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Thursday, June 28, 2012


आपातकाल से बदतर कुशासन से मुक्ति के लिए देश तरफ रहा है एक जय प्रकाश नारायण के लिए

शोषण की मार झेल रहे है आम आदमी, मजदूर व कर्मचारी देश 
जंतर मंतर पर पायलटों के आमरण अनशन की शर्मनाक उपेक्षा कर रही है मनमोहन सरकार 


इसी पखवाडे 25 जून को एक तरफ देश में लोकशाही के समर्थक इंदिरा गांधी द्वारा इसी दिन देश के लोकतंत्र पर ग्रहण लगाने वाले आपातकाल की कड़ी भत्र्सना कर रहा था वहीं दूसरी तरफ देश की राजधानी दिल्ली में लोकतंत्र की सर्वोच्च संस्था संसद की चैखट राष्ट्रीय धरना स्थल जंतर मंतर पर भारतीय पायलट संघ व दिल्ली पत्रकार संघ अपने अपने संस्थानों में उनके हितों का गला घोंटने की आपातकाल से बदतर स्थिति के कारण तपती धूप में भी सडकों में उतर कर आंदोलन कर रहे थे। परन्तु क्या मजाल कि देश में प्रबुद्ध व उच्च सेवा प्रदान करने वाले आंदोलनकारी पायलटों की मांग को सुनने के दायित्व का निर्वहन तक करने की कोशिश करे। देश के भ्रष्ट हुक्मरानों के कृत्यों से सरकारी विमानन सेवा इंडियन एयरलाइन्स व एयर इंडिया बदहाली के कगार पर पंहुच गया। इनके प्रबंधकों के आत्मघाती व विश्वासघाती कार्यो के कारण एयर इंडिया भारी घाटे में संचालित हो रही है। इसके कारण इसके पायलटों के हितों पर कुठाराघात हो रहा है। इन आंदोलनकारी पायलटों की मांगों पर सहानुभूति पूर्वक विचार करने के बजाय सरकार ने इनको निकालने का जो कृत्य किया उससे आक्रोशित पायलटों की सर्वोच्च संस्था ने जंतर मंतर पर आमरण अनशन करने का मजबूरी में कदम उठाया। इसके दस दिन बित जाने के बाबजूद सैकडों आंदोलनरत पायलटों की मांगों को सरकार नजरांदाज कर रही है। वहीं देश में लोकशाही का चैथा स्तम्भ ‘प्रेस’ के सिपाई पत्रकारों की स्थिति भी दिन प्रतिदिन बद से बदतर हो गयी है। देश में मनमोहनसिंह के प्रधानमंत्रित्व में देश की सत्ता पर काबिज सरकार में यहां मजदूर, कर्मचारियों व मेहनतकश आम आदमी की दुर्दशा का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि इसके एक ताकतवर श्रम मंत्री को अपने पद से हाथ इसीकारण धोना पडा कि उन्होंने देश की राजधानी से सटे हुए हरियाणा की औद्योगिक नगरी में बहुराष्ट्रीय कम्पनी में हो रहे मजदूरों के हितों पर बोलने का साहस किया। बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के दवाब में इस मेहनतकश आम आदमी के पक्ष में बोलने वाले मंत्री व कांग्रेस आला नेतृत्व के सबसे करीबी नेताओं में अग्रणी आस्कर फर्नाडिस के सत्ता से बेदखली ही नहीं हुई अपितु देश में मजदूर, कर्मचारियों व मेहनतकश आम आदमी की जुबान पर एक प्रकार से ताला ही लगा दिया गया। आज देश में ठेकेदारी व्यवस्था से देश के हितों व आम आदमियों का कैसे जीना हराम किया जा रहा है इसका सबसे प्रत्यक्ष व देश के हुक्मरानों को पूरी तरह से बेनकाब करने वाला प्रकरण है ‘ देश की राजधानी दिल्ली में बिजली को निजी क्षेत्र की बिजली कम्पनियों के हाथों यहां के करोड़ों लोगों को खुले आम लुटवाना। जिस प्रकार से दिल्ली सरकार की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित के आशीर्वाद व बिजली कम्पनियों के बिजली के मीटरों में भारी अनिमियताओं को शिकायत पर जांच किसी निप्पक्ष जांच ऐजेन्सी से कराने के बजाय मुनाफे में चल रही इन बिजली कम्पनियों को और लाभ पंहुचाने के लिए बिजली की दरों में यकायक 24 प्रतिशत की बढोतरी का तुगलकी आदेश देकर लोकशाही को ही शर्मसार कर दिया।
इस देश में जब पायलट व पत्रकार जैसे ताकतवर व असरदार तबके की मांगों पर सरकार ध्यान तक न देने का कृत्य कर रही है तो वह देश में आम मजदूरों व कामगारों तथा कर्मचारियों के हितों के बारे मे ंसोचने की फुर्सत ही कहां से निकालेगी। आज देश में कर्मचारियों व मजदूरों की स्थिति बहुत ही दयनीय हो गयी है। सभी संस्थान ठेकेदारों के हवाले दे कर उनसे कर्मचारियों का अमानवीय व अलोकशाही शोषण किया जा रहा है। भारत में जिस प्रकार से सरकारी व निजी संस्थानों में ठेकेदारी प्रथा का प्रचलन बद से बदतर बढ़ाया जा रहा है उससे कर्मचारियों के हितों पर सीधे डाका ही डालना माना जा रहा है। इससे प्रबंधक, मालिक की भ्रष्ट ठेकेदारों से मिल कर मजदूर व कर्मचारियों का शोषण किया जाता है। उसके बेतन का एक बडा हिस्सा हर माह ठेकेदार की तिजोरियों के लिए सेंघ मार दी जाती है। इस ठेकेदारी व्यवस्था का शिकार मीडिया, कर्मचारी व मजदूर बने हुए है। इस देश में कर्मचारियों को जो खुलेआम शोषण ठेकेदारी प्रथा से किया जा रहा है उससे लगता है कि एक दिन देश को बदहाली को सुधारने के नाम पर ठेकेदारी के तहत फिर से ईष्ट इंडिया कम्पनी की तरह की ही अमेरिकी बहुराष्ट्रीय कम्पनी को देश के हुक्मरान सोंप दे तो कोई आश्चर्य नहीं होगा। खासकर जिस प्रकार सरकारी उद्यमों व संस्थानों में पहले भ्रष्ट नौकरशाह व प्रबंधन आसीन करा कर देश के हुक्मरान इन संस्थानों में खुले भ्रष्टाचार व लुटबाजारी मचा कर इनको हजारों करोड़ के घाटे में डुबोते हैं उसके बाद इनको अपने प्यादों के निजी संस्थानों के हाथों कोडियों के दाम पर बेच देते है। यही काम देश में पहले भाजपा नेतृत्व वाली राजग सरकार में आईटीसी होटलों व पंच रत्न उद्यमों के निजीकरण में किया गया और अब इसी दिशा में कांग्रेस नेतृत्व वाली सप्रंग सरकार में भी किया जा रहा है। आज देश में डीटीसी हो या एयर इंडिया आदि संस्थान इनमें जो नुकसान हो रहा है वह इसके भ्रष्ट प्रबंधन तंत्र के कारण हो रहा है। देश में भ्रष्ट हुक्मरानों की शर्मनाक स्थिति जो देश को लुटने व लुटवाने वाली है उसका जीता जागता उदाहरण है देश के सबसे विश्वसनीय व श्रेष्ठ व्यवसायी घराना टाटा को एयर लाइन्स का कार्य न दे कर देश को चूना लगाने वालों को यह सेवा दे कर देश व कर्मचारियों का खुला शोषण कराया जाता है। आज सरकारी संस्थाओं में ठेकेदारी प्रथा लागू करके कर्मचारियों का खुला शोषण किया जा रहा है वह आपातकाल से बदतर है।
आज देश में इस ठेकेदारी प्रथा की खुली लूट के खिलाफ न तो भाजपा व नहीं कांग्रेस सहित दलों में आवाज ही निकल पा रही है। वामपंथियों का विरोध भी पहले की तरह धारधार होने के बजाय केवल रस्मी अदायगी रह गया है।  देश में कांग्रेस नेतृत्व वाली मनमोहनी सरकार  के नेतृत्व में आम आदमी का जीना ही मंहगाई, आतंकवाद व कुशासन से बेहाल कर रखा है वहीं ठेकेदारी प्रथा से कर्मचारी व मजदूरों का जीवन भी दूश्वार कर दिया है। दिल्ली में जिस प्रकार से शीला सरकार खुले रूप से बिजली की निजी कम्पनियों की लाभप्रद स्थिति के बाबजूद बिजली के बिलों में भारी बढ़ोतरी कर रही है वह किसी भी प्रकार से खुली लूट से कम नहीं है। देश व देश की जनता आज आपातकाल से बदतर स्थिति में जी रहे है। सबसे दुर्भाग्य यह है कि उस समय देश को आपातकाल से मुक्त कराने के लिए जय प्रकाश नारायण जैसे महानायक थे परन्तु आज देश के पास एक भी ऐसा नेता नहीं दिखाई दे रहा है जो इस कुशासन से दिल से दुखी हो, केवल राजनैतिक रोटियों को सेकने के लिए एक दूसरे दलों को कोसने के लिए भाषण दे कर विरोध करने वाले सेकडों नेता हैं परन्तु एक भी ऐसा नहीं जो दलीय दलदल से उपर उठ कर देश की जनता को मनमोहन सिंह जैसे धृतराष्ट के कुशासन से मुक्ति दिलाने के लिए जयप्रकाश नारायण की तरह आगे आ कर देश का नेतृत्व करे।

Tuesday, June 26, 2012


पाक समर्थक आतंकी अबू हाजमा की गिरफतारी से आक्रोशित पाक पलटा सरबजीत की रिहाई से 



पाकिस्तान ने दो दशक से पाक जेल में बंद सरबजीत सिंह को राष्ट्रपति द्वारा क्षमादान करके रिहा करने की घोषणा के 6 घण्टे के अंदर ही अपनी घोषणा से पलटते हुए पाकिस्तान ने कहा कि सरबजीत सिंह को नहीं अपितु पाक जेल में ही बंद दूसरे कैदी सुरजीत सिंह को रिहा करेगा। पाक की इस पलटी मार दाव के पीछे एक ही कारण है कि भारत द्वारा मुम्बई हमले के एक मास्टरमाइंड पाक समर्थक आतंकी अबू हाजमा को इसी सप्ताह दुबई से पकड़ कर मुम्बई हमले में पाक की संलिप्ता को बेनकाब करना रहा। खुद को बेनकाब होते देख कर आक्रोशित पाक ने यह पलटी दाव चलाया। गौरतलब है कि भारत ने भी एक पाक के दशकों से भारत की जैल में बंद केदी को गत माह रिहा किया था। पाकिस्तान ने भी इसी की उतर में सबरजीत को रिहा करने की अनौपचारिक सहमति दोनों देशों के बीच हो गयी थी। अब इस घटनाक्रम में आतंकी अबू हाजमा की गिरफतारी से बौखलाये पाक ने सरबजीत की रिहाई का ऐलान करने के बाद जिस प्रकार से पलटी मारी उससे उसकी विश्वसनीयता पर पूरे विश्व में प्रश्न चिन्ह लग गया है। वहीं जिस सुरजीत सिंह की रिहाई की बात कर रहे हैं वे 30 साल से पाक की जैल में आजीवन सजा को पूरी कर गये थे। उनको छोड़ने की बात करना पाक की मंशा को ही उजागर करती है ।

Sunday, June 24, 2012


बांध नहीं विश्व पर्यावरण रक्षक उत्तराखण्डियों को देश व विश्व संस्था प्रदान करे निशुल्क घरेलु गैस, पानी व बिजली

आज विश्व संस्था  व भारत सरकार को चाहिए कि  शताब्दियों से पूरे देश ही नहीं अपितु विश्व को हिमालयी क्षेत्र के जंगल व जमीन व जल की रक्षा करके पर्यावरण व जल संसाधनों को प्रदान करने वाले हिमालयी क्षेत्र के उत्तराखण्डियों को निशुल्क बिजली, पानी व घरेलू गैस को दे कर लोगो ंको जल जंगल व जमीन के रक्षक के रूप में सम्मानित करके अपने दायित्व का निर्वहन करे। इसके अलावा विश्व संस्थाओं व देश प्रदेश सरकारों द्वारा चलायी जाने वाली तमाम पर्यावरण संवर्धन व वृक्षा रोपण आदि कार्यक्रमों को एनजीओ आदि हवाई संस्थाओं के माध्यम से नहीं अपितु ग्राम सभाओं के माध्यम से स्थानीय लोगों द्वारा ही संचालित करके उनके रोजगार के नये अवसर खोल कर विश्व पर्यावरण के साथ साथ जल, जंगल व जमीन की रक्षा करने का काम किया जाय।
इन बांध समर्थकों को एक बात समझ लेनी चाहिए कि बांध के विरोध में केवल वामपंथी, भारतपंथी व उत्तराखण्ड राज्य आंदोलनकारी ही नहीं अपितु प्रदेश के ही नहीं देश के तमाम प्रबुद्ध लोग एकजूट है।  उत्तराखण्ड का कोई भी सच्चा सपूत होगा वह कभी भी उत्तराखण्ड को सेकडों बांधों से तबाह करने की किसी को भी इजाजत नहीं देगा। आज उत्तराखण्ड के राजनेता चाहे किसी भी दल से जुड़ा हो, तमाम बुद्धिजीवियों और आम जनता सहित प्रदेश सरकार को इस विषय की गंभीरता को समझते हुए सामुहिक रूप से न केवल भारत सरकार से और भारत सरकार की तरफ से विश्व संस्था को विश्व पर्यावरण की सदियों से रक्षा करने वाले उत्तराखण्डियों को इन सुविधाओं व सम्मान से नवाजने की दिशा में अपने दायित्व का निर्वहन करें।

Saturday, June 23, 2012


मोंटेक को वित्तमंत्री बनाने के षडयंत्र को साकार कर पायेगा क्या अमेरिकी 


तमाम आलोचनाओं को दरकिनारे करके प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के करीबी मित्र व अमेरिका तथा विश्व बैंक के आंखों के तारे मोंटेक सिंह आलूवालियों को प्रणव मुखर्जी के राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार बनने के बाद रिक्त हुए वित्त मंत्री के पद पर आसीन किया जाने का तानाबाना बुना जा रहा है। सुत्रों के अनुसार तमाम कोशिशों के बाबजूद कांग्रेस नेतृत्व जनता व कांग्रेसी कार्यकत्र्ताओं की नजरों में उतर चूके मंहगाई, आतंकवाद, भ्रष्टाचार रूपि कुशासन के जिम्मेदार राजग सरकार के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह व योजना आयोग के उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह आलुवालिया को ही नहीं बदल पा रही है। माना जा रहा है कि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह व मोंटेकसिंह आलूवालिया दोनों भारतीय राजनीति में अमेरिका की पहली पसंद है। अमेरिका वर्तमान में भी किसी भी तरह नेहरू परिवार के हाथों भारत की सत्ता देखना नहीं चाहता है। क्अमेरिका के रणनीतिकार मानते है कि जब भी भारत में नेहरू परिवार के हाथों में सत्ता की बागडोर रही वह मजबूती से विकास करने के साथ अमेरिका से आंखे दिखाने का ही काम करता है। नेहरू परिवार के हुक्मरानों से वह अपने ऐजेन्डे भारत में लागू नहीं करा पाया। अमेरिका के लाख कोशिशों के बाबजूद अमेरिका खुफिया ऐजेन्सी एफबीआई को भारत में अपना दिल्ली में पांव जमाने की इजाजत एनडीए की वाजपेयी सरकार के कार्यकाल में ही हासिल कर पायी। वहीं अमेरिका की सलाह पर ही कारगिल के गुनाहगारों जिनको भारतीय सेना ने चारों तरफ से कारगिल क्षेत्र में घेर लिया था, वाजपेयी सरकार ने सुरक्षित पाक जाने की इजाजत दी थी। यही नहीं अमेरिका के इशारे पर ही कंधार विमान अपहरण का शर्मनाक समर्पण किया गया और संसद हमले के दोषी पाक को सबक सिखाने के लिए सीमा पर महिनों तक खडे जांबाज सैनिकों को भारत के सम्मान को अमेरिका के लिए कुर्वान करने वाले वाजपेयी सरकार की नपुंसकता के कारण वापस अपने बेरकों में लोटना पडा। इसके साथ ही इसके बाद केन्द्र की सत्ता में अमेरिका के पसंद पर सत्तासीन हुए कांग्रेस गठबंधन वाले सप्रंग सरकार के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने न केवल अमेरिका के दम तोड़ रहे परमाणु कारखानो ंव संयंत्रों को भारत में खपा कर उसकी अर्थवयवस्था को मजबूत करने के नाम पर भारत से परमाणु संधि करने के लिए उतारू अमेरिका की मंशा को पूरी करने के लिए कितनी मेहनत की। यही नहीं मनमोहन सिंह ने कश्मीर के आतंकवाद को शक्ति से कुचलने व मुम्बई में आतंकी हमले करने के दोषी पाक को करारा सबक सिखाने का काम करने के बजाय कश्मीर से अलगाववाद की मानसिकता के समर्थकों को ही वार्ताकार बना कर कश्मीर पर अमेरिकी ऐजेन्डे को लागू करने का काम किया जा रहा है। इसके अलावा जिस प्रकार से मनमोहन सिंह के कार्यकाल में भारत आर्थिक ही नहीं सामरिक व राजनैतिक दृष्टि से कमजोर हुआ उससे अमेरिका प्रसन्न है। वह अब किसी भी सूरत पर न तो प्रधानमंत्री के रूप में मनमोहन को बदलना चाहता है व प्रणव मुखर्जी के राष्ट्रपति बनने की संभावनाओं को देखते हुए मोंटेक को वित्त मंत्री के पद पर आसीन होते देखना चाहता है।

बांधों से तबाह करने के लिए नहीं बनाया गया है उत्तराखण्ड


झुनझुनवाला व अविरल गंगा समर्थकों पर हुए हमले से कटघरे में बहुगुणा सरकार 


 आज मै एक दो टूक सवाल में उत्तराखण्ड को ऊर्जा के नाम पर सैकडों बांधों से जलसमाधी दे कर तबाह करने के लिए नहीं बना है। लाखों लोगों को उनकी जन्म भूमि से जबरन विस्थापन के लिए नहीं बना है। खासकर जिस ऊर्जा के उत्पादन के नाम पर सकडों बांधों को बना कर अपनी तिजोरी भरने का दिवास्वप्न देख रहे उत्तराखण्ड के दिशाहीन हुक्मरान, नौकरशाह व बांध बनाने वाले थेलीशाह एवं उनके दलाल बताये कि आखिर उत्तराखण्ड को डुबाने को क्यो तुले है। ऊर्जा मानव विकास के लिए है न की मानव विनास के लिए। प्रदेश को कितनी ऊर्जा चाहिए। इसका कोई उतर अभी तक प्रदेश की जनता को नहीं बताया गया। टिहरी बांध से कितनी ऊर्जा उत्पन्न हुई और उत्तराखण्ड को कितनी मिल रही है। अब कुछ समय बात पंचेश्वर बांध से लाखों लोगों को उजाडा जायेगा। एक बात देश व प्रदेश के हुक्मरान सुनलें कि उत्तराखण्ड जलसमाधी देने के लिए हरगिज नहीं है।
उत्तराखण्ड में बन रहे अंधाधुंध बांधों को बना कर यहां के लोगों को जबरन विस्थापित करने के अन्तरराष्ट्रीय षडयंत्र का विरोध उत्तराखण्ड के प्रबंद्ध लोग दशकों से करते आये है। परन्तु जिस प्रकार से शुक्रवार 22 जून को धारी देवी में माॅं के दर्शन करने गये गंगा में बांध बनाने की शांतिपूर्ण ढ़ग से आवाज उठाने वाले प्रो अग्रवाल, जलपुरूष राजेन्द्रसिंह, देश के वरिष्ठ पत्रकार वेद प्रताप वैदिक व ख्यातिप्राप्त डा भारत झुनझुनवाला के साथ दुरव्यवहार ही नहीं अपितु 19 किलोमीटर तक तथाकथित बांध समर्थकों ने डा भरत झुनझुनवाला के लछमोली स्थित आवास तक न केवल पीछा किया अपितु उन पर कातिलाना हमला करने के उदेश्य से पथराव भी किया गया। पर्वतीय राहों पर इस प्रकार का हमला सीधे बड़ी दुघर्टना का कारण बन सकती थी। जिस प्रकार इन तथाकथित उत्तराखण्ड के हितैषियों ने बांध निर्माण के विरोध करने के कारण प्रो. अग्रवाल व उनके मित्र झुनझुनवाला पर कालिख पोतले का प्रयास किया और झुनझुनवाला के घर पर तोड़ फोड़ की। जिस प्रकार से खबरे आ रही है कि झुनझुनवाला की पत्नी से भी दुरव्यवहार किया गया वह नितांत न केवल निंदनीय है अपितु इसमें शांतिपूर्ण ढ़ग से विरोध की आवाज दबाने का सरकारी निंदनीय षडयंत्र की भी बूॅ आ रही है। अगर इन विरोध करने वालों को सरकारी सह नहीं था तो इनको इनके खिलाफ 19 किलोमीटर तक पीछा करने की खुली छूट प्रदेश के शासन प्रशासन ने क्यों दी। क्यों नहीं इन विरोध करने वालों को धारी देवी में विरोध कर अपनी बात कहने के बाद प्रो अग्रवाल व साथियों का पीछा करने से रोका नहीं गया।
जो लोग आज बांध बनाने के समर्थन में खडे हैं और जो इसे उत्तराखण्ड के हितों पर प्रहार बता कर इसका किसी भी सीमा पर विरोध करने की बात कह रहे हैं वे लोग तब कहां थे जब प्रदेश में तिवारी व खंडूडी सरकार ने प्रदेश के भविष्य को तबाह करने वाले जनसंख्या पर आधारित विधानसभाई परिसीमन को रौंकने के लिए अपनी जुबान तक नहीं खोली। ये उत्तराखण्ड के हितैषी उस समय कहां थे जब तिवारी सरकार के राज मुजफरनगर काण्ड के आरोपी अनन्त कुमार को बरी करने का देश की न्याय व्यवस्था को कलंकित करने वाला षडयंत्र किया गया। उस समय ये उत्तराखण्ड के हितैषी कहां थे जब उत्तराखण्ड की खण्डूडी सरकार में बुआसिंह को लाल कालीन  प्रदेश के शासन दे उत्तराखण्ड में बिछाया। आज गैरसैण के लिए अपनी शहादत देने वाले बाबा मोहन उत्तराखण्डी व मुजफरनगर काण्ड के विरोध में मुलायम के दलालों का विरोध करने में शहीद हुए राजेश रावत के आरोपियों को सजा दिलाने के बजाय उनको गले लगाने हुक्मरानों का विरोध तक करने का साहस प्रदेश में नहीं किया गया। आज प्रदेश में जबरन जब भूगोल बदला गया, यहां के संसाधनों की खुली बंदरबांट की गयी, प्रदेश में जबरन नाम ही नहीं यहां पर लोकशाही को दफन करके मुख्यमंत्री तक थोपे गये, शराब माफियाओं के हितो ंके लिए पूरा प्रदेश को शराब के ठेकों का जाल ही बिछाये जाने पर भी कोई नहीं बोला। क्या केवल ऊर्जा के लिए पूरे प्रदेश के अधिकांश लोगों को बलात विस्थापित कर देना व अरबों खरबों जीव जंतुओं तथा वृक्ष-वनस्पतियों को जल समाधि दे कर हत्या करना कहां श्रेयकर है। उत्तराखण्ड में बनने वाले प्रस्तावित सैकडों बांधों से न केवल उत्तराखण्ड का ही नहीं अपितु हिमालयी राज्यों सहित पूरे विश्व की पर्यावरण पर गंभीर खतरा मंडराने लग जायेगा। चीन से लगे इस सीमान्त प्रदेश में थोक के भाव से बनाये जा रहे इन बांधों से प्रदेश सहित उत्तर भारत की सुरक्षा पर गंभीर खतरा भी मंडराने लगा है। परन्तु जिस प्रकार से इन तमाम उत्तराखण्ड के हितों के लिए इन समर्थकों ने कभी न तो यहां के हुक्मरानों का इतना विरोध किया । आज इन बांध समर्थकों के ये तेवर कभी जनता की भारी मांग के बाबजूद प्रदेश की स्थाई राजधानी गैरसैंण न बनाने वाले , मुजफरनगर काण्ड के अभियुक्तों को शर्मनाक संरक्षण देने वाले व प्रदेश के स्वाभिमान व हक हकूकों को रौदने वाले अब तक हुक्मरानों पर कभी कालिख तक फेंकने का काम तो रहा दूर सार्वजनिक रूप से कभी भरी जनता में इनकी उपस्थिति में धिक्कारने का काम भी किया। नहीं किया कभी नहीं, इनकी आवाज इन उत्तराखण्ड के हितों को रौंदने वाले हुक्मरानों के सम्मुख निकली ही नहीं। उत्तराखण्ड का कोई अब तक का मुख्यमंत्री या नेता ऐसा नहीं जिसको खुद मैने व मेरे आंदोलनकारी साथियों ने उपरोक्त उत्तराखण्ड विरोधी कृत्यों के लिए दुत्कारा न हो। जहां तक उत्तराखण्ड राज्य की खुशहाली के लिए मैने व मेरे आंदोलनकारी साथियों ने अपना जीवन ही कुर्वान किया, न की ऊर्जा के नाम पर बडे बडे ठेकेदारों, नेताओं, नौकरशाहों व दलालों की तिजोरी भरने के लिए बनाये जाने वाले बांधों में उत्तराखण्ड को तबाह करने के लिए। प्रदेश सरकार को अगर प्रदेश के हितों की चिंता होती तो यह यहां पर भूतापीय ऊर्जा, घराटों व छोटी जल विद्युत परियोजनाये जिनमें स्थानीय गांव के लोगों की सहभागिता से प्रदेश की ऊर्जा संस्थान के सांझे सहयोग से ऊर्जा का पर्याप्त उत्पादन किया जा सकता है। यहां पर पवन ऊर्जा सहित अन्य प्राकृतिक ऊर्जा के विकल्पों से ऊर्जा का निर्माण किया जा सकता है। एक बात का याद रखना चाहिए कि प्रकृति के साथ अंधाधुध छेडछाड से प्रदेश में तबाही के अलावा कुछ भी हासिल नहीं होगा। बांध समर्थक चंद ठेकेदारों व उनके समर्थकों को एक बात का ध्यान रखना चाहिए कि देश में लोकशाही है न की तानाशाही। तानाशाह बन कर जनता की गांधीवादी आवाज का दमन करने वालो का हस्र जनता सत्ताच्युत करके ही करती है। देवभूमि उत्तराखण्ड के लोग बुद्धिजीवी है वे अपना हित खुद समझते हैं। अगर जो लोग यहां के हितों को रौंदने के नाम पर कार्य करेंगे तो यहां के लोग उनको तर्को से पराजित करने की बुद्धि रखते। तर्क से शांतिप्रिय ढ़ग से इनके विचारों का जवाब देना चाहिए था न की पथराव व मारपीट करके। देवभूमि को अपनी तिजोरी भरने के खातिर ऊर्जा के नाम पर बडे बांधों का अंधाधुंध निर्माण करके प्रदेश की जनता को विस्थापित करने व लाखों जीव जन्तुओं की निर्मम हत्या करने वाले बडे ठेकेदारों, राजनेताओं व भ्रष्ट नौकरशाहों के षडयंत्र को अब जनता जान चूकी है। इसलिए ऊर्जा के नाम केवल बडे बंाध बनाने की हटधर्मिता ही इनके मुखोटों को बेनकाब करने के लिए काफी है। अगर इनको सच में प्रदेश में ऊर्जा की चिंता होती तो ये प्रदेश को बडे बांधों के नाम पर घाटी की घाटी डुबो कर तबाह करने की धृष्ठता करने के बजाय भू तापीय ऊर्जा, छोटी जल विद्युत परियोजनाओं व घराट ऊर्जा, पर्वन व सौर ऊर्जा आदि विकल्पों पर गंभीरता से कार्य करते। परन्तु इनको तो केवल हजारों करोड़ रूपये का बांध बनाना है जिससे इनकी तिजोरी भरे प्रदेश जाय भाड़ में।
जहां तक यह तर्क देना कि अब काम 80 या 90 प्रतिशत हो चूका है अब विरोध जायज नहीं है। सवाल यह है कि आत्महत्या को उतारू आदमी कहे कि मुझे फांसी का फंदा डालने के बाद रोकना गलत है,? अगर वह भी यह रोकना ही था तो शुरूआत में रोकते। या परमाणु बम को दूसरे देश को तबाह करने वाले शासक को अंतिम बटन दबाने से पहले रोकना या उस अस्त्र को बीच रास्ते में ही नष्ट करना गलत है। वह देश भी कह सकता है कि हमने इस बम बनाने में हजारों करोड़ रूपये खर्च किये अब तो हमको परमाणु बम विस्फोद करने दो। गलत काम का विरोध करना जायज है चाहे वह किसी भी स्थिति में है। यही नहीं काम पूरा होने के बाद भी इसका विरोध करना कहीं भी गलत नहीं है। पूरे गांव या क्षेत्र को शराब से तबाह करने वाले शराब माफियाओं व दावानल से पूरे जंगलों को जगाने वालों की तरह पूरे प्रदेश को बांधों से तबाह करने वालों का ठेके खोलने के बाद भी विरोध करना गलत नही है। जहां तक ऊर्जा के नाम पर पूरे प्रदेश में सेकडों बांधों से राद देना कहां तर्क संगत हैं। प्रदेश की ऊर्जा के लिए टिहरी जैसा बांध ही काफी था। उसको बनाने में देश व प्रदेश के संसाधनो को जिस प्रकार से लुटवाया गया उसकी अगर खुली जांच की जाय तो बांध बनाने वाले अधिकांश मठाधीश सलाखों के पीछे बंद होंगे और देश की आंखे खुल जायेगी। जहां तक बेकल्पिक ऊर्जा पर न तो अभी तक ईमानदारी से प्रदेश सरकार ने काम ही नहीं किया। विश्व में भू तापीय ऊर्जा के अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिक सूर्य प्रकाश कपूर की तमाम कोशिशों के बाबजूद प्रदेश सरकारो ने न तो अभी तक इस दिशा में ध्यान तक नहीं दिया। जबकि अमेरिका सहित इंडोनेशिया सहित दो दर्जन देशों में अब बड़ी तेजी से इस भूतापीय ऊर्जा संयंत्रों पर काम चल रहा है। इस बात को समझ लेना चाहिए कि उत्तराखण्ड में सैंकडों बांधों को बना कर तबाह करना कहां तर्क संगत है। उत्तराखण्ड केवल ऊर्जा के लिए डुबोने के लिए नहीं है। यहां पर सत्ता पर कुण्डली मारे नेता, नौकरशाह व बांध बनाने वाली बड़ी कम्पनियां तथा इनके दलाल जनता की आंखों में ऊर्जा के सब्जबाग बना कर मात्र अपनी तिजोरी भरने की है। प्रदेश की एक भी जनसमस्याओं को जिनके लिए अभी तक राज्य बना उनमें से एक का भी समाधान राज्य गठन के 12 सालों में यहां के हुक्मरानों ने निकाला तो रहा दूर इस दिशा में एक कदम भी ईमानदारी से बढ़ाने की कोशिश तक नहीं की। पूरे प्रदेश के लाखों लोगों को जबरन विस्थापित करके व घाटियों को बलात डुबो कर लाखों करोड़ की सम्पति को नष्ट करके चंद दशकों के लिए मात्र ऊर्जा अर्जित करना कहां तक तर्क संगत है। विकास का अर्थ तबाही नहीं जनकल्याण ही होना चाहिए। शेष श्री कृष्णाय् नमो। हरि ओम तत्सत्। श्री कृष्णाय् नमो।

Friday, June 22, 2012




भाजपा व कांग्रे्रसियों के चक्रव्यूह को भेद कर 
हिमाचल की रक्षा कर पायेंगे वीरभद्र




भाजपा व कांग्रेसी नेताओं के चक्रव्यूह में फंसे हिमाचल के दिग्गज नेता वीरभद्र ने आखिरकार केन्द्रीय मंत्रीमण्डल से इस्तीफा दे दिया। 23 साल पुराने एक मामले में उन पर आरोप तय होने के बाद उन्होंने नैतिक दृष्टि केन्द्रीय मंत्रीण्डल से इस्तीफा दे दिया। इस पूरे प्रकरण में पर्दे के पीछे कौन सी ताकतें हैं उनको भी वीरभद्र भले ढंग से पहचानते है। वे   परन्तु दिल्ली व हिमाचल में उनके खिलाफ जो हिमाचल की राजनीति से दूर करने का षडयंत्र दशकों से रचा जा रहा है उसको वे उम्र की इस मुकाम में किस प्रकार से पार पाते हैं, यह तो समय ही बतायेगा। परन्तु यह भी सोलह आना सच है हिमाचल की आम जनता इन तमाम आरोपों के बाबजूद यह मानने के लिए कतई तैयार नहीं है कि राजा साहब किसी भी रूप से किसी भ्रष्टाचार में कहीं लिप्त होंगे। उनका यह विश्वास वीरभद्र के चार दशक से अधिक लम्बी हिमाचल की महत्वपूर्ण सेवा को देख कर ही जनता कर रही है।
वही दूसरी तरफ   लगता है कांग्रेस आला नेतृत्व व उनके आत्मघाती दरवारियों ने कुछ माह पहले हुए 5 राज्यों के विधानसभा चुनाव में पार्टी के पतन से कुछ भी सीख नहीं ली है। जिस प्रकार से पंजाब ही नहीं उत्तराखण्ड में कांग्रेस को आशातीत सफलता न मिलने के कारण दिल्ली दरवार के हवाई नेताओं द्वारा जमीनी नेताओं के बजाय अपने प्यादों को विधायकी व चुनाव अभियान में प्रमुखता सौपना रहा। वेसा ही काम फिर हिमाचल प्रदेश में कांग्रेस कर रहा है। खासकर हिमाचल प्रदेश में वहां की आम जनता से लेकर दिल्ली में बेठे गैर कांग्रेसी राजनेता भी जानते हैं कि हिमाचल के सबसे जनप्रिय व वरिष्ट नेता वीरभद्र है, इसके बाबजूद उनके हाथों में पूरी तरह कांग्रेस की कमान सौंपने के बजाय दिल्ली के हवाई नेताओं को वहां पर थोपने का काम कर रहे है। हालांकि प्रदेश भाजपा सरकार के निशाने पर सदैव रहे वीरभद्र को अपने ही दल के विभिषणों से भी आये दिन दो चार होना पड़ता है। 23 साल पुराने एक मामले में खुद पर आरोप तय होने के बाद वीरभद्र ने कांग्रेस आलाकमान सोनिया गांधी से अपने इस्तीफे की पेशकश करते हुए भाजपा पर आरोप लगाया कि वह राजनैतिक द्वेष के कारण छदम् मामलों में फंसाना चाहते है। उन्होंने कहा कि वे षडयंत्रकारियों को बेनकाब करके ही दम लेंगे।
हालांकि भाजपा के षडयंत्रकारियों के अलावा चुनाव के मुहाने पर खड़ी कांग्रेस में वीरभद्र को कमजोर करने के लिए ही षडयंत्र किया जा रहा है उससे वे अनविज्ञ नहीं है। खासकर जिस प्रकार उत्तराखण्ड व दिल्ली में कांग्रेस की लुटिया डुबोने में इन राज्यों में केन्द्रीय प्रभारी चैधरी बीरेन्द्रसिंह का महत्वपूर्ण हाथ रहा, अब उसी के कंधों पर कांग्रेस आला नेतृयत्व ने हिमाचल का केन्द्रीय प्रभार भी सौंप रखा है। खासकर जिस प्रकार से चैधरी बीरेन्द्र ने 70 की विधानसभा सीट में कम से कम 45 सीटों पर सहज ही विजय हासिल करने के लिए तैयार खड़ी कांग्रेस की जडों में हवाई प्रत्याशी दिये उसी का दुष्परिणाम है कि आज  कांग्रेस को बाहरी समर्थन की बैशाखियों के सहारे सरकार बनाने के लिए मजबूर होना पडा।
ऐसा ही हिमाचल प्रदेश में भी जो भूल गत विधानसभा चुनाव में तत्कालीन प्रभारी आर के धवन की सह पर कांग्रेस ने हवाई प्रत्याशियों को थोप कर व हिमाचल में विकास की गंगा बहाने वाले महान भागीरथ प्रथम मुख्यमंत्री यशवंत सिंह परमार की तरह हिमाचल में विकास के नये आयाम खडे करने वाले वीरभद्र की उपेक्षा करके की। इसी कारण प्रदेश में वह चुनाव कांग्रेस अपनी इसी भूल के कारण हारी । अब भी कांग्रेस अपनी पिछली भूलों से न तो सीख ले रही है व नहीं उसे अपनी लुटिया डुबोने वालों को हिमाचल चुनाव से दूर रखने का ही काम किया। अपितु इस बार भी यहां पर आनन्द शर्मा जैसे हवाई नेताओं को जिनका हिमाचल जैसे प्रदेश में हिमाचल की आम जनता के दिलों में भी राज करने वाले व विकास व स्वाभिमानी हिमाचल की ठोस नींव रखने वाले वीरभद्र की राह पर कांटे बिछाने के लिए क्यों पूर्व कांग्रेसी नेताओं की तरह आत्मघाती भूल कर रहे है। वीरभद्र देश के उन चंद वर्तमान नेताओं में से एक है जिनका सम्मान जनता ही नहीं उनके विरोधी राजनेता हिमाचल व देश में भी करते है। यही नहीं वे ही देश में हिमालयी राज्यों की समस्याओं के निदान व वहां पर विकास की गंगा कैसे बहायी जाय इसके लिए सबसे योग्य राजनेता, प्रशासक व जमीनी नेता है। यह भी सच है कि आज वीरभद्र भाजपा के ही नहीं अपनों के भी चक्रव्यूह में बुरी तरह फंेसे हुए है। चुनावी रणभेरी भी बजने वाली है और न्यायालय से उनके खिलाफ सजा भी सुनायी देने वाली है। हालांकि वीरभद्र इस23 साल पुराने  मामले को भाजपा द्वारा फर्जी वाद बनाने का आरोप लगा रहे है। परन्तु अगर सज में वीरभद्र ने भ्रष्टाचार किया तो उनको सजा तो होनी ही चाहिए परन्तु उन्होंने हिमाचल के विकास के लिए इतना कार्य किया, उनके बेदाग राजनैतिक जीवन को देख कर सहज ही विश्वास नहीं आता। परमात्मा दुध का दुध व पानी का पानी करे। जो भी गलत कार्य करे उसको सजा हर हाल में मिले चाहे वह कोई भी क्यों न हो। हाॅं हिमाचल में उनके कार्यो को देख कर मुझे आशा है कि जनता उनको एक ही सजा दे वह हिमाचल को और विकास के पथ पर अग्रसर करने के लिए प्रदेश की सरकार संभालने की सजा।
आज जिस प्रकार से जमीनी राजनीति व हिमाचल के विकास की गाथा से अनविज्ञ टीम अण्णा के सिपाहेसलार हिमाचल में प्रचार करने में लगे है अगर दिल्ली दरवार के कांग्रेसी तिकडमियों ने वीरभद्र की राह में कांटे बिछाने का काम नहीं किया तो उत्तराखण्ड की तरह हिमाचल में भी टीम अण्णा को ही नहीं बाबा रामदेव को भी मुंह की खानी पडेगी। मुझे यह जान कर अफसोस होता है कि जमीनी नेताओं की जड़ों में मट्ठा डालने का काम उत्तराखण्ड की तरह हिमाचल में करने की जानबुझ कर भूल कांग्रेस आलाकमान सोनिया गांधी व राहुल गांधी क्यों करने दे रहे है। एक बात जो हिमाचल की ही नहीं दिल्ली के राजनैतिक गलियारों में कई सालों से गूंज रही हे कि अगर हिमाचल प्रदेश में कांग्रेस तभी सत्तासीन हो सकती है जब वह प्रदेश चुनाव की कमान वीरभद्र के हाथों में पूरी तरह से सोंप कर उनको ही चुनाव के बाद मुख्यमंत्री बनाने का ऐलान करे। परन्तु लगता है दिल्ली दरवार के नेताओं के अपने स्वार्थ प्रदेश व पार्टी के हितों से बढ़कर होते हैं वे उत्तराखण्ड की तरह पूरे देश में ऐसे नेताओं को शासन प्रसासन की कमान सोंपते हैं जिनको न प्रदेश व नहीं देश का कहीं दूर तक भान होता है। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह व मोंटेक सिंह आलुवालिया इसी मानसिकता का द्योतक है। वीरभद्र कांग्रेस के ही नहीं अपितु देश के सबसे अनुभवी व विकास के लिए समर्पित नेताओं में जाने जाते है। अगर उनकी सलाह पर उत्तराखण्ड के प्रथम मुख्यमंत्री स्वामी जरा भी अमल करते तो उत्तराखण्ड भी हिमाचल की तरह आज विकास व सुशासन की कुचालें भरता नजर आता परन्तु दुर्भाग्य है दिल्ली दरवार के संकीर्ण नजरिया वाले उत्तराखण्ड के अब तक के भाजपा व कांग्रेसी मुख्यमंत्रियों ने उत्तराखण्ड में हिमाचल की तरह विकास की नींव रखने व यहां के संसाधनों की रक्षा करने के बजाय यहां के संसाधनों को अपने आकाओं व अपने राजसी ठाठ में ही लुटवाने का काम किया। आज हिमाचल की कोई भी सरकार रहे उसके मंत्री या विधायक या नौकरशाह उत्तराखण्ड के नेताओं व नौकरशाहों की तरह दिल्ली के लिए अंधी दौड लगा कर प्रदेश के संसाधनों को लुटवाते नहीं देखे जा सकते है। यही नहीं उत्तराखण्ड प्रदेश की तरह हिमाचल प्रदेश में दिल्ली दरवार के संकीर्ण नेताओं के प्यादों को प्रदेश में संवैधानिक पदों पर आसीन करके प्रदेश की संस्थानों का तबाह करने का काम ही किया जाता। इसी कारण दिल्ली दरवार के नेता चाहे भाजपा हो या कांग्रेस देश में किसी जमीनी नेता को मुख्यमंत्री या केन्द्र में मंत्री बनाने के बजाय अपने जनाधार बिहिन हवाई प्यादों को महत्वपूर्ण पदों में आसीन कर उस प्रदेश या मंत्रालय का जम कर दोहन करते है। इसी कारण आज उत्तराखण्ड देश के सबसे भ्रष्टतम राज्यों में मात्र राज्य गठन के दस साल में बन कर अपने भविष्य को तबाह होते देख कर आंसू बहा रहा है। शेष श्रीकृष्ण कृपा। हरि ओम तत्सत्। श्रीकृष्णाय् नमो।

Thursday, June 21, 2012


कश्मीर समास्या के तीन महत्वपूर्ण समाधान
कश्मीर में भारत व भारतीय झण्डे का जो अपमान होता है और जिस प्रकार से वहां पर भारत विरोधी ही नहीं देशद्रोही सरेआम देश की सम्पति को नुकसान पंहुचाते हुए हिंसा फेलाते और राष्ट्रीय झण्डे को ही नहीं भारतीय संस्कृति को सरेआम कलंकित करने का दुशाहस करते हैं, उसके लिए आतंकवादी, व इन दहशतगर्दो को भारत विरोधी कृत्यों को करने के लिए शर्मनाक संरक्षण देने वाले पाक व अमेरिका से भी अधिक गुनाहगार भारत के नपुंसक सरकारें रही। सरकार चाहे कांग्रेस गठबंधन के मनमोहन सिंह रहे या संघ पोषित भाजपा नेता अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली राजग गठबंधन की रही हो या अन्य दलों की। दो दशकों में भारत की सरकारें इतनी नपुंसक हो गयी कि वह देश के हितों की रक्षा के बजाय अमेरिका के इशारे पर कश्मीर में भारतीय हितों को सरेआम रौंदने वाले कश्मीरी आतंकियों का सफाया करने के बजाय उनसे नपुंसकों की तरह वार्ता आदि का नाटक कर रहे है। कश्मीर समस्या का पहला समाधान यह है कि जम्मू कश्मीर प्रदेश को जम्मू, कश्मीर व लद्दाख तीन राज्यों में विभाजित करके किया जा सकता है । इसका दूसरा समाधान कश्मीर में धारा 370 को समाप्त करने के साथ पाकिस्तान के तमाम आतंकवादी अड्डों का सफाया करने के साथ पाक अधिकृत कश्मीर का सेना के हस्तक्षेप के दम पर भारत हासिल करने का है। इसका तीसरा और अंतिम समाधान है कश्मीर में सीमान्त क्षेत्र में इस्राइल व चीन द्वारा अपने अशांत प्रांतो में या तो भूमिहीन देशभक्तों या सेना से सेवानिवृत पूर्व सैनिकों को उचित सुविधा दे कर यहां पर बड़ी संख्या में बसा कर कश्मीर में फैले आतंक को परास्त किया जाय। परन्तु जिस प्रकार से अमेरिका के दवाब में मनमोहन सरकार जिन वार्ताकारों की रिपोर्ट के अधार पर अगर कोई आत्मघाती समाधान खोज कर सदरे रियासत व वजीरे आजम आदि जैसे आदम युग में लोटने व कश्मीर को अधिक स्वायतता देने का कोई कार्य किया तो कश्मीर सदा के लिए भारत के हाथों से लुट जायेगा। परन्तु देश का दुर्भाग्य है कि देश की सरकारे व राजनैतिक दल देश हित के बजाय अपने दलीय हित व सत्ता प्राप्ति के लिए अंध तुष्टीकरण कर देश की एकता पर अपने स्वार्थो का बज्रपात करता है। इसी कारण वोटों के मोह में आज कश्मीर ही नहीं आसाम व बंगाल के बाद अब उत्तराखण्ड को भी इसी दिशा में धकेलने का राष्ट्रघाती कृत सरकारी संरक्षण से शर्मनाक ढ़ग से किया जा रहा है। इस राष्ट्रघाती प्रवृति पर निकट भविष्य में अगर कठोरता से अंकुश नहीं लगाया तो वह दिन दूर नहीं जब पूरा भारत ही पाक की तरह आतंक की सबसे बड़ी फेक्टरी बन कर तबाह हो जायेगा।  

डिम्पल की तरह निर्विरोध चुनाव जीतने की विजय बहुगुणा की हसरत पर लगा ग्रहण


सितारगंज (प्याउ)। सितारगंज उपचुनाव में अंतिम दिन भाजपा, उत्तराखण्ड रक्षा मोर्चा, किसान मोर्चा व जवान किसान मोेर्चा के प्रत्याशियों सहित कई निर्दलीय प्रत्याशियों के नामांकन पत्र दाखिल करने के कारण सितारगंज उपचुनाव में प्रदेश के मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा की उप्र के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव की पत्नी डिम्पल यादव की तरह निर्विरोध ही उप चुनाव जीतने का कीर्तिमान स्थापित करने की हसरत पर ग्रहण ही लग गया। हालांकि मुख्यमंत्री के सिपाहेसलार इस दिशा मेें काफी प्रयास कर रहे थे कि मुख्यमंत्री विजय के खिलाफ कोई राजनैतिक दल अपना प्रत्याशी ही ना उतारें। निर्लदलीयों को उप्र के मुख्यमंत्री डिम्पल यादव के उपचुनाव में उठे निर्दलीय प्रत्याशियों को अपना नामांकन वापस करने के लिए मना लिया जाता। हालांकि इस बात के भी कई गुपचुप प्रयास भी किये गये कि भाजपा सितारगंज विधानसभा उप चुनाव में प्रदेश के मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा के खिलाफ भी डिम्पल यादव की तरह अपना प्रत्याशी ही चुनाव मैदान में न उतारें। यही अपेक्षा बहुगुणा समर्थकों की अन्य दलों से भी थी। इस दिशा में मुख्यमंत्री खेमें को काफी सफलता भी मिली इस सीट से सबसे मजबूत समझी जाने वाली बसपा ने भी अपना प्रत्याशी चुनावीं दंगल में न उतारा हालांकि उनके दिग्गज नेता नारायण पाल को कांग्रेस ने अपने समर्थन में खडा करके बसपा को प्रदेश में करारा झटका दे कर गठबंधन दलों में सेंध लगाने का कृत्य तक किया था। वहीं सपा के प्रत्याशी का यहां से चुनावी दंगल में न उतरने पर लोगों को किसी प्रकार का आश्चर्य तक नहीं हुआ। क्योंकि मुलायम व बहुगुणा परिवार का काफी घनिष्ट सम्बंध रहा है। वहीं प्रदेश में सपा के नेता के साथ विजय बहुगुणा की करीबी जगजाहिर है। इसके अलावा इस सीट से उक्रांद पी का चुनावी दंगल में न उतरना भले ही गठबंधन की मर्यादा का हवाला दे कर उत्तराखण्ड क्रांतिदल नेतृत्व बहुगुणा के समर्थन में अपना प्रत्याशी न उतार कर लोगों की जुबान बंद कराने की कोशिश कर रहा हो परन्तु जिस प्रकार से स्वयं उक्रांद ने भी विजय बहुगुणा के सितारगंज में शक्ति फार्म के बंगाली लोगों को भूमिधरी के पट्टे का वितरण अपनी चुनावी नैया को पार लगाने के लिए किया उसका उक्रांद ने केवल हवाई विरोध किया। अगर उक्रांद जरा सा भी ईमानदार होती या उसको उत्तराखण्ड के उन हितों की जरा सी भी चिंता होती तो वह चुनावी दंगल में उतरती। यही नहीं राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी ने भी यहां से अपना प्रत्याशी न उतार कर विजय बहुगुणा समर्थकों की यहां से निर्विरोध विजयी होने की मंशा को पंख अवश्य लगाये।
परन्तु विजय बहुगुणा खेमे को उस समय काफी करारा झटका लगा जब यहां से तमाम कोशिशों के बाबजूद भाजपा ने यहां पर अपना प्रत्याशी प्रकाश पंत के रूप में सितारगंज उप चुनाव में उतार दिया। वहीं सितारगंज विधानसभा में भारी संख्या में रहने वाला मुस्लिम समाज व कांग्रेस को समर्थन दे चूके नारायण पाल के सिपाहे सलार रहे किसान मुस्लिम नेता मजहर अहमद उर्फ मुन्ना भाई ने उत्तराखण्ड रक्षा मोर्चा के प्रत्याशी के रूप में पर्चा दाखिल किया। इसके अलावा निर्दलीय प्रत्याशी मोहम्मद असलम व मोबीन अली,जवान किसान मोर्चा के राजू मौर्य व उत्तराखंड परिवर्तन पार्टी के दीवान सिंह आदि ने पर्चा दाखिल कर विजय बहुगुणा समर्थकों की यहां से विजय बहुगुणा की निर्विरोध निर्वाचित होने आशाओं पर एक प्रकार से बज्रपात ही कर दिया। खासकर जिस उत्साह व जनसमर्थकों के साथ भाजपा प्रत्याशी वरिष्ठ भाजपा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष भगतसिंह कोश्यारी सहित तमाम वरिष्ठ नेता उपस्थित थे। हालांकि इस पर्दा दाखिली के अवसर पर भाजपाई प्रत्याशी प्रकाश पंत व कार्यकत्र्ताओं को मनोबल ऊंचा करने के लिए विधानसभा चुनाव में भाजपा के सुपर स्टार के रूप में प्रचारित किये गये पूर्व मुख्यमंत्री भुवनचंद खंडूडी नजर नहीं आये। गौरतलब है कि कांग्रेसी नेता विजय बहुगुणा व भाजपा नेता भुवनचंद खण्डूडी भले ही एक दूसरे के विरोधी दलों के नेता हों परन्तु उनके बीच ममेरे भाई का रिश्ता प्रदेश की राजनीति में एक नये ही समीकरण को हवा देने वाला अदृश्य गठबंधन कई चुनावों से देखने में आ रहा है। परन्तु इस बार जिस प्रकार से विजय बहुगुणा ने भाजपा के विधायक को तोड़ कर ही भाजपा को खुली चुनौती दी उसके बाद केन्द्रीय नेतृत्व के साथ प्रदेश भाजपा की भृकुटी तननी स्वाभाविक थी। इसी के कारण प्रदेश के तमाम कार्यकत्ताओं की पुरजोर मांग थी कि मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा के खिलाफ हो रहे उपचुनाव में चाहे मुख्यमंत्री जिस सीट पर से ही लडे वहां से भाजपा नेता भुवनचंद खण्डूडी को चुनावी मैदान में उतर कर भाजपा में सेंघ लगाने का विजय बहुगुणा को सबक सिखाना चाहिए था। परन्तु गलता है कि कोटद्वार में मिली खंडूडी को करारी हार के सदमें से अभी भाजपा नेतृत्व नहीं उबर पाया है। नहीं खंडूडी ही इतना साहस ही जुटा पाये कि वे बिजय बहुगुणा के खिलाफ चुनावी दंगल में उतर कर भाजपा में सेंघ मारने की कांग्रेस के कृत्य का मुंहतोड़ जवाब तक दे पाये। हालांकि इन सबके बाबजूद आज के दिन ऐसा लग रहा है कि यहां पर चुनावी जंग में विजय बहुगुणा ही विजय होंगे परन्तु उनके रणनीतिकारों की निर्विरोध चुनाव जीतने की हसरत पर इस सीट से तमाम कोशिशों के बाबजूद कई उम्मीदवारों का चुनावी दंगल में उतरने से ग्रहण लग ही गया। हो सकता है इनमें कुछ प्रत्याशियों का नामांकन रद्द हो या कुछ को बहुगुणा के समर्थन में बिठाने में बहुगुणा के समर्थक सफल रहे परन्तु जिस प्रकार से एक दर्जन से अधिक प्रत्याशियों ने विजय बहुगुणा के समर्थन में अपना नामांकन किया उसके बाद भले ही चुनाव परिणाम में कोई बडा उलट फेर होने की संभावना न भी दिखाई दे परन्तु कांग्रेसी प्रत्याशी की तरफ एक तरफा चुनावी दंगल के बाबजूद कांग्रेस के नेताओं की एक दूसरे को नीचा दिखाने के लिए चल रहे घात प्रतिघात भरी राजनीति विधानसभा चुनाव की तरह इस चुनाव में भी चैकांने वाले परिणाम भी ले आये तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए। परन्तु एक बात साफ हे कि इस सीट से निर्विरोध चुनाव जीतने की हसरत पूरी न होने का मलाल स्वयं मुख्यमंत्री व उनके समर्थकों को रहेगा

Tuesday, June 19, 2012


दंगाईयों से कठोर व निष्पक्ष ठंग से निपटे अखिलेश सरकार


उत्तर प्रदेश के मथुरा के समीप लगे कोसीकलां में 1 जून को हुए साम्प्रदायिक दंगों की रोकथाम व दोषियों को दण्डित करनेे तथा आम जनता को निष्पक्ष शासन देने में प्रदेश की अखिलेश यादव की सरकार विफल रही है। इसके बाद वहां पर आक्रोशित दोनों समाजों के बीच आपसी विश्वास जागृत करने में भी शासन अभी तक नकाम रहा । यह दंगा अखिलेश यादव के मुख्यमंत्री बनने के बाद उनकी निष्पक्षता की एक परीक्षा थी। शासन प्रशासन को चाहिए था कि वह दलीय संकीर्णता से उपर उठ कर जो भी समाज की शांति भंग करने की कोशिश करता है उसको सख्त से सख्त सजा दे। जिस प्रकार से समाचार पत्रों व फेस बुक में खबरें आ रही है उससे लगता है कि प्रदेश सरकार खुद ही कटघरे मे खड़ी लगती है। प्रशासन को चाहिए कि जो भी निर्दोष व्यक्तियों की सम्पतियों को दंगाईयों ने नुकसान पंहुचाया उसको मुआवजा प्रदान करे। समाज में ऐसे तत्वों जिनके कारण यह दंगा हुआ या जिन्होंने जनता को उकसाया उनको सजा देनी चाहिए। इसके साथ इन दंगा पीड़ित क्षेत्रों में किसी भी कीमत पर सम्प्रादायिकता को भडकाने के लिए कुख्यात नेताओं या व्यक्तियों को प्रवेश करने की इजाजत नहीं देनी चाहिए। इसके साथ प्रशासन को इस दंगे के कारणों का विशलेषण करके भविष्य में हर हाल में इनमें प्रतिबंध लगाने के लिए कड़े कदम उठाने चाहिए। इसके साथ प्रशासन को राहत सामाग्री के वितरण व अवैध हथियारों को जब्त करने के कार्य में किसी प्रकार भेदभाव नहीं अपनाना चाहिए और ऐसे तत्वों पर निगरानी रखने के लिए इस संवेदनशील क्षेत्र में महत्वपूर्ण स्थानों पर खुफिया केमरे लगाने चाहिए जिससे प्रदेश के अमन चैन पर कलंक लगाने वाले असामाजिक तत्वों पर प्रशासन बिना पक्ष पात के अंकुश लगा कर प्रदेश में भयमुक्त राज्य स्थापित कर सके। मुख्यमंत्री अखिलेश से प्रदेश की जनता को काफी आशा है उनको चाहिए कि वे अपने दल व शासन में समाज के अमनचैन को ग्रहण लगाने वाले लोगों को भी ऐसे क्षेत्रों से दूर रखना चाहिए। प्रदेश या देश में जो भी व्यक्ति जाति, धर्म, क्षेत्र आदि के नाम से पक्षपाती शासन प्रशासन चला कर प्रदेश की अमन चैन पर ग्रहण लगाने का काम करेगा तो भगवान ही नहीं देश प्रदेश की जनता भी ऐसे व्यक्ति को कभी माफ नहीं करेगी। दंगो में हमेशा बेगुनाह लोग ही न केवल पीड़ित होते है अपितु वे ही मारे जाते है । दंगाईयों का कोई धर्म नहीं होता है अपितु वे मानवता के नाम पर कलंक ही होते है। इन दंगो से हमेशा देश, समाज व मानवता ही शर्मसार ही नहीं अपितु कमजोर ही होती है। इसलिए सभ्य समाज में दंगा होना ही उस समाज के मानसिक दिवालियेपन की पहचान है।

शंकराचार्य स्वरूपानन्द के गंगा आंदोलन से कांग्रेस सरकार में हडकंप

संसद की चैखट पर उत्तराखण्ड में गंगा में बन रहे अंधाधुंध बांध पर गरजी सुशीला भण्डारी



नई दिल्ली। (प्याउ)। संघ व विश्व हिन्दु परिषद समर्थित भाजपाई नेतृत्व वाले रामजन्म भूमि आंदोलन सहित कई आंदोलनों में कांग्रेस की ढाल बन कर रक्षा करने वाले देश के वयोवृद्ध शंकराचार्य स्वरूपानंद जी महाराज का लगता है कांग्रेसी सरकार से मोह भंग हो गया है। वे गंगा की दुर्दशा को सुधारने के बजाय गंगा पर अनैक बांध बनाने में उतारू कांग्रेसी सरकार से इतने आक्रोशित है कि अपनी बुजुर्ग उम्र व भरी दोपहरी को नजरांदाज करते हुए वे संसद की चैखट जंतर मंतर पर बीच सडक में धरने में बैठ कर आंदोलन का शंखनाद कर गये। शंकराचार्य के इस आक्रोश से सरकार ही नहीं कांग्रेसी नेताओं में हडकंप मचा हुआ है। आजादी के बाद अब तक कांग्रेस से सहानुभूति रखने वाले देश के वरिष्ठ शंकराचार्य स्वरूपानन्द द्वारा गंगा पर बांध बनाने के लिए उतारू कांग्रेसी सरकार के कार्यो से आक्रोशित हो कर राष्ट्रीय धरना स्थल जंतर मंतर पर तपती दोपहरी में हजारों साधु संतो व गंगा भक्तों के साथ संसद की चैखट पर धरने पर बैठ गये। स्वयं स्वतंत्रता सैनानी रहे द्वारिका पीठ के शंकराचार्य वयोवृद्ध शंकराचार्य का कांग्रेस में कितना प्रभाव है इसका नजारा धरना स्थल पर साफ दिखाई दिया। जिस मंच पर खुले आम कांग्रेस को भारतीय संस्कृति के मूल प्राण गौ, गंगा व गीता को रौंदने का दोषी बता कर घोर निंदा की जा रही थी उसी मंच पर कांग्रेस के सबसे विवादस्थ दिग्गज नेता दिगविजय सिंह भी शंकराचार्य स्वरूपानन्द के चरणों में मंच में आसीन थे। भले ही उन्होंने इस मंच से कोई सम्बोधन नहीं किया परन्तु उनकी उपस्थिति मात्र ही पूरी कहानी को बयान कर रही थी। इस आंदोलन को गंगा मुक्ति संग्राम बता कर द्वारिका वज्योतिष पीठाधीर जगदगुरु शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद जी महाराज ने अफसोस जताया कि जब स्वयं पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने अपनी धर्मपत्नी सोनिया गांधी के साथ कुम्भ में स्नान करने के अवसर पर उनसे गंगा को निर्मल बनाने का वचन दिया था, परन्तु उनकी धर्मपत्नी सोनिया गांधी की सरकार आज राजीव गांधी के संकल्प को भी पूरा नहीं कर रही है। शंकराचार्य की इस टिप्पणी पर उनके चरणों में बेठे कांग्रेसी दिग्गज दिगविजय सिंह निर्विकार निगाहें नीचे करके ही बेठे रहे। शंकराचार्य ने आश्चर्य प्रकट किया कि गंगा उत्तराखंड की ही नहीं अपितु राष्ट्रीय नदी है और गंगा की रक्षा के लिए प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में अलग से मंत्रालय बनाना चाहिए, जिसके अंर्तगत गंगा की दिन-रात निगरानी की जानी चाहिए। शंकराचार्य ने कहा कि यदि सरकारी जांच एजेंसी ‘कैग’ की रिपोर्ट देखें तो लगता है गंगा अपने आपातकाल से गुजर रही है। गंगा की इस दशा के लिए प्राथमिकता के आधार पर कार्रवाई करने की जरूरत है।  शंकराचार्य ने गंगा बचाने के लिए आंदोलन तेज करने का भी ऐलान किया। इसके अलावा उन्होंने हरिद्वार में संतों के आश्रमों सहित बदरीनाथ, केदारनाथ, गंगोत्री, यमुनोत्री व हेमकुण्ड में जल संसोधन संयंत्र लगा कर गंगा को दुषित होने से बचाने की जरूरत पर भी बल दिया। हालांकि इस आयोजन में भाजपा समर्थित गंगा बचाओं आंदोलन के संत नहीं दिखाई दिये न हीं इसमें गोविन्दाचार्य, गंगा महासभा व इस आंदोलन से जुड़े लोग ही दिखाई दिये। इसके बाबजूद इस आंदोलन के प्रति आम जनता की सहमति को कोई व्यक्ति नहीं नकार सकता है।
हालांकि इस मंच पर रामजन्म भूमि की सबसे दिग्गज भाजपा नेत्री उमा भारती  ने भी अपना सम्बोधन किया। उनके साथ भाजपा नेता विजय कुमार मल्होत्रा ने भी इस अभियान को अपना पूरा समर्थन दिया। हालांकि न तो उस समय शकराचार्य स्वरूपानन्द जी ही उपस्थित थे व नहीं दिगविजय ही । दोनों 4 बजे के बाद मंच पर उपस्थित हुए। वहीं इस मंच पर जहां उदघोषक व हर वक्ता गंगा की धारा को अविरल, निर्मल तथा आचमन लायक बनाने की मांग कर रहा था । वहीं इस अभियान में का शुभारंभ गांधी की समाधि का जलाभिषेक करने व सर्वधर्म सभा करने के बाद, यहां से 6 किमी दूर जंतर मंतर तक पदयात्रा करके हुई। इसमें लोग ‘अविरल गंगा, निर्मल गंगा हमें चाहिए कल-कल गंगा.’ का नारा लगा कर गंगा की जय जय कार हर हर गंगे करके कर रहे थे।  राजघाट से जंतर मंतर तक साढ़े छह किलोमीटर की दूरी तय करने के दौरान संतों को लोगों का भारी समर्थन मिला। इस सभा में जहां सभी धर्मो के आचार्य थे वहीं इस सभा में कांग्रेस, भाजपा, समाजवादी पार्टी, भारतीय किसान यूनियन के नेता भी गंगा को प्रदूषण मुक्त बनाने के लिए संतों के साथ मंच पर आए। वक्ताओं में सबसे ज्यादा लोग भीष्म पितामह के किरदार मुकेश खन्ना के डायलोगों पर ताली बजाते देखे गये। इस सभा में जहां भजन गायक  संगीतकार लखविंदर सिंह लक्खा ने अपने गंगा भजनों से समारोह की समा ही बांध दी। वहीं  बाबा रामदेव के आंदोलन में प्रमुख भागेदारी निभाने वाले भाषा के पूर्व सम्पादक वेद प्रताप वैदिक ने इस आंदोलन को देश का सबसे बडा आंदोलन बताया। वहीं इस आंदोलन में उत्तराखण्ड में बांधों के विरोध में केदारघाटी बचाओं आंदोलन में 65 दिन की जेल की सजा काट कर आयी उत्तराखण्ड को बांधों से मुक्त करने के संकल्प के लिए समर्पित गोरा देवी के तुल्य ‘सुशीला भण्डारी ने अपने औजस्वी भाषण में जहां उत्तराखण्ड में बांध बनाये जाने से यहां के जन जीवन में हो रही भारी तबाही को बयान करते हुए उत्तराखण्ड व भारत को बचाने के लिए इस इन विनाशकारी बांधों पर रोक लगाने का आवाहन किया।  मंच का संचालन शंकराचार्य के आगमन से पूर्व आंदोलन के प्रमुख सुत्र धार जल विरादरी के राजेन्द्रसिंह, प्रमोद कृष्णन् जी महाराज, व हिन्दू महासभा के चक्रपाणी महाराज ने संयुक्त संचालन किया।  वहीं शंकराचार्य की आगमन के बाद मंच का संचालन शंकराचार्य के शिष्य ने ही किया। इसमें अपने उदबोधन करने वालों में परमार्थ आश्रम के प्रमुख, कालिकापीठ के महामण्डलेश्वर
महंत सुरेन्द्र, ओलिया के मजार से आये मुस्लिम सुफी संत, बनारस से आये हिन्दु मुस्लिम गंगा भक्त, भाजपा विधायक महेश शर्मा, कांग्रेसी नेता किशोर उपाध्याय आदि प्रमुख थे। इसमें बड़ी संख्या में गंगा भक्तों ने भाग लिया। इसमें प्रमुख लोगों में उत्तराखण्ड राज्य गठन आंदोलन के प्रमुख संगठन उत्तराखण्ड जनता संघर्ष मोर्चा के देवसिंह रावत, महासचिव जगदीश भट्ट, अग्रणी पत्रकार विजेन्द्रसिंह रावत, समाजसेवी ओमवीर तोमर सहित सेकडों की संख्या में महिलाये भी सम्मलित थी।

आलू गोबी की तरह उत्तराखण्ड में नेताओं की मंडी सजने की खबरों से जनता स्तब्य

भाजपा का षडयंत्र या कांग्रेस की चाल है भीम आर्य प्रकरण


घनसाली(प्याउ)। भले ही चंद दिनों के लिए अचानक रहस्यमय ढ़ग से भाजपा सहित तमाम नेताओं से अपने सम्पर्क काट कर अज्ञातवास में चले गये घनसाली विधानसभा सीट से भाजपा विधायक भीम लाल आर्य ने उनके कांग्रेस में सम्मलित होने की खबरों को सिरे से नकारते हुए दो टूक शब्दों में कहा कि ‘मैं आलू-टमाटर नहीं जिसे खरीदा-बेचा जा सके । श्री आर्य ने एक सप्ताह तक रहस्यमय ढ़ग से अज्ञातवास में रहने के बाद जिस प्रकार से अचानक अपने आवास घनसाली में प्रकट होने के बाद उसी दिन 18 जून को भाजपा नेता भुवनचंद खंडूडी से मिलने उनके आवास देहरादून में पंहुच कर अपने को भाजपा का अनुशासित सिपाई होने के खुद ही कसीदे पढ़ने लगे। वहीं प्रदेश के मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा ने इस पूरे प्रकरण के लिए भाजपा को ही गुनाहगार बताया। उन्होंने आरोप लगाया कि भाजपा ने उनकी सरकार को बदनाम करने के लिए इस प्रकार के औच्छे हथकण्डे अपना रही है।
सितारगंज के भाजपा विधायक के कांग्रेस में सम्मलित होने के बाद घनसाली से भाजपा के विधायक के रहस्यमय ढ़ग से गायब रहने व उसके बाद सितार गंज से कांग्रेसी मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा के समर्थन में अपना प्रत्याशी खड़ा न करने के लिए भाजपा अध्यक्ष को लिखे गये उनके तथाकथित पत्र के समाचार पत्रों के कार्यालय में पंहुचने तथा उसके बाद यकायक प्रकट हो कर भाजपा के अनुशासित सिपाई होने की भाजपा विधायक भीम लाल आर्य के पूरे प्रकरण ने प्रदेश की राजनीति को पूरी तरह से बेनकाब कर दिया। लोगों के दिलों में यह बात घर बना रही है कि इस प्रदेश में भाजपा कांग्रेस ही नहीं सभी दलों के नेता एक ही थाली के बेंगन हैं, इनको उत्तराखण्ड के हक हकूकों व जनहितों से कुछ नहीं लेना इनको केवल सत्ता चाहिए चाहे उसके लिए उत्तराखण्ड को ही दाव पर क्यों न लगाना पडे।
जिस प्रकार से सितारगंज के भाजपा विधायक की खरीद परोख्त की खबरें व आरोप भाजपा सहित अन्य लोग लगा रहे हैं उसके बाद जिस प्रकार से भाजपा के कई विधायक खुद भाजपा नेताओं की नजर में कांग्रेस से सम्पर्क करने के लिए संदेह के घेरे में आ गये। इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि भाजपा का अपने विधायकों पर विश्वास नहीं रहा। एक प्रेस वार्ता में जब एक भाजपा के नेता ने भाजपा विधायकों के कांग्रेस में जाने की अटकलों पर प्रतिक्रिया पूछी तो मंडल प्रकरण के बाद भीम लाल आर्य की घटना तथा इसके अलावा कई अन्य भाजपा विधायकों के कांग्रेस के सम्पर्क में होने की खबरो ंपर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए भाजपा के वरिष्ट नेता ने खीज कर कहा कि अगर कोई आत्महत्या करने को उतारू ही हो तो उसको केसे बचाया जा सकता है। वहीं भाजपा ने किरण मण्डल प्रकरण में हुई खरीद फरोख्त की निष्पक्ष जांच सीबीआई से कराने के लिए प्रदेश के राज्यपाल को भी इसी सप्ताह ज्ञापन दिया था।
इस पूरे प्रकरण पर नजर दोड़ाने से साफ हो गया कि प्रदेश में विजय बहुगुणा के शासनकाल में जो खरीद फरोख्त का वातावरण बन रहा है उससे प्रदेश के तमाम जागरूक जनता स्तब्ध है। सितारगंज में हुई भारी खरीद फरोख्त की जो खबरे रह रह कर समाचार पत्रों में सियासी दलों व इस प्रकरण से जुडे लोगों के द्वारा एक दूसरे पर लगाया जा रहा है उसको सुन कर प्रदेश की जनता में भारी आक्रोश है जनता को समझ में नहीं आ रहा है कि क्या विजय बहुगुणा अपनी कुर्सी के खातिर प्रदेश की राजनैतिक गंगा को इतना दूषित कर देंगे कि प्रदेश गोवा व झारखण्ड की तरह आया राम गया राम की कहानी दोहराते हुए भ्रष्टाचार के कलंक को प्रदेश के माथे पर लगाये।
प्रदेश के मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा व उनके सिपाहे सलारों की राजनीति पर पैनी निगाह रखने वाले राजनैतिक समीक्षकों का अनुमान है विजय बहुगुणा अपनी सरकार पर अपने दलीय विरोधी व गठबंधन की बैशाखियों के भरोसे चलाने के बजाय खुद कांग्रेस के बहुमत से सरकार चलाना चाहते है। इसी लिए वे आधा दर्जन भाजपा विधायकों को कांग्रेस के सम्मलित करा कर उनको फिर से नया जनादेश हासिल कराकर कांग्रेसी बहुमत से सरकार चलाने को श्रेयकर समझते है। ऐसा ही आरोप भाजपा व खुद कांग्रेसी प्रतिद्वंदी भी आपसी गुपचुप बैठकों में प्रदेश सरकार पर लगा रहे है। मुख्यमंत्री की कार्यशैली से जनता ही नहीं भाजपाई ही नहीं उनके दलीय विरोधी भी भौचंक्के है।
इस प्रकरण से एक बात भी सामने आ रही है वह यह है कि भाजपा जिस प्रकार से कांग्रेस पर अपने विधायकों पर डोरे डालने का आरोप लगा रही है और सितारगंज प्रकरण के बाद अचानक हुए घनसाली प्रकरण से प्रदेश की जनता में कांग्रेस के प्रति एक आक्रोश उमड़ने लगा है। इसको भांपते हुए कांग्रेस ने हो सकता है सितारगंज उपचुनाव के परिणाम आने तक अपने भाजपा तोड़ा अभियान स्थगित कर दिया हो। इस अभियान में तेजी हो सकता है सितारगंज उप चुनाव के परिणाम के बाद आये। अभी भाजपा भी आंदोलित है। परन्तु इस सच्चाई से भाजपा नेता भी नहीं नकार पा रहे हैं कि उनके कई विधायक कांग्रेसी नेताओं के इस मोहपाश में बंधे हुए है। अब पूरी गेंद मुख्यमंत्री के पाले में है कि वह कब इन भाजपाई विधायकों को कांग्रेस में सम्मलित करने को हरि झण्डी दे रहे है। लोग हैरान है कि प्रदेश में आलू गोवी की मंडी की तरह विधायकों की मंडी सजी है। सच्चाई क्या है यह तो कुछ महिनों बाद साफ हो जायेगा। परन्तु किरण मंडल प्रकरण के बाद भीम लाल आर्य प्रकरण ने प्रदेश के लोग इस प्रश्न से स्तब्ध है कि आलू गोबी की तरह नेताओं की मंडी सजाने वाले प्रदेश व जनहित का क्या भला करेंगे। भले ही भाजपा व कांग्रेस एक दूसरे नेता बेशर्मो की तरह अपने दामन साफ बतायें परन्तु ये जो प्रकरण घटित हो रहे हैं वह स्वयं चीख चीख कर इस सच्चाई को जगजाहिर करके इनके मुखोटों को बेनकाब कर रहे है।
 

सितारगंज में भाजपा व उक्रांद के शर्मनाक समर्पण से हैरान लोग


देहरादून।(प्याउ)। जिस प्रकार से सितार गंज विधानसभा उप चुनाव के दंगल मुख्यमत्री विजय बहुगुणा के खिलाफ चुनावी मैदान में अपने प्रत्याशी न उतारने की सपा, बसपा व राकांपा की घोषणा को प्रदेश की जनता ने  सामान्य घटना मान कर नजरांदाज कर लिया। परन्तु जिस प्रकार ने भाजपा ने यहां पर कई दिनों बाद प्रकाश पंत को यहां से चुनावी जंग में उतारा और उक्रांद पी ने जिस प्रकार गठबंधन धर्म की दुहाई दे कर यहां पर बहुगुणा का समर्थन करने की बात कह कर अपना प्रत्याशी चुनावी दंगल में न उतारने की घोषणा की उससे लोगों को गहरा धक्का लगा। खासकर जिस प्रकार से मुख्यमंत्री ने भाजपा के विधाकय को यहां से तोड़ा और जिस प्रकार से कांग्रेस भाजपा के अन्य विधायकों पर डोरा डाल रही है उसको देख कर भाजपा से यहां पर मजबूत प्रत्याशी उतारने की आशा प्रदेश की आम जनता ही नहीं राजनैतिक समीक्षक भी कर रहे थे।  वहीं उक्रांद जिस प्रकार से सितारगंज में मुख्यमंत्री द्वारा बंगाली समुदाय को थोक के भाव से भूमिधरी के पट्टे नवाजने का विरोध कर रहा है उसको देख कर उत्तराखण्ड की जनता को आशा थी कि उक्रांद जनभावनाओं का सम्मान करते हुए यहां पर चुनाव के मैदान में जरूर उतरेगी। परन्तु उक्रांद ने जनभावनाओं को नजरांदाज करके जीस प्रकार सितारगंज चुनाव से पीठ दिखाने का काम किया उससे उत्तराखण्ड के हितों के लिए संघर्ष करने वाली जनता की आशाओं में बज्रपात हुआ।
 भाजपा को चाहिए था कि यहां पर वह यहां के मजबूत जमीनी नेता को उतारते। उसने अपनी लापरवाही से बसपा से निष्काशित नेता नारायण पाल को भी अपने पाले में ला कर चुनावी दंगल में नहीं उतार पाये। वह यहां से खण्डूडी जरूरी के नारे में करोड़ो रूपये पानी की तरह बहाने के बाबजूद सितारगंज से न तो अपने महानायक खंडूडी को ही चुनावी दंगल में उतार पाये व नहीं कोश्यारी को। यही नहीं यहां से वे इस क्षेत्र के सांसद रह चूके बलराज पासी को चुनावी दंगल में उतारते तो लोगों को जरा नाम से जानने को मिलता। परन्तु प्रकाश पंत का यहां से उतारना केवल एक प्रकार से भाजपा का शर्मनाक आत्म सम्र्पण ही समझा जाता। इस प्रकरण से साफ हो गया कि भाजपा ने लोकसभा चुनाव की तरह यहां भी विजय बहुगुणा को अपने हाथों से विजयश्री की माला पहनाने की व्यवस्था कर दी। इससे प्रदेश की जनता हैरान है।
निर्णायक संख्या में विस्थापित बंगाली व मुस्लिम मतदाताओं वाली इस सितारगंज विधानसभा सीट में  कुल 91480 मतदाताओं में से  48966 पुरुष व 42514 महिला है। वर्तमान विधानसभा चुनाव में इस विधानसभा में भाजपा के किरन चन्द मंडल 29280 मत लेकर विजयी रहे थे, वहीं  दूसरे नम्बर पर बसपा के नारायण पाल को 16668 मत, कांग्रेस के सुरेश कुमार को 15560, निर्दलीय अनवार अहमद को 7085, समाजवादी पार्टी के विनय कृष्ण मंडल को 1456, निर्दलीय ईश्वरी प्रसाद को 1338, इंडियन जस्टिस पार्टी के हरचरण सिंह को 841, पीस पार्टी के सरताल अली को 667, उक्रांद(पी) के शाहीन खान को 393, लोक जनशक्ति पार्टी के बच्चन सिंह को 294 व शिव सेना के राम चन्द्र को 238 मत मिले थे। इस कारण यहां पर भाजपा का तो जनाधार माना जा सकता है परन्तु उक्रांद का नाम मात्र। भाजपा का समर्थन से विजयी किरण मण्डल की बंगाली विस्थापितों की अधिकांश वोट इस समय कांग्रेस को जाने की आश से यहां पर कांग्रेस का विजय होना तय माना जा रहा है।

Sunday, June 17, 2012


सादगी मनाया भगतसिंह कोश्यारी ने अपना 70 जन्म दिवस 


नई दिल्ली(प्याउ)। भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष व उत्तराखण्ड के पूर्व मुख्यमंत्री भगतसिंह कोश्यारी को 17 जून को उनके 70 वें जन्म दिवस पर उत्तराखण्ड के राज्यपाल सहित उनके समर्थकों ने हार्दिक बधाई दी। हालांकि संघ से ताउम्र जुडे हुए प्रदेश के सबसे जमीनी व भाजपा नेता सांसद भगतसिंह कोश्यारी ने अपने जन्म दिन पर किसी प्रकार के समारोह का आयोजन करने के बजाय बिना किसी समारोह के अन्य दिनों की तरह जन कार्यो मे ंसमर्पित रह कर ही मनाया। सादा जीवन उच्च विचार व जीवन को माॅं भारती की सेवा में समर्पित करने के संकल्प को ताउम्र आत्मसात करने वाले भगतदा के नाम से अपने समर्थकों में जाने जाने वाले सांसद भगत सिंह कोश्यारी की गिनती आज उत्तराखण्ड के ही नहीं देश के उन चंद जमीनी नेताओं में होती है जो अपनी सादगी व जनसेवा के लिए जनता के लिए हर पल अपने घर के दरवाजे खुले रहते है। प्रदेश भ्में भाजपा के वर्तमान पतन के लिए प्रदेश के ही नहीं देश के वरिष्ट राजनेता ही नहीं अपितु आम जन भी साफ छवि के इस जनप्रिय कद्दावर नेता के बजाय जनता द्वारा नक्कारे गये नेताओं को प्रदेश में थोपने की भाजपा आला नेतृत्व की आत्मघाती भूल को ही जिम्मेदार मानते है।
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जंगली जानवरों द्वारा मारे जाने पर मिले कम से कम 5 लाख का मुआवजा

डीडीहाट क्षेत्र में मनखी बाघ द्वारा मारे गये व्यक्ति को दी केवल 5 हजार सहायता

पिथौरागढ़ (प्याउ)। सीमान्त जनपद पिथोरागढ़ में इस सप्ताह 35 वर्षीय एक व्यक्ति को मनखी बाघ ने अपना निवाला बना लिया और दो अन्य लोगों को घायल कर दिया। इस प्रकरण पर सरकार ने संवेदनहीनता दिखाते हुए केवल 5 हजार का मुआवजा दिया। इसी प्रकार की दुर्घटना से आये दिन उत्तराखण्ड के हर पर्वतीय जनपद के लागों को दो चार होना पड़ता है। परन्तु क्या मजाल सरकार को अपने दायित्व का जरा सा भी बोध हो। सरकार की इस संवदेनहीनता यहां के प्रबुद्ध लोगों को झकझोर कर रख दिया है। क्या आम उत्तराखण्डी की कीमत केवल 5 हजार रूपये ही हे। सरकार ने अभी तक प्रदेश में भले सड़क दुर्घटना या अन्य आपदाओं में काल कल्वित होने वाले लोगों को मुआवजे का एक समान नियम कानून नहीं बनाया है। परन्तु फिर भी सड़क दुर्घटना में एक डेढ़ लाख से 50 हजार तक मुआवजा की घोषणा सरकार करती नजर आती है। परन्तु जंगली जानवरों द्वारा मारे गये लोगों या घायल लोगों या इन जानवरों के निवाला बने पालतु पशुओं के मुआवजे के बारे में सरकार ने न तो अभी तक कोई नियम बनाया व नहीं अभी तक कोई सम्मानजनक मुआवजा का ही ऐलान किया। बिना नियम बनाये सरकार ने यहां के आम जनजीवन को बाघों, रीछो, हाथियों, जंगली सुअरों व अब बंदरों के रहमोकरम पर छोड़ दिया है। इन जीवों ने न केवल पर्वतीय जनों का जीवन पर ग्रहण लगा दिया है अपितु यहां की खेती व पालतु पशुओं को भी तबाह करके रख दिया है।
 भले ही उत्तराखण्ड राज्य गठन हुए 12 साल गुजर गये हैं परन्तु प्रदेश में अब तक की कांग्रेस व भाजपा की किसी भी सरकार ने यहां के ग्रामीणों के जीवन पर सरकार द्वारा संरक्षित हिंसक वन जीवों से आम आदमी को सुरक्षा देने के लिए कोई ठोस नियम नहीं बनाये है।  प्रदेश में आये दिन किसी न किसी जगह आम आदमी कहीं मनखी बाघ तो कंहीं जंगली सुअर, रीछ व हाथी आदि के हमले का शिकार हो कर दम तोड़ता रहता है। परन्तु क्या मजाल है प्रदेश की सरकार इस मामले में कोई ठोस नीति बनाये। नीति या नियम बनाना तो रहा दूर इस दिशा में अभी तक किसी भी सरकार ने ईमानदारी से सोचने तक की कोशिश तक नहीं की। सरकार यहां पर वन जीव संरक्षण कानून का सोटा तो बेशर्मी से  बेझिझक हो कर यहां के पीड़ित लोगो ंपर चलाती है परन्तु कभी यहां पर सत्तासीन सरकार ने इस दिशा में सोचने की पहल तक नहीं की कि अगर आम आदमियों को सरकार द्वारा संरक्षित वन जीव हमला करता है या मौत के घात उतारता है तो उसको इसका मुआवजा भी सम्मानजनक देने के साथ इस दुर्घटना के लिए जिम्मेदार उस रेंज के जिम्मेदार अधिकारियों पर क्या दण्ड दिया जाय।  प्रदेश पहले उत्तर प्रदेश जेसे विशाल प्रदेश का एक अंग था। उत्तर प्रदेश की सरकारों पर तो उत्तराखण्ड की जनसमस्याओं को ना समझ पाने का आरोप यहां के राजनेता ही नहीं प्रबुद्ध जन लगाते रहे। परन्तु राज्य गठन के बाद भी प्रदेश की सरकारों ने इस दिशा में सोचने तक की कोशिश तक नहीं की। केवल उत्तर प्रदेश के कानूनों का सोंटा ही उत्तराखण्ड में भी चलाते रहे।
सीमान्त जनपद पिथोरागढ़ के डीडीहाट तहसील के ग्रामीण क्षेत्रों में मनखी बाघ द्वारा एक 35 वर्षीय को खाने व दो पर हमला करने की घटना से लोग सहमे हुए है। वहीं वन विभाग ने इस घटना के बाद उपजे आक्रोश को शांत करने के लिए इस बाघ को पकड़ने के लिए पिंजरा लगाने का आदेश दे दिया है। सुत्रो ंके अनुसार घिंगतड़ गांव के तोक चलमोड़ी निवासी टीकाराम  सड़क निर्माण कार्य में मजदूरी कर 16 जून की सायं घर वापस जा रहा तो गांव के समीप ही स्थित नौलागाड़ पहुंचा तो मनखी बाघ ने उस पर अचानक हमला करके उसे अपना निवाला बना दिया। उसका आधा खाया हुआ शव बाद में लोगो ंको जंगल में मिला। इसके बाद इस बाघ ने इसी क्षेत्र में घर की छत पर पर सो रहे मजदूरों पर हमला बोल कर एक मजदूरों पर हमला किया जिसमे ंएक बांघ ने घायल कर दिया वहीं दूसरा भयभीत हो कर छत से ही गिर कर घायल हो गया। पीड़ितो का शोर सुन कर बाघ तो भाग गया परन्तु ग्रामीणों में आक्रोश फेल गया। दोनों घायलों को जिला अस्पताल में उपचार के लिए भर्ती कराया गया है।
 एक तरफ क्षेत्र में मनखी बाघ का आतंक से लोग सहमे हुए हैं वही इस मुद्दे पर सरकार की संवेदनहीनता पर जनता बेहद आक्रोशित है। जनता का आक्रोशित होने का मुख्य कारण है कि वन विभाग ने इस घटना में मारे गये व्यक्ति के परिजनों को तत्काल 5 हजार की आर्थिक सहायता दे कर उनके जख्मों में नमक डालने का कृत्य करना।  लोग सरकार की इस संवदेनहीन कृत्य पर प्रश्न कर रहे हैं कि क्या आम आदमी की कीमत केवल सरकार 5 हजार ही समझती है।  सरकार द्वारा संरक्षित जंगली हिंसक जानवरों के हमलों में मारे गये लोगों के लिए जहां सरकार को एक ठोस नीति बनाते हुए इसका कम से कम 5 लाख रूपये तक का सम्मानजनक मुआवजा होना चाहिए और जिस रेंज में जंगली जानवर आम जनता के जीवन को नुकसान पंहुचाता हो उस रेंज के वनाधिकारियों को इसके लिए जिम्मेदार मान कर दण्उित किया जाना चाहिए। हालांकि इस मनखी बाघ के हमले पर घायल हुए दोनों ग्रामीणों में दहशत व्याप्त है। परन्तु सरकार व उनके कारिदों के पास इन पीड़ितों का दुख दर्द सुनने व देखने के लिए समय तक नहीं है। आखिर कब आयेगी उत्तराखण्ड की सरकार को अपने इस दायित्व को निर्वाह करने की सुध।

भारत में मोदी को ही एकमात्र देशभक्त व स्वाभिमानी नेता मानता है अमेरिका !

गांधी की तरह अमेरिका को दो टूक शब्दों में उसका असली चेहरा दिखाये मोदी

अमेरिका द्वारा गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी को अमेरिका आने के लिए वीजा न देने के प्रकरण का स्मरण होते ही मेरा मन महात्मा गांधी की उस महान दृढ़ता के लिए उनको शतः शतः नमन् करने को हिलोरे लेने लगता है । कितने महान व्यक्तित्व के धनी थे महात्मा गांधी जिनमें इतना नैतिक दृढ़ साहस व मानवीय दृष्टि भी थी कि अमेरिकियों के गांधी जी से अमेरिका पधारने के तमाम अनुनय विनय को दो टूक शब्दों में यह कहते हुए ठुकराया था कि अमेरिका हिंसक व शोषक देश है, जब तक उसकी यह वृति रहेगी मै अमेरिका में पांव नहीं रख सकता। क्या आज के किसी भारतीय नेताओं में इतना साहस है? चाहे नेता मनमोहन सिंह हो या अटल या अन्य सबके सब अमेरिका के आगे दुम हिलाने के लिए कितने अधीर हैं यह वर्तमान दो दशकों की राजनीति से साफ दिखाई देता है । किसी प्रकार अमेरिका के हितों के पोषण के लिए देश को अमेरिका के हितों की पूर्ति के लिए दाव पर लगाने वाले देश के वर्तमान प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ही नहीं अधिकांश राजनैतिक दल किस प्रकार से अमेरिका के साथ परमाणु समझोता करने के लिए उतावले हुए। गांधी में कई कमी हो सकती है परन्तु भारत को जीतना करीब से समझने व आम जनता के मर्म को जानने की महारथ महात्मा गांधी को हासिल थी उतना आज किसी नेता में कहीं दूर दूर तक दिखाई तक नहीं दे रही है। गांधी की तरह मोदी भी एक इंसान है। उनमें भी कई कमियां हो सकती है परन्तु आज जिस प्रकार से मोदी ने अपने शासन प्रशासन के एक दशक से अधिक लम्बे समय के शासन काल में चंद कार्यो को अगर नजरांदाज कर दे तो उन्होंने देश में ही नहीं विदेशों में भी अपने नेतृत्व का पताका फहरा दिया है। उनमें जो राष्ट्रभक्ति व स्वाभिमान कूट कूट कर भरा है उसी प्रखर नेतृत्व के कारण अमेरिका को लगता है कि आने वाले समय में अगर मोदी भारत की कमान संभालते हैं तो भारत न केवल महाशक्ति बनेगा अपितु विश्व को अमेरिकी शोषण से भी मुक्ति दिलाने का काम कर सकता है। इसी कारण मोदी को अमेरिका फूटी आंख नहीं देखना चाहता। मोदी के प्रखर नेतृत्व से भयभीत अमेरिका यह देख कर भी हैरान है कि जिस देश के अटल से लेकर मनमोहन तक तमाम नेता उनके इशारों पर नाचते रहे, जिनके हितों को ही नहीं जिस देश के मंत्रियों के स्वाभिमान को उनके कपडे उतरवा कर भी अमेरिका में आने पर वह निरंतर जलील तक करता रहा उस देश में महात्मा गांधी के बाद एक ऐसा प्रखर नेतृत्व मोदी के रूप में कैसे तेजी से उभर रहा है जो आने वाले समय में न केवल भारत को महाशक्ति बना सकता है अपितु अमेरिका के शोषणवादी प्रवृति पर भी ग्रहण लगा सकता है। लगता है मोदी को वीजा न दे कर अमेरिका ने अप्रत्यक्ष रूप से यह घोषणा कर दी है वर्तमान भारतीय राजनेताओं में केवल मोदी ही ऐसा नेता है जो अमेरिका की लूट प्रवृति के आगे झुकने वाला नहीं है। वह भारतीय हितों व स्वाभिमान को अमेरिका के इशारे पर अमेरिका के चरणों में समर्पित करने वाले अन्य नेताओं की तरह नहीं है। मुझे आशा है मोदी को भी अमेरिका की इस अपमानित करने वाले कृत्य का विरोध करने के लिए महात्मा गांधी की तरह अमेरिका को उसका असली चेहरा दिखाना चाहिए। आज जिस प्रकार से देश में मनमोहन ही नहीं भाजपा सहित देश में अधिकांश नेताओं में राष्ट्र स्वाभिमान व सही दिशा देखने को नहीं मिल रही है। उससे देश में न केवल आम जनता अपितु विश्वविख्यात भारतीय उद्योगपति प्रेम जी सहित अधिकांश उद्यमी भी दिशाहीन भारतीय नेतृत्व के कारण देश के हो रहे पतन से दुखी है। ऐसे समय में मोदी जैसे मजबूत इरादों के देशभक्त प्रखर नेतृत्व का होना आम भारतीयों के लिए किसी वरदान से कम नहीं है। परन्तु देश में राजनैतिक दलों में संकीर्ण दिशाहीन व जातिवादी नेतृत्व मोदी की इस राह में कांटे बिछाने में लगा है। जिस प्रकार से भाजपा सहित देश के तथाकथित संकीर्ण पदलोलुपु जातिवादी व भ्रष्टाचार को संरक्षण नेता आज मोदी को तानाशाह बता कर देश की बागडोर संभालने से रोकने का असफल प्रयास कर रहे है उससे देश की स्वाभिमानी जनता मोदी के पक्ष में खुल कर सामने आ रही है। मोदी का व्यवहार भले ही तानाशाह की तरह भाजपा सहित देश के अन्य नेताओं को लगे, परन्तु यह बात साफ है की राजनीति में देश को अमेरिका का गुलाम बनाने के लिए उतारू नेतृत्व किसी भी प्रकार से इस देशभक्त स्वाभिमानी मोदी की राह में कांटे बिछाने का कदम कदम पर षडयंत्र कर रहे है। इन्हीं षडयंत्रों को भांप कर देशहित के लिए मोदी ने देशहित में कठोर प्रहार करके इनके अरमानों को पंख लगने से पहले ही जमीदोज कर दिया है। मोदी जानते हैं लोकशाही के नाम पर आज भारत की राजनीति को जातिवादी, क्षेत्रवादी व भ्रष्टाचारी नेताओं ने किस प्रकार देश को खोखला कर दिया है। इसलिए मोदी इन तत्वों को सर उठाने से पहले कुचलने की चाणक्य नीति के तहत ही अमल कर रहे है। मोदी को चाहिए कि वह ऐसा शासन करे कि धर्म, जाति व क्षेत्र के नाम पर किसी भी बेगुनाह का शोषण व दमन न हो। सबको प्रगति व सम्मान का अवसर मिले। किसी से अन्याय न हो । हाॅं इस चीज का भी वे भान रखें कि कोई भी गुनाहगार जो देश की जडों में मट्ठा डाल रहा हो वह देश में कानून के शिकंजे से बच न पाये। देश में इतनी नपुंसक सरकारें भी न हो जो अटल सरकार की तरह संसद पर हमला होने पर भी अमेरिका की बंदर धमकी से सहम जाये या मनमोहन सिंह की सरकार की तरह संसद हमले के मौत की सजा पाये भारत के दुश्मन को फांसी देने का साहस तक न जुटा पाये। आज भारत में कश्मीर ही नहीं असम भी इन्हीं अंध तुष्टीकरण के कारण तबाह हो चूका है। इन्हीं के कारण अब उत्तराखण्ड भी चंद सालों में इसी दिशा में धकेलने का षडयंत्र हो रहा है। देश की रक्षा के लिए आज देश को मनमोहन सिंह जैसे अमेरिकापरस्त प्रधानमंत्री की नहीं नरेन्द्र मोदी जेसे राष्ट्रभक्त नेता की जरूरत है। यह साफ दिखाई दे रहा है 2014 के लोकसभाई चुनाव में देश की इस जनभावनाओं को साकार होने से व मोदी को भारत का प्रधानमंत्री बनने से रोकने का कुकृत्य कांग्रेस नहीं अपितु भाजपा के जातिवादी, दिशाहीन पदलोलुपु नेता ही करेंगे। परन्तु इनको इस चीज का भान होना चाहिए कि सूर्य को बादल लम्बे समय तक नहीं ढक सकता है, आने वाला समय राष्ट्रभक्त मोदी जैसे नेताओं के स्वागत करने के लिए भारतीय जनमानस पलकें बिछा रहा है। मोदी व गांधी की सोच में भले ही अंतर हो सकता है, दोनों के जीवन दर्शन में अंतर हो सकता है परन्तु गांधी की तरह मोदी में भी भारत के स्वाभिमान व देशभक्ति कूट कूट कर भरी हुई है। शेष श्रीकृष्ण कृपा। हरि ओम तत्सत्। श्रीकृष्णाय् नमो।

सन् 2000 के बाद हुक्मरानों द्वारा उत्तराखण्ड की जमीनों की बंदरबांट को जब्त करे सरकार


उत्तराखण्ड गठन के बाद यहां पर आसीन भाजपाई व कांग्रेसी सरकारों ने जो यहां के संसाधनों की खुली लुट मचाई उस पर अगर श्वेत पत्र इन कृपार्थियों के नाम सार्वजनिक किया जाय तो इन दलों के आकाओं के चेहरे जनता के समक्ष बेनकाब हो जायेंगे। खासकर भाजपा के आला नेता आडवाणी की लाडली हो या तरूण विजय या संघ पोषित संगठनों से जुडे संगठनों के एनजीओ आदि के लिए उत्तराखण्ड की जमीनें कोडियों के भाव लुटाई गयी। अब इस परमपरा को शर्मनाक ढ़ग से तिवारी व बहुगुणा सरकार ने बढ़ाया है। मुख्यमंत्री के चुनाव क्षेत्र में जिस प्रकार से भूमिधरी के पट्टे नवाजे गये उससे साफ हो गया कि यहां के हुक्मरान प्रदेश के संसाधनों की बंदरबांट करना अपना बपौती अधिकार समझते है। इस समस्या कितनी बिकराल हो गयी है कि इसके समाधान के लिए अब राज्य गठन जनांदोलन के प्रमुख आंदोलनकारी संगठन ‘उत्तराखण्ड जनता संघर्ष मोर्चा’ ने पुरजोर मांग की है कि सन2000 राज्य गठन के बाद  यहां की  जमीनो का यहां के हुक्मरानों ने जो भी बंदरबांट की है  उनके नाम सार्वजनिक करने के बाद उनका सरकार अधिग्रहण करे। प्रदेश में जिस प्रकार से यहां के हुक्मरानों तिवारी व खण्डूडी ने यहां के वर्तमान व भविष्य को नजरांदाज करते हुए जनसंख्या पर आधारित परिसीमन थोपने में शर्मनाक मौन रखा, उससे उत्तराखण्डियों के राजनैतिक शक्ति व सामाजिक तानाबाने पर एक प्रकार से ग्रहण लग गया है। अब विजय बहुगुणा की सरकार जिस प्रकार से यहां के मूल निवासियों के हक हकूकों पर ग्रहण लगाने का काम कर रही है उससे प्रदेश की स्थिति कश्मीर व आसाम की तरह होने की आशंका बलवती हो रही है। इसी आशंका से सावधान होते हुए उजसमों ने प्रदेश की जनता से अपील की कि वे अपने क्षेत्रों में किसी प्रकार से किसी अनजान , अराजक व अपरिचित रहस्यमय लोगों को किसी प्रकार का आश्रय न दे। यह सीमान्त क्षेत्र में सामाजिक व राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा बन सकते है।

Friday, June 15, 2012



-कांग्रेस के राष्ट्रपति दाव से भाजपा व ममता चित 

 अधिक बेहतर होता प्रधानमंत्री बनते प्रणव व मनमोहन बनते राष्ट्रपति



संप्रग प्रमुख सोनिया गांधी के राष्ट्रपति दाव से न केवल भाजपा ही नहीं अपितु सप्रंग सरकार को कदम-कदम पर नीचा दिखाने वाली बंगाल की मुख्यमंत्री व संप्रग सहयोगी ममता बनर्जी भी चारों खाने चित हो गई ।
सप्रंग गठबंधन की प्रमुख सोनिया गांधी ने जेसे ही देश के सबसे अनुभवी, वरिष्ठ व वर्तमान वित्तमंत्री प्रणव मुखर्जी को देश के राष्ट्रपति के पद का प्रत्याशी बनाने का ऐलान किया तथा इस ऐलान के चंद घण्टे के अंदर बहुजन समाजवादी पार्टी व समाजवादी पार्टी ने प्रणव मुखर्जी को राष्ट्रपति पद के लिए अपना समर्थन देने का ऐलान कर दिया। इसके बाद जिस प्रकार से राजग के घटक दलों (शिवसेना व जदयू) में प्रणव मुखर्जी के समर्थन में भाजपा के अनमने रुख को दर-किनारा करते हुए समर्थन में आगे आए, उससे साफ हो गया कि देश को अब तक का सबसे अनुभवी वरिष्ठ व साफ छवि का राजनेता प्रणव मुखर्जी के रूप में राष्ट्रपति के रूप में मिलेगा। परन्तु देश का इससे अधिक सौभाग्य रहता कि अगर प्रधानमंत्री के रूप में पूरी तरह से असफल ही नहीं अपितु अपने कुशासन से देश के आम जनता का जीना दूश्वार करने वाले मनमोहन सिंह को राष्ट्रपति के पद पर और प्रणव मुखर्जी को प्रधानमंत्री के पद पर आसीन करने का काम सप्रंग प्रमुख सोनिया गांधी करती। परन्तु लगता है कांग्रेस प्रमुख व उनके राजनैतिक सलाहकारों की बुद्धि पर काल ने पर्दा ही डाल दिया है। जो वे धृतराष्ट्री हट लगा कर मनमोहन सिंह को प्रधानमंत्री बनाये रख कर अपनी पार्टी के हितों पर मट्ठा डाल ही रहे हैं इसके साथ मनमोहन सिंह के कुशासन से देश की आम जनता का मंहगाई, भ्रष्टाचार व आंतकवाद के दश से जीना दूश्वार कर रही है। जो भी घटनाक्रम घटित हो रहे हैं उससे मेरे संकल्प को मजबूती प्रदान करते हुए दिखाई दे रही है कि आगामी लोकसभा चुनाव जो 2014 में हो या उससे पहले उसमें मिले जनादेश से कांग्रेस ही नहीं अपितु भाजपा भी सत्ता से बाहर होंगे। वहीं प्रधानमंत्री तीसरे मोर्चे का ही बनेगा परन्तु वह मुलायम सिंह यादव भी नहीं होंगे। उस सरकार को भाजपा बाहर से समर्थन करेगी। सवाल जहां तक प्रणव मुखर्जी अन्य सभी उम्मीदवारों का उन सबसे अधिक राजनैतिक अनुभव है। वे भी साफ छवि के है। परन्तु यह जगजाहिर है कि देश की आम जनता आज भी पूर्व राष्ट्रपति डा अब्दुल कलाम को इस पद पर आसीन देखना चाहती है।
सोनिया गांधी ने प्रणव मुखर्जी को राष्ट्रपति का प्रत्याशी बना कर उन तमाम अटकलों पर विराम लगाया कि वे प्रणव पर भरोसा नहीं करती है। इसके अलावा दादा के नाम से राजनैतिक जगत में विख्यात सबसे वरिष्ट व कद्दावर कुशल राजनेता प्रणव मुखर्जी अपने जीवन के 5 दशक से अधिक के राजनैतिक सफर में देश के सबसे बडे पद राष्ट्रपति के पद पर आसीन होकर काफी हद तक प्रधानमंत्री न बन पाने की टीस को भुला पायेंगे। आशा है दादा देश के संविधान के अनुसार दलगत राजनीति से उपर उठ कर अपने पद के दायित्व को निष्पक्षता से निर्वहन करेंगे।

Tuesday, June 12, 2012



















किसी को शिकवा नहीं है तुम्हारी उडान से 
जिसने नवाजे पंख तुमको जीवन वक्त के
भला वो क्यों जलेगा अपने ही चिराग से
रोशन करो तुम दुनिया को जलाओं नहीं 
यही आश करता है दुनिया का बाजीगर 
-देवसिंह रावत

दिल्ली मनमोहनी हम जाने

दिल्ली मनमोहनी हम जाने, 
आये यहां वह यहीं बस जाये।।
इसने छाती पर सहे सदियों से
जुल्म चंगेजों और फिरंगियों के। 
मोहपाश में इसके फंस कर 
देखो मिट गये कई सिकंदर।।
हम भी न जाने किस घड़ी में
बन गये आ कर यहां बंदर।।
इसके आंचल में मिलता है
सबको यहां ठोर ठिकाना।।
इसके मोहपाश में बंध कर 
 बन जाये जग ही दीवाना ।।
मिलता यहां राजा रंक को 
अपने स्वप्न लोक का जीवन।।
जो आये फिर लोट न पाये 
देती है सबको दाना पानी।।
तरसे चाहे अपनी घरती को 
फिर भी दिल्ली छोड़ न पाये।।
दिल्ली मनमोहनी हम जाने
आये यहां वह यहीं बस जाये ।।

        -देवसिंह रावत (प्रातः7.22 बुद्धवार 13 जून 2012)


यों कौन छोड़ना चाहता है अपनी धरती, अपने गांव को,
पेट की आग ने मेरे हम वतनों को बेवतन कर दिया।
आज इतना ही कहूगा आपसे मेरे बेवतन हुए साथियो,
अगर खुदगर्ज हुक्मरानों ने सुध ली होती वतन की।
हम भी अपने घर आंगन में बसंत की तरह खिलते।।
-देवसिंह रावत



मेरे देश के संसाधनों को लुटवा कर जो 
बने हुए हैं शहंशाह इस जहान में साथी 
उन खूदगर्ज हुक्मरानों को आओ मिल
हम बेनकाब करें इन्हीं के कुकृत्यों से 
   -देवसिंह रावत


आज जल रहा हे लुट रहा है 
चंगेजों के हाथों वतन साथियो
तुम गा रहे हो गीत बसंत के
रो रहा है मेरा वतन साथियो
उठों जागो खुदगर्ज न बनो
वतन की रक्षा में हुंकार भरो। 
कब तक उतारोगे ये आरती
स्वार्थो के लिए इन चंगेजों की 
-देवसिंह रावत 



मुलायम व पवार को पाक साफ बता कर भ्रमदेव न बने रामदेव 


बाबा रामदेव द्वारा मुलायम सिंह व पवार को आज पाक साफ बताने वाली खबर को सुन कर भ्रष्टाचार के खिलाफ संघर्ष करने वाला आम भारतीय हस्तप्रद ही नहीं ठगा सा रह गया। भारतीय संस्कृति के अभिन्न अंग योग को सिखा कर व भ्रष्टाचार के खिलाफ जंग छेड कर जहां स्वामी रामदेव को देश विदेश के भारतीयों ने अपने सर आंखों पर बिठाया। इसी के सहारे उनको वे अरबों की सम्पति के स्वामी बने व देश विदेश में लाखों लोगों को जोड़ कर जीवंत भारत स्वाभिमान जैसे संगठन के प्रमुख भी बने। परन्तु इस प्रभुता पा कर भी जब दिल्ली के रामलीला मैदान वाले उनके जनांदोलन में कांग्रेस के अमानवीय दमन से आक्रोशित हो कर उनका भ्रष्टाचार का आंदोलन देश में व्याप्त समग्र भ्रष्टाचार के खिलाफ से प्रारम्भ हुए उनके आंदोलन की राह से भटक कर मात्र कांग्रेस के भ्रष्टाचार के खिलाफ से तक सिमट कर रह गया। उनके बयानों में अब केवल कांग्रेस के खिलाफ उनका निजी आक्रोश साफ झलकता है।
जिस प्रकार से उन्होंने दिल्ली में इस्लामिक संगठनों की बैठक में मुसलमानों को आरक्षण का खुला समर्थन करके अपने समर्थकों को भी भौचंक्का कर दिया। वे भूल गये कि सामाजिक छूआछूत केवल हिन्दू समाज में शताब्दियों से व्याप्त था अन्य धर्मो में यह भेदभाव ही स्वीकार नहीं किया जाता है। वहीं अब बाबा रामदेव ने विदेशों में जमा काले धन  के समर्थन में जिस प्रकार से बाबा रामदेव ने मुलायम सिंह व शरद पवार को पाक साफ बताया, उससे देश के लोगों में स्वयं बाबा रामदेव की छवि ही धूमिल हुई। जिस रामलीला मैदान के दमन के कारण बाबा रामदेव कांग्रेस को लोकतंत्र का हत्यारी कहते हैं बाबा रामदेव को शायद भान न हो इन्हीं मुलायम के शासन काल में हजारों रामभक्तों पर किस प्रकार अयोध्या में अमानवीय दमन किया गया था। यही नहीं मुलायम के शासन जिस प्रकार से इलाहाबाद उच्च न्यायालय पर सत्तांध सपाईयों का हमला किया गया था और मुजफरनगर काण्ड-94 में जिस शर्मनाक व अमानवीय अत्याचार मुलायम सरकार में उत्तराखण्डियों पर हुए उसका रत्ती भर अहसास बाबा रामदेव को क्यों नहीं है। यह सच है कि बाबा रामदेव को विश्व प्रसिद्ध बाबा रामदेव बनाने मे मुलायम सिंह यादव व उनके साथियों का काफी हाथ है परन्तु उनके मानवता, राष्ट्र व लोकशाही के प्रति गुनाहों को बाबा रामदेव भले ही अपने पर हुए अहसानों से नजरांदाज कर दे परन्तु जिस देश व समाज के दिलों में उनके जुल्मों के घाव अभी तक हैं वे कैसे उनको नजरांदाज कर सकते है। खासकर उत्तराखण्डियों के लिए मुलायम सिंह यादव ने जो जख्म दिये उसे एक बार भगवान राम की सौगन्ध खाने वाले कलयुगी रामभक्त माफ भी कर दें परन्तु उत्तराखण्डी कभी नहीं कर सकते हे। बाबा रामदेव को इस बात का भान होना चाहिए इस काण्ड में मुलायम की शह पर शासन प्रशासन ने जो तांडव किया उसे इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने नाजी अत्चाचारों के समकक्ष रख कर देशभक्तों पर सरकारी दमन बता कर कड़ी भत्र्सना की थी साथ ही दस-दस लाख रूपये का मुआवजा मुलायमी शासन के दरिंदो के जुल्मों को भुक्तभोगियों को देने का निर्णय दिया था।
क्या बाबा रामदेव मुलायम व पवार के प्रति देश की आम जनता की भावनाओं को नजरांदाज करके जो पाक साफ का सर्टिफिकेट उनको दे रहे हैं उनसे उनकी खुद की छवि ही धूमिल होगी। हालांकि उत्तराखण्ड जहां उनका मुख्यालय है उस धरती की जनता उनके मुख्यालय से 100 किमी दूरी पर देहरादून में भाजपा सरकार के शासन काल में हो रहे भ्रष्टाचार के खिलाफ मूक रहने जनता को उनके भ्रष्टाचार के खिलाफ आंदोलन का मतलब ही समझ में आ गया।
वहीं दूसरी तरफ कृषि मंत्री पंवार को देश के अधिकांश लोग बढ़ती हुई मंहगाई के लिए काफी हद तक जिम्मेदार मानते है। उनको पाक साफ बता कर बाबा रामदेव ने जनभावनाओं का कहां तक सम्मान किया यह तो वे ही जाने । परन्तु देश की जनता चाहती है कि बाबा अगर हकीकत में भ्रष्टाचार के खिलाफ संघर्ष करना चाहते हैं तो उनको दलगत व व्यक्तियों के मोह से उपर उठ कर कांग्रेस सहित तमाम दलों के भ्रष्टाचारी नेताओं को एक ही लाठी से हांकना चाहिए। वहीं भारत की एकता व अखण्डता को ध्वस्थ करने वाले विन्दुओं पर गंभीरता से चिंतन मनन करके ही मुंह खोलना चाहिए। देश की जनता की आशायें उन पर है। उनकी आशाओं पर इस प्रकार के कार्यो से बजपात ही होता है।

Monday, June 11, 2012


सितारगंज में मतदाताओं को दिये गये खुले आम प्रलोभन पर मूक क्यों चुनाव आयोग 
सितारगंज से विजय बहुगुणा को मिलेगी भारी विजय 

देहरादून (प्याउ)। सितारगंज हो रहे उप चुनाव में जहां विजय बहुगुणा का जीतना तय माना जा रहा है वहीं इस सीट पर हो रहे उप चुनाव में चुनाव आयोग की प्रतिष्ठा पूरी तरह से दाव पर लग चूकी है। चुनाव आयोग ने सितारगंज विधानसभा उपचुनाव की अधिसूचना जारी करते हुए वहां पर 13 जून से 20 जून तक नामांकन भरने  व 21 जून को नाम वापसी का दिन घोषित करने के साथ 8 जुलाई को चुनाव तथा 11जुलाई को मतगणना करने का ऐलान कर दिया हो। पर सितारगंज चुनाव भले ही उपचुनाव हो परन्तु यह चुनाव जहां प्रदेश की राजनीति की दिशा तय करेगा वहीं देश के चुनाव आयोग की अग्नि परीक्षा भी करेगा। हालांकि यहां पर जिन परिस्थितियों में विधानसभा चुनाव हो रहे हैं इस सीट पर कांग्रेसी मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा का जितना तय माना जा रहा है। परन्तु चुनाव जीतने के लिए जिस प्रकार से यहां पर भाजपा अपने विधायक को अपने पक्ष में करने के लिए कांग्रेस सहित मुख्यमंत्री पर सीधे खरीद फरोख्त का आरोप लगा रही है वहीं सितारगंज के बहुसंख्यक मतदाताओं को भूमिधरी का प्ट्टा चुनाव अधिसूचना के ठीक एक पखवाडे पहले ही नवाजना क्या मतदाताओं को सीधा प्रलोभन देना ही मान कर इसका प्रदेश के अधिकांश राजनैतिक दल, बुद्धिजीवी, आंदोलनकारी संगठन कर रहे हैं क्या चुनाव आयोग चुनाव जीतने के लिए प्रदेश के मुख्यमंत्री के द्वारा अपनी सरकार से कराये गये इस फेसले को संज्ञान में लेने का साहस जुटा कर अपने निष्पक्ष चुनाव कराने के दायित्व का निर्वहन कर पायेगा। आज चुनाव आयोग की इसी कदम पर पूरे देश की निगाहें लगी हुई है। प्रदेश की राजनीति में मुख्यमंत्री के इस कदम का विरोध जहां खुले आम उनकेे सरकार मे ंसहयोगी उक्रांद पी भी कर रही है। उक्रांद पी के अध्यक्ष त्रिवेन्द्र पंवार इस सीट पर अपना प्रत्याशी खडा करने का ऐलान कर रहे है। वहीं बसपा की चुनौती को पहले ही कुंद करने के लिए मुख्यमंत्री ने इस क्षेत्र के बसपा क्षत्रप नारायण पाल का समर्थन हासिल करने में सफलता हासिल की है। भाजपा के लिए यह सीट अस्तित्व बचाने व चुनौती स्वीकार करने की है। जिस प्रकार से मुख्यमंत्री ने उनके विधायक को अपने पाले में ले जा कर भाजपा को खुली चुनौती दी है उसका मुहतोड़ जवाब भाजपा अभी भले ही देने की स्थिति में नहीं दिखाइै दे रही है। भाजपा के कमजोर नेतृत्व के कारण जहां विजय बहुगुणा की सरकार कांग्रेस में भारी असंतोष के बाबजूद बनी हुई हैं। वहीं बसपा से निकाले गये नारायण पाल तक को भाजपा अपने पाले में ला कर मुख्यमंत्री को कड़ी चुनौती नहीं दे पायी। अब अंधेरे में हाथ पांव मारते हुए भाजपा जिस प्रकार से भाजपा के दिग्गज नेता वरूण गांधी की बंगाली पत्नी को उतारने के बारे मे ंसोच रही है उससे साफ हो गया कि इस विधानसभा चुनाव क्षेत्र से भाजपा के दिग्गज खण्डूडी सहित क्षेत्र का कोई कद्दावर नेता जोखिम लेने को तैयार नहीं है।
भले ही चुनाव आयोग का दायित्व देश में लोकशाही की रक्षा करने के लिए देश में निष्पक्ष चुनाव कराना हो परन्तु जिस प्रकार से उत्तराखण्ड के मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा को विधानसभा सदस्य बनाने लिए प्रदेश की 68 नम्बर की विधानसभा क्षेत्र सितारगंज में उपचुनाव 8 जुलाई को हो रहा है उस पर निर्वाचन आयोग की अग्नि परीक्षा होगी। ै विधानसभा के आम चुनाव में यह सीट भाजपा की झोली में यहां के मतदाताओं ने डाली थी। परन्तु जिस प्रकार से यह सीट कांग्रेसी मुख्यमंत्री को विधानसभा सदस्य बनने के लिए भाजपा के किरण मंडल ने छोड़ी। जिस प्रकार से वहां पर मुख्यमंत्री को विजयी बनाने के लिए एक पखवाडे पहले ही प्रदेश सरकार ने यहां पर बहुसंख्यक बंगाली समाज को प्रभावित करने के लिए उनको भूमिधरी का अधिकार देने का कार्ड खेला। क्या वह चुनाव आयोग के संज्ञान में चुनाव को सीधे प्रभावित करने वाला प्रलोभन नहीं है?  सरकार जनकल्याण के कार्य करे परन्तु चुनाव जीतने के लिए सीधे मतदाताओं को लुभाने के लिए उनको भूमिधरी का प्रलोभन देना सीधे सीधे चुनाव व मतदाताओं को प्रभावित करने वाला प्रलोभन है। । हालांकि यह सीट मुख्यमंत्री के लिए जितनी सहज है उससे विकट इस सीट पर कांग्रेस सरकार द्वारा मतदाताओं को दिया गया खुले आम प्रलोभनों को नजरांदाज करना चुनाव आयोग के लिए मुश्किल है। जहां तक इस सीट के परिणाम के बारे में वर्तमान स्थिति को देखते हुए यह सीट विजय बहुगुणा के पक्ष में मानी जा रही है क्योंकि यहां पर उनके दल के विरोधी भी किसी भी कीमत पर यहां पर भीतरघात करने की स्थिति में दिखाई नहीं दे रहे है। हालांकि पहले यह आशंका प्रकट की जा रही थी कि जिस प्रकार से कांग्रेस आला कमान ने जनभावनाओं व अपने  अधिकांश विधायकों की भावनाओं को रौंदेते हुए सांसद विजय बहुगुणा को मुख्यमंत्री के पद पर थोपा है उसको देख कर उनका किसी भी सीट से उप चुनाव में विजय होना काफी विकट लग रहा था। खासकर कांग्रेसी आपसी कलह को देख कर।





भगवान बदरी-केदार, कैलाश मानसरोवर व अमरनाथ यात्रा  पर बेनकाब हुई सरकार 

भगवान अमरनाथ की यात्रा 25 जून से ही होगी प्रारम्भ 

श्रीनगर(प्याउ)। जम्मू एवं कश्मीर के राज्यपाल व श्री अमरनाथ श्राइन बोर्ड के अध्यक्ष एन.एन. वोरा ने ऐलान किया कि अमरनाथ धाम की यात्रा यात्रा निर्धारित तिथि 25 जून से ही शुरू होगी। विश्व प्रसिद्ध अमरनाथ धाम जम्मू कश्मीर प्रदेश में समुद्र तल से 13,888 फीट की ऊंचाई पर पवित्र गुफा में है। विश्व में रहने वाले करोड़ों सनातन धर्मियों के चार सर्वोच्च धामों में से एक भगवान अमरनाथ में  स्वतः बनने वाले प्राकृतिक शिवलिंग के दर्शन के लिए प्रतिवर्ष हजारों श्रद्धालु कठिन 37 किलोमीटर लंम्बीे पदयात्रा भी करते हैं। पिछले कई दशकों से इस यात्रा पर आतंकियों के हमले की आशंका के कारण निरंतर शासन प्रशासन पर दवाब बना रहता है। वहीं इस साल यात्रा काल के आस पास  हुई असमय की बर्फबारी के कारण यात्रा मार्ग का अधिकांश हिस्सा इस समय बर्फ से ढके रहने से इस यात्रा के समय पर शुरू होने पर ग्रहण लगने की आशंका थी। जो राज्यपाल के ऐलान के बाद साफ हो गये है। गौरतलब है हिन्दुओं के सर्वोच्च चार धामों में अग्रणी दो धाम भगवान बदरीनाथ-केदारनाथ जो उत्तराखण्ड में स्थित है व भगवान अमरनाथ जो जम्मू कश्मीर में स्थित है की पावन दर्शन यात्रा ग्रीष्मकाल में ही प्रारम्भ होती है। जहां भगवान सदाशिव के अदभूत दर्शन अमरनाथ धाम में प्राकृतिक रूप से पावन गुफा में बने शिवलिंग के रूप में होते है। वहीं केदारनाथ में भी भगवान के 12 ज्योतिर्लिगों में से प्रमुख केदारनाथ भगवान के रूप में ग्रीष्म काल में ही होते है। वहीं भगवान विष्णु के पावन दर्शन भगवान बदरीनाथ में भगवान बदरीनाथ के रूप में होते है। इसके अलावा ग्रीष्मकाल में ही भगवान सदाशिव के पावन निवास कैलाश मानसरोवर की दिव्य यात्रा व दर्शन भी होते है। भगवान शिव का यह पावन धाम कैलाश मानसरोवर पहले भारत में ही था परन्तु भारत सरकार की नपुंसकता के कारण यह क्षेत्र अब चीन ने अपने कब्जे में ले लिया है। भगवान सदाशिव के पावन धाम कैलाश मानसरोवर के दर्शन जहां हिन्दू धर्मालम्बियों को चीन के रहमो करम पर करने को मजबूर होना पड़ता है। इसी माह कैलाश मानसरोवर की पावन यात्रा भी प्रारम्भ होने वाली है। वहीं अमरनाथ के पावन दर्शन भी आतंकियों व जम्मू कश्मीर प्रांत के रहमोंकरम पर करने के लिए मजबूर होना पडता है। भगवान अमरनाथ के यात्रियों की सुविधा के लिए इस विकट स्थानों में सरकार तीर्थयात्रियों की वर्षो से धर्मशालाआदि के स्थाई निर्माण या अमरनाथ धाम ट्रस्ट के द्वारा पक्की व्यवस्था तक का कोई समुचित प्रबंध करने से प्रदेश सरकार व केन्द्र सरकार, आतंकियों के विरोध के कारण करने को तैयार ही नहीं है। वहीं भगवान बदरी व केदारनाथ यात्रा का उचित प्रबंध भी उत्तराखण्ड सरकार तमाम ऐलानों के बाद भी धरातल पर उतारने में अभी तक असफल रही। यात्रियों की असुविधायें कम होने का नाम ही नहीं ले रही है। यही नहीं सरकार दोनों धामों के लिए मोटर मार्ग आदि को भी समय पर ठीक करने का काम तक नहीं कर पाती है। सबसे हैरानी की बात है कि सरकार द्वारा यात्रा के दौरान चिकित्सा की समुचित प्रबंध न किये जाने से छह दर्जन से अधिक तीर्थ यात्रियों की असामयिक मौत चार धाम यात्रा के दोरान हो गयी परन्तु प्रदेश सरकार की कान में जूं तक नहीं रेंग रही है।

Sunday, June 10, 2012



दिशाहीन भ्रष्ट हुक्मरानों से पूरी व्यवस्था में फेली आरजकता 


सर्वोच्च न्याय तो केवल परमात्मा ही कर सकता है।हम आप जिस सांसारिक न्याय व्यवस्था में जी  रहे हैं वह अभी अपूर्ण है। उसमें आंशिक ही न्याय होता है। जहां तक भारतीय न्याय व्यवस्था की बात है वह तो अभी गुलामी की घनघोर अंधेरी रातों में ही भटकते हुए लोकशाही के सूर्योदय की पहली तेजोमय किरण को भी आत्मसात नहीं कर पा रही है। वह अभी गुलामी की जंजीरों में अपने आप को बांध कर आत्ममुग्ध है। वेसे भी भारत में भ्रष्टाचार व दिशाहीन नेतृत्व से जमीदोज हो चूकी भारतीय व्यवस्था में जिस प्रकार से न्यायाधीशों की नियुक्तियों होती है, उसमें अधिकांश पथभ्रष्ट हुक्मरानों के अपने इशारों या हितों के पोषण करने में साहयक रह सकने वालों को ही प्रायः नियुक्ति मिलती है। जिनका जमीर इन नेताओं व उनके प्यादे बने व्यवस्था के कर्णधारों के पांवों तले आये दिन दम तोड़ता हुआ नजर आता है। जिस प्रकार से आये दिन न्यायाधीशों की भी भ्रष्टाचार में लिप्तता के किसेे सुनने में आ रहे हैं या उससे एक बात स्पष्ट है कि हमें इस न्याय व्यवस्था में सुधार तब तक नहीं हो सकता है जब तक हमारी पूरी व्यवस्था सुधर न जाय। नैतिक मूल्यों के लिए जीने वाले प्रतिभाशाली लोगों को प्रमुख संवैधानिक पदो ंमें आसीन करने के बजाय हुक्मरान अपने गुनाहों कोछुपाने वाले दागदार प्यादों को पदासीन करने की धृष्ठता करते हैं तो उसका हस्र व्यवस्था का पटरी से नीचे उतर जाना ही होता है। यही देश का हाल है और उत्तराखण्ड में तिवारी से लेकर बहुगुणा तक के मुख्यमंत्रित्व काल में जो शर्मनाक पतन यहां की व्यवस्था का हुआ वह लोकशाही को पतन की गर्त में धकेलने वाला ही हो सकता है। जिस व्यवस्था में कर्णधार ही संकीर्ण व भ्रष्ट मानसिकता के सत्तालोलुपु हो तो वहां व्यवस्था के अन्य अंग केसे सुरक्षित रह सकते है। क्योंकि व्यवस्था के कर्णधार अच्छे, योग्य व लोकशाही के लिए समर्पित लोगों के बजाय पथभ्रष्ट, संकीर्ण व दागदार लोगों को अपने कुकर्मो को ढकने व स्वार्थो की पूर्ति के लिए पदासीन करके पूरी व्यवस्था को पतन के गर्त में धकेल देते है। इसी से देश, प्रदेश, समाज व संसार में आरजकता, मंहगाई, भ्रष्टाचार, हिंसा आदि का वातावरण बन जाता है।  इसलिए संसार में जब भी कभी पथभ्रष्ट, दिशाहीन व संकीर्ण लोग सत्तासीन होते हैं तो उस देश, समाज या प्रदेश को ही नहीं अपितु पूरी मानव समाज को भी इसके दुष्परिणाम भुगतने पड़ते है। इसलिए मानवीय समाज की रक्षा के लिए जरूरी है कि किसी गलत व्यक्ति को कहीं भी देश, प्रदेश की बागडोर सोंपने से रोका जाय। जनता में ऐसी जागरूकता कि नितांत आवश्यकता है कि वह गलत व्यक्ति को अपने निहित स्वार्थ, प्रलोभन व रिश्ते, जाति, धर्म या क्षेत्र आदि के नाम पर काबिज होने से रोंके। इसका उदाहरण हमारे सामने हैं चंगैज, हिटलर, औरंजेब, सिकन्दर, ही नहीं जार्ज बुश, ओसमा, ने पूरे संसार को अपने आतंक से तबाही के गहरे घाव दिये हैं। आज पाकिस्तान की दुर्दशा के लिए वहां के संस्थापक जिन्ना जहां जिम्मेदार है। वहीं हिमाचल प्रदेश के जमीनी विकास के लिए वहां के विदेही राज जनक के समान जनसेवक वहां के प्रथम मुख्यमंत्री यशवंत सिंह परमार द्वारा रखी गयी ईमानदार, विकासोनुमुख लोकशाही समर्थक नीवं प्रमुख कारक रही। वहीं देश भूमि उत्तराखण्ड के राज्य गठन के मात्र 12 साल में देश का सबसे भ्रष्ट्रतम राज्य बन जाने के पीछे वहां के प्रथम निर्वाचित मुख्यमंत्री नारायण दत्त तिवारी व उनके बाद यहां पर आसीन होने वाले संकीर्ण, दिशाहीन व पदलोलुपु लोगों के यहां के भाग्य विधाता बनना रहा। आज उत्तराखण्ड में जहां राजनेता ही नहीं नौकरशाही भी इतनी पथभ्रष्ट हो चूकी है कि उसको जनहितों का रत्तीभर भी भान नहीं है। इसी की परणीति है उत्तराखण्ड के स्वाभिमान व यहां के राज्य गठन के आंदोलन को कुचलने वाले तथा आंदोलनकारियों की निर्मम हत्या करने वालों को दण्डित करने के बजाय यहां के हुक्मरानों द्वारा उनको शर्मनाक संरक्षण मिलना, लोकशाही व भारतीय संस्कृति को कलंकित करने से कम नहीं है। हम इस पतन पर भले ही कितने ही घडियाली आंसू क्यों न बहा लें परन्तु जब तक हम लोकशाही व समाज के हित में निर्णायक क्षणों में जाति, धर्म, दल, रिश्ते, लिंग, भाषा, निहित स्वार्थ आदि के मोह से उपर उठ कर सुयोग्य प्रत्याशी को पदासीन नहीं करेंगे तब तक देश व समाज या विश्व में सुशासन नहीं आने वाला। हमें एक बात समझ लेनी चाहिए कि हम किसी भी कीमत पर किसी दल या जाति या धर्म आदि संकीर्णता के अंध भक्त या प्यादे बनने के बजाय देश, प्रदेश व समाज के व्यापक दूरगामी हितों को ध्यान में रख कर ही अपना फेसला करें। किसी भी कीमत पर गलत व्यक्तियों को समाज, राष्ट्र व प्रदेश तथा छोटे छोटे संगठनों की बागडोर सोंपने से रोकने के लिए अपनी ताकत लगायें। जब दिशावान व लोकशाही को समर्पित लोग पदासीन होंगे तभी व्यवस्था सही दिशा में आगे बढेगी और समाज में विकास की गंगा बहते हुए अमन चैन का सम्राज्य भी होगा। नहीं तो इस दिशा में केवल गाल बजाना व एक दूसरे को कोसना एक प्रकार से विधवा विलाप ही होगा। अन्याय का विरोध करना व लोकशाही के लिए समर्पित लोगों को समर्थन करना ही हमारा पहला धर्म है। यही देश, समाज व प्रदेश के संग मानवता की सर्वोच्च सेवा है। शेष श्रीकृष्ण कृपा। हरि ओम तत्सत् । श्रीकृष्णाय् नमो।