर  यानी साल के 12 सिलेण्डर करने का निर्णय लेने को मजबूर करे। मनमोहन सिंह का 6 सिलेण्डर का तुगलकी निर्णय न केवल देश की आम जनता का दुश्वार कर रहा है अपितु कांग्रेस की जड़ों में मट्ठा डाल रहा है। मनमोहन सिंह सरकार के कार्यो से साफ लगता है कि कांग्रेस का हाथ आम आदमी ही नहीं अपितु भारत के साथ में न हो कर अमेरिका के साथ है।
देश व दल की बागडोर मनमोहन सिंह जैसे गैर राजनैतिक व्यक्तियों के हाथों में सोंपने का दण्ड देश को व खुद उसके दल को कितना भोगना पड़ता है इसका सबसे ज्वलंत उदाहरण मनमोहन सिंह को प्रधानमंत्री के कुशासन से बदहाल हुए भारत है। जहां अपनी लड़खडाती हुई अमेरिकी अर्थव्यवस्था को बचाने के लिए अमेरिकी राष्ट्रपति ओबामा अमेरिकी उत्पादनों को बढावा देने का खुला आवाहन कर रहे हैं वहीं वे अमेरिका से बाहर काम कराने वाली अमेरिकी कम्पनियों पर अंकुश लगा रहे है। वहीं भारत के प्रधानमंत्री अपने देश की व्यवस्था को वाल मार्ट की तरह मजबूत करने की बजाय इस अमेरिकी कम्पनी को ही भारत में आने के लिए देश के हितों को ही दाव लगाने का कृत्य कर रहे है।
  पूरे देश की आम जनता ही नहीं खुद खांटी के कांग्रेसी भी कांग्रेस सरकार के इस तुगलकी फरमान पर हस्तप्रद हैं। कांग्रेस मुख्यालय का ही नहीं प्रधानमंत्री कार्यालय के कर्मचारी भी इस साल में 6 रसोई सिलेण्डर देने की तुगलकी आदेश से हैरान ही नहीं परेशान है। जनभावनाओं को समझने व उसको स्वीकार करने के बजाय कांग्रेस ने अपनी प्रदेश सरकारों से 6 सिलेण्डरों के साथ 3 सिलेण्डर पर सब्सिडी देने का निर्देश दे कर आम जनता को राहत देने का ढोंग कर रही है। इस प्रकार कांग्रेस शाशित प्रदेशों में 6 के बजाय अब 9 गैस सिलेण्डर सब्सिडी युक्त आम आदमी को मिलेंगे। जबकि आम आदमी ही नहीं आम कांग्रेसियों के साथ साथ ं हिमाचल प्रदेश के कांग्रेस के वरिष्ठ नेता वीरभद्र भी इस गैस व डीजल की बढ़ी हुई कीमतें कम करने की मांग कर चूके हंै। यही नहीं इस जनविरोधी कदम के खिलाफ ममता बनर्जी की तृणमूल पार्टी ने मनमोहन सरकार से समर्थन ही वापस ले लिया है। इसके साथ सप्रंग सरकार के समर्थक घटक डीएमके व बाहर से समर्थन दे रहे सपा व बसपा भी सरकार की इस कार्यवाही के खिलाफ है। परन्तु क्या मजाल सत्तामद व अमेरिकी मोह में देश को रसातल में धकेल रहे प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह व कांग्रेस अध्यक्षा को अपनी सरकार के कुशासन से देश की बदहाली व अपनी पार्टी के शर्मनाक पतन का भान तक नहीं है।  अगर कांग्रेस नेतृत्व को देश के जनतंत्र व अपनी पार्टी के हितों का जरा सा भी ख्याल रहता तो वे अविलम्ब 6 सिलेण्डर साल में देने की मनमोहन सरकार की देश की आम जनता को खून के आंसू रूलाने वाले व कांग्रेस की जड़डो में मट्ठा डालने वाले मोहम्मद तुगलक जैसे शासकों को भी शर्मसार करने वाला आदेश को तत्काल संसोधन करके उसे साल में 12 गैस सिलेण्डर करने का तत्काल निर्णय लेती। परन्तु लगता है सत्ता में आसीन होने के बाद अब सोनिया गांधी को देश व कांग्रेस पार्टी के हितों का भी तनिक सी भी चिंता नहीं जो वे इस प्रकार के आत्मघाती कदमों व सलाहकारों से देश व पार्टी दोनों पतन के गर्त में धकेलने दे रही है।

   

Monday, September 17, 2012


आखिर किस मुंह से अपने बेटे साकेत के लिए वोट मांग रहे हैं विजय बहुगुणा

टिहरी की स्वाभिमानी जनता ने अपने स्वाभिमान को रौंदने वाले थैलीशाहों, सत्तांधो को यहां जमीन सुंघाई है

‘सितारगंज विधानसभा सीट पर हुए कुछ माह पहले उप चुनाव में खुद को उत्त
राखण्डी नहीं बंगाली मूल का बताने वाले, (उत्तराखण्ड के जनादेश का अपमान करके निहित स्वार्थ में अंधे हो कर उत्तराखण्ड में कांग्रेस आला नेतृत्व द्वारा अधिकांश विधायकों की इच्छा के प्रबल विरोध के बाबजूद ) थोपे गये मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा, जिन्होंने खुद विधानसभा चुनावों में टिकट वितरण के समय प्रदेश में कांग्रेस में परिवारवाद का घोर विरोध किया था, अब अपने बेटे साकेत के लिए किस मुंह से टिहरी संसदीय उप चुनाव में इस क्षेत्र की उत्तराखण्डी जनता से वोट मांगेगे?
उत्तराखण्ड के स्वाभिमान को मुजफरनगर काण्ड-94 सहित राज्य गठन जनांदोलन में कदम कदम पर रौदने के गुनाहगार मुलायम सिंह व उनके उत्तराखण्डी प्यादों को अपने गले लगा कर उत्तराखण्डियों के जख्मों को कुरेदने वाले विजय बहुगुणा या उनके बेटे साकेत बहुगुणा को कोई भी स्वाभिमानी उत्तराखण्डी क्यों वोट देगा। हाॅं जो लोग अपने निहित स्वार्थ या दलगत संकीर्णता में अंधे हुए हैं वे जरूर सियार की तरह इनकी जय हो या समर्थन कर सकते है? आज सवाल साकेत का नहीं अपितु उत्तराखण्डी लोकशाही पर प्रश्नचिन्ह लग चूके थोपशाही के प्रतिक प्रदेश के मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा का है,? मुझे विश्वास है कि उत्तराखण्ड के स्वाभिमानी जनता जिसने तानाशाह बनी इंदिरा गांधी के धनबल व सत्तामद को चूर करके गढ़वाल लोकसभाई उपचुनाव में खुद को उत्तराखण्ड का सपूत बताने वाले हेमवती नन्दन बहुगुणा को विजय बना कर उनके राजनैतिक भविष्य की रक्षा की थी, उस स्वाभिमानी जनता को नमन् करके उनकी ताउम्र सेवा करने के बजाय खुद को उत्तराखण्डी मूल का नहीं बंगाली मूल का बताने वाले हेमवती नन्दन बहुगुणा के बेटे विजय बहुगुणा के इस बेगानेपन को अब प्रदेश की जनता कैसे भूल सकती है? मुझे विश्वास है कि टिहरी संसदीय क्षेत्र की जनता ने इसी स्वाभिमानीपन का परिचय आगामी 10 अक्टूबर को लोकसभा चुनाव में देगी। यह चुनाव केवल सामान्य चुनाव नहीं अपितु यह चुनाव प्रदेश के स्वाभिमान, लोकशाही, संसाधनों व हितों की रक्षा करने का भी चुनाव है। टिहरी संसदीय क्षेत्र की जनता ने हमेशा अपने स्वाभिमान की रक्षा में थैली शाहो, सत्तांधों व थोपशाही के प्रतीकों को यहां हमेशा करारा सबक सिखाया है। भगवान बदरीनाथ टिहरी संसदीय क्षेत्र के लोगों के इस महान अभियान में साथ दे।
 
लोकशाही में कोई मामला कांग्रेस या बीजेपी का निजी मामला नहीं होता है। लोकशाही में हर दल जनता व समाज का सेवक होता है। उसके हर कार्य पर निगरानी रखना जनता का पहला दायित्व है। टिहरी भी उत्तराखण्ड प्रदेश का महत्वपूर्ण संसदीय सीट है। यह चुनाव प्रदेश की लोकशाही में हो रहा है भाजपा व कांग्रेस के संगठन का नहीं। यह प्रदेश के हितों व स्वाभिमान का है।

जो भी व्यक्ति लोकशाही को रौदने का काम करेगा वह चाहे हरीश रावत हो या तिवारी, खण्डूडी हो या महाराज, बहुगुणा हो या भगतसिंह कोश्यारी या निशंक किसी को भी माफ नहीं किया जा सकता। मेरे लिए उत्तराखण्ड, देश व मूल्यों के लिए कोई व्यक्ति या पार्टी महत्वपूर्ण नहीं होती है। समाज का हित तमाम निहित स्वार्थो, संबंधों, जाति या क्षेत्र, रंग, धर्म तमाम संकीर्णता व सम्बंधों से उपर उठ कर ही साधा जा सकता है। जिन लोगों ने एक कदम भी अपने जीवन में अपने निहित स्वार्थ से उपर उठ कर नहीं सोचा होता है वे समझते हैं दुनिया में सभी उनकी तरह अपने निहित स्वार्थ के लिए ही जीते हैं, आंखे खोल कर देखों , हजारों लोगों ने देश व समाज के लिए शहादते दी तमाम उम्र सिद्धांत व मानवता के लिए खुद को कुर्वान किया है।

Sunday, September 16, 2012


-मुख्यमंत्री के दिल्ली मोह से प्रेरणा लेकर शायद पर्वतीय क्षेत्र में कार्यरत चिकित्सकों को भी शहरों में आवास देगी सरकार

-थोक के भाव में चिकित्सकों के स्थानांतरण करने के बाद प्रदेश सरकार का एक और तुगलकी फेसला


लगता है प्रदेश की कांग्रेसी सरकार ने यह प्रेरणा प्रदेश के मुख्यमंत्री के प्रदेश से अधिक दिल्ली में रहने से ले कर इस योजना का ऐलान किया कि पर्वतीय क्षेत्र में तैनात होने वाले चिकित्सकों के लिए सरकार देहरादून, कोटद्वार रामनगर हल्द्वानी, हरिद्वार व रुद्रपुर के शहरी क्षेत्रों में आवास बनाकर देने की योजना है। इससे जो थोड़ा बहुत चिकित्सक भी पर्वतीय क्षेत्र में रहते थे वे शहरी आवास के मोह में महिने में अधिकांश समय अपनी तैनातगी के स्थान के बजाय अपने शहरी आवास में ही मिलेगे। इसका ऐलान प्रदेश के स्वास्थ्य मंत्री सुरेन्द्रसिंह नेगी ने हल्द्वानी में 16 सितम्बर को प्रदेश की वित्तमंत्री इंदिरा हृदेश के साथ संयुक्त संवाददाता सम्मलन में किया।  वह इन नीति निर्धारकों को इस बात को समझ लेना चाहिए कि चिकित्सकों को आवास उनके नियुक्त चिकित्सा  लय के समीप ही दिया जाना चाहिए न की सेकडों किलोमीटर दूर। इन शहरी कस्बों में जिन डाक्टरों ने अपने बच्चे रखने हैं वे अपनी सुविधा के अनुसार रखने में सक्षम हैं। परन्तु उनको आवास शहरी स्थानों पर मिलने से वे प्रदेश के मुख्यमंत्री की तरह आये दिन इन शहरी आवासों पर ही रहेंगे या देहरादून में सत्ता के दलालों से अपना स्थानातरण कराने के लिए चक्कर लगाते रहेंगे। गौरतलब है कि उत्तराखण्ड के मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा जिस प्रकार से हर सप्ताह दिल्ली में डेरा डाले होते हैं उससे चर्चा जोरों पर है कि दिल्ली के महानगर में बडे लोगों की संगत में रहने वाले मुख्यमंत्री को देहरादून जैसा अपेक्षाकृत छोटे शहर का माहौल नहीं भा रहा है। न तो देहरादून में गोल्फ में ऐसे महारथी व नहीं दिल्ली जेसा पंचतारा संस्कृति की चकाचैंध।  वही रिटायर्ड लोगों के शहर के नाम पर जाना जाने वाला देहरादून में दिल्ली जैसे अंतर राष्ट्रीय सत्ता की हनक कहां। लगता है उत्तराखण्ड की सरकार को न तो प्रदेश के हितों का भान है, नहीं वहां के भविष्य का। जिस प्रकार से कुछ माह पहले चिकित्सकों को बड़ी संख्या में एकसाथ स्थानान्तरण किया गया उससे न केवल विपक्षी दल, आम जनता अपितु सत्तारूढ़ कांग्रेस के नेता भी आंदोलन करने के लिए मजबूर कर दिया था।  गौरतलब है कि सरकार के दिशाहीन हुक्मरानों ने  कुछ माह पहले प्रदेश में थोक के भाव से चिकित्सकों के एक साथ स्थानातरण करके डाक्टरों के अभाव में खुद बीमार पड़ चूके प्रदेश के पर्वतीय क्षेत्र के चिकित्सा व्यवस्था को पूरी तरह से तहस नहस ही कर दिया था।
हालांकि प्रदेश के स्वास्थ्य मंत्री सुरेन्द्र सिंह नेगी ने दावा कर रहे हैं कि दो वर्ष के भीतर चिकित्सा व्यवस्था पटरी पर आ जाएगी। उन्होंने इस चिकित्सा व्यवस्था को पटरी में लाने में विशेष सहयोग करने के लिए पत्रकार सम्मेलन में उपस्थित  वित्त मंत्री डा. इन्दिरा हृदयेश की खुले दिल से प्रशंसा करते हुए बताया कि स्वास्थ्य से जुड़ी हुई अधिकांश योजनाओं पर केंद्र नब्बे-दस के अनुपात में धनराशि जारी करने को सहमत हो गया है। स्वास्थ्य मंत्री ने बताया कि चिकित्सकों की कमियों से जुझ रहे प्रदेश में चिकित्सकों की युद्धस्तर पर नियुक्ति करने के लिए हर मंगलवार को स्वास्थ्य निदेशालय में साक्षात्कार किये जा रहे हैं। इस कार्य में राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन योजना का भरपूर लाभ लेने के लिए विशेष प्रयाश किये जा रहे है। इसके साथ ही उन्होंने स्थापित ट्रामा सेंटरों में चिकित्सकों की व्यवस्था के बाद सभी जिलों में बेस अस्पताल की स्थापना का भरोसा दिया है। स्वास्थ्य मंत्री ने प्रदेश की चिकित्सा व्यवस्था की वर्तमान जर्जर हालत के लिए पूर्ववर्ती  भाजपा सरकार ही जिम्मेदार है जिन्होंने  चिकित्सकों के साक्षात्कार होने के बाद चार वर्ष तक नियुक्ति नहीं दी गयी। इस कारण पर्वतीय क्षेत्र सहित पूरे प्रदेश में चिकित्सा व्यवस्था की यह स्थिति हो गयी है।
परन्तु जिस सरकार के मुख्यमंत्री का प्रदेश से अधिक मौह दिल्ली की पंचतारा संस्कृति में हो, जहां के मंत्रियों को उत्तरकाशी में आयी प्राकृतिक आपदा में अपनी सेवायें देने के बजाय विदेशी दौरे करने की ललक हो वहां पर भ्रष्टाचार के रसातल में डूबे सरकारी कर्मचारी अगर शहरों का मोह रखें तो किसी को आश्चर्य नहीं होगा। प्रदेश के इन हुक्मरानों का शहरी मोह इस कदर है कि जनता निरंतर गैरसेंण राजधानी बनाने की मांग करती रही परन्तु क्या मजाल है कि इस प्रदेश के अब तक किसी भी मुख्यमंत्री या जनप्रतिनिधि में इतनी भी नैतिकता या शर्म रही हो कि वह प्रदेश की राजधानी गैरसेंण बनाने के लिए ईमानदारी से पुरजोर प्रयास करे। सभी अपनी राजनैतिक रोटियां सेकने में लेगे है। यहां के नेताओं व सरकार को इस बात की होश तक नहीं है कि जिस क्षेत्र के लोगों ने अपनी शहादत व संघर्ष करके राज्य बनाया, उनकी जनांकांक्षाओं को पूरा करने का पहला दायित्व वहां की सरकारों का है।

Friday, September 14, 2012


पूरे साल  विदेशी भाषा में राजकाज चला कर एक दिन हिन्दी दिवस मनाना लोकशाही का अपमान 

  संसद की चैखट जंतर मंतर पर धरना प्रदर्शन व शोक दिवस के रूप में मनाया हिन्दी दिवस व किया सामुहिक मुण्डन 

नई दिल्ली(प्याउ)। ‘आजादी के बाद भी देश की राजभाषा में काम काज करने के बजाय उन्हीं फिरंगियों की भाषा अंग्रेजी से देश में राजकाज चलाना जहां देश की आजादी पर कलंक है वहीं देश के आजादी के अमर सैनानियों के साथ देश की लोकशाही का भी घोर अपमान है।  यह दो टूक विचार भारत की आजादी को अंग्रेजी की दासता से मुक्त करने के लिए संसद की दर्शक दीर्घा से देश के हुक्मरानों को धिक्कारने वाले भारतीय मुक्ति सेना के प्रमुख देवसिंह रावत ने हिन्दी दिवस के उपलक्ष में संसद की चैखट जंतर मंतर पर राष्ट्रीय निर्माण पार्टी द्वारा आयोजित एक दिवसीय धरने पर अपने संबोधन में कहे। यह शर्मनाक कलंक देश पर आजादी के 65 साल बाद भी लगाये रखने वाले देश के सभी हुक्मरानों व दलों को धिक्कारते हुए श्री रावत ने देश की जनता से आवाहन किया कि देश के स्वाभिमान व लोकशाही की रक्षा करने के लिए तुरंत फिरंगी भाषा से मुक्ति के लिए आगे आयें।’ राष्ट्र निर्माण पार्टी के क
राष्ट्र निर्माण पार्टी द्वारा 14 सितम्बर को आयोजित इस धरने का संचालन  राष्ट्रीय महासचिव डा वरूण वीर ने किया। इस धरने में मुख्य अतिथि संघ लोकसेवा आयोग पर भारतीय भाषाओं में संघ लोकसेवा आयोग की तमाम परीक्षायें संचालित करने व अंग्रेजी की अनिवार्यता का हटाने की मांग को लेकर अपने प्रमुख साथी राजकरण सिंह और अन्य साथियों के साथ एक दशक से अधिक समय तक धरना प्रदर्शन करने वाले भारतीय भाषा आंदोलन के प्रमुख पुरोधा पुष्पेद्र चैहान थे। इस अवसर पर सभा को संबोधित करते हुए भाषा आंदोलन के पुरोधा व अग्रणी साहित्यकार डा बलदेव वंशी, कई विदेशी भाषाओं का भारत में ज्ञान देने वाले निदेशक ज्योति संग, ओमप्रकाश हाथपसारिया, समाजसेवी संजय यादव, मीरापुर मुजफरनगर के समाजसेवी वीरेन्द्र गुप्ता, पुरूषोत्तम कपूर आदि प्रबुद्ध जनों ने अपने संबोधन में सरकार द्वारा देश को आजादी के बाद भी विदेशी भाषा की गुलामी देश पर बनाये रखना एक प्रकार का देश के साथ जघन्य अपराध है। ‘राष्ट्र निर्माण पार्टी ने इस अवसर पर हिन्दी को राष्ट्र भाषा घोषित करने, देश का नाम इंडिया हटा कर केवल भारत करने, उच्च न्यायालय व सर्वोच्च न्यायालय में अंग्रेजी स्थान पर हिन्दी में भाषा का प्रयोग करने की पुरजोर मांग की।
वहीं जंतर मंतर पर आयोजित एक अन्य धरने में बिहार के कटियार जनपद से सर्वोदय समाज के एक दर्जन से अधिक आये राष्ट्रभक्त स्वयंसेवियों ने अपने अध्यक्ष अशोक कुमार के नेतृत्व में  14 सितम्बर को हिन्दी दिवस को शोक दिवस मनाते हुए अपना सामुहिक मुण्डन करके विरोध प्रकट किया। सर्वोदय के आंदोलनकारी ‘राजभाषा हिन्दी को राष्ट्र भाषा का अधिकार देने, सर्वोच्च न्यायालय में हिन्दी लागू कराने व संसदी की कार्यवाही हिन्दी भाषा में कराने की मांग की। देश के स्वाभिमान व लोकशाही की रक्षा के लिए समर्पित समाजसेवी देवसिंह रावत, साहित्यकार डा बलदेव वंशी , ज्योति संग व समाजसेवी मोहनसिंह रावत ने सर्वोदयी कार्यकत्र्ताओं को उनके इस आंदोलन को धन्यवाद व समर्थन देते हुए राष्ट्र निर्माण पार्टी के कार्यक्रम में सम्मलित हुए।

क्यों एक दिन हिन्दी दिवस मनाते

रूस, चीन, जर्मन जापान सव
अपनी भाषा में राजकाज चलाते
फिर मेरे भारत में क्यों अंग्रेजी
स्वतंत्र होने पर भी राज चलाये
देशद्रोह, कलंक भारत के माथे पर
देशी छोड़ विदेशी में राज चलाना।
सारा राज अंग्रेजी में चलाने वालो
क्यों एक दिन हिन्दी दिवस मनाते।
शहीदों की शहादत का है अपमान
देश के स्वाभिमान का है अपमान।
चलता जहां विदेशी भाषा का राज
आजाद नहीं वो गुलाम सेे बदतर
हमे ंबलिदानों से मिली है आजादी
क्यों फिर अंग्रेजी ही राज चलाती।

देवसिंह रावत
www.rawatdevsingh.blogspot.com

Thursday, September 13, 2012


रूद्रप्रयाग में 13 सितम्बर को बादल फटने से मची तबाही, 29की मौत 20 से अधिक लापता 

बागेश्वर में 12 के बाद 13 सितम्बर को भी बादल फटने से 5 की मौत

बादल फटने की घटनाओं में बढ़ोतरी के लिए जिम्मेदार हैं प्रदेश में बड़ी संख्या में बनाये गये बांध





चमोली के श्रीगढ़ क्षेत्र में 13 सितम्बर को बादल फटने से मची तबाही 

उत्तराखण्ड में विते दिनों में बागेश्वर व रूद्रप्रयाग जनपदों में बादल फटने से प्रभावित क्षेत्रों में भारी तबाही मची है। लोग इस बात से परेशान है कि कुछ ही सालों में पर्वतीय क्षेत्र में बादल फटने की घटना में यकायक भारी बढोतरी क्यों हुई। मौसम वैज्ञानिक भले ही बादल फटने को पानी वाले बादलों की राह में कोई बाधा उत्पन्न होने को कारण मान रहे हैं परन्तु हिमालयी पर्यावरण के चिंतक इसके लिए यहां पर प्रकृति से खिलवाड करके बनाये गये बडी संख्या में बांधों को ही इस विनाश का मुख्य कारण मान रहे है। इस सप्ताह रूद्रप्रयाग में 13 सितम्बर की रात 12 बजे को ऊखीमठ विकासखण्ड के चुन्नी मंगोली, ब्राताणखोली, प्रेमनगर, किमाणा (जुआ) आदि गांवों में बादल फटने से भारी तबाही मच गयी। यहां पर 29 आदमी के मरने व 31 से अधिक लोगों के लापता होने की खबर है। सबसे ज्यादा तबाही चुन्नी गांव में 18 , किमाणा (जुआ) में 11,डंगवाड़ी में 4, ब्राताणखोली में 4, गिरिया में 3 व एक गोदाम के 4नेपाली मजदूरों सहित कुल 49 लोग अकाल काल के गाल में समा गये। इसके अलावा 50 से अधिक पशु भी गौशालाओं में ही जमीदोज हो गये। यहां पर चारों तरफ तबाही का दृश्य देख कर हर आदमी प्रकृति के इस तांडव देख कर सहमा हुआ है। गंभीर रूप से घायल हुए 9 से अधिक लोगों को हेलीकप्टर से श्रीनगर के बेस चिकित्सालय में भर्ती किया गया है। इस भारी त्रासदी में राहत कार्य में स्थानीय शासन के साथ सेना, पुलिस, आईटीबीपी, आपदा प्रबंधन दल के अलावा स्थानीय लोग भी बड़ी संख्या में राहत तथा बचाव कार्य में दिन रात लगे हुए है। इसके अलावा दिल्ली से नेशनल डिजास्टर रिलीफ फोर्स (एनडीआरएफ) की 45 सदस्यीय टीम पीडि़त क्षेत्र में राहत कार्य में भेजी गयी है। इसके साथ चमोली के श्रीगढ़ क्षेत्र में भी बादल फटने से क्षेत्र में खेत खलिहान व मार्ग क्षतिग्रस्त हो गये है। बड़कोट सहित उत्तरकाशी में हुई मूसलाधार वर्षा से भारी नुकसान होने की खबरें हैं। 
वहीं दूसरी तरफ बागेश्वर जनपद के कफकोट तहसील में जहां 12 सितम्बर को बादल फटने से 1 बालक की दर्दनाक मौत व मकान, गौशाला, खेत खलिहान आदि को भारी नुकसान हुआ था। इसके एक दिन बाद ही ं 13 सितम्बर बृहस्पति को कफकोट के चिरपतकोट क्षेत्र में ही फिर बादल फटने व मूसलाधार वर्षा से उफान पर आए नदी व गाड़ गदेरों ने पांच लोगों को बहा कर मौत की नींद सुला दिया। इनमें घराट गैंहॅू पीसने के लिए गये । इसके अलावा जगथाना की युवती नीमा ,खर्कुकानातोली के मोहन चन्द्र ,गैनाड़ के डुंगर सिंह भी उनफती गाड गदेरे व नदी में बह गए हैं। इसके साथ कई मकान, खेत आदि ढ़ह गये। 
इससे पहले बागेश्वर में 12 सितम्बर को बादल फटने से पोथिंग गांव निवासी बिशन सिंह (50) पुत्र खीम सिंह व उनकी 45 वर्षीय पत्नी मधुली देवी गदेरा पार करते हुए बह गयी। इसके अलावा यहां खेत खलिहान तबाह हो गये है। स्थिति को देखते हुए जिला प्रशासन ने सेना को राहत कार्यो के लगाने की मांग की है। इस क्षेत्र में हो रही मूसलाधार वर्षा से भिन्डी में सडक में मलवा आने से रिषीकेश केदारनाथ राजमार्ग बंद हो गया है। क्षेत्र का सम्पर्क शेष जनपद से कट गया है। 
वहीं दूसरी तरफ 12 सितम्बर बुद्धबार की रात बागेश्वर के कफकोट क्षेत्र में चिरपतकोट पहाडी पर बादल फटने व मूसलाधार वर्षा से स्थानीय गाड़ गदेरे व सरयू नदी के उफान से से इसके समीपवर्ती गांव पौथिंग ग्राम सभा के उच्छात तोक, आदि नुकसान हुआ। इस कफकोट क्षेत्र में बड़ेत, हरसिंग्याबगड़, सीरी, परमटी, चीराबगड़, बमसेरा, खाईबगड़, कपकोट, गैरखेत, रैथल, गोलना, असौं ,दुबटिया तोक में कलमठ,चीराबगड़ व परमटी, हिचैड़ी भराड़ी व गांसू सहित अनैक गांवों इस दिनं कई मकान, गौशालायें व खेत खलिहान तबाह हो गये वहीं पौलिंग ग्राम सभा के उच्छात तोक निवासी पुरूषोत्तम जोशी का 14 वर्षीय बेटा मकान के ध्वस्थ होने से मलवे में दब कर दम तोड़ गया और उसका भाई दीप गंभीर रूप से घायल हो गया। इसी गांव में 15 पशु भी गोशाला में जमीदोज हो गये। 
प्रदेश में इसी दो महिनों के अंदर बादल फटने की घटनाओं में अचानक बढोतरी होने से पूरे प्रदेश के लोग सहमें हुए है। मौसम वैज्ञानिकों की जहां धारणा है कि जब वर्षा वाले बादलों की राह में कोई बाधा उत्पन्न होती है तो उनमें तेज गति से आपस में टकराव होता है। वैज्ञानिकों के अनुसार जब किसी सीमित क्षेत्र में प्रति घंटे एक सौ मिलीमीटर या उससे अधिक बारिश हो तो उसे बादल फटना कहा जाता है। इससे ऐसी बारिश होती है कि मानों किसी ने उपर से पानी का तेज गति का झरना ही छोड़ दिया हो। यह भले ही कम समय के लिए हो परन्तु पर्वतीय क्षेत्र में चट्टाने कमजोर होने के कारण इस अप्रत्याशित जल की प्रबल वेगधारा को सहन नहीं कर पाते है और उसके रास्ते में छोटे पहाड़, मकान, खेत खलिहान जो भी आाते हैं बहा कर तहस नहस हो जाता है। वैज्ञानिक भले ही इसे बादल फटने का नाम देते हों परन्तु आम लोग इसे जल प्रलय ही मानते हैं। 
पर्यावरणविद इसे इस संवेदनशील हिमालयी क्षेत्र में तेजी से बड़ी संख्या में बनाये जा रहे बांधों से हो रहे यहां के पर्यावरण से खिलवाड को ही जिम्मेदार मान रहे है। बांधों के बनाये जाने से यहां की जलवायु में जो कृतिम परिवर्तन करके यहां पर विशाल बांध रूपि झीलों का बलात निर्माण किया गया, वह यहां के पर्वतीय जलवायु के अनुकुल नहीं है। इन बांधों से बनने वाले पानी के बादलों से ही यह तबाही मच रही है। क्योंकि प्रकृति ने जो यहां पर गाड गदेरों व नदियों की रचना की उसके अनकुल यहां के परिवेश है। परन्तु जो बलात विशाल झीलें यहां पर बना कर प्रकृति से गंभीर खिलवाड़ किया जा रहा है वह इस हिमालयी क्षेत्र के लिए गंभीर खतरा बन गया है। इन बांधों के निर्माण से पहले इस हिमालयी क्षेत्र में पहले वर्षो में कभी बादल फटने की घटना सुनाई देती थी परन्तु विगत दो माह में उत्तरकाशी, चमोली, टिहरी के बाद अब बागेश्वर व रूद्रप्रयाग जनपद में बादल फटने से तबाही मची हुई है उससे न केवल प्रदेश के लोग हैरान हैं अपितु पर्यावरणविद भी परेशान है। परन्तु सरकार को इस दिशा में सोचने की फुर्सत ही नहीं क्योंकि उनको जनहित व प्रदेश के हित से अधिक इन बांधों के निर्माण से मिलने वाले करोड़ों करोड़ रूपये की रिश्वत डकारने की ज्यादा चिंता रहती है। जनहितांें के लिए हमेशा मूक रहने वाले ये जनप्रतिनिधि व शासक इन बांधों के निर्माण के लिए प्रधानमंत्री से लेकर जनता तक सबसे गुहार लगाते नजर आते है।

-अधिसूचना जारी होने से पहले टिहरी संसदीय उप चुनाव में कांग्रेस की हार निश्चित 
-साकेत को टिकट दे कर कांग्रेस आला कमान ने साबित कर दिया कि कांग्रेस में समर्पित व वरिष्ठ कांग्रेसी नेताओं की कोई कीमत नहीं 
टिहरी लोकसभा उपचुनाव के लिए जैसे ह
ी कांग्रेस द्वारा तमाम वरिष्ठ समर्पित जमीनी दावेदारों को दरकिनारे करके मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा राजनीति में नौशिखिये बेटे साकेत बहुगुणा को अपना प्रत्याशी बनाने की घोषणा की उससे प्रदेश में समर्पित वरिष्ठ नेता ही नहीं आम समर्पित कार्यकत्र्ता भी अपना अपमान समझ कर आहत है। हालांकि इनमें से अधिकांश स्वयं कांग्रेस का वफादर अनुशासित सिपाई मान कर अधिकांश मूक हैं परन्तु अंदर से स्वयं को अपमानित महसूस कर रहे है। इसका सीधा असर कांग्रेस को 10 अक्टूबर को होने वाले मतदान में सामने आयेगा। हालांकि टिहरी संसदीय सीट में ही नहीं पूरे प्रदेश में कांग्रेस द्वारा विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को दिये गये जनादेश के विजय बहुगुणा को मुख्यमंत्री के रूप में थोप कर अपमान किया तथा मुख्यमंत्री बनने के बाद विजय बहुगुणा अब तक के शासन से प्रदेश की जनता हर हाल में कांग्रेस को करारा सबक सिखाना चाहती है। टिहरी संसदीय सीट की स्वाभिमानी जनता उत्तराखण्ड के स्वाभिमानी जनता की भांति ही कभी अपने स्वाभिमान व भविष्य को रौंदने वालों को करारा सबक सिखाती है। जिस प्रकार से कांग्रेस के कुशासन, मंहगाई, भ्रष्टाचार व आतंकवाद से पूरे देश में त्राही-त्राही मचा हुआ है इसका करारा जवाब टिहरी संसदीय सीट की जनता 10 अक्टूबर को सत्तामद में लोकशाही को शर्मसार कर रही कांग्रेस को करारा सबक सिखायेगी।
हालांकि लम्बे समय से इस बात की काफी चर्चा थी कि प्रदेश के मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा की धर्मपत्नी सुधा बहुगुणा को कांग्रेसी प्रत्याशी बनाया जायेगा। परन्तु भाजपा द्वारा इस सीट पर टिहरी रियासत की महारानी को अपना प्रत्याशी बनाये जाने से लगता है कांग्रेस में हडकंप मच गया। क्योंकि टिहरी की महारानी जो इस संसदीय सीट के प्रमुख भाषा गढ़वाली व नेपाली बहुत ही प्रभावी ढ़ग से बोलती है जबकी विजय बहुगुणा की धर्मपत्नी के बारे में ही नहीं स्वयं विजय बहुगुणा के बारे में प्रदेश के तमाम प्रबुद्ध लोगों में यह धारणा है कि कोई उत्तराखण्ड की कोई बोली तक नहीं बोल सकते हैं। शायद इसी कमजोरी के कारण विजय बहुगुणा ने अपनी धर्मपत्नी के बजाय अपने बेटे साकेत बहुगुणा को चुनावी समर में उतारने का निर्णय लिया। परन्तु टिहरी रियासत के आगे चुनाव जीतना कितना विकट है इसको स्वयं प्रदेश के मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा बखुबी से जानते हैं। इस पूरे क्षेत्र में टिहरी महाराज के प्रति लोगों में ‘बोलंदा बदरी’ रूपि सम्मान था। इसी कारण टिहरी से जब तक महाराजा मानवेन्द्र शाह जीवित रहे उनके सामने जब भी कांग्रेसी प्रत्याशी के रूप में विजय बहुगुणा सांसद के चुनाव में हमेशा ही पराजित होते रहे।
हालांकि टिकट के बारे में यही कहा जाता है कि प्रदेश कमेटी द्वारा दावेदारों के तीन-चार नाम केन्द्रीय आलाकमान के पास भेजा जाता है। केन्द्रीय आलाकमान उन प्रत्याशियों में से एक नाम पर अपनी मुहर लगाती है। परन्तु इस चुनाव से पहले ही यहां की आम जनता में यह धारणा थी कि टिकट उसी को मिलेगी जिस विजय बहुगुणा चाहेगा। क्योंकि कांग्रेस आला कमान का निर्णय तो केवल नाम मात्र का है यहां पर सारे फेसले आलाकमान के वे तथाकथित सलाहकार करते हैं जिनको अपने निहित स्वार्थो के अलावा न तो कांग्रेस का हित दिखाई देता है व नहीं दावेदारों का राजनैतिक जीवन का संघर्ष। इसी कारण कांग्रेस आलाकमान के इन सत्तांध सलाहकारों की सलाह पर ही प्रदेश के वरिष्ठ, अनुभवी, जनप्रिय नेताओं के बजाय विजय बहुगुणा जेसे नेता को मुख्यमंत्री बना कर कांग्रेस व प्रदेश के जनादेश की जो जगहंसाई करायी, उससे भी कांग्रेसी नेतृत्व अभी तक कोई सीख नहीं ले पाया। साकेत बहुगुणा को सांसद का प्रत्याशी बनाने से कांग्रेस नेतृत्व ने साफ कर दिया कि उनकी नजर में समर्पित व अनुभवी कांग्रेसी नेताओं का कोई महत्व नहीं है। वह केवल वही निर्णय लेती है जो उनके जनता व कांग्रेस से कटे हुए आत्मघाती सलाहकार निर्णय लेते है। वेसे यह देखा गया कि प्रदेश के अधिकांश बडे नेता यही चाहते थे कि इस सीट से विजय बहुगुणा के बेटे को कांग्रेस अपना प्रत्याशी बनाये। क्योंकि सभी कांग्रेसी नेता चाहते थे कि अगर विजय बहुगुणा के बेटे को इस चुनाव में कांग्रेसी टिकट मिल गया तो उनके बेटों के लिए भी आगामी विधानसभा या लोकसभा चुनाव में टिकट हासिल करने की राह आसान हो जायेगी। गौरतलब है कि इन विधानसभा चुनाव में यह आम चर्चा थी कि प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष यशपाल आर्य से लेकर हरीश रावत, सतपाल महाराज आदि नेता अपने बेटों के लिए चुनावी समर में उतारने का मन बना चूके थे, परन्तु उस समय परिवार का विरोध जिस प्रकार से वर्तमान मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा ने खुल कर किया और जनता व दल के कार्यकत्र्ताओं में इस बात का गुस्सा था कि क्या दशकों से पार्टी को मजबूत बनाने व जनसेवा में समर्पित रहने वाले कार्यकत्र्ता केवल इन नेताओं के बेटे-बेटियों व पत्नी को ढोने के लिए रह गये।
अब देखना यह है कि मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा किस मुंह से जनता के समक्ष अपने बेटे को चुनाव में जनादेश हासिल करते हैं क्योंकि वे खुद विधानसभा चुनाव में परिवारवाद का घोर विरोध कर चूके थे। यही नहीं टिहरी संसदीय क्षेत्र की जनता सहित प्रदेश की आम जनता को इस बात से भी मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा से आहत है कि उन्होंने सितारगंज विधानसभा चुनाव में जीतने के लिए उन्होंने दशकों से उत्तराखण्डी मूल का समझ कर स्नेह व समर्थन दे रही जनता पर अपने पूर्वजों को बंगाली मूल का बज्रपात किया। इलाहाबाद से चुनावी हार मिलने पर जब हेमवती नन्दन बहुगुणा को उत्तराखण्ड की जनता ने अपार स्नेह व सम्मान देकर इंदिरा गांधी के तमाम प्रलोभनों व तानाशाही का मुहतोड़ जवाब देते हुए गढ़वाल संसदीय उपचुनाव में विजय बनाया था। ऐसे विकट परिस्थितियों में उनके राजनैतिक जीवन की रक्षा करते हुए उनका पूरे देश की राजनीति में राष्ट्र का कद्दावर नेता के रूप में स्थापित किया उस बहादूर जनता को नमन् करने के बजाय उनके बेटे विजय बहुगुणा ने मात्र एक विधानसभा सीट के चुनाव के अवसर पर अपने पूर्वजों को बंगाली मूल कर बताना पूरे उत्तराखण्ड की जनता ने खुद को बेहद अपमानित महसूस किया। अब ऐसे माहोल में विजय बहुगुणा द्वारा अपने बेटे को टिहरी संसदीय सीट पर हो रहे उपचुनाव में उतारने का निर्णय अपने आप में राजनैतिक समीक्षकों की नजर में आत्मघाती कदम से कम नहीं है। इस उपचुनाव की अधिसूचना भले ही अभी जारी नहीं हुई परन्तु यहां पर जो राजनैतिक हवा कांग्रेस के खिलाफ बह रही है उसको देख कर आम जनता में भी यह धारणा प्रबल हो गयी कि यह सीट पर कांग्रेस की हार अवश्यमभावी है। देखना यह है 13 के अंक को अपने आप को भाग्यशाली मानने वाले विजय बहुगुणा को इसी 13 के प्रतीक 13 अक्टूबर को होने वाला मतगणना का परिणाम कहीं उनके मुख्यमंत्री पद पर ग्रहण लगाने का मूलकारण तो न बन जाय।
 

Wednesday, September 12, 2012




अग्रणी समाजसेवी शिव प्रसाद पुरोहित के आकस्मिक निधन से लगा उत्तराखण्ड को गहरा आघात

अग्रणी समाजसेवी व शंकराचार्य माधवाश्रम धर्मार्थ चिकित्सालय ट्रस्ट के महासचिव शिवप्रसाद पुरोहित का 12 सितम्बर 2012 की रात को दिल्ली के साकेत स्थित के मैक्स अस्पताल में  आकस्मिक निधन हो गया। उनके निधन की सूचना से दिल्ली, उत्तराखण्ड, पंजाब, उप्र. गुजरात, महाराष्ट्र, हरियाणा, जम्मू सहित देश विदेश में रहने वाले उनके मित्र व शंकराचार्य माधवाश्रम के अनुयायी स्तब्ध और शोकाकुल है।
उनके निधन की सूचना प्यारा उत्तराखण्ड समाचार पत्र को उनके करीबी मित्र समाजसेवी व दिल्ली प्रदेश कांग्रेस के नेता हरपाल रावत ने दी। उनका अंतिम संस्कार 13 सितम्बर को हरिद्वार में गंगा के पावन घाट पर किया जायेगा। रूद्रप्रयाग जनपद के सणगू गांव के मूल निवासी स्व. शिव प्रसाद पुरोहित हर किसी के दुख दर्द में सम्मलित होने वाले विलक्षण स्वभाव के समाजसेवी थे। वर्तमान में वे संसद भवन के समीप तपेदिक उन्मूलन संस्थान में कार्यरत थे व वहीं पर दशकों से सपरिवार निवास कर रहे थे। वे शंकराचार्य माधवाश्रम जी महाराज के अनन्य भक्त थें। उनकी समाजसेवी व समर्पित निष्टा को देख कर ही शंकराचार्य माधवाश्रम जी ने उनको भगवान बदरीनाथ केदारनाथ मार्ग पर रूद्रप्रयाग के समीप पावन कोटेश्वर में शंकराचार्य माधवाश्रम धर्मार्थ चिकित्सालय के भव्य निर्माण व संचालन का महासचिव का गुरूतर दायित्व का निर्वहन कई सालों से कर रहे थे। वे जनसेवा के मिशन में इस कदर समर्पित रहते थे कि उनको अपने परिवार, खाना पीना का भी भान नहीं रहता। आज उनकी इसी तपस्या से जहां कोटेश्वर में इस दुर्गम पर्वतीय क्षेत्र में श्री शंकराचार्य माधवाश्रम धर्मार्थ चिकित्सालय संचालित है। यहां पर सीमान्त व दुरस्थ क्षेत्र के चिकित्सा सुविधा के लिए तरस रहे लोगों  को चिकित्सा सुविधाओं का लाभ मिल रहा है। नहीं तो इस क्षेत्र की जनता को इलाज के लिए देहरादून व दिल्ली के दूरस्थ शहरों में मजबूरी में आना पड़ता है। आज शिवप्रसाद पुरोहित के समर्पित समाजसेवी तपस्या व  शंकराचार्य जी के आशीर्वाद से यहीं पर देश के अपोलो सहित कई बडे चिकित्सालयों के अनुभवी योग्य चिकित्सक यहां पर अपनी सेवायें दे रहे हैं और लोगों को एक्सरे, खून आदि सभी जांच यहीं पर मिलती है व महिला चिकित्सकों से युक्त इस चिकित्सालय में सस्ती दवाईयों के साथ अनैक प्रकार के रोगों का आप्रेशन भी हो रहे है। यहां पर अब तक हजारों लोग इस चिकित्सालय से लाभांन्वित हो चूके है।
 उनकी इस निस्वार्थ समाजसेवी भावना से देश के दिग्गज नेता हेमवती नन्दन बहुगुणा उनसे अत्यधिक स्नेह रखते थे। उत्तराखण्ड के पूर्व मुख्यमंत्री भुवनचंद खण्डूडी उनके निस्वार्थ सेवा भाव से उनको अपना छोटा भाई से अधिक मानते थे। उनका उत्तराखण्ड के अधिकांश राजनेताओं से ही नहीं देश के अधिकांश राजनेताओं, उद्यमियों, अधिकारियों, समाजसेवियों व आम आदमियों से गहरा अपनत्व है। उत्तराखण्ड राज्य गठन आंदोलन के समर्पित सिपाई के तरह में सदैव समर्पित रहे। राज्य गठन आंदोलन में श्रीयंत्र काण्ड में शहीद हुई यशोधर बेंजवाल उनके साले थे। दिवंगत श्री पुरोहित के शोकाकुल परिवार में उनके एक पुत्र व एक विवाहित बेटी व पत्नी हैं।
धार्मिक प्रवृति के सहृदयी शिवप्रसाद पुरोहित के निधन पर गहरा दुख पर मुझे गहरा आधात लगा, अपनी कुल इष्टा माॅं भगवती के अनन्य भक्त शिवप्रसाद पुरोहित अपने गांव, जनपद, प्रदेश व देश के सभी अच्छे रचनात्मक कार्यो में जुटे रहते थे। उन्होंने कोटेश्वर में कई चिकित्सा शिविर के साथ पूरे प्रदेश में तपेदिक रोग से मुक्त करने के लिए जागरूकता अभियान भी चलाया। वे तपेदिक से पीडि़त उत्तराखण्डियों को इस रोग से निजात दिलाने के लिए हमेशा समर्पित रहे। उन्होंने तपेदिक ऐसोशिएशन उत्तराखण्ड का गठन भी कुछ साल पहले किया। यही नहीं उनके प्रयास व मार्ग दर्शन से देहरादून में इसी ऐसोशियशन की महासचिव पूनम किमोठी ने राष्ट्रीय स्तर का एक विशाल सम्मेलन गत वर्ष देहरादून में किया था। उत्तराखण्ड के अग्रणी समाजसेवी व उत्तराखण्ड आंदोलन के अग्रणी आंदोलनकारी नेता हरपाल रावत ने कहा कि ऐसे समर्पित समाजसेवी व सहृदय इंसान का युवा अवस्था में हमारे बीच से यकायक चले जाना समाज के लिए भारी क्षति है। इस शोक की घड़ी में मैं उनके निस्वार्थ मानवसेवा में हरपल संलंग्न रहने की महान प्रवृति को शतः शतः नमन करता हूॅ और भगवान से प्रार्थना करता हॅू कि उनके शोकाकुल परिजनों  को इस असीम दुख से उनको उबारने में शक्ति दी।

Tuesday, September 11, 2012


खुदगर्ज, संकीर्ण व पदलोलुपु कांग्रेसी नेताओं  ने देश के साथ साथ राहुल व कांग्रेस के भविष्य पर भी लगाया ग्रहण

जनादेश का सम्मान कर देश को सही दिशा देने का काम करें राहुल

देश को दिशाहीन व संवेदनहीन सत्तालोलुपुओं के हाथों रौंदवाना देश के हितों के साथ खिलवाड है त्याग नहीं

अभी कांग्रेस पार्टी अमेरिका के प्रतिष्ठित समाचार पत्र वाशिंगटन पोस्ट में मनमोहन सिंह को असफल प्रधानमंत्री बताये जाने की करारी चोट से उबर भी नहीं पायी थी कि लंदन से छपनेवाली प्रतिष्ठित पत्रिका इकोनॉमिस्ट ने कांग्रेस की आशाओं के सूर्य व भावी प्रधानमंत्री के सर्वमान्य दावेदार राहुल गांधी को भी असफल, दिगभ्रमित बता कर कांग्रेसियों  की आशाओं पर एक प्रकार से बज्रपात सा कर दिया हैं। विदेशी समाचार पत्रों द्वारा एक के बाद कांग्रेसी आला नेताओं को निशाने पर रखने वाले लेखों से जहां कांग्रेसी तिलमिलाये हुए हैं वहीं यह देश की जनता द्वारा मनमोहन सिंह सरकार व कांग्रेसी नेताओं पर देश के हितों की घोर उपेक्षा के निरंतर लग रहे आरोपों को ही बल मिला। हालांकि विदेशी मीडिया द्वारा बेनकाब किये जा रहे कांग्रेसी नेताओं को यहां की मीडिया व जागरूक लोग पहले से ही असफल बता रहे थे परन्तु देश में तथाकथित विदेशी मानसिकता के गुलाम व देश की व्यवस्था पर काबिज तबके को तभी कोई बात वजनदार व समझने लायक महसूस होती जब कोई विदेशी या विदेशी मीडिया उसके बारे में कुछ लिखते या बोलते हैं।
इकोनाॅमिस्ट का यह आरोप बिलकुल सही है कि राहुल गांधी राजनीति व सरकार में और अधिक सक्रिय व असरदार भूमिका निभा सकते थे लेकिन उन्होंने वे मौके गंवा दिये।
सबसे हैरानी की बात राहुल गांधी ने राजनीति व त्याग की परिभाषा को ही गलत रूप में जाना है। या तो उनको इन शब्दों का खुद भान नहीं है या उनके संकीर्ण व समाज से कटे खुदगर्ज सत्तालोलुपु सलाहकारों ने गलत रूप में समझा दिया कि प्रधानमंत्री का पद न लेना ही त्याग है। राहुल गांधी व सोनिया गांधी को एक बात समझ लेनी चाहिए कि त्याग का ढोंग कर देश को दिशाहीन व संवेदनहीन सत्तालोलुपुओं के हाथों रौंदवाना देश के हितों के साथ खिलवाड है त्याग नहीं। राहुल गांधी अगर इसको ही राजनीति कहते या समझते हैं तो उनको राजनीति से बाय बाय कर देना चाहिए। जब उन्होंने कांग्रेस में कदम रख दिया तो उनको यह भान होना चाहिए कि देश की जनता उनके द्वारा देश को नेतृत्व देने की आश लगाये हुए है। वे देखना चाहते हैं कि उनमें इंदिरा गांधी की तरह नैतृत्व क्षमता है या नहीं। देश की जनता ने वर्तमान सरकार को जो जनादेश दिया है वह किसी मनमोहन व जनार्जन दिवेदी आदि नेताओं को देश की सत्ता को अपने शिकंजे में रखने के लिए नहीं दिया अपितु सोनिया या राहुल गांधी को देश की सरकार का नेतृत्व करने के लिए ही दिया था। जनादेश की मूल भाव को नक्कार कर राहुल व सोनिया अपने विश्वस्थ मनमोहन सिंह को प्रधानमंत्री बना कर यह समझे की उन्होंने त्याग कर दिया है तो यह उनकी हिमालयी भूल होगी। खासकर जब उनके भरत बने मनमोहन सिंह के प्रधानमंत्रित्व में जो सरकार चल रही है उसके कुशासन से देश में चारों तरफ मंहगाई, भ्रष्टाचार व आतंकवाद से लोगों का जीना दूश्वार हो रखा है। आम गरीब आदमी खून के आंसू रो रहा है। परन्तु क्या मजाल है सोनिया व राहुल गांधी कांग्रेस व देश को पतन के गर्त में धकेल चूके मनमोहन सिंह को हटा कर देश की रक्षा करने के लिए देश का प्रधानमंत्री बनने की सुध तक नहीं है।
सोनिया व राहुल गांधी को समझ लेना चाहिए कि यह देश की जनता अगर प्रेम व अपनत्व से किसी को सर में बिठाने का सम्मान भी दे सकती है तो उसके द्वारा जनादेश का अपमान करने पर सत्ता शिखर से पटक कर बाहर भी करना जानती है। देश की जनता सब कुछ सह सकती है परन्तु देश के हितों को रौंदने वाले दुशासनों को एक पल के लिए सहन नहीं करती है।
इसलिए राहुल गांधी को चाहिए कि अब नौटंकी करने के बजाय देश को मनमोहनी कुशासन से मुक्ति दे कर तत्काल प्रधानमंत्री का दायित्व संभाले। उनके पास सत्तारूढ़ होने का पर्याप्त जनादेश है। अगर 2014 तक उन्होंने देश की जनता द्वारा दिये गये दुर्लभ मौके को अपने भ्रष्ट व दिशाहीन सलाहकारों की सलाह पर ठुकराने की आत्मघाती भूल कि तो आगामी 2014 में देश की जनता नया इतिहास लिखने के लिए विवश है। इसकी भविष्यवाणी में पूर्व में कर ही चूका हूॅ कि 2014 में देश की जनता कांग्रेस को उसके मनमोहनी कुशासन का दण्ड देते हुए जहां देश की सत्ता से बेदखल करेगी वहीं भाजपा को ईमानदारी से देश के हितों की राजनीति न करने के लिए सत्ता से दूर रखेगी। इसके साथ अपने पूर्व कृत्यों के अभिशाप के कारण मुलायम सिंह यादव भी प्रधानमंत्री नहीं बन पायेगा। जो भी प्रधानमंत्री बनेगा वह तीसरे मोर्चे का होगा।
हालांकि मनमोहन सिंह को प्रधानमंत्री बनाये रखने में सोनिया गांधी के आर्शीवाद से अधिक अमेरिका का समर्थन ज्यादा कारगार है। क्योंकि अमेरिका नहीं चाहता है कि नेहरू-इंदिरा परिवार का कोई भी व्यक्ति भारत  की बागडोर संभाले। गौरतलब है कि अमेरिका का नेहरू परिवार के साथ तालमेल हमेशा 26 का रहा। इसके साथ अमेरिका इस ग्रंथी से भी ग्रसित है कि नेहरू परिवार के शासन में भारत मजबूती से विकास की तरफ कूचाले भरता हुआ अमेरिका के लिए बड़ी चुनौती खडी करता है। इसलिए वह पूरी ताकत से जहां अटल के बाद अपने सबसे अनकुल प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को बनाये रखने का काम कर रहा है वहीं दूसरी तरफ नेहरू इंदिरा परिवार के नये वारिश सोनिया व  राहुल गांधी सहित किसी भी सदस्य को देश की बागडोर न सोंपी जाय इसके लिए अपने तमाम हथकण्डों का प्रयोग कर रहा है।  सोनिया व राहुल गांधी को चाहिए कि यह देश कभी अमेरिका के नाजायज दवाब के आगे सर नहीं झुकाता है। इसलिए उनको तुरंत देश की रक्षा के लिए मनमोहन को हटा कर देश की बागडोर संभाल देनी चाहिएं। ताकी देश की जनता जान व देख सके कि राहुल गांधी में कितनी कुब्बत है। राहुल सहृदय है परन्तु कांग्रेस के निहित स्वार्थ में डूबे जनता से कटे हुए नेताओं से घिरे हैं जो नहीं चाहते है कि राहुल गांधी प्रधानमंत्री बने और उनके निहित स्वार्थो की पूर्ति में बाधक बने। इसीलिए वे अभी अनकुल समय के रहते हुए बार बार राहुल गांधी को प्रधानमंत्री न बनने की आत्मघाती सलाह दे रहे हैं या उनको मनमोहन सिंह की सरकार में मंत्री बनने के लिए प्रेरित कर रहे है। ऐसे लोगों की दोनो सलाह देश व कांग्रेस के लिए निहायत ही आत्मघाती है। लेखक का यह आरोप भी सच है कि राहुल गांधी की दिक्कत उनकी सलाहकार मंडली भी है. विदेशों में तालीम हासिल किए इन लोगों का भारतीय राजनीति की सच्चाईयों से सामना नहीं हुआ है। परन्तु उप्र के चुनाव में कांग्रेस के आत्मघाती नेताओं की उप्र चुनाव में कांग्रेस की लुटिया डूबोने की हर संभव कोशिश के बाबजूद कांग्रेस अपना जनाधार बचाने मे ंसफल रही। कांग्रेसी मठाधीशों को भय था कि अगर राहुल गांधी उप्र में सफल हो गये तो उनकी दुकानदारी कांग्रेस में नहीं चलेगी। इसी आशंका से ग्रसित कांग्रेसी नेताओं ने उप्र में कांग्रेस हराने के लिए खुला भीतरीघात कराया।
इतना तो जरूर है कि उत्तराखण्ड में जनाधार व अलोकप्रिय सांसद विजय बहुगुणा को जिस प्रकार मुख्यमंत्री के पद पर कांग्रेस के मठाधीशों ने आसीन किया उससे एक बात साफ हो गयी कि सोनिया गांधी व राहुल गांधी दोनों में न तो अपने प्रदेशों की राजनीति की समझ है व नहीं वे कांग्रेस के हित में मजबूत निर्णय ही ले सकते है। उनके मुंहलगे भ्रष्ट व जनविरोधी सलाहकार उनकी इस अक्षमता व अज्ञानता का लाभ उठा कर कांग्रेस व देश के हितों को रोंदने वाले फेसले करा देते है। इन्हीं भ्रष्ट सलाहकारों की सलाह के कारण आंध्र प्रदेश में जगमोहन रेड्डी को मुख्यमंत्री बनाने के बजाय उसको जानबुझ कर कांग्रेस की जडों में मट्ठा डालने वाला नेता बना दिया। कांग्रेस संगठन व सरकार में ऐसे लोगों का शिकंजा है जिनको न तो जनता से कहीं दूर दूर तक सरोकार ही है व नहीं उनका अब तक का कहीं जन सरोकारों के लिए संघर्ष करने का इतिहास ही रहा। यही कारण है कि आज कांग्रेसी नेता व मंत्री आये दिन भ्रष्टाचार में लिप्त पाये जा रहे है। सोनिया गांधी व राहुल गांधी को इसका कोई भान है या जान बुझ कर अनजान बन रहे हैं इसको देख कर देश की जनता हैरान है। अगर आज भी सोनिया व राहुल को देश व कांग्रेस की सेवा करनी है तो मनमोहन सिंह को अविलम्ब हटा कर देश के जनादेश का सम्मान करते हुए देश का सकारात्मक नेतृत्व कर देश की सेवा करे। नहीं तो आने वाला समय उनको पश्चाताप के लिए भी समय नहीं देगा।


उठो निराश न हो महान भारत तुम्हारी राह निहार रहा है !

मेरे साथियों, भारतीय संस्कृति में सदैव असत् को त्याग कर सत को आत्मसात करने की प्रेरणा दी है। कुछ साथी आज के पथभ्रष्ट युवाओं की तरफ देख कर निराश हैं अगर आप भारत के उडि़सा में 16 हजारे से अधिक गरीब आदिवासी बच्चों को पहली से स्नात्तकोत्तर का आवासीय सुविधा सहित शिक्षा देने वाले विश्व में भारत का नाम रोशन करने वाले उडि़सा के भुवनेश्वर में कलिंगा इंस्टीट्यूट के प्रमुख अच्युत सांमत व बिहार में गरीब प्रतिभाशाली विद्यार्थियों को आईआईटी आदि महत्वपूर्ण परीक्षा में उत्तीर्ण करने की कौचिंग देने वाले सुपर-30 के प्रणेता आनन्द, भारत में दुग्ध क्रांति(श्वेत क्रांति ) के जनक डा वर्गीज कुरियन, देश के पूर्व राष्ट्रपति डा अब्दुल कलाम, मेट्रो मेन इंजीनियर श्रीधरन, अण्णा हजारे व स्वामी रामदेव जैसे हजारों महापुरूषों की तरफ देखें तो आपको भ्रष्टाचार, अशिक्षा, कुशासन व हिंसा से त्रस्त भारत में आशा की नई उत्साहपूर्ण किरण से आपका मर्माहित हृदय अवश्य प्रसन्नता के हिलौरे लेगा। भगवान श्री कृष्ण व राम की यह जन्म व कर्म स्थली भारत अनादिकाल से पूरी सृष्टि को जीवन का अमृततुल्य संदेश देती रही है। भारत कोई अमेरिका या यूरोप जैसा कुछ शताब्दियों का इतिहास युक्त पश्चिमी देश नहीं अपितु हजारों  हजार साल से मानव जीवन को नई दिशा देने वाला पावन देश है। यहां पर रामकृष्ण परम हंस के परम शिष्य स्वामी विवेकानन्द ही नहीं उससे पहले व बाद में हजारों हजार ऐसे युगान्तकारी सत पुरूष हुए जिन्होंने पूरी सृष्टि में अपने युगान्तकारी वचनों से सतमार्ग की राह दिखाई। इसलिए वर्तमान हालत को देख कर आपका निराश होना स्वाभाविक है। परन्तु भारत युगों से हजारों हजार सपूतों से दिशाभ्रमित राष्ट्र व संसार को सही मार्ग दिखाने के लिए कभी गुरू गौरखनाथ, शंकराचार्य, बाल्मीकि, सुरदास, कबीर, गुरू नानक, रैदास, गुरू गोविन्दसिंह, रामकृष्ण परमंहंस, चैतन्य महाप्रभु, संत ज्ञानेश्वर, रामतीर्थ व विवेकानन्द जैसे असंख्य दिव्य महापुरूष जन्म ले कर मानवता का कल्याण करते है। इसलिए भगवान श्री कृष्ण के परम वचनों पर विश्वास करते हुए आप निश्चिंत हो जायें कि भारत का कोई कुशासक या पथभ्रष्ट लोग नुकसान पंहुचा पायेंगे। इस देश में गंगा की तरह इस देश में उत्पन्न विकारों को दूर करने के लिए निरंतर महापुरूषों का जन्म होता है। इसलिए मोदी द्वारा स्वामी विवेकानन्द को प्रेरणा पूंज मान कर राजनीति करना बहुत ही अनुकरणीय है। शास्त्रों में भी कहा गया है कि केशव केशव कूकिये, मत कूकिये अषाड, रात दिवस के कूकते कबहूं लगेगी आश’। इसलिए प्रेरणा हमेशा अच्छे लोगों व घटनाओं से लेनी चाहिए। सभी जड़ चेतन में भगवान श्रीकृष्ण का स्वरूप मान कर सबके कल्याण में रत रहना ही सबसे बडी देशभक्ति, प्रभुभक्ति व आत्मभक्ति है। इसी से जग में कल्याण होगा। जय श्री कृष्ण।


सैन्य ताकत से नहीं धूस की ताकत से भारत को मात देने की चीनी रणनीति 

सैन्य वायु सेना के पायलटों को नकद भैंट देने के बाद वायु सेना बैंड को भी नकद भेंट देना चाहते थे चीनी रक्षा मंत्री

नई दिल्ली (प्याउ)। लगता है चीन ने अपनी सामरिक नीति में आमू
ल बदलाव करते हुए भारत को गोली बारूद युक्त सैन्य ताकत के दम पर मात देने के बजाय अब भ्रष्टाचार के रिश्वत हथियार से मात देने का मन बना लिया है। अभी इस पखवाडे भारत के दोरे पर आये चीन के रक्षा मंत्री जनरल लियांग गुआंगली द्वारा भारतीय वायुसेना के दो पायलटों को एक लाख रुपए की असामान्य सौगात देने के बाद चीन के रक्षा मंत्री जनरल लियांग गुआंगली ने रक्षा मंत्री एके एंटनी द्वारा दी गई दावत पर वायुसेना के बैंड को ऐसी ही भेंट देने की असफल कोशिश को देश के जानकार इसी दिशा में ले रहे है। गौरतलब है कि मुंबई से दिल्ली आते हुए चीनी रक्षा मंत्री ने वायुसेना के दो पायलटों को दो लिफाफे दिए थे जिसमें 50-50 हजार रुपए थे। लिफाफों में असामान्य नकद भेंट पाकर दोनों पायलटों ने अपने वरिष्ठोें को इसकी सूचना दी और यह धनराशि कोषागार में जमा कर दी। इसके अलावा एक अन्य घटना में 4 सितम्बर की शाम को जनरल लियांग रक्षा मंत्री एके एंटनी द्वारा दी गई दावत पर इंडिया गेट के समीप वायुसेना के आकाश ऑफिसर मेस में थे। उस दौरान वायुसेना का बैंड हिंदी और चीनी गाने बजा रहा थे जो चीनी पक्ष को खूब भाया। जब दावत पूरी हो गई तब बैंड के प्रभारी को तैयार रहने को कहा गया क्योंकि चीन के रक्षा मंत्री उसे सराहना के तौर पर कुछ भेंट देना चाहते थे। भारतीय पक्ष को भान हो गया कि यह भेंट ही नकद होगी और उसने यह कहते हुए चीनी पक्ष को ऐसा नहीं करने के लिए मना लिया कि ऐसी कोई परिपाटी नहीं है। इन दोनों छोटी सी घटनाओं का गहरायी से समीक्षा की जाय तो साफ हो गया कि चीन को इस बात का अहसास हो गया कि भारत भ्रष्टाचार से पूरी तरह से जरजर हो गया है। यहां के हर संस्थान भ्रष्टाचार में लिप्त है। इसलिए भारत को मात देने के लिए सामरिक ताकत का प्रयोग करने के बजाय रिश्वत रूपि महाविनाशक अस्त्र का प्रयोग किया जाय।
1962 में अपनी विशाल सैन्य ताकत के बल पर भारत के हजारों वर्ग किमी भू भाग पर कब्जा जमाने वाला चीन भारत को अपने अस्तित्व के लिए अमेरिका के बाद सबसे बडा खतरा मानता है। अफगानिस्तान, इराक व लीबिया प्रकरण के बाद जिस प्रकार से पाकिस्तान को अमेरिका किसी आस्तीन के साफ से कम नहीं मान रहा है और उस पर भी नकेल कसने के लिए निरंतर अपना शिंकजा कसते जा रहा है। अमेरिका इस विश्व में आतंकवाद के बाद आये परिवर्तन में पाकिस्तान के बजाय अब तक अपना विरोधी रहा भारत को अपना सबसे मजबूत सामरिक सहयोगी की तौर पर अजमाने का मन बना चूका है। अमेरिका की सामरिक रणनीति में विश्व स्तर पर आये इस बदलाव में अमेरिका को जहां सबसे बड़ा खतरा इस्लामिक आतंकवाद नजर आ रहा है वहीं दूसरी तरफ चीन की बढ़ती हुई ताकत ने न केवल अमेरिका की आर्थिक ताकत पर ग्रहण लगा दिया अपितु चीन ने अमेरिका की सामरिक ताकत को भी एक प्रकार से खुली चुनौती दे दी है। इसी को भांपते हुए अमेरिका ने चीन के नम्बर वन दूश्मन रहे भारत को अपने पाले में रखने की रणनीति पर युद्धस्तर पर कार्य किया जा रहा है। इसके तहत पाकिस्तान की तर्ज पर अमेरिका ने भारत की राजनैतिक से लेकर आर्थिक सहित पूरी व्यवस्था पर अपना कब्जा धीरे धीरे बना दिया है। अमेरिकी रणनीति के जानकारों के अनुसार विगत 15 सालों से अमेरिका ने अपना शिकंजा भारत में पूरी तरह से कस लिया है। आज स्थिति यह है कि वह भारत की तमाम संस्थानों को अपने हितों के अनुसार प्रभावित करने की स्थिति में है। सरकारें भाजपा की हो या कांग्रेस की या अन्य दल की यहां पर विगत 15 सालों से वही हो रहा है जो अमेरिका चाहता है। भारतीय हुकमरानों की स्थिति इतनी शर्मनाक हो गयी कि वे देश की सर्वोच्च संस्था संसद , मुम्बई, कारगिल, गंधार व कश्मीर आदि पर अमेरिका के शह पर हमला करने वाले पाक को सबक सिखाने की हिम्मत तक नहीं कर पाते है। यही नहीं अमेरिका बार बार भारतीयों को अपने यहां कपडे उतार कर भी अपमानित करता है परन्तु क्या मजाल की अमेरिका के मोहपाश में देश के हितों को दाव पर लगाने वाले भारतीय हुक्मरानों का जमीदोज हुआ जमीर जाग भी जाय। यहां स्थिति बद से बदतर है । अमेरिका अपने हितो ं की पूर्ति के लिए भारत की सरकार से जहां परमाणु समझोता कराता है तो अधिकांश दल अपने आपसी विरोध को भूल कर इस के पक्ष में खडे होते है। कश्मीर से लेकर अधिकांश प्रकरणों पर यह सरकार भारत का पक्ष नहीं अमेरिका के हितो ं की पोषक अधिक नजर आती है। सबसे हैरानी की बात यह है कि जहां अमेरिकी हुक्मरान अपने देश की आर्थिक स्थिति को उबारने के लिए स्वदेशी वस्तुओं व उत्पादों को वरियता दे रही है और विदेशों में काम कराने वाले संस्थानों पर नकेल कस रही है। वही भारत की मनमोहनी सरकार अमेरिका के हितों के लिए अमेरिकी कम्पनियों का जाल भारत में फेलाने में भारतीयों के हितों का गला घोंटने से भी बाज नहीं आ रही है। यहां पर भ्रष्टाचार से देश की पूरी व्यवस्था जरजर हो गयी है। इसी को भांप कर शायद चीन ने भारत को सामरिक ताकत के बल पर नहीं अपितु रिश्वत रूपि भ्रष्टाचार के महास्त्र से मात देने का मन बना लिया