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Wednesday, November 23, 2011

अपनी बर्बादी पर क्यों आंशु बहाते हैं लोग,


शीशा देख कर भी अपनी शक्ल से नजरें चुराते हैं लोग,
फिर भी अपनी बर्बादी पर क्यों आंशु बहाते हैं लोग,
गुनाहगारों को जो देवता बता कर पूजते रहे उम्र भर,
वो क्यों फिर अपने जख्मों को देख कर आहें भरते हैं,
खुले दिमाग से जरा चेहरा पहचानना सीखो साथी,
यहां हर कदम पर भैडिये भी मशीहा बन कर आये हैं।

खंडूडी ने कमजोर लोकपाल बना कर जनता को ही नहीं अण्णा हो भी छला


भाजपा व कांग्रेस का उत्तराखण्ड से सफाया करके ही होगी जनभावनायें साकार: जनरल तेजपाल सिंह रावत/
खंडूडी ने कमजोर लोकपाल बना कर जनता को ही नहीं अण्णा हो भी छला/
नई दिल्ली, (प्याउ)। ‘भ्रष्टाचार के खिलाफ छेडी अण्णा की जंग में देश का हर देशभक्त अवाम साथ है। लोगों ने अण्णा की निर्मल छवि व त्याग की मूर्ति के कारण उनको गांधी का प्रतिमूर्ति मान कर उनको अपना समर्थन दिया। परन्तु उत्तराखण्ड के मुख्यमंत्री भुवनचंद खंडूडी ने न केवल अण्णा को अपितु प्रदेश की उस भोली जनता के साथ विश्वासघात किया, जो उनको भ्रष्टाचार के खिलाफ खुली जंग छेडने वाला एक ईमानदार राजनेता मानती रही। ऐसी भोली  जनता के विश्वास का गला घोंटते हुए प्रदेश के मुख्यमंत्री भुवनचंद खंडूडी ने भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने के नाम पर एक ऐसा लोकपाल बनाया, जो न केवल विधायक, मंत्री व मुख्यमंत्री जैसे पदों पर आसीन संभावित भ्रष्टाचारियों को साफ बचाने का ‘विशेष सर्वानुमति का’ पिछला दरवाजा बनाया है। यही नहीं श्री खंडूडी ने प्रदेश में खुली लूट मचा रहे एनजीओ पर अंकुश लगाने के लिए इसमें सम्मलित तक नहीं किया। वहीं इस बिल को देश में सबसे मजबूत बना कर अपनी झूठी छवि को बनाने का निकृष्ठ व अलोकतांत्रिक काम किया।’ जिस किसी को भी इसमें तनिक सा भी संदेह है उन्हें उत्तराखण्ड लोकायुक्त के पृष्ठ 21 के चेप्टर 6 में जो लिखा है
CHAPTER VI
INVESTIGATION AND PROSECUTION AGAINST HIGH
FUNCTIONARIES
Investigation  and  Prosecution  against high  functionaries
18. No investigation or prosecution shall be initiated without obtaining
permission from  the  Bench of all the members with  Chairperson
against any of the following persons:-
(i) The Chief Minister and any other member of the Council of
Ministers.
(ii) Any Member of Uttarakhand Legislative Assembly. (http://uk.gov.in/files/Documents/ENGLISH_UTTARAKHAND_LOKAYUKTA_BILL__2011.pdf)
उससे न केवल खंडूडी का छल बेनकाब होता है अपितु अण्णा के सहयोगियों द्वारा उनको जानबुझ कर गुमराह करने का कच्चा चिठ्ठा उजागर हो जाता है। अण्णा को क्यों उनकी टीम ने किस निहित स्वार्थो के खातिर ये गलत जानकारी दी, यह तो वे ही जानते हैं परन्तु अण्णा द्वारा इस लोकायुक्त को मजबूत कह कर समर्थन करना उनकी छवि को जहां धूमिल करता है वहीं उन को उनकी टीम द्वारा गुमराह किये जाने का आरोप सत्य साबित होता है।
यह दो टूक बात संसद के समीप प्रेस क्लब आफ इंडिया में आज 16 नवम्बर सांय तीन बजे प्रेस क्लब में आयोजित एक खुली प्रेस वार्ता में देश की मीडिया को संबोधित करते हुए उत्तराखण्ड रक्षा मोर्चा के अध्यक्ष, ले. जनरल तेजपाल सिंह रावत ने कहा कि आगामी विधानसभा चुनाव में समान विचार वाले राजनैतिक व उत्तराखण्ड समर्थक दलों, को साथ ले कर प्रदेश को दिल्ली के दलालों के लिए लूट का अड्डा बनाने वाले भाजपा व कांग्रेस के शिकंजे से मुक्त करना होगा। उन्होंने कहा कि उत्तराखण्ड राज्य का गठन के लिए हमारी माॅं बहिनों व युवाओं ने जो शहादतें दी व अपना सर्वस्व इस राज्य को गठन करने के लिए समर्पित किया, उस राज्य को भाजपा व कांग्रेस के दिल्ली दरवार के प्यादों ने पूरी तरह से तबाह कर दिया है। इन दलों ने न केवल प्रदेश की अस्मिता को रोंदने वाले मुजफफरनगर काण्ड के अभियुक्तों को शर्मनाक संरक्षण दिया अपितु प्रदेश की जनांकांक्षाओं को साकार करने वाली राजधानी गेरसैंण को भी षडयंत्र के तहत जमीदोज कर दिया है। पूर्व सांसद ले. जनरल तेजपाल सिंह रावत ने जनता से दो टूक शब्दों से कहा कि उनको भारतीय सेना का ले. जनरल जेसा गौरवशाली पद पर आसीन हो कर देश की रक्षा में अपने आपको समर्पित करने का अवसर मिला। मुझे प्रदेश में विधायक से कबीना मंत्री व भारत की सर्वोच्च सदन में सांसद बनने का शौभाग्य मिला। जब मैने देखा कर उत्तराखण्ड के हितों के साथ भाजपा व कांग्रेस दोनों दल शर्मनाक खिलवाड़ कर रहे हैं तो मेरी आत्मा ने मुझको अपनी मातृ भूमि की रक्षा के लिए दोनों दलों को त्यागने के लिए विवश किया। मेरा शौभाग्य है कि कांग्रेस की आला कमान सोनिया गांधी व भाजपा के आला नेताओं के तमाम प्रलोभन को ठुकरा कर अपनी जन्म भूमि उत्तराखण्ड के हितों की रक्षा के लिए मेरी आत्मा ने मुझे झकझोर दिया। मेरे इस काम में उत्तराखण्ड के महान चिंतक व पूर्व आईएएस सुरेन्द्र सिंह पांगती, उत्तराखण्ड के महान गायक नरेन्द्र नेगी सहित हजारों उत्तराखण्ड के हक हकूकों की रक्षा के लिए अपना सर्वस्व निछावर करने वाले महानायकों का आशीर्वाद व सहयोग रहा।
उन्होंने कहा कि उत्तराखण्ड रक्षा मोर्चा केवल एक राजनैतिक दल नहीं अपितु यह उत्तराखण्ड के हितों के लिए समर्पित पूर्व सैनिकों, छात्रों, बुद्विजीवियों, महिलाओं, समाजसेवियों का एक व्यापक जनांदोलन भी है।  उन्होंने कहा आज अगर हम जागे नहीं तो भाजपा व कांग्रेस प्रदेश के बाकी रहे संसाधनों को अपने आकाओं को खुश करने के लिए बर्बाद कर देंगे। उन्होंने कहा कि उनका संघर्ष कभी किसी व्यक्ति के खिलाफ नहीं रहा, उन्होने चाहे कांग्रेस हो या भाजपा दोनों दलों को छोडा जब वहां पर भ्रष्ट लोगों को प्रदेश की सत्ता का महत्वपूर्ण संवेधानिक पदों पर पार्टियों के नेतृत्व ने भारी विरोध करने के बाबजूद आंख बंद करके आसीन किया। उन्होने उत्तराखण्ड के जनमानस से अपील की कि वे उत्तराखण्ड के हितों को रौंद रहे दोनों दलों का
प्रदेश से सफाया करने के लिए आगे बढ़ कर तन मनधन से उत्तराखण्ड रक्षा मोर्चा का ध्वजवाहक बने। उत्तराखण्ड रक्षा मोर्चा के सिपाई प्रदेश की सत्ता की बंदरबांट करने के लिए नहीं अपितु
प्रदेश की उन जनांकांक्षाओ को साकार करने के लिए राजनीति में उतरे हैं। भ्रष्टाचार के खिलाफ आंदोलन कर रहे बाबा रामदेव पर गहरा कटाक्ष करते हुए उन्होंने कहा कि बाबा रामदेव में जरा सी भी नैतिकता होती तो वे किसी भी कीमतपर प्रदेश को भ्रष्टाचार के गर्त में धकेल रही भाजपा को भी कांग्रेस की तरह प्रहार करते। उन्होंने दो टूक शब्दों में कहा कि बाबा रामदेव ने उत्तराखण्ड में भाजपा का समर्थन करके न केवल अपना नैतिक बल का गला घोंट दिया अपितु जनता के विश्वास को भी बुरी तरह हिला दिया।  आत्म विश्वास से भरपूर ले. जनरल तेजपाल सिंह रावत ने कहा कि उनकी पार्टी में जातिवाद, क्षेत्रवाद व भ्रष्टाचार के बजाय ंपूरे विश्व में ईमानदारी, मेहनतकश व प्रबुद्वता के लिए विख्यात रहे उत्तराखण्ड का आदर्श राज स्थापित करेंगे। जिसमें न तो  किसी का शोषण किया जायेगा व नहीं किसी को उत्तराखण्ड के हितों से लूट खसोट करने वाले माफियाओं को पांव जमाने में सहयोग देने की इजाजत ही दी जायेगी।

Tuesday, November 22, 2011

देवी देवताओं के नृत्यों व खला मेलों की धूम है इस माह उत्तराखण्ड में


देवी देवताओं के नृत्यों व खला मेलों की धूम है इस माह उत्तराखण्ड में
रुद्रप्रयाग,(प्याउ)। इन पूरे उत्तराखण्ड में कहीं माॅं भगवती की अठवाड़ रूपि नृत्य तो कहीं कोई ग्वेल, भैरव व नरसिंह आदि देवी देवताओं की नृत्य व पूजन भी इसी महिने किया जाता हे। एक प्रकार से यह महिना पूरे उत्तराखण्ड में देवी देवता पूजन व खला मैलों का महिना यानी उत्सव का महिना ही माना जाता है। यहां हर जनपद में किसी न किसी प्रकार का मेला का आयोजन होता हैं। हर क्षेत्र में देवी देवताओं व स्थानीय मेलो का आयोजन किया जाता है। टिहरी में सेम मुखेम हो या पौडी में बूंखाल की कालिंका, चम्पावत हो या सुदूर पिथोरागढ़, अल्मोड़ा हो या पौड़ी सभी जगह मेलों व देवी देवताओं के नृत्यों का आयोजन इसी नवम्बर माह में बड़ी धूम धाम से किया जाता हे। जौल जीवी का मेला हो या पूर्णागिरी का मेला चारों तरफ मेलों का आयोजन।
 इन दिनों जनपद रूद्रप्रयाग व चमोली में पांडव नृत्यों की धूम मची हुई है। सदियो ंसे उत्तराखण्ड के इन अंचलों में पांडव लीला के आयोजन अनन्य धार्मिक अनुष्ठान के रूप में आयोजित किया जाता है। पांडव नृत्यों का उत्सव मनाने वाले गांवों में पूरा गांव सामुहिक रूप से इसमें पूरी श्रद्वा से भाग लेता है।  कई जगह चक्रव्यूह का आयोजन व कई जगह बिना चक्रव्यूह के यह आयोजन किया जाता रहा है। परन्तु भले ही देश के इतिहास में पांडवों को राजपरिवार के रूप में माना जाता रहा हो पर उत्तराखण्ड के इन भू भाग में पांडव देवता के रूप में सदियों से पूजे जाते है।

मनमोहन सरकार के कुशासन से त्रस्त जनता के जख्मों को कुरेदने से बाज आयें प्रणव मुखर्जी


मनमोहन सरकार के कुशासन से त्रस्त जनता के जख्मों को कुरेदने से बाज आयें प्रणव मुखर्जी
केन्द्रीय बित्त मंत्री प्रणव मुखर्जी द्वारा कुछ महिनों में मंहगाई पर काबू करने के बयान एक प्रकार से मनमोहन सिंह के कुशासन से त्रस्त देश की आम जनता के जख्मों को कुरेदने वाला शर्मनाक बयान हे। जब जब भी मंहगाई पर मनमोहन सिंह या उनके कबीना मंत्री शरद पवार या प्रणव मुखर्जी बयान देते है, तब तक देश में अचानक कमरतोड़ मंहगाई का तांडव और मच जाता हे। इस लिए देश की जनता का सप्रंग प्रमुख सोनिया गांधी से निवेदन है कि वे व उनकी नक्कारा सरकार देश की जनता को अपने हाल पर छोड़ कर उसके जख्मों पर नमक न छिड़के। आने वाले लोकसभा चुनाव में देश की जनता इस निकम्मी मनमोहन सरकार को देश से उखाड़ फेंकने का खुद काम करेगी।

माया ने उप्र विभाजन के दाव से विपक्ष को किया चारों खाने चित

माया ने उप्र विभाजन के दाव से विपक्ष को किया चारों खाने चित/
तेलांगना के साथ उप्र का शीघ्र हो विभाजन, -कांग्रेस व भाजपा बेनकाब/

मायावती ने उत्तर प्रदेश के आगामी विधानसभा चुनाव में फिर से प्रदेश की सत्ता में काबिज होने के ‘ उप्र विभाजन के चुनावी दाव के आगे भाजपा, कांग्रेस व सपा सहित पूरा विपक्ष भौचंक्का सा रह गया हे। कांग्रेस व भाजपा की स्थिति सांप छुछंदर की तरह हो गयी है। न तो इसका दिल से समर्थन ही कर पा रही है व नहीं उनके तर्क ही जनता के गले में उतर रहे है। वहीं सपा के लिए भी भले ही स्थिति अन्य दलों से अच्छी है पर उसके लिए भी चुनावी माहौल में पूरे प्रदेश में वह निरापद नहीं रही जिसके लिए वह सपने बुन रही थी। पूरा चुनाव अब मायावती के इसी चुनावी दाव के आगे पीछे सम्पन्न होगा। इसका भले ही सियासी लाभ माया पूरा उठा पाये न उठा पाये परन्तु उसने प्रदेश के आम जनमानस को अंदर से उद्देल्लित कर दिया। कांग्रेस की स्थिति बहुत ही असहज हो गयी है। भाजपा के लिए भी स्थिति उतनी ही असहज हो रखी है। माया ने इस चुनावी दाव से गैद भले ही कांग्रेस के पाले में डाल दी हे। परन्तु कांग्रेस नेतृत्व स्थितियों को समझने व उनका राजनैतिक लाभ उठाने के लिए तत्काल निर्णय लेने की स्थिति में न होने के कारण सकारात्मक परिस्थितियों का ेभी अपने विरोध में करने के लिए कुख्यात रहा। ऐसा नहीं कि मायावती ने यकायक इस दाव को चला। अपने इस दाव को मायावती ने कई बार सरेआम प्रकट भी कर दिया था । परन्तु क्या मजाल है कांग्रेस आला नेतृत्व इस दिशा में उचित कदम उठाने के लिए कोई जमीनी तैयारी तक की हो। भले ही मायावती का शासन भ्रष्टाचार व कुशासन के नाम पर जनता के लिए मुलायम सिंह के राज की तरह ही दुस्वप्न की तरह दुखदाई रहा हो परन्तु इन परिस्थितियों व मुद्दों से जनता का ध्यान बंटाने के लिए ही माया ने यह चुनावी दाव ऐसे समय पर चला कि इसका विरोध करने वालों के दलों में भी इस मुद्दे पर उनके इन क्षेत्रों के नेता जनता के बीच छाती ठोक कर विरोध करने का साहस तक नहीं जुटा पा रहे हो। कांग्रेस जो प्रारम्भ में ही इस विभाजन के पक्षधर रही। परन्तु अब तक उसने इस दिशा में कोई ठोस कदम तक नहीं उठाये। कांग्रेस आला नेतृत्व के अनिर्णय की शर्मनाक स्थिति के कारण आज न तो वह मनमोहन सिंह की नक्कारा सरकार पर ही अंकुश रख पा रही है व नहीं जनहित में व संगठन के हित में कोई राजनैतिक ठोस कदम ही उठा पा रही है। कांग्रेस को चाहिए था कि वह अविलम्ब तेलांगना राज्य का गठन करने के साथ उप्र के विभाजन को मूर्त रूप दे कर हारी हुई बाजी मार कर जनभावनाओं का सम्मान करना सीखना चाहिए। राजनेताओं को एक बात का ध्यान रखना चाहिए कि देश का शासन तंत्र उनके हितों की पूर्ति या उनकी अयाशी के लिए नहीं अपितु जनहितों का साकार करने के लिए है। जिस प्रकार ने मायावती ने अपने कुशासन व भ्रष्टाचार की तरफ प्रदेश की जनता का ध्यान हटाने के लिए उप्र के विभाजन का चुनावी दाव खेला, उसका जवाब राजनैतिक कुशलता से देना चाहिए न की नकारात्मक राजनीति करके। तेलांगना व उप्र के इन चार राज्यों का गठन अविलम्ब होना चाहिए।
जिस प्रकार से मायावती ने 21 नवम्बर को उप्र की विधानसभा में उत्तर प्रदेश विधान मण्डल के दोनों सदनों में विपक्ष के भारी शोरशराबे और हंगामे के बीच सरकार ने न केवल वर्ष 2012-2013 के लिए एक लाख 91 हजार करोड़ रुपये से ज्यादा के अंतरिम बजट व 70733 करोड़ रूपये से ज्यादा के लेखानुदान विधेयक को पारित करा लिया बल्कि प्रदेश के चार भागों में बांटे जाने के महत्पूर्ण प्रस्ताव को भी सदन की मंजूरी दिलाने में कामयाबी पा ली। यह उनके राजनैतिक कौशल का ही एक जलवा था। बिखराव के चलते एक बार फिर विधानसभा में विपक्ष की रणनीति जमींदोज हो गयी और मात्र 16 मिनट चली कार्यवाही में विधायी कायरे को अंजाम दे सदन की कार्यवाही अनिश्चितकाल के लिए स्थगित कर दी गयी। इतना ही नहीं मात्र एक दिन का सत्र इतिहास में भी दर्ज हो गया । दो दिवसीय सत्र का सोमवार को पहला दिन था जिसकी शुरुआत भारी शोर-शराबे, हंगामे और सरकार विरोधी नारों की गूंज से हुई। वन्देमातरम गान के तुरंत बाद विपक्षी सदस्यों ने पहले अपने स्थानों, फिर सपा और भाजपा के सदस्यों ने सदन के फर्श पर आकर अल्पमत की सरकार को बर्खास्त करने की पुरजोर तरीके से मांग उठायी। अपनी घोषित रणनीति के तहत मुख्य विरोधी दल समाजवादी पार्टी और भारतीय जनता पार्टी सदन में सरकार के खिलाफ अविास प्रस्ताव लाना चाहती थी पर विधानसभा अध्यक्ष सुखदेव राजभर ने इसकी मंजूरी नहीं दी। सपा और भाजपा के सदस्य पीठ से अनुमति न मिलने पर आक्रोशित हो उठे और पीठ की ओर बढ़ने लगे पर गार्ड के सख्त सुरक्षा घेरे को वे लांघ नहीं पाये। कुछ सदस्यों ने मेजों पर चढ़ कर पोस्टर भी लहराये जिन पर सरकार विरोधी नारे और अल्पमत की सरकार को बर्खास्त करने की मांग लिखी थी। हंगामे के बीच विधानसभा अध्यक्ष ने सदन की कार्यवाही पूरे प्रश्नकाल के लिए स्थगित कर दी। तकरीबन एक घंटा 16 मिनट के स्थगन के बाद सदन की कार्यवाही दोबारा शुरू हुई तो विपक्ष के सदस्य फिर अपने स्थानों पर खड़े हो हंगामा करने लगे। विधानसभा अध्यक्ष ने कार्यसूची के अनुरूप कार्यवाही चलने देने की अपील करते हुए सदस्यों से शांत होने की अपील की पर जब शोर शराबा और हंगामा कम नहीं हुआ तो उन्होंने संसदीय कार्य मंत्री लालजी वर्मा से तय समय पर अनुपूरक बजट प्रस्तुत करने के निर्देश दिये। हंगामे के बीच वित्तीय वर्ष 2012-2013 का एक लाख 91 हजार 825 करोड़ 70,733 करोड़ रूपये अनुपूरक बजट व लेखानुदान पारित करा लिये गये। इस बीच स्थगन के बाद दोबारा कार्यवाही शुरू हुई तो सदन में मुख्यमंत्री सुश्री मायावती भी मौजूद थीं जिन्होंने अनुपूरक बजट और लेखानुदान के पारित होने के तुरंत बाद राज्य को चार भागों बांटने संबंधी प्रस्ताव अचानक सदन के पटल पर रख दिया जिसे ध्वनिमत से पारित कर दिया गया।
छोटे राज्यों का गठन देश के हित में राजनैतिक दलों को अपने पूर्वाग्रहों व छुद्र स्वार्थो से उपर उठ कर देश के उन विकास से वंचित क्षेत्रों की तरफ भी अपनी राजनैतिक जिम्मेदारी का अहसास होना चाहिए। उत्तराखण्ड राज्य गठन का एक सिपाई होने के कारण मुझे इन मामले में दो टूक कहने का मन करता है कि राजनेताओं ने अभी तक देश के समग्र विकास के लिए कभी भी ईमानदारी से कार्य नहीं किया। इसके लिए अब समय है कि देश में नये राज्यों का ईमानदारी से गठन किया जाये। देश के वंचित व उपेक्षित क्षेत्रों को भी विकास का उतना ही हक है जिनता अमेटी, इटावा, दिल्ली सहित देश के प्रतिष्ठित क्षेत्रों को है। विकास का यह असंतुलन जहां देश में असंतोष को हवा देता है वहीं लोकशाही पर प्रश्न चिन्ह भी लगाता है। देश की तमाम राजनैतिक दलों को दलगत राजनीति से उपर उठ कर देश के समग्र विकास के लिए अपनी जिम्मेदारी का निर्वाह करना चाहिए। शेष श्रीकृष्ण कृपा। हरि ओम तत्सत् । श्री कृष्णाय् नमों

.दिल्ली में भी नहीं है आपदा से बचाव की आपात व्यवस्था दुरस्थ /

‎.दिल्ली में भी नहीं है आपदा से बचाव की आपात व्यवस्था दुरस्थ /
.नन्द नगरी टेन्ट प्रकरण ही नहीं कांग्रेस मुख्यालय के समक्ष कार दहन प्रकरण से जाहिर हुआ आपदा प्रबंधन बेनकाब/

दिल्ली देश की राजधानी है। यहां पर राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, प्रधानमंत्री व गठबंधन सरकार की प्रमुख सहित देश के तमाम मंत्रियों, सांसदों, सेना नायकों, प्रमुख नौकरशाहों का आवास व कार्यालय है। इसी महत्व के कारण दिल्ली आतंकियों के निशाने पर रही। यहां पर कई आतंकी कार्यवाही को आतंकियों ने बम धमाके व गोलियों से दिल्ली के दिल को छलनी करके लहू लुहान करने का नापाक कृत्य किया। अमेरिका में एक ही बार आतंकी हमला हुआ परन्तु उसके बाद अमेरिकी प्रशासन ने इतनी मजबूत आपदा व सुरक्षा व्यवस्था का गठन किया कि लाख कोशिश करने के बाबजूद आतंकी दुबारा कई वर्ष बीत जाने के बाबजूद अमेरिका में एक मच्छर तक नहीं मार सके। परन्तु भारत में संसद, लाल किला ही नहीं सरोजनी नगर, करोल बाग, कनाट प्लेस व वटाला हाउस पर हमला करके आतंकियों ने भारतीय व्यवस्था के तमाम आपदा प्रबंधों व सुरक्षा दावों को बेनकाब ही कर दिया। सरकार हर आतंकी हमले के बाद सुरक्षा व्यवस्था मजबूत करने के दावे करते रहे परन्तु आतंकियों ने एक के बाद एक हमला करके इनके दावों की पूरी कलई ही खोल दी। हाल में हाईकोर्ट के प्रवेश द्वार पर हुए हमले से शासन प्रशासन के दावों की हवाई ही उड गयीं।
यह बात तो आतंकी हमले की रही। उनको रोकने में सरकार अब तक असफल रही। परन्तु देश में हजारों करोड़ का हर साल आपदा प्रबंधन के नाम पर केन्द्र से लेकर राज्यों में अरबों रूपये पानी की तरह हर साल बहाये जाते हैं। परन्तु हकीकत यह है कि अभी आतंकियों के हमले के बाद तत्काल आपदा प्रबंधन के तहत अग्नि बुझाने वाला दस्ते, चिकित्सालय एम्बुलेंस, बिजली व पानी व सुरक्षा व्यवस्था सुचारू रखने का एक युद्वस्तरीय तंत्र पूरी तरह दम तोड़ चुका हे। इसका नजारा खुद 21 नवम्बर को कांग्रेस मुख्यालय 24 अकबर रोड़ व सोनिया गांधी के घर के समीप 10 जनपत के आगे हुई दुर्घटना को तत्काल सूचना मिलने के बाबजूद 20 मिनट बाद दमकल गाडी पंहुचती है तो देश के दूरस्थ क्षेत्रों के क्या हाल होंगे। इस घटना से सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है कि यह व्यवस्था कहां तक मृतप्राय हो चूकी हे। कांग्रेस मुख्यालय व सोनिया गांधी के आवास के समीप एक जलती हुई कार को समय पर तत्काल सूचना के बाबजूद 20 मिनट देर से आना यही प्रदर्शित करता है कि आपद काल में हो सकने वाली व्यवस्था से निपटने के लिए देश में क्या क्या व्यवस्था है।
भले ही 20 नवम्बर को दिल्ली के नन्द नगरी में किन्नर सम्मेलन के पण्डाल में लगी आग से हुई दुर्घटना से अपना पल्ला बचाने के लिए बहाना बनाया गया कि ‘ आयोजकों ने दमकल विभाग से एनओसी नहीं ली थी । परन्तु इसके अगले ही दिन 21 नवम्बर को दोपहर को (देश व संसद, सेना मुख्यालय, व देश के उपराष्ट्रपति के निवास के समीपवर्ती क्षेत्र) 24 अकबर रोड़ यानी कांग्रेस मुख्यालय, सोनिया गांधी के निवास 10 जनपत के प्रवेश द्वार व उच्च सैनिक अधिकारी के घर के सामने वाली अकबर रोड़ पर एक कार में सुरक्षा, यातायत पुलिस व कई लोगों की उपस्थिति में एक चलती कार में से धुंआ आने लगा। उसके चालक ने यकायक गाड़ी को रोक कर उसको देखने की कोशिश की परन्तु तब तक हल्की आग, गाड़ी में लगने लगी। ड्राइवर ने एक छोटे से पानी की बोतल से आग बुझाने का असफल प्रयास भी किया। यातायात पुलिस की महिला सिपाई ने तत्काल इस दुर्घटना की सूचना दमकल विभाग को दी । परन्तु दमकल विभाग की गाड़ी इस उच्च संवेदनशील व अतिविशिष्ट क्षेत्र में ही पूरे 20 मिनट बाद तब पंहुची जब गाड़ी आसमान को छू रही लपटों से आधी गाड़ी को श्वाहा कर गयी थी। असहाय पुलिस कर्मी व दर्जनों खबरिया चैनल के केमरे असहाय हो कर इस दुर्घटना को देखते रहे। इस घटना को देख कर देहरादून कांग्रेस के पूर्व जिलाध्यक्ष चैधरी महेन्द्रसिंह ने आश्चर्य प्रकट किया कि ऐसे उच्च संवेदनशील क्षेत्र में हुई इस दुर्घटना पर दमकल विभाग का यह हाल है तो और जगह क्या स्थिति होगी। यानी देश की राजधानी के अतिविशिष्ठ क्षेत्रों में भी किसी प्रकार से आपात स्थिति को निपटने के लिए अभी देश में कोई ऐसा चुस्त दुरस्त तंत्र तक नहीं है। तो देश के दूरस्थ क्षेत्रों में इस प्रकार की आपदा से निपटने के लिए देश का आपदा प्रबंधन के नाम पर करोड़ों रूपये डकारने वाला तंत्र की स्थिति कितनी लच्चर होगी इसका इस घटना से सहज ही अनुमान लगाया जा सकता हे।
देश की राजधानी दिल्ली में अखिल भारतीय किन्नर समाज सर्वधर्म महासम्मेलन में पण्डाल में लगी आग से हुई भयंकर दुघर्टना से दर्जनों किन्नर जलने व भगदड़ में कुचलने के कारण मारे गये और चार दर्जन से अधिक बुरी तरह से घायल हो गये। 20 नवम्बर की सांय 6.30 बजे नन्द नगरी के सामुदायिक भवन से उससे सटे खाली पार्क तक 1500 गज में लगे इस विशाल पण्डाल में बिजली की तार में शार्ट सर्किट हेने से अचानक आग लग जाने से यह दिल दहलाने वाला हादशा हुआ। उस समय इस पण्डाल में देश भर से आये 3000 किन्नरों सहित इस सम्मेलन का आनन्द ले रहे लोगों सहित करीब 5 हजार लोग उपस्थित थे। अचानक लगी इस आग से भगदड़ मच गयी। आग की चपेट में आये दो सिलेण्डर भी फट गये। सभी लोग गेट से बाहर निकलने के लिए भागे परन्तु एक ही 8 फुटी गेट होने के कारण लोग एक दूसरे को धकेलते कुचलते निकलते रहे, जो नीचे गिर गया उसको उठ भी नहीं पाया, हजारों लोग उसके उपर से गुजर गये। देर रात दर्जनों आग बुझाने वाली दमकलों के सहयोग से 11 बजे रात आग बुझायी जा सकी। इस दुर्घटना के घायलों को अस्पतालों में भर्ती किया गया। इस दुर्घटना पर दमकल विभाग अनापत्रित प्रमाण पत्र न लेने की बात कह कर अपना पल्ला झाड रहा है वहीं किन्नर समाज की अध्यक्षा सोनिया ने प्रशासन पर असहयोग का आरोप लगाते हुए कहा कि प्रशासन ने उनके आवेदनों पर कभी ध्यान तक नहीं देने का आरोप भी लगाया।
इस प्रकार की व्यवस्था को देखने के बाद हम चाहे दुनिया में कहीं भी विकास के नाम पर कितना भी हांके परन्तु देश की व्यवस्था अभी पूरी तरह से पटरी से उतर चूकी है। उसको सटीक व चूक रहित बनाने के लिए व्यवस्था का ढांचा ही नहीं व्यवस्था में आमूल सुधार की सक्त जरूरत है। शेष श्रीकृष्ण कृपा। हरि ओम तत्सत्। श्रीकृष्णाय् नमों।

-जन चेतना यात्रा से मजबूत हुई आडवाणी की प्रधानमंत्री की दावेदारी

-जन चेतना यात्रा से मजबूत हुई आडवाणी की प्रधानमंत्री की दावेदारी
प्यारा उत्तराखण्ड-
भाजपा के आला नेतृत्व लालकृष्ण आडवाणी की प्रधानमंत्री पद पर आसीन होने के स्वप्न पर लग रहे ग्रहण को दूर करने के लिए के लिए अचानक शुरू की गयी जन चेतना यात्रा का भले ही समापन दिल्ली में 20 नवम्बर को रामलीला मैदान में हो गयी हो परन्तु इस जन चेतना यात्रा के घोषित मकसद भ्रष्टाचार के खिलाफ’ जन चेतना जागृत करने के उद्देश्य के बजाय यह यात्रा लालकृष्ण आडवाणी की प्रधानमंत्री की दावेदारी में भाजपा सहित राजग गठबंध्न में ही पीछे धकेले जाने की क्षतिपूर्ति के रूप में देखा जा रहा है। गौरतलब है कि भाजपा में ही लालकृष्ण की दावेदारी पर प्रश्न चिन्ह लग गये थे। यहां संघ सहित एक बडा तबका लालकृष्ण आडवाणी के बजाय गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी को आगामी 2014 में प्रधानमंत्री के पद पर आसीन देखना चाहता है। इसी लिए आडवाणी को इस बार भाजपा ने अपने प्रधानमंत्री के दावेदार के तौर पर प्रस्तुत न करके एक प्रकार उनको हाशिये में धकेलने का अपरोक्ष ऐलान कर दिया था। इसी अपमान से आहत लालकृष्ण आडवाणी ने यकायक अण्णा व रामदेव के भ्रष्टाचार के खिलाफ जनांदोलन में मिली जनसहानुभूति को भुनाने के लिए व अपने विरोध्यिों को चारों खाने चित करने के लिए जनचेतना यात्रा का ऐलान करके अपने विरोधियों को ही नहीं समर्थकों को भी भौचंक्का कर दिया था। इस यात्रा का शुभारम्भ गुजरात से करने के बजाय उन्होंने अपने पसींदे मुख्यमंत्री नीतिश के राज्य बिहार से की। अब भले ही राजग गठबंध्न कुछ भी कहे पर इस यात्रा के समापन करके आडवाणी ने अपनी दावेदारी मजबूत कर दी हे। हकीकत यह है कि इस यात्रा का भ्रष्टाचार के खिलाफ कहीं दूर तक लेना देना नहीं रहा। क्योंकि लालकृष्ण आडवाणी की सरपरस्ती में कर्नाटक व उत्तराखण्ड की भाजपाई सरकारों में जो भ्रष्टाचार के कृत्य हुए। उनको लम्बे समय तक लालकृष्ण आडवाणी की मूक आशीर्वाद ही मूल शक्ति थी। अब राजनैतिक हज यात्रा यानी जनचेतना यात्रा से पहले आडवाणी ने दोनों को हटा कर अपना दामन भले ही पाक-साफ दिखाने का प्रयत्न किया, जो जानकारों की नजरों में पहले ही बेनकाब हो गया। कुल मिला कर आडवाणी की इस चेतना यात्रा से आडवाणी ने पिफर से अपने विरोध्यिों को चारों खाने चीत करने में सपफलता हासिल की। देखना है अब मोदी समर्थक किस प्रकार से आडवाणी की हसरत पर ग्रहण लगा कर अपने दावेदारी को मजबूत करते है।

Friday, November 18, 2011

काम्बली के बयान पर हायतौबा मचाना भारतीय पत्रकारिता का मानसिक दिवालियापन


-काम्बली के बयान पर हायतौबा मचाना भारतीय पत्रकारिता का मानसिक दिवालियापन
-देश की ज्वलंत मुद्दों पर शर्मनाक मौन रखने वाले  विदेशी व पैंसों वालों के खेल पर हायतौबा क्यों
लगता है खबरिया चैनलों के पास देश की तमाम ज्वलंत समस्याओं को देखने, समझने व दिखाने का कोई समय तक नहीं हे व नहीं सुध। जो उनको देश को तबाह कर रही मंहगाई, भ्रष्टाचार व आतंक जेसे ज्वलंत मुद्दो पर अपना दायित्व निभाने के बजाय 15 साल पुराने खेले गये विदेशी मूल के 15 साल पहले खेल क्रिकेट के एक अदने से मेच पर एक खिलाड़ी काम्बली के बयान पर इतना हाय तौबा मचा रहे है।  अगर कुछ सच था तो काम्बली क्या 15 साल से मच्छर मार रहे थे वे कुम्भकरण की तरह क्यों सोये हुए थे। अब क्या बिली ने छींक मारी या उनको किसी को बदनाम करने का सबसे अच्छा मोका अब मिला। अगर उनमें जरा सी भी नैतिकता रहती तो वे तुरंत 15 साल पहले ही उस मैच के बाद में अपना मूंह खोलते। नहीं तो 15 साल बाद बोल कर लोगों का समय नष्ट करने के लिए देश से माफी मांगते।
सबसे पहली बात यह है कि क्या देश में कभी इन क्रिकेट के लिए देशवासियों का समय बर्बाद करने के लिए जिम्मेदार इन दिशाहीन मीडिया ने कभी इसका एकांश भी देशी खेलों कुश्तियों, कब्बड़ी इत्यादि को इस विदेशी व मात्र पैंसे के लिए खेले जाने वाले इस खेल के लिए अपने तथाकथित खबरिया चैनलों के प्रसारण में दिया हो। क्रिकेट खेला ही पैंसों के लिए जाता है, देश के लिए तो संघर्ष या तो सैनिक, मजदूर, किसान व गरीब आम आदमी प्रायः करता है, धनिकों का तो प्रायः पूरी दुनिया मुट्ठी में होती है वे न तो मतदान करते परन्तु पूरा तंत्र उनकी सेवा व उनके लिए ही समर्पित रहता है। अगर मैच फिक्स नहीं हुआ तो यह आश्चर्य की बात हे। जिस देश में राजनेता से अधिकारी तक भ्रष्टाचार के गर्त में आकंठ फंसे हो उस देश व दुनिया में एक क्रिकेट में ऐसा हो गया हो तो इसमें आश्चर्य कैसा। यह कोई देश हित के लिए नहीं अपितु अपने निहित स्वार्थो के लिए धनिकों का चैचला है जिसमें देश के आम अवाम को इन खबरिया चैनलों ने अपने प्रसारणों के सहारे अफीम की सी लत लगा कर देश की श्रमशक्ति व ऊर्जा को बर्बाद कर देश के विकास की रही सही संभावनाओं को दफन कर दिया है। संसार के कोई वर्तमान मजबूत देश अमेरिका, रूस, चीन, जापान व जर्मनी, इस्राइल, फ्रांस आदि इस क्रिकेट को नहीं खेलते है। यही नहीं संसार के 5 प्रतिशत देश ही इस खेल को खेलते है और बेशर्मो की तरह डींग हांक कर कहा जाता है विश्व कप क्रिकेट। क्रिकेट कुल मिला कर प्रायः अंग्रेजों व उनके गुलामों का खेल है। परन्तु देश का दुर्भाग्य देखिये इस गुलामों के खेल के खिलाडियों को इन देशों में बेशर्मी से महानायक व देवता जैसे जुमलों से भी नवाजा जाता है। देश के इस नक्कारपन को अंगीकार कराने के लिए इन दिशाहीन समाचार पत्रों व खबरिया चैनलों का सबसे खतरनाक हाथ रहा। इनको अपनी इस भूल के लिए पूरे देश से माफी मांगते हुए अपने बनाये गये इस भष्मासुर को पुन्न चुहिया भव की तरह अपने दायित्व का निर्वहन करना चाहिए।

Thursday, November 17, 2011

बाबा रामदेव, सात जन्म में गदाफी सा शासन नहीं दे सकते विश्व के तमाम शासक


-बाबा रामदेव सात जन्म में गदाफी सा शासन नहीं दे सकते विश्व के तमाम शासक
-भागे नहीं राष्ट्र रक्षा में शहीद हुए गदाफी
बाबा रामदेव द्वारा भारतीय नेताओं को गद्दाफी कहना यह उनकी अज्ञानता का परिचय है भारतीय नेता कभी गद्दाफी की तरह राष्ट्रभक्त व जनता के हित के लिए अपना जीवन बलिदान करने वाले नहीं हुए। गदाफी ने जनता को जो मजबूत व विलक्षण शासन दिया उसकी कल्पना भी भारतीय लोकशाही में नहीं की जा सकती है। केवल उनका कसूर यह था कि वह अमेरिका व उनके पिट्टूओं को लीबिया के संसाधनों पर डाका डालने की इजाजत अपने 41 साल के शासन में नहीं दी और नहीं उन्होंने कट्टरपंथी मुस्लिमों को लीबिया में अपने जीते जी काबिज होने दिया। उनका जैसा शासन व बलिदान देने की कल्पना भारतीय राजनेता 7 जन्म में नहीं कर सकते। बाबा रामदेव को एक बात समझ लेनी चाहिए कि अमेरिका के 14 नाटो देशों व अलकायदा के लोकशाही वाहिनी के हमलों के आगे आत्मसम्पर्ण करने के बजाय अपने देश की प्रभुसत्ता की रक्षा के लिए वे भागे या आत्म समर्पण नहीं किया अपितु बीर की तरह शहीद हुए। गदाफी का कसूर केवल यही था कि उसने लोकशाही को मजबूत नहीं किया। परन्तु देश में उसका शासन संसार भर के तमाम शासकों से कई गुना अधिक जनहित में 21 था, 19 नहीं। लीबिया पर एक पाई का विदेशी कर्जा नहीं था, जबकि अमेरिका व भारत  सहित विश्व के अधिकांश देश विदेशी कर्ज में डूबे हुए है। लीबिया में सभी नागरिकों को शिक्षा व चिकित्सा ही नहीं बिजली तक निशुल्क थी। प्रत्येक नागरिक के जन्म लेने व शादी पर सरकार द्वारा लाखों रूपये का तौफा दिया जाता था। देश के तेल भण्डार के विक्रय पर सभी नागरिकों के खाते में एकांश जमा होता था। ऐसा विलक्षण शासन विश्व में अन्यत्र कहीं देखने को नहीं मिलता। ऐसे शासक पर हल्की टिप्पणी करके बाबा रामदेव ने ऐसे राष्ट्रभक्त जनहित में समर्पित शासक को अपमान करके अपनी अज्ञानता का परिचय दे कर अपनी जडों को कमजोर किया। हो सकता है कि अमेरिकी ऐजेन्टों व अलकादया के आतंकियों के मंसूबों को जमीदोज करने की आड में गदाफी शासन में आम लोगों का भी दमन हो गया हो परन्तु गदाफी का शासन विश्व में विलक्षण था।

Wednesday, November 16, 2011

कमजोर लोकपाल बना कर जनता को ही नहीं अण्णा को भी छला मुख्यमंत्री खंडूडी ने


कमजोर लोकपाल बना कर जनता को  ही नहीं अण्णा को भी छला मुख्यमंत्री खंडूडी ने /
भाजपा व कांग्रेस का सफाया करके ही होगी उत्तराखण्डी हितों की रक्षाः ले. जनरल टीपीएस रावत /
नई दिल्ली;(प्याउ)। ‘भ्रष्टाचार के खिलाफ छेडी अण्णा की जंग में देश का हर देशभक्त अवाम साथ है। लोगों ने अण्णा की निर्मल छवि व त्याग की मूर्ति के कारण उनको गांधी का प्रतिमूर्ति मान कर उनको अपना समर्थन दिया। परन्तु उत्तराखण्ड के मुख्यमंत्री भुवनचंद खंडूडी ने न केवल अण्णा को अपितु प्रदेश की उस भोली जनता के साथ विश्वासघात किया, जो उनको भ्रष्टाचार के खिलाफ खुली जंग छेडने वाला एक ईमानदार राजनेता मानती रही। ऐसी भोली  जनता के विश्वास का गला घोंटते हुए प्रदेश के मुख्यमंत्री भुवनचंद खंडूडी ने भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने के नाम पर एक ऐसा लोकपाल बनाया, जो न केवल विधायक, मंत्री व मुख्यमंत्री जैसे पदों पर आसीन संभावित भ्रष्टाचारियों को साफ बचाने का ‘विशेष सर्वानुमति का’ पिछला दरवाजा बनाया है। यही नहीं श्री खंडूडी ने प्रदेश में खुली लूट मचा रहे एनजीओ पर अंकुश लगाने के लिए इसमें सम्मलित तक नहीं किया। वहीं इस बिल को देश में सबसे मजबूत बना कर अपनी झूठी छवि को बनाने का निकृष्ठ व अलोकतांत्रिक काम किया।’ जिस किसी को भी इसमें तनिक सा भी संदेह है उन्हें उत्तराखण्ड लोकायुक्त के पृष्ठ 21 के चेप्टर 6 में जो लिखा है
CHAPTER VI
INVESTIGATION AND PROSECUTION AGAINST HIGH
FUNCTIONARIES
Investigation  and  Prosecution  against high  functionaries
18. No investigation or prosecution shall be initiated without obtaining
permission from  the  Bench of all the members with  Chairperson
against any of the following persons:-
(i) The Chief Minister and any other member of the Council of
Ministers.
(ii) Any Member of Uttarakhand Legislative Assembly.
( http://uk.gov.in/files/Documents/ENGLISH_UTTARAKHAND_LOKAYUKTA_BILL__2011.pdf) उससे न केवल खंडूडी का छल बेनकाब होता है अपितु अण्णा के सहयोगियों द्वारा उनको जानबुझ कर गुमराह करने का कच्चा चिठ्ठा उजागर हो जाता है। अण्णा को क्यों उनकी टीम ने किस निहित स्वार्थो के खातिर ये गलत जानकारी दी, यह तो वे ही जानते हैं परन्तु अण्णा द्वारा इस लोकायुक्त को मजबूत कह कर समर्थन करना उनकी छवि को जहां धूमिल करता है वहीं उन को उनकी टीम द्वारा गुमराह किये जाने का आरोप सत्य साबित होता है।
यह दो टूक बात संसद के समीप प्रेस क्लब आफ इंडिया में आज 16 नवम्बर सांय तीन बजे प्रेस क्लब में आयोजित एक खुली प्रेस वार्ता में देश की मीडिया को संबोधित करते हुए उत्तराखण्ड रक्षा मोर्चा के अध्यक्ष, ले. जनरल तेजपाल सिंह रावत ने कहा कि आगामी विधानसभा चुनाव में समान विचार वाले राजनैतिक व उत्तराखण्ड समर्थक दलों, को साथ ले कर प्रदेश को दिल्ली के दलालों के लिए लूट का अड्डा बनाने वाले भाजपा व कांग्रेस के शिकंजे से मुक्त करना होगा। उन्होंने कहा कि उत्तराखण्ड राज्य का गठन के लिए हमारी माॅं बहिनों व युवाओं ने जो शहादतें दी व अपना सर्वस्व इस राज्य को गठन करने के लिए समर्पित किया, उस राज्य को भाजपा व कांग्रेस के दिल्ली दरवार के प्यादों ने पूरी तरह से तबाह कर दिया है। इन दलों ने न केवल प्रदेश की अस्मिता को रोंदने वाले मुजफफरनगर काण्ड के अभियुक्तों को शर्मनाक संरक्षण दिया अपितु प्रदेश की जनांकांक्षाओं को साकार करने वाली राजधानी गेरसैंण को भी षडयंत्र के तहत जमीदोज कर दिया है। पूर्व सांसद ले. जनरल तेजपाल सिंह रावत ने जनता से दो टूक शब्दों से कहा कि उनको भारतीय सेना का ले. जनरल जेसा गौरवशाली पद पर आसीन हो कर देश की रक्षा में अपने आपको समर्पित करने का अवसर मिला। मुझे प्रदेश में विधायक से कबीना मंत्री व भारत की सर्वोच्च सदन में सांसद बनने का शौभाग्य मिला। जब मैने देखा कर उत्तराखण्ड के हितों के साथ भाजपा व कांग्रेस दोनों दल शर्मनाक खिलवाड़ कर रहे हैं तो मेरी आत्मा ने मुझको अपनी मातृ भूमि की रक्षा के लिए दोनों दलों को त्यागने के लिए विवश किया। मेरा शौभाग्य है कि कांग्रेस की आला कमान सोनिया गांधी व भाजपा के आला नेताओं के तमाम प्रलोभन को ठुकरा कर अपनी जन्म भूमि उत्तराखण्ड के हितों की रक्षा के लिए मेरी आत्मा ने मुझे झकझोर दिया। मेरे इस काम में उत्तराखण्ड के महान चिंतक व पूर्व आईएएस सुरेन्द्र सिंह पांगती, उत्तराखण्ड के महान गायक नरेन्द्र नेगी सहित हजारों उत्तराखण्ड के हक हकूकों की रक्षा के लिए अपना सर्वस्व निछावर करने वाले महानायकों का आशीर्वाद व सहयोग रहा।
उन्होंने कहा कि उत्तराखण्ड रक्षा मोर्चा केवल एक राजनैतिक दल नहीं अपितु यह उत्तराखण्ड के हितों के लिए समर्पित पूर्व सैनिकों, छात्रों, बुद्विजीवियों, महिलाओं, समाजसेवियों का एक व्यापक जनांदोलन भी है।  उन्होंने कहा आज अगर हम जागे नहीं तो भाजपा व कांग्रेस प्रदेश के बाकी रहे संसाधनों को अपने आकाओं को खुश करने के लिए बर्बाद कर देंगे। उन्होंने कहा कि उनका संघर्ष कभी किसी व्यक्ति के खिलाफ नहीं रहा, उन्होने चाहे कांग्रेस हो या भाजपा दोनों दलों को छोडा जब वहां पर भ्रष्ट लोगों को प्रदेश की सत्ता का महत्वपूर्ण संवेधानिक पदों पर पार्टियों के नेतृत्व ने भारी विरोध करने के बाबजूद आंख बंद करके आसीन किया। उन्होने उत्तराखण्ड के जनमानस से अपील की कि वे उत्तराखण्ड के हितों को रौंद रहे दोनों दलों का प्रदेश से सफाया करने के लिए आगे बढ़ कर तन मनधन से उत्तराखण्ड रक्षा मोर्चा का ध्वजवाहक बने। उत्तराखण्ड रक्षा मोर्चा के सिपाई प्रदेश की सत्ता की बंदरबांट करने के लिए नहीं अपितु प्रदेश की उन जनांकांक्षाओ को साकार करने के लिए राजनीति में उतरे हैं। भ्रष्टाचार के खिलाफ आंदोलन कर रहे बाबा रामदेव पर गहरा कटाक्ष करते हुए उन्होंने कहा कि बाबा रामदेव में जरा सी भी नैतिकता होती तो वे किसी भी कीमतपर प्रदेश को भ्रष्टाचार के गर्त में धकेल रही भाजपा को भी कांग्रेस की तरह प्रहार करते। उन्होंने दो टूक शब्दों में कहा कि बाबा रामदेव ने उत्तराखण्ड में भाजपा का समर्थन करके न केवल अपना नैतिक बल का गला घोंट दिया अपितु जनता के विश्वास को भी बुरी तरह हिला दिया।  आत्म विश्वास से भरपूर ले. जनरल तेजपाल सिंह रावत ने कहा कि उनकी पार्टी में जातिवाद, क्षेत्रवाद व भ्रष्टाचार के बजाय ंपूरे विश्व में ईमानदारी, मेहनतकश व प्रबुद्वता के लिए विख्यात रहे उत्तराखण्ड का आदर्श राज स्थापित करेंगे। जिसमें न तो  किसी का शोषण किया जायेगा व नहीं किसी को उत्तराखण्ड के हितों से लूट खसोट करने वाले माफियाओं को पांव जमाने में सहयोग देने की इजाजत ही दी जायेगी।

Tuesday, November 15, 2011

-शांति पुरूष नहीं आतंक पुरूष है गिलानी

-शांति पुरूष नहीं आतंक पुरूष है गिलानी/-अमेरिका के इशारे पर भारत में आतंक फेलाने से हुए क्या गिलानी शांति पुरूष/
-मनमोहन व गिलानी दोनों हैं अमेरिका के प्यारे/

में भी हेरान हूॅ देश के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के बयान पर, जो उन्होंने कुछ दिन पहले पाक के प्रधानमंत्री गिलानी को मिलने के बाद उनको शांति पुरूष के रूप में दिया था। देश भक्तों की तरह मेरा भी सर इस बयान पर चकरा गया। थोड़ी देर में मेने सर खुजलाया, तो मेरी समझ में सारा मजारा आ गया। मनमोहन व गिलानी अगर किसी एक देश के प्यारे हैं वह देश है विश्व का स्वयं भू थानेदार अमेरिका। जिस प्रकार मनमोहन सिंह अमेरिका के लिए प्यारे हैं उसी प्रकार पाक के प्रधानमंत्री गिलानी भी अमेरिका के प्यारे है। मनमोहन सिंह ने अमेरिका के साथ जिस प्रकार परमाणु समझोता व अन्य हितों की रक्षा कर अपनी मित्रता निभाई उसी प्रकार गिलानी ने भी अलकायदा प्रमुख ओसमा बिन लादेन के सफाये सहित अमेरिका के दुश्मनों के तबाही में अपनी पूरी ताकत झोंक कर निभाई। भले हम जिसे आतंक कह रहे हों परन्तु अमेरिका के लिए वह अमेरिका के हितों का विकास है। वह भारत में अपना विकास पाक के सहारे फेलाता हैं । देश की संसद, कारगिल, मुम्बई से लेकर कहां नहीं अमेरिका ने अपने इस विकास के मंत्र को पाक के सहारे नहीं फेलाया। इसी दिव्य ज्ञान को अपनी अर्थशास्त्री दृष्टि से समझ कर मनमोहन सिंह ने बहुत ही बेवाब ढंग से गिलानी को शांति का दूत घोषित किया। शांति वही जो अमेरिका को भाये। अमेरिका को भय है कि भारत, चीन सहित कई देश उसके विकास व उसकी शांति में खतरा उत्पन्न कर सकते है। इसी लिए वह पूरे विश्व में अपने विकास व शांति के लिए अपने प्यादे पाक के हुक्मरानों के सहयोग से उन सभी देशों को तबाह करते है। पाक के हुक्मरानों द्वारा फेलाये गये अमेरिका के लिए खतरा बन सकने वाले देशों में तबाही का आतंक फेलाना अमेरिका की दृष्टि में शांति है। फेस बुक में एक पुलेकेशन ढौंडियाल भी टिण्णणी करके इस गुढ़ रहस्य को नहीं समझ पाये वे कहते हैं कि . जिस शैतान ने हमारी आर्थिक राजधानी मुम्बई पर जेहादी भेज कर देश की अर्थव्यवस्था को तहस नहस करने का षड्यंत्र किया और १६६ निर्दोष भारतियों को मौत के घाट उतार दिया । उसे हमारे प्रधान मंत्री जी ने ‘शान्ति पुरुष’ की उपाधि दे डाली ।
अब तो बस अजमल कसाब को ग्लानी जी का ‘शांति दूत ‘ घोषित करना बाकी है. और हाँ एक दूत के साथ एक परम आदरणीय अतिथि के व्यवहार की तो सभी सीमाएं हम पार कर ही चुके ।  ५५ करोड़ रूपए से भी अधिक , उसकी तीमारदारी पर खर्च कर ! अब तो बस यह ‘ शान्ति दूत ‘ वापिस पाक को बा- इजत सौंपना ही बाकी है या फिर किसी कंधार हाईजैक का इंतजार है !। विश्व हिंदू परिषद के अंतरराष्ट्रीय महामंत्री डा. प्रवीण तोगड़िया ने प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को पाकिस्तान जाकर चुनाव लड़ने की सलाह दी है।
आज मनमोहन सिंह के बयान से भाजपा ही नहीं अपितु कांग्रेसी भी दिल से स्वीकार नहीं कर पा रहे है। पर मनमोहन सिंह को देश, देशवासी व नैतिकता से क्या लेना देना, उन्हे केवल अमेरिका से ही लेना देना है।

चीन की धमक से बनेगी ऋषिकेश से कर्णप्रयाग रेल लाइन

-चीन की धमक से बनेगी ऋषिकेश से कर्णप्रयाग रेल लाइन/
-सतपाल महाराज से प्रेरणा लेकर प्रदेश के हित में कार्य करें खंडूडी व अन्य राजनेता /

 उत्तराखण्ड में रेल परियोजना का गौचर में शिलान्यास हुआ। जिस प्रकार से इसमें विवाद खडा किया गया उससे मुझे ही नहीं देश के विकास के राह के अनुगामी को जरूर दुख हुआ होगा। ऋषिकेश से कर्णप्रयाग रेल लाइन बिछाने की मंशा अंग्रेजी राज्य में भी शासकों ने साकार करने का प्रयास किया था परन्तु वे सफल नहीं हो पाये, क्योंकि देश तब तक आजाद हो गया। इसके बाद आजादी के 64 सालों बाद यह परियोजना को साकार करने का निर्णय देश की सरकार ने लिया तो उसकी महता को समझ कर उसमें सकारात्मक सहयोग देने के बाजाय राजनैतिक पैंतरेबाजी से मन का दुखी होना स्वाभाविक है। 
इस परियोजना को भले ही कुछ लोग उत्तराखण्ड के लोगों के हित में बता रहे हों परन्तु इस परियोजना को साकार करने का अगर किसी एक को श्रेय दिया जाय तो वह देश के दुश्मन रहे चीन को। जिसने भारत की सीमा पर अपनी सरजमीन से रेल पंहुचा कर देश के सत्तांध हुक्मरानों को देश की सीमाओं पर भी चीन की तरह रेल पंहुचाने के लिए विवश कर दिया।  नहीं तो देश की आजादी के 64 साल बाद निरंतर इस मांग के लिए धरना प्रदर्शन करने वालो की उपेक्षा सप्रंग सरकार व राजग सरकार नहीं करती। न तो इस परियोजना को अब तक की कांग्रेस सरकारों ने ही स्वीकृति प्रदान की व नहीं देश भक्त कहलाने वाली भाजपा नेतृत्व वाली राजग गठबंधन की सरकार जिसमें वर्तमान मुख्यमंत्री खंडूडी स्वयं मंत्री थे। इससे स्पष्ट हो गया कि अगर देश के इस सीमान्त क्षेत्र में 6400 से 10000 करोड़ लागत मूल्य की बनने वाली रेल परियोजना जिसको रेल विभाग निरंतर अलाभकारी बता कर ठण्डे बस्ते में धकेल रहा था , वह यकायक उत्तराखण्ड का हितैषी बन कर उत्तराखण्ड प्रदेश के सालाना बजट से अधिक की एक ही योजना को कैसे स्वीकृति देता।  चलो जब आंख खुले तभी सबेरा व देर आय दुरस्थ आय। देश हित में जो भी कार्य हो हमें अपने छुद्र संर्कीण स्वार्थो से उपर उठ कर स्वागत व सहयोग करना चाहिए।  जहां एक तरफ प्रदेश के मुख्यमंत्री खंडूडी जी कमजोर लोकायुक्त बिल बना कर अपने आप को युगान्तकारी छवि बनाने में जुटे हैं वहीं सतपाल महाराज प्रदेश व देश के हित में मील का पत्थर साबित होने वाले रेल परियोजना, गढ़वाल कुमाउंनी भाषा व गैरसैंण राजधानी जेसे ऐतिहासिक कार्यों को साकार करने में जुटे हुए है। 
वहीं इस रेल परियोजना के साकार करने में सबसे अधिक किसी उत्तराखण्डी नेता का हाथ रहा तो वह सतपाल महाराज है।  भाजपा नेता भगतसिंह कोश्यारी सहित अन्य नेताओं का भी प्रयास रहा । परन्तु जिस प्रखरता व निरंतरता से सतपाल महाराज ने रेल परियोजना को साकार करने में अपने आप को समर्पित किया, उससे एक बात साफ हो गयी कि प्रदेश में ऐसे नेताओं की सख्त जरूरत है जो प्रदेश के विकास को अपनी राजनीति का माध्यम बनाये। राजनेता जो भी काम करेगा उसमें उसको प्रचार की भूख होना स्वाभाविक है, यह लोकशाही की शक्ति भी है। किसी में कम तो किसी में अधिक होगी। प्रदेश व देश के विकास के लिए सकाम राजनीति को भी अन्यथा नहीं लिया जाना चाहिए। 
उत्तराखण्ड के सांसद व वरिष्ठ कांग्रेसी नेता इन दिनों रेल परियोजना की स्वीकृति व शिलान्यास होने से गदगद है। अपने फेस बुक में अपनी इस खुशी का इजहार करते हुए श्री महाराज कहते हैं कि पिछले दिनों हम पहाड़ पर बहुत सी जन सभाओ  के माध्यम से अपने पहाड़ के लोगो से मिले । हमारा  पहाड़ के लोगो से जन सम्पर्क अभियान रेल लाइन के  शिलान्यास  की घोषणा के बाद हुआ द्य मुझे ये देख कर बड़ी प्रसन्नता  हुई  की हमारे पहाड़ के लोग रेल के आगमन को लेकर बड़े खुश हैं और जनता का अपार समर्थन भी मिल रहा  हैं । जनता की  ये खुशी देखते ही बनती थी। जब मैने आज से 16 साल पहले उत्तराखंड में रेल का सपना देखा था तब कुछ विकास विरोधी लोगो ने हमारे विकास के सपने का उपहास किया था । परन्तु हमारा ये सपना अब आम आदमी के विकास का सपना बन गया  है। 14 अगस्त 1996 को रेल राज्य मंत्री के रूप में मैने ही इस रेल लाइन के सर्वे का शिलान्यास  ऋषिकेश में किया था। आज मुझे यह  कहने में कोई संकोच नहीं की पिछले 16 वर्ष से मै इस सपने को पूरा करने में लगा रहा , सपने को पूरा करने की सोच ने अनवरत प्रयास जारी रखने को प्रेरित किया और नई ऊर्जा के साथ मै इसे पूरा करने में लगा रहा । मै आभारी हूँ यू.पी.ए. अध्यक्ष श्रीमती सोनिया गाँधी जी ,प्रधान मंत्री डॉ. मनमोहन सिंह जी, रक्षा मंत्री ऐंटनी व तत्कालीन रेल मंत्री कु०  ममता बेनर्जी जी का जिन्होंने इस सपने को रेल बजट 2010 में पूरा  किया । भले ही  यू.पी.ए अध्यक्षा  श्रीमती सोनिया गाँधी जी  इस परियोजना के शिलान्यास करने गौचर में अस्वस्थता के कारण  9 नवम्बर 2011 को नहीं आ पायी परन्तु देेश के रक्षा मंत्री ऐटनी व रेल मंत्री  ने इस परियोजना का शुभारंभ करके देश व उत्तराखण्ड को एक अनमोल तोफहा दिया।  आशा है इस परियोजना को पूरा करने में सोनिया जी, प्रधानमंत्री मनमोहन, रेलमंत्री सहित उत्तराखण्ड सरकार व जनता का भरपूर सहयोग मिलेगा। इस परियोजना से हमारे प्रदेश के लिए जहां विकास के नये द्वार खुलेंगे वहीं देश की रक्षा के लिए मील का पत्थर साबित होगा। 
 अपनी खुशी को सतपाल महाराज भले ही छिपा न रहे हों परन्तु उनको अपने इस सपने को साकार करने में अपने विरोधियों के हाथों कदम कदम पर सहयोग के बजाय उपहास का पात्र भी बनना पड़ा। कुछ महिनों से सतपाल महाराज जिस प्रकार से निरंतर प्रदेश के दूरगामी हितों के लिए एक के बाद एक काम कर रहे है , उससे उन्होंने अपना कद न केवल उत्तराखण्ड में अपितु देश ही नहीं संयुक्त राष्ट्र में भी स्थापित कर दिया है। खासकर जिस प्रकार से उन्होंने राज्य गठन आंदोलन में सकारात्मक योगदान देने के बाद प्रदेश की स्थाई राजधानी गेरसैंण, गढ़वाली व कुमाउंनी भाषाओं को राष्ट्रीय भाषा के रूप में मान्यता देने का अभियान चलाने के बाद देश व प्रदेश के हितों के लिए महत्वपूर्ण समझी जाने वाली रेल परियोजना को साकार करने में निरंतर भागीरथ प्रयत्न किया उससे उनका कद देश के जनहितों के लिए समर्पित नेताओं के रूप में उभर गयी है। भले ही अपने विराट व्यक्तित्व व व्यस्तता के कारण आम जनता की उनसे कई शिकायतें रही हो पर उनके प्रदेश के हित में उनके समर्पित रहने व यहां की जनता व राजनेताओं को भी दिशा देने में उनका कोई जवाब ही नहीं। प्रदेश की जनता व प्रबुद्व जनो को चाहिए कि ऐसे व्यक्तित्व व नेता का सम्मान करे व उनके रचनात्मक कार्यो का दलगत व संकीर्ण मनोवृति के कारण विरोध न करके प्रदेश व देश को पतन के गर्त में न धकेले। प्रदेश में व्याप्त जातिवाद, क्षेत्रवाद व भ्रष्टाचार की अंधी राजनीति से उबारने के लिए आज जनता की आंखों में धूल झोंकने वाले दोहरे चरित्र के भ्रष्टाचारियों को संरक्षण देने वाले नेताओं के बजाय प्रदेश के दूरगामी हितों के लिए राजनीति करने वाले नेताओं को जनता को सहयोग व समर्थन देना होगा। आज प्रदेश में खंडूडी जी सहित तमाम नेताओं को सोचना होगा कि रेत के महलों की तरह बनायी गयी छदम छवि को वास्तविकता की आंधी पूरी तरह बेनकाब कर देती हे। प्रदेश में ग्यारह साल बाद भी न तो प्रदेश की स्थाई राजधानी गैरसैंण बन पायी व नहीं मुज्जफरनगर काण्ड के अभियुक्तों को दण्डित ही कर पाये। प्रदेश में सुशासन व जनहित के कार्य करने के बजाय चारों तरफ भ्रष्टाचार का तांडव मचा है। सुशासन के नाम पर जातिवाद व क्षेत्रवाद की आंधी छायी हुई है। प्रदेश के राजनेताओं से जनता निराश है। परन्तु इस अंधेरी रात में भी जनता के हित में जरा सा काम करने वाले सतपाल महाराज, प्रदीप टम्टा , भगतसिंह कोश्यारी व टीपीएस जैसे नेता है। इन सबको हिमाचल के प्रथम मुख्यमंत्री यशवंत सिंह परमार से प्रेरणा ले कर प्रदेश के मूल जनांकांक्षाओं व विकास की नींव स्थापित करनी चाहिए। प्रदेश को अब जागरूक हो कर तिवारी, निशंक व खंडूडी टाइप के नेताओं को ढोने के लिए तैयार नहीं रहना चाहिए। शेष श्री कृष्ण कृपा। हरि ओम तत्सत्। श्रीकृष्णाय् नमो। 

Monday, November 14, 2011

राष्ट्र नायक डा. कलाम का नहीं भारत का अपमान किया अमेरिका ने


राष्ट्र नायक डा. कलाम का नहीं भारत का अपमान किया अमेरिका ने 
अमेरिका से अधिक गुनाहगार है नपुंसक भारतीय हुक्मरान !

भले ही भारत के पूर्व राष्ट्रपति डा अब्दुल कलाम अमेरिका में सुरक्षा के नाम पर उनके किये गये अपमान को भूल जाने की बात कहें या अमेरिकी प्रशाासन अपनी धृष्ठता पर पर्दा डालने के लिए माफी मांगने का नाटक करे। पर इस घटना से पूरा राष्ट्र इस घटना से बेहद मर्माहित है। इस घटना के लिए भारत को तबाह करके बर्बाद करने के मंसूबों में लगे अमेरिका से अधिक कोई गुनाहगार हैं तो वह नपुंसक हुक्मरान।  हुक्मरान चाहे राजग के अटल बिहारी वाजपेयी रहे हों या वर्तमान सप्रंग सरकार के प्रधानमंत्री मनमोहनसिंह, दोनों के राज में भारतीय सम्मान को अमेरिका ने जब चाहा तब रौंदा परन्तु क्या मजाल इन अमेरिकी मोह में अंधे बने हुक्मरानों को कभी राष्ट्रीय आत्मसम्मान की रक्षा करने के अपने प्रथम दायित्व का निर्वहन करने तक का भान रहा।

हर घटना के बाद अमेरिकी सरकार महज गहरा खेद जता कर मामले को दफन कर देती है और भारतीय हुक्मरान चाहे सरकारें कांग्रेस की रही हो या भाजपा आदि दलों की किसी को इस मामले में अमेरिका से सीधे दो टूक ढ़ग से बात करने की हिम्मत तक नहीं हुईं। न तो देश में राष्ट्रवाद के स्वाभिमान की राजनीति का दंभ भरने वाले प्रधानमंत्री रहे अटल बिहारी वाजपेयी ने अपने सहयोगी मंत्री के साथ हुए अपमान को राष्ट्र का अपमान माना व नहीं वर्तमान कांग्रेसी प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने अपने कार्यकाल में पूर्व राष्ट्रपति डा. अब्दुल कलाम से दो बार हुई इस बदसलुकी के बाबजूद अमेरिका के शीर्ष नेतृत्व से सीधे दो टूक बात करने की नैतिक दायित्व का निर्वहन करने का साहस तक किया। इससे एक बात साफ हो गयी कि भारतीय हुकमरानों चाहे सरकार कांग्रेस नेतृत्व वाली सप्रंग की रही हो या भाजपा के नेतृत्व वाली राजग गठबंधन की रही हो यह सरकारें अधिकांश भारतीय राजनैतिक दलों का प्रतिनिधित्व करती है। पर क्या मजाल इन दलों में जरा सा भी देश के स्वाभिमान का भान तक रहा है। अगर इनमें राष्ट्रीय सम्मान का जरा सा भी ख्याल रहता तो ये अमेरिका के राष्ट्रपति से सीधे दो टूक बात करते। भारत में स्थिति अमेरिकी राजदूत को सीधे बुला कर उनको दो टूक विरोध प्रकट करते। परन्तु भारतीय अस्मिता को अपनी महाशक्ति की गुमान में रौंदने वाले अमेरिका की इस अक्षम्य अपराध को मूक बन कर सहने वाले भारतीय हुक्मरान चाहे संघ के स्वयं सेवक रहे अटल बिहारी वाजपेयी रहे हो या गांधी के नाम के सहारे देश में अपना कुशासन से आम लोगों का जीना दूश्वार करने वाले वर्तमान कांग्रेसी प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह रहे, किसी को भी इस सवा अरब जनसंख्या वाले विश्व के सबसे बड़े व प्राचीन संस्कृति के ध्वजवाहक भारत के स्वाभिमान का तनिक सा भी भान नहीं रहा। हकीकत तो यह हे कि सत्तालोलुपु ये हुक्मरान को अपनी कुर्सी के अलावा देश का भान रहा ही नहीं। देश की संसद को अमेरिका के संरक्षण में पाकिस्तानी गुर्गों ने कारगिल, संसद ही नहीं मुम्बई में आतंकी हमले करके देश के स्वाभिमान को खुले आम रौंदने का दुसाहस करते रहे, परन्तु क्या मजाल की भारतीय इन नपुंसक हुक्मरानो को अमेरिका व पाक से सीधे दो टूक जवाब देने की हिम्मत तक नहीं रही। इन नपुंसक पदलोलुपु नेताओं को भारत को आतंक के गर्त में धकेल रहे अमेरिका व पाक के नापाक गठजोड को अमेरिका की तर्ज में सीधा आतंकी ठिकानों को तबाह करने की हिम्मत तो रही दूर सीधे इन दोनों को पूरे संसार के सम्मुख कटघरे में खड़ा करने की जुबानी नैतिक हिम्मत तक नहीं रही। खासकर सीआईए व आईएसआई के डब्बल ऐजेण्ड हेडली व राणा के पकडेत्र जाने के बाद जिस प्रकार से अमेरिका व पाकिस्तान का भारत को तबाह करने का खतरनाक आतंकी गठजोड़ बेनकाब होने के बाबजूद भारतीय हुक्मरानों में शर्मनाक नपुंसकता बनी हुई है, उससे अपनी गौरवशाली संस्कृति व वीरता के लिए विश्व में परचम फेहराने वाले सवा अरब भारतीय जनमानस शर्मसार हुई।

 गौरतलब है कि 80 वर्षीय भारतीय पूर्व राष्ट्रपति कलाम की 19 सितम्बर को जेएफके हवाई अड्डे पर सुरक्षा अधिकारियों ने दो बार तलाशी ली थी। अधिकारियों ने कलाम के एयर इंडिया के विमान पर चढ़ने से पहले विस्फोटकों की तलाश में उनके जैकेट और जूते तक उतरवा लिये थे। बाद में जब भारत ने  विरोध दर्ज कराया तो इस घटना के लिए अमेरिकी अधिकारियों ने कलाम से माफी मांग ली। अप्रैल 2009 में भी अमेरिकी विमानन कंपनी कॉन्टीनेंटल एयरलाइंस के अधिकारियों ने न्यूयाॅर्क के हवाई अड्डे पर भी कलाम की तलाशी ली थी। वहीं दिसम्बर 2010 माह में अमेरिका के जेक्सन इवर्स हवाई अड्डे पर अमेरिका में भारत की तत्कालीन राजदूत मीरा शंकर की केवल इसी लिए तलाशी ली गयी कि उन्होंने भारतीय परिधान साड़ी पहन रखी थी।  दिसम्बर 2010 में ही संयुक्त राष्ट्र संघ में भारत के राजदूत हरदीप पुरी को सुरक्षा जांच के नाम पर अपनी पगड़ी उतारने के लिए विवश किया गया। यही नहीं राजग के शासन में अटल बिहारी वाजपेयी के प्रधानमंत्रीत्व में तत्कालीन रक्षामंत्री जार्ज फर्नाडिस के तो सुरक्षा जांच के नाम पर कपड़े तक उतरवा दिये गये।
क्योंकि अमेरिका बार बार ऐसा दुसाहस करके माफी मांगता है और फिर ऐसी पुनर्रावृति करके भारतीय सम्मान को रोंद देता है। अमेरिका व भारतीय हुक्मरानों को एक बात का ध्यान रखना चाहिए कि डा कलाम न केवल भारत के पूर्व राष्ट्रपति हैं अपितु वे भारत के सबसे सम्मानित राष्ट्र नायक भी है। उनको भारत की जनता अपने प्राणों से अधिक सम्मान करती है। कोई यह कहे कि अमेरिकियों को इसका भान न होगा। यह सरासर झूट है । अमेरिकी प्रशासन को जब भारत के एक सूबे के मुख्यमंत्री मायावती की सेंडल के लिए मुम्बई जहाज भेजने तक की गुप्त घटनाओं की जानकारी तक होती तो उन्हें यह जानकारीनहीं है कि भारतीय डा अब्दुल कलाम को देश के किसी भी वर्तमान या भूत हुक्मरानों से अधिक सम्मान करती है।  अमेरिका द्वारा यह महज भूल बता कर अपनी गुस्ताखी पर पर्दा डालने का हथकण्डा ही समझा जायेगा । अमेरिका का यह एक प्रकार का सबसे बड़ा झूट है। हकीकत तो यह हे यह भारतीय राष्ट्रीय नायक का अपमान जानबुझ कर करके भारतीय के सम्मान को रोंदने की अमेरिकी धृर्णित मनोवृति है। इसलिए यह घटना केवल डा कलाम की व्यक्तिगत घटना न हो कर राष्ट्र के अपमान की है। डा कलाम महामानव है वे अपना बडपन दिखाते हुए इस घटना को भूल जाने की बात कहें परन्तु यह सवाल राष्ट्र के सम्मान को रौदने का है। इसको बार बार भारतीय हुक्मरानों द्वारा हलके में लिये जाने के कारण अमेरिका ही नहीं पाक व बंगलादेश जेसे देशों की हिम्मत बड़ गयी हैं । राजग के कार्यकाल में जब बंग्लादेश ने भारतीय सीमा सुरक्षा बल के कई जवानों को जानवरों से अधिक घृर्णित व्यवहार करके मार कर सोंपा तो उस समय के भारतीय प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने तो उफ तक नहीं की। मनमोहन हो या अटल बिहारी वाजपेयी दोनों अमेरिकी मोह में व पदलोलुपता के कारण इतने अंध हो गये की उनको न तो देश दिखाई दिया व नहीं अपने पद का दायित्व। उनको तो एक मात्र अपनी कुर्सी व अमेरिका का नोबल पुरस्कार या पुचकार ही अपने कार्यकाल में दिखाई देती रही। इतिहास ऐसे पदलोलुपुओं को कभी माफ नहीं करेगा। आज इस शर्मनाक स्थिति में देश को जरूरत हे इंदिरा गांधी जेसी हुक्मरानों की। जो अमेरिका सहित विश्व की किसी भी ताकत को भारत की शान पर अंगुली उठाने का मुंहतोड़ जवाब देने की हिम्मत ही नहीं अपितु सही समय पर करारा जवाब भी देती थी। काश भारतीय हुक्मरानों को देश के स्वाभिमान का भान तक रहता। शेष श्रीकृष्ण कृपा।
हरि ओम तत्सत्। श्रीकृष्णाय् नमो।

राष्ट्र नायक डा. कलाम का नहीं भारत का अपमान किया अमेरिका ने



राष्ट्र नायक डा. कलाम का नहीं भारत का अपमान किया अमेरिका ने 
अमेरिका से अधिक गुनाहगार है नपुंसक भारतीय हुक्मरान !

भले ही भारत के पूर्व राष्ट्रपति डा अब्दुल कलाम अमेरिका में सुरक्षा के नाम पर उनके किये गये अपमान को भूल जाने की बात कहें या अमेरिकी प्रशाासन अपनी धृष्ठता पर पर्दा डालने के लिए माफी मांगने का नाटक करे। पर इस घटना से पूरा राष्ट्र इस घटना से बेहद मर्माहित है। इस घटना के लिए भारत को तबाह करके बर्बाद करने के मंसूबों में लगे अमेरिका से अधिक कोई गुनाहगार हैं तो वह नपुंसक हुक्मरान।  हुक्मरान चाहे राजग के अटल बिहारी वाजपेयी रहे हों या वर्तमान सप्रंग सरकार के प्रधानमंत्री मनमोहनसिंह, दोनों के राज में भारतीय सम्मान को अमेरिका ने जब चाहा तब रौंदा परन्तु क्या मजाल इन अमेरिकी मोह में अंधे बने हुक्मरानों को कभी राष्ट्रीय आत्मसम्मान की रक्षा करने के अपने प्रथम दायित्व का निर्वहन करने तक का भान रहा।

हर घटना के बाद अमेरिकी सरकार महज गहरा खेद जता कर मामले को दफन कर देती है और भारतीय हुक्मरान चाहे सरकारें कांग्रेस की रही हो या भाजपा आदि दलों की किसी को इस मामले में अमेरिका से सीधे दो टूक ढ़ग से बात करने की हिम्मत तक नहीं हुईं। न तो देश में राष्ट्रवाद के स्वाभिमान की राजनीति का दंभ भरने वाले प्रधानमंत्री रहे अटल बिहारी वाजपेयी ने अपने सहयोगी मंत्री के साथ हुए अपमान को राष्ट्र का अपमान माना व नहीं वर्तमान कांग्रेसी प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने अपने कार्यकाल में पूर्व राष्ट्रपति डा. अब्दुल कलाम से दो बार हुई इस बदसलुकी के बाबजूद अमेरिका के शीर्ष नेतृत्व से सीधे दो टूक बात करने की नैतिक दायित्व का निर्वहन करने का साहस तक किया। इससे एक बात साफ हो गयी कि भारतीय हुकमरानों चाहे सरकार कांग्रेस नेतृत्व वाली सप्रंग की रही हो या भाजपा के नेतृत्व वाली राजग गठबंधन की रही हो यह सरकारें अधिकांश भारतीय राजनैतिक दलों का प्रतिनिधित्व करती है। पर क्या मजाल इन दलों में जरा सा भी देश के स्वाभिमान का भान तक रहा है। अगर इनमें राष्ट्रीय सम्मान का जरा सा भी ख्याल रहता तो ये अमेरिका के राष्ट्रपति से सीधे दो टूक बात करते। भारत में स्थिति अमेरिकी राजदूत को सीधे बुला कर उनको दो टूक विरोध प्रकट करते। परन्तु भारतीय अस्मिता को अपनी महाशक्ति की गुमान में रौंदने वाले अमेरिका की इस अक्षम्य अपराध को मूक बन कर सहने वाले भारतीय हुक्मरान चाहे संघ के स्वयं सेवक रहे अटल बिहारी वाजपेयी रहे हो या गांधी के नाम के सहारे देश में अपना कुशासन से आम लोगों का जीना दूश्वार करने वाले वर्तमान कांग्रेसी प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह रहे, किसी को भी इस सवा अरब जनसंख्या वाले विश्व के सबसे बड़े व प्राचीन संस्कृति के ध्वजवाहक भारत के स्वाभिमान का तनिक सा भी भान नहीं रहा। हकीकत तो यह हे कि सत्तालोलुपु ये हुक्मरान को अपनी कुर्सी के अलावा देश का भान रहा ही नहीं। देश की संसद को अमेरिका के संरक्षण में पाकिस्तानी गुर्गों ने कारगिल, संसद ही नहीं मुम्बई में आतंकी हमले करके देश के स्वाभिमान को खुले आम रौंदने का दुसाहस करते रहे, परन्तु क्या मजाल की भारतीय इन नपुंसक हुक्मरानो को अमेरिका व पाक से सीधे दो टूक जवाब देने की हिम्मत तक नहीं रही। इन नपुंसक पदलोलुपु नेताओं को भारत को आतंक के गर्त में धकेल रहे अमेरिका व पाक के नापाक गठजोड को अमेरिका की तर्ज में सीधा आतंकी ठिकानों को तबाह करने की हिम्मत तो रही दूर सीधे इन दोनों को पूरे संसार के सम्मुख कटघरे में खड़ा करने की जुबानी नैतिक हिम्मत तक नहीं रही। खासकर सीआईए व आईएसआई के डब्बल ऐजेण्ड हेडली व राणा के पकडेत्र जाने के बाद जिस प्रकार से अमेरिका व पाकिस्तान का भारत को तबाह करने का खतरनाक आतंकी गठजोड़ बेनकाब होने के बाबजूद भारतीय हुक्मरानों में शर्मनाक नपुंसकता बनी हुई है, उससे अपनी गौरवशाली संस्कृति व वीरता के लिए विश्व में परचम फेहराने वाले सवा अरब भारतीय जनमानस शर्मसार हुई।

 गौरतलब है कि 80 वर्षीय भारतीय पूर्व राष्ट्रपति कलाम की 19 सितम्बर को जेएफके हवाई अड्डे पर सुरक्षा अधिकारियों ने दो बार तलाशी ली थी। अधिकारियों ने कलाम के एयर इंडिया के विमान पर चढ़ने से पहले विस्फोटकों की तलाश में उनके जैकेट और जूते तक उतरवा लिये थे। बाद में जब भारत ने  विरोध दर्ज कराया तो इस घटना के लिए अमेरिकी अधिकारियों ने कलाम से माफी मांग ली। अप्रैल 2009 में भी अमेरिकी विमानन कंपनी कॉन्टीनेंटल एयरलाइंस के अधिकारियों ने न्यूयाॅर्क के हवाई अड्डे पर भी कलाम की तलाशी ली थी। वहीं दिसम्बर 2010 माह में अमेरिका के जेक्सन इवर्स हवाई अड्डे पर अमेरिका में भारत की तत्कालीन राजदूत मीरा शंकर की केवल इसी लिए तलाशी ली गयी कि उन्होंने भारतीय परिधान साड़ी पहन रखी थी।  दिसम्बर 2010 में ही संयुक्त राष्ट्र संघ में भारत के राजदूत हरदीप पुरी को सुरक्षा जांच के नाम पर अपनी पगड़ी उतारने के लिए विवश किया गया। यही नहीं राजग के शासन में अटल बिहारी वाजपेयी के प्रधानमंत्रीत्व में तत्कालीन रक्षामंत्री जार्ज फर्नाडिस के तो सुरक्षा जांच के नाम पर कपड़े तक उतरवा दिये गये।
क्योंकि अमेरिका बार बार ऐसा दुसाहस करके माफी मांगता है और फिर ऐसी पुनर्रावृति करके भारतीय सम्मान को रोंद देता है। अमेरिका व भारतीय हुक्मरानों को एक बात का ध्यान रखना चाहिए कि डा कलाम न केवल भारत के पूर्व राष्ट्रपति हैं अपितु वे भारत के सबसे सम्मानित राष्ट्र नायक भी है। उनको भारत की जनता अपने प्राणों से अधिक सम्मान करती है। कोई यह कहे कि अमेरिकियों को इसका भान न होगा। यह सरासर झूट है । अमेरिकी प्रशासन को जब भारत के एक सूबे के मुख्यमंत्री मायावती की सेंडल के लिए मुम्बई जहाज भेजने तक की गुप्त घटनाओं की जानकारी तक होती तो उन्हें यह जानकारीनहीं है कि भारतीय डा अब्दुल कलाम को देश के किसी भी वर्तमान या भूत हुक्मरानों से अधिक सम्मान करती है।  अमेरिका द्वारा यह महज भूल बता कर अपनी गुस्ताखी पर पर्दा डालने का हथकण्डा ही समझा जायेगा । अमेरिका का यह एक प्रकार का सबसे बड़ा झूट है। हकीकत तो यह हे यह भारतीय राष्ट्रीय नायक का अपमान जानबुझ कर करके भारतीय के सम्मान को रोंदने की अमेरिकी धृर्णित मनोवृति है। इसलिए यह घटना केवल डा कलाम की व्यक्तिगत घटना न हो कर राष्ट्र के अपमान की है। डा कलाम महामानव है वे अपना बडपन दिखाते हुए इस घटना को भूल जाने की बात कहें परन्तु यह सवाल राष्ट्र के सम्मान को रौदने का है। इसको बार बार भारतीय हुक्मरानों द्वारा हलके में लिये जाने के कारण अमेरिका ही नहीं पाक व बंगलादेश जेसे देशों की हिम्मत बड़ गयी हैं । राजग के कार्यकाल में जब बंग्लादेश ने भारतीय सीमा सुरक्षा बल के कई जवानों को जानवरों से अधिक घृर्णित व्यवहार करके मार कर सोंपा तो उस समय के भारतीय प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने तो उफ तक नहीं की। मनमोहन हो या अटल बिहारी वाजपेयी दोनों अमेरिकी मोह में व पदलोलुपता के कारण इतने अंध हो गये की उनको न तो देश दिखाई दिया व नहीं अपने पद का दायित्व। उनको तो एक मात्र अपनी कुर्सी व अमेरिका का नोबल पुरस्कार या पुचकार ही अपने कार्यकाल में दिखाई देती रही। इतिहास ऐसे पदलोलुपुओं को कभी माफ नहीं करेगा। आज इस शर्मनाक स्थिति में देश को जरूरत हे इंदिरा गांधी जेसी हुक्मरानों की। जो अमेरिका सहित विश्व की किसी भी ताकत को भारत की शान पर अंगुली उठाने का मुंहतोड़ जवाब देने की हिम्मत ही नहीं अपितु सही समय पर करारा जवाब भी देती थी। काश भारतीय हुक्मरानों को देश के स्वाभिमान का भान तक रहता। शेष श्रीकृष्ण कृपा।
हरि ओम तत्सत्। श्रीकृष्णाय् नमो।


Sunday, November 13, 2011

भारतीय भाषाओं के पुरोधा स्व. राजकरण सिंह के नाम पर विद्यालय, रोड़ व पुस्तकालय:


भारतीय भाषाओं के पुरोधा स्व. राजकरण सिंह के नाम पर  विद्यालय, रोड़ व पुस्तकालय
दिवंगत राजकरण सिंह की तेरहवी पर उनके गांव में पंहुचेे भाषा आंदोलनकारी/
भारतीय भाषाओ के पुरोधा व भारतीय संस्कृति के ध्वज वाहक स्व. राजकरण सिंह की अद्वितीय राष्ट्र सेवा का सम्मान करते हुए उत्तर प्रदेश की बसपा सरकार उनके नाम पर उनके गृह जनपद बाराबंकी में एक विद्यालय व मोटर मार्ग का नामांकरण करेगी तथा जनजागरूकता के प्रति उनकी भावना को नमन् करने के लिए एक पुस्तकालय की स्थापना करेगी। यह घोषणा 12 नवम्बर 2011 को राजकरण सिंह की तेरहवीं में उनके गांव कोटवांकला(विष्णुपुरा-बाराबंकी) उ.प्र में बसपा सरकार में दर्जाधारी राज्यमंत्री   व भाषा आंदोलन के प्रखर आंदोलनकारी रहे यशवंत निकोसे ने शोकाकुल परिजन व मित्रों की उपस्थिति में अपनी श्रद्वांजलि अर्पित करते हुए कही। 10 फरवरी 1954 को ठाकुर रघुराज सिंह व श्रीमती राम अधारी सिंह के जेष्ठ पुत्र के रूप में जन्म दिवंगत राजकरण सिंह की तेरहवीं में उनकी पावन जन्म भूमि की माटी को सादर नमन् करने के लिए भारतीय भाषा आंदोलन के उनके साथी पुरोधा पुष्पेन्द्र चैहान, विनोद गोतम, ओम प्रकाश हाथपसारिया व देवसिंह रावत दिल्ली के विशेष रूप से पंहुचे थे। भारतीय भाषाओं के सम्मान के लिए समर्पित पुरोधा दिवंगत राजकरण सिंह के शोकाकुल चारों भाई जयकरण सिंह, रामसिंह, जयसिंह व नरसिंह से मिल कर उनको ढाढ़स बंधाई। इनके अलावा दिवंगत राजकरण सिंह की विवाहित बहिने  बड़ी बहन श्रीमती कृष्ण कांति सिंह तथा छोटी बहिने श्रीमती मुन्नी सिह व श्रीमती पुष्पा सिंह भी अपने बडे भाई के आकास्मिक निधन से गमगीन थी। वहां पर पंहुच कर भाषा आंदोलनकारियों ने राजकरण सिंह के सबसे छोटे भाई नरसिंह व उनके परिजनों को ढांढस बधाया,। गौरतलब हे कि राजकरण सिंह अपनी माता जी के स्वर्गवास के बाद भी अपने छोटे भाई नरसिंह के साथ ही जब भी गांव में आते थे रहते थे। गांव में पंहुच कर अपने साथी स्व. राजकरण सिंह को श्रद्वाजलि अर्पित करने के लिए भाषा आंदोलनकारी, उनके आम के बाग में लगाई गयी चिता पर उनके पूर्व प्रधान भाई रामसिंह के साथ गये। वहां पर उनके छोटे अनुज रामसिंह ने बताया कि स्व. राजकरण सिंह की चिता उनकी माता पिता की चिताओं पर बनी समाधी के साथ ही लगाई गयी।
गौरतलब है कि दिवंगत राजकरण सिंह का निधन 30 अक्टूबर 2011 को अपने गांव में ही हुआ। लोहिया के बाद भारतीय भाषाओं के लिए संघ लोकसेवा आयोग की परीक्षाओं में भारतीय भाषाओं को सम्मलित करने व अंग्रेजी भाषा के बंधन से मुक्ति के लिए ऐतिहासिक आंदोलन चलाने वाले ‘भारतीय भाषा संरक्षण संगठन के प्रमुख आंदोलनकारी नेता रहे। इस आंदोलन में पूर्व राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह, पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी व विश्व नाथ प्रतापसिंह, व पूर्व उप प्रधानमंत्री चैधरी देवीलाल व लालकृष्ण आडवाणी चतुरानन्दमिश्र, मुलायमसिंह यादव, शरद यादवं, रामविलास पासवान, सोमपाल शास्त्री, राजनाथसिंह सहित चार दर्जन से अधिक सांसदों ने कई समय यहां के आंदोलन में ंसडक में भाग लिया था।  इस आंदोलन में राजेन्द्र प्रसाद माथुर,  प्रभात जोशी, विद्यानिवास मिश्र, विष्ण ुनागर , मधुसुदन आनन्द, ंराजकिशोर, ंअच्युतानन्द मिश्र, राम बहादूर राय, संजय अभिज्ञान, डा गोविन्द सिंह, विनोद  अग्निहोत्री, ओमप्रकाश तपस व हबीब अख्तर सहित देश  के  अग्रणी  ंराष्ट्रीय समाचार पत्रों के वरिष्ठ  सम्पादकों, पत्रकारों, साहित्यकारो , समाजसेवियों, गांधीवादियों ने ंयूपीएससी के आगे सडक पर  लगे  धरने में भाग लेकर देश की सरकार व ंजनमानस को झकझोर कर रख दिया था। भाषा आंदोलन के प्रमुख सहयोगियों में  पुष्पेन्द्र चैहान, डा. श्यामरूद्र पाठक, डा.मुनिश्वर,  यशवंत निकोसे,ंविनोद गौतम, ओम प्रकाश हाथपसारिया, ंहरीश मेहरा,  अजय मलिक, राजेेन्द्र कुमार राजस्थानी, सतवीर ं,चै के पी सिंह, आनन्द स्वरूप गोयल, मास्टर जी,  रविन्द्र सिंह धामी, ंविजय गुप्त, देवसिंह रावत सहित सेकड़ों ंप्रमुख थे। उनके व उनके साथियों के ंइस प्रखर आंदोलन से संघ लोकसेवा आयोग की व अन्य कई सरकारी सेवाओं की  परीक्षा भारतीय भाषा के माध्यम से प्रारम्भ हुई।  उनके निधन की ंसूचना मिलते ही दिल्ली में उनके सहयोगियों व मित्रों में शोक की लहर छा गयी। उनके निधन पर संसदीय ंराजभाषा समिति के सदस्य सांसद प्रदीप टम्टा,  भारतीय विदेश सेवा के सेवानिवृत उच्चाधिकारी महेश चन्द्रा, यूएनआई  केे पूर्व समाचार सम्पादक बनारसी सिंह,  भाषा आंदोलन के साथी ंपुष्पेन्द्रंसिंह चैहान, सम्पादक देवसिंह रावत, पत्रकार रविन्द्रं सिंह धामी, ंओमप्रकाश हाथपसारिया,  विनोद गोतम, चैधरी केपीसिंह, पत्रकार हबीब अख्त्तर, आर्य समाज सीताराम बाजार के समस्त पदाधिकारी,  जगदीश भट्ट, अनिल पंत, सुनीता चोधरी, कर्मचारी नेता हरिराम तिवारी व कांग्रेसी नेता ंसोवन सिंह रावत व ताराचंद गौतम,  ंचाटर्ड एकाउन्टेड श्री चैहान, समाजसेवी राठोर, सहित अनैक गणमान्य लोगों ने गहरा शोक प्रकट  करते हुए अपनी भावभीनी श्रद्वांजलि दी।  भारतीय भाषाओं को उनका सम्मान दिलाने के लिए वह अंतिम सांसों तक निरंतर संघर्षरत रहे, वे  भारतीय  भाषाओं व भारतीयता के इस समर्पित पुरोधा ने भारतमाता की सेवा के लिए विवाह तक ंनही किया था। ंउनकी राष्ट्रवादी विचारोें व भारतीय भाषाओं के प्रति अनन्य सेवा साधना को देखते हुए ंआर्य सम्माज उनका हृदय से सम्मान करता रहा और ंआर्य समाज के आग्रह पर  ही वे कई  वर्षो से दिल्ली के चावडी बाजार स्थित सीताराम बाजार के आर्य समाज मंदिर में निवास कर रहे थे। वे दीपावली के त्यौहार में सम्मलित होने के लिए चंद दिन पहले ही  अपने पैतृक बाराबंकी गये। वे भ्रष्टाचार के विरूद्व आंदोलन में ंएक मूक समर्पित सिपाई रहे। यही नहीं प्यारा  उत्तराखण्ड के सम्पादक देव सिंह रावत के अनन्य मित्र होने के कारण वे उत्तराखण्ड राज्य ंगठन जनांदोलन से लेकर 2 अक्टूबर 2 011 तक मनाये जाने गये काला दिवस पर सहित तमाम सामाजिक आंदोलनों में भी सक्रिय भागेदारी निभाते रहे।

Thursday, November 10, 2011

अंध विश्वास में न पडें-----काल्पनिक है सब सन्, महिने व दिन वार -11.11 .11,


अंध विश्वास में न पडें-----काल्पनिक है सब सन्, महिने  व दिन वार -11.11 .11, 
आज लोग बंहुत ही अदभूत  संयोग व उत्साहित है 11.11.11 के संयोग को देख कर। नंवम्बर माह की  ग्यारह तारीक व सन 2011 ंको 11.11.11 के रूप में अपने आप में उत्साहित है। कई  तथाकथित भविष्य को बताने वाले लूटेरों ने इस दिन की  आड में अंध विश्वास में फंसे लोगों को इस दिन के नाम पर ंजम कर लूट रहे हैै। परन्तु अधिकांश लोग इस बात से अनविज्ञ हैं कि ये संब झूट है। केवल माना गया है। वास्तव में न तो आज सन 2011  ही चल रंहां है व नहीं नवम्बर नाम का महिना  व नहीं आज की  तारीक ही 11 है। यह सब कुछ लोगों द्वारा  अपनी सुविधा के लिए या अपनी व्यवस्था  को संचालित करने के लिए इन सबको मान कर अपना जीवन चक्र को संचालित कर रहे हैं। पर हकीकत में ये दिन, महिना व सन हम मान रहे हैं वे काल्पनिक हैं। हम सब कल्पना लोक  में आश्रय लेकर अपने इस जीवन को संचालित कर रहे है। न तो ये महिने सन व दिन वास्तविक  है। वास्तविक क्या है? यह  सृष्टि कब से चली यह सृजनकार ही जान सकता है। जो ये सन् 2011 है ये तो ईसायत के लिए समर्पित ंसमय चक्र है। हमारे ंयहां विक्रम व शक सम्वत् का व ंयुगादि तथा सृष्टि सम्वत का भी प्रचलन था। परन्तु अब ईसायत को समर्पित  सन् का प्रचलन का सम्राज्य है। उसी  के दिन महिने का  नाम से संसार मान व जान रहा हैं परन्तु आज हमारे इतिहासकार व जानकार जानते हैं कि इस ईसा को समर्पित सम्वत 2011 से पहले भी संसार व समाज, देश ंसंचालित रहा। संसार में ईसायत को मानने वालों के बाद संसार संसार में सबसे अधिक जनसंख्या व देशों की जमात में अपने वजूद को स्थापित करने वाले मुस्लिम समाज का हिजरी सन भी प्रचलित है। संसार  का सबसे प्राचीन हिन्दू  धर्म का विक्रमी व शक सम्वत् भी विद्यमान है। परन्तु ब्रिट्रेन के बाद अमेरिका व ईसायत देशों के बर्चस्व के कारण आज पूरे विश्व में ईसायत का सम्वत् 2011 के रूप में आज हम सब अंगीकार कर रहे है। संसार का वास्तविक समय इस समय क्या हैं, ंयह तो केवल वही परम्ब्रह्म परमेश्वर ही जान सकते है जिन्होने इस पृथ्वी  सहित इस सृष्टि की रचना की। विज्ञान तो अभी उस काल गणना से कोसोें दूर है। ज्योतिषि भी  अंधेरे में तीर मार रहे है। हमारे संसार में पहले राजा महाराजा अपने नाम से संम्वतसर चलाते थे । अभी  मनुष्य, ज्ञान विज्ञान, मनुष्य की संरचना के रहस्य को नहीं जान पाया  तो इस पृथ्वी, अंतरिक्ष, सागर सहित सकल सृष्टि के बारे में जानना  बहुत दूर की कोड़ी का खेल है। एक ही बात यहां बताना चाहता हॅू कि लोग  11 .11.11 आदि किसी के चक्कर में न पड़ेे। हर पल विलक्षण व प्रभु की अपार कृपा से मिला है। संसार की  पूरी दौलत से भी  हम इस  एक  पल को हासिल नहीं कर सकते हैं। इसलिए अंध विश्वास में न पडें। ंभगवान श्री कृष्ण  का यही अपार संदेश है ।

करोडों दिलों में अमर रहेंगे महान गायक भूपेन हजारिका


करोडों दिलों में अमर रहेंगे महान गायक भूपेन हजारिका 
मुंबई।(प्याउ )ंभारतीय गीत संगीत को उस समय एक और गहरा झटका लगा जब दिल हूम हूम करे नामक गीत के महान गायक भूपेन हजारिका का स्वर्गवास इस सप्ताह हो गया। अभी हाल में महान गजल गायक जगजीत सिंह के देहान्त से  भारतीय संगीत प्रेमी अ भी उबर भी नहीं पाये थे कि यकायक लाखों दिलों में बसे स्वर सम्राट भूपेन हजारिका का निधन ने भारतीय संगीत की दुनिया  पर एक प्रकार से बज्रपात सा ही हुआ।  उनके निधन पर देष के राश्ट्रपति, प्रधानमंत्री सहित हर संगीत प्रेमियों , तमाम ंसंगीत दिग्गजों के साथ साथ उत्तराखण्ड के भूपेन हजारिका नरेन्द्रसिंह नेगी, ंचन्द्रसिंह राही, हीरासिंह राणा सहित अनैक चोटी के गायकों ने गहरा षोक प्रकट किया।
उनको श्रद्वांजलि देते हुए संगीत के दिग्गजों ने एक स्वर में मानों यह कहा हो कि ंजिन लोगों ने पानी में कंकड़ उछालते हाथों को देखा है, उन्हें शायद ही इस बात का यकीन आए कि कंकड़ों को पानी में तैराया भी जा सकता है। गीत- संगीत की दुनिया में इस जटिल खेल के उस्ताद थे भूपेन हजारिका, उनकी आवाज में ब्रतापुत्र जैसा वेग और संगीत में हिलोरें मारता असम का लोक जीवन। लेकिन इन सबसे ऊपर थे उनके सरोकार जिन्होंने उन्हें अलग और व्यापक पहचान दिलाई। लोक से लोग तक। ‘लोहित’के इस लाडले का पूरा संगीत संसार मुरीद था। भूपेन हजारिका ने मुंबई के कोकिलाबेन धीरूभाई अंबानी अस्पताल में उन्होंने शाम लगभग साढ़े चार बजे अंतिम सांस ली।
1926 में सादिया मंेें जन्में कवि, संगीतकार, गायक, अभिनेता, पत्रकार, लेखक, निर्माता और स्वघोषित यायावर हजारिका ने असम की समृद्ध लोक संस्कृति को अपनी विलक्षण आवाज से दिल हूम हूम करे और ओ गंगा बहती हो में गीतों के माध्यम से पूरी दुनिया में पहुंचाया। उनके निधन के साथ ही देश ने संस्कृति के क्षेत्र की एक ऐसी शख्सियत खो दी है, जो ढाका से लेकर गुवाहाटी तक में एक समान लोकप्रिय थी। असम के लोकसंगीत की गंगा को अपने स्वरों से  हिंदी फिल्मों में  अपनी जादुई असर पैदा करने वाली आवाज से ब्रह्मपुत्र के कवि भूपेन हजारिका ने देष विदेष में अपने लाखों प्रशंसक बना लिये।
दादा साहब फाल्के पुरस्कार से सम्मानित श्री हजारिका ने प्राथमिक शिक्षा गुवाहाटी से, बीए बनारस हिंदू विश्वविद्यालय से और पीएचडी जनसंचार कोलंबिया विश्वविद्यालय से की। उन्हें शिकागो विश्वविद्यालय से फैलोशिप भी मिली। उनके गीत व संगीत में आदिवासी संगीत के पुट ंके साथ असमिया संगीत का गहरी छाप साफ देखने को मिलती वे भी खुल कर अपनी सफलता का श्रेय इसी प्रादेषिक संगीत को देते थे। ं उन्होंने कई बार इसका खुल कर उल्लेख भी किया वे कहते थे कि मैं लोकसंगीत सुनते हुए ही बड़ा हुआ और इसी के जादू के चलते मेरा गायन के प्रति रुझान पैदा हुआ। मुझे गायन कला मेरी मां से मिली है, जो मेरे लिए लोरियां गातीं थीं। मैंने अपनी मां की एक लोरी का इस्तेमाल फिल्म रुदाली में भी किया है। अपना पहला गाना विश्व निजॉय नोजवान 1939 में 12 साल की उम्र में गाया। असमी भाषा के अलावा हजारिका ने 1930 से 1990 के बीच कई बंगाली और हिंदी फिल्मों के लिए गीतकार, संगीतकार और गायक के तौर पर काम किया। उनकी लोकप्रिय हिंदी फिल्मों में लंबे समय की उनकी साथी कल्पना लाजमी के साथ की रुदाली, एक पल, दरमियां, दमन और क्यों शामिल हैं। हजारिका ने अपना अंतिम गीत फिल्म ‘गांधी टू हिटलर’के लिए गाया। इसमें उन्होंने महात्मा गांधी के पसंदीदा भजन ‘वैष्णव जन’ के लिए अपनी आवाज दी।
हजारिका को चमेली मेमसाब के संगीतकार के तौर पर 1976 में सर्वश्रेष्ठ संगीतकार का पुरस्कार दिया गया। इसके अलावा उन्हें अपनी फिल्मों शकुंतला, प्रतिध्वनि, और लोटीघोटी के लिए राष्ट्रपति पुरस्कार भी दिया गया। साल 1967 से 1972 के बीच असम विधानसभा के सदस्य रहे हजारिका को 1977 में पद्मश्री से नवाजा गया। भले ही भूपेन हजारिका आज सदेह हमारे बीच न रहे हों पर वे गजलों के सम्राट की गजलों की तरह ही दिल हूम हूम करे के स्वरों से लाखों संगीत प्रेमियों के जेहन में सदा अमर हो कर बने रहेंगे।

लोकपाल के संधान से मनमोहन सरकार ही नहीं अपितु टीम अण्णा भी हुई मर्माहित/


लोकपाल को ठगपाल बनाने में तुले हुए हैं भ्रष्टाचारी /
-लोकपाल के संधान से मनमोहन सरकार ही नहीं अपितु टीम अण्णा भी  हुई मर्माहित/
2011 में एक षब्द लोकपाल ने देष के जनमानस को पूरी तरह उद्देल्लित करके रखा हे। न केवल जन मानस को अपितु देष की पूरी  व्यवस्था को इस षब्द ने एक प्रकार से अपने आगोष में लिया  हे। इसी षब्द का मुकुट पहन कर राणेसिद्वी में रहने वाले समाजसेवी अण्णा हजारे पूरे विष्व के मानसपटल पर अण्णा नहीं आंधी है यह आज का गांधी  है के गगनभेदी नारों से महानायक की तरह स्थापित हो गया। संसार के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देष भारत की मनमोहनी सरकार ही नहीं  पूरी व्यवस्था को झकझोर कर रख दिया है। इस  षब्द के फांस के दंष से मनमोहन सिंह व उनकी सरकार बाहर निकलने के लिए जो भी हर संभव कोषिष कर रही है उससे ंअधिक वह इस में और अधिक उलझ कर फंस जाती है। कई लोकपाल नामक षब्द की उत्पति कब हुई पर इतना निष्चित है कि यह लोकपाल षब्द का अस्तित्व गणतंत्र के बाद में ही ंआया होगा। जहां  गणतंत्र यानी लोकतंत्र हो। भले ही आजादी को आधुनिक भारतीय इसे फिरंगियों से मिली आजादी के बाद के षाषन को लोकतंत्र या गणतंत्र समझ रहे हों परन्तु ंइतिहास के विद्यार्थी भली भांति समझते हैं कि भारत में प्राचीन  समय में गणतंत्र विद्यमान था। भारतीय संस्कृति के प्राचीन मंत्रों में भी गण ंनन्ता गण पतिं.....गंग हवा महे...जैसे मंत्र स्तुतियां है। वेसे भी लोकपाल नामक षब्द द्वारपाल के प्रति भी कई जगह किया जाता रहा। यही नहीं लोकपाल को  भगवान के स्वरूप को भी कहा जाता रहा। जो ंसारे लोकों का पालन करे उसे लोकपाल कहा जाता है। भगवान राम के छोटे भाई भगवान लक्ष्मण को भी लोकपाल के नाम से जाना जाता रहा। वेसे लोकपाल यानी लक्ष्मण को ंषेशनाग का अवतार भी माना जाता है। आज फिरंगियों से मिली देष की आजादी के बाद  स्थापित तंत्र को भारत में लोकंतंत्र के नाम से जाना जाता है। उसी तंत्र को पूरी तरह झकझोरने वाले लोकपाल षब्द को सबसे पहले संसद में प्रयोग एक सदस्य, लक्ष्मी मल सिंघवी ने 1963 में दिया गया था। शिकायत निवारण तंत्र के बारे में संसद में एक बहस के दौरान उन्होंने यह प्रस्तावना दिया था ।  अब 2011 में जब यह षब्द अण्णा हजारे के कंधे में सवार हो कर ेदेष में व्याप्त भ्रश्टाचार के मुक्तिदाता के नाम से छा गया तो देष की सत्ता में आसीन कांग्रेसी नेतृत्ववाली मनमोहनी सरकार को उबारने के लिए इस लोकपाल षब्द के  संसद में प्रथम प्रयोगकत्र्ता  लक्ष्मी मल सिंघवी के पुत्र डॉ. अभिषेक मनु सिंघवी जो कांग्रेसी नेता होने के साथ साथ वर्तमान में संसदीय स्थायी समिति  की  अध्यक्षता  में यह बिल ंप्रदेष में कानून बना  कर लागू करने के लिए  संसद की बाट जोह रहा है।  संसद में  देष  में व्याप्त भ्रश्टाचार पर अंकुष लगाने हेतु यह   लोकपाल बिल पहली बार 1968 में शांति भूषण द्वारा संसद में पेश किया गया था। इसके बाद 1969 में 4 लोकसभा पारित कर दिया,   लेकिन पहले यह राज्य सभा द्वारा पारित किया जाये उससे पहले लोक सभा भंग किया गया और बिल व्यपगत हुआ। बाद में इस बिल को पुनरावर्तित करके पुनः 1971 , 1977, 1985, 1989, 1996, 1998, 2001, 2005 और 2008 में पेश किये गए , लेकिन उनमें से कोई भी पारित कर दिया।  अब इस बिल को देष की संसद द्वारा किसी ंभी हाल में पारित करने के लिए अण्णा हजारे के नेतृत्व में जंतर मंतर ंसे रामलीला मैदान में  हुए ंऐतिहासिक जनांदोलन ने पहली बार पक्ष विपक्ष सहित  पूरे राजनैतिक दलों को कटघरे में खड़ा  करने का ऐतिहासिक काम किया है। आषा है कि इसी व्यापक जनदवाब के कारण सरकार देर न सबेर इस बिल को कानून बना ही देगी। हालांकि इस लोकपाल को जिस अण्णा हजारे ने जनलोकपाल के रूप में देष में बनाने के लिए व्यापक जनांदोलन किया। उसमें देष की पूरी व्यवस्था को दीमक की तरह चट करने वाले तथाकथित स्वयं सेवी संगठन जिन्हें गैर सरकारी संगठन यानी एनजीओ के नाम से जाना जाता है, को इस विधेयक से बाहर रख कर लोगों के नजरों में स्वयं को कटघरे में  ही खडा कर दिया है। वहीं टीम अण्णा के सदस्यों के कारण अण्णा हजारे उत्तराखण्ड के कमजोर लोकायुक्त का मुक्त कंठ से सराहना भी करके, कानून के जानकारों की नजरों में अपनी छवि ही धूमिल कर चूके है। ंपरन्तु इसके बाबजूद अण्णा हजारे की सरलता व राश्ट्र के प्रति निश्छल समर्पण से देष  के लोगों के दिल में ंटीम अण्णा के लोगों के लिए भले ही वह सम्मान न हों परन्तु अण्णा हजारे के लिए तो पूरा सम्मान है। ंअब ंसबसे बड़ा सवाल यह है कि अण्णा हजारे व उनके समर्थक कैसे पदलोलुपता व प्रभुता के मद से भ्रमित हो कर लोकषाही का चोला पहन कर थोकषाही ंके रूप में देष में स्थाति हो गये। भले ही अण्णा हजारे लाख दुहाई दें कि वे लोकतंत्र में विष्वंास रख्ंाते हैं परन्तु जंतर मंतर से रामलीला मैदान का इतिहास ही चीख चीख कर कह रहा है कि  अण्णा हजारे व उनकी टीम का व्यवहार चाहे आमरण अनषन के दौरान रहा या बाद में अधिनायकवादी रहा।
सवाल जहां ंजंतर मंतर परं आमरण ं अनषन का हो या रामलीला मैदान में हुआ आमरण अनषन। अण्णा सदैव अपने अनषनकारी साथियों से खुद को ंविषेश जताने के लिए  ऊंचे व अलग स्थान पर आसीन थे। जंतर मंतर से रामलीला मैदान तक पंहुचते पंहुचते यह दूरी कम होने के बजाय निरंतर बढ़ती रही। चंदे के हिसाब देने में हुई अनावष्यक देरी के कारण  इंडिया अगेंस्ट करप्पषन के कार्यकत्र्ताओं को केजरीवाल हिसाब दो व अण्णा हजारे टीम अण्णा से सावधान के नारे के साथ जंतर मंतर पर धरना देने के लिए विवष रहे। राजनैतिक कारण रहे हों या यही दवाब उसके बाद अण्णा हजारे की इस टीम ने अपने चंदे के हिसाब को सार्वजनिक कर ही दिया।  यहां पर आज बात विशयान्तर न जाये इसके लिए मै इस बात को फिर ंलोकपाल पर आता हॅू। हमारे षास्त्रों में  क्षेत्रपाल को भीं ईश्ट के रूप  में या  देवता के रूप में पूजा जाता  है। पर ंभारतीय लोकषाही में भ्रश्टाचार को रोकने के लिए व लोकपाल नामक षब्द के फेरे में फंस कर देष के न केवल प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह व उनकी कांग्रेस सरकार सहित तमाम राजनैतिक दल, नेता बेनकाब हुए अपितु इस आंदोलन को चलाने वाले बाबा रामदेव, आचार्य बालकृश्ण,  अण्णा हजारे, स्वामी अग्निवेष, अरविन्द केजरीवाल, किरण वेदीं सहित अनैक झण्डेबरंदार भीं स्वयं इसके भंवर की चप्पेट में आ कर व्यथित संा हो गये। सच में लोकपाल का सफरनंामा अपनी मंजिल तक पंहुचते पंहुचते बहुत ही रंोचक रहा। देखंना है यह कब  साकार होता है? साकार होने के बाद यह भ्रश्टाचारियों पर ग्रहण ंलगाता है या भ्रश्टाचारी इस पर ग्रहण ंलगाते है। जिस प्रकार से ंअण्णा हजारे व उनकी टीम ने भाजपा की उत्तराखण्ड सरकार द्वारा अभी हाल में बनाये गये अपंग लोकायुक्त की मुक्त कंठ से सराहना की, उससे यह अहसास होता है कि अगर इसी तरह का लोकायुक्त केन्द्र सरकार ने बना दिया तो अण्णा हजारे व उसकी टीम किस मुंह से विरोध करेगी? भाजपा तो कर ही नहीं पायेगी? फिर लगता है कि भ्रश्टाचार को अंकुष लगाने के लिए बडे ही जिद्दोजहद से बनाया गया लोकपाल कानून भी भ्रश्टाचार  के मगरमच्छो से निपटने में एक प्रकार से गैरअसरदार ही साबित होगा। फिर जनता किससे आषा करेगी। अण्णा को चाहिए कि वह जनता के उन पर अटूट विष्वास की रक्षा करते हुए अपनी टीम के मोह में फंस कर आंख बंद कर किसी का समर्थन या विरोध न करे, अपितु निश्पक्ष विषेशज्ञों की सलाह लेकर इस पर अपनी राय दे, क्योंकि देष की भ्रश्टाचार से त्रस्त जनता को आषा की एकमात्र किरण सी दिखााई दे रही है। अण्णा को चाहिए कि एक बात समझ लेनी चाहिए कि भ्रश्टाचार के व्यापक जनांदोलन में लोगों का विष्वास उन पर है न कि उनकी टीम पर। इसलिए उनको बहुत ही ंनिर्ममता से यह निर्णय लेना चाहिए कि वह किसी भी गलत का समर्थन नहीं करेंगे चाहे वह उनकी  टीम का सदस्य ही क्यों न हो। दलगत राजनीति से उपर उठ कर  निर्ममता से भ्रश्टाचार पर प्रहार करके ही अण्णा जनता के विष्वास को बरकरार रख पायेंगे । अगर उन्होंने हिसार, अपनी टीम के सदस्यों की ंछोटी भूलों पर पर्दा डालने व  उत्तराखण्ड सरकार द्वारा  विधायकं, मंत्री-मुख्यमंत्री को बचने का साफ रास्ता देने वाले कमजोर लोकायुक्त का समर्थन करने जैसे कार्य भविश्य में किया तो जनता ंउनंको अपने हृदय से हटा कर राणेसिद्वि में उतारने में तनिक सी भी देर नहीं करेगी।

संगठन की नहीं, सरकार की बागडोर संभाले राहुल गांधी


संगठन की नहीं, सरकार की बागडोर संभाले राहुल गांधी/
-नक्कारे साबित हो चूके प्रधानमंत्री सहित मंत्रियों को बदल कर होगा द ेश व कांग्रेस का भला/
 एक साल में 6 बार पेट्रोलियम पदार्थों की कीमत बड़ा कर कांग्रेसी मनमोहन सरकार ने लोगों का एक प्रकार से जीना ही हराम कर दिया हे। इसके बाबजूद कांग्रेस ऐसे प्रधानमंत्री को बदलने का साहस तक नहीं कर पा  रही है। जबकि आम आदमी चाहता है  मनमोहन को सोनिया गांधी तत्काल प्रधानमंत्री की कुर्सी  से हटाये। मंहगाई में मरणासन्न देष के जख्मों में मरहम लगाये। मनमोहन सिंह ंको एक दिन के लिए भी  प्रधानमंत्री बनाये रखना देष  व आम जनता के हितों से खिलवाड करने के साथ कांग्रेस की जड़ों में मटठा डालना है। इसी को भांप कर मनमोहन सिंह के कुछ समर्थक  सोनिया से राहुल गांधी को संगठन में कार्यकारी अध्यक्ष  का ताज पहना कर किनारा लगाना चाहते हे। परन्तु आज देष व आम कांग्रेसी जनता की आवाज है कि ंवह राहुल गांधी को प्रधानमंत्री के रूप में देखना चाहती है। देष में न केवल मंहगाई, भ्रश्टाचार व आतंकवाद से तबाही के करार पर है वही ं देष की समग्र विदेष नीति भी एक प्रकार से  मनमोहन सिंह के कारण अमेरिका की पूछलग्गू सी बन कर कूंद हो गयी है।
परन्तु लगता हैं कांग्रेस आलाकमान को देश की हवाओं में बह रहे जनसंदेश को भांपने में असफल हैं या वह अमेरिका के भारी दवाब के कारण इतनी लाचार है कि वह देश व कांग्रेस को पतन के गर्त में धकेलने वाली अपनी सरकार के सबसे नक्कारे साबित हो चूके प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को तत्काल हटाने के बजाय केन्द्रीय मंत्रीमण्डल में ही बदलाव करने को समर्थन कर रही है। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को तत्काल हटा कर उनके कुशासन के कारण बेलगाम मंहगाई, भ्रष्टाचार व आतंकवाद से अराजकता के गर्त में पंहुच चूके देश को बचाने के लिए तत्काल राहुल गांधी को प्रधानमंत्री बना कर देश व कांग्रेस की रक्षा करने के अपने दायित्व का निर्वाह करना चाहिए। वहीं दूसरी तरफ प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह  अपनी छवि सुधारने के नाम पर कभी  देश के वरिष्ठ सम्पादकों से मिलने कर अपनी व अपनी सरकार की छवि सुधारने का काम कर रहे हैं,  तो कभी कुछ  और ।
परन्तु मनमोहन सिंह का यह टोटका भी कहीं काम नहीं आने वाला। क्योंकि मनमोहन सिंह ने देश की हालत इतनी शर्मनाक कर दी है कि इसका कोई प्रायश्चित नहीं है। वैसे भी जिन स्वनामधन्य सम्पादकों से वे मिल रहे हैं या मिलेंगे, वे ही ंनहीं देश के तमाम तथाकथित मीडिया धरानों के अधिकांश पत्रकार भी आज देश की आम जनता से पूरी तरह से कटे हुए हैं। आज ंका सम्पादक व पत्रकार अब मीडिया के लिए समर्पित पत्रकार नहीं अपितु एक सेल्समेन से ज्यादा नहीं रह गया है। वेसे भी आज के अधिकांश पत्रकार देश की उस 50 प्रतिशत से अधिक जनसंख्या का प्रतिनिधित्व करने वाली गरीबी के रेखा से नीचे जीवन यापन करने वाली जनता के सुख दुखों से ही नहीं उनकी दुनिया से पूरी तरह से अनजान हैं जिनके जीवन पर मनमोहनसिंह सरकार ने मंहगाई व भ्रष्टाचार से पूरी तरह ग्रहण लगा दिया है।
देश के दूरस्थ क्षेत्रों की बात तो रहने दें देश की राजधानी दिल्ली में ही आज इस लोकशाही के तथाकथित चोथे स्तम्भ को इतना भान नहीं है कि दिल्ली की आम जनता किस कदर से परिवहन के लिए संचालित डीटीसी की बसों से पीड़ित है। यह तो बहुत जमीनी बात है मीडिया के अधिकांश वर्ग को लोकशाही पर लगाये सरकार की वंदिशों का ही भान नहीं होगा। इन मीडिया के तथाकथित पंचतारा संस्कृति के सम्पादकों व पत्रकारों के भरोसे प्रधानमंत्री सोचते हैं कि वे अपनी व अपनी छवि उस आम जनता के नजरों में सुधार देंगे तो यह उनकी हिमालयी भूल है। उनकी देश सेवा के लिए एक ही विकल्प रह गया कि वे देश व कांग्रेस के हित में यह सर्वोच्च काम कर सकत हैं कि वे अपने पद से इस्तीफा दे कर देश की सच्ची सेवा करें।
लगता है प्रधानमंत्री मनमोहन अब इतने सत्तालोलुप हो गये हैं कि उनको अपनी सरकार से देश की ंहो रही ंभयंकर दुर्दशा भी नहीं दिखाई देगी। आज जिस प्रकारं से कांग्रेस सरकार में आस्कर फर्नाडिस जैसे जनता के लिए समर्पित नेताओं की उपेक्षा मंत्रीमण्डल में हो रही है उसी से कांग्रेसी सरकार आम जनता से दूर हो गयी है। वह कांग्रेस नेतृत्व की सोच को ही कटघरे में रख रही है। राहुल गांधी को प्रधानमंत्री बनाने व मनमोहन की विदाई में कांग्रेस जितनी भी देर करेगी, देश व कांग्रेस के लिए एक एक पल बहुत ही खतरनाक साबित हो रहे है।

Monday, November 7, 2011

भारत - चीन को युद्व मेें झोंकने व ईरान पर हमला कराने का अमेरिका का खतरनाक शडयंत्र !


भारत - चीन को युद्व मेें झोंकने व  ईरान पर हमला कराने का अमेरिका का खतरनाक शडयंत्र !

ंप्यारा उत्तराखण्ड की विषेश रिपोर्ट
मंदी की थप्पेडों से जरजर हो रही अमेरिका व यूरोप की अर्थव्यवस्था  को विष्व में तेजी से महाषक्ति बन रहे चीन व भारत कंे षिकंजे में जाने से बचाने के लिए अमेरिका व उसके नाटो संमर्थक देष एक खतरनाक शडयंत्र रच रहे है। इसके तहत एक तरफ तो ईरान पर हमला कर उसे इराक व लीबिया की तरह तबाह ंउन दोनों देषों में अमेरिका विरोधी हुक्मरान को जमीदोज किया जाय। वहीं दूसरी तरफ मंदी की मार से जर जर हो चूकी अमेरिकी व यूरोपिय अर्थव्यवस्था के कारण विष्व पटल पर तेजी से उभर रहे चीन व भारत जैसे महाषक्ति बनने जा रहे देषों से मिली चुनौती को कुंद करने के लिए इन दोनों देषों को आपस में युद्व की भट्टी में झोंक कर इनकी रफतार को तबाह करने का खतरनाक शडयंत्र का तानाबाना बुना जा चूका है। एक तरफ ईरान को चारों तरफ से घेरा जा रहा है तो वही ं दूसरी तरफ चीन व भारत दोनों देषों को एक दूसरे के खिलाफ रणनीति की तहत खड़ा कर  उनको युद्व की भट्टी में झोंका जा रहा है।  अगर भारत व चीन के हुक्मरानों ने अगर सावधानी से काम नहीं लिया तो दोनों देष ंअमेरिका के चुंगल में   फंस कर खुद के साथ विष्व की अमेरिका की चुंगल से मुक्त होने की आषाओं को भी दफन करा देंगे।
सावधान लीबिया को तबाह  करने के बाद अब  अमेरिका व उसका प्यादा बना नाटो ईरान पर हमला करने का मन बना रहे है। वहंीं वह विष्व में तेजी  से उभर रहे देष भारत व चीन को आपसी युद्व की भट्टी में झोंक कर अपना विष्व सम्राट व सम्राज्य को बरकरार रखना  चाहता है। इराक के बाद लीबिया में हुए हमले के बाद भी विष्व समुदाय जागृत नहीं हुआ, इसी  से उत्साहित हो कर अब अमेरिका परमाणु षक्ति सम्पन्न ईरान पर हमला करके उसे भी  तबाह करना चाहता है। अमेरिका के  करीबी प्यादे इस्राइल ने भी यह संकेत दिये है । इसे भांपते हुए ईरान ने भी संयुक्त राश्ट्र सहित तमाम विष्व मंचों पर अमेरिका की इस नापाक इरादों से आगाह करा दिया  हे। परन्तु संयुक्त राश्ट्र संघ अपने आप में कुछ नहीं अमेरिका का ही प्यादा है। वह वहीं करेगा जो अमेरिका चाहेगा। ंयह खतरनाक संकेत है। चीन, रूस व भारत की नपुंसकता के कारण एक दिन अमेरिका व उसके पूछल देश इग्लेण्ड, कनाड़ा, इटली आदि नाटो गुट के देश मिलकर इसी प्रकार का हमला कर संसार के तमाम देशों को इसी तरह से अपना गुलाम बनायेंगे। अगर अभी अमेरिका के नापाक इरादों पर अंकुष नहीं लगाया तो या तो अमेरिका चीन व भारत को आपस में  लडवायेगा या एक एक कर इराक, लीबिया की तरह अगली बारीं भारत , चीन व रूस की भी होगी। अमेरिका की यह जंग न तो आतंकबाद के खिलाफ है व नहीं तानाशाही के खिलाफ, अमेरिका की यह जंग केवल अपने विरोधियों को तबाह कर पूरे विश्व को अपना गुलाम बनाने की है। अमेरिका के विस्तार में उसका सहयोग अमेरिका द्वारा पोषित व संरक्षित अलकायदा ही कर रहा हैं। अगर अमेरिका की जंग अलकायदा या आतंकियों के खिलाफ होती तो वह अपना सबसे पहला हमला अफगानिस्तान, इराक व लीबिया में न करके पाकिस्तान में करता। क्योंकि पाकिस्तान ही आज पूरे विश्व में आतंकी हमलों की फेक्टरी बन गयी है। पाकिस्तान ही पूरे विश्व में आतंकवाद को पोषित व संरक्षित कर रहा है। तानाशाही के खिलाफ भी अमेरिका की जंग नहीं हे। अमेरिका ने हमेशा पाकिस्तान में ही नहीं अपितु अरब देशों में लोकशाही को रौंदने वालों को संरक्षण दिया। यह अमेरिका की जंग अमेरिका द्वारा विश्व को अपना गुलाम बनाने के विश्वव्यापी मुहिम का एक अहम हिस्सा है। अगर विश्व जनमत इसी तरह नपुंसक रह कर अमेरिका के जुल्मों का सर झुका कर मूक समर्थन किया तो वह दिन दूर नहीं जब इरान, उत्तरी कोरिया तो अमेरिका आज नहीं तो कल तो रौंदेगा अपितु वह किसी न किसी बहाने से भारत, चीन व रूस को भी इसी निर्ममता से रौंदेगा। इसका बहाना चाहे भारत में कश्मीर हो सकता है तथा चीन में कुछ ओर तथा रूस में भी चेचन्या सहित कुछ भी हो सकता है। संयुक्त राष्ट्र संघ की निर्लज्जता व अमेरिकी प्यादापन को तो विश्व जनमत तथा संयुक्त राष्ट्र संघ के भारी विरोध के बाबजूद इराक पर हमला करके हजारों इराकियों का कत्लेआम करने तथा वहां बलात कब्जा जमाने से ही उजागर हो गया हे। जिस तैवर से संयुक्त राष्ट्र संघ ने कुवैत पर एक दिन के हमले के कारण इराक पर प्रतिबंध लगाया था वह संयुक्त राष्ट्र संघ को इराक पर अमेरिका के निर्मम कब्जा इतने साल बाद भी क्यों नहीं दिखाई दे रहा है। उसकी हैकड़ी अमेरिका के आगे क्यों दम तोड़ गयी।   अगर अमेरिका पर अविलम्ब अंकुश नहीं लगाया गया तो अमेरिका एक एक कर सभी अपने संभावित विरोधियों को इराक व लीबिया की तरह तबाह कर देगा। लीबिया व उसके तानाशाह का हस्र भी अमेरिका इराक व उसके प्रमुख सद्दाम की तरह ही करेगा। लीबिया के तानाशाह कर्नल गद्दाफी का खात्मा कराके व लीबिया को तबाह करके अमेरिका ने यह साबित कर दिया कि अमेरिका अपने विरोधियों को किसी तरह इस धरती पर रहने की इजाजत ंअब किसी भी कीमत पर नहीं देना चाहता है ।  इस हमले से एक बात स्पष्ट हो गयी कि अमेरिकी राष्ट्रपति जार्जबुश के बदलने के बाद राष्ट्रपति बने ओबामा ने भी अमेरिका की उसी विश्व को अपना गुलाम बनाने की अमेरिका की घृर्णित विस्तारवादी नीतियों का अंधानुशरण किया है। अमेरिकी राष्ट्रपति बने ओबामा की इस कार्यवाही से पूरे विश्व के उन अरबों लोगों के विश्ववास का भी गला घोट दिया हे जो उनको बुश की तरह तानाशाह व विश्व शांति के लिए खतरा नहीं मानते थे। कुल मिला कर अमेरिका में बुश की जगह भले ही शासक का मुखोटा अब  ओबामा के रूप में पहन लिया हो परन्तु उसकी अमानवीय गतिविधियों पर कोई परिवर्तन नहीं हुआ। अपितु वह दिन प्रति दिन खतरनाक बनती जा रही है।  संयुक्त राष्ट्र की नपुंसकता व अमेरिका के हाथों की कटपुतली बनने का नतीजा है। लीबिया को इराक बनाने की धृष्ठता अलकायदा व अमेरिकी अनैतिक गठजोड़ को भी बेनकाब करती है

Thursday, November 3, 2011

खंडूडी से ही नहीं, अण्णा से भी निराश हुए उत्तराखण्डी


खंडूडी से ही नहीं, अण्णा से भी निराश हुए उत्तराखण्डी/
-खंडूडी द्वारा जनता की आंखों में धूल झोंकने वाले कमजोर लोकायुक्त विधेयक का क्यों कर रहे हैं अण्णा  समर्थन/
भ्रश्टाचार को मिटाने के लिए जिस लोकायुक्त को ऐतिहासिक बता कर देष में भ्रश्टाचार मिटाने का हौव्वा  उत्तराखण्ड की खंडूडी सरकार व उनके प्यादे तथा अण्णा हजारे की टीम कर रही है क्या वे बता सकते हैं कि - भ्रश्टाचार के प्रतीक बने एनजीओ यानी स्वयं सेवी संस्थाओं को क्यों इस लोकपाल /लोकायुक्त से बाहर क्यों रखा गया ?
क्या अण्णा हजारे व उनकी टीम केन्द्र सरकार द्वाराा बनाये गये ऐसे जनलोकपाल विधेयक को स्वीकार करेंगे जिसमें यह प्रावधान होगा कि जब तक लोकपाल के सभी सदस्य एकमत नही होंगे तो तब तक किसी भी भ्रश्टाचार में लिप्त सांसद, मंत्री या प्रधानमंत्री पर मामला ही दर्ज नहीं किया जायेगा? ंयदि नही ं तो फिर वे क्यों उत्तराखण्ड के भ्रश्टाचार पर अंकुष लगाने के लिए उत्तराखण्ड  के मुख्यमंत्री  द्वारा प्रदेष में इसी प्रकार का बनाये गये लोकायुक्त विधेयक का खुला  समर्थन कर रहे हैं? आज उत्तराखण्ड  की ही  नहीं ंपूरे देष की जनता यह जानकर हैरान है कि अण्णा हजारे क्यों ऐसे लोकायुक्त जिसमें किसी भी भ्रश्टाचार में लिप्त विधायक, मंत्री व मुख्यमंत्री  पर लोकायुक्त अपना अंकुष रखेगा जब तक लोकायुक्त का सभी सदस्य इस पर एकमत न हों। 
-इस लोकायुक्त में विधायक व मुख्यमंत्री पर तबतक मामला दर्ज नहीं होगा जब तक लोकायुक्त के सभी सदस्य इस पर सहमत न हों  ? ये सदस्य जो भी होगें ये पक्ष विपक्ष के नेताओं की कृपा से ही इसमें चयनित होंगे, फिर न नौ मन तेल होगा , न राधा नाचेगी। यानी जिन जनप्रतिनिधियों के भ्रश्टाचार पर अंकुष लगाने के नाम पर बना लोकायुक्त में इनकोे बचने का साफ रास्ता दिया गया। ंआम आदमी के लिए लोकायुक्त क्या एक पुलिस का सिपाही भी काफी होता है। कोर्ट कचहरी के बिना ही पटवारी का चपरासी व सिपाई इतना दण्डित कर देता है कि बेकसूर भी बिना किये जुर्म कबूल कर देता?  फिर खंडूडी जी बताये कि उनका  लोकायुक्त किसके भ्रश्टाचार पर अंकुष लगाने के लिए बनाया है? अण्णा की टीम के सिपाहेसलार बताये कि क्या वे ऐसा ही लोकायुक्त/लोकपाल  देष में बनाना चाहते हैं जिसके सभी सदस्य जब तक सहमत न हो सांसद, मंत्री व प्रधानमंत्री आदि  पर कोंई मामला ही दर्ज नहीं होगा। 
खंडूडी  जी प्रदेष की जनता काो पहले यह बतायें कि अपने प्यादे के भ्रश्टाचार पर वे चंद महिने पहले तक घडियाली आंसू बहा रहे थे वे मुख्यमंत्री बनते ही कहां गुम हो गया ? अब उनको वह भ्रश्टाचार दिखाई देना बंद हो गया ? खंडूडी जी को उत्तराखण्ड का तारनहार व भ्रश्टाचार का नाषक समझने वाले व उनके लिए भौंपू बजाने वाले मित्रों से यही कहना चाहता हॅू कि जिस खंडूडी ने मुख्यमंत्री रहते हुए मुजफरनगर काण्ड के दोशियों को सजा दिलाने में ठोस पहल तक नहीं की हो, जिस खंडूडी मुख्यमंत्री रहते हुए प्रदेष के भविश्य को जमीदोज करने वाले जनसंख्या पर आधारित विधानसभाई परिसीमन पर आंदोलनकारियों द्वारा बार-बार आग्रह पर उफ तक नहीं किया हो, जिस खंडूडी जी  ने जनभावनाओं के अनरूप प्रदेष की स्थाई राजधानी गैरसैंण बनाने के लिए कुछ भी नहीं ंिकया हो तथा जिस भ्रश्टाचार को मिटाने के तथाकथित मषीहा  की सारंगी की तान व निषंक की ताजपोषी में अपनी षान रही हो, वह अब चंद महिने पहले तक जिन भ्रश्टाचारियों के कुषासन के लिए घडियाली आंसू बहा रहे थे, वह उत्तराखण्डी प्रेम का वह दर्द प्रदेष की ंसत्ता मिलते ही खंडूडी जी के सीने व आंखों से सियार के सींग की तरह कैसे गायब हो गयी। जिन भ्रश्टाचारियों के कृत्यों पर वे घडियाली आंसू बहा रहे थे सत्ता मिलने के बाद को उन्होंने दण्डित करने का धर्म निभाने के बजाय वे गलबहियां करते नजर आये तो उनके द्वारा भ्रश्टाचार मिटाने के लिए ंमृतप्राय लोकायुक्त बनाने ंपर कौन विष्वास करेगा। वह भी तब प्राणवान होगा जब उसको केन्द्र सरकार ंस्वीकृत करेगी। पर न जाने उनके स्वयंभू रागी व भौंपूओं को उनके कृत्योें पर युगान्तकारी क्या नजर आ रहा है। प्रदेष  के गठन के लिए यहां के लोगों ने अपनी षहादत चंद  लोगों द्वारा प्रदेष में जाति, क्षेत्र व दलों के नाम पर लूटने के लिए नहीं बनाया था। प्रदेष बनाया था उत्तराखण्डी समाज के सम्मान व संसाधनों की रक्षा व ंप्रदेष का चहुमुखी विकास के लिए। 
ंभ्रश्टाचार को मिटाने के लिए मजबूत कानून व सबसे अधिक संवैधानिक महत्वपूर्ण पदों पर आसीन व्यक्तियों की ईमानदार नियत की जरूरत होती है। क्योंकि देखा यह जा रहा है कि राजनेताओं द्वारा संवैधानिक पदों पर ईमानदार, प्रबुद्व निश्पक्ष जिम्मेदार व्यक्ति के बजाय अपने हाथों की कठपुतली बन सकने वालों को ही प्रायः आसीन किया जा रहा है। इसी कारण आज पूरी व्यवस्था एक प्रकार से भ्रश्टाचार के दलदल में दम तोड़  चूकी है।  आज जरूरत मात्र कानूनों की नहीं अपितु ईमानदार, जिम्मेदार व राश्ट्रभक्त युगान्तकारी नेतृत्व की है। जो वर्तमान में दिखाई देने वाली राजनैतिक दलों में ही नहीं अपितु परिवर्तन का दंभ भर रहे आंदोलनकारियों में कहीं दूर-दूर तक दिखाई तक नहीं दे रही है।  षेश श्रीकृश्ण कृपा। हरि ओम तत्सत्। श्रीकृश्णाय नमो।