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Thursday, March 31, 2011

लोटी ऐजा मेरो दगड्या अपण पहाड


लोटी ऐजा मेरो दगड्या अपण पहाड
हिंसोली किलमोड़ी, यख काफोल भमोरा,
खाणू ऐजा मेरा दगड्या हमारा पहाड़।
ठण्ड मिठो पाणी यख, देखो बुरांशी फूल
कफूवा बासिंदो यख, प्यारी घुघुती घुर।।
हरयां भरयां बोण यख प्योंली सिलपारी
हिंवाली कांठी देखो हरियां भरयां बाज।।
क्यों डबकण्यू मेरो दगडया निरदयी परदेश
लोटी ऐजा  लोटी तु अब अपण मुलुका।।
स्वर्ग सी मेरी देवभूमि  धे लगाणी त्येतें
लोटी ऐजा मेरों बेटा तु भूलये धरती।।
दो दिन की जिन्दगी माॅं यति न भटकी।
 पैंसों का बाना न भूली ब्वे बुबें की धरती।।
परदेशमां  सब होंदा द्वी पैंसों का यार
यख तेरा ईष्ट मित्र यखी च माटी  धार।
लोटी ऐजा मेरो दगड्या अपण पहाड़।।
(ंदेवसिंह रावत 1 अप्रेल 2011)

उत्तराखण्डी शेर अब्बलसिंह बिष्ट नहीं रहे


उत्तराखण्डी शेर अब्बलसिंह बिष्ट नहीं रहे
उत्तराखण्ड समाज के अग्रणी समाजसेवी अब्बलसिंह बिष्ट का बुधवार को दिल्ली के अपोला अस्पताल में निधन हो गया। दिवंगत श्री बिष्ट का अंतिम संस्कार हरि हर की विश्व विख्यात पावन नगरी हरिद्वार स्थित पतित पावनी गंगा के पावन तट पर किया गया। राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली के गाजियाबाद-प्रताप बिहार क्षेत्र में विगत बीस सालों से निवास कर रहे श्री बिष्ट जनपद रूद्रप्रयाग के दश्जुला काण्डे के ईशाला गांव के मूल निवासी थे। भासीसुबल से स्वेच्छिक सेवानिवृत लेने के बाद श्री बिष्ट दिल्ली कनाट प्लेस स्थित विश्वविख्यात सिटी बैंक में कार्यरत थे। वे लम्बे समय तक प्रताप बिहार उत्तराखण्डी रामलीला समिति के प्रमुख रहने के साथ-साथ उत्तराखण्डी आत्मसम्मान के प्रतीक भी रहे। वे लगातार उत्तराखण्डियों को राजनीतिक वजूद बनाने के लिए प्रेरित करते रहे। उन्होंने दो बार गाजियाबाद के प्रताप बिहार क्षेत्र से पार्षद के चुनाव में निर्दलीय लड़ कर भाजपा व कांग्रेस सहित तमाम दलों के पसीने छुटा दिया था। भले ही तिकड़म से राजनैतिक दल चुनावी मशनरी का दुरप्रयोग करके विजयी रहे परन्तु इस प्रकरण से श्री बिष्ट ने  राजनैतिक दलों को जहां उत्तराखण्डी समाज की उपेक्षा करने के मद को चूर कर दिया साथ में ही श्री बिष्ट ने उत्तराखण्डियों में राजनैतिक वजूद हासिल करने के लिए प्रेरित भी किया। श्री बिष्ट की अध्यक्षता में व शंकराचार्य माधवाश्रम के आशीर्वाद से तथा महामंत्री शिव प्रसाद पुरोहित के सहयोग से रूद्रप्रयाग के विख्यात कोटेश्वर महादेव में अष्टादश पुराण का भव्य  आयोजन भी किया गया। इसके साथ  श्री बिष्ट अपने क्षेत्र के विकास के लिए सदा समर्पित रहते थे। यही नहीं उन्होंने रूद्र प्रयाग में अपने सहयोगियों के साथ आफसेट प्रिंटिंग प्रेस भी लगायी थी। स्वाभिमानी श्री बिष्ट जी अपने व समाज के सम्मान के लिए मरमिटने के लिए तैयार रहते थे।  स्पष्टवादी, निष्पक्ष के श्री बिष्ट जी  बोलने से अधिक स्वयं काम करने में विश्वास रखते थे, परन्तु वे गलत बात किसी की भी नहीं सहन करते थे। उन्होंने अपने सामथ्र्य से अपने पंहुच से सैकडों बेरोजगारों को सिटी बैंक सहित अन्य सेवाओं में लगाया। उनके शोकाकुल परिवार में उनकी धर्मपत्नी भावना बिष्ट, उनकी दो प्रतिभाशाली पुत्रियां व पुत्र है। उनके निधन पर दिल्ली व उत्तराखण्डी समाज के अग्रणी समाजसेवियों ने गहरा शोक प्रकट किया। नोबल पुरस्कार से सम्मानित संयुक्त राष्ट्र की संस्था के अन्तरराष्ट्रीय वैज्ञानिक डा एच एस कपर्वान, प्यारा उत्तराखण्ड के सम्पादक देवसिंह रावत, शंकराचार्य माधवाश्रम जी धर्मार्थ चिकित्सा ट्रस्ट के महामंत्री देवसिंह रावत, उत्तराखण्ड पत्रकार परिषद के पूर्व महामंत्री दाताराम चमोली, युवा कांग्रेस के महाराष्ट्र समन्वयक राजपाल बिष्ट, उद्यमी राजेन्द्र जगवान सहित अनैक समाजसेवियों ने उनके निधन पर गहरा शोक प्रकट करते हुए देहरादून निवास कर रहे उनके परिजनों को अपनी हार्दिक संवेदना प्रकट की।

शांतिपूर्ण आंदोलनों की नहीं उग्र आंदोलनों की ही सुनती है सरकारे


शांतिपूर्ण आंदोलनों की नहीं उग्र आंदोलनों की ही सुनती है सरकारे
कूच बिहार व तेलांगना जेसे शांतिप्रिय आंदोलनों की शर्मनाक उपेक्षा से उभरे उग्र आंदोलन


भले ही सर्वोच्च न्यायालय देश में हो रहे उग्र आंदोलनों पर गहरी चिंता प्रकट कर सरकार से इनको रोकने के लिए कह रही हो। परन्तु इसके मूल में एक ही कारण है कि देश के हुक्मरान चाहे सरकारें किसी भी दल की हों वे शांतिपूर्ण आंदोलनों की निरंतर उपेक्षा कर रही हे। शांतिपूर्ण आंदोलनों की कैसे उपेक्षा होती है इसके जीते जागते उदाहरण तेलांगना राज्य गठन व कूच बिहार राज्य गठन जैसे आंदोलन है।  इसे देश में शांतिपूर्ण आंदोलनों की क्या दशा होती है या सरकारों का इस पर केसे अलौकतांत्रिक व गैरजिम्मेदाराना रवैया रहता है, इसके लिए कहीं दूर जाने की जरूरत नहीं, यह सर्वोच्च न्न्यायालय से एक किमी दूरी पर व संसद की चैखट पर स्थित राष्ट्रीय धरना स्थल जंतर मंतर पर आ कर देख सकते है। यहां पर देश के तमाम आंदोलनकारी जब अपने क्षेत्र व स्थानीय राज्य सरकार से न्याय न मिलने के बाद यहां पर देश के हुक्मरानों से न्याय की आश ले कर यहां पर आते हैं तो उनको यहां आ कर पता चलता है कि इस देश में गांधीवादी आंदोलनों को कोई जगह ही नहीं है। जिस देश की आजादी के लिए गांधी जी के नेतृत्व में अनैकों आमरण अनशन व निरंतर धरना प्रदर्शनों के लिए कोई जगह ही नहीं है। राष्ट्रीय धरना स्थल पर आकर जब देश के न्याय व सामाजिक न्याय के फरियादियों को सांय पांच बजे जब उनको वहां से पुलसिया धमकियो व जलालत के बाद अपमानित करके खदेड़ दिया जाता हैं। वहीं दूसरी तरफ सरकारें हिंसक आंदोलनकारियों के आगे दण्डवत नमन करती रहती है। चाहे उग्र आंदोलन कश्मीर का हो या पूर्वोतर का। देश में  आक्रमक आंदोलनकारियों के आगे सरकार मनोगुहार करती नजर आती है। यहां पर गुजर व जाट आंदोलन इसके जीते जागते सबूत है। किस तरह से देश की राजधानी से लेकर देश की प्राणवायु समझी जाने वाली रेलमार्ग उजाडे व अवरोध किये जाते है। किस प्रकार से संसद पर हमला करने वालों को सरकारें किन्तु परन्तु के नाम पर संरक्षण दे रही है। इन सबसे लोगों का विश्वास शांतिपूर्ण आंदोलनों से उठ जाता हैं तथा लोगों में यह धारणा बन जाती है कि यहां पर उग्र आंदोलन की ही आवाज सरकारें सुनती हे। कम से कम  राष्ट्रीय धरना स्थल पर हजारों की संख्या में शांतिपूर्ण आंदोलन कर रहे कूच बिहार के शांतिप्रिय आंदोलनकारियों को देख कर तो यही लगता। इस आंदोलन की उपेक्षा सरकारें किस तरह से कर रही है। सरकार ही नहीं देश की तथाकथित मीडिया  की नजरों में ऐसे शांतिप्रिय आंदोलनों की कोई इज्जत नहीं है। देश के प्रमुख अखबारों ने सोमवार 28 मार्च को हजारों में कूच बिहार के गणवेश धारियों के मौन जलूस-धरना उपेक्षा को एक पंक्ति का स्थान न दे कर कम से कम यही साबित कर दिया है कि सरकार ही नहीं देश की मीडिया भी आज शांतिप्रिय आंदोलनकारियों की उपेक्षा करती हे। इसी कारण देश में हिंसक व उग्र आंदोलन करने के लिए लोग विवश हो जाते है। आंदोलनों के दौरान रेल और सड़क यातायात बाधित करने और सार्वजनिक संपत्ति नष्ट करने पर 28 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने गहरी चिंता और नाराजगी जताई। इतना ही नहीं, कोर्ट ने हरियाणा सरकार से पूछा है कि रेलवे को हुए नुकसान की भरपाई क्यों न उससे कराई जाए? न्यायाधीश जी. एस. सिंघवी व ए.के. गांगुली की पीठ ने सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाने और रेलवे ट्रैक बाधित करने के मामले में सख्त टिप्पणियां कीं। ज्ञात हो कि हरियाणा में मिर्चपुर कांड के आरोपियों के खिलाफ कार्यवाही के विरोध में उच्च जाति के लोगों ने आंदोलन किया था जिसमें 11 दिनों तक रेल ट्रैक बाधित रहा था। इससे रेलवे को करीब 34 करोड़ का नुकसान हुआ था। पीठ इस आंदोलन से हुए नुकसान और सरकार की जवाबदेही के मुद्दे पर विचार कर रही है।
पीठ ने कहा कि ऐसी परिस्थिति में कानून-व्यवस्था बनाए रखने की जिम्मेदारी राज्य सरकारों की है और इसमें विफल रहने पर उनकी जवाबदेही बनती है। कोर्ट ने कहा कि इस तरह सार्वजनिक संपत्ति नष्ट नहीं की जा सकती और न ट्रेनें रोकी जा सकती हैं। जो ऐसा करते हैं उनके खिलाफ कानूनी कार्रवाई होनी चाहिए क्योंकि वे अराजकता फैला रहे हैं। कोर्ट ने कहा कि अधिकार की बात तो दूसरे नंबर पर आती है पहले नंबर पर तो कर्तव्य आता है।
जब कोर्ट ने हरियाणा सरकार से रेलवे को हुए नुकसान की भरपाई करने को कहा तो राज्य सरकार की दलील थी कि यह तो प्रदर्शनकारियों से वसूला जाना चाहिए। पीठ ने कहा कि प्रदर्शनकारियों को कानून के समक्ष लाकर उन पर मामला चलाना राज्य की जिम्मेदारी है। या तो राज्य प्रदर्शन कारियों से पैसा वसूले या खुद कुछ भरपाई करे। राज्य सरकार ने फिलहाल इस मुद्दे पर जवाब देने के लिए कोर्ट से समय मांग लिया है।
इस समस्या का स्थाई निदान यही है कि यहां सरकार का कोई अपना उतरदायित्व ही समझ में नहीं आ रहा है। देश के लोगों को शांतिप्रिय आंदोलनकारियों को तो 12 घण्टे में राष्ट्रीय धरना स्थल जंतर मंतर से खदेड़ दिया जाता परन्तु उग्रआंदोलनकारियों  के प्रति सरकारें व पुलिस प्रशासन कैसे हाथ पर हाथ बैठी रहती है यह सरकार पर सर्वोच्च न्यायालय की टिप्पणी से ही उजागर हो जाती है। इसी जंतर मंतर पर जब जाट आंदोलनकारी आये तो उनके लिए पुलिस प्रशासन ने सांय 5 बजे के बाद भी आंदोलन जारी रखने की इजाजत दे दी परन्तु अन्य शांतिप्रिय आंदोलनकारियों को यहां से खदेड़ दिया जाता हे। देश की सुरक्षा के लिए सीमान्त प्रदेश उत्तराखण्ड के बागेश्वर में टनकपुर से रेल लाइनें बिछाने की मांग करने वाले सैकड़ों किमी दूर से आने वाले चार दर्जन से अधिक आंदोलनकारियों को तो पुलिस ने वहां से 12 घंटे बाद खदेड़ने के लिए विवश कर दिया ।ये आंदोलनकारी मजबूरी में हजारों रूपये खर्च करके रात को पहाड़ गंज के होटलों में रहे। यह देश में लोकतंत्र की हालत है। आम जनता के लिए इस देश में सुविधायें तो रही दूर फरियाद करने की इजाजत तक सम्मानजनक तक नहीं है। वहीं ंउग्र आंदोनलनकारियों के आगे सरकारें दण्डवत हो जाती है। इसी से देश में उग्र आंदोलन फल फूल रहे है।

Tuesday, March 29, 2011

ताउम्र वनवास भोग रहे हैं उत्तराखण्डी


ताउम्र वनवास भोग रहे हैं उत्तराखण्डी

by Pyara Uttrakhand on Sunday, 13 February 2011 at 22:35
ताउम्र वनवास भोग रहे हैं उत्तराखण्डी
15 से 21 जुलाई 2010 वाले प्यारा उत्तराखण्ड समाचार पत्र में प्रकाशित
भगवान राम को तो केवल 14 साल का वनवास भोगना पड़ा था। परन्तु उत्तराखण्ड के 60 लाख सपूतों को यहां के सत्तासीन कैकईयों के कारण पीढ़ी दर पीढ़ी का वनवास झेलना पड़ रहा है। अंग्रेजी शासनकाल के दौरान से यहां के लोग अपने घर परिजनों के खुशहाली के लिए दूर प्रदेश में रोजगार की तलाश में निकले। देश आजाद हुआ परन्तु शासकों ने यहां के विकास पर ध्यान न देने के कारण यहां से लोगों का पलायन रोजी रोटी व अच्छे जीवन की तलाश के कारण होता रहा। इसी विकास के लिए लोगों ने ऐतिहासिक संघर्ष करके व अनैकों शहादतें दे कर पृथक राज्य भी बनवाया। परन्तु यहां के शासकों की मानसिकता पर रत्ती भर का अंतर नहीं आया। उत्तराखण्ड का जी भर कर दौहन करना यहां के नौकरशाही व राजनेताओं ने अपना प्रथम अध्किार समझा। मेरा मानना रहा है कि पलायन प्रतिभा का हो कोई बात नहीं, परन्तु पेट का पलायन बहुत शर्मनाक है। पेट के पलायन को रोकने के लिए ही पृथक राज्य का गठन किया गया था। प्रदेश का समग्र विकास हो व प्रदेश का स्वाभिमान जीवंत रहे। परन्तु स्थिति आज राज्य गठन के दस साल बाद भी ऐसी शर्मनाक है जिसको देख कर गहरा दुख होता है। मेरे इन जख्मों को गत सप्ताह धेनी की शादी प्रकण ने पिफर हवा दी।  
गत पखवाड़े भारतीय क्रिकेट टीम के कप्तान महेन्द्रसिंह धेनी की शादी देहरादून में सम्पन्न हुई। इस शादी पर देश विदेश के समाचार जगत में बहुत कुछ लिखा जा चूका है। मुझे इस शादी में देश 
विदेश में रहने वाले 60 लाख से अध्कि ताउम्र का वनवास का अभिशाप झेल रहे उत्तराखण्डियों की एक ऐसी टीस दिखाई दी जो अपनी जड़ों को खोजनें व उससे जुड़ने के लिए तड़पफ रही है। 
  विश्वविख्यात क्रिकेटर महेन्द्रसिंह धेनी की ससुराल भले ही देश विदेश के आम लोग देहरादून या कोलकत्ता के रूप में जान रहे हैं परन्तु बहुत कम लोग जानते हैं कि महेन्द्रसिंह धेनी का पैतृक गांव जिस प्रकार से अल्मोड़ा के जैंती तहसील के ल्वाली गांव हैं, उसी प्रकार उनकी नवविवाहिता पत्नी साक्षी रावत का मूल गांव देहरादून या कोलकोता न हो कर पौड़ी जनपद का बछेलीगांव पौखाल हैं। जिस प्रकार धेनी के पिता जी रोजगार की तलाश में झारखण्ड प्रदेश के रांची में बस गये। वैसे ही साक्षी के दादा जी मनोहर सिंह रावत भी देहरादून में कई दशक पहले बस गये। वर्तमान में जहां धेनी के माता पिता रांची में ही निवास करते हैं। वैसे ही साक्षी के माता पिता वर्तमान में कोलकोता में निवास करते हैं। परन्तु उनके भाई सहित परिजन देहरादून के निम्मी रोड़ स्थित अपने आवास में ही निवास करते हे। इससे पहले साक्षी के पिताजी भी धेनी के पिताजी की तरह रांची में ही सेवारत थे। वे वहां से स्वैच्छिक सेवानिवृत लेकर जहां देहरादून चले गये थे। कुछ समय देहरादून में रहने के बाद उन्होंने  कोलकोता की एक चाय बगान में डायरेक्टर पर आसीन हो कर कोलकोता में ही बस गये। परन्तु धेनी व साक्षी की बचपन की दोस्ती जब प्रेम में बदल गयी तो धेनी के मांगलिक होने के बाबजूद दोनों ने शादी करने का निश्चय किया तो दोनों के परिवार ने अपने मूल प्रदेश उत्तराखण्ड में ही शादी करने का निश्चय करके देश विदेश में बसने वाले सवा करोड़ उत्तराखण्डियों का दिल ही जीत लिया। धेनी की शादी की सराहना न केवल आम उत्तराखण्डी ही कर रहे हैं वरन देश विदेश में उनके चाहने वाले लाखों लोग भी मुक्त कंठो से उनकी सराहना कर रहे है। अब धेनी व साक्षी के विवाह से प्रेरणा लेकर देश विदेश में बसे लाख से अध्कि उत्तराखण्डी ध्न कुवैर क्या अपने बच्चों की शादी भी उत्तराखण्ड में करेंगे। यह प्रश्न आज सभी ध्न कुवैरों के जेहन पर रह रह कर उठ कर उनको अपनी जड़ों से जुड़ने के लिए धेनी की तरह उद्देलित कर रहा है। भले ही धेनी ने अपने आप को एक क्रिकेटर के तौर पर उत्तराखण्डी नहीं अपितु झारखण्डी बताते रहे परन्तु निर्णायक समय में जब उनके जीवन का सबसे अहम मोड़ शादी का आया तो उन्होंने बिना कुछ कहे सबकुछ बयान कर दिया कि धेनी भले ही एक क्रिकेटर के तोर पर झारखण्डी हो पर, एक व्यक्ति के तोर वह उत्तराखण्डी ही है।  
गौरतलब है कि रोजगार या अन्य कारणों से उत्तराखण्ड के हर गांव से दर्जनों परिवार जनपद के ही कस्बों, देहरादून, नैनीताल, तराई व देश विदेश में बस गये है। दिल्ली जिसे लोग दूसरे उत्तराखण्ड के नाम से जानते हैं,  में ही 30 लाख उत्तराखण्डी निवास करते हैं। लखनऊ, मुम्बई ही नहीं देश का कोई ऐसा बड़ा शहर नहीं जहां लाखों की संख्या में उत्तराखण्डी निवास न करते हों। दिल्ली व उसके आसपास के शहर, गाजियाबाद, पफरीदाबाद व गुडगांव में ही नहीं जयपुर, गुजरात, महाराष्ट्र, कोलकोता, बंगलोर, चिन्नेई ही नहीं पूर्वोत्तर में भी बड़ी संख्या में उत्तराखण्डी बसे हैं।  अपने गांव को छोड़ कर देश विदेश में बसे इन उत्तराखण्डियों में से चंद ही ऐसे हैं जो भले ही अमेरिका या देश विदेश  में रहते हैं परन्तु अपने गांव से निरंतर उनका सम्पर्क बना रहता है। परन्तु अध्किांश ऐसे हैं जो अपनी जड़ों को भूल गये। ऐसे लोगों को ही धेनी व साक्षी ने उत्तराखण्ड में शादी कर एक सही रास्ता दिखाया। 
जहां दुनिया में एक तरपफ ग्लोबलाइजेशन की बयार बह रही है वहीं देश विदेश में अपनी जड़ों को भूल चुके उत्तराखण्डियों में बड़ी आश्चर्यजनक ढ़ग से अपनी जड़ों से जुडने की भावना उछाल मार रही है। यही कारण है कि अमेरिका हो या ब्रिट्रेन या खाड़ी देशों में  रहने वाले उत्तराखण्डी इसी दिशा में संगठित हो कर राजशाही की संकीर्णता की कैंचुली ‘गढ़वाल व कुमाऊं ’ के भेद को त्याग कर अपनी एक नई उत्तराखण्डी पहचान को आत्मसात कर अपनी सांस्कृतिक विरासत को अपने दिलों में संजोए रखने के लिए अपने अपने वनवासी शहरों में उत्तराखण्डी गीत-संगीत का आयोजन कर रहे है। 
यही नहीं बड़ी संख्या में उत्तराखण्डी गीत संगीत के कलाकार उत्तराखण्ड व दिल्ली सहित देश के महानगरों में ही नहीं अपितु देश विदेश के विख्यात शहरों में अपने रंगारंग कार्यक्रमों का आयोजन कर रहे है। राज्य गठन जनांदोलन यानी 1994 के बाद देश विदेश में रहने वाले 60 साल उत्तराखण्डियों में जो सांस्कृतिक जनजागरण व अपनी माठी के स्वाभिमान की ज्वार जागृत हुआ उसने न केवल दशकों से जमीदोज हुए पृथक राज्य उत्तराखण्ड को गठन के स्वप्न को साकार कर दिया अपितु पूरे देश का इतिहास ही बदल दिया। उत्तराखण्ड के साथ जहां झारखण्ड व छत्तीसगढ़ जैसे छोटे राज्यों का भी गठन किया गया।  यह ज्वार जो अपनी जड़ो से जुड़ने के साथ साथ वहां की बदहाली व अविकास को दूर करने के लिए आम प्रवासी उत्तराखण्डियों में उभरा था, उसकी महता को न तो इस नवगठित प्रदेश उत्तराखण्ड के सत्तासीन राजनेता समझ पाये व नहीं यहां के तथाकथित बु(िजीवी। यहां के राजनेताओं ने जहां दस ही साल में लोगों के सपनों के उत्तराखण्ड को जमीदोज करके इसे अपनी सत्तालोलुपता का प्यादा व अपने दिल्ली दरवार के आकाओं की चंगैजी संकीर्ण प्रवृतियों के दोहन का अड्डा बना दिया है। इससे भले उत्तराखण्ड में रहने वाला आम बदहाल व अपने स्वार्थों में लिप्त आदमी न समझ पा रहा हो परन्तु प्रदेश के विकास व स्वाभिमान के लिए अपना सर्वस्व निछावर करने वाले देश विदेश में पीढ़ी दर पीढ़ी वनवास का दंश झेल रहे  वनवासी उत्तराखण्डी भ्रष्ट राजनेताओं व नौकरशाहों के इस आत्मघाति तांडव से न केवल हैरान हैं अपितु आक्रोशित हैं। उनकी इस वेदना को सुनने के बाद जहां राजनेता प्रदेश को बदनाम करने का आरोप जड़ते हैं वहीं इस लूट में सांझे लूटेरे बने दलाल उन पर प्रवास के घडियाली आंसू बता कर अपमानित करते है। परन्तु आज वनवासी उत्तराखण्डी जाग गया है। अब वह स्वाभिमान के साथ इन सत्ता के आस्तीन के सांपों व भ्रष्ट नौकरशाहों को उत्तराखण्ड को और ज्यादा नहीं लूटने देगा। धेनी ने अपनी शादी में भले ही किस सोच के कारण प्रदेश की थोपी हुई राजधनी में शादी करने के बाद भी उस शादी में प्रदेश के मुख्यमंत्राी को नहीं बुलाया परन्तु मेरा मानना है कि यह धेनी ही नहीं आम उत्तराखण्डियों की नजरों में प्रदेश के राजनेताओं के लिए रह गये सम्मान का सूचक है। क्योंकि जनता के लिए इन्होंने एक रत्ती भर का काम नहीं किया। उल्टा प्रदेश के आन-मान व शान के साथ ही खिलवाड़ ही किया। इनकी चंगैजी मुखौटा उसी समय उजागर हो जायेगा जब इनकी सीबीआई या किसी स्वतंत्रा ऐजेन्सियों से जांच की जाय। हालांकि उत्तराखण्ड की जनता के नजरों में ये बेनकाब है। जनता इनका कल भी जानती है व आज भी। राज्य गठन के बाद प्रदेश में जहां भ्रष्टाचार बढ़ा व विकास की दोड़ में क्षेत्रा की निरंतर उपेक्षा होने के साथ-साथ शासन प्रशासन में जनहितों की घोर उपेक्षा हो रही है। इसे देखते हुए बदहाल जनता यह देख कर हैरान है कि बिना किसी उद्यम के यहां के हुक्मरान चंद सालों में अरबों सम्पति के मालिक कहां से बन गये। 
प्रदेश के वर्तमान मुख्यमंत्राी निशंक को भी यह बात समझ लेनी चाहिए कि पीढ़ी दर पीढ़ी का वनवास भोग रहे प्रवासी उत्तराखण्डी अपनी पैतृक भूमि उत्तराखण्ड की खुशहाली व विकास चाहते हैं। क्योंकि उनको प्रवास का दंश जो उनको वनवासी;शहरों में रहने के बाबजूद अपनी जड़ों से कटने का दंश रह रह कर सलाता रहता है।द्ध जीवन जीने के लिए मजबूर है। वे न तो अपने वनवासी जीवन को ही सही ढ़ग से जी पाते हैं व नहीं वे अपनी जन्मभूमि से विछोह के दंश से उबर पाते है। कहने का तात्पर्य वनवासी दोहरा जीवन जीने के लिए अभिशापित हैं। इसके बाबजूद वे अपनी संस्कृति व जन्मभूमि के विकास के लिए अपने आप को दिलो व जान से समर्पित रखते हैं। प्रदेश सरकार को चाहिए कि इन वनवासी लोगों  का सुझाव-अनुभव व सहयोग को प्रदेश के नवनिर्माण में बेझिझक लेना चाहिए।  पीढ़ी दर पीढ़ी वनवास की त्रासदी का दंश झेलने के लिए मजबूर 60 लाख उत्तराखण्डियों को  अपनी जड़ो से पिफर से जुड़ने का संदेश देने वाले विश्वविख्यात भारतीय क्रिकेट के कप्तान महेन्द्रसिंह धेनी व उनकी ध्र्मपत्नी बनी साक्षी रावत को प्यारा उत्तराखण्ड समाचार पत्रा की परिवार की तरपफ से हार्दिक बधई व लख-लख ध्न्यवाद। शेष श्रीकृष्ण कृपा। हरि ¬ तत्सत्। श्रीकृष्णाय् नमो। 

बाघ द्वारा मारे जाने पर 50 लाख रूपये दे सरकार



बाघ द्वारा मारे जाने पर 50 लाख रूपये दे सरकार
- बाघ मारने पर लोगों को हो आजीवन कारावास 
- बाघ द्वारा मारे गये लोगों की हत्या की जिम्मेदारी ले सरकार, 
- हिंसक बाघ के संरक्षित क्षेत्र के उच्चाधिकारी को भी हो आजीवन सजा
 आज देश के वातानुकुलित शहरों में रहने वाले रणनीतिकार इस बात पर जोर दे रहे हैं कि देश में बाघों को बचाया जाय। इसके लिए वे बाघ मारने पर कडे से कड़े यानी उम्र केद के सजा का प्रावधान करने पर जोर दे रहे है। वहीं पूरे हिमालयी राज्यों में इस बात से सदियों से हिमालयी पर्यावरण की रक्षा करने वाले लोग देश के हुक्मरानों से सवाल कर रहे हैं कि उनके घर व गांवों में घुस कर उनकी जानमाल का नुकसान करने वाले बाघ की सजा व इसकी जिम्मेदारी सरकार ग्रहण करे। आदमखोर बाघों द्वारा गांवों व खेतों तथा ग्रामीण जंगलों में घुसकर हमला करने के लिए जब तक सरकार जिम्मेदारी स्वीकार नहीं करती, तब तक यह बाघ संरक्षण कानून पूरी तरह से एक प्रकार से हिमालयी लोगों पर सरकारों द्वारा किया जाने वाला जुल्म से कम नहीं है। सरकार नियम बनाये कि अगर हिमालयी राज्यों में कोई बाघ किसी आदमी को मारता है तो केन्द्र व राज्य सरकार उसके लिए 50 लाख का क्षतिपूर्ति देने के साथ साथ उस बाघ के संरक्षक क्षेत्र के उच्चाधिकारी को भी आजीवन कारावास की सजा हो। इसके साथ पूरे हिमालयी क्षेत्र में आबादी के समीप पड़ने वाले तमाम टाइगर प्रोजेक्टों को बंद किया जाय या उनसे बाघों का बाहर न  निकल पाये इसका इंतजाम किया जाय। इसके साथ ही सरकार को हिमालयी राज्यों में कदम कदम पर बनाये जा रहे बांघों व बाघ संरक्षण पार्कों से हिमालयी राज्यों के निवासियों को उजाड़ने की नीतियों पर अविलम्ब अंकुश लगाना होगा। पर्यावरण का पाठ आज शहरों में वातानुकुलित यंत्रों से तबाह करने वालों को कम से कम सदियों से वन सहित विश्व पर्यावरण को बचाने वाले हिमालयी राज्यों के पर्यावरण रक्षकों को तो नहीं देना चाहिए। 
 हिमालयी राज्यों के लोग इस बात से भी आक्रोशित है कि शहरों में वातानुकुलित भवनों में बैठ कर हिमालयी राज्यों के लोगों के जीवन को पर्यावरण व वन जीव जन्तु अधिनियम की आड़ में  नरक बनाने वाले क्यों अपने अपने शहरों में बाघ संरक्षण पार्क बनाते हैं। सदियों से हिमालयी पर्यावरण के रक्षकों पर पर्यावरण व वन्य जीव संरक्षण के नाम पर यह जुर्म किसी भी सूरत में स्वीकार्य नहीं है।  एक तो सरकार ने इन हिमालयी लोगों के शांत संसार में अतिक्रमण करते हुए मनमाने ढ़ंग से जहां तहां बाघ संरक्षण पार्क, अभ्याहरण, राष्ट्रीय वनाक्षेत्रादि बना कर वन संरक्षकों के जीवन पर अतिक्रमण करके उनके हक हकूकों पर घोर अतिक्रमण ही कर दिया है। हिमालयी क्षेत्र के लोग वनो के साथ साथ वन्य जीवों की रक्षा सदियों से करते आये हैं। चिपको सहित विश्व स्तर के वन बचाओं व वन जीव बचाओं अभियान उनके द्वारा ही चलाये गये। परन्तु देश के हुक्मरानों ने विश्व पर्यावरण व वन्य जीवों को बचाने के लिए उनको पुरस्कृत करने के बजाय उनके जीवन पर ही नहीं अपितु उनके विकास पर भी पर्यावरण व वन्य जीव संरक्षण कानून से ग्रहण ही लगा दिया है। यही नहीं कुछ माह पहले रूद्रप्रयाग जनपद में यहां पर अंधाधुंध बन रहे बांधों के विरोध करने वाले पर्यावरण रक्षकों को सरकार ने बंद किया हुआ है। यह कैसी सरकार व कैसी उसकी नीतियां जो विश्व पर्यावरण की सीधे सीधे विरोधी है। 
इस सप्ताह सोमवार  29 मार्च को जहां देश की राजधानी के वातानुकुलित भव्य महलनुमा विज्ञान भवन में केन्द्रीय पर्यावरण  मंत्री जयराम रमेश के नेतृत्व में राष्ट्रीय स्तर की बाघों के संरक्षण पर आयोजित एक संगोष्ठी में  देश में बाघों की घटती हुई जनसंख्या पर चिंता जतायी जा रही थी, उसी समय 60 प्रतिशत से अधिक वनाक्षेत्र वाले देश के प्रमुख हिमालयी राज्य उत्तराखण्ड की विधानसभा में पूरा विपक्ष प्रदेश के सबसे बड़े जनपद पौड़ी के रिखणीखाल विकासखण्ड के धामधार गांव में बाघ प्रकरण पर जेल भेजे गये लोगों को निर्दोष बताते हुए विधानसभा से बहिर्गमन कर रहे थे। इन दोनों प्रकरणों के दौरान पूरे उत्तराखण्ड के लोग सरकार की तथाकथित बाघ संरक्षण नीति को ही जनविरोधी बताते हुए धामधार प्रकरण पर आक्रोशित थे। वहीं इस घटना के विरोध में रविवार से ही रिखणीखाल प्रखण्ड मुख्यालय में भारी संख्या में लोगों ने इस प्रकरण में तीन ग्रामीणों को जेल भेजने पर विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं।  इसके एक दिन बाद पौड़ी गढ़वाल जनपद के तहसील चैबट्टाखाल की ग्राम सभा गडरी के ताली गांव में गुलदार ने युवक पर हमला कर उसे घायल कर दिया। पर सरकार का शर्मनाक मौन क्यों?  सरकार को ऐसे दमनकारी कदमों को बंद करते हुए तत्काल जेल में भेजे गये लोगों को रिहा करके दोषी अधिकारियों को कड़ी सी कड़ी सजा देनी चाहिए।
इस सप्ताह दिल्ली के विज्ञान भवन में आयोजित संगोष्ठी में बताया गया कि दो दशक तक लगातार घटने के बाद आखिरकार भारत में बाघों की संख्या में जबरदस्त बढ़ोतरी हुई है। 2006 से 2010 के बीच 30 फीसदी बढ़ोतरी के साथ बाघों की संख्या अब 1706 हो गई है। कर्नाटक में सबसे ज्यादा 320 बाघ हैं। लेकिन, बाघों की संख्या में इस जबरदस्त बढ़ोतरी के पीछे इनकी गिनती में पश्चिम बंगाल के सुंदरवन और नक्सली प्रभाव वाले इलाकों को शामिल करना माना जा रहा है। सुंदरवन में 70 बाघ पाए गए जो 2006 की गिनती में शामिल नहीं थे। दो दशक पहले भारत में बाघों की संख्या तीन हजार से अधिक थी, जो 2006 में केवल 1411 रह गई थी। बाघों की तेजी से घटती संख्या से चिंतित सरकार ने उन्हें बचाने के लिए नए प्रयास शुरू किए। जाहिर है ये प्रयास रंग लाए और पिछले चार सालों में बाघों की संख्या में 295 की बढ़ोतरी हो गई। लेकिन, इस बढ़ोतरी को वन्यजीव विशेषज्ञ पर्याप्त नहीं मान रहे। दरअसल, बढ़ी संख्या में अकेले सुंदरवन के ही 70 बाघ शामिल हैं। इसके साथ ही इस बार की गिनती में उन नक्सल प्रभावित इलाकों को भी शामिल किया गया था जो पिछली बार छूट गए थे। गलती की गुंजाइश कम करने के लिए दिसंबर, 2009 से दिसंबर, 2010 तक पूरे एक साल तक बाघों की यह गिनती तीन चरणों में की गई। पहले चरण में लगभग पौने पांच लाख वन कर्मचारियों ने बाघों द्वारा छोड़े गए निशानों की पहचान की और उनके आधार पर उनकी संख्या का आंकलन किया।दूसरे चरण में सेटेलाइट कैमरों की मदद ली गई। तीसरे चरण में जंगल में लगे विशेष कैमरों की मदद से अलग-अलग बाघों की पहचान कर उनकी गिनती की गई। तीनों चरणों में मिले आंकड़ों के वैज्ञानिक विश्लेषण के बाद बाघों की संख्या का आंकलन किया गया।
देश के हुक्मरान किस प्रकार की गैरव्यवहारिक नियम कानून बनाते हैं यह धामधार प्रकरण से ही पूरी तरह बेनकाब हो गया है। इस गांव में  इस हिंसक बाघ का आतंक मचा हुआ था। इसने इस गांव के तीन लोगों पर हमला कर दिया था। असहाय लोगों ने वन विभाग व प्रशासन से लम्बे समय से गुहार लगायी थी।   एक बार पहले भी वन विभाग के लोगों ने इसको पकड़ कर वहीं छोड़ दिया। इसके बाद इस बाघ ने ग्रामीणों पर हमला किया। इस प्रकरण से सहमें ग्रामीणों की गुहार पर  पकडे गये इस बाघ को पकड़ कर सुरक्षित गांव से ले जाने के बजाय वन विभाग व सरकारी कर्मचारियों ने पीड़ित लोगों के जख्मों को कुदेरने व उनको भयभीत करने के लिए वही गांव में रख दिया। सरकारी इस दमन के खिलाफ न केवल पौड़ी अपितु पूरे उत्तराखण्ड के लोग आंदोलित है। इस काण्ड सें पूरे हिमालयी राज्यों  में सरकार की पर्वतीय जन विरोधी नीतियों को पूरी तरह से बेपर्दा ही कर दिया। अगर इस प्रकार की अव्यवहारिक नीतियों को संशोधन करके हिमालयी राज्यों के निवासियों के हितों को ध्यान में रखते हुए नीतियां नहीं बनायी गयी तो इससे पूरे विश्व का पर्यावरण व शांति खतरे में पड़ जायेगी। शेष श्री कृष्ण कृपा। हरि ओम तत्सत्। श्रीकृष्णाय नमो। 

Monday, March 28, 2011

फेस बुक के महानायक मार्क जकर्बर्ग को मिले नोबेल पुरस्कार


फेस बुक के जादूई चिराग से साकार होगा विश्व सरकार का सपना साकार 
फेस बुक के महानायक मार्क जकर्बर्ग को  मिले नोबेल पुरस्कार
निशुल्क ही फेस बुक से विश्व को कर दिया है मुठ्ठी में
छह साल में ही विश्व को  एक डोर में बांधने वाले महानायक मार्क जकर्बर्ग
आज जिस लोकशाही की रोशनी की एक किरण फेस बुक के माध्यम से पंहुचने से मिश्र से लेकर कई अरब देशों में तानाशाही सरकारें  रेत के महल की तरह ढह रही है। आज फेस बुक के माध्यम से आयी लोकशाही की रोशनी से ही लीबिया के लोग अपने देश में कर्नल गद्दाफी के चार दशक से अधिक सालों से स्थापित शासन को ढाह रहे हैं। अब वह दिन दूर नहीं है जब  फेस बुक के माध्यम से संसार भर के तमाम समझदार लोग ‘श्री  कृष्ण विश्व कल्याण भारती के बेनरतले मेरे दशकों से निराकार हुए विश्व सरकार के सपने को साकार करेगा। जहां न तो संयुक्त राष्ट्र संघ की तरह मात्र अमेरिका का बर्चस्व हो। यहां पर बिना रंगभेद, जाति, धर्म,लिंग व क्षेत्र भेद के सभी मनुष्यों के लिए कल्याणकारी एक विश्व सरकार की स्थापना हो। जहां शिक्षा, चिकित्सा सबको निशुल्क उपलब्ध करायी जायेगी। संसार के सभी नागरिकों को अपनी प्रतिभा के विकास का समान अवसर मिले। संसार के सभी संसाधन मानव कल्याण व विकास के लिए लगे न की विनाशकारी हथियारों के विकास व आपसी लडाई में लगे। इस कार्य में आज फेस बुक के माध्यम से पूरे संसार के लोग समझेगें और इसे अपनायेंगे। मुझे विश्वास है कि अब वह दिन दूर नहीं जब पूरे विश्व के लोग संसार की दो सो से अधिक सरकारों के झमेले से अपने को मुक्त कर  एक कल्याणकारी विश्व सरकार की स्थापना के लिए एकजूट होगे तथा इसे स्थापित करने में सफल होगें। आज इस बहस को विश्व सरकार के मंच से मैं पूरे विश्व जनसमुदाय के बीच में ले जा  रहा हॅू। इसके लिए सबसे बड़ा सहयोग फेस बुक का ही मिलेगा। इसी को कुरूक्षेत्र का मैदान बना कर इस सपने को साकार किया जायेगा।
विश्व शांति व लोकशाही तथा भाईचारे को बढ़ावा देने के लिए अगर किसी को विश्व शांति का नोबेल पुरस्कार दिया जाय तो वह किसी और को नहीं अपितु छह साल में ही विश्व को एक डोर में बांधने वाले महानायक मार्क जकर्बर्ग को देना चाहिए। जिन्होने सन्2004 में स्थापित अपनी फेस बुक से  विश्व के 500 लाख से अधिक लोगों को मेल मिलाप का विश्व का सबसे बड़ा संवाद मंच दिया। आज मिश्र से लेकर अरब देशों में लोकशाही का जो जनलहर चल रही है उसके पीछे सबसे बड़ा श्रेय फेस बुक को ही दिया जाना चाहिए। जिसके माध्यम से विश्व के तमाम लोगों में लोकशाही की रोशनी से रूबरू हुए। जिसके माध्यम से पूरे विश्व में अन्याय के खिलाफ लोग एकजूट हुए। जिसके माध्यम से पूरे विश्व के जागरूक लोगों को एकजूट करके संसार में विश्व सरकार स्थापित करने  का मेरा सपना पूरा हो सकता है। जो काम विश्व की कोई सरकारें नहीं कर सकी वह काम हार्बड विश्व विद्यालय के एक छात्र मार्क जकर्बर्ग ने कर दिखाया। आज इस छात्र ने विश्व के आधा अरब लोगों को अपनी फेसबुक से जोड़ कर विश्व को एक परिवार की तरह निशुल्क ही जोड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी। आप मंहगाई के मार में भले ही अपने जानकारों व मित्रों सहित तमाम असंख्य लोगों से दूरभाष या अन्य संसाधनों से सम्पर्क न कर पाये परन्तु आप फेस बुक  की सहायता से निशुल्क ही जोड़ कर आज विश्व में सबसे बड़ा सामाजिक संवाद संगठन बन गया है। अब आपको अपने मित्रों व जानकारों के लिए  संवाद करने के लिए दूरभाष, पत्र, मेलों व फेक्स इत्यादि के बजाय सुविधापूर्ण ढंग से एक ही साथ अनेकों लोगों से एक साथ बात कर सकते है।
यह इमेजिंग कि फेसबुक केवल 6 वर्षों के लिए आस पास किया गया के लिए कठिन है. यदि आप फेसबुक का हिस्सा नहीं रहे हैं आप जहां छुपा रहा है। यह सभी छात्रों के लिए एक मार्ग के रूप में हार्वर्ड से संपर्क में रहते शुरू किया है और जल्दी से आधुनिक युग के एक सांस्कृतिक प्रतीक बन जाते हैं. मार्र्क नबीमतइमतह, एक हार्वर्ड विश्वविद्यालय के छात्र, द्वारा 2004 में स्थापित यह समय नहीं है फेसबुक अन्य आइवी लीग के स्कूलों के अधिकांश के लिए प्रसार करने के लिए और हर और अमेरिका भर में महाविद्यालय, विश्वविद्यालय के लिए पर फिर के लिए किया.

2007 तक यह एक विश्वव्यापी घटना लाख से अधिक 300 डॉलर की बिक्री के साथ था. फेसबुक वर्तमान में सबसे बड़ी 500 से अधिक लाख सदस्यों के साथ इंटरनेट पर सामाजिक नेटवर्क है. यातायात कि फेसबुक दैनिक अक्सर प्राप्त की राशि गूगल खोज की है कि से बढ़कर है.

इसके बिजली की तेजी से उच्चारण के लिए मुख्य कारण यह है कि यह लोगों को आसानी से एक दूसरे को चैबीस घंटे के साथ एक दिन कनेक्ट करने के लिए अनुमति देता है. सदस्य पता लगा कि उनके दोस्तों के लिए क्या अपने दोस्तों दीवार को देखने के द्वारा कर रहे हो सकते हैं. फेसबुक दीवार एक जगह है जहाँ दोस्तों और परिवार के सदस्यों को कुछ भी पर वे पाते हैं उनके जीवन में दिलचस्प उनके विचारों, गतिविधियों, और दैनिक अद्यतन पोस्ट है. मित्रों टिप्पणियाँ, घड़ी वीडियो पोस्ट कर सकते हैं या पर प्रवेश कर और एक दूसरे की दीवारों को देखने से ही चित्रों को देखो.

कई व्यवसायों और क्लबों में भी बिजली का लाभ ले रहे हैं और थ्ंबमइववा में आसानी. वे जानकारी है कि विशेष घटनाओं, बिक्री, या बैठकों के बारे में अपने ग्राहकों या सदस्यों को सूचित पोस्ट. यह विज्ञापन और संचार की एक बहुत ही सस्ता और कारगर तरीका है कि अधिक से अधिक लोकप्रिय हर साल हो रही है.

थ्ंबमइववा की लोकप्रियता के लिए एक अन्य पहलू यह है कि यह मुफ्त है. थ्ंबमइववा अपने उपयोगकर्ताओं को नहीं विज्ञापनदाताओं से अपने राजस्व का सब हो जाता है. निजी कंपनी के एक कुछ वर्षों में सार्वजनिक जा रहा है तो यह शायद एक मुफ्त सेवा रहेगी, गूगल की तरह, हमेशा की योजना बनाई है.

यह सब आप से मिलने की तरह लगता है एक निजी या व्यापार थ्ंबमइववा पृष्ठ है और इसकी लोकप्रियता धीमा के कोई निशान नहीं दिखाता है. महाविद्यालय दुनिया भर में ब्रांड के लिए साइट, थ्ंबमइववा एक लोगों के संपर्क में रहने के लिए जल्दी, आसानी से, और मुफ्त के लिए शानदार तरीका है.
स्क्रीनशॉट दिखाएँ,
फेसबुक अन्तरजाल पर स्थित एक निःशुल्क सामाजिक नेटवर्किंग सेवा है। जिसके माध्यम से इसके सदस्य अपने मित्रों, परिवार और परिचितों के साथ संपर्क रख सकते हैं। यह फेसबुक इंकॉ. नामक निजी कंपनी द्वारा संचालित है। इसके प्रयोक्ता नगर, विद्यालय, कार्यस्थल या क्षेत्र के अनुसार गठित किये हुए नेटवर्कों में शामिल हो सकते हैं और आपस में विचारों का आदान-प्रदान कर सकते हैं।ख्५, इसका आरंभ २००४ में हार्वर्ड के एक छात्र मार्क जुकरबर्ग ने की थी। तब इसका नाम द फेसबुक था। कॉलेज नेटवर्किग जालस्थल के रूप में आरंभ के बाद शीघ्र ही यह कॉलिज परिसर में लोकप्रिय होती चली गई। कुछ ही महीनों में यह जालस्थल पूरे यूरोप में पहचाना जाने लगा। अगस्त २००५ में इसका नाम फेसबुक कर दिया गया। फेसबुक में अन्य भाषाओं के साथ हिन्दी में भी काम करने की सुविधा है।
फेसबुक ने भारत सहित ४० देशों के मोबाइल सेवा प्रदाता कंपनियों से समझौता किया है। इस करार के तहत फेसबुक की एक नई साइट का उपयोग मोबाइल पर निःशुल्क किया जा सकेगा। यह जालस्थल फेसबुक का पाठ्य संस्करण है। भारत में रिलायंस कम्युनिकेशंस और वीडियोकॉन मोबाइल पर यह सेवा प्रदान करेंगे। इसके बाद शीघ्र ही टाटा डोकोमो पर भी यह सेवा शुरू हो जाएगी। इसमें फोटो व वीडियो के अलावा फेसबुक की अन्य सभी संदेश सेवाएं मिलेंगी।
 फेस बुक के संस्थापक जुकेरबर्ग के अनुसार आज  फेस बुक में  आधे अरब सदस्यों का विश्व का सबसे बड़ा समुह है।  इसके कर्मचारियों की संख्या में कई हजार कर्मचारी हैं। इसके कर्मचारियों भावुक और ऊर्जावान हैं और एक प्रणाली है कि दुनिया भर के सदस्यों को अपने खुद के अनुप्रयोगों इतना विकसित है कि वे  इसका उपयोग कर सकते हैं।

Saturday, March 26, 2011

ऐसे कैसे होगी न्यायपालिका की गरिमा की रक्षा


ऐसे कैसे होगी न्यायपालिका की गरिमा की रक्षा 
हाई कोर्ट व सर्वोच्च न्यायालय के न्यायमूर्तियों को दूरियां रखनी होगी भ्रष्टाचार के आरोप से घिरे लोगों से 
नई दिल्ली(प्याउ)।  जिस उत्तराखण्ड प्रदेश के मुख्यमंत्री निशंक व उनकी सरकार के भ्रष्टाचार के मामले सर्वोच्च न्यायालय व उत्तराखण्ड उच्च न्यायालय में चल रहे हो उस सरकार के मुखिया की हिन्दी व अंग्रेजी में प्रकाशित हो चुकी पुस्तक ‘सफलता के अचूक मंत्र’ का बांग्ला भाषा में अनुवाद का विमोचन देश की सबसे बड़ी अदालत के वरिष्ठ न्यायमूर्ति अल्तमस कबीर के हाथों से कराया जाने से प्रदेश सरकार के भ्रष्टाचार से मुक्ति चाहने वालों की आशाओं पर बज्रपात सा कम नहीं था।  यह कार्यक्रम  देहरादून में ग्राफिक एरा विश्वविद्यालय में  25 मार्च 2011 को आयोजित हुआ। पुस्तक के बंगला भाषा में हुए अनुवाद का विमोचन देश के सर्वोच्च न्यायालय के वरिष्ठ न्यायमूर्ति अल्तमस कबीर के हाथों से किया गया।  इस कार्यक्रम में उत्तराखण्ड उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायमूर्ति वारिन घोष भी उपस्थित थे। भले ही इस सरसरी तौर पर यह मामला सामान्य सा दिखता है परन्तु ‘जिस प्रकार से निशंक सरकार स्टर्जिया भूमि घोटाले प्रकरण में वर्तमान में सर्वोच्च न्यायालय में कटघरे में खड़ी है।  भले ही इस प्रकरण में निशंक सरकार को नैनीताल उच्च न्यायालय ने दोषी मानते हुए इस पूरे भूमि प्रकरण को घोटाले मानते हुए सरकार से अविलम्ब इस भूमि को सरकारी कब्जे में लेने का आदेश दिया। परन्तु इस प्रकरण में मुख्यरूप से कटघरे में खडे मुख्यमंत्री निशंक के बजाय इस प्रकरण मेें नौकरशाहों को दोषी माना। जबकि इस प्रकरण में एक ही दिन में मुख्यमंत्री से लेकर पटवारी तक के हस्ताक्षर व इस भूमि के उपयोग को बदलाव तक की तमाम प्रक्रिया एक ही दिन में पूरी की गयी। लोकशाही का जरा सा भी समझ रखने वाले आम आदमी की नजर में इस मामले में नोकरशाही पर गाज गिरानी एक प्रकार से मुख्यमंत्री को अभयदान देना जेसा ही है। उच्च न्यायालय के इसी फेसले पर नाखुशी प्रकट करते हुए इस प्रकरण को उठाने वाले सर्वोच्च न्यायालय के प्रखर अधिवक्ता अवतार सिंह रावत ने सर्वोच्च न्यायालय में असली दोषियों को सजा देने के लिए इस पूरे प्रकरण की सीबीआई से जांच कराने की गुहार  लगायी। इसी से परेशान प्रदेश सरकार के मुखिया रमेश पोखरियाल ने अपनी सफलता के मंत्रों का शायद प्रयोग किया हो। यही नहीं प्रदेश सरकार के एक और  घोटाले पर उच्च न्यायालय में सरकार को नोटिस किया गया है। परन्तु इसके बाबजूद नैनीताल उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायमूर्ति वारिन घोष का इस कार्यक्रम में उपस्थित रहना किसी भी समझदार लोगों के गले नहीं उतरा। हो सकता हो कि सर्वोच्च न्यायालय के वरिष्ठ न्यायमूर्ति अल्तमस कबीर को इन मामलों के बारे में अनविज्ञता हो परन्तु नैनीताल उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायमूर्ति की अदालत ने खुद इन मामलों की सुनवायी की है। जिस प्रकार से स्टर्जिया प्रकरण में मुख्य न्यायमूर्ति ने अपने फेसले को सुरक्षित रखने की अवधि के बीच में मुख्यमंत्री द्वारा  प्रयोग किया जाने वाले सरकारी होलीकप्टर का प्रयोग किया था उस समय भी यह प्रकरण न केवल आम आदमियों अपितु  प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री भुवनचंद खंडूडी जेसे वरिष्ठ राजनेताओं तथा अनैक  वरिष्ठ कानूनविदों ने भी  आदर्श मर्यादाओं के अनरूप नहीं माना था।  यही नहीं इस प्रकरण में प्रदेश के वर्तमान मुख्यमंत्री रमेश पोखरियाल ने जिन दिनों उनकी सरकार स्टर्जिया प्रकरण में आकंठ फंसी हुई थी उन दिनों उच्च न्यायालय में ऐसे ही आनन फानन में कार्यक्रम कराये। इसमें मुख्य न्यायाधीश को ही प्रमुखता दी गयी थी। निष्पक्ष न्याय के पक्षधरों का मानना है कि न्याय पालिका को अपनी गरीमा बनाये रखने के लिए न्यायमूर्तियों को ऐसे प्रकरणों में लिप्त लोगों से पर्याप्त दूरियां बनानी चाहिए। क्योंकि घोटालों में लिप्त लोग किसी न किसी बहाने से न्यायमूर्तियों को अपने प्रभाव में  ले कर इन प्रकरणों को प्रभावित करने के लिए किसी भी प्रकार के हथकण्डे अपना सकते है। 
देश का आम जनमानस देश के पूर्व मुख्य न्यायमूर्ति के रिश्तेदारों को ज्ञात स्रोतों से अधिक आय प्रकरण में लिप्त पाये जाने की खबर सुन कर स्तब्ध था। इसके साथ उत्तराखण्ड उच्च न्यायालय से सेवानिवृत हुई न्यायमूर्ति निर्मल यादव, पीएफ भ्रष्टाचार मामले में लिप्त जजों व कर्नाटक  उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायमूर्ति  रहे व असाम उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायमूर्ति के खिलाफ मामला दर्ज होने की खबरों को सुन कर देश के नेताओं व नौकरशाही के भ्रष्टाचारों से स्तब्ध  देश की जनता की निगाहें  न्यायपालिका पर थी। परन्तु जब देश के उच्च न्यायालय के न्यायामूर्तियों के इन प्रकरणों की खबरें समाचारों के जरिये आम आदमियों को सुनने को मिली तो उसका विश्वास न्याय पालिका पर डगमगाने लगा। देश की न्यायपालिका की हकीकत के बारे में सर्वोच्च न्यायालय के वर्तमान वरिष्ठ न्यायमूर्ति द्वारा कुछ माह पहले किये इलाहाबाद उच्च न्यायालय की वस्तु स्थिति के बारे में की गयी सटीक टिप्पणियों से लोग सन्न रह गये। देश की जनता के विश्वास से कितना शर्मनाक खिलवाड़ किया जा रहा है। न्याय के मंदिरों को  सत्ता के दलालों ने अपने प्यादों से धूमिल कर दिया है। राजनेताओं व नौकरशाही से तो देश की आम जनता का विश्वास पहले से ही उठ चूका था। एकमात्र विश्वास देश की आम जनता को देश की न्यायपालिका पर है। परन्तु जब इस विश्वास का देवता ही भ्रष्टाचार मामलों में न्यायालय के कटघरे में खडे लोगों के साथ किसी तरह खडे नजर आयेंगे तो देश की जनता का विश्वास पर बज्रपात ही होगा। भले ही न्यायमूर्तियों की मंशा किसी भी प्रकार से इन मामले में पाक साफ हों परन्तु देश की आम जनता के न्यायालय के प्रति विश्वास की डोर को कमजोर करने के लिए किसी प्रकार का शक कहीं दूर-दूर तक उचित नहीं है। न्याय केवल होना ही नहीं होता दिखाई भी देना चाहिए। इलाहाबाद उच्च न्यायालय प्रकरण पर सटीक टिप्पणी करते हुए सर्वोच्च न्यायालय के वरिष्ठ न्यायमूर्ति ने सही कहा कि भले की आम लोग न्याय पालिका की अवमानना के भय से मूक  रहें परन्तु लोग सब कुछ  जानते हैं। जनता के विश्वास को बनाये रखने का सबसे बड़ा दायित्व भी न्याय के मंदिर में देवता की तरह आम जनता की नजरों में पूजित न्यायमूर्तियों के कंधों पर ही है। यह विश्वास उनके आचरण व उनके फैसलों से जनता के समक्ष दिखायी देता है। 

सरकार बनी तो भ्रष्टाचारियों को 3 महिने में जेल भेजेंगे डा हरक सिंह रावत


सरकार बनी तो भ्रष्टाचारियों को 3 महिने में जेल भेजेंगे डा हरक सिंह रावत
नई दिल्ली(प्याउ)। भले ही कांग्रेस ने उत्तराखण्ड में आगामी विधानसभा चुनाव में विजय होने के बाद किसी भी नेता को अभी मुख्यमंत्री के पद के लिए नामित नहीं किया है परन्तु वर्तमान विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष डा. हरकसिंह रावत ने वर्तमान निशंक सरकार को देश की सबसे भ्रष्ट सरकार बताते हुए दो टूक शब्दों में कहा कि अगर आगामी विधानसभा चुनाव में उनकी सरकार प्रदेश में सत्तासीन हुई तो तीन महिने के अंदर तमाम भ्रष्ट्राचारियों को सलाखों के अंदर जेल में बंद करेंगे। यह दो टूक विचार कांग्रेसी नेता डा हरक सिंह रावत ने प्यारा उत्तराखण्ड के सम्पादक व उत्तराखण्ड राज्य गठन के अग्रणी आंदोलनकारी संगठन उत्तराखण्ड जनता संघर्ष मोर्चा के प्रमुख देवसिंह रावत सिंह से कांग्रेस मुख्यालय में 26 मार्च की सांयकाल  को एक विशेष भेंटवार्ता में कही।    भले ही उन्होंने किसी का नाम नहीं लिया परन्तु उनका अप्रत्यक्ष इशारा स्पष्ट रूप से प्रदेश के वर्तमान मुख्यमंत्री रमेश पोखरियाल निशंक पर ही था। डा हरक सिंह रावत प्रदेश में भाजपा नेतृत्व वाली निशंक सरकार को भ्रष्टाचारी सरकार कहते हुए प्रदेश की आम जनता को आगाह किया कि इस सरकार ने प्रदेश की पूरी व्यवस्था को भ्रष्टाचार की गर्त में ही धकेल दिया है। गौरतलब है कि डा हरकसिंह रावत भी उत्तराखण्ड राज्य गठन जनांदोलन के दौरान देश की संसद की चैखट राष्ट्रीय धरना स्थल जंतर मंतर दिल्ली में 1994 से सन्2000 राज्य गठन तक राष्ट्रीय कीर्तिमान स्थापित करने वाले उत्तराखण्ड राज्य गठन जनांदोलन के प्रमुख संगठन ‘ उत्तराखण्ड जनता संघर्ष मोर्चा के अध्यक्ष भी रहे। भाजपा को छोड़ने के बाद  डा हरक सिंह रावत ने उत्तराखण्ड राज्य जनांदोलन के प्रमुख संगठन उत्तराखण्ड जनता संघर्ष मोर्चा से जुड़े। वे कई महिनों मोर्चा का नेतृत्व करने के बाद बसपा से जुड़ गयें परन्तु उत्तराखण्ड राज्य गठन जनांदोलन के लिए समर्पित आंदोलनकारी मोर्चा के संयोजक व सर्वोच्च न्यायालय के प्रखर अधिवक्ता अवतार सिंह रावत व मोर्चा के तत्कालीन महासचिव देवसिंह रावत सहित तमाम प्रखर आंदोलनकारियों ने दलगत राजनीति से उपर उठ कर मोर्चा के संघर्ष की मशाल को राज्य गठन तक प्रज्जवलित रखी। 16 अगस्त 2000 को राज्य गठन के बाद इस  छह साल तक के निरंतर सफल  ऐतिहासिक धरने के जंतर मंतर पर ही समापन अवसर पर भी डा हरक सिंह रावत, वर्तमान यमुनोत्री से कांग्रेसी विधायक केदारसिंह रावत भी विशेष रूप से सम्मलित हुए थे। इस अवसर पर आयोजित ऐतिहासिक समापन समारोह में वरिष्ठ कांग्रेसी नेता सतपाल महाराज व भाजपा के तत्कालीन सांसद बच्चीसिंह रावत सहित सभी प्रमुख आंदोलनकारी संगठनों ने भाग लिया था। उस ऐतिहासिक समापन समारोह का संचालन भी मोर्चा के तत्कालीन अध्यक्ष देवसिंह रावत व अध्यक्षता मोर्चे के संयोजक अवतारसिंह रावत ने किया था। 

Friday, March 25, 2011

भगवान, मानवता व राष्ट्र के प्रति सबसे क्रूर अपराध

जिस देश में अरबों- खरबों लोग बिना घर के खुले आसमान के नीचे  रहने को मजबूर हों, अरबों लोग बिना अन्न के भूखे ही सोने के लिए मजबूर हों, जिस देश में करोड़ों बच्चे गरीबी के कारण शिक्षा, चिकित्सा के लिए तरस रहे हों उस देश में अरबों खरबों रूपये के भव्य मंदिर-मस्जिद आदि धार्मिक स्थल बनाना और अरबों खरबों रूपया केवल चंद दिनों के खेल तमाशों में बर्बाद कर देना भगवान, मानवता व राष्ट्र के प्रति सबसे क्रूर अपराध है।

Thursday, March 24, 2011

भारत का दुर्भाग्य रहा अटल व मनमोहन जैसे अमेरिकीपरस्त नेतृत्व




यह भारत का दुर्भाग्य रहा कि इस देश में अटल व मनमोहन जैसे अमेरिकीपरस्त नेतृत्व मिला। जिन्होंने भारत के मान सम्मान व स्वाभिमान को अमेरिकी के लिए शर्मनाक ढंग से दाव पर लगाया। मामला चाहे कारगिल का हो या संसद पर हमले का या मुम्बई हमले का इन सब मामलों में देश के तत्कालीन हुक्मरानों ने राष्ट्रीय आत्मसम्मान की रक्षा करते हुए आतंकी पाक को मुहतोड़ जवाब देने के बजाय अमेरिका के इशारे पर नपुंसकों की तरह मूक रह कर देश के स्वाभिमान को आतंकियों के हाथों रौंदवाया। आज महात्मा गांधी और देश के वर्तमान नेतृत्व में अंतर स्पष्ट देखने को मिलता। आज का नेतृत्व व  देश का तथाकथित अमीर लोग अमेरिका जाने के लिए इस कदर लालयित हैं कि अमेरिका इनके कपड़े सहित उतारवा देता हैं, इनको कदम कदम  पर बेइज्जत करता हैं। फिर भी इस देश के नेता व अमीर लोग अमेरिका जाने के लिए व उसके इशारों पर कुत्तों की तरह दुम हिलाते रहते हैं। वहीं महात्मा गांधी जी ने कई बार अमेरिकी लोगों द्वारा अमेरिका आने के निमंत्रण को यह कह कर ठुकरा दिया था कि अमेरिका की सोच ही हिंसक है। आज भारतीय इतिहास पर नजर डालता हूूॅं तो इस देश में नेहरू, शास्त्री, इंदिरा  व राजीव के बाद कोई ऐसा नेतृत्व नहीं रहा जो देश के स्वाभिमान को अमेरिका के आगे स्वाभिमान  राष्ट्राध्यक्ष की तरह डटे रहे हों। अटल बिहारी व मनमोहन सिंह की सरकारों में तो अमेरिकी परस्त होने की शर्मनाक ऐसी होड़ लगी हुई हैं कि इसके कारण आज भारत भी पाकिस्तान की तरह अमेरिका के शिकंजे में जकड़ गया है। आज जरूरत हैं गांधी जैसे राष्ट्रवादी नेतृत्व की न की मनमोहन व अटल जैसे अमेरिकी परस्त नेताओं की। 

विदेशों में ही नहीं देश में ही हैं अकूत सम्पति बेइमानों की



इस  देश के बेइमानों के विदेशों में ही नहीं देश में ही अकूत सम्पति हैं। जरूरत हैं इसको ईमानदारी से जांच करने की।  अगर इस देश के विकासखण्ड प्रमुख से  लेकर प्रधानमंत्री तक तथा विकासखण्ड अधिकारी से लेकर देश के मुख्य सचिव तक तथा मध्यम दर्जे के व्यवसायियों की ईमानदारी से निष्पक्ष  जांच ऐजेन्सी से जांच करायी जाय तो इनकी बेनामी इतनी सम्पति मिल जायेगी उससे देश के उपर तमाम ऋण उतारने के बाद सभी बच्चों को शिक्षा, सभी बेघरों को घर, चिकित्सा व सभी गांवों में बिजली, पानी, खेतों में सिंचाई की नहरें व मोटर मार्गों से जोड़ने के लिए पर्याप्त संसाधन हासिल हो सकता है।

प्रधानमंत्राी मनमोहन सिंह इस्तीफा दे


विकिलीक्स में हुए खुलासों के बाद अब प्रधानमंत्राी मनमोहन सिंह में जरा सी भी नैतिकता है तो उन्हें देश व अपने हित में अविलम्ब प्रधानमत्राी के पद से इस्तीफा दे देना चाहिए। इसके साथ ही कांग्रेस व सप्रंग प्रमुख सोनिया गांध्ी को  भी देश की गरिमा की रक्षा करने के अपने प्रथम दायित्व का निर्वाहन करते हुए  अविलम्ब प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को पद से मुक्त कर देश के लोगों के विश्वास की रक्षा करनी चाहिए। विकिलिक्स में हुए इन नये खुलासों के बाद देश पर अटल बिहारी वाजपेयी व मनमोहन सिंह सरकारों के कार्यकाल में अमेरिकी शिकंजे में बुरी तरह से जकड़ने के प्यारा   उत्तराखण्ड द्वारा वर्षों से लगाये जाने वाले आरोपों की सच्चाई पर ही पुष्टि हुई। गौरतलब है कि प्यारा उत्तराखण्ड समाचार पत्रा अटल बिहारी वाजपेयी सरकार के दोरान ही देश में निरंतर बढ़ रहे अमेरिकी शिकंजे से देश के हुक्मरानों सहित देश की जनता को आगाह करता आ रहा है। परन्तु न तो किसी राजनैतिक दल ने व नहीं इस देश की खुपिफया ऐजेन्सियों ने ही इसको गंभीरता से लिया। लेते भी कैसे, देश की चिंता किसे। जब देश के सर्वोच्च पदों व सर्वोच्च नीतियों का निर्धरण अमेरिका के हितों के अनुसार होने लगे तो ऐसे समय में देश हित की बात करने की जरूरत कौन कर सकेगा।
ऐसे में आज देश की जनता व देश के तमाम देशभक्तों को चाहिए कि वह देश की रक्षा के लिए सरकारों व तमाम राजनैतिक दलों में महत्वपूर्ण पदों में आसीन अमेरिकी भक्तों को एक-एक कर अमेरिका ही भेज दें। देश की वर्तमान शर्मनाक व संवेदनशील हालत को देखते हुए कांग्रेस नेतृत्व को अविलम्ब मनमोहन सिंह को उनकी अमेरिकी परस्ती के कारण देशहित में प्रधनमंत्राी के पद से हटा कर राहुल गांध्ी को देश की बागडोर सौंप देनी चाहिए। इसके साथ सरकार व कांग्रेस से मोंटेक सिंह आलुवालिया, पी चिदंम्बरम, कबीना मंत्राी शर्मा, कपिल सिब्बल आदि को भी देश हित में सरकार से दूर रखना चाहिए। उसके साथ ही आस्कर पफर्नाडिस व नटवर सिंह को पुन्न कांग्रेस में महत्वपूर्ण पदों में आसीन करना चाहिए। अगर कांग्रेस नेतृत्व यह कार्य नहीं करेगी तो आने वाले समय में देश की जनता उनको किसी भी सूरत में मापफ नहीं करेगी। राहुल गांध्ी को भी आगामी लोकसभा चुनाव की इंतजार करने के बजाय देश की रक्षा के लिए यह चुनौती तत्काल स्वीकार करनी चाहिए। नहीं तो आने वाले समय में मनमोहन सिंह के कुशासन से देश की जनता कांग्रेस को किसी भी हालत में सत्तासीन नहीं करेगी। जिस ढ़ग से मनमोहन सिंह सरकार ने देश को मंहगाई, आतंकवाद व भ्रष्टाचार की गर्त में ध्केल कर देश के आम जनता का जीना ही दूश्वार कर दिया है उसको देखते हुए जनता के विश्वास को बनाये रखने व देश के हितों की रक्षा के लिए राहुल गांध्ी को तत्काल प्रधनमंत्राी के पद पर आसीन होकर देश की रक्षा करनी चाहिए। नहीं तो यह देश पाकिस्तान की तरह पूरी तरह से अमेरिका के शिकंजे में जकड़ जायेगा।

Wednesday, March 23, 2011

खच्चर चलाने के लिए मजबूर हैं राज्य आंदोलनकारी रणजीत पंवार


खच्चर चलाने के लिए मजबूर हैं राज्य आंदोलनकारी रणजीत पंवार
 उत्तराखण्ड के हुक्मरानों जरा शर्म करो
राज्य गठन जनांदोलन के लिए संसद की चैखट पर सालों तक धरना देने वाले आंदोलनकारियों को भूली उत्तराखण्ड की सरकार व सामाजिक संगठन
 ‘रावत जी मैं केदारनाथ मार्ग पर यात्रा काल में खच्चर चलाता हॅू’ जैसे ही  मेरे  राज्य आंदोलनकारी साथी रूद्रप्रयाग जनपद निवासी रणजीत पंवार ने गत सप्ताह दिल्ली के राष्ट्रीय धरना स्थल पर मेरे कुशल क्षेम पूछने पर कहा तो मैं सन्न रह गया। आंदोलनकारियों के कल्याण के बड़े बडे दावे करने वाली उत्तराखण्ड सरकार व उनके कारिंदों को होश कहां हैं कि वे आंदोलनकारियों की सुध ले। राज्य गठन आंदोलन में मात्र छह दिन की जेल जाने वालों को तो प्रदेश सरकार सरकारी सेवाओं में नियुक्ति व पेंशन देने का दावा कर रही है। वहीं अपने जीवन के कई साल राज्य गठन आंदंोलन के लिए संसद की चैखट पर धरना देने वाले प्रमुख आंदोलनकारी सरकारी की उपेक्षा के कारण कोई रणजीत सिंह पंवार की तरह खच्चर चलाने के लिए विवश हैं तो कोई देवेन्द्र चमोली की तरह दिल्ली की फेक्टरियों में धक्के खा रहे हैं तो दूसरी तरफ कोई गैरसैंण के समीप धूनियारघाट के आंदोलनकारी अशोक लाल शाह की तरह किसी तरह घर में रह कर अपना जीवन बसर कर रहे है। ताकुला के नरेन्द्रसिंह भाकुनी तो दिल्ली में ही दम तोड़ गये। परन्तु सरकार को इन आंदोलनकारियों की सुध लेने का भान नहीं।  उपरोक्त आंदोलनकारी वे हैं जिन्होंने राज्य गठन के लिए संसद की चैखट राष्ट्रीय धरना स्थल जंतर मंतर पर मेरे साथ छहः साल के ऐतिहासिक राज्य गठन जनांदोलन में उत्तराखण्ड जनता संघर्ष मोर्चा के बैनर तले वर्षों तक अपना सर्वस्व राज्य गठन आंदोलन के लिए समर्पित किया था।
 आप ही नहीं प्रदेश के तमाम मुख्यमंत्री व उनके चम्पू पूछेंगे कि रणजीत पंवार कौन हें? रणजीत पंवार उत्तराखण्ड राज्य गठन के लिए उत्तराखण्ड जनता संघर्ष मोर्चो के संसद की चैखट जंतर मंतर स्थित राष्ट्रीय धरना स्थल पर निरंतर छह साल तक चले सतत धरने के महत्वपूर्ण सिपाई थे। इस मोर्चा का राज्य गठन में ऐतिहासिक योगदान रहा। इस मोर्चे से जुडे रहे व कभी इसके प्रमुख रहे डा हरक सिंह रावत आज प्रदेश की विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष हैं। इस मोर्चे के एक संयोजक डा प्रकाश सुमन ध्यानी आज प्रदेश के मुख्यमंत्री के सलाहकार व वरिष्ठ भाजपा नेता है। इस मोर्चे के युवा मोर्चे के प्रमुख डा केदार सिंह रावत आज प्रदेश की विधानसभा में यमुनोत्री क्षेत्र से विधायक हैं। इसके बाबजूद आज की भाजपा सरकार में ही नहीं अपितु कांग्रेस के सरकार में भी इन नेताओं को कभी अपने आंदोलन के मोर्चे के साथियों की सुध लेने की कभी होश तक नहीं रही। जब यह हालत सबसे मजबूत मोर्चे की है तो अन्य छोटे मोटे संगठनों के आंदोलनकारियों की क्या हाल रही होगी।  इसे कहते हैं अंधेर नगरी चोपट राजा....... प्रदेश सरकार के बेशर्म हुक्मरानों ने अपने प्यादों को समायोजित करने के लिए तो राज्य आंदोलन में छह दिन के लिए जेल जाने वालों को तो आंदोलनकारी मान कर उनको राजकीय सेवाओं में समायोजित कर दिया परन्तु छह साल तक प्रदेश गठन के लिए संसद की चैखट पर निरंतर आंदोलन करके राज्य आंदोलन की अखल को जगाने वाले उत्तराखण्ड के महान सपूतों की सुध लेने का भान तक नहीं रहा। आंदोलनकारियों का सम्मान के नाम पर इससे बड़ा अपमान क्या होगा कि उनको अपने आप को आंदोलनकारी घोषित कराने के लिए थाना कचहरी से लेकर तिहाड़ जेल में दरदर की ठोकर खानी पड़ रही है, जिन लोगों ने सुविधा शुल्क दिया वे रिकार्ड लेने में सफल रहे व जो साफ बने रहे उनको रिकार्ड ही नहीं मिला। ऐसा अपमानित किया प्रदेश सरकार ने आंदोलनकारियों को सम्मानित करने के नाम पर। आंदोलनकारी रणजीत सिंह पंवार भी उसी आंदोलनकारी का जेल जाने का रिकार्ड लेने के लिए  दिल्ली संसद मार्ग स्थित थाने के चक्कर काट रहे थे। उनके अनुसार उनको यहां से ठका सा जवाब थाने वालों ने दिया कि हमारे पास अब कोई रिकार्ड नहीं है। मुझे समझ में नहीं आया कि मैं अपने आंदोलनकारी साथियों से क्या कहूूॅ। सरकारों को ऐसे आंदोलनकारियों को जिन्होंने अपने जीवन के कई वर्ष राज्य गठन जनांदोलन को सफल बनाने में लगा दिये हों ऐसे आंदोलनकारियों को सम्मानित करते हुए उनको सम्मानजनक जीवन यापन में सहयोग देना प्रदेश सरकार का प्रथम कत्र्तव्य होता हैं परन्तु यहां तो सरकारों ने ऐसे महान आंदोलनकारियों को अपने को आंदोलनकारी  साबित करने के लिए थाना कचहरी व जेल में कदम कदम पर जलालत सहने के लिए विवश करके अपमानित कर रही है।
उत्तराखण्ड राज्य गठन जनांदोलन के केन्द्र बिन्दू रहे इस ऐतिहासिक धरने में निरंतर छह साल निरंतर धरना देने के दौरान रूद्रप्रयाग के जखोली ब्लाक के तेल्ला गांव के रणजीत पंवार हो या जनपद पोड़ी जनपद के देवेन्द्र चमोली हो या अम्मोड़ा के सल्ट ब्लाक के मन्नु व ताड़ीखेत ब्लाक के भुवन बिष्ट, हो या जनपद चमोली के गैरसेंण के धुन्यार घाट के निवासी अशोक लाल शाह व कपीरी पट्टी के महिपाल नेगी। अल्मोड़ा के ताकुला क्षेत्र के नरेन्द्र भाकुनी हो या हरिसिंह बिष्ट अन्य आंदोलनकारी। इस आंदोलन में वर्षो तक अपना घरबार छोड़ने वाले इन साथियों के साथ जनपद चमोली के  नारायण बगड के समीप पैठाणी गांव के अग्रणी प्रखर आंदोलनकारी पानसिंह परिहार बिष्ट के योगदान को कौन भूला सकता।  जिन्होंने अपना सर्वस्व राज्य गठन के लिए समर्पित करके पुलिसिया व दलीय बंधुआ मजदूरों का भारी दमन सहते हुए बदहाली तथा सर्दी-गर्मी,बरसात, भूख प्यास सहते हुए भी उत्तराखण्ड राज्य गठन के आंदोलन में अपने आप को समर्पित कर दिया था।
हमारे मोर्चे के संयोजक सर्वोच्च न्यायालय के अधिवक्ता अवतार सिंह रावत आज भी उत्तराखण्ड की जनंाकांक्षाओं को साकार करने व इसको भ्रष्टाचार से मुक्ति दिलाने के लिए उच्च न्यायालय से लेकर सर्वोच्च न्यायालय में उत्तराखण्ड की भ्रष्ट सरकारों को पूरी तरह बेनकाब कर रहे हैं।
जिन महान उत्तराखण्डी आंदोलनकारियों ने राज्य गठन की मांग के लिए अपना घरबार त्याग कर संसद की चैखट पर निरंतर 6 साल का सफल धरना देकर जहां देश में राज्य गठन के इतिहास में नया इतिहास रचा वहीं उत्तराखण्ड राज्य गठन के प्रति उदासीन राजनैतिक दलों को व समाज मेें निरंतर उत्तराखण्ड पृथक राज्य गठन की लौ को अपने समर्षण से प्रज्जवलित रखा उन आंदोलनकारियों को सम्मानित करना तो रहा दूर अब तक राज्य गठन के 11 सालों की सरकारों ने उनकी शर्मनाक उपेक्षा की है। उत्तराखण्ड आंदोलनकारियों को सम्मानित करने के नाम पर ढपोर शंख बनी अब तक की सरकारों ने देश प्रदेश के अखबारों में भले ही करोड़ों रूपयें के विज्ञापन पानी की तरह बर्बाद कर दिये हों परन्तु सच्चाई यह हे कि राज्य गठन के लिए संसद की चैखट पर 6 साल तक धरना देने वाले राज्य गठन आंदोलन के प्रमुख संगठन उत्तराखण्ड जनता संघर्ष मोर्चा के आंदोलनकारियों तक को सम्मानित करना तो रहा दूर उनकी सुध लेने तक में अब तक की तमाम सरकारें असफल रही। इसके कारण राज्य गठन के लिए मैं संसद के समझ निरंतर 6 साल तक संसद की चैखट पर धरना देते रहने के कारण मुझे इसका अहसास है कि मेरे साथी आंदोलनकारियों ने कितनी बदहाली, भूख प्यास, सर्दी-धूप  व राजनीतिक दलों के तमाम षडयंत्रों को झेलते हुए भी उत्तराखण्ड के आत्मसम्मान के लिए राज्य गठन के आंदोलन में अपने आप को कुर्वान करने वाले मेरे साथियों ने कितना संघर्ष किया था। इसका अहसास राज्य गठन के बाद मुख्यमंत्री बनने वाले तिवारी, खडूडी या निशंक को लेशमात्र भी होगा। इनकी प्रतिबधता दल विशेष से थी। परन्तु उत्तराखण्ड के लिए अपने आप को अर्पित करने वाले मेरे राज्य आंदोलन के वरिष्ठ साथी अवतार रावत हो या राजेन्द्र शाह वर्षों तक समर्पित आंदोलनकारी देवेन्द्र चमोली, अशोक लाल शाह, यह न केवल उत्तराखण्ड के अब तक के तमाम सरकारों के लिए शर्म की बात है।
उत्तराखण्ड जनता संघर्ष मोर्चा राज्य गठन जनांदोलन का एक ऐसा प्रखर आंदोलनकारी संगठन रहा जिसने राज्य गठन जनांदोलन में सतत् धरना देकर न केवल तमाम आंदोलनकारी संगठनों को एकजूट करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। इसी आंदोलनकारी मंच में सम्मलित होने के लिए राजनेता, कर्मचारी, छात्र, पूर्व सैनिक, कर्मचारी, महिला सहित देश विदेश के तमाम उत्तराखण्डी ही नहीं अपितु लोकशाही में विश्वास रखने वाले तमाम लोग अपना समर्थन करने के लिए बड़े सम्मान के साथ आते थे।  इस संगठन में दिल्ली के सात दर्जन से अधिक सामाजिक संगठनों ने अपना समर्थन दिया था। देश के कोने कौने से आंदोलनकारी संगठनों के लिए यह केन्द्रीय संगठन के तौर पर जाना जाता रहा। इस संगठन को राज्य गठन तक मजबूत आधार देने वालों में संगठन के संयोजक ं अधिवक्ता अवतार सिंह रावत, अध्यक्ष देवसिंह रावत, खुशहाल सिंह बिष्ट, रवीन्द्र बत्र्थवाल, महासचिव जगदीश भट्ट, जगमोहन रावत, सूरत सिंह राणा, कोषाध्यक्ष देशबंन्धु बिष्ट, विनोद नेगी, प्रहलाद गुसांई, यशवंत गुसांई, सीता पटवाल, आकाश भण्डारी, व्योमेन्द्र नयाल, कुलदीप कुकरेती, जगदीश गौड़, श्रीमती कैतुरा, राम प्रसाद भदूला, हरिसिंह भण्डारी,   यही वह आंदंोलनकारी संगठन रहा जिसमें आंदोलन के दौरान खेट पर्वत पर ऐतिहासिक आंदोलन करने  के समापन के लिए वर्तमान कबीना मंत्री दिवाकर भट्ट का उपवास तत्काल केन्द्रीय मंत्री भी सम्मलित हुए थे। यह वही ऐतिहासिक आंदोलनकारी मंच रहा जिसमें अपना ऐतिहासिक भूख हड़ताल तोड़ने के लिए स्व इन्द्रमणि बड़ोनी व स्व. आंदोलनकारी भट्ट ने प्रयोग में लिया था। इस मंच पर अपना समर्थन देने के लिए पूर्व मुख्यमंत्री भुवनचंद खंडूडी सहित तमाम नेता अपना शौभाग्य समझते थे। यही वह मंच रहा जो कांग्रेसी-भाजपाई नेताओं को ही नहीं अपितु सपा व बसपा के नेताओं से सीधे आरपार की सड़़क का संघर्ष करके खदेड़ने का काम करता। ऐसे आंदोलनकारी मंच के वर्षों तक राज्य गठन आंदोलन में समर्पित रहे आंदोलनकारियों की उपेक्षा करने वाली सरकार को किन शब्दों में धिक्कारा जाय। यह तो जनता ही तय करे। परन्तु राज्य गठन के महान आंदोलनकारियों को सम्मानित करने व सहयोग देने में समाज के वे तमाम संगठनों को भी सांप सुघ गया जो समाज सेवा करने के नाम पर गाने बजाने में हर साल लाखों रूपया लुटा कर उत्तराखण्ड की संस्कृति को बचाने का दंभ भरते हैं। आखिर ऐसे आंदोलनकारियों को उनके हाल पर छोड़ने वाले सरकार व समाज के संगठनों को क्या कहा जाय। यह तो वे ही तय करें परन्तु सरकार व सामाजिक संगठनों की इस उदासीनता के लिए जितनी भी निंदा की जाय वह कम ही है। शेष श्रीकृष्णाय् नमो। हरि ओम तत्सत्। श्री कृष्णाय् नमो।

Sunday, March 20, 2011

इराक व लीबिया के बाद भारत, चीन व रूस पर भी करेगा अमेरिका हमला




इराक व लीबिया के बाद भारत, चीन व रूस पर भी करेगा अमेरिका हमला
सावधान लीबिया पर अमेरिका, इंगलेण्ड व फ्रांस का हमला केवल लीबिया पर नहीं अपितु पूरे विश्व के आत्मसम्मान पर है। चीन, रूस व भारत की नपुंसकता के कारण एक दिन अमेरिका व उसके पूछल देश इग्लेण्ड, कनाड़ा, इटली आदि नाटो गुट के देश मिलकर इसी प्रकार का हमला कर संसार के तमाम देशों को इसी तरह से अपना गुलाम बनायेंगे। अगली बारीं भारत पर, चीन व रूस की भी होगी। अमेरिका की यह जंग न तो आतंकबाद के खिलाफ है व नहीं तानाशाही के खिलाफ, अमेरिका की यह जंग केवल अपने विरोधियों को तबाह कर पूरे विश्व को अपना गुलाम बनाने की है। अमेरिका के विस्तार में उसका सहयोग अमेरिका द्वारा पोषित व संरक्षित अलकायदा ही कर रहा हैं। अगर अमेरिका की जंग अलकायदा या आतंकियों के खिलाफ होती तो वह अपना सबसे पहला हमला अफगानिस्तान, इराक व लीबिया में न करके पाकिस्तान में करता। क्योंकि पाकिस्तान ही आज पूरे विश्व में आतंकी हमलों की फेक्टरी बन गयी है। पाकिस्तान ही पूरे विश्व में आतंकवाद को पोषित व संरक्षित कर रहा है। तानाशाही के खिलाफ भी अमेरिका की जंग नहीं हे। अमेरिका ने हमेशा पाकिस्तान में ही नहीं अपितु अरब देशों में लोकशाही को रौंदने वालों को संरक्षण दिया। यह अमेरिका की जंग अमेरिका द्वारा विश्व को अपना गुलाम बनाने के विश्वव्यापी मुहिम का एक अहम हिस्सा है। अगर विश्व जनमत इसी तरह नपुंसक रह कर अमेरिका के जुल्मों का सर झुका कर मूक समर्थन किया तो वह दिन दूर नहीं जब इरान, उत्तरी कोरिया तो अमेरिका आज नहीं तो कल तो रौंदेगा अपितु वह किसी न किसी बहाने से भारत, चीन व रूस को भी इसी निर्ममता से रौंदेगा। इसका बहाना चाहे भारत में कश्मीर हो सकता है तथा चीन में कुछ ओर तथा रूस में भी चैचन्या सहित कुछ भी हो सकता है। संयुक्त राष्ट्र संघ की निर्लज्जता व अमेरिकी प्यादापन को तो विश्व जनमत तथा संयुक्त राष्ट्र संघ के भारी विरोध के बाबजूद इराक पर हमला करके हजारों इराकियों का कत्लेआम करने तथा वहां बलात कब्जा जमाने से ही उजागर हो गया हे। जिस तैवर से संयुक्त राष्ट्र संघ ने कुवैत पर एक दिन के हमले के कारण इराक पर प्रतिबंध लगाया था वह संयुक्त राष्ट्र संघ को इराक पर अमेरिका के निर्मम कब्जा इतने साल बाद भी क्यों नहीं दिखाई दे रहा है। उसकी हैकड़ी अमेरिका के आगे क्यों दम तोड़ गयी।   अगर अमेरिका पर अविलम्ब अंकुश नहीं लगाया गया तो अमेरिका एक एक कर सभी अपने संभावित विरोधियों को इराक व लीबिया की तरह तबाह कर देगा। लीबिया व उसके तानाशाह का हस्र भी अमेरिका इराक व उसके प्रमुख सद्दाम की तरह ही करेगा। लीबिया के तानाशाह कर्नल गद्दाफी पर यह हमला उनके तानाशाही के कारण नहीं अपितु अमेरिका के प्रखर विरोध के कारण ही किया जा रहा है। इस हमले से एक बात स्पष्ट हो गयी कि अमेरिकी राष्ट्रपति जार्जबुश के बदलने के बाद राष्ट्रपति बने ओबामा ने भी अमेरिका की उसी विश्व को अपना गुलाम बनाने की अमेरिका की घृर्णित विस्तारवादी नीतियों का अंधानुशरण किया है। अमेरिकी राष्ट्रपति बने ओबामा की इस कार्यवाही से पूरे विश्व के उन अरबों लोगों के विश्ववास का भी गला घोट दिया हे जो उनको बुश की तरह तानाशाह व विश्व शांति के लिए खतरा नहीं मानते थे। कुल मिला कर अमेरिका में बुश की जगह भले ही शासक का मुखोटा अब  ओबामा के रूप में पहन लिया हो परन्तु उसकी अमानवीय गतिविधियों पर कोई परिवर्तन नहीं हुआ। अपितु वह दिन प्रति दिन खतरनाक बनती जा रही है।  संयुक्त राष्ट्र की नपुंसकता व अमेरिका के हाथों की कटपुतली बनने का नतीजा है। लीबिया को इराक बनाने की धृष्ठता अलकायदा व अमेरिकी अनैतिक गठजोड़ को भी बेनकाब करती है।

मुस्कराओं प्रभु की कृपा के लिए


मुस्कराओं प्रभु की कृपा के लिए
ये रात दिन कब गुजर जाते हैं
बस यादें बाकी रह जाती है
समुन्दर की लहरों की तरह
जिनका कोई पता ठिकाना
नहीं होता बादलों की तरह
जिन्दगी भी इसी तरह
कब मिल जाय कब छूट जाय
हवा के झोंकों की तरह
बस मुस्कराते रहो हर पल
प्रभु की कृपा के लिए

शुभ रात्रि (20-03-2011 midnight)

Thursday, March 17, 2011

भारत को इंडिया से मुक्ति कराना है।



भारत को इंडिया से मुक्ति कराना है।
आओ  हम भारत को फिर से  महान बनायें
देष की आजादी को बंधन से मुक्ति दिलायें
षहीदों की षहादत की मिल कर लाज बचायें
भारत को इंडिया की गुलामी से मुक्ति करायें
आजादी के नाम पर चल रहा गुलामी का राज
अपनी भाशा रौंद कर चल रहा फिरंगी का राज
कब आयेगी  देष के बेषर्म हुक्मरानों को षर्म
देष  विकास के नाम पर अंधी मची है यहां लूट 
जाति-धर्म, भाशा-क्षेत्र के नाम बांट रहे हैं देष
देष लुट कर विदेषों में भर रहे हैं अपने बैंक
इन चंगेजों से देष को हम सबने बचाना है
अपने भारत कों फिर से विष्वगुरू बनाना है।।


(देवसिंह रावत 17 मार्च 20911 रात्रि 11.07 बजे)

Tuesday, March 15, 2011

चाह कर दिल भुला नहीं पाता


चाह कर दिल भुला नहीं पाता
कोन चाहता है दूर जाना, कोन चाहता है भूल जाना
यह वक्त का तकाजा ही होता मिल कर फिर विछुडना 
पर दूर जा कर भी कोई किसी को कभी न भूल पाता
नजर चुराने से भी कोई चाह कर दिल से भुला नहीं पाता
यह बात ओर है कि हर वक्त कोई साथ नहीं निभा पाता 
चाह कर भी  दर्द को तुम्हारी तरह सरेआम नहीं कह पाता 

कैसे गाऊं होली के गीत


चारों तरफ तबाही देख, रोता हैं न जाने क्यों मन

प्रभु की कृपा देख कर भी, बर्बादी पर रोता मेरा मन

हंसती खेलती दुनिया को तबाह होते देख रोता है मन

क्यों बना कर मिटा रहे हैं यही सोच कर रोता है मन 

तेरी माया तुही जाने दुस्वप्न से भी सहमा है मेरा मन

तबाही भारत में हो या जापान में बिलखता है मेरा मन

कैसे तुझको समझाऊं साथी विध्वंष से तड़फता है मन

कैसे गांऊ गीत मिलन के, अब नाचे कैसे मेरा तन मन

कैसे होली के गीत गाऊं अब कैसे बर्बादी में गाये मन।

(देवसिंह रावत-15मार्च 2011 रात 10.29)


Monday, March 14, 2011

लीबिया प्रकरण से बेनकाब हुआ अलकायदा व अमेरिका का गठजोड


ं -लीबिया को अफगानिस्तान व इराक बनाने से बाज आये अमेरिका 
-लीबिया से दूर रहे अमेरिका व संयुक्त राष्ट्र
-गद्दाफी को कमजोर कर अलकायदा की राह आसान न करे अमेरिका 
-लीबिया प्रकरण से बेनकाब हुआ अलकायदा व अमेरिका का गठजोड

चार दशक से अधिक समय से लीबिया में शासन कर रहे कर्नल गद्दाफी के खिलाफ लीबिया में हुए विद्रोह से जहां कर्नल गद्दाफी ही नहीं पूरा विश्व स्तब्ध है। लीबिया प्रकरण में अमेरिका व अलकायदा की एकजुटता उजागर हुई। दोनों मिल कर यहां अपने विरोधी कर्नल गद्दाफी को अपदस्थ करने में जुटे हे। जहां कर्नल गद्दाफी इस विद्रोह के पीछे अमेरिकी व अलकायदा को जिम्मेदार बता कर इसको उनके देश लीबिया को कमजोर करने की साजिश बता कर विद्रोह को शक्ति से कुचल रहे है। वहीं अमेरिका दशकों से अपनी आंख की किरकिरी बने हुए कर्नल गद्दाफी को हर हाल में निपटने की अमेरिका की रणनीति से लीबिया का भी हाल अफगानिस्तान व इराक बनने की प्रबल हो रही है। अमेरिका के प्रभाव में शेष विश्व भले ही इसे लीबिया के लोगों की लोकतंत्र को स्थापित करने का ज्वार बता रहे हैं। परन्तु इस स्थिति के पीछे दो कारक जो जिम्मेदार हैं उनका कहीं दूर-दूर तक लोकशाही व आम जनता के विकास से कहीं कोई लेना देना नहीं है। पहली जमात अमेरिका की है। जिसका इतिहास ही लोकशाही व मानवता को दमन का रहा व दूसरी जमात अलकायदा की है जो लीबिया में कर्नल गद्दाफी के मजबूत जनहितकारी शासन के कारण वहां पर अपना संकिर्ण इस्लामी शासन स्थापित करने का ऐजेन्डा लागू करने में असफल रहा है। अमेरिका के पीछे उसका पिछलग्गू संगठन नाटो व अमेरिका के हाथ का प्यादा संयुक्त राष्ट्र संघ है। दुनिया के 70 से अधिक देशों में अपने सैन्य शिकंजा कसे हुए अमेरिका लीबिया को भी इराक व अफगानिस्तान की तरह अपने शिकंजे में जकड़ कर उसका दोहन करने के लिए अपनी कठपुतली शासकों को स्थापित करना चाहता है। रही बात अलकायदा की उसका एकमात्र ऐजेन्डा सारे विश्व में इस्लामिक शासन स्थापित करना। इसके प्रथम चरण में अलकायदा संसार के उन सभी मुसलिम बहुल्य देशों में कट्टरपंथी इस्लामी शासन स्थापित करना चाहता हैं। मिश्र व अन्य अरब देशों में वर्तमान में चल रहा जनविद्रोह भले ही बाहर से लोकशाही की बयार सी लगे पर उसके पीछे इस्लामी कट्टरपंथी ही हैं। जो मिश्र से लेकर संसार के हर मुसलिम बाहुल्य देशों में अपने समर्थक कटरपंथी शासन स्थापित करना चाह रहे है।
अलकायदा व अमेरिका के विस्तारवादी राह में संसार में इस समय इस्लामी बाहुल्य देशों में कर्नल गद्दाफी शासित लीबिया ही है। जिसे कर्नल गद्दाफी ने अपने चार दशक से अधिक लम्बे शासन में लीबिया को न केवल मजबूत बनाया अपितु वहां पर लोगों के जीवन स्तर में काफी सुधार भी लाये। यह बात अमेरिका व उनके विरोधियों को कहीं नहीं दिखाई देती। हो सकता है लम्बे समय के शासन में कर्नल गद्दाफी से भी कई भूलें हो गयी होगी। ग्लोबलाइजेसन की चकाचैध में नयी पीढ़ी को देश में कर्नल गद्दाफी का शासन तानाशाही लगे परन्तु इस विद्रोह ने कर्नल गद्दाफी के लीबिया के लिए अकूत राष्ट्रप्रेम को जरजर कर दिया। उन्होंने सपने में भी नहीं सोचा होगा कि लीबिया में उनको ऐसे दिन देखने पड़ेगें खासकर जिस लीबिया के मान सम्मान व बेहतरी के लिए उन्होंने अपना पूरा जीवन समर्पित किया। वर्तमान में कर्नल गद्दाफी को सबसे पहले लीबिया में अपने बर्चस्व की जंग को निर्मता से लड़नी पड़ रही है। अपने ही लोगों के खिलाफ अपनी सैन्य ताकत को झोंकना पड़ रहा है।
लीबिया के नौजवानों को ग्लोबलाइजेसन की इस आंधी में लीबिया की खुशहाली पर ग्रहण लगाने के लिए उतावले हुए अमेरिका व अलकायदा के मंसूबों को भांपना चाहिए तथा अपने विद्रोह को कर्नल गद्दाफी की अपील पर समाप्त कर देना चाहिए। कर्नल गद्दाफी को चाहिए कि वे सभी विद्रोहियों को आम माफी दे कर लीबिया को मजबूत बनाने व वहां पर लोकशाही को स्थापित करने का शुभारंभ करे। शासन प्रशासन में चल रही खामियों को दूर कर अमेरिका व अलकायदा का षडयंत्र को विफल करे। क्योंकि अगर शासन इस समय कर्नल गद्दाफी के हाथों से छटक जाता है तो उस पर अमेरिकी पिठ्ठुओं को शिकंजा जकड़ जायेगा तथा वहां पर अलकायदा अपनी जमीन मजबूत कर इसे भी इराक व अफगानिस्तान तथा पाक की तरह तबाही की गर्त में धकेल देगा।
जहां तक संयुक्त राष्ट्र संघ सहित पूरी विश्व विरादरी को इस संकट में किसी भी तरह से अमेरिका के झांसे में इराक व अफगानिस्तान प्रकरण की तरह नहीं फंसना चाहिए। विश्व जनमत को जिस तरह से गुमराह किया जा रहा है उससे विश्व में अमन शांति को ही ग्रहण लगेगा। कर्नल गद्दाफी तानाशाह हो सकते हैं परन्तु उन्होने लीबिया को मजबूत बनाया, अमेरिका के शिकंजे से इसे मुक्त रखा तथा इसे अलकायदा की ऐशगाह अन्य इस्लामिक देशों की तरह न बनने दी। आज जरूरत है लीबिया की स्थिति को बहुत ही गंभीरता से विचार करने की। अगर इस समय भी विश्व जनमत ने इराक प्रकरण की तरह अमेरिका के झांसे में आने की भूल की तो उसे इसकी बड़ी कीमत लीबिया में अलकायदा की जमात का बर्चस्व स्थापित हो कर चुकाना पड़ेगा। जिस प्रकार से तमाम इस्लामिक देश कर्नल गद्दाफी के खिलाफ आवाज उठा रहे हैं उससे साफ हो गया है कि कर्नल गदाफी अपने शासन में धार्मिक संकिर्णता को कोई स्थान नहीं देते। जिस कारण वे धार्मिक कटरपंथियों के निशाने पर है। चीन, रूस व भारत को इस समय वह भयंकर भूल करने की इजाजत अमेरिका व उसके प्यादे संयुक्त राष्ट्र को नहीं देनी चाहिए। अगर अमेरिका द्वारा प्रायोजित लोकतंत्र की छदम आन्दोलन को चीन कुचलता नहीं तो आज अमेरिका सोवियत संघ की तर्ज पर चीन को भी कबके कई टूकड़ों में विखेर देता। कभी कभी शासकों को व्यापक देशहित के लिए कड़े कदम उठाने पड़ते है। भले ही वह कितने ही अप्रिय क्यों न हो। संयुक्त राष्ट्र संघ को कोई नेतिक अधिकार नहीं है कि वह लीबिया पर हमला कर उसको इराक व अफगानिस्तान की तरह कब्जाने पर उतारू अमेरिका व उसके नाटो संगठन के हाथों का मोहरा बने। चीन, रूस व भारत को लीबिया को बचाने के लिए आगे आना चाहिए।

भारत में 20 परमाणु विजली संयंत्र व बांघों से मच सकती है जापान जैसी भारी तबाही


परमाणु बिजली संयत्रों व बड़े बांघों से भारत को करो मुक्त
भारत में 20 परमाणु विजली संयंत्र व बांघों से मच सकती है जापान जैसी भारी तबाही  
जापान के पफुकुशिमा परमाणु बिजली संयंत्र में हुए विस्पफोट से रेडिएशन उपजे सवाल
इस सप्ताह जापान में हुए विनाशकारी तबाही से जहां जापान अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष कर रहा हैं वही पूरा विश्व भौचंक्का हैं कि प्रकृति के इस प्रकोष कहीं इस पृथ्वी से मानवता का समूल विनाश का संकेत तो नहीं है। जापान में हुए भूकम्प व सुमानी से क्षतिग्रस्त हुए वहां के परमाणु संयत्रों से  जिस प्रकार से जापान के लिए भयंकर खतरा उत्पन्न हो गया है। उससे भारत में स्थापित हुए व होने वाले इस प्रकार के तमाम परमाणु ऊर्जा संयंत्रों को तत्काल बंद करने की मांग जोर पकड़ती जा रही है। देश में इस समय 20 परमाणु ऊर्जा संयंत्रा कार्यरत है। इनमें रावतभाटा में सबसे अध्कि 6 परमाणु संयंत्रा तथा कैंगा व तारापुर में 4-4  परमाणु संयंत्र कार्य कर रहे है। वहीं नरोरा, काकरापार व कलपक्कम में 2-2 परमाणु ऊर्जा संयंत्रा लगे हुए हैं। इसके साथ अमेरिका व अन्य देशों से हुए अभी परमाणु ऊर्जा समझोते के तहत सरकार कई अन्य संयंत्रा लगाने का मन बना चूकी है। इसके अलावा इस देश में सरकार ने तमाम सुरक्षा व पर्यावरण की संवेदनशीलता को दर किनारे रखते हुए तत्काल हितों व निहित स्वार्थों की अंध्ी पूर्ति के लिए देश में अंधध्ुंध् बांधें का निर्माण किया। इसमें टिहरी, भाखडा, सरदार सरोवर, जैसे दर्जनों भीमकाय बांघ हैं जो जापान जैसी त्रासदी को झेलने को कहीं दूर-दूर तक तैयार नहीं है। खासकर सरकार ने जिस प्रकार से जनता व भूगर्भीय वेताओं की तमाम विरोध् के बाबजूद टिहरी जैसे भूकम्प की दृष्टि से हिमालयी क्षेत्रा में विशाल बांध् बनाये वह आने वाले समय में जहां हिमालयी क्षेत्रा में ही नहीं देश के समुचे उत्तर भारत के लिए विनाश का कारण बन सकता है। जहां तक ऊर्जा का सवाल है तो उसे हम छोटे छोट हाइथ्रो बांध् बना कर अर्जित कर सकते थे। इससे जहां पर्यावरण भी बच जाता तथा देश में लाखों लोगों को विस्थापित नहीं होना पड़ता। परन्तु लगता है देश के हुक्मरानों को न तो इस प्रकार की भीषण प्राकृतिक आपदा का ही भान होगा व नहीं उनको इन प्रकृति की संरचना से कृर्तिम छेड़छाड से होने वाली विभिषिका का ही भान होगा। जहां तक अब देश के हुक्मरानों व नीतिनिर्धरकों का केवल एक ही स्वार्थ रहता है कि किस योजना से उनको ज्यादा से ज्यादा कमीशन हासिल होगा। उनको देश के वर्तमान ही नहीं भविष्य के हितों से अब कोई लेना देना नहीं रह गया है। अगर होता तो देश के भूकम्पीय दृष्टि से संवेदनशील क्षेत्रों में इस प्रकार से बड़े बांध् नहीं बनाये जाते। नहीं सरकार इस प्रकार के तमाम सुरक्षा मापदण्डों को कड़ाई से लागू किये बिना देश में एक भी परमाणु संयंत्रा स्थापित करती।
 यही नहीं श्रीकृष्ण विश्व कल्याण भारती के प्रमुख के तौर पर मैं इस मांग को इस समय देश की जनता व सरकार के संज्ञान में रखना भी अपना परम दायित्व समझता हॅू कि इस देश से तमाम प्रकार के बड़े परमाणु ऊर्जा संयंत्रों को ही नहीं अपितु तमाम बड़े बांधें को तत्काल बंद किया जाय तथा भविष्य में इस प्रकार के किसी भी परमाणु ही नहीं बड़े बांघों के निर्माण पर तत्काल अंकुश लगाया जाय। इसके साथ मैं अपनी उस मांग को भी यहां पर पिफर से आम जनता के समक्ष रखना चाहता हॅू जो मैने देश के साथ सप्रंग सरकार के मुखिया प्रधनमंत्राी मनमोहन सिंह ने अमेरिका के मोह में पफंस कर देश के हितों को दाव पर लगाते हुए अमेरिका व अन्य देशों से परमाणु असैनिक सहयोग संध् िपर हस्ताक्षर किये। इसका एक ही मकसद अमेरिका का था कि उसके देश में दशकों से कूड़े के ढेर की तरह कबाड़ हो रहे परमाणु संयंत्रों को ऊंची कीमत पर भारत में थोपा जाय। न जाने प्रधनमंत्राी मनमोहन सिंह की क्या विवशता थी कि वह अमेरिका के दवाब में आकर भारतीयों की इन संयंत्रों से संभावित दुर्घटना के समय क्षतिपूर्ति की शर्तों को भी क्यों उदार करने में जुटे रहे। देश में ऊर्जा के नाम पर जिस प्रकार से देश की सरकारों ने ऊंची कीमतों पर परमाणु ऊर्जा संयंत्रा को देश में स्थापित करने का मन बनाया हैं, जापान के इसी माह हुए हादसे को देखने के बाद आम भारतीय इस आशंका से भयभीत हैं कि अगर भविष्य में कभी भारत में इस प्रकार की दुर्घटना घट गयी तो इस देश का क्या होगा। क्योंकि जापान में तो सुरक्षा के मापदण्डों व इस आशय की आम जनमानस को जागरूक करने की जिम्मेदारी सरकार ने बखुबी से निभाई हैं परन्तु भारत में यहां के हुक्मरानों की नजरों में आम जनता व देश की सुरखा का कहीं महत्व ही नहीं होता है। इस कारण जिस प्रकार से देश में आनन पफानन में अमेरिका व अन्य देशों से परमाणु संयंत्रों के नाम पर सुरक्षा मानकों व आम जनता के हितों की रक्षा की जा रही है उससे देश के परमाणु सुरक्षा विशेषक्ष भी सहमें हुए है। जहां तक अंतरराष्ट्रीय परमाणु सुरक्षा ऐजेन्सी के मानकों का सवाल है तो वह अमेरिका के ही इशारे पर उसके हितों की पूर्ति के लिए उसके हाथों की कठपुतली सी है।
जापान में 11 मार्च को शुक्रवार को आये  विनाशकारी भूकम्प के कारण समुद्र से उमड़े प्रलयंकारी सुमानी की थप्पेड़ों से जहां जापान का बड़ा भूभाग तहस नहस हो गया वहीं उसके परमाणु ऊर्जा संयंत्रों को भी बुरी तरह से क्षतिग्रस्त कर दिया। अंतराष्ट्रीय परमाणु निगरानी संस्था ने कहा है कि जापान में भूकंप और सुनामी के बाद क्षतिग्रस्त हुए न्यूक्लियर एनर्जी प्लांट के आसपास के इलाके से एक लाख सत्तर हजार लोगों को हटाया जा रहा है। वियना स्थित अंतरराष्ट्रीय परमाणु उर्जा एजेंसी ;आईएईएद्ध ने सुमानी के कारण जापान के  पफुकुशिमा डाई-ची संयंत्रा के 20 किलोमीटर दायरे में रह रहे लोगों को इलाके को खाली करने का निर्देश दिया गया है।उल्लेखनीय है कि शनिवार को संयंत्रा में विस्पफोट होने के बाद रियक्टर की इमारत क्षतिग्रस्त हो गयी थी लेकिन रियक्टर सुरक्षित है। आईएईए का कहना है कि एक दूसरे परमाणु संयंत्र के करीबी इलाके में रहने वाले 30,000 लोगों ने इस इलाके को खाली कर दिया है।जापान के प्रधनमंत्राी नाओतो कान ने इसे द्वितीय विश्वयु( से बड़ा संकट करार दिया है।  पफुकुशिमा परमाणु संयंत्रा में विस्पफोटों के कारण जिससे पिफर से विकिरण का खतरा उत्पन्न हो गया। इसके बाद जापानी सरकार ने चेतावनी जारी की।
जापान में हुए इस हादशे ने पूरे विश्व की आंखे खोल दी है। परन्तु मुझे नहीं लगता है कि भारत के हुक्मरान इस दिशा में जरा भी ईमानदारी से कार्य करेंगे। देश के रक्षा विशेषज्ञ सी उदय भाष्कर के विचारों से मैं शत प्रतिशत सहमत हूूॅ कि देश के परमाणु संयंत्रों की सुरक्षा की व्यवस्था के साथ-साथ यहां के लोगों को इस प्रकार के हादसों से निपटने के लिए कोई जानकारी अभी तक उस सरकार ने नहीं दी जिसने देश में अभी तक 20 परमाणु संयंत्रा स्थापित कर दिये और दर्जनों और लगाने का मन बना रही है। इसे देख कर देश की जनता को चाहिए कि वह देश में परमाणु संयंत्रों के साथ-साथ बड़े बांधें को आगे किसी भी सूरत में न बनने दें। क्योंकि यदि प्रकृति का जो प्रकोष जापान में गत सप्ताह आया अगर वह भारत में आया तो देश एक प्रकार से कब्रिस्तान में ही तब्दील हो जायेगा। क्योंकि भारत में इससे बचाव के न तो आम जनता को कोई उपाय ही सरकार ने बताये हैं व नहीं इन संयंत्रों की सुरक्षा के प्रति उतनी संवेदनशीलता देखी जा रही है जो उच्च मानक जापान में देखने को मिल रहा है। इस तरह देश में हर हाल में वैज्ञानिक रक्षा अनुसंधनों व चिकित्सा क्षेत्रा के अलावा किसी अन्य प्रकार की ऊर्जा के लिए परमाणु ऊर्जा पर अंकुश लगाया जाना चाहिए। प्रकृति से छेडछाड व सुरक्षा मापदण्डों से खिलवाड़ की देश को बड़ी सजा भुगतना पड़ सकता है। इस लिए देश की अवाम की यह आवाज हर हाल में सुनी जानी चाहिए कि देश में परमाणु संयंत्रा व बड़े बांधें पर तत्काल अंकुश लगाया जाय। शेष श्रीकृष्ण कृपा। हरि ¬ तत्सत्। श्री कृष्णाय् नमो।

बाबा रामदेव की एकपक्षता ने कमजोर किया भ्रष्टाचार की असली जंग



बाबा रामदेव की एकपक्षता ने कमजोर किया भ्रष्टाचार की असली जंग
नाक की जंग तक सीमित रह गयी है बाबा रामदेव व कांग्रेस का जुबानी जंग
 भ्रष्टाचार शिकंजे में दम तोड़ रहे भारत को मुक्तिदाता के रूप में उभरे हुए बाबा रामदेव का एकपक्षीय भ्रष्टाचार के खिलाफ अभियान के मार्ग में आज सबसे बड़ा अवरोध कांग्रेसी नेता नहीं अपितु कोई दूसरा नहीं अपितु स्वयं बाबा रामदेव का एकपक्षीय भ्रष्टाचार विरोधी अभियान उनके भ्रष्टाचार के खिलाफ छेड़ी जंग को कमजोर कर रही है।  लिए आम भारतीयों के आशा के सूर्य बन कर उभरे बाबा रामदेव की एकपक्षीय भ्रष्टाचार की जंग ने देश की आशाओं पर बज्रपात ही कर दिया है। भले ही बाबा अपनी तरफ से इस अभियान को देश से भ्रष्टाचार के समूल सफाये के उद्देश्य से कर रहे हों परन्तु उनके द्वारा केवल कांग्रेस पर ही निशाना साधने व उनके अपने प्रदेश उत्तराखण्ड सहित अन्य भाजपाई प्रदेशों में हो रहे भ्रष्टाचार के मुद्दे पर उतने प्रखर हो कर न बोलने या मूक रहने से उनके इस ऐतिहासिक संघर्ष की धार ही कुंद हुई। देश की जनता भले ही कांग्रेसियों के द्वारा लगाये गये तमाम आरोपों को सिरे से नकार दे परन्तु बाबा द्वारा इस संघर्ष को निष्पक्ष न बनाये रखने के कारण आम जनता के उस विश्वास को जरूर झटका लगा जिससे उनको बाबा रामदेव देश को भ्रष्टाचार का मुक्तिदाता के समान लगता था। बाबा रामदेव को चाहिए कि वह देश की उस अवाम का डगमगाते हुए विश्वास को फिर से बहाल करने के लिए दलीय राजनीति से उपर उठ कर हर भ्रष्टाचार के खिलाफ खुल कर अपना संघर्ष जारी रखे। क्योंकि कांग्रेसियों द्वारा बाबा रामदेव पर अकूत सम्पतियां अर्जित करने के आरोप देश की आम जनता की नजरों में जानते हुए भी कहीं नहीं टिकते है। बाबा के पास जो भी संसाधन है वह उन्होंने किसी शासकीय पद या नीतियों को देशहितों पर चोट पंहुचा कर अर्जित नहीं किया। उन पर एक ही आरोप हो सकता है कि उन्होंने अर्जित धन पर कर नहीं भरा हो या जो दान दे  रहा हो उसके स्रोत का उनको जानकारी न हो, परन्तु उनका सम्पूर्ण संसाधन, योग तथा देश निर्माण के लिए भ्रष्टाचार के खिलाफ संघर्ष भी राष्ट्र के हितों की पूर्तिकारक व इसको मजबूत करने में महत्वपूर्ण योगदान दे रहे है। परन्तु इस दिशा में अपना पथ जनांकांक्षाओं के अनरूप ही पाक साफ रखने में बाबा रामदेव खासकर उत्तराखण्ड की उस भाजपा सरकार के भ्रष्टाचार पर मूक रह कर असफल रहे, जिस निशंक सरकार के जल विद्युत परियोजनाओं व रिषिकेश भूमि घोटाले की गूंज से पूरा प्रदेश स्तब्ध है। खासकर स्टर्जिया भूमि घोटाले में तो प्रदेश सरकार के मुख्यमंत्री ही खुद लिप्त हैं। जिसे उच्च न्यायालय ने भी भ्रष्टाचार के लिए भले ही प्रदेश प्रशासन को जिम्मेदार माना परन्तु प्रदेश की आम जनता ही नहीं इस मामले को उच्च न्यायालय में ले जाकर प्रदेश सरकार को कटघरे में खडा करने वाले उत्तराखण्ड राज्य आंदोलन के अग्रणी मोर्चा उत्तराखण्ड जनता संघर्ष मोर्चा के संयोजक व सर्वोच्च न्यायालय के प्रखर अधिवक्ता अवतार सिंह रावत ने देश की सर्वोच्च न्यायालय में इस काण्ड के असली भ्रष्टाचारी को दण्डित करने की मांग को लेकर गुहार लगाई है। इसके बाबजूद बाबा रामदेव द्वारा प्रदेश सरकार के भ्रष्टाचार पर खुल कर न बोलना देश व प्रदेश की जनता की नजरों में खटकता है। लोगों को बाबा की मूकता गले नहीं उतर रही है। वहीं दूसरी तरफ बाबा के इस भाजपा मोह या अपनी मजबूरी के कारण देश में  आजादी के बाद भ्रष्टाचार व देश की संस्कृति के संबर्धन के चलाये गये इस सबसे बड़े  ऐतिहासिक मुहिम की धार कुंद होने का भय आम जनता को ही नहीं इस मुहिम में जुड़े देश के अग्रणी समाज सुधारकों व बाबा के इस मुहिम में अपना सर्वस्व न्यौछावर करने वाले माॅं भारती के सपूतों को भी होगा।
  भ्रष्टाचार और काले धन को लेकर योग गुरू बाबा रामदेव की मुहिम का निशाना बनी कांग्रेस के नेता भी अब बाबा रामदेव को लगातार निशाना बना रहे है।  हालत यह हो गयी है कि भ्रष्टाचार के नाम पर शुरू हुआ यह संघर्ष अब भ्रष्टाचार के खिलाफ नहीं अपितु नाक की लड़ाई बन कर रह गयी है। जिस प्रकार से बाबा रामदेव की करोड़ों की सम्पतियों का खुलाशा हुआ और उसके बाद बाबा रामदेव के ट्रस्ट द्वारा भाजपा को चुनावी चंदा देने के बाद कांग्रेसी नेताओं ने भी खुलकर बाबा रामदेव के खिलाफ अपना जबावी अभियान शुरू कर दिया है।
 गौरतलब है कि बाबा रामदेव द्वारा कांग्रेस की प्राण समझी जाने वाली नेहरू गांधी परिवार की वर्तमान ध्वजवाहक सोनिया गांधी पर अप्रत्यक्ष निशाना साधने के बाद कांग्रेस ने शायद मूक रहना हितकर नहीं समझा ओर उसने संघ व भाजपा पर निर्मम प्रहार करने के लिए विख्यात रहे अपने महारथी दिग्गविजय यानी दिग्गी राजा को आगे किया। कांग्रेस के दिग्गज नेता दिग्गविजय द्वारा बाबा रामदेव से सीधे आरोप प्रत्यारोपों के दंगल में सीधी चुनौती देने से पूरे देश में कांग्रेसियों में एक संदेश गया कि कांग्रेस नेतृत्व अब बाबा रामदेव के आरोपों को मूक बन कर सहन करने के मूड़ में नहीं है। वह बाबा रामदेव के भ्रष्टाचार के विरोध तथाकथित अभियान को एकाकी मानते हुए इसे केवल भाजपा के लिए राह बना कर कांग्रेस को कमजोर करने का षडयंत्र मान रही है। खासकर जिस प्रकार से बाबा रामदेव भाजपा खासकर जिस प्रदेश में स्वयं रहते हैं व जिस प्रदेश उत्तराखण्ड में उनका विश्व विख्यात पातंजलि योग संस्थान हैं उस प्रदेश में हो रहे भाजपा सरकार पर बाबा रामदेव की मूकता पर भले ही कांग्रेसी प्रश्न उठाते नजर आये पर देश के आम जागरूक लोगों को भी बाबा रामदेव की उत्तराखण्ड व कर्नाटक भाजपा सरकार के भ्रष्टाचार पर मूकता भी अखरने लगी है। इसक्रम में उत्तराखण्ड के नेताओं में भी एक होड़ सी लगी हुई है। इस होड़ में कांग्रेस में जहां हरीश रावत समर्थकों ने अपने दलीय विरोधियों को पछाड़ते हुए मोर्चा ही मार लिया है। केन्द्रीय राज्य मंत्री व हरिद्वार के सांसद कांग्रेसी दिग्गज हरीश रावत ने महिनों पहले ही बाबा रामदेव को भ्रष्टाचार के मामले में उनके ही द्वारा प्रदेश सरकार के मंत्री पर करोड़ रूपये लेने के आरोप लगाने के बाद उस मंत्री का नाम उजागर करने की खुली चुनौती देते हुए उनके भ्रष्टाचार के खिलाफ अभियान पर ही प्रश्नचिन्ह लगा दिया था। इसके बाद हरीश रावत के दाहिना हाथ समझे जाने वाले प्रदेश में टिहरी विधानसभा के विधायक पूर्व राज्य मंत्री किशोर उपाध्याय ने भी बाबा रामदेव के खिलाफ एक हजार करोड़ से अधिक रूपये की सम्पति अर्जित करने का आरोप लगाते हुए इसकी जांच सीबीआई से करने की मांग की।  इसके बाद बाबा रामदेव पर आरोपों की झड़ी लगाते हुए अल्मोड़ा पिथोरागढ़ संसदीय क्षेत्र के सांसद व हरीश रावत के करीबी प्रदीप टम्टा ने आजतक सहित अनैक टीबी चैनलों में अपने सहयोगी सांसद प्रवीण ऐरन के साथ बाबा रामदेव के नार्को टेस्ट कराने की पुरजोर मांग की।  वहीं इसके साथ ही उत्तराखण्ड में प्रदेश की थोपी हुई राजधानी देहरादून में गत शुक्रवार को अखिल भारतीय कांग्रेस सेवादल के राष्ट्रीय समन्वयक नवनीत कालरा के नेतृत्व में एक प्रतिनिधिमंडल ने राष्ट्रपति को संबोधित एक ज्ञापन राज्यपाल श्रीमती मारग्रेट आल्वा को सौंपा। इसमें मांग की गई है कि तत्काल बाबा रामदेव की जेड प्लस सुरक्षा वापस ली जाए और आचार्य बालकृष्ण समेत उनकी संपत्ति की सीबीआई से जांच कराई जाए। श्री कालरा ने बताया कि जांच से पूर्व बाबा रामदेव और आचार्य बालकृष्ण को सभी ट्रस्टों और संस्थाओं से हटाकर रिसीवर नियुक्त किये जाने चाहिए, ताकि वे जुटाए गए काले धन को खुर्दबुर्द न कर सकें। जहां तक बात हैं कांग्रेसी आरोपों की इससे न तो बाबा रामदेव को व नहीं देश की आम जनता जो भ्रष्टाचार के लिए काफी हद तक कांग्रेस को ही दोषी मानती है उस पर असर होगा। बाबा रामदेव पर आरोप लगा कर कांग्रेसी तो बाबा रामदेव के पक्ष में देश की आम पीडित जनता को धकेल रही है। परन्तु बाबा रामदेव द्वारा एकपक्षीय भ्रष्टाचार के खिलाफ होना इस मुहिम को सबसे कमजोर करेगी। इस लिए बाबा रामदेव को मेरी यही सलाह है कि वह दलीय मोह व रागद्वेष से उपर उठ कर हर भ्रष्टाचार के खिलाफ मुखर हो कर प्रहार करे। देश की जनता उनसे इसी प्रकार की निष्पक्षता की आश लगाये हुए है। उनको इस बात का भान रहना चाहिए कि उनकी असली पूंजी उनके पास आज आयी अकूत सम्पति नहीं अपितु देश की सोयी व रौंदे गये स्वाभिमान को जागृत करने व बचाने के आवाहन से अर्जित देश की आम जनता का विश्वास है। उस विश्वास को बचाने में जहां तक बाबा रामदेव सफल रहेंगे वहीं उनको मंजिल तक पंहुचायेगा। उस विश्वास को अगर बाबा अपनी नाक की लड़ाई में कमजोर करेंगे तो वे भी समय  चक्र के थप्पेडों के प्रहार से इतिहास के पन्नों में कहां गुमनाम होंगे, इसकी शायद उन्होंने कल्पना भी नहीं की होगी। भगवान श्रीकृष्ण कालनेमियों को पूरी तरह से बेनकाब करते हैं और सत्य व न्याय के महारथियों को कुरूक्षेत्र में विजय श्री का वरण कराते है। अब फेसला बाबा रामदेव को करना है। समय फिर किसी को पश्चाताप करने का लम्हां भी नहीं देता है। शेष श्रीकृष्ण कृपा। हरि ओम तत्सत्। श्री कृष्णाय् नमो।