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Friday, May 31, 2013

देश के हुमरानों व मीडिया शर्म करो, 


सरकारी भ्रष्टाचार पर पर्दा डालने के लिए क्रिकेट प्रकरण न उछालो


कोई देश के इन इलेक्ट्रोनिक समाचार चेनल वालों सहित भारत के समाचार जगत से पूछे कि उनको मनमोहन सरकार का कोयला घोटाला, रेल घोटाला, 2जी घोटाला सहित कई दर्जन घोटाले क्यों नहीं दिखाई दे रहे है? ये क्यों इन दिनों खुले सट्टे व पैसों के खेल आईपीएल में हुए घुस प्रकरण पर दिन रात ऐसा दिखा रहे हैं कि मानों क्रिकेट का यह घोटाला देश के सभी घोटालों का मूल है।
क्या यह देश का ध्यान इसी पखवाडे रेल व कोयले घोटाले में पूरी तरह घिर चूकी मनमोहन सरकार के घोटालों पनर पर्दा डालने का षडयंत्र नहीं है तो क्या है? चीन भारत की सीमा पर कब्जा कर रहा है, अमेरिका व चीन पाक को प्यादा बना कर देश पर आतंकी हमले कर रहे है। संसद से लेकर सीमा तक सुरक्षित नहीं है। चीन ने भारतीय सीमाओं पर ही अतिक्रमण नहीं किया अपितु उसने भारतीय अर्थव्यवस्था की रीढ़ समझे जाने वाले उद्योगों की कमर भी तोड़ दी। आज भारतीय बाजार चीनी माल से भरा हुआ है। देश के उद्योग धडाधड बंद हो रहे हैं। नक्सली दो जनपदों पर शिकंजा कस चूके है। भारत की सरकार, मीड़िया, राजनेता, बुद्धिजीवि इन समस्याओं पर गभीर चिंतन व देश रक्षा में युद्धस्तर पर जुटने के बजाय पैसों व सट्टे बाजी के खेल क्रिकेट में घूसबाजी पर दिन रात धरती आसमान एक किये हुए है? देश की जनता मंहगाई, भ्रष्टाचार, आतंकवाद पर अंकुश लगाने में पूरी तरह विफल रही मनमोहन सिंह की सरकार से त्राही-त्राह कर रही है और देश की बेशर्म मीडिया व राजनेता क्रिकेट की फिक्सिंग पर विधवा विलाप कर रहे है। क्या यही देश को पतन के गर्त में धकेलना नहीं तो क्या हे? शर्म आनी चाहिए इस देश के हुक्मरानों व मीडिया को जो देश की असली समस्याओं से लोगों का ध्यान हटाने के लिए क्रिकेट जैसे सट्टे के खेल पर लोगों का बलात ध्यान खिंच रहे हैं।

चुनावों में अपनी हालत पतली देख कर मुख्यमंत्री सहित तमाम नेताओं को आयी जनता व कार्यकत्र्ताओं की याद


क्या राज है मुख्यमंत्री बहुगुणा व यशपाल आर्य के कार्यकत्र्ताओं व जनता के लिए चंद दिनों से उमड़ रहे प्यार का

देहरादून (प्याउ)। आगामी लोकसभा चुनाव सर पर देख कर व प्रदेश में कांग्रेस को जनता द्वारा स्थानीय निकाय के चुनाव में बुरी तरह से नकारे जाने के बाद  उत्तराखण्ड के मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा व प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष यशपाल आर्य दोनों को जनता व कार्यकत्र्ताओं की याद आ रही है। कभी खुद को बंगाली मूल का बताने वाले व आम जनता से दूर रहने वाले प्रदेश के मुख्यमंत्री इन दिनों जनपद स्तर व विकासखण्ड स्तर पर यात्रा करके जहां एक तरफ लोकलुभावनी जनकल्याणकारी घोषणाओं का अम्बार लगा रहे हैं वहीं दूसरी तरफ अपनी ही पार्टी के शासन में उपेक्षित कार्यकत्र्ताओं का दिल जीतने के लिए प्रशासनिक अधिकारियों को धमका कर उनको कांग्रेसी कार्यकत्र्ताओं की उपेक्षा न करने की बात कह रहे हैं। केवल मुख्यमंत्री ही नहीं ऐसा नाटक प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष यशपाल आर्य भी कह रहे हैं कि संगठन सरकार से उपर है और सरकार को वफादार व वरिष्ठ कार्यकत्र्ताओं को दायित्व सरकार बनने के लम्बा समय गुजर जाने के बाद भी नहीं दिये जाने पर नाराजी जता रहे थे।
हकीकत यह है कि जिन कार्यकत्र्ताओं की मेहनत व आम जनता के विश्वास से प्रदेश में कांग्रेस सरकार सत्तासीन हुई उन कार्यकत्ताओं को ही नहीं आम जनता को भी ये नेता सत्तारूढ़ होते ही न केवल किनारे कर लेते है अपितु उनकी उपेक्षा करके प्रदेश के हितों के खिलाफ गहरा कुठाराघात भी करते है। यह केवल कांग्रेस पार्टी की बात नहीं आज की राजनीति में अधिकांश राजनैतिक दलों की स्थिति इसी प्रकार की हो गयी है। सत्ता मिलते ही नेता सत्तामद में चूर हो कर अपने निहित स्वार्थो में धृतराष्ट्र बन कर अपने बेटे बेटियों, परिजनों को स्थापित करने में ही युद्धस्तर पर जुट जाते है। इनके पास चुनाव से पहले न जनता के लिए समय होता है व नहीं कार्यकत्र्ताओं की ही सुध लेने की फुर्सरत। इनके असली लोकशाही चेहरा इनके आवास या कार्यालय में जाने से आम कार्यकत्र्ता या इनके क्षेत्र की जनता सहज ही देख सकती है। इनमें से अधिकांशों के घर के द्वार ही इन कार्यकत्र्ताओं व जनता के लिए नहीं ख्ुालते है। एकाद नेताओं को छोड़ दे तो इन नेताओं ने जनता व कार्यकत्र्ताओं को अछूत समझ कर घर के दरवाजे से ही बाहर रखने का काम कर दिया है। बिना उद्यम के साधारण परिवारों में पैदा होने वाले इन नेताओं के पास चंद वर्षो की राजनीति में ही कहां से कुबैर के समान अकूत दौलत आ जाती है। अगर इनके दो तीन पीड़ियों की ईमानदारी से जांच की जाय तो इनका असली चेहरा जनता के समझ आ जायेगा। हालांकि जनता इनमें से अधिकांश राजनेताओं की असली कुण्डली जानती है। यह हालत पूरे देश की राजनीति की है। परन्तु उत्तराखण्ड के राजनेताओं की स्थिति तो बेहद शर्मनाक है। चैधरी महेन्द्र सिंह, हीरासिंह बिष्ट व पूर्व सांसद महेन्द्र पाल जेसे अधिकांश  पार्टी के समर्पित निष्ठावान वरिष्ट नेताओं व कार्यकत्र्ताओं को सरकार व संगठन में दायित्व व सहभागी बनाने के बजाय सभी अपने बेटे बेटियों व परिजनों को ही महत्वपूर्ण पदों पर आसीन करने में जुटे रहते है। बेशर्मी की हद तो यह होती कि इनको चुनाव से पहले न तो अपने ही चुनावी घोषणा पत्र का भान रहता है व नहीं जनहितों का।
प्रदेश भाजपा की स्थिति तो कांग्रेस की तरह ही शर्मनाक है। यहां जनसमर्पित नेताओं के बजाय दिल्ली के मठाधीश अपने प्यादों को सत्ता आते ही मुख्यमंत्री थोप देते है। फिर एक के मुख्यमंत्री बनते ही दूसरे नेता इस जनता व संगठन पर थोपे नेता को सत्ता से उखाड़ फेंकने के लिए एक जूट  हो जाते है। भाजपा का भी पतन कांग्रेस की तरह है। इनको न तो अपने समर्पित व साफ छवि के जनप्रिय नेताओं के बजाय मठाधीशों के जनता की नजरों मे पूरी तरह से उतरे हुए प्यादे ही प्यारे लगते है। फिर इनके प्यादे सत्तारूढ़ हो कर ऐसे कारनामे करते हैं कि इनका राष्ट्रवाद, सुशासन व रामराज के हवाई दावे सब तार-तार हो जाते । जनता में इनकी इतनी भद पिटती है कि इनको अपने जनविरोधी प्यादों को खुद ही हटाना पडता है या जनता उखाड फेंकती है। परन्तु ठोकरें खाने के बाद भी ये मठाधीश संगठन में भी साफ छवि के अनुभवी व संघर्षशील नेताओं को  पार्टी की दिशा व दशा सुधारने का दायित्व देने के बजाय गुटबाज पीटे व जनता द्वारा नकारे गये नेताओं के प्यादों को ही पार्टी का कमान सौंप देते है।
यही हालत उक्राद की है। इनके नेताओं के भाषणों में भले उत्तराखण्ड के हित की बात सदा गूंजती रहती है परन्तु जैसे ही ये प्रदेश सरकार के साझेदार बनते है इनके नेताओं की पहली प्राथमिकता किसी प्रकार से सत्ता की मलाई में भागेदारी का रहता है। इनकी पूरी ताकत किसी प्रकार एकाद मलाईदार दायित्व मिल जाय। परन्तु राज्य गठन के जनांदोलन के समय से आज तक जब भी जनता को उक्रांद की जरूरत जुई ये जनता के हितों के संघर्ष का नेतृत्व करने के बजाय आपस में ही एक दूसरे से लडते नजर आये। सत्ता में रहते हुए इ्रमानदारी से कभी जनहितों के लिए आर पार की लडाई लड़ने का साहस तक नहीं रहा। हाॅं वर्तमान अध्यक्ष त्रिवेन्द्र पंवार ने जब इन सत्तालोलुपु नेताओं को जनहितों के लिए संघर्ष करने का आईना दिखाया तो तमाम पदलोलुपु नेताओं ने उनको अलग थलग ही कर दिया। 

Thursday, May 30, 2013

चंगेजों की लूट पर नहीं सट्टे पर तूफान है 


हवाओं में है खबर पर जुबान पर पहरा है
चंगेजों की लूट पर नहीं सट्टे पर तूफान है ।
यहां की हर साख पर उल्लूओं का ही है डेरा 
मेरे वतन के लूटरो पर क्यों डाल रहे है पर्दा ।।
वतन के लूटेरों के लिए यहां क्यों है सबेरा 
चारो तरफ गुनाहगारों का ही लगा है मेला ।।
दफन कर दिये गये यहां चमन के सब माली
लुटा रहे है तारनहार बन बतन की खुशहाली ।
लूट रहा आबरू, तो कोई सरकारी खजाना
खामोश है जुबान पर देख रही है हर आंखे ।।
नहीं फिक्र जरा  इन्हें भूखे प्यासे बच्चों की 
सनक है केवल देश को लुटने व लुटाने की ।
राज है यहां चंगेजों का हर शहर -गांव में
मत बहा खून के आंसू बेदर्दो के कब्रिस्तान में ।।
देर नहीं अंधेर नहीं यहां महाकाल के द्वार में 
बच नहीं पायेगा कोई अपने कृत्यों के जाल से ।
उठो आवाज उठाओं, वतन बचाओ चंगेजों से 
सतपथ के वीरों की रक्षा करता हर काल से ।।

-देवसिंह रावत 
(31 मई प्रातः 9 बजे कर 11 मिनट)

Wednesday, May 29, 2013

खूंखार नक्सलियों व आतंकियों से अधिक खतरनाक हो गये है खुदगर्ज हुक्मरान


अपनों पर पड़ी तो पाताल से भी ढूढ कर दबोचने की हुंकार भर रहे हैं हुक्मरान


छत्तीसगढ़ के दरभा में शनिवार 25 मई को हुए नक्सली हमले में कांग्रेसी नेताओं सहित 29 लोगों को निर्मम ढ़ग से हत किये जाने के बाद अब तक नक्सलियों को आतंकी न मानने वाली केन्द्र सरकार ने अब नक्सलियों को अब लोकतंत्र पर हमला करने वाला खुखार खतरा मानते हुए इन नक्सलियों को देश से उखाड़ फेंकने के लिए उन्हें पाताल से भी दबोचने के लिए कमर कस ली है। सुत्रों के अनुसार इससे पहले पांच दर्जन से अधिक पुलिस कर्मियों  व आम जनता को एक साथ मारने तथा जिला अधिकारी जैसे वरिष्ठ प्रशासनिक सेवा के अधिकारियों का भी अपहरण करके देश की पूरी व्यवस्था को खुली चुनौती का दुशाहस करने वाले खुखार नक्सलियों को आतंकी तक मानने के लिए तैयार नही था। यही नहीं देश की लोकशाही को उखाड फेंक कर पशुपति से तिरूपति तक यानी नेपाल से पूरे भारत को नक्सली राज कायम करने के लिए सशस्त्र हिंसा का तांडव मचाने वाले नक्सलियों के खिलाफ अब तक की कोई भी सरकार मजबूती से इस समस्या के निदान के लिए विकास के असंतुलन को दूर करके व दूरस्थ पिछडे क्षेत्रों में विकास की नयी धारा बहाने तक के लिए तैयार नहीं हुई। विकास के नाम पर इन नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में जमीन पर विकास होने के बजाय कागचों में हवाई विकास करके भ्रष्टाचार का तांडव मचता रहा। यही असंतुलित विकास व भ्रष्टाचार नक्सलियों को आम उपेक्षित व पीड़ित जनता को देश में लालझण्डा फेहराने के लिए बैताब  नक्सली ही तारनहार व सच्चे हमदर्द नजर आने लगते है। सबसे हैरानी की बात यह है कि इन सबके खतरनाक मंसूबों को जानने के बाबजूद देश के तमाम हुक्मरान देश की लोकशाही की रक्षा करने के अपने दायित्व का निर्वहन करने के बजाय अपने निहित दलगत स्वार्थो में अंधे हो कर कबूतर की तरह इनको पलने व बढ़ने देते रहे। हालत आज यह हो गयी कि देश के सवा सो से अधिक जनपदों में आज नक्सलियों ने अपने पांव मजबूती से पसार दिये है। इन नक्सलियों को भारत जैसे प्राचीन व समृद्ध संस्कृति वाले देश में बढ़ने देने के लिए अगर कोई जिम्मेदार है तो यहां की अब तक की तमाम जनविरोधी भ्रष्ट सरकार व दिशाहीन राजनैतिक दल।
लोकशाही के नाम पर यहां के हुक्मरानों ने जो खुली लूटशाही का तांडव देश में मचा रखा है, उससे देश की आम जनता न केवल मंहगाई, आतंक व भ्रष्टाचार से त्राही-त्राही कर रही है। यही नहीं आज देश की आम जनता से शिक्षा, चिकित्सा व न्याय तथा रोजगार ही नहीं सम्मान भी कोसों दूर हो गया है। देश की लोकशाही में मनमोहन जैसे संवेदनहीन, पदलोलुपु व जनता से कटे हुए लोगों का कब्जा हो गया है। जाति व धर्म के नाम पर अंधा तुष्टिकरण करने वाले निहित स्वार्थी तत्व देश के रहनुमा बने हुए है। आज अमेरिका व चीन दोनों अपने सांझे प्यादे पाकिस्तान का अंध समर्थन करके उससे भारत को तबाह करने के लिए आतंक की ज्वाला में धकेल रहे है। वहीं चीन भारत की हजारों वर्ग किमी भू भाग कब्जा करने के बाद अब दोस्ती के नाम पर भारत की सीमाओं में मीलों अंदर कब्जा जमाने व भारतीय भू भाग पर अपने टेण्ट ही नहीं मोटर मार्ग का निर्माण कर रहा है। परन्तु क्या मजाल है देश की एकता व अखण्डता पर चीन द्वारा खुले आक्रमण का मुहतोड़ जवाब देने के बजाय भारत की वर्तमान मनमोहनी सरकार चीन के आगे शर्मनाक आत्मसम्र्पण कर रही है, चीन से तुरंत राजनयिक व आर्थिक सम्बंध तोड़ने का सम्मान रक्षा हेतु कार्य करने के बजाय भारत सरकार बेशर्मी से चीन में ही नहीं भारत में भी चीन के आगे मेमना बन कर उसके लिए लालकालीन बिछा रही है।
चीन के गत माह भारतीय सीमा के मीलों अंदर कई दिनों तक कब्जा जमाने व चीन के प्रधानमंत्री के भारत आगमन के बाद जिस प्रकार से नक्सलियों ने छत्तीसगढ़ में कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं सहित 30 लोगों की निर्मम हत्या करने का दुशाहस करके भारतीय हुक्मरानों को खुली चुनौती दी है। ये दोनों घटनायें बिना कहे ही बहुत कुछ रहस्य खुद बेपर्दा कर रही है। आज भी अगर भारत सरकार ने नक्सली समस्या सहित देश की तमाम समस्याओं के प्रति कबूतरी दृष्टिकोण रखा तो वह दिन दूर नहीं जब नक्सली भारत के बडे भू भाग पर लाल झण्डा लहराने में सफल हो सकता है वहीं चीन व अमेरिका की शह पर पाकिस्तान भारत के अंदर एक ओर पाकिस्तान बना देगा। आज पाक व नक्सलियो से अधिक देश के लिए खतरनाक साबित हो रही है दिशाहीन पदलोलुपु भ्रष्ट सरकार। आज देश को जरूरत है एक मजबूत नेतृत्व वाली सरकार की, जो अपने निहित दलगत स्वार्थ व पदलोलुपता के लिए देश को बर्बादी की गर्त में धकेलने के लिए उतारू प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह जैसी सरकारों की तरह अपने कर्तव्यों के निर्वहन करने से विमुख न हो। आज मनमोहन सिंह जैसे  पदलोलुपु व खुदगर्ज कमजोर नेतृत्व के कारण जहां सरकारें बेहद कमजोर हो गयी है। शर्मनाक हालत यह है कि सरकार देश की अखण्डता व हितों की रक्षा करने के अपने दायित्वों का निर्वहन करने के बजाय भ्रष्टाचार का खेल खेलने में ही रत है। इस कारण देश की सुरक्षा के लिए खतरा बच चूके नक्सली व पाक समर्थित आतंकियों से भी अधिक खतरनाक देश के लिए ऐसा कमजोर नेतृत्व व भ्रष्ट सरकार खुद ही  बन गयी है। देश के दुश्मन बने नक्सली व पाक समर्थित आतंकियों का सफाया तो देश के जांबाज सुरक्षा बल पलक झपकते हुए कर सकते हैं परन्तु देश को तबाही के गर्त में धकेलने के लिए उतारू आस्तीन के सांप बन चूके देश के पथभ्रष्ट राजनैतिकों व उनकी भ्रष्ट सरकारों से देश केसे मुक्ति पायेगा,यही चुनौती देश के तमाम देशभक्तों के समक्ष आज है। आज इन पथभ्रष्ट नेतृत्व ने अपने प्यादों को देश के अधिकांश तंत्र पर काबिज कराकर पूरा तंत्र पथभ्रष्ट बना कर आम जनता की पंहुच से बेहद दूर बना दिया है। इनकी सरकारें कहीं जातिवाद के दंश से इस देश को मुक्त करने के बजाय जातिवादी जहर को और फेला रहे है। यही नहीं धर्म के आधार पर देश के विभाजन के बाद भी देश में एक समान कानून व सबको समान अवसर देने के बजाय अंध धार्मिक तुष्टिकरण करने को उतारू है। हालत इतनी शर्मनाक हो गयी कि वोटों के मोह में देश में हिंसा का तांडव मचाने वाले गुनाहगारों को भी सरकार न्यायालय से वाद वापस ले कर उनको रिहा करने की धृष्ठता कर रही है। सरकारों की इस प्रकार की प्रवृति से जहां न्यायालय ही नहीं सुरक्षा बल भी नाखुश है।
शेष श्री कृष्ण कृपा। हरि ओम तत्सत्। श्रीकृष्णाय् नमों। 

Monday, May 27, 2013

भारतीय हुक्मरानों की नपुंसकता से चीन व नक्सलियों के खतरनाक चक्रव्यूह में फंसा भारत


चीन ने भारतीय सीमा के 5 किमी अंदर बनायी सड़क

भारत के हुक्मरानों की घोर उदासीनता व नपुंसकता से आज भारत चीन व नक्सलियों के खतरनाक चक्रव्यूह में बुरी तरह से फंस गया है। एक ही समय में चीन जहां भारत की सीमा पर बलात कब्जा करता है उसी समय नक्सली भी भारत के खिलाफ सशस्त्र युद्ध छेड देते है। परन्तु बेखबर व सत्तामद में चूर भारतीय हुक्मरान व तंत्र बेखबर हो कर इस को रोकने के लिए ठोस कदम उठाने के लिए तैयार भी नहीं है।
एक तरफ चीन ने भारतीय सीमा पर लद्दाख क्षेत्र में एक माह पहले ही 19 किलोमीटर पर दो सप्ताह तक कब्जा करके भारतीय अखण्डता व सम्मान को खुले आम रौदने के बाद भारतीय हुक्मरानों को मेमना बन कर अपनी शर्तो पर समझोता करने के लिए विवश करता है। उसके एक पखवाडे के भीतर चीन समर्थित डेढ़ हजार सशस्त्र नक्सली भी छत्तीसगढ़ में हमला बोल कर छत्तीसगढ़ के दिग्गज नेताओं को मौत के घाट उतार देते है। इस दर्दनाक खबर से भारतीय उबर भी नहीं पाये थे कि खबर आयी कि   चीन ने लद्दाख में वास्तविक नियंत्रण रेखा के भीतर भारत की ओर कब्जा कर पांच किमी तक सड़क बना ली है। वहीं सीमा के भीतर भारतीय सेना के एक गश्ती दल को भी रोका गया है। सबसे हैरानी की बात यह है कि न तो भारतीय सुरक्षा बल व हुक्मरानों को नक्सली हमले की रोक थाम कर पा रही है व नहीं चीन से देश की रक्षा। क्या कारण है चीन व नक्सली एक ही समय में भारत पर हमले कर रहे है । क्या ये चीन की सोची समझी रणनीति का एक हिस्सा तो नहीं। क्या यह चीन व नक्सलियों का भारत के खिलाफ सांझे चक्रव्यूह का हिस्सा तो नहीं है। भले ही भारतीय हुक्मरान चीन द्वारा सीमा पर सीधे कब्जा को कोई बड़ी घटना नहीं मान रहे है। चीन से दो टूक बात करने से भारतीय हुक्मरान घबरा रहे है। परन्तु चीन खुले आम भारतीय भू भाग पर सैन्य बल पर कब्जा जमा रहा है और भारतीय हुक्मरान चीनी प्रधानमंत्री के लिए भारत में लाल कालीन बिछा रहे है। जबकि होना तो यह चाहिए था कि चीनी सेना को अविलम्ब वापस जाने के लिए भारत को चीन से राजनैतिक व आर्थिक सम्बंध तोड़ देने का सम्मानजनक कदम उठाने चाहिए थे परन्तु भारत की वर्तमान मनमोहनी सरकार को इतना नैतिक साहस कहां। इसी प्रवृति को देख कर चीन ने अभी हाल में चीन फिंगर-4 इलाके तक सड़क बनाने में कामयाब रहा है। यह जगह सिरी जैप इलाके में आती है। यह भारतीय सीमा में एलएसी से पांच किलोमीटर भीतर है।
चीन यह इलाका अपने सीमा क्षेत्र में होने का दावा करता है। जबकि भारत इसे लद्दाख का हिस्सा मानता है। सिरी जैप इलाके में ही फिंगर-8 पर 17 मई को दोनों तरफ के सैनिकों में टकराव की घटना हुई। इसके बाद भारतीय सेना का गश्ती दल एलएसी की ओर बढ़े बिना वापस लौट गया। लद्दाख में तैनात 14 कोर ने सभी गश्त रोक दी। दिपसांग में भेजे जाने वाले गश्ती दल को भी रोक दिया गया। इसी इलाके में ही चीनी सेना ने करीब तीन हफ्ते तक अपने तंबू लगा रखे थे। अब सबसे हैरानी की बात यह है कि भारतीय हुक्मरान इस सम्बंध में मुंह खोलने का साहस तक नहीं कर पा रहे है। हमारे रणनीतिकारों को समझना होगा कि आखिर क्यों चीन व नक्सली एक ही समय में भारत के खिलाफ संघर्ष कर रहे हैं। क्या यह चीन की रणनीति का हिस्सा है कि वह इस समय भारत के कमजोर नेतृत्व को देख कर भारत के बडे भू भाग पर कब्जा करने के लिए सबसे अनुकुल समय मान रहा है। गौरतलब है कि चीन पर भारत में नक्सल आंदोलन को संरक्षण देने का भी
आरोप लगता रहता है। नक्सल समस्या से जुडे विशेषज्ञ भी इस समय नक्सलियों के दुशाहसिक व बडे हमले से भौचंक्क है। 

Sunday, May 26, 2013

26 मई को भी दिल्ली के रामलीला मैंदान में दर्शन देगी माॅ नन्दादेवी 


उत्तराखण्ड के बाहर मुम्बई से दिल्ली आदि शहरों में रहने वाले 70 लाख उत्तराखण्डियों  को पहली बार नन्दादेवी  2013 राजजात से जोड़ने का सराहनीय भागीरथी कार्य करने वाले मुम्बई के युवा उद्यमी गणेश सनवाल ने अगली राजजात यात्रा को अमेरिका सहित विश्व भर के उत्तराखण्डियों को एकसुत्र में जोड़ने का लिया संकल्प 

नई दिल्ली(प्याउ) दिल्ली के 30 लाख से अधिक उत्तराखण्डी आज 26 मई को भी माॅं भगवती नन्दादेवी के पावन दर्शन रामलीला मैदान में सांयकाल 6 बजे से रात्रि के  दस बजे तक कर सकते है। दिल्ली के लाखों उत्तराखण्डियों को माॅं भगवती नन्दादेवी के पावन दर्शन मुम्बई के अग्रणी समाजसेवी व युवा उद्यमी गणेश सनवाल के महान भागीरथ प्रयासों से कर पा रहे है। जिन्होने मन्नत संस्था के बेनर तले 23-24 दिसम्बर व जनवरी 2013 को उत्तराखण्ड भवन वासी में नंदादेवी के पावन दर्शन मुम्बई वासियों को कराये। माॅं नन्दादेवी के पावन दर्शन कराने के साथ साथ श्री सनवाल ने मुम्बई व दिल्ली सहित तमाम प्रवासी बंधुओं की तरफ से अगस्त 28 अगस्त से सीमान्त जनपद चमोली के नोटी गांव से प्रारम्भ होने वाली 280 किमी विश्व प्रसिद्ध श्री नंदादेवी राजजात यात्रा में अन्य देवी देवताओं की छतोली की तरह सम्मलित कराने का भागरथी संकल्प लिया। इसके तहत इनके नेतृत्व में 80 लोगों की भारी भरकम दल जो आधुनिक मंच प्रकाश युक्त माॅं नन्दादेवी की डोली के साथ मुम्बई से उत्तराखण्ड हिमालय के लिए चली इस यात्रा को मुम्बई, पुणे, अहमदाबाद, इंदौर, नागपुर, दिल्ली , चण्डीगढ़, देहरादून व हल्द्वानी के भक्तों को दर्शन देते हुए नोटी मं पंहुचेगी। जहां से नन्दादेवी राजजात यात्रा में यह सम्मलित होगी। 
दिल्ली में पंहुच कर पहले दिन रामलीला मैदान में माॅं नन्दादेवी ने अपने भक्तों को 25 मई को दिव्य दर्शन दिये। दिल्ली में यह दर्शन कार्यक्रम युगान्तर संस्था के सौजन्य व अखिल भारतीय उत्तराखण्ड महासभा सहित अनैक संगठनों के सहयोग से दिल्ली के रामलीला मैदान में यह कार्यक्रम आयोजित किया।
25 मई को जहां रामलीला मैदान पंहुचने पर मुम्बई से उत्तराखण्ड में पहली बार माॅं नन्दादेवी की यात्रा में सम्मलित होने के लिए निकाली गयी नन्दादेवी डोली यात्रा के सूत्रधार माॅं नन्दादेवी के भक्त गणेश सनवाल का माल्यापर्ण करके भव्य स्वागत किया गया। इसके पहले 25 मई की सुबह रामलीला मैदान के मंच का पूजन किया गया। सांयकाल भले ही भारी गर्मी के कारण रामलीला मैदान में दिल्ली के अपेक्षा से कम लोग उमडे परन्तु इसके बाबजूद सैकडों की संख्या में लोगों ने माॅं नन्दादेवी के दर्शन व पूजन किया। इसमे दिल्ली प्रदेश कांग्रेस के नेता हरिपाल रावत व दीवान सिंह नयाल, अखिल भारतीय महासभा के उपाध्यक्ष विनोद नौटियाल, दिल्ली प्रदेश महासचिव देवेन्द्र सजवाण, उत्तराखण्ड जनमोर्चा के दलवीर रावत, दुबई से पंहुची गीता चंदोला,  प्यारा उत्तराखण्ड के सम्पादक देवसिंह रावत व प्रबंधक सम्पादक महेश चन्द्रा, उत्तराखण्ड क्लब के देवेन्द्र खत्री,  जगदीश भट्ट, जगमोहन रावत, सतेन्द्र रावत, गढ़वाल हितैषिणी सभा के बृजमोहन उपे्रती आदि प्रमुख थे। वहीं स्वागत करने में युगान्तर संस्था के कैलाश द्विवेदी, महेश प्रकाश, अनिल पंत, प्रवीण जुयाल आदि प्रमुख थे। 

Saturday, May 25, 2013

छत्तीसगढ़ में नक्सली हमले में सलवा जुडूम के संस्थापक महेन्द्र वर्मा आदि कांग्रेसी नेताओं व पुलिस कर्मियों सहित 29 मरे 


नक्सली व पाक के आतंक से तबाही के गर्त में फंसे भारत को बचाने के बजाय खुद भ्रष्टाचार की गर्त में धकेल रहे हैं हुक्मरान


रायपुर(प्याउ) देश के लोकतंत्र  के लिए गंभीर खतरा बन चूके एक हजार से अधिक हथियारबंद नक्सलियों ने अपने कमांडर गुरसा ओसेंडी के नेतृत्व में 25 मई शनिवार को परिवर्तन यात्रा के तहत सुकमा से जगदलपुर के लिए निकले प्रदेश के वरिष्ठ कांग्रेसी नेताओं के काफिले पर छत्तीसगढ़ के सुकमा जिले की दरभा घाटी के पास घात लगा कर किये हमले में कई वरिष्ठ कांग्रेसी नेताओं व 10 पुलिस कर्मियों सहित 29 लोगों की हत्या कर दी । इसी नये नक्सली कमांडर ने इस हमले की जिम्मेदारी भी ली है। सुत्रों के अनुसार जैसे ही यह यात्रा  शाम करीब साढ़े 5 बजे गीदम घाटी के करीब पहुंची तो घात लगा कर बैठे  नक्सलियों ने पेड़ गिरकार रास्ता रोक लिया और यात्रा पर गोलीबारी और बमों से भी हमला किया गया। इस हमले में जहां प्रदेश अध्यक्ष नंद कुमार पटेल,  पूर्व सांसद महेंद्र कर्मा, व गोपाल माधवन कश्यप, कवासी लखमा, उदय मुदलियार सहित कई बड़े नेता शामिल थे.। वहीं पूर्व केंद्रीय मंत्री विद्याचरण शुक्ल, सहित अनैक गंभीर रूप से घायल हो गये। सुत्रों के अनुसार यह हमला सलवा जुड़ूम’ अभियान के संस्थापक कांग्रेसी नेता महेंद्र कर्मा को निशाना बनाने के लिए किया गया था। इससे पहले प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष नंद कुमार पटेल के काफिले पर गरियाबंद के पास भी हमला हुआ जिसमें वे बाल-बाल बच गये। इसके बाद जीरम घाटी में भी उनके 20 गाडियों के काफिले में सम्मलित 120 लोगों को विस्फोट से उडाने की कोशिश की गयी। वहीं इस हमले में नक्सलियों के सफाये के लिए आम जनता का हथियारबंद दस्ते ‘सलवा जुड़ूम’ अभियान के संस्थापक कांग्रेसी नेता महेंद्र कर्मा को 100 से अधिक गोली मार कर मौत के घाट उतार दिया।  महेंन्द्र वर्मा नक्सलियों के हिट लिस्ट में थे।
वहीं इस हमले में नक्सलियों ने छत्तीसगढ़ प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष नंद कुमार पटेल व उनके बेटे दिनेश पटले को नक्सलियों ने अगवा कर दिया और बाद में दोनों की हत्या की गयी और उनके शव दरभा के जंगलों में बरामद कर दिये गये। वहीं इस हमले में गंभीर रूप से घायल पूर्व केन्द्रीय मंत्री विद्याचरण शुक्ल की पीठ में तीन गोलियां लगी हैं उन्हें इलाज के लिए गुड़गांव के बेदांता अस्पताल में हवाई ऐम्बुलेंश से लाया गया। इस हमले से जहां पूरा देश स्तब्ध है। वहीं कांग्रेस ने अपनी परिवर्तन यात्रा व भाजपा ने अपनी राज्य व्यापी विकास यात्रा स्थगित कर दी है। इस हमले की प्रधानमंत्री, कांग्रेस अध्यक्षा, छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री सहित तमाम नेताओं ने इस बर्बर हमले की कड़ी भत्र्सना की। वहीं इस घटना के तुरंत बाद केन्द्र सरकार ने छत्तीसगढ़ में इन नक्सलियों के सफाये के लिए केन्द्रीय सुरक्षा बलों की अनैक दस्ते भेज दिये है। वहीं कांग्रेस ने इसके विरोध में छत्तीसगढ़ बंद का ऐलान किया।

सुत्रों के अनुसार नंद कुमार पटेल के काफिले पर इससे पहले भी गरियाबंद के पास नक्सली हमला हुआ था, जिसमें वे बाल-बाल बच गए थे.। सुकमा छत्तीसगढ़ के सबसे नक्सल ग्रसित सबसे ज्यादा संवेदनशील इलाकों में एक है। यही सुकमा के जिलाधिकारी का अपहरण करके नक्सलियों ने देश की व्यवस्था को खुली चुनौती दी थी। इस घटना के बाद भी शासन प्रशासन ने इस नक्सली आतंक पर अंकुश नहीं लगा पायी। केवल जुबानी भत्र्सना व निंदा करने के अलावा इस गंभीर समस्या के समाधान के लिए देश की सरकारों ने कोई ठोस कदम अभी तक नहीं उठाया।  इस बार कांग्रेसी नेताओं के मारे जाने के बाद प्रधानमंत्री व कांग्रेस अध्यक्ष यहां छत्तीसगढ़ पंहुचे। कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी 25 मई की रात को ही छत्तीसगढ़ पंहुच गये थे। परन्तु जब नक्सलियों ने पांच दर्जन से अधिक सुरक्षा कर्मियों को इसी प्रकार घात लगा कर मौत के घाट उतार दिया उसके बाद भी न तो प्रदेश सरकार व नहीं केन्द्र सरकार ने कठोर कदम नहीं उठाया । अगर इस प्रकरण से सरकार जाग जाती तो आज इस प्रकार का तांडव देखने को नहीं मिलता। सबसे खौपनाक हालत नक्सल प्रभावित क्षेत्र के लोगों की है जो सरकार व नक्सलियों के बीच बर्चस्व की जंग में दोनों तरफ से दमन के शिकार बन रहे है। यहां के लोग पूरी तरह विकास से कट गये है । वहीं नक्सली आंदोलन भी सरकारों द्वारा जनता का समुचित विकास न किये जाने से उभरे जनांक्रोश के बाद बड़ी तेजी से पूरे देश के सवा सो से अधिक जनपदों को अपने शिकंजे में जकड़ चूका है। इसके साथ देश में जहां एक तरफ अमेरिका व चीन के प्यादे पाक द्वारा पोषित आतंक देश की एकता व अखण्डता को आतंकी तांडव से खतरा बने हुए है वहीं देश मेें लोकशाही को बदल कर जनशाही लाने के लिए इस प्रकार का आतंक से देश की व्यवस्था को उखाड़ फेंकने की तरफ बढ़ रही है। भारत का दुर्भाग्य यह है कि इन दोनों खतरों से देश को बचाने के लिए ठोस व गंभीर रणनीति पर अमल करने के बजाय देश के हुक्मरान खुद देश के विकास के संसाधनों की बंदरबांट कर देश को भ्रष्टाचार की गर्त में धकेल कर खुद ही तबाह कर रहे हैं। इन तीन तरफा संकट से घिरे भारत की रक्षा केसे होगी यही सोच कर देश का प्रबुद्धजन व आम देशभक्त बेहद चिंतित है। जहां नक्सलियों का सपना तिरपति से पशुपति तक लाल गलियारा बनाना है वहीं पाक पोषित आतंकियों का भारत को दूसरा पाकिस्तान बनाना है। इस गंभीर संकट से देश कैसे उबरे यह आज देश भक्तों के समक्ष सबसे बड़ी चुनौती है। 

Friday, May 24, 2013

गैरसैंण में राजधानी बनाने के बजाय बलात देहरादून में राजधानी थोपने वालों की कब्र बना देगा महाकाल


उत्तराखण्ड राज्य गठन जनांदोलन के अग्रणी संगठन उत्तराखण्ड जनता संघर्ष मोर्चा ने देहरादून के रायपुर में नये विधानसभा भवन का निर्माण करने को उतारू उत्तराखण्ड की वर्तमान विजय बहुगुणा सरकार सहित तमाम राजनैतिक दलों को उत्तराखण्ड की जनभावनाओं व शहीदों की शहादत का गला घोंटने से बाज आने की दो टूक चेतावनी देते हुए कहा कि  भगवान श्री बदरी केदार की मोक्ष भूमि से निहित स्वार्थ के लिए सत्तामद में खिलवाड़ करने वालों का भी घोर उत्तराखण्ड विरोधी राव, मुलायम व तिवारी की तरह हस्र होगा। उत्तराखण्ड राज्य गठन के लिए संसद की चैखट जंतर मंतर पर 6 साल (1994 से 2000 ) का ऐतिहासिक सफल धरना प्रदर्शन करने वाले मोर्च के अध्यक्ष देवसिंह रावत ने सत्तामद में चूर उत्तराखण्ड के मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा को आगाह किया कि अगर उन्होने भी उत्तराखण्ड के जनहितों का गलाघोंटने वाले नापाक कृत्यो पर तत्काल अंकुश नहीं लगाया तो उनका भी हस्र तिवारी, खण्डूडी व निशंक जैसे पूर्व मुख्यमंत्रियों की तरह ही होगा। मोर्चा के अध्यक्ष देवसिंह रावत ने दो टूक शब्दों में कहा कि उत्तराखण्ड राज्य का गठन किसी तिवारी, कोश्यारी, खण्डूडी, निशंक, विजय बहुगुणा, हरीश रावत, सतपाल महाराज सहित किसी भी नेता या नौकरशाह की अंध सत्तालोलुपता की पूर्ति के लिए गठित नहीं किया गया है। उत्तराखण्ड की जनता ने राज्य गठन के लिए जो ऐतिहासिक संघर्ष किया व बलिदान दिया वह भारतीयता के प्राण उत्तराखण्ड  की संस्कृति, सम्मान व हक हकूकों की रक्षा करने के साथ तीब्र विकास करने के लिए किया था। श्री रावत ने प्रदेश के अब तक के हुक्मरानों को धिक्कारते हुए कहा कि इन्होंने इन 12 साल के शासन में उत्तराखण्ड में शराब माफियाओं, भू माफियाओं, जंगल माफियाओं के हाथों उत्तराखण्ड के हक हकूकों का गला घोंटवा कर अपने संकीर्ण स्वार्थो की पूर्ति की। श्री रावत ने कहा कि इसी कारण उत्तराखण्ड की प्रबुद्ध जनता ने तिवारी, खण्डूडी, निशंक के बाद अब विजय बहुगुणा को भी जमीन सुघाने का काम जनादेश से दण्डित करके किया है। आज राज्य गठन के 12 सालों में भाजपा से कांग्रेस तक की सभी सरकारों ने प्रदेश में भ्रष्टाचार, जातिवाद व क्षेत्रवाद के गटर में प्रदेश को धकेल दिया है। यही नहीं प्रदेश के हक हकूकों की रक्षा करने के बजाय इन्होने प्रदेश गठन की मूलाधार पर ही कुठाराघात करके यहां पर बलात जनसंख्या पर आधारित विधानसभाई परिसीमन थोपने का कृत्य तिवारी व खण्डूडी जेसे उत्तराखण्ड के हक हकूकों को रौंदने वाले मुख्यमंत्रियों ने किया। इन 12 सालों में मुजफरनगर काण्ड-94 के गुनाहगारों व राज्य गठन आंदोलनकारियों के हत्यारों तथा मुलायम सिंह के प्यादों को न केवल संरक्षण दिया गया अपितु उनको महत्वपूर्ण पदों पर आसीन किया गया। परन्तु क्या मजाल प्रदेश के सच्चे रहनुमाना होने का दंभ भरने वाले इन तमाम दलों, मुख्यमंत्रियों, विधायकों, मंत्रियों व सांसदों ने उफ तक नहीं की। इन 12 सालों में इन प्रदेश के हितों को रौंदने वाले हुक्मरानों को न तो प्रदेश के सम्मान को मुजफरनगर काण्ड-94 के खलनायक तत्कालीन मुलायम सिंह सरकार की पुलिस प्रशासन  के इस मानवता व भारतीय संस्कृति को कलंकित करने वाले कृत्य से क्षुब्ध हो कर उप्र पुलिस की नौकरी से इस्तीफा देने वाले जांबाज सिपाही रमेश का ही सम्मान करने तथा उत्तराखण्ड राज्य गठन के लिए मील का पत्थर बने पूर्व प्रधानमंत्री देवगोड़ा को ही प्रदेश में सरकार की तरफ से विशेष सम्मान करने की सुध ही आयी व नहीं इनके सम्मान के लिए प्रदेश की जनता की तरफ से दो शब्द भी कहने का नैतिक साहस तक यहां की सरकारों को रहा।
मोर्चा ने कहा कि उत्तराखण्ड की जनता उत्तराखण्ड राज्य गठन जनांदोलन के समय से ही प्रदेश की राजधानी गैरसैंण में बनाने का निर्णय ले चूकी थी। नजभावनाओं को सम्मान करते हुए अविभाजित उप्र में सरकार द्वारा गठित कौशिक समिति ने भी जनभावनाओं का सम्मान किया था। परन्तु उत्तराखण्ड जनभावनाओं को रौंदने वाले अब तक के प्रदेश के मुख्यमंत्रियों व उनकी सरकारों ने गैरसैंण राजधानी बना कर लोकशाही का सम्मान करने के बजाय बलात राजधानी देहरादून में थोपने का निकृष्ठ कृत्य लगातार कर रहे है। इन 12 सालों में जरा सी गैरसैंण में विधानसभा बनाने की सुध वर्तमान मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा व उनकी सरकार को आयी, परन्तु गैरसैंण में विधानसभा भवन का निर्माण कार्य शुरू होने से पहले ही देहरादून में रायपुर में एक और विधानसभा भवन निर्माण करने का विजय बहुगुणा सरकार का निर्णय उनके गैरसैंण की तरफ किये गये पहले नेक व महत्वपूर्ण कार्य पर भी पानी फेर दिया।
राज्य गठन के प्रमुख संगठन के तौर पर उत्तराखण्ड जनता संघर्ष मोर्चा ने मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा व सांसद सतपाल महाराज की गैरसैंण में विधानसभा भवन बनाने की पहल की नौटंकी जानते हुए भी उसका खुला समर्थन इस आधार पर किया कि चलो 12 साल में इस कब्रीस्तान मे कोई जीवन की सांस तो लेने वाली सरकार दिखी। मोर्चा ने विधानसभाध्यक्ष गोविन्दसिंह कुंजवाल व सांसद प्रदीप टम्टा की प्रदेश की स्थाई राजधानी गैरसैण बनाओं के अभियान की राजनैतिक असलियत को भी जानते हुए भी चलो इस कब्रीस्तान में कोई आवाज तो आयी की हकीकत को जान कर खुला स्वागत किया।
इसके बाद अब विजय बहुगुणा सरकार जो नौटंकी रायपुर में विधानसभा भवन बनाने के नाम पर कर रहे हैं वह केवल प्रदेश की लोकशाही का गलाघोंटने वाले के साथ साथ इस सरकारी धन की बर्बादी के अलावा कुछ नहीं है।
उत्तराखण्ड जनता संघर्ष मोर्चा के अध्यक्ष देवसिंह रावत ने विजय बहुगुणा सहित प्रदेश के तमाम सत्तामद में चूर नेताओं से कहा कि अगर गैरसैंण के बजाय देहरादून में राजधानी थोपने की उत्तराखण्ड जनांकांक्षाओं को रौदने वाले कदमों पर तत्काल अंकुश नहीं लगाया तो आगामी लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को उत्तराखण्ड से ही नहीं देश से सफाया हो जायेगा। उन्होने दो टूक शब्दों में कहा कि राज्य का गठन इन घोर सत्तालोलुपुओं के न चाहने के बाबजूद जिस भगवान बदरी केदारनाथ की अपार कृपा से हुई वह इन पदलोलुपुओं को गैरसैंण राजधानी बनाने के लिए मजबूर कर देगा।

Wednesday, May 22, 2013

सरकारी भ्रष्टाचार पर पर्दा डालने के लिए उछाला गया है क्रिकेट फिक्सिंग प्रकरण


क्रिकेट फिक्सिंग से लाखों गुना खतरनाक है सत्तासीन हुक्मरानों के घोटाले 


जिस प्रकार से प्रधानमंत्री मनमोहन व सप्रंग सरकार की ं कोयला घोटाला प्रकरण मेंसर्वोच्च न्यायालय प्रकरण मे  सीबीआई द्वारा दाखिल किये गये शपथ पत्र व रेलवे में पद्दोन्नति के मामले में रेलमंत्री बंसल के रिश्तेदार द्वारा सीधे धूस लेते हुए सीबीआई द्वारा गिरफतार किये जाने से भारी किरकिरी पूरे देश में हो रही थी, मामले की गंभीरता व सर्वोच्च न्यायालय द्वारा मिली कड़ी फटकार के बाद मनमोहन सरकार को ना चाहते हुए अपनी खाल बचाने के लिए रेल मंत्री बंसल व कानून मंत्री अश्वनी को बर्खास्त कर अपनी खाल बचानी पड़ी।
जनता में हो रही भारी बदनामी से बचाने के लिए सरकार के प्रबंधकों ने दिल्ली पुलिस से पैंसे के खेल आईपीएल का धमाका कर लोगों का ध्यान मनमोहन सरकार के भ्रष्टाचार से बंटाने के लिए किया। इसी लिए इसी समय आईपीएल मैचों में हो रही धूस मिली भगत को पुलिस द्वारा छापेमारी के बाद श्रीसंत सहित कई खिलाडियों व दारा सिंह के बेटे बिन्दु जैसे लोगो को गिरफतार करके संचार व समाचार माध्यमों में ऐसे पेश किया जा रहा है कि मानो इस देश में भ्रष्टाचार का मूल क्रिकेट में चल रही धूस प्रकरण ही है। जबकि आईपीएल क्रिकेट मेचों को लोग पहले से ही पैंसे का खेल मान रहे हें। लोग इसको सरकारी शह पर खेला जा रहा जुआ मानते है। लोगों में यह धारणा है कि फिल्म उद्योग व आईपीएल क्रिकेट मेचों में लगा ही पैसा दो नम्बर का होता है। यह काला धनिकों के हाथों का एक खिलोना है।
जबकि हकीकत यह है कि आईपीएल और सिनेमा उद्योग में अधिकांश खेल ही काले धनिकों का है। देश व अर्थव्यवस्था को इस काले खेल से उतना नुकसान नहीं होता जितना सत्तारूढ़ हुक्मरानों के सीधे भ्रष्टाचार से। आज जिस प्रकार से पूरे समाचार जगत भ्रष्टाचार में घिरी मनमोहन सरकार व प्रधानमंत्री को घेरने के बजाय पूरे दिन रात चैबीसों घण्टे इसी पेसें के खेल क्रिकेट में हो रही घूस प्रकरण पर ही नये नये धमाकेदार अंदाज में पेश कर जनता को भ्रंिमत कर रहे है। जबकि हकीकत यह है कि आज देश को सबसे बडा खतरा मनमोहन व उनकी यूपीए जैसी सरकार के भ्रष्टाचारों व देश के हितों के प्रति उदासीन रवैये से है। क्रिकेट व सिनेमा जगत में हो रहे भ्रष्टाचार पर तो अंकुश लगाने के लिए साधारण पुलिस व सरकार की हल्की सी इच्छा शक्ति भी काफी है। परन्तु मनमोहन सिंह जैसे नक्कारे प्रधानमंत्री व उनकी भ्रष्टाचार में लिप्त सरकार के कारण आज जहां न तो देश की सीमायें सुरक्षित बची है व नहीं देश के आम आदमी का जीवन । चारों तरफ भ्रष्टाचार, मंहगाई व आतंकवाद से देश का आम आदमी त्रस्त है । चीन भारतीय एकता व अखण्डता को सीधे चुनौती दे रहा है। परन्तु बेशर्मी की हद तो यह प्रधानमंत्री मनमोहन व उनकी पार्टी कांग्रेस देश की इस शर्मनाक त्रासदी पर भी जश्न मना रहे हैं और आततायी चीन का भारत में लालकालीन बिछा कर स्वागत कर रहे हैं। सरकार कितना भी नौटंकी क्रिकेट मैचों में धूस प्रकरण पर क्यों न कर ले अब देश की जनता का ध्यान नहीं बंटने वाला, आने वाले समय में देश की जनता कांग्रेस को मनमोहन सिंह से देश को भ्रष्टाचार की गर्त में धकेलने का  दण्ड सत्ता से उखाड् फेंक कर देगी । दिवारों पर लिखी जनाक्रोश को पढ़ने में भले ही सोनिया गांधी व मनमोहन एक दूसरे के गुणगाण करके नजरांदाज करने की कबूतरी प्रवृति कितना भी कर लें परन्तु देश की जनता मनमोहन सिंह जैसे भ्रष्टाचारी सरकार को उखाड़़ फेंकने का मन बना चूकी है। हालांकि भाजपा के चंद मुगेरीलाल अपनी अहं की तुष्टि के लिए कांग्रेस की राह में फूल बिछाने का काम कर रहे है परन्तु जनता इन मुगेरीलालों को भी सबक सिखायेगी। 

स्वागत समारोह में गढ़वाल भवन में मुख्यमंत्री बहुगुणा  आते तो नहीं होता विवाद


क्या निशंक प्रकरण से भयभीत है आज भी उत्तराखण्ड के मुख्यमंत्री !

उत्तराखण्ड के मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा अगर आज सांयकाल साढ़े पांच बजे दिल्ली में उत्तराखण्ड की सबसे समृद्ध व सबसे पुरानी सामाजिक संस्था गढ़वाल हितैषिणी संस्था द्वारा आयोजित अपने स्वागत सम्मान में पंहुचते तो आज जो विवाद गढ़वाल भवन में बलात कब्जा जमाने वाले से इतना विवाद नहीं होता। बताया गया कि यह विवाद गढ़वाल भवन के बाहर सडक में जबरन भवन में काबिज सेल वाले के बेनर को हटाने पर हुआ। यह छोटा से विवाद इतना गहरा हुआ कि मामला मंदिर मार्ग थाने में दोनो पक्षों को जाना पडा। पहली बार सैकडों की संख्या में गढ़वाल हितैषिणी सभा के सदस्यों ने इस जबरन भवन के एक भाग पर कब्जा करने वाले के खिलाफ मंदिर मार्ग थाने पर जबरदस्त प्रदर्शन किया। रात के साढ़े नो बजे तक मंदिर मार्ग थाने में जमे उत्तराखण्डी समाज के भारी जमवाडे से पडे  जनदवाब के कारण ही पुलिस द्वारा मिली संरक्षण के बाबजूद सेल वाले को इस पर माफी मांगना पडा। इस विवाद को सुलझाने में बृजमोहन उप्रेती, समाजसेविका गीता चंदोला, श्री भट्ट सहित तमाम पदाधिकारियों को विशेष योगदान रहा।
 इस कार्यक्रम में मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा के सबसे करीबी सिपाहेसलार विधायक सुबोध उनियाल भी पंहुच गये थे । पर कार्यक्रम में मुख्यमंत्री के ना आने पर मुख्यअतिथि के रूप में सम्मानित किया गया। मुख्यमत्री के अंतिम समय तक कार्यक्रम में न पंहुचने से आयोजक निराश हुए अपितु मुख्यमंत्री के स्वागत के लिए पंहुचे कई लोगों को भी निराशा हाथ लगी। वहीं लोग यह भी मान रहे थे कि अगर मुख्यमंत्री इस कार्यक्रम को अंतिम समय में रद्द नहीं करते तो गढ़वाल भवन में हुआ विवाद टल जाता। क्योंकि उस समय वहां पर सभी मुख्यमंत्री के आवागमन पर जुटे रहते।  सुत्रों के अनुसार मुख्यमंत्री ने बाद में प्रधानमंत्री के रात्रि भोज का बहाना बना कर इस कार्यक्रम में सम्मलित नहीं हुए। बहुगुणा की सामाजिक संगठनों को नकारने की प्रवृति पर दो टूक टिप्पणी करते हुए प्यारा उत्तराखण्ड के सम्पादक देवसिंह रावत ने कहा कि जब तक ऐसे आम जनता से दूर रहने वाले व उत्तराखण्ड की जनांकांक्षाओं को रौंदने वाले हुक्मरानों का सामाजिक संगठन सम्मान के लिए आतुरू रहेगे तब तक न तो उनको ऐसे राजनेता सम्मान देगे व नहीं जनहितों के लिए ही काम होगा। सामाजिक संगठनों को  हमेशा जनहितों पर कुठाराघात करने वाले नेताओ ंको सम्मान नहीं दुत्कारना चाहिए और जनहित में समर्पित समाजसेवियों को सम्मानित करना चाहिए। तभी समाज में विकास व नैतिक मूल्यों का भी विकास होगा।
यह प्रवृति दिल्ली में उत्तराखण्ड राज्य गठन के समय देखी गयी। उस समय, आंदोलनकारियों के राजनेताओं के प्रति भारी जनाक्रोश के कारण ही जहां कांग्रेसी नेता हरीश रावत सहित तमाम सपा, बसपा व भाजपा के नेताओं को भी जंतर मंतर ही नहीं दिल्ली में अन्य जगहों में कई बार कोप भाजन का शिकार होना पडा था। वहीं राज्य गठन के बाद पूर्व मुख्यमंत्री निशंक को राज्य आंदोलनकारियों द्वारा समारोह से खदेड़े जाने की पुरानी घटना के बाद से उत्तराखण्ड का कोई भी मुख्यमंत्री दिल्ली में प्रमुख सामाजिक संगठनों के कार्यक्रमों में सम्मलित होने से बचते रहते है। लगता है मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा को उनके सलाहकारों ने इन कार्यक्रमों से दूर रहने की सलाह दी है या स्वयं मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा इन सामाजिक संगठनों को कोई महत्व ही नहीं देते हैं। वेसे भी उत्तराखण्ड के मुख्यमंत्री  विजय बहुगुणा पर आम जनता ही नहीं कांग्रेसी कार्यकत्र्ता भी दूरी बनाने का आरोप लगाते रहते है।
दिल्ली में उत्तराखण्ड पत्रकार परिषद के कार्यक्रम में लगभग तीन साल पहले संसद के समीप काॅस्टीटयूशन क्लब में हुए कार्यक्रम में मैं और मेरे राज्य आंदोलन के साथियों ने तत्कालीन उत्तराखण्ड के मुख्यमंत्री रमेश पोखरियाल निशंक को उनकी सरकार के प्रदेश की जनांकांक्षाओं के खिलाफ किये जा रहे कार्यो के लिए उनके अलोकतांत्रिक रवैये व आंदोलनकारियों को मंच से खुली चुनौती देने के कारण बीच भाषण में ही सभागार से बाहर खदेड़ने का काम किया।
आज भी इस निशंक प्रकरण की दहशत उत्तराखण्ड के राजनेताओं के दिलो दिमाग में छाया हुआ है। हरीश रावत व भगतसिंह कोश्यारी को छोड़ कर अधिकांश नेता जनता से दूरी बनाये रहते हैं। दिल्ली में इन दोनों नेताओं के पास आम उत्तराखण्डी काम हो या न हो अपने दुख दर्द को सुनाने जाता है।
22 मई की सांयकाल जेसे ही मैं और मेरे आंदोलन के साथी जगदीश भट्ट गढ़वाल भवन पंहुचे वहां पर गढ़वाल हितैषिणी सभा के तमाम पदाधिकारी व अन्य समाज के प्रमुख लोग गढ़वाल भवन के द्वार पर मुख्यमंत्री के स्वागत के लिए गाजे बाजों के साथ कतार लगाये खडे थे। थोडी देर बाद मुख्यमंत्री के सिपाहेसलार सुबोध उनियाल भी इटीवी के तेजतरार पत्रकार पवन लालचंद के साथ मुख्यमंत्री के आगमन की इंतजारी में बाहर ही खडे थे। इसी दौरान यह सेल बेनर विवाद भी हुआ। अगर मुख्यमंत्री समय पर आते तो शायद यह विवाद भी नहीं होता। आज गढ़वाल हितैषिणी सभा के समारोह में सभा के अध्यक्ष गम्भीर सिंह नेगी, उपाध्यक्ष प्रताप सिंह असवाल, महासचिव महादेव प्रसाद बलूनी, उदय राम ढौडियाल, द्विवेदी, प्रताप राणा, महावीर राणा, गायककार चन्द्रसिंह राही,  तिवारी, देवेश्वर जोशी, पवन कुमार मैठाणी, रामेश्वर गोस्वामी, दलवीर रावत, मोहब्बत राणा, आर एस नेगी सहित अधिकांश     पदाधिकारी उपस्थित थे। वहीं समाजसेवी व उद्यमी बीएस भण्डारी, पत्रकार सुनील नेगी, अनिल पंत, एसीपी शर्मा, आई एस रावत, कैलाश द्विवेदी,महेश प्रकाश, बृजमोहन सेमवाल, पत्रकार नीरज जोशी, सतेन्द्र रावत, पोखरियाल, डेसू रावत, शिवचरण मुण्डेपी, सागर पुण्डीर बीडी भट्ट, श्री गैरोला, अजय सिंह बिष्ट, एस एस रावत, सहित अनैक प्रतिष्ठित पदाधिकारी उपस्थित थे। 

Tuesday, May 21, 2013


फिर कभी किसी देश में मनमोहन व अटल जैसा प्रमुख न देना


तुम्हारे कुशासन की वर्षगांठ पर ओर क्या आशीष दें मनमोहन
तुम्हारे कुशासन से खून के आंसू बहाने वाली भारत ये जनता।। 
नापाकी आतंक से जर-जर हो गयी है मेरे भारत की अखण्डता 
भ्रष्टाचार व मंहगाई से त्राही त्राही कर रही है भारत की जनता।।
तुम और तुम्हारे मंत्री नीरो की तरह सत्तामद की बंशी बजा रहे
देखो आज बेरोजगारी में देश का युवा दर-दर भटक रहा है ।।
अबोध बालिकायें ही नहीं, वृद्धायें भी सुरक्षित नहीं तुम्हारे राज में
देश की सीमा ही नहीं, संसद भी सुरक्षित नहीं है तुम्हारे राज में।।
सोनिया -मनमोहन!  अब तो इस देश पर तुम जरा रहम करो  
अपनी अहं के लिए भारत को अमेरिका के लिए बर्बाद न करो ।।
मेरे श्रीकृष्ण अपने भारत पर अब इतनी कृपा तो तुम कर ही देना
फिर कभी किसी देश में मनमोहन व अटल जैसा प्रमुख न देना।।

-देवसिंह रावत 
(22 मई 2013 प्रातः 8.23 बजे )

Monday, May 20, 2013


एक गुट के अध्यक्ष बनने के बाद, ऐरी गुट मारपीट के बाद उक्रांद कार्यालय पर काबिज

कांग्रेस की शह पर उक्रांद पर काबिज होना चाहते है सत्तालोलुपु ऐरीः पंवार


त्रिवेन्द्र पंवार की तानाशाही ने किया उक्रांद का भारी नुकसानः ऐरी


ऐरी को निष्काशित करने का दाव आत्मघाती साबित हुआ त्रिवेन्द्र पंवार को 


देहरादून (प्याउ)। उक्रांद अध्यक्ष त्रिवेन्द्र पंवार ने काशीसिंह ऐरी व उनके समर्थकों पर आरोप लगाया कांग्रेस सरकार की शह पर उक्रांद पर कब्जा कर रहे हैं। दोनो गुट देहरादून कार्यालय पर कब्जा करने का खुला संघर्ष कर रहे हैं। अपने आप को उक्रांद का शीर्ष नेता समझने वाले काशी सिंह ऐरी ने सपने में भी नहीं सोचा होगा कि जिस त्रिवेन्द्रसिंह पंवार को अपना प्यादा समझ कर काशीसिंह ऐरी कई दशकों से दिवाकर भट्ट सहित अन्य विरोधियों पर अंकुश लगाने के लिए बढ़ावा दे कर अध्यक्ष के पद पर भी आसीन करते रहे, वही त्रिवेन्द्र पंवार एक दिन उनको दल से ही निष्काशित करके भष्मासुर साबित होगा। 
उक्रांद अध्यक्ष त्रिबेन्द्र पंवार द्वारा उक्रांद के शीर्ष नेता काशीसिंह ऐरी को दल से निष्काशित करने के बाद ऐरी समर्थकों द्वारा देहरादून में इसी सप्ताह आयोजित दो दिवसीय महाधिवेशन में पार्टी के अधिकांश वरिष्ठ नेताओं ने काशी सिंह ऐरी को दल का अध्यक्ष चुनते हुए तीन साल से उक्रांद के शर्मनाक पतन के लिए वर्तमान अध्यक्ष त्रिवेन्द्र पंवार को जिम्मेदार व तानाशाह बताया। इस दो दिवसीय महाधिवेशन के बाद जैसे ही नव निर्वाचित अध्यक्ष काशीसिंह ऐरी अपने दल बल के साथ 20 मई सोमवार को पार्टी के कार्यालय पहुंचे तो वहा पर उनकी त्रिवेन्द्र पंवार गुट से भारी झडप व मारपीट हो गयी। वहां पर पहले से मौजूद पुलिस बल ने बीच बचाव किया। ऐरी गुट कार्यालय में काबिज होने में सफल रहा  और वर्तमान अध्यक्ष त्रिवेन्द्र पंवार गुट कमजोर पड़ने के कारण कार्यालय के गेट पर धरना देने के लिए मजबूर हुए।
गौरतलब है कि जिस अधिवेशन को उक्रांद अध्यक्ष त्रिेवेन्द्र पंवार असंवैधानिक बता रहे थे । वे 24-25 जुलाई को ही महाधिवेशन कराने की बात कह रहे है। परन्तु वे भूल गये कि काशीसिंह ऐरी प्रीतम पंवार नहीं जो दल से हटाने पर मूक रहे। काशीसिंह ऐरी को निष्कासित करने से उक्रांद का कई वर्षो से बंद कमरों में चल रहा विवाद सडकों पर उतर गया।  काशीसिंह ऐरी गुट के समर्थने से ही अविभाजित उक्रांद का अध्यक्ष बनने के बाद जिस प्रकार से त्रिवेन्द्र पंवार ने उक्रांद में काशीसिंह ऐरी के कट्टर विरोधी दिवाकर भट्ट को पार्टी से बाहर का रास्ता दिखाया वह उन्होंने ऐरी की इच्छा पर ही किया। इससे उक्रांद में विभाजन हो गया। इसके बाद त्रिवेन्द्र पंवार ने उत्तराखण्ड को पतन के गर्त में धकेल रही कांग्रेस सरकार से समर्थन वापसी का ऐलान किया तो सरकार में सम्मलित उनके एकमात्र विधायक जो प्रदेश के कबीना मंत्री है प्रीतम पंवार ने दल का फरमान मानने से मना कर दिया। इसे त्रिवेन्द्र पंवार ने अनुशासन हिनता मानते हुए उनको दल से निकाल दिया। इसी से काशीसिंह ऐरी व उनके समर्थकों के साथ वर्तमान अध्यक्ष त्रिवेन्द्र पंवार की तनातनी बढ़ गयी। काशीसिंह ऐरी समर्थक सरकार से समर्थन वापसी के पक्षधर नहीं थे। वहीं त्रिवेन्द्र पंवार आरोप लगा रहे हैं कि काशी सिंह ऐरी ने हमेशा जनहित की राजनीति के बजाय सत्ता की राजनीति की। इससे उक्रांद के प्रति जनता का विश्वास कम हुआ। त्रिवेन्द्र पंवार गुट का आरोप है कि लाल बतियों की अंधी लालशा के लिए काशीसिंह ऐरी गुट कांग्रेस के शह पर उक्रांद पर कब्जा करना चाहता है। वहीं काशीसिंह ऐरी गुट का आरोप है कि अपनी तानाशाही से त्रिवेन्द्र पंवार ने दल के शीर्ष नेताओं को दल से बाहर कर दल को बेहद कमजोर कर दिया है।
 गौरतलब है कि इसी पखवाडे देहरादून में पंवार के विरोध के बाबजूद काशीसिंह समर्थकों का जो महाधिवेशन हुआ, उसमें उक्रांद के अधिकांश बडे व जिलाध्यक्ष सम्मलित होने से पंवार की स्थिति कमजोर हो गयी। देहरादून के हरिद्वार रोड़ स्थित एक शादी व्याह हाल में उक्रांद का 14वें महाधिवेशन में उक्रांद के संरक्षक व पूर्व अध्यक्ष काशी सिंह ऐरी, पूर्व अध्यक्ष नारायण सिंह जंतवाल, पूर्व विधायक पुष्पेश त्रिपाठी ने दीप जला कर महाधिवेशन का शुभारंभ किया। इसमें काशी सिंह ऐरी को नया अध्यक्ष, जगदीश बुधानी को महामंत्री व आनंद सिलमाना को कोषाध्यक्ष चुन लिया है। अध्यक्ष चुने जाने का बाद काशी सिंह ऐरी ने कहा कि पार्टी को नए उत्साह व संकल्प के साथ खड़ा करना है। अक्षम व गैर राजनीतिक नेतृत्व के चलते दल को जो नुकसान हुआ है उसकी भरपाई करनी होगी। नए लोगों को जोड़ कर दल को मजबूती प्रदान करनी होगी। यही नहीं पुराने साथी जो दल के बाहर कर दिए गए हैं, उन्हें एक बार फिर से मुख्यधारा में लाकर जनता में विश्वास पैदा करना होगा। उत्तराखंड राज्य आंदोलन के दौरान व उसके बाद भी जो उत्तराखंड के सरोकारों से जुड़े रहे हैं उनको भी एक मंच पर लाना प्राथमिकता होगी। महाधिवेशन में दल के निवर्तमान उपाध्यक्ष चंद्रशेखर कापड़ी, महेश परिहार, नरेंद्रंिसंह रावत, नरेंद्र पाठक, भुवन जोशी, प्रताप शाही, महामंत्री डा. प्रकाश पांडेय, पुष्कर धामी, किशन मेहरा, हरीश पाठक, पुष्कर पाल सिंह धामी, गुलामंिसंह कुटियाल, श्रीमती विजया ध्यानी, शीशपालंिसंह बिष्ट, प्रवक्ता डा. सुरेश डालाकोटी, केंद्रीय संगठन मंत्री भुवन पाठक, संयोजक मंडल के सह संयोजक शैलेश गुलेरी, सदस्य जयप्रकाश उपाध्याय, वीरेंद्र सिंह बिष्ट, पंकज व्यास, धम्रेद्र कठैत, आशा शर्मा, सुलोचना बहुगुणा, पुष्पा ममगाई उपस्थित थी।  जिलाध्यक्षों में उत्तरकाशी से तेजेद्र सिंह रावत, बागेश्वर से हीरा लाल भट्ट, रानीखेत से शिवराज मेहरा, अल्मोड़ा से सुभाष पांडेय, पिथौरागढ़ से चंद्रशेखर पुनेठा, चम्पावत से प्रह्लाद सिंह मेहता, प्रताप शाही, नैनीताल से इन्दर सिंह मनराल, पौड़ी से सुरेश जुयाल, रुद्रप्रयाग से नरेंद्र सिंह नेगी, देहरादून से केंद्रपाल तोपवाल,चमोली से राकेश सती,  देहरादून महानगर से बहादुर सिंह रावत, टिहरी से मकान सिंह रावत, प्रतापनगर से अतुल चंद्र रमोला, ऊधमसिंहनगर से आनंद सिंह असवोला, खटीमा से शिवलाल रस्तोगी, डीडीहाट से सलीम अहमद,  हरिद्वार से सरिता पुरोहित आदि काशीसिंह ऐरी का खुला समर्थन में उतर आये। कुल मिला कर इस विवाद से साफ हो गया कि भले ही त्रिेवन्द्र पंवार कमजोर साबित लग रहे हैं परन्तु कांग्रेस से समर्थन वापसी का उनका निर्णय किसी भी दृष्टि से उक्रांद के अहित में नहीं था। आम कार्यकत्र्ता यही चाहते परन्तु हाॅं कुछ लाल बत्ती या सत्ता की राजनीति करने के इच्छुक नेताओं को यह नहीं जंचा, इसी कारण त्रिवेन्द्र पंवार को उक्रांद नेताओं का एक बडा वर्ग खलनायक बता रहा है।

Sunday, May 19, 2013


भाजपा के मुगेरीलालों के दवाब में मोदी की ताजपोशी का ऐलान नहीं कर पा रही है भाजपा


 मोदी सहयोगियों को मिली प्रदेशों की कमान 

अमित शाह को उत्तर प्रदेश व रूड़ी को महाराष्ठ, वरूण को बंगाल व राधा मोहन को बनाया उत्तराखण्ड का प्रभारी 


नई दिल्ली(प्याउ)। प्रधानमंत्री बनने के हसीन सपने संयोजये भाजपा के कई मुगेरी लालों के कारण भाजपा कार्यकत्र्ताओं व देश की अवाम की पहली पसंद नरेन्द्र मोदी को प्रधानमंत्री का दावेदार घोषित करने  का साहस तक नहीं जुटा पा रही है। वहीं दूसरी तरफ वर्तमान हालत में देश की जनता किसी भी कीमत पर कांग्रेस के कुशासन को सहने के लिए तैयार नहीं है। इसका खुलाशा इसी सप्ताह जारी हुए पूर्व चुनावी सर्वेक्षण में किये जा रहे है। परन्तु भाजपा जनता की भावनाओं को और मजबूती देते हुए नरेन्द्र मोदी को प्रधानमंत्री का दावेदार घोषित नहीं कर पा रही है। सुत्रों के अनुसार मोदी का जो विरोध नीतीश व शिवसेना द्वारा किया जा रहा है उसके पीछे भी भाजपा के मुगेरीलालों का ही हाथ है। इन मुगेरीलालों कों संघ व भाजपा का एक संकीर्ण व प्रभावी तबका हवा दे रहा है।
वहीं रविवार 19 मई को भाजपा ने आगामी लोकसभा चुनाव में भाजपा का परचम फेहराने के लिए मोदी के करीबियों को महत्वपूर्ण राज्यों को प्रभार दे दिया हे। इसके तहत मोदी के करीबी अमित शाह को उत्तर प्रदेश जैसे 80 सांसदों वाले बडे राज्य का प्रभारी बनाया गया। हिमाचल प्रदेश में कलराज मिश्र की जगह अब बलबीर पुंज को प्रभारी बनाया गया है। लोकसभा चुनाव से पहले भाजपा ने राज्यों में अपने सेनापतियों की नियुक्ति कर उन्हें प्रमुख राज्यों का प्रभार दिया है। इसमें युवाओं को ज्यादा जिम्मेदारी दी गयी है। इसके तहत प्रताप रूडी को महाराष्ट्र, धर्मेंद्र प्रधान को बिहार,  प्रभात झा आंध्र प्रदेश, अनंत कुमार को मध्य प्रदेश व स्मृति ईरानी को गोवा की प्रभारी नियुक्त किया गया,। वहीं भाजपा के युवा तुर्क माने जाने वाले तेजतरार वरुण गांधी को पश्चिम बंगाल का प्रभारी बनाया गया है। मध्य प्रदेश में अनंत कुमार, राजस्थान में कप्तान सिंह, छत्तीसगढ़ में जेपी नड्डा ,शांता कुमार को पंजाब का, चंडीगढ़ का प्रभारी आरती मेहरा को प्रभारी बनाया गया है।
जबकि अमित शाह को उप्र के प्रभारी बनाने के साथ-साथ त्रिवेंद्र सिंह रावत, रामेश्वर चैरसिया व सत्येंद्र कु शवाहा के रूप में तीन सह प्रभारी भी बनाये गये । उत्तराखंड में थावरचंद गहलोत के स्थान पर राधा मोहन सिंह को प्रभारी बनाया गया। इसके साथ ही उत्तराखण्ड भाजपा को अपने प्रभार के दौरान पतन की गर्त में धकेलने के लिए जाने जाने वाले अनिल जेन को हरियाणा का सह प्रभारी बनाया गया और थावर चन्द यहां का प्रभार जगदीश मुखी को सौंपा गया हे। इस प्रकार भाजपा के मुगेरीलालों की एक रणनीति यह भी है कि जनता को इस बात के लिए धोके में रखा जाय कि मोदी समर्थकों को प्रदेशों का कमान दे कर भाजपा आगामी लोकसभा चुनाव में विजयी होती है तो प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ही बनायें जायेंगे। हकीकत यह है कि ये मुगेरीलाल नीतीश व शिवसेना के द्वारा मोदी का विरोध करा कर मोदी की लोकप्रियता को उनके समर्थकों को राज्यों का प्रभार सौंप कर बटोर कर अपने प्रधानमंत्री बनने के सपने को पूरा करना चाहते हैं। इन मुगेरीलालों के इस षडयंत्र को भांप कर जनता व कार्यकत्र्ताओं ने भाजपा नेतृत्व पर चुनाव से पहले ही मोदी को प्रधानमंत्री का उम्मीदवार घोषित करने का भारी दवाब बढा दिया है। कार्यकत्र्ताओं व आम जनता ने यह भी ऐलान कर दिया है कि अगर मोदी को भाजपा प्रधानमंत्री का दावेदार घोषित नहीं करती है तो भाजपा को भी जनता कांग्रेस की तरह सबक सिखायेगी। भाजपा के इन मुगंरी लालों के इन षडयंत्रों से कांग्रेस को फिर से जीवनदान मिल सकता है। परन्तु मुगेरीलालों को क्या, उनको कांग्रेस स्वीकार है पर जन नायक नरेन्द्र मोदी नहीं।


 दो टके के लालच में नेताओं व नौकरशाहों ने बना दिया देवभूमि उत्तराखण्ड को शराब का गटर एवं माफियाओं का अभ्याहरण


शराब न पीने देने पर दो भाईयों ने तीन पडोसियों को घर सहित जला मारा


उत्तरकाशी(प्याउ)। पडोसी द्वारा और शराब न पीने देने से शराब के लिए हैवान बने दो भाईयों ने गहरी नींद में सोते अपने तीन पडोसियों के घर में आग लगा कर मार डाला। बिजली, पानी, स्वास्थ्य सेवाओं के लिए तरस रही प्रदेश की जनता यह देख कर हैरान व स्तब्ध हे कि यह बेशर्म सरकार व प्रशासन गंगा यमुना के पावन देवभूमि उत्तराखण्ड को शराब का गटर बनाने को तुली हुई है। प्रदेश के शहर व कस्बों के कोने कोने से लेकर दूर दराज के गांव -गांव तक सरकार शराब पंहुचाने में उतारू हो रखी है। वहीं शराब की लत में पूरा प्रदेश तबाही के गर्त में तबाह हो रहा है। हर जगह हत्या, मार पीट, चोरी व व्यभिचार शराब के कारण होने से जनता त्रस्त है। गांव हो या शहर जन्मदिन से मरण दिन के कार्यक्रमों पर शराब ने पूरी तरह से ग्रहण लगा दिया है। परन्तु सरकार इस पर अंकुश लगाने के बजाय शराब को बढावा दे रही है।
पूरे प्रदेश को स्तब्ध करने वाली उक्त घटना गत सप्ताह सीमान्त जनपद उत्तरकाशी में घटित हुई। जहां  शराबी साथियों को ओर शराब न पीने देने से गुस्से में अंधे हुए दो सगे भाईयों ने बृहस्पति वार 16 मई की रात को अपने घर में गहरी नींद में सोये हुए पडोसी व उसके परिवार का जला कर मार डाला। इन शराब के लिए शैतान बन गये हैवानों ने पहले पडोसी का दरवाजा बंद किया और खिड़कियों से अंदर मिट्टी तेल छिड़कने के बाद आग लगा कर पडोसी, उसकी पत्नी व उसके भाई की इस आग में जलने से दर्दनाक मौत हो गयी। वहीं पडोसी का दूसरा भाई भी घायल अवस्था में चिकित्सालय में भर्ती कराया गया।
सुत्रों के अनुसार यह घटना इस सीमान्त जनपद मुख्यालय उत्तरकाशी के चंद किमी दूरी पर स्थित कोटियाल गांव में घटित हुई । उस गांव के इस दुर्घटना में मारे गाये व्यक्ति का नाम लाल बहादूर, उसकी पत्नी सीता व भाई रोहित व राजू सोये हुए थे। आग लगाने वाले पडोसी जिनके साथ लाल बहादूर ने शराब पी वह थे करण बहादूर व चंद बहादूर । पहले इन तीनों ने शराब पी। देर होने के बाद लाल बहादूर ने जब और अधिक न पीने व सोने की बात कह कर दोनों शराबी भाईयों को मना किया तो वे नाराज हो गये। शराबी करण व चंदू ने शराब न पीने देने से इतना अंध गुस्से हो गया और दोनों ने थोडी देर बाद जब लाल बहादूर का पूरा परिवार गहरी नींद में सो गया उन्होंने उनका दरवाजा बाहर से बंद कर घर में मिट्टी तेल छिडक कर आग लगा दी। तेजी से फेली इस आग से इस अभागे परिवार को कोई नहीं बचा पाया। इस काण्ड से पूरा क्षेत्र गहरे शोक से स्तब्ध रह गया। मुझे समझ में नहीं आ रहा है कि क्या हमने इसी शराब के लिए क्या राज्य का गठन किया था। प्रदेश को शराब का गटर बनाने को तुली अब तक की सरकारों के कृत्यों को देख कर आज जरूर राज्य गठन के लिए शहीद हुए राज्य गठन आंदोलनकारियों की आत्मा दुखी हो रही होगी। प्रदेश सरकार को प्रदेश में शराब के कारण हो रही तबाही की रत्ती भर भी चिंता नहीं है। उनकी नजर शराब माफियाओं से मिल रही उनकी तिजोरियों को भर रही दौलत पर टिकी हुई है। सरकारी खजाने की बात तो केवल जनता की आंखों में धूल झोंकने के लिए है। असल में शराब माफियाओं से इनके सम्बंधों के कारण मात्र 12 साल में उत्तराखण्ड के इन हुक्मरानों ने प्रदेश को पूरी तरह शराब माफियाओं की झोली में धकेल दिया है। प्रदेश के पूरे संसाधनों व तंत्र पर शराब के कारोबारियों का कब्जा हो गया है। प्रदेश की सरकारे बनाने व गिराने में इनका हाथ हो गया है। इनके लिए ही प्रदेश की आबकारी नीतियां ही नहीं अन्य प्रमुख नीतियां भी बन रही है। ये सतह ही आरोप नहीं अपितु ये बाते भाजपा के शासन काल में जल विद्युत परियोजनाओं की जिस प्रकार बंदरबांट में शराब लोबी का बर्चस्व देखा गया और गत वर्ष ही बहुगुणा की सरकार के एक दर्जाधारी नामधारी के कारनामें व उसको संरक्षण दे रहे राजनेताओं व नौकररशाहों की जुगलबंदी से प्रदेश की पूरी राजनीति अपने आप में बेनकाब हो गयी। मुजफरनगर काण्ड को दोषियों को दण्डित करने व प्रदेश में शराब माफिया के राजनेताओं-नौकरशाहों के नापाक गठजोड़ से मुक्ति के लिए सीबीआई जांच कराने की मांग को नजरांदाज करने वाले मुख्यमंत्री बहुगुणा को तो प्रदेश की चिंता कहां रही उन्हें तो केवल सोनिया गांधी को खुश करने के लिए बाबा रामदेव के लापता गुरू की जांच करना ही प्रमुख समस्या दिखाई दे रही थी। इसीलिए उन्होंने शराब कारोबारी पौटी व उनके गुर्गे नामधारी के साथ प्रदेश के राजनेताओं व नौकरशाहों के नापाक गठजोड़ की सीबीआई से जांच की हिम्मत ही कहा है अगर वे निष्पक्ष जांच करते तो उनकी सरकार ही नहीं प्रदेश के अधिकांश दलों के नेता भी पूरी तरह बेनकाब हो जाते। जो अपने निहित स्वार्थ के लिए प्रदेश को शराब माफियाओं का अभ्याहरण बनाने को उतारू हैं।
आज उत्तराखण्ड को इस त्रासदी से कोन उबारेगा। सैनिक व पूर्व सैनिक बाहुल्य इस प्रदेश को शराब का गटर बनाने में केन्द्र सरकार का भी बडा हाथ रहा । जो पूर्व सैनिकों व सैनिकों का कल्याणार्थ सही योजनाओं को लागू करने के बजाय उनको शराबी बना कर तबाह कराने के लिए उनको शराब का कोटा प्रदान कर रही है। इसी शराब के कोटे के लिए कई पूर्व सैनिक इस शराब को ऊंचील दामों में अपने अपने गांवों या शराब मिलने वाली जगहों पर खुले आम बेच रहे है। यहीं नहीं पूर्व सैनिक के निधन के बाद उनकी विधवाओं को भी शराब का कोटा यह बेशर्म सरकार दे रही है। इसे देख कर दो पैसे के लालच में कई विधवायें शराब ला कर इसको अपने गांव या कस्बे में बेच रही है। अनैक पूर्व सैनिक जेसे देशभक्तों को सरकार ने आज शराब का तस्कर बना डाला है। मैने इस शराब के कोटे को खत्म करने के लिए कई बार अपने समाचार पत्र में प्रमुखता से लिखा परन्तु क्या मजाल है सरकार की कानों में जूं तक नहीं रेंगी। कुछ साल पहले मैने जब यह लिखा कि शराब के कोटे को बंद करो, देशभक्त सैनिकों की विधवाओं को शराब परोसने वाली सरकार शर्म करो’ जैसे प्रखर समाचार प्रकाशित किये तो मैने उस लेख में सोनिया गांधी, खण्डूडी व जनरल रावत को धिक्कारा था। इस पर मेजर जनरल खण्डूडी की धर्मपत्नी अरूणा खण्डूडी ने मुझसे कहा कि रावत जी खण्डूडी जी तो शराब को छूते तक नहीं आपने उनको क्यों लिखा, मैने कहा खण्डूडी जी छूये या न छूये शराब इससे मुझे कोई लेना देना नहीं, परन्तु एक जनप्रतिनिधी होने व सैनिक अधिकारी से देश के नेता होने के कारण उनका पहला दायित्व बनता है कि पूर्व सैनिकों व उनकी विधवाओं को बर्बाद करने वाली इस योजना को तत्काल बंद करने के लिए उन्होंने कोई कदम जो उन्हें उठाने चाहिए थे नहीं उठाया, इस लिए उनको धिक्कारा जा रहा है। वे देश की जनता को इस प्रकार से शराब न पिलायें। इसी लेख को कांग्रेसी नेत्री रीता बहुगुणा को कांग्रेस मुख्यालय में पढाते समय उनसे सोनिया जी से तत्काल इस महिला विरोधी कृत्य को रोकने की मांग की तो वह मुह बना कर इस बात के लिए नाराज हुई कि मैने इस लेख में सोनिया जी को इसके लिए धिक्कारा था। रीता बहुगुणा ने मुझसे कहा आपने सोनिया जी के खिलाफ क्यों लिखा... इसके लिए तो तिवारी जी जो उस समय उत्तराखण्ड के मुख्यमंत्री थे उनसे मांग करनी चाहिए थी। मैने रीता बहुगुणा को बताया कि यह मामला उत्तराखण्ड का नहीं अपितु देश का है। इसके लिए केन्द्र सरकार ही जिम्मेदार है। परन्तु इतने साल बाद भी यह समस्या ज्यों की त्यों अपितु इससे और बिकराल बन गयी है। इस की तरफ किसी राजनेता का ध्यान नहीं अधिकांश राजनेता चुनाव में शराब को परोसने में लगे रहते है। सांसद या विधायक के चुनाव में ही नहीं प्रधान के चुनाव तक शराब से पूरा गांव देहात व शहर गटर बना दिये जाते है। कार्यकत्र्ताओं को शराब तो पानी की तरह पिलाई जाती है। युनाव यानी शराब की बाढ़, इस बाढ़ में लोकशाही के साथ साथ समाज की शांति व नैतिकता सब डूब कर दम तोड़ देती है। इस समस्या के निदान के लिए महिला संगठन सहित समाजसेवी लोग आगे आयें तभी इस समस्या से निजात पाया जा सकता है। जरूरत है उत्तराखण्ड में माओ की तर्ज पर मजबूत नेतृत्व की, जो नशे व राजनैतिक माफियाओं के गठजोड़ से समाज को मुक्ति दिला पाये। शेष श्रीकृष्ण। हरि ओम तत्सत्। श्रीकृष्णाय् नमो।

Saturday, May 18, 2013


25-26 मई को दिल्ली के रामलीला मैंदान में दर्शन देगी माॅं नन्दादेवी 


दिल्ली में माॅं नन्दादेवी के भव्य स्वागत के लिए उत्तराखण्डियों ने कसी कमर 


माॅं भगवती की दिव्य स्वरूपा माॅं नन्दादेवी के दिल्ली के भक्तों को आगामी 25 -26 मई को दिल्ली के विख्यात रामलीला मैदान में दर्शन देगी। भले ही विश्वविख्यात 280 किमी ‘माॅं नन्दा देवी राजजात ’यात्रा का शुभारंभ मोक्ष भूमि उत्तराखण्ड में 28 अगस्त से होगा। परन्तु दिल्ली के माॅं भगवती अपने भक्तों को हिमालयवासनी माॅं नन्दा राज राजेश्वरी के पावन दर्शन 25-26 मई को दिल्ली के विख्यात रामलीला मैंदान में देगी। माॅं भगवती नन्दा राज राजेश्वरी के दिल्ली आगमन पर 25-26 मई की सांय 4 बजे से रात्रि दस बजे तक दर्शन मेले की भव्य तैयारियों के लिए दिल्ली में रहने वाले 30 लाख उत्तराखण्डियों के तमाम संगठन जुट गये हैं।
25-26 मई को माॅं नन्दा राज राजेश्वरी के आगमन व दर्शन मेले के भव्य स्वागत के लिए दिल्ली के तमाम उत्तराखण्डी संगठनों ने कमर कस ली है। इसको ऐतिहासिक स्वरूप देने के लिए शुक्रवार 18 मई की सांयकाल साढ़े सात बजे से साढ़े दस बजे तक दिल्ली पेरामेडिकल इस्टीटयूट, न्यू अशोक नगर दिल्ली में युगान्तर जन परिषद्(पंजी.) व डा. विनोद बछेती के आवाहन पर  दिल्ली के उत्तराखण्ड समाज के लिए समर्पित अग्रणी युवा राजनेता, पत्रकार, सामाजिक संगठन व उद्यमियों ने संकल्प लिया कि आगामी 25-26 मई को दिल्ली में माॅं भगवती नन्दा देवी की भव्य स्वागत किया जायेगा।
उत्तराखण्ड जनता संघर्ष मोर्चा के अध्यक्ष व प्यारा उत्तराखण्ड समाचार पत्र के सम्पादक देवसिंह रावत  की अध्यक्षता में दिल्ली प्रोगे्रसिव पार्टी के अध्यक्ष जगदीश मंमगांई, कांग्रेसी नेता दीवानसिंह नयाल ,हरपाल रावत व रवीन्द्रसिंह नेगी, भाजपा नेता डा विनोद बछेती व चंदनसिंह गुसांई के अलावा अग्रणी सामाजिक संगठन अखिल भारतीय उत्तराखण्ड महासभा के उपाध्यक्ष विनोद नोटियाल, दिल्ली प्रदेश के महासचिव देवेन्द्रसिंह सजवान, उत्तराखण्ड जनमोर्चा के दलवीर सिंह रावत, उत्तराखण्ड परिषद के कैलाश वेलवाल, उत्तराखण्ड महासभा के करण बुटोला व रामेश्वर गोस्वामी, उक्रांद के शिवचरण मुण्डेपी, वरिष्ठ पत्रकार अभिनव कलुडा व वेद विलास उनियाल, समाजसेवी प्रेमसिंह चैहान, दिनेश भण्डारी, उद्यमी प्रकाश बिष्ट, उत्तराखण्ड क्लब के पृथ्वी सिंह केदारखण्डी,  राजेन्द्र नेगी, समाजसेवी उदय राम मंमगांई, राजेन्द्र वक्सी आदि ने नन्दादेवी के दिल्ली आगमन पर भव्य स्वागत करने के लिए ज्यादा से ज्यादा लोगों से रामलीला मैदान पंहुचने का आवाहन किया।
इस तैयारी बैठक सम्मलित में अन्य प्रमुख लोगों में उत्तराखण्ड जनता संघर्ष मोर्चा के महासचिव जगदीश भट्ट, पत्रकार उर्मिलेश भट्ट, हरीश भण्डारी टीबी 100 के थपलियाल, नीरज जोशी व सतेन्द्र रावत, दिनेश घिल्डियाल आदि प्रमुख थे।
समारोह का संचालन युगान्तर जन परिषद के कैलाश द्विवेदी व आयोजन समिति के संयोजक महेश प्रकाश ने संयुक्त रूप से किया। इस अवसर पर बताया गया कि माॅं राज राजेश्वरी नंदा देवी का दिल्ली आगमन मुम्बई से हो रहा है। माॅं नन्नदा देवी राज राजेश्वरी की राजजात के इतिहास में पहली बार इस बार मुम्बई से भी माॅं नन्दा देवी राजजात में मुम्बई से मुख्य नन्दा देवी राजजात में सम्मलित होने के लिए मुम्बई भ्रमण के बाद पुणे, अहमदाबाद, इंदौर, नागपुर, दिल्ली , चण्डीगढ़, देहरादून व हल्द्वानी के बाद नोटी मं पंहुचेगी। जहां से नन्दादेवी राजजात यात्रा में यह सम्मलित होगी।
वहीं नन्दादेवी के दिल्ली आगमन पर युगान्तर जन परिषद की आयोजन समिति के प्रमुख महेश प्रकाश, प्रताप सिंह नेगी, अनिल पंत, विक्रम सिंह राणा, राजेन्द्रसिंह नेगी, राजेश मालगुड़ी, प्रवीण जुयाल, रवि प्रकाश शास्त्री, गोविन्द बल्लभ शर्मा व बदरीदत्त शर्मा  तथा परिषद से जुड़ी  समाजसेवी श्रीमती विमला रावत ने पुन्न उत्तराखण्डी समाज से 25-26 मई को दिल्ली के रामलीला मैदान में सांय 4 से रात्रि दस बजे से माॅं नन्दादेवी के दर्शन करने को पधारने का खुला आवाहन किया। इस बैठक के बाद डा विनोद बछेती की तरफ से डीपीएमआई परिसर में रात्रि भोज भी परोसा गया।

Friday, May 17, 2013


सिनेमा व साहित्य जगत भी, अंग्रेजी की स्वयंभू गुलामी से आजाद हो 


अमिताभ बच्चन से प्रेरणा लें सिनेमा व साहित्य जगत 


काॅस फिल्म महोत्सव में भारत के स्वाभिमान व लोकशाही के प्रतीक हिन्दी में अपने विचार प्रकट करने पर भारतीय सिनेमा जगत के महानायक अमिताभ बच्चन के राष्ट्रीय गौरव बढ़ाने वाले इस कदम का भारतीय भाषा आंदोलन सहित तमाम राष्ट्र भक्त स्वागत करते हुए भारतीय सिनेमा जगत से आवाहन करता है कि उनको जो पहचान, सम्मान व अकूत दौलत जिन भारतीय भाषाओं ने दी उन भारतीय भाषाओं को वे अपने समारोह सहित अपनी निजी जिन्दगी में भी स्थान दें। सहसे शर्मनाक बात यह है कि भारतीय फिल्म जगत के अधिकांश समारोह में ये कलाकार प्रायः जिस भाषा ने इनको इतनी पहचान, सम्मान व दौलत दी उसका तिरस्कार करके केवल अंग्रेजी भाषा में बोलने में अपनी शान समझते है। आशा है भारतीय सिनेमा जगत अपने राष्ट्रीय दायित्व का निर्वहन भविष्य मे अपने तमाम समारोह व अपनी निजी जिन्दगी में करेगा। नहीं तो सिनेमा जगत को भी भारतीय नेताओं, नौकरशाहों व साहित्य कर्मियों की तरह भारतीय भाषाओं को तिरस्कार करने का अपराधी मान कर न केवल आंदोलनकारी धिक्कारेगे अपितु इतिहास भी इनके इस कुकृत्य के लिए इनको स्वयंभू गुलाम ही मानेगा। सबसे दुर्भाग्य यह हे कि आज आजादी के 65 साल बाद जहां शिक्षा व न्याय का देश को तबाही की गर्त में धकेलते हुए यहां के हुक्मरानों ने अंग्रेजीकरण कर दिया है। न्याय का भी गला देश की लोकशाही की तरह ही अंग्रेजी से 65 सालों से घोंटा जा रहा है। जो साहित्यकार व कलाकार भारतीय भाषाओं के कारण इतना मान सम्मान, अकूत दौलत अर्जित करते हैं उनमें भी अधिकांश समारोहों या निजी जीवन में अंग्रेजी के कहार बनते देखा गया है। यही नहीं इनके अपने निजी समारोहों के निमंत्रण पत्र, अपना परिचय पत्र आदि तक अपनी भाषा में नहीं अपितु फिरंगी भाषा अंग्रेजी में छाप कर खुद को स्वयंभू गुलाम घोषित कर देश के सम्मान को रौंदने का निकृष्ठ काम करते हैं।
 

भारतीय भाषाओं को सर्वोच्च न्यायालय व संघ लोकसेवा आयोग की परीक्षाओं में स्थापित करने के सा

 

देश में लोकशाही की असली जंग है संसद की चैखट जंतर मंतर पर जारी भाषा आंदोलन


नई दिल्ली। ’ न्यायालय व संघ लोकसेवा आयोग में भारतीय भाषाओं को स्थापित करने की निर्णायक जंग में आगे आयें देश के साहित्यकार, पत्रकार, कलाकार ,राजनेता व सभी देशभक्त । ’ यह आवाहन संसद की चैखट, राष्ट्रीय धरना स्थल जंतर मंतर पर चल रहे भारतीय भाषा आंदोलन में 16 मई को आयोजित हुई एक बैठक में देश के अग्रणी साहित्यकार, पत्रकार व भाषा आंदोलनकारियों ने संयुक्त रूप से भारतीय भाषाओं की शर्मनाक स्थिति को देख कर किया। इस बैठक में भारतीय भाषा आंदोलन के संयोजक पुष्पेन्द्र चैहान, महासचिव देवसिंह रावत, अग्रणी पत्रकार ज्ञानेन्द्रसिंह, समाजवादी नेता सुलतान कुरैशी, इंजीनियर जगदीश भ्ीाट्ट, पत्रकार नीरज जोशी, डा. आर एन सिंह, रामकृष्ण परमहंस, मोहम्मद आजाद, गौरव त्यागी, भगवत स्वरूप मिश्रा, कौशलेन्द्रकुमार, सुनील कुमार सिंह, चन्द्रवीर, सरदार महेन्द्रसिंह, वीपी सिंह, व दलीप कुमार सिंह, आदि ने भाग लिया। इस बैठक की अध्यक्षता, भारतीय भाषा आंदोलन के अध्यक्ष साहित्यकार डा. बलदेव बंशी ने किया। इस अवसर पर डा. बलदेव बंशी ने अपनी संत साहित्य से जुड़ी कविताओं का भी पाठ किया।
आंदोलनकारी इस बात से भी हैरान है कि आजादी के 65 साल बाद भी देश की उच्च न्यायालयों में व देश की उच्च सेवाओं में नियुक्ति की तमाम परीक्षाओं में ही नहीं अपितु देश मे शिक्षा व सम्मान में आज भी उसी फिरंगी भाषा अंग्रेजी का एकाधिकार है जिससे मुक्ति के लिए शताब्दियों का संघर्ष करके इस देश के लाखों लोगों ने अपना सर्वस्व बलिदान करके देश को आजादी दिलाई थी। आज जहां देश में अंग्रेजी भाषा शासन प्रशासन की प्राण बनी हुई हैं वहीं हिन्दी सहित तमाम भारतीय भाषाओं को शर्मनाक उपेक्षा का दंश झेलना पड़ रहा है। इससे देश अपनी संस्कृति व इतिहास से जहां कट गया है वहीं देश अपना आत्मसम्मान भी खो चूका है। पूरे देश में भ्रष्टाचार, व्यभिचार व आतंक रूपि कुशासन का तांडव मचा हुआ है। भारतीय हुक्मरान जिस प्रकार से न्यायालयों में भारतीय भाषाओं में भी न्याय दिलाने की मांग के अग्रणी न्याय आंदोलनकारी श्याम रूद्र पाठक एवं साथियों के 4 दिसम्बर 2012 से 24 अकबर रोड़ के समक्ष चल रहे धरने की शर्मनाक उपेक्षा कर रहे हैं, इससे आहत हो कर और देश को इस शर्मनाक स्थिति से उबारने के लिए व लोकशाही को स्थापित करने के लिए ही संसद की चैखट जंतर मंतर पर निर्णायक भारतीय भाषा जनांदोलन छेड ा गया है।
गौरतलब है कि संघ लोकसेवा आयोग की परीक्षाओं में अंग्रेजी की अनिवार्यता व भारतीय भाषाओं की शर्मनाक उपेक्षा से खिन्न हो कर भारतीय भाषाओं को सम्मलित करने की मांग को लेकर 1988 से 14 साल तक अखण्ड धरना दिया।थां इसमें पूर्व राष्टपति ज्ञानी जैल सिंह, पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी व वीपीसिंह सहित देश के तमाम अग्रणी आंदोलनकाररी सम्मलित हुए। परन्तु जब इस ऐतिहासिक आंदोलन के बाद भी सरकार की तंद्रा नहीं टूटी तो भ्भारतीय भाषा आंदोलन ने पुष्पेन्द्र चैहान के नेतृत्व में 21 अप्रैल 2013 से संसद की चैखट पर उपरोक्त मांगों को लेकर फिर आंदोलन का श्री गणेश कर दिया। इसी आंदोलन में अब निरंतर देश भर के अग्रणी भारतीय भाषा आंदोलनकारी पंहुच कर अपना समर्थन दे रहे है। यही नहीं यहां हर दिन देश की वर्तमान शर्मनाक पतन पर गहरा चिंतन मंथन होता रहता है। उल्लेखनीय है कि पुष्पेन्द्र चैहान व स्व. राजकरण सिंह के नेतृत्व में चलाये गये भारतीय भाषा आंदोलन के प्रथम चरण के आंदोलन में 1988 के बाद इस आंदोलन में जहां ज्ञानी जेल सिंह, अटल बिहारी वाजपेयी, वीपीसिंह, आडवाणी, चतुरानन्द मिश्र सहित चार दर्जन से अधिक देश के वरिष्ठ नेता भाग लेते थे वहीं इसमें देश के अग्रणी सम्पादक राजेन्द्र माथुर, प्रभात जोशी, अच्युतानन्द मिश्र, राम बहादुर राय, राहुल देव व गोविन्द सिंह सहित हबीब अख्तर, ओम प्रकाश तपस, रामहित नन्दन सहित अनैक विख्यात पत्रकार भाग लेते रहे। इस आंदोलन के महत्वपूर्ण स्तम्भों में ओम प्रकाश हाथपसारिया, यशवंत निकोसे, विनोद गौतम, रविन्द्र धामी,, ओमवीर तोमर, विजय गुप्त, राजेन्द्रसिंह, स्व. सतवीर, हरपाल राणा व ईश्वर भारद्वाज सहित अनैक प्रमुख आंदोलनकारी अग्रणी रहे। वर्तमान में श्याम जी भट्ट, सतीश मुखिया, बी आर चैहान, प्रदीप नागर, भगतजी , सुलतान कुरैशी, नवीन कुमार सोलंकी, वीड़ी दिवाकर, पत्रकार विजयेन्द्र, जगदीश भट्ट, आशीष व अर्जुन आदि प्रमुख है।
आंदोलनकारी इस बात से भी हैरान है कि आजादी के 65 साल बाद भी देश की उच्च न्यायालयों में व देश की उच्च सेवाओं में नियुक्ति की तमाम परीक्षाओं में ही नहीं अपितु देश मे शिक्षा व सम्मान में आज भी उसी फिरंगी भाषा अंग्रेजी का एकाधिकार है जिससे मुक्ति के लिए शताब्दियों का संघर्ष करके इस देश के लाखों लोगों ने अपना सर्वस्व बलिदान करके देश को आजादी दिलाई थी। आज जहां देश में अंग्रेजी भाषा शासन प्रशासन की प्राण बनी हुई हैं वहीं हिन्दी सहित तमाम भारतीय भाषाओं को शर्मनाक उपेक्षा का दंश झेलना पड़ रहा है। इससे देश अपनी संस्कृति व इतिहास से जहां कट गया है वहीं देश अपना आत्मसम्मान भी खो चूका है। पूरे देश में भ्रष्टाचार, व्यभिचार व आतंक रूपि कुशासन का तांडव मचा हुआ है। भारतीय हुक्मरान जिस प्रकार से न्यायालयों में भारतीय भाषाओं में भी न्याय दिलाने की मांग के अग्रणी न्याय आंदोलनकारी श्याम रूद्र पाठक एवं साथियों के 4 दिसम्बर 2012 से 24 अकबर रोड़ के समक्ष चल रहे धरने की शर्मनाक उपेक्षा कर रहे हैं, इससे आहत हो कर और देश को इस शर्मनाक स्थिति से उबारने के लिए व लोकशाही को स्थापित करने के लिए ही संसद की चैखट जंतर मंतर पर निर्णायक भारतीय भाषा जनांदोलन छेड ा गया है।गौरतलब है कि संघ लोकसेवा आयोग की परीक्षाओं में अंग्रेजी की अनिवार्यता व भारतीय भाषाओं की शर्मनाक उपेक्षा से खिन्न हो कर भारतीय भाषाओं को सम्मलित करने की मांग को लेकर 1988 से 14 साल तक अखण्ड धरना दिया।थां इसमें पूर्व राष्टपति ज्ञानी जैल सिंह, पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी व वीपीसिंह सहित देश के तमाम अग्रणी आंदोलनकाररी सम्मलित हुए। परन्तु जब इस ऐतिहासिक आंदोलन के बाद भी सरकार की तंद्रा नहीं टूटी तो भ्भारतीय भाषा आंदोलन ने पुष्पेन्द्र चैहान के नेतृत्व में 21 अप्रैल 2013 से संसद की चैखट पर उपरोक्त मांगों को लेकर फिर आंदोलन का श्री गणेश कर दिया। इसी आंदोलन में अब निरंतर देश भर के अग्रणी भारतीय भाषा आंदोलनकारी पंहुच कर अपना समर्थन दे रहे है। यही नहीं यहां हर दिन देश की वर्तमान शर्मनाक पतन पर गहरा चिंतन मंथन होता रहता है। उल्लेखनीय है कि पुष्पेन्द्र चैहान व स्व. राजकरण सिंह के नेतृत्व में चलाये गये भारतीय भाषा आंदोलन के प्रथम चरण के आंदोलन में 1988 के बाद इस आंदोलन में जहां ज्ञानी जेल सिंह, अटल बिहारी वाजपेयी, वीपीसिंह, आडवाणी, चतुरानन्द मिश्र सहित चार दर्जन से अधिक देश के वरिष्ठ नेता भाग लेते थे वहीं इसमें देश के अग्रणी सम्पादक राजेन्द्र माथुर, प्रभात जोशी, अच्युतानन्द मिश्र, राम बहादुर राय, राहुल देव व गोविन्द सिंह सहित हबीब अख्तर, ओम प्रकाश तपस, रामहित नन्दन सहित अनैक विख्यात पत्रकार भाग लेते रहे। इस आंदोलन के महत्वपूर्ण स्तम्भों में ओम प्रकाश हाथपसारिया, यशवंत निकोसे, विनोद गौतम, रविन्द्र धामी,, ओमवीर तोमर, विजय गुप्त, राजेन्द्रसिंह, स्व. सतवीर, हरपाल राणा व ईश्वर भारद्वाज सहित अनैक प्रमुख आंदोलनकारी अग्रणी रहे। वर्तमान में श्याम जी भट्ट, सतीश मुखिया, बी आर चैहान, प्रदीप नागर, भगतजी , सुलतान कुरैशी, नवीन कुमार सोलंकी, वीड़ी दिवाकर, पत्रकार विजयेन्द्र, जगदीश भट्ट, आशीष व अर्जुन आदि प्रमुख है।

Thursday, May 16, 2013


पदलोलुपु की नहीं,  उमा भारती जैसी जनहितों के लिए संघर्ष करने वाली नेता की जरूरत


जनहितों पर आवाज उठाने को क्यों सांप सुंघ जाता है उत्तराखण्डी नेताओं को 


बृहस्पतिवार 16 मई को जिस समय उत्तराखण्ड के मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा सहित उत्तराखण्ड के तमाम राजनेता दिल्ली व उत्तराखण्ड में प्रदेश की बदहाली व दुर्दशा से बेपरवाह हो कर अपने निहित स्वार्थो में डूबकर आराम फरमा रहे थे उस समय भाजपा की तेजतरार नेत्री उमा भारती, अपने दल के शीर्ष नेता लालकृष्ण आडवाणी के नेतृत्व में राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी से मिल कर उत्तराखण्ड की जनआस्थाओं व हक हकूकों के संघर्षों की प्रतीक शिला रूपि ‘धारी देवी मंदिर’ को श्रीनगर के समीप अलकनन्दा नदी में बन रहे बांध में डुबोने को उतारू प्रदेश सरकार व बांध निर्माण कम्पनी से बचाने की गुहार लगा रहे थे।
उत्तराखण्ड के मुख्यमंत्री बहुगुणा सहित अधिकांश कांग्रेसी दिग्गज नेताओं ने अपनी केन्द्रीय सरकार पर अपने प्रभाव का इस्तेमाल कर इस पर रोक लगाने के लिए जारी किये गये अपने ही आदेश को वापस ले लिया है। उल्लेखनीय है कि केन्न्द्रीय पर्यावरण व वन मंत्रालय द्वारा उत्तराखण्ड में बांध के लिए उत्तराखण्ड की जनआस्था व हक हकूकों के संघर्षों की प्रतीक शिला रूपि धारी देवी मंदिर को डुबोने पर रोक लगाने वाले अपने ही आदेश को 10 मई को सर्वोच्च न्यायालय की न्यायमूर्ति  के एस राधाकृष्णन व दीपक मिश्र की खण्डपीठ के समक्ष वापस लेने से इस मंदिर का बाहरी ढांचा ऊंचे स्थान में प्रतिस्थापित करने को उतारू बांध निर्माण कम्पनी की राह आसान हो गयी।
उमा भारती भले ही उत्तराखण्ड मूल की न होते हुए भी उनका सदैव उत्तराखण्ड से गहरा जुडाव ही नहीं अपितु वह हमेशा उत्तराखण्ड के हक हकूकों की रक्षा के लिए प्रदेश के तमाम भाजपा व कांग्रेस के नेताओं से अधिक संघर्ष करती नजर आती है। चाहे उत्तराखण्ड राज्य गठन जनांदोलन हो या मुजफरनगर काण्ड के दोषियों को सजा देने की मांग करने के लिए वह हमेशा संसद ही नहीं सड़क सभी जगह संघर्ष करती रही। जब भी उन पर राजनैतिक संकट आया हो या वह राजनीति के अच्छे दिनों में जब मध्य प्रदेश की मुख्यमंत्री भी रही हो उन्हें उत्तराखण्ड ही भाया। जहां उत्तराखण्ड के नेताओं को विदेश या दिल्ली में सकुन मिलता है वहीं उमा भारती को भगवान शिव के चरणों में व हिमालय की गोद में बसे उत्तराखण्ड में सकुन मिलता है। केदारनाथ धाम हो या मदमहेश्वर जैसे दिव्य धामों में उमा भारती को सकुन मिलता है। भले उत्तराखण्ड नाम के प्रति उनका दुराग्रह व उत्तरांचल के प्रति उनका स्नेह को दलीय मोह व भाजपा के प्रांतीय नेताओं की अज्ञानता के कारण रहा हो। पर उमा भारती तमाम अपमान व विपरित परिस्थितियों की परवाह न करते हुए सदा भारतीय संस्कृति व हक हकूकों की रक्षा के लिए संघर्षरत रही। भाजपा का दुर्भाग्य रहा कि उसने अपनी तेजतरार व भारतीय संस्कृति की इस जुझारू ध्वजवाहक को जिसने हुगली के मैदान में भारतीय ध्वज तिरंगा को फहराने का ऐतिहासिक कार्य किया था, उसका समर्थन देने के बजाय उसको राजनैतिक रूप से हाशिये में धकेलने का आत्मघाती काम किया। देश व प्रदेश के हक हकूकों के लिए कैसे संघर्ष किया जाता है इसकी सीख भाजपा सहित तमाम नेताओं को उमा भारती से लेनी चाहिए। परन्तु दुर्भाग्य है देश में भारतीय संस्कृति के स्वयं भू ध्वज वाहक होने का दंभ भरने वाली भाजपा में उमा भारती जैसे समर्पित नेताओं को हाशिये में डाल कर सुषमा जैसी नेताओं को अग्रणी पंक्ति की नेत्री बनाने जैसा कृत्य करती है।
यहां पर बात उत्तराखण्ड की हो रही है तो उत्तराखण्ड के नेताओं में उमा भारती जैसा समर्पण तो रहा दूर उनमें भाजपा के ही तेज तरार व कई विवादों में घिरे रहने वाले सांसद तरूण विजय की तरह भी प्रदेश के जनभावनाओं को स्वर देने की कुब्बत नहीं है। तरूण विजय भले ही उत्तराखण्ड कोटे से भाजपा के राज्यसभा सांसद हैं पर उन्होंने उत्तराखण्ड मूल के सभी सांसदों चाहे वे कांग्रेस से हों या भाजपा से सबको अपने सामने 19 ही साबित किया है। जिस प्रखरता से वे नन्दा राजजात के मामले में इसे प्रखरता से उठा रहे हैं उसके समक्ष उत्तराखण्ड के नेताओं की इस मामले में उदासीनता शर्मसार ही करती है। यही नहीं कुछ साल पहले उन्होंने उत्तराखण्ड के सबसे पोष्टिक परन्तु उपेक्षित खाद्यान्न ‘कोदा यानी मंडूवा’ को पहचान देने के लिए मंडूवा महोत्सव भी मना कर अपनी जमीनी पकड़ व बद्धि कौशल का प्रमाण दिया। जो अभी तक 12 साल के शासन में किसी भी उत्तराखण्डी मुख्यमंत्री तिवारी, खण्डूडी, निशंक, बहुगुणा में ही नहीं किसी सांसद व मंत्री में दूर दूर तक दिखाई नहीं दे रहा है। काश उत्तराखण्ड में भी ऐसे नेता होते जिनको इसकी माटी से गहरा लगाव उमा भारती की तरह होता या उसके हितों की रक्षा के लिए संघर्ष करने की कुब्बत होती । परन्तु  इन स्वार्थ में अंधों के आंगे यह बीन बजाने के समान है। आज अगर उत्तराखण्ड के नेताओं में जरा सी भी कुब्बत होती तो प्रदेश में जनसंख्या पर आधारित परिसीमन नहीं थोपा जाता, प्रदेश के सम्मान को रौंदने वाले मुजफरनगर काण्ड-94 आदि के गुनाहगारों को सजा मिलती, प्रदेश की स्थाई राजधानी गैरसैंण बन जाती, प्रदेश में घुसपेटियों के बजाय मूल निवासियों के हक हकूकों के लिए काम किया जाता व प्रदेश में भू-जल-जमीन, शराब व बांध माफियाओं का शिकंजा इस तरह नहीं कसता।






केजरीवाल के खुलासे के बाद फिर घिरे कानून मंत्री सहित मनमोहन सरकार 


नई दिल्ली। (प्याउ)। लगता है कानून मंत्री के पद पर ग्रहण लग गया हे। कुछ समय पहले सर्वोच्च न्यायालय द्वारा कोयला आवंटन घोटाले पर सीबीआई जांच में दखल नदाजी करने पर कड़ी फटकार से सरकार की जो किरकिरी हुई। उसने न केवल कानून मंत्री अपितु प्रधानमंत्री सहित पूरी सरकार ही कटघरे में खड़ी हो गयी है। उससे उबरने के लिए कांग्रेस ने मनमोहन सरकार से कानून मंत्री का इस्तीफा दिला कर मंत्री अश्वनी कुमार को बलि का बकरा बनाया गया। कानून मंत्रालय ठीक ठाक से संभालने के लिए कांग्रेस ने कानून के प्रकाण्ड विद्धान कपिल सिब्बल को यह मंत्रालय सोंपा गया। परन्तु यह मंत्रालय मिलते ही नये कानून मंत्री कपिल सिब्बल ने जिस प्रकार से वोडाफोन मामले में पहला निर्णय लिया उस निर्णय से वे खुद कटघरे में खडे हो गये है। आप पार्टी के संयोजक केजरीवाल ने 15 मई बुधवार को प्रेस कॉन्फ्रेंस कर कहा कि सिब्बल ने कानून मंत्री बनते ही ब्रिटिश टेलीकॉम कंपनी वोडाफोन को 11 हजार करोड़ के टैक्स चोरी मामले में फायदा पहुंचाने की कोशिश की है। सिब्बल ये सब अपने बेटे अमित सिब्बल के लिए कर रहे हैं। ताकि सरकार वोडाफोन के खिलाफ 11 हजार करोड़ रुपए टैक्स चोरी का मामला कोर्ट के बाहर निपटा सके। केजरीवाल और प्रशांत भूषण ने पूछा कि आखिर कानून मंत्री बनने के 24 घंटे के भीतर कपिल सिब्बल ने वोडाफोन के पक्ष में ये फैसला क्यों ले लिया? खुद ही जवाब देते हुए केजरीवाल ने कहा कि दरअसल कपिल सिब्बल के बेटे अमित सिब्बल वोडाफोन की सहयोगी कंपनी हचिंसन के वकील हैं। इसलिए कपिल सिब्बल कंपनी को फायदा पहुंचाना चाहते हैं। केजरीवाल ने कहा कि उनके पास आरोप साबित करने के लिए दस्तावेज भी हैं।
इन आरोपों पर सफाई देते हुए कानून मंत्री कपिल सिब्बल ने आरोपों को सिरे से नकारते हुए स्पष्ट किया कि उनका बेटा अमित बतौर वकील वोडाफोन से 2007 से 2009 के बीच जुड़े थे। जबकि टैक्स विवाद का मामला पिछले साल आया है। सिब्बल ने कहा कि उनके टेलीकॉम मंत्री बनने के बाद उनके बेटों ने टेलीकॉम से जुड़ा कोई केस नहीं लिया है। इस बीच अमित सिब्बल ने कहा है कि आखिरी बार वह किसी टेलीकॉम कंपनी की सुनवाई में 22 अप्रैल 2010 को कोर्ट में गए थे। जबकि कपिल सिब्बल इसके बाद टेलीकॉम मंत्री बने हैं। गौरतलब है कि कानून मंत्री का पद संभालते ही कपिल सिब्बल ने गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ खुलासे करने का बडे जोरों से दावा किया था। यह दावा तो कपिल कब पूरा करेगे अब अरविन्द के इस खुलासे से न केवल कपिल अपितु पूरी कांग्रेस पार्टी व उसकी सरकार कटघरे में खडी हो गयी है।



कांग्रेस व लालू के चक्रव्यूह में फंस कर कहीं चैबे से दुबे न बन जाएं नीतीश



एक तरफ पटना के गांधी मैदान में लालू प्रसाद यादव बिहार के मुख्यमंत्री  नीतीश कुमार को आर एस एस का तौता बता कर उनको अवसरवादी बता कर फटकार लगा रहे थे वहीं दूसरी तरफ योजना आयोग बिहार राज्य के पिछड़े जिलों के विकास के लिये चालू वित्त वर्ष के दौरान 2,500 करोड़ रुपये की राशि मंजूर कर रही थी। राजनीति के मर्मज्ञ इसे कांग्रेस गठबंधन की केन्द्रीय सरकार की इसे  कोरी उदारता नहीं अपितु केन्द्र सरकार के प्रमुख घटक कांग्रेस का आगामी लोकसभा चुनाव में राजग गठबंधन से जदयू को दूर करने का एक सोची समझा राजनैतिक दाव ही मान रहे है। गौरतलब है कि 15 मई को जब पटना में लालू यादव जदयू के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को गांधी मैदान रेली में फटकार रहे थे उसी दिन योजना भवन में योजना आयोग के अध्यक्ष मोंटेक सिंह आलुवालिया , बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के साथ बैठक कर 12वीं योजना में राज्य के लिये घोषित 12,000 करोड़ रुपये के विशेष पैकेज में से 2013.14 के दौरान राज्य के पिछडे इलाकों के विकास हेतु 2,500 करोड़ रुपये जारी करने का ऐलान कर रहे थे।
गौरतलब है कि  कांग्रेस पार्टी को इस बात का अहसास हो गया है कि मनमोहन सरकार के कुशासन से देश की जनता कांग्रेस से काफी आक्रोशित है। आगामी लोकसभा चुनाव कांग्रेस के लिए अस्तित्व की रक्षा का चुनाव होगा। इसीलिए वह बहुत ही तिकड़मों का सहारा ले कर राजग गठबंधन के अतिमहत्वाकांक्षी ने
ता नीतीश कुमार को हवा दे रहे है। सुत्रों के अनुसार वर्तमान राजनीतिक हालात को देख कर नीतीश कुमार भी चन्द्र शेखर की तरह प्रधानमंत्री बनाये जाने के लिए कांग्रेस की तरफ आशा भरी नजरों से निहार रहे है।
नीतीश कुमार की महत्वाकांक्षा को भांपते हुए कांग्रेस ने जो चक्रव्यूह बुना है उसमें नीतीश कुमार काफी हद तक घिरते जा रहे है। परन्तु कांग्रेस व नीतीश कुमार की जुगलबंदी पर जिस प्रकार से लालू यादव मूक हैं वह केन्द्र सरकार को कटघरे में खडा करने से निरंतर बच रहे है। पटना के गांधी मैदान में भी वे केवल नीतीश कुमार पर ही बरसते रहे और केन्द्र पर किसी प्रकार से निशाना साधने से बचते रहे। राजनीति के मर्मज्ञों के अनुसार नीतीश कुमार की मंशा को भांप कर लालू यादव भी नीतीश कुमार की हालत चैबे से दुबे बनाने में जुट गये है। वह कांग्रेस से सीधे दुश्मनी लेने के बजाय नीतीश कुमार को ही कटघरे में रख कर नीतीश के समर्थकों में एक संदेश पंहुचाना चाहते हैं कि नीतीश फिरकापरस्तों को मजबूत करने में जुटे है। अगर नीतीश से बिहार का अल्पसंख्यक वर्ग व पिछड़ा वर्ग दूर होता है तो नीतीश की हालत उस चैबे की तरह होनी निश्चित है जो छबे बनने चले थे पर दुबे बन कर लोटे। क्योंकि कांग्रेस से पींगे बढाते देख कर राजग के प्रमुख घटक भाजपा भी अब अंदर से नीतीश को सबक सिखाने का मन बना चूकी है। वहीं कांग्रेस का कोई भरोसा नहीं। नीतीश कुमार अभी न तो भाजपा से बाय बाय कर सकते हैं व नहीं सीधे कांग्रेस के साथ गलबहियां कर सकते है। इस कारण वह बेहद दुविधा में है। इसी दुविधा का लाभ उठाते हुए लालू यादव निरंतर नीतीश पर प्रहार कर रहे है। उन्होंने नीतीश को आर एस एस का तोता बताते हुए कहा कि  जब तक लालू और बिहार की धमनी में खून का एक भी कतरा बचा रहेगा तब तक दिल्ली की गद्दी पर फिरकापरस्त ताकतों को काबिज नहीं होने देंगे। राजद प्रमुख लालू ने याद दिलाया  कि जेपी आंदोलन के समय भी इसी गांधी मैदान में उन्होंने यह कसम खायी थी कि भारत को तोड़ने और टूटने नहीं देंगे और सभी धर्म के लोग साथ रहेंगे तथा इस बखिया को उजाड़ने वाली ताकत को मुंहतोड़ जवाब देंगे।
लालू यादव कांग्रेस से अभी सीधे टकराव नहीं चाहते हैं। वह लोकसभा चुनावों में अपनी ताकत बढाने में सारा ध्यान लगा रहे है। उनको इस बात का भान है कि बिहार की जनता अभी कांग्रेस को घास नहीं डालने वाली। इसलिए वह नीतीश पर पूरा ध्यान लगाना चाहते है। उनकी नजर में आगामी लोकसभा चुनाव में बिहार में होने वाली चुनावी जंग भी लालू व नीतीश के बीच ही होगी। भाजपा जहां नीतीश को विश्वासघात का सबक सिखायेगी। वहीं कांग्रेस मनमोहन के कुशासन के दंश से आहत देश की जनता के साथ साथ बिहार की जनता के कोप का भाजन बनेगी। इन समीकरणों को देखते ही लालू का नीतीश को दुबे बनाने का अभियान कहां तक सफल होगा यह आने वाला वक्त ही बतायेगा।



जनादेश लेने से क्यों डर रहे  हैं मनमोहन 


प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने 15 मई बुधवार को असम से राज्यसभा सदस्य बनने के लिए नामांकन पत्र को दाखिल करने से एक सवाल देश भर की जनता पूछ रही है कि आखिर क्यों प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह जनादेश लेने से इतना डर रहे है।  गौरतलब है कि मनमोहन सिंह को ही नहीं कांग्रेस नेतृत्व को भी इस बात का भरोसा नहीं है कि अगर प्रधानमंत्री देश की किसी सीट से लोकसभा के लिए चुनाव में उतरे तो वे जीत ही जायेंगे। इसी आशंका से ग्रसित हो कर शायद खुद मनमोहन सिंह व उनकी पार्टी राज्य सभा से निर्वाचित होना पसंद करती है। गौरतलब है कि प्रधानमंत्री के रूप में मनमोहन सिंह बेलगाम मंहगाई, भ्रष्टाचार व आतंकवाद को रोक पाने में पूरी तरह से असफल होने के कारण जनता के बीच बेहद अलोकप्रिय हैं। इसी को देखते हुए अधिकांश चुनावी समीक्षक ही नहीं कांग्रेसियों को भी 2014 में होने वाले लोकसभा चुनाव में कांग्रेस के दुबारा से सत्तारूढ़ होने पर संदेह है।
प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह 1991 से राज्य सभा से ही सांसद बनते रहे। यह उनका पांचवां नामंकन है। इससे यह भी सवाल खडे हो रहे हें कि एक दशक से मनमोहन सिंह देश के प्रधानमंत्री के पद पर आसीन हैं, इसके बाबजूद वे देश की किसी भी लोकसभा सीट से चुनाव लड़ने का साहस तक क्यों नहीं जुटा पा रहे है। क्या उनको खुद व अपनी सरकार की लोकप्रियता पर भरोसा नहीं रहा है। हालांकि संविधानिक दृष्टि से प्रधानमंत्री के लिए लोकसभा से चुनाव जीत कर आने की बंदिश नहीं हैं परन्तु लोकतंत्र में ऐसी आशा कि जाती है कि देश में लोकशाहीी की बागडोर जिसके हाथों में हो वह कम से कम जनता द्वारा प्रत्यक्ष रूप से चुन कर आये। एकाद बार राज्यसभा में निर्वाचित होने को जनता स्वीकार कर सकती है परन्तु लगातार कई बार राज्य सभा यानी ऊपरी सदन के रास्ते से निर्वाचित हो कर सांसद बनना अपने आप में जरूर सवाल खडे करते हैं। वहीं जनभावनाओं को नजरांदाज करते हुए 80 वर्षीय प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह कहते हैं कि असम की जनता ने ही उन्हें केंद्र में भेजा है। असम से वे बतौर सांसद 21 साल तक रह चुके हैं। राज्य सांसद के रूप में उनका वर्तमान  कार्यकाल 14 जून को खत्म हो रहा है।


कुटिल अमेरिका, पाक व चीन से सावधान रहे भारत


पाकिस्तान में हाल में सम्पन्न हुए चुनाव में पूर्व प्रधानमंत्री नवाज शरीफ की पार्टी के नेतृत्व में सरकार बनने की संभावनाओं व उसको इमरान खान ीक पार्टी का साथ मिलने की संभावनाओं को देखते हुए जहां एक तरफ भारतीय उत्साहित है। वहीं दूसरी तरफ अपनी भारत यात्रा से पहले चीन के प्रधानमंत्री ली क्विंग भारत और चीन को दोस्ती का हाथ मिलाने के गीत गा रहे हैं। जबकि कुछ ही दिनों पहले लद्दाख क्षेत्र में भारत की सीमा  के 19 किमी अंदर कम से कम दो सप्ताह तक बलात कब्जा जमाने वाला चीन व भारत से जापान अमेरिका के साथ सांझा सैन्य अभ्यास न करने का दवाब डालने वाला चीन अब दोस्ती की गीत गा रहा है। उससे भारतीय नेतृत्व व जनता को अत्यधिक सावधानी बरतनी चाहिए। क्योंकि न केवल चीन व पाक ने अभी तक भारत विरोधी अभियान को बंद किया व नहीं उनके कार्यो से कहीं दूर-दूर तक दोस्ताना रूख दिखाई दे रहा है। यही नहीं भारत विरोधी गतिविधियों को संचालित करने के केन्द्र बन कर उभरे पाकिस्तान का सरपरस्त आका अमेरिका भी भले ही तत्कालीन परिस्थितियों के कारण भारत से दोस्ती की डींग हांक रहा हो परन्तु सच्चाई यह है कि आज भी अमेरिका ने अफगानिस्तान से लेकर सामरिक क्षेत्र सहित तमाम संवेदनशील मामलों में पाक को ही भारत से कहीं अधिक वरियता दी है। अमेरिका का आज भी भारत के प्रति रवैया एक मित्र राष्ट्र के रूप में नहीं हें। सच्चाई तो यह है कि अबतक पाकिस्तान भारत के खिलाफ जो भी अभियान संचालित करता है उसका निर्दश व संरक्षण उसे अमेरिका से ही मिलता है। यह कारगिल व संसद हमले के साथ साथ कश्मीर प्रकरण से पूरी तरह से उजागर हो गया। इसके बाबजूद भारत के हुक्मरान अमेरिका से दोस्ती के गीत गाने में मस्त रहते हे।
पाकिस्तान में भले ही सत्ता परिवर्तन हो जाच परन्तु उसकी असली ताकत सेना के पास रहती है। सत्ता परिवर्तन होने से उसकी नीति में कोई परिवर्तन नहीं होता। पाकिस्तान का जन्म ही भारत के विरोध में हुआ। वहीं चीन अपनी अर्थ व्यवस्था को सुदृढ़ बनाने के लिए भारत को जहां एक तरफ आये दिन धमकाता व रौदता रहता है वहीं वह दोस्ती की डींग भी हाॅंक कर भारतीय नेतृत्व को गुमराह कर रहा है।
गौरतलब है कि अपनी भारत यात्रा से पूर्व चीन के नए प्रधानमंत्री ली क्विंग ने 15 मई को बुधवार को कहा कि एशिया को विश्व अर्थव्यवस्था का इंजन बनाने के लिए चीन और भारत को हाथ मिलाना चाहिए।
उल्लेखनीय है कि प्रधानमंत्री ली 19 मई को नई दिल्ली पहुंचेंगे। ली ने कहा कि दुनिया में बहुत से लोग यह विश्वास करते हैं कि 21वीं सदी में, एशिया प्रशांत, विशेष रूप से एशिया वैश्विक अर्थव्यवस्था तथा राजनीति में अधिक महत्वपूर्ण भूमिका अदा करेगा और यह विश्व अर्थव्यवस्था के लिए एक महत्वपूर्ण इंजन बनेगा।
वहीं अमेरिका में प्रभावशाली गुट भारत की प्रतिभाओं  का अमेरिका में प्रवेश पर ही प्रतिबंध लगाने के लिए अभियान छेड़े हुए है। अमेरिका भारत के बडे बाजार का लाभ भी उठाना चाहता है और चीन के खिलाफ उसको मोहरा भी बनाना चाहता परन्तु वह किसी भी कीमत पर भारत को एक मजबूत राष्ट्र के रूप में स्वीकार नहीं करना चाहता। हालत यह है कि भारत विरोधी तमाम अभियानों का केन्द्र ही अमेरिका कई दशकों से बना हुआ है। अब अमेरिका के इस कार्य में सबसे बडे प्यादे पाक को चीन ने भी अपना प्यादा बना दिया है। आज अमेरिका व चीन के संरक्षण में पाक भारत के साथ कितना दोस्ती निभायेगा इसका अंदाजा सहज ही लग जाता है। भारतीय हुक्मरानों व जनता को इस नापाक देशों से भारत को सदैव सावधान रहने की जरूरत को समझनी होगी। शेष श्री कृष्ण कृपा। हरि ओम तत्सत्। श्री कृष्णाय् नमो।