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Tuesday, November 27, 2012



महान गायक नरेन्द्रसिंह नेगी जी को शतःशतः नमन्


नरेन्द्रसिंह नेगी न केवल उत्तराखण्ड के चोटी के कलाकार हैं अपितु उन्होंने उत्तराखण्ड की सांस्कृतिक विरासत को अपने स्वरों से न केवल देश प्रदेश अपितु विदेश में बसे लाखों उत्तराखण्डियों  के हृदय में बसाने का भी काम किया। इसके अलावा उन्होंने सामान्य कलाकारों की तरह उत्तराखण्ड के हक हकूकों व जनांकांक्षाओं को अपनी अंध सत्तालोलुपुता से रौंदने वाले कुशासकों के कृत्यों को बेनकाब करने के लिए जनता में अपने विशेष गीतों से गूंजायमान किया है। सीमा रक्षा में जुटे सेना के असंख्य जवान हो या ससुराल में रहने वाली आम नारी या देश विदेश में रहने वाले लाखों प्रवासी अपनी जन्म भूमि से जोडने का एकमात्र सहारा नेगी जी के कालजयी गीत हैं। 
इससे आक्रोशित हो कर उत्तराखण्डी तत्व उनके विराट व्यक्तित्व पर छीटा कसी करने का का षडयंत्र  रच रहे है। इसलिए उत्तराखण्ड के तमाम प्रबुद्ध जनों से अपील है कि ऐसे तत्वों का मोहरा बन कर उनके  नापाक कृत्यों पर किसी प्रकार की टिप्पणी करने के बजाय उनको ब्लाक करें। उनको अहमियत ही न दें। जब तक नरेन्द्रसिंह नेगी के विराट जनहित के गीत व गायन है तब तक ऐसे बौनी मानसिकता के जनविरोधी तत्व कुछ नहीं कर सकते। हाॅं सभी लोग न तो ऐसे तत्वों को कहीं समारोहों में आमंत्रित करें व नहीं उन पर कोई कमेंटस करे। जो प्रदेश के हक हकूकों की रक्षा के लिए अपने हितों को दाव पर लगाने के अदम्य साहस करे ऐसे महान गायक नेगी जी को शतःशतः नमन्। 



प्रदीप टम्टा को प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष बनाना चाहते हैं तिवारी!
देहरादून (प्याउ)। क्या कांग्रेस के वरिष्ठ नेता नारायणदत्त तिवारी अपने प्रबल विरोधी हरीश रावत के सबसे करीबी सिपाहे सलार सांसद प्रदीप टम्टा को उत्तराखण्ड प्रदेश कांग्रेस का नया 
अध्यक्ष बनाना चाहते है। गत सप्ताह देहरादून में एफआरआई परिसर में स्थित तिवारी के अनन्त वन आवास में हुई प्रदीप टम्टा के साथ भेंटवार्ता के बाद तिवारी का यह कथन की ‘मेरी इच्छा है कि प्रदीप टम्टा प्रदेश की राजनीति में भी सक्रिय हो’, से तो कम से कम यहीं अर्थ लोग लगा रहे है। गौरतलब है कि सपा प्रमुख मुलायमसिंह के साथ पींगे बढ़ा रहे पूर्व मुख्यमंत्री नारायण दत्त तिवारी के साथ केन्द्रीय मंत्री हरीश रावत व सांसद प्रदीप टम्टा की भैंट होने से प्रदेश की राजनीति में नया समीकरण बनने के कायस लगाया जा रहा है।
जिस प्रकार से तिवारी के कई कृत्यों व प्रदेश के मुख्यमंत्री रहते हुए उनके कुशासन से प्रदेश की जनता में तिवारी के प्रति निरंतर आक्रोश बढ़ने के कारण कांग्रेस आला नेतृत्व ने तिवारी से दूरियां बना ली थी। इसी को भांपते हुए प्रदेश कांग्रेस में भी तिवारी से दूरियां बनायी गयी। इसके बाबजूद प्रदेश की राजनीति में तिवारी समर्थकों का दबदबा रहा और उनसे छत्तीस का आंकडा रखने वाले हरीश रावत संगठन व सरकार दोनों में अपना वर्चस्व रखने में असफल रहे। संगठन में जहां यशपाल आर्य व मुख्यमंत्री के पद पर विजय बहुगुणा आसीन हुए दोनों ही तिवारी के समर्थक ही माने जाते रहे। दोनों का समय समय पर हरीश रावत व उनके समर्थक निरंतर अप्रत्यक्ष रूप से विरोध करते रहते है। तिवारी व उनके केन्द्र में समर्थकों के लाख न चाहने के बाबजूद हरीश रावत केन्द्रीय मंत्री बनने में सफल हो गये और प्रदेश में मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा भी अपने ढ़ग से सरकार चलाते देख कर तिवारी व उनके समर्थक खुद को अपमानित महसूस कर रहे है। इसी का लाभ उठाते हुए मुलायम सिंह उप्र व उत्तराखण्ड में 2014 में और मजबूती के लिए तिवारी को अपने साथ लेने का दाव चलने की तैयारी कर रहे है। शायद इसी की भनक लगते ही कांग्रेस नेतृत्व के इशारे को समझते हुए इस पखवाडे केन्द्रीय मंत्री हरीश रावत व बाद में उनके सिपाहेसलार प्रदीप टम्टा ने तिवारी जी से मुलाकात की। हालांकि दोनों मुलाकात को दोनों नेता केवल सामान्य शिष्टाचार की भेंट बता रहे है। परन्तु जिस प्रकार से तिवारी जी का बयान समाचार पत्रों में आया कि उनकी इच्छा है कि सांसद प्रदीप टम्टा प्रदेश संगठन में भी सक्रिय भूमिका निभाये। गौरतलब है कि तिवारी से न तो हरीश रावत व नहीं सांसद प्रदीप टम्टा जो हरीश रावत के करीबी सिपाहेसलार माने जाते हैं, उनका दोस्ताना सम्बंध रहा। तिवारी व हरीश दोनों के नरसिंह राव के कार्यकाल से ही 36 का आंकडा रहा है जो वर्तमान में आज तक भी जारी है। ऐसे में प्रदेश कांग्रेस को अपनी इच्छा से नचाने की हसरत दिल में छुपा कर अपने समर्थक क्षत्रपों द्वारा अपनी उपेक्षा की जाने से आहत तिवारी अपने विरोधियों के साथ भी हाथ मिला सकते है। सुत्रों के अनुसार तिवारी इन दिनों अपने समर्थक समझे जाने वाले यशपाल आर्य, विजय बहुगुणा व सतपाल महाराज से पहले की तरह खुस नहीं है।
तिवारी व हरीश रावत के मेल मिलाप से एक अर्थ यह भी लगाया जा रहा है आगामी लोकसभा चुनाव में तिवारी ने जहां नैनीताल से चुनाव लडने की हुंकार भरी है, उसकी रणनीति को अंजाम देते हुए वे नैनीताल से पार्टी के संभावित दावेदार डा महेन्द्रपाल को भी किसी सूरत में प्रदेश अध्यक्ष बन कर अपनी राह में कांटे नहीं बोना चाहते। इसके साथ ही वे यशपाल ही नहीं सतपाल व विजय बहुगुणा को भी संकेत देना चाहते हैं कि अगर उनकी उपेक्षा की गयी तो वे प्रदीप टम्टा को आगे करके उनकी राह विकट कर सकते है। राजनीति के चतुर खिलाड़ी तिवारी यह भी भांप चूके हैं कि प्रदेश में हरीश रावत से मजबूत कोई छत्रप नहीं है इसलिए उन पर हाथ रख कर वे बाकी की राजनीति गोटियां चल सकते है। या हरीश रावत के एक सिपाहेसलार को अपने पक्ष में करके हरीश को मात देने का दाव चल रहे है। पर जो भी हो प्रदेश कांग्रेस की इस राजनीति से साफ हो गया कि प्रदेश कांग्रेस के नेताओं में भी नैतिकता व जनहितों के प्रति जरा सी भी स्थान नहीं रह गया। वे अपने पद को अक्षुण्ण बनाये रखने के लिए तिवारी या मुलायम जैसे लोगों के भी शरण में जा सकते हैं।
 

Sunday, November 25, 2012



आतंकियों से अधिक खतरनाक साबित हो रहे है देश की सुरक्षा के लिए सत्तांध हुक्मरान

आतंकी पाक से क्रिकेट खेल कर या आतंकियों को रिहा कराके नहीं कैसे होगी  देश की रक्षा 

कारगिल, संसद व मुम्बई पर आतंकी हमलों के बाद भी क्यों आत्मघाती नींद में सोये हैं भारतीय हुक्मरान

मुम्बई पर आतंकी हमले की बरसी पर अमेरिका में जेल में बद अमेरिकी ऐजेन्ट हेडली की मांग करे भारत
एक तरफ देश 26 नवम्बर को मुम्बई पर हुए हमले की बरसी मना रहा है। देश के हुक्मरान घडियाली आंसू बहा कर आतंकबाद का मुंहतोड़ जवाब देने की कसमें खा रहा है। पूरा देश इस काण्ड में जहां इस काण्ड पर मातम मना कर श्रद्धांजलि दे रहा है । वहीं इस काण्ड के मुख्य गुनाहगार अमेरिका व पाक में बैठ कर हमारे हुक्मरानों की नपुंसकता पर उपहास उडाते हुए उल्टा भारत पर फिर हमले की धमकी दे रहे है। देश के हुक्मरानों की नपुंसकता का इससे ज्यादा परिचय क्या होगा कि इस काण्ड के मुख्य गुनाहगार पाक में जश्न मना  रहा है हमारे देश के हुक्मरान उसी आतंकियों के संरक्षणदाता पाक के साथ क्रिकेट मेच खेलने व उनके हुक्मरानों से पींगे बढ़ाने के लिए बेशर्मी से लालायित है। अगर हमारे देश के हुक्मरानों में जरा सा भी देश से प्रेम होता और जरा सा भी स्वाभिमान होता तो वे अमेरिका से सीख ले कर आतंकियों व उनके रहनुमाओं को सजा देने का काम करते। वे अनुसरण करते कि कैसे अमेरिका ने आतंकियों  द्वारा 9/11 को अमेरिका पर किये गये हमले का मुंहतोड़ जवाब सात समुद्रपार जा कर अफगानिस्तान व पाक में आतंकियों को तहस नहस किया। आतंकियों को संरक्षण देने वाली अफगानिस्तानी तालिवान सरकार को उखाड़ फेंका व पाक में छुपु हुए आतंकी सरगना ओसमा बिन लादेन को पाक में ही घुस कर मार डाला। यही नहीं आतंकियों के शरणस्थलों पर ड्रोन हमला करके तबाह किये। आज इसी के कारण अमेरिका में 9/11 के बाद कोई आतंकी हमला करने की हिम्मत तक नहीं जुटा पा रहा है। परन्तु भारत में सरकार संसद पर हमला के दोषी आतंकी को ही फांसी की सजा देने की हिम्मत तक नहीं जुटा पा रही है। यही नहीं यहां केन्द्र सरकार ही नहीं राज्य सरकार भी देशद्रोहियों को धर्म से जोड़ कर उनको वोट बेंक समझ कर शर्मनाक खेल खेल रही है। देश के राजनैतिक दलों का राष्ट्रहित के बजाय अपने निहित दलीय स्वार्थ को वरियता देते हुए आतंकियों को दण्डित करने के बजाय उनको संरक्षण देते हुए छोड़ने की रहकतों पर न्यायालय भी हैरान है। अपनी जान से इन आतंकियो को पकड़ने वाले सुरक्षा बलों की मेहनत पर पानी फेरते हुए अपनी कुर्सी के लिए राष्ट्रघाती तुष्टिकरण करते हुए आतंकियों को रिहा करने का आत्मघाती कृत्य करने को उतारू देख कर समझ में नहीं आता है कि ये देश के हितैषी हुए तो दुश्मन किसे कहेंगे?।देश के हुक्मरान कितने नपुंसक है कि संसद व मुम्बई पर हुए आतंकी हमले के बाबजूद वे न तो इन हमलों के लिए दोषी पाक से दो टूक बात ही कर पाया व नहीं वह अमेरिका सहित पाक में इस काण्ड के दोषियों को भारत में लाने की हिम्मत ही कर पाया। हिम्मत तो रही दूर वह अमेरिका में जेल में बंद अमेरिकी व पाक दोनों के डब्बल ऐजेन्ट हेडली को भारत को सौंपने की पुरजोर मांग तक अमेरिका से नहीं कर पाया।
आज से चार साल पहले बुधवार, 26 नवंबर 2008 की रात भाड़े के दस आतंकियों ने  मुंबई के छत्रपति शिवाजी टर्मिनस स्टेशन, ताज होटल, होटल ओबेरॉय, लियोपोल्ड कैफे, कामा अस्पताल तथा दक्षिण मुंबई के अन्य अनेक स्थानों पर आतंकियों ने अंधाधुंध गोलीवारी करके इस हमले को अंजाम दिया।
इस हमले के एकमात्र जीवित दोषी आतंकी मोहम्मद अजमल कसाब को 21 नवम्बर 2012 को पुणे की यरवदा जेल में दी गयी फांसी पर पाकिस्तान  स्थित आतंकी संगठन तहरीक ए तालिबान पाकिस्तान के प्रवक्ता एहसानुल्लाह एहसान ने सीधे भारत को धमकी देते हुए कहा कि कसाब को फांसी पर लटकाए जाने का बदला संगठन भारत और अन्य जगहों पर हमलों के साथ लेगा।  गौरतलब  है  कि मुम्बई में आतंकी हमलों के गुनाहगार कसाब उन 10 पाकिस्तानी आतंकियों में एकमात्र ऐसा आतंकी था जिसको जीवित पकड़ने में भारत के सुरक्षाबल सफल हुए थे। इन 10 पाक के आतंकियों ने, समुद्र के रास्ते मुंबई में दाखिल होकर 26/11 हमले को अंजाम दिया था। इस हमले में 165 लोगों की मौत हो गई थी, जबकि कई लोग घायल हो गए थे। लम्बे समय से इन गुनाहगारों को फांसी न दिये जाने से देश की जनता सरकार की नपुंसकता से आक्रोशित थी। सवाल कसाब को फांसी देने या संसद हमले के दोषी अफजल गुरू को फांसी न देने का नहीं अपितु सवाल है देश की समग्र राष्ट्रीय सुरक्षा नीति का जो यहां के हुक्मरानों के दलीय स्वार्थ व सत्तामोह
के कारण वोटबेंक को करियता देने के आत्मघाति कुनीति के कारण दम तोड़ रही है। इन आत्मघाती सरकारों को इसका भान ही नहीं कि जब देश ही सुरक्षित नहीं रहेगा तो इनका राज ताज कहां से सुरक्षित रहेगा। देश का सबसे बड़ा दुर्भाग्य यह है कि न तो यहां के हुक्मरानों व न हीं किसी राजनैतिक पार्टी की देश के हित में कोई ठोस राष्ट्रीय नीति है । आज चीन, अमेरिका, इस्राइल ही नहीं पाक की भी एक ठोस राष्ट्रीय सुरक्षा नीति है। परन्तु दुर्भाग्य यह है कि संसार का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक देश व सबसे प्राचीन सभ्यता व संस्कृति वाला देश भारत की न केवल अपनी राष्ट्रवादी नीति है व नहीं अपना कोई आत्मसम्मान ही। केवल यहां के सत्तासीन अपनी कुर्सी के लिए देश की जनता को जाति, धर्म व क्षेत्र के नाम पर बांट कर अपना स्वार्थ सिद्ध करते हुए देश की सुरक्षा से खिलवाड कर रहे है। सच तो यह है देश की सुरक्षा के लिए आतंकियो से अधिक गुनाहगार देश के हुक्मरान हो गये। आतंकियों से तो हमारे सुरक्षाा बल देश की रक्षा करते ही आ रहे है परन्तु  इन आत्मघाती राजनैतिक दलों व हुक्मरानों का कैसे मुकाबला देश करेगा जो जाति, धर्म व क्षेत्र के नाम पर देश को कमजोर कर रहे हैं और पकडे गये आतंकियों का संरक्षण कर रहे है।आज इसी कारण देश पूरी तरह से भ्रष्टाचार, आतंक व कुशासन की गर्त में धंसा जा रहा है। एक तरफ अमेरिका व पाक और दूसरी तरफ चीन इस देश को तबाह करने के लिए दशकों से लगे हुए है। यह सब कुछ जानने के बाबजूद देश के हुकमरान देश हित में ठोस राष्ट्रीय सुरक्षा नीति बनाने के बजाय अपने दलीय व सत्ता स्वार्थ के लिए तुष्टिकरण का दाव खेल कर राष्ट्रीय हितों व सुरक्षा से खिलवाड कर  रहे हैं। आज जरूरत है देश की जनता को जागृत होने की। देश के हितों को समझने की। शेष श्रीकृष्ण कृपा। हरि ओम तत्सत्। श्रीकृष्णाय् नमो।

पौंटी जैसे थैलीशाहों के रहमों करम पर दम तोड़ती लोकशाही 

निशक सरकार में बना पौंटी का मित्र नामधारी अल्पसंख्यक आयोग का अध्यक्ष,

भाजपा व कांग्रेस, सपा बसपा शासन में भी पौंटी पर रही मेहरवानी
उप्र, पंजाब , उत्तराखण्ड के शासन प्रशासन पर पौंटी चढ़ढा का शिकंजा, 

पौंटी के प्यादे बने राजनेता के नाम बेनकाब किये जाय
उत्तर प्रदेश, पंजाब, उत्तराखण्ड सहित कई राज्यों में शराब, रियल स्टेट व फिल्म आदि कारोबार के बल पर इन प्रदेश के पदलोलुपु राजनेताओं को अपनी जेब में रख कर इन प्रदेश की सरकारों को अपने हितों की पूर्ति के लिए अपने इशारे पर चलाने वाले पौंटी चढ़ढा की हत्या से इन प्रदेश की लोकशाही पर गंभीर प्रश्न उठ गये हैं। सवाल केवल एक पोंटी चढ़ढा का नहीं अपितु देश की व्यवस्था में कदम कदम पर आज के सत्तालोलुपु हुक्मरानों ने असंख्य पौंटी चढ़ढाओं को देश की व्यवस्था पर ग्रहण लगाने के लिए संरक्षण दिया हुआ है। आज देश में दो या तीन दशक में जितने भी अधिकांश नव धनाडय हुए उनमें से 99 प्रतिशत ऐसे ही लोग है जिन्होंने देश व समाज को रौंद कर अपने अटल सम्राज्य स्थापित कर दिये है। अधिकांश भ्रष्टाचारी लोग आज अरबों खरबों की सम्पदा व उद्यमों के स्वामी बन गये हैं और आम मेहनतकश आम आदमी का जीना दूश्वार हो रखा है? जब यह स्थिति पर आम जनता ध्यान देती है तो उसको इस व्यवस्था से मोह भंग हो जाता है। आज ऐसी स्थिति देश के लोगों की है देश के हुक्मरान चाहे किसी दल का हो उनकी नीतियां व संरक्षण केवल पौंटी जैसे देश या विदेशी लोगों के लिए है आम आदमी की सुध लेने की उनको एक पल की फुर्सत तक नहीं है। इससे लोगों को इन राजनेताओं से धृणा हो गयी है। आम जनता मंहगाई, भ्रष्टाचार व आतंकवाद से त्रस्त है और देश के हुक्मरान देशी व विदेशी पौंटिओं की सेवा करने में ही मस्त है। देश में कानून, नियम सब गरीब व असहाय आदमी के लिए लुटेरों के लिए केवल देश लूटने के लिए रह गया है। उन्हीं लूटेरों के लिए सभी पार्टी, सभी सरकारें व सभी मठाधीश अपने दरवाजे खोलते है। आज सरकार मनमोहन की हो या भाजपा की सब अम्बानी जैसे थैलीशाहों या अमेरिका के इशारे पर नाचने के लिए हर पल तैयार है। देश व आम आदमी जाय भाड़ में। 
जनहितों की पूर्ति करने का दंभ भरने वाली पार्टियां कैसे पौंटी चढ़ढ़ा जैसे लोगों के हाथों का खिलौना बने होते हे। इसका खुलाशा उस समय हुआ जब इस सप्ताह पौंटी चढ़ढा और उसकी भाई हरदीप की छत्तरपुर के 42 नम्बर फार्म हाउस पर कब्जे को लेकर हुए विवाद में एक दूसरे की गोली मार कर हत्या के समय वहां पर उपस्थित पौंटी चढ़ढा के मित्र उत्तराखण्ड सरकार में अल्पसंख्यक आयोग के अध्यक्ष सुखदेव नामधारी का नाम प्रमुखता सामने आया। पुलिस सुत्रों के अनुसार इस विवाद में दर्ज दो एफआईआर में एक अवैध रूप से फार्म हाउस मे घुसने व दूसरी, घटना के वक्त मौजूद पौंटी के दोस्त उत्तराखण्ड के अल्पसंख्यक आयोग के अध्यक्ष सुखदेव नामधारी ने दर्ज करायी है। 
विजय बहुगुणा सरकार से प्रदेश की जनता यह जानना चाहती है कि आखिर पौंटी चढ़ढा के और कितने तथाकथित मित्रों को किसके कहने पर प्रदेश के इस महत्वपूर्ण पद पर नवाजा गया है?
हालांकि उत्तराखंड के पुलिस महानिदेशक (डीजीपी) सत्यव्रत बंसल ने बताया कि नामधारी को 2010 में भाजपा की रमेश पोखरियाल निशंक सरकार के कार्यकाल के दौरान राज्य अल्पसंख्यक आयोग का अध्यक्ष नियुक्त किया गया था। डीजीपी ने बताया कि त्यागी पिछले डेढ़ साल से उनकी सुरक्षा में तैनात था। पुलिस महानिदेशक ने हालांकि स्पष्ट किया कि उनके द्वारा इस मामले में कोई समानान्तर जांच नहीं की जा रही है क्योंकि अपराध स्थल दिल्ली है और नियमानुसार वहीं की पुलिस इस मामले को देख रही है। उन्होंने यह भी साफ किया कि दिल्ली पुलिस ने उन्हें इस मामले के बारे में कोई जानकारी नहीं दी है और उनसे कोई सहयोग भी नहीं मांगा है। इसके साथ अपने स्पष्टीकरण में ं पुलिस महानिदेशक ने कहा कि अभी यह पता नहीं चल पाया है कि नामधारी की पोंटी चड्ढा के साथ मौके पर मौजूदगी का क्या कारण था। उन्होंने कहा कि उन दोनों के बीच कोई व्यापारिक संबंध या मित्रता हो सकती है। एक अन्य प्रश्न के उत्तर में बंसल ने माना कि नामधारी के खिलाफ उत्तराखंड में कुछ मामले दर्ज हैं। हालांकि वह यह नहीं बता पाए कि ये मामले किस प्रकृति के हैं और राज्य के किस हिस्से में दर्ज हैं। उन्होंने कहा कि उन्होंने अपने अधिकारियों से इस मामले में सभी तथ्य जल्दी ही इकट्ठा करने और उन्हें उनसे अवगत कराने को कहा है। सवाल केवल एक नामधारी का नहीं अपितु ऐसे कितने ओर लोगों को उत्तराखण्ड सहित अन्य प्रदेशों में महत्वपूर्ण पदों पर पौंटी जैसे लोगों के चेहतों को आसीन किया गया है। 
0 उत्तराखण्ड में पौंटी चढ़ढा का कितना शिकंजा कसा हुआ था इस आशय की एक खबर दिल्ली से प्रकाशित प्रतिष्ठित बिजनेस स्टेडेर्ड ने 19 नवम्बर के अंक में 
(Ponty wanted to enter power sector in big way in Uttarakhand
Chadha's liquor companies were allotted over a dozen hydel projects with capacity ranging between 5 Mw to 25 Mw in 2010 by the state government),एक खबर प्रमुखता से प्रकाशित की है। इस खबर के अनुसार 2010 में तत्कालीन भाजपा सरकार ने 56 जल विद्युत परियोजनाअेां जिसमें एक दर्जन से अधिक हाइथ्रो पावर प्रोजेक्ट को चढ़ढा के कम्पनियों को आनन फानन में आवंटित कर दिये थे जिस पर भारी विवाद हुआ था जिसको हाई कोर्ट के हस्तक्षेप के बाद रोक दिये गये। हालांकि चढ़ढा समर्थिक कंपनियां इस मामले को सर्वोच्च न्यायालय में ले गयी है। कांग्रेस को कुशासन व भ्रष्टाचार के लिए कोसने वाली भाजपा का चेहरा अब पौंटी चढ़ढ़ा प्रकरण से पूरी तरह से बेनकाब हो गया कि कैसे भारतीय संस्कृति व रामराज्य की दुहाई देने वाला दल भी कांग्रेस आदि दलों की तरह अपने निहित स्वार्थो के लिए कभी पौंटी से गलबहियां व तो कभी रेड्डी बंधु जैसे लोगों से गलबहियां करते है। शासन व प्रशासन के महत्वपूर्ण पदों में प्रबुद्ध जानकार व साफ छवि के लोगों को आसीन करने के बजाय थैलीशाहों के प्यादों को आसीन किया जाता है। अगर प्रदेश में वर्तमान में आसीन लोगों के कारनामों की निष्पक्ष जांच हो तो जो बदरंग चेहरा सामने आयेगा उससे लोगों को इन दलों से धृणा ही हो जायेगी। 
यहां मामला केवल भाजपा व कांग्रेस तक ही सीमित नहीं है। अपितु चढ़ढा और उस जैसे लोगों ने यहां के सामाजिक, राजनैतिक, आर्थिक ही नहीं सांस्कृतिक क्षेत्र पर भी अपना अंकुश व प्यादे स्थापित कर दिये है। आज प्रदेश मे ंयह आम धारणा यह है कि यहां सरकार भाजपा हो या कांग्रेस या किसी की भी बने पर सरकार को पौंटी जैसे लोग ही संचालित करेंगे। संघ व भाजपा के नेताओं को आत्मचिंतन करना चाहिए कि देवभूमि को पौंटीकरण करने के लिए उन्होंने जो प्यादे प्रदेश की सत्ता में आसीन किये उसके लिए उनका कोई प्रायश्चित नहीं है। जनमत व साफ छवि के नेताओं को नकार कर पौंटी जैसे लोगों के प्यादे बने लोगों को प्रदेश के मुख्यमंत्री के पदों पर आसीन करने की प्रवृति से ही कांग्रेस, सपा, बसपा आदि तमाम पार्टियों का आज शर्मनाक हस्र हो रखा है। भाजपा को यह समझ लेना चाहिए कि जनता सब जानती है? केवल नारे या भगवान का नाम ले कर आस्तीन के सांपों को संरक्षण व पोषण करने वालों के चेहरे को जनता बखुबी से पहचानती भी है। 
यह केवल उत्तराखण्ड की ही नहीं अपितु उप्र, पंजाब सहित कई प्रदेशों में पौंटी या उसी की तरह के लोग परोक्ष रूप से सत्ता में काब्जि है। जिस प्रकार से उप्र में मायावती सरकार में पौंटी की तू ती सरकार में बोलती थी उस पर किसी प्रकार का अंकुश मुलायम सिंह की सरकार में नहीं लगा। वहीं उत्तराखण्ड में भाजपा की हो या कांग्रेस की उस पर पौंटी चढ़ढ़ा का साफ असर देखा गया। यही नहीं उत्तराखण्ड जेसे देव भूमि में पौंटी का खास मित्र जो किसी की सम्पति पर कब्जा करने के मिशन में तक साथ रहता हो ऐसे लोगों को अल्पसंख्यक आयोग का अध्यक्ष बनाया जाता है तो यह प्रदेश सरकारों की शराब के कारोबारी व सत्तारूढ़ पार्टी के आकाओं के करीबी रिश्ते को ही बेनकाब करते है। भले ही पौंटी की सम्पति के बारे में 6000 करोड़ बता रहे हों परन्तु उसकी सम्पति कई लाख करोड़ से कम किसी भी सूरत में नहीं है। जिस प्रकार से गाजियाबाद से लेकर कई प्रदेशों में उसके ज्ञात अज्ञात अकूत सम्पति बटोरी गयी है वह किसी अजूबे से कम नहीं है। कैसे उत्तराखण्ड के रामनगर में छोटे से ढाबा चला या मुरादाबाद में शराब के ठेके के बाहर दाल पानी बेच कर अपना व्यवसायिक जीवन शुरू करने वाले पौंटी व उसके पिता कुलवंत सिंह चढ़ढा परिवार ने लाखों करोड़ की सम्पति बटोरी इसके पीछे सफेद पोश राजनेताओं व भ्रष्ट नौकरशाहों का शर्मनाक संरक्षण काफी हद तक जिम्मेदार है। 
एक बात सभी को अपने दिलो दिमाग में बिठा लेनी चाहिए कि भगवान के घर अंधेर नहीं है वह सभी को उनके कर्मो को फल समयानुसार देता है। उसके आगे किसी की तिकडम व बाहुबल या सत्ता की हनक काम नहीं करता है। शेष श्रीकृष्ण कृपा। हरि ओम तत्सत्। श्रीकृष्णाय् नमो।
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आम आदमी पार्टी के खेवनहार क्यों नहीं जीत पा रहे हैं अपनो का ही विश्वास

नई दिल्ली (प्याउ)।एक तरफ देश को भ्रष्टाचार व स्थापित दलों की अलोकशाही प्रवृति से मुक्ति दिलाने के नाम पर देश में एक नयी राजनैतिक दल ‘आम आदमी पार्टी’ के गठन का ऐलान अन्ना हजारे के नेतृत्व में जनलोकपाल गठन की देशव्यापी जनांदोलन के सबसे प्रमुख सिपाहेसलार अरविन्द केजरीवाल, मनीष सिसौदिया व साथी 24 नवम्बर को देश की सर्वोच्च संस्था संसद भवन के करीब काॅस्टीटयूशन क्लब में कर रहे थे। वहीं उसी समय अण्णा, रामदेव सहित देश के तमाम जनांदोलनों के निर्णायक संघर्ष का कुरूक्षेत्र रहे संसद की चैखट जंतर मंतर पर इंडिया अगेन्सट करप्शन के पुराने साथी श्रीओम अर्जव अपने साथियों के साथ सरकार से अण्णा व अरविन्द दोनो पर जनता को गुमराह करने का आरोप लगाते हुए अविलम्ब लोकपाल विधेयक को संसद के इसी सत्र पारित करने की मांग को लेकर धरना दे रहे थे।
ऐसा नहीं कि केवल राष्ट्रीय धरना स्थल जंतर मंतर में ही एआईसी के पूर्व साथी विरोध कर रहे थे। जैसे ही काॅस्टीट्यूशन क्लब में अपने आम आदमी पार्टी की घोषणा करते हुए बताया गया कि इस पार्टी की करीब 350 संस्थापक सदस्य होंगे तो इस पर भी वहां पर एआईसी से प्रारम्भ से जुडे लोग ही हैरान हो गये।इस बारे में अपना विरोध अशोक अरोड़ा नामक आईटी के विजिटिग प्रोफेसर मनीष सिसौदिया के फेसबुक पर किये कमेंटस में स्पष्ट लिखा की जब हजारों लोगों ने अपने खून पसीने से एआईसी को सींचा तो केवल 350 ही लोगों को किस आधार पर संस्थापक सदस्य माना गया। उन्होंने अपने कमेंटस में लिखा भी उनके साथ तिलक नगर विधानसभा क्षेत्र के कार्यकत्र्ताओं ने इस बारे में प्रश्न पूछा तो उन्होंने  भी इसका सीधा उतर देने के बजाय बाद में स्पष्ट करेंगे कह कर उपेक्षा की। इसके बाद गोपाल राय ने भी इसी प्रकार का उतर दिया। इस प्रकार से किसी ने भी उनके इस प्रश्न का कोई उतर नहीं दिया। भ्रष्टाचार के खिलाफ संघर्ष करने वाले आईटी के समर्पित कार्यकत्र्ता इस बात से हैरान थे कि पार्दिर्शता की दुहाई देने वाले अरविन्द व साथी अपने साथियों से निर्णय लेने पर क्यों ऐसा खुद आत्मसात नहीं करते? इसके साथ अपने कमेंटस में उनकी आम आदमी वाली कथनी व करनी पर भी प्रश्नचिन्ह खडे किये।
हालांकि 25 नवम्बर को इस नवगठित दल आम  आदमी पार्टी ने अरविन्द केजरीवाल को अपना राष्ट्रीय संयोजक बनाने की घोषणा की। इसके साथ पंकज गुप्ता को राष्ट्रीय सचिव व कृष्णकांत को कोषाध्यक्ष बनाया गया है। इनका चुनाव 23 राष्ट्रीय कार्यकारणी के सदस्यों ने आम सहमति से किया। अरविन्द केजरीवाल की आम आदमी पार्टी, आने वाले 2014 व उससे पहले दिल्ली विधानसभा चुनाव में क्या रंग दिखायेगी। परन्तु उससे बडे सवाल यह है कि कांग्रेस व भाजपा को देश में लोकतंत्र को कमजोर करने का आरोप लगाते हुए जनता का विश्वास अर्जित करने की दिशा में जनांदोलन की राह के राही बने अरविन्द केजरीवाल क्यों अपने साथियो का विश्वास  नहीं जीत पा रहे हैं? क्यों उनकी शंकाओं का निवारण कर पा रहे है? क्यों दो साल के संघर्ष की राह में उनके ख्यातिप्राप्त रहुनुमा अण्णा हजारे एवं किरण वेदी, मेघा पाटेकर, राजेन्द्र सिंह व  अरविन्द गोड सहित अनैक साथी एक एक करके उनसे किनारा कर रहे है?

Saturday, November 24, 2012


नरेन्द्र नेगी के ‘जय नन्दा राज राजेश्वरी ’गीत से गूंजायमान हुआ दिल्ली का अंतरराष्ट्रीय व्यापार मेला

दस सालों में दिल्ली की सरकारों से मदद लेगा नहीं देगा उत्तराखण्ड

भले ही उत्तराखण्ड के महान गायक नरेन्द्रसिंह नेगी दिल्ली के प्रगति मैदान में लगे भारत के अन्तराष्ट्रीय व्यापार मेले में 24 नवम्बर की सांयकाल को आयोजित उत्तराखण्ड दिवस समारोह में साक्षात उपस्थित नहीं थे  परन्तु अन्य कलाकारों द्वारा उनके द्वारा गाये गये कालजयी गीत ‘जै भगोती नन्दा, जै ऊंचा कैलाशों की‘ तेरों त्रिसिग्या खाडू, तेरी छतेरी रिंगाल की...’.को गा कर यहां का पूरा ही माहौल भगवान शिवशक्ति की परमशक्ति ‘श्री नन्दा राज राजेश्वरी’ मय कर दिया। उत्तराखण्ड के महान गायक नेगी जी द्वारा गाये इस गीत पर अन्य कलाकारों के स्वरों. पर अपने सुन्दर नृत्य से  नन्दादेवी के मूल क्षेत्र की परंपरागत पाखूला पहने हुई सुन्दर नृतकियों व परंपरागत परिधान पहनेे कलाकारों ने इस समारोह में उपस्थित मुख्यमंत्री  विजय बहुगुणा सहित तमाम लोगों का मनमोह लिया।
गौरतलब है कि उत्तराखण्ड प्रदेश में सत्तासीन रहे कांग्रेस के तिवारी सरकार व भाजपा की निशंक सरकार के कार्यकाल में हुए भ्रष्टाचार को बेनकाब करने वाले जनता में व्यापक जागृति फेलाने वाले कालजयी गीतों को गा कर वहां के शासन प्रशासन तथा उनके प्यादों की आंखों के प्यादे बन गये हो। इसी कारण भ्रष्ट राजनेताओं व नौकरशाहों का गिरोह इस उत्तराखण्डी संस्कृति व लोकशाही के ध्वजवाहक जनता के दिलों में राज करने वाले महान गायक को बदनाम करने के लिए तमाम प्रकार की धृष्ठता कर रहे हैं, जनता इनके तथाकथित षडयंत्रों व प्रदेश की संस्कृति को दुषित करने वाले गीतों की भी कडी भत्र्सना करते हुए सिरे से नकार रहे है। उत्तराखण्ड समाज के तमाम बुद्धिजीवियों व चिंतकों ने इस प्रकार की प्रवृति की कड़ी भत्र्सना करते हुए जनता से आवहान किया कि वे इस प्रकार के तत्वों को नजरांदाज कर दे।
उत्तराखण्ड सरकार के संस्कृति विभाग द्वारा आयोजित इस समारोह में मुख्य अतिथि प्रदेश के मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा थे वहीं विशिष्ट अतिथि कबीना मंत्री दुर्गापाल थें। इस अवसर पर मुख्यमंत्री ने दो टूक शब्दों में कहा कि दिल्ली लघु उत्तराखण्ड है। दिल्ली के उत्तराखण्डियों ने राज्य गठन के संघर्ष में जो ऐतिहासिक योगदान दिया। इस अवसर पर मुख्यमंत्री ने कहा कि वे देश में ही नहीं विदेश में काफी भ्रमण किया है। जो टिहरी बांध से निर्मित झील है वह स्वीजरलेण्ड व कनाडा की झीलों से अधिक सुन्दर व पर्यटकों के लिए आकर्षित करने वाली होगी। उन्होंने कहा कि मात्र 12 साल में उत्तराखण्ड ने जो विकास करके देश के विकास की दर से अधिक विकास की दर अर्जित करने में सफलता हासिल की है। उन्होंने सगर्व इस बात का ऐलान किया कि उत्तराखण्ड को प्रवृति ने तमाम अकूत संसाधन दिये हैं वह दिन दूर नहीं दस बीस सालों में ही हम दिल्ली की मदद के लिए मोहताज नहीं होंगे अपितु दिल्ली को हम अपनी तरफ से मदद देंगे।
उत्तराखण्ड राज्य गठन जनांदोलन के प्रमुख संगठन उत्तराखण्ड जनता संघर्ष मोर्चा के अध्यक्ष देवसिंह रावत, केन्द्रीय मंत्री हरीश रावत के करीबी कांग्रेसी नेता नन्दन घुघतियाल व कमल सिंह बिष्ट, अग्रणी गायक चन्द्रसिंह राही,  उद्यमी के सी पाण्डे, समाजसेवी मोहन सिंह रावत, पत्रकार सुनील नेगी, उर्मिलेश भट्ट, अनिल पंत व सतेन्द्र रावत, कांग्रेसी नेता अषाडसिंह अधिकारी व भगवती प्रसाद नौगांई, हुकमसिंह कण्डारी, अधिवक्ता सुधीर सजवाण आदि प्रमुख समाजसेवी उपस्थित थे। इस अवसर पर प्रदेश सरकार में संस्कृति सचिव डा उमाकांत पंवार, मुख्य सचिव रनबीर सिंह, दिल्ली में मुख्य स्थानिक आयुक्त एस के मुट्टू अपर सचिव अमित नेगी, षैलेश गोली, व स्थानिक आयुक्त शंकरदत्त शर्मा व मुख्य व्यवस्थाधिकारी रंजन मिश्रा सहित अनैक वरिष्ट अधिकारी उपस्थित थे।

Friday, November 23, 2012


एकादशी की बग्वाल की हार्दिक शुभकामनाएॅ

आप सभी को 24 नवम्बर को इकास बग्वाल की हार्दिक शुूभकामनाएॅ।  दीपावली के 11 दिन बाद एकादशी की तिथी के अवसर पर  आयोजित इस बग्वाल को इकास यानी इकादशी बग्वाल के नाम से पूरे उत्तराखण्ड में दिवाली की तरह ही बहुत ही हर्षोल्लाश के साथ मनाते है। उत्तराखण्ड में तीन बग्वाल यानी दिवाली मनाने की प्रथा है। पहली बग्वाल यानी दिवाली पूरे उत्तराखण्ड में दीपावली के एक दिन पहले मनायी जाती है। उसे जेठी बग्वाल के नाम से जाना जाता है। दूसरी बग्वाल जिसे पूरे देश में दीपावली के नाम से मनाया जाता है और तीसरी बग्वाल दीपावली के 11 दिन बाद मनायी जाती है इसे छोटी या इकास बग्वाल के नाम से जाना जाता है। इस दिन भी बग्वाल की तरह दाल के पकोड़े आदि व्यंजनों व घर आंगन को फूलों से सजाने के साथ साथ गौ ग्रास पूजन किया जाता है। तीनों बग्वाल के अवसर पर नव विवाहित बहुयें अपने मायके भी विशेष रूप से जाती है। 


प्रगति मैदान व्यापार मेले में 24 नवम्बर को उत्तराखण्ड दिवस पर भी उत्तराखण्डी समाज की उपेक्षा क्यों?

उत्तराखण्ड सरकार की उदासीनता से उपेक्षित है दिल्ली के 30 लाख उत्तराखण्डी

हिमाचल, केरल व आंध्र प्रदेश की तरह दिल्ली में अपने समाज को नहीं जोड़ पायी उत्तराखण्डी सरकार

दिल्ली में 14 नवम्बर से लगे अंतरराष्ट्रीय व्यापार मेले के भव्य आयोजन में जहां उत्तराखण्ड भागीदार राज्य है। इस मेले में प्रत्येक राज्य अपना दिवस मनाता है। 24 नवम्बर को इस मेले में उत्तराखण्ड दिवस मनाया जायेगा। परन्तु दिल्ली में रहने वाला उत्तराखण्ड के 30 लाख से अधिक उत्तराखण्डियों को इसकी भनक तक नहीं है। 12 सालों से मैं इस समारोह में अधिकांश भाग लेता हॅू परन्तु मैने जिस प्रकार से प्रदेश के लाखों रूपये झोंक कर यहां पर उत्तराखण्ड दिवस व उसमें सांस्कृतिक संध्या का आयोजन किया जाता है, उसमें खाना पूर्ति की भीड़ को देख कर अगर इनके अधिकारी व नेता कभी दिल्ली के उत्तराखण्डी बाहुल्य क्षेत्रों में आयोजित सांस्कृतिक समारोह की तरफ देखते तो उनको खुद अपने इस कृत्य पर शर्म आती। इस समारोह के पास ऐसे लोगों को दिये जाते  है या तो वे इस समारोह में न आते हैं व नहीं उनको उत्तराखण्डी संस्कृति से दूर दूर तक कोई लगाव तक नहीं है। जो समाज अपनी संस्कृति व प्रदेश के विकास के लिए दिलों में स्थान देता है उसको न तो इस समारोह से व नहीं खुद से जोड़ने से सरकार ने कभी ऐसी पहल की जिस प्रकार की पहल हिमालय के प्रथम मुख्यमंत्री यशवंत परमार ने दिल्ली के हिमाचली ही नहीं उत्तराखण्डी समाज को बार बार एकजूट कर प्रेरित करके किया था। आज उन्हीं की बदोलत हिमाचल उत्तराखण्ड को ही नहीं अपितु देश के अधिकांश राज्यों को पछाड़ कर देश का सबसे शांत व विकसित राज्य बन गया है।
दिल्ली में अन्य राज्यों की तरह प्रदेश से वेतन डकारने के लिए यहां उत्तराखण्ड सरकार के कई भवन हैं। इसमें चाणाक्यपुरी में उत्तराखण्ड निवास व उससे कुछ ही दूरी पर बना उत्तराखण्ड सदन। इसके अलावा बाराखम्बा रोड पर उत्तराखण्ड मुख्य स्थानिक आयुक्त, गढ़वाल व कुमायूं मण्डिल विकास निगम का कार्यालय, चाणाक्यपुरी में उत्तराखण्ड सूचना केन्द्र व मुख्यमंत्री के विशेष कार्याधिकारी, सहित अन्य कार्यालय है। परन्तु 12 साल बाद भी उत्तराखण्डियों को जोडने की दिशा में प्रदेश सरकार व उनके अधिकारियों ने कोई ऐसी पहल तक नहीं की जैसे आंध्र प्रदेश, केरल, आदि राज्यों के इसी प्रकार के विभाग यहां अपने राज्य के समाज को अपने साथ जोड़ने की करते है। राष्ट्रीय धरनास्थल से सटे जंतर मंतर रोड़ पर स्थित केरल भवन में कभी ओणम व कभी अन्य कार्यक्रम से मलयाली समाज यहां पर बडे उत्साह से जुड़ता है। आंध्र प्रदेश व मध्य प्रदेश में भी न केवल इन प्रदेशों के अपितु दूसरे प्रदेशों के लोग भी दूर दूर से जुडते है। परन्तु क्या मजाल है उत्तराखण्ड जैसे देवभूमि की सरकार व वहां के प्रशासन ने राज्य गठन के बाद भी देश विदेश के लोगों को जोड़ने की मजबूत पहल करनी तो रही दूर दिल्ली में रहने वाले 30 लाख जागरूक उत्तराखण्डियों को ही जोड़ने की ईमानदारी से पहल नहीं की। जबकि यहां पर उत्तराखण्ड महोत्सव व स्थाापना दिवस या वहां के प्रसिद्ध विखौती या बग्वाल आदि उत्सवों का भी आयोजन किया जाना चाहिए था। यहां पर उत्तराखण्डी संस्कृति व खान पान आदि का विशेष आयोजन होना चाहिए था। जिस प्रकार से लोग दक्षिण भारतीय खाने के लिए आंध्र प्रदेश भवन दूर दूर से जाते हैं, उसी प्रकार उत्तराखण्डी भोजन के लिए लोग दिल्ली में उत्तराखण्ड निवास में भी आ सकते है। परन्तु न तो यहां के नेताओं व नहीं यहां के नौकरशाहों को इस दिशा में कुछ करने की ललक है व नहीं सुध। उनका ध्यान तो केवल प्रदेश के संसाधनों को कैसे पौंटी जैसे लोगों व उनके प्यादों को लुटवाने में ही लगा रहता।
हालांकि दिल्ली को एक प्रकार से उत्तराखण्ड मय है। यहां दिल्ली में उत्तराखण्डी समाज दिल्ली की कुल आवादी का सातवें हिस्से का प्रतिनिधित्व करने वाला प्रमुख समाज है। यहां उत्तराखण्ड के 30 लाख से अधिक लोग राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली में निवास करते है। उत्तराखण्ड में उप्र व वर्तमान प्रदेश सरकार द्वारा रोजगार, शिक्षा व चिकित्सा आदि महत्वपूर्ण  क्षेत्रों में की गयी उपेक्षा के कारण यहां से अधिकांश लोग रोजी रोटी व शिक्षा दीक्षा के लिए मजबूरी में यहां पर पलायन का दंश पीढ़ी दर पीढ़ी झेलना पडता है। इन्हीं पलायन के दंश झेले हुए दिल्ली, मुम्बई, लखनऊ सहित देश विदेश में रहने वाले उत्तराखण्डियों ने आपसी सहयोग व शासन प्रशासन पर दवाब डाल कर उत्तराखण्ड में शिक्षा, चिकित्सा, मोटर मार्ग सहित अन्य विकास व व्यापक जनजागरण के कार्य किये। यही नहीं उत्तराखण्ड राज्य गठन में भी उत्तराखण्ड के लोगों ने संसद की चैखट पर निरंतर 6 साल तक निरंतर सफल धरना प्रदर्शन करके देश में राज्य निर्माण के इतिहास में नया कीर्तिमान स्थापित किया। देश में अब तक किसी भी राज्य गठन के लिए देश की राजधानी में इतना लम्बा जीवंत आंदोलन नहीं चलाया गया था। इसके साथ देश विदेश में भी यह आंदोलन के समर्थन में लोगों ने बैठकें, सभायें व रैलियां निकाली। आज राज्य गठन के 12 साल बाद जब यही समाज प्रदेश सरकार व उसके शासन प्रशासन से कोई अपनत्व भरा स्नेह भी नहीं पाते तो उनके दिलों व दिमाग में कैसी पीड़ा व अपमान होता होगा इसका अहसास प्रदेश के हुक्मरानों को कहां?

Thursday, November 22, 2012


सत्तांध कांग्रेसी मठाधीशों को लोकशाही का पाठ पढ़ाने वाली सांसद राजलक्ष्मी शाह ने ली शपथ

नई दिल्ली (प्याउ)। विधानसभा चुनाव में मिले जनादेश का उपहास उडा कर जिस शर्मनाक थोपशाही से कांग्रेस आलाकमान ने उत्तराखण्ड के सत्तारूढ़ विधायकों की इच्छा के खिलाफ विजय बहुगुणा को प्रदेश के मुख्यमंत्री के रूप में थोपा। उस कांग्रेसी थोपशाही के प्रतीक मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा को लोकशाही का पाठ टिहरी लोकसभाई उपचुनाव में सिखाने वाली उत्तराखण्ड की स्वाभिमानी टिहरी संसदीय क्षेत्र की जनता ने उनके द्वारा रिक्त की गयी संसदीय सीट टिहरी में हुए उप चुनाव में ऐसा सबक सिखाया कि जिसकी गूंज दिल्ली में बेठे कांग्रेसी मठाधीशों को भी सुनाई दी। मुख्यमंत्री की कुर्सी पा कर लोकशाही का अपमान करते हुए जिस प्रकार कांग्रेस ने टिहरी संसदीय सीट पर विजय बहुगुणा की अंध पुत्रमोह का समर्थन करके टिहरी से उनके बेटे को पार्टी का प्रत्याशी बनाया ‘उसे देख कर जनता में संदेश गया कि कांग्रेस के वर्तमान नेतृत्व को न तो लोकशाही का लेशमात्र भी सम्मान करती है, व नहीं उसे जनता के हितों की कोई चिंता है। कांग्रेस की यह धृष्ठता देख कर जनता ने टिहरी संसदीय उपचुनाव में मुख्यमंत्री द्वारा रिक्त की गयी सीट पर मुख्यमंत्री द्वारा पूरा शासन प्रशासन व संसाधन पानी की तरह इस चुनाव में बहाने के बाबजूद अपने पुत्र को चुनाव में नहीं जीता पाये यही जनता की ऐतिहासिक जीत रही। ऐसी जनादेश के प्रतीक बनी टिहरी रियासत की पूर्व शासक जिनको जनता ने ही बेताज किया था, उसी जनता ने लोकशाही के नाम पर थोकशाही चलाने वालों को जमीनी सुघाने का काम किया। कुछ माह पूर्व सम्पन्न हुए इस लोकसभाई उपचुनाव में विजय रही भाजपा की प्रत्याशी माला राज लक्ष्मी शाह को शीतकालीन सत्र के पहले दिन यानी े 22 नवम्बर को लोकसभा महासचिव टी के विश्वनाथन ने बंगाल से लोकसभाई उपचुनाव में विजय रहे राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी के बेटे अभिजीत मुखर्जी के साथ शपथ दिलाई।
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ममता के अविश्वास प्रस्ताव दाव से सरकार ही नहीं विपक्ष भी हुआ बेनकाब 

खुदरा व्यापार में विदेशी निवेश यानी एफडीआई के विरोध में भले ही ममता बनर्जी की तूणमूल कांग्रेस पार्टी मनमोहन सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव रखने में असफल रही हो हो परन्त
ु वह देश की जनता के सामने न केवल कांग्रेस नेतृत्व वाली मनमोहन को ही अपितु भाजपा, कम्यूनिस्ट सहित सपा व बसपा का सत्तालोलुपु व अवसरवादी चेहरा पूरी तरह से बेनकाब करने में सफल रही । ममता बनर्जी ने पूरे देश को दिखा दिया कि भले ही उसके पास संसद में 19 सांसद हैं उसके 19 सांसदों ने देश के हितों को बचाने के लिए वह काम किया जिसे न तो सत्तारूढ़ सप्रंग ही कर पायी व नहीं भाजपा नेतृत्व वाले राजग गठबंधन ही कर पाया। सपा व बसपा की विसात ही क्या ? ममता बनर्जी ने आज अपने 19 सांसदों के दम पर आज सांसदों को भले ही लोकसभा अध्यक्ष ने लोकसभा में सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव, 55 सांसदों के समर्थन की लक्ष्मण रेखा की संवैधानिक बाध्यता के कारण सफल न हो पायी हो परन्तु वह देश की जनता में एक संदेश देने में सफल रही कि देश हितों के लिए जहां ममता बनर्जी केन्द्र की सरकार से मंत्रीपद भी ठुकरा सकती है परन्तु सपा, बसपा व भाजपा तो इस देश के हितों को विदेशी कम्पनियों के लिए खोलने वाली कांग्रेस नेतृत्व वाली सप्रंग सरकार के खिलाफ सीधे लडना तो रहा दूर उसके खिलाफ सत्ता को ठुकरा कर जंग लड़ने वाली ममता बनर्जी को भी अविश्वास प्रस्ताव का समर्थन करने के लिए भी तैयार नहीं है। जहां ममता बनर्जी ने मनमोहन सिंह की सरकार की सत्ता को देशहित के लिए ठुकराने का काम किया वहीं सपा, बसपा व अब भाजपा प्रधानमंत्री की दावतें डकार कर मात्र दिखावे के लिए एफडीआई का विरोध कर रहे है। ममता ने दिखा दिया कि देश में आज उसके अलावा सारे बडे नेता पदलोलुपु व देशहित के लिए सत्ता का ठुकराने का साहस किसी में नहीं। आज देश में भाजपा, सपा, बसपा, द्रुमुक व नीतीश सहित सभी दलों पर ममता की देशहित में केन्द्रीय सत्ता को ठुकराने का दाव 21 पडा।
 

Tuesday, November 20, 2012


मुम्बई हमलों के दोषी कसाब को दी गयी फांसी
मुम्बई हमलों से वर्षो पहले हुए संसद हमले के दोषी को सजा देने में आज भी नपुंसक बनी हुई है सरकार

,मुम्बई(प्याउ)। मुम्बई हमलों की बसरी से पहले ही सरकार ने मुंबई हमलों के गुनहगार 25 वर्षीय पाकिस्त
ानी आतंकवादी अजमल आमिर कसाब को बेहद गोपनिय ढ़ग से 21 नवम्बर की प्रातः 7.30 बजे पुणे की यरवडा जेल में फांसी दे दी गई है। जहां इस फांसी की सजा से देशवासियों ने चेन की सांस ली वहीं लोग इस बाद से भी हैरान है कि मुम्बई हमले से कई साल पहले से संसद पर हमले के गुनाहगार गुरू को फांसी की सजा देने में नपुंसक क्यों बन रही है।? इस फांसी की सजा दिये जाने के बाद लोगों के जेहन में एक सवाल है कि सरकार ने यकायक जो तेजी मुम्बई हमले के दोषी को फांसी की सजा देने में दिखाई वह इस काण्ड से बडे गंभीर व बहुत पहले घटित हो गये संसद हमले के गुनाहगार गुरू को सजा देने में क्यों नहीं दिखाई? हालांकि संसद देश की सर्वोच्च लोकतांत्रिक संस्थान है। देश के स्वाभिमान का सर्वोच्च प्रतीक है। उसके आतंकी को एक दशक से अधिक समय से सर्वोच्च न्यायालय ने फांसी की सजा दे रखी है? इसके बाबजूद राष्ट्रपति के पास इसकी याचिका क्यों लंम्बित पड़ी है? यह सरकार अमेरिका के दवाब में उसे फांसी की सजा नहीं दे रही है? या अंध तुष्टीकरण के कारण देश के स्वाभिमान से खिलवाड़ कर रही है? अगर वह दोषी है तो फांसी की सजा क्यों नहीं अगर नहीं है तो फिर क्यों उसे बंद किया गया है? गौरतलब है कि कसाब को 26/11 की बरसी से पहले गोपनीय ढ़ग से फांसी दिये जाने का एक यह भी कारण हो सकता है कि सरकार इस बात से भी भयभीत हो की जिस प्रकार से बाला साहब ठाकरे की शव यात्रा में लाखों लोग सडकों में उतर गये थे अगर जनता ने मुम्बई की बरसी के दिन भी ऐसा ही जनसैलाब सरकार के कसाब जैसे आतंकी को सजा न दिये जाने के खिलाफ उतर गया तो स्थिति बड़ी विकट होगी। मुम्बई में हुए शिवसेनामय माहोल में अपनी उपस्थिति दर्ज कराने की कोशिश भी कसाब को गोपनीय तरीके से फांसी की सजा दिये जाने का कारण हो सकती है। परन्तु इन सबके बाबजूद देश की आम अवाम इस बात से खुश है कि एक गुनाहगार को तो सजा देने का साहस तो सरकार ने किया।
मुम्बई में आतंकी हमलों के गुनाहगार कसाब उन 10 पाकिस्तानी आतंकियों में एकमात्र ऐसा आतंकी था जिसको जीवित पकड़ने में भारत के सुरक्षाबल सफल हुए थे। इन 10 पाक के आतंकियों ने, समुद्र के रास्ते मुंबई में दाखिल होकर 26/11 हमले को अंजाम दिया था। इस हमले में 165 लोगों की मौत हो गई थी, जबकि कई लोग घायल हो गए थे। लम्बे समय से इन गुनाहगारों को फांसी न दिये जाने से देश की जनता सरकार की नपुंसकता से आक्रोशित थी।
गौरतलब है मुम्बई हमलों में कसाब को फांसी की सजा देने की खबर का खुलाशा फांसी देने के बाद ही आम जनता को लग पायी।
कसाब को मुंबई की ऑर्थर रोड जेल से पुणे की यरवडा जेल में ले जा कर उसे 21 नवम्बर बुधवार सुबह 7.30 बजे फांसी दी गई। फांसी के बाद डॉक्टरों ने भी उसे मृत घोषित कर दिया। महाराष्ट्र के गृह मंत्री आर.आर. पाटिल ने इसकी पुष्टि कर दी है। वह थोड़ी ही देर में प्रेस कॉन्फ्रेंस करके इसकी जानकारी देंगे।
कसाब को फांसी दी जाने से पहले मंगलवार को ही राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी ने अजमल कसाब की दया याचिका खारिज को खारिज कर दिया था। केंद्रीय गृह मंत्रालय से सलाह के बाद यह फैसला लिया गया था। दया याचिका खारिज होने के तुरंत बाद मंगलवार को कसाब को मुंबई की ऑर्थर रोड जेल से पुणे की यरवडा जेल में गुपचुप तरीके से शिफ्ट कर दिया गया। ऐसा इसलिए किया गया क्योंकि यरवडा जेल में फांसी देने का इंतजाम है। 25 वर्षीय आतंकी कसाब को जनवरी 2008 में ऑर्थर रोड जेल में रखा गया था। इस मुम्बई आतंकी हमले में इस्राइल, अमेरिका सहित अनैक विदेशी पर्यटक भी मारे गये थे। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इस घटना की कडी भत्र्सना की गयी थी।

Sunday, November 18, 2012


बिना तख्त व ताज के लाखों लोगों के दिलों में राज करने वाले बाला साहब ठाकरे को सलाम

महाराजा छत्रपति शिवाजी की तरह करोड़ों लोगों ंके हृदय सम्राट अमर रहेंगे बाला साहब ठाकरे 

राष्ट्रीय  स्वाभिमान व मराठा गौरव के अमर महानायक छत्रपति शिवाजी की तरह ही करोड़ों लोगों के दिलों में राज करने वाले शिवसेना के प्रमुख बाला साहिब ठाकरे के निधन पर न केवल महाराष्ट्र अपितु देश विदेश में रहने वाले भारतीय संस्कृति के लिए समर्पित लोग शोकाकुल है।  1926 में पुणे में जन्मे 86 वर्षीय महानायक बाला साहब ठाकरे का निधन 17 नवम्बर को 2012 को दोपहर 3.03 बजे हुआ। उनके पार्थिक शरीर को सांय पांच बजे तक आम जनता के दर्शन के लिए शिवाजी पार्क में रखा गया।  दिवंगत बाला साहब ठाकरे का अंतिम संस्कार सायं 6 बजे पूरे राजकीय सम्मान के साथ पंचतत्व में विलीन किया गया। महाराष्ट्र पुलिस की विशेष टुकड़ी ने गार्ड आफ आॅनर देते हुए उनको अंतिम सलामी दी और मातमी धुन बजा कर अपने महानायक को चिर विदाई दी। बाला साहब ठाकरे की चिता को मुखाग्नि  उनके बेटे उद्वव ठाकरे ने दी। इस अवसर पर उनके बेटे उद्वव ठाकरे, पोते आदित्य ठाकरे , भतीजे राज ठाकरे सहित पूरे ठाकरे परिवार उपस्थित थे। इस अवसर पर अतिविशिष्ट लोगों में पूर्व उप प्रधानमंत्री लाल कृष्ण आडवाणी, केन्द्रीय शरद पवार, अमिताभ बच्चन, अनिल अम्बानी, अरूण जेटली, सुषमा स्वराज, भाजपा अध्यक्ष नितिन गडकरी, राजीव शुक्ला, रामदास आठवले, संजय निरूपम, नाना पाटेकर, संजय दत्त, आदि राजनेताओं, फिल्मी दुनिया व उद्योगजगत  सहित सैकडों प्रतिष्ठित लोगों ने शिवाजी पार्क में लाखों लोगों के साथ उनको अंतिम विदाई दी। समाचार चैनलों के अनुसार 20  लाख से अधिक लोगों ने मुम्बई की सडकों पर उतर कर अश्रूपूर्ण नेत्रों से अपने महानायक बाला साहब ठाकरे को अंतिम विदाई दी।  दिवंगत बाला साहब ठाकरे का कितना विशाल कद आम मराठियों के दिलो व दिमाग में है इसका छोटा सा अहसास उनके निधन पर भारत की स्वर सम्राज्ञी लता मंगेशकर द्वारा कहे गये शब्दों से सहज ही हो सकता है कि जिसमें लता जी ने कहा था कि आज महाराष्ट्र अनाथ हो गया। महाराजा शिवाजी ने अपनी बीरता व स्वाभिमान के बल पर मराठा सम्राज्य की कीर्ति को पूरे देश में फेहराया था वहीं बाला साहब ठाकरे ने अपने स्वाभिमानी प्रवृति से सत्ता से दूर रहने के बाद भी चार दशक तक पूरे भारत में फहराया था। उनके निधन पर उनकी पावन स्मृति को शतः शतः नमन्।

बाबा साहब ठाकरे की अंतिम यात्रा में सम्मलित होने के लिए मुम्बई में जिस प्रकार से विशाल जनसमुद्र की तरह लाखों की संख्या में आम जनमानस अपने महानायक को श्रद्धांजलि देने के लिए उमड़ पडे हैं उसको खबरिया चैलनों से सीधे प्रसारण में देख कर पूरा विश्व अचम्भित है। इस जनसैलाब को देख कर पूरा विश्व स्तब्ध है कि किस प्रकार बिना शासन के किसी बडे पद में रहे बिना बाल ठाकरे ने 4 दशक से अधिक समय तक लाखों लोगों के दिलों में राज किया। एक ऐसा राज व सम्मान जो बडे बडे चक्रवर्ती सम्राटों व शासनाध्यक्ष को भी नसीब नहीं होता है।  किस प्रकार पुणे में जन्मे व काटूनिस्ट बन कर अपनी जीवन यात्रा प्रारम्भ करने वाले बाबा साहब ठाकरे ने मराठी मानुष व राष्ट्रीय गौरव के लिए प्रखरता से समर्पित हो कर एक आम आदमी से बिना तख्त व ताज के लाखों लोगों के दिलों में पूरे चार दशक तक राज किया।  बाला साहब ठाकरे ने महाराष्ट्र के स्वाभिमान व विकास के लिए भले ही शिवसेना नाम से राजनैतिक पार्टी की स्थापना करके महाराष्ट्र की राजनीति में अपनी पूरी पकड़ बनाये रखी परन्तु वे राजसत्ता के किसी भी पद पर कभी आसीन नहीं हुए। आज के पदलोलुपु राजनेतिक युग में भी बाल ठाकरे अपने आप में बिना पद के  सत्ता व जनमानस पर राज करने के अनौखे मिशाल थे। उन्होंने राजसत्ता को नहीं अपितु आम जन व भारतीय संस्कृति को सदा वरियता दी। राष्ट्रीय झण्डे तिरंगे में लिपटे उनके पार्थिक शरीर को मातोश्री से अंतिम यात्रा से रवाना होने से पहले सशस्त्र पुलिस बल ने  पूरे राजकीय सम्मान के साथ उनको अंतिम सलामी दी। वहीं बाला साहब ठाकरे के बेटे उद्वव ठाकरे सहित लाखों लोगों ने उनको अश्रुपूर्ण विदाई दी।  मातुश्री से अंतिम यात्रा शिवसेना भवन में पंहुची वहां पर भी शिव सेनिकों ने उनको अपनी अंतिम विदाई दी। मातुश्री से शिवसेना भवन होते हुए शिवाजी पार्क के लिए शुरू हुई उनकी इस अंतिम यात्रा में सम्मलित लाखों लोग बाला साहिब ठाकरे अमर रहे के गगनभेदी नारे लगा रहे है। 24 हजार से अधिक पुलिस जवानों के अलावा बडी संख्या में अर्ध सैनिक बल को सुरक्षा की दृष्टि से इस यात्रा को सुचारू संचालित करने के लिए तैनात किया गया है। सांय 5 बजे तक आम जनता के दर्शन व श्रद्धांजलि देने के लिए उनका पार्थिक शरीर शिवाजी पाक्र में रखा गया।  बाला साहब ठाकरे के निधन से स्तब्ध फिल्मी दुनिया की राजधानी मुम्बई ने अपने सभी काम काज स्थगित कर दिये है। दुकाने व व्यवसायिक संस्थान बंद रही। बाला साहब ठाकरे के सम्मान में 19 नवम्बर को बंद रहेंगे। भले ही बाला साहब ठाकरे महाराष्ट्र व मराठी मानुष को प्रथम वरियता देते हुए अपना जीवन समर्पित किया इसके बाबजूद वे भारतीय संस्कृति व भारतीय स्वाभिमान  के लिए उन्होंने अपना स्पष्ट नजरिया रखा उससे देश के करोड़ों लोग उनके देहान्त से गमगीन कर दिया।

डेंगू से पूर्व पार्षद हरीश अवस्थी की धर्मपत्नी श्रीमती रमा अवस्थी का निधन

उत्तराखण्ड मूल के दिल्ली के पूर्व पार्षद हरीश अवस्थी की धर्मपत्नी श्रीमती रमा अवस्थी का डैंगू की बीमारी के चपेट में आकर युवा अवस्था में ही आकस्मिक निधन हो गया है। उनका अंतिम संस्कार 17 नवम्बर को 12.30 बजे यमुना तट पर निगमबोध घाट पर किया गया। निगम बोध घाट में दिवंगत श्रीमती रमा अवस्थी को अंतिम विदाई देने के लिए उनके पति हरीश हवस्थी, उनके पुत्र, ससुर व परिजन के अलावा सेकडों की संख्या में हरीश अवस्थी के मित्र व शुभचिंतक सम्मलित थे। निगम बोध घाट में शोकसंतप्त पूर्व पार्षद हरीश अवस्थी ने बताया कि उनकी धर्मपत्नी खतरनाक डैंगू की चपेट में आ कर दो दिन में ही स्वर्गवास हो गयी। उनको निजी अस्पताल में भर्ती भी कराया गया परन्तु बहुत तेजी से इस बीमारी ने उनको संभलने का मौका भी नहीं दिया। श्री अवस्थी ने कहा कि उनके राजनैतिक व सामाजिक जीवन में गृहस्थ का पूरा आधार ही उनकी धर्मपत्नी रही। राजनैतिक व सामाजिक जीवन में जनहितों के लिए कई बार कई दिनों के लिए जेल यात्राओं व आंदोलन के तहत घर से बाहर रहते थे परन्तु उनकी धर्मपत्नी ने न केवल घर की जिम्मेदारी बखूबी से निभायी अपितु उनको भी मजबूती से समाजसेवा व राजनीति में उतरने की मजबूत आधार दिया। इस अवसर पर निगम बोध घाट पर अंतिम विदाई देने वालों में भाजपा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष व राज्यसभा सांसद भगतसिंह कोश्यारी, दिल्ली विधानसभा में भाजपा के विधायक मोहन सिंह बिष्ट, प्रोग्रेसिव पार्टी के अध्यक्ष जगदीश मंमगांई, दिल्ली नगर निगम की मेयर, भाजपा नेता वीरेन्द्र जुयाल, उदय शर्मा, पूरणचंद नैनवाल, अनिल सती, भागवत नेगी, प्यारा उत्तराखण्ड के सम्पादक देवसिंह रावत, उत्तराखण्ड क्लब के अध्यक्ष देवेन्द्र खत्री,  इंजीनियर जगदीश भट्ट, समाजसेवी जगदीश भाकुनी व मोहन सिंह रावत, पत्रकार इन्द्रचंद रजवार व नीरज जोशी सहित बड़ी संख्या में समाजसेवी व परिजन प्रमुख थे।  इस दुखद समाचार को  उत्तराखण्ड के पूर्व मुख्यमंत्री भगतसिंह कोश्यारी के साहयक जगदीश भाकुनी ने दूरभाष पर दी। उसके बाद प्रोगेसिव पार्टी के द्वारा इस आशय की सूचना भी मिली। पत्नी शोक से संतत्प पूर्व पार्षद हरीश अवस्थी दिल्ली में उत्तराखण्ड समाज के अग्रणी समर्पित समाजसेवियों व राजनेताओं में प्रमुख हैं। 

Thursday, November 15, 2012


राहुली चक्रव्यूह का कैसे मुकाबला करेगी अपनों के ही चक्रव्यूह में फंसी भाजपा 
एक तरफ देश की प्रमुख विपक्षी दल भाजपा न तो अभी अपने प्रधानमंत्री पद के दावेदार का नाम ही सार्वजनिक कर पा रही है वह नहीं वह पार्टी अध्यक्ष की कमान किसके हाथों में 
रहेगी इसकी भी घोषणा नहीं कर पा रही है। भाजपा की राह में इस बार सबसे बडा अवरोधक भ्रष्टाचार व मंहगाई आदि से जनता की नजरों में बेनकाब हो चूकी सत्तारूढ़ कांग्रेस नहीं अपितु अतिमहत्वाकांक्षी, सत्तालोलुपु, आत्मघाति नेता ही है। जो मैं बनूंगा प्रधानमंत्री तू नहीं के द्वंद में चुपचाप अपने ही दल के नेताओं के गुप्त कारनामों को बेनकाब करके भाजपा की जगहंसाई करा रहे है। इसी कारण आज विवादों में घिरे गडकरी को फिर से अध्यक्ष के पद पर चाहते हुए भी संघ ताजपोशी कर पा रही है और नहीं आम कार्यकत्र्ताओं एंव आम जनता में प्रधानमंत्री के सबसे पसंदीदा उम्मीदवार नरेन्द्र मोदी के नाम का ऐलान भाजपा भावी प्रधानमंत्री के रूप में ही कर पा रही है। कांग्रेस को पटकनी देने के लिए आज देश में कोई ऐसा मजबूत सांझा विपक्ष भी नहीं दिखाई दे रहा है। कुल मिला कर एक भाजपा वह भी आपसी द्वंद में इतनी बंटी हुई है। यह ही प्रबुद्ध जनों को चिंता का विषय है। इससे भाजपा कार्यकत्र्ताओं व कांग्रेस के कुशासन से व्यथित जनता में भाजपा नेताओं की इस आत्मघाती कुनीति से गहरी निराशा है। कांग्रेस का सत्ता में काबिज होने का अनुभव व अकूत संसाधनों के बल पर अंदर से बिखरी भाजपा कैसे मुंहतोड जवाब देगी यही लोगों के बीच चिंता का विषय है।
वहीं दूसरी तरफ देश की सत्ता में काबिज कांग्रेस ने चुनावों के लिए राहुल गायी के नेतृत्व में अपनी तस्वीर ही नहीं अपितु अपना चक्रव्यूह का ऐलान भी कर दिया है। गौरतलब है कि इसी नवम्बर माह में हरियाणा के सुरजकुण्ड में आयोजित हुए संवाद शिविर में लिये गये निर्णय के अनुसार कांग्रेस अध्यक्ष के निर्देश पर 15 नवम्बर बृहस्पतिवार को कांग्रेस ने राहुल गांधी के नेतृत्व में चुनाव समन्वय समिति के गठन के साथ साथ तीन उप समितियों के गठन का भी ऐलान किया। चुनाव समन्वय समिति में राहुल गांधी के अलावा अहमद पटेल, जनार्दन द्विवेदी, दिग्विजय सिंह, मधुसूदन मिस्त्री व जयराम रमेश है। कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के कांग्रेस को 2014 में फिर से सत्तासीन करने के उदेश्य से बनायी गयी चुनाव समन्वय समिति व तीन उपसमितियों का ऐलान किया गया। तीन उप समितियों में चुनाव पूर्व गठबंधन उप समिति में ए के एंटनी, वीरप्पा मोइली, मुकुल वासनिक, सुरेश पचोरी, जितेन्द्र सिंह व मोहन प्रकाश है। चुनाव पूर्व गठबंधन उपसमिति में एके एंटनी, वीरप्पा मोइली, मुकुल वासनिक, सुरेश पचैरी, जितेंद्र सिंह और मोहन प्रकाश सदस्य होंगे। दूसरी उपसमिति को संचार एवं प्रचार उपसमिति के नाम से बनाया गया है इसमें दिग्विजय सिंह,अंबिका सोनी, मनीष तिवारी, दीपेंद्र हुड्डा, ज्योतिरादित्य सिंधिया, राजीव शुक्ला एवं भक्त चरणदास को सदस्य बनाया गया है। इसके अलावा चुनाव घोषणा पत्र एवं सरकारी कार्यक्रम उप समिति बनायी गयी है इसमें एके एंटनी , पी चिदंबरम, सुशील कुमार शिंदे, आनंद शर्मा, सलमान खुर्शीद, संदीप दीक्षित, अजित जोगी, रेणुका चैधरी, पीएल पुनिया और मोहन गोपाल (विशेष आमंत्रित) शामिल किए गए हैं।
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शीतकाल के लिए भगवान केदारनाथ धाम के कपाट बंद

संसार भर के करोड़ों सनातन धर्मियों के लिए अथाह श्रद्धा का केन्द्र भगवान केदारनाथ धाम का कपाट शीतकाल के लिए 15 नवम्बर को पूरी पंरपरा के साथ बंद कर दिया गया। अनादिकाल से शीतकाल में उत्तराखण्ड के इस हिमालयी श्रंृखला में बसे हिन्दुओं के चार सर्वोच्च धामों में प्रमुख श्रीबदरी केदारनाथ के नाम से विश्व विख्यात धाम साल में शीतकाल के छह माह यहां पर पडने वाली भारी वर्फवारी के कारण आम श्रद्धालुओं के लिए बद रहते है। भगवान विष्णु व भगवान शिव के परम दिव्य धाम श्री बदरी नाथ धाम व श्री केदारनाथ धाम  के कपाटें ग्रीष्म कालीन के दौरान आम श्रद्धालुओं के लिए खोले जाते है। इसी परंपरा के अनुसार सर्दी शुरू होते ही शास्त्र सम्मत दिनवार के  अनुसार भगवान बदरीनाथ व केदारनाथ के साथ साथ गंगोत्री व यमुनोत्री के कपाट भी बंद कर दिये जाते है। छह माह इन धामों में रौनक रहने वाले स्थानों में कपाट बंद होते ही सन्नाटा पसर जाता है। इसी क्रम में 15 नवम्बर बृहस्पतिवार को भगवान केदारनाथ के कपाट शीतकाल के लिए पूरे विधि विधान के साथ बंद कर दिये। इस अवसर पर देश विदेश के सेकडों श्रद्धालु इस विशेष पूजा अर्चना में सम्मलित होने के लिए केदारनाथ धाम मे इस पूजा के साक्षी रहे। शीतकाल के दौंरान भगवान केदारनाथ की शीतकालीन पूजा ऊखीमठ के ओंकारेश्वर मंदिर में की जाती है। इसी दिन माॅं यमुनोत्री के कपाट भी शीतकाल के लिए बंद कर दिये गये। गौरतलब है कि गंगोत्री के कपाट भी इसी सप्ताह बंद हो गये है। सबसे अंत में इसी माह भगवान बदरीनाथ के कपाट भी शीतकाल के लिए बंद होते हैं। फिर हर साल ग्रीष्म काल में भगवान बदरीनाथ व भगवान केदारनाथ के साथ गंगोत्री व यमुनोत्री धामों के कपाट आम श्रद्धालुओं के लिए खोल दिये जाते है। इन चारों धामों की यात्रा को उत्तराखण्ड में चार धाम यात्रा के नाम से जाना जाता है। इन धामों के दर्शन करने के लिए देश विदेश से सदियों से लाखों श्रद्धालु हर साल देवभूमि उत्तराखण्ड में पंहुचते है। इसके बाबजूद इन धामों की यात्रा व यहां का प्रबंधन वेष्णों देवी की तर्ज पर सुचारू व व्यवस्थित न चलने की कमी आम श्रद्धालुओं को रह रह कर खलती है। 

भारत रत्न गोविन्द बल्लभ पंत के सुपुत्र के सी पंत का निधन
उप्र के प्रथम मुख्यमंत्री व देश के गृहमंत्री रहे भारत रत्न गोविन्द बल्लभ पंत के वयोवृ0 पुत्र व देश के योजना आयोग के उपाध्यक्ष के साथ साथ कबीना मंत्री रहे कृष्णचंद पंत का निधन 15 नवम्
बर को दिल्ली में हुआ। कांग्रेसी नेता के रूप में जीवन शुरू करने वाले बेहद शांत व साफ छवि के दिग्गज नेता कृष्णचंद पंत, नेहरू परिवार के बेहद करीबी पंत परिवार से होने के बाबजूद नैनीताल संसदीय सीट पर अन्य कांग्रेसी दिग्गज नेता नारायणदत्त तिवारी के समक्ष वे कांग्रेसी राजनीति में अपने आप को असहज महसूस करते। इसी कारण वे अपने मजबूत घर कांग्रेस को छोड कर भाजपा में सम्मलित हुए। भाजपा से उनकी धर्मपत्नी भी नैनीताल से सांसद रही। राजग शासनकाल में प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के शासनकाल में दिवंगत कृष्णचंद पंत योजना आयोग के उपाध्यक्ष के महत्वपूर्ण पद पर भी आसीन रहे। हालांकि अन्य दिग्गज नेताओं की तरह उन्होंने अपने मूल प्रदेश उत्तराखण्ड के लिए कोई उल्लेखनीय कार्य भले न किया हो परन्तु अपनी साफ छवि व शांत प्रवृति के कारण आज वे देश की राजनीति में गरीमामय स्थान बनाये हुए थे।
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डूबते हुए जहाज कांग्रेस की कमान राहुल को सोंप कर क्यों जश्न मना रहे हैं कांग्रेसी मठाधीश 

राहुल की राह रोकने के साथ साथ जनादेश का अपमान कर रहे हैं आत्मघाती कांग्रेस मठाधीश

कांग्रेसी राहुल गांधी को 2014 के आम चुनाव की कमान देने को ऐसे प्रचार कर रहे हैं कि मानों उन्होंने राहुल के राजतिलक की पूरी तैयारी कर दी है। हकीकत यह है कि गांधी नेहरू परिवार की बची खुची साख की बदोलत हासिल जनादेश का घोर अपमान मनमोहन सिंह के प्रधानमंत्रित्व वाली सरकार में करके देश के साथ साथ देश की आम जनता का जीना ही दुश्वार कर रखा है। ऐसे में जब जनता का कांग्रेस से पूरी तरह से मोह भंग हो गया और कांग्रेस पार्टी एक डुबता हुआ जहाज बन गयी है, उसकी पतवार को राहुल गांधी के हाथों में सौंपने का एक ही अर्थ होता है कि राहुल के भविष्य पर भी ग्रहण लगाना। आज जो जरा सी भी कांग्रेस की राजनीति को करीब से जानता है उसे मालुम है कि आज भी कांग्रेस की कमान राहुल गांधी के ही पास है। परन्तु राहुल गांधी इतना असहाय कांग्रेसी मठाधीशों जो उनके साथ 2014 के उस तथाकथित समन्वय समिति में भी प्रमुखता से सदस्य हैं ने बना रखा है कि उनको देश की जनता को दिये गये कांग्रेस के वचनों को पूरा करने का दायित्व तक नहीं सौंपा जा रहा है। आखिर किस मुंह से राहुल गांधी 2014 में कांग्रेस के लिए जनादेश मांगेगे? क्या आम जनता को मंहगाई से जीना हराम करने के नाम पर या देश में एक के बाद एक भ्रष्टाचार का कलंक लगाने वाली सरकार के कारनामों के बल पर?
आज जिस प्रकार से कांग्रेसी मठाधीशों ने राहुल गांधी को लोकसभा चुनाव समन्वय समिति का अध्यक्ष बनाने का ऐलान करके राहुल गांधी को महत्वपूर्ण दायित्व देने की बात समाचार चैनलों व पत्रों में बडी प्रमुखता से प्रचार किया वह एक प्रकार देश की जनता की आंखों में धूल झोंकने के साथ साथ राहुल गांधी के नेतृत्व पर ग्रहण लगाने के साथ साथ जनादेश का घोर अपमान भी है।
कांग्रेसी एक तरफ यह प्रचार कर रहे हैं कि 2014 के लोकसभा के आम चुनाव की कमान राहुल गांधी के हाथों में है। जबकि हकीकत यह है कि मनमोहन सिंह सरकार  अपने कुशासन, भ्रष्टाचार, मंहगाई व आतंकी दहशत से देशवासियों व देश को इतना परेशान व पतन की गर्त में धकेल देंगे कि 2014 में आम जनता कांग्रेस का नाम से धृणा सा करने लगेंगे।
 अगर कांग्रेस पार्टी के दिग्गजों को जरा सी भी देश, आम जनता व कांग्रेस से ही सहानुभूति रहते तो वे 2014 से कई साल पहले ही देश की आम जनता का जीना अपने कुशासन से बेहाल करने वाले मनमोहन सिंह को बनाये रख कर एक प्रकार से कांग्रेस के पक्ष में मिले जनादेश का अपमान किया। जनादेश में कांग्रेस नेतृत्व को देश की सरकार का नेतृत्व करने का जनादेश था न की अमेरिकी परस्त मनमोहन सिंह को देश का प्रधानमंत्री बना कर आम जनता के साथ साथ भारत के हितों पर ग्रहण लगाने का। कांग्रेसियों ने  सोनिया गांधी को इतना असहाय व कमजोर बना कर आम जनता से पूरी तरह से काट दिया है। न तो आम जनता से सोनिया गांधी का सीधा संवाद है व नहीं राहुल गांधी का। केवल उन्हीं लोगों को राहुल व सोनिया गांधी से मिलाया जाता है जो कांग्रेसी नेतृत्व को गुमराह करके अपने निहित स्वार्थ पूरा करने वाली कटोरी की पसंद हो। यह कटोरी नहीं चाहती है कि देश में कांग्रेस अपने बल पर सरकार बनाये व और मजबूत हो। इसी कारण उन्होंने ऐसा ताना बाना बुना हुआ है कि कांग्रेस आम आदमी से दूर हो जाये। इसके साथ ही देश व कांग्रेस पार्टी के हितों पर भी जो कुठाराघात हो रहा है उसको जनता से कटे रहने के कारण न तो सोनिया गांधी व नहीं राहुल गांधी को इसका अहसास हो रहा है। मनमोहन सिंह, मोंटेक, चिदम्बरम व कपिल सिब्बल जैसे हुक्मरानों को न तो इस देश की आम जनता का ही भान है व नहीं देश का। कांग्रेस पार्टी रहे या न रहे इनको इससे भी कोई लेना देना नहीं है। ऐसा ही कांग्रेस में अधिकांश महासचिवों का है। इनको न तो कांग्रेस से कुछ लेना देना है व नहीं देश तथा नहीं आम जनता से। न हीं अधिकांश जो लोग सरकार व संगठन में काबिज है उनका कहीं कभी समाजसेवा का जमीनी अनुभव नहीं रहा। यही नहीं आम जनता से कभी आम जीवन में संवाद करने को ये लोग अपनी शान के खिलाफ समझते है। ऐसे में कांग्रेस पार्टी के इन मठाधीशों द्वारा राहुल गांधी को 2014 के आम चुनावों की कमान सौंपना किसी षडयंत्र से कम नहीं। अगर वे हितैषी होते तो वे मनमोहन को सत्ता से बेदखल कर राहुल गांधी के हाथों में कांग्रेस पार्टी द्वारा जनादेश मांगते समय किये गये वायदों को पूरा करने का दायित्व सोंपते।

Wednesday, November 14, 2012


खुद के भ्रष्टाचारों को बेनकाब होने से आक्रोशित सरकार, भानिमप(केग) के पर कतरने को तैयार

4 जी स्पेक्ट्रम के सबसे बडे रहस्यमय सौदे पर विपक्ष, कैग, अण्णा,  केजरीवाल आदि मूक क्यों

 2 जी स्पेक्ट्रम की बेहद कम नीलामी होना कहीं केग को झूठा ठहराने का षडयंत्र तो नहीं?



एक तरफ सरकार घोटालों से बदरंग हुए धृर्णित चेहरे को छुपाने के लिए केग के पर कतरने के लिए तैयारी कर रही है। वहीं दूसरी तरफ 2 जी स्पेक्ट्रम से कई गुना बडे 4 जी का हुआ रहस्यमय सौदे पर कहीं शौर नहीं? विपक्ष मूक, कैग मूक, केजरीवाल या अण्णा आदि सब मूक? आखिर क्या रहस्य है। यह पूरा सौदा किसी और ने नहीं अपितु केवल मुकेश अम्बानी ने ही लिया। बताया जा रहा है कि इसकी बोली लगाने में देश की कोई अन्य संचार निजी कम्पनियों मैदान में आयी नहीं।
आज यही सबसे बडा सवाल यह है कि 2 जी पर तो शोर मच रहा है। पर 4 जी पर हुए रहस्यमय  सौदे पर सभी मौन क्यों? क्या किसी अन्य द्वारा बोली न लगाया जाना भी एक षडयंत्र है?
जिस प्रकार से 2जी स्पेक्ट्रम की सर्वोच्च न्यायालय के निर्देश पर हुई नीलामी में टेलीकाॅम कम्पनियों ने जो उदासीनता दिखाई क्या वह सरकार व टेलीकाॅंम कम्पनियों की मिली भगत से केग को नीचा दिखाने का षडयंत्र है या 3 जी या 4 जी के कारण अब संचार कम्पनियों का इस 2जी लाईसेंस पर मोह भंग होना है। परन्तु सबसे चोंकाने वाला तत्थ्य यह है कि जिस प्रकार से इस नीलामी को हथियार बना कर केन्द्र सरकार भारत के नियंत्रक और महालेखा परीक्षक यानी केग के पर कतरने का ताना बाना बुन रही है उससे यह सवाल उठना स्वाभाविक ही है। क्योंकि इस नीलामी पर केन्द्रीय संचार मंत्री कपिल सिब्बल ने टिप्पणी करते हुए कहा कि  सीएजी का दावा और सच्चाई देश के सामने है। सीएजी ने  बढ़ाचढ़ कर आंकड़े पेश किये। गौरतलब है कि सीजीए ने 2जी घोटाले की आशंका व्यक्त की थी और देश को 1.77 लाख करोड़ रुपए का घाटा होने का अनुमान लगाया था। इससे देश में सरकार की न केवल किरकिरी हुई अपितु सर्वोच्च न्यायालय ने भी सीएजी की रिपोर्ट को आधार मानते हुए इन लाइसेंसों को ही रद्द कर दिया। इसके बाद सर्वोच्च न्यायालय के निर्देश पर फिर से नीलामी की गयी थी।  हालांकि सरकार ने इसका लक्ष्य 28 हजार करोड़ रखा था। जबकी 5 मेगाहर्टज के स्पेक्ट्रम के लिए 14  हजार करोड़  रूपये का रिजर्व प्राइस रखा था। जो जानकारों के अनुसार काफी ऊंची मानी जा रही है। यह आशंका तब ही निर्मूल होगी जब सरकार या निष्पक्ष जांच ऐजेन्सी इसकी जांच करे कि क्यों इसमें लक्ष्य को प्राप्त करने में सरकार असफल रही और क्यों संचार कम्पनियों ने इस नीलामी में दिलचस्पी नहीं दिखाई।
सरकार द्वारा घोषित लक्ष्य 40000 करोड़ की एक ति जिस प्रकार से सर्वोच्च न्यायालय द्वारा 2जी के लाइसैंस को प्रदान करने के मामले में हुए केग द्वारा सरकार की आवंटन की नीति पर उठाये गये प्रश्न के आधार पर 2जी के 122 लाइसेंसों को रद्द करने के बाद सरकार व संचार क्षेत्र से जुडी दिग्गज कम्पनियों की किरकिरी हुइ्र थी। उसके बाद सरकार ही नहीं देश के इन संचार कम्पनियों की नजरों में खटकने लगा था। क्योंकि केग ने ही सबसे पहले इस मामले में सरकार व इन संचार कम्पनियों की मिली भगत से देश को हजारों करोड़ रूपये का चूना लगाने का आरोप लगाया था। इसके बाद पूरे देश में इस विवाद को इतना तुल मिला कि संचार मंत्री को न केवल अपने पद से इस्तीफा देना पडा अपितु इसके साथ उनको जेल की हवा भी खानी पड़ी। पूरा देश देश को सरकार में आसीन लोगों, नौकरशाहों व उद्यमियों के नापाक गठबंधन से खूल आम लूटने की खबर से स्तब्ध था। इसी को देखते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने इस प्रकरण में संदेह के घेरे में आयी 122 लाइसंस ही रद्द करके फिरसे इनकी नीलामी कराने का आदेश दिया।
सर्वोच्च न्यायालय के आदेश के बाद जिस प्रकार से 2जी के 176 में से केवल 101 ब्लाक की ही बोली लग कर केवल 9407 करोड़ बिक्री हुई।
केग पर अंकुश लगाने के लिए सरकार बहाना ढ़ंूढ रही थी। सरकारें यह तनिक सा भी सहन नहीं कर पा रही है कि कोई उनके कार्यो में मीन मेख निकाले। जिस प्रकार से सरकार के विभिन्न विभागों के घोटालों को केग ने बेनकाब किया उससे देश की जनता में एक संदेश गया कि देश या राज्य में किसी भी दल की सरकारें हों इनके भ्रष्टाचार करने की प्रवृति में कोई कमी नहीं है। भ्रष्टाचार करने के लिए सब एक समान ही है। केग की इसी साफगोही से आहत अधिकांश राजनैतिक दल अंदर ही अंदर इस पर अंकुश लगाने के लिए कैग को बहुसदस्यी आयोग बनाने का षडयंत्र रच रहे हैं।

Monday, November 12, 2012


मेरे कृष्ण तुम एक ऐसा दीप जला दो 

हर घर आंगन में दीप खुशियों का जले
हर पल अधरों में खिले खुशियों के दीये
आंखों में दिखे कहीं भी न दुख के आंसू
खिले हर दिल खुशियों से इस जग में
मेरे कृष्ण तुम एक ऐसा दीप जला दो 
सकल सृष्टि को श्री से रोशन कर दो
-देवसिंह रावत 
(दीपावली, मंगलवार, 13 नवम्बर प्रातः 9.56 बजे)
चीन में सत्ता परिवर्तन को देख कर हैरान है विश्व जनमानस

जी जिनपिंग होगे चीन के नये राष्ट्रपति
अपनी सामरिक महाशक्ति व अर्थशक्ति से पूरे विश्व पर अपना शिकंजा कसने की दिशा में बढ़ रहे चीन आज विश्व की वर्तमान एकमात्र स्वयंभू थानेदार बने अमेरिक
ा के बर्चस्व को चुनौती दे रहा है वहीं वह अपने देश में हो रहे सत्ता के शीर्ष नेतृत्व परिवर्तन को अंतिम रूप दे रहा है। यह कितनी शालिनता व व्यवस्थित ढ़ग से हो रहा है इसको देख कर पूरा विश्व अचम्भित है। विश्व की महाशक्ति बन चूके चीन की सत्ता में महत्वपूर्ण बदलाव पर पूरे विश्व की नजरें लगी है। लोग हैरान है कि कैसे सत्ता में बैठा ताकतवर नेता अपने 10 साल तक देश के भावी नेतृत्व के लिए किस उत्साह से कुर्सी खाली कर रहा है । यहां व्यक्ति नहीं अपितु राष्ट्र महत्वपूर्ण है। दस साल तक अब जी जिनपिंग चीन के नए राष्ट्रपति होने के साथ साथ चीन की सर्वशक्तिामन कम्युनिस्ट पार्टी के महासचिव होंगे, । जी निजपिंग के नेतृत्व वाली सरकार के प्रधानमंत्री ली कीकियांग होंगे। ये दोनों हू जिन्ताओ और वेन जियबाओ की जगह लेंगे। चीन के वर्तमान राष्ट्रपति जिन्ताओं के नेतृत्व में चीन ने न केवल विश्व को अपनी सामरिक शक्ति को लोहा मनाया अपितु उसने अपनी अर्थशक्ति के आगे पूरे विश्व के बजारों पर एक प्रकार का कब्जा भी कर लिया। हालांकि भावी राष्ट्रपति जी के पिता चीन की कम्युनिस्ट पार्टी के संस्थापकों में रहे हैं। वहीं प्रधानमंत्री ली के पिता मध्यम स्तर लेवल के सरकारी अधिकारी थे। दोनों ही 60 वर्ष के करीब के उम्र के है। दोनों को 5 साल पहले ही कम्युनिष्ट पार्टी की पोलित व्यूरों में स्थान दिया गया था। चीन के नये नेतृत्व के समक्ष जहां विश्व में चीन के बर्चस्व को बचाने का दायित्व होगा वहीं चीन की अर्थव्यवस्था को जमीदोज करने में लग चूके भ्रष्टाचारी ग्रहण पर अंकुश लगाना ही मुख्य चुनौती होगा।
शराब के अन्तर राज्य तस्करों के शिकंजे में जकडा देवभूमि उत्तराखण्ड 

शराब से तबाह समाज की रक्षा के लिए आगे आयें महिला और बुद्धिजीवी 

शराब को सरेआम चुनाव में बांटने वाले नेता, शादी व्याह आदि कार्यक्रमों में शराब परोसने वाले है समाज के दुश्मन



देवभूमि के रूप में विख्यात उत्तराखण्ड में शराब की बढ़ती खपत को देख कर अन्तरराज्य गिराहो का भी मकड़ जाल दिन प्रति दिन और मजबूत हो रहा है। यहां पर घोर सत्तालोलुपु राजनेताओं, भ्रष्ट नोकरशाहों के चलते पावन उत्तराखण्ड आज शराब के तस्करों की ऐशगाह बन चूका है। अधिकांश स्थानों पर शराब माफियाओं से नेताओं व पुलिस प्रशासन की मिली भगत से शराब के ठेकों का जाल पूरी तरह से फेल गया है। उत्तराखण्ड में ऐसी स्थिति हो गयी है कि यहां पर शराब माफिया ही यहां पर आबकारी नीति का ही नहीं प्रदेश के संसाधनों पर काबिज होने के ताकत रखने के साथ साथ सरकारों को बनाने व बिगाडने वाले बन गये है।
कुछ ही दिन पहले देहरादून पुलिस ने इस सप्ताह पुलिस अन्तर राज्य शराब तस्करों के गिरोह को दबोचा। इनसे 200 पेटियों में शराब की 2400 बोतलें बरामद की गयी हैं। तस्कर उसे दीपावली के अवसर पर पहाड़ों में सप्लाई करने वाले थे। इन पकडे गये शराब तस्करों की पहचान नरेश कुमार कमोदा पीपली कुरुक्षेत्र (हरियाणा) ,रूपलाल निवासी जैतपुरा अंबाला तथा कुलदीप नरवाना जिला जिन्द के रूप में दी। यह केवल सडक छाप गिरोह हो सकता है यहां पर काबिज शराब के माफियाओं से यहां के नेताओं व नौकरशाहों की ही नहीं यहां के समाजसेवकों के रिश्ते सार्वजनिक हो जायं तो इन्हें देख कर जनता को खुद को विश्वास ही नहीं आयेगा।
वहीं दूसरी तरफ पिथोरागढ़ रैंज के उपमहानिरीक्षक गणेश सिंह मर्तोलिया शराब में तबाह होते उत्तराखण्डी समाज को देख कर बेहद चिंतित है। वे चाहते हैं कि इससे बचने के लिए पुलिस, बुद्धिजीवी, महिलायें व स्वयं सेवी संगठन आगे आयें। बागेश्वर में पत्रकारों से वार्ता करते हुए उन्होंने यह चिंता जाहिर की। वे चाहते हैं कि पहाड़ में शराब जैसी बुराई को समाप्त करने के लिए पुलिस गांवों में जागरूकता अभियान चलाएगी। इसके लिए गांवों में महिलाओं के समूह बनेंगे तथा एनजीओ का भी सहारा लिया जाएगा। कपकोट के गुलेर निवासी श्री मर्तोलिया जहां शराब से तबाह हो रहे उत्तराखण्डी समाज को बचाना चाहते वहीं वे गांवों से हो रहे पलायन से बेहद दुखी हैं। यह केवल एक पुलिस अधिकारी की चिंता का विषय नहीं है। यह चिंता हम सबकी होनी चाहिए। क्योंकि गंगा यमुना की उदगम स्थली व देवताओं की भूमि उत्तराखण्ड शराब का गटर बन कर इसकी पवित्रता को कलंकित कर रही है।
भले ही जनहित व लोकशाही में निर्वाचित होने की दंभ भरने वाली सरकारें जनहित में कितना काम करती है यह देश व प्रदेश में निरंतर मानव समाज को पथभ्रष्ट कर रही शराब के प्रति सरकार के नजरिये से ही बेनकाब हो जाता है। हकीकत यह है कि लोकशाही की सरकारें भारत के सुदूरवर्ती क्षेत्रों में पानी, बिजली, विधालय, मोटर रोड व चिकित्सालय आदि समाज को विकास के पथ पर बढाने वाली सुविधाओं को उपलब्ध कराने में तो नकाम रह रही है परन्तु दूरस्थ से दूरस्थ क्षेत्रों में शराब पंहुचाने में निरंतर बेशर्मी से लगी हुई है। वहीं देवभूमि कहे जाने वाले उत्तराखण्ड में भी इन दिनो शराब ने पूरी तरह से पूरे समाज को अपनी जकड़ में ले लिया है। कई स्थानों पर प्रबुद्ध महिलायें व समाजसेवी हैं जिन्होंने सरकार के इस नापाक इरादों का पुरजोर विरोध करने की ठानी है। पर देखा यह जा रहा है कि अधिकांश समाज में खुशी या गम दोनों के आयोजनों में शराब से लोग तरोबतर है। इससे न केवल नयी पीढी बर्बाद हो गयी है अपितु समाज में निरंतर हिंसा, असंतोष व राग द्वेष बढ़ रहा है। कभी प्रतिभा व ईमानदार कर्मठ लोगों के समाज के रूप में जाना जाने वाला समाज अब शराबियों की जमात के रूप में जाना जाने लगा है। कई स्थानों पर जागरूक महिला मंगल दलों ने अपने गांव में शादी व्याह सहित किसी आयोजन में सार्वजनिक रूप से शराब परोसने वाली कुप्रथा पर अंकुश लगा दिया है परन्तु अपनी झूठी शान का छदम प्रदर्शन करने के पागलपन के दौर में आज लोग लोक दिखावा करने के लिए इस प्रकार शराब की पार्टी का आयोजन कर रहे हैं। इससे छोटे बच्चे तक शराब की जकड़ में आ गये है। कई स्थानों पर महिलाओं ने इन कच्ची व पक्की शराब की भट्टियों के साथ साथ सरकार द्वारा खोले जा रहे ठेकों का भी विरोध कर इन्हें बंद करने में सफलता हासिल की। ऐसी स्थिति में उत्तराखण्ड के बुद्धिजीवियों,नौजवानों व जागरूक महिलाओं को चाहिए कि वह ऐसे जनप्रतिनिधियों, लोगों व प्रशासनिक अधिकारियों का बहिष्कार करे जो समाज में अपने स्वार्थ के खातिर शराबी बनाने के लिए चुनाव, शादी व्याह या अन्य आयोजनों में शराब परोसते है। यहां सवाल कच्ची या पक्की शराब का नहीं यहां सवाल है इसकी जकड़े से तबाह हो रहे समाज को बचाने का है। हालांकि यहां शराब बिना पुलिस प्रशासन व नेताओं की मिली भगत से नहीं मिल सकती परन्तु इसको बढावा देने में समाज के प्रभावशाली तबके व उन लोगों का हाथ है जो अपनी झूठी शान के लिए शादी व्याह सहित अन्य आयोजनों में शराब को सार्वजनिक रूप से परोसने की धृष्ठता करके समाज को पतन के गर्त में धकेल रहे हैं।

Saturday, November 10, 2012



कश्मीर में अलगाववादी नेताओं को सुरक्षा व देशभक्त जांबाज देशभक्तों की उपेक्षा कर रही है सरकार


21 साल से आतंकियों का सफाया करने में पुलिस व सेना का साथ देने वाले राष्ट्रभक्त नजीर अहमद लोन व साथियों की उपेक्षा क्यो?




‘भारत सहित किसी भी देश के लिए इससे  शर्मनाक बात और क्या हो सकती है कि एक तरफ सरकार, देश को तबाह करने वाले देशद्रोही कश्मीरी अलगाववादी नेताओं को तो सुरक्षा प्रदान कर रही है परन्तु वहीं दूसरी तरफ देश के अमन शांति पर ग्रहण लगाने वाले आतंकवादियों से देश सुरक्षित रखने के लिए अपनी जान को हथेली में रखने वाले देश भक्त एसपीओं को न तो पर्याप्त सुरक्षा ही प्रदान कर पा रही है व  नहीं उनको अपने परिवार का सम्मानजनक ढ़ग से गुजरबसर कर सकने वाला ही रोजगार  दे पा रही है। भाईजान मैंने व मेरे साथियों ने कश्मीर से आतंक का सफाया के लिए अपने व अपने परिवार की सुरक्षा की परवाह न करते हुए पुलिस व सेना के साथ मिल कर दो दशक से अधिक समय से समर्पित हो कर देश की रक्षा का काम किया। परन्तु अपनी व अपने 100 साथियों को पर्याप्त सुरक्षा व रोजगार देने की मांग को लेकर पर न तो जम्मू कश्मीर सरकार ने व नहीं  केन्द्र सरकार ने लम्बे समय से ध्यान देने की जरूरत तक नहीं समझी। इससे आहत हो कर मुझे सीमान्त प्रांत कश्मीर से दिल्ली में गृहमंत्री से लेकर अन्य नेताओं से गुहार लगाने के लिए मजबूर होना पडा। मैं कई दिनों से दिल्ली में डेरा डाले हुए हूॅ।’ यह दर्द भरी दास्तान कश्मीर के अनन्तनाग जनपद में 20 साल से कश्मीर में आतंकियों का सफाया करने में पुलिस व सेना की सहायता करने वाले जांबाज नाजीर अहम्मद लोन ने प्यारा उत्तराखण्ड से कही। दिल्ली में संसद की चैखट, राष्ट्रीय धरना स्थल जंतर मंतर पर संयोगवश मेरे साथ पत्रकार इंजीनियर जगदीश भट्ट के साथ हुई विशेष वार्ता में श्री नजीर इस बात से भी बेहद आहत थे कि देश के हुक्मरानों को देश व देशभक्तों की चिंता क्यों नहीं है?
अनन्तनाग जनपद के पजलपोरा बिजबेहरा क्षेत्र के निवासी नजीर अहमद की मांग कोई तख्त और ताज की नहीं अपितु केवल अपने परिवार की पर्याप्त सीआरपी दस्ते द्वारा सुरक्षा प्रदान करने के साथ साथ उनको व उनके 100 एसपीओ साथियों को उचित रोजगार प्रदान करने की मांग कर रहे है। श्री लोन के अनुसार कश्मीर में सरकार आतंकियों के खात्मा के लिए कई बार पुरस्कार आदि की घोषणा करती है। परन्तु जब कोई देशभक्त अपनी जान जोखिम में डाल कर आतंकियों का सफाया कराता तो उसका ईनाम भी पुलिस प्रशासन के भ्रष्ट अधिकारी ही डकार जाते है। श्री लोन के अनुसार उन्होंने ने भी 7 साल पहले पहलगांव से अपहरण किये गये इटली सहित 5 विदेशी पर्यटकों की खोज में उनकी सूचना पर हयाजखान ने छित्तरकुल नतीजमाल पहाडियों के कब्रों से अपहरित पर्यटकों के शव  ढूंढें थे।  इनकी सूचना देने वाले को डीजी ने एक करोड़ के इनाम की घोषणा की थी। इस इनाम की जब मांग नजीर अहमद लोन ने एस पी से की तो पुलिस अधिकारी एस पी ने उसको गोली मारने की धमकी देते हुए ईनाम की राशि भूल जाने की बात कही।
श्री नजीर ने 21 साल तक पुलिस व सेना के साथ मिल कर एसटीएफ के तहत आतंकियों के सफाये का सराहनीय कार्य किया। उनके कार्यो की सराहना पुलिस व सेना के उच्चाधिकारियों ने समय समय पर की। यही नहीं जम्मू के खुफिया आईजी श्री निवास ने उनके द्वारा 4 आतंकियों के सफाया कराने पर हार्दिक बधाई दी थी। वे अपनी व अपने साथियों की उपेक्षा से आहत हो कर दिल्ली में नेताओं व मंत्रालयों में दर दर भटक रहे है। उनकी मांग को पूरा करना तो रहा दूर उनकी दास्तान तक सुनने की फुर्सत दिल्ली के नेताओं व नौकरशाहों के पास नहीं है। पर अब नये गृह मंत्री से जब वे इस सप्ताह मिले तो सुशील कुमार शिंधे ने उनकी फरियाद को सुनने व उनका उत्साह बढाया उससे उनको जरा आशा की किरण दिखाई दे रही है। श्री नजीर के अनुसार आतंकियों ने उसके  परिजनों को भी निशाना बनाते है। उनका एक भाई के बेटे पर भी जानलेवा हमला आतंकी कर चूके है। उनके अनुसार कश्मीर को खुदा ने तमाम संसाधन व सौन्दर्य दिये परन्तु आतंकियों ने इसको नरक बना दिया। खुद नजीर का परिवार अखरोट, बदाम व सेव के पुस्तैनी बागों से अपनी जीविकोपार्जन करता है। परन्तु सरकार व भ्रष्ट अधिकारियों के व्यवहार से वे बेहद आहत है।  भारत सरकार क्या उसकी बात सुनेगी इसी चिंता में वे दिल्ली में दर दर की धूल फांक रहे हैं।
एक तरफ देश की मनमोहन सरकार आतंकवाद से ग्रसित कश्मीर की समस्या के समाधान के लिए काम करने का दावा कर रही है वहीं हर साल देश के अरबों खरबों रूपये कश्मीर में आतंकी गतिविधियों पर अंकुश लगाने  के नाम पर पानी की तरह बहाये जा रहे है। परन्तु जमीनी हकीकत यह है कि सरकार द्वारा कश्मीर समस्या के समाधान के लिए बनायी गयी कश्मीर समिति भी वही भाषा बोल रही है जो पाक समर्थित अलगाववादी संगठन बोल रहे हैं और कश्मीर में आतंकवाद पर अंकुश लगाने के लिए खर्च किया जाने वाला देश का पैंसा यहां आतंकियों के सफाया करने वालों के हितों की रक्षा करने के बजाय यहां पर काबिज भ्रष्ट नौकरशाही के उदरपूर्ति में खर्च हो रहा है। हालत इतनी शर्मनाक है कि अमेरिका की शह पर कश्मीर को अपनी आतंकी गतिविधियों से तबाह करने को तुले पाकिस्तान के कुचक्र को विफल करने के लिए अपनी जान की परवाह न करके आतंकियों का सफाया कराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले जांबाज एसपीओं सरकार की उदासीनता व भ्रष्ट अधिकारियों के षडयंत्र के कारण न केवल बदहाली के कगार पर हैं अपितु उनके व उनके परिजनों के सर पर हर पल आतंकवादियों के हमले का साया मंडरा रहा है। देश की सुरक्षा के लिए आतंकियों का सफाया करने में महत्वपूर्ण रहे कश्मीरी देशभक्त जांबाज नौजवानों ने एसपीओ बन कर देश की सेवा करना स्वीकार किया है। उनको व उनके परिजन को उचित सुरक्षा देने तथा उनको सम्मानजनक रोजगार देने के बजाय उनको उनके हाल पर छोडने का काम किया जा रहा है।  अब सवाल यह है कि क्या गृह मंत्री सुशील कुमार शिंधे अपने पूर्वमंत्री द्वारा इस क्षेत्र व देशभक्तों की उपेक्षा को दूर करने के दायित्व का निर्वहन करके इन राष्ट्रभक्तों के साथ न्याय कर पायेंगे? शेष श्री कृष्ण कृपा। हरि ओम तत्सत्। श्रीकृष्णाय् नमो।



गैरसेंण में विधानसभा भवन बनाने की पहल को गैरसेंण राजधानी बनाने की दिशा में सकारात्मक कदम मानते हैं नरेन्द्र सिंह नेगी 

उत्तराखण्डी अखबार, गीतों की कैसेट व साहित्य को बढावा देने की जरूरत
उत्तराखण्ड के अग्रणी कालजयी लोक गायक नरेन्द्रसिंह ने
गी ने उत्तराखण्ड प्रदेश सरकार द्वारा 3 नवम्बर को गैरसेंण में मंत्रीमण्डल बैठक के बाद किये ‘गैरसेंण में मकर संक्रांति 2013 को विधानसभा भवन का शिलान्यास करने व विधानसभा का एक सत्र गैरसेंण में कराने के निर्णय को प्रदेश की स्थाई राजधानी गैरसेंण में बनाने की दिशा में एक सकारात्मक कदम मानते हुए इसका पुरजोर स्वागत किया। प्रदेश की संस्कृति, हक हकूकों व जनभावनाओं को अपना स्वर दे कर आम जनमानस के दिलों में राज करने वाले महान गायक नरेन्द्रसिंह नेगी ने अपने विचार उत्तराखण्ड राज्य गठन जनांदोलन के अग्रणी संगठन ‘उत्तराखण्ड जनता संघर्ष मोर्चा के अध्यक्ष व प्यारा उत्तराखण्ड के सम्पादक देवसिंह रावत, उत्तराखण्ड पत्रकार परिषद के पूर्व महासचिव दाताराम चमोली, आर्चिटेक्ट ब्रह्मा छिमवाल व संजय नौडियाल, एबीपी समाचार चैनल के पत्रकार मनु पंवार, नरेन्द्रसिंह नेगी के उभरते हुए गायक सुपुत्र कविलास व पत्रकार वेद उनियाल के साथ दिल्ली में उत्तराखण्डी समाज के दीवाली मिलन समारोह में गैरसेण पर सरकारी पहल पर चल रही एक चर्चा पर अपना दृष्टिकोण रखते हुए कही। 
दीवाली मिलन समारोह का आयोजन 10 नवम्बर को सांय 7 बजे से डीपीएमआई परिसर में न्यू अशोक नगर दिल्ली में पैरामेडिकल इस्टीटयूट के प्रबध निदेशक व समाज के अग्रणी समाजसेवी डा. विनोद बछेती द्वारा डीपीएमआई परिसर में किया गया। इसमें उत्तराखण्डी समाज के अग्रणी समाजसेवियों, पत्रकारों, उद्यमियों ने भाग लिया। इस अवसर पर उत्तराखण्ड के मुहम्मद रफी के रूप में ख्याति प्राप्त नरेन्द्रसिंह नेगी ने प्यारा उत्तराखण्ड के बेबाक प्रकाशन के लिए सम्पादक देवसिंह रावत की सराहना करते हुए कहा कि भले ही उत्तराखण्ड में असंख्य समाचार पत्र प्रकाशित किया जाते हैं पर जो बेबाब ढ़ग से प्यारा उत्तराखण्ड के सम्पादक देवसिंह रावत प्यारा उत्तराखण्ड का प्रकाशन कर रहे हैं वह सराहनीय है। 
महान लोक गायक नरेन्द्रसिंह नेगी ने इस अवसर पर समाज के लोगों से अनुरोध किया कि वह महाठी समाज की तरह अपनी संस्कृति व हक हकूकों की रक्षा करने के लिए आगे आयें। श्री नेगी ने अफसोस प्रकट किया कि हमारे समाज में अपने समाज के हक हकूकों व संस्कृति की रक्षा के लिए प्रकाशित समाचार पत्रों, साहित्य पुस्तकों व गीत की केसेटों को खरीद कर इसे मजबूती प्रदान करने की प्रवृति नहीं है। वहीं मराठी समाज में अपनी संस्कृति के मजबूती प्रदान करने वाले गीतों की कैसेट, साहित्य पुस्तके व समाचार पत्रों को खरीदने की प्रवृति के कारण है कि आज मराठी समाज बाॅलीवुड के चकाचैंध में भी अपना सम्मानजनक स्थान बनाने में सफल है। उन्होंने कहा कि जहां मराठी संस्कृति को बढावा देने के लिए वहां की क्षेत्रीय दल मजबूत हैं। वहीं उत्तराखण्ड में क्षेत्रीय दल दिशाहीन व सत्तालोलुपु है। उन्होंने कहा कि उत्तराखण्डं की संस्कृति व लोकभाषा तथा हक हकूंकों के लिए सतपाल महाराज उत्तराखण्डी क्षेत्रीय दलों से कहीं बेहतर काम कर रहे हैं । 
डा विनोद बछेती द्वारा दीवाली मिलन के नाम से आयोजित इस कार्यक्रम में गत वर्ष की भांति इस साल भी लोक गायक नरेन्द्रसिंह नेगी उपस्थिती ने इस आयोजन को चार चांद लगा दिये। इसमें सम्मलित अन्य महत्वपूर्ण समाजसेवियों में उत्तराखण्ड के अग्रणी गायक चन्द्रसिंह राही, प्रोगे्रसिव पार्टी के अध्यक्ष जगदीश मंमगांई, दिल्ली कांग्रेस के नेता दीवान सिंह नयाल, दिल्ली पुलिस के एसीपी सतीश शर्मा, नोयडा के समाजसेवी योगेन्द्र मंमगांई, व उद्यमी भगवती प्रसाद रतूडी , उत्तराखण्ड महासभा के कर्ण बुटोला, वरिष्ठ पत्रकार व्योमेश जुगरान, इंजीनियर जगदीश भट्ट, दिनेश ध्यानी, उत्तराखण्ड लोकमंच के अध्यक्ष बृजमोहन उप्रेती, पत्रकार इन्द्रचंद रजवार, अनिल पंत, सतेन्द्र रावत , दूरदर्शन के पत्रकार उर्मिलेश भट्ट, केन्द्रीय मंत्री श्रीप्रकाश जयसवाल के ओएसडी एस एस नेगी, किशोर रावत, गढवाल सभा कडकडडूमा के अध्यक्ष अमरसिंह राणा, रंगकर्मी महेश, समाजसेवी जयसिंह रावत, शिव चरण मुडेपी, रंगकर्मी नरेन्द्र पांथरी, उत्तराखण्ड परिषद के मोहन बिष्ट एवं साथी, अनिल, भण्डारी, चैहान, व हेमंत पसबोला सहित अनैक प्रतिष्ठित समाजसेवी उपस्थित थे।
 

Friday, November 9, 2012


प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की दावत ने हजारों लोगों को रूलाया

देश के हुक्मरानों के कदमों तले दम तोड़ती भारत की लोकशाही


9 नवम्बर की सांय को प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के आवास पर दी गयी दावत ने रेसरोड़ व उसके आसपास से जुडे तमाम रोड़ों पर लम्बे
 समय पर जाम में फंसा कर बहुत ही बेदर्दी से रूलाया। अपने घर के अन्दर प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह व उनको अपने समर्थन की बैशाखियों का सहारा देने वाले मुलायम व अन्य दावत का आनन्द ले रहे होगें वही उनके घर के आस पास मीलों तक उनकी इस दावत के कारण जाम में फंसे हजारों देश के आम नागरिक अपनी बेबसी पर भारतीय लोकशाही का कहर सह रहे थे। मनमोहन सिंह व उसकी सरकार के बद इंतजामी व अलोकतांत्रिक मनोवृति के कारण इस जाम में फंस कर भारतीय लोकतंत्र के इस नीरो के लिए आम आदमी की बेबसी के आंसू को पीने वाला मैं अकेला नहीं मेरे जैसे हजारों लोग रेस कोर्स रोड़ से लेकर उसके आस पास मीलों दूर तक फंसे हुए थे । हालांकि मुझे सुबह से भनक थी कि 9 नवम्बर की रात को प्रधानमंत्री अपनी सरकार को अपने समर्थन की बैशाखियों का सहारा देने वाले मुलायम सिंह यादव, उनके सुपुत्र यानी उप्र के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव, मुलायम के भाई रामगोपाल सहित मंत्री सांसद के रूप में विराजने वाले उनके पूरे कुनबै को दावत दे रहे हैं। खुफिया ऐजेन्सी भी इस खबर की पुष्टि के लिए इधर उधर अंधेरे में हाथ मार रही थी।
मैं अग्रणी समाजसेवी महेश चन्द्रा के साथ एक कार में 7 रेसकोर्स रोड़ पर 7 बजे से आठ बजे के करीब प्रधानमंत्री के घर के आसपास 200 मीटर की इस रोड़ पर जाम में इस पार्टी के कारण फंसे रहे। परन्तु उन आम आदमियों की चिंता न तो प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को हुई, न उनके मंत्रियों व नहीं उनकी जनविरोधी सरकार को अपने निहित स्वार्थो के कारण समर्थन दे रहे मुलायम सिंह यादव जैसे समर्थक दलों को होगी। देश के भ्रष्टतम शासन प्रशासन को आम आदमी के इस लाचारी का कभी भान ही नहीं रहा। लगता है मनमोहन जैसे जनता पर अपने कुशासन का कहर ढालने वाले प्रधानमंत्री व उनके प्रशासन को जनता को कभी मंहगाई व कभी भ्रष्टाचार आदि से बेहाल करने के बाद इस प्रकार से रूलाने में अपार आनन्द मिलता है। अगर मनमोहन सिंह व उनके शासन प्रशासन को जनता का जरा सा भी ख्याल रहता तो वे कभी जनता को इस प्रकार से कभी परेशान नहीं करते। क्या प्रशासन को जनता को बेवजह परेशान करने में आंनन्द आता है। क्या यही भारत का लोकतंत्र है ? क्या आम जनता को ऐसे जनप्रतिनिधि चुनने का यही दण्ड यह तंत्र देता है। यह सवाल केवल कांग्रेस या भाजपा या अन्य दल का नहीं है। इस देश में सरकार किसी की रहे, उसकी नजर में आम आदमी को कोई इज्जत नहीं। देश के इन हुक्मरानों के आने जाने व दावतों में इस प्रकार से हर दिन यत्र तत्र लोगों को परेशानी झेलनी पड़ती है। प्रधानमंत्री व उनका प्रशासन आजादी के 65 साल बाद भी इस प्रकार के अलोकतांत्रिक समस्या का समाधान तक नहीं खोज पाये। या खोजने की सुध तक भी इन्हें नहीं रही। अगर इन हुक्मरानों को आम आदमी से इतना ही भय है तो ये क्यों लोकशाही में जनप्रतिनिधी बनते हैं। इनको यह देश छोड़ कर अमेरिका या इनका कार्यालय या आवास किसी निर्जन द्वीप में बना देना चाहिए जहां ये जहाज या हेलीकप्टर से जा कर वहां अपनी बैठक या दावत वहीं होनी चाहिए। जिससे आम आदमियों को किसी प्रकार की परेशानी इनके आने, जाने या दावत आदि से नहीं होगी। संसार में सबसे बडे लोकतांत्रिक देश होने का दम भरने वाले भारत में लोकशाही की हकीकत यही है कि यहां आज भी राजशाही से बदतर घिनौना चेहरा, देश के तथाकथित जनप्रतिनिधी व नौकरशाह, देश की मालिक आम जनता को हुक्मरान बन कर कैसे अपने कदमों तले रूलाती है यह इनके आने जाने व दावत आदि कार्यो के कारण घण्टों जाम में फंसे हुए बेबश आम आदमी से बेहतर कौन जान सकता है।
 

Thursday, November 8, 2012


जय श्री कृष्ण। 
विश्व लोकशाही में भारतीयता का परमच फेहराने के लिए बनाये गये उत्तराखण्ड राज्य के स्थापना दिवस 9 नवम्बर को राज्य गठन के सभी शहीदों
व समर्पित आंदोलनकारियों के ऐतिहासिक संघर्ष को शत् शत् नमन्।
आप सभी को उत्तराखण्ड राज्य गठन की 12 वीं वर्षगांठ पर
हार्दिक बधाई और शुभकामनाए।


आओ संकल्प लेंआओ उत्तराखण्ड को कल्याणकारी राज्य बनाने के लिए संकल्प लें

उत्तराखण्ड राज्य के नाम ‘उत्तराखण्ड ’को राज्य गठन के 6 सााल बाद संघर्ष व प्रबल दवाब से हासिल करने की तरह ही

-प्रदेश की स्थाई राजधानी गैरसेंण बनाने, ग्रीष्मकालीन नहीं पूर्ण कालीन राजधानी बने गैरसैण, प्रदेश के विकास व लोकशाही की रक्षा के लिए देहरादून की थोपशाही से लोकशाही को कलंकित होने से बचायें ।

--प्रदेश के भविष्य व वर्तमान पर ग्रहण लगाने वाले जनसंख्या पर आधारित विधानसभाई परिसीमन का रद्द करने। 

-राज्य गठन जनांदोलन को खटीमा, मसूरी, मुजफरनगर काण्ड, देहरादून व श्रीयंत आदि स्थानों पर रौंद कर प्रदेश के सम्मान को पुलिस प्रशासन के अमानवीय दमन व अत्याचार से शर्मसार करने वालों को कठोर दण्ड दिलाने के लिए प्रदेश सरकार को विवश करना। प्रदेश के शासन प्रशासन में घुसे मुजफरनगर काण्ड-94 के गुनाहगारों व उनके प्यादों को चिन्हित करके उनको दण्डित कराने तथा राजनैतिक दलों में घुसे मुजफरनगर काण्ड के खलनायक मुलायम के प्यादों जो आज भी आंदोलनकारियों के कातिल के रूप में जाने जाते हैं उनको हटाने के लिए राजनैतिक दलों को विवश करना। 

-प्रदेश में बांधों, तथा बाघों के विनाशकारी प्रवृति पर अंकुश लगाते हुए इस सीमान्त प्रदेश में हो रही घुसपेट पर अंकुश लगाना। 

-प्रदेश मे एनजीओ के बजाय ग्राम पंचायत, महिला मंगल दल, युवक मंगल दलों को पर्यावरण रक्षा, संरक्षण के कार्यो में लगा कर यहां की बैरोजगारी व पलायन पर अंकुश लगाना।

-ग्रामीण व प्रदेश में शिक्षा के मूलाधार को बचाने के लिए राजकीय सेवाओं में विद्यालयी शिक्षा सरकारी विद्यालयों से ग्रहण करने वालों को आरक्षित करके ही बचायी जा सकती है।

-सीमान्त जनपदों में स्वास्थ सेवायें उपलब्ध कराने के लिए राष्ट्रीय सीमान्त स्वास्थ्य मिशन को लागू कराने के लिए केन्द्र सरकार पर दवाब बनाना। 

-प्रदेश की लोकशाही व विकास पर जातिवाद व क्षेत्रवाद एवं भ्रष्टाचार का ग्रहण लगाने वाले दिल्ली दरवार के कांग्रेस व भाजपा के मठाधीशों के षडयंत्र का मुंहतोड़ जवाब देते हुए यहां विकासोनुमुख व जनसमर्पित नेतृत्व से कल्याणकारी राज की स्थापना करना।

-प्रदेश के जल, जंगल व जमीन की रक्षा के लिए हिमाचल प्रदेश की तर्ज पर रक्षा करना और हिमाचल की ही तर्ज पर फलोद्योग व कुटीर उद्योग को संरक्षण देना। जैविक खाद्यान्नों का विश्व स्तर का उत्पादन केन्द्र बना कर यहां के किसानों व व्यवस्था को मजबूत बनाना।

पर्यटन को व्यापक उद्योग में तब्दील करना तथा देवभूमि में सात्त्विक धार्मिक व साहसिक पर्यटन में विश्व का प्रमुख केन्द्र बनाना। 

-भारतीय चिकित्सा पद्धति को बढावा देते जड़ी बूटियों को भारी स्तर पर उत्पादन से लोगों को आत्म निर्भर बनाना। 

-राज्य गठन के बाद प्रदेश में राजनैतिक दलों के आकाओं के परिजनों, प्यादों व अन्य लोगों को एनजीओ आदि के नाम पर लुटवाये गये प्रदेश की जमीनों के पट्टे को तत्काल रद्द करने।

-भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने के लिए भ्रष्ट्र अधिकारी व जनप्रतिनिधि की सम्पति जब्त हो तथा हर साल सम्पति की घोषणा हो। 

-प्रदेश में शराब, गुटका, तम्बाकू व कत्लगाहों पर पूर्ण प्रतिबंध लगना।




देवसिंह रावत
अध्यक्ष 
उत्तराखण्ड जनता संघर्ष मोर्चा 
(अगस्त 1994 से 16 अगस्त 2000 तक संसद की चैखट, राष्ट्रीय धरना स्थल जंतर मंतर पर राज्य गठन के लिए ऐतिहासिक सफल धरना, प्रदर्शन व रैलियां करने वाला तथा भारत में राज्य गठन के इतिहास में सबसे लम्बा जीवंत व सफल धरना देने का कीर्तिमान स्थापित करने वाला संगठन। राज्य गठन के बाद इन 12 सालों तक निरंतर जनांकांक्षाओं के अनुरूप प्रदेश में शासन स्थापित के लिए अब तक सत्त संघर्ष करने के लिए समर्पित संगठन)
— with Rajpal Bisht and 44 others.