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Saturday, October 29, 2011

देश व उत्तराखण्ड के हित में रेल परियोजना के उदघाटन समारोह का विरोध अनुचित

देश व उत्तराखण्ड के हित में रेल परियोजना के उदघाटन समारोह का विरोध अनुचित 
नई दिल्ली (प्याउ)।उत्तराखण्ड राज्य गठन के प्रमुख जनांदोलनकारी संगठनों ने ंकेन्द्र सरकार द्वारा ‘ऋषिकेश से कर्णप्रयाग रेलमार्ग’ को स्वीकृत करने व इस परियोजना का 6 नवम्बर को गोचर में शुभारम्भ सप्रंग सरकार की प्रमुख सोनिया गांधी द्वारा किये जाने के निर्णय का ंहार्दिक स्वागत करते हुए ंइस परियोजना का खुले दिल से स्वागत करने के बजाय मात्र सोनिया गांधी के द्वारा शुभारंभ होने का विरोध करने ंको उत्तराखण्ड ही नहीं देश के हितों पर कुठाराघात करने वाला कदम बताया। ं
राज्य आंदोलन के प्रमुख संगठनों, उत्तराखण्ड जनता संघर्ष मोर्चा, उत्तराखण्ड जनमोर्चा, उत्तराखण्ड महासभा व उत्तराखण्ड राज्य लोकमंच की तरफ से जारी एक वयान मे अफसोस जाहिर किया गया कि पहली बार आठ दशक से अधिक लंम्बे समय से ठण्डे बस्ते में दम तोड रही ऐतिहासिक ‘ऋषिकेश से कर्णप्रयाग रेलमार्ग’ निर्माण परियोजना जो राष्ट्रंीय सुरक्षा व उत्तराखण्ड के विकास की दृष्टि से मील का पत्थर साबित होगी, उसके उदघाटन समारोह के विरोध में बयानबाजी करने वाले भाजपा नेताओं से पुरजोर अपील की कि वे अपने संकीर्ण राजनैतिक कारणों से देश की सुरक्षा व सीमान्त प्रदेश के विकास की नयी गंगा बहाने वाली ऋषिकेश से कर्णप्रयाग रेलमार्ग’ परियोजना का विरोध करने की प्रवृति को ंतत्काल त्याग दें। उत्तराखण्ड राज्य गठन के लिए 6 साल तक संसद की चैखट राष्ट्रीय धरना स्थल जंतर मंतर पर ऐतिहासिक धरना देने वाले उत्तराखण्ड जनता संघर्ष मोर्चा के अध्यक्ष देवसिंह रावत ने ंइस ऐतिहासिक परियोजना का खुले दिल से स्वागत किया जाना चाहिए। भाजपा व कांग्रेस के नेताओं को एक बात साफ समझ लेनी चाहिए कि प्रदेश की जनता किसी भी राजनैतिक दल व व्यक्ति ंको इस बात की इजाजत नहीं देती कि वह अपने निहित स्वार्थों के लिए प्रदेश के बहुमुखी विकास व सम्मान के साथ खिलवाड़ करें। उन्होंने सप्रंग सरकार के लिए प्रदेश की इस रेल परियोजना को स्वीकृत कर प्रदेश का ही विकास ही नहीं अपितु सीमा पर रेल बिछा चूके चीन का मुहतोड़ जवाब देने के लिए अत्यावश्यक व सराहनीय कार्य ंबताया। श्री रावत ने ंइस ंरेल परियोजना को स्वीकृत कराने में वरिष्ठ कांग्रेसी नेता सतपाल महाराज व भाजपा के राज्यसभा सांसद भगतंसिंह कोश्यारी सहित तमाम उन लोगों को बधाई दी जो इस परियोजनाओं को मंजूर कराने के लिए कई वर्षों से ंनिरंतर सहयोग दे रहे हें।
राज्य आंदोलन के प्रमुख संगठनों, उत्तराखण्ड जनता संघर्ष मोर्चा, उत्तराखण्ड जनमोर्चा, उत्तराखण्ड महासभा व उत्तराखण्ड राज्य लोकमंच की तरफ से जारी एक वयान में ंउत्तराखण्ड के भाजपा नेताओं से पुरजोर अपील करते हुए प्रमुख आंदोलनकारी देवसिंह रावत ने कहा कि देश की सुरक्षा व प्रदेश के विकास की दृष्टि से ऐतिहासिक इस परियोजना के जल्द शुरू करने के लिए दवाब डालने के लिए खुले दिल से स्वागत करने के बजाय उदघाटन समारोह सोनिया के हाथों से कराये जाने का विरोध करना किसी भी दृष्टि से देश व प्रदेश के हित में नहीं हे। ंश्री रावत ने कहा कि लोकतंत्र में ंपक्ष विपक्ष में सकारात्मक विरोध स्वागत योग्य तथा लोकशाही के लिए हितकारी होता हैं परन्तु लोकश्ंााही में सत्तासीन दल प्रायः अपने महत्वपूर्ण कार्यो का राजनैतिक लाभ लेने के लिए महत्वपूर्ण परियोजनाओं का उदघाटन अपने राजनैतिक आकाओं से कराता रहता है। वैसे भी सोनिया गांधी न केवल कांग्रेस की अध्यक्षा है अपितु वह सत्तासीन ंसंयुक्त प्रगतिशील गढ़बंधन की प्रमुख भी है। उनके द्वारा देश में कई बड़ी परियोजनाओं का उदघाटन इस सरकार व इससे पहली सरकार के कार्यकाल में किया जाता रहा। भाजपा के नेताओं को यह नहीं भूलना चाहिए कि इस परियोजनाओं को न तो भाजपा नेतृत्व वाली राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन वाली अटल बिहारी सरकार ने ही स्वीकृत किया। अगर कांग्रेसी ंगठबंधन की सरकार इस परियोजना को बना रही है तो इतना राजनैतिक लाभ लेने का उसका हक है। ंसोनिया द्वारा इस परियोजना का विरोध करने वाले भाजपा नेता देश व उत्तराखण्ड की जनता को बताये कि आखिर क्यों नहीं उनकी राजग सरकार ने देश के सीमान्त प्रदेश उत्तराखण्ड में दशकों से लम्बित पड़ी परियोजनाओं को स्वीकृत नहीं किया। तब उनको इस परियोजना का उदघाटन ंअटल या आडवाणी से कराने कां अवसर मिल सकता था। परन्तु खुद भी जनहित व राष्ट्रहित की इस परियोजना का निर्माण नहीं किया अब दूसरा दल कर ंरहा है तो उसके इस जनहित के कार्य का स्वागत करके रचनात्मक विपक्ष की भूमिका निभाने के बजाय उसके शुभारंभ में ही हाय हला मचा कर व्यवधान डाल रहे हैं। भाजपा नेताओं का यह कदम न केवल अदूरदर्शी है अपितु यह देश व उत्तराखण्ड के हित में कहीं दूर दूर तक नहीं है। इसके साथ यह लोकशाही के हित में भी घातक है। इस परियोजना के निर्माण के लिए कांग्रेस सरकार द्वारा दूर से ही सही शुरू की गयी पहल को तेजी से अमली जामा पहनाने के लिए दवाब डालने के बजाय सोनिया सोनिया कह कर व्यवधान डालना नितांत गलत कदम है। इसी प्रकार की गलत राजनीति कदमों से न तो प्रदेश की आम जनता की भावनाओं के अनरूप राजधानी गैरसैंण ही बन पायी व नहीं प्रदेश में ऋषिकेश में राजग सरकार के दौरान स्वीकृत किया गया अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान का चिकित्सालय ही खुल पाया। राजनैतिक दलों की इस संकीर्ण प्रवृति से देश का विकास जहां कुंद पडता है वहीं लोकशाही भी विकृत होती है।

Friday, October 28, 2011

शीतकाल के लिए केदारनाथ व यमुनोत्री के कपाट हुए बंद


शीतकाल के लिए केदारनाथ व यमुनोत्री के कपाट हुए बंद
विश्व विख्यात केदारनाथ धाम व यमुनोत्री के कपाट  शीतकाल के  लिए 28 अक्टूबर को विधिविधान से बंद कर दिये गये। शीतकाल में जहां भगवान सदाशिव केदारनाथ की विधिवत पूजा उनके शीतकालीन गद्दी ऊखीमठ के ओंकारेश्वर मंदिर में तथा  ंयमुनोत्री की शीतकालीन पूजा खरसाली में ंकी जाती है। गौरतलब है कि चंार धाम यात्रा से विश्वविख्यात भगवान बदरीनाथ धाम व केदारनाथ धाम के साथ यमुनोत्री व गंगोत्री की पावन यात्रा  शीतकाल के दोरान बंद ंहोती  है तथा देवताओं की पूजा इनके शीतकालीन स्थलों पर विधिवत की जाती है।  केदारनाथ व यमुनोत्री के बाद इसी पखवाडे बदरीनाथा व गंगोत्री धाम के कपाट भी शीतकाल के लिए बंद ंहो जायेंगें। ंसनातन धर्मावलम्बी लाखों की संख्या में देश विदेश  से हिन्दुओं के इन सर्वोच्च धामों के दर्शन पूजन के लिए हर साल यहां आते है।

जनलोकपाल को हाथी का दांत न बनाये खंडूडी !


खंडूडी जी मात्र जनलोकपाल से नहीं होगा प्रदेश से भ्रष्टाचार दूर/
जनलोकपाल को हाथी का दांत न बनाये  खंडूडी !/
हाथी के दांत खांने के कुछ  व दिखाने के कुछ और ही होते हैं। यह कहावत ंमेरी तरह आपने भी सुनी हंोगी। परन्तु उत्तराखण्ड  में प्रदेश की सत्ता पर आसीन भुवनचंद खंडूडी पर यह कहावत सटीक बैठती है। ंभारतीय आला कमान  की आत्मघाति प्रवृति की  नयी मिशाल देखने को मिली  कि भाजपा आला नेताओं के आंखों के तारे निशंक   के कुशासन -भ्रष्टाचार के गर्त में फंसी भाजपा की नैया को चुनावी भंवर से पार लगाने के लिए खेवनहार भी बनाया गया तो चंद साल पहले जनता द्वारा पूरी तरह से नकारे गये अलोकतांत्रिक प्रवृति के भुवनचंद खंडूडी को ही। हालांकि प्रदेश की जनता को खंडूडी को ईमानदारी व कुशल प्रशासक का तकमा देने की ंभाजपा नेतृत्व व प्रदेश की मीडिया की आत्ममुग्ध प्रवृति ंपर हंसंी ंही आ रही है । क्योकि प्रदेश की जनता खंडूडी द्वारा अपने पहले कार्यकाल में प्रदेश पर सारंगी व निशंक का अनमोल तोफहे का दंश ंझेल चूकी है। ंऐसे में अपनंी  छवि को निखारने के लिए  ंमुख्यमंत्री खंडूडी ं, अण्णा हजारे को मिले व्यापक जनसमर्थ के समुद्र में ‘जनलोकपाल विधेयक का ’गौता लगा कर जनता की नजरों में अपने आप को भ्रष्टाचार के खिलाफ ंलड़ने वाला योद्वा ंसाबित करना चाहते हैं। परन्तु ंख्ंांडूडी जी भूल ंगये कि उत्तराखण्ड की जनता को अण्णा व ंखंडूडी के कथनी ही नहीं करनी में भी भेद करना आता है। ंखंडूडी जी को इस बात का भान होना चाहिए कि ंप्रदेश की जनता कानूनों ंकी किताब बनाने से अधिक उसको मजबूती से लागू  करने मे यकीन करती है। वह जानती  है कि एक तरफ खंडूडी  ंउन भ्रष्टाचारियों को संरक्षण दे रहे हैं जिनके भ्रष्टाचार पर वे कई सालों से व चंद महिने पहले ंयत्र तत्र घडियाली आंसू बहा रहे थे।  खंडूडी के इन्ही हाथी के दांतों को देख कर प्रदेश की जनता ने उनके कुशासन से प्रदेश से मुक्ति दिलाने के लिए व खंडूडी मोह में धृतराष्ट्र बने ंभाजपा आलाकमान को लोकशाही का सबक सिखाने के लिए जनता ंने लोकसभा चुनाव में पूरे प्रदेश से भाजपा का पूरी तरह से सफाया किया था। जनता का करारी  ठोकर से तिलमिलाये भाजपा आला नेतृत्व ने भारी मन से खंडूडी को मुख्यमंत्री के पद से हटाया परन्तु खंडूडी कंीं हटधर्मिता के आगे दण्डवत करते हुए ईमानदार, साफछवि व वरिष्ठ अनुभवी भगतसिंह कोश्यारी,   डा केदारसिंह फोनिया,  मोहनसिंह ग्रामवासी जैसे दिग्गज भाजपा नेतााओं ंको दरकिनारे करके ,चंद महिनों पहले तक जिस निशंक को  फूटी  आंख से भी देखना जो खंडूडी जी पसंद नहीं करते थे उस निशंक को खंडूडी जी ने प्रदेश का भाग्य विधाता बनावंां ंकर ंप्रदेश की जनता को हस्तप्रद कर दिया। निशंक के कुशासन से जब जनता ही नहीं भाजपा के स्वाभिमानी व साफ छवि के उत्तराखण्डी हितो के लिए समर्पित पूर्व सांसद  ले. जनरल तेजपाल सिंह रावत ंने ंभारी विरोध किया। जब उनके विरोध को भ्रष्टाचारी चासनी ंकी तान के मोह में ंधृतराष्ट्रं बने भाजपा आला नेताओं ने ंअनसुनी की तो भाजपा में सेना के सबसे वरिष्ठ  अधिकारी ले. जनरल तेजपालसिंह रावत ने ‘उत्तराखण्ड रक्षा मोर्चा’ के बेनर तले उत्तराखण्ड में लाखों की संख्या में रहने वाले पूर्व सैनिकों, उत्तराखण्ड के महान जनगायक नरेन्द्रसिंह नेगी व ंवरिष्ठ ंसेवा निवृत भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारी सुरेन्द्रसिंह पांगती सहित तमाम उत्तराखण्ड के हितों की भाजपा-कांग्रेस जैसे राष्ट्रीय दलों की भ्रष्टाचारीं कुशासन ंसे रक्षा के लिए समर्पित ंलोगों का विशाल जनसैलाब सडकों परं उतरा तो भाजपा नेताओं के  पैरों तले जमीन ही खिसक गयी। ंजनरल तेजपाल सिंह रावत के नेतृत्व वाली उत्तराखण्ड रक्षा मोर्चा की हुंकार से  भयभीत भाजपा आला नेतृत्व ने ंआगामी विधानसभा चुनाव में अपनी ंपाटी्र के भविष्य को अंधकार की गर्त में फंसने की आशंका से भयभीत हो कर नेतृत्व  परिवर्तन तो किया परन्तु फिर उसी खंडूडी जी को प्रदेश की सत्ता में काबिज करा ंदिया जिसको चंद महिनों पहले ही जनता ने लोकसभा चुनाव में पूरीं तरह से नकार दिया था।
प्रदेश की  सत्ता में आसीन खंडूडी के एक माह के कार्यकाल को देखने के बाद साफ हो गया कि उन लगे जातिवाद, क्षेत्रवाद, भ्रष्ट ाचारियों व प्रदेश  की जनभावनाओं की उपेक्षा करके अलोकशाहीं प्रवृति से लोकशाही को रौंदने वाले पूर्व कार्यकाल में भी लगे आरोपों की छाया आज भी ज्यों की त्यों उनके साथ लगी  हुई है। केवल नये अवतार में खंडूडी भ्रष्टाचार विरोध में देश व्यापी अण्णा की  लोकप्रियता को भूनाने के लिए प्रदेश में जनलोकपाल सा कानून बनाने का दावा कर रहेे है । परन्तु जनता यह  देख कर भौचंक्की है कि  जिस निशंक व  तिवारी के कार्यकाल को वे निरंतर  कोसते रहे उन दोनों ंपर कोइ्र कार्यवाही करने के बजाय खंडूडी जी तिवारी जी की चरणवंदना करते व निशंक से मंचों पर जुगलवंदी  करते नजर आ रहे  हैं। फिर जो लोग अपने कुशासन से प्रदेश के भविष्य को रौंदने के  िलए मुख्य जिम्मेदार हो उनके प्रति ऐसा अचम्भित करने वाला  नजरिया खंडूडी व उनके प्रशासन का होगा तो जनलोकपाल बनाने या दागदा रों की सरपरस्ती में  जांच आयोग  बनाने के हाथी दांत कैसे प्रदेश से भ्रष्टाचार सेे मुक्त कर पायेंगे। इसके लिए  हुक्मरानों को जनता के ंमानसपटल पर छाये सारंगी व निशंक जैसंी प्रवृति को संरक्षण देने के दंशों  को मिटा कर ईमानदारी से जातिवाद व क्षेत्रवाद से उपर उठ कर भ्रष्टाचार को रौंदने ंकी ईमानदारी से ठोस  पहल की  जरूरत है।  नहीं तो मजबूत से मजबूत कानून, किताबों तक ही में दफन ंहो कर दम तोड़ देगा व पूरे समाज, प्रदेश व देश को भ्रष्टाचारी पहले की तरह ही रौंदते रहेगे। इसके लिए जरूरी  है संवैधानिक पदों पर आसीन लोगों का व्यक्तिगत जीवन पावसाफ व जनहितों के  लिए समर्पण  न कि दल या निहित स्वार्थपूर्ति के लिए समर्पण। सबसे दुखद  बात यह है कि  खंडूडी अपने दूसरे कार्यकाल में भी निशंक के  शासन में इतनी ठोकरें खाने के बाबजूद खुद पर लगे पूर्व कार्यकाल में लगे आरोपों की छाया से खुद को ंदूर नहीं कर पाये व नहीं व नहीं वे एक भी  ऐसे व्यक्ति को अपने साथ अपनी टीम में रख पाये जिसे संगठन व जन भावनाओं का सम्मान तक करना आता हो। उनकी  टीम में वही अलोेकशाही प्रवृति के लोग आज भी जुडे हुए है जो न तो आम जनता  का सम्मान करना जानते व नहीं पार्टी कार्यकत्र्ताओं का। ंखंडूडी ने अपने पहले कार्यकाल में प्रदेश के हितो ं पर जनसंख्या पर ंआधारित विधानसभाई क्षेत्र परिसीमन, गैरसैंण ंराजधानी बनाने, मुजफरनगर काण्ड के अभियुक्तों को दण्डित करने, प्रदेश के संसाधनों की रक्षा करने  व जनभावनाओं के अनरूप ंप्रदेश में जातिवाद-क्षेत्रवाद व भ्रष्टाचार मुक्त विकासोनुमुख राज्य बनाने जैसे महत्वपूर्ण मुद्दों पर ं ंशर्मनाक मूक रख कर प्रदेश ंके भविष्य के साथ पूर्व मुख्ंयमंत्री  तिवारी की भांति ही शर्मनाक खिलवाड ़ किया। इसका खमियाजा प्रदेश को दसकों तक चूकाना पडेगा। ंआज जरूरत है कानून बनाने से अधिक  उसको ईमानदारी से लागू करने की। ंजिसे प्रदेश की जनता ंदेखने के लिए राज्य गठन के बाद से निरंतर तरसती आ रही है । ंशर्मनाक बात यह है कि अभी तक किसी भी  राजनैतिक  दल की सरकार ने इस दिशा में कोई एक कदम भी उठाना मुनासिब नहीं समझा। ंखंडूडी जी ंदीवारों पर लिखी इस बात को पढ़ने में जितनी जल्द  ही सफल होंगे उससे उनके साथ प्रदेश ंका भी भला होगा। उनको इस बात का भी भान होना  चाहिए कि उत्तराखण्ड के  लोग सहृदय व ईमानदार  हैं वे ंप्रदेश के हितों को रौदने वाले नौछमियों व कलंकों ंको ंप्रदेश की सत्ता से दूर करने का माद्दा रखते है। ंहर दुशासन को उखाड़ फेंक ने का अदम्य साहस रखते है। हर कालनेमियों को सबक सिखाने के लिए हर पल तेयार रहते हैं। ईश्वर ने उनकोे फिर अपनी  भूल सुधारने का दुर्लभ अवसर दिया, ंअगर  इसको भी वे हाथी ंके दांत दिखाने, ंनंौछमियों व कलोंको को सरंक्षण देते  रहे, ंजातिवादी, क्षेत्रवादी छाया से अपने आप को शीघ्र मुक्त नहीं किया तो आगामी विधानसभा चुनाव में भी जनता  लोकसभा की तरह प्रदेश  से भाजपा का पूरी तरह सुपडा ही साफ कर देगी। शेष श्रीकृष्ण कृपा। हरि ओम तत्सत्। श्रीकृष्णाय् नमो।

ऐसी प्रखर नव प्रभात जग में कर दो


ऐसी प्रखर नव प्रभात जग में कर दो
जय श्रीकृष्णम् शुभ प्रंभातम्, 
करूं श्री हरि हर का वंदन
ंतन-मन-जग को निर्मल करदो
प्रभु ऐसी ही शुभ जग में कर दो
मिटे रागद्वेष, घृणा, अज्ञानता जग से
शोषण, रोग मुक्त हो जड़ चेतन
रहे न दीनहीन, असहाय इस जग में
मिटे जाति,क्षेत्र, रंग, लिंग व धर्म भेद
ऐसी प्रखर नव प्रभात जग में कर दो
तन मन को प्रभु आलौकित कर दो।।

ंदेवसिंह रावत (29 अक्टूबर 2011 प्रात 7.48 बजे)

Wednesday, October 26, 2011

सार्वजनिक व सामाजिक कार्यक्रमों में शराब पिलाने वालों का होगा सामाजिक बहिष्कार


-सार्वजनिक व सामाजिक  कार्यक्रमों में शराब पिलाने वालों का होगा सामाजिक बहिष्कार/
-दरमोला गांव से प्रेरणा लें समाज/
शराब व भ्रष्टाचार में तबाह हो रहे गंगा यमुना के इस उदगमी प्रदेश को बचाने के लिए अब समाज में धीरे धीरे   जागरूकता आ रही  है। यहां शराब ने समाज को अपने आगोश में लेकर उसका बर्बाद सा कर दिया है । शर्मनाक बात यह है  कि देवभूमि समझी जाने वाली  इस प्रदेश में विवाह, सगाई, मुंडन, नामकरण, होली, दीपावली, रामलीला, पांडवलीला सहित किसी भी सार्वजनिक समारोह में ही  नहीं मृतक  श्राद्व व अंतिम संस्कार में भी शराब परोसने का चलन बढ़ने से यहां के जागरूक लोग काफी चिंतित है।  कई प्रबुद्व लोग अपने स्तर पर  इसे रोकने का प्रयास कर रहे है। ऐसा ही सराहनीय प्रयास जनपद रुद्रप्रयाग में भरदार गांव में किया गया। यहां के ग्रामीणों ने एक स्वर में प्रस्ताव पारित किया कि विवाह, सगाई, मुंडन, नामकरण, होली, दीपावली, रामलीला, पांडवलीला सहित किसी भी सार्वजनिक समारोह या समारोह आयोजित करने वाले परिवार द्वारा शराब नहीं परोसी जाएगी यदि इस प्रस्ताव का गांव के किसी परिवार या उसके किसी भी सदस्य ने उल्लंघन किया तो उस पर कठोर कार्रवाई की जाएगी और पंचायत की सहायता से उस परिवार या व्यक्ति का सामाजिक बहिष्कार किया जा सकता है। इस सप्ताह विकासखंड जखोली की पश्चिमी भरदार के अंतर्गत ग्राम दरमोला की कप्रवाण समिति दरमोला की बैठक में  पारित एक महत्वपूर्ण प्रस्ताव में ऐलान किया कि  आगामी विधानसभा चुनाव में प्रत्याशियों द्वारा वोट के लिए शराब पिलाये जाने पर विरोध किये जाने का निर्णय लिया गया। ग्रामीणों ने कहा कि गांव में आयोजित समारोहों और विधानसभा चुनाव में भोली-भाली जनता को शराब के लालच में वोट खरीदने वाले प्रत्याशियों का विरोध कर उन्हें गांव में घुसने नहीं दिया जाएगा। उन्होेंने कहा कि पांच सालों में ग्रामीणों की समस्याओं को दरकिनार कर चुनाव के दौरान उन्हें शराब व रुपये देकर उन्हें बेवकूफ बनाया जाता है । इसके साथ समारोह में कोई भी ग्रामीण शराब पीकर नहीं आएगा और यदि कोई ऐसा पाया गया तो उस पर अर्थदंड वसूला जाएगा। गौरतलब है कि इस गांव में ही नहीं अपितु प्रदेश के अधिकांश गांवों में शराब का सेवन से आये दिन हो रहे झगड़े, गाली-गलोच से महिलाओं एवं बच्चों पर बुरा असर पड़ रहा है। युवा पीढ़ी भी इसका सेवन कर बर्बाद होती जा रही है। ंप्रदेश  में शराब बंदी  के लिए महिला मंगल दलों ने कमर कसी हुई है। जहां सरकार अपने सामाजिक दायित्व से मुंह मोड़ कर दूर  दराज के क्षेत्रों में पानी, बिजली या स्वास्थ्य सेवायें उपलब्ध कराने के बजाय शराब  की दुकाने खोलने का समाज विरोधी कृत्य कर रही है  वही प्रदेश में महिला मंच,  महिला मंगल दल सहित चंद संगठन ही शराब से तबाह हो  रहे इस प्रदेश को बचाने के लिए कमर कसे हुए है।   नहीं तो देखने में यह आ रहा है कि समाज सेवा के नाम  पर हो रहे अधिकांश  सामाजिक ,धार्मिक व सांस्कृतिक कार्यक्रमों के आयोजक ही जनता को सही दिशा देने के बजाय खुद  ही शराब खोरी में लिप्त रहते  है। इन सामाजिक संगठनों का मानसिक पतन इतना  शर्मनाक है कि  ऐसे आयोजनों ंमें वे खुल कर खुले रूप से शराब परोसने व पिलाने में अपनी शान समझते है। वे भूल जाते है कि उनके  इस कृकृत्य या अपनी झूठी  शान  को दिखाने के दंभ की कीमत पूरे समाज व प्रदेश को कितनी चूकानी पड़ती है। इस प्रकार के कृत्य करने वाले लोग समाज के विरोधी ही नहीं आनी वाली  पीड़ियों को पथभ्रष्ट करने  के  अपराधी  भी है। समाज को दिशा देने के लिए स्कूल के गुरूओं के साथ समाजसेवियों, राजनेताओं के साथ पुजारियों का महत्वपूर्ण ंभूमिका  हो सकती है। इन्हीं के  शराबी होने या मूक होने  पर समाज पतन के गर्त में निरंतर गिर रहा है।

सबके दामन खुसियों से भर दे



जगमग जगमग दीप जले,
जग सारा खुशियों से दमके
आपके जीवन उपवन में भी
दीपावली बसंत सी चमकेे।
मेरे मनमंदिर के श्रीकृष्ण 
सबके दामन खुसियों से भर दे।।
-देवंिसंह रावत

Monday, October 24, 2011

-कुम्भ आयोजन में ंनिशंक ने मांगा नोबल पुरस्कार मिलेगी जेल!


-कुम्भ आयोजन में ंनिशंक ने मांगा नोबल पुरस्कार मिलेगी जेल!/
-कोश्यारी के बजाय निशंक को म ुख्यमंत्री बनाने वाले खंडूडी, भाजपा अ ाला नेता व संघ जिम्मेदार इस कलंक के  िलए/
  मेने र्कइ  बार इसी समाचार पत्र में दो टूक शब्दों में लिखा था कि भगवान बदरीनाथ अंधे नही ं ह ै। वो हर  दोषी जो देवभूमि उत्तराखण्ड को अपने नापाक कृत्यों से शर्मसार  करने का नापाक कृत्य करता है उसे भगवान बदरीनाथ कभी  माफ नहीं  करते। उसको हर हाल में दण्ड  िमलता है । इसका ताजा उदाह रण  है  कुम्भ घोटाला।   आखिरकार भाजपा आला नेतृत्व क े अ ांखों के तारे  भाजपा के केन्द्रीय उपाध्यक्ष पूर्व मुख्यमंत्री रमेश पोखरियाल  िनशंक क े खिलाफ 2010 में हरि द्वार  म ें  हुए उसी   िवश्व  िवख्यात कुम्भ आयोजन ंके मामले में भ्रष्टाचार करने के मामले में ंअदालत में 200 करोड़ का भ्रष्टाचार  के आरोपी के रूप में मामला द र्ज कर  िदया गया,  िजस कुम्भ के आयोजन के सफल अ ायोजन क े नाम पर निशंक व उनके प्यादे  निशंक कोे  नोबेल पुरस्कार देने की बचकाना मांग कर ंजगहंसाईं क े पात्र  बने हुए हैं। 
देहरादून की अदालत में ं2010 मेें ंआसीन रहे भाजपा के मुख्यमंत्री  िनशंक ंके कार्यकाल में सम्पन्न  ह ुए इस कुम्भ के आयोजन मेें जिस प्रकार से भारी अनिमियता यें हुए उस पर केग ने भ ी प्रद ेश सरकार को कटघरे में खड़ा  िकया था, उसी   को आध ार  बना कर ंअग्रणी अ िधवक् ता जे डी  जै न ने निशंक व  वर्तमान  पर्यटनमंत्री  मदन को िशक   सहित  13 लोगों को अ ारोप ी ब नंा कर मामला  देहरादून की  सीजीएम कोर्ट में दर्ज   िकया गया। 
इस ंप्रकरण पर मामला द र्ज कराने की याचिका पर जैसे ही प्रदेश क ेलोकपाल ने अपनी स्वीकृति प्रदान की तो ंप्रदेश के भाजपा नेताओं के ही  नही ं भाज पा व संघ के आला नेताअ ों के चेह रे से  हर्वाइ या उतर गयी। सवाल यह है  कि इस मामले में गुनाहगार केवल निशंक उसके 12 साथी  हैं जिनका नाम या िचका में है या अ न्य कोई। मेरा  तो साफ मानना ह ै कि निशंक  क्या है ं उसके बारे में पूरा उत्तराखण्ड का बच्चा जानता  है। अदालतें या मीडिया क् या क हती या समझती  है परन्तु प्रदेश की जनता जिसने 50  साल से निशंक सहित ंसभी  नेताओं का उदय से लेकर पराभव ही यह यात्रा द ेखी तो उसी म ालुम  है  िक  इनका असली चरित्र  क्या  है।  असली दोेषी  तो वे हैं जो अपनी संकीर्ण स्वार्थों व कुण्ठाअ ों के खातिर अच्दे लोगों का  विरोध करके संवेधानिक  पदा ें पर ऐसे भ्रष्ट प्यादों को आसीन करते है। निशंक प्रकरण पर वे लोग  िजम्मेदार है जिन्होंने निशंक को मुख्यमंत्री से लेकर  राष्ट्रीय उपाध्यक्ष तक बनाया। आखिर आज प्रदेश केे म ुख्यमंत्री खंडूडी,  संघ प्रमुख व भाजपा आला नेतृत्व किस मुंह से उत्तराखण्ड क ी जनता के समक्ष  खड े  ह ोगे?  आज  इ स शर्मसार प्रकरण के लिए निशंक से अधिक वे लोग जिम् मेदार  ह ै जिन्ह ोंने संघ समर्पि त व िरष्ठ  पाक छवि के नेता भगत िसंह कोश्यारी  को  िवधायकों के पुरजोर समर्थ न के बाबजूद खंडूडी व उनके प्यार े निश ंक को प्रदेश की सत्ता पर आसीन कराया । क्यों केवल जातिवाद व क्षेत्रवाद के कारण अच्छे  व्यक्तियों के ब जाय ऐसे बेनकाब रहे मोहरों को संवैधा िनक प द ों पर आसीन किया जायेगा  तो  उसका परिण ाम  ऐसे ही शर्मसार करने वाला होगा। कोश्यारी जि नको जनता व अ िधकांश विधायकों का समर्थन   हासिल था उनको जबरन वनवास देकर खंडूडी  निशंक को प्रदेश की सत्ता में  आसीन करने वाले आज सबसे बडे गुनाह गार हैं।   
हालांकि  स्ट िर्जंया, जल  िवधुत परियोजना आदि  घोटालों में  निश ंक सरकार  पह लेे ह ी घोटाला ें में ंपूरी तरह लिप्त  हो गयी थी,  का ेर्ट में बेनकाब  भी हुए ंकिसी  प्रका र से निशंक  अपने कौशल से बच निकले परन्तु कहते है दुनिया की अदालत  से भले ही पाक  साफ  बरी ह ो जायें परन्तु उपर वाले की  अदालत से बरी  नहीं ह ो स कते ह ै ?
गुनाहगार क ेवल निशंक ह ी नहीं अपितु वे ला ेग हैं  जो उनके गुनाहों पर पर्दा डाल क र उनको संवेधा िनक पद ों पर अ ासीन करा ते रहे। खंडूडी गुनाहग ार है ं, जिन्होंने जा नते ह ुए भी उनको मुख्यमंत्री  ब नाने में अपनी पूरी ताकत लगा कर कोश्यार ी  का  रास्ता रोका। गुनाहगार आडवाणी व भाजपा अ ध्यक्ष गडकरी  है जिन्होंने ऐसे बेनकाब व्यक्ति को प्रदेश का मुख्यमंत्री बनाया। गुनाहगार संघ है  जो  म ूक र ह कर ऐसे कृत्य क ो करके भार तीय संस्कृति की उदगम स्थली  को रौंदते रह े। 
अगर  आज निशंक पर केस दर्ज हुआ तो गुनाहगा र  केवल वह ही नहीं अपितु वे सभी नेता हैं जिन्होंने को श्यारी  क ी राह रोक  कर  िनशंक, मदन  कौशिक  जेसे नेताअ ों क ो प्रदे श  की छाती में म ूंग दलने की इजाजत दी। इसके   बाबजूद क्या सोच कर निशंक को राष्ट्रीय उ पाध्यक्ष बना कर भाजपा के सुशासन के चेहरे क ो पूरी  तरह से ब ेनकाब किया गया। क्या जातिवाद व भ्रष्टाचार भाजपा के सुशासन क ा प्र ितक  है?  अगर आज राज्यपाल निशंक पर मामला द र्ज करने की इजाजत नहीं द ेता तो क्या  प्रद ेश भाजपा सरकार   से यह अ ाश क ी जा सक ती कि  वे निशंक पर कैस करने क ी इ जाजत भी देते? कभ् ाी  नही ं जो ंइ तने भ्रष्टाचारों के बाब जूद  निशंक को राष्ट्रीय उपाध्यक्ष ब नाये उस भाजपा से क्या आशा क ी जा  सकती। 
 निशंक को चाह े अद ालत दोषी माने या न माने, यह बाद का  िवषय है परन्तु इस प्रकरण से एक बात साफ हो गयी  कि भाजपा क ा भ्रष्टाचार विरोध अपने अ ाप में कांग्रेस की   तरह ही  दिखावा  है अ सल में ंयहां भी भ्रष्टाचा िर यों को संरक्षण व महत्वपूर्ण प दों पर  अ ासीन  िकया जाता है।  परन्तु महाकाल किसी भी अपराधी को माफ नहीं करता। उसने राव, मुलायम, तिवारी, खंडूडी  के बाद निशंक को भी  मिला दण्ड इ स बात गवाह ह ै। 
आओ उत्तराखण्ड बचाओ
खंडूडी, निशंक ंहो या तिवारी
उत्तराखण्डी की जनता इनकी मारी,
जातिवाद व क्षेत्रवाद  ये लाये,
भ्रष्टाचार से ये उत्तराखण्ड  रूलाये।
इनको दिखाओ बाहर  के द्वारे
नहीं तो  चोपट  कर देंगे देवभूमि प्यारी।
मुजफरनगर के जख्म हमे रूलाते
गैरसैंण के लिए शहीद, हमे पुकारें
उठो जागो मेरे उत्तराखण्डी वीरो
इन सत्तालोलुपुओं से 
जन्मभूमि को बचालो।।
 -देवसिंह  रावत (22.10.2011) 


  शेष श्री कृष्ण कृपा। ह िर आंेम तत्सत्। श्रीकृष्णाय् नमों। 

Saturday, October 22, 2011

-न्यायालय के दो टूक फेसले के बाद गढ़वाल हितैषिणी के शीघ्र होंगे चुनाव


-न्यायालय के दो टूक फेसले के बाद गढ़वाल हितैषिणी के शीघ्र होंगे चुनाव
नई दिल्ली(प्याउ)। निहित स्वार्थ में डूबे नेतृत्व व गुटों के कारण समाज को केसे शर्मसार होना पडता है इसका प्रत्यक्ष उदाहरण है दिल्ली में उ़त्तराखण्डियों की सबसे पुरानी संस्था गढवाल हितेषिणी सभा । 1932 से करांची होते हुए दिल्ली में संचालित इस प्रतिष्ठित संस्था को लोग गढ़वाल भवन के नाम से जानते है। उत्तराखण्ड के महान मनीषियों व समाज के चिंतकों द्वारा आजादी के समय दिल्ली में जो प्रतिष्ठा इस संस्था को बना कर अर्जित की थी वह प्रतिष्ठिा आज के दिन इस संस्था के कर्णधारों ने अपने अहं व संकीर्ण कार्यो के कारण इस पर बाहरी लोगों का कब्जा करा कर व इस संस्था के आपसी विवाद को कोर्ट कचहरी में ले जाकर पानी ही फेर दिया है। मात्र अपने वर्चस्व व सदस्यता के नाम पर उठे इस विवाद के कारण संस्था को महिनों तक कोर्ट कचहरी के विवाद में उलझ कर लाखों रूपये का जहां आर्थिक भार उठाना पडा वहीं संस्था के भवन में बाहरी व्यक्ति का कब्जा, समाज की प्रतिष्ठा को रौंदा जा रहा है। कोर्ट द्वारा यहां के विवाद को देखते हुए जहां प्रशासक की नियुक्ति हुई वहीं कोर्ट ने सदस्यता के विवाद पर जो फेसला दिया वह विवाद के पहले ही दोर में सुलझा लिया जा सकता था, परन्तु चंद व्यक्तियों की नाक के कारण यह संस्था लम्बे समय तक लोकशाही से वंचित रही अपितु संस्था को लाखों रूपये का आर्थिक भार भी उठाना पडा। इसके साथ संस्था अपने गठित उदेश्य के प्रति काम करने से वंचित रही। 
कोर्ट के फेसले के बाद अब प्रशासक श्री नेगी द्वारा नवम्बर माह में गढवाल हितेषिणी सभा की आम बैठक बुलाई जा रही है। पुराने 2200 के करीब सदस्यों के अलावा इतने से अधिक नये सदस्यों के कारण इस सभा में करीब साढे चार हजार के लगभग सदस्यों के लिए आम सभा के आयोजन करना एक प्रकार से प्रशासक श्री नेगी के लिए एक चुनौती से कम नहीं है। इस आम सभा की बैठक के बाद सभा की नयी कार्यकारणी के गठन के लिए राह साफ हो सकेगी।  

एनजीओे व मीडिया क ो सम्मलित करने वाला अण्णा से मजबूत लोकपाल बाये सरकार


एनजीओे व मीडिया  क ो सम्मलित करने वाला अण्णा से मजबूत लोकपाल बाये सरकार
नई दिल्ली (ंप्याउ)। भ्रश्टाचार पर अंकुल लाने के लिए सरकार जिस लोकपाल को संवैधानिक दर्जा देने की  हवा  फेला रही है अगर  उसमें  जरा सी  भी सच्चाई  व ईमानदारी है तो  सरकार को आगामी  सत्र में इसको संवेधानिक  दर्जा  देते हुए पारित  करना चाहिए। इसके साथ अण्णा द्वारा सुझाये गये जनलोेकपाल से अधिक  सषक्त लोकपाल बनाना चाहिए, जिसमें देष में भ्रश्टाचार का  प्रतीक बने एनजीओ व मीडिया जिन पर ंअण्णा भी मुंह  खोलने का साहस तक नहीं जुटा पा रहे  है , उनको  भी इसके  दायरे में लाना चाहिए। हालांकि सरकारी तंत्र में काबिज एजीओ की  मजबूत लोबी  इसका पुरजोर विरोध कर रही है । इसी कारण सरकारी लोकपाल  में भी एनजीओ व मीडिया को ंअण्णा के आधे अधूरे जनलोकपाल की तरह  बाहर ही रखा गया है । सुत्रों के  अनुसार सरकार संसद की एक स्थायी समिति इस संबंध में एक मसौदा विधेयक पर विचार कर रही है, जिसमें एक प्रावधान के तहत राज्यों का अनुमोदन जरूरी नहीं होगा। संवैधानिक संशोधन विधेयक का मसौदा भारत के दो प्रधान न्यायाधीशों न्यायमूर्ति जे एस वर्मा और न्यायमूर्ति एम एन वेंकटचलैया ने तैयार किया है, जिसमें निर्वाचन आयोग की तर्ज पर प्रस्तावित प्रावधान हैं। संविधान (116वां) संशोधन विधेयक का प्रारूप विधि एवं न्याय तथा कार्मिक विभाग की स्थायी संसदीय समिति को पिछले सप्ताह दोनों पूर्व प्रधान न्यायाधीशों ने सौंपा। मसौदे के प्रावधान चुनाव आयोग की तर्ज पर तैयार किए गए हैं। सरकार इसको जल्द ही  आगामी  सत्र में संसद में पारित  कर अण्णा के अपंग जनलोकपाल से मजबूत लोकपाल बनाकर भ्रश्टाचार पर  अंकुष  लगाये।  

हीरासिंह राणा के मदमस्त गीत ‘ंमेरी नोली पराणा’ से सजी दिवाली मिलन समारोह


हीरासिंह राणा के मदमस्त  गीत ‘ंमेरी नोली पराणा’ से सजी दिवाली मिलन  समारोह
नई दिल्ली(प्याउ)। उत्तराखण्ड  समाज के अग्रणी लोकगायक हीरासिंह राणा ने जैसे  ही ‘मेरी नोली पराणा’ का अपना सुप्रसिद्व मदमस्त गीत गाया, तो उसने स्वरों में स्वर मिलाते हुए ‘दिल्ली के न्यू अशोक नगर में ‘डीपीएमआई’ में आयोजित उत्तराखण्डी दिवाली मिलन समारोह  में पधारे समाज के अग्रणी लोग भी झूमने के लिए मजबूर हो गये। शनिवार 22 अक्टॅूबर की देर रात तक चली इस समारोह का आयोजन दिल्ली में उत्तराखण्डी समाज में तेजी से उभरते हुए समाजसेवी व ‘दिल्ली पेरामेडिकल एण्ड मनेजमेंट इस्टीटयूट’ के प्रबंध निदेशक डा. विनोद बछेती ने समारंोह में पधारे सभी अतिथियों का हार्दिक  स्वागत किया। समारोह में अल्मोड़ा पिथोरागढ़ के सांसद प्रदीप टम्टा, उत्तराखण्ड  लोक सेवा आयोग के प्रथम अध्यक्ष पूर्व आईएएस अधिकारी श्रीकृष्ण आर्य, भारत सरकार के  विदेश व्यापार सेवा के सेवानिवृत उच्चाधिकारी, प्यारा उत्तराखण्ड समाचार पत्र केे प्रबंध सम्पादक व अग्रणी  समाजसेवी महेश चन्द्रा, अग्रणी  गीतकार  हीरासिंह राणा, दिल्ली  प्रदेश कांग्रेस के नेता दिवान सिंह नयाल, दिल्ली प्रदेश कांग्रेस के सचिव हरिपाल रावत, उत्तराखण्ड  पत्रकार परिषद के अध्यक्ष देवेन्द्र  उपाध्याय, सचिव कैलाश धूलिया, उत्तराखण्ड आंदोलन के अग्रणी संगठन ‘उत्तराखण्ड  जनता संघर्ष मोर्चा के अध्यक्ष देवसिंह रावत, महासचिव जगदीश भट्ट, पत्रकार  व्योमेश जुगरान, चारू तिवारी, नीरज जोशी, वेद भदोला, रामप्रसाद ध्यानी, सतेन्द्र रावत, नन्दन बोरा, कांग्रेसी नेता बृजमोहन उप्रेती, म्यर उत्तराखण्ड के अध्यक्ष मोहन बिष्ट व महासचिव सुदर्शन रावत,  अभाउ महासभा के दिल्ली प्रदेश अध्यक्ष जयसिंह रावत व शिव प्रसाद मुण्डेपी, नोयडा से योगेन्द्र मंमगाई व भगवती प्रसाद रतूड़ी, गढ़वाल  हितैषिणी सभा के कार्यवाहक अध्यक्ष  मदन मोहन बुडाकोटी, उदय राम ढौडियाल,  ंएडवोकेट संदीप शर्मा, व्यवसायी डीएस रावत, हेमंत पसबोला सहित अनैक प्रतिष्ठित समाजसेवी उपस्थित थे। डीपीएमआई की तरफ से स्वागत समिति में वरिष्ट  समाजसेवी व पत्रकार अनिल पंत, डीपीएमआई के समाचार पत्र मेडिकोज टाइम्स के सम्पादक  इन्द्रचंद रजवार सहित अनैक सम्मानित पदाधिकारी जुटे हुए थे। 

Friday, October 21, 2011

मनमोहन ने निकला देश का दिवाला



भ्रष्टाचार, मंहगाई और कुशासन  से 
जिसने निकाला  देश का दिवाला
उस अमेरिका के प्रिय मनमोहन से
अब देश को बचायेगा उपर वाला
कुशासन से छीना जिसने मुंह से निवाला
उस सोनिया भक्त मनमोहन से 
बचाये मेरे भारत को उपर वाला
मरणासन भारत की जनता देख 
कैसे दूू आप सबको बधाई
मनमोहन रूपि इस त्रासदी से 
बचे मेरे सभी प्रिय देशवासी।।
 -देवसिंह रावत-(22.10.2011)

आओ उत्तराखण्ड बचाओ


आओ उत्तराखण्ड बचाओखंडूडी, निशंक ंहो या तिवारी
उत्तराखण्डी की जनता इनकी मारी,
जातिवाद व क्षेत्रवाद ये लाये,
भ्रष्टाचार से ये उत्तराखण्ड रूलाये।
इनको दिखाओ बाहर के द्वारे
नहीं तो चोपट कर देंगे देवभूमि प्यारी।
मुजफरनगर के जख्म हमे रूलाते
गैरसैंण के लिए शहीद, हमे पुकारें
उठो जागो मेरे उत्तराखण्डी वीरो
इन सत्तालोलुपुओं से
जन्मभूमि को बचालो।।
-देवसिंह रावत


Thursday, October 20, 2011

हे जगदीश मेरे श्रीकृष्ण


निज स्वर बंधन में  बांध कर तुमने
की अदभूत सृष्टि की रचना 
हे जगदीश  मेरे श्रीकृष्ण
कैसी सुन्दर तुम्हारी मनमोहक प्रकृति

इंसानों की नहीं बुतों की हो गयी है ये दुनिया


बहुत गहरे जख्म है सीने पर दुनिया के,
जालिम के जुल्म से छलनी हुआ सीना
पर क्या कहूंॅ आपसे मेरे हमदम
एक उफ तक किसी के सीने से नहीं निकली
लगता है ये बस्ती भी खुदगर्जो की
इंसानों की नहीं बुतों की हो गयी है ये दुनिया ।

गद्दाफी की शहादत से फिर उजागर हुई संयुक्त राष्ट्र संघ व विश्व समुदाय की नपुंसकता


 -सद्दाम के बाद गद्दाफी भी हुआ आततायी अमेरिका के हमले में शहीद/
 -अकूत तेल सम्पदा को   कब्जाने के लिए किया अमेरिका ने सद्दाम व गद्दाफी का सफाया/
-गद्दाफी  की शहादत से फिर उजागर हुई संयुक्त राष्ट्र संघ व विश्व समुदाय की नपुंसकता /


तेल के अकूत भण्डारों को कब्जाने की अमेरिका व उसके आततायी मित्र देशों के हमले में इराक के स्वाभिमानी शासक सद्दाम हुसैन के बाद उत्तर अफ्रीका के अग्रणी देश लीबिया के प्रमुख कर्नल गद्दाफी भी अमेरिकी प्यादों के हमले में 20 अक्टूबर 2011 को 69 वर्ष की उम्र में जाबांजों की तरह आततायिों का मुकाबला करते हुए शहीद हो गये। दोनों का कसूर केवल यही था कि उन्होने अमेरिका ंको अपने देश  के अकूत तेल संसाधनों पर कब्जाने की इजाजत नहीं दी और अमेरिका के आतंक के आगे विश्व के अन्य देशों के हुक्मरानों की तरह सर झुकाने के बजाय जंगे मैदान में शहादत दे कर वीर गति हासिल की ।  7 जून 1942 में लीबिया के ंजिस सिर्ते शहर में मुअम्मर गद्दाफी ने जन्म लिया उसी में लीबिया के स्वाभिमान की रक्षा के लिए अपने प्राणों की शहादत भी दी।  सन् 1969 में हुई  लीबिया की क्रांति में सत्तासीन होने के बाद मुअम्मर गंद्दाफी पूर े विश्व में अपने प्रखर नेतृत्व के कारण कर्नल गद्दाफी के नाम से विख्यात हुए। कर्नल गद्दाफी ने 1969  से 2011 तक अपने 41 सालों के शासन में अमेरिका व उसके मित्र राष्ट्रों की लीबिया के संसाधनों पर कुण्डली मारने के हर नापाक कोशिश का मुहतोड़  जवाब देते हुए लीबिया को एक मजबूत राष्ट्र बनाया। कर्नल गद्दाफी ने ंदेश मे भले ही तानाशाही चलायी पर अमेरिका के सह पर चलाये जा रहे तमाम अभियानों को रौंदा। परन्तु वे फरवरी 2011 से हुए इस विद्रोह में जिसमें अमेरिका व उसके मित्र राष्ट्रों ने लीबिया में भारी बमबारी  कर वहां के शासक गद्दाफी को हटाने के लिए हजारों जनता का खात्मा किया। चारों तरफ से घिर जाने के बाबजूद कर्नल गद्दाफी ने  एक स्वाभिमानी वीर सैनिक की तरह जंग में शहीद हुए न की कायरों की तरह आत्मसम्र्पण किया। हो सकता  है कि अपने शासनकाल के दौरान अलौकतांत्रिक शासन के दौरान कुछ ज्यादतियां हो गयी  हो परन्तु उसका मुख्य उदेश्य अमेरिका के शिकंजे में जाने से अपने देश को बचाना था । कर्नल गद्दाफी चाहे लोकशाही के जमाने में एक तानाशाह हों परन्तु अमेरिकी सम्राज्यवाद  से उन्होंने लीबिया के संसाधनों व सम्मान की रक्षा की उसके लिए भविष्य के जांबाज स्वाभिमानी शासकों की तरह उन्हें याद किया जायेगा। 
जहां तक अमेरिका व उसके प्यादे नाटों के सह पर लीबिया में लोकशाही लाने के नाम पर जो तबाही मचाई गयी, उसके लिए इराक प्रकरण की तरह न केवल संयुक्त राष्ट्र  संघ  व विश्व के अन्य देशों के  हुक्मरानों  की अमेरिका व उसकी चैकड़ी के इन अत्याचारों के आगे नपुंसकता ही विश्व इतिहास को शर्मसार करती अपितु विश्व लोकशाही पर ग्रहण भी लगाती है। अमेरिका व उसके प्यादे जो इराक व लीबिया  में हमला करके बलात तख्ता पलट करते वे क्यों फिलिस्तीन व सीरिया,  सउदी अरब  सहित अन्य देशों में वहां के जनमत का सम्मान करने के लिए ठीक इसी प्रकार की कार्यवाही क्यों नहीं करते। अमेरिका ने दशकों तक पाकिस्तान की लोकशाही को अपने सैनिक तानाशाह प्यादों से कुचलाया। क्यों इस्राइल की तानाशाही को संरक्षण दे कर अमेरिका व उसंके प्यादे फिलिस्तीन को स्वतंत्र देश कीं मान्यता नहीं दे रहे हैं?  सद्दाम के बाद कर्नल गद्दाफी की शहादत जहां अमेरिका के लोकशाही समर्थक मुखोटे को बेनकाब करती है वहीं वह संयुक्त राष्ट्र संघ, रूस, चीन व भारत सहित पूरे विश्व समुदाय की  नपुंसकता को धिक्कार रही  है। जहां तक अमेरिका ने पूरे विश्व की शांति को रौंदने के लिए अलकायदा, ओसमा व तालिबान ही नहीं अपितु पाक जैसे अनैक आतंकी  संगठन व देश तैयार किये हैं, अब वह उनके नाम पर विश्व आतंकवाद से मुक्ति के नाम पर पूरे विश्व में अपना आतंकी सम्राज्य स्थापित कर रहा है। जो उसको चुनौती दे रहा है उसको सद्दाम व गद्दाफंी की तरह मौत की नींद बलात सुला दे रहा है। विश्व के अग्रणी राजनैतिक समीक्षक ब्ीतपेजवचीमत ठवससलद ने दो टूक  शब्दो में अमेरिका द्वारा लीबिया वालों को लोकशाही व गद्दाफी के तानाशाही के  विरोध के  नाम पर तबाह  किये गये लीबिया के चहुमुखी विकास की कहानी व विश्व में अन्य देशों की स्थिति से आज भी लीबिया के वे लांेग अनजान   हैं जो लीबियों में आज  जश्न मना रहे है। उनके द्वारा भेजे  गये मेल संदेश में बताया  गया कि आज लीबिया में सभी नागरिकों बिजली निंशुल्क मिलती है। वहां ब्याज रहित लोन मिलता है। ंप्रतेक  नवविवाहित दम्पति को  60 हजार दीनार यानी 50 हजार डालर घर खरीदने के लिए प्रदान किया जाता रहा। लीबिया में शिक्षा ही नहीं चिकित्सा भी निशुल्क दी जाती है । यदि किसी को लीबिया में उचित मेडिकल या पढाई के  लिए विदेश में  जांने की आवश्यकता होती ंहै तो उसका खर्चा  सरकार बहन करता है। इसके साथ उसे 2300  अमेरिकी डालर  प्रतिमाह  मकान व वाहन व्यय का भी प्रदान किया जाता है। गदाफी के शासन से पहले जहां लीबिया में शिक्षा का प्रसार केवल 25 प्रतिशत था वहीं गदाफी के  राज में 83 प्रतिशत लोग शिक्षित हैं। लीबिया के 2 5 प्रतिशत लोग स्नातक है। जो लीबिया में खेती को अपनी आजीविका ंशुरू करना चाहता उसे  जमीन, फार्म हाउस, यंत्र  आ िद निशुल्क प्रदान किया जाता। यदि लीबिया वाला कोई कार लेना  चाहता है कि सरकार उसे 50 अनुदान देती है साथ में लीबिया में पेटोल 0 . 14 डालर है। जहां अमेरिका सहित विश्व के  तमाम देशों पर  भारी विदेशी कर्ज है वहीं लीबिया पर कोई कर्ज तक  नहीं है। वहीं उसके पास 150 बिलियन डालर रिजर्व है। गदाफी ने लीबिया में पानी की कमी  को दूर करने के लिए विश्व में महत्वपूर्ण 27 बिलियन डालर किमत की  मनुष्य निर्मित नदी से  न केवल रेगिस्तान वाले  सूखे लीबिया को हरा भरा व सम्पन्न बनाया अपितु पूरे विश्व में एक  कीर्तिमान भी स्थापित किया। लीबिया में कोई  स्नातक शिक्षा ग्रहण करने के बाद  रोजगार  नही प्राप्त कर पाता तो उसे उसके स्तर का रोजगार न  मिलने तक ओसत वेतन सरकार  द्वारा दी जाती है।  लीबिया में एक निश्चित ंअंश (तेल बेचने से मिली  राशि का)  हर नागरिक के खाते में स्वतः ही जमा हो जाते। नवजात शिशु भी जन्म लेते ही  भारतीय मुद्रा के अनुसार 2.5 लाख यानी 5000ं डालर उसकी माता के खाते मे ं जमा हो जाती  है ।  लीबिया में 40 पीस वाली ब्रेड की कीमत 0 .15 डालर है। यानी भारत से कई गुना सस्ती। लीबिया को तेल भण्डारों पर गदाफी ने अमेरिका सहित तमाम विदेशी कम्पनियों का अपना शिकंजो नहीं कसने दिया, इसी कारण गदाफी  को वर्षो  से निरंतर हटाने का प्रयत्न किया  जाता  रहा। गदाफी  लोकशाही का स्थापित करना चाहते थे परन्तु लोकशाही के नाम पर  अमेरिकी दलालों जो ंलीबिया के  ंस्वाभिमान को व संसाधनों को अमेरिका के हाथों गिरवी रखने का षडयंत्र रच रहे थे  उनके हाथों में लीबिया सौंपने के 
लिए तैयार नही ं थे ।  इस बार ऐसे ही लोगों के साथ मिल कर अमेरिका व  नाटो ने गदाफी को मारने की सफलता हासिल की। अगर उपरोक्त बातें सच है तो ऐसे शासक को भारत के  लोग आजादी के 64 साल बाद भी  हासिल  नहीं कर  पाये। विश्व के किसी अन्य लोकतांत्रिक देश में क्या ऐसा किसी शासक ने किया। आज ंअमेरिका व संयुक्त राष्ट जो गदाफी की मौत को आजादी बता रहा है कि क्या अमेरिका के राष्टपति बुश ने जो कत्लेआम अफगानिस्तान व इराक में मचाया था क्या उनको  यह  सजा ंदेने का आवाहन तब इस विश्व संस्था ने क्यों नहीं की । क्यों ंपाक जो ंपूरे विश्व की  शांति को अमेरिका के शह  व संरक्षण में  तबाह कर रहा है  उस पर ऐसी कार्यवाही की गयी। क्यों चींन को ंतिब्बत पर कब्जा जमाने पर ऐसी कार्यवाही क्यों नहीं की गयी। इराक के बाद लीबिया पर हुई कार्यवाही अमेरिका व उसके प्यादों द्वारा वहां के ंतेल संसाधनों पर कब्जा जमाने व अपने ंविरोधी को सबक सिखाने के अलावा कुछ  भी नहीं है। नहीं इस कार्यवाही का लोकशाही से कोई लेना देना नहीं  हे। कुछ  समय बाद जब आम लीबि या के लंोगों को पूरे विश्व के देशों की ंस्थित का पता चलेगा तो  उनको अपने कृत्य पर अवश्य पछतावा होगा । हो सकता है कि  अमेरिका के  षडयंत्रों से आशंकित गदाफी ने विरोधियों का दमन किया हो परन्तु  उसके दिल में लीबिया के स्वाभिमान व विकास के लिए जो जब्जा व समर्पण था वह ंविश्व के अन्य शासकों में दूर तक नहीं दिखायी देता। एक महान योद्वा व जन विकास के लिए समर्पित गदाफी की शहादत को सादर  नमन् करते हुए मैं यह लेख श्रीकृष्ण चरणों में समर्पित करता  हॅू। 
 शेष श्रीकृष्ण कृपा। हरि ओम तत्सत्। श्रीकृष्णाय् नमो। 

Tuesday, October 18, 2011

-सुअर से बदतर निकले उत्तराखण्ड के हुक्मरान


-सुअर  से बदतर निकले उत्तराखण्ड के हुक्मरान
मैं 11 अक्टूबर से 16 अक्टूबर तक अपने गांव में था। देश के सीमान्त जनपद चमोली के दूरस्थ विकासखण्ड में स्थित मेरे गांव में इन दिनों कोदा, नट्टा, दलहन, धान की कटाई -मंडाई के साथ लोग गेंहॅंू की बुआई के लिए खेतों में हल लगा रहे है। यानी चारों तरफ काम ही काम, किसी को एक पल की फुर्सत तक नहीं। दो तीन दिन तक खेतों में काम करने पर मुझे ज्ञात हुआ कि यहां पर किसान परेशान है कि उनकी फसलों को जंगली सुअरों ने तबाह कर दी हैं । हालांकि बंदरों से भी लोग परेशान हैं परन्तु यहां ही नहीं पूरे प्रदेश में जंगली सुअरों के कारण किसान खून के आंसू बहाने के लिए विवश है। लोग इसकारण अपनी खेती छोड रहे है। खेत खलिहान व बाग बगीचे जंगली सुअरों ने बर्बाद कर दिये। लोगों की इस व्यथा का निदान करने वालो कोई नहीं। इससे मै भी परेशान रहा परन्तु उसी क्षण मुझे भी भान हुआ कि ये सुअर तो एक बार की फसल बर्बाद कर रहे हैं प्रदेश के हुक्मरान चाहे नेता हो या नौकरशाह ये तो प्रदेश का वर्तमान ही नहीं अपितु भविष्य भी तबाह कर रहे है। प्रदेश की जनता को उसी प्रकार संगठित हो कर इन भ्रष्ट नोकरशाहों व नेताओं को प्रदेश की सरजमी से दूर करने के लिए एकजूट होना चाहिए।  परन्तु मुझे यह लिखते हुए काफी कष्ट हो रहा है कि दुर्भाग्य से उत्तराखण्ड में एक भी ऐसा नेता नहीं है जो अपने संकीर्ण स़त्तालोलुपता व दलगत स्वार्थों से उपर उठ कर अपनी जन्मभूमि उत्तराखण्ड के हितों के लिए ईमानदारी से एक नेता की तरह जरूरत के समय जनता को दिशा दे सकने के लिए आगे आया हो। एक गहरी टीस मन में है कि काश उत्तराखण्ड में भी एक नेता होता। आप कहेंगे रावत जी क्या कह रहे हो? यहां तो देश के दूसरे भागों से अधिक बड़े नेता हैं। यहां तो नेताओं के अलावा दूसरा कोई हैं ही नहीं। नेतागिरी तो यहां की माटी में कण कण में भरी हुई है।कहने को उत्तराखण्ड में नेताओं की कमी नहीं हैं। यहां एक दो नहीं आध दर्जन से अधिक  अखिल भारतीय नेताओं की जमात है। देश के सबसे वरिष्ठ राजनेता नारायणदत्त तिवारी हैं, केन्द्रीय मंत्राी हरीश रावत हैं, विश्वविख्यात संत व राजनेता सांसद सतपाल महाराज हैं, भाजपा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष भगतसिंह कोष्यारी व  भुवनचंद खंडूडी हैं जैसे दिग्गज राष्ट्रीय नेता हैं। कहने को तो भाजपा के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष मुरली मनोहर जोशी भी उत्तराखण्डी मूल के नेता हैं परन्तु उनका केवल मुख्यमंत्राी के पद पर कोन आसीन हो इसमें हस्तक्षेप करने के अलावा किसी मामले में अपने आप को उत्तराखण्डी मामने को तैयार नहीं है। नेता तो दूसरे भी हैं जो प्रदेश में अपने आप के मुख्यमंत्री के सबसे बड़े दावेदार मानते हैं, इनमें वर्तमान मुख्यमंत्राी रमेश पोखरियाल निशंक, नेता प्रतिपक्ष डा. हरकसिंह रावत। इसके अलावा सांसदों, विधयकों व मंत्रियों तथा भूतपूर्वों की एक लम्बी जमात हें जो अपने आप को प्रदेश का सबसे वरिष्ठ व जमीनी नेता मानते हैं। भाजपा व कांग्रेस के नेताओं के अलावा कहने को यहां पर बसपा व उक्रांद के नेता हैं जो दल प्रदेश विधनसभा में अपनी उपस्थिति दर्ज करा रहे हें। बसपा में तो पूरे भारत में एक ही नेता होती हैं वह उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्राी सुश्री मायावती। बसपा के संस्थापक स्व. काशीराम के बाद अब बसपा में केवल एक ही व एकछत्रा नेता है। रही बात उक्रांद की उसमें काशीसिंह ऐरी व दिवाकर भट्ट हैं। जिनके कारण विरोध्ी दलों को कमजोर करने के बजाय अपने ही दल को विखराव करने का एक लम्बा इतिहास रहा।  परन्तु मैं तो यहां पर प्रदेश के विकास की बंदरबांट के लिए नेतागिरी करने वाले नेताओं की बात नहीं कह रहा हूॅ। मैं तो उत्तराखण्ड के हितों के लिए संघर्ष करने वाले नेता की बात कर रहा हॅू। अगर उत्तराखण्ड में एक भी नेता होता तो वह उत्तराखण्ड राज्य के आत्मसम्मान व भारत के माथे पर कलंक लगाने वाले ‘मुजफ्रपफरनगर काण्ड-94 के दोषियों को’ सीबीआई, मानवाधिकार आयोग व इलाहाबाद उच्च न्यायालय द्वारा दोषी ठहराने के बाबजूद 17 साल बाद भी सजा न होने पर इस तरह नकटों की तरह मूक नहीं रहते। इनमें जरा सा भी जमीर होता तो ये सामुहिक रूप से भारत के प्रधनमंत्राी से उसी प्रकार की पुरजोर गुहार करते जिस प्रकार 1984 के सिख विरोधी दंगों व गुजरात दंगों में कई बार जांच की जा रही है। ये मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्राी की तरह अगर सरकारें व न्यायालय नहीं सुनते तो अनशन करते। परन्तु करता कौन वह कांग्रेसी सरकार जिसके मुख्यमंत्राी नारायणदत्त तिवारी की सरकार में इस काण्ड के आरोपी को न्याय प्रक्रिया को ध्त्ता बता कर बरी करने का जघन्य कृत्य किया जाये या वह भाजपाई सरकार जिसके मुख्यमंत्राी खंडूडी के कार्यकाल में इस काण्ड के आरोपी को उत्तराखण्ड में लालकालीन बिछाने की धृठता की गयी हो। आरोपियों को दण्डित देना तो रहा दूर इस काण्ड के अभियुक्तों को शर्मनाक संरक्षण देने वालों को प्रदेश में महत्वपूर्ण पदों पर आसीन किया गया। कहां गयी इनकी गैरत? सबसे ज्यादा हैरानी व आश्चर्य यह है कि जिस काण्ड को इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने नाजी अत्याचारों के समकक्ष माना, जिस काण्ड के लिए इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने तत्कालीन केन्द्र की राव तथा उप्र की मुलायम सरकार को दोषी मानते हुए वहां के प्रशासन पर भारतीय संविधान व मानवता को गला घोंटने का अपराध्ी माना था, जिस काण्ड पर सीबीआई्र ने जिनको दोषी ठहराया था । उस काण्ड पर भाजपा सहित देश के तमाम संगठन घडियाली आंसू बहा रहे थे, आज उस मानवता व महिलाओं पर हुए इस निर्मम राज्य की संगठित बर्दी धरी गुण्डों के शर्मसार करने वाले अपराध् पर क्यों मूक हैं? आज इस काण्ड ने न केवल उत्तराखण्ड के नेताओं की अपितु देश की न्याय पालिका सहित पूरी व्यवस्था पर प्रश्न चिन्ह लगा दिया है। यह काण्ड आज भी ध्क्किार रहा है देश के हुक्मरानों को, यहां के तथाकथित मानवाध्किार के पुरोधओं को यहां के तथाकथित न्याय के पेरोकारों को। आज जिन लोगों को आरूषि हत्याकाण्ड दिखाई दे रहा है उन काठ के उल्लूओं को मुजफ्रपफरनगर काण्ड क्यों नहीं दिखाई दे रहा है इस बात का सबसे बड़ा अपफसोस है। निशंक सरकार से आशा ही करनी क्या? उनको तो प्रदेश का शर्मनाक दोहन करने के लिए उनके आकाओं ने जनभावनाओं को रौंद कर  मुख्यमंत्राी बना रखा है। उनको तो शायद ही इस आत्म सम्मान का जरा भी भान हो? अगर होता तो वे अपने पूर्ववर्ती मुख्यमंत्रियों तिवारी, कोश्यारी, स्वामी व खंडूडी की तरह इस मामले में नपुंसकों की तरह मौन नहीं रहते। इनमें जरा सी भी आत्मसम्मान होता तो वे अविलम्ब शिवराज चैहान की तरह अनशन करने का कदम उठाते? परन्तु यहां तो दुर्भाग्य यह है कि यहां पर किसे लगी है प्रदेश के हितों की इन सबको प्रदेश की सत्ता की बंदरबांट में खुद को चैध्री बनने की अंधी दौड का नायक बनना है। 
केवल मुजफ्रपफरनगर काण्ड ही नहीं अपितु यहां पर प्रदेश की स्थाई राजधनी ंिजसको प्रदेश की उस जागरूक जनता ने राज्य गठन आंदोलन के प्रारम्भ में ही गैरसैंण के रूप में स्वीकार कर दिया था। जिसे राज्य गठन से पहले मुलायम सरकार की समिति ने गैरसेण को राजधनी के रूप में मान्यता दे दी थी  परन्तु क्या मजाल राज्य गठन के बाद यहां के विकास के बजट पर बंदरबांट करने के लिए राजनीति करने वाले तथाकथित राजनेताओं को लोकशाही के प्रति जरा सी भी ईमानदारी व नैतिकता को अंगीकार किया। अगर इनमें जरा सी भी नैतिकता होती तो ये अब तक अविलम्ब गैरसैंण में राजधनी गठित कर लोकशाही का सम्मान करते। 
दुर्भाग्य यह रहा कि उत्तराखण्ड में आज भी एक भी नेता ऐसा नहीं है जो अन्य प्रदेश के मुख्यमंत्रियों की तरह प्रदेश के हितों के लिए अनशन जेसे कदम तक उठाने के लिए तैयार हो। तैयार होना तो रहा दूर वे इस दिशा में आवाज उठाने का साहस तक नहीं जुटा पाते हैं।  उत्तराखण्ड में जहां प्रदेश के भविष्य पर इन निहित स्वार्थी नेताओं के कारण जनसंख्या पर आधारित परिसीमन थोपा गया, इससे प्रदेश का राजनेतिक भविष्य सदा के लिए दफना ही गया है। परन्तु इन्होंने अभी तक उपफ तक नहीं की। प्रदेश में विकास के बजाय भ्रष्टाचार, जातिवाद व क्षेत्रावाद की आड़ में प्रदेश के विकास की बंदरबांट का अंधी आंधी चली हुई है। ऐसे में केवल एक ही टीस मन में उठती है है प्रभु मेरे उत्तराखण्ड को इन पाखण्डी व जनहितों को अपने निहित स्वार्थ के लिए रौंदाने वाले नेताओं से बचाओ। काश मेरे प्रदेश में कोई यशवंत सिंह परमार होता तो प्रदेश में विकास होता, कोई शिवराज चैहान जैसा मुख्यमंत्राी होता तो प्रदेश के हितों की रक्षा  होती, यहां पर विशेष राज्य का दर्जा हासिल होने पर भी उस पर ग्रहण लग गया, न तो रिषिकेश में एम्स बन पाया व नहीं यहां घोषित हुई रेल लाइनें, इन मुद्दों के लिए राजनीति करते तो प्रदेश का कुछ भला होता। परन्तु करेगा कौन इनको तो केवल बंदरबांट के लिए यहां पर केवल बजट और बजट चाहिए। प्रदेश में शिक्षा, स्वास्थ्य व नैतिकता का मापदण्ड निरंतर गिर रहा है। परन्तु इसकी चिंता कौन करे। इन्हें केवल बजट चाहिए। प्रदेश व जनता जाय भाड़ मे। 


शेष श्रीकृष्ण कृपा। हरि ओम  तत्सत्। श्री कृष्णाय् नमो।

बेदर्द हुक्मरान


बेदर्द  हुक्मरान 
जिन्होने देष ओर जनता के 
वर्तमान और भविश्य को, 
अपनी  सत्तालोलुपता के 
खातिर रौंद कर भी  कभी,
उफ तक  न की हो,
ऐसे बेदर्द हुक्मरान 
जनता की कराह को भी 
अपनी षान के खिलाफ
गुस्ताखी मान कर 
उनकी जुबान को 
लाठी गोली से 
रौंद कर सदा के लिए
राजबाला की तरह  
लोकषाही को बचाने के
नाम पर सदा के लिए
षांत करा देते हें।
- देवसिंह रावत  

-रामदेव, अण्णा व भाजपा ही नहीं कांग्रेसी भी डाल रहे हैं उत्तराखण्ड में कांग्रेसी जड़डो में मठ्ठा

हरियाणा सहित देष के कई भागों में हुए उपचुनावों मे ंमिली करारी हार से भले ही कांग्रेसी दिग्गज चिंतित हो परन्तु चंद माह बाद उत्तराखण्ड में हो रहे चुनाव में कांग्रेस की जड़ों में न केवल अण्णा, रामदेेव व भाजपा के साथ आत्मघाति कांग्रेसी रणनीतिकार भी मठ्ठा डालने का काम कर रहे है । प्रदेष मे ं विधानसभा चुनाव से पहले जहां भाजपा कांग्रेस को चक्रव्यूह में घेरने के लिए अपने मुख्यमंत्री से लेकर संगठन तक महत्वपूर्ण मजबूती दे रही हैं वहीं कांग्रेस में गुटबाजी कम होने के बजाय उसको हवा देने का काम किया जा रहा है । जहां भाजपा नेे प्रदेष के मुख्यमंत्री के पद पर निषंक को हटा कर उनसे बेहतर मजबूत लोक लुभावने का दम रखने वाले भ्ंाुवनचंद खंडूडी को आसीन करते हुए संगठन के महारथी पूर्व मुख्यमंत्री भगत सिंह कोष्यारी को चुनाव अभियान समिति की कमान सौंप कर पुन्न सत्ता पर काबिज होने की मजबूत घेराबंदी कर दी है वहीं सत्ता पर काबिज होने के हसींन सपने देखने में आत्ममुग्ध कांग्रेस के रणनीतिकार अपने ही मजबूत क्षत्रपों को ही हाषिये में डालने में जुटी हुई है। प्रदेष के सबसे मजबूत जननेता हरीष रावत व उनके समर्थकों को प्रदेष कांग्रेस में हाषिये में डालने की आत्मघाति रणनीति से भाजपा खेमें में अपार हर्श दौड रही है। अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी ने डेढ़ वर्ष बाद पीसीसी की सूची जारी कर दी है, उसमें जिस प्रकार से चंद साल पहले विरोधी दलों से आये हवाई लोगों को महत्वपूर्ण स्थान दिया गया परन्तु प्रीतम सिंह, गोविन्दसिंह कुजवाल, पूर्वमंत्री महारा, किषोर उपाध्याय व रणजीत सिंह रावत जैसे कई बार से अपने विधानसभा क्षेत्रों का प्रतिनिधित्व कर रहे वरिश्ठ कांग्रेसी क्षत्रपों को हाषिये में डाल कर चुनावी मुहाने में खड़ी कांग्रेस का प्रदेष कांग्रेस के रणनीतिकारों ने कौन सा हित किया यह तो आला कमान ही जाने। नई कार्यकारणी में प्रदेश अध्यक्ष यशपाल आर्य के अलावा उपाध्यक्ष पद पर छह, महासचिव पद पर आठ, कोषाध्यक्ष पद पर एक और कार्यकारिणी समिति में 15 सदस्यों को मनोनीत किया है। इसके अलावा 17 आमंत्रित सदस्य और अनुशासन समिति में पांच सदस्यों को नामित किया गया है। उपाध्यक्ष पद पर महेन्द्र पाल सिंह, राम शरण नौटियाल, शांति जुवांठा, सुबोध उनियाल, फुरकान अहमद व रविन्द्र सिंह बिष्ट को शामिल किया गया है। महासचिव पद पर वीरेन्द्र सिंह बिष्ट, मयूख महर, संतोष कश्यप, मंत्री प्रसाद नैथानी, केदार सिंह रावत, प्रयाग दत्त भट्ट, राजपाल खरोला व विजय सारस्वत को नामित किया है। कार्यकारिणी में डा. हरक सिंह रावत, डा. अनुसूइया प्रसाद मैखुरी, योगेन्द्र खंडूड़ी, धर्मपाल अग्रवाल, राम प्रसाद टम्टा, जया बिष्ट, सुरेन्द्र कुमार अग्रवाल, लाल चंद शर्मा, मौलाना जाहिद रजा रिजवी, किरन डालाकोटी, राकेश चंदोला, राव फारुख, अनिता वशिष्ठ, मनोरमा शर्मा डोबरियाल, सुंदरलाल मोयाल को नामित किया है। इसके साथ ही आमंत्रित सदस्यों में शूरवीर सिंह सजवाण, सुरेन्द्र सिंह नेगी, हीरा सिंह बिष्ट, तिलक राज बेहड़, इंदिरा ह्दयेश, आजम नवाज खान, साधू राम, संजय पालीवाल, मदन बिष्ट, कुंवर सिंह नेगी, शंकर चन्द्र रमोला, ले. जनरल गंभीर सिंह नेगी, मेजर जनरल जेसी पंत, इकबाल भारती, प्रकाश जोशी, राजीव जैन को शामिल किया गया है। इसके अलावा अनुशासन समिति में नरेन्द्र सिंह भंडारी, धीरेन्द्र प्रताप, भूपेन्द्र लिंगवाल, राजेन्द्र सिंह कनवाल, निर्मला शर्मा को शामिल किया गया है। ब्रह्मस्वरूप ब्रताचारी को फिर से कोषाध्यक्ष की जिम्मेदारी सौंपी गयी है। मुख्यमंत्री बनने के लिए एक दूसरे को मात दे कर धूल चटाने में लगे कांग्रेसी दिग्गजो के इस आत्मघाति खेल से प्रदेष को भ्रश्टाचार की गर्त में धकेल चूकी भाजपा को सबक सिखाने की जनता की आषाओं पर ग्रहण लग सकता है।

-अण्णा या भाजपा ने नहीं अपितु मनमोहन ने डुबोई कांग्रेस की लुटिया

भले ही देष की मीडिया व टीम अण्णा हिसार व अन्य उपचुनाव में कांग्रेस के सफाये के लिए अण्णा फेक्टर को जिम्मेदार मान रही हे परन्तु इस हार के लिए अगर कोई जिम्मेदार है तो प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह व उनको प्रधानमंत्री पद पर बनाये रखने वाली कांग्रेस आला कमान। जिन्होने मनमोहन सिंह जैसे अलोकतांत्रिक व्यक्ति को देष की छाती पर महंगाई, भ्रश्टाचार व कुषासन की मंूग दलने की खुली छूट देकर देष के भविश्य के साथ खिलवाड किया। इस चुनाव से साफ हो गया कि देष की जनता मनमोहन के कुषासन से बेहाल है और इसलिए कांग्रेस को सबक सिखाने के लिए कृत संकल्पित है। ंहरियाणा के हिसार लोकसभा उप चुनाव के अलावा ं तीन अन्य विधानसभा सीटों पर हुए उपचुनावों में भी कांग्रेस को करारी हार मिली है। इन तीन विधानसभा सीटों में से महाराष्ट्र की खड़गवासला सीट जहां भाजपा के खाते में आई है, वहीं राजग की सहयोगी पार्टी जदयू ने बिहार की दरौंदा सीट पर कब्जा जमा लिया है। आंध्र प्रदेश की बांसवाड़ा सीट पर हुए उपचुनाव में तेलंगाना राष्ट्र समिति (टीआरएस) को जीत मिली है। हरियाणा की प्रतिष्ठित हिसार लोकसभा सीट पर हुए उपचुनाव में हरियाणा जनहित कांग्रेस (हजकां) और भाजपा के संयुक्त प्रत्याशी कुलदीप बिश्नोई को जीत मिली। पूर्व मुख्यमंत्री भजनलाल के बेटे बिश्नोई ने इंडियन नेशनल लोकदल (इनलोद) के अपने निकटतम प्रतिद्वंद्वी और पूर्व मुख्यमंत्री ओम प्रकाश चैटाला के पुत्र अजय सिंह चैटाला को 6,323 मतों के नजदीकी अंतर से हराया। कांग्रेस प्रत्याशी और हिसार से तीन बार सांसद रह चुके पूर्व केंद्रीय मंत्री जयप्रकाश की जमानत जब्त हो गई और उन्हें तीसरा स्थान प्राप्त हुआ। हिसार में कांग्रेस प्रत्याशी जय प्रकाश की करारी हार हुई है और उनकी जमानत जब्घ्त हो गई है। हरियाणा जनहित कांग्रेस के उम्मीदवार कुलदीप बिश्नोई जीत गए हैं। इंडियन नेशनल लोकदल के उम्घ्मीदवार अजय चैटाला दूसरे नंबर पर रहे। बिश्घ्नोई को 3,55,941 वोट मिले जबकि चैटाला को 3,49,618 और जय प्रकाश को 1,49,785 वोट मिले। हिसार सीट पर 2009 में हुए चुनाव में भजन लाल को 2,48,476 वोट मिले थे और वह विजयी रहे। इनेलो प्रत्घ्याशी संपत सिंह दूसरे स्घ्थान पर रहे थे जिन्घ्हें 2,41,493 वोट मिले थे वहीं कांग्रेस के जय प्रकाश को 2,04,539 वोट मिले थे। गौरतलब है कि हिसार लोकसभा उपचुनाव के अलावा बिहार, महाराष्घ्ट्र और आंध्र प्रदेश में विधानसभा की एक-एक सीटों पर हुए उपचुनाव के नतीजे भी आए, जिसमें कांग्रेस या उसके गठबंधन को हार मिली।इससे पहले आखिरी बार उन्होंने साल 2004 में यह सीट जीती थी। गौरतलब है कि भजनलाल की मृत्यु के बाद इस उपचुनाव की जरूरत पड़ी थी। आंध्र प्रदेश के निजामाबाद जिले के बांसवाड़ा में हुए विधानसभा उपचुनाव में टीआरएस प्रत्याशी पोचाराम श्रीनिवास रेड्डी ने कांग्रेस प्रत्याशी श्रीनिवास गौड़ को 49,889 मतों के अंतर से हराया। इस साल मार्च महीने में तेलुगू देसम पार्टी (तेदेपा) विधायक पोचाराम के इस्तीफे के बाद यह सीट खाली हुई थी। पोचाराम अलग तेलंगाना राज्य की मांग पर तेदेपा से इस्तीफा देकर टीआरएस में शामिल हो गए थे। महाराष्ट्र में सत्तारूढ़ कांग्रेस-राकांपा को झटका देते हुए भाजपा ने पुणो जिले की खड़गवासला विस सीट पर हुए उपचुनाव में जीत दर्ज की। भाजपा प्रत्याशी भीमराव तपकीर ने राकांपा प्रत्याशी हषर्दा वानजले को 3,625 मतों से हराया। हषर्दा, महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (मनसे) विधायक रमेश वानजले की विधवा हैं। रमेश की मृत्यु के बाद इस सीट पर चुनाव की जरूरत पड़ी थी। भाजपा की जीत पर प्रतिक्रि या व्यक्त करते हुए शिवसेना प्रवक्ता और सांसद संजय राउत ने कहा कि यह सिर्फ कांग्रेस-राकांपा की ही हार नहीं बल्कि अजित पवार की भी हार है।’’ बिहार की दरौंदा विधानसभा सीट पर हुए उपचुनाव में विपक्षी राजद-लोजपा गठबंधन को धूल चटाते हुए जदयू ने यह सीट फिर से अपने नाम कर ली। जदयू प्रत्याशी कविता सिंह ने राजद के अपने निकटतम प्रतिद्वंद्वी परमेर सिंह को 20,092 मतों के अंतर से हराया। कविता, इस सीट की पूर्व विधायक दिवंगत जगमाता देवी की बहू हैं। कविता को जहां 51,754 वोट प्राप्त हुए वहीं परमेर सिंह को 31,662 वोट मिले। गौरतलब है कि परमेर को शहाबुद्दीन व प्रभुनाथ सिंह जैसे बाहुबहिलयों का समर्थन प्राप्त था। जहां तक अण्णा फेक्टर का हौव्वा खडा किया जा रहा है उसमें कोई दम नहीं है इस सीट पर गत चुनाव की तरह के ही परिणाम रहे कहीं परिवर्तन नहीं हुआ। कांग्रेस तीसरे पर थी तीसरे पर ही रही । केवल जो देष व्यापी आक्रोष है वह मनमोहन के कुषासन के कारण। अब भी कांग्रेस आला नेतृत्व ने मनमोहन का मोह नहीं त्यागा तो मनमोहन कांग्रसे की लुटिया 2014 में ऐसे डुबों देंगे जिसकी कल्पना भी किसी ने नहीं की होगी । शेष श्रीकृष्ण कृपा। हरि ओम तत्सत्। श्री कृष्णाय् नमो।

Saturday, October 8, 2011

अब तक भाजपा की उत्तराखण्ड सरकार के भ्रष्टाचार पर मूक रहने वाले बाबा रामदेव व अण्णा माफी मांगे

अब तक भाजपा की उत्तराखण्ड सरकार के भ्रष्टाचार पर मूक रहने वाले बाबा रामदेव व अण्णा माफी मांगे by Dev Singh Rawat on Sunday, 09 October 2011 at 11:00 अब तक भाजपा की उत्तराखण्ड सरकार के भ्रष्टाचार पर मूक रहने वाले बाबा रामदेव व अण्णा माफी मांगे बाबा रामदेव देश में भ्रष्टाचार के खिलाफ व विदेशी बैंकों में जमा भारतीयों के काले धन को देश में वापस लाने की मांग करने के अपने जनांदोलन के दूसरे चरण में ंउत्तराखण्ड की पावन धरती पर पंहुच कर अपना अभियान में जनता से आगामी चुनाव में कांग्रेस पार्टी के खिलाफ ंमतदान का आवाहन कर रहे है। परन्तु उत्तराखण्ड की ंमहान जनता जो अनादिकाल से भ्रष्टाचार व कुशासन के खिलाफ ंनिरंतर कुरूक्षेत्र के मैदान में उतर कर पूरे विश्व को दिश्ंाा देने का काम करते आ रहे हैं, चाहे विदेशी लुटेरों के शासन के खिलाफ हो या आजादी के बाद के लोकशाही को रोंदने वाले कुशासकों के नापाक इरादों को जमीदोज करके करारा सबक सिखाने का काम करने के लिए विख्यात रही। उत्तराखण्ड की जनता यह देख कर हैरान रही कि अण्णा हजारे के सिपाहेसलार जो कुछ समय पहले भाजपा सरकार ंके आवभगत से चकाचैंध हो कर प्रदेश की छाती पर प्रदेश की भाजपा सरकार द्वारा मूंग दले जाने पर एक शब्द भी बोलने से बचते रहे व बाबा राम देव जो स्वयं उत्तराखण्ड ंके निवासी हैं उनके मुखारविंद से एक भी शब्द प्रदेश को भ्रष्टाचार की गर्त में धकेलने वाले भाजपा सरकार के खिलाफ मुंह खोलना तो रहा दूर उल्टा उनके गरिमामय समर्थन से अपने आप को गौरवान्वित समझते रहे।
भ्रष्टाचार का विरोध में देश की जनता का नैतिक समर्थन की आश में पूरे देश में जनांदोलन करने वाले बाबा रामदेव व अण्णा हजारे कोे एक बात का भान रहना चाहिए कि देश की जनता भ्रष्टाचार के मामले में उनकी निष्पक्षता को ही स्वीकार करेगी न की उनके पक्षपातपूर्ण रवैये को। ंअण्णा हजारे के सिपाहे सलार अरविन्द केजरीवाल व प्रशांत भंूषण को चाहिए था कि भाजपा सरकार के मुखोटे भुवनचंद खंडूडी से दो टूक शब्दों में कहते कि आप कडा लोकपाल विधेयक बनाओ परन्तु इससे पहले आप अपनी भाजपा सरकार के कार्यकाल में हुए स्टर्जिया व जल विद्युत परियोजनाएं आदि घोटाले के दोषियों को सलाखों की पीछे डाल कर जनविश्वास की रक्षा करेें न कि केवल महज शब्दों के कानूनी जाल की धूल झोंक कर जनता का वोट हरण का कृत्य करो। वहीं बाबा रामदेव भ्रष्टाचार के खिलाफ जंग का ऐलान उस उत्तराखण्ड की धरती पर करने का कृत्य किस मुंह से कर रहे हैं जिस प्रदेश की सरकार के खिलाफ एक शब्द बोलने का उनको नैतिक साहस तक नहीं रहा । वे दिल्ली जनांदोलन के बाद किसी महात्मा या सदचरित्र ंसमाजसेवी से अधिक भरोसा ंउत्तराखण्ड प्रदेश के भाजपा सरकार के तत्कालीन मुख्यमंत्री निशंक पर प्रकट कर रहे थे जिसकी सरकार के भ्रष्टाचार से प्रदेश की जनता ं त्राही-त्राही कर रही थी। बाबा रामदेव ने ंअपने इस अभियान में उत्तराखण्ड ंकी अस्मिता व देश की संस्कृति से खिलवाड़ करने वाले मुजफरनगर काण्ड-94 के खलनायक रहे मुलायम सिंह के खिलाफ एक शब्द बोलने का साहस व नैतिकता तक नहीं ंप्रदर्शित कर पाये। यही नहीं ंभू माफियाआंे द्वारा सीमान्त प्रदेश उत्तराखण्ड की भूमि पर कब्जा करने के कृत्यों पर मुंह खोलने का साहस तक नहीं जुटा पाया। यही नहीं बाबा रामदेव उत्तराखण्ड के उस मंत्री का नाम भी बतानेे का साहस नहीं जुटा पाये जिसने उनसे करोड़ रूपये रिश्वत मांगने का कृत्य किया था। बाबा रामदेव व अण्णा हजारे को एक बात समझना चाहिए नैतिकता का दोहरा मापदण्ड उत्तराखण्ड की उस स्वाभिमान व भारतीय संस्कृति के मूल आधार उत्तराखण्डी जनता कभी सपने में भी स्वीकार नहीं करती । इस पावन धरा के भू पुत्रों ने अत्याचारी मुगलों, फिरंगियों, चीन व पाक के दांत खट्टे करने का अदम्य साहस किया तो इसके साथ उन्होंने ंआजादी के बाद लोकशाही को रौंदने वाली इंदिरा गांधी, ंराव व ंमुलायम सिंह, तिवारी, खंडूडी आदि जनादेश से करारा सबक सिखाने का गौरवाशाली कीर्तिमान स्थापित भी किया है। बाबा रामदेव हो या अण्णा हजारे या अन्य कोई समाजसेवी या राजनेता एक बात समझ लेनी चाहिए कि इस देश में अनादिकाल से भ्रष्टाचारियों, कुशासकों व दमनकारियों के खिलाफ संघर्ष करने का युगों युगों का सनातनी इतिहास रहा है। संसद की चैखट जंतर मंतर पर पृथक उत्तराखण्ड राज्य गठन के लिए ऐतिहासिक 6 साल (अगस्त 1994 से 16 अगस्त 2000) का ऐतिहासिक सफल धरना जन ांदोलन का एक प्रमुख सिपाई रहने के अदभूत अनुभव के अनुसार में भगवान श्रीकृष्ण व काला बाबा के आर्शीवाद से प्राप्त अनुभव की बदोलत मैं यह कह सकता हॅू कि उत्तराखण्ड सहित देश की जनता हर उस व्यक्ति के साथ है हर उस व्यक्ति के साथ है जो देश के हित में कार्य करते हुए संघर्ष कर रहा होता है। देश हित के लिए निष्पक्ष हो कर संघर्ष करने वाले व्यक्ति के साथ जनता ंतनमनधन अर्पित करने के लिए जहां तत्पर है वहीं वह दोहरे मापदण्ड को लेकर ंसंघर्ष करने वालो को बेनकाब करना भी जानती है। अण्णा हजारे व बाबा रामदेव को यह समझ लेना चाहिए कि नासते विध्यते भावो, ना भावो विध्यते सत्। असत् का साथ लेने वाले भीष्म, कर्ण, आचार्य जैसे महाबली को भी पराजय को ही वरण करना पड़ा। इसलिए देश हित में उनसे आशा है कि वे पक्षपात रहित हो कर दलों के मोह से उपर उठ कर अपना आंदोलन चलाये। तभी देश व उनके संकल्प की रक्षा होगी। देवभूमि उत्तराखण्ड मे इस दोहरे मापदण्ड के साथ अपना अभियान चलाने वाले बाबा रामदेव व कुछ समय बाद उत्तराखण्ड में अभियान चलाने वाले अण्णा हजारे को उत्तराखण्ड की पावन धरती व जनता से माफी मांगते हुए पक्षपात रहित मात्र देशहित कार्य करना चाहिए। उत्तराखण्ड की जनता भ्रष्टाचार से उत्तराखण्ड की धरती को रौदने वाली भाजपा को कैसे माफ करेगी? क्या करेंगे ऐसे जनलोकपाल या कानूनों का जिसका बागडोर ही भ्रष्टाचार को संरक्षण देने वाले कुशासकों के हाथों में हो ? भ्रष्टाचार जो भी करे उसका जनमत द्वारा सफाया करने से ही जनतंत्र व देश मजबूत होता है। चाहे वह कांग्रेस का हंो या भाजपा या अन्य दलों का। 20 14 में होने वाले लोकसभा चुनाव मेें कांग्रेस ंको व 2012 में हो रहे विधानसभा चुनाव में प्रदेश की जनता भाजपा को प्रदेश से उखाड ़ फैंकेने का काम करेगी। एक बात साफ करना चाहता हूॅ कि महाकाल कभी दुशासन, भ्रष्टाचारी, ंकालनेमी व तानाशाह को उत्तराखण्ड की पावन धरती पर अपने नापाक इरादों का साकार करने की इजाजत नहीं देता। उत्तराखण्ड सहित देेश की जनता भ्रष्टाचार के खिलाफ अभियान में अनादिकाल से संघर्षरत है। मुर्गे की तरह अपनी बाग पर सुबह होने का भ्रम रखने वालों को इस बात का ऐहसास होना चाहिए कि भगवान श्रीकृष्ण व भगवान राम के इस सृष्टि में कुशासन के खिलाफ मर्यादाओं की रक्षा के लिए गुरूगोविन्दसिंह, विवेकानन्द, अमर शहीद भगतसिंह, गांधी जी, नेताजी सुभाष चंद्र बोस सहित असंख्य महापुरूषों व ंसमाजसेवियों ंने देश को अपने ंसंघर्षों से शताब्दियों तक मार्गदर्शन इसी लिए करने में सफल रहे कि उनका जीवन पक्षपात रहित ंपूर्ण रूप से देश व मर्यायादाओं के लिए समर्पित रहा। मैं आशा करता हॅू कि अण्णा व रामदेव भ्रष्टाचार के खिलाफ अपने राष्ट्र व्यापी अभियान में अपने मार्ग में आ रहे ंआसक्ति पूर्ण व्यवहार को दूर करके समदर्शी व्यक्तित्व बना कर राष्ट्र सेवा में ंसमर्पित हो कर राष्ट्र की लोकशाही को मजबूत बनायेंगे। शेष श्री कृष्ण। हरि ओम तत्सत्। श्रीकृष्णाय् नमो।

Friday, October 7, 2011

why we be slave of english language

why we be slave of english language and ignore world most scientific and oldest richest language Sanskrit, which we call Dev Bhasha, Hindi and most of language of Bharat is come out from its laps, Bhartian be slave of british, so they fill bad to learn country language, see without english germany, russia, china, Italy, francs, japan and all other developed country get historical success their own language, why slave country whom we now CWC be blind on english

अविलम्ब तेलांगना राज्य का गठन हो

अविलम्ब तेलांगना राज्य का गठन हो
ंतेलांगना पृथक राज्य के गठन की पांच दशक से पुरानी मांग को देश के हुक्मरानों द्वारा जबरन दमन व नकारना लोकशाही की निर्मम हत्या करने वाला ही कृत्य है। देश में शासन प्रशासन आम जनता की जनभावनाओं व सहभागेदारी के तौर पर होना चाहिए। देश के राजनैतिक दलों ने अपने संकिर्ण दलगत हितों व अलोकतांत्रिक प्रवृति से लोकशाही को गहरा आघात पंहुचा । ंदेश के हुक्मरानों को लोकशाही का सम्मान करते हुए अविलम्ब तेलांगना राज्य का गठन करना चाहिए।

Thursday, October 6, 2011

अमेरिका के नेतृत्व में लीबिया में हो रहे कत्लेआम पर नपुंसक क्यों बना है विश्व

अमेरिका के नेतृत्व में लीबिया में हो रहे कत्लेआम पर नपुंसक क्यों बना है विश्व
नई दिल्ली(प्याउ)। कई महिनों से लीबिया पर अमेरिका के नेतृत्व में नाटो द्वारा लीबिया में लोकशाही की रक्षा के नाम पर किये जा रहे कत्लेआमी हमले के विरोध में जिस प्रकार से संयुक्त राष्ट्र सहित पूरा विश्व हुक्मरान ने शर्मनाक चुप्पी साध रखी है, उससे साफ हो गया है कि पूरे विश्व में रूस, चीन व भारत जेसे तथाकथित ताकतवर देश भी अमेरिका की इस विश्व की अमन शांति को ग्रहण लगाने वाली हिटलरी प्रवृति के आगे नपुंसक की तरह आत्मसम्र्पण कर चूके है। लोकशाही की दुहाई दे कर लीबिया में हमला करने वाले अमेरिका व उसके पिछलग्गू नाटो का मुखोटा उस समय बेनकाब हो जाता है वे जब फिलिस्तीन की आजादी व प्रभुसत्ता को रौंद रहे इस्राइल के कृत्य पर न केवल मूक हैं अपितु उसकी हैवानियत को लगातार संरक्षण दे रहे है। अमेरिका व उनके प्यादे नाटो की लोकशाही व आतंकवाद के उनमुलन के प्रति दावे उस समय बेनकाब हो जाते हैं जब वह विश्व को आतंक से तबाह करने वाले आतंकियों के उत्पादन का विश्व का सबसे बड़ा कारखाना बन चूके पाक पर शर्मनाक मौन साधे हुए है तथा सीरिया व सउदी अरब में लोेकशाही दम तोड़ रही है परन्तु क्या मजाल कि अफगानिस्तान, इराक व लीबिया में कत्लेआम मचाने वाले अमेरिका व उसके नाटो को ये देश कहीं दिखाई तक देते होे। संयुक्त राष्ट्र व विश्व जनमत को अमेरिका की इस दोरही प्रवृति का मूक समर्थन करने के लिए इतिहास बार बार धिक्कारेगा तथा गुनाहगारों को परमेश्वर अवश्य दण्डित करेगा। अमेरिका व उसके प्यादा ें की यह प्रवृति विश्व शांति व लोकशाही के लिए एक कलंक ही नहीं खतरा भी बन चूका हैै।

-राम का नहीं रावणों का सम्मान होता है यहां

-राम का नाम बदनाम न करो/ -राम का नहीं रावणों का सम्मान होता है यहां/
दशहरे के पावन पर्व पर विजय दशमी के रोज भले की रामलीलाओं के मंचों में भगवान राम द्वारा रावण का वध करने के साथ लाखों की संख्या में रावण सहित उसके समुल वंश के पुतलों का दहन ‘बुराई पर अच्छाई की जीत’ के नाम पर ंकिया जाता हो। परन्तु सच्चाई यह है कि भगवान राम को उनके देश भारत में ही नहीं अपितु उनकी पावन जन्म भूमि ंअयोध्या में भी एक प्रकार से बनवास दिया गया हैं वहीं यहां आसुरी शक्तियों के प्रतीक रावण का सम्राज्य चारों तरफ विद्यमान है। यही नहीं भगवान राम के नाम पर आयोजित की जाने वाली रामलीलाओं के पावनमंच में भी भगवान राम की तरह मानवीय व सनातनी मूल्यों के लिए समर्पित लोगों के बजाय जनहितों व सनातनी परमपरा को रौदने वाले मनमोहन सिंह जैसे राजनेताओं तथा धन ंपशुओं को सम्मानित किया जाता है। राम के नाम पर हो रही रामलीलाओं ंके अधिकांश आयोजक स्वयं नैतिक मूल्यों व आदर्शों से कोसो दूर होते है। इसी कारण भगवान राम की पावन लीलाओं के मंचन वाले पावन मंच पर नैतिक मूल्यों के पुरोधाओं के बजाय रावण की तरह आम जनता व मर्यादाओं को रौंदने वालों को ंबेशर्मी से सम्मानित किया जाता है। जिन राक्षसी प्रवृति के लोगों के विनास व संताप दूर करने के लिए भगवान ने स्वयं समय समय पर मानव देह का धारण किया, उन्हीं राक्षसी प्रवृति के जनहितों पर डाका डालने वाले लोगों को उनकी पावन लीलाओं के मंचन मंच पर गौरनावित किया जाता है। इससे बड़ा ं भगवान राम व भारतीय संस्कृति का दूसरा क्या हो सकता है। Li

Wednesday, October 5, 2011

मुजफरनंगर काण्ड व राजधानी गैरसैंण मुद्दंे पर दिल्ली में भी घिरे खंडूडी

मुजफरनंगर काण्ड व राजधानी गैरसैंण मुद्दंे पर दिल्ली में भी घिरे खंडूडी
नई दिल्ली(प्याउ)। मुजफरनगर काण्ड-94 के अभियुकतों को प्रदेश की अब तक की सरकारों द्वारा ईमानदारी से सजा देने के लिए ठोस पहल न किये जाने व प्रदेश की राजधानी गैरसैंण बनाने की जनभावनाओं ंका नजरांदाज करके जबरन राजधानी देहरादून में थोपने की नापाक कृतों से भले उत्तराखण्ड की सरजमी पर उत्तराखण्ड के मुख्यमंत्री को ंतीखे सवालों का सामना न करना पडे परन्तु दिल्ली में जहां उत्तराखण्ड जनांदोलन का केन्द्र रहा था वहां पर प्रदेश के ंअब तक के तमाम मुख्यमंत्रियों ंइन मुद्दों पर तीख े सवालों ंसे ंमुह चुराने के लिए विवश होना पडता है। ंऐसे ही तीखे व सीधे सवाल पर आज 5 अक्टूबर को मुख्यमंत्री खंडूडी को भी उस समय सामना करना पड़ा जब उत्तराखण्ड निवास में उनंके द्वारा ंआयोजित प्रेस से मिलन व भोज के अवसर पर प्रैस वार्ता में प्यारा उत्तराखण्ड के सम्पादक देवसिंह रावत ने उनसे दो टूक सवाल किया कि जिस मुजफरनगर काण्ड को इलाहाबाद उच्च न्यायालय व केन्द्रीय जांच ऐजेन्सी सीबीआई ने दोषी ठहराया हुआ है उसके दोषियों को 17 साल बाद भी देश के हुक्मरान व प्रदेश के हुकमरान सजा देने में क्यों असफल रहे? श्री रावत ने मुख्यमंत्री से सीधा सवाल किया कि जब गुजरात दंगों व सिख दंगों के दोषियों को सजा दिलाने के लिए कई जांच आयोग व पहल की जा सकती है तो उत्तराखण्ड की अस्मिता को रौंदने वाले गुनाहगारों को सजा दिलानेे के लिए सरकार क्यों ंठोस पहल नहीं कर रही है।? इस सवाल पर भी मुख्यमंत्री ंने संतोष जनक जवाब देने के लिए वहीं घुमा फिरा कर कहा कि हम इसके गुनाहगारों को सजा दिलायेंगें। ंपर इसके लिए क्या पहल कर ंरहे हैं इस मामले में उनकी तरफ से कोई ठोस उतर नही ं दिया गया। वहीं दूसरा महत्वपूर्ण सवाल पूछते हुए प्यारा उत्तराखण्ड के सम्पादक देवसिंह रावत ने ंखचाखच भरे प्रेस वार्ता में पूछा कि जब प्रदेश में राजधानी चयन आयोग की रिपोर्ट को सरकार ने न स्वीकार की व नहीं उसको ंरद्द करने का ऐलान ही किया। ऐसे में ंप्रदेश की स्थाई राजधानी बनाने के ऐलान से पहले चुपचाप देहरादून में विधानसभा, सचिवालय व रांजनिवास सहित अनैक महत्वपूर्ण भवनों का निर्माण करके प्रदेश की उस बहुसंख्यक जनता की भावनाओं का रौंदने का गैरलोकतांत्रिक कार्य किया जिन्होने राज्य गठन व ंराजधानी गैरसैंण के लिए लम्बा संघर्ष व बलिदान दियां ?ं ंइसका उतर भी संतोष जनक देने ंमें प्रदेश के मुख्यमंत्री असफल रहे। ंगौरतलब है कि दिल्ली के पत्रकार व आंदोलनकारी निंरतर राज्य गठन जनांदोलन की तर्ज पर ही मुजफरनगर काण्ड के अभियुक्तों को दण्डित करने व राजधानी गैरसैंण तथा परिसीमन जैसे मुद्दंो ंपर निरंतर ंप्रदेश के हुक्मरानों को घेरते रहे। इससे चंद महिने पहले तत्कालीन मुख्यमंत्री निशंक को भी पत्रकारों के कांउस्टीटयूशन क्लब में आयोजित समारोेह में इन्हीं मुद्दों पर ंगलत बयानी करने के कारण भारी विरोध के कारण भाषण अधूरा छोड़ कर किसी तरह से ंआंदंोलनकारियों के प्रकोप से बच कर भागना पड़ंा था। ं

Tuesday, October 4, 2011

-आडवाणी को प्रधानमत्री बनाने के लिए संघ ने चलाया मोदी का नाम

-आडवाणी को प्रधानमत्री बनाने के लिए संघ ने चलाया मोदी का नाम/ -निशंक बने संघ व भाजपा के सुशासन के मुखोटे/
नरेन्द्र मोदी को ढाल बना कर लालकृष्ण आडवाणी को प्रधानमंत्री बनाने की रणनीति पर कार्य कर रहा है संघ या आडवाणी को जिन्ना भक्ति का दण्ड देने के लिए नरेन्द्र मोदी को आगे कर रहा है संघ। हालांकि राजनीति के मर्मज्ञों को संघ द्वारा नरेन्द्र मोदी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनाने में सहमति देने पर भी विश्वास नहीं हो रहा है। क्योंकि संघ व भाजपा में नीति निर्धारण में जिन लोगों का शिकंजा जकड़ा हुआ है उसे देख कर नितिश के कंधे में बंदुक रख कर गुजरात में नरेन्द्र मोदी का विरोध क्या भाजपा व संघ कीं ंजातिवादी मानसिकता का एक दाव के रूप में भी देखा जा रहा है। लोगों को इस बात की आशंका के है कि सघ -भाजपा नेतृत्व मोदी के नाम पर वोट ले कर बाद में आडवाणी या अपने किसी और प्यादे को प्रधानमंत्री के पद पर आसीन कराने का तो षडयंत्र तो नहीं रच रहे है। क्योंकि नितिश कुमार द्वारा बिहार से आडवाणी के भ्रष्टाचार विरोधी रथ यात्रा को झण्डी दिखाने को इसी षडयंत्र का एक महत्वपूर्ण कड़ी के रूप में देखा जा रहा है। मोदी के नाम को प्रधानमंत्री के प्रत्याशी के लिए संघ द्वारा ऐलान किये जाने से जहां आडवाणी व उनके समर्थकों के मंसबों पर एक प्रकार से बज्रपात ही हो गया था, आडवाणी व उनके समर्थक इसे अपना अपमान मान कर चुपचाप अपमान के घुंट को पीने के बजाय उन्होंने आडवाणी को भ्रष्टाचार के खिलाफ रथ यात्रा निकाल कर प्रधानमंत्री के लिए अपना दावा मजबूत करने का शंखनाद ही कर दिया। इस मामले में संघ व भाजपा की राजनीति के विशेषज्ञों का मानना है कि यह संघ की सोची समझी रणनीति का हिस्सा भी हो सकता है। क्योंकि वे सीधे तोर पर आडवाणी को प्रधानमंत्री का दावेदार बना कर मोदी के पक्ष में पूरे देश में बह रही समर्थन की एक मजबूत लहर को खोना नहीं चाहती। इसी लिए वह इन मतों को हासिल करने के लिए चुनाव में मोदी का नाम लेगी परन्तु विवाद उत्पन्न करके मोदी को प्रधानमंत्री बनाने के बजाय आडवाणी की ताजपोशी भी की जा सकती है। विशेषज्ञों का मानना है कि संघ अपनी रणनीति को समय आने से पहले कभी खुलाशा नहीं करता। खासकर रामजन्म भूमि आंदोलन के बाद देश में वर्तमान राजनीति को देखते हुए हो सकता है यह संघ को छुपा हुआ ऐजेन्डा हो। वहीं दूसरी तरफ भ्रष्टाचार के खिलाफ पूरे देश में भाजपा के शीर्ष नेता लालकृष्ण आडवाणी की रथ यात्रा निकालने से पहले राष्ट्रीय कार्यकारणी के समापन पर भाजपा ने निशंक को राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बनाने का निर्णय लिया। उससे भाजपा का भ्रष्टाचार विरोधी मुखोटा पूरी तरह से बेनकाब हो गया। हालांकि चंद दिन पहले भ्रष्टाचार के मामले में चर्चित रहे उत्तराखण्ड के मुख्यमंत्री पद से हटाये गये रमेश पोखरियाल निशंक को राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बनाने का ऐलान कर अपने सुशासन का असली चेहरा देश के समक्ष रखने से भाजपा से सुशासन की आश करने वालों को गहरा धक्का लगा । वहीं उनके विरोधी अब कह रहे है कि आडवाणी के रथ की सारथी सुषमा होगी तथा आडवाणी के आजू बाजू में भाजपा के सुशासन के नये प्रतीक निशंक व यदिरुप्पा उनके प्रमुख सेनानी की तरह आसीन हो कर पूरे देश में भ्रष्टाचार का ऐसा नैतिक पाठ पढ़ायेंग। हो सकता है कि इसे देख कर संघ के स्वयं सेवकों के दिव्य चक्षु भी खुल जायेगे। यह तय है कि देश की जनता के साथ साथ उत्त्ंाराखण्ड की जनता भाजपा नेतृत्व के इस अदभूत फेसले के लिए आगामी चुनावों में लोकसभा के चुनाव की तरह उचित ईनाम देगी।

-देश में सबसे गरीब है मनमोहन, मोंटेक, मंत्री, सांसद, विधायक, नौकरशाह, बाबा और समाजसेवी

-देश में सबसे गरीब है मनमोहन, मोंटेक, मंत्री, सांसद, विधायक, नौकरशाह, बाबा और समाजसेवी -आम गरंीब आदमी को अमीर घोषित करे सरकार
देश में योजना आयोग द्वारा सर्वोच्च न्यायालय में गत पखवाडे दिये गये हलफनामे से जहां पूरा देश भौचंक्का है। देश में ही नहीं विदेश में भी भारत के योजना आयोग व सरकार की जो जगहंसाई हुई उसने देश के हुक्मरानों को पूरे विश्व के सामने बेनकाब कर दिया। सवाल आज यह नहीं है कि 32 रूपये या 26 रूपये वाला गरीब है या नहीं। मेरा मानना है कि इस देश में सबसे बड़े गरीब कोई है तो इस देश के हुक्मरान, नौकरशाह,इंजीनियर, डाक्टर, महत्वपूर्ण पदों में आसीन लोग, उद्यमी और समाजसेवी । यहां का कर्मचारी गरीब है यहां के अधिकारी व शिक्षिक गरीब है। यहां के मजदूर व बेरोजगार गरीब नहीं है। उन पर सरकार को टेक्स लगाना चाहिए। देश का अशिक्षित आदमी जो कानून का पालन करता है वह गरीब है। देश का आम आदमी जो मेहनत कश है वह गरीब है। देश की व्यवस्था के महत्वपूर्ण पदों में आसीन लोग गरीब है। क्योंकि देश की व्यवस्था हमेशा उन्हीें के लिए अपने संसाधनों व भत्तों को लुटाती है। किसी को चिंता नहीं कि जो लोग सौ रूपये देखने के लिए भी तरस जाते हैं उनका पेट व उनका परिवार कैसे पलता है। सबसे गरीब तो यहां के जनप्रतिनिधी खासकर सांसद व विधायक है। यहां के नौकरशाह है। यहां के इंजीनियर व डाक्टर तथा शिक्षक अधिकारी है। यहां के समाजसेवी है। यहां के साधु संत है। सांसदों व विधायकों का वेतन व भत्ते कितनी बार बढ़ चूके है। साधु संतो के फाइव स्टारी ठाठ राजा महाराजाओं को मात करते है। नौकरशाहों की अकूत सम्पति किसी बड़े उद्यमी को भी शर्मशार करती है। राजनेताओं व समाजेवियों की सम्पतियां जिस तेजी से बढ़ रही है उसको देखते हुए उनकी गरीबी भी निरंतर बढ़ रही है। ऐसे में सर्वोच्च न्यायालय में देश के आम लोगों की गरीबी दूर करने के बजाय अमेरिका के प्यारे मनमोहन सिंह व मोंटेक को अपने साथियों की गरीबी दूर करने के उपाय सुझाने चाहिए। आज देश का आम आदमी मंहगाई , भ्रष्टाचार व आतंक से सहमा हुआ हैं परन्तु क्या मजाल कोई उसकी तरफ देखे। इसका किसी को अंदाज तक नहीं। परन्तु सांसदों व सरकारी कर्मचारियों का वेतन कितनी बार बढ़ गया। कितनी बार उनके भ़त्ते बढ़ गये। फिर भी उसकी चिंता ही सारी व्यवस्था को है। सांसदों, विधायकों , व मोंटेक सिंह जैसे लोगों के लिए देश की व्यवस्था कितना खर्च कर रही है अगर इसके आंकड़े जारी किये जायें तो देश का आम गरीब आदमी का हार्ड टेक वेसे ही सुनते ही हो जाय। इस लिए मेरा निवेदन यह है कि इन जनप्रतिनिधियों व नौकरशाहों को जन्म जन्मांतर का आरक्षण किया जाय। देश में हर शहर में ही नहीं पूरे विश्व में इनके लिए सरकारी खर्च में अट्टालिकायें बनायी जाय। इनके ऐशोआराम में देश के सभी संसाधन खर्च किये जाय। बेचारे बहुत गरीब है। देश में अगर जरा सी भी व्यवस्था में नैतिकता होती तो मनमोहन सिंह व मोंटेक सिंह आलुवालिया को उनकी गरीब की नई परिभाषा देने के लिए इनको तुरंत ससम्मान अमेरिका के लिए भैंट कर देना चाहिए था। देश के सांसदों का वेतन देश के आम गरीब आदमी के वेतन के समान होना चाहिए था। सरकार के किसी भी कर्मचारी का वेतन गरीबी की रेखा के निर्धारण आधार से पांच गुना अधिक नहीं होनी चाहिए। परन्तु अब पूरे विश्व में थू थू होने के बाद नहीं समिति का गठन किया गया। जो लोगों के आंखों में धूल झोंकेगी। बताया जा रहा है कि गरीबी रेखा को लेकर मचे बबाल को ठंडा करने के लिए प्रधानमंत्री के निर्देश पर ग्रामीण विकास मंत्री जयराम रमेश, योजना आयोग के उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह अहलूवालिया, सदस्य प्रोफेसर अभिजीत सेन, मिहिर शाह, सईदा हामीद और नरेंद्र जाधव ने सोमवार 3 अक्टूबर को साझा प्रेस कांफ्रेंस की और इस मसले पर पैदा हुए भ्रम को लेकर सफाई दी। इनमें से अधिकांश लोगों ने मोंटेक सिंह के खिलाफ झंडा उठा रखा था लेकिन प्रधानमंत्री के कहने पर योजना आयोग के सुप्रीम कोर्ट में दायर किये गये शपथपत्र को उन्होंने जायज ठहराया। अहलूवालिया ने कहा कि शपथ पत्र वापस नहीं होगा लेकिन यदि सुप्रीम कोर्ट कहेगा तो वे उसमें संशोधन कर सकते हैं। अहलूवालिया ने कहा कि 26ध्32 रुपये के आंकड़े तथ्यों पर आधारित हैं लेकिन ये आंकड़े योजना आयोग के नहीं हैं। जाति व आर्थिक आधार पर चल रही जनगणना के आंकड़े आने पर गरीबों की संख्या तय की जाएगी और उन्हें मिलने वाले लाभ तय किए जाएंगे। जाति आधारित गणना आने के बाद एक विशेषज्ञ समिति का गठन किया जाएगा जो गरीबों की संख्या का आकलन करेगी। उच्चतम न्यायालय में जो हलफनामा दिया गया है, वह तेंदुलकर समिति द्वारा गरीबी की गणना के लिए दिए गए सुझाव पर आधारित है। उन्होंने इन आशंकाओं को खारिज किया कि तेंदुलकर समिति की गरीबी की रेखा से वे परिवार उस लाभ से वंचित हो जाएंगे, जिसके वे हकदार हैं। अहलूवालिया ने स्पष्ट किया कि तेंदुलकर समिति की गरीबी की रेखा का इस्तेमाल ज्यादा से ज्यादा लोगों को गरीबी से उबारने के लिए किया जाएगा। लगता है सरकार गरीबी रेखा के इस पैमाने में आने वाली आबादी को तिकडम करके अमीर बनाने का नया ड्रामा कर रही है। इसमें वह कहा सफल होगी यह तो परमात्मा ही नहीं देश की आम जनता भी जानती है। उन्हें समझ नहीं आ रहा है कि मनमोहन सिंह व आलुवालिया किस देश के प्राणी है। अगर वे इस देश के होते तो कम से कम उन्हें देश के आम लोगों के दुख दर्द का भान तो होता। लगता है उनको अमेरिका के अलावा कुछ दूसरी चीज दिखाई ही नहीं देती। Like · · Share · Delete

सूचना के अधिकार को कुंद करके भ्रष्टाचार को कैसे रोकेगी खंडूडी सरकार

सूचना के अधिकार को कुंद करके भ्रष्टाचार को कैसे रोकेगी खंडूडी सरकार
देहरादून (प्याउ। एक तरफ खंडूडी सरकार प्रदेश में भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने के लिए मजबूत जनलोकपाल विधेयक लाने का ढ़िंढोरा पीट रही है वहीं वह भ्रष्टाचार के खिलाफ निरीह समझी जाने वाली आम जनता के पास एक सशक्त हथियार बन चूके सूचना के अधिकार से भयभीत हो कर उसकी धार को कुंद बनाने के लिए इसमें ंएक महत्वपूर्ण संशोधन करके अपनी खाल बचाने का काम कर रही है। इसके तहत अब कोई संस्था या उसके पदाधिकारी के नाम पर कोई सूचना नहीं मांगी जायेगी।
गौरतलब है कि नौकरशाह व सरकार में आसीन मंत्रियों के भ्रष्टाचार के खिलाफ सूचनाधिकार के तहत कोई व्यक्ति किसी संस्था या उसके पद के नाम से सूचनाएं नहीं मांग सकेगा। गौरतलब है कि भ्रष्टाचारियों के आतंक से कोई आम आदमी उनके खिलाफ इस अधिकार का प्रयोग करने की हिम्मत प्रायः नहीं करता हें। जबकि संगठन के नाम से अधिकांश ंलोग सामुहिक रूप से सूचना के अधिकार का प्रयोग करते रहते है। ंइसी को देख कर सरकार ने इसको कुंद करने का मन बना लिया है। इसका नमुना सूचनाधिकार के एक मामले में राज्य सूचना आयोग ने दरअसल ऋषिकेश के दीप ट्रेडर्स ने ग्राम सभा जौंक,लक्ष्मणझूला (पौड़ी गढ़वाल) वाले प्रकरण पर यह फैसला दिया है। राज्य सूचना आयुक्त अनिल कुमार शर्मा का कहना है कि सूचना कानून के तहत भारत के नागरिक द्वारा नाम से सूचनाएं मांगने पर ही सूचनाएं उपलब्ध कराई जा सकती हैं। सूचना आयुक्त ने यह भी कहा है कि सूचनाधिकार से संबंधित सभी किस्म के पत्राचार रजिस्र्टड डाक के जरिए किया जाए। इस प्रकरण के बाद प्रदेश के सूचना आयोग ने लोक सूचनाधिकारी को निर्देश दिए कि सूचनाधिकार संबंधी सभी पत्राचार रजिस्र्टड डाक से किया जाए और साथ ही यह भी कहा कि किसी संस्था या संस्था के पदनाम से सूचना मांगे जाने पर कोई सूचना न उपलब्ध कराई जाए। देखने में ंपहली नजर में यह सामान्य सा बदलाव है परन्तु सूचना के अधिकार व प्रदेश में भ्रष्टाचार की दलदल को देखते हुए साफ लगता है कि यह साधारण सा दिखने वाला बदलाव प्रदेश में भ्रष्टाचार की सफाई करने के मार्ग में सबसे बड़ां अवरोधक बन जायेगा।

-उत्तराखण्ड को कश्मीर बनाने का षडयंत्र है रूद्रपुर दंगे

-भाजपा के मुख नहीं मुखौटे हैं खंडूडी/
-उत्तराखण्ड को कश्मीर बनाने का षडयंत्र है रूद्रपुर दंगे/
- निशंक को राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बना कर सम्मानित किया भाजपा ने/


भारतीय जनता पार्टी के शासन में भ्रष्टाचार व कुशासन से त्रस्त उत्तराखण्ड प्रदेश में भाजपा की नौका का बंठाधार होने की आशंका से भयभीत हो कर, भाजपा आला नेतृत्व ने अपने उत्तराखण्ड प्रदेश के मुख्यमंत्री निशंक को आनन फानन में हटाते हुए पूर्व मुख्यमंत्री खंडूडी की ताजपोशी प्रदेश में जिस सुशासन देेने के नाम पर की थी, उसका मुखोटा भी खुद भाजपा आला नेतृत्व ने प्रदेश में भाजपा की छवि को आम जनता की नजरों में अपने कुशासन से तार-तार करने वाले निशंक को राष्ट्रीय उपाध्यक्ष का गरीमामय पद पर आसीन करके बेनकाब कर दिया हे। इस ताजपोशी से साफ हो गया कि खंडूडी उत्तराखण्ड में भाजपा के मुखोटे हैं मुख नही। प्रदेश की जनता को आशाा थी कि खंडूडी अपने भरत निशंक द्वारा उनको दिये गये तथाकथित वनवास से लोकशाहीं का ंपाठ सीख चूके होंगे। परन्तु ंगत सप्ताह उनका व्यवहार व कार्यो को देख कर मुझे भी जो थोड़ी सी आशा भी थी वह ंटूट कर बिखर गयी। ंमुझे आशा थी कि वे अपने इस ंनंये अवतार से जातिवाद व क्षेत्रवाद तथा भ्रष्टाचार से तबाह हो रहे प्रदेश को सहीं दिशा देने का केवल मुंह जुबानी बयान देने के बजाय उस पर खुद भी अमल करते। परन्तु उन्होंने सत्तासीन होने के बाद न अपनी वह अलोकशाही प्रवृति छोड़ी व नहीं अपने पर लगने वाले जातिवाद व क्षेत्रवादी प्रवृति के लगे दागों को धोने का ही काम कर पाये। उनके द्वारा कि गयी पहली तीन नियुक्तियों ही उन पर लगे इन आरोपों का खुद बयान करती है। प्रदेश की प्रतिंभाओं को समायोजित करने की न तो उनमे ं ललक ही दिखायी देती है व नहीं वे अंधा बांटे रेवड़ी अपने अपने दे ।वहीं प्रदेश से भ्रष्टाचार का सुपाडा ही साफ करने की हुकार भरने वाले भुवन ंचंद खंडूडी की हकीकत यह है कि वे भाजपा सरकार द्वारा वर्ष 2007 में 56 घोटालों की जांच के लिए गठित घोटालों की जांच निष्पक्ष कराने के लिए खुद ंखंडूडी कितने संवेदनशील हैं यह उनके ंहाल में दिये गये बयानों से ही उजागर हो रही है कि ये आरोप लगाने कांग्रेस की आदत ही बन गयी है। अपने पूर्व मुख्यमंत्री निशंक सरकार ंके जिन घोटालों के बारे में ंखंडूडी अपने राजनैतिक वनवास के दिनों में ंआये दिन घडियाली आंसू बहाते नजर आते थे, सत्ता मिलते ही उनको वे घोटाले कहीं नजर नहीं आ रंहे है। आयेंगे कैसे उनके आला नेतृत्व ने निशंक की महान सेवाओं से खुश हो कर राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बनाने का ऐलान तो कर दिया है। खंडूडी जी की हिम्मत नहीं कि वे अपने इस लाडले भरत के कारनामों के खिलाफ कार्यवाही करना तो रहा दूर वे मुंह भी खोल पायें। इसंसे साफ ंहो गया कि उनकी प्राथमिकता केवल ंप्रदेश की राजसत्ता की गद्दी है। उनको प्रदेश के हितों से कहीं दूर-दूर तक कोई लेना देना नहीं। केवल अपनी छवि बनाने के नाम पर वे कानूनों का मकड़ जाल बना कर ंजनता की आंखों में धूल झोकने का काम क र रहे है । अगर उनमें जरा सी भी ईमानदारी होती तो वे अविलम्ब स्टर्जिया, जल विद्युत परियोजनाओं व अन्य भूमि घोटालों से सम्बंधित अपंने भरत निशंक के कार्यकाल के कार्यो की ंनिष्पक्ष जांच कराने का सीबीआई से ंअनुरोध करके प्रदेश में भ्रष्टाचार के खिलाफ एक ईमानदार मुहिम छेड़ते। परन्तु उन्होंने केवल अण्णा हजारे की टीम को बुला कर उनकी लोकप्रियता को अपने पक्ष में भुनाने का नाटक किया। खंडूडी अगर ईमानदार रहते तो वे कभी निशंक के इन कारनामों को नजरांदाज नहीं करते । उनको आंला नेतृत्व की चिंता तो हैं परन्तु भ्रष्टाचार से तबाह हो रहे उत्तराखण्ड की तनिक सी भी चिंता नहीं है। अगर होती तो वे मुजफरनगर काण्ड-94 के अभियुक्तों को दण्डित करने के लिए गुजरात व सिख दंगो के दोषियों को सजा दिलाने के लिए नये सिरे से नये जांच आंयोग के गठन करते।
ंगौरतलब है कि उन पंर अलौकतांत्रिक व्यवहार, जातिवाद व क्षेत्रवाद का जो आरोप पहले कार्यकाल में लगता रहा इस कार्यकाल के प्रारम्भ मे ं ही उन दागों व आरोपों को झुटलंाने के लिए उन्होंने कोई ऐसी पहल की हो यह ंदिखाई तक नहीं ंदेती। नई दिल्ली में उनके ंदूसरी बार मुख्यंमंत्री बनने के बाद पहली बार जब उनको मै उत्तराखण्ड निवास में मिला, उनको मैने आंदोलनकारी संगठनों की तरफ से ंराष्ट्रपति को 2 ंअक्टूबर को दी जाने वाले ज्ञापन का प्रति भेंट की। तो उस समय मैने वहां पर उनके व्यवहार में किसी प्रकार के बदलाव को महसूस नहीं किया। समझदार आदमी अपनी असफलताओं व लोगों की आलोचनाओं से सिखता है। दिल्ली स्थित उत्तराखण्ड निवास में उनका जन्म दिन मनाया जा रहा था, ंउत्तराखण्ड शिल्पकार चेतना मंच के पदाधिकारी ंअपने अध्यक्ष ंमहेशं चंद्रा व भाजपा नेता बी आर टम्टा के नेत्त्व मेें ढोल-रणसिंगा बजा कर खंडूडी जी का अभिनन्दन कर रहे थे। दर्जनों लोग उनको व उनकी धर्मपत्नी को ंबधाईयां दे रहे थे। खंडूडी व निशंक से लेकर तिवारी के कार्यकाल में ंउनके ंजनंसम्पर्क को करीबी से देखने के बाद मुझे लगा कि खंडूडी को आज भी लोकशाही का पहला ंपंा ठ सिखने की जरूरत है। ंसेना के ंउच्च अधिकारी के पद से सेवा निवृत व भाजपा के रांजनेता बनने के कई वर्षो वाद भी उनकी जनरली ंहनक में कोई कमी नहीं आयी। लोकशाही में ंजनप्रतिनिधी ंको जनमुखी ंव्यवहार की आशा व अपेक्षा की जाती। उनके पहले दिल्ली पदार्पंण पर मेने देखा कि ंमुख्यमंत्री ंसे मिलने जाने वाले आम लोगों को उनके दूसरी मंजिल पर स्थित कार्यालय में जा कर मुख्यमंत्री से मुलाकात व बधाई देने या उनसे समय लेंने के कार्यालय तक जाने की इजाजत ंनहीं थी। नीचे से केवल दूरभाष से अपने खास खास लोगों को ही उपर बुलाया जा रहा था। जबकि तिवारी से निशंक के कार्यंकाल में मुख्यमंत्री के इस कार्यालय तक आम आदमी पंहुच संकता था। खुद ंखंडूडी के पहले कार्यकाल में आम आदमी जहां तक पंहुच सकता था अब दूसरे कार्यकाल में वहां तक नहीं पंहुच रहा था। और तो और पत्रकारों को भी नीचे ही रहना पडा। खंडूडी जी को यह समझना चाहिए कि वे एक जिले या एक जाति के मुख्यमंत्री नहीं अपितु पूरे प्रदेश के मुख्यमंत्री है। वे केवल भारतीय जनता पार्टी के हितों या अपने निहित स्वार्थो की पूति के लिए प्रदेश के मुख्यमंत्री नहीं ंबनाये गये अपितु वे उत्तराखण्ड प्रदेश की जनता के हितों की रक्षा के लिए एक जनसेवक के रूप में उनकी सेवा करने के लिए बनाया गया है। शासक द्वारा प्रदेश की प्रतिभाओं को प्रदेश के हित के लिए अपनी सेवाओं को प्रदान करने का अवसर देनां चाहिए, बिना किसी संकीर्ण भेदभाव के। केवल जातिविशेष के लोगों को नौकरशाही, न्यायपालिका, कार्यपालिका, ंदर्जाधारी, मंत्री मण्डल आदि पदो में इकतरफी नियुक्ति से लोकशाही व समाज के विकास में अवरोध होता है। ंलंोकशाही कमजोर होती है। लोेगों में रंाग द्वेष व भ्रष्टाचार बढ़ता है। ंप्रदेश में ग्यारह सालों में भाजपा कांग्रेस ने एक ही कृत्य किया प्रदेश के शासन प्रशासन में जातिवाद-क्षेत्रवाद व भ्रष्टाचार के कारण तबाही के गर्त में पंहुच चूका है। ंअमन व शांति के लिए विख्यात ंउत्तराखण्ड की सरजमी पर आज रूद्रपुर में हुए दंगे का कलंक ंलग गया है। इसी कारण ईमानदारी के लिए विख्यात प्रदेश आज देश में भ्रष्टाचारी के शीर्ष पायदान पर आसीन है। उत्तराखण्ड से रत्ती भर का भी लगाव नही ं है। प्रदेश के इन हुक्मरानों के कारण प्रदेश में जनसंख्या पर आधारित परिसीमन थोप कर इसे कश्मीर की तरह अशांत क्षेत्र बनाने का षडयंत्र किया जा रहा है । ंजब तक प्रदेश की जनता जाति, क्षेत्र व धर्म से उपर उठ कर प्रदेश के हितों की रक्षा के लिए इन सत्तांधों को दूर नहीं करेगी तब तक प्रदेश को नहीं बचाया जा सकता।
शेष श्रीकृष्ण कृपा। हरि औम तत्सत्। श्रीकृष्णाय् नमो।