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Wednesday, December 28, 2011

अण्णा व टीम अण्णा का उपहास व अपमानित करने के बजाय इनको सम्मानित करे सरकार व मीडिया

-महानायक अण्णा का सलाम
-जब बिना सीबीआई के कैग भ्रष्टाचारियों को बेनकाब करता है तो लोकपाल के अंदर सीबीआई लाने की जिद्द क्यों?
-टीम अण्णा नहीं देश की सवा अरब जनता को समझे अण्णा अपनी शक्ति
अण्णा व टीम अण्णा का उपहास व अपमानित करने के बजाय इनको सम्मानित करे सरकार व मीडिया

जब बिना सीबीआई को अपने नियंत्रण में लिये हुए देश में केन्द्र व राज्य सरकारों के कई बडे घोटालों को भारत का नियंत्रक एवं महा लेखा परीक्षक यानी कैग , हर साल बखुबी से बेनकाब करता है तो क्यों अण्णा हजारे व उसकी टीम लोकपाल के नियंत्रण में सीबीआई लाने की जिद्द कर रहे  हैं? क्या लोकपाल के पास असीमित शक्तियां देना लोकशाही के खिलाफ नहीं है। लोकपाल देश में एनजीओ यानी स्वयं सेवी संस्थाओं व मीडिया सहित तमाम सरकारी विभागों के भष्टाचार पर अंकुश लगाने का काम करे। इसी दिशा में मजबूत पहल होनी चाहिए तथा सरकार को भ्रष्टाचार के खिलाफ जंग लड़ने वाले याची को किसी प्रकार से प्रताड़ित करने वाले व आरोपी को बचाने वाले किसी प्रकार का प्रावधान इस लोकपाल के अंदर होना चाहिए। अण्णा हजारे ने अपना अनशन को समाप्त करके तथा अपना जेल जाने वाला आंदोलन भी स्थगित करके सराहनीय कार्य किया। पूरा देश अण्णा जी की देश को मजबूत बनाने वाली भावना का सम्मान करता है परन्तु उनको अपनी टीम पर अंधा संरक्षण देने के बजाय जो भी गलत करे या देश हित के खिलाफ कार्य करेगा उसका विरोध करने का नैतिक साहस अपने अंदर से जुटाना चाहिए। देश की जनता इसी दिशा के राही के रूप में अण्णा को देखना चाहती है। अण्णा ने अपनी वयोवृद्व अवस्था में सोई हुई देश की जनता को जागृत करने का ऐतिहासिक काम किया है उसके लिए उनको शतः शतः नमन्। जो लोकपाल कानून सरकार इन दिनों संसद में पारित कर रही है वह सब अण्णा जी व उनकी टीम के अरविंद केजरीवाल के सत्त प्रयासों से हुआ। आज देश की अधिकांश मीडिया जो अण्णा जी के मुम्बई में समापन किये आंदोलन को कम आंदोलनकारियों के होने से असफल बता कर अण्णा जी का मजाक उडाने में लगे हैं, उनका यह कृत्य देश में लोकशाही को कमजोर करने वाला साबित होगा। अण्णा जी को चाहिए कि वह अपने सिपाहे सलारों पर अंध विश्वास न करके पूरी जांच पडताल के साथ अंध विरोध या अंध समर्थन नहीं करे। उनको दलगत राजनीति से उपर उठ कर ही कार्य या समर्थन करना चाहिए। उत्तराखण्ड का लोकायुक्त जो बहुत कमजोर बना है, जिसको बनाने की वाहवाही लूट रहे प्रदेश के मुख्यमंत्री भुवनचंद खंडूडी की नियत पर प्रश्न चिन्ह यह लोकायुक्त बिल का ‘‘विधायक, मंत्री व मुख्यमंत्री पर लोकायुक्त के पूरे सदस्यों की सहमति होने पर ही इन पर मामला दर्ज होने वाली लक्ष्मण रेखा ही उजागर करती है। ऐसे कमजोर लोकायुक्त को सर्वोत्तम बता कर उसका समर्थन करके अण्णा ने जहां उत्तराखण्ड के उन लोगों के साथ विश्वासघात किया जो उन पर अंध विश्वास करते हैं, इसके साथ वे खुद भाजपा के हाथों का खिलोना बन कर रह गये। इसलिए भविष्य में अण्णा को चाहिए कि वह इस प्रकरण पर उत्तराखण्ड की जनता से माफी मांगे तथा इस बिल का समर्थन करने वाले अपने बयान वापस लें । अण्णा के सबसे खासमखास सिपाहे सलार केजरीवाल ने देश को सही दिशा देने का सराहनीय कार्य किया, परन्तु उनको अंध समर्थन व विरोध से बचना चाहिए। किरण बेदी को देश की अधिकांश जनता ईमानदार मानती है, उनके कई प्रकरण जो छोटे से हवाई जहाज के किराये में मामुली  भ्रष्टाचार के दायरे में आता है उनको भी अपनी इस भूल के लिए देश की जनता से सार्वजनिक माफी मांगनी चाहिए। वहीं प्रशांत भूषण को भी चाहिए था कि अण्णा का जनलोकपाल का आंदोलन राष्ट्र को मजबूत बनाने वाला आंदोलन है, इस आंदोलन से जुड़ने से मिली ख्याति को वे देश के विभाजन को उतारू कश्मीरी ताकतों के पक्षवाले बयान देने में दुरप्रयोग नहीं करना चाहिए। अण्णा को चाहिए था कि वे प्रशांत भूषण से दो टूक शब्दों से कहते कि अगर आपने देश के विभाजन करने को उतारू कश्मीरी आतंकियों की भाषा का समर्थन करना है तो आप टीम अण्णा से दूर रहें। परन्तु अपनी टीम के सदस्यों की इन्हीं भूलों का भी आम आदमी की तरह ढाल बना कर बचाव करते रहें। यही कार्य देश की आम जनता की आंखों में उनकी छवि को कमजोर कर गया। जो विश्वास देश की जनता ने उनके प्रति रामलीला मैदान व जंतर मंतर के पहले दौर के आंदोलन के दिनों दिया था वह कहीं दूर-दूर तक दिखाई नहीं दे रहा है। इसके बाबजूद आज भी देश को अण्णा की जरूरत है, क्योंकि आज देश का दुर्भाग्य यह है कि हमारे पास देश को सही दिशा देने के लिए अण्णा हजारे से बेहतर कोई जननायक नहीं है। अण्णा हजारे की एक ही भूल रही कि उन्होंने अपनी शक्ति देश की सवा अरब जनता को छोड़ कर मात्र टीम अण्णा के सदस्यों तक मान लिया। अगर वे देश की आम जनता के समक्ष फिर से अपनी टीम के शिकंजे से उपर उठ कर कार्य करें तो आज भी देश की जनता उनके पीछे मर मिटने के लिए समर्पित है।
अण्णा को चाहिए कि वह बाबा रामदेव की तरह मात्र कांग्रेस का अंध विरोध न करें अपितु वे हर दलों के भ्रष्टाचारियों का विरोध करने की रणनीति पर अपने आंदोलन को आगे बढ़ाना चाहिए। कांग्रेस को भी चाहिए कि अण्णा व टीम अण्णा के सदस्य केजरीवाल व किरण वेदी को खलनायक मानने के बजाय देश निर्माण में इनकी बहुमुखी प्रतिभा व अनुभवों का सदप्रयोग करे। इनमें कुछ कमियां हो सकती है परन्तु देश के भ्रष्ट व जनविरोधी कई मंत्रियों से इनका देश हित में समर्पण कई गुना अधिक है। देश की प्रतिभाओं व जनहितों के लिए समर्पित योद्वाओं का स्वागत किया जाना चाहिए, उनको प्रताडित व अपमानित करना देश विरोधी कृत्य होगा।

Tuesday, December 27, 2011

लो बन ही गया लोकपाल अण्णा व सोनिया को बधाई

लो बन ही गया लोकपाल      अण्णा व सोनिया को बधाई
देश को तबाह कर रहे भ्रष्टाचार पर अंकुश लाने के लिए ‘जनलोकपाल कानून बनाने की मांग को लेकर ’व्यापक जनांदोलन चलाने वाले अण्णा हजारे व सप्रंग सरकार की मुखिया सोनिया गांधी की पहल पर बनाये गये लोकपाल बिल को संसद द्वारा 27 दिसम्बर की मध्य रात्रि में पारित करने पर हार्दिक बधाई। भले ही अण्णा का जनलोकपाल व सरकार द्वारा बनाये गये लोकपाल में कई खामियां है परन्तु देश में व्याप्त भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने के लिए इस दिशा में लोकपाल कानून बनाने की पहल करने का स्वागत। आशा हे कि देश की संसद जो इस कानून को बनाने के लिए रात बारह बजे तक निरंतर चलती रही, इसी प्रकार देश के हितों के लिए भविष्य में भी इस कानून में एनजीओ और मीडिया सहित तमाम उन संस्थानों को भी जोड कर इसे और प्रभावी बनायेगी जिससे देश को भ्रष्टाचार पर अंकुश लगेगा। इस लोकपाल को संवेधानिक दर्जा देने की राहुल गांधी की पहल पर जिस ढ़ग से भाजपा ने विरोध किया उससे साफ हो गया कि भाजपा का देश में व्याप्त भ्रष्टाचार को समूल नष्ट करने के लिए कितनी तैयार है। भाजपा को देश के हित में दलीय स्वार्थो से उपर उठ कर इस लोकपाल को मजबूत बनाने के लिए काम करना चाहिए । अब सरकार की इस पहल को ध्यान रखते हुए अण्णा हजारे को अपना अनशन समाप्त कर सरकार को अन्य महत्वपूर्ण कार्यों को करने के लिए प्रेरणा देने का काम करना चाहिए।

-राहुल गांधी ने किया भाजपा के भ्रष्टाचारी व जातिवादी मुखोटे पर करारा प्रहार

-राहुल गांधी ने किया भाजपा के भ्रष्टाचारी व जातिवादी मुखोटे पर करारा प्रहार /
-राहुल गांधी के ‘आम जनता की नहीं वर्ग विशेष की  है भाजपा सरकार’के बयान से सहमी भाजपा/

 कांग्रेस के शीर्ष नेता राहुल गांधी द्वारा  23 दिसम्बर को  देहरादून में हुई देहरादून में आयोजित रैली में प्रदेश भाजपा सरकार को न केवल भ्रष्टाचारी बताया अपितु उसके जातिवादी व क्षेत्रवादी मुखोटे को आम जनता की नहीं अपितु वर्ग विशेष की सरकार बता कर प्रदेश की राजनीति में खलबली मचा दी। हालांकि प्रदेश के अधिकांश समाचार पत्रों ने इस इशारे को समझ नहीं पाये, परन्तु राहुल गांधी ने प्रदेश की उस पीड़ित जनता की नब्ज पर हाथ रखा जो लम्बे समय से प्रदेश  भाजपा के जातिवादी, क्षेत्रवादी व भ्रष्टाचारी कुशासन से लम्बे समय से त्रस्त है। जिस प्रकार से प्रदेश भाजपा शासन में केवल जाति विशेष के लोगों को प्रदेश के मुख्यमंत्री से लेकर महत्वपूर्ण मंत्रालय व शासन प्रशासन के महत्वपूर्ण पदों में आसीन तमाम विरोध के बाबजूद किया जा रहा है उससे प्रदेश का बहुसंख्यक वर्ग भाजपा से काफी आक्रोशित हे। इसी आक्रोश के कारण प्रदेश की जनता ने भाजपा को लोकसभा में सफाया किया था व अब जिस प्रकार से प्रदेश के भगत सिंह कोश्यारी, केदारसिंह फोनिया व मोहन सिंह ग्रामवासी जैसे ईमानदार व वरिष्ठ भाजपा नेताओं को दरकिनारे करके केवल निशंक व खंडूडी व उनके वर्ग के लोगों को भाजपा ने प्रदेश का शासन प्रशासन सोंपा है, उससे आज प्रदेश में भाजपा पर घोर जातिवादी होने के आरोपों को बल मिल रहा है। इसी के कारण हो रही उपेक्षा व कुशासन से व्यथित हो कर प्रदेश के पूर्व सांसद ले. जनरल तेजपाल सिंह रावत, रतनसिंह गुनसोला व मुन्ना सिंह चैहान सहित कई भाजपा वरिष्ठ नेता  भाजपा का दामन छोड़ चूके है। हालांकि जनता की आंखों में धूल झोंकने के लिए भाजपा ने अपने चुनाव अभियान की कमान भी भगतसिंह कोश्यारी को सोंपी हुई है। वहीं राजनाथ सिंह को भी प्रदेश को चुनाव जीताने का भार सोंपा हुआ है परन्तु चुनाव जीतने पर फिर खंडूडी को ही कमान सोंपने का मन बना चूके है। प्रदेश की सत्ता की मात्र अपनों के लिए बंदरबांट करते हुए देख कर प्रदेश की आम जागरूक जनता लोकसभा की तरह विधानसभा चुनाव में भी सबक सिखाने के लिए मन बना चूकी है।
 राहुल गांधी की इस सफल रेली ने जहां उत्तराखण्ड प्रदेश में होने वाले विधानसभाई चुनाव के लिए कमर कसे हुए कांग्रेसियों में उत्साह भर दिया। वहीं  प्रदेश भाजपा सरकार को भ्रष्टाचार व वर्ग विशेष की सरकार बता कर भाजपा में हडकंप ही मचा दिया। राहुल गांधी के बयानों व इस रेली में उमड़ी भीड़ ने फिर से प्रदेश की सत्ता में आरूढ़ होने की आश लगा कर चुनाव मेदान में उतरी हुई भाजपा में हड़कंप ही मचा दिया है। प्रदेश भाजपा के कुशासन से त्रस्त जनता की नब्ज पर हाथ रखते हुए कांग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव राहुल गांधी ने कहा कि  इस पर्वतीय राज्य में संसाधन के नाम पर तो सब कुछ है, लेकिन सरकार नाम की कोेई चीज नहीं ।  उन्होंने भाजपा की जातिवादी प्रवृति पर कड़ा प्रहार करते हुए कहा कि कांग्रेस एक विशेष वर्ग की सरकार नहीं बनाना चाहती है बल्कि आम जनता की सरकार बनाना चाहती है, जबकि बीजेपी एक विशेष वर्ग की सरकार बनाने की हिमायती है। कांग्रेस गरीबों, किसानों, मजदूरों और सभी वर्गों का प्रतिनिधित्व करना चाहती है। अपने पिता राहुल गांधी का स्मरण करते हुए कांग्रेस के महासचिव राहुल ने कहा कि उनके पिता राजीव गांधी ने उन्हें देहरादून में इसलिए पढ़ने भेजा था क्योंकि यह पूरे देश में शिक्षा का सर्वोत्तम केंद्र है। देहरादून को अब अमेरिका और कैलिफोर्निया की यूनिवर्सिटी की टक्कर में खड़ा होना चाहिए, लेकिन यहां की सरकार को भ्रष्टाचार के मामले में होड़ करने से ही फुरसत नहीं है। उन्होंने भाजपा सरकार के भ्रष्टाचार पर कड़ा प्रहार करते हुए कहा कि आज यहां की सरकार कर्नाटक सरकार से भ्रष्टाचार के मामले में आगे रहने की होड़ कर रही है। उन्होंने कहा कि कर्नाटक में भ्रष्टाचार के आरोपी मुख्यमंत्री को जेल भेजा जाता है तो उत्तराखंड में मुख्यमंत्री को बदलकर उसे प्रमोशन दे दिया जाता है। राहुल ने पूर्व मुख्यमंत्री रमेश पोखरियाल निशंक का नाम लिए बिना कहा कि उन्हें मुख्यमंत्री पद से हटाकर बीजेपी ने पार्टी में बड़ा ओहदा दे दिया क्योंकि यहां के पूर्व मुख्यमंत्री को कर्नाटक के पूर्व मुख्यमंत्री से भ्रष्टाचार के कॉम्पिटिशन में आगे जो रहना था।  उन्होंने उत्तराखण्ड की प्रथम निर्वाचित सरकार को आम जनता की सरकार बताते हुए कहा कि कांग्रेस की सरकार को गरीबों, व्यापारियों, किसानों, मजदूरों और आम जनता ने बनाया, जिसके चलते प्रदेश में प्रगति की लहर आई। उन्होंने भाजपा के अटल सरकार के सुशासन के दावे को बेनकाब करते हुए कहा कि ये लोग अपने शासनकाल में वातानुकूलित कमरे में बैठकर इंडिया शाइनिंग की बात कर रहे थे। 5 साल सरकार चलाने के बावजूद वह किसी गांव में नहीं गए। गांव मंें बल्ब नहीं था और उनका कहना था कि इंडिया चमक रहा है। कांग्रेस सरकार ने सत्ता में आते ही सबसे पहले विकास को रोजगार से जोड़ा। कांग्रेस शासन में मनरेगा के तहत रोजगार की कानूनी गारंटी दी गई।
राहुल गांधी ने सूचना के अधिकार को कांग्रेस की लोकशाही को मजबूत बनाने का एक अनुपम हथियार बताते हुए भाजपा पर प्रहार किया और कहा कि इसी कांग्रेसी पहल के कारण आज लोग सांसदों , नौकरशाहों और मंत्रियों को के घोटाले भी सूचना का अधिकार कानून से हासिल कर रहे है। इसी कारण आज अधिक घोटाले पकडे जा रहे है। उन्होंने कहा कि कांग्रेस सरकार ने ही स्कूलों में भोजन की व्यवस्था की गई। अब केंद्र सरकार हर परिवार को कम से कम 35 किलो अनाज का अधिकार प्रदान करने के लिए कानून बनाने जा रही है। राहुल ने कहा कि अब एक ऐसा पहचान पत्र बनाया जाएगा , जिसका उपयोग लोग अपने अधिकार के लिए देश के किसी भाग में कर सकेंगे। इसी कार्ड के माध्यम से उनका पैसा उनके खाते में आ जाया करेगा। राहुल गांधी की इस रेली से जहां प्रदेश की भाजपा के कुशासन से पीड़ित जनता को साफ संदेश दिया कि वे प्रदेश में अगर विकास चाहते हैं तो भाजपा की वर्ग विशेष की सरकार को उखाड़ फेंके। देखना यह है कि कांग्रेस अगर प्रदेश की सत्ता में आसीन होती है तो वह भी इसी वर्ग विशेष को प्रदेश का ताज पहनाती है या प्रदेश में आम जनता का विकासोनुमुख व साफ छवि के नेता को प्रदेश की कमान सोंपते है। हालांकि प्रदेश की जनता को कांग्रेस ने तिवारी को प्रदेश की सत्ता सोंप कर विश्वासघात किया था।  जय श्रीकृष्ण

30 जनवरी को मतदान की घोषणा से उत्तराखण्ड में मचा हडकंप

30 जनवरी को मतदान की घोषणा से उत्तराखण्ड में मचा हडकंप/
-5 जनवरी को अधिसूचना जारी, 12 जनवरी को नामांकन भरने की अंतिम दिन व 16 जनवरी को नामांकन वापस लेने का अंतिम दिन/

-नई दिल्ली।(प्याउ)। चुनाव आयोग द्वारा उप्र, उत्तराखण्ड, पंजाब, मणिपुर व गोवा राज्यों की विधानसभाई चुनाव की रणभेरी बजा दी। इस घोषणाा के तहत हिमालयी राज्य उत्तराखण्ड में 30 जनवरी को मतदान किये जाने की घोषणा से प्रदेश की सभी पार्टियों में एक प्रकार से हडकम्प सा मच गया। प्रदेश में चुनाव की अधिसूचना 5 जनवरी को जारी की जायेगी। नामांकन भरने की अंतिम दिन 12 जनवरी, 13 जनवरी को  उम्मीदवारों के नामांकन पत्रों की जांच व 16 जनवरी को नाम वापसी की अंतिम दिन होगा। मतदान 30 जनवरी को होगा।  चुनाव आयोग की इस अप्रत्याशित घोषणा के कारण भाजपा, कांग्रेस सहित तमाम राजनैतिक दलों को अपने प्रत्याशियों की इसी सप्ताह घोषणा करने के लिए मजबूर कर दिया। राजनैतिक दलों को आशा थी कि प्रदेश में 20 से 25 फरवरी के बीच ही चुनाव होगा। परन्तु चुनाव आयोग की इस घोषणा से सभी हैरान व परेशान है।
प्रदेश के मुख्यमंत्री से लेकर प्रदेश की आम जनता इस पर चुनाव आयोग की प्रदेश की भौगोलिक स्थिति को नजरांदाज करने का आरोप लगा कर इसका विरोध कर रहे है। गौरतलब है कि जनवरी के महिने में यहां भयंकर हाड कंपादेने वाली ठण्ड की चपेट में पूरा प्रदेश होता है। यही नहीं प्रदेश के सीमान्त हिमालयी जनपदों में भारी हिमपात भी होता है।  परन्तु चुनाव आयोग ने सभी आपतियों को दर किनारे करते हुए अपने पूर्व घोषित कार्यक्रम को यथावत रखा। चुनावों की घोषणा के साथ ही इन राज्यों में चुनाव आचार संहिता लागू हो गई है।चुनावों में उम्मीदवारों के खर्च पर नजर रखने के लिए निर्वाचन आयोग ने उनके लिए अलग बैंक खाता खोलना जरूरी कर दिया है। निर्वाचन आयोग ने पहली बार वोटिंग से जुड़ी शिकायतों के लिए 24 घंटे एक कॉल सेंटर की शुरुआत की है। टेलिफोन नंबर 1950 डॉयल कर लोग अपनी शिकायत दर्ज करा सकते हैं।
मुख्य चुनाव आयुक्त श्री कुरैशी ने नई दिल्ली में आयोजित एक विशेष प्रेस वार्ता में इन चुनावों को ऐलान करते हुए बताया कि मणिपुर की 60 विधानसभा सीटों के लिए 28 जनवरी को वोटिंग होगी, उत्तराखंड की सभी 70 विधानसभा सीटों  व पंजाब की सभी 117 विधानसभा सीटों के लिए मतदान 30 जनवरी 2012 को होगा । वहीं  उत्तर प्रदेश की 403 विधानसभा के लिए चुनाव 4 ,8, 11, 15, 19, 23, 28 फरवरी  तथा गोवा के 40 विधानसभा सीटों के लिए मतदान तीन मार्च 2012 को होगा । उन्होंने बताया कि सभी राज्यों में मतदाता सूचियों को संशोधित किया जा रहा है और दो जनवरी 2012 को इसे पब्लिश किया जाएगा। फिलहाल उत्तर प्रदेश में 11 करोड़ 19 लाख 16 हजार 689 लोगों के नाम मतदाता सूची में हैं , पंजाब में एक करोड़ 74 लाख 33 हजार 408 मतदाता , गोवा में दस लाख 11 हजार 675, मणिपुर में 16 लाख 77 हजार 270 तथा उत्तराखंड में 57 लाख 40 हजार 148 मतदाता हैं। कुरैशी ने बताया कि मतदान के समय मतदाता की पहचान अनिवार्य होगी। अधिकांश वोटरों के पास फोटो पहचान पत्र हैं। इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों से कोई छेड़छाड़ न हो पाए , इसके लिए इनकी सुरक्षा के कड़े इंतजाम किए गये हैं।
मुख्य निर्वाचन निर्वाचन आयोग के अनुसार इन विधानसभा चुनाव के लिए गोवा में 1612, मणिपुर में 2325 , पंजाब में 19724, उत्तर प्रदेश में 128112 व उत्तराखण्ड में 9744 मतदान केन्द्र हैं।  इन विधानसभा चुनाव में जहां गोवा की विधानसभा में गोवा में 1 अजा, मणिपुर में 1 अजा व 19 अजजा, पंजाब में अजा के लिए 34, उत्तर प्रदेश में अजा की 85 व उत्तराखण्ड में 13 अजा तथा 2 सीटें अजजा के लिए आरक्षित है।

Monday, December 26, 2011

राजधानी गैरसैंण बनाने के संकल्प के साथ ‘म्यर उत्तराखण्ड’ ने मनाया 5वां भव्य वार्षिकोत्सव

राजधानी गैरसैंण  बनाने के संकल्प के साथ ‘म्यर उत्तराखण्ड’ ने मनाया  5वां भव्य वार्षिकोत्सव/
म्यर उत्तराखण्ड संस्था से प्रेरणा लें  तथाकथित सामाजिक संस्थायें
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प्यारा उत्तराखण्ड की विशेष रिपोर्ट-

रविवार, दिनाक 25 दिसम्वर 2011 को ‘म्यर उत्तराखंड ग्रुप सोसाएटी ने श्री सत्यसाईं इंटरनेशनल सेंटर में अपना पांचवा वार्षिकोत्सव बहुत ही भव्य ढ़ग से मनाया। इस अवसर पर मुख्य अतिथि सांसद प्रदीप टम्टा सहित संस्था सहित तमाम वक्ताओं ने एक स्वर में प्रदेश की स्थाई राजधानी गैरसैंण बनाने का संकल्प ले कर मनाया! कार्यक्रम में उत्तराखंडी लोक संस्कृति पर आधारित रंगारंग प्रस्तुति दी गई,। इस समारोह का सबसे सराहनीय बात यह रही कि इसमें गायिका कुसुम पाण्डे को छोड़ कर अधिकांश तमाम कार्यक्रम गीत व नृत्य संस्था के सदस्यों द्वारा ही प्रस्तुत किये गये, इसको उपस्थित जनसमुदाय ने मुक्त कंठ से सराहना की।  गौरतलब है कि यह संस्था प्रतिवर्ष अपने वार्षिकोत्सव पर किसी क्षेत्र में किये गए उल्लेखनीय योगदान के दो विशिष्ठ व्यक्तियों को सम्मानित करती है! और उत्तराखंड की सांस्कृतिक अभिव्यक्ति पर केन्द्रित स्मारिका का लोकार्पण करती है! संस्था ने इस वर्ष अपनी पांचवे वार्षिकोत्सव के अवसर पर गढ़वाली साहित्य के लिए ललितमोहन केसवान जी और कुमाउनी साहित्य के लिए पूरण चन्द्र कांडपाल जी को सम्मानित किया और प्रसस्ति पत्र एवं शाल भेंट किये! और वार्षिक स्मारिका ’बुरांश’-२०११ का लोकार्पण किया!
संस्था के पांचवे वार्षिकोंत्सव समारोह में मुख्य अतिथि अल्मोड़ा, पिथौरागढ़ के वर्तमान सांसद श्री प्रदीप टम्टा थे, और विशिष्ठ अथितियों में प्रवासी समन्वय समिति के अधक्ष श्री पूरण चंद नैनवाल,देव सिंह रावत जी (संपादक- प्यारा उत्तराखंड एवं उत्तराखंड राज्य आन्दोलनकारी),  प्रो. गोपाल सिंह नयाल जी (प्रोफेसर कुमाऊं विश्वविद्यालय), उत्तराखंड यूथ कांग्रेस की महासचिव सुश्री रीतू कनियाल, उक्रांद नेता भुवन पाठक ,जय महाभारत पार्टी के स्वामी अनंत विश्वदेवा ,अखिल भारतीय उत्तराखंड महासभा (सामाजिक संस्था),  धाद (सामाजिक संस्था), उत्तराखंड क्लब (सामाजिक संस्था)  एस के नेगी , जगदीश नेगी जी (उत्तराखंड पब्लिक स्कूल नॉएडा) को सम्मानित किया गया।  एवं अन्य गणमान्य व्यक्ति थे! कार्यकर्म में रंगारंग प्रस्तुति संस्था के ही युवा सदस्यों द्वारा दी गई! समारोह में उपस्थित गणमान्य लोगों में  सहारा समय के ख्याति प्राप्त पत्रकार  मंजीत सिंह नेगी, उत्तराखण्ड जनता संघर्ष मोर्चा के महासचिव जगदीश भट्ट, श्रीमती हेमा उनियाल (समाज सेविका व लेखिका) पत्रकार इन्द्रचंद रजवार, अनिल पंत, वेद भदोला व सतेन्द्र रावत, सहित अनैक गणमान्य लोग उपस्थित थे। कार्यक्रम को सफल बनाने व उपस्थित अथितियों का भव्य स्वागत करने में संस्था के अध्यक्ष मोहन बिष्ट, महासचिव सुदर्शन रावत, धीरेन्द्र अधिकारी (उपाध्यक्ष), मनिज नेगी (सचिव), नीरज पंवार (सांस्कृतिक सचिव) , सुमित बनेशी, त्रिलोक रावत ,नीरज पंवार, मंजू नेगी, शिवानी सिंह, दीपा किरमोलिया, राजन पांडे, भुवन चन्द्र जोशी, रेनू नेगी, हरीश रावत, विनोद शाही, सुमित बिष्ट सहित तमाम पदाधिकारी उपस्थित थे। समारोह में  शेखर शर्मा ‘पाठक‘ ने दयाल पाण्डे द्वारा रचित व नोयडा क्षेत्र की बालिकाओं के मनोहारी नृत्य पर  ‘वंदे मातरम ’ उत्तराखण्डी बोली में गीत गाया तो पूरा सभागार इस गीत से गूंज गया। संस्था के अध्यक्ष मोहन सिंह बिष्ट के नेतृत्व में संस्था के कलाकारों की कालजयी उत्तराखण्डी नाटक ‘रामी बोरामी ’ की जीवंत प्रस्तुति दे कर सभागार में उपस्थित दर्शकों को भावविभोर कर दिया। समारोह का संचालन संस्था के वरिष्ठ सदस्य भूपाल सिंह बिष्ट ने किया।
इस संस्था का सबसे महत्वपूर्ण कार्य यह है कि यह संस्था अन्य उत्तराखण्डी सामाजिक संस्थाओं की तरह मात्र गीत संगीत का कार्यक्रम या नेताओं के गले में माला डालने तक ही सीमित नहीं है अपितु यह संस्था प्रदेश के हक हकूकों की रक्षा के लिए व जनता में व्यापक जनजागृति के लिए व्यापक जन जागृत अभियान व आपदा शिविर का भी आयोजन करती है। अपनी स्थापना के चंद पांच सालों के दौरान जहां इस संस्था ने गत वर्ष प्रदेश में आयी प्राकृतिक आपदा में आगे बढ़ कर पीड़ित परिवारों का हाथ बंटाया, वहीं इस संस्था ने प्रदेश की स्थाई राजधानी गैरसैंण बनाने के लिए गैरसेंण में एक रैली का भी आयोजन किया। वहीं इस संस्था ने उत्तराखण्ड के अग्रणी आंदोलनकारी संगठनों के आवाहान पर 2 अक्टूबर को राष्ट्रीय धरना स्थल जंतर मंतर पर मुजफरनगर काण्ड के दोषियों को सजा दिलाने के लिए काला दिवस मनाने में प्रमुखता से भाग लिया था। इसके अलावा संस्था दिल्ली सहित उत्तराखण्ड में प्रतिभाशाली बच्चों को सम्मानित करके जहां प्रोत्साहित करती है वहीं वह उत्तराखण्ड समाज के महापुरूषों की पावन स्मृति को नमन् करते हुए उन पर विशेष चित्र पोस्टर का भी प्रकाशन करती है। उत्तराखण्ड की तमाम सामाजिक संगठनों को दिल्ली जैसे महानगर में देश विदेश की नामी कम्पनियों व सरकारी सेवा में काम करने वाले उत्तराखण्ड के इन युवाओं की इस संस्था से प्रेरणा लेना चाहिए। इस सस्था से प्रेरणा ले कर अभी दिल्ली सहित देश विदेश में उत्तराखण्डी समाज की कई इंटरनेटी संस्थायें बन चूकी है परन्तु जो मुकाम इस संस्था ने अपने गठन के मात्र 5 साल में हासिल किया, वह मुकाम हासिल करना और संस्थाओं के लिए आज भी दूर की कोड़ी साबित हो रही है। देखने में यह आता है कि  अधिकांश सामाजिक संस्थाओं के कर्णधार या तो खुद दिशाहिन हैं या इनका केवल नेताआंें को फूल मालायें पहनाने तक की समाजसेवक हैं, प्रायः खुद को उत्तराखण्ड समाज की सबसे बड़ी संस्था बताने वाले इन संस्थाओं के कर्णधार कहीं कभी उत्तराखण्ड हितों के लिए संघर्ष करते हुए नहीं देखा गया है। ये अपनी संस्थाओं में या तो कुण्डली मारे हुए रहते हैं या इन संस्थाओं में काबिज हो कर मात्र इस संस्था को अपनी जेबी संस्था बना कर इसके सामाजिक सरोकारों का गला ही घोंट देते है। देखने में यह भी आता है कि ये संस्थायें समाज के हितों के लिए काम करने वाले समाजसेवियों के बजाय समाज का गला घोंटने वालों व धन्ना सेठों को मंचासीन करने में उनका स्वागत करने में ही जुटे रहते है।
इन सबसे हट कर ‘म्यर उत्तराखण्ड’ संस्था  को मात्र पांच साल में मिली अद्वितीय सफलता के पीछे जहां संस्था के अध्यक्ष मोहन सिंह बिष्ट व महासचिव सुदर्शन सिंह रावत तथा उनके तमाम जुझारू सदस्यों का हाथ है जिनके दिलों में अपनीे उत्तराखण्ड जन्म भूमि के लिए अथाह प्रेम व समर्पण है तथा उसकी बदहाली के कारण उनके दिल में गहरा दर्द भी है। इसी दर्द को दूर करने के लिए ये कामकाजी व अच्छी कम्पनियों में कार्यरत प्रतिभाशाली युवा अपनी जन्मभूमि उत्तराखण्ड को सही दिशा देने के लिए म्यर उत्तराखण्ड ’ के बेनर तले एकजूट है।

Sunday, December 25, 2011

राहुल गांधी की मेहनत पर ग्रहण लगा रहे हैं कांग्रेसी के क्षत्रप

राहुल गांधी की मेहनत पर ग्रहण लगा रहे हैं कांग्रेसी के क्षत्रप
राहुल की रेली में दो सांसदों की उपेक्षा से हैरान कांग्रेसी

 देहरादून (प्याउ)। एक तरफ राहुल सोनिया गांधी आगामी विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को सत्तासीन कराने के लिए दिन रात मेहनत कर रहे हैं वहीं उनकी मेहनत पर कांग्रेसी मठाधीश पानी फेरने का काम कर रहे है। ऐसा ही उत्तराखण्ड में चुनाव 30 जनवरी को होने वाले हैं परन्तु कांग्रेसी मठाधीश प्रदेश में कांग्रेस की राजनैतिक विरोधी भाजपा पर प्रहार करने के बजाय अपने ही दल के अपने विरोधी क्षत्रपों को पटकनी देने में व्यस्त है।
भले ही कांग्रेसी उत्तराखण्ड में राहुल गांधी के दौरे को ऐतिहासिक व आगामी विधानसभा चुनाव में विजय का डंका बजाने वाला बता रहे हो परन्तु हकीकत यह हे प्रदेश कांग्रेस के मठाधीशों ने इस रेली में कांग्रेस का परचम फेहराने से अधिक अपनी नाक ऊंची रखने के ,खातिर राहुल सोनिया की मेहनत पर पानी फेरने का काम किया। यह सब राहुल गांधी की उपस्थिति में व प्रदेश प्रभारी चोधरी वीरेन्द्र की उपस्थिति में हुआ। राहुल गांधी को इसकी भनक तक नहीं लगी। जब लगने लगी तो किसी तरह उस पर पर्दा डालने की असफल प्रयास किया गया। इस रेली में राहुल गांधी का जोशीला व भाजपा के कुशासन पर करारा प्रहार करने वाला भाषण हुआ। इससे प्रदेश कांग्रेस के आम कार्यकत्र्ताओं में जहां जोश भर गया वहीं कांग्रेस के मठाधीश नेता जो प्रदेश में कांग्रेस को लाने के लिए मेहनत करने के बजाय खुद को मुख्यमंत्री बनाने के लिए अपने ही कांग्रेस के क्षत्रपों की जडों में मठा डालने का काम कर रहे है। हुआ यो कि राहुल गांधी की 23 जनवरी की देहरादून रैली में मंच में कांग्रेस कें दो साफ छवि के संघर्षशील व साफ छवि के सांसदों को जगह न दिये जाने से न केवल कांग्रेसी हैरान थे अपितु उपेक्षित सांसद प्रदीप टम्टा व के सी बाबा भी अपने आप को असहज महसूस कर रहे थे। मंच में अपने सांसदों को न देख कर अल्मोड़ा व नैनीताल के सांसद को मंच पर जगह न देख कर कार्यकत्र्ताओं में गहरी नाराजगी छा गयी। इसकी भनक कहीं राहुल गांधी को न लगे इसके लिए बाद में दोनों सांसदों से राहुल गांधी को गुलदस्ते दिलाये गये।
यही नहीं कांग्रेसी रणनीतिकारों ने प्रदेश में आजादी के बाद से पहली बार सप्रंग सरकार द्वारा दिये गये रेल परियोजना की उपलब्धी का बखान राहुल गांधी व सतपाल महाराज द्वारा एक दूसरे से न कराये जाने से साफ हो गया कि कांग्रेस को अपनी उपलब्धियों को जनता के समक्ष रखना व उसको भूनाना तक नहीं आता। वहीं भाजपा द्वारा बनाये गये कमजोर लोकायुक्त बिल पर करारा प्रहार करने से राहुल व कांग्रेसी दिग्गज चूक गये।

Friday, December 23, 2011

बिना गैरसैण राजधानी बनाए पहाड़ी क्षेत्रों के विकास की कल्पना नहीं की जा सकती-मनोहरकांत ध्यानी

बिना गैरसैण राजधानी बनाए पहाड़ी क्षेत्रों के विकास की कल्पना नहीं की जा सकती-मनोहरकांत ध्यानी/
उत्तराखण्ड राज्य गठन के लिए आहुति देने वाले पर्वतीय क्षेत्र की उपेक्षा से भी व्यथित श्री ध्यानी अब सक्रिय राजनीति से संन्यास लेंगे

गोपेश्वर (प्याउ)। ‘उत्तराखण्ड की राजधानी गैरसेंण बनाये बिना पहाड़ी क्षेत्र के विकास की कल्पना ही नहीं की जा सकती’ वरिष्ठ भाजपा नेता व प्रदेश के योजना आयोग के सदस्य मनोहर कांन्त ध्यानी ने अपनी राजनैतिक जीवन की संघ्या में आखिरकार इस सच को प्रकट कर दिया जिस सच को जानते हुए भी सत्तासीन भाजपा के मुख्यमंत्री भुवनचंद खण्डूडी व पूर्व मुख्यमंत्री निशंक सहित वर्तमान भाजपा व कांग्रेस के अधिकांश नेता कहने की हिम्मत तक नहीं जुटा पा रहे है।
24 दिसम्बर को एक राष्ट्रीय समाचार पत्र ‘राष्ट्रीय सहारा ’में प्रकाशित विशेष वार्ता में  इस सच को जुबान पर आखिरकार लाने का साहस करके अब तक की भाजपा व कांग्रेस की तमाम सरकारों को अप्रत्यक्ष रूप से कटघरे में  खडा कर दिया है। 23 दिसम्बर शुक्रवार को गोपेश्वर में चुनाव अभियान में पार्टी के प्रचार के तहत आये भााजपा नेता मनोहर कांत ध्यानी के साथ बदरीनाथ के विधायक केदार सिंह फोनिया, भाजपा के जिला महामंत्री गजेंद्र रावत, भाजपा के अनेक नेता भी मौजूद थे।इस खबर के अनुसार श्री ध्यानी विधानसभा चुनाव के बाद सक्रिय राजनीति से सन्यास लेने की घोषणा भी कर गये । लगता है इस घोषणा के तह में भी  पूर्व सांसद श्री ध्यानी का अपने दल में हो रही वरिष्ठ नेताओं की उपेक्षा व पृथक राज्य गठन के 11 साल बाद भी पहाड़ी क्षेत्रों के हितों व विकास की अनदेखी का दर्द ही रह रह कर उनका भी व्यथित कर रहा हैै। हालांकि उन्होंने  इसके लिए किसी दल या सरकारों का नाम न लिया हो परन्तु उनके शब्दों से साफ झलकता है कि वे अब तक की सभी सरकारों द्वारा पर्वतीय क्षेत्र की उपेक्षाओं व प्रदेश की स्थाई राजधानी गैरसेंण न बनाये जाने से आहत है। इस भेंटवार्ता में श्री ध्यानी ने दो टूक शब्दों में कहा कि ‘ बिना गैरसैण राजधानी बनाए पहाड़ी क्षेत्रों के विकास की कल्पना नहीं की जा सकती। यदि इसमें भी कोई परेशानी है तो फिर ग्रीष्मकालीन राजधानी गैरसैण बना कर पर्वतीय जनमानस की भावनाओं पर खरा उतरा जा सकता है।‘पहाड़ी क्षेत्रों के हितों की कदापि अनदेखी नहीं की जानी चाहिए। जिन संघर्षाे के बल पर लोगों ने इस राज्य के निर्माण में अपनी आहुति दी थी अब उन उद्देश्यों को साकार करने की दिशा में कदम बढ़ाए जाने चाहिए। जिस तरह तेजी से पहाड़ी क्षेत्रों से पलायन बढ़ रहा है उसको देखते हुए उद्योगों के विस्तार के साथ ही पहाड़ी क्षेत्रों में सड़क, शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं को प्रमुखता से स्थान दिया जाना चाहिए।  राज्य योजना आयोग के उपाध्यक्ष मनोहर कांत ध्यानी ने की घोषणा की कि विधानसभा चुनाव निपटने के बाद वे सक्रिय राजनीति से पूरी तरह संन्यास ले लेंगे। मौजूदा राजनीतिक हालातों पर विस्तार से चर्चा करते हुए उनका कहना था कि अब फिलहाल उनका सक्रिय राजनीति में बने रहने का कोई इरादा ही नहीं। चुनाव निपटने के बाद वे सक्रिय राजनीति को अलविदा कह कर हिमालयी सरोकारों से जुड़े सवालों को लेकर गंभीर प्रयासों में जुटेंगे। उन्होंने कहा कि अब जबकि वे 70 वर्ष पार कर चुके है तो अब राजनीति से भी उनका मन भर गया है। वे भी इस बात से व्यथित थे कि मौजूदा विधानसभा चुनाव में इस बार दलीय मुकाबले के बजाय व्यक्ति से व्यक्ति के बीच ही टक्कर होगी। उन्होंने कहा कि देश में इस समय वातावरण भ्रष्टाचार के विरुद्ध बना हुआ है। 

Thursday, December 22, 2011

संसद, सरकार, अण्णा व जंतर-मंतर पर लोकपाल के नजारे

संसद, सरकार, अण्णा  व जंतर-मंतर पर लोकपाल के नजारे
आखिरकार काफी जिद्दोजहद के बाद 22 दिसम्बर को आज कांग्रेस गठबंधन वाली सप्रंग सरकार ने देश में व्याप्त भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने वाले बहुचर्चित लोकपाल विधेयक को संसद में पेश कर ही दिया। जहां सप्रंग प्रमुख सोनिया गांधी, प्रधानमंत्री सहित कांग्रेस के सभी नेता इसका समर्थन कर रहे हैं वहीं इस विधेयक को पेश करने के लिए देशव्यापी जनांदोलन छेड कर देश की सरकार व जनता को झकझोरने वाले अण्णा हजारे ने इसका पुरजोर विरोध करते हुए इसे भ्रष्टाचार को ओर बढ़ाने वाला विधेयक बताया। वहीं संसद की चैखट यानी राष्ट्रीय धरना स्थल जंतर मंतर पर कभी अण्णा के आंदोलन के हिस्सा रहे इंडिया अगेनस्ट करपशन के असंतुष्ट कार्यकत्र्ताओं  ने न केवल जनलोकपाल को लोकशाही के लिए खतरनाक बताया अपितु अण्णा हजारे के चार प्रमुख सिपाहे सलार अरविन्द केजरीवाल, किरण वेदी, प्रशांत भूषण व सिसोदिया के प्रति अंध मोह के कारण अण्णा की अलोकशाही प्रवृति को भी उजागर किया। जंतर मंतर के आंदोलनकारी क्षेत्र में लोग उस समय अचम्भित रह गये जब एक बडा मंच अण्णा के जनलोकपाल व अपने चार सिपाहेसिलारों का अंध मोह पर कई प्रश्न खडे करने वाले तस्वीर युक्त बडे बडे पर्दा नुमा बेनर टंके मिले। लोग बड़ी उत्सुकता से इसको पड़ने लगे। इन्हे देख कर मैं भी उस मंच पर गया। वहां पर दो आंदोलनकारियों को मैं अण्णा के 11 दिसम्बर वाले आंदोलन के दिन मिला था। इनमें एक का नाम श्रीओम व सुश्री शुक्ला भी सक्रिय थी। इन दोनों को मैने डेढ़ दो महिने पहले इंडिया अगेनस्ट करपशन वाले संगठन में चंदे के मामले में हो रही तथाकथित अनिमियता के विरोध में जंतर मंतर पर मंच लगा कर आंदोलन करते हुए देखा था।
आज में जब वहां पर पंहुचा तो वहां पर इंडिया अगेनस्ट करप्शन का एक वोलेन्टर विपिन नैयर मिला। जिसने मुझे 21 दिसम्बर वाला एक प्रेस विज्ञप्ति भी सोंपी। लामेडस्टोन.डाट काम वाले विपिन का राजस्थान के कोटा के उमेदपुरा गांव का निवासी है। दिल्ली के अशोक विहार में निवास करता हे। उनका अपना व्यवसाय है। उनके अनुसार वे अण्णा के भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन में 19 अगस्त 2011 से जुडा । उसने अण्णा के आंदोलन में जहां कम से कम 50 हजार का पानी भी वितरित किया। 21 हजार का दान रसीद सहित दिया। यही नहीं इसके अलावा भी हजारों का दान दिया। उनके अनुसार उन्होंने जब अण्णा के 11 दिसम्बर वाले आंदोलन के संदर्भ में दिल्ली के प्रेस क्लब में 10 दिसम्बर को आयोजित अण्णा की प्रेसवार्ता में केवल एक प्रश्न पूछने की कोशिश की तो उनको अण्णा के लोगों ने पीटा। इन हिंसक लोगों से दिल्ली पुलिस ने उसको किसी तरह से बचाया।  उन्होंने कहा कि अण्णा व उनके समर्थकों में जरा सी भी लोकशाही के प्रति सम्मान नहीं हे। वे बहुत व्यथित थे। वे अब अण्णा से ही नहीं अण्णा के जनलोकपाल को देश के लिए खतरा मान रहे हैं। जंतर मंतर में ही एक अन्य आंदोलनकारी अलग से मंच लगा कर अण्णा के लोकपाल या संसद में प्रस्तुत लोकपाल के खिलाफ अनशन कर रहे है।
वहीं संसद में लालू मुलायम व शरद का विरोध रहा लोकपाल बिल के खिलाफ। भाजपा का भी विरोध रहा। उधर अपने गांव में अण्णा हजारे व उनकी टीम ने सरकार
द्वारा संसद में पेश किये गये लोकपाल बिल का भारी विरोध किया। टीम अण्णा का विरोध है कि सरकार लोकपाल बिल में सीबीआई को सम्मलित नहीं किया। वहीं इसमें सरकार द्वारा पूरी तरह से नियंत्रित है। वहीं सरकार इसे मजबूत लोकपाल बता रही है। इस लोकपाल की नियुक्ति के लिए प्रधानमंत्री, नेता प्रतिपक्ष, भारत के मुख्य न्यायाधीश व लोकसभाध्यक्ष जैसे महत्वपूर्ण उच्च लोक रहेंगे। परन्तु टीम अण्णा इससे सहमत नहीं है। इसके विरोध में अण्णा मुम्बई में तीन दिवसीय अनसन व दिल्ली में सोनिया राहुल के द्वार पर धरना देने का ऐलान कर चूके है। कुल मिला कर अब सरकार व अण्णा हजारे की टीम आर पार का निर्णायक संघर्ष करने के लिए कमर कस चूके है। जनता में लोकपाल को लेकर जो उत्सुकता थी वह धीरे धीरे कम हो रही है। देखना है लोकपाल का हस्र भी महिला आरक्षण की तरह ही होता है या यह अपना मुकाम हासिल कर पाता है। परन्तु इस प्रकरण में भी अण्णा के प्रति आम जनता का वह समर्थन नहीं दिखाई दे रहा है जो रामलीला मैदान या जंतर मंतर पर अनशन के दौरान दिखा। इस दोरान टीम अण्णा पर भी जो आरोपों के छिंटे पडे उससे सुलझाने में अण्णा लोगों की अपेक्षा के अनरूप खरे नहीं उतर पाये। इसी लिए धीरे धीरे लोगों का समर्थन कम होता जा रहा है।

Tuesday, December 20, 2011

-मुखोटे नहीं, मुख बने अण्णा हजारे

-मुखोटे नहीं, मुख बने अण्णा हजारे/
-मनमोहन सरकार की सत्तांधता व हटधर्मिता तोडने में सफल हुए अण्णा/

देश में जनविरोधी सरकारों के कुशासन के दंश  से मृतप्राय पड़ी देश की करोड़ों जनता को जनलोकपाल बनाओं आंदोलन से झकझोरने वाले गांधी के बाद देश के जननायक बनके उभरे अण्णा हजारे ने कांग्रेस गठबंधन की सप्रंग सरकार की हटधर्मिता व सत्तांधता को तोड़ने का  ऐतिहासिक कार्य करने के लिए उनको शतः शतः नमन्। महाराष्ट्र के एक सामान्य गांव राणेसिद्वी में रहने वाले भारतीय सेना के इस जांबाज पूर्व सेनिक ने न केवल अपने संकल्प व जुझारूपन से अपने गांव, क्षेत्र व प्रदेश के साथ साथ देश तथा विश्व को अपने को अचंम्भित कर दिया। इसके साथ देश की आम जनता के साथ देश के राजनेताओं व सरकार को लोकशाही का ऐसा पाठ पढ़ाया कि सरकार की सारी हटधर्मिता व सत्तांधता दूर हो गयी। ऐसे समय जब पूरी व्यवस्था भ्रष्टाचार के गर्त में दम तोड़ रही हो ऐसे समय में अण्णा हजारे के नेतृत्व में देश को भ्रष्टाचार से मुक्त करने के लिए जो जनलोकपाल बनाने का जनांदोलन चलाया उससे देश के हितों के प्रति लापरवाह बनी सरकार सहित तमाम राजनैतिक दलों की इस दिशा में सोचने व काम करने के लिए मजबूर कर दिया।  इसके लिए अण्णा हजारे व उनकी टीम को हार्दिक बधाई। हालांकि मेरा ही नहीं अधिकांश लोगों का मानना है कि केवल कानून बनाने से देश में व्याप्त भ्रष्टाचार पर समूल अंकुश नहीं लगेगा। परन्तु देश के आम अवाम की जो मानसिकता है कि भय बिन होय न प्रीत,, उससे देख कर यह लगता है कि यहां कानून का भी भय होना जरूरी है। नहीं तो मध्य प्रदेश के एक साधारण सा चपरासी व बाबू ने जिस प्रकार से करोड़ों रूपये की अकूत सम्पति अर्जित की थी , उसे देख कर आंखें जहां फट्टी की फट्टी रह गयी। 
देश में कडे कानून होने ही चाहिए। इससे अधिक देश में महत्वपूर्ण पदों पर आसीन लोगों का अपने पद के दायित्व का निर्वाह करने की ललक व दृढ़इच्छा होनी चाहिए। परन्तु देखने में यह आता है कि राजनैतिक दल अपनी संकीर्ण राजनैतिक स्वार्थो व दलीय हितों की पूर्ति के लिए संवैधानिक पदों पर ऐसे व्यक्तियों को आसीन करते हैं जो पद के दायित्व का ईमानदारी से निर्वाह करने के बजाय अपने राजनैतिक आकाओं व अपने संकीर्ण स्वार्थौ की पूर्ति करने में लगे रहते हे। इससे पूरी व्यवस्था जीर्ण हो जाती है। भारतीय व्यवस्था के महत्वपूर्ण संवैधानिक पदों पर ऐसे लोगों को आसीन किये जाने के कारण ही आज देश की स्थिति ऐसी दयनीय हो गयी हे। आज देश के नेताओं, नोकरशाहों व समाजसेवियों के पास ऐसी अकूत सम्पति है जिसका उनकी वैध आय से कहीं दूर दूर तक मेल नहीं खाता है।
इसी कारण न तो उनको देश के हितों की सुध रहती है व नहीं देश की आम जनता की। आज देश की आम जनता महंगाई, भ्रष्टाचार व आतंक से पूरी तरह से त्रस्त है। परन्तु सत्तासीन लोगों को इसके प्रति पूरी तरह से उदासीनता देश में अराजकता की गर्त में धकेलने वाला ही साबित हो रहा है।
ऐसे में हमारे देश की वर्तमान हालत में लोकपाल कानून बनने के बाद भी यकायक यह आशा करना कि भ्रष्टाचार पर अंकुश लगेगा। यह सोचना अपने आप में बेईमानी ही है। यहां पर जब तक लोगों के दिलों में देश हित से अधिक अपने निहित स्वार्थ अंधता अधिक रहेगी तब तक देश में भ्रष्टाचार पर अंकुश नहीं लग सकता। भ्रष्टाचार के मामले में सबसे चैकांने वाला उदाहरण दिल्ली में सरकारी विभाग में वर्षों से कार्यरत फर्जी हजारों कर्मचारी थे। जिनकों केवल हाजरी लगाने वाली मशीनों के लगने के कारण ही पकड़े गये व उजागर हो  पाया। यह देखा जा रहा है कि सर्वोच्च न्यायालय सहित उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों पर भी जिस प्रकार से भ्रष्टाचार के छींटे पड़ रहे हैं उसे देख कर लोकपाल व उसके सदस्यों का पाक साफ होने की संभावना बहुत कम है। वेसे भी देखने में यह आ रहा है कि अपराधों पर अंकुश लगाने के लिए खोले गये पुलिस के थानों के खुलने से उस क्षेत्र में अपराध कम होने के बजाय अपराधों का हकीकत में ग्राफ बढ़ जाता है, चाहे अपराधों को छुपाने से व्यवस्था उन पर नियंत्रण का दावे करे। परन्तु हकीकत में आज देश में जो व्यवस्धा जिस काम के लिए बनायी गयी है वह उस काम का ही तमाम करने में लगी हुई है।
देश की हालत इतनी दयनीय हो गयी हे कि देश के हुक्मरानों, व्यवस्था के कर्णधारों, नौकरशाहों व मीडियाकर्मियों को भी देश की आम जनता की बदहाली का भान तक नहीं हे। अगर किसी को मात्र भाषणों व लिखने लिखाने तक का भान हो परन्तु उनकी बदहाली को दूर करने के लिए देश को सही दिशा देने के लिए अपना दायित्व ईमानदारी से निर्वाह करने की कुब्बत व इच्छा
तक नहीं हे।
ऐसे विकट दशा में आज देश के अवाम में अण्णा हजारे एक आशा की किरण बन कर उभरे है। देश में हालांकि हजारों लोग देश को नई दिशा देने के लिए जुटे हुए हे। परन्तु ऐसे लोगों में बहुत कम है जिनका व्यक्तित्व व कृतित्व में अण्णा हजारे की तरह एक रूपता व सरलता है। वेसे भ्रष्टाचार के खिलाफ अण्णा हजारे से अधिक बाबा रामदेव ने देश में अपनी जनयात्राओं व भाषणों से जागृत करने की कोशिश की। परन्तु बाबा रामदेव की कथनी व करनी में काफी अंतर होने से लोगों में उनका प्रभाव अण्णा से कम नजर आ रहा है। बाबा रामदेव जहां देश में भ्रष्टाचार के खिलाफ व कालाधन के खिलाफ आंदोलन कर रहे हैं, वहीं वे अपनी अकूल सम्पति व बार बार भ्रामक बयानों से अपनी स्थिति को खुद ही कमजोर कर रहे है।  खासकर जिस प्रकार से बाबा रामदेव ने उत्तराखण्ड की भ्रष्ट भाजपा सरकार के खिलाफ मुंह खोलने की हिम्मत तक नहीं जुटायी तथा उसके बाद वे उत्तराखण्ड के उस मंत्री का नाम जग जाहिर करने में चूक गये जिस पर उन्होंने करोड़ रूपये घूस मांगने का आरोप लगाया था। इन दिनों ऐसा ही आरोप उन्होंने एक अनाम केन्द्रीय मंत्री पर उनको धन देने का प्रलोभन देने का आरोप लगा दिया। दिल्ली के रामलीला मैदान में घटित प्रकरण में सरकारी दमन के बाद बाबा रामदेव जिस प्रकार से  अपना आंदोलन चला रहे हैं उससे ऐसा लग रहा है कि अब उनका आंदोलन विदेश से काला धन भारत में लाना की आड में केवल कांग्रेस के खिलाफ प्रतिशोध के रूप में विरोध करने तक रह गया है। बाबा रामदेव ने भारतीय संस्कृति व देश की जनता को जागृति करने का महान कार्य किया परन्तु जिस प्रकार से वे अनुभवहिनता व अपार सम्पति के स्वामी होने कारण उसकी छाप अपने आंदोलन में नहीं छोड़ पाये जिसकी छाप अण्णा जैसे सम्पतिहिन, साधारण व बुजुर्ग आम समाजसेवी अपने चंद दिनों की भूख हडताल से छोड़ पाये। देश की जनता त्याग, सादगी व कथनी करनी में एक रूपता में समर्पित आम आदमी को भले ही महात्मा व महानायक का दर्जा दे सकती है परन्तु अकूत सम्पति के स्वामियों का दोहरा आचरण को कभी दिल से स्वीकार नहीं करते है।
आज देश की नैतिक स्थिति इतनी दयनीय है कि भ्रष्टाचार के खिलाफ जो अण्णा का जनांदोलन चलाने के अगुवा कई सदस्य है, उन  पर भी लोग शतः प्रतिशत ऐसा विश्वास नहीं कर पा रहे हैं जो विश्वास लोगों को आज अण्णा हजारे पर बना हुआ है।
देश का शौभाग्य है कि देश के पास ऐसे समय पर अण्णा जैसे महा नायक विद्यमान है जो अपना जीवन देश के लिए समर्पित करके देश की जनता को सही दिशा में समर्पित किया हुआ हो। देश की जनता आज उनको अपना आदर्श मानती हैं । ऐसे में अण्णा हजारे को चाहिए कि जो छोटी सी गलती करके बाबा रामदेव ने लोगों के दिलों से उतर गये , वह भूल अण्णा हजारे कम से कम न अपनाये। अण्णा हजारे ने भी अपने राष्ट्रीय पटल पर उभरने के कुछ महिनों में कर दी है उससे मुझे भय है उनकी स्थिति कहीं अपनत्व के मोह के कारण बाबा रामदेव की तरह न हो जाय। देश की जनता इस बात को आज भी पचा नहीं पा रही है कि क्यों अण्णा हजारे ने हवाई यात्रा बिल विवाद के घेरे मेे आयी किरण वेदी, अपने सरकारी विभाग की देनदारी के मामले में आये केजरीवाल तथा कश्मीर विवाद पर देश के हितों के प्रतिकूल बयान देने वाले प्रशांत भूषण पर एक सामान्य आदमी की तरह अपनी टीम के सदस्यों का पक्ष ले कर जनता के विश्वास पर कुठाराघात ही किया। ऐसा ही जनता के विश्वास को उन्होंने उत्तराखण्ड प्रदेश के कमजोर लोकायुक्त का खुलेआम समर्थन करके भी कमजोर किया। देश की जनता हैरान है कि अण्णा हजारे ने क्या सोच कर राजनैतिक मगरमच्छो को बचने की राह देने वाले लोकायुक्त विधेयक का समर्थन आखिर किस मजबूुरी से किया। एक दल से बंधे हुए नेता कोई ऐसा बयान देता तो जनता को कभी आश्चर्य नहीं होता परन्तु अण्णा हजारे जोखुद को देश के लिए समर्पित कर चूके हैं उनके द्वारा ऐसा समर्थन किया जाना देश की जनता के गले नहीं उतर रहा है। यही नहीं टीम अण्णा के सदस्य अरविन्द गौड भी एक अनौपचारिक वार्ता में मुझसे उत्तराखण्ड लोकायुक्त विधेयक के समर्थन करने पर पूरी तरह से सहमत नहीं थे। राणे सिद्वि गांव मे एक साल पहले अनशन के लिए दिल्ली आने वाले एक आम समाजसेवी अण्णा हजारे की मजबूरी टीम अण्णा हो सकती थी परन्तु आज देश के जननायक बने अण्णा हजारे की मजबूरी अब टीम अण्णा की बेशाखियों की लक्ष्मण रेखा में बंधने की कतई नहीं है। अण्णा हजारे को अपने विराट शक्ति का सम्मान हीं नहीं पहचान होनी चाहिए। देश की जनता आशा करती है कि उनमें गांधी जेसी इच्छाशक्ति व नैतिक बल हो कि वे अपनी टीम के सदस्यों की भी छोटी सी भूल के लिए भी उनको सुधार करने के लिए एक दिन का उपवास करने का आदेश सार्वजनिक दे सके। इससे जहां लोगों का विश्वास बढ़ता वहीं देश को सही दिशा मिलती। अण्णा हजारे द्वारा जिस प्रकार से एनजीओ को लोकपाल के दायरे रखने तक ही नैतिकता नहीं दिखाई उससे उन पर एनजीओ के शिकंजे में जकडे होने के आरोपों को ही हवा मिलती है। हालांकि अण्णा हजारे इसके बाबजूद देश के लिए सबसे बड़े जीवंत आदर्श के रूप में देश के जनमानस के हृदय में स्थापित हो चूके है। अब गैद सरकार के पाले में हे कि वह जल्द ही मजबूत लोकपाल बनाये। जिसमें एनजीओ, मीडिया, प्रधानमंत्री, नौकरशाह आदि हो। सरकार को चाहिए कि वह देश के जनमानष की भावनाओं का आदर करे। वहीं अण्णा को भी एक बात का ध्यान रखना चाहिए कि वे अपने आप को टीम अण्णा के ममत्व से उपर उठ कर निष्पक्ष रूप से देश की जनता को एक आदर्श स्थापित करने में अपना योगदान दें। नहीं तो इतिहास साक्षी है महान वीर, ज्ञानी व पुरोधा होने के बाबजूद भीष्म पितामह भी अनुकरणीय नहीं बन सके। अब फैसला अण्णा हजारे को करना है कि वे अपने व्यक्तित्व व देश की जनता की आशाओं में कहां तक खरे उतर पाते है। शेष श्रीकृष्ण कृपा। हरि ओम तत्सत्। श्री कृष्णाय् नमो।

Monday, December 19, 2011

यदि रूस में श्रीमद् भागवत गीता पर प्रतिबंध लगता है तो रूस से तत्काल सम्बंध तोडे भारत

यदि रूस में श्रीमद् भागवत गीता पर प्रतिबंध लगता है तो  रूस से तत्काल सम्बंध तोडे भारत/
गीता पर प्रतिबंध लगाना सामुहिक आत्महत्या के समान है
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नई दिल्ली(ंप्याउ)। यदि रूस, श्रीमद् भागवत गीता (प्रभुपाद द्वारा अनुवादित भाष्य ) पर प्रतिबंध लगाने की धृष्ठता करता है तो भारत सरकार अविलम्ब रूस से अपने सारे सम्बंध तोड़ देना चाहिए।’ यह विचार श्रीकृष्ण विश्व कल्याण भारती के प्रमुख देवसिंह रावत ने इस बारे में रूस में हो रहे विवाद पर दो टूक विचार प्रकट करते हुए भारत सरकार से मांग की। श्री कृष्ण विश्व कल्याण भारती के प्रमुख ने कहा कि श्रीमद् भागवत गीता न केवल हिन्दुओं का पावन धर्म ग्रंथ है अपितु  विश्व संस्कृति की मूलाधार भारतीय दर्शन का प्राण भी है। श्रीकृष्ण विश्व कल्याण भारती के प्रमुख ने भारत के प्रधानमंत्री द्वारा अपनी हाल में सम्पन्न हुई यात्रा में इस विषय पर शर्मनाक मूक रखने पर कड़ी भत्र्सना करते हुए कहा कि प्रधानमंत्री को देश के सम्मान, संस्कृति व हितों की रक्षा करने के अपने प्रथम दायित्व का निर्वाहन करना चाहिए। इस विषय पर भारत सरकार व देश की जनता को आगाह करते हुए श्री रावत ने कहा कि जो समाज व राष्ट्र अपने सम्मान, संस्कृति व हितों को रौंदते हुए शर्मनाक मूक रखते हैं उनका न तो देश व नहीं विश्व समुदाय में कहीं सम्मान होता है। उन्होंने अफसोस प्रकट किया कि रूसी हुकमरानों व समाज को भारतीयों की दशकों से चली प्रगाड़ मित्रता का ईनाम भारतीय संस्कृति के मूलाधार श्रीमद् भागवत गीता को रौंदने की धृष्ठता करके चुकाना चाहता है तो विश्व की सबसे प्राचीन संस्कृति के ध्वज वाहक सवा अरब भारतीय,  भारतीय संस्कृति के प्राण व स्वाभिमान को रौंदने की इजाजत रूस सहित किसी देश व समाज को किसी भी कीमत पर नहीं दी  देगी। अब फेसला रूसी हुक्मरानों व व्यवस्था को करना है कि वे भारतीयों के साथ दोस्ती को बनाया रखना चाहते हैं कि भारतीयों से दुश्मनी।
गौरतलब है कि महान श्रीकृष्ण भक्त प्रभुपाद ने जड़ चेतन में भगवान श्रीकृष्ण को मानते हुए पूरे विश्व के कल्याणार्थ गीता की दिव्य ज्ञान की गंगा से उद्वार कराने का भागीरथ प्रयत्न किया। उनके इस श्रेयकर प्रयास से पूरे विश्व के लाखों लोगों ने अपना जीवन को धन्य किया। परन्तु गीता रूपि दिव्य ज्ञान के प्रकाश से अज्ञानी लोगों को अपनी धर्म के नाम से चलने वाली भ्रमित करने वाली दुकाने बंद होने का भय सताने लगा। इसी भय से भयभीत हो कर रूस में गीता को अलगाववाद का प्रतीक मानते हुए उस को बंद करने के लिए कुतर्क दे कर ऐन केन प्रकार से गीता व इस्कान पर प्रतिबंध लगाने का षडयंत्र रच रहे है। इसी का एक छोटा सा नमुना है रूस की कोर्ट में इस मामले में एक वाद। हालांकि इस विवाद पर रूसी अदालत ने अपना फेसला एक सप्ताह के लिए रोक दिया है। गीता पर प्रतिबंध की मांग करके रूस के धर्म के ठेकेदारों ने अपने समाज की एक प्रकार से सामुहिक आत्महत्या करने के लिए धकेलने का निकृष्ठ काम कर रहे है। ये सब केवल रूस में हो रहा षडयंत्र नहीं अपितु पूरे विश्व में ईसायत व आतंकवादियों का इस दिशा में सामुहिक शर्मनाक प्रयास है। गीता जडतावादी नहीं चेतनवादी प्रवृति की प्रवाहिका है। इससे रूस का ही सबसे अधिक अहित होगा क्योंकि रूसी दिव्य ज्ञान से वंचित होंगे।

Sunday, December 18, 2011

गो हत्या भारत ही नहीं मानवता के माथे पर भी कलंक हैः शंकराचार्य माधवाश्रम

गो हत्या भारत ही नहीं मानवता के माथे पर भी कलंक हैः शंकराचार्य माधवाश्रम/
ज्योतिष्पीठाधीश्वर जगतगुरू के शंकराचार्य पद पर आसीन होने के 18 वें वर्ष पूरे होने पर/
शंकराचार्य माधवाश्रम जी महाराज का भव्य अभिनन्दन
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नई दिल्ली(प्याउ)। सनातन धर्म के सर्वोच्च धर्मार्थ पद शंकराचार्य के पद पर आसीन होने के 18 वें वर्ष पूर्ण होने पर ज्योतिष्पीठाधीश्वर शंकराचार्य माधवाश्रम जी महाराज का 18 दिसम्बर को श्रीकृष्ण बोध धाम दिल्ली में भव्य अभिनन्दन किया गया। इसमें बड़ी संख्या में संतो, बुद्विजीवियों, राजनेताओं व श्रद्वालुओं ने शंकराचार्य माधवाश्रम जी महाराज की चरणवंदना कर उनका पावन आर्शीवाद ग्रहण किया। इस अवसर पर सभी वक्ताओं ने जहां शंकराचार्य माधवाश्रम जी के विराट जीवन को सादर नमन् किया वहीं सभी संतों व समाज  को महाराज जी के विराट जीवन से प्रेरणा ले कर समाज व राष्ट्र निर्माण के लिए धर्म का पथ आत्मसात करने का भी आवाहन किया। उपस्थित जनों को इस अवसर पर शंकराचार्य माधवाश्रम जी ने आशीर्वचन देते हुए गो रक्षा के लिए अपने आप को समर्पित करने का भी आवाहन किया। उन्होंने दो टूक शब्दों में कहा कि गो हत्या न केवल भारत अपितु पूरी मानवता के माथे पर बदनुमा कलंक है तथा इसको अविलम्ब बंद किया जाना चाहिए। इसके लिए उन्होंने देश की तमाम सरकारों की कड़ी भत्र्सना करते हुए जनता से गो रक्षा के लिए आगे आने का आवाहन भी किया। गौरतलब है कि शंकराचार्य का हिन्दू धर्म में सर्वोच्च धर्माध्यक्ष के रूप में वंदनीय है। शंकराचार्य माधवाश्रम जी महाराज देश में स्वामी करपात्री के बाद गौहत्या बंदी आंदोलन के अग्रज ध्वज वाहक है। वे दशकों से इस आंदोलन का नेतृत्व कर रहे हे। वे अखिल भारतवर्षीय धर्म संघ के भी प्रमुख है।  प्रातः काल से ही बड़ी संख्या में भक्तों ने दिल्ली सिविल लाइन्स स्थित शंकराचार्य आश्रम में पंहुचना प्रारम्भ कर दिया था। 18 दिसम्बर को शंकराचार्य के पद पर 18 वर्ष पूरे होने पर किये गये अभिनन्दन में सम्मलित होने वालो में उत्तराखण्ड के मुख्यमंत्री भुवनचंद खंडूडी, अखिल भारतीय शिव सेना के प्रमुख जय भगवान गोयल, भाजपा नेता उदय शर्मा, ज्योषीमठ से ब्रहमचारी इन्दुस्वरूप जी महाराज, हकीम आस मोहम्मद, शिव प्रसाद पुरोहित, डिमरी पंचायत के अध्यक्ष श्री डिमरी, एम के महाजन, प्रेम चंद गुप्ता, प्रमोद माहेश्वरी, केप्टन महेश कुमार, अशीष वशिष्ठ, डा गोविन्द बल्लभ पुरोहित, जय प्रकाश गुर्जर, कमीशनर बी एन शर्मा, प्यारा उत्तराखण्ड के सम्पादक देवसिंह रावत, जगदीश भट्ट, विनोद नेगी, सहित अनैकों संत, गणमान्य लोग, बडे बुजुर्ग, महिलायें व बच्चे विधमान थें । इस समारोह के  आयोजन में अखिल भारतवर्षीय धर्मसंघ, धर्मसंघ महाविद्यालय, अखिल भारतीय सर्वदलीय गोरक्षा महाअभियान समिति, शंकराचार्य ट्रस्ट चण्डीगढ़, धर्मवीर दल, परशुरामेश्वर महादेव मंदिर समिति, अखिल भारतीय रामराज्य परिषद, जगद्गुरू शंकराचार्य ज्योतिष्पीठाधीश्वर स्वामी माधवाश्रम धर्मार्थ ट्रस्ट-चिकित्सालय कोटेश्वर रूद्र प्रयाग, ज्योतिष्पीठ समिति दिल्ली आदि प्रमुख संस्थाये सहयोगी थी। इसका आयोजन ज्यातिष्पीठ समिति , जगद्गुरू शंकराचार्य अभिनन्दन समारोह समिति द्वारा किया गया। इसमें प्रमुख यजमान श्रीमती शिल्पा, समीर, श्रुति एवं अरूणा नई दिल्ली तथा श्रीमती दीप्ति, विक्रम तथा माधवन् चण्डीगढ़ वाले थे।

गीता पर प्रतिबंध लगाना सामुहिक आत्महत्या के समान है

गीता पर प्रतिबंध लगाना सामुहिक आत्महत्या के समान है
महान श्रीकृष्ण भक्त प्रभुपाद ने जड़ चेतन में भगवान श्रीकृष्ण को मानते हुए पूरे विश्व के कल्याणार्थ गीता की दिव्य ज्ञान की गंगा से उद्वार कराने का भागीरथ प्रयत्न किया। उनके इस श्रेयकर प्रयास से पूरे विश्व के लाखों लोगों ने अपना जीवन को धन्य किया। परन्तु गीता रूपि दिव्य ज्ञान के प्रकाश से अज्ञानी लोगों को अपनी धर्म के नाम से चलने वाली भ्रमित करने वाली दुकाने बंद होने का भय सताने लगा। इसी भय से भयभीत हो कर रूस में गीता को अलगाववाद का प्रतीक मानते हुए उस को बंद करने के लिए कुतर्क दे कर ऐन केन प्रकार से गीता व इस्कान पर प्रतिबंध लगाने का षडयंत्र रच रहे है। इसी का एक छोटा सा नमुना है रूस की कोर्ट में इस मामले में एक वाद। गीता पर प्रतिबंध की मांग करके रूस के धर्म के ठेकेदारों ने अपने समाज की एक प्रकार से सामुहिक आत्महत्या करने के लिए धकेलने का निकृष्ठ काम कर रहे है। ये सब केवल रूस में हो रहा षडयंत्र नहीं अपितु पूरे विश्व में ईसायत व आतंकवादियों का इस दिशा में सामुहिक शर्मनाक प्रयास है। गीता जडतावादी नहीं चेतनवादी प्रवृति की प्रवाहिका है। इससे रूस का ही सबसे अधिक अहित होगा क्योंकि रूसी दिव्य ज्ञान से वंचित होंगे।

Friday, December 16, 2011

OSCAR FERNADES A Great and Unique Real leader of INDIAN Politics

i selute great and unique real leader of Bhartian politics, who has care country and people . I seeing since many year Mr Oscar Fernandes either he was minister or MP or simple leader he look after all common people who come to visit him, I see no one leader of Indian politics who serve common people like Oscar. I never introduse myself with Oscar but I has been seeing how so heartly he helps allpeople who come infront of him. I selute again great real and unique leader of Indian Politics who has heart to honestly serve human being without any partialities and self interse. I wonder to see his dedication at this time of Indian politics where most of leader and all system has been corrupted . I wish pray god if Indian politicians and social activist learn few dedication from great and real leader Mr Oscar Farnadis. I seen no one leader in indian politics either congress or bjp or others party who has innocently and heartly serving all human being without seeing what his position. Indian political leader should learn how to dedicate himself from Oscar Fernandes. I again selute him and wish allmighty god bless him bright future with long life . I seeing Oscar who follow this saying nar seva hi narayan seva. www.rawatdevsingh.blogspot.com

Sunday, December 11, 2011

जरूरत है दिल्ली व देश को लोकशाही के चंगेजों से बचानी की


जरूरत है दिल्ली व देश को लोकशाही के चंगेजों से बचानी की/
सिकन्दर हो या चंगेज या फिरंगी, भारत पर रही सब लूटेरों की सदा नजर/
फिरंगियों से आजादी मिलने के बाद भारत को लूटने के लिए लोकशाही के लूटेरों की नजर भी इसके खजाने पर रही।
आज दिल्ली को देश की राजधानी बने हुए 100 साल हो गये , ऐसे में जरूरत है देश के दिल्ल व भाग्यविधाता बनी दिल्ली पर इन लोकशाही के चंगेजों से बचाने की। आओ दिल्ली को राजधानी बने 100 साल होने पर हम सब दिल्ली को लोकशाही के चंगेजों से बचाने का संकल्प लें, जो जाति, धर्म व क्षेत्र के नाम पर देश को दोनों हाथों से लूट रहे हैं।

Saturday, December 10, 2011

-लोकशाही के कुरूक्षेत्र राष्ट्रीय-धरना स्थल ‘जंतर मंतर’ पर फिर पधारने पर अण्णा का हार्दिक स्वागत


--लोकशाही के कुरूक्षेत्र राष्ट्रीय-धरना स्थल ‘जंतर मंतर’ पर फिर पधारने पर अण्णा का हार्दिक स्वागत/
-देश में केवल जंतर मंतर पर ही जीवंत है लोकशाही/
-लोकशाही के पुरोधाओं के लिए सबसे बड़ा तीर्थ है जंतर मंतर /

देश की लोकशाही को भ्रष्टाचार के शिकंजे से बचाने के लिए जनांदोलन का नेतृत्व कर रहे अण्णा हजारे का  दिल्ली के जंतर मंतर पर 11 दिसम्बर 2011 को स्वागत है। अण्णा हजारे भ्रष्टाचार के शिकंजे में दम तोड़ रही भारतीय व्यवस्था को बचाने के लिए सरकार से जनलोकपाल कानून बनाने की मांग को लेकर निरंतर कई महिनों से विश्व को झकझोरने वाला शांतिपूर्ण व्यापक जनांदोलन का नेतृत्व कर रहे है। इसी जंतर मंतर पर मैने भी अपने साथियों के साथ पृथक उत्तराखण्ड राज्य गठन के लिए निरंतर 6 साल (अगस्त 1994 से 16 अगस्त 2000) तक व्यापक सफल जनांदोलन एव धरना प्रदर्शन  किया था। देश के राज्य गठन के संघर्ष में उत्तराखण्ड राज्य गठन के लिए हमारे ‘उत्तराखण्ड जनता संघर्ष मोर्चा ’ के 6 साल के जंतर मंतर के का यह संघर्ष अब तक का संसद की चैखट राष्ट्रीय धरना स्थल जंतर मंतर दिल्ली में चलने वाला सवसे लम्बा एकलोता संघर्ष रहा।  इस लिए जंतर मंतर मेरे लिए ही नहीं देश की लोकशाही पर विश्वास करने वाले जनसंघर्षों के सिपाईयों के लिए भी सर्वोच्च पावन तीर्थ स्थल है। देश में जनता गांधीवाद ढ़ग से अपनी मांग को सुनवाने के लिए जब अपने क्षेत्र, जनपद, व प्रदेश में कहीं सुनवायी नहीं होती है तो जनहितों के लिए अंतिम संघर्ष करने के लिए सरकार व जनता उनकी मांगों की तरफ ध्यान देगी, इस आश के साथ यहां पर धरना प्रदर्शन, रेली, आमरण अनशन, क्रमिक अनशन आदि करते हैं।
द्वापर में कोरव पाण्डवों के बीच राज्य के बंटवारे का अंतिम फेसला करने के लिए हुए निर्णायक महाभारत युद्व का जंग-ए-मैदान हरियाणा का कुरूक्षेत्र रहा हो परन्तु कलयुग में संसार की सबसे बड़े लोकशाही भारत में लोकशाही की रक्षा करने के लिए जन महाभारत का कुरूक्षेत्र हरियाणा में नहीं अपितु देश की राजधानी दिल्ली में लोकशाही के सर्वोच्च मंदिर ‘संसद’ की चैखट  राष्ट्रीय
 धरना स्थल जंतर मंतर बन गया है। ईसा सन् 1710 में जयपुर के महाराजा सवाई जयसिंह द्वितीय ने  जंतर मंतर नामक यत्र को इस स्थान में स्थापित करते समय यह कल्पना भी नहीं की होगी कि उनके द्वारा स्थापित यह स्थल के समीप कभी संसार को झकझोरने वाले जनांदोलनों के लिए विख्यात रहेगा। देश की सरकार ने आजादी के समय 1948 में खगोलीय पिण्डों की जानकारी को जानने के लिए स्थापित महाराजा सवाई जयसिंह के इस जंतर मंतर यंत्र को राष्ट्रीय पुरातत्व धरोहर घोषित किया। दिल्ली में संसद के समीप इस यंत्र से  200 मीटर की दूरी पर यह धरना स्थल देश में लोकशाही का तीर्थ स्थल व देश का राष्ट्रीय धरना स्थल बन गया है।
भले ही द्वापर से लेकर कलयुग के लोकशाही के उदय से पहले राजा या समुह अपने हितों के लिए जब बात चीत से समाधान नहीं निकलता तो युद्व करके निर्णय करते थे। परन्तु आज लोकशाही में शांति पूर्ण तरीके से लोग धरना, बंद, जलूस, अनशन, प्रदर्शन या रेलियां आदि करके अपनी मांगो को सरकार के समक्ष रखते हैं।  फिरंगियों के जाने के बाद देश में लोकशाही स्थापित होने के बाद देश की सरकारें जब कोई देश का नागरिक संसद की चैखट राष्ट्रीय धरना स्थल जो पहले संसद व इण्डिया गेट के बीच में वोट क्लब के नाम से विख्यात रहा, अपनी मांगों को लेकर धरना, प्रदर्शन, अनशन या प्रदर्शन करता तो आजाद भारत की सरकारें उसकी मांग पर गंभीरता से विचार करती थी। इंदिरा गांधी के शासन तक यह प्रथा धीरे धीरे कम होती रही। इस प्रथा ने नरसिंह राव की सरकार के कार्यकाल व उसके बाद दम ही तोड़ दिया। वोट क्लब से राष्ट्रीय धरना स्थल मुरली मनोहर जोशी की अध्यक्षता वाली भाजपा के भारत बंद के वोट क्लब रेली के चलते यहां प्रतिबंध कर दिया गया। वोट क्लब पर चैधरी महेन्द्र सिंह टिकैत के नेतृत्व वाली किसान रेलियां, आदि करते है। अण्णा हजारे व उसकी टीम में कुछ कमियां भले ही हो परन्तु देश को भ्रष्टाचार की चंगुल से बचाने के लिए उनके समर्पण पर कोई प्रश्न नहीं उठा सकता है। हालांकि अण्णा ने अपने साथियों की कमजोरी का विरोध न करके तथा बिना पढ़े व समझे उत्तराखण्ड के मुख्यमंत्री द्वारा बेहद कमजोर लोकायुक्त की मुक्त कण्ठ से सराहना करके जनता के विश्वास को कमजोर करने का काम किया। परन्तु उनकी देश हित को समर्पण के देश के लोग आज भी कायल है।
देश के राष्ट्रीय धरना स्थल पर यहां पर अण्णा ही नहीं अण्णा की तरह देश के हित में काम करने वाले समाजसेवी यहां पर अपनी मांगों को लेकर आंदोलन करने आते है। लोकशाही का अदभूत नजारा व दर्शन यहां पर ही देखने को मिलता है। मैने अपने छह साल की जंतर मंतर पर लोकशाही की तपस्या के दौरान निरंतर इस विषय पर गंभीरता से विचार ही नहीं आत्मसात भी किया कि देश में लोकशाही पर विश्वास रखने वालों, छात्रों, समाजसेवियों, राजनेताओं, बुद्विजीवियों, समाजशास्त्रियों व पत्रकारों को अवश्य यहां पर गंभीरता से अध्यन करने के लिए आना चाहिए। देश की वर्तमान स्थिति को देखते हुए मेरा मानना है कि देश में अगर कहीं लोकतंत्र जींदा है तो वह केवल राष्ट्रीय धरना स्थल जंतर मंतर पर ही। हालांकि सरकार ने लोकशाही में जनसमस्याओं का तत्काल से समाधान करने के बजाय अब लोकशाही के इन वीरों को ही प्रताडित करना प्रारम्भ कर दिया हैं। विश्व की सबसे बड़ी लोकशाही का दम्भ भरने वाले भारत के हुक्मरानों के निकम्मेपन्न के कारण आज देश के इस सर्वोच्च धरना स्थल पर आने वाले देश के दूर दराज और कोने-कोने से आने वाले आंदोलनकारियों को यहां आ कर देश की व्यवस्था के जिस निरंकुश व मृतप्राय प्रवृति का सामना करना पड़ता है उससे उनका मन न केवल आक्रोशित हो जाता है अपितु अचम्भित भी रहते हैं कि आजादी के 64 साल बाद भी देश की सरकारों ने देश की जनता द्वारा देश के सवो्रच्च धरना स्थल पर आने वाले लोकशाही के पुरोधाओं की समस्याओं को सुनने तक का कोई अदना कर्मचारी तक नियुक्त नहीं किया है। देश के आंदोलनकारी लोग ठगे से रहते हैं कि देश के हुक्मरान न केवल गूंगे व बेहरे हैं अपितु वे देश की जनता से कहीं दूर दूर तक सरोकार तक नहीं रखते। यहां पर व्यवस्था के नाम पर संसद मार्ग पुलिस का यहां पर आंदोलन करने की अनुमति ले कर आंदोलन करने वालों का ज्ञापन सम्बंधित विभाग तक भेजने के लिए अपना वाहन व अधिकारी साथ देना मात्र है। देश की आम जनता के प्रति कितना निरंकुश रवैया यहां की सरकारों का है यह देखने के लिए लोगों को अपनी मांग को लेकर जंतर मंतर पर प्रदर्शन करने एक सप्ताह आना चाहिए। मेरा शौभाग्य रहा कि हमारी मांगे सरकार ने भगवान की कृपा की बदोलत या व्यापक जनदवाब व दलीय स्वार्थो के कारण पूरा कर दिया, नहीं तो मेने अपने कई आंदोलनकारी साथियों को दम तोड़ते या निराश हो कर लोटने या गुजरात की आंदोलनकारी पार्वती व उनके पति की तरह इसी जंतर मंतर के आस पास व्यथित हो कर मूक रहते हुए देख कर दिल में गहरी टीस लगती है। अण्णा हजारे के आंदोलन में जिस प्रकार से देश की मीडिया ने आगे बढ़ कर हाथों हाथ ही नहीं अपितु आंदोलन को आसमान पर ही उठा दिया जैसा व्यवहार देश की तथाकथित राष्ट्रीय मीडिया का नहीं रहा। हमारे आंदोलन के समापन के समय ही देश में इलेकट्रोनिक मीडिया का उदय हुआ । परन्तु आज सबसे शर्मनाक बात यह है कि देश की मीडिया भी इस लोकशाही के सर्वोच्च स्थल पर देश के कोने कोने से आये जनहितों को लेकर आंदोलन करने वालों की घोर ही नहीं शर्मनाक उपेक्षा करता है। इससे लोकशाही के इन सिपाहियों को मीडिया से विश्वास ही उठ जाता है। अण्णा के एक दिन 11 दिसम्बर 2011 के सांकेतिक उपवास धरने में सम्मलित होने के 12 घण्टे पहले में जंतर मंतर धरना स्थल पर गया तो वहां पर पहले से ही इलोक्ट्रोनिक मीडिया की बड़ी बड़ी वेनें व मीडिया कर्मी बड़ी संख्या में डट गये थे। जबकि प्रायः देखने में यह आता है कि यही मीडिया आंदोलनकारियों द्वारा आमंत्रण पत्र देने के बाबजूद उनकी तरफ झांकने भी समय पर नहीं आता। अण्णा के आंदोलन के लिए लगने वाले मंच के करीब तेलांगना राज्य के लिए आंध्र प्रदेश में पुलिस के डीसीपी पद से त्यागपत्र देने वाली नलिनी के तेलांगना पृथक राज्य गठन करने की मांग को लेकर 9 दिसम्बर से प्रारम्भ किये गये  आमरण अनशन को समर्थन करने के लिए मैं उनके मंच पर गया। तेलांगना की महान सुपुत्री नलिनी को अपना पूरा समर्थन देते व नमन् करते हुए मैं साढ़े छह बजे जंतर मंतर से अपने निवास पर आ गया। परन्तु देश में लोकशाही का कुरूक्षेत्र बन चूका राष्ट्रीय धरना स्थल जंतर मंतर देश के अन्य आंदोलनकारियों की तरह अण्णा हजारे का 11 दिसम्बर को स्वागत करने के लिए तत्पर है। केवल यही आश यह कुरूक्षेत्र रखता है कि अन्याय के समर्थन में मेरे  किसी सिपाई का सर न झुके।

Friday, December 9, 2011

राहुल व सोनिया की आशाओं पर उत्तराखण्ड में बज्रपात करने को उतारू हैं कांग्रेसी दिग्गज


राहुल व सोनिया की आशाओं पर उत्तराखण्ड में बज्रपात करने को उतारू हैं कांग्रेसी दिग्गज/
उत्तराखण्ड विधानसभा चुनाव से पहले के नजारे/
दिल्ली में कांग्रेसी मठाधीशों के कारण उत्तराखण्ड विधानसभा का जीत सकने वाला चुनाव कहीं कांग्रेस गत विधानसभा चुनाव की तरह हाथ से चुकाना न पडे। कांग्रेसी मठाधीशों की गतिविधियों को देख कर ऐसा ही लग रहा है कि वे सब भाजपा के भ्रष्टाचारी कुशासन से मुक्ति पाने के लिए लालायित जनता व कांग्रेस को सत्तासीन करने के लिए दिन रात पसीना बहाने वाले कांग्रेसी आला नेता सोनिया-राहुल गांधी की आशाओं में बज्रपात करने वाले है। अगर कांग्रेस नेतृत्व ने समय पर ध्यान नहीं दिया तो कांग्रेस का बंठाधार उनके नाम पर मठाधीश बने नेता करने वाले है।
टिकटार्थियों की जमघट दिल्ली में, भाजपा में ना के बराबर व कांग्रेस में धमाल ही मचा हुआ हे। भाजपा में कम का एक कारण यह भी है कि भाजपा में टिकटों के वितरण का जिम्मा मुख्यमंत्री खंडूडी व कोश्यारी दोनों के पास है। दोनों आये दिन उत्तराखण्ड में ही यत्र तत्र दिखाई दे रहे हैं। वहीं कांग्रेस में टिकटों का बंटवारा केन्द्रीय नेतृत्व के जिम्मे होने के कारण कांग्रेसियों का भारी जमवाड़ा यहां है। कांग्रेस की टिकटार्थियों को एक नहीं दसों नेताओं के दर पर सर झुकाना पड़ रहा है। इसमें ऐसे नेता मुकुल वासनिक को भी मठाधीश बनाया गया हैं  जिनको बिहार में  जमीनी कांग्रेसियों की उपेक्षा करने व अपने प्यादों को टिकट नवाजने के अपने कारनामों से बिहार में ही नहीं दिल्ली में हुए कांग्रेसी महा अधिवेशन में बिहार से आये कांग्रेसियों के कोप का भाजन बनना पडा। दूसरे ऐसे ही एक हवाई नेता आनन्द शर्मा, जिनको दिल्ली दरवार की कृपा से भले ही मलाईदार मंत्रालय मिला हुआ हो परन्तु जनता का दिल कैसे जीत कर चुनाव जीता जाता है इस मामले में वे फिसड्डी रहे, उनको भी उत्तराखण्ड का मठाधीश बनाया गया। प्रभारी भले ही चैधरी बीरेन्द्र बनाये गये परन्तु उनकी सुनता ही कौन, वेसे भी प्रदेश कांग्रेस कमेटी के गठन से साफ हो गया कि उनकी प्राथमिकता भी धरातली नेताओं से अधिक कुछ और है।
टिकटार्थी ऐसे भी हैं जो एक नहीं 7 जगह से जिनका नाम पैनल में आया हुआ है। तो किसी का 4 जगह हैं। कांग्रेसी दिग्गज ऐसे नेता है जो अपनी विधायकी सीट से लडने की हिम्मत तक नहीं जुटा पा रहे है। पहाड़ मे ंइनकी अब तक की सीट से ये चुनाव में उतरने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहे हैं। अब मैदानों की तरफ रूख कर रहे है। इन पलायन वादी नेताओं ने नेता प्रतिपक्ष डा हरक सिंह रावत भी सम्मलित है। वहीं यही नहीं प्रदेश में कांग्रेसी शासन में भ्रष्टाचार के लिए कुख्यात लोग भी टिकट की लाइनों में बेसर्मी से खडे है। यही नहीं जिन लोगों का क्षेत्र व प्रदेश में उत्तराखण्ड विरोधी चेहरा रहा उनकी भी कांग्रेस की टिकटों के लिए दावेदारी मजबूती से कांग्रेसी मठाधीश ही कर रहे है। सबसे चोकाने वाला नाम तिवारी के मुख्यमंत्री काल में सुपर मुख्यमंत्री के नाम से कार्यरत रहे उनके सहायक आरेन्द्र शर्मा का नाम की पैरवी मजबूती देहरादून से मजबूती से करते हुए देख कर प्रदेश के बुद्विजीवियों व समर्पित कांग्रेस कार्यकत्र्ता कांग्रेसी दिग्गजों की मति पर शर्मसार हैं। तिवारी समर्थकों का मानना है कि विकास पुरूष तिवारी के शर्मनाक पतन के लिए काफी हद तक आरेन्द्र शर्मा का प्रत्यक्ष हाथ है। आरेन्द्र शर्मा के टिकट दिलाने वाले नेताओं के नाम जनता के सामने सार्वजनिक करने के लिए कई कांग्रेस कार्यकत्र्ता कमर कसे हुए है।
वहीं प्रदेश में कांग्रेस के बडे दिग्गज जिस प्रकार से साफ छवि के जनप्रिय ईमानदार लोगों को कांग्रेस का प्रत्याशी बनाने के बजाय अपने परिजनों को टिकट देने के लिए लालायित है। इनमें जहां कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष यशपाल आर्य, हरीश रावत व महाराज सहित अनैक नेताओं के परिजनों के भी चुनावी दंगल में कूदने की आशंका से संभावित विधानसभा क्षेत्र के अन्य दावेदार आशंकित है।
लोग हैरान है कि जिस प्रकार से प्रदेश के नेता जनहितों में समर्पित निष्टावान कांग्रेसियों व सदचरित्र लोगों को प्रत्याशी बनाने के बजाय अपने परिजनों को स्थापित करने के लिए लालायित हैं उससे प्रदेश की स्थिति दयनीय हो गयी है। प्रदेश के हितों के लिए संघर्ष करने वाला कोई कद्दावर नेता नहीं रह गया जो प्रदेश में व्याप्त भाजपा के कुशासन से मुक्ति व जनहितों को साकार करने के लिए आगे आ कर काम करे। प्रदेश के बडे नेताओं पर परिवारवाद का आरोप हवा में नहीं लग रहा है। प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष यशपाल आर्य अपने बेटे को स्थापित करने के लिए लोकसभा चुनाव से अब तक प्रयत्न रत है। कांग्रेस के दिग्गज  सतपाल महाराज पहले ही धर्मपत्नी अमृता रावत को पहले ही विधायक बना चूके है। चर्चा यह है कि अब वे अपने बेटे को भी राजनीति में स्थापित करने के लिए आगामी विधानसभा चुनाव में विधायक की टिकट के लिए मन बना रहे हैं। वहीं दूसरी तरफ प्रदेश के दिग्गज नेता हरीश रावत जो कबीना मंत्री व भावी मुख्यमंत्री के प्रबल दावेदार सतपाल महाराज की तरह है, उन पर भी परिवारवाद का आरोप लगता। उन्होने अपनी धर्मपत्नी रेणु रावत को अल्मोड़ा संसदीय क्षेत्र से लोकसभा का प्रत्याशी के रूप में पहले ही उतार चूके हैं। वहीं उनका मंझोला बेटा आनन्द रावत भी वर्तमान में प्रदेश युवक कांग्रेस के अध्यक्ष हैं। वर्तमान विधानसभा चुनाव में प्रदेश में यह चर्चा जौरों पर है कि हरीश रावत अपने प्रदेश युवक कांग्रेस के अध्यक्ष बेटे के साथ ही अपने बेटी को भी चुनाव मैदान में उतारने का मन बना चूके है। टिहरी के सांसद विजय बहुगुणा भले ही प्रदेश में अपने किसी परिजन के लिए विधानसभा का प्रत्याशी बनाने का मन न बना रहे हों परन्तु यह जग जाहिर है कि उनकी छोटी बहन रीता बहुगुणा जोशी को उत्तर प्रदेश कांग्रेस की अध्यक्षा केवल देश के कद्दावर नेताओं में रहे स्व. हेमवती नन्दन बहुगुणा की सुपुत्री होने के कारण ही बनाया गया। वहीं स्व. हेमवती नन्दन बहुगुणा के छोटे बेटे शेखर बहुगुणा को भी रीता बहुगुणा की तरह ही उप्र की विधानसभा के चुनाव में कांग्रेस ने अपना प्रत्याशी बनाया हुआ है। इस प्रकार बहुगुणा परिवार से दो सदस्यों को कांग्रेस ने इन 5 राज्यों में होने वाले विधानसभा चुनाव में अपना प्रत्याशी बनाया तीसरे विजय बहुगुणा वर्तमान में टिहरी लोकसभा से सांसद हैं ही।
इसी तरह अनैक प्रत्याशी ऐसे भी है जो अपनी दिल्ली पंहुच के दम पर टिकट के दावेदार हैं जिनको जनता ने उत्तराखण्ड द्रोही, जिनको पुलिस ने उनके कुकृत्यों के लिए गधे में बिठा कर काला मुंह कर जलूस निकाला हुआ है। विधानसभा चुनाव में टिकट के इस मेले में एक प्रत्याशी भी देखा गया जो एक नेता से पहले टिकट के लिए मांग करता नजर आया। दूसरे ही क्षण वह खुद ही बोल पड़ा टिकट नहीं तो कम से कम नोकरी ही दिला दो। प्रत्याशी की ऐसी बात सुन कर नेताजी के दरवार में बेठे अन्य प्रत्याशियों के साथ नेताजी की भी हंसी के फुव्वारे भी छूटने लगे।

-लूटेरे पंचतारा अस्पतालों के फल फूलने व सरकारी अस्पतालों का दम तोड़ने के लिए जिम्मेदार है निकम्मी सरकारें


-लूटेरे  पंचतारा अस्पतालों के  फल फूलने व सरकारी अस्पतालों का दम तोड़ने के लिए जिम्मेदार है निकम्मी सरकारें /
-कोलकाता के निजी पंचतारा अस्पताल में अग्निकाण्ड प्रकरण से चिकित्सा माफियाओं पर उठे गंभीर सवाल/
-ग्रामीण चिकित्सकों वाली व्यवस्था शीघ्र प्रारम्भ करें स्वास्थ्य मंत्री गुलाम नबी आजाद/

पश्चिम बंगाल प्रदेश की राजधानी कोलकाता के दक्षिण क्षेत्र के एक निजी अस्पताल आमरी (एएमआरआई) के नए भवन के भूतल में 9 दिसम्बर शुक्रवार तड़के 2.10 बजे लगी भीषण आग लगने से दम घुटकर मरीज व अस्पताल कर्मचारी समेत 90 लोगों की मौत हो गई और कई गंभीर रूप से जख्मी हो जाने से देश में तेजी से खुले इन पंचतारा अस्पतालों की पूरी कार्यप्रणाली पर ही प्रश्नचिन्ह लग गया। आज सबसे बड़ा सवाल यह है कि देश में हजारों की संख्या के फेले अस्पताल के नाम पर लूट खसोट के लक्षागृहों का फलने फूलने का तथा सरकारी अस्पतालों का दम तोड़ने का क्या कारण है ?देश के चिकित्सा मंत्री गुलाम नबी आजाद जो क्रांतिकारी ग्रामीण चिकित्सक व्यवस्था देश में लागू करा कर ग्रामीणों के स्वास्थ्य की रक्षा करना चाहते थे । उसको तत्काल शुरू करना चाहिए। देश के चिकित्सा माफिया इसे अपने अस्तित्व के लिए खतरा मान कर विरोध कर रहे है। अब देश के हित में देश की सरकारें कब जागेगी।
 जिस प्रकार से शासन प्रशासन की मिली भगत से गरीबों का भी सस्ता इलाज करने का वायदा करने के नाम पर इन पंचतारा अस्पतालों को कोडियों के भाव से सरकारी जमीन दी जाती है । परन्तु अस्पताल बनते ही इनमें से अधिकांश के दरवाजे जहां गरीबों के लिए बंद कर दिये जाते हैं वहीं ये अधिकांश अस्पताल इनमें चिकित्सा की आश से आने वालों को इलाज के नाम पर जम कर लूटते है। यही नहीं इन अस्पतालों के कारण शासन प्रशासन देश में चल रहे सरकारी अस्पतालों की निरंतर उपेक्षा करते है। इस कारण देश के अधिकांश चिकित्सालय खुद ही बीमार हो गये है। केवल गरीब, असहाय लोगों के स्वास्थ्य से खिलवाड़ करने के अड्डो में तब्दील हो गये है। यहां पर भ्रष्टाचार व अराजकता के अड्डे बन कर रह गये हे। चिकित्सक जैसे गरीमामय पेशे के इस अंधा बाजारीकरण करने की सरकारों की अदूरदर्शीता व निकम्मेपन के कारण आज देश के अधिकांश जनता स्वास्थ्य भगवान के भरोसे ही रह गया है। वहीं शासन प्रशासन की मिली भगत से इन पंचतारा अस्पतालों का आत्मघाती जाल पूरे देश में फेल गया हें। देखने में यहां तक आ रहा है कि यहां पर भर्ती हुए मरीजो से बेवजह मंहगे मंहगे अनावश्यक टेस्ट करायी व मंहगी दवाईयां मंगाई जाती हे। यही नहीं इन अस्पतालों के कमरे का किराया ही हजारों रूपये प्रति दिन के रूप में लूटा जाता हे। कई बार तो इनकी लूट बाजारी इतनी अमानवीय हो जाती है कि ये मृतक मरीज का शव तब तक नहीं देने की धृष्ठता करने लगे जब तक लाखों रूपये का इनका चिकित्सा बिल न चूकता किया जाय।
हालांकि प्रशासन ने अपनी जिम्मेदारी पर पर्दा डालने के लिए  मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के निर्देश पर आमरी अस्पताल प्रबंधन के खिलाफ मामला दायर किया गया और कोलकाता नगर निगम की ओर से लाइसेंस रद्द कर दिया गया। मुख्यमंत्री के आदेश के बाद आमरी अस्पताल प्रबंधन के सात पदाधिकारियों सह उद्योगपतियों श्रवण टोडी, रवि टोडी, राधेश्याम गोयनका, मनीष गोयनका और दयानंद अग्रवाल व दो अन्य को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया है। उनके खिलाफ गैर जमानती धारा 304 तथा धारा 308 के तहत पुलिस ने मामला दर्ज किया है। इस दर्दनाक हादसे पर प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने शोक के साथ-साथ नाराजगी भी जताई। उन्होंने मारे गए लोगों के परिजनों को दोदो लाख रुपए देने की घोषणा भी की। राज्य सरकार ने भी बतौर मुआवजा तीन-तीन लाख रुपए देने की घोषणा की।
कोलकोता के इस पंचतारा अस्पताल में हुए इस हादसे में कांग्रेस के दो स्थानीय नेताओं, जिसमें पूर्व विधायक शिशिर सेन शामिल हैं, की मौत हो गई। इसके अलावा मरने वालों में एक बांग्लादेशी नागरिक व त्रिपुरा के 6 मरीज थे जिसमें एक मंत्री का रिश्तेदार भी है। हादसे के वक्त अस्पताल में 160 मरीज थे। बेसमेंट में पार्किग की जगह बनाया गया स्टोर बना हादसे की वजह एसी से फैला धुआं। तीसरी मंजिल, चैथी और पांचवीं मंजिल के मरीजों की मौत दम घुटने से हुई। आग पर काबू पाने के लिए 25 दमकल गाड़ियां मौके पर पहुंचीं। सीढ़ियों की सहायता से ऊपर चढ़े बचावकर्मियों  के पास गैस मास्क न होने के कारण व समय पर अस्पताल प्रशासन ने रात के 2.35 बजे ही शिकायत करने के बाबजूद कुछ कदम नहीं उठाया। रात 3.35 बजे यानी एक घण्टे बाद दमकल विभाग को इसकी शिकायत की गयी। दमकल विभाग की तत्परता को तार तार करते हुए शिकायत के एक घण्टे बाद यानी 4.30 बजे 25 दमकल गाडियां यहां पर पंहुची परन्तु उनके पास सीढ़ियां व गैस मास्क न होने के कारण बचाव कार्य प्रारम्भ नहीं किया गया। आग लगने के 4 घण्टे बाद ही दमकल कर्मियों ने खिड़कियों के शीशे तोड़ कर कमरों में भरा घुंए को बाहर निकलने दिया। यानी 8 बजे शवों को निकाला जा सका।
इस घटना से साफ है कि अगर इस होटल के कर्मचारी जागरूक रहते तो रात के 2.10 मिनट पर एएमआरआई, ठाकुरिया के बेसमेंट में आग लगने के बाद यहां रखे गैस सिलिंडरों व अन्य ज्वलंनशील पदार्थो में लगी आग से निकली गैस के कारण 2.35 बजे चिकित्साधीन रोगियों परिजनों द्वारा गार्डो और रिसेप्शन पर जाकर दम घुटने की शिकायत करने के बाबजूद अस्पताल ने इसको नजरांदाज कर दिया। यही गैरजिम्मेदाराना कार्य इस विभत्स त्रासदी का मूल कारण हुआ। अगर समय पर अस्पताल प्रशासन जागता तो यह त्रासदी से बचा जा सकता था।
इस हादसे से एक बात स्पष्ट हो गयी कि यहां देश में पूरी व्यवस्था देश को आरजकता की गर्त में धकेलने का एक सूत्री काम अपने संकीर्ण स्वार्थो में लिप्त रहने के कारण आज देश का आम अवाम से चिकित्सा व्यवस्था से माहताज हो गयी है। स्वास्थ्य सेवाओं के नाम पर दिन रात कुकुरमुतो की तरह फेल गये इन पंचतारा लक्षागृह रूपि निजी अस्पतालों के लुट से लोग त्रस्त है तथा सरकारी अस्पतालों की हालत शासन प्रशासन की उपेक्षा के कारण खुद ही मरीज बन गये हैं। हालत यह हो गयी कि अधिकांश सरकारी अस्पताल जहां देश के दूरस्थ व पिछड़े क्षेत्रों में दम तोड़ चूके हैं, वहीं ही नहीं देश की राजधानी व प्रदेश की राजधानियों में केवल असहाय व गरीब लोग ही दाखिल होना चाहते हैं। जो चंद सरकारी अस्पताल ठीक काम कर रहे हैं वहां पर आम आदमी एम्स की तरह दाखिला होने व इलाज कराने के लिए महिनों धक्के खाने पड़ने के कारण वहां जाने का साहस ही नहीं जुटा पाते है। वहां पर भी केवल पंहुच वाले लोग ही इलाज करा पाते हे। उत्तराखण्ड जेसे मेरे सीमान्त प्रदेश के सीमान्त जनपदों में अधिकांश चिकित्सालय दम तोड़ चूके है। चिकित्सकों के लिए ही तरस रहे हे। 1980 -85 तक इन दूरस्थ क्षेत्रों के चिकित्सालयों में चिकित्सक नजर आते थे, लोग इलाज कराते थे, आज के दिन ये सब अस्पताल चिकित्सकों व दवाई इत्यादि से वंचित हो कर खुद ही मरीज बन गये है। ग्रामीण क्षेत्रों की बदहाली को दूर करने के लिए न तो समझ सरकार में है न हीं शासन प्रशासन के पास। क्योंकि इन सबको न तो इन क्षेत्रों की वर्तमान हालत का भान है व नहीं इसको जानने की इच्छा शक्ति। हाॅं गुलाम नबी आजाद जो ग्रामीण चिकित्सा में क्रांतिकारी परिवर्तन कर रहे थे, वे इन मठाधीशों ने अपनी दुकानदारी व जत्थेदारी खत्म होने के भय से बंद करा दी है। देश के चिकित्सा मंत्री गुलाम नबी आजाद जो क्रांतिकारी ग्रामीण चिकित्सक व्यवस्था देश में लागू करा कर ग्रामीणों के स्वास्थ्य की रक्षा करना चाहते थे । उसको तत्काल शुरू करना चाहिए। देश के चिकित्सा माफिया इसे अपने अस्तित्व के लिए खतरा मान कर विरोध कर रहे है। अब देश के हित में देश की सरकारें कब जागेगी। आज देश में चिकित्सा सेवाये भी शिक्षा सेवाओं की तरह आम आदमी से कोसों दूर हो गयी हे। देश की जनता को इन पंचतारा लक्षागृहों की मकड़ जाल से कोन बचायेगा। शेष श्रीकृष्ण कृपा। हरि ओम तत्सत्। श्रीकृष्णाय् नमो।

Wednesday, December 7, 2011

तीन पीड़ियों का एक अधूरा सपना


तीन पीड़ियों का  एक अधूरा सपना
सपना बाप का भी वही
सपना हो दादा का भी वही
एक छोटा सा घर हो अपना
सपना पोता का भी है वही ।
एक पक्का घर बनाने की
आश में मिट जाती है
गरीबों की कई पीडियां
पर न ही वह घर ही बनता
नहीं रहते है वे आदमी ।
पर लुटेरों के महलों को
रोशन करने के लिए
तबाह की जाती है
गरीबों की बस्तियां
पर इन गरीबों का
एक पक्का घर बनाने का
पीडियों का सपना अधूरा।।
सरकार कोई भी बने यहां
बनती सदा गरीबों के मतो से
पर वह गरीबों को मिटा कर
रोशन करती है अमीरों की दुनिया।।
देवसिंह रावत (7दिसम्बर बुद्ववार 2011 रात के 12.27)

Tuesday, December 6, 2011

विधानसभा चुनाव में भी भाजपा की लूटिया डुबोयेंगे खंडूडी



विधानसभा चुनाव में भी भाजपा की लूटिया डुबोयेंगे खंडूडी/
-भाजपा को डूबता जहाज मान कर दामन छोड़ रहे हैं भाजपा नेता/
एक तरफ नैनीताल में भाजपा के राष्ट्रीय महामंत्रियों की बैठक में भाजपा ने उत्तराखण्ड में होने वाले आगामी विधानसभा चुनाव मुख्यमंत्री खण्डूडी के ही नेतृत्व में कराये जाने की आत्ममुग्ध ऐलान की गूंज, प्रदेश की जनता के कानों तक भी नहीं पंहुच पायी थी कि सीमान्त जनपद पिथौरागढ़ की जिला पंचायत अध्यक्षा सुनीता देवी ने भाजपा को डूबता जहाज समझते हुए उसका दामन छोड़ कर कांग्रेस का दामन थामने का ऐलान कर प्रदेश की राजनीति में जनभावनाओं का आयना भाजपा को दिखा कर, भाजपा के रणनीतिकारों की नींद ही उडा दी। हालांकि यह पहली बार नहीं हुआ कि भाजपा समर्थक किसी जिला पंचायत अध्यक्ष ने प्रदेश में भाजपा के शासन में उत्तराखण्ड में भाजपा का दामन छोड़ा हो। इससे पहले 13 जनपदों के प्रदेश में 3 भाजपा समर्थक जिला पंचायत अध्यक्षों ने भाजपा का दामन इस सरकार के वर्तमान कार्यकाल में छोड़ दिया हे। सबसे पहले प्रदेश की थोपी गयी राजधानी देहरादून की जिला पंचायत अध्यक्षा ने भाजपा के हवाई नेतृत्व को जमीनी हकीकत का अहसास कराया। उसके बाद टिहरी के जिला पंचायत अध्यक्ष रतन सिंह गुनसोला जो टिहरी में ही नहीं प्रदेश में भाजपा के सबसे वरिष्ठ व मजबूत नेताओं में जाने जाते थे उन्होंने खण्डूडी की दूबारा ताजपोशी के चंद दिनों के अंदर ही भाजपा नेतृत्व की आत्मघाति व अलोकशाही सोच के कारण प्रदेश भाजपा से नाता तोडते हुए, भाजपा की जनविरोधी व भ्रष्टाचार संरक्षक नीतियों से खपा हो कर इस्तीफा देने वाले पूर्व सांसद ले. जनरल तेजपाल सिंह रावत के नेतृत्व में बने उत्तराखण्ड रक्षा मोर्चा का दामन थाम कर भाजपा को पूरी तरह से बेनकाब ही कर दिया था।
भले ही भाजपा उत्तराखण्ड में 2012 में होने वाले विधानसभा चुनाव में फिर से सत्तासीन होने के तमाम हवाई दावे करते हुए प्रदेश में भाजपा से मोह भंग जनता को लुभाने के लिए वहां पर अपने जनता की नजरों में बुरी तरह से असफल मुख्यमंत्री लगने वाले निशंक को आनन फानन में बदल कर पहले ही जनता द्वारा ठुकराये गये खंडूडी की ताजपोशी मुख्यमंत्री के रूप में की गयी हो, परन्तु जिस प्रकार से प्रदेश में भाजपा का दामन एक के बाद एक  भाजपा समर्थक जिला पंचायत अध्यक्ष  व  पूर्व सांसद जनरल तेजपाल सिंह रावत जैसे कद्दावर नेता छोड़ रहे हों तो उससे  राजनैतिक समीक्षकों को ही नहीं यह है कि भाजपा के बडे दिग्गजों को एक आशंका भयभीत कर रही है कि कहीं  खण्डूडी फिर लोकसभा चुनाव की तरह विधानसभा चुनाव में भी  भाजपा की आशाओं में पानी फेरने वाले जनरल तो साबित नहीं होगे।  हालांकि लोगों की यह आशंका हवाई नहीं है इसके पीछे खण्डूडी की हवाई राजनीति व अलोकतांत्रिक सोच कहीं ज्यादा जिम्मेदार है। जिस प्रकार से खंडूडी ने अपनी दूसरी पारी में जनहितों व ईमानदारी से काम करने के बजाय ‘कमजोर लोकायुक्त बनाने के बाबजूद हवाई कलाकारी कर उसको मजबूत लोकायुक्त बता कर देश भर में वाह वाही लूट कर जनता की आंखों में धूल झोंकने का हथकण्डा अपनाया, उसकी कलई खुलने के बाद जनता इस विश्वासघात से खंडूडी जी से खपा है। खंडूडी जी व भाजपा के दिल्ली बैठे हुए नेताओं को इस बात का अहसास होना चाहिए कि जनता का विश्वास ईमानदारी से हर कोई जीत सकता है परन्तु उसकी आंखों में धूल झोंक कर विश्वासघात करने वाले दोहरे लोगों को जनता कभी माफ नहीं करती है। यही हाल प्रदेश में विकास पुरूष की छदम छवि से जनता से विश्वासघात करने वाली कांग्रेस के बाद भाजपा का आगामी विधानसभा चुनाव में ठगपाल का झुनझुना पकड़वा कर छलने वाले खण्डूडी का भी जनता लोकसभा चुनाव की तरह न करदे, इसी आशंका से भाजपा के दिल्ली दरवार के आला नेता सहमें हुए हैं।
दिल्ली में 23.74 करोड़ रूपये की लागत से नव निर्मित उत्तराखण्ड सदन के लोकार्पण के अवसर पर उत्तराखण्ड के मुख्यमंत्री भुवनचंद खंडूडी मेरी एक टिप्पणी पर बहुत ही विश्वास के साथ अपने समर्थकों की तरफ इशारा करते हुए जिस दंभ से कह रहे थे कि उनके ये सब जनरल हैं, परन्तु सत्तामद में आत्ममुग्ध मुख्यमंत्री को इस बात का शायद ही अहसास हो कि उनके नेतृत्व में प्रदेश भाजपा को डूबता हुआ जहाज समझते हुए उनके कई मजबूत लोकशाही के जनरल एक एक कर भाजपा का दामन छोड़ रहेे है।

अपने लिये नहीं अपितु प्रदेश के लिए सोंचे राज्य आंदोलनकारी


-अपने लिये नहीं अपितु प्रदेश के लिए सोंचे राज्य आंदोलनकारी/
-जब घर में तबाही की ज्वाला धधक रही हो तो उस समय उस ज्वाला को समाप्त करने के लिए पानी की बाल्टी डालने के बजाय अपनी रोटी के लिए आंसू बहाना कोई बुद्विमता नहीं है। /
इस सप्ताह खबर आयी कि ऋषिकेश उत्तराखंड राज्य आंदोलनकारी संघर्ष समिति ने सरकार पर आंदोलनकारियों की उपेक्षा का आरोप लगाते हुए गत शुक्रवार से शहीद स्मारक में अनिश्चितकालीन धरना प्रदर्शन शुरू कर दिया है। आंदोलनकारी खपा थे कि सरकार उनकी मांगे नहीं मान रही है। उनकी सुध नहीं ले रही है। आंदोलनकारियों को सरकारी सुविधाएं दिए जाने की मांग को लेकर संयुक्त संघर्ष समिति द्वारा लगातार सरकार को अवगत कराया जा रहा था, लेकिन इस संबंध में कोई कार्रवाई न होता देख आंदोलनकारियों ने विरोध स्वरूप धरना प्रदर्शन शुरू कर दिया है।
इस खबर को पढ़ कर मेरे मन में सदा की तरह एक ही सवाल गूंजा कि क्या हमने अपने हकों के लिए या अपने सम्मान के लिए यह राज्य आंदोलन में भाग लिया था। मेरा तो मानना रहा है कि सरकार हमारा मान करे या अपमान, हमें उससे कोई शिकायत नहीं। शिकायत ही नहीं आश भी नहीं। मेरी तो हमेशा एक ही आश रहती हे कि सरकार प्रदेश के हितों की रक्षा करे। उन सपनों को साकार करे जिसके लिए मेरे जेसे हजारों आंदोलनकारी ने अपना सर्वस्व निछावर कर प्रदेश गठन के सपने को साकार किया था।
ऐसा नहीं कि ऐसी मांगे या आंदोलन केवल ऋषिकेश में ही की जा रही हो। ऐसी मांग प्रदेश में ही नहीं दिल्ली सहित हर उस स्थान के आंदोलनकारी शहर से की जा रही हे जहां लोगों ने उत्तराखण्ड राज्य गठन के लिए ऐतिहासिक आंदोलन किया था। आंदोलनकारी भी आम आदमी की तरह इन्सान ही तो हैं। उनके भी परिवार है, उनको भी ससम्मान जीने का हक है। उन्होंने ऐतिहासिक कार्य भी किया। एक आम आदमी या नेताओं की तरह उन्होने अपना घर परिवार के लिए धन या सम्पति जुटाने के बजाय पूरे प्रदेश व देश के विकास के लिए उत्तराखण्ड राज्य गठन के लिए अपना जीवन दाव पर लगाया था। इसी लिए प्रदेश का गठन करने के लिए तत्कालीन सरकारें मजबूर हुई थी। उनका सम्मान करना सरकारों का दायित्व भी हे। परन्तु आंदोलनकारी ऐसी मांग करे, यह मुझ जैसे अदने आंदोलनकारी के लिए कभी स्वीकार नहीं होगी। क्योंकि मेरा साफ मानना हे कि आंदोलनकारी अपने हितों से अधिक प्रदेश के उन जनांकांक्षाओं को साकार करने के लिए जुटना चाहिए जिसके लिए प्रदेश का गठन किया गया था। जिसके लिए हमारे साथियों ने अपनी शहादते दी थी। जिसके लिए हमने अपना जीवन इस पर कुर्वान कर दिया था। वह सपना आज भी अधूरा है। उस सपने पर प्रदेश के हुक्मरान ग्रहण लगा चूके है। राजधानी गैरसेंण हो या मुजफरनगरकाण्ड के अभियुक्तों को सजा दिलाने वाली बातें अभी नहीं पूरी हुई। परिसीमन से प्रदेश का भविष्य तबाह हो चूका है। प्रदेश के हुक्मरानों ने अपनी संकीर्ण सत्ता लाोलुपता के खातिर प्रदेश को जातिवाद व क्षेत्रवाद तथा भ्रष्टाचार के गर्त में धकेल कर प्रदेश के उन सपनों व आशाओं की निर्मम हत्या कर दी है जिसके लिए प्रदेश का गठन किया गया था। प्रदेश का दुर्भाग्य रहा कि यहा पर तिवारी जेसे उत्तराखण्ड विरोधी व खण्डूडी -निशंक जेसे अदूरदर्शी व तिकडमी नेता रहे। प्रदेश की जनता यहां पर हिमाचल के भाग्य विधाता रहे यशवंत सिंह परमार जैसे नेतृत्व की आज भी बाट जोह रही है। संसद की चैखट जंतर मंतर पर राज्य गठन के लिए मैने अपने साथियों के साथ जिस उत्तराखण्ड राज्य गठन के लिए ऐतिहासिक धरना प्रदर्शन रूपि तपस्या की। पुलिस की लाठियां, दमन, विरोधियों के षडयंत्र सह कर भी अपने लक्ष्य से नहीं भटके, । आज उस राज्य के गठन के बाद गत 11 सालों में यहां के हुक्मरानों ने जो दुर्दशा की उससे मन बहुत आहत है। हमारे साथियों ने अपनी वेदना प्रकट की, कई मुझसे दूरभाष पर भी अपनी वेदना प्रकट करते है। कई पत्रों से । पर मेरा साफ मानना है कि जब घर में तबाही की ज्वाला धधक रही हो तो उस समय उस ज्वाला को समाप्त करने के लिए पानी की बाल्टी डालने के बजाय अपनी रोटी के लिए आंसू बहाना कोई बुद्विमता नहीं है। हमारा पहला दायित्व है प्रदेश की जनांकांक्षाओं को साकार करना जिसके लिए राज्य गठन के बाद भी बाबा मोहन सिंह उत्तराखण्डी व भाई कठैत को अपनी शहादत देनी पड़ी।

भारत के नहीं अमेरिका के हितों की रक्षा के लिए क्यों उतावले हैं प्रधनमंत्री मनमोहन



भारत के नहीं अमेरिका के हितों की रक्षा के लिए क्यों उतावले हैं प्रधनमंत्री मनमोहन/
- एनजीओ, मीडिया, न्यायपालिका व प्रधानमंत्री को दायरे में रखने वाले लोकपाल का गठन रके सरकार /
प्यारा उत्तराखण्ड
 अमेरिका की बहु राष्ट्रीय बड़ी कम्पनियों के लिए भारतीय खुदरा बाजार खोलने की मनमोहन सरकार की अंधी जिद्द के कारण संसद का शीतकालीन सत्र का एक सप्ताह से अधिक  हाय हल्ला की भैंट चढ़ गया।  आखिरकार मनमोहनसरकार को अपना कदम मजबूरी में वापस लेना पडा।  इस प्रकरण से एक बात देश के प्रबुद्व जनों को समझ में नहीं आ रही है कि जब देश में मंहगाई, आतंकवाद, भ्रष्टाचार व बेरोजगारी  से देश त्रस्त है ऐसे में इन ज्वलंत समस्याओं का समाधान करने के बजाय देश की केन्द्र सरकार क्यों अमेरिका के हितों की पूर्ति के लिए देश का खुदरा बाजार खोलने के लिए उतावली हो रही है। मनमोहन सिंह सरकार के कार्यो पर एक नजर मारी जाय तो स्पष्ट हो जाता है कि यह सरकार देश की ज्वलंत समस्याओं के निदान करने में न केवल नितांत असफल रही अपितु यह सरकार इन समस्याअ ों के समाधान करने के लिए ईमानदार भी नहीं रही।
देश में चारों तरफ से अमेरिका, पाक व चीन का शिकंजा कस रहा है।  उस समय देश के हितों की रक्षा के लिए मजबूत कदम उठाने के बजाय वह अमेरिका के हितों के पोषण या उसकी रणनीति को अमली जामा पहनाने का काम करते ही नजर आते है। मामले चाहे अमेरिका से परमाणु समझोता करने का हो या कश्मीर समाधान की दिशा में उठाने वाले कदम का हो। मनमोहन सरकार के ये सब कदम भारतीय हितों की पूर्ति करते कम अमेरिका के हितों की रक्षा करते हुए ज्यादा नजर आते हे।
मनमोहन सिंह सरकार का दायित्व मंदी के दौर से दम तोडती अमेरिकी अर्थव्यवस्था को मजबूती प्रदान करने का नहीं अपितु भारतीय अर्थव्यवस्था को मजबूत करने का है। हो सकता है खुदरा व्यापार को खुलने से कई लाभ हों परन्तु देश के करोड़ों लोगों के जीवन को अंधकार व अनिश्चिता के गर्त में धकेलने के कीमत पर इतनी हाय तौबा इस को लागू करने के लिए क्यों मनमोहन सरकार मचा रही है। वह भी अपनी सरकार के अस्तित्व को खतरे मंे डाल कर भी। अमेरिका से परमाणु समझोता करते समय भी ऐसा ही काम मनमोहन सिंह ने किया। वाजपेयी की तरह मनमोहन सिंह ने भी कभी अपना अमेरिका प्रेम छिपाया नहीं। अमेरिका के ईशारे पर या अमेरिका को खुश करने की अंधी ललक से भारतीय हितों की किस निर्ममता से हत्या हुई इसका अंदाजा न तो इन सरकार के पेरोकारों को है व नहीं इनके समर्थकों को। देश इस समय अण्णा हजारे का भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन व बाबा रामदेव का काले धन की वापसी का आंदोलन से देश जुझ रहा है। देश की जनता भी इस आंदोलन में भागेदारी निभा रही है, ऐसे में मजबूत जनलोकपाल जिसमें एनजीओ, मीडिया, प्रधानमंत्री , नौकरशाही व न्यायपालिका सहित पूरा तंत्र समाहित हो , को संसद में पारित कराने के बजाय विदेशी कम्पनियों के लिए देश के एक बडे वर्ग को बदहाल करने के लिए द्वार खोलने के लिए अपनी सरकार को व अपनी पार्टी को दाव पर लगाना या जोखिम में डालने की मनमोहन सिंह की क्या मजबूरी होगी। मनमोहन सिंह अपनी जिम्मेदारी भारत की जनता या पार्टी के प्रति समझने के बजाय क्यों अमेरिका के प्रति समझ रहे है। 5 दिसम्बर  सोमवार को लोकसभा में सदन के नेता प्रणब मुखर्जी ने विपक्ष की नेता सुषमा स्वराज और माकपा नेता सीताराम येचुरी से सदन चलाने के मसले पर बात की। प्रणब ने बताया कि सरकार फिलहाल एफडीआइ के मुद्दे को स्थगित करने जा रही है और अब विपक्ष सदन चलाने में सहयोग करने की अपील कर अपनी रणनीति को उजागर किया। सरकार के इस कदम का उद्योग जगत से लेकर अधिकांश लोग विरोध कर रहे हे। यही नहीं कांग्रेसी नेता भी अपनी सरकार की इस मंशा के पक्ष में अंदर से सहमत नहीं है।  सोनिया गांधी को चाहिए कि अविलम्ब मनमोहन सिंह को देश के प्रधानमंत्री पद से हटा कर अपने दल की भारी मांग पर राहुल गांधी को प्रधानमंत्री के पद पर आसीन कर देश को अमेरिका के शिकंजे से मुक्त करने में अपने दायित्व का निर्वाह करना चाहिए।

बलि देने वालों से अधिक गुनाहगार हे कातिल सरकारें


बलि देने वालों से अधिक गुनाहगार हे कातिल सरकारें/
-पशु बलि, जनता बनाम कातिल सरकार/
उत्तराखण्ड के प्रसिद्व बूंखाल मेले में इस साल बलि नहीं हुई। लोगों ने सरकारी कानून के भय से बलि नहीं दी। ऐसा ही कई जगह हुआ। मेरे मन में एक विचार कई सालों से बार बार उठता है कि अपने हितों के लिए निरापराध जीव की हत्या करने वाले गुनाहगार है। चाहे दो टके लिए लाखों निरापराध पशुओं की कत्ल कराने वाली सरकार या देवी देवताओं या अल्लाह के नाम पर बलि या कुर्वानी  देने वाले लोग।  जब हम किसी को जीवन दे नहीं सकते तो हमे किसी का जीवन दे नहीं सकते तो हमें किसी निरापराध जीव की हत्या करने का कोई अधिकार नहीं हे। जब तक कोई हमारे प्राणों को हरने की चेष्टा न करे तब तक हमें किसी के प्राणों को हरने की चेष्टा ही नहीं करनी चाहिए। इस मामले में मैं आम लोगों से अधिक गुनाहगार भारत की सरकार को मानता हॅू। पश्चिमी देश या अरब देशों से यह आश करना अभी बेईमानी ही होगी। क्योंकि इनको अभी इस गुढ़ दिव्य ज्ञान का भान तक नहीं। भारतीय संस्कृति पूरे विश्व में अदभूत है। भारत में ज्ञान विज्ञान व आध्यात्म की सदियों से अमर गंगा बहती है। यहां पर सरकारें दो टके के लिए लाखों जीवों (बकरी, भैंस, गौवंश आदि जीवों) की निर्मम हत्या के लिए देश में कत्लगाह खुलाने वाले ईश्वर की आगे तो गुनाहगार हैं ही अपितु ये भारतीय संस्कृति पर कलंक ही नहीं अपितु एक प्रकार से हत्यारे भी हैं। खासकर मनुष्य जो प्रकृति प्रदत शाकाहारी जीव हे, वह सृष्टि के उन बेगुनाह जीवों की हत्या करे जो उसके जीवन के लिए कहीं दूर दूर तक संकट पैदा नहीं करते हों। उस पर हमला तक नहीं करते हों। ऐसे जीवों की हत्या करने वाले  प्रकृति के अपराधी है। चाहे वह सरकार हो या व्यक्ति। जो अपराध बलि देने वाले का है पशुओं की हत्या करने वाले का है, वहीं अपराध सरकार का भी है। यह अजीब बिडम्बना है कि इस मुल्क में एक कार्य जो अपराध है उसे व्यक्ति करे तो अपराध व सरकार करे तो माफ नहीं चलना चाहिए।  भारत की धरती पर निरांपराध जीवों की हत्या के लिए सरकार कत्लखाने चलाये या चलाने की इजाजत दे इससे बड़ा कलंक इस भारत जैसे विश्व गुरू समझे जाने वाले देश के लिए कोई दूसरा हो ही नहीं सकता है। इसके लिए में आज तक के तमाम हुक्मरानों जिसमें गांधी के नाम पर शासन चलाने वाली कांग्रेस व भारतीय संस्कृति के स्वयंभू झण्डेबरदार बने संघ के स्वयंसेवक रहे अटल आडवाणी की सरकार को भी में धिक्कारना चाहता हॅू। ये सभी सरकारें इस मुद्दे पर गुनाहगार है।
 इस पखवाडे मैं अपने गांव गया । वहां पर पांडव नृत्य हो रहा था। 25 नवम्बर को जब मैं गांव में पंहुचा तो मेरे साथ गांव जा रहे रेलवे में सेवारत मेरे भतीजे सुरेन्द्र सिंह रावत ने कहा ‘चाचा हम सही समय पर जा रहे हैं, आज हमारे यहां पाण्डव नृत्य का समापन भी है। देवताओं का आशीर्वाद भी हमें मिल जायेगा। मैं भी खुश था, कई सालों बाद मैं पाण्डव नृत्य के समय गांव पंहुच रहा था। जैसे ही दोपहर को गांव में पंहुचा तो पता चला कि वहां पर पाण्डव नृत्य के समापन के लिए दो बकरियों की बलि दी जायेगी। मेने पाण्डव नृत्य के समापन पर वहां न जाने का फेसला किया। पशुओं की बलि की बात सुनते ही मुझे गुस्सा आ गया। आता भी क्यों नहीं। कई साल पहले मैने ही अपने गांव में पाण्डव नृत्य में ही इस पशु बलि को न होने देने के लिए सफल अभियान चलाया था। देवी देवताओं के अवतरण के बाद मेने उनसे दो टूक एक ही बात पूछी थी कि इस निर अपराध बकरी की हत्या क्यों ? बताया गया कि एक बकरी भूमियाल देवता व दूसरी बकरी माॅं भगवती के थान में मारी जायेगी। यानी बलि दी जायेगी। मैने कहा कि भूमि का स्वामी यानी भूमियाल भगवान विष्णु माने जाते हैं वे सात्त्विक वृति के हैं, उनके नाम पर बलि एक अपराध है। वहीं दूसरी तरफ माॅं भगवती के नाम पर बलि । मैंने देवी अवतरित व्यक्ति से दो टूक शब्दों में पूछा कि ‘ या देवी सर्वभूतेषू मातृ रूपेण संस्थिताम... यानी जो माॅं भगवती सारी सृष्टि के जीवों की माता है, उसके आगे उसके पुत्र की बलि कौन सी पूजा हे। संसार की कौन सी माॅं ऐसी होगी जो अपने आगे उसकी पूजा के नाम पर उसके बेटे की हत्या करने वाले तथाकथित भक्तों से प्रसन्न होगी? मेरी बात पर देवी अवतरित व्यक्ति ने कहा कि बलि मुझे नहीं मेरे वीर गणों को चाहिए। मेने कहा जिसके दर्शन मात्र से जन्म जन्मांतर के पाप नष्ट हो जाते हैं, उन दिव्य स्वरूपा माॅं भगवती के साथ रहने वाले गणों की ऐसी वृति हो ही नहीं सकती कि वे किसी निरापराध जीव की हत्या कराने के लिए अपने भक्तों से पूजा कराये।  मेरी इन दलीलों से निरूतर गांव के मठाधीशों ने उस समय बलि रोक दी थी। परन्तु इस पखवाडे की। मैं गुूस्से में था। उसी समय घर पंहुचा हुहा था। मेरी धर्मपत्नी मेरे स्वभाव को जानती है। क्योंकि एक समय पहले मेरे ही कहने पर मेरा परिवार गांव में कई दशकों बाद आयोजित माॅं नंदा की स्यलपाती में इसी बलि के कारण सम्मलित नहीं हुए थे। उस समय भी लोगों ने तर्क दिया था कि जब आप बलि में सम्मलित न हो परन्तु अपने परिवार का अंशदान रूपये जो गांव के प्रत्येक परिवार पर लगा रखे हैं उसको दो। मैने कहा कि अंशदान देने का मतलब उस निरापराध पशु की हत्या में सम्मलित होना। पूरे क्षेत्र में हमारे गांव में आयोजित इस विशाल स्यलपाती आयोजन के कई दिनों के इस मेले में मेरा परिवार सम्मलित नहीं हुआ। उन्होंने कितनी जलालत सही होगी। कितने ताने सहे होंगे। इसका मुझे अहसास है। में अपनी पत्नी के इस त्याग के लिए उसको शतः शतः नमन् करता हॅू कि उसने मेरे सिद्वान्तों के कारण तमाम अपमान व परेशानियां झेलते हुए भी कभी उफ तक नहीं की। तमाम बदहालियां, परेशानियां व जनविरोध को झेलने के बाबजूद कदम कदम पर मजबूती से मेरा साथ दिया।
 सवाल हमारे गांव के पाण्डव नृत्य का हो या कहीं और। हमारे उत्तराखण्ड में पहले हर काम में बलि का विधान था। शादी हो गयी तो बहु के मायके वालों को मसाण के नाम पर बलि दे कर उनकी उदर पूर्ति बकरे से की जाती थी। कदम कदम पर बकरे की बलि। किसी को दुख बीमार हो या शादी व्याह। मनौती हो या क्रिकेट मैचादि। कोई भी समारोह तो बकरे की शामत।
हालांकि लोगों में कई प्रकार से जागृति आ गयी। जब मैं गांव में था तो उस समय हमारे यहां पर लोगों के कान  बूंखाल मेले में के बलि के बारे में जानकारी जान कर हस्तप्रद थें। वहां पर हजारों की संख्या में बलि होती थी। पौडी जनपद के बालि कण्डारस्यूं पट्टी में कालिंका के नाम से प्रसिद्व इस मेले में बलि प्रथा बंद हुई तो सरकार के दण्ड के दम पर, हालांकि लोगों में कुछ जागृति भी आयी। ऐसी जागृति हमारे क्षेत्र में ही नहीं पूरे प्रदेश में आयी। मेने देखा जब मैं गांव में था तो हमारे यहां चैपता चैंरी व चिरखून गांव में हो रही माॅं भगवती की अठवाड पूजा नृत्य में बलि कई वर्षो से नहीं की जा रही है। ऐसी ही चमोली जिले के गणाई गांव में भी ऐसा ही प्रयास किया जा रहा है। गांव में इसी पखवाडे 64 साल बाद एक अनुष्ठान आयोजित किया गया। यहां पर 64 बलि देने का विधान था। पशु बलि रोकने के लिए जिला पंचायत अध्यक्ष और प्रशासन के अधिकारी ग्रामीणों से बातचीत के बाद मामला सुझा। वहीं  दूसरी ओर प्रशासन ने पूजा स्थल पर निषेधाज्ञा लगा देने और एहतियातन पुलिस बल भी तैनात देने से जोशीमठ तहसील के गंणाई गांव में 64 साल बाद चंडिका भगवती के मंदिर में पूजा अनुष्ठान सात्त्विक रूप से सम्पन्न हुआ। कई सामाजिक संस्थाओं ने लोगों में जागृति लाने का काम किया। टिहरी में यही काम कई वर्ष पहले माॅं चन्द्रबदनी में किया गया। ऐसा ही कुमायूं मण्डल में भी बलि प्रथा को रोकने के लिए किया गया। यह कार्य निरंतर चल रहा है। परन्तु सवाल यह है कि अगर बलि प्रथा जीव हत्या है तो देश की सरकारों के लिए यही कार्य पुण्य क्यों? क्यों सरकार देश में तमाम कत्लगाह बंद नहीं करती। एक देश में दो विधान नहीं चलने चाहिए। सरकार को देश में  हिन्दू, मुस्लिम सहित अन्य धर्मो के इस प्रकार के पर्वो पर दी जाने वाली बलि या कुर्वानी पर प्रतिबंध के साथ देश के तमाम कत्लगाह बंद कर देश की जनता से देश की संस्कृति को अब तक कलंकित करने के लिए माफी मांगनी चाहिए। शेष श्रीकृष्ण कृपा। हरि ओम तत्सत्। श्रीकृष्णाय् नमो।

Friday, December 2, 2011

अण्णा हो या सरकार

अण्णा हो या सरकार
अण्णा हो या सरकार
सुनलो कान लगाय
भारत में नहीं चाहिए
एनजीओ, जनप्रतिनिधियों
व नौकरशाहों को 
बचाने वाला ठगपाल।
एक देश में हो एक विधान
एक दण्ड हो एक सम्मान
जनता हो या नेता 
अधिकारी हो या न्यायाधीश
कानून सबके लिए हो समान 
ऐसा बने भ्रष्टाचार पर अंकुश 
लगाने वाला जन लोकपाल।। www.rawatdevsingh.blogspot.com

Thursday, December 1, 2011

भारतीय लोकशाही पर ग्रहण लगाता परिवारवाद

भारतीय लोकशाही पर ग्रहण लगाता परिवारवाद /
-नेहरू गांध्ी वंश पर परिवारवाद का आरोप लगाने वाले भी परिवारवाद फैलाने में बदतर /
मैं भी दशकों से एक ही तोता रटन लगाये हुए था कि भारत विश्व की सबसे बड़ी लोकशाही है। मुझे भी भ्रम था कि देश में लोकशाही विद्यमान हैं। परन्तु कुछ समय पहले देश के अग्रणी चिंतक व प्यारा उत्तराखण्ड के प्रबंध् सम्पादक ने प्रतिभाशाली युवा उद्यमी व भाजपा नेता डा विनोद बछेती व उत्तराखण्ड राज्य आंदोलन के प्रखर आंदोलनकारी अनिल पंत के साथ  एक बेठक में हंसी मजाक में कहा कि भई को तो चंद परिवारों द्वारा संचालित किया जा रहा है। मैने सोचा भाई साहब कहीं संघ परिवार या अमेरिका के नाटो परिवार या राजग-सप्रंग गठबंध्न की बात तो नहीं कर रहे है। पिफर थोड़ी देर अपने माथे पर जोर दे कर मैने सोचा कहीं भाई साहब गांध्ी-नेहरू परिवार की तो बात नहीं कर रहे है। मैं इसी उलझन में उलझा हुआ था कि उन्होने अपनी बात से रहस्य के पर्दों को खुद ही  पर्दा हटाते हुए कहा कि देखो इस देश में गांध्ी नेहरू परिवार के छह वयस्कों में से चार सांसद है। सोनिया, राहुल, मेनका व वरूण। दो वयस्क प्रियंका  व वढ़ेरा भी सांसद होते अगर वे जरा सी भी इस तरपफ चाहत रखते। वे अपनी खुशी से अभी सांसद न बनने का मन बनाने के कारण देश में सांसद नहीं है। नहीं तो क्या मजाल की वे संसद सदस्य नहीं होते। उनकी कृपा से अन्य दो भारतीयों को संसद में जाने का दुर्लभ अवसर मिल गया। नहीं तो प्रियंका व वढ़ेरा भी नेहरू परिवार के अन्य वयस्क सदस्यों की तरह देश की संसद के घोषित सदस्य होते। हालांकि संसद सदस्य न होते हुए भी उनका रूतवा आज भी देश के प्रधनमंत्राी से कम नहीं है। वे कुछ न होने के बाबजूद सबकुछ हैं नेहरू परिवार की अन्य सदस्यों की तरह देश के सम्मानित नेता हैं। देश की आम जनता ही नहीं देश के अध्किांश नेता भी उनको अपना नेता मान चूके हैं। यह उन दोनों का बढ़पन है कि दोनों ने सांसद बनना अपनी मर्जी से कहो या रणनीति से तहत स्वीकार नहीं किया है। नेहरू गांध्ी वंश की प्रमुख झण्डेबरदार सोनिया गांध्ी व राहुल गांध्ी जहां देश की सरकार के सरपरस्त है, तो वहीं गांध्ी नेहरू वंश के मेनका व वरूण गांध्ी मुख्य विपक्षी दल भाजपा के प्रमुख नेताओं में कमान संभाले हुए हैं। पक्ष व विपक्ष दोनों दलों में आज नेहरू गांध्ी परिवार का ही झण्डा पफहरा रहा है। उन्होंने चंद उदाहरण दिये। परन्तु घर आने के बाद मैने इस विषय पर पिफर सोचा तो मेरी आंखें पफटी की पफटी रह गयी। हालांकि इस मुद्दे पर मैने प्यारा उत्तराखण्ड में एक लम्बा लेख लिखा था।
इस देश में केवल ऐसा नहीं कि गांध्ी नेहरू परिवार के लोग ही सांसद है। वंशवाद के लिए कुछ दशक पहले गांध्ी नेहरू परिवार को पानी पी पी कर गाली देने वाले जनता पार्टी परिवार के विखरे कुनबे के क्षत्राप सपा के मुलायम सिंह यादव का परिवार का दूसरा नाम सपा है। वे व उनके सुपुत्रा ही नहीं उनके भाईयों ने भी संसद से लेकर विधनसभा में अपने परिवार का झण्डा बुलंद कर रखा है। इंदिरा गांध्ी को वंशवाद के कोसने वाले स्व. चरणसिंह के सुपुत्रा चै. अजित सिंह की अध्यक्षता वाली राष्ट्रीय लोकदल में उनके पुत्रा जयंत भी चैध्री वंश का झण्डा बुलंद किये हुए है। बसपा में अन्य जमीनी नेताओं के मुकाबले काशी राम ने मायावती को आगे किया। उप्र में जमीन से उखड चूकी कांग्रेस को पिफर से पेर जमाने के उद्देश्य से ही वरिष्ठ व समर्पित कांग्रेसियों को दरकिनारे करके समाजवादी पार्टी से जुड़ी रही  रीता बहुगुणा को भी उनके दिग्गज नेता रहे पिता स्व. हेमवती नन्दन बहुगुणा की अपार ख्याति की पफसल को काटने के लिए ही अध्यक्ष बनाया गया। वहीं स्व. बहुगुणा के नाम को भुनाने के खातिर उनके बड़े बेटे विजय बहुगुणा को कांग्रेस ने गढ़वाल से राजनीति में उतारा तथा शेखर को उप्र की राजनीति में।
 वहीं हरियाणा में तो कांग्रेस हो या अन्य विपक्षी दल सभी में परिवारवाद ही चल रहा है। चैध्री देवीलाल जो परिवारवाद पर इंदिरा गांध्ी को कोसते थे उन्होंने ने भी चोध्री चरणसिंह की तरह अपने दल में अपना उतराध्किारी अपने बेटे चोटाला को ही बनाया। चैटाला ने अपने दोनों बेटों अजय व अभय को अपना सेनापति बना कर अपने परिवार का झण्डा बुलंद कर रखा है। इस मामले में स्व. वंशी लाल भी पीछे नहीं रहे। जब हरियाणा के तीन लालों ने इस दिशा में अपने परिवार का झण्डा बुलंद किया तो हरियाणा का तीसरा प्रसि( लाल भजनलाल कैसे पीछे रहते। उन्होंने ने भी अपने हरियाणा विकास कांग्रेस की बागडोर अपने सुपुत्रा के हाथों में सौंप दी। सोनिया गांध्ी के आशीवार्द से हरियाणा के चार लालों के युग समाप्ति का शंखनाद करने वाले भूपेन्द्रसिंह हुड्डा ने भी अपने सुपुत्रा को सांसद बना कर अपने परिवार का झण्डा अन्य तीनों लालों की तरह बुलंद ही रखा है। हिमाचल में तो राजशाही ही दशकों तक चली, परन्तु राजशाही के प्रतीक वीरभद्र सिंह ने राजा होते हुए भी इसे बहुत ही लोकशाही के रंग में हिमाचल का विकास हिमाचल के शिल्पी समझे जाने वाले प्रथम मुख्यमंत्राी यशवंत सिंह परमार की तरह ही किया। जिसे लोकशाही की आड़ में नये शासक बने नेताओं को सबक लेना चाहिए। हालांकि राजा वीरभद्र ने भी अपनी रानी साहिबा को भी सांसद बनाया। भाजपा के वर्तमान मुख्यमंत्राी ध्ूमल ने तो अपने बेटे को आगे बढ़ा कर अपने परिवार का झण्डा भाजपा में भी बुलंद किया हुआ है। उन्हीं ध्ूमल के सांसद बेटे को भाजपा ने युवा मोर्चा की राष्ट्रीय कमान सौंपी है। 
    इसी तरह महाराष्ट्र में तो ठाकरेशाही इसी परिवारवाद के मोह मंें पफंस कर मजबूत पकड़ होने के बाबजूद अपनी आत्महत्या को उतारू है। भाजपा नेता प्रमोद महाजन के स्वर्गवास होने पर उनके परिवार को ही भाजपा ने आगे किया है। वहीं कांग्रेसी नेताओं ने तो बाजी ही मार रखी है। देशमुख हो या राणे, शिंदे हो या अन्य नेता सभी ने अपनी परिवार की डोर को आगे बढ़ाने का ही काम किया। वर्तमान मुख्यमंत्राी चव्हाण को तो मुख्यमंत्राी की कुर्सी उनके स्व. पिता चव्हाण की गांध्ी नेहरू परिवार की वपफादारी को देखते ही सोनिया गांध्ी ने प्रदान की। परिवारवाद के महाराष्ट्र में सबसे बड़े पोषक बन कर उभरे राकांपा के शरद पवार ने अपने भतीजे के बाद अब अपनी बेटी को संसद में भेज कर लोकशाही की आड़ में छुपाया अपना मुखौटा खुद ही बेनकाब कर दिया।
    तमिलनाडू में तो लोकशाही पर परिवारवाद ही इतना हावी है कि यहां लोग इससे आगे देखने के लिए भी तेयार नहीं हैं। द्रविण परिवार की राजनीति के बंटने के बाबजूद तमिलनाडू की सत्ता करूणानिध्ी व जयललिता के बीच ही हिलोरे लेती है। करूणानिध्ी के कुनबे का तमिलनाडू की राजनीति में ऐसा बर्चस्व है कि जिसकी कल्पना ही करना सहज नहीं है। सत्ता के सभी प्रमुख संस्थानों पर उनका शिकंजा है। करूणानिध्ी की दो तीन पत्नियों व उनके आध दर्जन बच्चों में अध्किांश महत्वपूर्ण पदों पर आसीन है। जो संसद से लेकर विधनसभा में करूणानिध्ी परिवार का झण्डा बुलंद कर रहे है। परन्तु वयोवृ( करूणानिध्ी के उत्तराध्किारी कौन होगा इसमें उनके मंझे हुए राजनेता साबित हो रहे स्टालिन व दूसरी पत्नी के बेटे के बीच बर्चस्व का विवाद चरम पर है। वहीं दूसरी तरपफ जयललिता भले ही अपने नायक के प्रति पूरी तरह से एकनिष्ट रही हो परन्तु उन पर अपनी सहेली के पुत्रा को आगे बढ़ाने का आरोप लगता ही रहता है।
इसके साथ आंध््र प्रदेश में कहना ही क्या। वहां पर लोकशाही पर परिवारवाद कितना हावी है इसका नजारा पूर्व मुख्यमंत्राी रेड्डी के पुत्रा जगनमोहन की प्रदेश के मुख्यमंत्राी पद पर आसीन होने की प्रबल इच्छा ने कांग्रेसी सरकार पर ग्रहण लगा दिया हे। कांग्रेसी ही नहीं तेलगू देशम के जनक एनटी रामाराव के दामाद चन्द्र बाबू नायडू के नेतृत्व में चल रहा दल वास्तव  में लोकशाही की नहीं परिवारशाही का ही प्रतीक हे।
उडीसा में बीजू पटनायक के सुपुत्रा वर्तमान मुख्यमंत्राी नवीन पटनायक एक प्रकार से लोकशाही के नहीं परिवारवाद के प्रतीक है। इसी तरह परिवारवाद की आग में यहां के पूर्व मुख्यमंत्राी गिरध्र गोमांग का परिवार ही बिखर गया। उन्होंने मुख्यमंत्राी की कुर्सी पर आसीन होने के खातिर अपनी संसदीय सीट बचाने के लिए अपनी पत्नी हेमा गोमांग को दिल्ली सांसद बना कर क्या भेजा, उससे उनका परिवार ही बिखर गया। उनकी पत्नी ने अगले चुनाव में उनके लिए अपनी सीट छोड़ने से ही मना कर दिया। इस कारण उनके परिवार में विखराव ही हो गया।
वहीं पंजाब में तो लोकशाही को रोंद रहे परिवारशाही की कहने ही क्या। अकाली प्रमुख प्रकाशसिंह बादल का परिवारवाद अकाली दल के विस्तार पर ग्रहण लगा चूका है। उनका बेटा व उनकी पुत्रा बध्ु भी राजनीति में उतर चूकी हे। संसद से विधनसभा में प्रकाशसिंह बादल का परिवारवाद ही अकाली दल के नाम पर लहरा रहा है। वहीं कांग्रेसियों के तो कहने ही क्या। महाराजा पटियाला के वंशज पूर्व मुख्यमंत्राी अमरिन्दर सिंह व उनकी पत्नी संसद से विधनसभा में अपने परिवार की पताका लहरा रहे है।
अविभाजित मध्य प्रदेश में कांग्रेस में शुक्ला बंध्ुओं के बाद अजित जोगी तथा अर्जुनसिंह , दिगविजय तथा अब मोती लाल वोरा के परिवार का परचम पफहरा रहा है। मध्य प्रदेश में भाजपाई भी इसी रंग में रगंने की हौड़ कर रहे है। भाजपा कांग्रेस में सिंध्यिा परिवार का झण्डा दोनों पार्टियों में बहुत ही शान से पफहराया जा रहा है।
दिल्ली में तो मुख्यमंत्राी शीला दीक्षित ने दिल्ली के जमीनी कांग्रेसी दिग्गजों का पत्ता काटवा कर जिस प्रकार से अपने बेटे संदीप दीक्षित को सांसद बनाया। भाजपा के कई नेता अपने बेटों को आगे बढ़ाते रहे। कांग्रेसी व भाजपाई नेता इसी होड़ में यहां जुटे हुए है।
    इस मामले में बिहार की बात न हो तो सब कुछ अध्ूरा ही रह जायेगा। पिछड़ों के नाम पर राजनीति करने वाले लालू का कुनबा कैसे पूरे विहार को डेढ़ दशक तक लोकशाही को रौंदता रहा। दलित की नाम की राजनीति करने वाले राम विलास पासवान ने भले ही लालू की तरह अपनी गांव की पत्नी को आगे नहीं किया, परन्तु उन्होंने अपने भाईयों को राजनीति में जरूर आगे बढ़ाया। नितीश व शरद यादव इसके अपवाद जरूर रहे। परन्तु समाजवादी नेता जार्ज ने भले ही अपने परिवार को राजनीति में आगे नहीं बढ़ाया परन्तु अपनी विशेष चहेती जया जेटली को सांसद ही नहीं अपितु अपने दल की अध्यक्षा तक बना दिया था। कांग्रेस ने भी दिग्गज कांग्रेसी नेता रहे बाबू जगजीवन राम के नाम की पफसल काटने के लिए उनकी सुपुत्राी मीरा कुमार को कांग्रेसी राजनीति का झण्डाबरदार बनाया। 
    पूर्वोत्तर के राज्यों में मेघालय में जिस प्रकार से पी के संगमा ने अपनी नव युवती बेटी अगाध संगमा को केन्द्रीय राज्य मंत्राी बनाने में सपफलता हासिल की। असम, त्रिपुरा, मणिपुर व सिक्कम की स्थिति कुछ अलग नहीं है। गुजरात में भले ही वर्तमान भाजपा मुख्यमंत्राी नरेन्द्र मोदी का शासन चल रहा है परन्तु कांग्रेसी नेताओं का यहां लोकशाही की आड़ में चल रहा परिवारवाद बेशर्मी से निरंतर बढ़ता ही जा रहा है। यही प्रवृति राजस्थान सहित अन्य प्रदेशों में देखने में मिल रही है। राजस्थान में भाजपा की पूर्व मुख्यमंत्राी वसुंध्रा राजे सिंध्यिा हो या जसवंत सिंह या विद्रोही कांग्रेसी नेता नटवर सिंह सभी परिवार के वंशवेल को आगे बढ़ाने में लगे हुए है। कश्मीर में तो शेख अब्दुला वंश का तीसरा मुख्यमंत्राी प्रदेश की वर्तमान में कमान संभाले हुए है। शेख अब्दुला, पफारूख अब्दुला के बाद अब उमर अब्दुला परिवार वाद का झण्डा लोकशाही में भी बहुत ही शान से पफहरा रहे है। वही मुफ्रती मोहम्मद सईद ने अपनी बेटी महबूबा मुफ्रती को अपने परिवार की कमान सौंपी हुई है।  वहीं राजवंश के अंतिम चिराग समझे जाने वाले राजा कर्णसिंह कांग्रेसी राजनीति में वनवास भोगने के लिए अभिशापित हो रहे है।
    वहीं नवोदित उत्तराखण्ड राज में सत्ता अध्किांश कांग्रेस के हाथों में रही। इनके नेताओं में परिवारवाद कूटकूट कर भरा हुआ है। गोविन्द बल्लभ पंत के बेटे कृष्णचंद पंत व पुत्रा बध्ु इला पंत दोनों ही कांग्रेस व भाजपा की नेता रहे। इन दिनों भाजपा में हैं। नारायणदत्त तिवारी भले ही अपने घोषित परिजनों को न लाये हों परन्तु अपनी चेहतों को सदैव आगे लाने में वे पीछे नहीं रहे। उत्तराखण्ड में जहां देशभक्त राजनेताओं के शिरोमणि वीर चन्द्रसिंह गढ़वाली जैसे महानायक रहे हों, जिन्होंने जवाहर लाल नेहरू द्वारा केन्द्रीय मंत्राी पद पर आसीन करने के तमाम प्रलोभनों को ठुकराते हुए कांग्रेस से नहीं जुडें हों।  यहां के कांग्रेसी नेताओं में जहां नेहरू जी के केन्द्रीय मंत्राी मंडल से समाज सेवा के लिए सक्रिय राजनीति से भी इस्तीपफा देने वाले शिक्षाविद भक्तदर्शन जी जैसे नेता रहे हों परन्तु अब के नेताओं में जिस प्रकार से मैं व मेरा परिवार तक ही सीमित दृष्टिकोण हो गयी उससे उत्तराखण्ड की लोकशाही  ने यहां के राजशाही के ध्वंशावशेषों को भी पछाड़ दिया है। विश्व में ध्र्म ध्वजा पफहराने वाले सिरमौर सतपाल महाराज जहां सांसद हैं वहीं उनकी ध्र्मपत्नी श्रीमती अमृता रावत प्रदेश में वर्तमान में विधयक रहने से पहले प्रदेश सरकार में राज्यमंत्राी के पद पर भी आसीन रही है। वहीं उत्तराखण्ड के सबसे दिग्गज नेता हरीश रावत जो स्वयं केन्द्रीय राज्यमंत्राी हैं उनकी ध्र्मपत्नी श्रीमती रेणु रावत भी अल्मोड़ा संसदीय क्षेत्रा से कांग्रेस की प्रत्याशी रह चूकी हैं। वे अपने समकालीन नेताओं को मात देते हुए अपने मंझोले बेटे आनन्द रावत को प्रदेश युवक कांग्रेस के अध्यक्ष पद पर आसीन करा चूके है। इसके साथ उनकी बेटी व बेटे भी आगामी विधनसभा चुनाव में विधयक प्रत्याशियों के रूप में चुनावी दंगल में उतर जायें तो किसी को आश्चर्य नहीं होगा। इसके साथ कांग्रेसी राजनीति में प्रदेश में क्षत्राप बने विजय बहुगुणा या भाजपा की राजनीति में क्षत्राप बने भुवनचंद खंडूडी आज भले ही नेता हों परन्तु इनको स्थापित करने में स्व. हेमवती नन्दन बहुगुणा के नाम का ही एकमात्रा सहारा रहा। पूर्व केन्द्रीय मंत्राी ब्रह्मदत्त के सुपुत्रा हों या जौनसार  क्षेत्रा के एकक्षत्रा दिग्गज नेता रहे स्व गुलाब सिंह के सुपुत्रा प्रीत्तम सिंह हो या अन्य,  अपने परिवार का ही झण्डा बुलंद किये हुए है। यही स्थिति जिला पंचायत से लेकर क्षेत्रापंचायत व ग्राम प्रधन की है। यहां पर भी परिवारवाद का की वंशवेल भारतीय लोकशाही को पूरी तरह से जकड़ चूकी है।
    परिवारवाद की राजशाही से बूरी तरह से जकड़ चूकी भारतीय लोकशाही के अस्तित्व पर आज प्रश्नचिन्ह लग गया है। अगर पहले के नेता भी नेहरू गांध्ी सहित इन परिवार के पोषकों की तरह अपने अपने परिवारों को बढ़ावा देते तो भारतीय राजनीति में  विशाल आकाश में मुलायम-लालू, शरद पासवान, पवार, बादल व अजित इत्यादि कहीं दूर-दूर तक भी नहीं देखने को मिलते।  सबसे खतरनाक बात यह हे कि इसी तरह की प्रवृति देश के अन्य महत्वपूर्ण संस्थानों में देखने को मिल रही है। इस देश के पूरे तंत्रा पर करीब 300 परिवारों का कब्जा है। किन्हीं परिवारों का शिक्षा जगत पर तो किन्हीं परिवारों का चिकित्सा जगत में, किसी परिवारों का उद्योग जगत में तो किन्हीं परिवारों का न्याय जगत तथा मीडिया-मनोरंजन पर कब्जा है।  अब तो इस देश में खेल जगत पर भी किन्हीं परिवारों का कब्जा है। यही नहीं नौकरशाही में भी कई परिवारों का बर्चस्व बना हुआ है। ध्र्म के क्षेत्रा में तो सदियों से वंशवाद का ही वर्चस्व रहा। यही नहीं इस देश में लोकशाही में भी शोषित भी पीढ़ी दर पीढ़ी शोषित होने का ध्र्म निभा रहे हैं। कुल मिला कर इस देश में लोकशाही का कहीं दूर-दूर तक नामोनिशान देखने को नहीं मिल रहा है। इस मैं और मेरे परिवारवाद की प्रवृति ने जहां देश की प्रतिभावान नेतृत्व से वंचित किया वहीं देश की लोकशाही पर ग्रहण भी लगा दिया। आज इनके समर्थक इनको प्राइवेट लिमिटेड कम्पनी की तर्ज पर बोस कह कर आपसी बातचीत में वयान करते है। जिन कार्यकत्ताओं की सांझी मेहनत व त्याग से वे इतने बड़े पद पर पंहुचे होते हैं, उस पद पर पंहुचने के बाद योग्य कार्यकत्र्ता को आगें बढ़ाने के बजाय जब कोई नेता अपने परिवार व अपने रिश्तेदारों को ही आगे बढ़ाये तो समझ लो नेता का पतन हो गया। देश मे ंचाहे कितना ही आरक्षण व संरक्षण दे दो। महिलाओं को मिल रहे आरक्षण के नाम पर अध्किांश दलों के बड़े नेता पार्टी की समर्पित योग्य महिला नेत्री को आगे करने के बजाय अपनी पत्नी, बेटी, पुत्राबध्ु, रिश्तेदार व सहेली इत्यादि को ही आगे करते है। यही स्थिति युवाओं को आगे करने के मामले में देखी जा रही है। नेताओं के बेटे, भाई, रिश्तेदार या चारण ही आगे बढ़ रहे है। प्रतिभावान व निष्टावान समर्पित कार्यकत्ताओं के हिस्से दरी बिछाना व नेताओं के नारे लगाना तक सीमित रह गया है। पफट्टे  हाल नेता आज चंद सालों में ध्नकुवैर बन गये है। कार्यकत्र्ता निरंतर बदहाली  की गर्त में ध्ंसता ही जा रहा है।