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Thursday, February 28, 2013



डा. श्याम रूद्र पाठक के आंदोलन से मीडिया, सोनिया गांधी, भाजपा व तमाम सामाजिक संगठन बेनकाब


देश से अंग्रेजी की गुलामी से मुक्त करने के लिए ‘सर्वौच्च न्यायालय व उच्च न्यायालयों में न्याय भारतीय भाषाओं के दिलाने की मांग को लेकर सोनिया गांधी के दर पर 4 दिसम्बर से निरंतर धरना देेने वाले देश के अग्रणी वैज्ञानिक डा श्याम रूद्र पाठक, गीता मिश्रा व प्रोफेसर पाण्डे को 85 दिन से अधिक हो गये। सबसे शर्मनाक बात यह है कि विगत 80 दिन से डा श्यामरूद्र पाठक को एक प्रकार 4 दिसम्बर से पुलिस हिरासत में रखा गया है। वे 4 दिसम्बर से निरंतर दिन में 10 जनपथ सोनिया गांधी के निवास पर धरना देते है उसके बाद सायंकाल दिल्ली पुलिस उनको गिरफतार करके जेल भेजने के बजाय डा श्यामरूद्र पाठक को तुगलक रोड़ थाने में ही बंद रखा जाता है। अपनी मांगों को लेकर डा श्यामरूद्र पाठक 4 दिसम्बर से निरंतर पुलिस की हिरासत में ही रखा गया है और अभी तक उनको न तो न्यायालय के समक्ष पेश किया गया। वहीं हर सायं डा श्यामरूद्र पाठक को तो पुलिस थाने में ही बंद रखती है वहीं उनकी सह आंदोलनकारिनी गीता मिश्रा को उनके दिल्ली आवास पर पुलिस हर रोज भेज देती है। फिर वह दूसरी सुबह धरने पर आंदोलन के आती है। इस प्रकार देश की लोकशाही की बात करने वाले हुक्मरान डा श्याम रूद्र पाठक के नागरिक अधिकारों का हनन तो कर ही रहे हैं अपितु इसके साथ उनको अवैध रूप से हिरासत में रख रहे है। परन्तु देश की मीडि़या, मानवााधिकार संगठन, भारतीय संस्कृति की बात करने वाले सभी ने शर्मनाक मौन रखा हुआ है।
संसार का सबसे बड़ा लोकतंत्र होने का दंभ भरने वाला भारत के हुक्मरानों व इसमें चार दश से अधिक समय तक शासन चलाने वाली वर्तमान सत्तासीन सरकार की प्रमुखा सोनिया गांधी में इतनी नैतिकता नहीं कि वह अपने दर पर 80 दिन से धरना दे रहे प्रबुद्ध देश भक्तों की बात तक सुन सके? उनसे एक पल के लिए मिल सके?
इसके लिए 20 फरवरी को मैने खुद स्वामी अग्निवेश से बात की और भारतीय भाषाओं के पुरोधा वेद प्रताप वैदिक को भी लिखा। हालांकि वैदिक स्वयं 10 जनपथ के समक्ष धरने में पंहुचे थे। परन्तु जिस प्रकार से मीडिया ने मौन साधा है है वह सोनिया गांधी द्वारा की जा रही उपेक्षा से अधिक शर्मनाक है। आखिर भारतीय अस्मिता के लिए आंदोलन करने का दण्ड सोनिया गांधी, भारतीय पुलिस, मीडिया और मानवाधिकार संगठन उन्हें क्यों दे रहे हैं?

Tuesday, February 26, 2013






भारतीय संस्कृति के गौरव रामसेतु को तबाह करने व देशद्रोहियों का स्मारक भारत में बनाने से बाज आये सरकार


दिल्ली में स्थापित की जा रही है भारत के लाखों शहीदों के हत्यारे व भारत को गुलाम बनाने के गुनाहगार ब्रिट्रेन के हुक्मरानों की मूर्तियों 

-गुनाहगार फिरंगी हुक्मरानों की मूर्तियों को फांसी की सजा दो 


एक तरफ भारतीय सरकार भारतीय संस्कृति व आस्था के प्रतीक भगवान राम द्वारा बनवाये गये रामसेतु को देश की करोडों जनता के पुरजोर विरोध के बाबजूद तोड़ कर तबाह करने को तुली है वहीं दूसरी तरफ भारत सरकार बहुत ही शर्मनाक ढ़ग से भारत के लाखों देश भक्तों के कातिल, व देश की सम्पति को लूटने एवं गुलाम बनाने वाले ब्रिट्रेन के गुनाहगार हुक्मरानों को गौरवान्वित करने के लिए भारत की राजधानी दिल्ली के बुराड़ी क्षेत्र में कारोनेशन पार्क बना कर ब्रिट्रेन की महाराजा व महारानी सहित तमाम गुनाहगारों की मूर्तियों को स्थापित करने की धृष्ठता करने जा रही है। गौरतलब है कि आजादी के तत्काल बाद देशभक्तों ने इंडिया गेट से लेकर तमाम महत्वपूर्ण स्थानों में लगी देश के स्वाभिमान को रौंद कर शताब्दियों तक गुलाम बनाने वाले ब्रिट्रैन की महारानी व महाराजा और उनके सिपाहेसलारों की इन मूर्तियों को फिर से भारतीय अस्मिता को कलंकित करते हुए भारत की राजधानी में ही स्थापित करने जा रही है। भारत को गुलाम बनाने वाली ईष्ट इंडिया कम्पनी से सत्ता हासिल करने के बाद ब्रिट्रेन के महाराजा जार्ज पंचम का दिल्ली में हुआ राज्याभिषेक समारोह भी दिल्ली के किग्जवे केप में हुआ था, उस समय जिस स्थान में केम्प लगा कर यानी टेण्ट लगा कर राज्याभिषेक समारोह किया गया उसी स्थान का नाम आज भी बेशर्मी से किंगवेकेम्प है। यानी राजा का केंप। यहां पर उस समय भारतीय गुलाम राजाओं की उपस्थिति में भारत को ब्रिट्रेन के तत्कालीन राजा जार्ज पंचम का राज्याभिषेक किया गया था। इन्हीं जार्ज पंचम के मुम्बई में पंहुचने पर गेट वे आफ इंिडया में उनके स्वागत में पहली बार रविन्द्र नाथ टेगोर द्वारा रचित जणमणगन गीत का गायन किया गया। आज देश का दुर्भाग्य है कि यही गीत देश का राष्ट्रीय गान बना हुआ है। आज जिस स्थान से जार्ज पंचम की मूर्ति को हटाया गया था वहां पर आजादी के 65 साल बाद भी महात्मा गांधी की मूर्ति को लगाने तक में भारतीय हुक्मरान असफल रहे। अब भारत सरकार देश के स्वाभिमान व सम्मान का ख्याल न रखते हुए इन भारत के गुनाहगारों को गौरवान्वित करने के लिए देश की राजधानी दिल्ली में ही शानदार पार्क बना कर उनको स्थापित करेगी। जिनको देश के नौनिहालों को गुनाहगार के रूप में प्रस्तुत करना चाहिए था उनके लिए देश की जमीन पर देश के संसाधनों से महिमामण्डित कर शानदार पार्क में स्थापित किया जायेगा। इससे बड़ा अपमान देश व देशवासियों का दूसरा और क्या हो सकता। अगर देश के हुक्मरानों को इनकी मूर्तियों व उनकी दासता से इतना ही लगाव है तो इनको भारत की नागरिकता छोड कर ब्रिट्रेन में शरण लेनी चाहिए और वहीं इनके वंशजों की चाकरी करनी चाहिए। परन्तु भारत में इन गुनाहगारों के लिए अगर कहीं स्थान है तो भारत सरकार को चाहिए कि एक ऐसा स्थान बनाये जहां इन गुनाहगारों की जाहिली व अत्चाचारों का उल्लेख करते हुए इनको फांसी के तख्ते पर इनकी मूर्तियों को झूलते हुए लटकाते हुए प्रदर्शित होनी चाहिए। परन्तु देश के हुक्मरान ऐसा क्यों करेंगे। इन्होंने जिन अंग्रेजों के गुलाम रहे उनकी भाषा अंग्रेजी का ही देश गुलाम बना दिया। उन्हीं के द्वारा दिये गये नाम इण्डिया को आत्मसात करके प्राचीन गौरवशाली अपने असली नाम भारत को जमीदोज कर दिया। यही नहीं जिस कलंक के प्रतीक ब्रिट्रेन की दासता की बेडियों से भारत को मुक्त करने के लिए लाखों देश भक्तों ने अपनी प्राणों की शहादत दे कर शताब्दियों तक भारतीय आजादी के लिए संघर्ष किया आजादी हासिल होने के बाद भारतीय हुक्मरानों ने उन्हीं ब्रिट्रेन की महारानी की सरपरस्ती में काॅमनवेल्थ की सदस्यता देश पर थोप दी। देश की आजादी के 65 साल बाद भी कहने को देश आजाद है परन्तु देश की संस्कृति, देश के आराध्य देव, देश की भाषा व देश के इतिहास को रौद कर भारत को गुलाम से बदतर स्थिति में धकेल कर दयनीय बनाया जा रहा है।
देश की राजधानी दिल्ली में इन देश के गुनाहगारों को सम्मानित करने वाले पार्क का निर्माण की योजना लम्बे समय से सरकार चला रही है। कई बार हमारे यहां चर्चा का विषय भी रहा। 25 फरवरी को मै व मेरे आंदोलनकारी मित्र जगदीश भट्ट ने जब यह प्रसंग याद दिलाया तो उस समय में अनिल पंत व जगदीश भट्ट इण्डिया गेट के समीप हेदाराबाद हाउस के बाहर सडक पर पैदल ही चल रहे थे। तभी मेरे मन में रामसेतु पर भारत सरकार की हटधर्मिता वाला रूख भी क्रोंध गया। किस बेशर्मी से सरकार भारतीय सम्मान के प्रतीकों को एक एक करके नष्ट करने को तुली है। देश का दुर्भाग्य यह रहा कि आजादी के बाद किसी भी सरकार को न तो देश के सम्मान को रौंदने वाली इन कलंकों से मुक्ति दिलाने की सुध रही व नहीं इनकी इच्छा। अपितु आजादी के बाद जितनी भी सरकारें रही उनके शासनकाल में देश के सम्मान व आजादी को शर्मसार करने वाली फिरंगी भाषा की गुलामी व भारतीय सम्मान के प्रतीकों को रौंदने का ही काम किया गया। किसी भी सरकार ने देश की संस्कृति, इतिहास व वर्तमान को शर्मसार करने वाले कंलक के प्रतीकों को देश को मुक्त करने का प्रयास तक नहीं किया अपितु उस कलंक को और मजबूत करने का कृत्य किया। चाहे सरकार किसी भी दल की रही केवल एक ही काम हुआ भारत को कमजोर करने का। अंग्रेजों के बाद अमेरिका का शिकंजा इस देश में कसने का। रामसेतु परियोजना जो रामसेतु को तबाह करके रास्ता बनाने का। इस रास्ते की मांग भले ही द्रुमुक आला कमान करूणानिधी ने की हो परन्तु इसके पीछे असली भारतीय प्राकृतिक सम्पदा को हरने का अमेरिका का ही षडयंत्र है इसी कारण भारत की सरकारें इस परियोजना को अमलीजामा पहनाने के लिए उतावली है। जब रामसेतु को बचाते हुए इस का अनय पांच वैकल्पिक मार्ग भारतीय वैज्ञानिकों ने सुझाये हैं तो फिर सरकार क्यों देश की अस्मिता व सम्मान के प्रतीक को तोडने के लिए उतावली हो रही है। सेतु समुद्रम परियोजना के वैकल्पिक मार्ग भी उपलब्ध हैं, और जानकारों का कहना है कि रामेश्वरम और धनुकोष्टि के बीच फैले रेत के टीलों को हटाकर नया रास्ता बनाया जा सकता है। सेतु समुद्रम के वैकल्पिक मार्ग के रूप में वैज्ञानिकों ने पांच परियोजनाएं सुझाईं थी जिनमें रामसेतु पर कोई आंच न आती लेकिन सरकार यह छठा सुझाव लेकर रामसेतु तोड़ने की हठधर्मिता कर रही है। एक सवाल यह भी उठता है कि प्रधानमंत्री ने मार्च 2005 में तूती कोसिन बंदरगाह से 16 प्रश्नों का जवाब मांगा था लेकिन फिर ऐसा क्या हो गया कि जवाब देखने के पहले ही 2 जुलाई 2005 को परियोजना के उद्घाटन करने पहुंच गए। वहीं बताया तो यह भी जा रहा है कि इसके लिये पम्बन और धनुकोष्टि के बीच 15 किमी की मुख्य भूमि में खुदाई कर स्वेज और पनामा की तरह जलमार्ग बनाया जा सकता है वह भी बगैर किसी प्रागैतिहासिक धरोहर को नष्ट किये। यहां सवाल किस सरकार ने योजना बनाई और कौन आगे बढ़ा रही है का नहीं है बल्कि ऐतिहासिक धरोहर को बचाने का है। चाहे यह धरोहर प्रकृति निर्मित हो या फिर मानव निर्मित।
सरकार का रामसेतु को तोडने के लिए उतावला होना व दिल्ली में देश को गुलाम बनाने वाले गुनाहगारों की मूर्ति को लगाने के लिए बैताव होना ही भारतीय हुक्मरानों को पूरी तरह बेनकाब करता है। रामसेतु केवल हिन्दू धर्म के करोड़ों लोगों के आस्था का प्रतीक ही नहीं अपितु भारत की ऐतिहासिक धरोहर भी है। इसको तबाह करने व दिल्ली में देश के गुनाहगारों की मूर्तियों को लगाने की कलुषित मंशा को सरकार तत्काल त्याग दे । सरकार की इस प्रवृति को न तो भारत की वर्तमान स्वाभिमानी जनता सहन करेगी व नहीं भविष्य कभी इस गुनाह के लिए देश के हुक्मरानों को माफ करेगा। शेष श्रीकृष्ण कृपा। हरि ओम तत्सत्। श्रीकृष्णाय् नमो।

Sunday, February 24, 2013


अपनी जन्मभूमि की भी सुध लें उत्तराखण्डीः इंजी. रतन सिंह गुनसोला


नई दिल्ली(प्याउ)। टिहरी जिला पंचायत अध्यक्ष इंजीनियर रतनसिंह गुनसोला ने  दिल्ली सहित देश विदेश में रहने वाले लाखों उत्तराखण्डियों से खुला आवााहन किया कि अपने विकास के साथ साथ उत्तराखण्ड के  विकास के लिए समर्पित हों कर अपनी जन्मभूमि की सेवा करने के अपने दायित्व का निर्वाह करें। इंजीनियर गुनसोला ने यह आवाहन प्यारा उत्तराखण्ड के सम्पादक देवसिंह रावत से 24 फरवरी को दिल्ली में अपने प्रवास के दौरान एक संक्षिप्त भैंटवार्ता में दी। इंजीनियर गुनसोला 24 ने गढ़वाल भवन दिल्ली की नयी कार्यकारणी के चुनाव में भागलेने आये हुए हजारों की संख्या में पंहुचे उत्तराखण्डियों को अपना यह संदेश देने के लिए पंचकुंया रोड़ दिल्ली में भी पंहुचे। इस भैंटवार्ता में इंजीनियर रतनसिंह गुनसोला ने कहा कि भले ही प्रदेश की अब तक की सरकारें प्रदेश की प्रतिभाओं का सम्मान व उपयोग नहीं कर पा रही है , परन्तु प्रदेश के विकास व यहां के हक हकूकों की रक्षा के लिए जागरूक उत्तराखण्डियों को अपने अपने स्तर पर उत्तराखण्ड में अपना योगदान देना चाहिए। उन्होंने कहा कि प्रदेश में  शिक्षा,रोजगार, चिकित्सा व विकास के अभाव में ही अधिकांश उत्तराखण्डी देश विदेश में पलायन के लिए मजबूर होते है। श्री गुनसोला ने कहा कि हमें उत्तराखण्ड को सत्तालोलुपु नेताओं के रहमोकरम पर न छोड़ कर अपनी जन्म भूमि के विकास में अपना योगदान भी देने के दायित्व का निर्वाह करना चाहिए।गौरतलब है कि प्रदेश में पूर्व भाजपा सरकार के दौरान यहां के जल विद्युत परियोजनाओं में पर्याप्त अनुभव व क्षमता होने के बाबजूद प्रदेश सरकार ने इंजीनियर रतनसिंह गुनसोला जो भाजपा के कद्दावर नेता व जल विद्युत परियोजनाओं के निर्माण में बडे उद्यमी है, उनकी घोर अपमानजनक उपेक्षा कर बाहर के बिना अनुभव के रहस्यमय लोगों को वरियता दी तो इंजीनियर रतनसिंह गुनसोला जो टिहरी जिला पंचायत के अध्यक्ष भी है ने इसका पुरजोर विरोध किया और इसमें सीधे अनिमियता का खुला आरोप लगाया ।इससे भ्रष्टाचार मुक्त व भारतीय संस्कृति के अनुसार रामराज्य जैसा साफ सुशासन देने का दावा करने वाली भाजपा ने शर्मनाक मौन साधा। न तो संघ नेतृत्व व नहीं तत्कालीन भाजपा नेतृत्व को ही इतना नैतिक साहस ही रहा कि वे अपने वरिष्ट नेता के इन आरोपों को संज्ञान में ले कर अपनी जनता के समक्ष बेनकाब हो रही सरकार पर अंकुश लगाती। केन्द्रीय नेतृत्व की शर्मनाक मौन देख कर इंजीनियर रतनसिंह गुनसोला ने एक स्वाभिमानी उत्तराखण्डी की तरह भाजपा से तत्काल इस्तीफा दे दिया। हालांकि रतन सिंह गुनसोला द्वारा उठाये गये अनिमियता के आरोपों से जनता में सरकार की भारी किरकिरी हुई इसके साथ न्यायालय ने भी इस पर गंभीर प्रश्न खडे किये, इससे मजबूर हो कर तत्कालीन भाजपा की निशंक सरकार ने यह पूरा आवंटन ही रद्द करना पडा था। इस प्रकरण से साफ हो गया था कि प्रदेश की सरकारें प्रदेश के हितों के लिए नहीं अपितु अपने निहित स्वार्थ में अंधी हो कर प्रदेश के संसाधनों का खुला दुरप्रयोग कर रही है और प्रदेश के प्रतिभावान व क्षमतावान दक्ष लोगों की उपेक्षा करके बाहर के लोगों को संरक्षण दे रही है। इससे लोगों में गहरा आक्रोश है। यह केवल एक ही सरकार में नहीं अपितु राज्य गठन के बाद जिस प्रकार से राज्य के हक हकूकों के साथ व यहां के संविधानिक व गंभीर विषयों में भी महत्वपूर्ण पदों पर प्रदेश के दक्ष लोगों के बजाय बाहर के कम प्रतिभावन निहित स्वार्थी लोगों को थोपा जा रहा है। यह प्रदेश की शासन प्रशासन को पंगु करने के लिए एक दीमक की तरह लग गया है। इसलिए इंजीनियर गुनसोला का यह आवाहन काफी तर्कसंगत है कि प्रदेश के लोगों को प्रदेश के विकास व हक हकूकों को ऐसे जनविरोधी सरकारों के रहमोकरम पर नहीं छोडना चाहिए।

Friday, February 22, 2013


हेदराबाद के आतंकी हमले के बाद हुआ गया में नक्सली हमला


आतंकी और नक्सली समस्या का स्थायी समाधान करने से क्यों डर रही है सरकार? 

देशवासी अभी 21 फरवरी बृहस्पतिवार को हेदराबाद में हुए आतंकी हमले से उबर भी नहीं पाया था कि अगले ही दिन 22 फरवरी शुक्रवार दोपहर बिहार के गया जनपद में नक्सलियों ने  बारूदी सुरंग से पुलिस जीप उड़ा कर उसमें सवार सभी सात पुलिसकर्मियों सहित एक ग्रामीण को मौत के घाट उडा दिया। बिहार के गया में हुए नक्सली हमले के बारे में पुलिस सुत्रों के अनुसार विस्फोट रौशनगंज थाने से लगभग 600 मीटर दूर उचला गांव में 22 फरवरी की दोपहर 12.08 बजे हुआ।  इस विस्फोट में स्थानीय थाने के एएसआई प्रद्युम्न कुमार राय और एसपीओ पवन कुमार सहित 7 पुलिस कर्मियों की घटनास्थल पर ही मौत हो गई। ये पुलिसकर्मी आंगनवाडी सेविकाओं के चयन के बाद वापस लोट रहे थे कि उनकी वापसी पर वारूदी सुरंग से विस्फोट करने का जाल नक्सलियों ने पहले से बिछा दिया था। इस हमले के बाद  नक्सलियों ने पुलिसकर्मियों के हथियार भी लूट लिए। इस कायराने हमलों से भले  ही देश के सत्तांध हुक्मरान व राजनेता केवल रस्मी बयान बाजी करने में लगे हुए है वहीं इनके कुशासन, आतंकी व नक्सली हमलों से  बेहद व्यथित है। परन्तु देश के हुक्मरान आहत देशवासियों को  अपने हाल पर छोड कर पुन्न अपनी अंधी सत्तालोलुपता की चंगैजीवृति में लगे हुए है। गौरतलब है कि 21 फरवरी को हेदराबाद के दिलसुखनगर रोड़  पर हुए सांयकाल 7 बजे हुए बम विस्फोटों में 16 लोग मारे गये व 119 लोग घायल हो गये। इस हमले से कुछ ही महिने पहले हेदराबाद में ही एक मुस्लिम नेता ने जो भडकाऊ बयान दिये थे। वह तो भले ही सलाखों के अंदर बंद है परन्तु इस बम विस्फोट के बाद साफ हो गया है कि हेदराबाद आतंकियों का गढ़ बन गया है। केन्द्र सरकार व प्रदेश सरकार ने यहां मजबूत ब न चूके आतंकी गढ़ों को ध्वस्थ करने में अभी तक कोई कदम नहीं उठाया। अपितु राजनैतिक दल इस प्रकार के कृत्यों को अपने दलगत स्वार्थो के खातिर इन तत्वों को संरक्षण देने काम कर रहे है। खासकर जिस प्रकार से देश में करोड़ों की संख्या में घुसपेट कर चूके बंगलादेशियों ने असम से लेकर बंगाल, उप्र व दिल्ली में अपनी गहरी पेठ बना ली है इस समस्या का गंभीर समाधान निकालने के बजाय सरकारें इसे नजरांदाज कर रही है। उप्र में जिस प्रकार से वर्तमान सपा सरकार ने जेल में बद आतंकियों को छोडने के लिए न्यायिक प्रक्रिया में हस्तक्षेप किया उस पर उच्च न्यायालय ने जो गंभीर टिप्पणी की वह देश के वर्तमान दलों की राष्ट्रघाती राजनीति को ही बेनकाब करती है। देश के हुक्मरान देश की एकता व अखण्डता के लिए गंभीर खतरा बन चूके आतंकी व नक्सली समस्या का स्थाई निदान करने के बजाय इसको नजरांदाज करके देश के हितों से खिलवाड करने का गंभीर कुकृत्य ही कर रहे हैं। इससे यह समस्या दिन प्रति दिन और विकराल बन गयी है। नक्सली समस्या भले ही सरकार की भेदभाव पूर्ण गलत नीतियों के कारण भी देश के 15 प्रतिशत भू भाग को अपनी चपेट में ले चूका है। वहीं आतंकी समस्या पाकिस्तान सहित विदेशी दुश्मन देशों के भारत को तबाह करने वाले षडयंत्र के कारण भारत में निरंतर बढ़ रहा है। परन्तु दशकों से इन दोनों समस्या से ग्रसित भारत की सरकारें इन गंभीर मसलों पर स्थाई समाधान के लिए एक कदम भी ईमानदारी से उठाना तो रहा दूर ईमानदारी से इस समस्या पर विचार करने को तैयार नहीं है। इससे देश की एकता व अखण्डता को गंभीर खतरा उत्पन्न हो गया है। वहीं देश का बडा भू भाग न केवल आतंकी अपितु नक्सली प्रभाव में आ गया है। राजनैतिक दलों की तुष्टिकरण की आत्मघाती कुनीति आज देश की एकता व अखण्डता पर ग्रहण लगाने का कारण बन चूकी है।


एक साल 13 दिन बाद दिल्ली सरकार ने दिया नजफगढ़ की दामनी के परिजनों को 1 लाख रूपये की सहायता 



उत्तराखण्ड सरकार कुछ  तो शर्म करो

जलविहार की बहादूर गरीब दामिनी की सुध ले नहीं पायी अब तक दिल्ली की मुख्यमंत्री ?

गत वर्ष 9 फरवरी 2012 को नजफगढ़ दिल्ली में सामुहिक बलात्कार व हत्या की शिकार हुई उत्तराखण्ड मूल की दामिनी के परिजनों को कई बार गुहार लगाने के बाद दिल्ली सरकार ने आज एक साल 13 दिन बाद दामिनी के माता-पिता को एक लाख रूपये का चैक सौंपा। दिल्ली सचिवालय में इस अवसर पर दिल्ली के मुख्यमंत्री के एडिशनल सचिव कुलानन्द जोशी के अलावा उत्तराखण्डी समाज से कांग्रेसी नेता दिवान सिंह नयाल, भाजपा नेता डा विनोद बछेती, उत्तराखण्ड जनता संघर्ष मोर्चा के अध्यक्ष देवसिंह रावत, उत्तराखण्ड महासभा के अनिल पंत, पत्रकार सतेन्द्र रावत, संगीतकार राजेन्द्र चैहान सहित अनेक प्रतिष्ठित समाजसेवी उपस्थित थे।
  लोकशाही के सामान्य शिष्टाचार निभाते हुए प्रदेश की मुख्यमंत्री को या उनके अधिकारियों को 16 दिसम्बर की दामिनी की तर्ज पर ही पीडि़त के परिजनों के घर भी जा कर उनको ढाढश बंटाते हुए सहयोग देना चाहिए था। परन्तु दिल्ली की मुख्यमंत्री ने एक साल 13 दिन तक इस परिवार का दर्द सुनने के लिए उनके घर पर जा कर सुनने का धर्म न का भले ही भान न हो परन्तु उन्होंने उत्तराखण्ड के समाजसेवियों द्वारा मामला उठाने पर 22 फरवरी 2013 को एक लाख इस गरीब परिवार को देने का काम तो किया। परन्तु दिल्ली में उत्तराखण्ड के सात सांसदों व नहीं मजबूत संस्था ने हीे इस परिवार की सहायता दे कर उनका ढाढस बढाने का दायित्व तक नहीं निभाया। उस पीडि़त परिवार की स्थिति को देख कर मुख्यमंत्री दिल्ली द्वारा दिया गया एक लाख रूपये की सहायता देने के अवसर पर दिल्ली सचिवालय में मैं भी उपस्थित रहा।
  सबसे शर्मनाक बात यह है कि  उत्तराखण्ड सरकार ने आज तक इस पीडि़त परिवार की सहायता करनी तो रही दूर उसके दुख दर्द को पूछने का मानवीय धर्म तक नहीं निभाया।  9 फरवरी 2012 में दिल्ली के नजफगढ़ क्षेत्र में सामुहिक बलात्कार व हत्या की शिकार हुई उत्तराखण्ड मूल की दामिनी के परिजनों की सुध लेने का सामान्य मानवीय धर्म भी न तो उत्तराखण्ड की तत्कालीन भाजपा के मुख्यमंत्री भुवनचंद खण्डूडी की सरकार ने निभाया व नहीं वर्तमान की कांग्रेसी मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा की सरकार ने ही निभाया। जबकि वर्तमान मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा आये दिन दिल्ली में ही डेरा डाले रहते हैं और प्रदेश के गठन ही नहीं इसके विकास में दिल्ली में रहने वाले 30 लाख से अधिक उत्तराखण्डियों की महत्वपूर्ण भागेदारी को बार बार खुले मंचों से भी सराहना कर चूके है। परन्तु जब इस विशाल उत्तराखण्डी समाज के एक परिवार पर इस प्रकार की आपदा आती है तो उस समय 16 दिसम्बर 2012 को उप्र मूल की दिल्लीवासी दामिनी के साथ ऐसे ही बर्बर बलात्कार पर तो 5 लाख तत्काल सहायता दे कर राष्ट्रीय मीडि़या के समक्ष दरियादिली दिखाने वाले उत्तराखण्ड के मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा को एक साल से इस पीडि़त परिवार की खोज खबर लेने की सुध तक नहीं रही।
गौरतलब है कि कुछ समय पहले दिल्ली सरकार की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित से उनके एडिशनल सचिव कुलानन्द जोशी, दिल्ली प्रदेश कांग्रेसी नेता दीवान सिंह नयाल व डा विनोद बछेती के नेतृत्व में उत्तराखण्डी समाजसेवियों ने मुख्यमंत्री शीला दीक्षित इस इस प्रकरण पर 16 दिसम्बर की दामिनी के प्रकरण की तरह त्वरित न्याय दिलाने की गुहार लगायी। इससे मुख्यमंत्री शीला दीक्षित ने इस प्रकरण को फास्ट कोर्ट में न्याय दिलाने का वायदा किया। इसके साथ मुख्यमंत्री ने परिवार को सहयोग देने का आश्वासन दिया था।
ऐसा नहीं कि यह पहला मामला है जब उत्तराखण्ड की सरकार ने उत्तराखण्ड मूल के पीडि़त परिवार की उपेक्षा की। एक साल गुजरने के बाद भी नजफगढ़ प्रकरण के पीडि़ता के परिजनों की सुध तक उत्तराखण्ड की सरकार ने नहीं ली। वहीं दिल्ली की मुख्यमंत्री का दिल भी गत माह दिल्ली के लाजपत नगर के समीप जलविहार की दामिनी के साथ हुए ऐसे खौफनाक दरिदगी की बहादूर दामिनी व उसके गरीब परिजनों की दयनीय स्थिति जान कर भी नहीं पसीजा। इस बहादूर गरीब बेटी की बहादूरी को सलाम करने के लिए महिला होते हुए भी न तो शीला का हाथ क्यों कांप गये? क्यों उत्तराखण्ड के मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा इस बहादूर बेटी जो गीता चैपडा राष्ट्रीय पुरस्कार की सच्ची हकदार है उसको केवल 2 लाख रूपये देने तक क्यों सीमित रहे? क्या यही है बहुगुणा सरकार को उत्तराखण्डी प्रेम? सबसे बड़ी त्रासदी यह है कि जलविहार की दामिनी का पिता कुछ समय पहले स्वर्गवास हो गया,। यही नहीं कुछ साल पहले उसकी बड़ी बहन भी स्वर्गवास हो गयी। 11वीं में पढ़ रही बेटी दामिनी व एक बेटे को प्राइवेट में काम करके बड़ी मुश्किल से झुग्गी में रह कर जीवन यापन करने वाली विधवा महिला के दर्द को कौन सुनेगा? जलविहार की दामिनी पर इस क्षेत्र के दरिंदे ने जब उसके साथ दुराचार करना चाहा तो दामिनी ने प्रचण्ड विरोध किया, इससे बौखला कर उस दरिंदे ने पाइप ही दामिनी के मुह में डाल दिया, कई दिन तक वह अखिल भारतीय संस्थान में इलाज के लिए दाखिल रही।

Thursday, February 21, 2013


सत्तांध हुक्मरानों के कारण भारत भी बन जायेगा पाकिस्तान की तरह आंतंकीस्तान


 देश की सत्तांध राजनीति के कारण देश में आतंकी बैखौफ देश को तबाह कर रहे है। राजनेता अपने निहित स्वार्थ के लिए एक दूसरे पर आरोप प्रत्यारोप लगाने को ही अपना कर्तव्य मान रहे है। इसी कारण आतंकी संसद, मुम्बई, दिल्ली, कारगिल ही नहीं कल 21 फरवरी को हेदराबाद में भी बम विस्फोट कर 15 निर्दोष लोगों की हत्या व सवा सौ से अधिक लोगों को घायल कर चूके हैं। आखिर भारत की निर्दोष जनता कब तक इन सत्तांध सरकारों की लापरवाही के कारण इन नापाक आतंकियों के हाथों  बम धमाकों में आये दिन मारे जायेंगे।  मनमोहन सरकार अपने वोट बैंक के खातिर इन आंतंकियों के सफाया करने, घुसपेटिये आतंकियों को बाहर करने व एक ठोस नीति बनाने में पूरी तरह से विफल रही है। उप्र, असम, बंगाल, दिल्ली, आंध्र ही नहीं इन घुसपेटियों ने सीमाान्त प्रदेश उत्तराखण्ड में भी अपने पांव पसार लिये है। देश की सरकारें अगर इसी प्रकार मूक रही तो आने वाले 15 सालों में देश आतंकियों के पूरी तरह से शिकंजे में होगा और ये आतंकी भारत को भी पाकिस्तान की तरह आतंकीस्तान बना देंगे। देश में जिस प्रकार से बंगलादेशी घुसपेट हो गयी है और पाकिस्तान व चीन के साथ अमेरिका का भी साया भारत को कमजोर करने के लिए निरंतर खौफनाक हो रहा है। अगर इस पर अमेरिका व इस्राइल सरकारों की तरह कठोरता से कुचला नहीं गया तो आने वाला समय देश के लिए और भी खौफनाक होगा। जरूरत है इसके लिए  देश में ठोस राष्ट्रीय  सुरक्षा नीति की जो देश में मुस्लिम समाज की भावनाओं को भडकाने के लिए चलाये जा रहे पाक व बग्लादेशी आतंकी नापाक गठजोड़ को पूरी तरह से बेनकाब कर सके। इसके लिए कांग्रेस व सपा के साथ जदयू,ममता,सहित तमाम पार्टियों को अपने संकीर्ण राजनैतिक ऐजेन्डे को त्याग कर राष्ट्रीय हितों की रक्षा के लिए अमेरिका की तरह काम करना होगा।

महिलाओं के लिए बैखौप आजादी व यौन अपराधों पर तत्काल अंकुश लगाने की मांग को लेकर जंतर मंतर पर विशाल धरना -प्रदर्शन


21 फरवरी संसद के बजट सत्र के दौरान महिलाओं के साथ हो रही यौन हिंसा पर तत्काल प्रतिबंध लगाने की मांग को लेकर जंतर मंतर पर माले की छात्र इकाई आइसा के साथ अनैक महिला संगठनों ने मिल कर महिलाओं के लिए ‘बेखौप आजादी’ की हुंकार भरते हुए संसद की चैखट राष्ट्रीय धरना स्थल जंतर मंतर दिल्ली पर विशाल धरना दिया। इसमें फिल्म अभिनेत्री शबाना आजमी से लेकर अनैक प्रतिष्ठित महिलाओं ने भी इसमें भाग लिया। इसमें अरविन्द गौड की नाट्य मण्डल अस्मिता ने भी इस पर अपना नाटय का मंचन किया। सुबह से रात साढ़े सात तक चले इस विशिष्ट धरने में बड़ी संख्या में जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, दिल्ली विश्वविद्यालय व जामिया विश्ववि़द्यालय के छात्र-छात्राओं के अलावा वामपंथी विचारकों ने भाग लिया। इसमें महिलाओं के लिए पूर्ण आजादी की पुरजोर मांग की गयी। इस धरने में विख्यात में जहां जनवादी नेत्री कविता कृष्णन् ने अपने औजस्वी संबोधन से महिलाओं की पूर्ण आजादी व उन पर हो रहे यौन अत्याचारों पर प्रकाश डाला । वहीं देश की विख्यात नृत्यांगना, फिल्म निर्माता व समाजसेवी शिक्षका माया कृष्णा राव ने महिलाओं के लिए बेखौप आजादी पर आधारित अपना वर्तमान व्यवस्था पर प्रचण्ड प्रहार करने वाला नृत्य नाटिका से उपस्थित हजारों की संख्या में आये जनसमुदाय को भावविभोर कर दिया। ‘हमे क्या चाहिए आजादी’ का जय घोष से दिन भर संसद की चैखट पर स्थित जंतर मंतर गूंज उठा। सुचेता दे ने कार्यक्रम का संचालन किया।
वहीं दूसरी तरफ जंतर मंतर पर 16 दिसम्बर क्रांति नामक संगठन के आंदोलनकारियों ने महिलाओं पर हो रहे योन अपराधों पर कड़ी सजा देने व दामिनी के सभी 6 अपराधियों को फांसी की सजा देने की मांग को लेकर अपना 24 दिसम्बर से चल रहा आंदोलन आज भी जारी रखा।
 

अब रामदेव की तरह चुनौती को स्वीकार करना भी सीखें अरविन्द केजरीवाल 


केजरीवाल जी, पलायनवादी नेतृत्व को कभी स्वीकार नहीं करता है भारतीय जनमानस 

खबरिया चैनलों व मीडिया की अंध व्यवसायिकता कहां ले जायेगी भारतीय लोकशाही को 



21 फरवरी को जंतर मंतर पर इंडिया न्यूज चैनल द्वारा आम आदमी पार्टी के प्रमुख अरविन्द केजरीवाल से होने वाली बहस अरविन्द केजरीवाल के न पंहुचने पूरी नहीं हो पायी।  हालांकि इस सीधे प्रसारण में कई  समर्थकों ने दीपक चैरसिया का प्रखर विरोध किया। इस खुली बहस की चुनौती  अरविन्द केजरीवाल की आम आदमी पार्टी के कुमार विश्वास व संजय सिंह से हुई इंडिया न्यूज के दीपक चैरसिया से हुई अलग अलग तीखी बहस के बाद चुनौती के रूप में निश्चित किया गया था। अरविन्द केजरीवाल के न आने से यह कार्यक्रम चला पर इसके लिए उत्सुक लोगों को निराशा ही हाथ लगी। गौरतलब है कि इंडिया न्यूज टीबी चैनल पर विगत कई दिनों से अन्ना को मोहरा बना कर व्यवस्था से आक्रोशित जनभावनाओं की आड में अपनी राजनैतिक महत्वाकांक्षा के लिए दुरप्रयोग किया। आम लोगों को विश्वास था का अरविन्द केजरीवाल इस सीधी बहस की चुनौती को स्वीकार करके अपने पर लगे तमाम आरोपों का बहादूरी से मुकाबला करेंगे। परन्तु अरविन्द के न आने से इस मामले पर लगा प्रश्न और गहरे हो गये। हालांकि कई लोग इसको दिल्ली में अरविन्द की पार्टी के बढ़ते हुए जनाधार से परेशान कांग्रेस व भाजपा की आड में केजरीवाल की पार्टी को बदनाम करने का सांझा षडयंत्र करार दे रहे हैं, तो कई लोग इसको इंडिया न्यूज व केजरीवाल दोनों का अंदरखाने के प्रचार का छदम युद्ध बता रहे है। सच्चाई क्या है यह तो दीपक चैरसिया ही जाने परन्तु जनता में इन दिनों फिर केजरीवाल व इडिया टीबी पर लोगों का ध्यान केन्द्रीत हो गया है। प्रचार की दुनिया के विशेषज्ञ इसे प्रचार का हथकण्डा भी मान रहे है। आज की दुनिया में लोग इस धारणा में भी विश्वास करते हैं बदनाम हुए तो क्या हुआ प्रचार तो हुआ। एक कांग्रेसी नेता जो किसी महिला के यौन शोषण के आरोप से बरी हुए। उन पर भी मीडिया ने काफी प्रहार किये, उनका मामला पूरे देश में गूंजा। एक बार जब वे मिले तो अपने कमरे में बता रहे थे कि भाई मैं मंत्री रहा अध्यक्ष रहा पर मुझे देश भर में इतनी पहचान नहीं मिली जितनी पहचान मुझे इस प्रकरण के बाद मिली। अधिकांश प्रबुद्ध लोग जान गये कि मै कौन हॅू और मुझे झूठा फंसाया जा रहा था।
अरविन्द केजरीवाल व उनकी आम आदमी पार्टी पर जो आरोप इन दिनों लग रहे हैं उसके पीछे लोगों को कांग्रेस व भाजपा सहित तमाम उन दलों का भी हाथ लग रहा है जो केजरीवाल के आरोपों व उसकी पार्टी के अंदर ही अंदर हो रहे विस्तार से भयभीत हैं। नहीं तो इंडिया टीबी जैसे चैनल को इस प्रकरण के एक साल गुजरने के बाद यकायक आज कल दीपक चैरसिया द्वारा इंडिया टीबी की कमान संभालने के बाद ही क्यों याद आया? यह शायद इस चैलन द्वारा अपनी लोकप्रियता बढ़ाने का भी एक हथकण्डा भी हो । हालांकि अण्णा के जनांदोलन में उमड़े हुए लोगो के दिलों में भी यह सवाल कचैट रहा है क्यों अण्णा व अरविन्द की राहें अलग अलग हुई। अधिकांश लोग आज भी अण्णा के साथ हैं वे अरविन्द से खपा भी हैं पर फिर भी अरविन्द को अण्णा का कुशल सेनापति
भी मानते है। हालांकि उत्तराखण्ड के कमजोर लोकायुक्त को मजबूत बता कर अण्णा व देश को गुमराह करने के प्रकरण, आंतरिक लोकपाल बना कर अपने साथी प्रशांत भूषण आदि साथियों पर लग रहे आरोपों की अभी तक जांच नहीं करा पाने, एक मुद्दे को उठा कर उसको मुकाम पर पंहुचाने से पहले ही उसे छोड़ दूसरा मुद्दा उठाने की प्रवृति व अपने की वचनों पर खरा न उतरने व अपने संगठन में पारदर्शिता खुद न अपनाने के कारण आंदोलन के साथी ही नही उनकी तरफ आशा भरी नजरों से अरविन्द केजरीवाल को देखने वाले जनमानस को भी निराशा ही हाथ लगी। जहां तक टीबी चैनलों व मीडिया वालों का उन पर व्यवसायिकता के भूत उनके सर कितना चढ़ा होता है। नहीं तो देश में वर्तमान राजैतिक दलों के कुशासन में भ्रष्टाचार, मंहगाई, आतंकबाद व अराजकता आदि गंभीर विषयों को छोड़ कर गडे हुए मुर्दे उखाडने की मीडिया की प्रवृति अंधी व्यवसायिकता का पागलपन नहीं तो और क्या है?
यह इस छदम् प्रकरण से जग जाहिर हो गया। इसके बाबजूद भारतीय जनमानस के मन में एक ठीस है कि अरविन्द केजरीवाल ने दीपक चैरसिया की जंतर मंतर पर बहस करने की खुली चुनौती स्वीकार करनी चाहिए थी। वहां पर आंदोलनकारी जनता भी उनका साथ देने के लिए बैताब थी। भारतीय जनमानस चुनौती को स्वीकार करने वाले को ही महानायक के रूप में स्वीकार करती है। बाबा रामदेव का रामलीला मैदान से हजारों की जनता को छोड कर चुपचाप जाते हुए पुलिस द्वारा पकडे  जाने को लोगों ने स्वीकार नहीं किया। जनता चाहती कि बाबा रामदेव पुलिसिया दमन के आगे जनता को असहास छोड कर खुद को निकलने के बजाय पुलिस को उनको गिरफतार करने की चुनौती दे कर गिरफतारी देते। इस प्रकरण से जहां पूरे भारत में कांग्रेस की थू थू हुई थी वहीं जनता बाबा रामदेव के बच कर निकलने के प्रकरण से नाराज थी। अपनी इसी भूल को  बाबा ने उसके बाद के प्रदर्शनों में सुधारा जिसको जनता ने खुले दिल से सराहा। इस तरह अरविन्द को भी अपनी भूलें सुधार कर वर्तमान राजनैतिक दलों के चंगैजशाही से देश को बचाने के लिए आगे आ कर हर चुनौती का मुंहतोड़ जवाब देना चाहिए। तभी देश की जनता उनका साथ देगी।

Sunday, February 17, 2013


बसंत मिले या पतझड जिन्दगी की राह में




बसंत मिले या पतझड जिन्दगी की राह में
नादान बन कर फिर दिल न लगाना कभी।।
चाहे स्वागत करो या विलाप करो तुम
दुनिया से एक दिनसबको जाना होगा।
बसंत को भी पतझड की तरह जग से
यहां आकर जाना है सबको मेरे साथी।।
सब अपने ही समय में यहां आते जाते
फिर क्यों किसी का यहां दिल दुखाते।।
सृष्टि के इस सुन्दर उपवन में देखों
फूल खिले है रंग विरंगे जड़ चेतन के ।
जीवन के इस अनन्त सफर में देखो
जग बगिया में हम ही हैं फूल व कांटे।
हम सबके भी हैं अपने शूल और फूल
खिलता वही जिसको खिलाता है माली।
नहीं तो कांटों की सेज सुलाता है माली
जीवन में भी बसंत-पतझड दिखाता माली।
किसे ताज तो किसे रात दिखाता माली
जिंदगी के इस सफर में सबको साथी।
इन हसीन व
खौपनाक राहों में भी जीकर
दुनिया को छोड घर अपने जाना ही होगा।
न रखो राग द्वेष किसी से भी यहां साथी
हम सब हैं इस जीवन पथ के राही साथी।।
जिन्दगी हे अमानत इस बाग के माली की 
इसलिए मिल जुल कर जीना सीख लो।।
बसंत मिले या पतझड जिन्दगी की राह में
नादान बन कर फिर दिल न लगाना कभी।।
-देवसिंह रावत 
(रविवार 17 फरवरी दोपहर सवा एक बजे)
 

नन्दादेवी राजजात यात्रा के 19 नहीं 25 पढ़ाव होंगे 


29 अगस्त से 16 सितम्बर 2013 को होगी विश्वविख्यात श्रीनन्दादेवी राजजात यात्रा


नन्दादेवी राजजात समिति द्वारा घाट क्षेत्र की उपेक्षा से आक्रोशित घाट के ग्रामीणों ने विधायक डा जीत राम का घेर
ाव

घाट (प्याउ)। एक तरफ पूरा विश्व के करोडों श्रद्धालु 29 अगस्त 2013 से प्रारम्भ हो रहे श्री नन्दादेवी राजजात यात्रा का बेसब्री से इंतजारी कर रहे है। वहीं नन्दादेवी राजजात समिति द्वारा घोषित 29 अगस्त से 16 सितम्बर तक के 280 किमी लम्बी इस राजजात यात्रा के पडावों पर विवाद हो गया है। श्री नंदादेवी राजजात समिति द्वारा राजजात यात्रा में घोषित 19 पडावों में विकासखण्ड घाट के महत्वपूर्ण पडावों की उपेक्षा करने से आक्रोशित घाट विकासखंड के आंदोलित लोगों द्वारा अपना घेराव करने पर इस क्षेत्र के विधायक डा जीतराम ने जनता को बताया कि श्री नन्दादेवी राजजात यात्रा के पडावों में घाट विकासखण्ड की उपेक्षा किसी भी सूरत में नहीं की जायेगी और उनके ही दवाब में नन्दा देवी राजजात समिति द्वारा पूर्व में घोषित इस विश्व विख्यात यात्रा के 19 पडावों को बढ़ा कर अब 25 पड़ाव कर दिये है। 
गौरतलब है कि पिण्डर घाटी व मंदाकिनी घाटी को नंदा की धरती के रूप में जाना जाता है। इसमें तीन महत्वपूर्ण स्थानों में नौटी, भगोती व कुरूड़ है। नौटी जहां कर्णप्रयाग में तो भगोती नारायणबगड विकासखण्ड व कुरूड़ घाट विकासखण्ड में स्थित है। राजजात समिति द्वारा घोषित 19 पडावों में घाट विकासखण्ड क्षेत्र की उपेक्षा देख कर इस क्षेत्र के लोग न केवल अपमानित महसूस कर रहे हैं अपितु आक्रोशित हो कर आंदोलनरत भी है। ऐसे समय जब स्थानीय विधायक डा जीतराम, घाट विकासखण्ड में सरपाणी गांव में आयोजित कार्यक्रम में भाग लेने के लिए घाट से गुजर रहे थे तो बैंड बाजार में लोगों ने उनका घेराव करके इस प्रकरण पर जम कर नारेबाजी करके अपना विरोध प्रकट किया। आक्रोशित लोगों के आक्रोश को जायज ठहराते हुए विधायक डा जीत राम ने लोगों को आश्वासन दिया कि घाट विकासखण्ड का किसी भी हालत में उपेक्षा सहन नहीं की जायेगी। इसी को ध्यान में रखते हुए और नन्दादेवी में घाट क्षेत्र का विशिष्ट स्थान को देखते हुए ही उन्होंने समिति के 19 घोषित पडावों को बढा कर 25 करा दिया है। घाट क्षेत्र के आक्रोशित लोग इस कदर से नाराज थे कि उन्होंने समिति की रवैये को नंदादेवी की परंपराओं की उपेक्षा करने का आरोप लगाते हुए चेतावनी दी कि अगर समिति ने अपना रवैया नहीं बदला तो नौटी की राजजात यात्रा में नन्दा देवी की डोली शामिल नहीं होगी। यही नहीं , वाण से लाटू देवता को सिद्धपीठ कुरुड़ मंदिर में पूजा अर्चना के लिए आमंत्रित किया जाएगा। घाट क्षेत्र की उपेक्षा क्यों की गयी और कुरूड़ जैसे महत्वपूर्ण सिद्धपीठ की उपेक्षा यहां के लोगों की ही नहीं अपितु नंन्दाराज जात की परंपरा में विश्वास रखने वाले श्रद्धालुओं के भी गले नहीं उतर रही है। वहीं प्रदेश सरकार इस यात्रा में देश विदेश के श्रद्धालुओं की भारी संख्या में भागलेने की संभावनाओं को देख कर इसकी तैयारी के लिए केन्द्र सरकार से विशेष सहयोग देने का अनुरोध कर रही है। वहीं इस 280 किमी लम्बे यात्रा की सभी मार्ग व पडावों में हजारों हजार यात्रियों के लिए पीने के पानी, बिजली, स्वास्थ्य, ठहरने व परिवहन सहित तमाम प्रकार की व्यवस्थाओं को यात्रा के अनुकुल बनाने की तैयारियों पर प्रशासन व समिति जुटे हुए है।


सूर्य नमस्कार का विरोध नहीं यह भारतीय संस्कृति को रोंदेने का खतरनाक षडयंत्र है


देश भर में आज 2 करोड़ से  अधिक विद्यार्थी सूर्य नमस्कार करके विश्व में एक कीर्तिमान स्थापित कर रहे हैे। कुछ तथाकथित लोग इसका विरोध कर रहे हैं। इनका विरोध केवल यह है कि यह भारतीय संस्कृति का अंग है जिसमें मातृ देव भव, पितृ देव भव, अपने से बडों बुजुर्गो को नमन् करना और इस सृष्टि के मूलाधार सूर्य, वायु, जल, पृथ्वी, गाय सहित सम्पूर्ण जड़ चेतन को परमात्मा का स्वरूप मान कर उनको नमन् करना और सम्मान करना सिखाया जाता है। सूर्य नमस्कार का विरोध करने वालों की मानसिकता तब कहां गयी जब वे स्कूल कालेजों में टाई व स्कर्ट पहनने व न्यायालयों में काला कोट गर्मी में भी पहनने में मूक रहते हे। क्या भारतीय संस्कृति का अनादर करना ही लोकतंत्र व सच्चा धर्मनिरपेक्ष है तो ऐसा धर्म निरपेक्षता को हजार बार हम लानत देते है। इसकी अब इस देश में कोई जरूरत नहीं हे। हमने विश्व की सबसे वैज्ञानिक भाषा संस्कृत को इन्हीं अंधों के विरोध के कारण जमीदोज कर दिया और हमने भारतीय प्राचीन सनातनी ज्ञान विज्ञान को पौंगा पंथी मान कर दफन कर दिया। आज पूरा पश्चिमी जगत उसको अंगीकार  कर रहा है तो हम उसे योग, वेद विज्ञान को योगा के नाम पर विदेशियों की तर्ज पर अब अपना रहे है। सूर्य को सनातन संस्कृति में अनादिकाल से इस संसार के जीवों का जीवनदाता माना है उसको नमन करने की भारतीय संस्कृति का विरोध किसके हित में है। इस तथाकथित धर्मनिरपेक्षों के कारण आजादी के 65 साल बाद भी भारत अपने देश के नाम, अपनी संस्कृति, अपने इतिहास व अपने आराध्य महापुरूषों से ही नहीं सुभाष, भगतसिंह व आजाद जैसे महान सपूतों की महानगाथा से वंचित है। हमारे देश में बलात अंग्रेजी की गुलामी से देश के स्वाभिमान को ही नहीं देश की लोकशाही को रौंदा जा रहा है। क्या यह देशभक्ति है या देश की आत्मा की निर्मम हत्या। जब प्राचीन भारतीय संस्कृति को आज संसार का सबसे बडा इस्लामिक देश इंडोनेशिया आत्मसात कर रहा है, जब भारतीय संस्कृति के दिव्य ज्ञान विज्ञान के प्रतीक वेद ग्रंथों पर जर्मन से लेकर अमेरिका में गहन आत्मसात किया जा रहा है तो भारतीय संस्कृति को भारत में क्यों तबाह करने का षडयंत्र करने की इजाजत दी जा रही है।

Saturday, February 16, 2013


दामिनी प्रकरण के दो महिने पूरे होने पर आंदोलनकारियों ने किया  जंतर मंतर से इंडिया गेट तक  विरोध मार्च



16 दिसम्बर को दिल्ली में चलती बस में पेरामेडिकल की छात्रा दामिनी के साथ हुए सामुहिक बलात्कार की पूरे विश्व में मानवता को शर्मसार करने वाली घटना के दो माह होने पर 16 फरवरी को 16 दिसम्बर क्रांति के आंदोलनकारियों ने पुलिस व वर्षा को धत्ता बताते हुए जंतर मंतर से इंडिया गेट तक विरोध मार्च निकाला और अमर जवान ज्योति पर दामिनी को श्रद्धांजलि देते हुए इस प्रकरण के सभी 6 गुनाहगारों को फांसी की सजा देने की मांग की। ‘16 दिसम्बर क्रांति ’संगठन में  आम आदमी, छात्र-छात्रायें, बुजुर्ग, महिलायें व नौजवान जुडे हैं। जो देश में महिलाओं पर हो रहे निरंतर यौन अत्याचार के खिलाफ व्यापक जन जागरण करने व कडे कानून बनाने के लिए जंतर मंतर पर 24 दिसम्बर से डटे हुए है। हालांकि इन आंदोलनकारियों का मनोबल तोडने व इनको बदनाम करने के लिए किये जा रहे तमाम घिनौने हथकण्डे भी इनके समर्पण को कमजोर नहीं कर पा रहे है।
गौरतलब है कि 16 दिसम्बर क्रांति के बेनरतले दिल्ली मे दामिनी से हुए ंसामुहिक बलात्कार प्रकरण के दोषियों सहित महिलाओं से हो रहे अत्याचार के खिलाफ कड़ी सी कड़ी सजा देने की मांग को लेकर 24 दिसम्बर से संसद की चैखट राष्ट्रीय धरना स्थल जंतर पर पर निरतंर धरना व प्रदर्शन का आयोजन किया जा रहा है। इस प्रकरण के विरोध में जो जनसैलाब 22 व 23 दिसम्बर को इंडिया गेट से लेकर विजय चैक राष्ट्रपति के द्वार तक उमड़ा, उससे देश हुक्मरान इतने भयभीत हो गये हैं कि 24 दिसम्बर से जंतर मंतर पर बीचों बीच सड़क को अवरूद्ध करके धरना व आंदोलन आज भी जारी है।
 इंडिया गेट पर इस प्रकरण में मारी गयी दामिनी को श्रद्धांजलि देने के बाद जब नारे लगाते हुए आंदोलनकारी वहां से पैदल मार्च करते हुए वापस जंतर मंतर धरना स्थल पर पंहुचे। इस प्रकरण में सम्मलित आंदोलनकारी ने बताया कि जंतर मंतर से इडिया गेट  तक के मार्च में किसी पुलिस वालों ने उनका रास्ता नहीं रोका। हाॅं जब इंडिया गेट पर चंहुचे तो पुलिस वालों ने आंदोलनकारियों से इंडिया गेट पर प्रदर्शन करने की अनुमति के बारे में प्रश्न किया तो आंदोलनकारियों ने पुलिस अधिकारियों व जवान से प्रतिप्रश्न किया कि क्या जिन बलात्कारियों ने दिल्ली की सड़क पर चलती बस में  दामिनी के साथ सामुहिक बलात्कार क्या अनुमति ले कर किया था? आंदोलनकारियों के क्रांतिकारी तैवर देख कर पुलिस मूक हो गयी और आंदोलनकारी इंडियागेट पर श्रद्धांजलि देने के बाद जलूस के रूप में वापस जंतर मंतर लोट आये।  गौरतलब है कि 23 व 23 दिसम्बर के बाद से दिल्ली पुलिस ने जंतर मंतर व रामलीला मैदान को छोड़ कर पूरे नयी दिल्ली क्षेत्र में धरना प्रदर्शनों पर प्रतिबंध लगाते हुए धारा 144 लगा दी है। उसके बाद कई बार आंदोलनकारियों ने जंतर मंतर से इंडिया गेट तक जलूस निकालने या सीधे इंडिया गेट पर शांतिपूर्ण प्रदर्शन करने की कोशिश की परन्तु पुलिस ने उनके मंसूबों को विफल कर दिया था। 16 फरवरी को दामिनी प्रकरण के दो माह पूरे होने पर जंतर मंतर पर 24 दिसम्बर से निरंतर आंदोलन कर रहे 16 दिसम्बर क्रांति के नाम से आंदोलन छेड़े हुए आंदोलनकारियों ने दिन भर हुई वर्षा की परवाह न करते हुए जहां जंतर मंतर पर प्रदर्शन किया वहीं पुलिस की इस पावंदी को दरकिनारे करते हुए इंडिया गेट तक मार्च का आयोजन किया । इस घटना पर टिप्पणी करते हुए आंदोलनों के मर्मज्ञों ने एक ही बात कही कि दिल्ली पुलिस जो चंद घण्टे के लिए जंतर मंतर या संसद मार्ग में मोटर मार्ग अवरूद्ध करने वाले हजारों की भीड़ को भी एक तरफ किनारा कर देती है, वह पुलिस इस प्रकार दो महिने तक मूक रहे व इडिया गेट तक जाने दे तो इससे स्पष्ट होता है कि देश के हुक्मरानों के दिलो दिमाग में आज भी 22 व 23 दिसम्बर को उमडे़ जल सैलाब से भयभीत हैं। इसी भय से भयभीत हो कर हुक्मरानों ने दिल्ली पुलिस से आंदोलनकारियों से किसी प्रकार की शक्ति न करने का कडे निर्देश दिये होंगे। वहीं आंदोलनकारी इस प्रकरण पर अध्यादेश जारी होने व इन अपराधियों पर त्वरित न्यायालयों में मामला चलाने के बाबजूद अभी तक आंदोलन का मोर्चा जारी रखे हुए है। आंदोलनकारी सरकार से इस प्रकरण के सभी छह आरोपियों को फांसी की सजा देने की मांग कर रहैं और सरकार से बलात्कार के मामलों में कड़ी सजा देने की पुरजोर मांग कर रहे है।

Friday, February 15, 2013


16 मई को खुलेंगे भगवान श्री बदरीनाथ के कपाट 


नरेन्द्र नगर (प्याउ)। विश्व के सबसे प्राचीन हिन्दु धर्म के सर्वोच्च पावन धाम भगवान बदरीनाथ के पावन दर्शन अरबों सनातन धर्मी श्रद्धालु 16 मई से कर पायेंगे। 2013 में भगवान श्री बदरीनाथ धाम के कपाट  16 मई को प्रातः 4 बजे खुलेंगे। यह घोषणा बसंत पंचमी के पावन पर्व पर े टिहरी राजवंश के  महल में महाराजा मनुजेंद्र शाह के प्रतिनिधिी की उपस्थिति में की गयी। इस अवसर पर बदरी-केदार मंदिर समिति के अध्यक्ष गणेश गोदियाल सहित तमाम प्रमुख पदाधिकारी भी उपस्थित थे। उल्लेखनीय है कि गत वर्ष 2012 में भगवान बदरीनाथ धाम के कपाट 29 अप्रैल को खुले थे। श्रीबदरीनाथ धाम के कपाट खोलने की रस्म के रूप में तेल कलश यात्रा जो  गाडूघड़ी नाम से जानी जाती है की तिथि 30 अप्रैल तय की गई है। गौरतलब है कि गढ़वाल के पूर्व नरेश  की ओर से पारम्परिक रूप से तेल कलश बदरीनाथ धाम के लिए भेजा जाता है। पिछले साल प्राकृतिक आपदाओं व अतिवृष्टि से इस पावन यात्रा में अत्यधिक व्यवधान आया था। यही नहीं इस दौरान अनैक तीर्थ यात्रियों की अकाल मृत्यु से इस यात्रा घिरी रही। दिव्य हिमालय में स्थित भगवान हरि हर के पावन सर्वोच्च धाम श्री बदरी केदार नाथ के यह पावन धाम उत्तराखण्ड में अनादिकाल से श्रद्धालुओं के लिए मोक्षधाम के रूप में जाने जाते हैं।परन्तु आज तक भी किसी भी सरकार ने इस पावन धामों की व्यवस्था में सुधार करने के लिए ठोस कदम तक  उठाने की जरूरत तक महसूस नहीं की। लम्बे समय से श्रद्धालु इस सर्वोच्च धाम की व्यवस्था वैष्णों देवी व तिरूपति जैसे तीर्थो की तर्ज पर करने की मांग उठा रही है। परन्तु दशकों से यहां की व्यवस्था पर काबिज निहित स्वार्थी तत्वों के दवाब में कोई भी सरकार इसका संचालन वैष्णोंदेवी व तिरूपति की तर्ज पर करके सुधार करने को तैयार ही नहीं है।  इससे न तो यह समिति मंदिर में आने वाले श्रद्धालुओं को उचित व्यवस्था प्रदान कर पायी है नहीं जनहित में कोई महत्वपूर्ण सेवायें ही जनता को प्रदान कर पायी। जबकि वैष्णोंदेवी व तिरूपति जी के संस्थान अपने दोनों लक्ष्यों को बेहतर ढ़ग से संचालित कर रही हैं।  शीतकाल के दौरान  भगवान विष्णु व भगवान शिव के सर्वोच्च पावन धाम श्री बदरीनाथ व श्री केदारनाथ धाम के कपाट बंद रहते हैं और  हर साल ग्रीष्मकाल में यह देश विदेश से पावन दर्शनों को आने वाले लाखों भक्तों के लिए खोल दिये जाते हैं। इससे साफ हो गया कि राज्य गठन के 12 साल बाद भी एक भी सरकार ने इस दिशा में कोई ठोस कदम नहीं उठाया। श्री बदरीनाथ-केदारनाथ मंदिर कमेटी में अपने प्यादों को बेठाने के लिए भले ही यहां के हुक्मरान उतावले रहते हैं परन्तु इस समिति को श्रद्धालुओं व जनहित में वेष्णोंदेवी व तिरूपति की तर्ज पर गठित करने की इनके पास एक पल की फुर्सत तक नहीं।


आन,मान व शान व हक हकूकों को रौंदने वाले भैडियों पर अंकुश लगाने के लिए सरकार व समाज दोनों को भी आगे आना होगा 


फेसबुक में पूर्व में भी बेटियों को शादी का झांसा दे कर शोषण होने वाली खबर प्रकाशित हुई थी तो तहलका के इसी लेख पर पहले भी मैने टिप्पणी की थी। मेरा मानना है कि इसके लिए समाज से अधिक यहां की व्यवस्था जिम्मेदार है। जो इस प्रकार के तत्वों पर अंकुश लगाने में असफल रही है। न तो यहां की राजनेताओं व नहीं नौकरशाहों को प्रदेश की आन मान शान व हक हकूकों के प्रति जरा सा भी भान है। पूरी व्यवस्था चंगैजीवृति में प्रदेश के वर्तमान संसाधनों को लुटने व लुटवाने में लगी है। इसके लिए महिला मंगलदल, युवाओं व पत्रकारों को आगे आना होगा। दुर्भाग्य यह है चंद लोगों को छोड़ कर यहां अपनी संकीर्ण मनोवृति में आकंठ धृतराष्ट बन कर प्रदेश को पतन के गर्त में धकेलने के लिए उतारू हैं। उत्तराखण्ड का नाम रौंदने की धृष्ठता की गयी थी उसको तो प्रदेश के जांबाज लोगों ने छह साल बाद हासिल कर लिया। प्रदेश के स्वााभिमान को मुजफरनगर काण्ड में रौंदा गया, उसके गुनाहगारों को सजा देने के बजाय, प्रदेश के लिए इससे शर्मनाक और दूसरी बात क्या हो सकती है कि इस काण्ड के गुनाहगारों को संरक्षण देने वालों को प्रदेश के महत्वपूर्ण पदों पर आसीन किया गया है। यही नहीं प्रदेश के राजनैतिक भविष्य को जमीदोज करने के लिए जनसंख्या पर आधारित विधानसभाई परिसीमन पर थोपा गया। प्रदेश गठन के 12 साल तक प्रदेश के हुक्मरान जनभावनाओं के अनरूप प्रदेश की राजधानी गैरसैंण में बनाना तो रहा दूर उसका नाम लेने का साहस तक नहीं जुटा पाये। उल्टा देहरादून में ही राजधानी थोपे रखने का निरंतर अलोकतांत्रिक षडयंत्र विधानसभा भवन गैरसेंण बनाने की वर्तमान सरकार की घोषणा के बाबजूद आज भी जारी हैं। प्रदेश में मूल निवास सहित तमाम महत्वपूर्ण मुद्दों पर सरकारें नपुंसकों की तरह आत्मघाती मौन रख कर प्रदेश की जनता के हितों को रौंद रहा है। हमारे समाज के प्रबुद्ध जनों को भ्रष्टाचार, क्षेत्रवाद व जातिवाद की संकीर्णता में धकेल रहे हुक्मरानों को पूरी तरह बेनकाब कर प्रदेश में हिमाचल की तरह का भू कानून बना कर माफियाओं के दंश से प्रदेश को बचाना होगा। वोट की अंधी लालशा से प्रदेश के तराई क्षेत्रों में ही नहीं पर्वतीय कस्बों में भी कितने घुसपेटियें षडयंत्र के तहत बसाये जा चूके हैं इसका अहसास प्रदेश की जनता को शायद असम के लोगों की तरह तब होगा जब पानी सर से उठ जायेगा। इस मुद्दे पर दो टूक नजरिया पहले भी रखा था कि सीमान्त जनपदों में किसी प्रकार के बाहरी फेरीवालों व घुसपेटियों को किसी भी हालत में घुसने न दिया जाय। सामाजिक संगठन व जनप्रतिनिधी जनता में इस मामले में जागरूक करके दूरस्थ क्षेत्रों में इस प्रकार के संदिग्ध लोगों की घुसपेट पर अंकुश लगाते हुए गरीब परिवार की बेटियों की शादी कराने में सामुहिक भागेदारी निभाने के लिए आगे आयें। क्योंकि गरीबी व अज्ञानता के कारण गरीब परिवार के लोग बेटी की शादी कैसे करें इससे बेहद परेशान,असहाय व अकेला अपने आप को पाता है, इसी का लाभ उठाते हुए स्थानीय असामाजिक तत्वों से सांठगांठ करके ये माफिया प्रदेश से बाहर अच्छी शादी करने के नाम पर अपना शिकार आसानी से बनाता है। जिसके बाद ऐसी बेटियों का जीवन नरक बन जाता है। वहीं जनता को प्रदेश के राजनैतिक नेतृत्व पर निंरतर यह जनदवाब बनाना होगा कि प्रदेश के संवैधानिक व भविष्य निर्माण करने वाले संस्थानों के महत्वपूर्ण पदों राजनैतिक आकाओं या अपने निहित स्वार्थी तत्वों को आसीन करने के बजाय वह प्रदेश की प्रतिभाओं को इन पदों पर आसीन करके प्रदेश के पूरे तंत्र को जनहितकारी बनायें। आज जरूरत है प्रदेश को जनांकांक्षाओं व भारतीय संस्कृति की पावन गंगोत्री को साकार करने की। जहां जातिवाद-क्षेत्रवाद व भाई भतीजावाद तथा माफियाओं के प्यादों का शासन नहीं अपितु जनांकांक्षाओं को साकार करने वाले जनसमर्पित राजनेताओं द्वारा भारतीयता को जीवंत करने वाला निष्पक्ष सुशासन चलाया जाय।
 

भारतीय लोकगायकी का ध्रुवतारा -लोकगायक से जननायक बने नरेन्द्रसिंह नेगी 


भले ही देश में हिन्दी सहित तमाम भारतीय भाषाओं में गीत लिखने वाले व गाने वाले गायकों की संख्या असंख्य है। परन्तु जो मुकाम उत्तराखण्ड के शीर्ष लोकगायक नरेन्द्रसिंह नेगी ने अपने प्रदेश में युगान्तकारी व क्रांतिकारी गीतों को गा कर जननायक बन कर हासिल किया वह वर्तमान में हिन्दी के बाॅलीवुड के गायकों को भी हासिल नहीं है। अपने ही रचित गीतों को स्वर देकर न केवल नरेन्द्रसिंह नेगी देश की रक्षा में लगे लाखों जांबाज वीर सैनिकों के दिलों की धडकन है अपितु वे उत्तराखण्ड में यहां की जनविरोधी सरकारों द्वारा समुचित विकास न किये जाने के कारण पीढी दर पीढ़ी देश प्रदेश में वनवासी जीवन जीने के लिए अभिशापित लाखों उत्तराखण्डियों व अकेल ही उत्तराखण्ड में घर परिवार की जिंम्मेदारी ढोने के लिए मजबूर महिलाओं के सुख दुख के सहारा भी बने है।  आज देश का प्रबुद्ध लोग व राजनीतिज्ञ भी यह जानते हैं कि उत्तराखण्ड में एक ऐसा महान लोकगायक है नरेन्द्रसिंह नेगी जिन्होंनेे देश के सबसेे बडे दिग्गज राजनेता व कांग्रेसी मुख्यमंत्री नारायणदत्त तिवारी को ही नहीं  अपितु रामराज्य व भ्रष्टाचार मुक्त सुशासन देने के दावा करने वाली भाजपा को उत्तराखण्ड की पावन देवभूमि में अपने गीतों के माध्यम से बेनकाब किया। जहां तक बालीवुड में स्थान बनाने से बढ़  कर जनता के दिलों में छाने का जो सराहनीय कार्य नरेन्द्रसिंह नेगी ने अपनी दुखी जन्मभूमि के लोगों को इन कुशासकों से मुक्ति का स्वर दे कर सफलता हासिल की वह मुकाम भले ही सरकारी अलंकरणों से सम्मानित होने के बाबजूद असम के महान गायक भूपेन दा को हासिल नहीं हो पाया। वे जनमानस को असम को घुसपेटियों से रौदवाने वाले हुक्मरानों को बेनकाब करके जनता को दिशा देने में असफल रहे। वहीं नरेन्द्रसिंह नेगी आज देश का एक ऐसा जीवंत लोकगायक बन गया है जो प्रदेश के दिशाहीन पदलोलुपु राजनैतिक दलों से दुखी जनता को अपने गीतों के माध्यम से सही दिशा देने का काम भी बखूबी से कर रहे है। वे जनविरोधी सरकारी तकमों व अलंकरणों या बाॅलीवुड की मायानगरी में अपनी आत्मा व गीत संगीत का सौंदा न करके आज भी अपनी जन्मभूमि व प्रदेश की संस्कृति व लोकशाही को मजबूत बनाने के लिए समर्पित है। सबसे बडी सेवा यही है कि जो अपने निजी स्वार्थो  को भी दाव पर लगा कर जनहितों व लोकशाही की रक्षा के लिए समर्पित रहे। तिवारी व निशंक के कार्यकाल में इसी कार्य को करके नेगी जी ने न केवल अपनी प्रतिभा का डंका बजाया अपितु प्रदेश व देश में एक नजीर भी पेश की कि कलाकार केवल अपने स्वार्थ के लिए नहीं अपितु समाज के हितों की रक्षा के लिए अपने हितों को भी दाव लगा सकते हैं।   वहीं ‘जय भगौती नन्दा ’जैसे कालजयी गीत गा कर पूरे विश्व में नन्दादेवी राजजात से रूबरू कराया। हिन्दी में गुलजार, प्रदीप,  आंध्ंा्र में गदर, छत्तीसगढ़ में तीजनबाई, असम में भूपेन दा सहित असंख्य महान गीतकार व गायक हुए परन्तु जिस प्रकार से लोकत्रांत्रिक ढ़ग से जनविरोधी सरकारों को बेनकाब करने में महत्वपूर्ण सफलता नरेन्द्रसिंह नेगी ने हासिल की वह अपने आप में अद्वितीय है। ऐसे महान गायक नरेन्द्रसिंह नेगी को इसी पखवाडे दिल्ली में न केवल उत्तराखण्ड के सांस्कृतिक, सामाजिक सरोकारों के मर्मज्ञ डा. शेखर पाठक अपितु राष्ट्रीय व  अंतरराष्ट्रीय मामलों के विशेषज्ञ पुष्पेश पंत व देश के वरिष्ठ पत्रकार रहे डा गोविन्दसिंह भी उनको उत्तराखण्ड के महान गायक ही नहीं जननायक के रूप में सम्मानित किया। नरेन्द्र नेगी ने अपने 40 वर्षीय गायकी यात्रा से उत्तराखण्ड के ही नहीं अपितु देश के तमाम कलाकारों को एक संदेश दे दिया कि एक कलाकार को धन के लिए अपनी लोकसंस्कृति को विकृत्य करने की प्रवृति को छोड़ कर जनहितों का गलाघोंटने वाली सरकारों को भी बेनकाब करने के दायित्व को पूरा करना भी प्रत्येक गायक व लोककलाकार का प्रथम धर्म है । नेगी जी ने अपने गीतों के माध्यम से न केवल उत्तराखण्डी संस्कृति के साथ साथ शराब, पर्यावरण बलिप्रथा, भ्रष्टाचार सहित तमाम सामाजिक कुरितियों पर जमकर प्रहार किया। इस धर्म का निर्वाह करने से ही जनता उनको सर आंखों में बिठायेगी।

Wednesday, February 13, 2013


वेलेन्टाइन डे के नाम पर व्यापार हो गया है प्रेम,


वेलेन्टाइन डे के नाम पर व्यापार हो गया है प्रेम,
इस व्यापार से बढा हिंसा छेड़छाड  बलात्कार ।।
जग मदिरा का गटर बन कर सजा देह बाजार
नारी जग में बन गयी आज क्यों इतनी लाचार।।
हिंसा व दुराचार से हो गयी सारी दुनिया त्रस्त
अपराधियों का संरक्षक क्यो बन गया है तन्त्र ?
दानवों के इस व्यापार से कराह रहा यह संसार
अश्लीलता के इस व्यापार को बढ़ा रही सरकार।।
दुराचार की इस आंधी में बदनाम हो गया है प्रेम
शिक्षा, चिकित्सा, रोजगार से वंचित जग है त्रस्त।।
सत्तांध दुशासन चंगेज यहां हैं वेलेन्टाइन में मस्त
पावन पवित्र प्रेम का गलघोंट दिया है क्यों सर्वत्र?
वेलेन्टाइन डे को फिर क्यों बढावा दे रही सरकार
इससे फैल रहा है हिंसा, व्यभिचार का ही व्यापार।।
यौन शिक्षा के नाम से दुषित होगे अबोद्य नौनिहाल
नैतिकता का गला घोंट रही मूर्ख बेलेन्टाइनी सरकार।।
अराजकता के गर्त में देश को धकेल रही हैं सरकार
बेलन्टाइनी व्यापार से क्यों नरक बना रही  संसार।।

-देवसिंह रावत
(14 फरवरी2013  वेलेन्टाइन -प्रातः 10.05 बजे श्रीकृष्ण चरणों में सादर समर्पित )





Monday, February 11, 2013


राजधानी बनाओ गैरसैंण 


माफिया, नेता और नौकरशाह यूं बनियांच काल आज
उत्तराखण्डियों की एक ही मांग आज राजधानी गैरसैंण
उत्तराखण्ड का जू च विरोधी, तों कू क्यूं च दून प्यारी,
गैरसैंण मां बसियां च उत्तराखण्डी वीर शहीदों का प्राण
तख नी च कखी भू माफिया, खाली कलंक न लगावा
देहरादून माॅं कख रन देवता भेजी जरा ये भी बतावा
एक बात सभी आज कान लगावा गैरसैंण ना गैर बतावा
गैरसैंण च उत्तराखण्ड की आन मान शान -पहचान 
दीदा गैरसैंण को न गैर बतावा, शहीदों की भूमि यो च
उत्तराखण्ड की प्राण यो च, गैरसैण राजधानी गैरसैण 
लखनऊ से जब छोडी मोह क्यों थोपी अब देहरादून 
आओ मिलके गीत गावा, राजधानी हमारी च गैरसैंण 
-देवसिंह रावत 
(11 फरवरी की रात 9.24 बजे)

Sunday, February 10, 2013


ऊखीमठ त्रासदी के पाच माह  बाद भी प्रदेश सरकार की लापरवाही से आक्रोशित  भू वैज्ञानिक बलबीर धर्मवान करेंगे 
14 फरवरी को ऊखीमठ में  भूख हडताल 


13 सितम्बर 2012 को हुई त्रासदी में 60 लोगों की दर्दनाक मौत हुई थी 



उत्तराखण्ड के रूद्रप्रयाग जनपद के ऊखीमठ क्षेत्र में 13 सितम्बर को बादल फटने के बाद भूस्खलन के कारण हुई भारी त्रासदी से निपटने में दुर्घटना के समय घडियाली आंसू बहाते हुए प्रभावित क्षेत्र को इस प्रकार की प्राकृतिक आपदा के निदान के लिए ठोस कदम उठाने वाला प्रदेश का शासन प्रशासन इस त्रासदी के 5 माह बीत जाने के बाद अब कुम्भकर्णी नींद सो गया है। इस क्षेत्र के अनैक गांवों के  लोगों के जीवन पर मंडरा रहे खतरे को नजरांदाज कर प्रशासन न तो अपनी की गयी घोषणा के अनुसार इस भूस्खलन की दृष्टि से संवेदनशील क्षेत्र का सही ढंग से वैज्ञानिक (भू वैज्ञानिक, सीविल इंजीनियर, मौसम वैज्ञानिक)सर्वेक्षण करा रहा है। इस से आहत हो कर व क्षेत्र की जनता पर मंडरा रहे प्राकृतिक आपदा के खतरे से बचाने के लिए इसी संवेदनशील क्षेत्र के मंगोली गांव के मूल निवासी विख्यात भू वैज्ञानिक बलबीरसिंह धर्मवान 14 फरवरी से ऊखीमठ तहसील में आमरण अनशन में बैठेंगे। प्यारा उत्तराखण्ड समाचार पत्र को 10 फरवरी को एक भैंटवार्ता में भू वैज्ञानिक धर्मवान ने बताया कि इस दुर्घटना से पहले ही वे निरंतर इस के मूल कारण के निदान की मांग प्रशासन से करता रहा परन्तु प्रशासन की नजरांदाज करने से इस दुर्घटना में 60 लोगों की दर्दनाक मौत हो गयी। इस काण्ड के बाबजूद आज 5 माह बीतने के बाद भी प्रशासन इस त्रासदी से उबरने के लिए ठोस कदम नहीं उठा रहा है। भू वैज्ञानिक धर्मवान ने प्रधानमंत्री, प्रदेश के मुख्यमंत्री व जिला प्रशासन सहित तमाम संबंधित अधिकारियों को अपने निर्णय की सूचना दे दी है।
ऊखीमठ में इसी माह बादल फटने के बाद हुए भूस्खलन से जो विनासकारी तबाही हुई उसके लिए अगर कोई जिम्मेदार है तो यहां का बेहद उदासीन व भ्रष्ट प्रशासन। जिसने उनके 2002 से उनके द्वारा लगातार इस भूस्खलन के लिए जिम्मेदार पर्वत श्रृखला का सर्वेक्षण कराने की मांग को नजरांदाज किया। निकम्मे प्रशासन ने न तो इस क्षेत्र का सर्वेक्षण किया व नहीं यहां हो रहे भूस्खलन का ट्रीटमेंट। इसी पर्वत से हुई भूस्खलन के कारण मंगोली ग्रामसभा में 28 लोगों व समीपवर्ती क्षेत्र में 32 अन्य लोगो ंकी मौत हुई।‘ यह टूक आरोप 13 सितम्बर को ऊखीमठ क्षेत्र के तबाह हुए गांवों की विनाशकारी हालत को देख कर दिल्ली लोटे भू वैज्ञानिक बलबीरसिंह धर्मवान ने प्यारा उत्तराखण्ड समाचार पत्र से व्यथित होकर कही।
उन्होने दो टूक शब्दों में कहा कि जितना धन राजनेता व नौकरशाह अब ऊखीमठ क्षेत्र में 13 सितम्बर की रात को भूस्खलन से हुई त्रासदी के बाद यहां पीडिघ्तों के झूठे हमदर्द बन कर घडियाली आंसू बहाने के नाटक करने के लिए हेलीकाॅप्टर से यात्रा करने आदि में लगा रहे है, उससे कम खर्च में इस तबाही का कारण बने मंगोली गांव के ऊपर की वर्षो से भूस्खलन हो रही पर्वत श्रृंखला का भूगर्भीय सर्वेक्षण व ट्रीटमेंट कराकर 13 सितम्बर की रात आयी इस क्षेत्र में विनासकारी तबाही से हुए 60 से अधिक लोगों की मौत, 70 तबाह हुए मकानों, अरबों रूपये मूल्य की खेत खलिहानों आदि की तबाही से बचा जा सकता था। उन्होने अफसोस प्रकट किया कि यहां शासन प्रशासन में बैठे लोगों को न तो आम लोगों की जानमाल की चिंता है व नहीं अपने दायित्व का भान। यही नहीं वे जनहित के किसी भी संवेदनशील कार्य तक करने के लिए समय पर कहीं तैयार नहीं है। उन्होंने कहा कि शासन प्रशासन में आसीन लोगों का ध्यान अपने दायित्व के निर्वहन से अधिक अब प्राकृतिक आपदा के धनराशि की बंदरबांट पर है। अगर प्रशासन ने उनकी गुहार समय पर सुन ली होती तो आज इस लोगों को यह बुरे दिन नहीं देखने पड़ते। इसमें रूद्रप्रयाग पीडब्ल्यूडी विभाग ने जो यहां पर भूस्खलन क्षेत्र का ट्रीटमेंट करने का जो अपने दायित्व नहीं निभाकर अक्षम्य अपराध किया, उसका खमियाजा यहां की जनता व प्रशासन आज भूगत रहा है।
 उन्होंने कहा आज इस त्रासदी के बाद जिलाधिकारी व प्रशासन भारतीय भूगर्भ विभाग से सर्वेक्षण कराने की बात कह रहे हैं क्यों प्रशासन के पास इस बात का कोई जवाब हे कि विगत दस सालों से इसकी मांग को उन्होंने क्यों ठुकरा कर पाच दर्जन से अधिक लोगों को मौत के मुंह धकेला।
13 सितम्बर की रात को आये विनाश के बाद इस क्षेत्र में जब वे गये तो राहत के नाम पर राजनेताओं व नौकरशाही की हवाई पिकनिक से पीडिघ्त जनता काफी परेशान ही नहीं दुखी भी है। जिस प्रकार से मुख्यमंत्री विजय, सांसद सतपाल महाराज व प्रदेश के आपदा प्रबंधन मंत्री यशपाल आर्य ने हेलीकाॅप्टर से रा.इंटर कालेज के मैदान में बने हेलीपेड़ में उतर कर त्रासदी से तबाह गांवों का जायजा लेने के बजाय मात्र 100 मीटर की दूरी पर वहां पर तमाम पीडिघ्त, घायलों आदि को शासन प्रशासन द्वारा बुलवा कर अपना कत्र्तव्य इति समझा। हाॅं भाजपा के तीनों पूर्व मुख्यमंत्रियों भगतसिंह कोश्यारी, भुवनचंद खण्डूडी व रमेश पोखरियाल निशंक ने अलग अलग तबाह हुए क्षेत्र में जा कर वहां का जायजा लिया। देखा तो यह जा रहा है कि प्रायः नेता या अधिकारी जो भी लोगों का दुख दर्द लेने के नाम पर यहां पर गये और  वह अपने साथ किसी फोटोग्राफर को ला कर लोगों के साथ अपनी फोटो खिंचवाने  में लगे रहेै। यही नहीं उत्तरकाशी में प्राकृतिक आपदा के पीडित लोगों को उचित राहत देने के नाम पर ‘भजन आदि करने की सलाह देने वाले प्रदेश के मुख्यमंत्री को अपने बेटे को चुनाव लड़ाने में भारी व्यवस्तता के कारण यहां लोगों की सुध लेने का समय है ही कहां था। हाॅं ऊखीमठ त्रासदी के पीडिघ्तों को सरकार से अधिक शांतिकुज का दिन रात चलने वाला लंगर अधिक राहत पंहुचा रहा । जो सरकारी खाना हेलीकाप्टर द्वारा लाया जा रहा है उसको आदमी क्या कुत्ते तक बदबू मारने के लिए खाने के लिए तैयार नहीं थे।
रूद्रप्रयाग जिला मुख्यालय से 45 किमी दूरी पर स्थित ऊखीमठ के समीपवर्ती क्षेत्र में 13 सितम्बर हो बादल फटने व भूस्खलन से भारी तबाही हुई।  इसके कारण गिरीया मनसूना  में 3, मंगोली में 10, चुन्नी में 18, ब्राह्मण खोली 4, राशन डिप्पो में 4 नेपाली मजदूर,बोधे 4, जुजा 12, व प्रेम नगर 5 लोक 13 सितम्बर को आयी प्राकृतिक त्रासदी में कालकल्वित हो गये। यह सब ऊखीमठ-मनसूना मोटर मार्ग में मंगोली गांव के ऊपर के कई सालो ंसे पहाड़ टूटने व उससे हो रहे भूस्खलन का समय पर ट्रीटमेंट न किये जाने के कारण हुआ। भू वैज्ञानिक व मंगोली गांव के समाज सेवी ने शासन प्रशासन को इससे आगाह किया। उनकी इस चेतावनी को 14 नवम्बर 2002 को अमर उजाला में वर्षा से मंगोली गांव में भूस्खलन के खतरे व  25नवम्बर 2002 में दैनिक जागरण में मंगोली गांव इस भूस्खलन से होने वाले खतरे की खबरे प्रकाशित करके जनता व प्रशासन को आगाह किया। यही नहीं  5 फरवरी 2005 को भू बैज्ञानिक बलबीर धर्मवान ने प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री व  जिलाधिकारी रूद्रप्रयाग को पत्र लिख कर किया आगाह कि प्रशासन 12-13 नवम्बर 2002 की रात्रि को आये मंगोली गांव के ऊपरी पहाड पर हुए भूस्खलन की अनदेखी कर रहा है। 6 फरवरी 2005 को भू वैज्ञानिक की 2 साल बाद भी इस पहाड पर हो रहे भूस्खलन की उपेक्षा करने की खबर को दैनिक जागरण व अमर उजाला ने प्रकाशित की।  14 नवम्बर 2007 को भू वैज्ञानिक बलबीर धर्मवान ने प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर सरकारी तंत्र द्वारा आपदा प्रबंधन के कार्य के प्रति बेहद उदासीन होने का आरोप लगाया।  30 मई 2008 जिलाधिकारी रूद्रप्रयाग द्वारा भू वैज्ञानिक बलबीर धर्मवान को उनके प्रधानमंत्री को प्रशासन द्वारा मंगोली गांव के ऊपर स्थित पर्वत पर हो रहे भूस्खलन की उपेक्षा करने वाले  पत्र का जवाब ( संख्या 2852ध्41-02(2007-2008) दिनाॅंक 30 मई 2008) दिया। 10 जून 2010 को इस क्षेत्र का भू सर्वेक्षण कराने की मांग को लेकर भू वैज्ञानिक धर्मवान का जिलाधिकारी रूद्रप्रयाग को प्रार्थना पत्र लिखा।
20-6-2010 को अमर उजाला समाचार पत्र ने प्रमुखता से मंगोली गांव के भूगर्भीय सर्वेक्षण कराने की वैज्ञानिक धर्मवान की बात को प्रकाशित किया।  25 अक्टूबर 2010 को भू वैज्ञानिक बलबीर सिंह धर्मवान ने फिर जिलाधिकारी को मंगोली गांव के ऊपर स्थित भूस्खलन हो रहे पर्वत से उत्पन्न खतरे के निदान हेतु पूरे क्षेत्र का वैज्ञानिक सर्वेक्षण कराने की मांग के प्रति शासन प्रशासन की उदासीनता से खिन्न हो कर 28 जनवरी 2011 से आमरण अनशन की चेतावनी युक्त पत्र दिया।
जब प्रशासन द्वारा 2002 से उनके आग्रहों को नजरांदाज करने का का कृत्य किया और उससे 13 सितम्बर को ऊखीमठ क्षेत्र में भारी तबाही हुई। इससे व्यथित हो कर भू वैज्ञानिक श्री धर्मवान ने 19 सितम्बर 2012 को 13 सितम्बर की रात को आयी इस क्षेत्र में भारी प्राकृतिक त्रासदी में 60 लोगों के भूस्खलन में मारे जाने के बाद पुन्न इस क्षेत्र में भूस्खलन का वैज्ञानिक व इंजीनियरिग ट्रीटमेंट करने की अपनी दस साल पुरानी मांग को दोहराते हुए जिला अधिकारी रूद्रप्रयाग को फिर पत्र लिखा।
वैज्ञानिक धर्मवान के अनुसार अधिकांश त्रासदी इस क्षेत्र में जुलाई माह में नहीं अपितु अगस्त सितम्बर में होती है। इस काण्ड के बाद भी प्रशासन इस त्रासदी से उबरने से कोई ठोस कदम न उठा कर और त्रासदी का इंतजार कर रही है। इसी से आहत हो कर भू वैज्ञानिक बलबीरसिंह धर्मवाण ने 14 फरवरी से आमरण अनशन पर बैठने का ऐलान किया।


उप्र सरकार व रेलवे की लापरवाही से हुआ कुम्भ में रेलवे स्टेशन हादसा

रेल मंत्री व उप्र के कुम्भ प्रबंध मंत्री दें तत्काल इस्तीफा


रेलवे स्टेशन पर हुई दुर्घटना में 36 मरे 50 से अधिक घायल



इलाहाबाद(प्याउ)। इलाहाबाद पावन कुम्भ के दूसरे बडे शाही स्नान मौनी आमावस्या के दिन स्नान करने के बाद रेलवे व प्रशासन की लापरवाही से रेलवे स्टेशन की 5 व 6 नम्बर प्लेटफार्म पर हुई दुर्घटना में 16 महिलाओं सहित 36 श्रद्धालु मारे  गये व 31 घायल हो गये। हालांकि प्रशासन प्रत्यक्ष दर्शी के दावे को गलत बता रहा है कि यह दुर्घटना पुलिस द्वारा लाठी चार्ज करने के कारण अपने घरों को लोट रहे श्रद्धालुओं  में मची भगदड़ के कारण मची । उत्तर प्रदेश में सत्तारूढ़ समाजवादी पार्टी इस दुर्घटना का टिकरा रेलवे के सर फोड़ रही है। कुल मिला कर इस दुर्घटना में प्रशासन व रेलवे दोनों की लापरवाही का खमियाजा आम जनता को अपनी जान से चूकाना पडा। इस प्रकरण से साफ हो गया कि न तो प्रशासन व नहीं रेलवे दोनों ने कुभ मेले में उमड़ने वाली श्रद्धालुओं की भीड़ के लिए किये गये तमाम प्रबंधों की पोल खोल दी है। उप्र सरकार व रेलवे के कुम्भ के लिए किये गये तमाम प्रबंधों की पोल उस समय खुल गयी जब इस दुर्घटना के कई समय बाद भी प्रशासन व रेलवे राहत कार्य भी समुचित ढ़ग से शुरू तक नहीं कर पाये। हादसे के बाद सेकडों लोग अपनो से बिछुड गये, कई अकाल मौत के शिकार हो गये। परन्तु जिनके कंधों में इसकी जिम्मेदारी थी वे अपनी जिम्मेदारी का निर्वाह करने के बजाय एक दूसरे को इस काण्ड का दोषी ठहरा रहे थे। इस काण्ड के लिए रेल मंत्री ही नहीं प्रदेश के कुम्भ मेले आयोजन समिति से जुडे मंत्री को भी तत्काल इस्तीफा दे देना चाहिए। अपनी बेनकाबी को ढकने के लिए हालांकि उप्र सरकार ने इस दुर्घटना में मारे गये श्रद्धालुओं के परिजनों को 5-5 लाख व घायलों को 1-1 लाख रूपये का मुआवजा देने का ऐलान किया। वहीं प्रधानमंत्री राहत कोष से भी इस दुर्घटना पर राहत देने का ऐलान किया। वहीं इस दुर्घटना पर अपनी जिम्मेदारी को स्वीकार करने का साहस तक न कर पाने वाले देश के रेलमंत्री पवन कुमार बंसल ने सफाई कि  रेलवे ने कुंभ के मद्देनजर अपनी तरफ से संभावित भीड़ के मुताबिक पर्याप्त इंतजाम किए थे। इसके तहत 1800 बोगियां विभिन्न ट्रेनों में लगाई गई। रोजना 112 ट्रेनों का परिचालन किया गया। रविवार 10 फरवरी को भी हादसा होने तक इलाहाबाद से 50 विशेष गाडि़यां चलाई जा चुकी थीं, लेकिन मौनी अमावस्या पर अनुमान से ज्यादा लोगों के पहुंचने से संभवतरू भगदड़ मच गई। उन्होंने कहा कि यह वक्त किसी को दोष देने का नहीं है, न कारणों पर जाने का बल्कि यह समय हालात को काबू करने का है। इस वक्त उत्तर-मध्य रेलवे के महाप्रबंधक इलाहाबाद में आपात बैठक कर ज्यादा से ज्यादा ट्रेनें चलाने की कोशिश में लगे हुए हैं। एक तरफ प्लेट फार्म 6 की रेलिंग टूटने को इस हादसे का कारण बताया जा रहा है वहीं दूसरी तरफ पुलिस द्वारा लाठी चार्ज होने के कारण मची भगदड़ को इसका कारण बताया जा रहा है। कारण जो भी हो परन्तु साफ हो गया कि न तो स्थानिय प्रशासन व नहीं रेलवे ने कुम्भ मेले में आने वाली भारी भीड़ को ध्यान में रखते हुए उचित प्रबंध तक नहीं किये थे।



गायकी के 40 वर्ष पूरे होने पर महान लोक गायक नरेन्द्रसिंह नेगी का दिल्ली में भव्य सम्मान 


उत्तराखण्डी जनता से जो लोकसम्मान मिला उसके आगे तमाम सरकारी सम्मान गौणः नेगी 

उत्तराखण्ड के सबसे बडे जन नायक बन कर उभरे है नरेन्द्रसिंह नेगी: डा गोविन्द सिंह 

नई दिल्ली(प्याउ)।‘ उत्तराखण्ड की महान जनता ने उनके गीतों को दिल में बसाते हुए उनको जो सम्मान दिया है, उस अपार सम्मान व स्नेह को पाने के बाद उनके मन में किसी प्रकार की सरकारी सम्मान पाने की एक रत्ती भी ललक नहीं है।  जो सम्मान उत्तराखण्ड की जनता से उत्तराखण्ड सहित देश विदेश में उन्हें मिला है उसके आगे कोई भी सरकारी सम्मान गौण है।’ यह दो टूक विचार उत्तराखण्ड गौरव से सम्मानित महान लोक गायक नरेन्द्रसिंह नेगी ने उनकी  गायकी के 40 वर्ष पूरे होने पर देश की राजधानी दिल्ली में संसद भवन के समीप विख्यात कन्स्टीट्यूशन हाल में 10 फरवरी को आयोजित भव्य सम्मान समारोह में सम्मानित करने पर कही। इस कार्यक्रम का आयोजन अग्रणी समाजसेवी व उद्यमी डा विनोद बछेती ने दिल्ली पेरामेडिकल संस्थान के सहयोग से उत्तराखण्ड लोक भाषा  साहित्य मंच, दिल्ली द्वारा किया। इस अवसर पर कार्यक्रम का शुभारंभ पर डा गोविन्द सिंह की धर्मपत्नी, डा शेखर पाठक की धर्मपत्नी, लोक गायक नरेन्द्रसिंह नेगी की धर्मपत्नी व श्रीमती गीता चंदोला के कर कमलों से दीप प्रज्जवलित करके किया गया।
अपने सम्मान से गदगद उत्तराखण्ड के स्वर सम्राट के नाम से ख्यातिप्राप्त नरेन्द्रसिंह नेगी ने कहा कि उन्होंने हमेशा उत्तराखण्ड की जनभावनाओं के सम्मान व हितों की रक्षा के लिए गीत गाये तथा प्रदेश की कोई भी सरकार रही हो जो जनहितों पर कुठाराघात करती हो तो उस पर उन्होंने अपने गीतों के माध्यम से करारा प्रहार करके बेनकाब करने का काम किया। इसी कारण न तो उनको कोई सरकार सरकारी सम्मान देगी व नहीं उनकी इन पुरस्कार को पाने की कभी भी तनिक सी भी लालशा रही।
इस अवसर पर उत्तराखण्ड के शीर्ष लोक गायक नरेन्द्रसिंह नेगी ने इस अवसर पर ‘नरेन्द्रसिंह नेगी गीत यात्रा’ नामक पुस्तक का विमोचन भी किया गया।
इस अवसर पर ‘सुप्रसिद्ध लोकगायक नरेन्द्रसिंह नेगी की 40 वर्षीय गीत यात्रा ’ नामक विषय पर एक परिचर्चा भी आयोजित की गयी। परिचर्चा में देश के अग्रणी सामाजिक एवं रानैतिक समीक्षक प्रो. पुष्पेश पंत, देश के अग्रणी पत्रकार डा गोविन्द सिंह, दिल्ली सरकार में मुख्यमंत्री के अपर सचिव कुलानन्द जोशी, उत्तराखण्ड के जनांदोलनों से जुडे रहे प्रदेश के अग्रणी सीपीआई नेता समर भण्डारी व उत्तराखण्ड के जनांदोलनों से जुडे रहे प्रखर चिंतक डा शेखर पाठक ने श्री नेगी जी के इन 40 वर्षीय गीत यात्रा का गंभीरता से हर पहलुओं पर चर्चा करते हुए उनको उत्तराखण्ड का सच्चा संरक्षक व जननायक बताया।
इस समारोह के दूसरे सत्र में महान गायक नरेन्द्रसिंह नेगी व उपस्थित प्रबुद्ध जनमानस से से सीधे संवाद का आयोजन किया गया। इस जनसंवाद का संचालन  गणेश खुगशाल ‘गणी’ ने बखुबी से किया। श्री गणी ने नेगी जी के इन 40 सालों की विराट गीत यात्रा पर अनछुये पहलुओं पर सटीक सवाल किये जिसे नेगी जी ने बडे उत्साह के साथ हर सवाल का जवाब दिया। इसके साथ उन्होंने अपने जनता के दिलों को छूने वाले गीतों को लिखने के लिए प्रेरणा सुत्र आम जनता को बताया। लोक गायक नरेन्द्रसिंह नेगी ने कहा कि उत्तराखण्डी गायकों के लिए किसी विद्यालय से अधिक सीख यहां की वादियों में जनता के नजदीक आंख कान खुले रखने से मिलेगी। उन्होंने कहा कि उनको गीत रचना में जो सहजता अपने पहाड में मिलती है वह उसे दिल्ली या देहरादून सहित देश प्रदेश में कहीं नहीं मिलती है। महान लोक गायक नरेन्द्र सिंह नेगी ने उत्तराखण्ड में शराब के खिलाफ व्यापक जनांदोलन चलाने की जरूरत पर विशेष जोर दिया। उन्होंने इस अवसर पर पौड़ी जिले के कई गांवों में महिलाओं द्वारा शादी विवाह आदि कार्यक्रमों में हो रही शराब की पार्टियों पर लगाये जा रहे प्रतिबंध को आज का नया सराहनीय आंदोलन बनाया।   शराब के खिलाफ महिलाओं द्वारा चलाये जा रहे इस प्रकार के आंदोलन से प्रेरणा लें। उन्होंने अफसोस प्रकट किया कि उनकी तरह ही प्रदेश के सैकडों लोगों पर शराब विरोध आंदोलन में फर्जी केश बना कर दण्ड का शिकार बनाया जाता हैं। श्री नेगी ने कहा कि जो लोग कहते हैं कि उनके सकारात्मक गीतों का वर्तमान व्यवस्था पर असर नहीं होता है, उनको नौछमी नारेण नामक गीत के बाद अब तक की किसी भी सरकार पर थोक के भाव में लालबत्तियां देने का साहस तक नहीं जुटा पाये है। यही जनता व उनके गीतों की जीत है। इस अवसर पर उन्होंने अपनी उत्तराखण्डी पहचान को छुपा कर अपने आप को देहरादून या शहरी बताने वाली नयी पीढ़ी को सीख देते हुए श्री नेगी ने कहा कि जन्म कहीं भी लेने या खान पान परिवेश बदलने पर भी हम उत्तराखण्डी ही होते है। इस अवसर पर श्री नेगी ने अपनी माॅं, अपनी पत्नी व जीवन से जुडे विभिन्न पहलुओं के प्रभाव में बने अपने कालजयी गीतों पर प्रकाश डाला। इस अवसर पर उन्होंने उत्तराखण्ड राज्य आंदोलन, पर्यावरण, बुजुर्ग लोगों, महिलाओं सहित उत्तराखण्ड की हर क्षेत्र पर गाये गये अपने कालजयी गीतों की पृष्टभूमि पर भी प्रकाश डाला। इस अवसर पर उभरते हुए गायक विनायक असवाल ने नरेन्द्रसिंह नेगी के लोकप्रिय गीत ‘टिहरी डूबनों लगी गे बेटा, बांध का खातिर ....’ का बेहतर ढ़ंग से गायन किया।
इस अवसर पर महान लोकगायक नेगी जी व उनकी धर्मपत्नी श्रीमती उषा नेगी का भी विशेष रूप से सम्मानित किया गया। महान लोक गायक नरेन्द्रसिंह नेगी व श्रीमती नेगी के साथ साथ परिचर्चा में भाग लेने वाले प्रो. पुष्पेश पंत, डा गोविन्द सिंह, कुलानन्द जोशी, डा शेखर पाठक व समर भण्डारी का सम्मान करने वालों में श्रीमती व श्री डा विनोद बछेती, दुबई से पधारी गीता चंदोला, उत्तराखण्ड लोकभाषा साहित्य मंच के संयोजक दिनेश ध्यानी, अनिल पंत, जयपाल सिंह रावत, वेद विलास उनियाल, सतेन्द्र रावत, जगदीश नेगी व उर्मिलेश भट्ट आदि प्रमुख थे।
इस अवसर पर इस जनसम्मान से सम्मानित महान गायक नरेन्द्रसिंह नेगी व श्रीमती नेगी को बधाई देने वाले प्रमुख लोगों में उत्तराखण्ड गौरव से सम्मानित गायक हीरासिंह राणा, प्रसिद्ध गायिका कल्पना चैहान, संगीतकार राजेन्द्र चैहान, प्यारा उत्तराखण्ड के सम्पादक देवसिंह रावत, वरिष्ट पत्रकार विजेन्द्र रावत, मंजीत नेगी, एस एस नेगी, उद्यमी बी पी रतूडी, नौयडा के व्यवसायी शर्मा जी, चन्द्र मोहन ज्योति, समाजसेवी बृजमोहन उप्रेती व कर्ण बुटोला, कमला रावत, कलाकार नरेन्द्र पांथरी, साहित्यकार पूरण काण्डपाल, कवि पृथ्वीसिंह नेगी केदारखण्डी, विनोद नेगी, शिवचरण मुण्डेपी, हमर उत्तराखण्ड परिषद के अध्यक्ष मोहन बिष्ट, कैलाश बेलवाल, हिमांशु पुरोहित, भारत रावत एवं साथी प्रमुख थे।
 इस अवसर पर उपस्थित विशिष्ठ लोगों में वरिष्ट पत्रकार बनारसी सिंह, सुरेश नौटियाल, अभिनव कलुडा, दाता राम चमोली, समाजसेवी महेश चन्द्रा, वयोवृद्ध कांग्रेसी नेता सीएस पयाल व दीवान सिंह नयाल, महादेव प्रसाद बलूनी, संजय नौडियाल, रविन्द्रा चैहान, मोहन सिंह रावत, परमवीर सिंह रावत, बलबीर सिंह धर्मवान, किशोर रावत, जगदीश भट्ट, वेद भदोला, नीरज जोशी, प्रताप थलवाल, सहित बडी संख्या में गणमान्य लोग उपस्थित थे।

Saturday, February 9, 2013



नजफगढ़ की दामिनी की पहली बरसी पर जंतर मंतर पर आक्रोशित आहत उत्तराखण्डियों ने दी श्रद्धांजलि


उत्तराखण्ड राज्य गठन जनांदोलन के बाद पहली बार सम्मलित हुए तमाम अग्रणी लोग


नई दिल्ली(प्याउ)। 9 फरवरी 2012 को दिल्ली के नजफगढ़ से बलात्कारियों की शिकार बनी दामिनी को एक बरस बीत जाने पर उत्तराखण्ड समाज ने संसद की चैखट राष्ट्रीय धरना स्थल जंतर मंतर पर श्रद्धांजलि अर्पित की। इस श्रद्धांजलि सभा में पंहुचे समाज के लोग इस बात से बेहद आहत थे कि इस घटना को एक साल होने के बाबजूद अभी तक न तो न्याय ही मिला व नहीं पीडि़ता के परिजनों को केन्द्र, दिल्ली या उत्तराखण्ड कहीं की भी सरकार ने सहायता देनी तो रही दूर उनकी सुध तक नहीं ली। उत्तराखण्ड राज्य गठन जनांदोलन के बाद पहली बार इतनी बडी संख्या में अधिकांश अग्रणी समाजसेवी, राजनेता, पत्रकार, उ़द्यमी , महिलायें सहित बडी संख्या में उत्तराखण्डियों ने भाग लिया। इस श्रद्धांजलि सभा में उत्तराखण्ड के पूर्व मुख्यमंत्री व भाजपा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष भगतसिंह कोश्यारी, उत्तराखण्ड से राज्यसभा सांसद तरूण विजय, प्रोग्रेसिव पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष जगदीश मंमगांई, उत्तराखण्ड जनता संघर्ष मोर्चा के अध्यक्ष देवसिंह रावत, खाडी देश दुबई से इस कार्यक्रम में सम्मलित होने आयी गीता चंदोला, वरिष्ट पत्रकार सुनील नेगी, मुम्बई से आये राष्ट्रीय राजीव सेना के चंदर शर्मा आदि ने संबोधित किया। इस मोमवती युक्त प्रदर्शन में सबसे महत्वपूर्ण गरीमामय उपस्थिति उत्तराखण्ड गौरव से सम्मानित महान गायक नरेन्द्रसिंह नेगी व हीरासिंह राणा के अलावा शिवदत्त पंत सहित अनैक प्रतिठित कलाकार भी उपस्थित थे।
इस श्रद्धांजलि सभा में उपस्थित प्रबुद्ध लोगों में उत्तराखण्ड जनता संघर्ष मोर्चा के संयोजक व प्रदेश के अपर महाधिवक्ता अवतार रावत, पूर्व अध्यक्ष खुशहाल सिंह बिष्ट, महासचिव जगदीश भट्ट, उत्तराखण्ड क्रांतिदल के उपाध्यक्ष प्रताप शाही, पत्रकार विजेन्द्र रावत, उत्तराखण्ड परिवर्तन पार्टी के सुरेश नौटियाल व प्रेम सुन्दरियाल,  उत्तराखण्ड जनमोर्चा के अध्यक्ष रविन्द्रसिंह बिष्ट, एस एन वसलियाल, हर्ष बर्धन खण्डूडी, दलवीर रावत, बृजमोहन सेमवाल व हुकमसिंह कण्डारी,उत्तराखण्ड महासभा के अनिल पंत व करण बुटोला, उत्तराखण्ड लोकमंच के बृजमोहन उप्रेती उत्तराखण्ड मानवाधिकार संगठन के प्रमुख एस के शर्मा, भाजपा नेता श्याम लाल मंझेडा, पीसी नैनवाल, श्री बिष्ट, युवक कांग्रेस के नेता राजपाल बिष्ट, दिल्ली प्रदेश कांग्रेस के नेता हरिपाल रावत, नन्दन रावत, विनोद नगर से श्री रावत, भूपेश शर्मा, गिरीश कडाकोटी, प्रमोद पंत, हमर उत्तराखण्ड परिषद के अध्यक्ष मोहन बिष्ट, म्यर उत्तराखण्ड के अध्यक्ष सुदर्शन रावत, महासचिव भूपाल सिंह बिष्ट, उपाध्यक्ष देवेन्द्र बिष्ट, धीरेन्द्र अधिकारी हिमांशु पुरोहित, हरीश रावत, मनीष सुन्दरियाल, भारत रावत,  व  टिहरी उत्तरकाशी जनविकास परिषद के अध्यक्ष गंभीर सिंह नेगी, प्रताप सिंह राणा, गंगोत्री संस्था से कमला रावत व दातराम जोशी, साहित्यकार ललित केशवान, जयपालसिंह रावत, देवेश्वर जोशी, दिनेश ध्यानी, सुरेन्द्र रावत, जोगीन्दर रावत, पत्रकार बनारसी सिंह, विवेक जोश, दाताराम चमोली, चारू तिवारी, श्री रावत, सतेन्द्र रावत, नीरज जोशी, कण्डारी, मोहन सिंह रावत, परमवीरसिंह रावत, फिल्म निर्माता राकेश गौड़ व महेश कुमार, समाजसेवी धर्मपाल कुमंई,  कमलेश जोशी, आशा बलोदी, फिल्म कलाकारा सुश्री रावत, रामचन्द्र भण्डारी पूर्व मुख्यमंत्री के साहयक यूएस नेगी नैनीडाण्डा विकास समिति के जयपाल रावत, अनूप रावत , चकबंदी आंदोलनवाले डोभाल,व शैलेन्द्र के अलावा बड़ी संख्या में महिलायें जलविहार से खुशहाल सिंह बिष्ट के साथ इस आंदोलन में सम्मलित होने आयी थी। इसके अलावा बड़ी संख्या में समाजसेवी उपस्थित थे।
इसका आयोजन अनैक समाजसेवियों ने सामुहिक रूप से इंटरनेट फेसबुक आदि का साहयता ले कर किया। इंटरनेटी दुनिया से आंदोलनों में भाग लेने वाले लोगों को भले ही यह संख्या आशा से कम दिखी परन्तु जनांदोलनों के अपने लम्बे अनुभवों के आधार पर यह संख्या राज्य गठन आंदोलन के बाद पहली बार बड़ी संख्या में उत्तराखण्डी समाज के हित के लिए सडक पर उतरे। हाॅं यह संख्या उन लोगों को अवश्य कम नजर आती है जो केवल उत्तराखण्ड के जनांदोलनों से दूर रह कर केवल सांस्कृतिक कार्यक्रमों में उमडने वाली भीड़ को देख कर अभिभूत रहते। हमारे समाज में सबसे कमी इसी बात कि है कि हमारे लोग अपने हितों के संघर्षो को नजरांदाज व सांस्कृतिक कार्यक्रमों या दावत पार्टियों में भारी संख्या में डींगे हांकते नजर आते। परन्तु समाज की प्रवृति को देख कर जंतर मंतर में श्रद्धांजलि सभा में उमडा जनसमुदाय काफी है।
9 फरवरी 2013 को जंतर मंतर पर सांय 5 बजे से जंतर मंतर पर श्रद्धांजलि सभा का आयोजन बहुत ही गमगीन माहौल में किया गया। इसमें न तो किसी प्रकार के संगठन का बैनर व माइक का ही प्रयोग किया गया। इस घटना पर प्रकाश डालते हुए अखिल भारतीय उत्तराखण्ड महासभा के जयसिंह रावत ने इसका संचालन किया। सभा को
9 फरवरी 2012 को उत्तराखण्ड मूल की दिल्ली के छावला नजफगढ़ निवासी 19 वर्षीय दामिनी को ऑफिस से घर आते वक्त 9 फरवरी 2012 सायं करीब 8 .30 बजे को कुतुब विहार (छावला) नजफगढ़ से उस समय एक बिना नम्बर प्लेट लगी हुए कार सवारों ने अगवा किया जब वह अपने सहेलियों के साथ घर वापस आ रही थी। सरेआम हुई इस घटना से क्षेत्र मे रह रहे सभी समुदायों के सेकडों लोगो ने नजफगड़ थाने व रोड़ पर निरंतर प्रदर्शन करके दोषियों को पकड़ने  तक लगातार मांग की।  इस काण्ड के विरोध में संसद के समक्ष 13 फरवरी 2012को सांय 6 बजे सेकड़ों लोगों ने घण्टों तक जंतर मंतर पर प्रदर्षन किया था। बाद में पुलिस ने इस दामिनी की लांश मिली व कुछ दिन बाद अपराधी भी पकडे गये। परन्तु इस काण्ड के घटित हुए एक साल गुजर जाने पर भी इस काण्ड के अपराधियों को अभी तक सजा तक नहीं दी गयी। गत वर्ष 16 दिसम्बर को दिल्ली के बसंत बिहार में 23 वर्षीया छात्रा दामिनी के साथ हुए सामुहिक बलात्कार के बाद जो जनाक्रोश 22 व 23 दिसम्बर को दिल्ली के इंण्डियागेट से लेकर राष्टपति भवन तक सडकों पर हजारों की संख्या में आम जनता आक्रोशित हो कर उतरी उससे पूरी व्यवस्था सहम गयी। आज लोगों के जेहन में यह सवाल उभर रहा है कि अगर किरण प्रकरण में सरकार ईमानदारी से कडे कदम उठाती तो 16 दिसम्बर को दामिनी के साथ ऐसा घृर्णित कृत्य करने का दुशाहस कोई नहीं कर पाता और दामिनी आज हमारे बीच अपना जीवन यापन करती।
इस श्रद्धांजलि में तमाम वक्ताओं ने दिल्ली व उत्तराखण्ड सरकार से जहां नजफगढ़ व जलविहार की पीडि़त परिवारों की सहायता करने, इन काण्डों के दोषियों को कड़ी सजा देने के साथ साथ देश में निरंतर बढ़ रही महिलाओं से दुराचार की घटनाओं पर अंकुश लगाने के लिए सशक्त कानून बनाने की पुरजोर मांग की। सभा में उपस्थित समाजसेवकों को जनहित के संघर्षो की लडाई में सडक पर सम्मलित होने वाले उत्तराखण्ड समाज को दलगत राजनीति से उपर उठ कर आंदोलन को तेज करना चाहिए न की एक दूसरे  को कमजोर करने का कार्य।


Friday, February 8, 2013


सर्वोच्च न्यायालय व उच्च न्यायालय से अंग्रेजी का कलंक मिटा कर भारतीय भाषाओं में करने को तैयार नहीं मनमोहनी सरकार


इस विषय पर सरकार की तरफ से नहीं निजी विधेयक संसद में प्रस्तुत करने को तैयार कांग्रेस, भाजपा भी समर्थन को आयी आगे

सोनिया के दर पर 68 दिन से निरंतर धरना दे रहे है आंदोलनकारी नेता श्यामरूद्र पाठक व साथी, रात को तुकलक रोड थाने में जमा रहते है

नई दिल्ली(प्याउ)। आजादी के 65 साल बाद भी देश के माथे पर जो विदेशी भाषा अंग्रेजी का कलंक देश के बेशर्म हुक्मरानों ने लगा रखा है उसको मिटाने के लिए देश के अग्रणी वैज्ञानिक श्यामरूद्र पाठक 4 दिसम्बर से सप्रंग सरकार की प्रमुखा सोनिया गांधी के निवास 10 जनपथ की देहरी पर निरंतर धरना दे  रहे है परन्तु सोनिया गांधी सहित देश का कोई नेता, समाजसेवी, पत्रकार, आंदोलनकारी उनकी सुध लेने के लिए तैयार नहीं है। 4 दिसम्बर से निरंतर 10 जनपथ के समक्ष धरना देने वाले अग्रणी वैज्ञानिक डा श्याम रूद्र पाठक, गीता मिश्रा व दिल्ली विश्व विद्यालय के प्रोफेसर पाण्डे जी के इस धरने के 67वें दिन बितने पर भारतीय मुक्ति सेना के प्रमुख देवसिंह रावत ने 8 फरवरी को न केवल धरना स्थल पर जा कर उनको अपना समर्थन दिया। इसक ेसाथ आंदोलनकारी गीता मिश्रा के साथ इस विषय में भाजपा अध्यक्ष राजनाथ सिंह से भी दोपहर साढे बारह बजे भाजपा मुख्यालय में मिले । राजनाथ सिंह से वार्ता के दौरान आंदोलनकारी गीता मिश्रा व देवसिंह रावत ने बताया कि सर्वोच्च न्यायालय व उच्च न्यायालय से अंग्रेजी का कलंक मिटा कर भारतीय भाषाओं में करने को तैयार नहीं मनमोहनी सरकार तैयार नहीं है परन्तु कांग्रेसी नेता आस्कर फर्नाडिस ने इसी सप्ताह तुगलक रोड़ थाने में रात को रह रहे आंदोलनकारी नेता श्यामरूद्र पाठक को बताया कि वह सरकार की अनिइच्छा व इसके लिए कांग्रेस निजी विधेयक संसद में लाने के लिए तैयार है के सन्दर्भ में बताया। आंदोलनकारियों की बात सुन कर भाजपा अध्यक्ष राजनाथ सिंह ने दो टूक शब्दों में कहा कि यह सरकार देश से विदेशी भाषा का कलंक तो नहीं मिटायेगी परन्तु अगर वह इस सम्बंध में अपने किसी सांसद से निजी विधेयक लाती है तो उसको भाजपा पूरी तरह से खुला समर्थन देगी।
इसके बाद कांग्रेस प्रमुखा के  आवास पर धरने में पंहुच कर भारतीय मुक्ति सेना के प्रमुख देवसिंह रावत अपने समाजसेवी साथी मोहम्मद आजाद खान के साथ सर्वोच्च न्यायालय व उच्च न्यायालयों से अंग्रेजी के कलंक को मिटा कर भारतीय भाषाओं में न्याय दिलाने के आंदोलनकारी नेता श्याम रूद्र पाठक से मिलने 10 जनपथ के धरने में सम्मलित हुए। वहां पर आंदोलनकारी नेता डा श्यामयद्र पाठक ने बताया कि जब देश के उप्र, उत्तराखण्ड सहित कई उच्च न्यायालयों में हिन्दी भाषा में न्याय मिल सकता है तो देश की सर्वोच्च न्यायालय व उच्च न्यायालयों में न्याय भारतीय भाषाओं में दिलाने में सरकार क्यों 65 साल से मूक बनी हुई है। देश पर विदेशी भाषा को थोपना लोकशाही का गला घोंटने के साथ साथ देश के सम्मान को रौंदने का अक्षम्य अपराध भी है।


दामिनी प्रकरण में उमडे जनाक्रोश  से सहमें हुक्मरानों ने दी संसद हमला काण्ड के गुनाहगार अफजल गुरू को फांसी


13 दिसम्बर 2001 को संसद पर हुए आतंकी हमले के दोषी आतंकी अफजल को दिल्ली के तिहाड़ जेल में आज 9 फरवरी तडके  8 बजे पर फांसी दे दी गयी। तिहाड की जेल नम्बर 3 में दी गयी देश की सर्वोच्च संस्था संसद पर पाक द्वारा कराये गये आतंकी हमले के इस दोषी अफजल गुरू को फांसी पर न लटकाये जाने से पूरे देश की जनता देश के हुक्मरानों को वर्षों से धिक्कार रहे थे । जबकि सर्वोच्च न्यायालय ने 2002 में इस आतंकी को फांसी की सजा देने के बाबजूद तमाम प्रक्रिया से गुजरने के बाद 20 अक्टूबर 2006 में इसकी फांसी की सजा पर अंतिम मुहर लग गयी। परन्तु तब से इसको फांसी देने में राष्टपति के समक्ष दया की याचिका के नाम पर लटकाया गया। देश ही नहीं पूरा विश्व संसद पर हमले के फांसी की सजा पाये आतंकी अफजल गुरू को भारतीय हुक्मरानों द्वारा फांसी के फंदे पर न लटकाये जाने से भारतीय हुक्मरानों की नपुंसकता पर हैरान था वहीं इस प्रकरण से जहां जग हंसाई हो रही थी वहीं देश के नागरिकों का आक्रोश निरंतर बढ़ रहा था। इसके साथ देश के सुरक्षा बलों का मनोबल पर विपरित प्रभाव पढ़ने व आतंकियों को हौसले बढ़ने के बाबजूद देश की सरकार नपुंसकों की तरह मूक बेठी हुई थी। इसी बीच दिल्ली में 16 दिसम्बर को हुए एक छात्रा के साथ हुए सामुहिक बलात्कार के शिकार प्रकरण पर नपुंसक सरकार के खिलाफ 22व 23 दिसम्बर को इंडिया गेट से विजय चैक यानी राष्टपति के दर तक उमडे अभूतपूर्व जनाक्रोश से देश के हुक्मरान न केवल भौचंक्के रह गये अपितु बेहद सहम गये। देश के हुक्मरानों ने जो जनाक्रोश मिश्र, लीबिया व सीरिया सहित संसार के देशों में देखा उन्हें राष्ट्रपति के दर पर आजादी के बाद पहली बार उमडे इस प्रकार के जनाक्रोश ने पूरी तरह हिला कर रख दिया। इसी जनाक्रोश से भयभीत जनभावनाओं को रौंदने वाली व अफजल गुरू जैसे आतंकी को सजा देने में नपुंसक बनी हुई मनमोहनी सरकार ने इसी शुक्रवार 8 फरवरी को गृहमंत्रालय के द्वारा फांसी देने का फेसला लेने के लिए मजबूर हुई और 9 फरवरी की प्रातः इस आतंकी को फांसी की सजा दे दी गयी। इस आतंकी को तिहाड़ जेल में ही दफनाने का निर्णय लिया गया। इस प्रकार दामिनी का बलिदान व जनाक्रोश दोनों ने देश पर लगे इस आतंकी के कलंक से मुक्त कर दिया। गौरतलब है कि इसके पहले राष्ट्रपति ने अफजल गुरु की दया याचिका को 3 फरवरी को खारिज कर दी थी।
सर्वोच्च न्यायालय द्वारा इस आतंकी को फांसी की सजा देने की अपील को ठुकराने के बाद देश की सरकारों ने कई वर्षो तक इसे फांसी के फंदे पर न लटकाये जाने से न केवल देश के नागरिक आक्रोशित थे अपितु इस हमले में संसद की रक्षा व आतंकियों को मार गिराने में अपनी शहादत देने वाले अमर वीर जवानों के परिजनों ने 13 दिसम्बर 2006 को सरकार को अपने सम्मान भी सामुहिक रूप से वापस कर दिये थे। 13 दिसम्बर 2001 को यह आतंकी हमला उस समय हुआ जब संसद का सत्र चल रहा था उस दिन पाकिस्तान के आतंकी लक्शरे ताइबा व जैश मोहम्मद के 5 आतंकियों ने गृहमंत्रालय का स्टीकर लगी कार से दाखिल हो कर अंधाधुंध गोलिया चला कर संसद में घुसने की कोशिश की इसको जांबाज सुरक्षा बलों ने अपनी जान की बाजी लगा कर विफल करके पांचों आतंकियों को मौत के घाट उतार दिया। उस समय संसद में तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी, नेता प्रतिपक्ष सोनिया गांधी ही नहीं अपितु उप राष्ट्रपति भी संसद में थे। इस हमले में पांचों आतंकियों सहित 12 लोग मारे गये और 18 घायल हो गये। शहीद होने वालों में 5 पुलिस के जवान, एक संसद का सुरक्षा गार्ड व एक माली था।
देश में अफजल गुरू के अलावा 5 आतंकी और भी है जिनको फांसी पर लटकाये जाने का इंतजार देश कर रहा है। इनमें राजीव गांधी गांधी के हत्यारों मुरुगन, संथान और पेरारिवलन, पंजाब के मुख्यमंत्री बेअंत सिंह की हत्या करने वाले बलवंत सिंह राजोआना तथा मनिंदर जीत सिंह बिट्टा को निशाना बनाकर बम धमाका करने वाले देविंदर पाल भुल्लर, शामिल हैं।
आतंकी अफजल गुरू कश्मीर के बारामूला जनपद का मूल निवासी है। वह एमबीबीएस का प्रथम वर्ष की परीक्षा पास करने के साथ भारतीय प्रशासनिक सेवा परीक्षा के लिए तैयारी भी कर रहा था। जम्मू कश्मीर लिबरेशन फ्रंट का आतंकी बन गया। बीच में उसने सुरक्षा बलों के समक्ष आत्म सम्र्पण भी कर दिया था। वह पाक भी आतंकी टेªर्निग लेने गया। उसके बाद वह अपने मूल स्थान सपोर में अनन्तनाग के आतंकी तारिक के सम्पर्क में आने से वह पुन्न आतंकी गतिविधियों मे ंऐसा सम्मलित हुआ कि वह दिल्ली में संसद व दूतावास पर हमला करने के लिए आत्मघाती आतंकी बन गया। उसको फांसी की सजा देने का विरोध न केवल आतंकी संगठन कर रहे थे अपितु जम्मू कश्मीर की सरकार भी उसकी फांसी की सजा माफ करने के लिए केन्द्र सरकार पर निरंतर दवाब बना रही थी।