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Thursday, June 30, 2011

come allmighty god Shri Krishna wish to bless u

whenever u come out from well and swim in deep sea, whenever you open yrself from lock room to fly open endless sky u must find there new and heavenly happiness, see how very large and deep of sea of spritual, where u can see yrself , where u easily can know mistry of life, where u can enlight yr soul. why delay life is not to waste, search better way, see how heavely happiness sea waiting you, if u are really wish to know secret of life and happiness, if u really wish to know who u are and who is creator of this universe please see and come the holly heaven of god which all world say INDIA but its real own name is BHARAT. where is land of wisdom and peace, where is lant of spritual, where is land of Yoga,. where is holly Himalaya and holly Ganga, where alive more than 5 thousand year enrich civilise society. see when no other religion will existance that true path still alive with its potential. where u may learn its from yrself real meaning of divine, where u can see how to true yr this dream . come allmighty god Shri Krishna wish to bless u. www.rawatdevsingh.blogspot.com

Tuesday, June 28, 2011

मंत्री मण्डल को नहीं, प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को बदलो

मंत्री मण्डल को नहीं, प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को बदलो/
सम्पादक ही नहीं अधिकांश मीडिया घरानों से जुड़े पत्रकार भी जनता से कटे/
लगता हैं कांग्रेस आलाकमान को देश की हवाओं में बह रहे जनसंदेश को भांपने में असफल हैं या वह अमेरिका के भारी दवाब के कारण इतनी लाचार है कि वह देश व कांग्रेस को पतन के गर्त में धकेलने वाली अपनी सरकार के सबसे नक्कारे साबित हो चूके प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को तत्काल हटाने के बजाय केन्द्रीय मंत्रीमण्डल में ही बदलाव करने को समर्थन कर रही है। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को तत्काल हटा कर उनके कुशासन के कारण बेलगाम मंहगाई, भ्रष्टाचार व आतंकवाद से अराजकता के गर्त में पंहुच चूके देश को बचाने के लिए तत्काल राहुल गांधी को प्रधानमंत्री बना कर देश व कांग्रेस की रक्षा करने के अपने दायित्व का निर्वाह करना चाहिए। वहीं दूसरी तरफ प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह आज से अपनी छवि सुधारने के नाम पर देश के वरिष्ठ सम्पादकों से मिलने कर अपनी व अपनी सरकार की छवि सुधारने का काम कर रहे हैं, मनमोहन सिंह का यह टोटका भी कहीं काम नहीं आने वाला। क्योंकि मनमोहन सिंह ने देश की हालत इतनी शर्मनाक कर दी है कि इसका कोई प्रायश्चित नहीं है। वैसे भी जिन स्वनामधन्य सम्पादकों से वे मिल रहे हैं या मिलेंगे, वे ही ंनहीं देश के तमाम तथाकथित मीडिया धरानों के अधिकांश पत्रकार भी आज देश की आम जनता से पूरी तरह से कटे हुए हैं। आज ंका सम्पादक व पत्रकार अब मीडिया के लिए समर्पित पत्रकार नहीं अपितु एक सेल्समेन से ज्यादा नहीं रह गया है। वेसे भी आज के अधिकांश पत्रकार देश की उस 50 प्रतिशत से अधिक जनसंख्या का प्रतिनिधित्व करने वाली गरीबी के रेखा से नीचे जीवन यापन करने वाली जनता के सुख दुखों से ही नहीं उनकी दुनिया से पूरी तरह से अनजान हैं जिनके जीवन पर मनमोहनसिंह सरकार ने मंहगाई व भ्रष्टाचार से पूरी तरह ग्रहण लगा दिया है। देश के दूरस्थ क्षेत्रों की बात तो रहने दें देश की राजधानी दिल्ली में ही आज इस लोकशाही के तथाकथित चोथे स्तम्भ को इतना भान नहीं है कि दिल्ली की आम जनता किस कदर से परिवहन के लिए संचालित डीटीसी की बसों से पीड़ित है। यह तो बहुत जमीनी बात है मीडिया के अधिकांश वर्ग को लोकशाही पर लगाये सरकार की वंदिशों का ही भान नहीं होगा। इन मीडिया के तथाकथित पंचतारा संस्कृति के सम्पादकों व पत्रकारों के भरोसे प्रधानमंत्री सोचते हैं कि वे अपनी व अपनी छवि उस आम जनता के नजरों में सुधार देंगे तो यह उनकी हिमालयी भूल है। उनकी देश सेवा के लिए एक ही विकल्प रह गया कि वे देश व कांग्रेस के हित में यह सर्वोच्च काम कर सकत हैं कि वे अपने पद से इस्तीफा दे कर देश की सच्ची सेवा करें। लगता है प्रधानमंत्री मनमोहन अब इतने सत्तालोलुप हो गये हैं कि उनको अपनी सरकार से देश की ंहो रही ंभयंकर दुर्दशा भी नहीं दिखाई देगी। वैसे भी मंत्रीमण्डल में बदलाव के नाम पर सरकार से जन नेता व ईमानदार छवि के लोगों को दूर करके उन प्यादों को जोड़ा जायेगा जिनका मनमोहनसिंह की तरह आम जनता से कभी कोई सरोकार ही नहीं रहा। मंत्रीमण्डल के बदलाव के नाम पर उन लोगों को मंत्रिमण्डल व बड़े पदों पर आसीन किया जायेगा, जो अपने आकाओं की पूजा कर सके, लगता है मनमोहन सिंह मंत्रीमण्डल में बीरभद्र सिंह जेसे ईमानदार व जननेताओं के बजाय आनन्द शर्मा जैसे हवाई नेताओं की ज्यादा जरूरत है। आज जिस प्रकारं से कांग्रेस में आस्कर फर्नाडिस जैसे जनता के लिए समर्पित नेताओं की उपेक्षा मंत्रीमण्डल में हो रही है वह कांग्रेस नेतृत्व की सोच को ही कटघरे में रख रही है। राहुल गांधी को प्रधानमंत्री बनाने व मनमोहन की विदाई में कांग्रेस जितनी भी देर करेगी, देश व कांग्रेस के लिए एक एक पल बहुत ही खतरनाक साबित हो रहे है।

आखिर क्यों दम तोड़ चूकी है उत्तराखण्डी नेताओं की आत्मा

-आखिर क्यों दम तोड़ चूकी है उत्तराखण्डी नेताओं की आत्मा/
-चार साल से कब्जा जमाये हुए थे विधायक किशोर, मुख्यमंत्री के पद से हटने के कई महिनों तक मुख्यमंत्री आवास पर जमे रहे खंडूडी, भाजपा के बीना महाराना व अजट टम्टा ने भी जमें हुए हैं मत्री की कोठी में/

इस सप्ताह जो प्रकरण देहरादून में कांग्रेसी विधायक किशोर उपाध्याय के सरकारी आवास को खाली कराने पर घटित हुआ उसको देख कर मेरा सर शर्म से झुक गया। हमारे भाग्य विधाताओं के कारनामों को देख कर एक ही प्रश्न मेरे मन में उठा कि आखिर ये उत्तराखण्ड को कहां ले जायेंगे? इन नेताओं की आत्मा जनप्रतिनिधी होते हुए क्यों दम तोड़ गयी।
इस सप्ताह राज्य सम्पति विभाग और पुलिस ने विधायक किशोर उपाध्याय का यमुना कालोनी स्थित आवास उनकी अनुपस्थिति में बलपूर्वक खाली करा कराया। इसका प्रचण्ड विरोध कर रहे नेता प्रतिपक्ष डा. हरक सिंह रावत, विधायक दिनेश अग्रवाल और अन्य कांग्रेसियों क ेकरीब पांच घंटे हंगामे के बाद पुलिस ने कांग्रेसियों को गिरफ्तार करने पर इस प्रकरण का पटाक्षेप किया। इसकी झलक देश के समाचार चैनलों ने भी दिखाया। इस आवास में मौजूद सामान को जब्त कर ट्रांजिट हास्टल पहुंचा दिया गया है। इस कार्रवाई से पूर्व न्यायालय से विधायक किशोर उपाध्याय को दो बार नोटिस दिया जा चुका है। दो दिन पहले अपर सचिव अरविन्द सिंह ह्यांकी ने आदेश जारी किया कि चार साल से यमुना कालोनी न्यू मंत्री आवास संख्या-पांच में अनाधिकृत तरीके से रह रहे विधायक किशोर उपाध्याय का आवास खाली कराया जाए। इसके बाद सिटी मजिस्ट्रेट मेहरबान सिंह, एसपी सिटी अजय जोशी और राज्य सम्पत्ति विभाग के मुख्य व्यवस्थाधिकारी सीनियर ग्रेड सीपी बृजवासी पुलिसबल के साथ घटना वाले दिन सुबह नौ बजे विधायक आवास पहुंचे। विधायक किशोर..विधायक किशोर उपाध्याय इन दिनों परिवार के साथ कोलकाता में था। उसे देश कर देश के प्रबुद्व लोग हैरान थे कि उत्तराखण्ड के नेताओं को क्या हो गया। क्या विधायक के मकान में रहना इन लोगों के शान के खिलाफ है। अगर जनप्रतिनिधि ही कानून का सम्मान नहीं करेंगे तो आम जनता से क्या आशा की जा सकती है।
इसकी सूचना नेता प्रतिपक्ष हरक सिंह रावत, विधायक लक्ष्मण चैक क्षेत्र दिनेश अग्रवाल व अन्य कांग्रेसियों को मिली। सूचना मिलते ही भारी संख्या में कांग्रेसी मौके पर पहुंच गए। तब तक आवास से दो ट्रक सामान ले जाया जा चुका था। हालांकि नेता प्रतिपक्ष डा. हरक सिंह रावत ने पुलिस- प्रशासन और सरकार पर विधायक के उत्पीड़न का आरोप लगाते हुए अन्य कांग्रेसियों के साथ मुख्य द्वार पर धरना आरंभ कर दिया। कांग्रेसियों ने सरकार के खिलाफ नारेबाजी की। एसपी सिटी अजय जोशी व सिटी मजिस्ट्रेट मेहरबान सिंह ने नेता प्रतिपक्ष को समझाने का प्रयास किया परंतु वह धरने से उठने को राजी नहीं हुए।कांग्रेसियों के हंगामे के बाद पुलिस ने धरना-प्रदर्शन और नारेबाजी कर रहे कांग्रेसियों को गिरफ्तार कर लिया और पुलिस लाइन ले जाकर छोड़ दिया। इसके बाद राज्य सम्पत्ति विभाग द्वारा विधायक आवास खाली करवाकर सामान एमएलए ट्रांजिट हास्टल (अस्थाई विधायक आवास) स्थित आवास संख्या छह में रखवा दिया गया। प्यारा उत्तराखण्ड को दूरभाष द्वारा सम्पर्क किये जाने पर मुख्य व्यवस्थाधिकारी राज्य सम्पत्ति विभाग सीपी बृजवासी ने बताया कि 13 मार्च 2007 को विधायक किशोर उपाध्याय का आवंटन निरस्त कर दिया गया था। आवंटन निरस्त होने के बाद भी श्री उपाध्याय आवास खाली नहीं कर रहे थे। न्यायालय द्वारा उनको दो बार उन्हें नोटिस भेजा जा चुका था। ऐसी स्थिति में प्रशासन के पास यह कार्यवाही करने के अलावा कोई दूसरा रास्ता नहीं बचा था।
यह घटना मात्र इतनी नहीं है कि प्रदेश की सत्तासीन भाजपा सरकार के इशारे पर प्रशासन ने कांग्रेसी विधायक किशोर उपाध्याय का मंत्रियों के लिए बने यमुना कालोनी वाला सरकारी आवास पुलिस बल की सहायता से खाली करा दिया। हालांकि कांग्रेसी यह सवाल कर रहे हैं कि भाजपा सरकार ने इसी प्रकार से मंत्री आवासों पर कब्जा जमाये हुए विधायकों को क्यों खाली नहीं कराया। यह केवल राजनीति द्वेष है। गौरतलब है कि भाजपा की विधायक बीना महाराना व अजय टम्टा भी किशोर उपाध्याय की तरह ही इन मंत्री वाले आवासों में ही रह रहे हैं। उनसे प्रशासन ने कई बार खाली कराने का अनुरोध किया परन्तु क्या मजाल है इन लोगों को अपने नैतिक दायित्व का बोध तक हो। मामला कोर्ट में चल रहा है। ये तीनों विधायकों को ये आवास उस समय आवंटित किये गये थे जब वे मंत्री पद पर आसीन थे। किशरो उपाध्याय तिवारी के शासन काल में राज्य मंत्री थे, बाद में किन्ही कारणों से उन्होंने अपने पद से इस्तीफा दे दिया। ऐसा ही भाजपा नेत्री बीना महाराना व अजय टम्टा के साथ हुआ। दोनों भाजपा मुख्यमंत्री भुवनचंद खंडूडी के नेतृत्व वाली सरकार में मंत्री पद पर आसीन थे तब उन्हें ये आवास मिले। प्रदेश में भाजपा द्वारा मुख्यमंत्री को बदले जाने पर निशंक सरकार में बीना महाराना को मंत्री पद पर आसीन नहीं किया गया वहीं अजय टम्टा को भी सांसद चुनाव में करारी हार का खमियाजा भोगते हुए उन पर भाजपा नेतृत्व की गाज गिरी और उनको प्रदेश सरकार में मंत्री पद से भी हाथ धोना पड़ा।
इन तीनों के प्रकरण से एक बात स्पष्ट हो जाती है कि इन तीनों का नैतिक दायित्व यही कहता है कि जैसे ही मंत्री पद से हट गये तो मंत्री पद हेतु मिली सभी सुविधायें व अधिकार शासन को समर्पित कर दिये जायं। मंत्री पद पर रहते हुए जो गाड़ी, सहायक व कार्यालय सहित अन्य सुविधायें स्वतः सरकार वापस ले लेती है। इसी तरह सरकार आशा करती है कि मंत्री आवास भी जल्द से जल्द सरकार को सोंप दिया जाय ताकि जो इस पद पर नियुक्त हो चूके मंत्री को यह आवास उपलब्ध किया जा सके। इस नैतिक तकाजे के बाबजूद न जाने क्यों इन जनप्रतिनिधियों ने क्या सोच कर इन आवासों को खाली करना नहीं चाहा। हो सकता है कि कोई ऐसे वाजीफ कारण रहे हों परन्तु जब उनको विधायक आवास आवंटित किये जा चूके हैं तो उनका मंत्री आवास अपनी शान-प्रतिष्ठा का प्रतीक तथा अपनी बपौती न समझते हुए इसको सरकारी धरोहर समझ कर शासन प्रशासन को सौंप देना चाहिए।
यह प्रवृति केवल विधायकों या मंत्रियों तक सीमित नहीं रह गयी जिस प्रकार से प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री भुवनचंद खंडूडी ने मुख्यमंत्री के पद से हटने के कई महिने बाद भी मुख्यमंत्री आवास खाली नहीं किया, इससे जनता में उनकी भारी किरकिरी हुई। इस कारण से प्रदेश के वर्तमान मुख्यमंत्री को अपने मंत्री वाले आवास को ही मुख्यमंत्री आवास में ंतब्दील करना पड़ा। जिस कारण भले ही मुख्यमंत्री को असुविधा भले ही न हो परन्तु प्रशासन व सुरक्षा तंत्र को काफी परेशानी का सामाना करना पड़ा। खंडूडी के मुख्यमंत्री पद से हटने के कई महिने तक मुख्यमंत्री आवास पर डटे रहने की प्रवृति की जब जनता में कड़ी भ्रत्र्सना हुई तो खंडूडी को अपनी भूल का एहसास हुआ परन्तु तब तक कई माह बीत गये। लोग हैरान थे कि एक सेना का उच्च अधिकारी होने के बाबजूद खडूडी को इतना भी नैतिकता नहीं रही कि पद को छोड़ते ही उसकी महत्वपूर्ण सुविधायें छोड़नी पड़ती है खासकर मुख्यमंत्री आवास व्यक्ति का नहीं पद पर आसीन का होता है। यह प्रवृति व झूटे दिखावे की प्रवृति उत्तराखण्ड को कहां ले जायेगी। यही चिंता का विशष है। शेष श्रीकृष्ण कृपा। हरि ओम तत्सत् । श्री कृष्णाय् नमो।

Monday, June 27, 2011

माया ने दिया कांग्रेस को करारा जवाब

- माया ने दिया कांग्रेस को करारा जवाब/
-भगवान के घर अंधेर नहीं,/
-शीशे के घरों में रहने वालों को दूसरों पर पत्थर नहीं फेंकना चाहिए/
27 जून को मायावती में कांग्रेस को उसकी ही भाषा में ऐसा जवाब दिया कि अठ्ठाहस कर रहे दिग्विजयी कांग्रेसी कागची शेर माया के वार से लखनऊ में ही चारों खाने चित्त हो हो गये। माया के इस करारे सबक से कांग्रेसियों ने मान ही लिया होगा भगवान के घर अंधेर नहीं है। मायावती के इस दमनकारी कदम से कांग्रेस ने यह सबक भी सीखा होगा कि जिनके घर शीशों के होते हैं उनको दूसरों को पत्थर नहीं मारने चाहिए। ऐसा ही रहस्यमय सबक सिखाया समय ने सत्तामद में जनहितों को रोंद रही देश की सत्ता में आसीन कांग्रेस को। दमन कांग्रेस ने किया लोकशाही का, दमन माया भी कर रही है लोकशाही का। दोनों दमनकारी दलों को समय, समय-समय पर ऐसा करारा सबक सिखाता की उनके मंसूबे धरे की धरे रह जाते हैं।
देश की सत्ता में आसीन कांग्रेस गठबंधन की सरकार ने अपनी सत्तामद में चूर हो कर देश के हित में विश्व विख्यात योगगुरू बाबा रामदेव के नेतृत्व में शांतिपूर्ण ढंग से दिल्ली के रामलीला मैंदान में आमरण अनशन कर रहे हजारों आंदोलनकारियों को रोते हुए 4 जून की मध्य रात्रि में लाठी व आंसू गैस की मार से उखाड़ फेंक कर खलनायकी अठ्ठाहस भरते हुए दिग्विजयी शंख बजा रहे थे। वे बाबा रामदेव को ही नहीं अपितु देश के अग्रणी गांधीवादी नेता अण्णा हजारे को भी बाबा रामदेव की तरह हस्र होने की गिदड सी धमकी दे रहे थे। बाबा रामदेव पर तो कांग्रेसी सरकार ने 15 दिनों तक दिल्ली में प्रवेश का प्रतिबंध ही लगा दिया गया। परन्तु कांग्रेस को क्या पता भगवान के यहां कहीं अंधेर नहीं है। लोकशाही का दमन कर खुद को शेर समझ रही कांग्रेस को उप्र की मुख्यमंत्री मायावती ने ऐसा ही करारा सबक सिखाया की कांग्रेसी नेताओं को अब लोकशाही याद आने लगी। जब माया ने कांग्रेस को उनके ही तरीके से पुलिसिया दमनकारी जवाब उप्र की राजधानी लखनऊ में 27 जून को कांग्रेस की न्याय यात्रा पर प्रतिबंध लगा कर कांग्रेस को एक प्रकार से ऐसा करारा जवाब दिया जिससे कांग्रेसी दिग्गजों के भी पसीने ही छूट गये अब वे किस मुंह से मायावती के लखनऊ में प्रतिबंध लगाने का विरोध करे। यही नहीं मायावती के इस फरमान के बाद पूरे लखनऊ में धारा 144 ही लगा दिया गया और इस धारा का उलंधन करते हुए जिन भी कांग्रेसियों ने न्याय यात्रा करने पर उतारू कांग्रेसियों को पुलिसिया दमन से रोका गया। इसमें अनेक कांग्रेसी घायल हो गये। इस प्रकरण से कांग्रेसी नेताओं का बाबा रामदेव के शांतिपूर्ण आंदोलन को पुलिसिया दमन से खदेड़ने की कार्यवाही हिमालयी भूल सी प्रतीत होने लगी।
इससे पहले 4 जून को बाबा रामदेव की शांतिप्रिय आंदोलन को अपनी पुलिसिया दमन से दिल्ली से खदेड़ कर भले ही कांग्रेसी अपनी दमनकारी सत्ता की हनक से देश में जन आंदोलनों को कुचलने की दिग्विजयी हुंकार भर रहे थें यही नहीं दिग्विजय सहित कांग्रेसी नेताओं की अलोकतांत्रिक व दमनकारी हुंकार का बाबा रामदेव या अन्ना हजारे ने भले ही करारा जवाब न दिया हो परन्तु कहते हैं बकरे की माॅं कब तक खेर मनायेगी, महाकाल ने सत्तामद में दमनकारी कांग्रेसी हुक्मरानों इसका करारा मायावती के द्वारा दे कर उनको आईना दिखा ही दिया। कांग्रेसी हुक्मरानों को अब कोई जवाब देते नहीं बन रहा है कि वे किस मुंह से मायावती के इस दमन का विरोध करें। वक्त ने कांग्रेस को उनके कृत्यों का जवाब तब मिला जब मायावती ने कांग्रेस की न्याय न्यात्रा पर 27 जून को लखनऊ में प्रतिबंध लगा कर दिया तो कांग्रेसी सन्न रह गये। इस प्रकरण से एक बात साफ हो गया कि दमनकारी, अत्याचारी, दुराचारी सत्तांध चाहे कितने भी बलशाही क्यों न हो, महाकाल उसको समय आने पर ऐसा सबक सिखाता है कि लोग बरबस कह उठते हैं कि भगवान के घर अंधेर नहीं और ऊपर वाली की लाठी की मार की कोई आवाज तक नहीं होती है। भले ही सत्तांध सांसारिक न्यायालयों द्वारा दण्डित न हो पायें परन्तु महाकाल किसी भी गुनाहगार को कभी माफ नहीं करता।

Saturday, June 25, 2011

बाबा रामदेव को भगोड़ा कहने पर हुआ संसद के समीप भारी हंगामा

बाबा रामदेव को भगोड़ा कहने पर हुआ संसद के समीप भारी हंगामा/
गोविन्दाचार्य के नेतृत्व में बना देश को नयी व्यवस्था देने के लिए संगठन/

नई दिल्ली(प्याउ)।भले ही आज कांग्रेसी नेता व चंद लोग बाबा रामदेव को 4 जून की सरकार की दमनकारी कार्यवाही के बाद केन्द्र सरकार की दमनकारी कृत्यों का पुरजोर विरोध करने के बजाय देश के हित में आवाज उठाने वाले बाबा रामदेव की निंदा करने में ही अपनी वीरता का प्रदर्शन कर रहे हैं। परन्तु देश की बहुसंख्यक जागरूक जनता बाबा रामदेव की निदां को किसी भी सूरत में सहन नहीं कर रही है। वह बाबा रामदेव का विरोध करने वालों को मुंहतोड़ जवाब दे रही है। ऐसी ही एक घटना संसद के समीप घटित हुई। इस घटना के बाद लगता है कि आने वाले समय में कांग्रेस सहित बाबा का विरोध सार्वजनिक मंचों से करने वालों को भारी विरोध का सामना करना पडेंगा।
आज 25 जून 2011 को दिल्ली में संसद के समीप प्रतिष्ठत काॅंस्टिट्यूशनल क्लब में गोविन्दाचार्य के नेतृत्व देश में नये राजनैतिक विकल्प देने व पूरी भ्रष्ट्र व्यवस्था को सामूल परिवर्तन लाने के लिए आयोजित सम्मेलन में उस समय अजीबोगरीब स्थिति हो गयी जब राजस्थान से आये एक समाजसेवी ने अपने संबोधन में जब बाबा रामदेव के 4 जून को पुलिस दमन के दौंरान मंच से भाग जाने पर कटाक्ष करते हुए गोविन्दाचार्य के नेतृत्व में काम करने का आवाहन किया। उस वक्ता के संबोधन होते ही सम्मेलन में दर्जनों की संख्या में लोगों ने बाबा रामदेव पर कटाक्ष करने वाले का भारी विरोध किया। विरोध इतना प्रबल था कि विरोध करने वाले ने माफी मांग ली परन्तु लोग तब तक शांत नहीं हुए जब तक वह वक्ता तुरंत मंच से ही नहीं सम्मेलन स्थल से बाहर न चला जाय। बड़ी जिद्दोजहद के बाद गोविन्दाचार्य ने स्वयं स्थिति को संभालने के लिए मंच संभालना पड़ा। उस समय मंच में पूर्व केन्द्रीय मंत्री मोहम्मद आरिफ खाॅं, कर्नाटक में गुलबर्गा क्षेत्र के वरिष्ठ समाजसेवी पूर्व सांसद पाटिल, महाराष्ट्र के दो बार स्वतंत्र प्रत्याशी के रूप में विजयी रहे विधायक, आजादी के तीसरे आंदोलन के नायक गोपाल राय, भाजपा के वरिष्ठ नेता मोहनसिंह ग्रामवासी आदि उपस्थित थे। इस अवसर पर चिंतक , अग्रणी समाजसेवी व प्यारा उत्तराखण्ड के सम्पादक देवसिंह रावत ने सुझाव दिया कि भ्रष्टाचार पर तब तक अंकुश नहीं लग सकता है जब तक देश में व्यक्तिगत सम्पति का राष्ट्रीय करण न कर दिया जाय। इसके साथ ही उत्तराखण्ड राज्य गठन पर संसद की चैखट पर निरंतर 6 साल तक ऐतिहासिक धरना दे कर राष्ट्रीय कीर्तिमान स्थापित करने वाले क्रांतिवीर के नाम से विख्यात देवसिंह रावत ने स्वामी रामदेव या अन्ना का नाम न लेते हुए इशारे ही इशारे में कटाक्ष किया कि भ्रष्टाचार के खिलाफ देश का नेतृत्व कर रहे लोगों को भ्रष्टाचारियों व दुराचारियों से दूरी बनाने को आगाह किया।

उत्तराखण्ड में जल, जंगल व जमीन पर स्थानीय लोगों के हक के लिए प्रधानमंत्री से गुहार

उत्तराखण्ड में जल, जंगल व जमीन पर स्थानीय लोगों के हक के लिए प्रधानमंत्री से गुहार/
उक्रांद नेता ऐरी ने राज्य गठन के बाद नैतिक पतन व कांग्रेसी नेता उपाध्याय ने कांग्रेस व भाजपा दोनों सरकारों को बताया असफल
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नई दिल्ली(प्याउ)।आज 25 जून 2011 को दिल्ली में उत्तराखण्ड के अनैक संगठनों ने उत्तराखण्ड के जल, जंगल व जमीन पर विकास के नाम पर बाहरी लोगों को सोंपने की प्रदेश व केन्द्र सरकार की प्रवृति का पुरजोर विरोध करते हुए प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को यहां के जल, जंगल व जमीन पर स्थानीय लोगों को सौंपने हेतु एक ज्ञापन भेंट किया। सोमवार, 25 जून को संसद की चैखट राष्ट्रीय धरना स्थल जंतर मंतर दिल्ली में सामाजिक संगठनों द्वारा सांझे रूप में आयोजित एक दिवसीय धरने में कांग्रेस, उक्रांद व भाजपा के नेताओं सहित बड़ी संख्या में स्थानीय लोगों ने भाग लिया। भाग लेने वालों में उत्तराखण्ड क्रांतिदल के शीर्ष नेता काशीसिंह ऐरी, कांग्रेस विधायक किशोर उपाध्याय, भाजपा नेता पूर्व विधायक मुरारी सिंह पंवार व श्याम लाल मंझेडा के अलावा बड़ी संख्या में राज्य गठन के अग्रणी आंदोलनकारी एवं समाजसेवी उपस्थित थे। धरने में जहां उक्रांद नेता काशीसिंह ऐरी ने प्रदेश गठन के बाद प्रदेश में नैतिक चरित्र के ह्रास के साथ प्रदेश में निरंतर बढ़ते हुए भ्रष्टाचार पर गंभीर चिंता प्रकट की, वहीं धरने को संबोधित करते हुए कांग्रेसी विधायक किशोर उपाध्याय ने भाजपा व कांग्रेस दोनों ही सरकारों पर प्रदेश के हितों की घोर उपेक्षा करने का आरोप लगाया कि इन दस सालों में प्रदेश में एक भी उच्च स्तरीय चिकित्सालय तक भी नहीं बनाने पर सरकारों को कटघरे में रखा। वहीं उन्होंने चिकित्सा, शिक्षा व रोजगार तीनों क्षेत्रों में प्रदेश की अब तक की दोनों सरकारों को असफल बताया। वहीं इस अवसर पर उन्होंने देश में सबसे पिछडे जनपदों में प्रदेश के चमोली, उत्तरकाशी व चम्पावत के लोगों को आरक्षण की सुविधा देने की पुरजोर मांग की।
इस धरने में सम्मलित होने वाले अग्रणी आंदोलनकारियों में राज्य गठन के लिए संसद की चैखट पर निरंतर छह साल तक सफल धरना देने वाले ‘उत्तराखण्ड जनता संघर्ष मोर्चा के अध्यक्ष देवसिंह रावत व पूर्व अध्यक्ष खुशहाल सिंह बिष्ट, उक्रांद के वरिष्ठ उपाध्यक्ष प्रताप शाही, महेश पपनै, मजदूर नेता जसपाल रावत, कवि देवेश्वर प्रसाद जोशी, गंगोत्री सामाजिक संगठन की अध्यक्षा श्रीमती कमला रावत, मनमोहन जोशी आदि उपस्थित थे। इस धरने का संचालन पत्रकार सुरेश नौटियाल ने किया। इस धरने का आयोजन, उत्तराखण्ड चिंतन, म्यर उत्तराखण्ड व अखिल भारतीय उत्तराखण्ड महासभा के दिल्ली प्रदेश ने संयुक्त रूप से किया। उत्तराखण्ड चिंतन के के एम पाण्डे, नन्दन सिंह बोरा, अखिल भारतीय उत्तराखण्ड महासभा के दिल्ली प्रदेश अध्यक्ष जयसिंह नेगी, पत्रकार गिरीश बलूनी, शिवचरण मुण्डपी तथा म्यर उत्तराखण्ड संस्था के महासचिव सुदर्शन सिंह रावत, पत्रकार सतेन्द्र रावत, धीरेन्द्रसिंह अधिकारी, श्री पाण्डे प्रताप रावत आदि उपस्थित थे।

Tuesday, June 21, 2011

-भगवान श्रीबदरीनाथ अंधे नहीं हैं निशंक व गडकरी जी

-भगवान श्रीबदरीनाथ अंधे नहीं हैं निशंक व गडकरी जी
-निशंक से ही नहीं गड़करी से भी नाखुश हैं भगवान बदरीनाथ!

भले ही चार बार के अथक प्रयास के बाबजूद मुख्यमंत्री निशंक को भगवान बदरीनाथ के दर्शन इसी रविवार 19 जून को हो गये हों परन्तु उनको व उनके साथ गये भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष गडकरी को एक संकेत भले ही भगवान श्रीबदरीनाथ का एक संकेत समझ में आ रहा हो पर प्रदेश की जनता ने समझ लिया कि उनकी तरह ही भगवान श्रीबदरीनाथ प्रदेश के मुख्यमंत्री निशंक से खुश नहीं हैं। वे गत वर्ष जब भगवान श्री बदरीनाथ के कपाट 19 मई को खुले थे तब भी भाजपा के आला कमान लालकृष्ण आडवाणी को भगवान बदरीनाथ के दर्शन कराने हवाई मार्ग से भगवान बदरीनाथ जाना चाहते थे परन्तु तब भी मोसम ठीक होने के कारण चाह कर भी भगवान बदरीनाथ के दर्शन नहीं कर पाये। इस साल जब 9 मई 2011 को भगवान श्री बदरीनाथ के कपाट खुले तो तब भी मुख्यमंत्री निशंक बदरीनाथ के दर्शन चाह कर नहीं कर पाये, उस दिन दिल्ली में भाजपा आलाकमान ने बैठक रख दी। इसके बाद मुख्यमंत्री का 1 जून को कार्यक्रम पर भी मौसम ने ग्रहण लगा दिया। अभी इसी माह 17 जून को उनका भगवान बदरीनाथ धाम में भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष गडकरी को सपरिवार दर्शन कराने के कार्यक्रम पर भी मौसम ने फिर ग्रहण लगाया। पूरे देश में इस कार्यक्रम के पूरे पेज के रंगीन विज्ञापनों से विकास के लिए तरस रहे प्रदेश का विकास कार्यो में लग सकने वाला करोड़ो रूपये बहाने में मुख्यमंत्री निशंक को तनिक सा भी दर्द नहीं हुआ। इससे यह लगता है कि अगर उनका बस चलता तो वे पूरे प्रदेश के संसाधनों को गडकरी की खुशी के लिए कुर्वान तक कर देते। परन्तु भगवान बदरीनाथ को शायद उनकी यह प्रवृति फिर भी नहीं जंची और निशंक व गडकरी के मंसूबों पर एक बार उसी दिन नहीं अपितु दूसरे दिन भी ग्रहण लगा। इससे निशंक ही नहीं मडकरी व उनके परिजनों के चेहरे पर मायूसी साफ झलक रही थी। इसके बाबजूद भी 19 जून को लगता है भगवान बदरीनाथ का दिल पसीजा और उन्होंने मौसम साफ करके दर्शन की इजाजत दी। 19 जून को मुख्यमंत्री निशंक अपने खास मेहमान भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष गडकरी व उनके परिजनों को भगवान बदरीनाथ के दर्शन उडन खटोले से कराने में सफल रहे। परन्तु उनकी खुशी उस समय फुर्र हो गयी जब गडकरी के परिजनों को देहरादून हवाई अड्डे में छोड कर वापस आ रहा उडन खटोला दुर्घटनाग्रस्त हो गया। भले ही इसमें गडकरी के परिजन या नहीं थे। पायलट भी बच गये। परन्तु इस दुर्घटना से मुख्यमंत्री निशंक, गडकरी व उनके परिजनों को ही नहीं अपितु देश के आम जागरूक लोगों को भी अंदर से हिला दिया। भगवान बदरीनाथ की यात्रा के बाद इस प्रकार की दुर्घटना को गड़करी व निशंक जैसे नेताओं के लिए मैं भगवान बदरीनाथ की चेतावनी के रूप में ही देख रहा हॅू। मानों भगवान बदरीनाथ कह रहे हैं कि मैं सब कुछ जानता हॅू, सत्तांध हो कर जनहितों को रौंदने वालों को हर हाल में मैं दण्डित करता हॅू। मैने गत वर्ष भी निशंक जी सहित तमाम सत्तांधों को सावधान करने के लिए लिखा था कि भगवान श्री बदरीनाथ को अंधा या मात्र पत्थर की मूर्ति न समझें। वे साक्षात हैं सर्वज्ञ है। वे कभी किसी अहंकारी व अत्याचारी को माफ नहीं करते है। प्रस्तुत है 27 मई 2010 के प्यारा उत्तराखण्ड में प्रकाशित मेरे दो टूक लेख।
गत वर्ष भी 19 मई 2010 को भगवान बदरीनाथ के कपाट खुले, सभी भक्तों ने दर्शन किये। परन्तु निशंक जी व भाजपा आलाकमान आडवाणी जी को चाह करके भी भगवान के दर्शन नहीं कर पाये। करते कैसे, कपाट खुलते समय के पावन मुहूर्त में भगवान बदरीनाथ धम व बदरीनाथ क्षेत्रा में मूसलाधर बरसात जो हो रही थी। इस कारण भाजपा आलाकमान आडवाणी व प्रदेश के मुख्यमंत्राी रमेश पौखरियाल निशंक चाह कर भी भगवान बदरीनाथ के दर्शन उस शुभ मुहूर्त में नहीं कर पाये। क्योंकि वे वहां वायु मार्ग से सरपट पंहुचना चाहते थे। शायद यह भगवान को मंजूर नहीं था। वर्षा तो हर साल आती है भगवान बदरीनाथ धम के पावन कपाट खुलने वाले दिन। न केवल बदरीनाथ धम में अपितु पूरे बदरीनाथ क्षेत्रा में भी वर्षा आती है। बदरी भगवान का क्षेत्रा पुराना बदरी केदार विधनसभा का उत्तरी कडाकोट क्षेत्रा तक है यानी कोठुली क्षेत्रा तक। यह भगवान बदरीनाथ की पावनता का एक जीता जागता प्रमाण कई सालों से मुझे भी देखने को मिलता है। निशंक जी, भगवान बदरीनाथ बहुत तत्काल हैं। वे सर्वशक्तिमान साक्षात भगवान श्री विष्णु ही हैं। वे सबकुछ जानते हैं समझते है। दूध् का दूध् व पानी का पानी करना जानते है। भगवान बदरीनाथ के दर पर राव व मुलायम सरकारों के अमानवीय दमन से त्राही-त्राही करती हुई असहाय उत्तराखण्ड की जनता ने पफरियाद की। नरसिंह भगवान से पफरियाद की। भेरव देवता से पुकार की। पवन सुत हनुमान से पफरियाद की। उन्होंने कैसे पफरियाद की इसकी एक झलक उस जनांदोलन में विशेष रूप से बनाया गया उत्तराखण्ड के प्रसि( गीतकार व गायक नरेन्द्रसिंह नेगी के ‘जाग जाग हे उत्तराखण्ड/ हे नरसिंह भैरव बजरंग.’ ...से आपको भी भान होगा। भगवान तो जड़ चेतन में है। परन्तु उत्तराखण्ड तो सच में देवभूमि, मुक्तिधम व तपोभूमि है। यहां 33 करोड़ देवी देवताओं का वास है। यहीं स्वयं नर नारायण की तपस्थली है। यहीं भगवान विष्णु व भगवान शिव का पावन धम है। यहां के कण-कण में भगवान शंकर व विष्णु विद्यमान है। यहीं पतित पावनी गंगा यमुना की अवतरण भूमि है। ऐसे पावन ध्रती पर जन्म लेने वाले तो ध्न्य हैं ही इसके दर्शन करने वाले भी बड़ भागी हैं। परन्तु इस पावन भूमि में जन्म लेने के बाद भी जो मनुष्य जनहित का गला अपने निहित स्वार्थ पूर्ति के लिए घोंटता है या समाज,प्रदेश व देश तथा ध्र्म से छल करता है तो उसको कहीं मुक्ति नहीं मिलती है।
मैं यहां पर आपसे विनम्र निवेदन करना चाहता हॅू निशंक जी। क्योंकि भगवान की कृपा से आपको जन व प्रदेश सेवा का दुर्लभ अवसर मिला है। उसको तिवारी व खंडूडी की तरह व्यर्थ में न गंवाओ। भगवान सर्वस्त्रा है। सबमें है। सबके हैं। सत्य में हैं। ध्र्म में है। न्याय में है और परमार्थ में है। त्याग में है। जल में है थल में है और इस सृष्ठि के कण-कण में व्याप्त है। वह सांसारिक अदालत नहीं जिन्हें गुनाहगारों के सबूतों की बैखाखियों की जरूरत हो। हर प्राणी के मानसपटल व अन्तःकरण में उसके संचित कर्म ;मनसा, वाचा व कर्मणाद्ध अंकित होते है। जो उसके स्थूल, सुक्ष्म, कारण व महाकारण शरीर से भी परे उसकी मुक्ति तक उसके साथ ही विद्यमान रहते है। भगवान बदरीनाथ किसी राजनैतिक दल के आला कमान नहीं जो स्वार्थपूति रूपि पूजा पाठ से प्रसन्न हो कर उनके गुनाहों से आंखे पफेर कर उनको अंध संरक्षण दे। भगवान बदरीनाथ का दण्ड देने वाले काल रूप की मार इतनी सटीक होती है कि राजभवन के अंतःपुर के अभैद सुरक्षा व्यवस्था के बाबजूद वह गुनाहगार को बेपर्दा कैसे करता है, उसे देश की जनता ने इसी साल खबरिया चैनलों के सहयोग से अपनी आंखों से देखा। वह न तो नेता को, व नहीं कालनेमी बने साध्ु को व नहीं न्यायाध्ीश बने भ्रष्ट को मापफ करता है। वह सभी गुनाहगारों को उसके गुनाह का सही समय पर ऐसी सजा देता है कि गुनाहगार को प्रायश्चित का भी अवसर नहीं मिलता है। वह जाति, ध्र्म, क्षेत्रा, रंग, नस्ल, लिंग, देश,भाषा इत्यादि के नाम पर दूसरे का शोषण करने वालों को भी दण्डित करता है। वह कैसे गुनाहगारों की बु(ि को भ्रष्ट कर उसे दण्डित करता है, इसको आपने स्वयं अपनी आंखों से कई बार देखा होगा। भगवान बदरीनाथ की मूर्ति को पफैकने वाले आततायी आज कहां हैं?
आपके पास अब भी समय है, तिवारी व खंडूडी के हस्र को देखने के बाद, आप अब भी उत्तराखण्डियों की आशाओं को साकार करने का कार्य करके अपना इह लोक व परलोक सुधरने का शुभ अवसर अपने हाथों से न गंवाओ। अब तक प्रदेश में कितने मुख्यमंत्राी हो गये। प्रदेश की जनता कहां किसी को याद कर रही है। करे भी क्यों? क्या दिया इन मुख्यमंत्रियों ने उत्तराखण्ड राज्य की उस जनता को जिसने अपने सम्मान व विकास के लिए दशकों लम्बे संघर्ष व राव-मुलायम सरकारों के जुल्मों को सहते हुए भी उत्तराखण्ड राज्य का गठन करने के लिए तत्कालीन सरकारों को विवश किया। प्रदेश की जनता की इच्छा के अनरूप न तो उसके सम्मान व विकास के प्रतीक प्रदेश की राजधनी गैरसैण ही बनायी गयी तथा नहीं मुजफ्रपफरनगर काण्ड के अभियुक्तों को अभी तक दण्डित ही किया गया। नहीं आपकी सरकार ने इस दिशा में ईमानदारी से एक कदम भी अभी तक उठाया। उत्तराखण्डियों की राजनैतिक भविष्य को जनसंख्या पर आधरित परिसीमन लागू करा कर तिवारी जी व खंडूडी जी ने दपफन करने का अक्षम्य भूल की। उसको सुधरने की अभी तक आपकी सरकार ने कोई महत्वपूर्ण पहल तक नहंी की। प्रदेश की पिछड़े वर्ग के ;रंवांई क्षेत्राद्ध के मूल निवासियों के हक हकूकों पर अपने निहित स्वार्थी प्यादों द्वारा रोंदने के लिए आपकी सरकार ने कट आपफ डेट 1960 के बजाय 31 जनवरी 2004 रखने की भयंकर भूल किया था जिसको जनता के प्रबल विरोध् के बाद वापस लिया गया। प्रदेश में आदर्श राज स्थापित करने की बजाय जातिवाद, क्षेत्रावाद व भ्रष्टाचार का अंध तांडव नचाया जा रहा है। ढपोर शंख से ज्यादा दिन तक नहीं चलता। काल के हाथों कोई तिकड़मी कभी नहीं बचा। दिवस जात नहीं लागत बारा। 2012 आने में अब ज्यादा समय नहीं लगेगा। अब भी समय है, भगवान आपको सुबु(ि दे। जिन दिल्ली दरवार की सेवा में आप उत्तराखण्डियों के हितों को बहुत ही निर्ममता से रौंद रहे हैं वह दिल्ली दरवार तमाम कोशिशों के बाबजूद मे. जनरल खंडूडी कीे मुख्यमंत्राी की कुर्सी को नहीं बचा सका। कुर्सी आपको मिली। वह भी सदा आपकी नहीं रहेगी। आपका कल क्या था, इसको भूल जाओं, आज सच्चे हृदय से अगर प्रदेश की जनांकांक्षाओं को पूरा करने का संकल्प लो तो बदरीनाथ आपको अवश्य आर्शीवाद देगा, परन्तु जनता जर्नाजन की उपेक्षा कर दिल्ली दरवार के बल पर हवाई किल्ले बनाते रहे तो आपको भी तिवारी की तरह न केवल सत्ता च्युत होना पड़ेगा अपितु अपने दल में भी अलग थलग रहने का अभिशाप भोगना पड़ेगा। मैने लोकसभा चुनाव से पहले इसी स्तम्भ में कई बार भाजपा व लालकृष्ण आडवाणी के देश की सत्ता में आसीन होने के मंसूबों पर उत्तराखण्डी अभिशाप लगने की दो टूक चेतावनी दी थी। मैने सापफ कहा था कि आडवाणी अगर खंडूडी जी को प्रदेश के मुख्यमंत्राी पद से हटा दें तो वे अभिशाप मुक्त हो सकते हैं परन्तु न तो आडवाणी जी ने सुनी व नहीं भाजपा ने। नतीजा सामने है। अब मैं आपसे करब( निवेदन कर रहा हॅू कि उत्तराखण्ड की जनांकांक्षाओं को साकार करके हिमाचल के मुख्यमंत्राी यशवंत सिंह परमार की तरह अमर हो जाओ। नहीं तो भगवान बदरीनाथ सब कुछ देखता है। वह जनहितों को रौंदने वालों को तिवारी व खंडूडी की तरह बेताज करने में कोई कसर नहीं छोड़ता।
शेष श्रीकृष्ण कृपा। हरि ¬ तत्सत्। श्री कृष्णाय् नमों।

भाजपा के शर्मनाक पतन के लिए जिम्मेदार है आत्मघाति जातिवादी नेतृत्व

-भाजपा के शर्मनाक पतन के लिए जिम्मेदार है आत्मघाति जातिवादी नेतृत्व/
महाराष्ट्र में ही नहीं उत्तराखण्ड में विरष्ठ जननेताओं की भारी उपेक्षा/

भाजपा के शर्मनाक पतन के लिए अगर कोई जिम्मेदार है तो भाजपा -संघ का पदलोलुप व जातिवादी नेतृत्व। आज महाराष्ट्र में भाजपा के सबसे बडे नेता गोपीनाथ मुण्डे अपनी उपेक्षा से आहत है। वे भाजपा के संसद में उप नेता प्रतिपक्ष है। उत्तराखण्ड में भाजपा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष भगतसिंह कोश्यारी व पूर्व मुख्यमंत्री भुवनचंद खंडूडी भी भाजपा के केन्द्रीय नेतृत्व द्वारा अपनी उपेक्षा से आहत हैं। मुण्डे इतने आहत हैं कि वे भाजपा को अलविदा कहने को अपने आप को मजबूर पा रहे हैं। यही हालत करीब करीब उत्तराखण्ड में भी है। ऐसा नहीं है कि यह केवल वर्तमान में ही हो रहा है। भाजपा का आला नेतृत्व कभी साफ छवि के व जमीनी नेताओं को फूटी आंख देखना नहीं चाहता। वे केवल अपनी कठपुतलियों के सहारे पूरी पार्टी को जहां नचाना चाहते हैं वहीं अपनी पदलोलुपता-सत्तालोलुपता की पूर्ति करना चाहते हैं। संघ परिवार की इस राजनैतिक संगठन में जनसंघ से लेकर भाजपा तक के सफर में अब तक जितने देश के लिए सर्मिर्पत बलराज माधोक, सुब्रबण्यम स्वामी, गोविन्दा चार्य, बधेला, सुरेश जोशी, केशु भाई -राणा आदि नेताओं को जमीदोज करने में कांग्रेसी नेताओं का नहीं अपितु भाजपा के आला कमान बने अटल आडवाणी की जुगलबंदी ने संघ नेतृत्व के मूक समर्थन से ही किया। कांग्रेस के इतने घोर कुशासन के बाबजूद भाजपा गत माह सम्पन्न हुए चार राज्यों के विधानसभा चुनाव में दस सीटों पर भी विजय हासिल नहीं कर सकी। आज भाजपा के जनता के दिलों में कभी राज करने वाले मदनलाल खुराना व उमा भारती की स्थिति क्या है? इसको बताने की जरूरत किसी को है क्या? आज भाजपा के जो आला नेता बने गड़करी, सुषमा, जेटली, वेंकटया, अनन्त कुमार आदि का कौन से संघर्ष का इतिहास रहा? कैसे सुषमा चंद सालों में जमीनी नेताओं को धकियाते हुए भाजपा की आला नेताओं में सुमार हो गयी है? कैसे भाजपा का वर्तमान आला नेतृत्व रेड्डी बंधु से लेकर रमेश पोखरियाल निशंक को शर्मनाक संरक्षण दे कर भाजपा को पूरी तरह जनता की नजरों में बेनकाब कर रहे है। सबकुछ जानते हुए भी जिस नपुंसकता से संघ यह सब होने दे रहा है उससे साफ हो गया है कि भाजपा में अब रामराज्य, सुशासन व ईमानदार जननेताओं को कोई जगह नहीं रह गयी है। यहां पर भी कांग्रेस की तरह ही जनता से जुड़े नेताओं व अनुभवी ईमानदार नेताओं के बजाय आला नेताओं के संकीर्ण स्वार्थो को पूरे करने वाले दागदार छवि के लोगों व जातिवादी चाटुकारों को ही वरियता दी जाती है।
फेस बुक में मुझे एक संदेश, 18 जून को आशीष शुक्ला नामक भाजपा समर्थक मित्र का मिला। उसमें उनहोंने उत्तराखण्ड में वर्तमान त्रासदी के लिए भाजपा को नहीं अपितु उत्तराखण्ड की जनता को दोषी ठहराया। मुझे लिखे संदेश में उन्होंने आरोप लगाया कि मैं कुमाऊं क्षेत्र से हॅू। पहले तो आपको शायद ही यह ज्ञात होगा कि मैं उसी क्षेत्र से हूूॅ जिस क्षेत्र से आपके प्रिय खंडूडी जी और भाजपा व संघ के आला नेतृत्व की आंखों के तारे निशंक जी हैं। जनता का कसूर क्या? जब जनता के चुने हुए अधिकांश भाजपा विधायक भगतसिंह कोश्यारी को मुख्यमंत्री बनाना चाहते थे तो भाजपा नेतृत्व ने लोकशाही का गला घोंट कर जिस प्रकार से खंडूडी जी को थोपा। यही नहीं खंडूडी जी के मंत्री मण्डल में जिस प्रकार से प्रदेश के सबसे छाप छवि के अनुभवी विधायक केदारसिंह फोनिया की शर्मनाक उपेक्षा की गयी उससे साफ हो गया कि भाजपा में राष्ट्रवाद के नाम पर केवल जातिवाद का ही घिनौना कृत्य किया जाता है। लोकशाही में जनमत का सम्मान न करते हुए भाजपा के आला नेतृत्व ने जिस शर्मनाक ढ़ग से यहां पर जातिवाद का घिनौना जहर घोला उसी के कारण यह है कि आज देश में मण्डल कमीशन के लागू होने के बाद उत्तराखण्ड एकमात्र ऐसा अभागा राज्य है जहां पर बहुसंख्यक समाज का शासन व प्रशासन के एक प्रकार से षडयंत्र के तहत बलात वंचित किया गया है। प्रदेश में भाजपा के वरिष्ट एवं साफ छवि के भगतसिंह कोश्यारी, केदारसिंह फोनिया व मोहनसिंह ग्रामवासी जैसे दिग्गज नेताओं को हाशिये में डाला गया। इसी प्रवृति को देख कर भाजपा के तेज तरार जननेता मुन्ना सिंह चैहान ने भाजपा से अलविदा कहने के लिए मजबूर हुआ। यह देश व लोकशाही के साथ किसी भी सभ्य समाज के लिए कहीं दूर-दूर तक हितकर नहीं है। खंडूडी के कुशासन में जब लोकशाही व जनांकांक्षाओं का निर्ममता से गला घोंटा गया तो विधायकों व मंत्रियों ने मजबूरी में प्रदेश में लोकशाही को बचाने के लिए केन्द्रीय आला नेतृत्व से गुहार लगायी। तो उसके बाद जिस शर्मनाक ढ़ग से भाजपा नेतृत्व जो पूरे देश में रामराज्य व सुशासन देने का दंभ भरता है, ने प्रदेश के साफ छवि व वरिष्ठ नेताओं को दरकिनारे कर निश्ंाक का राजतिलक कर दिया तो इसमें जनता का कहां कसूर है। जनता तो ईमानदार व अनुभवी नेता को मुख्यमंत्री देखना चाहती। परन्तु कोश्यारी को बलात दिल्ली वनवास भेजने तथा खंडूडी व निशंक को मुख्यमंत्री के रूप में आसीन करके भाजपा ने जाहिर कर दिया कि उसका राष्ट्रवाद से कहीं दूर-दूर तक कोई लेना देना नहीं अपितु उसका असली चेहरा जातिवाद है। इससे प्रदेश की तमाम आशाओं व अपेक्षाओं पर एक प्रकार का बज्रपात सा हो गया। यही नहीं अधिकांश महत्वपूर्ण मंत्रालयों पर जिस प्रकार से मुख्यमंत्री ने स्वयं कुण्डली मारी हुई हैं मात्र नाम मात्र के मंत्रालयों को अन्य जाति के लोगों को आसीन किये गये। यह यहीं तक सीमित नहीं है। दर्जाधारी से लेकर पीसीएस से लेकर जुडिशियरी तक, शासन व्यवस्था के महत्वपूर्ण पदों पर जिस प्रकार से जातिवादी घेराबंदी की गयी है उससे यहां के अन्य समाजों में आक्रोश उपजना स्वाभाविक है। आज लोग शिक्षित एवं जागरूक है। जो सामने दिख रहा है उसको केेसे नजरांदाज करेंगे। जिस प्रकार से भाजपा व कांग्रेस में जातिवादी जहर प्रदेश में घोला हुआ है उससे यहां की स्थिति बहुत ही शर्मनाक हो गयी है।
दिल्ली में बेठे हुए लोगों की तरह ही आपको भी शायद ही यह मालुम होगा कि प्रदेश की जनता ने अपनी किन जनांकांक्षाओं के लिए पृथक राज्य के गठन का ऐतिहासिक आंदोलन छेड़ा था। आप जैसे राजनीतिक दलों से जुड़े हुए लोगों के लिए भले ही उत्तराखण्ड गढ़वाल व कुमांयू या पहाड़ व मैदान तथा ठाकुर व पण्डित का गणित हो परन्तु उत्तराखण्ड यहां की जनता के लिए आज आप द्वारा आरोपित दृष्टि से नहीं अपितु आत्मसम्मान व समग्र विकास का प्रतीक ही है। यह तो आप के कहने के अनुसार जनता दोषी है। यह मेरा भी मानना है कि जनता दोषी है परन्तु भाजपा द्वारा किये गये विश्वासघात पर आप क्या कहेंगे। जिस तिवारी के कुशासन व भ्रष्टाचार से मुक्ति देने का वादा करके भाजपा ने विधानसभा का जनादेश मांगा, उसी तिवारी को सत्तासीन होने के बाद भाजपा के नेता मंचों से महिमामण्डित करते रहे व दूसरी तरफ जनता की आंखों में धूल झोंकने के लिए तिवारी के शासन में हुए भ्रष्टाचार के तथाकथित चार दर्जन से अधिक घोटालों की जांच के लिए एक आयोग बनाया गया।
खासकर मेरे जैसे आदमी को जो जड़चेतन में भगवान श्री कृष्ण को मानते हुए प्राणियों की ही नहीं अपितु जड़ का भी सम्मान करता हूॅ। वह लोकशाही के नाम पर इस धृर्णित जातिवादी दुशासनों को कैसे स्वीकार कर सकता हूॅ। जिस उत्तराखण्ड राज्य गठन के लिए मैने छह साल तक संसद की चैखट जंतर मंतर पर निरंतर धरना-प्रदर्शन व आंदोलन किया, उसको जातिवादी दुशासनों के लिए अभ्याहरण कैसे बनने दूूॅ। प्रदेश की जिन जनांकांक्षाओं के लिए मुझ जैसे हजारों युवाओं ने अपना सर्वस्व बलिदान इस राज्य गठन के लिए किया उन आशाओं पर कांग्रेसी कुशासक तिवारी के बाद भाजपा के खंडूडी व निशंक के शासन में बुरी तरह से रौंदा गया है। एक बात यहां पर और उल्लेख करना चाहता हॅू। उत्तराखण्ड देव भूमि ही नहीं अपितु मोक्ष भूमि भी है। विश्व संस्कृति की पावन गंगोत्री उत्तराखण्ड में जो भी दुशासन जनहितों को रौंदने का कुकृत्य करता है उसको राव, मुलायम, वाजपेयी, तिवारी व खंडूडी की तरह महाकाल द्वारा सत्ता से वंचित हो कर अभिशाप का कोप भाजन होना पड़ता है। जाति, धर्म व क्षेत्र के नाम पर राजनीति करने वाले लोकशाही के ही नहीं महाकाल के भी अपराधी होते है। मैने स्वयं तिवारी, खंडूडी व निशंक से इस जनद्रोह को छोड़ने की पुरजोर अपील की। भाजपा नेतृत्व को जागृत करने के लिए उनको दर्पण दिखाने का काम किया। परन्तु लगता है महाकाल के पाश में बंधे भाजपा के मठाधीशों को मेरा सुझाव व संदेश ठीक उसी तरह से अनुचित लगा जिस प्रकार दुर्योधन की सभा में भगवान श्रीकृष्ण ने अपना विश्वरूप दिखाने के बाबजूद सत्तांध कौरव महाकाल के संदेश को समझ नहीं पाये। भाजपा के इस शर्मनाक पतन पर मुझे दुख नहीं परन्तु संघ को खड़ा करने में अपना जीवन समर्पित लाखों देशभक्तों की मेहनत से सत्तासीन हुई भाजपा के जातिवाद चैहरे से निराशा अवश्य हुई। पर मुझे मालुम है ‘नासते विध्यते भावो ना भावो विध्यते सत्। शेष श्रीकृष्ण कृपा। हरि ओम तत्सत्। श्रीकृष्णाय् नमो।

-विश्व वैंक का प्रमुख बनकर राहुल गांधी को प्रधानमंत्री बनायें मनमोहन/

-विश्व वैंक का प्रमुख बनकर राहुल गांधी को प्रधानमंत्री बनायें मनमोहन/
-देश व कांग्रेस को बचाने के लिए पूरी तरह असफल हुए प्रधानमंत्री दें इस्तीफा/

जनता की नजरों में पूरी तरह से बेनकाब हो चुके प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह भी अब कांग्रेसी कार्यकारी आलाकमान राहुल गांधी को प्रधानमंत्री बनाने के लिए मन से तैयार हो चूके है! खासकर जिस प्रकार से राहुल गांधी के 41 वें जन्म दिन पर आम कांग्रेसियों ने राहुल गांधी को देश का प्रधानमंत्री बनाने के लिए अपनी दिली भावना प्रकट की उस भावना का सम्मान करते हुए मनमोहन सिंह आखिर कब तक करते हैं ? कांग्रेसी नेतृत्व को भी यह बात समझ में आ गया है कि अगर अभी चंद महिनों के अंदर राहुल गांधी को प्रधानमंत्री नहीं बनाया गया तो कांग्रेस को फिर किसी भी कीमत पर आगामी चुनाव के लिए नहीं उबारा जा सकता है।
सुत्रों के अनुसार कांग्रेस नेतृत्व कांग्रेस के लिए तुरप का पत्ता साबित हुए मनमोहन सिंह की सम्मानजनक विदाई भी चाहते है। अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा से लेकर कई महत्वपूर्ण देशों के प्रमुखों को भी भारतीय प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को एक योग्य अर्थशास्त्री व नेता मान कर उनको विश्व बैंक के अध्यक्ष पद पर आसीन कराने वाले प्रस्ताव का भारी समर्थन करेंगे। विश्व बैंक की आड में अमेरिकी नीतियों व हितों के प्रसारक के रूप में मनमोहन सिंह की योग्यता का अमेरिका वैसे भी कायल है। वैसे भी प्रधानमंत्री के रूप में मनमोहन सिंह वर्तमान अमेरिकी प्रधानमंत्री बराक ओबामा के ही नहीं उनके पूर्ववर्ती जार्ज बुश के भी सबसे पसींदा प्रधानमंत्री रहे। मनमोहन सिंह की खुली तारीफ करने में बराक ओबामा ने बुश को कहीं पीछे छोड़ा हुआ है। वे कई बार सार्वजनिक मंचों से मनमोहन सिंह की खुली तार ीफ भी कर चूके है। तारीफ करें भी क्यों नहीं भले ही मनमोहन सिंह के शासन में आम भारतीयों को बेलगांम मंहगाई, भ्रष्टाचार व अमेरिका-पाक पोषित आतंकवाद से खून के आंसू बहाने के लिए मजबूर होना पड़ रहा हो परन्तु अमेरिका के लिए अटल बिहारी वाजपेयी के बाद मनमोहन सिंह ही अमे िरका के लिए सबसे अनकुल भारतीय प्रधानमंत्री साबित हुए। भले ही मनमोहन सिंह भारतीय मान सम्मान व हितों की रक्षा करने में पूरी तरह से असफल हुए हों परन्तु वे अमेरिका के बससे आज्ञाकारी व हितैषी भारतीय प्रधानमंत्री साबित हुए। ,खासकर जिस प्रकार से प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने अमेरिकी हितों व लडखडाती अर्थव्यवस्था को संजीवनी साबित होने वाले अमेरिका के साथ हुए परमाणु समझोता करा कर अमेरिकी नेतृत्व का दिल ही जीत लिया। उसकी अमेरिका में ही नहीं अपितु नाटो गठबंधन में उनकी भूरि भूरि प्रसंशा क ी जा रही है।
इसके लिए सबसे उपयुक्त कांग्रेसी नेतृत्व को भी इस समय ‘मनमोहन सिंह को विश्व बैंक के अध्यक्ष पद पर आसीन करवाना चाह रहे है।
राहुल गांधी की ताजपोशी के लिए भले ही दिग्विय सिंह के ‘राहुल गांधी में प्रधानमंत्री बनने के सभी गुण विधमान है‘’ वाले इस बयान को देश की जनता के साथ राजनैतिक क्षेत्रों में गंभीरता से नही लिया गया। परन्तु कांग्रेसी राजनीति के मर्मज्ञों को यह बयान कांग्रेसी रणनीति का एक अहम हिस्सा नजर आ रहा है। कांग्रेसी नेतृत्व इस बात से काफी परेशान है कि मनमोहन सिंह सरकार से देश की आम जनता का ही नहीं कांग्रेस कार्यकत्र्ताओं का भी पूरीे तरह से मोह भंग हो गया हे।
आम जरूरी चीजों की कीमतों में बढ़ोतरी की आग में जल रहे आम देश के नागरिकों के जख्मों में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह सरकार का निठ्ठलापन्न व शर्मनाक चुप्पी नमक मिर्च उडेलने का कृत्य साबित हो रहा है। एक तरफ सरकार मंहगाई पर अंकुश लगाने का कोई ईमानदारी से काम नहीं कर रही है। नहीं सरकार देश में जमाखोरों व मिलावटबाजों के खिलाफ ठोस कार्यवाही ही कर रही है। केवल प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह व उनकी सरकार के बार-बार झूठे साबित हो रहे मंहगाई पर अंकुश लगाने वाले आश्वासनों से कैसे आम आदमी का पेट भरेगा। लोगों में मनमोहन सिंह की सरकार के नक्कारेपन से कांग्रेस के खिलाफ जबरदस्त आक्रोश है, परन्तु कोई भरोसेबंद विपक्ष न होने से कांग्रेसियों को अभी अपनी जमीन पूरी तरह खिसकती नजर ना भी आ रही हो परन्तु अंदर से कांग्रेसी भी अपने नक्कारे साबित हो चूके प्रधानमंत्री की इस जनविरोधी सरकार से खुश नहीं है।अब कांग्रेसी नेतृत्व को भी समझ में आ गया है कि आम गरीब आदमी खाना पीना छोड़ कर केवल प्रधनमंत्राी के हवाई आश्वासनों के लालीपोप से तो अब और ज्यादा समय तक मूर्ख नहीं बनाया जा सकता। देश की जनता की भी सहनशीलता की एक सीमा होती है।
इसी स्थिति को भांपते हुए शायद मनमोहन सिंह ने भी ससम्मान विदाई करने का मन बना लिया है। इसका संकेत वे समय समय पर अपने करीबियों से देते रहते। वेसे भी ऐसी ही मंशा उन्होंने अपने दूसरे कार्यकाल के प्रथम वर्षगांठ के अवसर पर आयोजित संवाददाता सम्मेलन में भी प्रकट की थी । तब मनमोहनसिह ने एक प्रश्न के उतर में दो टूक शब्दों महा था कि अगर कांग्रेस आला कमान इशारा भी करे तो वे राहुल जी के लिए प्रधानमंत्राी की कुर्सी छोड़ सकता हॅू। उन्होंने राहुल गांध्ी को सुयोग्य नेता बताया। यह कह कर प्रधनमंत्राी मनमोहन ने अपने आप को राहुल का भरत साबित करने का प्रयास कर सप्रंग प्रमुख सोनिया गांध्ी का विश्वास और मजबूत करने का काम भी किया। परन्तु प्रधनमंत्राी मनमोहन सिंह शायद यह भूल गये वह राजशाही नहीं या नेहरूशाही नहीं अपितु भारत में लोकशाही का राज चलता है। मनमोहनसिंह के इसी उदघोष से सापफ हो गयी है कि उनकी लोकशाही से अध्कि नेहरूशाही में विश्वास है। उनकी प्रतिब(ता देश की आम जनता से अध्कि कांग्रेसी युवराज राहुल गांध्ी से अध्कि है। उनका दर प्रधनमंत्राी बनने से पहले व अब भी न तो किसी आम आदमी के लिए खुला है व नहीं पार्टी के आम कार्यकत्र्ता के लिए। एक प्रकार से लोकशाही के सर्वोच्च पद प्रधानमंत्राी पद पर आसीन होने के बाबजूद भी मनमोहन का देश की आम जनता से कहीं सीधा सम्बंध नहीं है। इसी कारण उनको न तो आम जनता के दुख दर्द का भान है व नहीं देश के। वे जनता के अर्थशास्त्र से अध्कि कागची अर्थशास्त्र के आंकडों को ही जीवन की सच्चाई समझ बेठे है। ईमानदारी का तकमा पहने मनमोहन सिंह को अपने आप से यह सवाल करना होगा कि यह ईमानदारी किस काम की जो देश की आम जनता व देश का अमन चैन पर ग्रहण लगाये। वे अगर समझते हैं तो सोनिया गांध्ी व अमेरिका के राष्ट्रपतियों की भावना। प्रधनमंत्राी मनमोहन एक प्रकार से लोकशाही का एक जीता जागता उपहास ही है। अगर उनमें जरा सी भी नैतिकता रहती या लोकशाही के प्रति उनके दिलो दिमाग में जरा सा भी सम्मान रहता तो वे उनके कुशासन से त्राही-त्राही कर रही देश की आम जनता की दयनीय हालत को देख कर कबके चुपचाप इस्तीपफा दे देते। आज मंहगाई से त्रास्त देश की जनता की हाहाकार सुन कर भी उनकी आत्मा उनको उनके प्रथम दायित्व को बोध् नहीं करा पा रही है तो इससे साफ हो गया कि उनके शब्द कोष में शायद लोकशाही नामक शब्द को कहीं दूर-दूर तक स्थान भी नहीं है। सच तो यह है मनमोहन सिंह सही अर्थो में कांग्रेस व राहुल के लिए भरत नहीं राव ही साबित हो रहे है। जिस प्रकार से राव ने अपने कुशासन से उत्तर भारत में कांग्रेस की जड़ों में एक प्रकार का मट्ठा ही डाल दिया था उसी प्रकार मनमोहन सिंह ने अपने कुशासन से कांग्रेस व देश दोनों का भट्टा ही गोल कर दिया है।
मनमोहन सिंह देश को यह अवश्य समझायें कि कैसे वह पाकिस्तान से मित्रता का सुत्रपात करेंगे। पाकिस्तान का जन्म ही भारत द्वेष के कारण हुआ। उसे पूरा कश्मीर भी दे दो पिफर भी उसके हुक्मरानों की ‘हंस कर लिया पाकिस्तान, लड कर लेंगे हिन्दुस्तान’ व लालकिले में पाकिस्तानी झण्डा फहराने की दिली हसरत को कौन पूरा करेगा। हालांकि पाकिस्तान की हिम्मत बंगलादेश बनाने के बाद इतनी नहीं रह गयी थी कि वह भारत से सीधे इस प्रकार की दुश्मनी मौल ले, जिस प्रकार वे अटल व मनमोहन सिंह सरकारों के दौरान ले रहा है। वह अपने दम पर नहीं अपितु अमेरिका द्वारा उसे जबरन भारत के विरोध में आतंकवाद को हवा देने के लिए झौंका जा रहा है। उसको इसके लिए न केवल संरक्षण अमेरिका प्रत्यक्ष रूप से दे रहा है अपितु वह पाकिस्तान को सीध्े हथियार व दौलत भी प्रदान कर रहा है। अमेरिका भारत को सीध्े इराक व अपफगानिस्तान की तर्ज पर कमजोर नहीं करना चाहता। वह भारत को पाकिस्तान के कंधे पर आतंकी बंदूक रख कर कमजोर करना चाहता है। यही नहीं अमेरिका का यह नापाक षडयंत्र उस समय बेपर्दा हो गया जब कारगिल प्रकरण पर भारतीय सेना द्वारा कारगिल में चारों तरपफ से घिर चूके पाक सैनिकों को सुरक्षित रास्तादिलाने के लिए अमेरिका के राष्ट्रपति ने भारत के प्रधनमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी को मजबूर किया। यही नहीं अमेरिका ने संसद हमले में पाक की सीधी भूमिका से आक्रोशित भारत की जनभावनाओं का सम्मान करते हुए जैसे ही तत्कालीन प्रधनमंत्राी अटल बिहारी वाजपेयी आर पार की लड़ाई के लिए भारतीय सेना को पाक को सबक सिखाने हेतु सीमा पर कूच करने का आदेश दिया तो अमेरिका ने पाक का संरक्षक बन कर अटल बिहारी वाजपेयी को शर्मनाक मूकता रखने के लिए विवश कर दिया। ऐसा ही कृत्य अमेरिका वर्तमान प्रधनमंत्राी मनमोहन सिंह से करा रहा है। मनमोहन सिंह भारत के प्रधनमंत्राी होने के बाबजूद पाक की मुम्बई हमलों व अमेरिकी ऐजेन्ट हेडली के भारत में आतंकी मिशन को उजागर होने के बाबजूद उनकी सीध्ी मांग तक नहीं कर पाये। अब मनमोहन सिंह देश को बतायें कि उन्होंने आतंकवाद पर देश का सम्मान बचाने के लिए क्यों अमेरिका को हेडली को भारत को सौंपने के लिए पुरजोर मांग नहीं की। क्यों मनमोहन सिंह ने अमेरिका के तर्ज पर पाकिस्तानी आतंकी अड़डों को ड्रोन हमलों से नष्ट नहीं किया।
प्रधानमंत्राी मनमोहन सिंह के शासनकाल में न तो देश का सम्मान ही सुरक्षित है व नहीं देश की सीमायें। न तो देश में आम आदमी का चक्की चुल्हा ही सुरक्षित है व नहीं आम आदमी का जीवन। कहीं आतंकी हमले होते तो कहीं नक्सली हमले। देश की पूरी व्यवस्था भ्रष्टाचारियों के चंगुल में प्रायः मृतप्राय सी हो गयी है। ऐसे में देश की आम लोगों के दिल से एक ही आवाज आ रही है कि मनमोहन सिंह जी जरा देश की आम गरीब जनता पर रहम करो। देश को अपने हाल पर छोड़ दो, उसको अपने कुशासन से मृतप्रायः न बनाओ। आप तो कल महामहिम भी बन जायेंगे। पर आपके कुशासन से आम आदमी व उसका परिवार कल जींदा रह पाये इसमें खुद देश के आम आदमी को संशय है। देश के खातिर मनमोहन सिंह जी अविलम्ब अपने पद से इस्तीफा दे दो। यही आपकी देश के प्रति सबसे बड़ी सेवा होगी। शेष श्रीकृष्ण कृपा। हरि ओम तत्सत्। श्रीकृष्णाय् नमो।

Thursday, June 16, 2011

ग्रहों के प्रकोप से रहेगा हरीश रावत व सतपाल महाराज में 36 का आंकडा

ग्रहों के प्रकोप से रहेगा हरीश रावत व सतपाल महाराज में 36 का आंकडा/
-निशंक सरकार के भ्रष्टाचार से व्यथित जनता को मिला नरेन्द्र नेगी के गीतों का सहारा/
नई दिल्ली (प्याउ)। उत्तराखण्ड कांग्रेस के लिए ही नहीं दिल्ली में उत्तराखण्ड में आगामी 2012 में कांग्रेसी सरकार बनाने के दिवास्वप्न देख रहे आला कांग्रेसी नेताओं के लिए भी एक बुरी खबर है कि प्रदेष कांग्रेस के दोनों शीर्ष नेता केन्द्रीय कृषि राज्यमंत्री हरीष रावत व पूर्व केन्द्रीय राज्य मंत्री सतपाल महाराज में 36 का आंकड़ा बना रहेगा। इसका खुलाषा करते हुए कांग्रेसी पार्टी में दषकों से चर्चित रहे ख्याति प्राप्त ज्योतिषी पण्डित प्रेम चंद ने शनिवार इसी सप्ताह कांग्रेस मुख्यालय में प्रदेष कांग्रेस के पूर्व महामंत्री धीरेन्द्र प्रताप की उपस्थिति में की। प्रकाण्ड ज्योतिषी पण्डित प्रेमचंद ने इसका रहस्य उजागर करते हुए कहा कि हरीष रावत की राषि का स्वामी शनि और सतपाल महाराज की राषि का स्वामी बुध मित्र नहीं होने से इन दोनों के बीच चाहते हुए भी मित्रता हो ही नहीं सकती है। ंगौरतलब है कि प्रदेष के केन्द्रीय नेतृत्व द्वारा उत्तराखण्ड कांग्रेस में गुटबाजी के कारण मची घमासान को ही ठीक करने के लिए केन्द्रीय महामंत्री चैधरी बीरेन्द्रसिंह को उत्तराखण्ड का प्रभारी बनाया गया। अपना कार्यभार सम्भालने के बाद से ही केन्द्रीय प्रभारी को इन दोनों दिग्गज नेताओं को एक साथ दिल नहीं अपितु एक मंच में एकसाथ खडे करने के लिए भी काफी पसीने बहाना पड़ रहा है। स्थिति यह है कि इसी पखवाड़े जहां दिल्ली में प्रदेष का एक उच्च स्तरीय षिष्टमण्डल केन्द्रीय प्रभारी चैधरी वीरेन्द्र सिंह के नेतृत्व में राष्ट्रपति से उत्तराखण्ड प्रदेष सरकार के मुख्यमंत्री रमेष पौखरियाल निषंक के भ्रष्टाचार का पिटारा ही खोलने राष्ट्रपति भवन गये तो उस षिष्टमण्डल में न तो सतपाल महाराज ही थे व नहीं इस षिष्टमण्डल में उनकी धर्मपत्नी व प्रदेष की संभावित मुख्यमंत्री की प्रबल दावेदार समझी जाने वाली अमृता रावत ही सम्मलित थी। वहीं दूसरी तरफ सतपाल महाराज भी इस बात से काफी खपा है कि हरीष रावत उनके क्षेत्र में मुख्यमंत्री के कार्यक्रमों में चढ़बढ़ कर भाग ले कर उनकी जड़ों को कमजोर करने का काम कर रहे है। हालत यह है कि भले ही कहने को प्रदेष में चुनाव भाजपा कांग्रेस के बीच में होंगे परन्तु राजनीति के मर्मज्ञ जान रहे हैं कि यह चुनाव उत्तराखण्ड में तिवारी समर्थकों व हरीष रावत समर्थकों के बीच में ही होगा। निषंक को मुख्यमंत्री बनाये रखने से जनता की नजरों में आगामी विधानसभा चुनाव में भाजपा पहले ही चुनावी दंगल से बाहर मान रही है। जनता में निषंक की छवि का अंदाज इसी बात से लगाया जा सकता है कि प्रदेष सरकार के एक के बाद एक भ्रश्टाचार के पिटारे के खुलने से प्रदेष की जनता की नजरों में भाजपा पूरी तरह से बदरंग हो चूकी है। प्रदेष की आम जनता प्रदेष की सत्ता में आसीन मुख्यमंत्री निषंक सरकार के भ्रश्ट कारनामों से कितनी व्यथित है इसका सहज ही अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि जनता ने निषंक सरकार के भ्रश्टाचार पर प्रहार करने वाला उत्तराखण्ड के महान गायक नरेन्द्रसिंह नेगी के गीत ‘अब कथ्या खेलो’ यानी अब और कितना खायेगा को जनता ने हाथों हाथ लिया। इसकी लोकप्रियता का सहज ही इस बात से अनुमान लगाया जा सकता है कि इस गीत का धमाल उत्तराखण्ड में ही नहीं अपितुदिल्ली, मुम्बई, लखनऊ ही नहीं अपितु पूरे संसार भर में रहने वाले जागरूक उत्तराखण्डियों ने इस गीत के लिए नरेन्द्र सिंह नेगी को बधाईयां दी। गौरतलब है कि उत्तराखण्ड को पतन के गर्त में धकेलने वाले पूर्व मुख्यमंत्री नारायणदत्त तिवारी के कुषासन से व्यथित जनता के स्वरों को अपने गीतों में पिरोने वाले कालजयी गायक नरेन्द्रसिंह नेगी ने नारायणदत्त तिवारी के कुषासन को तर्पण देने के लिए नौछमी नारैण नामक एलबम निकाला जिसने पूरे उत्तराखण्डी समाज में तिवारी की कुषासन की लंका को ढाहने के लिए एकनिश्ट बनाया। अब भले ही दिल्ली में आसीन भाजपा के मठाधीष अपने निहित स्वार्थो में धृतराश्ट्र बन कर प्रदेष की पतवार निषंक के हाथों में ही सौंपने की हटधर्मिता प्रदेष के दिग्गज भाजपा नेता पूर्व मुख्यमंत्री कोष्यारी व मेजर जनरल खंडूडी के पुरजोर विरोध को दरकिनारे करके कर रहे हैं तो प्रदेष की जनता प्रदेष से भाजपा के सफाया के लिए आगामी विधानसभा चुनाव की बेसब्री से इंतजारी कर रहे हैं। परन्तु जिस प्रकार से आपसी महाभारत कांग्रेस में भी हो रहा है उसे देख कर जनता में हैरानी है कि कांग्रेसी क्या गत विधानसभा चुनाव फतह करके भी इस समय भी अपने विरोधियों को सत्तासीन कर देंगे। जिस प्रकार भाजपा व कांग्रेस में अन्तकलह है उसे देख कर उक्रांद व मुन्नासिंह चैहान व अन्य साथियों के बीच तीसरे मोर्चे के नाम पर जो गठबंधन बनाया जा रहा है वह प्रदेष की राजनीति की दिषा तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभायेगी। इसके साथ ही कांग्रेसी दिग्गज सतपाल महाराज व हरीष रावत की आपसी अहं के द्वंद के कारण प्रदेष की राजनीति पर एक बार फिर अनिष्चिता का ग्रहण लगे ही रहेगा। वहीं कांग्रेसी आषाओं पर तीसरे मोर्चे के उदय से व सतपाल महाराज एवं हरीष रावत के द्वंद से भी लग सकता है ग्रहण।

अण्णा के भ्रश्टाचार मुहिम पर ग्रहण हैं एनजीओ

अण्णा के भ्रश्टाचार मुहिम पर ग्रहण हैं एनजीओ /
नई दिल्ली(प्याउ)। भले ही आज अण्णा हजारे व उनकी सिविल सोसायटी के साथी बहुत ही जोष खरोस के साथ देष की जनता से उनके आंदोलन में समर्थन देने के लिए अपील कर रहे हैं कि देष में व्याप्त तमाम भ्रश्टाचार पर अंकुष लगाने के लिए एकमात्र रामवाण दवा जन लोकपाल कानून है। लोगों को यह भरोसा दिलाया जा रहा है कि अगर यह कानून बन गया तो देष से भ्रश्टाचार पर काफी हद तक देष में भ्रश्टाचार पर अंकुष लग जायेगा। परन्तु सच्चाई यह है कि उनके सबसे करीबी साथी श्री रेसरदा ओरंगाबाद वालों को ही इस बात पर विष्वास नहीं है कि जो लड़ाई भ्रश्टाचार पर अंकुष लगाने के लिए जनलोकपाल कानून बनाने के नाम पर अन्ना हजारे लड़ रहे हैं वह षायद ही मुकाम पर पंहुच पायेगा। अण्णा के अपने आमरण अनषन के लिए दिल्ली आने से अब तक हर निर्णायक संघर्श में साये की तरह साथ रहने वाले अण्णा के साथी श्री देसरदा ने दो टूक षब्दों में कहा कि अण्णा के आंदोलन को जिस प्रकार से एनजीओ ने चारों तरफ से अपने चुंगुल में ले रखा है उन्होंने स्पश्ट षब्दों में कहा कि देष में अधिकांष एनजीओ एक प्रकार से भ्रश्टाचार में आकण्ठ डुबे हुए हैं, ऐसे में एनजीओं के भरोसे भ्रश्टाचार की लड़ाई षायद ही जीती जा सकती है। अण्णा हजारे के करीबी साथी श्री रेसरदा ने यह उदगार षनिवार 11 जून को सांय दिल्ली में संसद के समीप कांस्टीटयूषन क्लब के डिप्टी स्पीकर हाल में ‘ ऊर्जा क्षेत्र भूअर्जन-पर्यावरण एवं मानव अधिकारों का हनन के मुद्दे पर आयोजित एक सम्मेलन को संबोधित करते हुए कही। इस सम्मेलन में पीयूसीएल के राश्ट्रीय अध्यक्ष न्यायमूर्ति राजेन्द्र सच्चर, समाजवादी पार्टी के महासचिव सांसद मोहन सिंह, समाजवादी नेता व किसान संघर्श समिति के संस्थापक अध्यक्ष डाॅ सुनीलम्, श्रीमती मंजू मोहन आदि ने संबोधित किया। सम्मेलन का संचालन सोषलिस्ट फ्रंट के विजय प्रताप कर रहे थे। सम्मेलन में हर वक्ता ने जहां सरकार की दमनकारी व षोशणवादी कुनीतियों से किसान, मजदूर व आम आदमी के जीवन पर ग्रहण लगाने वाली बताया वहीं मध्य प्रदेष में अदानी पावर प्रोजेक्ट लिमिटेड के गुण्डों द्वार डा सुनीलम व एडवोकेट आराधना भार्गव पर किये गये कातिलाना हमले की कडी भत्र्सना की। इसके साथ ही सरकार से मांग की गयी कि किसानों की जमीनों का जबरन छिनने की प्रवृति पर अंकुष लगाया जाय। इसके अलावा सम्मेलन में 4 जून की रात को बाबा रामदेव के जनांदोलन पर पुलिसिया दमन की भी कड़ी भ्रत्र्सना की गयी। सम्मेलन में प्रतिश्ठित समाजसेवियों में राजेन्द्र रवि, भूपेन्द्र सिंह रावत, समाजवादी नेता राजेष कुमार, भाशा आंदोलन के राजकरण सिंह, उत्तराखण्ड राज्य गठन जनांदोलन के देवसिंह रावत, जगदीष भट्ट व जगमोहन रावत, एनएपीएम की सुनीता, धर्मेन्द्र मित्रा, योगेष कमाल, देव षास्त्री, प्रीति आदि प्रमुख थे।

स्वामी रामदेव को बर्बाद करने पर क्यों उतारू हैं सरकार?

-स्वामी रामदेव को बर्बाद करने पर क्यों उतारू हैं सरकार?
-भारत को मजबूत बनाने के बाबा के आंदोलन को रौंदने के लिए राष्ट्रीय ही नहीं अंतरराष्ट्रीय षडयंत्र
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देश की सत्ता में पक्ष-विपक्ष व पूरी व्यवस्था के विभिन्न महत्वपूर्ण संस्थानों में काबिज मजबूत तबका देश की संसद पर हमला सह सकता है! उसके अपराधियों को न्यायालय द्वारा फांसी दिये जाने के बाबजूद वर्षो तक उसकी खातिरदारी कर सकता है। वह देश के तबाह करने पर तुले अमेरिका व पाक के आतंकियों पर रहम कर सकता है। यही नहीं देश को मंहगाई व भ्रष्टाचार से तबाह करने वाले देशद्रोहियों को देश की छाती पर मूंग दलते हुए देख सकता है परन्तु देश का यह तबका किसी भी हालत में यह सहन नहीं कर सकता है कि उनके द्वारा दशकों से देश से कमाये गये अकूत काले धन पर जो उन्होंने बहुत ही पापड़ बेल कर विदेशी बैंकों में अपने बुरे दिनों के लिए सुरक्षित रखा है उस पर कोई नजर भी उठाये। उस पर नजर उठाने वाले हालांकि सुब्रमणयम स्वामी जेसे बहुत हैं परन्तु बाबा रामदेव जैसे जनबली व धनबली अब तक एक भी न था। बाबा द्वारा देश हित में उनके माल पर नजर रखने की हिमाकत करने के कारण देश का यह तबका हर हाल में उसको जमीदोज करने के लिए उतारू है।
बाबा रामदेव जैसे मजबूत व लाखों जनता को आंदोलित करके उस धन को जब्त करने की बात दिल्ली में आकर उनकी छाती पर चढ़ कर करने लगे तो यह देश के उन लोगों को कतई बर्दास्त नहीं हुआ जिनकी अकूत सम्पति विदेशों में इन बैंकों में रखी हुई है। यह नहीं की ये लोग केवल कांग्रेस पार्टी के हैं ये भारत के तमाम अग्रणी राजनैतिक दलों में ही महत्वपूर्ण पदों में आसीन नहीं हैं अपितु ये लोग नौकरशाह, व्यवसायी, कलाकार, खिलाड़ी, कानूनविद्,तस्कर, माफिया, साधु-संत, उद्यमी और समाजसेवी सहित व्यवस्था के तमाम महत्वपूर्ण तबके को अपने शिकंजे में जकडने वाले लोग है। ’ ऐसे लोग कैसे सहन करे की उनकी उम्र भर की कमाई को , जो उन्होंने कितने ही कुकर्म करके बचते छुपाते विदेशी बैंकों में छुपाई हैं, इस कमाई को बाबा रामदेव द्वारा देश के लिए जब्त करने की मांग को सुनते ही उनकी दिन का चैन व रातों की नींद ही उड गयी। उन्होंने मिल कर दवाब डाल कर बाबा रामदेव को ऐसा सबक सिखाने का रणनीति बाबा के दिल्ली आगमन से पहले ही तय कर ली थी। वे हर हाल में बाबा रामदेव की जुबान को सदा के लिए बंद करने के लिए भी उतारू है। इसी कारण सरकार ने इतनी कमजोरी व आवभगत बाबा रामदेव के सम्मुख दिखाई कि उसे देख कर पूरा देश हैरान था। सरकार किसी भी कीमत पर बाबा को दिल्ली में आमरण अनशन क्या इस मुद्दे को लेकर किसी प्रकार का योग शिविर की भी इजाजत नहीं दे रही थी। परन्तु बाबा ने जिस प्रकार से चार मंत्रियों को अपनी बातों में फंसा कर 4 जून को रामलीला मैदान में आमरण अनशन करने में सफलता हासिल की उससे विदेशी बैंकों में अकूत धन रखने वालों की त्योरियां चढ़ गयी। उन्होंने अपने प्रभाव से किसी भी कीमत पर बाबा रामदेव को ऐसा सबक सिखाने का मन बना लिया कि जिससे आने वाले समय में कोई इस मुद्दे को उठाने की हिम्मत तक न कर पाये। इसी के तहत आधी रात को सोते हुए आंदोलनकारियों व बाबा रामदेव को पुलिसिया दमन का शिकार होना पड़ा। वह बाबा रामदेव का शौभाग्य रहा कि वे सुरक्षित बच गये। अगर उस भगदड में बाबा रामदेव भी वहां पर शहीद हो जाते तो इन धन पशुओं के चेहरे पर तनिक सी भी सिकन नहीं आती। इसके बाद जिस प्रकार से बाबा रामदेव को बदनाम करने का एक जबरदस्त प्रचार कांग्रेस व सरकार ने मीडिया के सहयोग से किया उससे साफ हो गया कि बाबा रामदेव जिंदा भी हैं तो यह देश के लोगों के लिए शौभाग्य व भगवान की कृपा से। नहीं तो जो निष्ठुर व्यवस्था रात के अंधेरे में सोते हुए हजारों अनशनकारी महिला, बुजुर्ग व बच्चों पर जलियावाले बाग से अधिक शर्मनाक दमन कर सकती है तो उसके लिए अपने निहित स्वार्थ के लिए बाबा रामदेव को रामलीला मैदान की भगदड़ में ही जमीदोज करने में कितनी मेहनत करनी पड़ती। देश की जनता को ही नहीं पूरे विश्व के चिंतकों को एक बात समझ में नहीं आ रही है कि भारत सरकार शांतिपूर्ण ढंग से लाखों लोगों के समर्थन से देश के हित में आंदोलन कर रहे योग गुरू बाबा रामदेव को कुचलने के लिए इतनी क्यों अधीर है? क्यों भारत सरकार ने 4 मई की रात को सोते हुए अनशनकारी रामदेव व पच्चीस हजार अनशनकारियों को बर्बर पुलिसिया दमन से क्यों रौंदा? उसके बाद भी केन्द्र सरकार व सत्तासीन कांग्रेस पार्टी दोनों ने ही जिस गैर जिम्मेदाराना ढ़ग से बाबा रामदेव के अनशन का उपहास ही नहीं उपेक्षा की उससे देश के लोगों के जेहन मे ं केवल एक ही सवाल बार बार उभर रहा है कि आखिर बाबा रामदेव ने ऐसी क्या गलती कर दी जो उसके साथ देश के दुश्मनों से भी बदतर व्यवहार करने के लिए सरकार उतारू हैं? क्यों सरकार देशहित में चल रहे इन शांतिपूर्ण आंदोलनों को तो हर हाल में लाठी गोली चलवा कर पुलिसिया दमन से रौंदने के लिए उतारू हैं परन्तु वहीं दूसरी तरफ यही सरकार देश की संसद से लेकर भारत को अपने आतंकियों से तबाह करने पर दशकों से संलिप्त अमेरिका व पाक से मैत्री की पींग बढ़ा रही है तथा उनके आतंकी गुर्गो को तमाम न्यायालयों द्वारा सजा दिये जाने के बाबजूद भी शर्मनाक संरक्षण दे रहे हैं।
कुछ महिनों से देश की राजनीति में यकायक तब उबाल आया जब बाबा रामदेव व अन्ना हजारे ने देश में बेलगाम भ्रष्टाचार से व्यथित हो कर इसके खिलाफ गांधीवादी आंदोलन चलाने के लिए कमर कसी। रामदेव तो पूरे भारत में भारतीयों द्वारा विदेशों में जमा करायी गयी अकूत दौलत को भारत में वापस लाने की मांग करते हुए आंदोलन चला रहे थे। वहीं अन्ना हजारे भी अपने साथियों के साथ ‘जन लोकपाल’ की नियुक्ति के लिए कानून बनाने के लिए आंदोलन कर रहे थे। पूरे देश ने देखा कि अण्णा हजारे के आंदोलन को सरकार ने हाथों हाथ लेकर उनके साथ समझोता करके नया इतिहास रचा। लोगों को लगा कि केन्द्र सरकार जनदवाब में आ कर लोकशाही का सम्मान करने के लिए मजबूर हो गयी है। जन लोकपाल कानून बनाने के लिए सरकार ने तत्काल मंत्रीमण्डल समुह की समिति और एक अण्णा हजारे वाले दल की नागरिक समिति गठन का ऐलान कर दिया। इसकी एक दो बैठकें भी आयोजित हुई। सरकार पहले अण्णा हजारे की प्रधानमंत्री से लेकर न्यायपालिका को इस कानून के अन्तर्गत रखने के लिए सहमत हुई परन्तु चंद महिने में ही सरकार ने अपना रंग दिखाना शुरू कर दिया। किन्तु परन्तु ऐसे लगाये कि समिति के औचित्य पर ही प्रश्न चिन्ह लगाना शुरू कर दिया। इसके साथ ही बाबा रामदेव ने भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने के लिए जन लोकपाल को नाकाफी बताते हुए साफ शब्दों में अपनी पहली मांग के रूप में विदेशी बैंको में भारतीयों द्वारा रखे गये तथाकथित 400 लाख करोड़ रूपये को वापस भारत मे ं लाने की मांग को लेकर अपने ऐतिहासिक अनशन का ऐलान कर दिया।
4 जून को प्रारम्भ हुए इस आमरण अनशन में सम्मलित होने के लिए बाबा ने पूरे देश का भ्रमण करते हुए इसमें देश भर के लाखों लोगों को जोड़ने में जैसे ही सफलता हासिल की, उससे केन्द्र सरकार के हाथ पांव फूलने लगे। इस आंदोलन को जिस प्रकार से संघ परिवार का खुला समर्थन हासिल हुआ, सरकार के पांवों के नीचे से मानों जमीन ही खिसक गयी। सरकार ने इस बात का निश्चय कर लिया कि किसी भी कीमत पर बाबा रामदेव को दिल्ली में आमरण अनशन तो क्या कुछ भी करने के लिए इस समय घुसने ही न दिया जाय। जब बाबा अपने जनजागरण अभियान के अंतिम पड़ाव महाकाल की नगरी उज्जैन में हजारों लोगों को संबोधित करके 3 जून को दिल्ली से पालम हवाई अड्डे पर उतरे ही थे कि वहां पर केन्द्र सरकार के चार मंत्री उनसे अपना आमरण अनशन स्थगित करने की गुहार लगाने को पंहुच गये। इन चारों मंत्रियों ने बाबा रामदेव से कहा कि सरकार ने कालाधन को देश में लाने की मांग व मेडिकल -इंजीनियरिंग सेवाओं की परीक्षायें भारतीय भाषाओं में कराने की मांग को सिद्वांत रूप में स्वीकार कर लिया है। 3 जून को भी बाबा रामदेव के साथ भारत सरकार के मंत्रियों की दिल्ली के एक पंचतारा होटल में बैठक हुई। िह हालांकि इन बातों को उजागर नहीं किया गया। बाबा ने देश भर से आये अपने लाखों समर्थकों के साथ रामलीला मैंदान में आमरण अनशन का अपना वचन निभाने की मजबूरी शायद केन्द्र सरकार के मंत्रियों सके समक्ष रखी। बाबा की मजबूरी को समझते हुए शायद सरकार ने इसको भी मान लिया। परन्तु जब 4 जून तक बाबा के अनशन पर लाखों लोग पंहुच रहे थे तथा वहां पर देश के कौने कौने से लाखों और लोगों के पंहुचने की आशंका से केन्द्र सरकार के लोगों की त्योरियां चढ़ने लगी।
वैसे भी बाबा रामदेव को मनाने की गुहार जिस प्रकार से केन्द्र सरकार ने अपने चार -चार मंत्रियों को भेज कर की उससे पूरे कांग्रेसी जगत में सरकार की कड़ी भत्र्सना हुई। इसके साथ ही पूरे देश में एक संदेश गया कि मनमोहन सिंह सरकार पूरी तरह से बाबा रामदेव के रहमों करम पर टिकी हुई है। कांग्रेसी रणनीतिकारों को आशा थी कि वह बाबा को भी अण्णा हजारे की तरह अपने कमेटी इत्यादि के जाल में फंसा ही लेंगे। परन्तु जिस प्रकार से बाबा रामदेव के हाथों अपनी मिटियामेट होते देख कर कांग्रेसी रणनीतिकारों ने 4 जून की रात को बाबा रामदेव पर अनशन समाप्त न करने व वादा खिलाफी करने का आरोप लगा कर ुपलिस के दमन के बल पर आंदोलन को तहस नहस कर दिया। इसकी कड़ी भ्रत्र्सना पूरे देश ही नहीं विदेशों में भी हुई। परन्तु देश के इस तबके को इससे क्या लेना, वह तो बाबा रामदेव को ऐसा सबक सिखाने को उतारू हैं और इसके लिए उसने अपनी सारी ताकत झोंक दी है। उसकी एक ही कोशिश है कि बाबा को इतना करारा सबक सिखाया जाय कि कोई दूसरा भूल कर भी इस दिशा में मुंह खोलने की हिम्मत तक न कर सके।
बाबा को सबक सिखाने के बाद अब अण्णा हजारे को भी सरकार मूक रहने के लिए विवश कर रही है। इसी के तहत अण्णा हजारे को संघ का आदमी और तानाशाह आदि बताया जा रहा है। बाबा रामदेव के पास तो धनबल व जनबल था सरकार को मालुम है कि अण्णा के पास ऐसा कुछ नहीं है। केवल जनता के दिलों में जरूर अण्णा हजारे के लिए जगह है परन्तु अण्णा के पास वर्तमान में केवल एनजीओ की टीम के अलावा कोई ऐसा समर्पित तबका नहीं है जो सरकार के दमन के बाद अपने आप को विरोध में झोंक दे। इसलिए सरकार जानती है कि एनजीओ तो सबसे भ्रष्ट व अवसरवादी तबका होता है, वह लम्बा संघर्ष किसी भी कीमत पर नहीं कर सकता है। ऐसे में बाबा रामदेव के बाद अण्णा का मुंह बंद कर देश को भ्रष्टाचार का चारागाह बनाने के लिए देश की व्यवस्था पर काबिज मजबूत तबका उतारू है। इसी तबके के इशारों पर पक्ष विपक्ष ही नहीं पूरी व्यवस्थायें संचालित होती है। सरकार किसी की भी रहे इसी मजबूत तबके का राज देश में
चलता है।
जो लोग बाबा रामदेव व अण्णा की चंद भूलों के कारण इस आंदोलन का विरोध कर रहे हैं उनको यह बात समझ लेना चाहिए कि अण्णा व बाबा की भूलों को तो सुधारा जा सकता है परन्तु व्यवस्था में काबिज इन खूंखार भेडियों से देश बचाने के लिए इन दोनों को निजी अहं भूला कर एकजूट हो कर सांझी लडाई लडनी जरूरी है। इस लडाई में भले ही संकीर्ण मानसिकता के नेता, भ्रष्ट नेताओं को अग्रणी न भी बनाया जाय परन्तु इस आंदोलन में सबका सहयोग लेना नितांत आवश्यक है। एक हिंसक तबके व देश को लूटने में दशकों से लगे तबके से देश की व्यवस्था को बचाने के लिए तथा भ्रष्टाचार पर ईमानदारी से अंकुश लगाने के लिए समाज के सभी तबकों की भागेदारी को स्वीकार करना पडेगा। इसमें संघ या मुस्लिम लीग या अकाली सभी तबके का जो भी व्यवस्था की भलाई में सहयोग देना चाहता हो उसका सहयोग लेना चाहिए। अगर हमने इन खूंखार तबके के जाल में फंस कर संघ या मुस्लिम इत्यादि लक्ष्मण रेखाओं को अपनी चारों तरफ खिंचा तो इस लडाई को किसी भी सूरत पर तमाम कोशिशों के बाबजूद नहीं जीता जा सकता है। जो लोग बाबा रामदेव के हजारों करोड़ रूपये की सम्पति के कारण उनका विरोध कर इस आंदोलन को कमजोर कर रहे हैं उनको यह नहीं भूलना चाहिए कि बाबा रामदेव की तरह इस देश में हजारों ऐसे संत व महंत हैं जिनके पास उनसे भी अधिक सम्पति है। परन्तु बाबा रामदेव ने यह सम्पति देश का नाम रोशन करके अर्जित की। हो सकता है कानूनों का कुछ उलंधन हुआ हो परन्तु उनके कार्यो से देश को हजारों करोड़ का लाभ व अरबों रूपये का अर्थव्यवस्था को लाभ हुआ। हाॅं जिन बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के खिलाफ बाबा रामदेव पेप्सी, कोक इत्यादि को रोकने के लिए प्रचार कर रहे थे उनके आर्थिक सम्राज्य को बाबा ने गहरा नुकसान पंहुचाया था। इसकारण हो सकता है बाबा के खिलाफ यह अंतरराष्ट्रीय साजिश भी हो। क्योंकि बाबा रामदेव जिस प्रकार से भारत के स्वाभिमान व विकास के लिए देश की जनता को जागृत कर रहे थे उसको देख कर विदेशी ताकतें किसी भी सूरत पर बाबा के अभियान को रौंकना चाहती थी। इस तरह बाबा के भारत को मजबूत बनाने के इस अभियान को रोंकने व रौंदने में राष्ट्रीय ही नहीं अंतरराष्ट्रीय साजिश भी है। देश के स्वाभिमानी देशभक्तों को इस बात को समझना चाहिए कि बाबा के आंदोलन से देश मजबूत ही होगा। देश की न्यायपालिका को भी यह बात समझ में आ ही गयी कि बाबा के आंदोलन को कुचला गया है। आज देशवासियों का पावन कर्तव्य है कि वे बाबा व अण्णा हजारे के देश को महान बनाने के आंदोलन को कुचलने पर आमदा सरकार के मंसूबों पर आगे आ कर पानी फेर दे। शेष श्री कृष्ण कृपा। हरि ओम तत्सत् । श्री कृष्णाय् नमो।

-लोकशाही पर कलंक है दमनकारी हुक्मरान -अण्णा व रामदेव एकजुट हो कर देश को दिशा दें

-लोकशाही पर कलंक है दमनकारी हुक्मरान
-अण्णा व रामदेव एकजुट हो कर देश को दिशा दें

हरिद्वार में गंगा की पावनता को अक्षुण्ण खने व इसमें अवैध खनन को रोकने की मांग को लेकर अनिष्चित कालीन अनषनकारी संत स्वामी निगमानन्द की 13 जून को सोमवार को दर्दनाक मौत हो जाने से भारतीय हुक्मरानों प देष की जनता के माथे पर एक षर्मनाक कलंक लग गया है। क्या इस देष की सरकारें आजादी हासिल करने के मात्र 64 साल में ही इतनी संवेदनहीन हो गयी हैं कि वे जनहित के मुद्दे पर सरकार का ध्यान आकृश्ठ करने वाले की इस कदर उपेक्षा करे की वह दम तोड़ने के लिए विवष हो जाये। जिस प्रकार से देष की विदेषों में जमा की गयी अकूत दौलत को देष में वापस लेने की मांग को लेकर आमरण अनषन कर रहे योग गुरू बाबा रामदेव व 25 हजार सोते हुए षांतिप्रिय आंदोलनकारियों मध्य रात्रि में केन्द्र सरकार की मनमोहनी सरकार ने लाठी व आंसू गैस के पुलिसिया दमन से रौंदने का काम किया तथा अब देष के भ्रश्टाचार पर अंकुष लगाये जाने के लिए ‘जन लोक पाल कानून’ बनाने की मांग करने वाले देष के अंग्रणी गांधीवादी नेता अण्णा हजारे को मनमोहन सरकार व कांग्रेस पार्टी धमका रही है उससे साफ हो गया है कि भारतीय हुक्मरान चाहे वह कांग्रेस के हों या भाजपा के या बसपा के हों या सपा के या वामदल आदि के किसी के दिल में लोकषाही के लिए जरा सा भी सम्मान नहीं है। यही नहीं ये अपनी सरकार के कुकृत्यों के प्रति आंदोलन करने वाले लोगों को रौंदने के लिए किसी भी अमानवीय हथकण्डे को अपना सकते है। सबसे हैरानी कांग्रेस के नेताओं के घोर पतन से हो रहा है वे गांधीवादी आंदोलनों को जनतंत्र के लिए खतरा बताते हुए उनको हर हाल में दमन करने के लिए बेषर्मो की तरह उतारू हैं। वहीं मायावती के राज में ंिजस प्रकार से किसानों पर नोयडा में दमन व वामदला के राज में सिंगूर में दमन किया गया, उससे साफ हो गया कि भले ही नाम के लिए भारतीय हुक्मरान अपने आप को अलग अलग दल के बताते हों परन्तु देष की लोकषाही को रौंदने के लिए ये सब मिल कर एक हैं।
उत्तराखण्ड में गो गंगा व गीता की दुहाई देने वाले संघ पोशित भाजपा का षासन है वहां पर गंगा की निर्मलता की रक्षा व इसमें अवैध खनन को रौंकने की मांग करने वाले हरिद्वार के महान संत स्वामी निगमानन्द की आमरण अनषन की सरकार ने इतनी षर्मनाक उपेक्षा की कि उनका देहान्त ही हो गया। उनकी षहादत के बाद भी न तो भाजपा के मुख्यमंत्री निषंक को षर्म आयी व नहीं संघ व भाजपा के अध्यक्ष गडकरी को ही षर्म आयी। अगर समय पर प्रदेष सरकार जागती तो स्वामी निगमानन्द का जीवन बचाया जा सकता था। वहीं बाबा रामदेव के आमरण अनषन पर जिस प्रकार से मनमोहन सरकार ने दमन किया उससे भारतीय लोकषाही की निर्ममता से एक प्रकार से हत्या ही की गयी। इस षर्मनाक प्रकरण के बाबजूद न तो प्रधानमंत्री ने न ही कांग्रेस की अध्यक्षा सोनिया गांधी ने अपने नैतिक राजधर्म को निर्वाह तक नहीं किया। उन्होंने बाबा रामदेव व देष से माफी मांगनी तो रही दूर, इस व्यथित राश्ट्र के धावों पर मरहम लगाने के लिए बाबा रामदेव से आमरण अनषन तोड़ने की औपचारिक अपील तक नहीं की। केवल तामषबीन हो कर वे सब बाबा रामदेव का भी हस्र गंगा की रक्षा के लिए आमरण अनषन के कारण बलिदान हुए बाबा की तरह ही करना चाहते थे। यह केवल कांग्रेस की ही नहीं अपितु भाजपा की भी मंषा थी कि बाबा अपने आमरण अनषन को न तोड़े। जिस षर्मनाक ढ़ग से प्रदेष के मुख्यमंत्री अंतिम समय तक बाबा के अनषन को जारी रहने की घोशणायें कर रहे थे उससे भाजपा की मंषा जग जाहिर हो गयी। भाजपा इस प्रकरण से इतनी खुष थी कि उसकी आला नेता सुशमा को काला दिवस मनाते समय देषभक्ति के गीत के आड में अपनी खुषी को प्रकट करने के लिए नाचने से अपने आप को नहीं रोक पायी। बाबा रामदेव व उनके हित चाहने वाले श्री रविषंकर व बापू मुरारी आदि संतों ने बाबा को राजनैतिक दलों के जाल में न फंसने के लिए अपना आमरण अनषन तोड़ने को राजी कर लिया। बाबा रामदेव में कई कमियां हो सकती है परन्तु ंिजस प्रकार से उन्होंने देष हित में अपने आप को दाव में लगा दिया वह सराहनीय ही नहीं अनुकरणीय है। बाबा ने आमरण अनषन तोड़ कर कांग्रेस ही नहीं भाजपा के मंसूबों पर भी पानी फेर दिया। बाबा के इस कार्य से देष की जनता ने राहत की सांस ली और लोगों को आषा है कि बाबा फिर पूरे जोष से देष की रक्षा के अपने आवाहन को पूरा करके देष को इन सत्ता के भैडियों से बचायेंगे।
इस प्रकरण से जनता पार्टी के षासन पर भी कांग्रेस की तरह संवेदनहीनता का कलंक लग गया। गौरतलब है कि इसी पखवाड़े इन महान संत के स्वास्थ्य की कुषल क्षेम पूछने के लिए उमा भारती भी स्वयं देहरादून के उसी हिमालय अस्पताल गयी जहां अनषनकारी स्वामी रामदेव को भी स्वास्थ्य लाभ के लिए भर्ती किया गया तथा यहीं पर बाबा रामदेव ने श्री श्री रविषंकर व बापू मुरारी सहित तमाम संतों के अनुरोध पर अपना आमरण अनषन तोड़ा था। इन दिनों देष को बाबा रामदेव के दिल्ली से उत्तराखण्ड में हुए आमरण अनषन ने उद्देल्लित कर दिया है भले ही बाबा रामदेव का अनषन चंद दिनों का रहा हो या देष में बढ़ते हुए भ्रश्टाचार पर अंकुष लगाने के लिए देष के अग्रणी गांधीवादी नेता अण्णा हजारे का ‘जनलोकपाल कानून’ बनाने के लिए संसद की चैखट राश्ट्रीय धरना स्थल जंतर मंतर पर किया गया 96 घंटों का ऐतिहासिक आमरण अनषन ने दषकों से सोये हुए देष की आत्मा को पूरी तरह से झकझोर कर रख दिया। हालांकि दिल्ली के इतिहास में आमरण अनषनों का एक लम्बा इतिहास रहा परन्तु देष की भाशाओं की आजादी के लिए संघ लोकसेवा आयोग के समक्ष भारतीय भाशाओं में संघ लोक सेवा आयोग की तमाम परीक्षायें कराने की मांग को लेकर 27 अप्रैल से 26 मई 1989 तक 29 दिन का ऐतिहासिक आंदोलन करने वाले भारतीय भाशाओं के पुरोधा पुप्पेन्द्र चैहान, राजकरणसिंह, हीरालाल, विध्नेष्वर पाण्डे व निर्वाण ने किया, जिसका समापन तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी के आष्वासन पर किया गया।
उत्तराखंड में लंबे अनशनों की लंबी पंरपरा है। सबसे लंबे अनशन का रिकॉर्ड 84 दिनों का है। 1940 के दशक में टिहरी में लोकतंत्र के लिए संघर्ष करने वाले गांधीवादी दिवंगत श्रीदेव सुमन ने अपनी कैद के दौरान 84 दिनों तक अनशन रखा था। अनशन के 84वें दिन उनका निधन हो गया था। जनता ने इससे आक्रोषित हो कर टिहरी की राजषाही को ही उखाड़ फेंका। वहीं दूसरी सबसे ऐतिहासिक अनषन उत्तराखण्ड राज्य गठन के बाद उत्तराखण्ड की जनांकांक्षाओं, लोकषाही व आत्मसम्मान के प्रतीक ‘गैरसैंण राजधानी’ बनाने की मांग को लेकर कांग्रेसी सरकार के उत्तराखण्ड के घोर विरोधी नारायणदत्त तिवारी के मुख्यमंत्रित्व काल में किया। 29 दिन के इस ऐतिहासिक आमरण अनषन में उत्तराखण्ड के महान सपूत बाबा मोहन उत्तराखण्डी ने जहां अपनी षहादत दी परन्तु क्या मजाल उत्तराखण्ड के वर्तमान व भविश्य को अपनी संकीर्ण कुकृत्यों से तबाह करने वाले घोर सत्तालांेल ुपु तिवारी ने उफ तक की हो। उत्तराखण्ड की जनता ने भले ही टिहरी की महान जनता के द्वारा श्रीदेव सुमन की षहादत के बाद आक्रोषित हो कर राजषाही के अंत करने का आक्रोष न दिखाया हो परन्तु उसके बाद हुए विधानसभा चुनाव में प्रदेष की सत्ता से तिवारी जैसे उत्तराखण्ड द्रोहियों को आसीन करने के लिए दण्डित करते हुए उखाड फैंका। वहीं दूसरी तरफ आमरण अनषन के क्रम में राज्य गठन के इतिहास में उक्रांद के आला नेता स्व. इन्द्रमणि बड़ोनी व वुजुर्ग भट्ट जी ने भी ऐतिहासिक आमरण अनषन किया था। इसके साथ ही प्रदेष के वर्तमान कबीना मंत्री दिवाकर भट्ट ने भी उत्तराखण्ड राज्य गठन जनांदोलन के दौरान खेट पर्वत पर किया था जिसका समापन दिल्ली में संसद की चैखट जंतर मंतर पर उत्तराखण्ड राज्य गठन जनांदोलन के केन्द्र बिन्दू बने ‘उत्तराखण्ड जनता संघर्श मोर्चा के धरना स्थल पर केन्द्रीय मंत्री के हाथों से हुआ।
हालांकि यहां पर आमरण अनषन का इतिहास चिपको आंदोलन के नेता सुंदर लाल बहुगुणा ने 74 दिनों का अनशन रखा था। उन्होंने यह अनशन 1990 के दशक में टिहरी पनबिजली परियोजना के विरोध में किया था। परन्तु उनके अनषन से उत्तराखण्ड के आम जनमानस व इतिहास को उतना उद्देल्लित नहीं किया जितना कि श्रीदेव सुमन व बाबा मोहन उत्तराखण्डी की षहादत वाले अनषन ने। हालांकि सीमान्त जनपद चमोली में में भी बलवंत सिंह नेगी जी ने दर्जनों बार आमरण अनषन करके इस सीमान्त क्षेत्र चमोली के षासन प्रषासन को जनहितों की उपेक्षा करने से बाज आने का सराहनीय कार्य किया। देष में चल रहे जनांदोलनों के प्रति हुक्मरानों का उदासीन व दमनकारी रवैये को देख कर चिंता होती है कि देष की जनता को अब इन दमनकारी ताकतों को हर हाल में देष की सत्ता से आगामी चुनावों में बाहर करना होगा। अण्णा हजारे व बाबा रामदेव को अपने आपसी मतभेदों को भुला कर देष की लोकषाही की रक्षा के लिए मिलजुल कर देष के आम अवाम को संगठित करके दमनकारी हुक्मरानों से देष की रक्षा करने के लिए सतत प्रयास करना चाहिए। यह आंदोलन हर हाल में षांतिपूर्ण रहे तभी इसकी विजय होगी। आज की सरकारें जो आतंकवादियों की आवभगत व गांधीवादी जनहित में आंदोलनरत लोगों का दमन करती है उसको एक पल के लिए देष की सत्ता में आसीन होने का कोई नैतिक हक नहीं है। षेश श्रीकृश्ण कृपा। हरि ओम तत्सत्। श्री कृश्णाय् नमो।

श्रीकृष्ण ही हॅू

श्रीकृष्ण ही हॅू
ना मैं देव हॅू,
ना देह हॅू।
मैं तो केवल
श्री कृष्ण ही हॅू।
खड़ा हॅू मैं,
अनादिकाल से,
विभिन्न रूपों मैं,
कुरूक्षेत्रा मैं,
अन्याय के खिलाफ,
सतत् संघर्ष में।
क्यों ढूंढ रहे हो मुझे,
गोकुल और वृंदावन में,
मैं नहीं हॅू अब,
मथुरा और द्वारिका
के महलों में,
मैं तो आज बसा हॅू
हर जन की श्वास में।
-देव सिंह रावत

-गंगा भक्त स्वामी निगमानन्द की उपेक्षा से लगाया निशंक सरकार ने देश के माथे पर कलंक

-गंगा भक्त स्वामी निगमानन्द की उपेक्षा से लगाया निशंक सरकार ने देश के माथे पर कलंक
-भाजपा के प्रदेश मुख्यमंत्री निशंक इस्तीफा दें

उत्तराखण्ड में गो गंगा व गीता की दुहाई देने वाले संघ पोशित भाजपा का षासन है वहां पर गंगा की निर्मलता की रक्षा व इसमें अवैध खनन को रौंकने की मांग करने वाले हरिद्वार के महान संत स्वामी निगमानन्द की आमरण अनषन की सरकार ने इतनी षर्मनाक उपेक्षा की कि उनका देहान्त ही हो गया। उनकी षहादत के बाद भी न तो भाजपा के मुख्यमंत्री निषंक को षर्म आयी व नहीं संघ व भाजपा के अध्यक्ष गडकरी को ही षर्म आयी। अगर समय पर प्रदेष सरकार जागती तो स्वामी निगमानन्द का जीवन बचाया जा सकता था। हरिद्वार में गंगा की पावनता को अक्षुण्ण खने व इसमें अवैध खनन को रोकने की मांग को लेकर अनिष्चित कालीन अनषनकारी संत स्वामी निगमानन्द की 13 जून को सोमवार को दर्दनाक मौत हो जाने से भारतीय हुक्मरानों प देष की जनता के माथे पर एक षर्मनाक कलंक लग गया है। इस देष की सरकारें आजादी हासिल करने के मात्र 64 साल में ही इतनी संवेदनहीन हो गयी हैं कि वे जनहित के मुद्दे पर सरकार का ध्यान आकृश्ठ करने वाले की इस कदर उपेक्षा करे की वह दम तोड़ने के लिए विवष हो जाये। इस प्रकरण से भाजपा जनता पार्टी के षासन पर भी कांग्रेस की तरह संवेदनहीनता का कलंक लग गया। गौरतलब है कि इसी पखवाड़े इन महान संत के स्वास्थ्य की कुषल क्षेम पूछने के लिए उमा भारती भी स्वयं देहरादून के उसी हिमालय अस्पताल गयी जहां अनषनकारी स्वामी रामदेव को भी स्वास्थ्य लाभ के लिए भर्ती किया गया।
प्रदेश सरकार की संवेदनहीनता का सबसे निकृष्ठ रूप यह दिखा की वह बाबा रामदेव के चंद दिनों के आमरण अनशन पर जहां समर्पित दिखी वहीं गंेगा भक्त निगमानन्द के लम्बे आमरण अनशन की उसने इस कदर शर्मनाक उपेक्षा की कि बाबा को अपनी शहादत देने के लिए मजबूर होना पड़ा। महान गंगा भक्त निगमानन्द की शहादत से आज पूरे देश के सभ्य समाज को हिला कर रख दिया है कि हमारी सरकारें चाहे किसी भी दल की हो उसमें जरा भी न तो देश व नहीं प्रदेश के हितों के प्रति जरा सी भी संवेदनशीलता रह गयी है। भारतीय संस्कृति की प्राण समझी जाने वाली गंगा की पावनता के लिए अपनी शहादत देने वाले महान संत निगमानन्द अमर होगये वहीं भाजपा शासन में देवभूमि समझी जाने वाली उत्तराखण्ड प्रदेश में निशंक जैसे संवेदनहीन मुख्यमंत्री में अगर जरा सा भी जमीर होता तो वे तत्काल उसी तरह से इस्तीफा देते जिस प्रकार से देश के लोकप्रिय प्रधानमंत्री रहे लाल बहादूर शास्त्री ने अपने रेलमंत्री के कार्यकाल में रेल दुर्घटना पर इस्तीफा दिया था परन्तु ऐसी नेतिकता की आशा न तो देश को भाजपा के मुख्यमंत्री निशंक से है व नहीं भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष गडकरी से ही है।

Friday, June 10, 2011

गुरू तेगबहादुर की षहादत धिक्कार रही है भारतीय हुक्मरानों को

गुरू तेगबहादुर की षहादत धिक्कार रही है भारतीय हुक्मरानों को
‘महान गुरू तेगबहादुर जी व उनके प्रिय षिश्यों भाई मतिदास आदि ने जो अपनी षहादत, अत्याचारी मुगल षासक से कष्मीरी पण्डितों की रक्षा करने के लिए षताब्दियों पहले दी थी उस षहादत का सम्मान आज कई षताब्दियां बीत जाने के बाद भी न तो भारतीय हुक्मरान ही रख पाये व नहीं हम सवा अरब भारतीय । इससे षर्मनाक बात भारतीयों के लिए दूसरी क्या हो सकती है कि आज भी उन्हीं कष्मीरी पण्डितों के वंषज आजादी के 64 साल बाद भी आतंकियों के अत्याचारों से अपने घर बार छोड़ कर कष्मीर छोड़ कर इधर उधर यायावरी जीवन जीने के लिए अभिषापित है।’ यह विचार मेरे मन में उस समय आये जब मैं आज षुक्रवार 10 जून 2011 को दोपहर सवा बारह बजे सीस गंज गुरूद्वारे के समीप गया। वहां पर महान गुरू तेगबहादुर की पावन स्मृति को षतः षतः नमन् करते हुए मेरी नजर गुरूद्वारे के समीप गोल चक्कर पर बने र्भाइ मति दास चैक पर लगे षिलापट पर गयी जो गुरू तेजबहादुर के परम षिश्य भाई मतिदास एवं साथियों की अमर षहादत की पावन गाथा का वर्णन लिखा हुआ है। मै उस षिलापट पर गया और महान गुरू षिश्यों के लिए षतः षतः नमन् किया।
आज भले ही देष के षासक के रूप में महान बलिदानी गुरू गोविन्द सिंह द्वारा स्थापित सिख धर्म को मानने वाले डा मनमोहन सिंह देष के प्रधानमंत्री की कुर्सी पर आठ सालों से विराज रहे हैं परन्तु क्या मजाल हे कि उनके कानों में लाखों की संख्या में आततायी आतंकियों के अत्याचारों से कष्मीर से बेधर हो कर यायावरी जीवन जी रहे कष्मीरियों की करूण पुकार सुनाई दे रही है। मनमोहन सिंह भले ही अपने आप को सिख मानते हों परन्तु उनको इस बात का भान होगा कि अपने दर पर अत्याचारी मुगलिया षासक के अत्चाचारों से त्रस्त कष्मीरी पण्डितों की करूण पुकार को सुनते ही उन्होंने अपने महान प्रतापी पिता गुरू तेगबहादुर से पीड़ित कष्मीरियों के हितों की रक्षा के लिए आगे आने के लिए पुरजोर आग्रह किया। अपने पूरे वंष को कुर्वान करके मानवता की रक्षा करने वाले महान गुरू गोविन्द सिंह जी द्वारा स्थापित सिख पंथ के गौरवषाली इतिहास को देख कर जहां पूरा विष्व नतमस्तक होता है वहीं आज उसी सिख पंथ से सम्बंध रखने वाले देष के वर्तमान प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की सत्ता लोलुपता को देख कर षर्मसार हैं। सिख धर्म के इतिहास में महाराजा रणजीत सिंह से बडे विषाल देष के षासक होने के बाबजूद मनमोहन सिंह के षासन में जनता जहां बेलगाम मंहगाई, भ्रश्टाचार व आतंकबाद से देष की आम जनता का जीना दूष्वार है। देष की जनता चारों तरफ त्राहीत्राही कर रही है परन्तु क्या मजाल है कि धृतराश्ट्र की तरह सत्तांध मनमोहन सिंह की मृतप्राय आत्मा जरा सा भी जागृत हो। उनको इस बात का भी भान नहीं है कि महान गुरू तेग बहादूर जी व भाई मतिदास ने तो चंद फरियादियों के कारण कल्पनातीत बलिदान दिया। मानवता की रक्षा करने के लिए घोर अमानवीय यातनायें हंसते हंसते सहते हुए भी अपना जीवन बलिदान दे दिया। परन्तु मनमोहन सिंह की आंखों के आगे कष्मीर ही नहीं पूरा भारत त्राही-त्राही कर रहा है परन्तु क्या मजाल है भारत के इस नये नीरों की आत्मा में जरा सी भी संवेदना जागृत होकर इनको अपने दायित्व का बोध भी कराये।
यह केवल मनमोहन सिंह की बात नहीं अपितु इसके लिए आजादी के बाद के देष के सभी हुक्मरान जिम्मेदार है। कांग्रेस पर तो किसी को विष्वास भी नहीं रहा परन्तु ‘जहां बलिदान हुए मुखर्जी वह कष्मीर हमारा है’ व ’कष्मीर से धारा 370 को समाप्त करो तथा समान नागरिक संहिता को लागू करने के लिए ‘एक देष में दो निषान व दो विधान नहीं चलेगा ’के नारे लगा कर सत्तासीन हुए भारतीय संस्कृति के स्वयंभू ध्वजवाहक संघ पोशित भाजपा के महानायक अटल व आडवाणी के केन्द्रीय षासक बनने पर कांग्रेसियों से बदतर देषहित पर मूक रहने व तमाम वादों को भूल जाने को देख कर भारतीय जनमानस अपने आप को ठगा महसूस कर रहा है। जनता भाजपा के नायकों द्वारा कांग्रेसियों से बदतर विष्वासघात किये जाने से अभी तक हस्तप्रद है। आज सीसगंज गुरूद्वारे व भाई मतिदास चैक के पास जा कर मेरी आत्मा ने मुझे जो धिक्कारा उससे में पूरी तरह से व्यथित हॅू। मैं अपने महान गुरू तेगबहादुर जी व भाई मतिदास तथा अन्य गुरू भाईयों की षहादत को नमन् करते हुए जो टिस मेरे मन में लगी। मुझे लगा कि आज गुरू तेगबहादुर व भाई मतिदास सहित अन्य षहीदों की दिव्य आत्मा हम सब सवा करोड़ भारतीयों व यहां के तमाम हुक्मरानों को कष्मीर समस्या के समाधान न करने के लिए धिक्कार रही है। काष आजादी के इन 64 सालों में एक भी ऐसा प्रधानमंत्री होता जो महानगुरू के इस अमर बलिदान को नमन् करते हुए कष्मीर समस्या का समाधान करता।

Wednesday, June 8, 2011

लोकशाही का गला घोंट कर की कांग्रेस ने आत्महत्या

-लोकशाही का गला घोंट कर की कांग्रेस ने आत्महत्या
-रामदेव संिहत अनशनकारियों व राष्ट्रीय धरनास्थल जंतर मंतर पर पुलिसिया दमन से रौंदने का कुकृत्य से शर्मसार हुई लोकशाही/
आज भले ही प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह व कांग्रेसी सिपाहेसलार बाबा रामदेव व उनके पचास हजार से अधिक देश के हित के लिए अनशन कर रहे शांतिपूर्ण आंदोलनकारियों को बर्बर पुलिसिया दमन के दम पर खदेड़ने वाले लोकशाही के गला घोंटने वाले कृत्य को जायज ठहराने के लिए कुतर्क पर कुतर्क गढ़ रहे हों परन्तु देश का आम आदमी के गले उनके ये तमाम तर्क किसी भी सूरत में नहीं उतर रहे है। देश की जनता एक ही सवाल कर रही है कि जो सरकार देश द्रोहियों को दिल्ली में देश के खिलाफ विष वमन करते हुए भी नपुंसकों की तरह मूक रहती हो, जो सरकारें भारतीय संसद पर हमला करने के दोषी फांसी पाये हुए आतंकी को फांसी पर लटकाने की हिम्मत नहीं कर पा रही हो, वो सरकार देश के हित में भ्रष्टाचारियों द्वारा विदेशों में जमा अकूत भारतीय धन को वापस लेने की मांग करने वाले सत्याग्रहियों को पुलिसिया दमन क्यों किया गया। वह भी खासकर सोते हुए लोगों पर। बच्चे बुढ़े, महिलाओं पर। भारतीय भाषाओं के लिए देश में ऐतिहासिक आंदोलन करने वाले राजकरण सिंह का कहना है कि हिंसक जंगली जानवर भी कभी सोते हुए प्राणी पर हमला नहीं करता है।
मेरा भी साफ मानना है कि सरकार ने जलियावाले बाग से बदतर काण्ड करके अपनी जड़ों में जहां मट्ठा डाला वहीं जनता की नजरों में पूरी तरह से जमीदोज हो चूके भाजपा को फिर प्राण वायु दी। जलियावाले बाग में तो फिरंगियों ने अपनी सत्ता को चुनौती देने वालों को रौंदा। परन्तु यह तो यहां की सरकार ने अपने देश की मजबूती के लिए कार्य कर रहे शांतिपूर्ण आंदोलनकारियों को रौंदा।
4 जून को मैं भी दोपहर को यहां बाबा रामदेव के अनशन स्थल पर उनकी राष्ट्रवादी मांगों का समर्थन करने वहां अपने भाषा आंदोलन के साथी राजकरण सिंह के साथ दोपहर 12 बजे वहां गया। वहां पर एक घंटा रहने के बाद मैं व राजकरण सिंह राष्ट्रीय धरना स्थल जंतर मंतर पर पंहुचे। क्योंकि ऐसी घोषणा की गयी थी कि बाबा रामदेव 2 बजे के करीब जंतर मंतर आयेंगे। शायद ज्ञापन देने के लिए। जंतर मंतर पंहुच कर हमने देखा कि सरकार ने चारों तरफ से पुलिस के जवानों से इस स्थल को घेर दिया था। इससे साफ लग रहा था कि बाबा किसी भी कीमत पर वहां पर न जा सके।
इसके बाद मैं जंतर मंतर का अध्ययन बारीकी से किया। यहां पर देश के विभिन्न भागों से लोग न्याय की गुहार करने यहां आये थे। यहां पर वे लोग आते हैं जो देश में अपनी प्रदेश सरकारों से भी न्याय नहीं मिलता है। जिनको कोर्ट कचहरी के द्वार भी बंद लगते है। ऐसे सताये हुए लोग जो भारतीय लोकशाही को मजबूत करते हैं वे यहां पर धरने पर थे। इनमें नोयडा में मायावती सरकार के जुल्मों के सताये गये किसान, दिल्ली में पुलिसिया दमन के सताये लोग, राजीव गांधी के हत्यारों को सजा देने की मांग को लेकर चल रहे आंदोलन। इसके साथ ही यहां पर भ्रष्टाचार के खिलाफ अपने वर्षो से चलाये जा रहे जूता मार आंदोलन के प्रणेता सूर्यवंशी, इसके अलावा कई आंदोलन के संगठन यहां पर आंदोलन रत थें। परन्तु सरकार ने बाबा रामदेव को आर एस एस का मुखोटा बता कर अपनी खाज उन निरापराध लोगों पर उतारा जो माॅं भारती के सम्मान व कल्याण के लिए हजारों किमी दूर से दिल्ली में में न्याय की आशा से आये थे। देश के हित में आये थे। ऐसे लोगों पर रात में सोते समय हमला किया गया। यह लोकशाही व मानवता के प्रति ऐसा धृर्णित अपराध हे जिसका प्रायश्चित कांग्रेस को हर हाल में करना पड़ेगा।
बाबा रामदेव को आर एस एस का मुखोटा बता कर वहां पर पुलिसिया दमन करने को उचित ठहराने वाले कांग्रेसी मठाधीशों की कार्यवाही से देश की जनता बहुत खिन्न है। कांग्रेसी सरकार बाबा को फिर किसी होटल या वार्ता के नाम पर बुला कर नजरबंद कर सकते थे। हालांकि बाबा को बंद करने की नौबत ही नहीं थी। बाबा तो 4 जून को सरकार द्वारा मांगे माने जाने पर खुश थे वे जाने ही वाले थे कि कबीना मंत्री कपिल सिब्बल ने जो चिट्ठी दिखाई उससे बाबा व उसके समर्थकों का गुस्सा जायज ही था। वास्तव में सरकार तो बाबा को हर हाल में सबक सिखाना ही चाह रही थी। सुत्रों के अनुसार बाबा के इस अनशन स्थल पर पुलिसिया दमन के लिए कुख्यात अधिकारी पहले से यहां पर सादी वर्दी में डेरा डाले हुए थे। यही नहंी कांग्रेसी नेता जिस प्रकार से बाबा रामदेव को ठग बता रहे हैं तो लोग प्रश्न करते हैं अगर बाबा ने कुछ गलत किया तो उन पर सरकार ने पहले कार्यवाही क्यों नहीं की। उन पर कार्यवाही केवल तब ही किया जा रहा है जब उन्होंने विदेशों में जमा भारतीय धन को वापस लाने के लिए जनांदोलन किया। इससे साफ हो गया कि विदेशों में अधिकांश पैसा कांग्रेसी नेताओं या उनके करीबियों का है। नहीं तो इस देशहित की मांग पर नाहक ही डण्डा बरसाने का क्या तुक है।
बाबा रामदेव को संघ का समर्थन यकायक नहीं मिला कई महिनों से मिल रहा था। तब क्यों चार मंत्री बाबा रामदेव को मनाने हवाई अड्डे पर गये। कांग्रेस के तमाम तर्क कहीं दूर-दूर तक तर्क संगत नहीं है। सरकार को चाहिए कि वह अपनी भूल को प्रायश्चित करके तुरंत राष्ट्रीय धरना स्थल पर आपात काल खत्म करे। इससे पहले भी सरकार ने इस स्थल पर जहां पर ही देश में लोकशाही जीवित है उस पर प्रतिबंध लगाया। गुलामी के बदनुमा कलंक के प्रतीक राष्ट्रमण्डल खेलों के समय भी सरकार ने ऐसी ही आत्म घाति कदम उठाये परन्तु तब भी न तो विपक्ष ने अपितु किसी भी मीडिया ने इस पर प्रश्न तक न करके अपना मुखोर्ट भी बेनकाब कर दिये। ऐसे में बाबा रामदेव को आर एस एस का ऐजेन्ट कह देने से जनता उनको गुनाह गार नहीं मानती। परन्तु बाबा रामदेव को भी समझमें आ ही गया होगा कि सरकार से लड़ाई उतनी सहज नहीं है जितना वे समझ रहे थे। उनको निशंक व तिवारी जैसे नेताओं से निरंतर दूरी बनायी रखनी होगी। अपने हर कार्य को पारदर्शिता के साथ आंदोलन में अपने आप को बचाने के लिए नहीं अपितु उस जनता को जो उन पर विश्वास करके वहां पर आयी थी उनकी ढाल बनने का काम करना चाहिए। अपने संगठन को किसी के समर्थन की बेशाखियों के बजाय ऐसे जांबाज व सदचरित्र लोगों की पूरे भारत में ऐसा जांबाजी संगठन बनाये जो ऐसे दमनकारी तत्वों से बचने में सक्षम हो। देश की जनता जानना चाहती है कि मनमोहन सिंह जो पुलिसिया दमन करने का इतना ही शोक था तो वे क्यों जमाखोरों व देश को मंहगाई की गर्त में धकेलने वाले भ्रष्टाचारियों व आतंकी पर ऐसा करे।
परन्तु उन पर कार्यवाही करने की हिम्मत तो प्रधानमंत्री व उनकी सरकार ने दिखाई नहीं हाॅं देश की महानायिका रही इंदिरा गांध्ंाी जिनके देश हित के कार्यो के कारण कांग्रेस सत्तासीन है उनको गुनाहगार बताने का काम उनकी कांग्रेस ने किया तो इंदिरा के नाम की दुहाई लेने वाले कांग्रेसियों को सांप सुंघ गया। किसी मंत्री से लेकर संगठन के नेता में इतनी हिम्मत भी नहीं रही कि वे अपने पद से इस काण्ड के विरोध में इस्तीफा दें।
शेष श्री कृष्ण कृपा। हरि ओम तत्सत्। श्रीकृष्णाय नमो।

Sunday, June 5, 2011

केन्द्र से कांग्रेस, उत्तराखण्ड से निशंक व उ.प्र से माया सरकार का होगा सफाया

केन्द्र से कांग्रेस, उत्तराखण्ड से निशंक व उ.प्र से माया सरकार का होगा सफाया/
जनविरोधी भाजपा-कांग्रेस व बसपा पर महाकाल की काली छाया/
जा को प्रभु दारूण-दुख देऊं, ताकी मति पहले हर लेहूॅ

त्रिकालदर्शी महाकवि तुलसीदास की उपरोक्त पंक्तियां जनता से पूरी तरह से कट गये भाजपा व कांग्रेस के पदलोलुप नेताओं पर शतः प्रतिशत सटीक बैठती है। काल के पदचाप से जो संदेश साफ सुनाई दे रहा है कि आगामी चुनावों में जहां भारत की महान जनता मनमोहन सिंह की सरकार को हटा कर कांग्रेस के सत्तांधों को करारा सबक सिखायेगी। वहीं विश्व संस्कृति की पावन गंगोत्री उत्तराखण्ड प्रदेश में आसीन भाजपा की भ्रष्टतम निशंक सरकार को 2012 में होने वाले विधानसभा चुनाव में हटा कर दिल्ली में भ्रष्टाचारी कुशासक को शर्मनाक संरक्षण दे रहे आसीन संघ भाजपा के धृतराष्टों को सबक सिखायेगी। इसके साथ ही दलित, गरीब, उपेक्षित समाज के हितों की दुहाई देकर सत्तांध बनी बसपा सरकार की मुखिया की दमनकारी व तानाशाही को भी प्रदेश की जनता विधानसभा चुनाव में पदच्युत करेगी। जिस प्रकार से बसपा नेत्री जनहितों को अमानवीय पुलिसिया दमन से रौंद रही है, उसको देख कर महाकाल कभी उसे मनमोहन सिंह व निशंक की तरह ही माफ नहीं करेगा।
कांग्रेस पर महाकाल की वक्रदृष्टि का स्पष्ट संकेत यह देख कर सहज ही महसूस किया जा सकता है कि देश को अपने कुशासन से भ्रष्टाचार, मंहगाई व आतंक पर जरा सी भी ईमानदारी से अंकुश लगाने के प्रथम दायित्व का निर्वाहन न करने से देश की आम जनता का जीना दुश्वार कर ने वाली सप्रंग सरकार का प्रमुख दल कांग्रेस ने अपने पतन का ठीकरा देश व कांग्रेस की महान जननेत्री श्रीमती इंदिरा गांधी के सर फोडने का आत्मघाति कार्य किया। मेरे इस लेख को लिखे दो दिन भी नहीं हुए थे कि महाकाल ने कांग्रेस के सत्तांधों की ऐसी मति हर ली कि उन्होंने दिल्ली के रामलीला मैदान में भ्रष्टाचारियों द्वारा विदेशों में बैंकों में जमा की गयी अकूत धन को भारत में लाने की मांग को लेकर आंदोलनरत विश्व विख्यात योग गुरू बाबा रामदेव व उनके हजारों अनुयायियों पर 4 जून की रात 2 बजे (5 जून)को मनमोहन सिंह सरकार की अत्याचारी पुलिस ने आंसूगैस के गोलों व लाठियों के प्रहार कर उस समय हमला किया जब वे गहरी नींद में सोये हुए थे। इस शांतिपूर्ण देश हित के जनांदोलन में सम्मलित सोते हुए अनशनकारी बुजुर्ग, साधु-संतों, महिलाओं व बच्चों पर पुलिस ने अमानवीय दमनकारी कार्यवाही किया उसने मनमोहन सिंह के कुशासन से पतन के गर्त में डुब रही कांग्रेसी सरकार के लिए ताबूत की कील ही साबित हो रही है। ऐसा िनकृष्ठ दमन दुनिया के इतिहास में किसी भी चंगैज, औरंजेब, बाबर व फिरंगी अत्याचारी तानाशाहों ने भी नहीं किया। मनमोहन सिंह सरकार की इस कुकृत्यों से विश्व जनमत के आगे विश्व की सबसे बड़ी लोकशाही व प्राचीन संस्कृति के ध्वजवाहक भारत का सर शर्म से झुका दिया। भले ही कांग्रेसी रणनीतिकारों ने बाबा रामदेव से मिल कर गोल मोल समझोता कर ही दिया था। इसका ऐलान भी रामदेव के मंच व सरकार के मंत्री कपिल सिब्बल दोनों ने प्रेस वार्ता में कर ही दिया था। परन्तु महाकाल को इनदोनों की चालाकी मंजूर नहीं थी। होनी को निश्चित करने के लिए दोनों की मति पर ऐसा पर्दा एक चिटिठी ने ऐसो गुल खिलाया की सब उलटा पुलटा हो गया। ऐसे ही मतिभ्रम के आगोश में कांग्रेसी सत्तांधों ने लाठी चार्ज करा कर एक प्रकार से अपने ताबुत पर खुद ही कील ठोक दी। बाबा रामदेव को भी महाकाल के पदचाप को समझना चाहिए, उनको निशंक सरकार के भ्रष्टाचारों व कांग्रेसी नेता तिवारी के कृत्यों को जानकर भी अपने हमदर्द बनने के नाटक को समझना चाहिए। दोनों के साथ खडे हो कर बाबा रामदेव ने अपनी कमजोरी ही जाहिर की। बाबा को समझना चाहिए कि सत्य का साथ छोड़ने पर आदमी की स्थिति कैसी असहाय सी हो जाती है यह बाबा ने स्वयं पुलिसिया दमन के बाद बाबा को खुद ही समझ में आ गया होगा। जो महाकाल किसी को महाकाय भी बना सकता है वह पल में जमीदोज भी कर सकता है। आदमी केवल महाकाल के हाथों का एक खिलोना मात्र है।
जिस प्रकार से कांग्रेस के नेताओं ने मनमोहन सिंह जैसे आत्मघाति राजनेता को प्रधानमंत्री के पद पर बनाये रखा है वह देश व कांग्रेस के लिए ही घातक साबित हो रहा है। मनमोहन सिंह की सरकार भारतीय हितों के बजाय अमेरिका के हितों को भारत में मजबूत करती रही। वहीं मन मोहन की तरह ही कांग्रेस पार्टी ने सरकार में आस्कर फर्नाडिस जैसे जन नेताओं की बजाय जनार्जन द्विवेदी, अहमद पटेल व आनन्द शर्मा जैसे लोगों को आगे कर रखा है। इस कारण आज कांग्रेस जनता से ही नहीं अपने कार्यकत्र्ताओं से भी दूर हो गयी है। मनमोहन सरकार की सत्तालोलुपता कितनी है कि बाबा रामदेव के आमरण अनशन से सत्ताच्युत होने की आशंका से इतने भयाक्रांत हो गये कि मनमोहन सिंह सरकार के चार चार मंत्री बाबा रामदेव से अनशन न करने की गुहार लगाने हवाई अड्डे पर ही पंहुच गये। अगर यह सरकार मंहगाई व जनहितों के लिए इतनी तत्पर रहती तो आज देश को इतने दुर्दिन नहीं देखने पड़ते।
वहीं भाजपा के आला नेतृत्व का पतन की नींव उसी दिन पड़ी जब भाजपा के नेताओं ने ‘भगवान राम मंदिर बनाने को अपने ऐजेन्डे में न होने की बात कही, कारगिल, कंधार व संसद प्रकरण पर शर्मनाक हथकण्डे अपनाया, ताबूत प्रकरण, नवरत्नों को कोड़ी के भाव बेचना व इंडिया इज साइनिंग नाउ के बेमोसमी गीत गाने के कृत्य किये। भाजपा ने जनता से जुड़े उमा भारती, गोविन्दाचार्य, मदनलाल खुराना आदि नेताओं को दरकिनारे करते हुए सुषमा व जेटली जेसे बंद कमरों की राजनीति करने वालों को अपनी कमान सोंपी। सुशासन देने का दम भरने वाले देवभूमि उत्तराखण्ड में सत्तासीन होते ही घोर जातिवादी व भ्रष्टाचारियों के संरक्षक बन कर ऐसे बेनकाब हुए कि जिस देख कर उत्तराखण्ड की जनता भाजपा नेतृत्व को धिक्कार रही है। परन्तु क्या मजाल भाजपा व संघ नेतृत्व का मोह धृतराष्ट्र की तरह उत्तराखण्ड व कर्नाटक के सत्तांधों से हो रहा है। आज जिस प्रकार से भाजपा में कर्नाटक के रेड़डी बंधुओं के संरक्षण देने के मामले में सुषमा व जेटली में मै नहीं-मैं नहीं का द्वंद चला हुआ है तथा वहीं दूसरी तरफ उत्तराखण्ड में आसीन भाजपा की निशंक सरकार के भ्रष्टाचार के प्रकरणों की वाद उच्च न्यायालय से सर्वोच्च न्यायालय में गूंज रहे हों परन्तु भाजपा के तथाकथित भावी प्रधानमंत्री ही नहीं जिस प्रकार से संघ द्वारा भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष के पद पर आसीन किये गये गडकरी कर रहे हैं, उसके बाद साफ हो गया कि भाजपा भी कांग्रेस की ही कार्बन कापी है व उसका भ्रष्टाचार का विरोध करने की बात हाथी के दांत की तरह छदम ही है। आज इन दोनों दलों में इतनी ताकत भी नहीं रही कि दोनों मिल कर बाबा राम देव की तरह हुंकार भर कर आम जनता तो रही दूर अपने तथाकथित पूरे कार्यकत्र्ताओं को ही सड़को ंपर उतार सके। दोनों दलो सहित तमाम राजनैतिक दल आज देश की जनता के विश्वास पर पूरी तरह से बेनकाब हो चूके है। लगता है इनकी जनविरोधी कृत्यों को चुकता करने के लिए ही महाकाल ने इनके नेतृत्व की मनोशक्ति को उलटी पुलटी कर दी है। इसी कारण ये ऐसे कृत्य महाकाल के पाश में फंस कर कर रहे हैं। लोकसभा चुनाव में भी जनसेवा व राजनीति को भी व्यापार समझ कर जनता को मूर्ख समझने वाली भाजपा की आशाओं पर बज्रपात ही होगा। विश्व के चमत्कारी व रहस्यमय शक्तियों के स्वामी काला बाबा की बात मुझे अक्षरशः कदम कदम पर सच ही साबित होती दिखाई दे रही है कि देवी..काल कभी किसी को डण्डा उठा कर मारने नहीं आता है वह कारण बनाता है। काला बाबा की इसी परमशक्ति व भगवान श्री कृष्ण की परमकृपा से मैं भविष्य की गर्भ में छुपे हुए इस सच को जनहित के लिए उजागर इसलिए कर रहा हॅू कि ये सत्तांधों को इस सच्चाई का अहसास हो सके कि महाकाल के हाथों में वे केवल कठपुतली से अधिक कुछ नहीं है। इसलिए अहंकारी, अत्याचारी व सत्तांधों का पतन निश्चित है।

स्वयं भगवान श्री कृष्ण करेंगे बाबा रामदेव की रक्षा

बाबा रामदेव की रक्षा करेंगे भगवान श्री कृष्ण
अन्याय के खिलाफ जो कोई भी अत्याचारी सत्तांधों के खिलाफ कुरूक्षेत्र के मैदान में बाबा रामदेव की तरह उतर कर संघर्ष का शंखनाद करता है, उस सत्य व न्याय के जांबाज नायक की रक्षा स्वयं भगवान श्री कृष्ण करते हैं और दुष्टों को संहार करने वाला मेरा सुदर्शन ऐसे सत्तांधों से कुरूक्षेत्र के मैदान में ही फतह कराता है।

पुलिस ने अपराधियों व जानवरों जैसा व्यवहार किया :बाबा रामदेव

पुलिस ने अपराधियों व जानवरों जैसा व्यवहार किया :बाबा रामदेव
रामलीला मैंदान में हुई पुलिसिया दमन कार्यवाही की रौंगटे खडा करने वाला बर्बर अत्याचार बताते हुए बाबा ने ऐलान किया कि वे अपना अनशन जारी रखेंगे। उन्होंने सरकार पर विश्वासघात करने का आरोप लगाते हुए ऐलान किया कि सरकार किसी भी हालत में विदेशी बैंकों में जमा भ्रष्ट लोगों का धन वापस नहीं लाना चाहती है। दिल्ली मे उनके नेतृत्व में आमरण अनशन कर रहे आंदोलनकारियों पर हुए ढ़ग से बर्बर अत्याचार पर अपनी प्रथम टिप्पणी अपने हरिद्वार स्थित पातंजलि आश्रम में 5 जून रविवार को दोपहर आयोजित प्रेस कांफ्रंेस में बाबा रामदेव ने कहा है कि पुलिस ने उनके साथ भी अपराधियों व जानवरों जेसा सलूक किया गया। उन्होंने कहा कि उनकी हत्या की साजिश की गई थी। उन्होने साफ शब्दों में कहा कि अगर उनकी हत्या होती है तो उसके लिए सोनिया गांधी व कांग्रेस जिम्मेदार होगी। उन्होने कहा कि इसके विरोध में पूरे देश में काला दिवस मनायें जायेंगे। बाबा रामदेव ने साफ शब्दों में कहा कि वे आखिरी सांसों तक अपने आंदोलन को जारी रखूंगा।

Friday, June 3, 2011

पतंजलि के संत रामदेव तुने कर दिया कमाल

पतंजलि के संत रामदेव तुने कर दिया कमाल
फिरंगी भाषा से भारत को आजादी दिलायी रामदेव ने

भले ही 4 जून की रात को मध्य रात्रि में भूखे प्यासे सो रहे हजारों देशभक्तों को अपनी पुलिसिया दमन से खदेड़ कर चैन की सांस ले रही हो परन्तु मनमोहन सिंह सरकार के इस पुलिसिये दमन ने कांग्रेस को देश की आम जनता की नजरों में पूरी तरह से गिरा दिया। परन्तु इसके बाबजूद सरकार के साथ जो समझोता बाबा रामदेव व सरकार के बीच में हुआ था उससे देश की लोकशाही एक प्रकार से मजबूत ही हुई थी। उसी महत्वपूर्ण उपलब्धी को देख कर मैने यहां पर यह लेख लिखा था। इस पावन भावना पर जो देश की लोकशाही को मजबूत व राष्ट्र के विश्व गुरू के रूप में फिर से स्थापित करने में सफल होने वाले महत्वपूर्ण कदम
जहां फिरंगी हुक्मरानों से देश को आजादी महात्मा गांधी के नेतृत्व में भारतीय जनमानस ने हासिल की। वहीं आज दूसरी आजादी ( फिरंगी भाषा अंग्रजी की दासता से भारतीय जनमानस को) बाबा रामदेव ने भी हासिल एक प्रकार से कर ही ली है। वहीं अमेरिका सहित पूरा विश्व जनसमुदाय यह देख कर हैरान है कि जहां लीबिया, अरब देशों सहित अनैकों जगह हो रहे हिंसक जनसंघर्ष के बजाय भारत में एक पातंजलि के संत की अगुवायी में शस्त्र व बिना तोड़ फोड व हिंसा के मात्र तपोबल व जनबल के बल कर पूरी सरकार को अपनी चरणों में दण्डवत झुका रहा है। सवाल यह है कि अब सरकार की अग्नि परीक्षा है कि वह बाबा रामदेव के साथ हुई वार्ता में स्वीकार की गयी बातों को देश में लागू करते हैं या फिरंगी गुलामी का बदनुमा दाग देश के माथे पर लगा कर देशद्रोश करेंगे। सवाल बाबा के कारनामों का नहीं सवाल यह है कि बाबा अगर गुनाहगार है तो अब तक सरकार ने उन्हें क्यों छोडा था।
अब तो साफ लगता है कि सरकार उनको भ्रष्टाचार व विदेशों में जमें काला धन को वापस लाने से की मांग करने का सबक सिखाना चाहती है। सरकार की इसी कार्यवाही से वह पूरी देश की जनता की नजरों में पूरी तरह से गिर चूकी है।
दे दी हमें आजादी बिना खटक बिना ढाल,
साबरमती के संत तुने कर दिया कमाल।
मुझ जैसे आजादी के बाद इस देह में अवतरित हुए आम भारतीयों को उपरोक्त गीत को गाने पर विश्वास ही नहीं होता था कि कभी गांधी जी ने सचमुच आजादी हासिल करने के लिए आम भारतीय जनमानस को इतना उद्देलित किया हो। परन्तु अब भ्रष्टाचार को मिटाने व विदेशों में जमा हुए काला धन को देश में वापस लाने की मांग को लेकर 4 जून से दिल्ली के रामलीला मैदान आमरण अनशन करने की भीष्म प्रतिज्ञा से ही जहां पूरा देश ही आंदोलित व उद्देलित हुई है। देश के लाखों लोग पूरे देश के कोने कोने से बाबा रामदेव के आंदोलन में भागीदारी निभाने के लिए जिस प्रकार से उमड़ रहे हैं उससे भयभीत हो कर देश की सरकार जिस प्रकार सहमी हुई हैं और उनकी अधिकांश मांगों को मानने के लिए तैयार है। इस अचंम्भित करने वाले ऐतिहासिक संघर्ष व अकल्पनीय जन शैलाब को गांधी के समान ही भारतीय संस्कृति के लिए अपना जीवन समर्पित करने वाले चंद वस्त्र पहनने वाले बाबा रामदेव के आवाहान पर भारत को भ्रष्टाचार के कुशासन से पतन के गर्त में धकेलने वाले हुक्मरानों को अपनी मांगों को स्वीकार करने के लिए मजबूर करते देख कर ‘ साबरमती के संत के तर्ज पर ही पतंजलि के संत रामदेव जी तुमने कर दिया कमाल’ का गान स्वयं स्फूर्त ही मानस पटल पर छाने लगा। आज इस घटना से सदियों से भारतीय जनमानस में अमिट विश्वास की भांति भगवान श्री कृष्ण के अमर वचन ‘संभवामि युगे-युगे’ को साकार होते देख कर भगवान श्रीकृष्ण को शतः शतः नमन् करता हॅू।

Thursday, June 2, 2011

-दिल्ली में राजनैतिक प्रतिनिधित्व हासिल करने के लिए संसद में उत्तराखण्डियों ने कसी कमर

-दिल्ली में राजनैतिक प्रतिनिधित्व हासिल करने के लिए संसद में उत्तराखण्डियों ने कसी कमर/
-उत्तराखण्डी समाज की तीन महत्वपूर्ण घटनायें, नरेन्द्र नेगी का भ्रष्टाचार विरोधी गीत, राष्ट्रपति के समक्ष गुंजा निशंक का भ्रष्टाचार, संसद में महत्वपूर्ण बैठक/
आज 2 जून के हितों की रक्षा के लिए तीन महत्वपूर्ण कार्यो का शंखनाद हुआ। एक उत्तराखण्ड के महान गायक नरेन्द्रसिंह नेगी ने तिवारी के कुशासन से मुक्ति दिलाने के लिए बनाये गये अपने ‘नौछमी नारैण्ण’ गीत के बाद अब भ्रष्टाचारियों के शिकंजे में बुरी तरह से जकड़े उत्तराखण्ड की रक्षा के लिए ‘अब कथ्गा जी खेचुलू रे’ को उत्तराखण्ड की जनता के लिए जारी किया। उत्तराखण्ड की जनता को आशा है कि नौछमी नारैण की तरह ही इस गीत का प्रभाव उत्तराखण्ड की जनता में ठीक वेसे ही पड़ेगा जैसे तिवारी के कुशासन को उखाड़ फैंकने में पड़ा था।
वहीं दूसरे महत्वपूर्ण कदम के तहत कांग्रेस पार्टी ने उत्तराखण्ड प्रदेश में आसीन भाजपा की निशंक सरकार को भ्रष्टाचारियों की सरकार बताते हुए राष्ट्रपति को निशंक सरकार के भ्रष्टाचार का कच्चा चिट्ठा प्रस्तुत किया। कांग्रेस के राज्य प्रभारी चैधरी वीरेन्द्र सिंह के नेतृत्व में पांचों सांसदों, विधायकों ने राष्ट्रपति के समक्ष निशंक सरकार के कारनामों को प्रस्तुत किया। इस घटना के बाद निशंक के भ्रष्टाचार के खिलाफ मूक सा दिखने वाली कांग्रेस अब आक्रमक नजर आयेगी, इसके बाद लगता है कांग्रेस अब निशंक सरकार को उनके कारनामों को जनता के समक्ष रखते हुए निशंक सरकार को एक पल के लिए चैन की सांस भी नहीं लेने देगी।
इसके अलावा एक महत्वपूर्ण घटनाक्रम में 2 जून को बृहस्पतिवार के दिन दिल्ली में रहने वाले 25 लाख से अधिक उत्तराखण्डी समाज को दिल्ली प्रदेश कांग्रेस व सरकार में उचित प्रतिनिधित्व देने के लिए संसद में एक महत्वपूर्ण बैठक हुई। उत्तराखण्ड कांग्रेस के अग्रणी नेता हरिपाल नेतृत्व की अध्यक्षता में आयोजित इस सम्मेलन में दिल्ली प्रदेश कांग्रेस पार्टी के अध्यक्ष सांसद जय प्रकाश अग्रवाल ने कहा कि वह उत्तराखण्डी समाज को हर संभव उचित प्रतिनिधित्व देने की कोशिश करेंगे। सभा में प्रथम वक्ता के रूप में बोलते हुए प्यारा उत्तराखण्ड के सम्पादक देवसिंह रावत ने कहा कि लोकशाही में थोपशाही चलाने वाले या समाज के एक तबके की उपेक्षा करने वाले लोकशाही के दुश्मन होते है। समाज के समग्र विकास के लिए प्रतिभावान व हर समाज को विकास का सम्मुचित अवसर देना चाहिए। संसद में आयोजित इस सम्मेलन में बड़ी संख्या में उत्तराखण्डी समाज के प्रबुध जनों व कांग्रेस के समर्पित कार्यकत्र्ताओं ने भी भाग लिया। इन तीनों घटनाओं का सीधा सम्बंध उत्तराखण्डी समाज के हितों से जुड़ा हुआ है। गौरतलब है कि दिल्ली प्रदेश कांग्रेस में ही नहीं प्रदेश सरकार में दिल्ली के 25 लाख उत्तराखण्डी लोगों की घोर उपेक्षा की जाती है। इसको सुधारने के लिए संसद में आयोजित इस बैठक का दूरगामी प्रभाव देखने को निकट भविष्य में मिलेगा।

जनविरोधी भाजपा-कांग्रेस पर महाकाल की काली छाया

जनविरोधी भाजपा-कांग्रेस पर महाकाल की काली छाया/
जा को प्रभु दारूण-दुख देऊं, ताकी मति पहले हर लेहूॅ/

त्रिकालदर्शी महाकवि तुलसीदास की उपरोक्त पंक्तियां जनता से पूरी तरह से कट गये भाजपा व कांग्रेस के पदलोलुप नेताओं पर शतः प्रतिशत सटीक बैठती है। कांग्रेस पर महाकाल की वक्रदृष्टि का स्पष्ट संकेत यह देख कर सहज ही महसूस किया जा सकता है कि देश को अपने कुशासन से भ्रष्टाचार, मंहगाई व आतंक पर जरा सी भी ईमानदारी से अंकुश लगाने के प्रथम दायित्व का निर्वाहन न करने से देश की आम जनता का जीना दुश्वार कर ने वाली सप्रंग सरकार का प्रमुख दल कांग्रेस ने अपने पतन का ठीकरा देश व कांग्रेस की महान जननेत्री श्रीमती इंदिरा गांधी के सर फोडने का आत्मघाति कार्य किया। जिस प्रकार से कांग्रेस के नेताओं ने मनमोहन सिंह जैसे आत्मघाति राजनेता को प्रधानमंत्री के पद पर बनाये रखा है वह देश व कांग्रेस के लिए ही घातक साबित हो रहा है। मनमोहन सिंह की सरकार भारतीय हितों के बजाय अमेरिका के हितों को भारत में मजबूत करती रही। वहीं मन मोहन की तरह ही कांग्रेस पार्टी ने सरकार में आस्कर फर्नाडिस जैसे जन नेताओं की बजाय जनार्जन द्विवेदी, अहमद पटेल व आनन्द शर्मा जैसे लोगों को आगे कर रखा है। इस कारण आज कांग्रेस जनता से ही नहीं अपने कार्यकत्र्ताओं से भी दूर हो गयी है। मनमोहन सरकार की सत्तालोलुपता कितनी है कि बाबा रामदेव के आमरण अनशन से सत्ताच्युत होने की आशंका से इतने भयाक्रांत हो गये कि मनमोहन सिंह सरकार के चार चार मंत्री बाबा रामदेव से अनशन न करने की गुहार लगाने हवाई अड्डे पर ही पंहुच गये। अगर यह सरकार मंहगाई व जनहितों के लिए इतनी तत्पर रहती तो आज देश को इतने दुर्दिन नहीं देखने पड़ते।
वहीं भाजपा के आला नेतृत्व का पतन की नींव उसी दिन पड़ी जब भाजपा के नेताओं ने ‘भगवान राम मंदिर बनाने को अपने ऐजेन्डे में न होने की बात कही, कारगिल, कंधार व संसद प्रकरण पर शर्मनाक हथकण्डे अपनाया, ताबूत प्रकरण, नवरत्नों को कोड़ी के भाव बेचना व इंडिया इज साइनिंग नाउ के बेमोसमी गीत गाने के कृत्य किये। भाजपा ने जनता से जुड़े उमा भारती, गोविन्दाचार्य, मदनलाल खुराना आदि नेताओं को दरकिनारे करते हुए सुषमा व जेटली जेसे बंद कमरों की राजनीति करने वालों को अपनी कमान सोंपी। सुशासन देने का दम भरने वाले देवभूमि उत्तराखण्ड में सत्तासीन होते ही घोर जातिवादी व भ्रष्टाचारियों के संरक्षक बन कर ऐसे बेनकाब हुए कि जिस देख कर उत्तराखण्ड की जनता भाजपा नेतृत्व को धिक्कार रही है। परन्तु क्या मजाल भाजपा व संघ नेतृत्व का मोह धृतराष्ट्र की तरह उत्तराखण्ड व कर्नाटक के सत्तांधों से हो रहा है। आज जिस प्रकार से भाजपा में कर्नाटक के रेड़डी बंधुओं के संरक्षण देने के मामले में सुषमा व जेटली में मै नहीं-मैं नहीं का द्वंद चला हुआ है तथा वहीं दूसरी तरफ उत्तराखण्ड में आसीन भाजपा की निशंक सरकार के भ्रष्टाचार के प्रकरणों की वाद उच्च न्यायालय से सर्वोच्च न्यायालय में गूंज रहे हों परन्तु भाजपा के तथाकथित भावी प्रधानमंत्री ही नहीं जिस प्रकार से संघ द्वारा भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष के पद पर आसीन किये गये गडकरी कर रहे हैं, उसके बाद साफ हो गया कि भाजपा भी कांग्रेस की ही कार्बन कापी है व उसका भ्रष्टाचार का विरोध करने की बात हाथी के दांत की तरह छदम ही है। आज इन दोनों दलों में इतनी ताकत भी नहीं रही कि दोनों मिल कर बाबा राम देव की तरह हुंकार भर कर आम जनता तो रही दूर अपने तथाकथित पूरे कार्यकत्र्ताओं को ही सड़को ंपर उतार सके। दोनों दलो सहित तमाम राजनैतिक दल आज देश की जनता के विश्वास पर पूरी तरह से बेनकाब हो चूके है। लगता है इनकी जनविरोधी कृत्यों को चुकता करने के लिए ही महाकाल ने इनके नेतृत्व की मनोशक्ति को उलटी पुलटी कर दी है। इसी कारण ये ऐसे कृत्य महाकाल के पाश में फंस कर कर रहे हैं।