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Tuesday, October 30, 2012


सृष्टि को गुलाम बनाने की किसी के प्रयास को विफल करती है प्रकृति 
सैंडी जैसे प्राकृतिक व अमेरिका जैसे तानाशाही मनोवृति से पृथ्वी की रक्षा करने के लिए जरूरत है एक मजबूत विश्व सरकार की
विश्व मानवता व लोकशाही को अपनी जिस ताकत के दम पर अमेरिका द्वितीय विश्व युद्ध के बाद निरंतर रौंद रहा है वह ताकत प्रकृति के एक साधारण से थपेडों ‘सैंड़ी तूफान’ के आगे बेबस, असहाय व शक्तिहीन बना हुआ है। अपने आप को विश्व
की एकमात्र महाशक्ति बन कर अपने निहित स्वार्थ के लिए अफगानिस्तान, इराक व लीबिया जैसे देशों को तबाह कर तथा 75 देशों की शांति पर अपने सैन्य ताकत व नाटो व संयुक्त राष्ट्र आदि गिरोह से ग्रहण लगा कर लाखों लोगों को अकाल ही मौत की नींद सुलाने वाले अमेरिकी हुक्मरान इस समय प्रकृति के इस जरा से थेप्पेडों को आगे खुद को बेबश पा कर प्रकृति के रहमोकरम पर जी रहे हैं। यह प्रकृति द्वारा अत्याचारी अमेरिकी हुक्मरान को एक संदेश भी है कि अपने गिरेवान में झांक कर इंसानियत को न रौंदे।परन्तु इस समय अमेरिका के करोड़ों निर्दोष लोगों का जीवन भी संकट में घिरा हुआ है। विश्व जनसमुदाय प्रकृति से लोगों के अमन चैन की दुआयें कर रहा है। हालांकि अमेरिका ने अपने विकसित तंत्र के कारण इस आपदा का पूर्वाभाष लगा कर इन क्षेत्रों से लाखों लोगों को पहले ही सुरक्षित स्थानों में सुरक्षित पंहुचा दिया था। इसी कारण ना के बराबर संख्या में लोग हताहत हुए। केवल अरबों की सम्पति का नुकसान हुआ। इस प्रकार की आपदा पूरे विश्व में कहीं भी आये पूरे संसार को पीडि़त लोगों को इस प्रकार की त्रासदी से उबारने के लिए आपसी प्रयत्न व सहयोग करना चाहिए। अब पूरे मानव समाज को एक बात समझ लेना चाहिए कि वे अपने निहित स्वार्थ के लिए चाहे किसी भी प्रकार महाद्वीप, देश, प्रदेश, धर्म, जाति, भाषा, नस्ल या लिंग भेद की दिवारें बना कर मानव समाज को अपने निहित स्वार्थो की पूर्ति के लिए बांट तो सकते हैं परन्तु प्रकृति की आंखों में धूल नहीं झोंक सकते। प्रकृति के आगे इस सृष्टि के सभी आकाश गंगायें, सूर्य, चंद, तारे, ग्रह, पृथ्वी, जीव, जन्तु, स्थावर, जल थल व नभ सब समान है। यह सारी सृष्टि की एक जीव की अंध तृष्णा के लिए नहीं बनाया गया। मनुष्य को चाहिए कि वह पूरे सृष्टि को अपना गुलाम बनाने व दूसरे जीवों की निर्मम हत्या, शोषण आदि करके अपना एकक्षत्र सम्राज्य स्थापित करने की आत्मघाती प्रवृति को त्याग कर सबको जीवो व जीने दो के भारतीय संस्कृति के मूल तत्व वासुदेव सर्वम को आत्मसात करे। प्रकृति किसी भी जीव को दूसरे जीव के जीवन को अकारण ही नष्ट करने की इजाजत नहीं देती। एक दूसरे की स्वतंत्रता व जीने के अधिकार का सबको सम्मान करना चाहिए। इसके साथ ही मनुष्य को सृष्टि के अन्य ग्रहों या आकाश गंगाओं के जीवों से भविष्य में होने वाले किसी प्रकार के खतरे खतरे या प्रकृति के सैंडी जैसे तूफानों, भूकम्पों सहित अन्य प्रकार के तमाम आपदाओं से समुचित ढ़ग से निपटने के लिए अब इस प्रकार की वर्तमान 200 से अधिक देशों की अलग अलग सरकारों की कोई जरूरत नहीं रह गयी है। अब इस सृष्टि के इस अनुपम ग्रह पृथ्वी के सृष्टि चक्र को व्यवस्थित संचालित करने के लिए पूरे विश्व के लिए एक सर्व हितकारी सरकार की ही जरूरत है जो कल्याणकारी कार्यो में पूरे पृथ्वी के संसाधनों का समुचित सदप्रयोग करे और तमाम प्रकार की प्राकृतिक आपदाओं से भी पृथ्वी के जीवों की रक्षा कर सके। क्योंकि पूरी पृथ्वी की सुरक्षा का जिम्मा न तो अमेरिका जेसे शोषक व तथाकथित महाशक्ति ही निभा सकता है व नहीं विश्व के 200 के करीब दिशाहीन असहाय अन्य सरकारें। आज पूरे विश्व के हुक्मरान अपने अपने देशों में कल्याणकारी व्यवस्था बनाये जाने के बजाय भ्रष्टाचार व विनाशकारी हथियारों की खरीद फरोख्त व उत्पादन में ही सारी पृथ्वी के संसाधनों का दुरप्रयोग कर रहे है। एक ऐसी विश्व सरकार बने जो सैडी जैसी प्राकृतिक आपदा या अमेरिका जेसे तानाशाह देश के दंश से पूरी पृथ्वी के अमन चैन की रक्षा कर सके।
सैंडी आ कर चले गया परन्तु अमेरिका को ही नहीं अपितु पूरे विश्व को एक संदेश दे गया कि सृष्टि के तमाम जीव जन्तुाओं को अपना गुलाम बना कर पूरी सृष्टि पर अपना शिकंजो जकड़ने की तरह हरपल कृत्य करते हुए प्रकृति को चुनोती देने वाला मनुष्य खुद को प्रकृति की संतान समझे मालिक नहीं। इससे एक बात स्पष्ट हो गयी कि मनुष्य प्रकृति के हाथों का एक मोहरा है खुद को सरताज न समझे। प्रकृति अपने संसाधनों से मनुष्य सहित सभी जीव जन्तुओं व पैड़ पौधों का पालन पोषण तो कर सकती है परन्तु मनुष्य जैसे किसी भी अतिवादी जन्तु की पूरी सृष्टि को अपना गुलाम बना कर अपनी अंध तृष्णा को पूरी करने की इजाजत नहीं देती।
 
देश में 65 साल में पहली बार बना कोई कबीना मंत्री 

-लोकशाही की रक्षा के लिए मिटाना होगा उत्तराखण्ड से जातिवाद का धृर्णित कलंक

- देश का एकमात्र प्रदेश है उत्तराखण्ड जहां बहुसंख्यक समाज को षडयंत्र के तहत लोकशाही के न्यायोचित हक हकूकों से व

ंचित किया गया‘आजादी के 65 साल बाद पहली बार उत्तराखण्ड का कोई राजपूत देष का कबीना मंत्री बना’! मेरे उत्तराखण्ड राज्य गठन जनांदोलन के मित्र व पिथोरागढ़ मूल के पत्रकार व इंजीनियर जगदीष भट्ट ने जैसे ही यह बात कही तो उत्तराखण्ड पत्रकार परिशद के पूर्व महासचिव व टिहरी बडियारगढ़ क्षेत्र के मूल निवासी अग्रणी पत्रकार दाताराम चमोली ने कहा ‘हाॅं नहीं तो अभी तक जितने भी आजादी के बाद उत्तराखण्ड मूल के देष में कबीना मंत्री बने उनमें चाहे गोविन्द बल्लभ पंत हो, या हेमवती नन्दन बहुगुणा, ब्रहमदत्त ,नारायणदत्त तिवारी, कृश्णचंद पंत व भुवनचंद खण्डूडी जैसे नेता रहे हों परन्तु उत्तराखण्ड में राजपूत समाज का 65 साल तक एक भी मंत्री नहीं बना। प्रदेष में जनसंख्या के हिसाब से यह उपेक्षा कहीं उचित नहीं थी। पहली बार मनमोहन सिंह की सरकार के मंत्रीमण्डल में हुए अंतिम फेरबदल में हरीष रावत को राज्य मंत्री से कबीना मंत्री बनाये जाने से यह दीवार एक प्रकार से टूट गयी। 
मैने कहा कि नेहरू जी के मंत्रीमण्डल में भक्त दर्षन सिंह रावत जी मंत्री थे तो भट्ट जी ने कहा वे राज्य मंत्री रहे हैं। राज्यमंत्री तो सतपाल महाराज, बच्चीसिंह रावत भी रहे है। हालांकि उत्तराखण्ड मूल के आनन्द चंद जोषी भी जो मध्यप्रदेष के सांसद रहे राज्य मंत्री रहे। हंसी मजाक में कही गयी यह बात में मुझे भारतीय राजनीति में चल रहे अलोकतांत्रित प्रवृति की तरफ बरबस ध्यान गया। 
28 अक्टूबर को प्रधानमंत्री मनमोहन द्वारा अपने मंत्रीमण्डल में किये गये विस्तार में हरीष रावत सहित 7 कबीना मंत्री व डेढ़ दर्जन के करीब राज्य मंत्री बनाया गया। इस पर उत्तराखण्ड के दिग्गज कांग्रेसी नेता हरीष रावत को कबीना मंत्री बनाये जाने पर मेरे दो पत्रकार मित्रों ने जो सटीक प्रतिक्रिया की उससे उत्तराखण्ड में लोकषाही के नाम पर स्थापित राजनैतिक दल कांग्रेस व भाजपा के फेलाये गये जातिवादी शडयंत्र को पूरी तरह बेनकाब कर दिया। इनके घिनौने षडयंत्र से उत्तराखण्ड में लगभग 60 प्रतिशत से अधिक जनसंख्या में भागीदारी निभाने वाले राजपूत समाज को बलात लोकशाही में भी न्यायोचित अवसर व सम्मान से ही नहीं हक हकूकों से भी वंचित किया हुआ है। 
देष की राजनीति की चाल व ढाल का जिसे भी जरा सा भी करीबी से भान हो वह यह जानता है कि देष की तमाम राजनैतिक दलों में (वामदलों को छोड़ कर) अधिकांष में जनसेवा व प्रतिभा के बजाय जाति, धर्म, क्षेत्र, व भाशा को ही सबसे बडी योग्यता मानी जाती है। भले ही ये अधिकांष दल व इनके नेता अपने भाशणों व घोशणा पत्रों में समाज में सर्वधर्म, जाति व क्षेत्र सम्भाव की दुहाई दें परन्तु अपने दल में संवेधानिक पदों, मुख्यमंत्री, मंत्री, सांसद, विधायक ही नहीं न्यायपालिका, दायित्वधारी व नौकरषाही आदि महत्वपूर्ण पदों में आसीन करते समय जनसमर्थन, योग्यता के बजाय अपने निहित स्वार्थो व जाति-धर्म, क्षेत्र को ही वरियता देते हैं। 
लोकषाही को कलंकित करने वाली इस घृर्णित मनोवृति का बहुत ही षर्मनाक षिकार देष की आजादी के बाद उत्तराखण्ड को झेलना पडा। यहां इसके लिए देष की मुख्य राजनैतिक पार्टी भाजपा व कांग्रेस ने ही लोकषाही को षर्मसार करने वाला कृत्य किया। ऐसा नहीं कि आजादी के प्रारम्भिक दषको से 65 साल तक यहां पर बहुसंख्यक राजपूत समाज के कोई जनप्रिय व प्रतिभाषाली नेता नहीं हुए। भाजपा व कांग्रेस में कई बार सांसद रहे टिहरी के पूर्व नरेष आजादी विगत 4 दषक से अधिक समय तक यहां से सांसद रहे परन्तु क्या मजाल षासन प्रषासन को निश्पक्ष ढ़ग से संचालित करने के अनुभव होने के बाबजूद उनको नजरांदाज करके अन्य लोगों को कबीना मंत्री बनाये गये। यही नरेन्द्रसिंह बिश्ट, प्रताप सिंह नेगी, जंगबहादूर बिश्ट, त्रेपन सिंह नेगी, सतपाल महाराज, महेन्द्रपाल आदि नेता रहे। 
इसकी छोटी व्यथा कांग्रेस को छोड़ कर वीपी सिंह के साथ गये यहां के दिग्गज नेता चन्द्र मोहन सिंह नेगी ने कांग्रेस में वापसी की गुहार करने गये वरिश्ट काग्रेसी मित्र से कही कि भाई मैं उत्तर प्रदेष में इतने सालों तक विधायक रहा, मेरे से कनिश्टों को मंत्री बनाया गया परन्तु मुझे तिवारी जी ने हमेषा मंत्री बनते समय नजरांदाज किया। अब पहली बार वीपीसिंह ने मुझे यह सम्मान दिया तो ऐसे व्यक्ति को छोड कर मैं कांग्रेस में कैसे वापस आ सकता हूॅ।
देष के षासन प्रषासन व लोकतंत्र से इसी जातिवादी षिकंजे से मुक्त करने के लिए व उपेक्षित बहुसंख्यक समाज की भी सहभागिता बढ़ाने के लिए आजादी के बाद जहां अजा/अजजा को जहां विधायिका सहित षासन प्रषासन में भी आरक्षण का प्रावधान किया गया । वहीं मण्डल कमीषन को लागू करके भी उपेक्षित अन्य जातियों को आरक्षण दिया गया। इसके बाद देष की राजनीति का स्वरूप ही बिहार, उप्र, मध्यप्रदेष सहित तमाम राज्यों में पूरी तरह से बदल गया। परन्तु उत्तराखण्ड को इसी जातिवादी षिंकजे में जकड़ने के लिए अभिषापित होना पडा। उत्तराखण्ड देष का पहला ऐसा राज्य है मण्डल कमीषन की रिपोर्ट लागू होने के बाद षासन प्रषासन व विधायिका में जहां बहुसंख्यक समाज को शडयंत्र के तहत हाषिये में डाला गया है। यह सब यहां पर काबिज कांग्रेस व भाजपा के संकीर्ण मानसिकता के नेताओं व उनके प्यादों के तिकडम से हो रहा है। 
उत्तराखण्ड राज्य गठन के बाद भी भले ही वहां पर अधिकांष पार्टियों में सांसदों, विधायकों, जिला पंचायत सदस्यो व ब्लाक अध्यक्ष में बहुसंख्यक राजपूत समाज के प्रतिनिधियों का एकक्षत्र वर्चस्व हैं परन्तु दिल्ली में भाजपा व कांग्रेस की सत्ता में मठाधीष बने आकाओं ने राज्य गठन के 12 सालों में सभी निर्वाचित मुख्यमंत्री के पद पर विधायकों की भावनाओं को दरकिनारे करके जिस षर्मनाक ढ़ग से दिल्ली से सजातीय वर्चस्व को बलात बनाये रखने के लिए कभी नारायण दत्त तिवारी, तो कभी खण्डूडी, कभी निषंक व तो अब विजय बहुगुणा को मुख्यमंत्री के रूप में थोप कर प्रदेष की लोकषाही को रौंदने का कृत्य किया। पहली निर्वाचित विधानसभा में तिवारी को जहां कांग्रेस ने थोपा, वहीं दूसरे निर्वाचित विधानसभा में अधिकांष भाजपा विधायकों का मुख्यमंत्री भगतसिंह कोष्यारी बनाये जाने की मांग को जिस प्रकार से दिल्ली के भाजपा मठाधीषों ने भुवनचंद खण्डूडी को थोप कर रौंदा उससे प्रदेष की जनता हैरान रह गयी, उसके बाद खण्डूडी जी के सारंगी मोह व अलोकषाही व्यवहार से खिन्न विधायकों ने जब खुला विद्रोह किया तो भाजपा नेतृत्व ने भगतसिंह कोष्यारी, मोहन सिंह ग्रामवासी, केदारसिंह फोनिया व त्रिवेन्द्रसिंह रावत जैसे वरिश्ट, साफछवि के समर्पित नेताओं को नजरांदाज करके बलात रमेष पौखरियाल निषंक को देवभूमि के रूप में विख्यात उत्तराखण्ड का मुख्यमंत्री बनाया तो प्रदेष की जनता ही नहीं देष के प्रबुद्ध लोग भौचंक्के रह गये। फिर जब निषंक के ख्याति के अनुसार प्रदेष में कुषासन से चारों तरफ भाजपा की थू थू होने लगी तो जनता का नब्ज देख कर भाजपा ने फिर साफ छवि के जननेताओं के बजाय फिर से भुवनचंद खण्डूडी को ही मुख्यमंत्री के रूप में थोप दिया। यही नहीं प्रदेष की जनता के जख्मों को रौदते हुए भाजपा ने जिस प्रकार से चुनाव जीतने के लिए खण्डूडी है जरूरी का आत्मघाती नारा दिया, वह न केवल विधानसभा चुनाव में खुद खण्डूडी को अपितु पूरे प्रदेष से भाजपा को भी सत्ता से बेदखल करने वाला साबित हुआ। भाजपा की इस जातिवादी अलोकषाही प्रवृति से मुक्ति चाहने के लिए प्रदेष की जनता ने जिस कांग्रेस के पक्ष में अपना जनादेष दिया वह कांग्रेस ने जब अधिकांष विधायकों की भावना को नजरांदाज करके विजय बहुगुणा को थोपने का निर्णय लिया तो उसका जो प्रचण्ड विरोध हुआ उससे यह प्रकरण पूरे देष में कांग्रेसी नेतृत्व की संकीर्ण अलोकतांत्रित मनोवृति को पूरी तरह बेनकाब कर गयी। इसके बाद टिहरी लोकसभा उपचुनाव में भी वहां के वरिश्ट कांग्रेसी नेताओं को कांग्रेसी टिकट देने के बजाय विजय बहुगुणा के ही राजनीति में नौषिखिये बेटे साकेत को चुनावी दंगल में उतार कर प्रदेष को लोकषाही को ठेंगा दिखाने की धृश्ठता की गयी, जिसका जनता ने मुंहतोड़ जवाब दे कर विजय बहुगुणा की लोकसभाई सीट (जो मुख्यमंत्री बनने के बाद रिक्त हुई,) पर अपने मुख्यमंत्री पद पर आसीन रहते हुए वे अपने बेटे को तमाम षासन प्रषासन झोंक कर भी जीता न सके। यहां पर केवल मुख्यमंत्री या केन्द्रीय पद का सवाल नहीं है अपितु यह भेदभाव दायित्वधारी, नौकरषाही, न्याय पाालिका सहित षासन प्रषासन के तमाम संस्थानों में उच्च पदों पर आसीन किये जाते समय देखने को लगातार मिल रहा है। वर्तमान लोकसभा चुनाव में उत्तराखण्ड से पांच से पांच लोकसभा सांसद कांग्रेस की झोली में जनता ने डाला। परन्तु इस मंत्रीमण्डल के पुर्नगठन से पहले एक को भी कबीना मंत्री नहीं बनाया। वहीं हिमाचल में एक सांसद वीरभद्र के रूप में जीते तो वहां से आनन्द षर्मा व वीरभद्र को कबीना मंत्री बना दिया गया। परन्तु वरिश्ट कांग्रेसी नेता हरीष रावत व देष में लाखों समर्थक रखने वाले लोकसभा में आये दिन जनहित के मुद्दों को उठाने वाले सतपाल महाराज की न केवल मत्रिमण्डल के कबीना मंत्री बनाते समय उपेक्षा की गयी। केवल हरीष रावत को राज्य मंत्री का झुनझुना थमाया गया। वहीं विधानसभा चुनाव में इन दोनो वरिश्ठ नेताओं को नजरांदाज करते हुए जिस प्रकार से जनता व अधिकांष विधायकों से समर्थन से दूर रहने वाले विजय बहुगुणा को बलात जिस प्रकार से मुख्यमंत्री के पद पर थोपा गया। उससे कांग्रेस व भाजपा के द्वारा यहां खेले जा रहे इस घोर राजनैतिक शडयंत्र को प्रदेष की अधिकांष जनता के समझ में आ गया। इससे नजता में घोर आक्रोष फेला हुआ है। लोग इस बात से आक्रोषित हैं कि जनता में जहां फेले सवर्ण व दलित जातिवादी कुरितियां कानून व सामाजिक जागरूकता से दूर की जा रही है। वहीं राजनीति द्वारा फेलायी जा रही इस जातिवाद को क्यों समाज के जागरूक लोग, पत्रकार नजरांदाज कर रहे है। इससे समाज में जहां राग द्वेश बढ़ रहा है। 
मैं इस बात से हैरान हूॅ कि जब भी मैने इस षोशण के खिलाफ आवाज उठायी मेरे कुछ मित्र इसे जातिवाद को बढावा देने का आरोप मंडने को तैयार हो जाते है। वे इस सच्चाई को जानते हुए भी नजरांदाज करते है। यह जातिवादी प्रवृति प्रदेष के विकास व वहां की षांति के साथ लोकषाही को ग्रहण लगा रही है। जन्म से अपने आप को श्रेश्ठ व दूसरों को हेय मानने वाली यह प्रवृति को जब तक प्रखर विरोध करके जड़ से समाप्त नहीं किया जायेगा तब तक यह समाज सही अर्थो में आगे बढ़ ही नहीं सकता। प्रदेष के प्रतिभावानों की उपेक्षा कर बाहर के दागदार व नेताओं के प्यादों को यहां पर महत्वपूर्ण पदों पर आसीन किया जा रहा है। यहां पर प्रदेष लोकसेवा आयोग से लेकर अधिकांष महत्वपूर्ण मंत्रालयों, विभागों व लाभप्रद दायित्वधारी विभागों में जिस प्रकार से बहुसंख्यक समाज को निरंतर नजरांदाज किया जा रहा है वह बहुत ही खतरनाक शडयंत्र है। केवल बहुसंख्यक समाज को ही नहीं अपितु दलितों के हितों की भी निरंतर उपेक्षा की जा रही है। अगर संवैधानिक आरक्षण की बाध्यता न होती तो यहां सत्ता पर काबिज कांग्रेस व भाजपा के मठाधीष दलित वर्ग के साथ भी ऐसा ही अत्याचार करते। 
मै जड़ चेतन सभी में परमात्मा का परमांष मानते हुए सबको श्री हरि का स्वरूप समझता हूॅ। इसी कारण अज्ञानी लोगों द्वारा जाति, धर्म, रंग, क्षेत्र आदि के नाम पर दूसरों का षोशण करने या अन्याय करने पर मुझे गहरी पीड़ा होती है, मैं हर अन्याय के विरोध में आवाज उठाता हॅू। मैं नहीं चाहता हॅू कि किसी का षोशण जाति, धर्म या क्षेत्र के नाम पर किया जाये। मैं प्रतिभा के साथ साथ सभी की भागेदारी को षासन प्रषासन में देखना चाहता हॅू। 
समाज में जातिवाद या धर्म या क्षेत्रवाद फेलाने वालों को मैं समाज का दुष्मन मानता हॅू और इस जहर का मूक संरक्षण देने वालों को भी मैं समाज को उतना ही दुष्मन मानता हॅू। हालांकि प्रदेष की इस संकीर्ण जातिवादी व्यवस्था में प्रदेष में तीनों प्रमुख जातियों के कल्याण के लिए संगठन चलाने वाले मेरे करीबी मित्र है। इनमें उत्तराखण्ड षिल्पकार चेतना मंच के अध्यक्ष महेष चन्द्रा, अल्मोडा जनपद मूल के वल्र्ड ब्राह्मण फाउंडेषन के राश्ट्रीय उपाध्यक्ष व उत्तराखण्ड अध्यक्ष के सी पाण्डे व उत्तराखण्ड क्षेत्रिय कल्याण मंच के अध्यक्ष व्योमेन्द्र नयाल प्रमुख है। इसके बाबजूद मैं किसी जाति विषेश का बर्चस्व बनाने या किसी को उपेक्षित करने की किसी प्रकार की मानसिकता का प्रबल विरोधी हूॅ। 
अपने दोनों मित्रों की बात सुन कर भौचंक्का रहा, मेरे साथ उस समय अखिल भारतीय युवक कांग्रेस के चुनाव इंचार्ज राजपाल बिश्ट, देष के अग्रणी नेता रहे जगजीवन राम के करीबी सहयोगी टी सी गौतम, सुलतानपुर से आजाद खान व राकांपा के श्री पाण्डे भी खडे थे। हमारे सभी साथी इस बात पर हंसने लगे।
28 अक्टूबर को प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के मंत्रीमण्डल में हुए फेरबदल के बाद कांग्रेस के दिग्गज नेता हरीष रावत के कबीना मंत्री बनने पर मैं , उनके दिल्ली निवास 9 तीन मूर्ति लेन पर अपने उत्तराखण्ड मानवाधिकार संगठन के अध्यक्ष एस के षर्मा, श्रीमती षर्मा, इंजीनियर जगदीष भट्ट, अग्रणी राजनैतिक विषलेशक टीसी गौतम व आजाद खाॅ के साथ वहां पंहुचा था। वहीं पर मुझे दाताराम चमोली सहित अपने कई पत्रकार बंधु भी मिले। यहां पर उत्तराखण्डी ही नहीं पूरे देष के विभिन्न समाज से जुडे समाजसेवी, कांग्रेसी, कर्मचारी सहित बडी संख्या में हरीष रावत के समर्थक पंहुचे हुए थे। भले ही मेरे मित्रों ने मजाक के तर्ज पर यह टिप्पणी की हो परन्तु यह गंभीर समस्या है जिसके खिलाफ उत्तराखण्ड के आज हर जागरूक आदमी को खडा उठना हैं। इसमें भी खासकर राजनैताओं, समाजसेविया व पत्रकारों को। अगर कल यही समस्या विकराल बनी या उपेक्षित समाज में आक्रोष बढ़ा और वह अपना वर्चस्व ही प्रदेष के हर क्षेत्र में बिहार,उप्र, तमिलनाडू या आंध्र की तरह करने लगा तो प्रदेष का कहीं हित नहीं होगा। प्रदेष में सभी को अपनी प्रतिभा के अनुसार सम्मान व अवसर मिले किसी को भी जाति, धर्म व क्षेत्र के कारण वरियता या उपेक्षा का दंष न झेलना पडे। तभी प्रदेष में स्वस्थ्य समाज की स्थापना होगी। परन्तु इस जड़ता को तोडने के मार्ग में स्थापित लोग व उनके प्यादे जहां ंतहां विरोध करेंगे। इन सबकी काॅंव काॅंव को नजरांदाज करके आज नयी पीढ़ी को इस तथ्य को समाने रख कर करना चाहिए कि अगर यह भेदभाव व उपेक्षा मेरी होती तो मुझे कैसे लगता। तभी प्रदेष में सच्चा लोकतंत्र स्थापित होगा। षेश श्रीकृश्ण कृपा। हरि औम तत्सत्। श्रीकृणाय् नमो।

Saturday, October 27, 2012


2014 के चुनावी भंवर में कांग्रेस को डूबने से नहीं बचा पायेगा मनमोहनी मंत्रीमण्डल के विस्तार का टोटका भी

देष की जनता ने सोनिया गांधी के नेतृत्व पर विष्वास करके जनता की आषाओं पर खरा उतरने में असफल रही एनडीए गठबंधन को सत्ताच्युत किया था। देष को सही षासन दे कर विकास की रहा में चलाने का दायित्व निर्वाह करने के बजाय सोनिया गांधी ने अमेरिका के प्रिय मनमोहन सिंह को देष का प्रधानमंत्री बनाने की हिमालयी भूल की। मनमोहन सिंह को बनाने के बाद जिस ढ़ग से देष की बर्बादी की राह में अपने कुषासन से धकेला उससे देष मंहगाई, भ्रश्टाचार, आतंकवाद के  षिकंजे में बुरी तरह से जकड़ गया। आम जनता का जीना दुष्वार हो रखा है परन्तु क्या मजाल आम जनता के हित में काम करने की दुहाई देने वाली कांग्रेस व उसकी आला कमान सोनिया गांधी व राहुल गांधी के कानो में जूॅं तक नहीं रेंग रही है। वह देष व पार्टी के हित में मनमोहन सिंह को अविलम्ब प्रधानमंत्री के पद से हटाने के बजाय उसके कुषासन को ही बढावा दे रही है।  मनमोहन सरकार अमेरिका के हित में व भारतीय हितों को जिस निर्ममता से रौंद रही है उससे उसका एक पल के लिए ही देष का भाग्य विधाता बने रहना या बनाये रखना किसी बडी त्रासदी से कम नहीं है। देष की जनभावनाओं से खिलवाड़ करने व जनविष्वास से खिलवाड करने का दण्ड कांग्रेस को 2014 के चुनाव में सत्ता से बाहर करके महाकाल देगा। इसके साथ भाजपा ने भी जो दोहरा मापदण्ड अपना रखा हे उसके कारण उसको भी सत्ता से दूर रहने के लिए मुलायम सिंह की तरह ही मजबूर होना पडेगा। देष की सत्ता की मुख्य बागडोर कांग्रेस व भाजपा के हाथ से छिटक कर छोटे दलों के नेतृत्व में देष की सरकार बनेगी। इसमें ममता बनर्जी, या जय ललिता या अन्य देष की बागडोर संभालेगा जिसको बाहर से समर्थन देने में भाजपा व कांग्रेस में उसी प्रकार प्रतियोगिता होगी जिस प्रकार कांग्रेस को समर्थन देने में सपा व बसपा में वर्तमान में प्रतियोगिता होती है।

Friday, October 26, 2012




-देशहित में मनमोहन को प्रधानमंत्री पद व गडकरी भाजपा अध्यक्ष पद से हटें

-कांग्रेस की तरह भ्रश्टाचार को आत्मसात कर आत्महत्या न करे भाजपा, 

-गडकरी हटा कर गोविन्दाचार्य को बनाये अध्यक्ष भाजपा 

आज भारत बहुत ही संकट के दौर से गुजर रहा है। यहां देष की एकता व अखण्डता के रक्षक होने साथ साथ  देष में लोकषाही को संचालित करने वाली देष की प्रमुख दोनों  राश्ट्रीय पार्टी कांग्रेस व भाजपा दोनों पर दिषाहीन व कमजोर नेतृत्व होने के कारण संकट के बादल मंडराने लगे है। इसी कारण देष भ्रश्टाचार, मंहगाई, आतंकवाद आदि समस्याओं से बुरी तरह जकड़ गया है उसके लिए मुख्य रूप से जिम्मेदार देष के हितों के प्रति उदासीन अमेरिकापरस्त प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को अविलम्ब अपने पद से इस्तीफा दे देना चाहिए। वहीं भ्रश्टाचार के आरोप में बुरी तरह से घिरे देष की मुख्य विपक्षी दल के अध्यक्ष नितीन गड़करी भी तत्काल अपने पद से इस्तीफा दे। अगर दोनों अपने विवेक से षीघ्र इस्तीफा नहीं देते हैं तो प्रधानमंत्री को कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी व गडकरी को संघ तत्काल पद से बर्खास्त करने का काम करें। आज देष के आम जनता का जीना मनमोहन सिंह सरकार के मंहगाई व भ्रश्टाचार रूपि कुषासन ने हराम कर रखा है। ऐसे में उनको बनाय रखते हुए मंत्री मण्डल में किसी प्रकार का फेरबदल या राहुल गांधी को संगठन का उपाध्यक्ष या कार्यकारी अध्यक्ष बनाने के टोटके से कांग्रेस व देष को कोई लाभ नहीं होगा। उन्हें देष में जमीने खरीदने के बजाय जनादेष का सम्मान करना सीखना चाहिए।
सोनिया गांधी व राहुल गांधी को इस बात का भान होना चाहिए कि देष को  मनमोहन जैसे पदलोलुपु व अपने दायित्वों को नजरांदाज करने वाले व्यक्ति को झेलना बेहद आत्मघाती साबित होगा। वहीं इसके साथ कांग्रेस आला नेतृत्व को चाहिए कि वह सलमान खुर्षीद, जैसे भ्रश्टाचार के आरोपों से घिरे व कपिल सिब्बल, आनन्द षर्मा आदि जनता व संगठन से दूर  रहने वाले मंत्रियों को तत्काल सरकार से हटाये।  इसके साथ संगठन से जनार्जन द्विवेदी जैसे जनता से कटे हुए व्यक्ति को दूर रखें।
 वहीं दूसरी तरफ भाजपा जो देष में भारतीय संस्कृति व लोकषाही को बचाने का दंभ भर रही है और जिसके कंधों पर मुख्य विपक्षी दल का गुरूतर दायित्व भी है उसमें गडकरी और सुशमा जेसे नेता जब दल की खेवनहार बनेंगे तो ऐसी पार्टी का क्या भविश्य होगा?  जिस प्रकार से कांग्रेस में देषभक्त, जनसेवकों, साफ छवि के नेताओं के बजाय भ्रश्टाचारियों को संगठन व सत्ता दोनों में वरियता दे कर अपनी आत्महत्या करने में उतारू है वही रोग लगता है भाजपा को भी लग गया है। कम से कम भ्रश्टाचार के आरोपों मंे घिरे अपने राश्ट्रीय अध्यक्ष को जिस षर्मनाक ढ़ग से यानी कांग्रेस की तरह बचाव करके उसको बनाये रखने का काम भाजपा कर रही है। उससे भाजपा को भी कांग्रेस की तरह सत्ताच्युत होने का दण्ड मिलेगा। आगामी 2014 में दोनों पार्टियां देष की सत्ता से दूर रहेगी।
संघ भले ही गडकरी के ताजा विवाद से अपने आप को अलग रखने की कोषिष कर रहा हो परन्तु जिस प्रकार से उन्होंने गडकरी को महाराश्ट्र की प्रदेष की राजनीति के एक क्षत्रप गडकरी को भाजपा का राश्ट्रीय अध्यक्ष बनाने का काम किया अब संघ का प्रायष्चित केवल इसे भाजपा का आन्तरिक मामला बता कर नहीं दूर होने वाला। संघ को अविलम्ब गडकरी को अध्यक्ष पद से इस्तीफा दिला कर भाजपा का राश्ट्रीय अध्यक्ष या कार्यकारी अध्यक्ष आडवाणी, जेटली, सुशमा, राजनाथ, जोषी आदि पदलोलुपु लोगों के कंधों पर सौंपने के बजाय देश के सबसे जमीनी व अनुभवी जनप्रिय नेता गोविन्दाचार्य जो भाजपा के राश्ट्रीय संगठन महामंत्री भी रहे उनकी ताजपोषी करके भाजपा की रक्षा करनी चाहिए। संघ व भाजपा के  कुछ संकीर्ण नेताओं ने जिस प्रकार से गोविन्दाचार्य जैसे अनुभवी व देश-जनता की नब्ज पहचानने वाले नेता की शर्मनाक उपेक्षा की वह देष व भाजपा के लिए बहुत ही मंहगा पडा। अगर आज गोविन्दाचार्य की उपेक्षा भाजपा व संघ नहीं करता तो आज  भाजपा को गडकरी जैसे प्रकरणों से शर्मसार नहीं होना पड़ता। गडकरी को बनाये रखने का दण्ड हिमाचल के साथ गुजरात में भी भुगतना पडेगा।   यहां पर एक बात स्पश्ट कर दे की भाजपा व कांग्रेस दोनों मात्र राजनैतिक दल ही नहीं वर्तमान में देश की एकता अखण्डता के साथ लोकषाही की जीवन धारा संचालित करने वाली पार्टी भी है। इसलिए दोनों पार्टियों का कमजोर होना या गलत या  कमजोर हाथों में नेतृत्व रहने का दण्ड देश को भुगतना पड रहा है। इनकी कमजोरी के कारण आज देश में आरजकता के साथ साथ दिषाहिन षासन प्रषासन हो गया है।


Thursday, October 25, 2012


-उत्तराखण्ड मेें जमीनों को आडवाणी की बेटी सहित तमाम एनजीओ को लुटाई जमीनों के पट्टे रद्द हो

-विजय बहुगुणा सरकार व विपक्ष को क्या सांप सुंघ गया 

जिस प्रकार से हरियाणा, हिमाचल व महाराश्ट्र सहित अनैक राज्यों में वहां की सरकारों द्वारा नेताओं व नेताओं के रिष्तेदारों को जमीनें कोडियों के भाव से दी जाने पर बबाल मच रहा है। हिमाचल प्रदेष में प्रियंका गांधी व भ्रश्टाचार के खिलाफ जंग लड रहे अण्णा व केजरीवाल के आंखों के तारे प्रषांत भूशण, हरियाणा में सोनिया गांधी के दामाद बढ़ेरा व राहुल गांधी तथा महाराश्ट्र में भाजपा के राश्ट्रीय अध्यक्ष व संघ के आंखों के तारे गडकरी को जमीने दिये जाने पर बबाल मच रहा है। परन्तु अफसोस हे कि सन 2000 राज्य गठन के बाद उत्तराखण्ड में पहली मनोनीत प्रदेष सरकार के मुखिया नित्यानन्द स्वामी के राज में जिस प्रकार से भाजपा के आला नेताओं के बच्चों व प्यादों वहां की जमीने उनके एनजीओ व अन्य नाम से आवंटित की गयी वह परमपरा कांग्रेस के तिवारी राज से अब तक बहुत ही षर्मनाक  ढ़ग से जारी है। उस मुद्दे पर न तो कांग्रेसी व नहीं भाजपाई मुंह खोलने के लिए तैयार नहीं है। सुत्रों के अनुसार राज्य गठन के बाद भाजपा के आला नेता लाल कृश्ण आडवाणी की बेटी प्रतिभा आडवाणी व उनके स्नेही तरूण विजय आदि के नाम चर्चा में आ रहे है। तिवारी से लेकर अब तक के राज में कई कांग्रेसी व अन्य लोगों को यहां की जमीने खैरात की तरह कोडियों के भाव आवंटित की गयी  उन सब पर प्रदेष की राजनीति में एक प्रकार से सांप सुंघा हुआ है। जिस प्रकार वहां पर सेज के नाम पर या चुनाव जीतने के लिए विजय बहुगुणा ने जमीनी पट्टे का आवंटन किया वह सबके नये तरीके है। जिस प्रकार उप्र की सरकारों ने किसानों की जमीने सेज के नाम से औने पौने दामों में ले कर उसको बिल्डरों को आवंटित की उसका भण्डा वहां के जागरूक किसानों के व्यापक आंदोलन से हुआ। परन्तु उत्तराखण्ड में तिवारी के राज में पंत नगर कृर्शि विष्व विद्यालय की जमीने, भंवाली में महत्वपूर्ण टीबी संस्थान की जमीने सहित अनैक सोना उगलने वाली जमीने या तो नेताओं के रिष्तेदारों को आवंटित की गयी या पूंजी पतियों को औने पौने दामों पर लुटवा दी गयी। उत्तराखण्ड में भाजपा व कांग्रेस के सत्तासीनों को ये लगा षायद उत्तराखण्ड का कोई पूछने वाला नहीं है। यहां पर जिस प्रकार से नदी ही नहीं जंगल व गाड  गदेरे व पर्वत कहीं जल विद्युत के नाम पर तो कहीं पर्यटन बढाने के नाम पर भू-जल माफियाओं को लुटा दी गयी है।
यहां सबसे षर्मनाक स्थिति यह हो गयी है कि प्रदेष में ठेकेदारी प्रथा में  राजनीति का पतन हो गया हैं। षराब प जल विद्युत माफियाओं के गोद में दम तोड़ रही उत्तराखण्ड की राजनीति में न किसी को प्रदेष के हितों का भान हे व नहीं इनकी खुद की कहीं सम्मान है। ये कांग्रेस भाजपा के दिल्ली दरवारियों के दरवान प्रदेष की राजनीति में भाग्य विधाता बन जाते है। यहां पर क्षेत्रीय दलों के नेतृत्व की दिषाहीनता सत्तालोलुपता के कारण वे जनता से कट कर खुद आपसी द्वंद में लड़ झगड कर दम तोड़ चूके है। प्रदेष को इस त्रासदीी से उबारने के लिए तमाम आंदोलनकारी ताकतों ने एक जूट हो कर प्रदेष के संसाधनों की रक्षा के लिए सांझा आंदोलन नहीं चलाते हुए इन खैराद की तरह आवंटित किये गये पट्टों को रद्द नहीं किया तो यह सीमान्त प्रदेष नहीं बच पायेगा।

भगवान बचाये हर पल दुनिया हमारी

छल प्रपंच और राग-द्वेश से भरी हुई है दुनिया सारी।
तुम्ही बताओ इस दुनिया से कैसे निभेगी हमारी यारी ।।
चारों तरफ हैं इस दुनिया में हुए सत्तासीन भश्टाचारी ।
तुम्हीं बताओ मेरे साथी कैसे सर उठायेगी ईमानदारी ।।
धर्म कर्म और राज काज पर काबिज हुए है दुराचारी।
तुम्हीं बताओं ऐसी दुनिया में कैसे जींदा रहे सदाचारी।।
जाति धर्म व रंगभेद के असुरों से जकडी दुनिया सारी ।
ऐसी दुनिया में कैसे रहेगी एक पल भी श्री षांति प्यारी।।
प्रपंची लोगों को कभी नहीं मिलती है प्रभु कृपा प्यारी।
विना श्री हरि की कृपा से व्यर्थ है ये सारी दुनियादारी ।।
दया धर्म व न्याय प्रेम से रहित प्राणी ही है अत्याचारी
ऐसे लोगो से भगवान बचाये हर पल दुनिया हमारी।।
जो निहित स्वार्थ में डूब कर बनते है धृतराश्ट गंधारी
दुसरों का दुख देने  वालेों को खुद काल बने कसाई।।
दो दिन के जीवन में आओ मिल जुल रहे सब भाई
ना तेरा ना मेरा है जग यहां तो दो पल रेन बसाई।।
-देवसिंह रावत
(षुक्रवार 26 अक्टूबर 2012 प्रात 11 बजे )

Wednesday, October 24, 2012


असत्य पर सत्य की जय हो


असत्य पर सत्य की जय हो
अधर्म पर धर्म की जय हो 
अन्याय न कहीं फले फूले
अधर्म भी सर उठा न सके
पाप जग को रूला न सके
ऐसा दीप ज्ञान का ही जले
मन में कभीं राग द्वेश न रहे 
सबके हित में जिन्दगी जीयें
आओ सभी के लिए हम जींये
असत्य पर सत्य की जय करें।
-देवसिंह रावत
(विजय दषमी के पावन पर्व पर 24 अक्टूबर 2012 रात के 9.30 बजे)

Tuesday, October 23, 2012

गैरसैंण राजधानी बनने से होगी लोकशाही की जीत 

इससे खुलेगे उत्तराखण्ड विकास के द्वार 

उत्तराखण्ड राज्य गठन जनांदोलन में हमारी प्रमुखतः जो दो माग थी वह था उत्तराखण्ड राज्य का गठन करने व प्रदेश की राजधानी गैरसैंण बनाने की प्रमुखता से थी। प
रन्तु राज्य गठन के बाद जनतंत्र का गला घो।टने वाली सरकारों ने भले ही जन आक्रोश व जनदवाब को देखते हुए भले राज्य का गठन तो कर दिया परन्तु अपना अलोकतांत्रिक चेहरा खुद बेनकाब करते हुए प्रदेश का नाम उत्तराखण्ड रख दिया और राजधानी गैरसेंण बनाने के बजाय उसे षडयंत्र के तहत देहरादून में थोप दिया। यही नहीं राजधानी गैरसेंण न बने इसके लिए जहां एक तरफ राजधानी चयन आयोग जैसे टोटका प्रदेश के लोगों की आंखों में धूल झोंकने के लिए बना कर प्रदेश के करोड़ो रूपये के संसाधन एक दशक तक इस पर बर्बाद किये गये। वहीं दूसरी तरफ गुपचुप करके उत्तराखण्ड से द्रोह करके राजधानी बलात देहरादून में ही थोपते हुए यहां पर इससे सम्बंधित कई भवन तक बना दिये गये।
जब खुद मैने प्रथम निर्वाचित मुख्यमंत्री तिवारी से उत्तराखण्ड निवास में गैरसेंण राजधानी बनाने के लिए आग्रह किया तो उन्होंने गुस्से में तमतमाते हुए कहा कि कैसे बनेगी गैरसेंण राजधानी मैने देहरादून में सभी कार्यालय बना दिये। यह मेरी पहचान साफ होने पर अपने गुस्से को काबू न रख सकने वाले भारत के दिग्गज तिवारी के मूंह से सच्चाई सच में छलक ही गयी।
उसके बाद मैने मुख्यमंत्री बने भाजपा नेता खण्डूडी से इस राजधानी चयन आयोग को भंग न किये जाने पर सवाल किये तो उन्होंने बहुत ही मासूमियत से जवाब दिया कि उन्होने अभी अपनी रिपोर्ट ही सरकार को नहीं सौंपी। मैने खण्डूडी जी से सवाल किया कि आप लोगों ने क्या इस आयोग के अध्यक्ष की पेंशन लगा दी है। क्या जरूरत है उनकी रिपोर्ट की। जिस सवाल को लोगों ने सबसे पहले सुलझा दिया उसमें प्रदेश के संसाधन व समय क्यों नष्ट किये जा रहे है।
उसके कई महिनों बाद इस आयोग की रिपोर्ट सरकार को सोंपी। न तो खण्डूडी जी ने व नहीं उसके बाद मुख्यमंत्री बने निशंक ने इस दिशा में कुछ काम किया। मैने निशंक जी से मुख्यमंत्री बनने के बाद उत्तराखण्ड निवास में आधा घण्टा की खुली चर्चा की थी जिसमें एक दर्जन से अधिक देश की प्रबुद्ध मीडिया, चार दर्जाधारी व प्रदेश सरकार के कई अधिकारी भी उपस्थित थे। मैने तत्कालीन मुख्यमंत्री से कहा था कि निशंक जी आप गैरसेंण राजधानी बना दो प्रदेश की जनता आपको यशवंत सिंह परमार की तरह याद करेगी। इसके साथ मेने उनको आगाह किया था कि उत्तराखण्ड देवभूमि है इस धरती से अन्याय करने वाले मुलायम-राव ही नहीं तिवारी, खण्डूडी भी अपनी छवि को तार तार कर चूके हैं। आपको परमात्मा ने अवसर दिया है इस दुर्लभ अवसर का सदप्रयोग नहीं करोगे तो आपको भी महाकाल माफ नहीं करेगा। निशंक ने मुझे आश्वासन दिया था परन्तु सत्तामद में शायद वे भूल गये। आज कहां है सत्तांधों को समय ऐसी मार मारता है कि उनको प्रायश्चित करने का भी समय नहीं मिलता।
अब भाजपा को उत्तराखण्ड की जनभावनाओं से खिलवाड करने का दण्ड दे कर महाकाल ने कांग्रेस को अवसर दिया। परन्तु कांग्रेस आलाकमान ने विजय बहुगुणा को मुख्यमंत्री बना कर जनादेश का अपमान किया। इसी का दण्ड अब कांग्रेस 2014 में देश से सत्ता से दूर होगी और भाजपा भी सत्तासीन नहीं हो पायेगी। मुलायम सिंह का तो मतलब ही नहीं ।
अब उत्तराखण्ड के मुख्यमंत्री बहुगुणा गैरसेंण में अपने मंत्रीमण्डल की बैठक 3 नवम्बर को कर रहे है। इसका स्वागत है। चाहे आधे मन से या लोगों की आंखों में धूल झोंकने के लिए यह नाटक कर रहे है फिर भी इससे गैरसेंण राजधानी बनाने की मांग को ही बल मिलेगा।
मने हरीश रावत, सतपाल महाराज व प्रदीप टम्टा से दो टूक शब्दों में अपनी मूल बात बता दी है कि गैरसेंण राजधानी से कम किसी कीमत पर स्वीकार नहीं। प्रदेश के सत्तासीनों को हर हाल में राजधानी गैरसेंण बनानी होगी। आंदोलनकारी संगठनों व बुद्धिजीवियों को समय का सदप्रयोग करना चाहिए। इस मांग को निरंतर बल देना चाहिए। जब तक प्रदेश की राजधानी गैरसेंण नहीं बनेगी तब तक प्रदेश के हुक्मरानों का ध्यान पर्वतीय क्षेत्र जिसके समग्र विकास के लिए उत्तराखण्ड राज्य के गठन का ऐतिहासिक आंदोलन हुआ।
आज राज्य गठन के 12 साल बाद भी प्रदेश से न तो पलायन रूका। गांव के गांव विरान हो रहे है। गांवों की स्कूल,चिकित्सालय सहित तमाम सरकारी कार्यालय मरणासन्न है। प्रदेश में विकास के बजाय भ्रष्टाचार का शिकंजा जकडा हुआ है। प्रदेश में एनजीओ का शिकंजा दिन रात भ्रष्टाचार से प्रदेश के संसाधनों को बर्बाद करने में लगे हे। अगर प्रदेश को जीवंत रखना है तो जन भावनाओं का सम्मान करते हुए राजधानी गैरसेंण बनानी नितांत आवश्यक है। यह देखना बाकी है कि लोकतंत्र की जीत होती है या थोपशाही की। चंद अवसरवादी व सुविधाभोगी लोग कैसे प्रदेश की जनांकांक्षाओं को अपने इशारे पर नचा कर लोकतंत्र का गला घोंटते है। राजधानी गैरसेंण बनानी ही सच्ची श्रद्धांजलि होगी राज्य आंदोलनकारी शहीदों व बाबा मोहन उत्तराखण्डी को। अब सरकार को जो बजट राजधानी बनाने के लिए केन्द्र से मिला है उसको तत्काल यहां गैरसेंण में राजधानी बनाने में खर्च करना चाहिए। यही लोकतंत्र में जायज है व यही जनादेश का सम्मान है।

Sunday, October 21, 2012


नीरो से बदतर साबित हुए सोनिया, मनमोहन, मंत्री व देश के नेता

-भ्रष्टाचार व मंहगाई से आम जनता त्रस्त परन्तु मनमोहन व उनकी सरकार मस्त 

-जयराम में हिम्मत है तो जनता से पहले जनता को खुले में शौंच करने के लिए मजबूर करने वाले हुक्मरानों को डालें जेल 

‘सलमान खुर्शीद प्रकरण पर कांग्रेस आला कमान सोनिया गांधी व मनमोहन सिंह की शर्मनाक मूकता को देख कर व कांग्रेसी नेताओं व मंत्रियों के शर्मसार करने वाले बयानों को सुन कर मेरे मन में एक विचार क्रोंधा नीरो तू मरा नहीं तू आज भले ही रोम में जींदा न हो पर तू भारत में जींदा है। सोनिया व मनमोहन सिंह की सरकार के रूप में आम आदमियों के जख्मों को कुरेद रहा है।
बचपन में मेरी तरह आपने भी सुना होगा कि जब रोम जल रहा था तो उस समय वहां का सत्तालोलुपु शासक नीरों चैन की बंसी बजा रहा था। इस कहावत को पढ़ते या सुनते मुझे लगता था कि शायद यह बहुत ही अतिश्योक्ति पूर्ण कहावत है। सच में ऐसा थोड़ी हुआ होगा। परन्तु आज भारत में सोनिया गांधी के नेतृत्व वाली मनमोहन सिंह की सरकार के कारनामों को देख कर लगता है कि सच में नीरो अब रोम में नहीं भारत में ही जींदा है।  देश में मंहगाई, भ्रष्टाचार, आतंकवाद व कुशासन से त्रस्त है। जनता का जीना दूश्वार हो रखा है। कभी लाखों करोड़ रूपये का 2जी घोटाला तो कभी इसको मात करने वाला कोयला घोटाला। अब तो हद हो गयी जिन विकलांग व्यक्तियों पर आम आदमी भी रहम करता है उनके कल्यार्थ योजनाओं को मनमोहन सिंह के मंत्री द्वारा संचालित ट्रस्ट ने ही चूना लगा कर डकार दिया। सबकुछ  देख कर भी न तो सोनिया गांधी को व नहीं मनमोहन सिंह को नेतिकता याद आ रही है अपना दायित्व का ही बोध हो रहा है। मंत्री व अन्य नेताओं के कारनामों व बयानबाजी की बात लोगों के जख्मों को कुरेदने का काफी है। यह केवल कांग्रेस व उनके नेताओं की बात नहीं आज देश की अधिकांश राजनीति ही इतनी भ्रष्ट हो गयी कि आम जनता का विश्वास ही इनसे उठ गया है। आज कांग्रेसी सरकार के कृत्यों को देख कर आम आदमी को कांग्रेस का हाथ आम आदमी के साथ का नारा भी जख्मों को कुरेदने वाला ही प्रतीत हो रहा है।
केन्द्रीय मंत्री जयराम रमेश भी लगता है अपने प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की तरह ही हवाई बातें करके सरकार के कुशासन, मंहगाई व भ्रष्टाचार से मरणाशन देश की जनता के जख्मों को कुरेदने की धृष्ठता कर रहे है। जिस प्रकार केन्द्रीय मंत्री जयराम रमेश ने राजस्थान के कोटा जनपद के दौरे के समय सांगोड में निर्मल यात्रा कार्यक्रम में तुगलकी फरमान किया कि देश में खुले में शौंच करने वालों को जेल भेज दिया जायेगा। केन्द्रीय मंत्री जयराम रमेश को इस बात का भान होना चाहिए कि देश की आधी से अधिक आवादी के पास आज शौचालय की सुविधा से वंचित यहां के हुक्मरानों ने रखा हैं उनको आम जनता को जेल डालने का साहस है तो वे  पहले अपने सरकार के मुखिया मनमोहन सिंह सहित तमाम अब तक की सरकार में मंत्री रहे व मुख्यमंत्री आदि रहे नेताओं तथा नौकरशाहों को जेल में डाल देना चाहिए, जिन्होने देश की आम जनता की इतनी उपेक्षा व शोषण किया कि वे आजादी के 65 साल बाद भी खुले में शौंच करने के लिए मजबूर हैं। शायद प्रधानमंत्री सहित कांग्रेस के अन्य नेताओं को इस बात का भान ही नहीं है कि देश में आम आदमियों की माली हालत उनके कुशासन से कितनी चरमा गयी है। देश की संस्कृति क्या है।  जिस प्रकार से कबीना मंत्री जयराम रमेश ने उक्त धमकी बेहाल जनता को दी उससे साफ लगता है कि केन्द्रीय मंत्री को देश की हकीकत का भान उसी प्रकार नहीं है । शायद उनको लगता है कि देश के अधिकांश गरीब जनता जो सरकार की नालायकी के कारण खुले में शौंच जाने के लिए विवश है वे अपनी खुशी से जानबुझ कर ऐसा काम करते हैं। अभी जयराम रमेश व उनके प्रधानमंत्री को इस बात का अहसास ही नहीं होगा कि देश की आम जनता पानी, बिजली, शिक्षा, स्वास्थ्य व सम्मान ही नहीं दो वक्त की रोजी रोटी के लिए कितने पापड़ बेलने पडने के बाबजूद इससे वंचित है।
जिस प्रकार योजना आयोग के उपाध्यक्ष मोंटेक जो अपने प्रयोग के लिए शौंचालय तो लाखों का खर्च कर देते हैं परन्तु आम गरीब जनता के लिए एक दिन के गुजारे के लिए 30-35 रूपया भी काफी बताते है। कांग्रेसी सरकार के कुशासन से गैस सिलेण्डर की कीमते बढ़ने पर जिस बेहुदा ढ़ग से गुस्से में रेणुका चैधरी झलाते हुए कही कि 900 रूपये में गैस सिलेण्डर कौन नहीं ले सकता है ? इसी प्रकार जयराम रमेश भी कभी शौचालय की जरूरत पर उसकी तुलना मंदिर से करके देश के बहुसंख्यक समाज के लोगों की भावनाओं को अपनी मूर्खता से रौदने का कृत्य करते है।  केन्द्रीय मंत्री जयराम रमेश को जहां मनमोहन व मोंटेक सिंह से सो गुना ईमानदार व कर्मठ मंत्री माना जाता परन्तु जिस प्रकार वे बेवजह ज्यादा बोलजाते हैं उससे वे जनता की आंखों में खटकने लगते है।
केन्द्रीय मंत्री सलमान खुर्शीद व उनकी पत्नी द्वारा संचालित ट्रस्ट पर लगे घोटेले पर जिस प्रकार से कबीना मंत्री बेनी प्रसाद वर्मा, सूचना प्रसारण मंत्री अम्बिका सोनी व राज्य मंत्री हरीश रावत ने सलमान खुर्शीद जैसे दिग्गज मंत्री पर मात्र 71 लाख रूपये का घोटाले का आरोप को इस लिए मान नहीं रहे थे कि यह रकम इन मंत्रियों के लिए सम्मानजनक नहीं है। जिस प्रकार बेनी प्रसाद ने आश्चर्य प्रकट किया कि अगर 71 करोड़ रूपये घोटाले का आरोप लगता तो हम इसे घोटाला समझते। इन नादानों को क्या मालुम की देश की आम जनता आज उनके कुशासन से एक एक रूपये जुटाने के लिए कितना खून पसीना बहाना पड़ता है। जिस प्रकार से कांग्र्रेस आला कमान सोनिया गांधी, महामंत्री राहुल गांधी व प्रधानमंत्र.ी इस घोटाले पर मूक बने हुए हैं और लाखों करोड़ के घोटालों को आराम से बेसर्मी से पचाने वाली सरकार व उसके आत्मघाती मंत्री -नेताओं को 71 लाख रूपये की कोई कीमत ही नजर नहीं आती। इनके कहने के अनुसार इन्होंने धारणा बना ली कि एक कबीना मंत्री हजारों लाखों करोड़ रूपये का घोटाला तो कर सकता है परन्तु 71 लाख जैसे मामूली कीमत का कोई घोटाला कर ही नहीं सकता। दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित द्वारा संरक्षित बिजली की कम्पनियों के आम आदमी का जीना हराम करने वाले बिजली के बिल के दंश से बुरा हाल किया हुआ है उस पर मूक रहने पर सोनिया गांधी भी खुद जनता की नजरों में कटघरे में खड़ी हो गयी है। जनता को समझ में नहीं आ रहा है कि वह किससे इस खुली लूट की फरियाद करे।
आम जनता के लिए आज नीरो बन चूक मनमोहन व उसकी सरकार के मंत्रियों की आम जनता के जख्मों को कुरेदने वाले बयानों का यहीं पर अंत नहीं होता है। इन नेताओं व इनकी सरकार के नजर में आम आदमी की क्या कीमत है यह सर्वोच्च न्यायालय द्वारा सरकार को अनाज के उचित भण्डारन न करने के कारण खुले में सड़ रहे अनाज को देश के गरीबों में बांटने के आदेश पर भी उसे  भूख से बेहाल लोगों को देने के बजाय सड़ने देने वाले प्रधानमंत्री मनमोहन व कृषि मंत्री शरद पवार के  अमानवीय कृत्य से ही उजागर हो गयी। इस प्रकरण से पूरे विश्व की नजरों में भारत शर्मसार हुआ। यह सरकार कितनी निष्ठुर है इसका नमुना प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के कुशासन से बेलगाम हुई मंहगाई को रोकने के बजाय प्रधानमंत्री की ‘मैं कोई ज्योतिषी नहीं हॅू जो यह बताये कि मंहगाई कब रूकेगी’ ही काफी है। इस सरकार में आम आदमी की क्या कीमत है इसके एक पूर्व मंत्री द्वारा हवाई जहाज के विशेष श्रेणी के सफर को जानवरों यानी केटल क्लास  कहा था। शायद उस मंत्री को इस बात का भान नहीं होगा कि देश के एक चैथाई जनता के लिए आज भी मोटर रोड़  की सुविधाओं के लिए तरस रही है। देश में आम लोग रोजगार व मंहगाई से त्रस्त हैं परन्तु भारत के प्रधानमंत्री को देश में अमेरिकी कम्पनियों को रोजगार देने की ज्यादा चिंता है वे एफडीआई से उनको स्वागत कर अपने लोगों को बेरोजगार बना रहे है। यहां स्पष्ट कर दूं ऐसा नहीं कि केवल नीरो कांग्रेस में ही फलफूल रहा है वह तो अन्य सभी राजनैतिक दलों में भी बेहतर फल फूल रहा है। केवल रो रहा है तो यहां का आम आदमी जो इनको अपना तारनहार मान कर इनको लोकशाही का ताज सौंप देता है।

Saturday, October 20, 2012


देश की अगली प्रधानमंत्री हो सकती है ममता बनर्जी

-ममता के आगे बौने पडे मुलायम, नीतीश सहित सभी नेता

-विपक्षी नहीं भाजपा के नेता है मोदी की राह के सबसे बडे  रोडे 

‘ऐ मेरे वतन के लोगों जरा आंखों में भर लो पानी, जो शहीद हुए हैं उनकी जरा याद करो कुर्वानी ’ के गीत को गा कर संसद की चैखट राष्ट्रीय धरना स्थल जंतर मंतर से हुंकार भरते हुए बंगाल की मुख्यमंत्री व देश की आम अवाम की रहनुमा बन चूकी ममता बनर्जी ने देश की आम जनता को मंहगाई, कुशासन व भ्रष्टाचार से खून के आंसुओं से रोने के लिए विवश करने वाले कांग्रेस गठबंधन वाली सप्रंग की मनमोहनी सरकार को धिक्कारते हुए कहा कि जब तक उसके शरीर में प्राण है वह देश की रक्षा के लिए जेल जाने व गोली खाने के लिए भी तैयार है। उन्होंने मनमोहन सरकार को बेनकाब करते हुए कहा कि देश में विकास व आर्थिक सुधारों के नाम पर मनमोहन सरकार देश को लुटवा रही है । आम आदमी का जीना दूश्वार कर रही है और मैं और मेरी पार्टी किसी भी कीमत पर देश को लूटने नहीं देगे। बंगाल में जनशाही के नाम पर विगत 3 दशक से कुण्डली जमा कर वहां के विकास को कुंद किये हुए वाममोर्चे की सरकार को उखाड फेंकने का ऐतिहासिक काम करने वाली ममता बनर्जी ने बंगाल में अपनी तृणमूल सरकार का ताज पहन कर अमेरिका सहित पूरे विश्व समुदाय को अचम्भित कर दिया था। सप्रंग सरकार की साझेदार होने के बाबजूद जिस प्रकार से ममता बनर्जी ने मंहगाई व मनमोहन सरकार के अन्य जनविरोधी नीतियों पर अंकुश रखा उससे देश के लोगों में उसका कद एक मजबूत व जनहितों के लिए संघर्ष करने वाली नेता के रूप में राष्ट्रीय नेतृत्व के रूप में मजबूती से स्थापित हो गया है।
जिस मनमोहनी सरकार ने मंहगाई, भ्रष्टाचार व आंतकवाद के आगे शर्मनाक समर्पण के कारण लोगों का जीना दूश्वार करके पूरे विश्व में भारत को जगहंसाई का पात्र बना दिया है, उस मनमोहनी सरकार से देश को मुक्ति दिलााने के लिए जब आडवाणी, मुलायम, माया, नीतीश सहित तमाम नेता बौने साबित होने लगे तो उस ऐतिहासिक घड़ी में केन्द्र सरकार से अपने छह मंत्रियों का इस्तीफा दे कर व समर्थन वापस ले कर दिल्ली की सत्ता को बेनकाब करने का ऐतिहासिक कार्य किया, उससे देश की जनता की नजरों में ममता बनर्जी का कद सत्तालोलुप मुलायम सिंह, मायावती, नीतीश कुमार आदि के सामने विराट हो गया। देश की जनता पर जब मनमोहन सरकार अपने कुशासन से न केवल प्रहार कर रहा था अपितु देश के हितों को अमेरिका के आगे एफडीआई ला कर समर्पण करने की धृष्ठता कर रहा था उस समय मुलायम का दोहरा पन, नीतीश का ढुलमूल पन, माया का अवसरवाद, द्रुमुक का अनिर्णय ने जहां देश की जनता को निराश किया वहीं ममता ने दिल्ली की सत्ता को ठोकर मार कर मनमोहन सरकार से न केवल अपने छह मंत्री हटा लिये अपितु इस सरकार को देश के हितों से खिलवाड करने का आरोप लगा कर इससे सम्बंध ही तोड़ ने का ऐतिहासिक निर्णय लिया। यही निर्णय देश की जनता का विश्वास जीत गया। इसी जनभावना को पढ़ कर एनडीए के संयोजक शरद यादव ने  ममता को महान नेत्री बताया और आशा प्रकट की कि देश को यही नेतृत्व मनमोहन के कुशासन से मुक्ति दिलायेगा और देश को विकास के पथ पर अग्रसर करेगा। इस रेली में ममता ने हुंकार भरते हुए कहा कि वह विकास के नाम पर देश को लुटवा अविश्वास प्रस्ताव लाने को तैयार ममता है। शरद यादव कबीर को याद करते हुए कहा कि ममता ही वर्तमान नेताओं में ऐसी नेता है जिसके जीवन पर एक जरा सा भी दाग नहीं है। शरद यादव ने ममता बनर्जी को बंगाल की ही नहीं देश की शेरनी बताया और कहा कि उनकी बगावत इतिहास में दर्ज हो गई है।मनमोहन सिंह की सरकार से समर्थन वापस लेने के बाद ममता बनर्जी खामोश नहीं बैठीं. उन्होंने कोलकाता में सरकार की नीतियों के खिलाफ विरोध प्रदर्शन किया और अब इस लड़ाई को वो दिल्ली ले आई हैं.।
तृणमूल काँग्रेस की नेता और पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने केंद्र सरकार पर निशाना साधते हुए कहा है कि सरकार लोगों के हितों को बेच कर वॉलमार्ट के लिए काम कर रही है.
केंद्र सरकार की नीतियों के खिलाफ राजधानी दिल्ली के जंतर मंतर पर अपने भाषण में उन्होंने कहा कि सरकार के हाल के फैसले छोटे-बड़े दुकानदारों और किसानों से लेकर आम आदमी के खिलाफ हैं.
ममता ने कहा, सरकार देश को बेच रही है लेकिन वो यह नहीं जानती कि जो सरकार देश को बेचती है जनता उसे बेच देती है.।
इस अवसर पर व्यापारियों व किसानों द्वारा ममता के इस ऐतिहासिक योगदान के लिए उसको चांदी का मुकुट पहनाने का जब ऐलान किया तो ममता ने उस मुकुट को खुद न पहन कर एक गरीब आदमी को पहना कर जो महान संदेश दिया कि उसको मुकुट, सम्पति नहीं देश के आम आदमी से प्यार है। उसके इस संदेश ने भी उसके व्यक्तित्व पर चार चांद लगाया। ममता सादगी व जनहितों के लिए समर्पित नेत्री है। वह देश के वर्तमान नेताओं में अपने विराट व्यक्तित्व के कारण आज सिरमोैर बनी हुए है। देश की जनता उसको देश को नया नेतृत्व देने के लिए आगे आने का इंतजार कर रही है और ममता ने दिल्ली में हुंकार भर कर व देशव्यापी आंदोलन का नेतृत्व करने का ऐलान करके जनता का दिल जीत लिया। देश ऐसे महान नेत्री को शतः शतः नमन करता है।

Friday, October 19, 2012


चीन, अमेरिका व पाक से अधिक खतरनाक है देश का नपुंसक पदलोलुपु नेतृत्व

चीन युद्ध के अमर शहीद व जांबाजो को 50 वीं बरसी पर शतः शतः नमन

1962 में आक्रांता चीन  से भारत की रक्षा करने में अपने प्राणों की शहादत देने वाले व युद्ध भूमि में चीन के मंसूबों का मुंहतोड़ जवाब देने वाले जांबाज वीर सैनिकों को कृतज्ञ राष्ट्रवासियों का शतः शतः नमन्। शांति शांति के नाम पर देश को नपुंसकता की गर्त में धकेलने वाले देश के नेतृत्व व कई शताब्दियों से गुलामी के दंश से अपने गौरवशाली अतीत को भूल कर कायर बने देशवासियों को शक्ति सम्पन्न राष्ट्र होने का महत्व समझाने वाले चीन से युद्ध की 50 वीं वर्षगांठ पर आओ भारत को एक मजबूत व सशक्त राष्ट्र बनाने का संकल्प लें। भले ही 50 साल पहले हमारे पास हथियार न हों परन्तु हमारे देश में उस समय नेतृत्व, सैनिक व जनता के दिलों में राष्ट्र के लिए कुर्वान होने की भावना आज के दिन से कई गुना अधिक थी।  आज देश जहां भ्रष्टाचार के गर्त में आकंण्ठ डूब कर दम तोड़ रहा है। वहीं देश का नेतृत्व न केवल दिशाहीन, नपुंसक व अमेरिकीपरस्त है। अगर आज के दिन 1962 की तरह चीन भारत पर हमला करता है तो हमारे सैनिक भले ही चीन का युद्ध में मुंहतोड़ जवाब दे दें परन्तु देश का नेतृत्व आज 1962 के युद्ध में चीन द्वारा कब्जाये गये भारतीय भू भाग को ही वापस लेने की पहल करना तो रहा दूर इतनी नपंुसकता है कि भारतीय नेतृत्व चीन से अपने भू भाग को वापस करने की मांग भी मजबूती से नहीं कर पा रहा है। नेतृत्व चाहे कांग्रेस नेतृत्व वाला मनमोहनी सरकार हो या भाजपा नेतृत्व वाली अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार रही हो दोनों में भारतीय हक हकूकों के प्रति इतना शर्मनाक रवैया रहा और दोनों सरकारों में अमेरिकी परस्त रही। भारत के नपुंसक नेतृत्व को देख कर ही अमेरिका के संरक्षण में पाकिस्तान ने न केवल भारतीय संसद, कारगिल व मुम्बई सहित कई स्थानों पर आतंकी हमला कराया अपितु पाक द्वारा बलात कब्जाई भारतीय जम्मू कश्मीर के एक बडे हिस्से को चीन को भी खैरात में दे दिया है। इसका भी भारतीय नेतृत्व ने न तो प्रचण्ड प्रतिवाद किया अपितु नपुंसकों की तरह मूक रह कर भारतीय हितों को रौंदने का काम किया। वहीं दूसरी तरफ आज भारतीय नेतृत्व एक तरफ सामरिक दृष्टि से भारतीय हितों की उपेक्षा कर रहा है वहीं आर्थिक ढांचे को भी अमेरिका व चीन द्वारा तहस नहस करने की इजाजत दी है। एक तरफ भारतीय हुक्मरान चीनी वस्तुओं से तबाह हो रहे भारतीय ओद्योगिक इकाईयों की कब्र बनते देख कर भी मूक हैं वहीं दूसरी तरफ  देश की तबाह हो रही औद्योगिक जगत को मजबूत करने के बजाय अमेरिकी की डगमगाडती व्यवस्था को मजबूती देने के लिए देश में अमेरिकी व पश्चिमी बहुराष्ट्रीय कम्पनियों को खुदरा, बीमा व अन्य व्यापार में भी उतरने के लिए लाल कालीन बिछाने की धृष्ठता कर देश को पतन के गर्त में धकेल रहे है। ऐसे में भारत को चारों तरफ से घेर रहे प्रत्यक्ष दूश्मन चीन व दशकों से पाकिस्तान के कंधे पर बंदूक रख कर भारत में आतंकवाद फेला कर कमजोर कर रहे अमेरिका से भारत की रक्षा केसे होगी, यह आज का सबसे बडा यज्ञ प्रश्न है। इसी प्रश्न पर जहां अमेरिका के प्यादा बने देश के हुक्मरान बगलें झांक रहे है वहीं जाति, धर्म, क्षेत्र व भ्रष्टाचार के दंश में मर्माहित देशवासियों को ही नहीं इस देश के बुद्धिजीवियों को भी इस दिशा में सोचने की फुर्सत तक नहीं है।
आज संसार में भारत का इतना शर्मनाक पतन हो गया कि देश की शताब्दियों से गुलामी के जंजीरों में जकडे हुए राष्ट्र को आजादी के 65 साल बाद भी गुलामी के प्रतीक अंग्रेजी तंत्र से मुक्ति नहीं मिल पायी। देश में न्याय पालिका से लेकर शिक्षा, चिकित्सा ,रोजगार, सम्मान व राजकाज पर भारतीय भाषाओं का नहीं अपितु उसी अंग्रेजी भाषा का है जिससे मुक्ति के लिए देश के लाखों लोगों ने दशकों लम्बा संघर्ष करते हुए अपने प्राणों का बलिदान दिया था। आज आजादी के बाद जिस तरह से देश अपने नाम, भाषा, संस्कृति व स्वाभिमान के लिए तरस रहा है, देश के नौनिहालों को राष्ट्रीय संस्कृति देने के बजाय भविष्य को गुलामी की जंजीरों में जकड़ने का नापाक कृत्य किया जा रहा है।
आज इस दिशा में एक मजबूत रचनात्मक पहल बाबा रामदेव ने की थी, गत वर्ष रामलीला मैदान आंदोलन में की थी, सरकार ने काफी हद तक भारत में अंग्रेजी गुलामी की जंजीरों में बांधने का काम कर रहे संघ लोकसेवा आयोग की परीक्षाओं में हिन्दी सहित भारतीय भाषाओं में करने की हामी भर दी थी, सरकार के इस सकारात्मक पहल का रामलीला मैदान में बाबा रामदेव के मंच से भी किया गया । यकायक सरकार अपने बयानों से मुकर ही नहीं गई  अपितु कपिल सिब्बल के द्वारा बाबा रामदेव को बदनाम करके इस समझोते को तार तार करने का कृत्य किया गया। उसके बाद बाबा रामदेव व उनके सोते हुए आंदोलनकारियों पर मध्य रात्रि में जिस बरबरता से लाठी चार्ज किया गया उसे साफ हो गया कि देश में अंग्रेजी की गुलामी को बनाये रखने वाले देशद्रोहियों को यह जरा भी मंजूर नहीं है कि भारत आजाद हो और अपनी भाषा व अपनी संस्कृति को आत्मसात कर उनके वर्चस्व को तहस नहस करे। इस लिए पूरी पश्चिमी सम्राज्यवादी व संकीर्ण ताकतों ने भारतीय नपुंसक नेतृत्व को बाबा रामदेव के शांतिपूर्ण आंदोलन को
कुचलने का आदेश दिया। उसका पालन विदेशों में देश को लुट कर अरबों खरबों की सम्पति रखने वाले काले धनिकों के इशारे पर चलने वाली सरकार ने किया। इस दमन पर भले ही न्यायपालिका भी हैरान थी परन्तु वह भी इसके असली  अपराधियों को बेनकाब करने में असफल रही। अमेरिकी हितों के प्रसार का यत्र बने विश्व बैंक से जुडे रहे प्यादों के दम पर भारत को अपने इशारे पर नचाने वालों के मंसूबों पर अब निरंतर खतरा उत्पन्न हो रहा है उसको सिरे से कुचलने के लिए यह दमन हुआ। आज जिस प्रकार देश में विदेशी धन के बल पर देश के बुद्धिजीवियों को विदेशी धन के दम पर चल रहे एनजीओ के माध्यम से जरजर करने का षडयंत्र चल रहा है उसको समझने में अभी देश का नेतृत्व ही असफल रहा तो जनता कहां से समझेगी।
आज जरूरत है देश में राष्ट्रवादी, सही दिशा वाले मजबूत नेतृत्व की जो भारत को न केवल फिरंगी भाषा की गुलामी से मुक्ति दिला सके अपितु देश में व्याप्त चीन, अमेरिका व पाक के खतरनाक लाॅबी को जमीदोज कर सके। तभी देश की रक्षा होगी। आज नहीं तो मनमोहन सिंह जेसे अमेरिका परस्त आत्मघाती हुक्मरान के कारण आम आदमी का मंहगाई, भ्रष्टाचार व आतंकवाद रूपि कुशासन से जीना ही हराम हो गया है। आज आम आदमी से शिक्षा, चिकित्सा, न्याय व सम्मान ही नहीं शासन प्रशासन भी कौसों दूर हो गया है। आज का पूरा तंत्र केवल धनपशुओं के खिदमत के लिए रह गया है। आज जरूरत है देश को इस गुलाम प्रवृति के आत्मघाती तत्वों से देश को मुक्त करने की तभी चीन, अमेरिका व पाक जेसे बाहरी दुश्मनों का देश मुकाबला कर पायेगा। शेष श्री कृष्ण कृपा। हरि ओम तत्सत्। श्री कृष्णाय् नमो।
   

Thursday, October 18, 2012


तिवारी को सपा का प्रमुख बना कर लखनऊ में ही बसायें मुलायम 

तिवारी को ही नहीं मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा को भी उप्र में ले जायें मुलायम 

18 अक्टूबर तिवारी के जन्म दिवस पर जिस प्रकार से मुलायम सिंह यादव ने तिवारी को अपनी कर्म भूमि रही उप्र में बसने का  सार्वजनिक निमंत्रण दिया है उस पर मेरी व मेरे सहित तमाम आंदोलनकारी संगठनों की यही प्रतिक्रिया हो सकती है कि अगर इससे  बढ़ कर एक बडा काम मुलायम सिंह कर सकते हैं तो वे उत्तराखण्ड  मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा जो तिवारी के पद चिन्हों पर चल कर उत्तराखण्ड की जनांकांक्षाओं को तिवारी की तरह ही मुख्यमंत्री बन कर रौंद रहे हैं उनको भी उनकी जन्म भूमि उत्तर प्रदेश में ले जायें। तिवारी को अविलम्ब मुलायम सिंह का आमंत्रण स्वीकार कर उत्तराखण्ड को मुक्ति दें। आम उत्तराखण्डियों की नजर में मुलायम सिंह यादव की तरह एन डी तिवारी दोनों ही उत्तराखण्ड के घोर विरोधी हैं। जहां मुलायम सिंह यादव उत्तराखण्ड राज्य गठन का घोर विरोधी रहने के साथ साथ उत्तराखण्ड राज्य गठन जनांदोलन को रौंदने वाले घोर खलनायक रहे वहीं नारायण दत्त तिवारी भी राज्य गठन के घोर विरोधी रहने के साथ साथ घोर सत्तालोलुपु बन कर उत्तराखण्ड के प्रथम निर्वाचित मुख्यमंत्री बन कर यहां की जनांकांक्षाओं व इसकी पूरी व्यवस्था को अपने संकीर्ण कृत्यों से दूषित करके पतन के गर्त में धकेलने के दोषी है। आज जो उत्तराखण्ड में राजनीति, नौकरशाही व समाज में भ्रष्टाचार में लिप्त हो कर नैतिक मूल्यों का जो शर्मनाक पतन दिखाई दे रहा है उसके लिए काफी हद तक तिवारी ही जिम्मेदार है। क्योंकि तिवारी जो वर्तमान में देश के सबसे अनुभवी व कुशल राजनेताओं में हैं परन्तु अपने की संकीर्ण मनोवृति के कारण उन्होंने जो जानबुझ कर उत्तराखण्ड को पतन के गर्त में धकेला उसके दंश से कभी विश्व में अपनी ईमानदारी व नैतिकता के लिए विख्यात उत्तराखण्ड, आज भारत के सबसे भ्रष्टतम राज्यों में जाना जा रहा है। तिवारी अगर चाहते तो वे उत्तराखण्ड के लिए हिमाचल की मजबूत नींव रखने वाले यशवंत सिंह परमार की तरह सही दिशा दे सकते थे। परन्तु अपने संकीर्ण मनोवृति व दिल्ली में कांग्रेस प्रमुख सोनिया गांधी द्वारा प्रधानमंत्री न बनाये जाने की खीज जिस ढ़ग से तिवारी ने नवगठित राज्य उत्तराखण्ड पर उतारी उसके कारण तिवारी मुलायम सिंह से बदतर खलनायक हो गये है। अपने कृत्यों से देहरादून से लेकर हेदराबाद तक शर्मसार करने वाले तिवारी का देहरादून में जिस प्रकार उनके प्यादों द्वारा गुणगान व महिमामण्डल किया जाता है उससे देख कर देश के स्वाभिमानी उत्तराखण्डियों को सर शर्म से झुक जाता है। खासकर भारतीय संस्कृति की स्वयंभू ध्वज वाहक होने का दंभ भरने वाली भाजपा ने अपने उत्तराखण्ड में खण्डूडी व निशंक के सत्तासीन होने के कार्यकाल में जिस प्रकार से सार्वजनिक मंचों में तिवारी को सम्मान दिया उससे भाजपा भी पूरी तरह से बेनकाब हो गयी है। अगर उत्तराखण्ड के बेशर्म कांग्रेसी नेताओं को आला नेतृत्व का भय न हो तो वे तिवारी को ही ताउम्र के लिए उत्तराखण्ड का मुख्यमंत्री बनवा कर दोनों हाथों से उत्तराखण्ड के संसाधनों को लूटने व लुटवाने का काम करते।
18 अक्टूबर को तिवारी के जन्म दिवस पर लखनऊ में नारायण दत्त तिवारी की दिवंगत पत्नी सुशीला तिवारी के नाम से संचालित इण्टर कालेज की वार्षिक पत्रिका का विमोचन करते हुए मुलायम सिंह ने कहा कि श्री तिवारी की जन्मभूमि भले ही उत्तराखंड हो, लेकिन उन्हें यूपी का ही माना जाता है। वह प्रदेश के चार बार सीएम रहे। उन्होंने सलाह दी कि वे लखनऊ आकर निवास करें ताकि उनके अनुभवों से लोगों को सीखने का मौका मिले।’

Tuesday, October 16, 2012


राजनीति में फिल्मी हीरो को नहीं अपितु सच्चे जनसेवक को स्वीकारती है जनता


टिहरी लोकसभा उपचुनाव में मिले जनादेश का सम्मान करते हुए सच्चे मन से जनांकांक्षाओं को साकार करने का संकल्प लेने के बजाय फिर फिल्मी स्टार की तरह डायलोग बोल कर  कि एक फिल्म के फलाप्त हो जाने से हिरो का केरियर खत्म नहीं होता हो या एक मैच में शून्य पर आउट होने वाले खिलाडी का केरियर समाप्त नहीं होने वाले जुमले बोल कर जनादेश का उपहास उड़ाने वाले विजय बहुगुणा भले ही प्रदेश के मुख्यमंत्री दिल्ली के तिकड़मियों की कृपा से बन गये हों परन्तु अभी उनको न तो लोकशाही का प्रथम पाठ का ज्ञान है कि राजनीति होलीवुड या बोलीवुड नहीं यहां हीरो व्यक्ति नहीं अपितु जनता असली हीरो होती है। जनता ही यहां कुशासकों को जमीन सुंघाती है और जनता ही यहां जनसेवकों को सत्तासीन भी करती है। मुख्यमंत्री भूल गये कि उत्तराखण्ड देवभूमि है और यहां प्रदेश की जनता ने सदियों से अन्यायी कुशासकों को धूल चटायी है। यहां की जनता सहृदयी जनसेवक को तो सर आंखों पर बिठाती है परन्तु सत्तांध व धनमद व धूर्तता से जनता को छल प्रपंच से जनभावनाओं को रौंदने वालों को जमीन भी सुंघाती है। शायद बहुगुणा जी को अभी उत्तराखण्ड  की जनता का भान नहीं। उनको जनसेवा व यहां की जनता से अधिक लगता है फिल्मी हीरो हिरोइनों पर ज्यादा भरोसा है। नहीं तो वे चुनाव जीतने के लिए टिहरी उपचुनावों की तरह संजय दत्त, राजबब्बर व नफीसा अली जैसे फिल्मी हीरो हिरोइनों को तारन हार समझ कर नहीं उतारते। लगता है मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा जी को अब जल्द ही भूलने की आदत हो गयी नहीं तो उन्हें यह जरूर याद रहता कि सितारगंज विधानसभा उप चुनाव में फिल्मी हीरो हिरोइनों को उतारने के कारण अपने  विरोधी भाजपा का मजाक उडा रहे थे।  शायद विजय बहुगुणा यह भूल गये कि यह जनता है सब कुछ जानती है। अपना अच्छा व बुरा भी पहचानती है।
शायद विजय बहुगुणा को मुख्यमंत्री बनने के बाद इस बात का भी भान नहीं रहा होगा कि जिन फिल्मी दुनिया का जुमला वे बोल रहे हैं उसी के महानायक अमिताभ बच्चन को आगे करके कांग्रेस ने इलाहाबाद में मुख्यमंत्री के पिता जी व देश के प्रखर नेता हेमवती नन्दन बहुगुणा को पटकनी  दे कर उनके राजनैतिक जीवन पर ग्रहण लगाने का कृत्य किया। वहीं इससे पहले जब कांग्रेस आला नेतृत्व इंदिरा गांधी से राजनैतिक टकराव के तहत हेमवती नन्दन बहुगुणा ने  इलाहाबाद से सांसद पद से इस्तीफा दे कर गढ़वाल लोकसभा उपचुनाव में उतरे । इंदिरा गांधी से सीधे टक्कर लेते देख कर उत्तराखण्ड के गढ़वाल लोकसभा क्षेत्र की स्वाभिमानी जनता ने ऐतिहासिक गढवाल उपचुनाव में हेमवती नन्दन बहुगुणा को अपना मान कर सत्तामद में चूर इंदिरा गांधी को तमाम तिकड़मों व संसाधनों को झोंकने के बाबजूद अपने प्रत्याशी चन्द्र मोहन सिंह नेगी को जीता नहीं पाये। उत्तराखण्ड की स्वाभिमानी व बहादूर जनता ने इंदिरा गांधी के मंसूबों को जमीन संुघा कर उत्तराखण्ड नन्दन  श्री बहुगुणा को राष्ट्रीय राजनीति के धू्रवतारा बना कर स्थापित करने में महत्वपूर्ण योगदान दिया। इस चुनाव में इंदिरा गांधी की तानाशाही के खिलाफ मेरे जैसे उस समय के छात्र व आम आदमी भी बहुगुणा को विजय दिलाने के लिए मर मिटने के लिए चुनावी समर में कूदे हुए थे।   आज उन्हीं बहुगुणा जी के बेटे को उस स्वाभिमानी जनता के हक हकूकों से खुद को दूर करते हुए देखता हॅू तो सच में मुझे ही नहीं उस पीड़ी के अधिकांश लोगों को बहुत दुख होता है। वे भूल गये कि यह उत्तराखण्ड की पावन धरती है यहां पर सदियों से अपने मान सम्मान व हक हकूकों को रौंदने वाले सत्तांधों को करारा सबक सिखाने का गौरवशाली इतिहास रहा है। जनता का दिल विनम्रता व जनसेवा से जीता जा सकता है न की उसको दौलत व सत्ता की धमक दिखा कर।
उन्हीं हेमवती नन्दन बहुगुणा के बेटे विजय बहुगुणा को जब कांग्रेस नेतृत्व ने विधानसभा चुनाव में मिले जनादेश का सम्मान करने के बजाय बलात उत्तराखण्ड का मुख्यमंत्री बनाया तो विजय बहुगुणा ने उस स्वाभिमानी जनता को शतः शतः नमन् करने के बजाय जब उत्तराखण्ड के स्वाभिमान को रौंदने वाले खलनायक मुलायम सिंह व उनके प्यादों के साथ गलबहियां करने का दुशाहस किया तो जनता ठगी सी रह गयी। यही नहीं एक सितारगंज विधानसभा उपचुनाव जितने के लिए जिस प्रकार से मुख्यमंत्री बहुगुणा ने अपने आप को उत्तराखण्डी मूल का नहीं बंगाली मूल का बताया कर जनता के जख्मों को कुरेद ही दिया। इससे जनता बेहद अपमानित व ठगी सी महसूस कर रही थी। जनता को आशा थी कि विजय बहुगुणा अपने पिता के पदचिन्हों पर चल कर प्रदेश का सम्मान बढ़ाते हुए जनांकांक्षाओं को साकार करेंगे। परन्तु जिस प्रकार से मुख्यमंत्री के रूप में विजय बहुगुणा का घोर सत्तालोलुपु चेहरा समाने आया तो जनता को लगा कि ये भी तिवारी, खण्डूडी, निशंक जैसे मुख्यमंत्रियों की तरह मात्र अपनी कुर्सी के लिए राजनीति कर रहे हैं इनका उत्तराखण्ड के सम्मान, हितों व हक हकूकों से कहीं दूर दूर तक कोई लेना देना नहीं है। अब टिहरी संसदीय उपचुनाव में जिस प्रकार उन्होंने अपने राजनीति में नौशिखिया बेटे साकेत, जिसका एक दिन का उत्तराखण्ड के हक हकूकों के लिए संघर्ष करने का इतिहास नहीं रहा, को सांसद का प्रत्याशी बनाने से जनता का भ्रम पूरी तरह से टूट गया। जनता को समझ में आ गया कि विजय बहुगुणा को भी अन्य नेताओं की तरह मै, मेरे बेटे, मेरी पत्नी व मेरे रिश्तेदार तथा मेरे समर्थक से आगे न तो जनता ही दिखाई देती है व नहीं अपनी पार्टी के जमीनी वरिष्ट कार्यकत्र्ता ।  उन्हें न तो मुजफरनगर काण्ड के अभियुक्तों को दण्डित करने के लिए ठोस कदम उठाने का भान रहा, उनको न हीं गैरसेंण राजधानी बनाने का, नहीं प्रदेश में व्याप्त जातिवाद-क्षेत्रवाद की संकीर्णता व भ्रष्टाचार को दूर करने का दायित्व ही याद रहा। जनसंख्या पर आधारित विधानसभाई परिसीमन का दंश का तो उनको भान ही नहीं। मूल निवास पर न्यायालय के निर्णय के बाद उनकी सरकार की संवेदनहीनता से एक तथ्य उजागर हो गया है कि उनको न तो उत्तराखण्ड के वर्तमान की चिंता है व नहीं  भविष्य की। केवल तिकड़मों व फिल्मी हीरो हिरोइनों के लटके झटके से चुनाव जीत कर सत्ता का जम कर दोहन करना ही एक मात्र लक्ष्य रह गया। विजय बहुगुणा सहित तमाम राजनेताओं को एक बात गांठ बांध लेनी चाहिए कि तिकड़मों व तमाशों से जनता का कुछ पल का मनोरंजन तो किया जा सकता है परन्तु दिल नहीं जीता जा सकता है। जनसेवा के लिए नेताओं को यशवंत सिंह परमार जैसे दूरदृष्टि वाला व लाल बहादूर शास्त्री जैसे चरित्रवान जमीनी नेता होना चाहिए। आज फिल्मी दुनिया के लटके झटके के दम पर राजनीति में उतरे महानायक अमिताभ बच्चन से लेकर राजेश खन्ना, संजय दत्त से लेकर गोविन्दा, धर्मेन्द्र से लेकर विनोद खन्ना आदि बुरी तरह से असफल हुए। केवल जनसेवा को आत्मसात करने वाले रामचन्द्रन, जया ललिता, रामाराव व सुनील दत्त जेसे फिल्मी दुनिया के लोग ही राजनीति मे सफल हुए।


सलमान प्रकरण से बेनकाब हुए मनमोहन, कांग्रेस व व्यवस्था

-केजरीवाल का सराहनीय संघर्ष पर जब तक सलमान इस्तीफा न दे तब तक धरना चलाने की हुकार भरकर भी पहले धरना उठाना गलत

देश के सबसे प्रतिष्ठित समाचार चैनल आजतक  द्वारा खुर्शीद और उनकी पत्नी लुईस द्वारा संचालित डॉक्टर जाकिर हुसैन मेमोरियल ट्रस्ट में 71 लाख रूपये के कथित अनियमितताओं के खुलाशा ने न केवल सलमान खुर्शीद को अपितु देश के प्रधानमंत्री, कांग्रेस पार्टी को ही नहीं अपितु पूरी व्यवस्था को ही पूरी तरह से बेनकाब कर दिया। भारत के ही नहीं अपितु विदेशी भी इस खुलाशे से भौंचक्के हैं कि भारत व्यवस्था सच में इतनी भ्रष्ट व अमानवीय हो गयी है कि वे विकलांग व्यक्तियों के लिए दी जाने वाली सरकारी सहायता पर ही डाका डालने  में तनिक सी भी शर्म नहीं आ रही है। इससे भी शर्मनाक बात यह हे कि न तो प्रधानमंत्री व नहीं सोनिया गांधी में इतना नैतिक साहस रहा कि वे अपने मंत्री को जांच तक पद से इस्तीफा देने की नैतिक साहस दे पाये। लगता है नैतिकता आज भारतीय राजनीति में रही नहीं गयी। गांधी जी कहते थे बडे पद पर आसीन व्यक्ति की नैतिकता व दायित्व भी बडी होती है। जिस देश व कांग्रेस में मात्र एक रेल दुर्घटना होने मात्र से अपने पद से इस्तीफा देने वाले लाल बहादूर शास्त्री जैसे नेता रहे हो, जिस कांग्रेस में गुलजारी लाल नन्दा जैसे ईमानदार नेता रहे हों उस पार्टी के मंत्री की संस्था पर जब खुले आम बिकलांगों के साथ अनिमियताओं का आरोप लगे व वह मंत्री ही नहीं पूरी सरकार जिस बेशर्मी से कुर्सी पर ऐसे संदेह से घिरे मंत्री को बनाये रखने का काम कर देश की छवि को धूमिल करने का काम कर रहे है वह वास्तव में देश के लिए बहुत ही शर्मनाक है। सलमान को चाहिए था कि निष्पक्ष जाच तक अपने पद से इस्तीफा दे देते। लोग अचम्भित है कि प्रतिष्ठित परिवार के सलमान कोई गरीब आदमी तो नहीं जो 71 लाख के लिए घोटाला करते परन्तु गांधी ने कहा था कि यह पृथ्वी अरबों जीवों का जीवन तो चला सकती है परन्तु एक भी व्यक्ति की तृष्णा को पूरी नहीं कर सकती। वे पद से जांच तक इस्तीफा देते तो उनका सम्मान ही बचता व कांग्रेस पार्टी में इस कलंक का भागी बनने से बचती। परन्तु अब सलमान व प्रधानमंत्री के मूक बने रहने से बिना जांच के भी पूरे देश की जनता के सम्मुख सलमान ही नहीं कांग्रेस भी गुनाहगार सी दिखाई देने लगी है। वहीं इस प्रकरण पर सलमान के इस्तीफे तक संसद मार्ग से धरना जारी रखने की हुंकार भरने वाले अरविन्द केजरीवाल व उनके साथियों ने जिस अनुकरणीय साहस के साथ यह कार्य किया, उससे पूरे देश की जनता उनका स्वागत कर रही थी परन्तु जिस प्रकार से 15 अक्टूबर को अपना धरना स्थगित करके आगे का आंदोलन फर्रूखाबाद में सलमान के चुनाव क्षेत्र में करने के निर्णय से लोगों को जरूर धक्का लगा। लोगों का मानना है कि जिस प्रकार अरविन्द व उनकी टीम जंतर मंतर अनशन के बाद संसद मार्ग आंदोलन में भी अपना लक्ष्य पूरे होने तक धरना जारी रखने के वचन की रक्षा तक नहीं कर पा रहे हैं यह उनके व्यक्तित्व की एक कमजोरी है। वहीं मंत्री सलमान के इस प्रकरण की जांच के लिए निरंतर आंदोलन कर रहे अरविंद केजरीवाल व उनकी पूरी टीम ने जंतर मंतर संसद थाने के सम्मुख अपने आंदोलन में  उप्र सरकार की जांच पर प्रश्न चिंह लगाते हुए आशंका प्रकट किया कि खुर्शीद और उनकी पत्नी लुईस द्वारा संचालित डॉक्टर जाकिर हुसैन मेमोरियल ट्रस्ट में कथित अनियमितताओं की उत्तर प्रदेश सरकार की जांच पर केजरीवाल ने कहा कि मंत्री सलमान खुर्शीद और आय से अधिक सम्पति के मामले में घिरे मुलायम तथा अखिलेश पिता-पुत्र द्वय एक दूसरे को बचाने का प्रयास करेंगे।
सवाल सलमान खुर्शीीद व उनका ट्रस्ट दोषी है की नहीं, यह तो जांच के बाद या वे खुद जानते होंगे। परन्तु जो तथ्य सामने आजतक ने रखे उससे एक पल के लिए उन्हें अपने पद पर बने रहने का नैतिक हक नहीं है। अगर उनमें विवेक होता तो वे तत्काल अपने पद से इस्तीफा दे देते। परन्तु गांधी की कांग्रेस का दुर्भाग्य यह हे कि उसमें जनता से कटे पदलोलुपु प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह व अध्यक्ष सोनिया गांधी है। उनके आत्मघाती सलाहकारों की तो बात ही क्या। मंत्री व महासचिव तो दिगविजय, वेनी प्रसाद,गुलाम, सहित पूरी कांग्रेस पार्टी सलमान का बचाव में ऐसी खडी है कि मानो सलमान के साथ किसी ने बहुत बुरा किया। वे भूल गये कि सरकार व कांग्रेस पार्टी का दायित्व देश के सम्मान व उसके हितों की रक्षा करना है। आरोप है कि विकलांगों को उपकरण नहीं दिए गए और ट्रस्ट के पदाधिकारियों ने इन रुपयों का गबन किया। यही नहीं नियंत्रक एवं लेखा-महापरीक्षक की रिपोर्ट में भी इसी तरह की बात कही गई है।  सलमान खुर्शीद इस ट्रस्ट के अध्यक्ष हैं और उनकी पत्नी लुईस खुर्शीद प्रोजेक्ट डायरेक्टर। हालांकि दोनों ने ही आरोपों का खंडन किया है। वहीं उत्तर प्रदेश सरकार इसकी जांच की बात कह रही है। वहीं इस आरोपों को देखते हुए केन्द्रीय मंत्रीमण्डल से सलमान खुर्शीद का तत्काल इस्तीफा देने की मांग को लेकर इंडिया अगेन्सट करपशन के प्रमुख अरविन्द केजरीवाल व उनकी टीम ने विगत कई दिन तक निरंतर अपना आंदोलन छेडा हुआ है। प्रधानमंत्री आवास पर प्रदर्शन किया वहीं उप्र में प्रशासन ने पुलिस को जांच के आदेश दिए हैं कि जिन विकलांगों को उपकरण दिए जाने की बात कही गई है वे वास्तव में हैं भी या नहीं और उन्हें उपकरण मिले या नहीं? इसके अलावा क्या ऐसे लोगों को उपकरण दिए गए जो मर चुके हैं? क्या उपकरण बांटने के कैंप लगाने के फर्जी दस्तावेज तैयार किए गए हैं? गौरतलब है कि
इससे पहले विकलांग कल्याण विभाग मामले की जांच कर रहा था. विकलांग कल्याण विभाग की जांच में कुछ अधिकारियों के फर्जी हस्ताक्षर की बात सामने आने पर पुलिस को जांच सौंपी गई थी। इस प्रकरण पर अरविंद केजरीवाल ने उत्तरप्रदेश सरकार पर सलमान खुर्शीद को बचाने की गरज से सबूत नष्ट करने का आरोप लगाया है.। कुल मिला कर यह प्रकरण देश की छवि को कलंकित करने का ही काम कर रहा है। देश के राजनेताओं की स्थिति इतनी शर्मनाक हो गयी है कि अब बिकलांगों का धन को भी डकारने में लग गये है। शेष श्री कृष्ण कृपा। हरि ओम तत्सत् । श्रीकृष्णाय् नमो।

जनता ने सुंघाई सत्तांध मुख्यमंत्री बहुगुणा को जमीनी, 

इस्तीफा दे मुख्यमंत्री

उत्तराखण्ड की प्रबुद्ध जनता की जागरूकता के कारण टिहरी संसदीय उपचुनाव में मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा की तमाम तिकडमों के बाबजूद कांग्रेस को जीत नसीब नहीं हुई। 10 अक्टूबर को टिहरी संसदीय सीट के लिए सम्पन्न हुए संसदीय उपचुनाव की 13 अक्टूबर को मतगणना में भाजपा प्रत्याशी  माला राज लक्ष्मी शाह ने कांग्रेस के प्रत्याशी साकेत बहुगुणा को ं22694 मतों से हराया। इस चुनाव में विजयी रही भाजपा प्रत्याशी माला राज्यलक्ष्मी शाह को 245835 मत मिले व हारे हुए कांग्रेसी प्रत्याशी साकेत बहुगुणा को 223141 मत मिले। यहा ंपर चुनाव जीतने के लिए पूरा सत्ता तंत्र, संसाधन व घात प्रतिघात की तिकड़मी हथकण्डे अपनाने के बाबजूद हर हाल में टिहरी संसदीय सीट से चुनाव जीत कर अपने बेटे को सांसद बनाने में उतारू प्रदेश के मुख्यमंत्री को जनता ने हार का करारा सबक सिखाया। यह हार कांग्रेस के प्रत्याशी साकेत से अधिक प्रदेश के मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा की मानी जा रही है। इस हार को जनता की जीत मानते हुए प्रदेश के मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा के इस्तीफे की मांग आंदोलनकारी संगठनों ने की। वहीं विजयी प्रत्याशी माला शाह ने मतगणना स्थल देहरादून में पंहुच कर समर्थन के लिए जनता को धन्यवाद दिया। देहरादून जनपद में भाजपा को मिली बढ़त ने कांग्रेस द्वारा चकराता सीट पर हासिल की गयी 11300 की बढ़त पर पूरी तरह पानी फेर दिया। हालांकि उत्तरकाशी के गंगोत्री व पुरोला में कांग्रेस को व यमुनोत्री में भाजपा को बढ़त रही व टिहरी व घनसाली विधानसभा पर भाजपा तथा प्रतापनगर व धनोल्टी में कांग्रेस की बढ़त रही। वहीं मसूरी, केंट, रायपुर, विकासनगर आदि में भाजपा को मिली जीत।
यहां हुए चुनाव में भले ही देश प्रदेश के आम लोग कांग्रेस व भाजपा के बीच हुआ मान रहे हों परन्तु उत्तराखण्ड के चिंतक इसे प्रदेश की लोकशाही व लोकशाही को ठेंगा दिखा रहे प्रदेश के मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा की जनविरोधी सत्ता के बीच ही माना गया। जिस प्रकार से विधानसभा चुनाव में आये जनादेश को ठेंगा दिखा कर सोनिया गांधी ने विधायकों की इच्छा के विरूद्ध सत्तांध हो कर विजय बहुगुणा को प्रदेश का मुख्यमंत्री बनाया, उससे उत्तराखण्ड के लोग अपने आपको बेहद अपमानित महसूस कर रहे थे। प्रदेश के मुख्यमंत्री बनने के बाद भी कांग्रेसी आलाकमान की ताकत के अहं में जिस प्रकार से प्रदेश के मुख्यमंत्री ने सितारगंज में विधानसभा उपचुनाव जीतने के लिए प्रदेश के हक हकूकों को ही अपितु प्रदेश की जनता के विश्वास को भी रौंदा उससे प्रदेश की जनता काफी आक्रोशित थी। यही नहीं जिस प्रकार प्रदेश की सत्ता में संवैधानिक पदों पर एक एक कर जनता के नजरों में खलनायक व दागी लोगों को आसीन करके प्रदेश की जनता का एक प्रकार से अपमान ही किया। वहीं विधानसभा चुनाव में परिवार का घोर विरोध करने वाले प्रदेश के मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा ने टिहरी संसदीय उपचुनाव में कांग्रेस का प्रत्याशी के चयन में यहां के जमीनी व वरिष्ठ कांग्रेसी नेताओं को नजरांदाज करके अपने राजनीति में नौशिखिये बेटे साकेत को प्रत्याशी बना कर लोगों के गुस्से को सातवें आसमान चढ़ा दिया। इसके अलावा केन्द्र सरकार के भ्रष्टाचार व मंहगाई से भरे कुशासन से पूरे देश की जनता के साथ उत्तराखण्ड के टिहरी संसदीय क्षेत्र की जनता भी बेहद पीडि़त है। इसका खमियाजा भी कांग्रेसी प्रत्याशी को भुगतना पडा। मतगणना स्थल के बाहर भाजपा के कार्यकत्र्ता झण्डे लहरा कर नारे बाजी कर रहे हैं और कांग्रेसी मायूस हो रखे है।
टिहरी संसदीय सीट में सम्मलित तीनों जनपद के 14 विधानसभाओं मेें कुल मतदाताओं की संख्या 1197822 है इनमें 630432 पुरूष व  567390 महिलायें है। टिहरी संसदीय सीट में कुल 1561 मतदान केन्द्र है। 10 अक्टूबर को टिहरी संसदीय उपचुनाव में 5,08,767 मतदाताओ ंने भाग ले कर इसमें भाग लेने वाले माला राज लक्ष्मी शाह-भाजपा की , साकेत बहुगुणा- कांग्रेस, त्रिवेन्द्र पंवार-उक्राद(पी), कुंवर जपेन्द्रसिंह उत्तराखण्डी-उत्तराखण्ड रक्षा मोर्चा, योगी राकेश नाथ(दिवाकर), कुलदीप मधवाल-उत्तराखण्ड परिवर्तन पार्टी, ं कई चुनाव लड चूके दर्शन लाल डिमरी-अखिल भारत हिन्दू महासभा , राष्ट्रीय एकता पार्टी के सहस्रपुर निवासी लियाकत अली, स्वतंत्र प्रत्याशी जौहारी लाल, नवीन कुमार भट्ट, ब्रह्मदेव झा, मनीष वर्मा, विज्ञान विक्रम शाह व संजय गोयल के भाग्य का फैसला किया।
उत्तरकाशी के तीन विधानसभा पुरोला(अजा), यमुनोत्री व गंगोत्री में कुल मतदाता 191947 व 424 मतदान केन्द्र हैं। वहीं टिहरी जनपद की टिहरी संसदीय सीट पर सम्मलित 4 विधानसभा क्षेत्र घनशाली(अजा), प्रतापनगर, टिहरी व धनोल्टी में कुल मतदाता 288930 व 507 मतदान केन्द्र हैं। वहीं टिहरी संसदीय क्षेत्र में आने वाले सबसे अधिक मतदाताओं वाले जनपद देहरादून के 7 विधानसभा क्षेत्र चकराता(अजजा), विकासनगर, सहस्रपुर, रायपुर, राजपुर रोड(अजा), देहरादून केण्ट व मसूरी में कुल मतदाता 716945 व 630 मतदान केन्द्र है। इस जीत ने जहां एक बार फिर गढ़वाल लोकसभा उपचुनाव की यादें ताजी कर दी। जिसमें कांग्रेस के सत्ताबल को  जनता ने अपने विवेक व लोकशाही के प्रति सम्र्पण से ठुकरा दिया। यह जीत लोकशाही की जीत हैं। यह हार कांग्रेस के मुख्यमंत्री व कांग्रेस आला नेतृत्व की है जो उत्तराखण्ड की जनभावनाओं को रौंद कर अपने प्यादों को यहां पर आसीन करने का कृत्य करने का उतारू है। वह भी उस जनता के साथ जो उन पर विश्वास करने की भूल कर उनके पक्ष में जनादेश देने का काम कर चूकी थी। शेष श्री कृष्ण कृपा। हरि ओम तत्सत् । श्रीकृष्णाय् नमो।

Thursday, October 11, 2012


गुजरात में मोदी व हिमाचल में वीर भद्र का ही  बजेगा डंका 

भले ही कांग्रेस व भाजपा सहित तमाम चुनाव समीक्षक कुछ  भी राग अलाप लें परन्तु गुजरात में मोदी व हिमाचल में वीर भद्र का डंका ही इन चुनाव में बजेगा। इस सप्ताह चुनाव आयोग ने 3 अक्टूबर बुधवार को गुजरात और हिमाचल प्रदेश में विधानसभा चुनावों की घोषणा की। इसके तहत दोनों राज्यों के चुनाव परिणाम 20 दिसम्बर को आयेगे। चुनाव आयोग की अ अधिसूचना के तहत जहां हिमाचल में 4 नवम्बर को चुनाव होगे और  गुजरात में दो चरणों में 13 और 17 दिसम्बर को चुनाव कराए जाएंगे। चुनाव आयोग द्वारा हिमाचल व गुजरात के मतगणना में इतना लम्बा अंतर रखना लोकशाही के लिए उचित नहीं माना जा रहा है। जिस प्रकार के पांच राज्यों के कुछ माह पहले हुए चुनाव में उत्तराखण्ड की विधानसभा के चुनाव के एक महिने से अधिक देर बाद इसके परिणाम आये वह आम लोगों का मोह भंग करता है। गुजरात मे 37815306  व हिमाचल प्रदेश में 45लाख 16 हजार 54 मतदाता है। गुजरात में 44496  व हिमाचल में 7252 मतदान केन्द्र है।  वर्तमान में गुजरात  विधानसभा में कुल 182 विधानसभा सीटों व हिमाचल में 68 सीटें है। भाजपा में जहां भाजपा के 121 विधायकों के साथ सत्तासीन है वहीं कांग्रेस यहां पर दूसरे नम्बर पर है। हिमाचल में भी भाजपा 41 सीटो ंसे सत्तासीन है। गुजरात में विगत 11 साल से मोदी निरंतर प्रदेश की सत्ता में आसीन है। उनके सामने कांग्रेस ने  कोई एक मजबूत नाम मुख्यमंत्री के रूप में प्रस्तुत नहीं किया। जहां तक बधेला व केशु भाई पटेल कभी मोदी से 21 भले ही हों परन्तु इन 11 सालों में मोदी ने न केवल गुजरात में अपना नाम स्थापित कर दिया अपितु वह भारत के प्रधानमंत्री का भी सबसे बडा दावेदार बन कर सामने आये है। भले ही मोदी के शासन में कई कमियां हो परन्तु केन्द्र की कांग्रेस सरकार के कुशासन से जनता इतनी निराश व आक्रोशित है कि उसे प्रदेश में न तो कोई कांग्रेस दिग्गज नेता में वह करिश्मा दिखाई दे रहा है जो मोदी में है व नहीं कांग्रेस किसी नेता को मोदी के विकल्प के रूप में सामने रख पायी। प्रदेश की जनता को मालुम है कि कांग्रेस का शासन अगर होगा तो मुख्यमंत्री से अधिक अहमद पटेल की ही यहां पर चलेगी। वेसे भी मोदी का शासन इस समय  अन्य राज्यों ीक तुलना बेहतर ही साबित हुआ।
वहीं हिमाचल में भले ही लोग कांग्रेस के कुशासन से नाराज हो परन्तु वे प्रदेश में सत्तासीन भाजपा से अधिक बेहतर भले कांग्रेस को न माने परन्तु वीरभद्र को आम जनता आज भी हिमाचल के लिए सबसे बेहतर मुख्यमंत्री परमार के बाद मानती है। यहां पर अगर कांग्रेस के दिल्ली बेठे नेताओं चोधरी बीरेन्द्र, आनन्द शर्मा व अनिल शर्मा आदि ने अपनी मनमानी न की तो हिमाचल में वीरभद्र के रूप में कांग्रेस का शासन ही देखने को मिलेगा। हांलांकि विरोधी वीरभद्र पर विजय मनकोटिया द्वारा लगाये गये भ्रष्टाचार के अदालत में चल रहे विवाद को हव्वा दे कर उनका विरोध करें परन्तु प्रदेश की जनता की वर्तमान सभी विकल्पों में वीरभद्र ही सर्वश्रेष्ठ है। उनके विरोधियों की धार उस समय कुंद हो गयी वीरभद्र पर चंदा लेने के भ्रष्टाचार का आरोप लगाने वाला विजय मनकोटियां फिर कांग्रेस में सम्मलित हो कर यहां से विधायक का चुनाव लड  रहे है।

मवेशियों चराने व घासफूस खाकर गरीबी में बचपन गुजारने वाले चीनी साहित्यकार मो येन को मिला नोबेल पुरस्कार

प्रतिभा कभी न तो धनपशुओं व सत्तासीनों और तथाकथित उच्च वर्ग की गुलाम नहीं होती है,  प्रतिभा गरीब की झोपडी में भी रोशन हो सकती है। यह कहावत सच साबित तब हुई जब विश्व प्रतिष्ठित साहित्य का नोबेल पुरस्कार चीन के  मो येन को प्रदान किया गया। बचपन में मवेशियों को चराने व घास फूस खाकर पेट भरने के लिए मजबूर रहे चीनी साहित्यकार मो येन को मिला साहित्य का नोबल पुरस्कार । 57 वर्षीय मो येन पहले चीनी लेखक है जिनको साहित्य का 2012 का नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया। मो येन का असली नाम गाओ शिगजिएन है परन्तु वे मो येन के नाम से साहित्य जगत में विख्यात है। मो येन का चीनी भाषा में अर्थ होता है मत बोलो। साहित्य का 109 वां नोबेल पुरस्कार विजेता मो येन गरीबी के कारण व चीन में सांस्कृतिक क्रांति के दौरान मवेशियों को चराने के साथ साथ पेडों की छाल व घासफूस खा कर जीवन यापन करने के लिए मजबूर भी होना पडा। यही अनुभव उनके जीवन में साहित्य की दिशा देने वाली प्रेरणादायक शक्ति बनी हुई है। चीनी सेना यानी पीपल लिब्रेशन आर्मी के सिपाही रहे मो येन के शब्दों में अकेलापन व भूख उनके लेखन जगत के अभिन्न अंग है। उन्होंने अपनी स्वयं भोगी पीडा व अनुभव के आधार पर ही  वे भ्रष्टाचार से निपटने, चीनी समाज के पतन, ग्रामीण जीवन और चीन की एक बच्चा नीति के बारे लिख पाए.। उनकी प्रसिद्ध उपन्यास ‘रेड सोरगम’, रिपब्लिक आॅफ वाइन, लाइफ एंड डेथ आर वेयरिंग मी आॅउट  और बिग ब्रेस्ट, वाइंड हिप्स को काफी सराहना मिली। उनके नये उपन्यास ‘फ्रॉग को मॉओ डुन’ जो चीन में एक बच्चे की नीति के बारे में था को चीन का सबसे प्रतिष्ठित साहित्य पुरस्कार दिया गया।

Tuesday, October 9, 2012


लोकशाही के बेशर्म लूटेरे

क्या कहू इन बेशर्मो को जो कभी चारा तो कभी ताबूत डकारते है।
कभी बफोर्स घोटाला तो   कभी  बर्दी घोटाले से देश को लूटते हो। 
कभी कामनवेल्थ खेल के नाम पर तो कभी कोयला को डकारते हो
कभी सेज के नाम पर जमीने छीन कर  बिल्डिरों से मिल लूटते हो
कभी बारूद घोटाला, तो कभी 2जी घोटाला कर देश को लुटाते हो
इन लूटेरों ने तो माॅ भारती की जुबान भी लगाया है अंग्रेजी ताला ।
जब लूटने से दिल न भरा तो अपने फिरंगी आकाओं को बुला डाला।
इतने खुदगर्ज लूटेरे हैं इन्होंने तो विकलांगों का धन भी उडा डाला। 
कभी दुनिया को न्याय व ईमानदारी का पाठ पढ़ाने वाला भारत आज।
लूटशाही के लूटेरों का ऐशगाह बनकर कर नपुंसक आंसू बहा रहा है।
कोई धर्म तो कोई जाति के नाम पर देखो मेरे भारत को लूट रहा है 
कोई क्षेत्र तो कोई जनसेवा के नाम पर मेरे भारत को लूट रहा है। 
देवसिंह रावत
(मंगलवार 9 अक्टूबर 2012 रात के 11.57)

Sunday, October 7, 2012




पुलिस से नहीं सीबीआई से जांच हो तिवारी प्रकरण की

-कहीं यह तिवारी की सम्पति पर काबिज होने का खतरनाक षडयंत्र तो नहीं है तिवारी को नींद की गोलियां देना

-एफआरआई से दूर बनाया जाय तिवारी का आवास 

देहरादून (प्याउ)। जिस प्रकार से उत्तराखंड और उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री नारायण दत्त तिवारी को कई साल से दवाइयों के साथ नींद की गोलियों की ओवरडोज देकर उनका स्वास्थ्य बिगाड़ने के खतरनाक षडयंत्र का सनसनीखेज खुलाशा तिवारी के ही ओएसडी भवानी भट्ट द्वारा किये जाने की खबरें इस पखवाडेत्र उत्तराखण्ड सहित देश के समाचार पत्रों में प्रकाशित हुई। खबरों के अनुसार यह जब वे प्रदेश के मुख्यमंत्री थे उस समय से लेकर जब वे आंध्र प्रदेश के राज्यपाल के पद पर आसीन थे तब भी यह सिलसिला जारी था।  इस खबर के बाद बताया गया कि देहरादून  पुलिस की वरिष्ठ अधीक्षक नीरू गर्ग ने मीडिया में छपी खबरों को संज्ञान में लेते हुए शहर की पुलिस उपाधीक्षक टीडी बैला को इन आरोपों की सत्यता जानने के लिए जांच करके पुलिस अधिकारी बैला,  तिवारी के ओएसडी भट्ट के अलावा उनके निजी स्टाफ और सुरक्षा कर्मियों तथा अन्य संबंधित लोगों से बातचीत कर अपनी रिपोर्ट एक सप्ताह के अंदर देगी।
इन आरोपों में कितनी सच्चाई है यह तो जांच के बाद ही आम आदमियों को पता चलेगा या तिवारी व उनके करीबी ही इन खबरों की हकीकत को जानते होंगे। परन्तु यह सच है कि जब से कांग्रेसी दिग्गज रहे नारायणदत्त तिवारी की धर्मपत्नी डा. सुशीला तिवारी का आकस्मिक निधन हुआ तब से तिवारी के आसपास कुछ ऐसे लोगों ने अपना शिकंजा कस लिया जो अपने स्वार्थो की पूर्ति के लिए तिवारी की कमजोरियों का फायदा उठाते थे। तिवारी के करीबियों की अगर निष्पक्ष जांच सीबीआई द्वारा की जाय तो उनके मुखोटे खुद ही बेनकाब हो जायेंगे। तिवारी के करीब जुड़ने से पहले बदहाली व दर दर की ठोकरे खाने वाले यकायक चंद सालों में धनकुवैर कैसे बन गये। परन्तु निष्पक्ष जांच कौन करेगा? जब तिवारी प्रदेश के मुख्यमंत्री थे उस समय भी उनके करीबी पंत का रहस्यमय परिस्थितियों में हुई मृत्यु पर तमाम प्रकार के सवाल उठे? शासन प्रशासन ने इस पर आंखे मूंदे रखा। देहरादून में तिवारी के करीबियों में इस बात की चर्चा थी कि यह भी मौत भी स्वाभाविक नहीं थी अपितु तिवारी के करीबियों में चल रहे वर्चस्व की जंग का एक खौपनाक घटना मात्र थी। इसी वर्चस्व के संघर्ष का परिणाम था तिवारी के काफी करीबी रही उनके जैविक बेटे शेखर की माॅं उज्जवला व उनके बीच में देश में चर्चित विवाद। इसी देशव्यापी चर्चित विवाद में ही दिल्ली उच्च न्यायालय को तिवारी के डीएनए जांच के बाद उन्हें उज्जवला शर्मा के बेटे को उनका जैविक बेटा होने का निर्णायक फेसला सुनाना पडा। वहीं जानकारों के अनुसार तिवारी किसी भी प्रकार के विवाद में नहीं पडना चाहते थे परन्तु उनके करीबी आत्मघाती सलाहकार ने उनकी इच्छा को नजरांदाज करके अपने वर्चस्व को बनाये रखने के लिए इस विवाद को न्यायालय के बाहर समझोता तक नहीं होने दिया।  तिवारी के करीबियों में सबसे बडा नाम था दिवंगत पंत जी जो अब नहीं रहे, परन्तु जबसे आरेन्द्र शर्मा तिवारी के करीबी बने तब से एक प्रकार से तिवारी के दरवार में वही होता था जो आरेन्द्र शर्मा चाहते थे। उत्तराखण्ड में नारायणदत्त तिवारी भले ही मुख्यमंत्री रहे हों परन्तु जिस प्रकार से वहां पर कार्य होते रहे , उससे कभी विकास पुरूष के नाम से ख्यातिप्राप्त तिवारी उत्तराखण्ड के लिए विनाशपुरूष सा ही प्रतीत होने लेग। उनके विरोधी ही नहीं आम जनता में उनकी छवि इतनी दुषित हो गयी कि उन पर प्रदेश से सबसे बडे लोकगायक नरेन्द्रसिंह नेगी ने ‘नौछमी नारेण’ नामक गीत बनाया। जो उनके कुशासन को उखाड फैकने में महत्वपूर्ण साहयक हुआ।
अब सवाल उठता है कि तिवारी को नींद की गोलियां दे कर उनके स्वास्थ्य से खिलवाड करने का षडयंत्रकारी कैसे बेनकाब होगा। जबकि प्रदेश में तिवारी व तिवारी के करीबियों की ही सरकार है। तिवारी के सबसे करीबी आरेन्द्र शर्मा जो इस समय कांग्रेस की प्रदेश सरकार के मुखिया विजय बहुगुणा के सबसे करीबी सिपाहे सलारों में है। वहीं कभी तिवारी के ओएसडी रहे शंकरदत्त शर्मा भी इन दिनों मुख्यमंत्री के करीबी है। यही नहीं खुद तिवारी मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा के बहुत करीबी है । उनको मुख्यमंत्री बनाने में जितना हाथ नारायणदत्त तिवारी का है उससे अधिक हाथ तिवारी के सबसे करीबी आरेन्द्र शर्मा का है। ऐसे में सरकार को इसकी जांच प्रदेश के पुलिस प्रशासन के बजाय सीबीआई से करानी चाहिए। प्रदेश मे ंकांग्रेस व भाजपा सहित तमाम अधिकांश नेता भी तिवारी के हैदारबाद जैसे वाले शर्मनाक प्रकरण के बाबजूद आज भी तिवारी के चरण स्पर्श करके वंदना करने में अपना शौभाग्य समझते है। जबकि प्रदेश की जनांकांक्षाओं को रौंदने में तथा प्रदेश में नौकरशाही व जनप्रतिनिधियों को बेलगाम करने की जो नींव तिवारी के कार्यकाल में लालबत्तियों, मुख्यमंत्री विवेकाधीन कोष सहित 56 घोटालों के प्रकरण हुए उसी के कारण कभी ईमानदार व चरित्रवान समझे जाना वाला उत्तराखण्ड आज भारत के भ्रष्टत्तम राज्यों की पंक्ति में खडा हे। देश के अग्रणी व अनुभवी तिवारी को अपनी रंगीन मिजाजी का दण्ड न केवल अपने राजनैतिक जीवन में चूकाना पडा अपितु उसका दण्ड विकास की पहली सीडी चढ़ रहे उत्तराखण्ड को चूकाना पडा। तिवारी अपने अनुभव से उत्तराखण्ड को हिमाचल बना सकते थे परन्तु अपने ऐसे ही रंगीन मिजाजी के कारण उनके करीबियों ने उत्तराखण्ड में जो कार्य किये उससे प्रदेश गठन की जनांकांक्षाओं पर न केवल ग्रहण लगा अपितु इस शर्मनाक पतन को देख कर राज्य गठन शहीदों व आंदोलनकारियों की आत्मा चित्कारने लगी। अब जब तिवारी के करीबियों पर ये आरोप लग रहे हैं तो प्रदेश की जनता ही नहीं देश की जनता भी जानना चाहती है कि आखिर तिवारी जेसे दिग्गज नेता को किसने अपना प्यादा बना कर अपने निहित स्वार्थो की पूर्ति करता रहा? वह कौन है जो तिवारी को नींद की गौलियां खिला कर उनसे अपने इशारों पर नाचने के लिए विवश करता रहा? आखिर वह कौन है जो तिवारी के अन्य करीबियों को एक एक कर उनसे दूर करता रहा? आखिर क्या यह तिवारी की घोषित व अघोषित सम्पति पर काबिज होने के लिए तो एक खतरनाक षडयंत्र तो नहीं है? यह सच है कि तिवारी के इस शर्मनाक पतन का अगर कोई दोषी उनके सिपाहे सलार या निजी स्टाफ के लोग नहीं अपितु खुद तिवारी हैं जो अपनी कमजोरियों के कारण अपने प्यादों के हाथों का एक मोहरा बन कर रहे गये। परन्तु उस आस्तीन के सांप को भी दुनिया बेनकाब होते देखना चाहती है जिसने तिवारी जेसे दिग्गज नेता के रंगीन मिजाजी को हथियार बना कर या नींद की गोलियां खिला कर अपने हाथों की कठपुतली बना दिया।  देश को शर्मसार करने वाले हैदारवाद राजभवन वाले प्रकरण में हो या शेखर प्रकरण में दोनों प्रकरणों में तिवारी के करीबियों का ही तिवारी को बेनकाब कराने में महत्वपूर्ण अदृश्य हाथ रहा। कुछ महिनों पहले उनके किसी करीबी व तिवारी जी के भतीजे के बीच नौकझोंक की खबरे सुनने में भी आयी ? अब क्या वही हाथ तिवारी को नींद की गौलियां दे रहा है? इसकी जांच करने के लिए एक ही रास्ता है कि प्रदेश के मुख्यमंत्री स्वयं सीबीआई से इसकी जांच करायें। इसके साथ कांग्रेस नेतृत्व को भी चाहिए तिवारी को अपना प्यादा बनाने वालों को बेनकाब करने की निष्पक्ष जांच के लिए सीबीआई से अविलम्ब जांच की जाय। जिस प्रकार तिवारी का हैदराबाद राजनिवास प्रकरण व उससे पहले कई प्रकरण सामने आये उसको देख कर तिवारी का आवास एफआरआई जेसे संस्थान के क्षेत्र में बनाये रखना प्रशासन को खुद कटघरे में खडा करता है।  देश के विख्यात एफआरआई के शोध छात्र-छात्राओं युक्त परिसर से दूर तिवारी का निवास प्रशासन को बनाना चाहिए। परन्तु एक बात स्पष्ट है कि तिवारी के आसपास जो भी हो रहा है उससे एक बात स्पष्ट है कि वहां पर सबकुछ ठीकठाक नहीं है। शेष श्रीकृष्ण कृपा। हरि ओम तत्सत्। श्रीकृष्णाय् नमो।


पुण्य तिथि पर लखनऊ में याद किये गये आजादी के महानायक चन्द्रसिंह गढ़वाली

लखनऊ में भी अगले साल से उत्तराखण्डी मनायेंगे 2 अक्टूबर को काला दिवस 

लखनऊ से दानसिंह रावल
फिरंगी हुकुमत का सूर्यास्त कभी न होने के दंभ को पेशावर काण्ड से  चूर-चूर करने वाले भारतीय आजादी के महानायक वीर चन्द्रसिंह गढ़वाली की पुण्य तिथि पर भले ही देश के हुक्मरानों ने उनको भूला दिया हो परन्तु आज भी देश के लिए समर्पित लोगों के दिलों में वे राज करते है। उनकी पुण्य तिथि पर उनकी स्मृति को शतः शतः नमन् करने के लिए लखनऊ में भावपूर्ण श्रद्धांजलि अर्पित की गयी। गौरतलब है 25 दिसम्बर 1891 में उत्तराखण्ड के पौड़ी जनपद में जन्मे वीरचन्द्रसिंह गढ़वाली  1 अक्टूबर 1979 में हुआ। आजादी के बाद उनकी घोर उपेक्षा इस बात से ही उजागर होती है कि उन पर डाक टिकट भी सरकार ने जनता की पुरजोर मांग के बाद 1994 में जारी किया।
पर्वतीय महापरिषद के बेनर तले मोनाल सांस्कृतिक संस्था के अध्यक्ष विक्रम सिंह बिष्ट के सोजन्य से लखनऊ के केशरबाग स्थित जयशंकर प्रसाद सभागार में वीर चन्द्रसिंह गढ़वाली की याद में एक विशेष कार्यक्रम का आयोजन किया गया।
इस कार्यक्रम में पर्वतीय महापरिषद के अध्यक्ष ठाकुर सिंह मनराल व महासचिव  गणेश दत्त जोशी ने सहित तमाम उपस्थित जनसमुदाय ने आजादी के महानायक की पावन स्मृति को नमन् किया। इस अवसर पर दैनिक हिन्दुस्तान के स्थानीय सम्पादक नवीन चंद जोशी व ललित सिंह पोखरिया ने वीर चन्द्रसिंह गढ़वाली को देश के उन अग्रणी महानायकों मे बताया जिनको आज भी वह सम्मान नहीं मिला जिसके वे हकदार थे। इस अवसर पर ललित सिंह पोखरिया ने बताया कि 1957 में देश के प्रख्यात साहित्यकार राहुल सांस्कृत्यायन ने उन के विराट व्यक्तित्व को नमन् करते हुए एक पुस्तक को प्रकाशित की थी। पेशावर काण्ड से फिरंगी हुकुमत की चूलें हिलाने वाले वीर चन्द्रसिंह गढ़वाली व उनके साथियों को कड़ी सजा मिली। वे 11 वर्ष, 3 माह व 11 दिन की सजा काटने के बाद 1943 में रिहा हुए थे। इस अवसर पर उनके साथ कुछ समय जेल में रहे स्वतंत्रता सैनानी  डा बेजनाथ सिंह ने जब सभा में वीर चन्द्रसिंह गढ़वाली के विराट व्यक्तित्व को रोशन करने वाले संस्मरण सुनाये तो उपस्थित जनों की आंखें भर आयी। इस अवसर पर उपस्थित समाजसेवी अधिवक्ता दानसिंह रावल ने ऐलान किया कि आगामी वर्ष तक अगर मुजफरनगर काण्ड-94 के अभियुक्तों को दण्डित करने में देश की व्यवस्था असफल रहती है तो लखनऊ में रहने वाला विशाल उत्तराखण्डी समाज 2 अक्टूबर को संसद की चैखट पर 18 साल से इसी दिन मनाये जा रहे काला दिवस की तरह ही लखनऊ में भी काला दिवस मना कर अपना विरोध प्रकट करेंगे।