Pages

Monday, December 31, 2012


आइसा से प्रेरणा लें नेताओं की चाटुकारिता छोड़ जनहितों के लिए संघर्ष करें कांग्रेस व भाजपा के छात्र संगठन


दामिनी को श्रद्धांजलि देने के लिए आइसा व अस्मिता ग्रुप का जेएनयू के समीप पार्क में भारी जनजागरण 

दिल्ली में भले ही आज हाड  को कंपकपाने वाली ठण्ड है। देश के हुकमरान जहां नव वर्ष का जश्न मनाने में जुटे होंगे। वहीं जंतर मंतर पर भी आधी रात को लोग दामिनी को श्रद्धांजलि अर्पित करने के लिए जुटे रहे। वहीं भाकपा माले की छात्र संगठन आइसा के छात्र व अरविन्द गौड़ की नाट्य मण्डली से जुडे कलाकार जेएनयू के सामने मुनिरिका की तरफ को पढ़ने वाले पार्क में रात के 12 बजे विशाल नाट्य जनजागरण का आयोजन कर रहे है। वे दामिनी के हत्यारों को कड़ी सजा देने की मांग के साथ समाज से नारी के सम्मान करने का आवाहन कर रहे थे।  इसमें हजारों की संख्या में लोग जुटे हुए है। मुनिरिका के समीप रामकृष्ण पुरम में रहने वाले समाजसेवी आजाद खान ने अभी फेस बुक पर चैट करते हुए मुझे बताया कि वहां पर मध्य रात्रि तक पहले आइसा छात्र संगठन का हमे आजादी चाहिए नाटक का मंचन हुआ तथा उसके बाद यहां पर अरविन्द गौड के नाट्य  मंच ‘अस्मिता’ के कलाकारों ने इंडिया गेट पर हुई बरबर लाठी चार्ज का नाट्य मंचन किया।
आज 31 दिसम्बर को भी जब आइसा के सेकडों छात्रों का मार्च जंतर मंतर पर आया तो मेरे कानों  में उनके ‘सुना है साथी लाठी का असर मिठा मिठा होता है’ ढपली के संग सामुहिक गीत गुनगुनाते सुना तो मेरी समझ में आया कि क्यों तमाम राजनैतिक दलों से बढ़कर आइसा का संगठन है। जो समर्पण व तत्परता मुझे भाकपा(माले) के छात्र संगठन आइसा में देखने को मिला वह मुझे न तो 127 वर्ष पुरानी कांग्रेस के एनएसयूआई और राष्ट्रवाद का परचम फेहराने का दंभ भरने वाली भाजपा की छात्र ईकाई अभाविप(एवीबीपी)या अन्य किसी राजनैतिक दल के छात्र संगठन में नहीं दिखाई देता। मैने 1994 के उत्तराखण्ड राज्य गठन जनांदोलन में सक्रिय भागीदारी के बाद अब तक के राष्ट्रीय व स्थानीय  आंदोलनों में मैने देखा आइसा की भागेदारी सब पर 21 है। 1994 में उत्तराखण्ड राज्य गठन जनांदोलन के समय में आज भी मुझे आइसा के प्रखर छात्र नेता चन्द्र शेखर के जंतर मंतर पर हमारे मंच पर ओजस्वी भाषण आज भी उनकी शहादत के बाद उनकी बरबस यादें दिलाता है। वहीं उस समय उत्तराखण्ड से गिरजा पाठक जैसे प्रखर छात्र नेता आज माले के नेताओं में जाने जाते हे। वहीं कुछ समय पहले इन्द्रेश मैखूरी की प्रखरता को आज भी उत्तराखण्ड ही नहीं अपितु पूरे देश की उदयमान छात्र नेताओं में जाने जाते रहे। आज भी उत्तराखण्ड में उनकी प्रखरता कहीं न कहीं भाजपा व कांग्रेस के थोपे हुए नेतृत्व को आइना दिखाते है। भले ही माले अपना लोकसभा में अपना प्रभाव चुनावों में उतना व्यापक दर्ज न करा पाया हो परन्तु उसकी छात्र ईकाई स्थानीय से लेकर राष्ट्रीय व अन्तराष्ट्रीय मुद्दों पर हमेशा प्रखर व सजग रहती है। आज कांग्रेस व भाजपा का जनता से कटने का कारण मुझे एक यही समझ में आ रहा है कि इनकी छात्र ईकाईयों का जनता से कटे रहना है। भाजपा व कांग्रेस के नेतृत्व को चाहिए कि वह अपनी छात्र ईकाई को आइसा का अनुशरण करने की सीख दें। नहीं तो कांग्रेस व भाजपा में केवल सत्ता के दलालों या तथाकथित आला नेतृत्व की गणेश परिक्रमा करने वालों को महत्वपूर्ण पद मिलता वहीं आइसा में संघर्ष करने वालों को प्राथमिकता मिलती है। आज देश की छात्र ईकाई में केवल आइसा ही ऐसा छात्र संगठन है जो स्थानीय समस्याओं से लेकर राष्ट्रीय व अन्तरराष्ट्रीय मुद्दों पर प्रखतरा से अपनी छाप छोड़ते अपितु जनता के दमन व हितों के लिए प्रखरता से संघर्ष भी करते। दामिनी प्रकरण में भी आइसा की प्रखर उपस्थिति ने जनता को दिशा ही नहीं अपितु इस जनांदोलन को मजबूती देने की महत्वपूर्ण भूमिका निभायी। वहीं कांग्रेस व भाजपा के छात्र संगठन की भूमिका केवल रस्म अदायगी मात्र की रही।

Sunday, December 30, 2012


दामिनी प्रकरण पर पूरे विश्व के समक्ष खुद नपुंसक बन गयी मनमोहन सरकार 


बलात्कारियों को मृत्यु देने के लिए क्यों नपुंसक बन रही है मनमोहन सरकार 

जिस प्रकार से खबरों में जो सुनने में आ रहा है कि कांग्रेस गठबंधन वाली सप्रंग सरकार बलात्कारियों को मृत्यु दण्ड देने की जनता की प्रबंल मांग को मांगने के बजाय उनको नपुंसक बनाने का विकल्प ढूढ रही है। वहीं दामिनी प्रकरण से उपजे देशव्यापी भारी जनाक्रोश से मनमोहन सरकार की पूरे विश्व में मनमोहन सरकार की इस नपुंसकता के कारण भारत की छवि को गहरा धक्का लगा है। जिस प्रकार से दामिनी की मौत पर जहां पूरा भारत आंसू बहा रहा है वहीं भारतीय जनाक्रोश से भले ही सत्तांध मनमोहनी सरकार की कुम्भकर्णी खुमार को न तोड़ पायी हो परन्तु इसकी गूंज संयुक्त राष्ट्र संघ सहित पूरे विश्व में गूंज गयी है। पूरा विश्व मनमोहन सरकार की जनभावनाओं के अनुकुल काम न करने की सत्तांध नपुंसकता से हैरान है। भारत की आम जनता ही नहीं पूरा विश्व अचम्भित है कि भारत में क्यों सरकारें आजादी के 65 साल बाद भी गुलामी के दिनों में बने कानूनों में बदलाव करने को तैयार नहीं है। क्यों जनता के इतने आक्रोश के बाबजूद फिरंगी काल में बने कानून, भाषा ही नहीं अपितु उसकी हर हूठन को सरमाथे पर लगाये हुए है। क्यों मनमोहन सिंह व उसकी सरकार देश की जनभावनाओं के अनुरूप बलात्कारियों को मृत्युदण्ड का कानून बनाने में क्यों नपुंसक बनी हुई हैं। हालांकि देश की जनता मनमोहन सिंह सरकार सहित देश के हुकमरानो ंसे देश के स्वाभिमान, जनहितों के साथ राष्ट्रहितों की रक्षा करने के अपने दायित्व का निर्वहन तक नहीं कर पा रहे है। देश पाकिस्तानी आतंकियों ने संसद तक हमला कर के दोषी अफजल गुरू को सर्वोच्च न्यायालय द्वारा फांसी की सजा पर मुहर लगाने के कई सालों बाद भी मनमोहन सरकार उस आतंकी अफजल गुरू को फांसी देने में नपुंसक बनी हुई है। देश की आम जनता सरकार की नपुंसकता से बढ़ रही काला बाजारी, मिलावट खोरी व मंहगाई व भ्रष्टाचार से परेशान है परन्तु क्या मजाल मनमोहन सरकार इन पर अंकुश लगाने के लिए भी नपुंसक बनी हुई है। देश की जनता भ्रष्टाचारियों व बलात्कारियों को सजा दिलाने के लिए कानून में बदलाव चाहती है वह जनलोकपाल चाहती है व बलात्कार पर फांसी की मांग कर रही है। देश की जनता मांग कर रही है कि देश को लूटने वालों ने विदेशों में जमा किये हुए काला धन भारत में वापस लाया जाय परन्तु सरकार, देशहित के लिए जनभावनाओं के अनुरूप काम करने के बजाय देश हित के लिए सरकार से काम करने की मांग करने वालों पर फर्जी मुकदमें, लाठी, आंसू गैस, पानी की बौछारें आदि दमन करके जनता का मुंह बंद करना चाहती है। अब जनता चाहती है कि देशहित के लिए सरकार जाग कर लोकशाही का सम्मान करे तो वह 22 व 23 दिसम्बर की तरह पुलिसिया दमन का कहर से जनता का मुंह बंद करना चााहती है। पर अब सरकार असफल हे। क्या मनमोहन सरकार व उनकी कांग्रेस को जो खुद को 127साल की पार्टी बताती है उसको लोकशाही का सम्मान करना नहीं आता।  अगर आता तो वह बलात्कारियों को मृत्युदण्ड का कानून बनाने के लिए इतना ना नुकुर क्यों कर रही हे। जबकि वोटो की राजनीति करते हुए इसी कांग्रेस ने शाह बानों कैसे में सर्वोच्च न्यायालय के फेसले को पलटने के लिए तनिक सी भी देरी नहीं लगायी थी। तो अब क्यों नपुंसक बनी हुई है। निर्दोष कोई फंसे नहीं और दोषी कोई छूटे नहीं ऐसा कानून क्यों नहीं बनाया जा रहा है। हकीकत यह हे देश के लिए आज कांग्रेस पाटी व उसकी मनमोहनी सरकार खुद नपुंसक बन कर न केवल देश के विकास, सम्मान व जनभावनाओं की रक्षा करने में नपुंसक बन गयी है। आखिर 16 दिसम्बर से देश त्राही त्राही कर रहा है और सरकार के पास घडियाली आंसू बहाने, जनता की आंखों में धूल झोंकने के लिए मरणासन्न दामिनी को सिंगापुर भेजने व जनभावनाओं को पुलिसिया कहर ढाने के अलावा क्या लोकशाही का सम्मान करना क्यों नहीं आता? ऐसे प्रधानमंत्री व सरकार की देश को एक पल के लिए भी कोई जरूरत नहीं  है जो न जनभावना समझ पाये व नहीं देश के हितों  व सम्मान की रक्षा कर पाये।

Saturday, December 29, 2012


देश डूबा दामिनी के शोक में पर चैन्नई में देश के दुश्मन पाक से क्रिकेट मैच का तमाशा क्यों?


बहुत दुख की बात है कि जब पूरा देश दामिनी की मौत पर शोक मना रहा है। वहीं भारत के दिशाहीन सरकार देश के स्वाभिमान व अखण्डता को दशकों से रौंदने वाले पाकिस्तान से चैन्नई में मैच खेल रहा है। सरकार व क्रिकेट के रहनुमाओं को जरा शर्म करो। देश के जज्बातों से खिलवाड बंद करो। मुझे समझ में नहीं आ रहा है कि जब पूरा देश विलख रहा है तो देश के हुकमरानों व इस पाक से खेले जा रहे इस राष्ट्रघाति क्रिकेट मैच को खेलने का क्या औचित्य है। सरकार में अगर जरा सी भी शर्म होती या देश के प्रति जरा सा भी सम्मान व प्रेम होता तो वह पाक से तब तक मैच नहीं खेलती जब तक वह अपने भारत को तबाह करने वाले नापाक इरादों को बंद नहीं कर देता। वेसे भी आज जब पूरा देश दामिनी के शोक में डूबा हुआ है। उसका अंतिम संस्कार 30 दिसम्बर की प्रातः हुआ। इस दिन जश्न का प्रतीक क्रिकेट मैच का आयोजन क्यों? जितने लोग अगर इस मैच देखने जाते है या घरों में देखते हैं उतने अगर जनहित व राष्ट्रहित में लगे रहते या सरकार के गलत कामों के खिलाफ सडकों पर उतरते तो भारत कबका विश्व की महान शक्ति ही नहीं जगतगुरू फिर से बन जाता। देश में कोई बेरोजगार व कुशासक नहीं रहता।
 

मुख्यमंत्री शीला के कारण आज जलियावाला बाग बन जाता जंतर मंतर 


पुलिसिया दहशत को धत्ता बताते हुए दामनी को श्रद्धांजलि देने उमडे जंतर मंतर पर हजारों लोग

29 दिसम्बर की तड़के दिल्ली में 16 दिसम्बर को सामुहिक बलात्कार की शिकार हुई 23 वर्षीया पेरामेडिकल की छात्रा दामिनी की मौत के बाद पूरे देश में फेले आक्रोश को पुलिसिया ताकत के बल पर भले ही कुंद करने की कोशिश करते हुए जंतर मंतर पर हजारों की संख्या में उमड़ कर दिवंगत दामिनी को श्रद्धांजलि अर्पित की और इसके दोषियों को अविलम्ब सजा-ए-मौत की सजा देने की मांग करते हुए धरना प्रदर्शन किया। वहीं दिन भर आंदोलनकारियों की सुझबुझ से राष्ट्रीय धरना स्थल जंतर मंतर पर आज उस समय एक बड़ा हादसा टल गया जब दोपहर दो बजे सत्तामद में चूर दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित ने दामिनी की मौत व सरकार की लापरवाही के कारण आक्रोशित जनता ने जंतर मंतर पर पीडि़ता को श्रद्धांजलि अर्पित करने के नाम पर वहां पर पंहुच कर मोमवत्ती प्रज्वलित   करने  का काम किया। वह दिल्ली पुलिस  की   तत्परता  व आंदोलनकारियों की सुझबुझ से  आज बडा हादसा होने से बच गया।  इस जनांदोलन में आम लोग दिल्ली व केन्द्र में  कांग्रेस की  सरकार ही सत्तारूढ़     होने के कारण आम जनता  शासन प्रशासन  द्वारा समय पर इस काण्ड के दोषियों को   सजा-ए-मौत  न देने के लिए  कानून  न बनाये जाने से काफी आक्रोशि थी। ऐसे में दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित द्वारा दामिनी के मोत के  दिन आक्रोशित हजारों आंदोलनकारियों के बीच पंहुचना अपने आप में जनाक्रोश की  बारूद डालने के बराबर था। अगर कुछ अनहोनी वहां पर घटित हो जाती या  जिस प्रकार से मुख्यमंत्री आक्रोशित आंदोलनकारियों के बीच में घिर गयी थी उसमें कोई दुर्घटना हो जाती तो यहां पर फिर निर्दोष जनता 22 व 23 दिसम्बर से अधिक  क्रूर ढ़ग से पुलिसिया जुल्म का शिकार हो जाती।  शीला दीक्षित को  कम से कम  ऐसे मौके पर जनता के बीच किसी भी सूरत में नहीं आना चाहिए।  जंतर मंतर  एक प्रकार से आज जलियावाला बाग  में तब्दील होते होते बचा। क्योंकि जंतर मंतर के दोनों प्रवेश की सडकों पर पुलिस ने दोनों तरफ से बेरेकेट लगा कर  एक प्रकार से  घेरा हुआ था।   बाकी दोनों तरफ ऊंची  दिवारें।  इसी कारण   23 दिसम्बर को प्रदर्शन को दौरान बाबा रामदेव व जनरल   वी के सिंह   के नेतृत्व वाले आंदोलनकारियों को पुलिस की लाठी चार्ज का बुरी तरह शिकार होना पडा।  पुलिस सुत्रों के कारण जंतर मंतर ही  प्रदर्शनकारियों को नियंत्रण करने की दृष्टि से  इंडिया गेट व विजय चैक   से अधिक  सुविधाजनक है। इसके बाद रामलीला मैदान। वहां भी  चारों दरवाजों पर पुलिस की घेराबंदी के कारण प्रदर्शनकारियों को पुलिस सहजता से अंकुश  में रख लेती है।  शायद इसी कारण पुलिस ने जंतर मंतर व रामलीला मैदान दोनों जगह पर प्रदर्शन की इजाजत दी है।  दामिनी के मौत के बाद जनाक्रोश के बीच दिल्ली की कांग्रेसी मुख्यमंत्री शीला दीक्षित द्वारा  जंतर मंतर पर  आक्रोशित   प्रदर्शनकारियों के बीच  में ऐसे समय पर पंहुचने का दुशाहस करना अतिविशिष्ठ सुरक्षा से जुडे विशेषज्ञों के गले नहीं उतरी। उनका तर्क था कि जब वहां पर लोग अरविन्द केजरीवाल आदि  जनांदोलनकारियों को  लोग राजनेता बता कर उनसे दूरी बना रहे थे तो ऐसे समय में किसी राजनेता को ऐसे आंदोलनों से दूर ही रहना श्रेयकर है। यही नहीं कई आंदोलनकारियों ने शीला दीक्षित के आने से एकाद घण्टे पहले सीपीआई के झण्डे, बैनर व पोस्टर लिये दो दर्जन लोगों को उस समय  वहां से  दूर करने का  प्रयास किया जब वे आंदोलन के बीच में बेठ चूके थे। यही नहीं आज प्रातःकाल से ही यहां पर आंदोलनकारियों का चारो तरफ से पुलिस प्रशासन की तमाम अवरोधों को नजरांदाज करते हुए यहां पंहुचे। यहां जो आ रहा था सरकार के कृत्यों से आक्रोशित था। युवाओं में काफी आक्रोश था। सुबह से कुछ समर्पित युवाओं ने जंतर मंतर के अशोक रोड़ वाली तरफ बेरिकेट पर दामिनी को श्रद्धाजलि देने व दामिनी को न्याय दो/दामिनी के बलात्कारियों को फांसी दो के गगनभेदी नारों से गूंजायमान कर दिया। परन्तु आक्रोशित आंदोलनकारियों को दिनभर शांतिपूर्ण आंदोलन से जोडे रखने में अरविन्द गौड़ व उनके काफी कामयाब रहे। इसके बाबजूद कई प्रकार के आक्रोशित आंदोलनकारियों को पुलिस की तरफ कूच करने से 22 व 23 दिसम्बर के पुलिसिया दमन से सबक सिखे आंदोलनकारियों ने बड़ी मुश्किल से काबू रखा। यहां पर आज जहां अरविन्द केजरीवाल, मनीष सिसौदिया, गोपाल राय, कुमार विश्वास, प्रसांत भूषण, योगेन्द्र यादव ने भी जंतर मंतर में घण्टों तक सडक पर अन्य आंदोलनकारियों के साथ श्रद्धा सुमन अर्पित किया। इसके अलावा मैं, जगदीश भट्ट व मोहन सिंह रावत के साथ इस आंदोलन के सहभागी रहे। जंतर मंतर पर दिन भर ही नहीं देर रात तक दामिनी को श्रद्धाजलि अर्पित करने वालों का तांता ही लगा रहा। जंतर मंतर पर पंहुच कर श्रद्धांजलि अर्पित करने वालों में पूर्व सेना प्रमुख वी के सिंह, अन्तरराष्ट्रीय प्रेरक शिव खेड़ा, उदित राज सहित अनैक प्रतिष्ठित व्यक्ति यहां पर अपनी श्रद्धांजलि अर्पित करने पंहुचे। इनमें से अधिकांश बिना किसी भाषण दिये या मीडिया के सामने आये हुए चुपचाप मौन श्रद्धांजलि अर्पित करके चल दिये।
जंतर मंतर पर दिन से रात तक दिल्ली पुलिस के आला अधिकारी डटे रहे। इंडिया गेट से लेकर पूरी नई दिल्ली एक प्रकार की छावनी बना डाली थी। मेट्रो संसद से इंडिया गेट तक पंहुचने वाले मेट्रो के दस स्टेशनों में आवागम ही बन नहीं किया गया अपितु इंडिया गेट से जुड़ने वाले हर मार्ग पर चलने वाली बसों का आवागन ही बंद कर दिया गया हो परन्तु इसके बाबजूद हजारों की संख्या में छात्र-छात्राओं सहित आम जनता ने संसद की चैखट जंतर मंतर पर हजारों की संख्या में पंहुच कर दामिनी को अपनी भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित किया। नई दिल्ली के चारों तरफ हजारों की संख्या पुलिस व अर्ध सैनिक बलों को तैनात किया गया था। सरकार ने जमुना पार से नई दिल्ली में घुसने की अगर कोई जलशैलाब कोशिश करता तो उसको आईटीओ  दिल्ली सचिवाल के समीप ही सैकडों पुलिस कर्मी व बेरेकेट लगाने का भी तमाम प्रबंधन किये हुए था।

Friday, December 28, 2012


सामुहिक दुराचार की पीडि़त लड़की की सिंगापुर में मौत से देश गहरे सदमें में
 

 16 दिसम्बर को दिल्ली में 23 वर्षीय पेरामेडिकल की जिस छात्रा से सामुहिक बलात्कार हुआ था उसका 29 दिसम्बर की प्रातः सवा दो बजे सिंगापुर के माउंट ऐलिजाबेथ अस्पताल में मृत्यु घोषित किया गया। इस खबर से पूरा देश गहरे सदमें में है। उसका पार्थिक शरीर 29 दिसम्बर दोपहर बाद 3-4 बजे भारत लाया जायेगा। इस पीडि़त लड़की मौत से जहां पूरा देश में शोक की लहर छा गयी। देश की जनता को चाहिए की वह शांति बना कर दिवंगत आत्मा का अपनी शांतिपूर्ण श्रद्धांजलि दे और सरकार दमनकारी हथकण्डे छोड़ कर दोषियों को अविलम्ब मौत की सजा दिलाने के लिए कानून बना कर उनको दण्डित कराने का दायित्व निभाये। यहीं दामिनी को सच्ची श्रद्धांजलि होगी । देश के राष्ट्रपति से लेकर प्रधानमंत्री सहित तमाम बडे नेता  जहां लोगों से शांति बनाये रखने की अपील की वहीं सरकार ने ऐतिहात के तौर पर इंडिया गेट के आस पास के सभी दस मेट्रो स्टेशन आवागमन के लिए बंद कर दिये है। इंडिया गेट की तरफ जाने वाले सभी रास्ते बंद कर दिये गये हैं। नई दिल्ली क्षेत्र को एक प्रकार से सुरक्षा बलों की छावनी में तब्दील कर दिया है।  लम्बे समय से उसके जीवन के बारे में गंभीर अटकलें लगायी जा रही थी। हालांकि जिस गंभीर हालत में उसको देश से बाहर इलाज के लिए ले जाया गया उस पर भी न केवल आम आदमियों ने अपितु मेडिकल क्षेत्र के विशेषज्ञों ने भी सवाल खडे हुए थे।
इस काण्ड के बारहवें दिन बाद वह जिन्दगी की जंग हार गयी। दिल्ली के सफदरजंग चिकित्सालय के बाद उसको सिंगापुर के माउंट एलिजाबेथ अस्पताल में इलाज के लिए ले जाया गया जहां उसकी मौत 29 दिसम्बर की तडके 2.15 बजे हो गयी। दिल्ली में हुए सामुहिक दुराचार की घटना से पूरा देश आक्रोशित था। 22 व 23 दिसम्बर को जो विजय चैक से इंडिया गेट व जंतर मंतर पर व्यापक जनांक्रोश के रूप में फूटा। जिसको देख कर पूरी व्यवस्था सहम गयी। इलाज के दौरान दिल्ली में लड़की होश में थी और परिवारवालों से बात भी कर रही थी लेकिन अचानक 27 दिसम्बर को उसे दिल का दौरा पड़ने के बाद सिंगापुर के  माउंट ऐलिजाबेथ अस्पताल  भेजा गया था जहां 29 दिसम्बर की तडके उसके शरीर के कई अंगों ने काम करना बंद कर दिया था। अस्पताल के अनुसार अस्पताल के 8 डॉक्टरों की टीम उसकी देख रेख में जुटी थी परन्तु पीडि़त छात्रा के शरीर और दिमाग में बेहद गंभीर चोटें थीं लेकिन उसकी इच्छाशक्ति ने उसे जिंदा रखा और वो तमाम मुश्किलों के बावजूद बहादुरी से जिंदगी के लिए लड़ी मगर वो जीत नहीं पाई।


दामिनी को न्याय दिलाने के लिए पुलिस के बर्बर दमन के बाबजूद जंतर मंतर पर डटे हैं जांबाज आंदोलनकारी


22 व 23 दिसम्बर को विजय चैक से लेकर इंडिया गेट व जंतर मंतर पर पुलिस ने जिस दामनी को न्याय दो, बलात्कारियों को मौत की सजा दो रूपि जनांदोलन की कमर तोड़ने के लिए लाठियों, आंसू गैस व पानी के तेज धार के प्रहार तथा कानून का खुला दुरप्रयोग भी किया था, उस आंदोलन को पुलिसिया दमन को धत्ता बता कर जंतर मंतर पर दिन भर शांतिपूर्ण ढ़ग से धरना प्रदर्शन करके जींदा रखे हुए है। चारों तरफ से सैकडों पुलिस की घेरेबंदी व पानी की तेज धार से प्रहार करने के लिए तैयार पुलिसिया गाड़ी की तैनातगी के बाबजूद आंदोलनकारी राष्ट्रीय धरनास्थल पर दिन भर ‘बलात्कारियों को सजा दो/ दामिनी तुम संघर्ष करो हम तुम्हारे साथ हैं/ सोनिया जिसकी ममी है वो सरकार निकम्मी है,/ पूरा देश आसू बहा रहा है मनमोहन व राहुल शर्म करो, आदि गगनभेदी नारों, दिन भर छात्र-छात्राओं व समाजसेवियों के जोशिले न्याय की मांग करने वाले भाषणों से जंतर मंतर गूंज उठता है। वहीं यहां पर कई कलाकार अपनी पेंटिंग बना कर यहां पर दामिनी को न्याय देने की मांग कर रहे है। वहीं सांय 7बजे के आसपास यहां पर मोमबत्तियां जला कर छात्रायें व युवती प्रदर्शन करके दामिनी के दोषियों को सजा की मांग करते हैं। आंदोलनकारियों में ही नहीं अपितु देश के अधिकांश लोगों में बेहद गंभीर हालत में दामिनी को इलाज के लिए सिंगापुर भेजने के सवाल पर भी प्रश्न उठ रहे है।
परन्तु इन जांबाजों को देख कर यहां पर हर कोई एक ही सवाल करता है कि कहाॅं गये जंतर मंतर पर जनांदोलन चलाने वाले देश के तथाकथित बडे आंदोलनकारी? आखिर अण्णा या अरविन्द या रामदेव या भाजपा, वामदल सहित अन्य रानैतिक दल क्यों पुलिस की अमानवीय दमन व लोकशाही का गला घोंटने वाले प्रकरण के बाद यहां पर आ कर सत्तांध हुक्मरानों को खुली चुनौती दे रहे आंदोलनकारियों का समर्थन करने या लोकशाही की रक्षा करने के लिए क्यों राष्ट्रीय धरना स्थल जंतर मंतर पर आने का साहस क्यों नही कर पाये। क्योंकि जिस लोकशाही व मानवाधिकारों को कुचलने के लिए सरकार ने 22 व 23 दिसम्बर को कहर ढाया क्या उसका विरोध करना उचित नहीं समझते है ये लोकशाही के समर्थक। आज जरूरत है सबसे अधिक सरकार के अमानवीय जुल्म के विरोध में शांतिपूर्ण प्रदर्शन करने की। केवल यहा पर अरविन्द गौड,  व योगेन्द्र यादव जैसे बडे नाम ही आंदोलनकारियों के बीच पंहुचे। वहीं टीम अण्णा की प्रमुख सदस्या जो जंतर मंतर पर इन दिनों सांयकाल केंडल मार्च करने के लिए प्रमुखता से आती है। परन्तु प्रमुख नाम जिनके नाम से आंदोलनों में लोग सडकों पर उतरे थे उनके इन दिनों दर्शन तक नहीं हो रहे हैं।

गौरतलब है कि 16 दिसम्बर को दिल्ली की पेरामेडिकल की 23 वर्षीया छात्रा के साथ हुए सामुहिक बलात्कार के दोषियों को कड़ी सजा देने के लिए कानून बनाने व देश की आक्रोशित आहत जनता को विश्वास दिलाने में एक सप्ताह बाद भी केन्द्र की मनमोहन सरकार पूरी तरह असफल रही तो  आक्रोशित हजारों की संख्या में उमडे छात्र-युवाओं व प्रबुद्ध जनों के जनशैलाब ने  22 व 23 दिसम्बर को राष्ट्रपति भवन की चैखट विजय चैक से लेकर इंडिया गेट व राष्ट्रीय धरना स्थल जंतर मंतर पर स्वयं स्फूर्त हो कर न्याय की गुहार लगायी तो मनमोहन सरकार की कंपकपी निकल गयी। इन आंदोलन की कमर तोड़ने के लिए देश के हुक्मरानों ने पुलिसिया जुल्मों से शांतिपूर्ण आंदोलन कर रहे हजारों की संख्या में छात्राओं, महिलाओं व युवाओं पर जिस बर्बरता से लाठियों, पानी की बौछारों की प्रहारों व आंसू गैस के गोलों के दर्जनों बार प्रहार किया। रेस कोर्स से राजीव चैक तथा राजीव चैक से प्रगति मैदान वाले सभी सातों  मेट्रो स्टेशन पर आवागमन रोक दिया गया। इस प्रकार सरकार ने सत्तांध हो कर न तो जनभावनाओं के अनुसार बलात्कार को मोत की सजा या उम्रकेद देने के लिए कानून में संशोधन करने के लिए न तो अध्यादेश ही जारी किया व नहीं अभी तक संसद का विशेष सत्र या सर्वदलीय बैठक बुला कर इस मामले का  समाधान करने की ईमानदारी से पहल की। इससे लगता है कि सरकार को जनभावनाओं का कहीं सम्मान करती है व नहीं उसे मानवाधिकार व लोकशाही पर कहर ढाने का तनिक सा भी मलाल है। अगर सरकार को जरा सा भी जनभावनाओं या लोकशाही के प्रति सम्मान रहता तो वह तुरंत जनता पर 22 व 23 दिसम्बर को कहर ढाने वाले पुलिस के अधिकारियों के साथ साथ दिल्ली पुलिस के आयुक्त को भी तत्काल पदमुक्त करके जनाक्रोश को शांत करती।

Thursday, December 27, 2012


मोदी को प्रधानमंत्री का उम्मीदवार घोषित करके व गडकरी को पदमुक्त करके ही पार लगेगी भाजपा की नौका


मोदी के आगमन पर भाजपा मुख्यालय में भाजपा के बडे नेताओं की अनुपस्थिति ने किया मोदी युग का शंखनाद

नई दिल्ली।(प्याउ)। गुजरात में में तीसरी बार विधानसभा के चुनाव में अपने विरोधियों को चारों खाने चीत करके दिल्ली पंहुचे देश में प्रधानमंत्री पद के लिए देश की जनता का पहला पंसद बन कर उभरे गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी के दिल्ली आगमन पर भाजपा मुख्यालय 11 अशोक रोड़  में हुए मोदी के भव्य स्वागत ने साबित कर दिया कि भाजपा में अब मोदी युग का शंखनाद हो चूका है। हजारों की संख्या में उमड़े भाजपा कार्यकत्र्ताओं की मोदी के लिए ‘पीएम-पीएम’के गगनभेदी नारों के बीच भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष सहित तमाम भाजपा के वरिष्ठ नेताओं को यह बात साफ समझ में आ गयी होगी कि भाजपा का आम कार्यकत्र्ता भी अब भाजपा के भावी प्रधानमंत्री के दावेदार के रूप में स्वीकार चूका है।
कार्यकत्र्ताओं की भावनाओं पर प्रत्यक्ष टिप्पणी करने से बचते हुए केवल मोदी ने यही कहा कि बीजेपी जो जिम्मेदारी देगी, वह उसे पूरा करने का प्रयास करेंगे। इसके साथ उन्होंने अपनी सफलता के लिए भाजपा के हर कार्यकत्र्ता की मेहनत का फल बताया।
इस अवसर पर चतुर राजनीतिज्ञ की तरह नरेन्द्र मोदी ने दो टूक शब्दों में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को देश को पतन के गर्त में धकेलने का आरोप लगाते हुए  राष्ट्रीय विकास परिषद (एनडीसी) की बैठक दिये गये अपने भाषण को दोहराते हुए कहा कि मैंने प्रधानमंत्री के सामने कहा कि आप जिस पद से जो बात कर रहे हैं उससे देश में निराशा पैदा हो रही है। कार्यकर्ताओं के पीएम...पीएम नारों के बीच मोदी ने कहा, प्रधानमंत्री के सामने ‘मैंने कठोरता से अपनी बात रखी। मैंने कहा कि आपके पास कोई सोच, कोई सपना और कोई कार्ययोजना नहीं है।

इसके साथ गुजरात में विकास का परचम फेहराने वाले मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कहा कि 9 प्रतिशत की आर्थिक विकास दर का लक्ष्य तय करने वाली केंद्र सरकार इसे 7.9 प्रतिशत के स्तर पर ही पहुंचा पाई और अब सरकार ने 9 के बजाय यह लक्ष्य 8.2 प्रतिशत आंका है।
विरोधियों पर अपनी बेबाक टिप्पणी से जनता का दिल जीतने वाले नरेन्द्र मोदी ने प्रधानमंत्री व उनकी कांग्रेस सरकार के विकास के दावों की हंसी उडाते हुए कहा कि मनमोहन सरकार का लक्ष्य ही जब केवल 0.3 प्रतिशत आगे बढ़ाना है। इसके लिए पूरे देश को यहां राष्ट्रीय विकास परिषद में जमा किया गया। 0.3 प्रतिशत के लिए इतनी मशक्कत करनी पड़ रही है। यह हाल केंद्र सरकार का है।
विकास के नाम पर गुजरात में विधानसभा चुनाव में परचम फेहराने वाले श्री मोदी ने कहा कि उनके नेतृत्व में गुजरात में जो विकास हुआ उसके दम पर हम चीन को टक्कर देने की क्षमता है। हमारे पास अथाह युवा शक्ति है। जिनमें कुछ कर गुजरने का जोश हैै। देश में 65 प्रतिशत से ज्यादा आबादी 35 साल से कम उम्र के युवाओं की है। आज देश का दुर्भाग्य है कि इस विशाल युवा शक्ति वाले देश के विकास के लिए सरकार के पास न तो कोई योजना है व नहीं कोई राजनीतिक दृढ़ शक्ति ।
मंच पर भले ही आडवाणी की तस्वीर स्वागत बैनर के उपर लगी हुई थी परन्तु न तो इस समारोह में आडवाणी ही दिखे व नहीं सुषमा, जेटली व जोशी सहित कोई बडे नेता। केवल मंच पर दिल्ली बीजेपी अध्यक्ष विजेंद्र गुप्ता, भारतीय जनता युवा मोर्चा अध्यक्ष अनुराग ठाकुर, गुजरात के प्रभारी बलबीर पुंज, बीजेपी प्रवक्ता प्रकाश जावड़ेकर सहित चंद जाने पहचाने चेहरे थे।  परन्तु मोदी की उपस्थिति में भाजपा के कार्यकत्र्ता ही नहीं उपस्थित नेता भी मोदी युग का शंखनाद अपार हर्षोल्लाश के साथ कर रहे थे। मोदी के आगमन पर भारी आतिशबाजी के साथ मोदी पीएम-पीएम के गगनभेदी नारे के बीच से आ कर जब में जनसंघ काल के वरिष्ठ पत्रकार से मिला तो उन्होंने दो टूक शब्दों में कहा कि अगर भाजपा मोदी को प्रधानमंत्री का प्रत्याशी घोषित करते हुए गडकरी को अध्यक्ष पद से हटा दे तो भाजपा को आगामी लोकसभा चुनाव में ऐतिहासिक सफलता मिल सकती है। परन्तु अगर गडकरी को अध्यक्ष पद पर बनाये रखा तो भाजपा को पतन के गर्त से कोई नहीं बचा सकता है। वहीं भाजपा समर्पित एक अन्य विचारक ने कहा कि मोदी के नेतृत्व में भाजपा कल्याणसिंह व वरूण गांधी की साझीदारी से उप्र में भी चैकान्ने वाली सफलता हासिल कर सकती है।
देश में मोदी युग का शंखनाद होने की घोषणा करने वाले इन भाजपा के अग्रणी चिंतक के अनुसार मोदी को रोकने के लिए जो भीतरघात गुजरात में किया गया उसका मुहतोड़ जवाब मोदी व गुजरात की प्रबुद्ध जनता ने दिया। उनके अनुसार मोदी ने अपने विरोधियों का दिल जीतने की महारथ हासिल है। इसी के तहत उन्होंने चुनाव जीतने के बाद केशुभाई पटेल से आशीर्वाद लिया और अपने घोर विरोध कांग्रेसी नेता बघेला से भी दूरभाष में बात करके अपना बनाने का कार्य किया।
अब देखना है कि संघ व भाजपा के नेता जनभावनाओं व भाजपा के कार्यकत्र्ताओं की भावनाओं का सम्मान करते हुए मोदी को भावी प्रधानमंत्री का दावेदार अपनी तरफ से घोषित करते हुए देशहित में गडकरी को पार्टी का दुबारा अध्यक्ष न बनाने का कार्य करती है कि नहीं। संघ समय की नजाकत से सीख लेता है या गडकरी के मोह में लीन रहता है।

Wednesday, December 26, 2012


गैंगरेप की पीडि़ता को सिंगापुर में इलाज के लिए भेजा पर दिल्ली में हुआ फिर सामुहिक बलात्कार


23 व 23 दिसम्बर को शांतिपूर्ण आंदोलनकारियों पर ढाये पुलिस के अमानवीय कहर पर क्यों मूक हैं मानवाधिकार वाले

नई दिल्ली। एक तरफ सरकार ने दिल्ली में 16 दिसम्बर को सामुहिक बलात्कार की शिकार हुई पीडि़ता को इलाज के लिए सिंगापुर भेजने में जुटी हुई थी उसी दिन वृंदावन का एक गाइड दलिप ने जयपुर से दिल्ली आयी एक महिला से अपने साथियों के साथ सामुहिक बलात्कार करके महिला को को दिल्ली के कालका जी के पास फेंकने की खबर से बलात्कार के मामले पर सरकार के रवैये व पुलिसिया दमन से जनाक्रोश से धधक रही दिल्ली सहित पूरे देश के लोगों की त्योरियां और चढ़ गयी। महिला की शिकायत कालका जी थाने में दर्ज की गयी। एक तरफ सरकार दिल्ली में हो रहे एक के बाद एक बलात्कार को रोकने में असफल रही है वहीं वह बलात्कारियों को कडी सजा देने के लिए न तो अध्यादेश ही ला रही है व नहीं संसद का विशेष सत्र बुला कर जनभावनाओं के अनुरूप कठोर कानून ही बना रही है। उल्टा दोषियों को कड़ी सजा देने व इसके लिए कठोर कानून अविलम्ब बनाने की मांग को लेकर सडकों पर उतर कर न्याय की मांग कर रही शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों को लाठियों, व आंसूगैस आदि से प्रहार कर उनके लोकतांत्रिक व मानवाधिकार अधिकारों का गला घोंटने पर लगी है।
जिस प्रकार से 22 व 23 दिसम्बर को इस दुराचार की घटना से आक्रोशित शांतिप्रिय आंदोलनकारियों का आंदोलन कुचलने के लिए पुलिस प्रशासन ने असामाजिक तत्वों की आड़ में 22 दिसम्बर को राष्ट्रपति भवन की चैखट विजय चैक पर व 23 दिसम्बर को इडिया गेट पर आंदोलन को शांतिपूर्ण रूप से नियंत्रण में रखते हुए अण्णा आंदोलन के प्रमुख स्तम्भ व जनांदोलनों के महत्वपूर्ण योद्धा अरविन्द गौड अपने अस्मिता नाटय मंच के नाट्य महिला कलाकारों के साथ जुटे हुए थे। उनको ही नहीं सैकडों महिलाओं की शांतिपूर्ण आंदोलन को दिशा दे रही अस्मिता नाट्य मंच के प्रतिभावान महिला कलाकारों पर जो बर्बरता पूर्ण कहर दिल्ली पुलिस ने ढाया उसको देख कर अरविन्द गौड़ आज भी बेहद आहत है। 25 दिसम्बर को जब वे जंतर मंतर पर चल रहे आंदोलन को देखने आये थे व वहां पर चाय की दुकान पर चाय पी रहे थे तो मेरी उनसे भैंट हो गयी। उन्होंने सारी घटना को विस्तार से बताते हुए दिल्ली पुलिस सहित तमाम उन लोगों का धिक्कारा जो मानवाधिकारों का अमानवीय दमन कर रही पुलिस की 22 व 23 दिसम्बर की बर्बर कार्यवाही को जायज ठहरा रहे हे। जनांदोलनों से सशक्त हस्ताक्षर रहे अरविन्द गौड़ को अपने पूरे वदन पर लाठियों के प्रहारों से ज्यादा पीड़ा नेतृत्व विहिन हजारों की भीड़ को शांतिपूर्ण दिशा दे रही अस्मिता ग्रुप की महिला कलाकारों पर अमानवीय ढ़ग से पुरूष पुलिसवालों का हैवानियत ढ़ग से लाठियों से दमन करने से हो रहा है। उन्होंने मानवाधिाकाारों के लिए घडियाली आंसू बहाने वालों को भी धिक्कारते हुए कहा कि वे अब क्यों मूंह छुपाये हुए है। उनको सरेआम शांतिपूर्ण आंदोलनकारियों का दमन करने वाली पुलिस प्रशासन का कहर क्यों नहीं दिखायी दे रहा है। श्री गौड ने कहा कि अगर सरकार सहित इस व्यवस्था को जरा भी शर्म होती तो इस दमन के दोषी पुलिस वालों को तत्काल बर्खास्त करके देश से माफी मांगती।
23 दिसम्बर को केवल अरविन्द गौड ही नहीं अपितु भाजपा के राष्ट्रीय महासचिव जो अपनी बेटियों के साथ इस आंदोलन के समर्थन देने को आये थे उनको भी लाठियों से कहर ढाया। वहीं देश के अग्रणी चिंतक योगेन्द्र यादव पर भी कई पुलिस वालो ंने लाठियों की मार से कहर ढाया। 26 दिसम्बर को जब वे जंतर मंतर पर तेलांगना आंदोलनकारियों व बलात्कारियों को सजा की मांग कर रहे आंदोलनकारियों को समर्थन देने आये थे तो उनसे मेरी भेंट हुई। उन्होंने बताया कि पुलिस की लाठियों से कराह रही महिला को बचाने को गया तो उस पर भी कई पुलिस वालों ने ताडबतोड़ लाठियां बरसा दी। उन्होंने कहा कि शांतिपूर्ण आंदोलनकारियों, महिलाओं व बच्चों तथा बुजुर्गो पर कहर ढाने वाली पुलिस की कार्यवाही बेहद निदनीय और लोकशाही का गला घोंटने वाली है। वहीं इस प्रकरण में अरविन्द केजरीवाल को ही नहीं दिल्ली पुलिस के कहर से रामदेव व पूर्व सेनाध्यक्ष वी के सिंह भी नहीं बचे। दिल्ली पुलिस द्वारा देश के पूर्व सेनाध्यक्ष पर लाठी का प्रहार की बात से ही दिल्ली पुलिस व प्रशासन की अदूरदर्शिता व विवेकशून्यता के बारे में क्या कहा जाय। देश के संवेधानिक महत्वपूर्ण पदो ंपर आसीन व्यक्ति पूर्व हो या वर्तमान देश की शान होती है। फिर सेना का मामला बहुत ही संवेदनशील है। इस प्रकरण पर दिल्ली पुलिस के आयुक्त सहित उस स्थान के उच्चाधिकारी तथा दोषी कर्मी को अविलम्ब नौकरी से बर्खास्त करके सरकार को देश से माफी मांगनी चाहिए थी।
दिल्ली पुलिस के जवान की मौत से पूरा देश दुखी है। इस प्रकार की घटनायें नहीं होनी चाहिए। परन्तु जिस प्रकार से चश्मदीद व्यक्ति व चिकित्साधिकारी ने पुलिस के दावों पर सवालिया निशान खडे किये उससे लगता है कि पुलिस दुराग्रह से निर्दोष व्यक्तियों को फंसा कर आंदोलन को रौंदना चाहती है। यह सत्यमेव जयते का आदर्श आत्मसात करने वाली भारत की संस्कृति का अपमान ही नहीं देश के संविधान का अपमान के साथ साथ पुलिसिया शक्तियों का खुला दुरप्रयोग भी है।
 

Tuesday, December 25, 2012


तू प्यार का सागर है, तेरी एक बूंद के प्यासे हम...’


वाजपेयी जी के जन्म दिवस पर दिल्ली के फिक्की में गूंजे कविता सेठ के सुफियाना गीत 


25 दिसम्बर को जब विश्व भर में क्रिसमस का पर्व बहुत धूमधाम से मनाया जा रहा था तब सांय पोने सात बजे के करीब  मैं, उत्तराखण्ड राज्य गठन जनांदोलन के साथी इंजीनियर जगदीश भट्ट के साथ इस सभागार में पंहुचा तो वहां पर चारों तरफ अटल जी के जीवन की विभिन्न पहलुओं को उजागर करने वाली तस्वीरों की गेट के अंदर व सभागार के बाहर लगी हुई थी। उनके आदम कद तस्वीरों से वहां सजा हुआ था। उनके 88वें साल के प्रतीक 88 दीपक प्रज्वलित किये गये थे।
पूर्व प्रधानमंत्री व भाजपा के शीर्ष नेता अटल बिहारी वाजपेयी के 88वें जन्म दिवस पर, 25 दिसम्बर की सांयकाल को दिल्ली के मण्डी हाउस के समीप फिक्की सभागार में देश की अग्रणी सूफी गायिका कविता सेठ के मधुर स्वरों से गूंजायमान रहा। सभागार में भाजपा के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष डा. मुरली मनोहर जोशी सहित भाजपा नेताओं व कार्यकत्र्ताओं से खचाखच भरे सभागार में जैसे ही कविता सेठ ने वाजपेयी के जन्म दिवस पर सूफियाने अंदाज में ‘तू प्रेम का सागर है, तेरी एक बूद के प्यासे हम........’गाया तो मुरली मनोहर जोशी सहित तमाम उपस्थित वाजपेयी युग के साक्षी रहे राजनेता वाजपेयी की यादों में मन ही मन इस गीत को गुनगुनाने लगे। इस सभागार में हर किसी को एक ही कमी खल रही थी वह कमी थी कि काश वाजपेयी साक्षात इन गीतों के गायन के समय इस सभागार में होते तो इस आयोजन को चार चांद लग जाते। परन्तु सबके दिलों में एक टीस थी कि ‘काल के कपाल पर गीत लिखने ’ जैसे कविता लिखने वाले भाजपा के महानायक अटल बिहारी वाजपेयी आज इस सभागार से चंद फलांग दूर पर होने के बाबजूद महाकाल के विधान के कारण इन सबकी खुशी में सदेह सम्मलित नहीं हो पाते। गायिका कविता सेठ के इस गीत को सुनने के बाद में सभागार से बाहर आये तो बाहर भाजपा के कार्यकत्र्ता वाजपेयी के 88 वें जन्म दिवस पर मिष्ठान वितरित कर रहे थे। थोड़ी देर बाद मेने देखा कि वाजपेयी के समकक्ष भाजपा के वरिष्ठ नेता मुरली मनोहर जोशी भी अपने सुरक्षा दस्तों के घेरे में सभागार से अपने  निवास की तरफ निकल पडे। मैं व मेरे साथी जगदीश भट्ट  भी  भाजपा के शीर्ष नेता अटल की यादों का स्मरण करते हुए अपने गंतव्य की तरफ चल पडे।

Monday, December 24, 2012


अविलम्ब अध्यादेश लाने के बजाय न्याय की मांग  करने वालों पर फर्जी मुकदमे बनाने से बाज आये सरकार


अपनी नाकामयाबी को छुपाने के लिए पूर्व थल सेना प्रमुख व बाबा रामदेव पर प्रतिशोध में मुकदमें दर्ज 

जनाक्रोश प्रकरण मे दमनकारी पुलिस अधिकारियों पर नहीं यातायात व पीसीआर सहायक उपायुक्तों पर क्यों गिरा रही है गाज

नई दिल्ली।(प्याउ)। आक्रोशित जनता की मांग के अनुसार सरकार बलात्कारियों को कठोर सजा देने के लिए अध्यादेश लाने के या संसद का विशेष सत्र बुला कर कठोर कानून बनाने के बजाय न्याय की मांग करने वाले बाबा रामदेव व पूर्व सेनाध्यक्ष वी के सिंह पर मामला दर्ज करने और शांतिपूर्ण आंदोलनकारियों पर दमनकारी कहर ढाने का आत्मघाती काम कर रही है।  दमनकारी पुलिस अधिकारियों को दण्डित करने के बजाय वह यातायात व पीसीआर के सहायक उपायुक्तों पर गाज गिरा कर जनता की आंखों में धूल झोंकने का काम कर रही है।
सीबीआई के पूर्व निदेशक जोगेन्द्र सिंह , पूर्व न्याय मंत्री शांति भूषण सहित तमाम कानून के विशेषज्ञों का मानना है कि सरकार को जनाक्रोश का दमन करने के बजाय तुरंत बलात्कार की धारा 376 में महज दो लाइन जोडते हुए इसकी न्यूनतम सजा उम्रकैद और अधिकतम सजा फांसी करना चाहिए था ।इसके ड्राफ्टिंग केवल 15 मिनट के भीतर हो सकता है। सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश जस्टिस पीबी सांवत के अनुसार भी सरकार अध्यादेश लाकर बलात्कार के अपराध की सजा फांसी बना कर इसे  छह माह के भीतर संसद की मंजूर भी कराना होगा। वहीं पूर्व कानून मंत्री शांतिभूषण का भी कहना है कि वर्तमान परिस्थितियों में लोगों का गुस्सा ठंडा करने के लिए अध्यादेश ही सही रास्ता है। यदि सरकार को समय गंवाये बिना तुरंत सर्वदलीय बैठक बुला कर इस आशय का अध्यादेश निकाल देती तो देश को ऐसा जनाक्रोश नहीं झेलना पडता।
 एक छात्रा से 16 दिसम्बर को हुए दुराचार के मामले में जनभावनाओं के अनरूप न्याय की ठोस पहल न करके जनाक्रोश को दूर करने में नकाम रही सरकार ने जनता की आंखों में धूल झोकने के लिए दिल्ली पुलिस के दो सहायक उपायुक्तों को निलम्बित कर दिया है । दिल्ली के उप राज्यपाल तेजिन्दर खन्ना ने अपनी अमेरिका की अपनी यात्रा बीच में ही छोड़कर राजधानी वापस लौटने के बाद अपने संबाददाता सम्मेलन में दमनकारी पुलिस अधिकारियों के बजाय ट्रेफिक व पीसीआर के सहायक उपायुक्तों को निलंबित करने का ऐलान किया। उप राज्यपाल ने पुलिस आयुक्तों मोहन सिंह डबास (ट्रैफिक) और यागराम (पीसीआर) को निलंबित कर दिया है। सरकार की इस मामले में स्थिति इतनी दयनीय  है  कि वह अध्यादेश निकालना तो रहा दूर वह एक सप्ताह के भीतर इस मामले में आरोप पत्र दाखिल भी दाखिल नहीं कर पायी।
सरकार अपनी असफलता छुपाने के लिए व प्रतिशोध में 23 दिसम्बर को जंतर-मंतर पर हुए प्रदर्शन के सिलसिले में दर्ज एफआईआर में पूर्व सेना प्रमुख वीके सिंह और योग गुरु बाबा रामदेव पर मामुली से लाठी चार्ज को  आधार बना कर मामला दर्ज करा चूकी है। जबकि यहां पर बाबा रामदेव व उनके समर्थकों ने  बहुत सुझबुझ से काम ले कर शांतिपूर्ण आंदोलन कर सांयकाल वापस चले गये थे। देश की जनता इसे  राजनैतिक प्रतिशोध मान रही है। जनता यह देख कर हैरान है कि सरकार बलत्कारियों को दण्डित करने के लिए ठोस कानून बनाने के बजाय इसकी शांतिपूर्ण मांग कर रहे लोगों पर फर्जी मुकदमे व दमन क्यों कर रही है। अगर सरकार समय  पर अध्यादेश ले आती और दमनकारी पुलिस अधिकारियों को दण्डित करती तो देश में यह जनाक्रोश इतना नहीं बढ़ता। इसके बजाय सरकार आम जनता को परेशान करने के लिए यातायात को अवरूद्ध कर रही है। सरकार के इस नक्कारेपन से जहां लाखों लोगों को देशभर में सडकों पर उतरना पडा वहीं सैकडो लोग घायल हो गये और पुलिस के जवानों को अपनी शहादत देनी पड़ी। सोनिया गांधी के अलावा देश का कोई बडा नेता आंदोलनकारियों  से मिलने का साहस तक नहीं कर पाया। सरकार  को चाहिए कि अभी समय गंवाये बिना इस आशय का तुरंत अध्यादेश ला कर और फर्जी प्रतिशोध के मुकदमे वापस लेते हुए दमनकारी पुलिस अधिकारियों को दण्डित करे।

Sunday, December 23, 2012


जनांदोलन को और फैलने से पहले बलात्कारियों को मौत की सजा का कानून बना कर दमनकारी पुलिस पर अंकुश लगाये सरकार,




शांतिपूर्ण आंदोलन का दमन न करे सरकार, आंदोलनकारी पुलिस व सम्पतियों को किसी भी हालत में नुकसान न पंहुचाये

किसी भी सूरत में हिसक न हों पुलिस व आंदोलनकारी 

रविवार को भी दिल्ली में गत रविवार की रात को चलती हुई बस में एक पेरामेडिकल की छात्रा के साथ हुए सामुहिक बलात्कार के विरोध सरकार द्वारा ठोस कदम न उठाये जाने से पूरा देश आक्रोशित है। भले ही रविवार 23 दिसम्बर को राष्ट्रपति भवन की तरफ आंदोलनकारियों ने पुलिस की भारे अवरोधों के कारण न किया हो परन्तु इडिया गेट व जंतर मंतर पर आंदोलनकारियों ने अपनी आवाज बुलन्द रखी। परतु न जाने क्यों पुलिस आंदोलनकारियों पर लाठी व आंसू गैस बरसा कर आंदोलनकारियों का दमन करके आंदोलन को भड़का रही है। आंदोलनकारियों को भी न तो किसी प्रकार से सरकारी या निजी सम्पतियों को नुकसान नहीं पंहुचाना चाहिए और नहीं पुलिस से किसी प्रकार की मुठभेड़ करके आंदोलन की धार को कमजोर बनाना चाहिए। बलात्कारियों को यथाशीघ्र कड़ी सजा मिलनी चाहिए। आंदोलनकारी एक ही मांग कर रहे हैं कि इस प्रकार के बलात्कारियों को फास्ट कार्ट में मामला चले तथा इस प्रकार के अपराधियों को कम से कम मृत्यु दण्ड देने का कानून बनाया जाय। परन्तु समझ में नहीं आता कि सरकार इस प्रकार के कदम उठाने की महत्वपूर्ण मांग पर भी मूक क्यों बनी हुई है।?
सरकार को शांतिपूर्ण आंदोलनकारियों, खासकर महिलाओं पर भी बर्बरता से दमनकारी हथकण्डों पर रोक लगानी चाहिए। पुलिस के दमनकारी रवैये से यह आंदोलन शांत होने के बजाय यह पूरे देश में और तेजी से भड़क सकता है।
वहीं सरकार की तरह आंदोलनकारियों को भी शांति बनाये रखना चाहिए। पुलिस या असमाजिक तत्वों द्वारा भडकावे की कार्यवाही के बाबजूद किसी प्रकार से आगजनी, पथराव व सरकारी या निजी सम्पति की तोड़ फोड़ नहीं करनी चाहिए। किसी भी सूरत पर पुलिस पर हमला या पथराव नहीं करना चाहिए। 23 दिसम्बर की दोहपर बाद जंतर मंतर पर बाबा रामदेव व पूर्व सेनाध्यक्ष जनरल वी के सिंह ने बहुत सुझबुझ से आज अपने आंदोलन का संचालन किया। सरकार को चाहिए कि बिना नेतृत्व के चल रहा यह आंदोलन को और फेलने से पहले बलात्कारियों को मौत की सजा का कानून बनाने का ऐलान करने के साथ, शांतिपूर्ण चल रहे आंदोलन को लाठी व आंसू गैस के बल पर दमन करने का हथकण्डे को त्यागे। जिस प्रकार से इन दो दिनों के आंदोलन में कई पुलिस वाले व आंदोलनकारी गंभीर रूप से घायल हो गये है और पुलिस के जवान मारे गये हैं वह बहुत ही चिंताजनक बात है। इससे न तो इस आंदोलन को लाभ होगा व नहीं देश को । आंदोलनकारियों व पुलिस दोनों को एक दूसरे को दूश्मन की तरह व्यवहार न करना चाहिए। दोनों को देशहित के बारे में पहले सोचना चाहिए। सरकार सहित तमाम राजनैतिक दलों को जनता का विश्वास व्यवस्था से उठने से पहले अविलम्ब जनभावनाओं का सम्मान करते हुए बलात्कार के दोषियों को फांसी का कानून बनाने के साथ ही ये मामले त्वरित अदालत में चलाने की प्रक्रिया शुरू करें तथा दमनकारी पुलिस पर अंकुश लगाने का ऐलान करे। इससे ही वर्तमान यह जनाक्रोश शांत हो सकता है।
जिस प्रकार से 22 दिसम्बर को मेने दिन भर राष्ट्रपति भवन से इंडिया गेट तथा 23 दिसम्बर को सांयकाल तक जंतर मंतर का आंदोलन अपनी आंखों से देखा व समझा तथा इसके बाद जो कुछ इन दोनों दिनों के आंदोलन की झलकियां खबरिया चैनलों में देखा तो मुझे यही कहना है कि सरकार ही नहीं पुलिस व आम आंदोलनकारियों का भी यह दायित्व बनता है कि किसी भी हालत में इस आंदोलन को अराजक व हिंसक न बनने दें। इससे देश का ही नुकसान होगा। सप्रंग सरकार की मुखिया सोनिया गांधी को अपने कुशासन से देश को पतन के गर्त में धकेल रहे प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के भरोसे यह समस्या न छोड़ कर अविलम्ब सरकार से इस समस्या का समाधान खोजने के लिए अपने प्रभाव का प्रयोग करे। सोनिया गांधी ने आक्रोशित आंदोलनकारियों से मिल कर जहां विवेकपूर्ण कार्य किया वहीं उनको सरकार से तुरंत बलात्कार के दोषियों के लिए हरदिन मामला चलाते हुए इनको मौत की सजा का विधान बनाने के लिए दवाब बनाना चाहिए। इसके साथ दिल्ली पुलिस के दोषी अधिकारियों को अविलम्ब निलंबित करना चाहिए।

Saturday, December 22, 2012


‘आपको गुरू घण्टाल तो नहीं, गुरू कहूगा ...’ मेजर जनरल खण्डूडी जब मुझको देखते ही बोले 


‘आपको गुरू घण्टाल तो नहीं, गुरू कहूगा..क्या हाल हैं आपके ’ गत रविवार 16 को दोपहर जैसे ही उत्तराखण्ड के मुख्यमंत्री दिल्ली में शंकराचार्य माधवाश्रम जी महाराज के अभिनन्दन समारोह से आशीर्वाद लेने के बाद आश्रम के गेट पर खड़ी अपनी कार में बैठने के लिए कार के दरवाजे पर ही पंहुचे तो वहां पर यकायक मुझे सामने खडे देख कर मुस्कराते हुए दोनों हाथों से मेरे दोनों कंधे पर रखते हुए बरबस बोल पडे। मैने हंसते हुए कहा मैं तो ठीक हूॅ आप बतायें सब कुशल से हें आप और परिवार में सब कुशल से हैं। उन्होंने भी कहा सब ठीक है। उनके साथ उस समय खण्डूडी की तरह साथ रहने वाले उनके सहायक जयवीर सिंह रावत भी साथ थे। शंकराचार्य माधवाश्रम के परम शिष्य श्री वशिष्ट जी सहित कई लोग उनको विदाई देने के लिए हाथ जोड़ कर वहां पर खडे थे। उत्तराखण्ड के पूर्व मुख्यमंत्री व भाजपा के वरिष्ट नेता मेजर जनरल भुवनचंद खण्डूडी 16 दिसम्बर को दिल्ली में सिविल लाइन स्थित शंकराचार्य आश्रम में ज्योतिष्पीठ पर शंकराचार्य के पद पर शंकराचार्य माधवाश्रम जी महाराज के आसीन होने के 19 वर्ष होने पर आयोजित अभिनन्दन समारोह में शंकराचार्य से आशीर्वाद लेने हर साल की तरह पंहुचे थे।गौरतलब है उत्तराखण्ड की जनभावनाओं के अनरूप मुख्यमंत्री रहते हुए मै खण्डूडी जी के कार्यो की कटु आलोचना सार्वजनिक मंचों व प्यारा उत्तराखण्ड समाचार पत्र में प्रमुखता से करता रहा हॅू। इस कारण न केवल भुवनचंद खण्डूडी अपितु उनकी धर्मपत्नी श्रीमती अरूणा खण्डूडी तथा उनके समर्थक भी मेरे से लम्बे समय से तिवारी निशंक, सतपाल महाराज, हरीश रावत, विजय बहुगुणा व कोश्यारी की तरह नाराज है। खंडूडी जी मेरे से मिलने पर पहले प्रायः नजरे इधर उधर फेर देते थे।
 

भारतीय लोकशाही के इतिहास में पहली बार राष्ट्रपति भवन पर से इंडियागेट तक काबिज रहे हजारों आंदोलनकारी 



बलात्कारियों को फांसी देने की मांग करने वालों पर पुलिस ने बरसाये आंसू गैस व लाठियां

जनाक्रोश से सहमी सरकार, दिल्ली की सीमाये सील, सोनिया भी मिली आंदोलनकारियों से 

 दिल्ली में गत रविवार को चलती हुई बस में हुए सामुहिक बलात्कार के खिलाफ व दोषियों को फांसी की सजा देने की मांग को लेकर जनता का गुस्सा उफान पर है। आजाद भारत के इतिहास में पहली बार किसी जनांदोलन के हजारों आंदोलनकारियों ने पूरे दिन राष्ट्रपति भवन, विजय चैक से लेकर इंडिया गेट तक पूरा राजपथ आक्रोशित छात्र व छात्राओं के साथ आम जनता के कब्जे में रहा। इससे सहमी सरकार ने 22 दिसम्बर की सुबह से जमी जनता को 23 दिसम्बर की प्रातः 6.30 बजे पुलिसिया बल के सहारे उठा कर विजय चैक सहित पूरा इलाका जनता से मुक्त करा दिया है। देर रात कपंकंपा देने वाली भारी ठण्ड में भी जमे हुए जांबाज 100 के करीब आंदोलनकारियों को पुलिस ने उठा कर दिल्ली के बवाना या गाजियाबाद के इन्द्रापुरम इलाके में छोड दिया है और बवाना में अस्थाई जैल बना डाली। रेल भवन के पास भी बेरिकेट लगा कर पूरे इलाके में रेपिड एक्शन पुलिस बल भी तैनात कर दिया है। सरकार को  आशंका है कि रविवार को भारी संख्या में जनता पर विरोध प्रदर्शन करने को आ सकती है। गौरतलब है कि बाबा रामदेव सहित कई संगठनों ने 23 दिसम्बर को यहां पर प्रदर्शन का ऐलान कर दिया था। आजादी के बाद पहली बार विजय चैक से इंडिया गेट तक दिन भर काबिज रही जनता के जनाक्रोश से सहमी सरकार ने इस पूरे क्षेत्र सहित नई दिल्ली में धारा 144 लगाते हुए मेट्रो  के सात स्टेशन केन्द्रीय सचिवालय, रेस कोर्स, मंडी हाउस, उद्योग भवन, बाराखम्बा व पटेल चैक अस्थाई रूप से बंद कर दिया है। देर रात सोनिया गांधी भी आंदोलनकारियों से मिली।
गौरतलब है कि शनिवार 22 दिसम्बर की प्रातःकाल से ही हजारों की संख्या में छात्र व छात्रायें हाथों में बलात्कारियों को फांसी दो जैसे नारे लिखे पट्टों को लिये गगनभेदी नारे लगाते हुए जमे रहे। ये स्कूल कालेज जाने वाली उम्र के हजारों की संख्या में स्वयं इस आंदोलन का अंग बने बच्चों का आक्रोश देखते ही बनता था।  साढ़े ग्यारह बजे दोपहर से सांय पौने सात बजे तक मैं राष्ट्रपति भवन से लेकर इंडिया गेट अमर जवान ज्योति तक मैं हपले अकेले व बाद में राज्य गठन आंदोलनकारी साथी अनिल पंत के साथ आंदोलन में डटा रहा। इस दौरान देश की इस सबसे प्रतिष्ठित व संवेदनशील उच्च सुरक्षा क्षेत्र से जुड़े स्थान पर काबिज आंदोलनकारियों से मुक्त कराने के लिए पांच से अधिक बार आंसू गैस व लाठी चार्ज का सहारा भले ही ले लिया हो परन्तु यहां पर पुलिस को मुंह की खानी पड़ी। पुलिस द्वारा 6 बार लाठी चार्ज व आंसू गैस के खेल चल जाता। राष्ट्रपति भवन से लेकर राजपथ के समीप रेल भवन के पास भी सांय साढ़े छह बजे तक यहां पर चले आंसू गैस के गोलों ने मुझे उत्तराखण्ड राज्य गठन आंदोलन के 1994 व 1995 के आंदोलनों पर पुलिस के  दमन की यादों ने मुझे झकझोर कर रख दिया। राष्ट्रपति भवन, संसद भवन के साथ ही नार्थ व साउथ ब्लाक में देश के सर्वोच्च नीति निर्धारकों का कार्यालय के पास आजादी के बाद के इतिहास में पहली बार दिन भर हजारों आंदोलनकारियों ने दिन भर का प्रचण्ड धरना दिया। वेसे इस क्षेत्रमें धरना प्रदर्शन की बात ही अकल्पनीय है। मैं आरक्षण विरोधी मण्डल कमीशन के आंदोलन के समय वोट क्लब पर आयोजित टिकैत वाली रेली का साक्षी रहा, 1984 में इंदिरा गांधी की हत्या के बाद सिख दंगो का काला इतिहास का भी साक्षी रहा, यही नहीं रामजन्म भूमि आंदोलन का भी साक्षी रहा। अभी हाल के एकाद सालों में देश व्यापी जनांदोलनों की श्रेणी में राष्ट्र के आंदोलित करने वाले बाबा रामदेव व अण्णा के आंदोलनों का भी में साक्षी रहा। परन्तु तब भी किसी एक भी आंदोलन में इस अतिविशिष्ठ स्थल पर आंदोलनकारियों ने अपने पांव तक नहीं रखे। उत्तराखण्ड राज्य गठन जनांदोलन को 1994 से 2000 तक के जनांदोलन का तो मैं एक सिपाई ही रहा। परन्तु इस अतिविशिष्ठ स्थान पर पहली बार पूरे दिन भर आंदोलनकारियों ने आंदोलन से गूंजायमान किया यह पहली बार देखा।
इस आंदोलन को मैं स्वयं स्फूर्त आंदोलन ही कहूंगा। क्योंकि इसमें अधिकांश वे छात्र व छात्रायें थी जो प्रायः समृद्ध परिवारों से सम्बंध होने के कारण कभी जीवन में इस प्रकार के आंदोलनों में सम्मलित हुए होंगे। इसी कारण इन छा आंदोलन में  पंहुचे किसी राजनैतिक दल या नेता की कोई विशेष महत्व नहीं दिया। हालांकि मैने खुद इस आंदोलन में विजय चैक के पास माकपा नेत्री वृन्दा करात को उनके चंद पार्टी जनों को छोड़ कर किसी ने विशेष महत्व नहीं दिया। ठीक इसी प्रकार का भाजपा के नगर निगम के नेता को भी आंदोलनकारियों ने ज्यादा  भाव नहीं दिये। इस आंदोलन में आम आदमी की पार्टी के गोपाल राय, मनीष सिसोदिया व कुमार विश्वास ने राष्ट्रपति भवन के समक्ष चल रहे पुलिस बेरेकेट के समक्ष को मजबूत करने के बजाय वहीं किनारे मुख्य बेरेकेट से 200 मीटर दूर पर कुछ दर्जन आंदोलनकारियों को लेकर अपनी समान्तर सभा का संचालन किया। इसके बाबजूद टीम अन्ना के सहयोगी अरविन्द गौड के अस्मिता ग्रुप के जीवंत नारों व आंदोलनों से राष्ट्रपति भवन को गूंजायमान रहा। बच्चों खासकर महिला उा आंदोलनकारियों का आक्रोश देखते ही बनता था। पता नहीं क्यों सोनिया व मनमोहन को राष्ट्र की जनभावनाओं को समझने में समय लग रहा है। अविलम्ब बलात्कारियों को फांसी की सजा देने का कानून बनाने व उदासीन दिल्ली पुलिस को इस काण्ड की सजा देने में क्यों बिलम्ब कर रही है। दोषियों को सजा मांगने व इस प्रकरण पर न्याय मांगने वाले युवाओं पर दिल्ली पुलिस ने पाच छह बार आंसू गैस व लाठी चार्ज करके तीन दर्जन से अधिक आंदोलनकारियों को घायल कर दिया । वहीं पुलिस ने इस झडपों में अपने दो डीएसपी सहित 37 पुलिस जवानों को घायल बताया है। इस पूरे प्रकरण में लगता नहीं कि देश में कोई सरकार नाम की कोई चीज है। संवेदनहीन मनमोहन सरकार न जाने देश को और कितने दंशों से मर्माहित करेगी।

Friday, December 21, 2012


विश्व शांति के नोबेल पुरस्कार से सम्मानित हों विकिलीक्स प्रमुख असांजे 




असांजे द्वारा अमेरिका सहित संसार भर के हुक्मरानों के कृत्यों को फिर से बेनकाब करने की हुंकार भरने से मचा विश्व में हडकंप 

वि
श्व लोकशाही को अपने सामरिक ताकत के बल पर रौंदने वाले अमेरिकी हुक्मरान सहित विश्व के अधिकांश अलोकतांत्रिक हुक्मरानों के कृत्यों को पूरे विश्व के समक्ष बेनकाब करने वाले विकिलीक्स के संचालक जुलियन असांजे को विश्व शांति का सर्वोच्च शांति पुरस्कार ‘नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया जाना चाहिए। अपनी जान व व्यवसाय को जोखिम में डाल कर असांजे ने अमेरिका सहित विश्व के अधिकांश देशों के प्रमुखों के विश्व शांति व लोकशाही को ग्रहण लगाने वाले कृत्यों के उजागर होने से पूरे विश्व की जनता जागृत हो गयी है और संसार के किसी भी देश के हुक्मरान द्वारा संसार की शांति व लोकशाही को ग्रहण लगाने की प्रवृति का मुंहतोड़ जवाब देंगे।
जैसे ही श्री असांजे ने अपनी विश्व विख्यात बेबसाइट विकिलीक्स से अमेरिका सहित अन्य देशों के हुक्मरानों को बेनकाब किया उससे वह अमेरिका की नजरों में खटकने लगा। उसको किसी भी हालत में फंसाने का ताना बाना बुना जा रहा है। इसी के तहत आस्टेªलिया के इस पूर्व कंप्यूटर के महारथी को अमेरिका के पिट्ठू बने ब्रिट्रेन ने जब ऐन केन प्रकारेण से अमेरिका के इशारे पर बंद करने की कोशिश की तो इक्वाडोर ने असांजे को अपने दूतावास में शरण दे दी। इस सप्ताह दूतावास की बालकनी से अपने 100 से अधिक समर्थकों को सम्बोधित करते हुए असांजे ने इक्वाडोर के राष्ट्रपति राफेल को धन्यवाद देते हुए कहा कि शीघ्र ही उसके पास मौजूद अमेरिका सहित विश्व के सभी देशों के हुक्मरानों के गोपनीय दस्तावेज जगजाहिर करके इनका चेहरा दुनिया के सामने बेनकाब करेंगे। वहीं स्वीडन में असांचे पर किये गये एक मामले में उसका प्रत्यर्पन करने के लिए ब्रिट्रेन तैयार है। इसी से बचने के लिए असांजे विगत छह माह से इक्वाडोर के दूतावास में शरण लिये हुए है। वहीं इक्वाडोर के राष्ट्रपति ने असांचे को अपना समर्थन जारी रखने का साहसिक कार्य किया। इसके लिए न केवल असांचे अपितु पूरे संसार के बुद्धिजीवी व लोकशाही के समर्थक इक्वाडोर के राष्ट्रपति के साहस को भी शतः शतःनमन् करते है। क्योंकि जो साहस संसार का कोई भी देश अमेरिका के प्रकोप के डर से इस मामले का विरोध करने तक का भी साहस नहीं जुटा पा रहे हैं। असांजे सहित विश्व लोकशाही के समर्थकों को इस बात की आशंका है कि अमेरिका स्वीडन व ब्रिट्रेन से मिल कर किसी न किसी बहाने असांजे का मूंह बंद करना चाहता है। इसी कारण स्वीडन में चलाये जा रहे मामले के पीछे भी अमेरिका का ही हाथ माना जा रहा है।
 —

बलात्कारियों को उम्र केद नहीं ,मृत्य दण्ड की मांग करे सरकार

बलात्कारियों को फांसी की सजा देने की मांग करने के बजाय उन पर दया कर क्यों उम्रकेद मांग रही है सरकार 


नई दिल्ली(प्याउ)।दिल्ली में पेरामेडिकल की छात्रा से गत रविवार की रात को हुए सामुहिक बलात्कार के हैवानों को सड़क से लेकर संसद तक हर कोई मृत्युदण्ड देने की मांग कर रहे है । दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला, उप्र की मुख्यमंत्री मायावती, नेता प्रतिपक्ष सुषमा स्वराज, ही नहीं तमाम सांसद से लेकर देश के आम प्रबुद्ध लोगों की एक स्वर में मांग कर रहे हैं कि इस प्रकार के बलात्कारियों को जब तक फांसी की सजा भी कम है। जब तक इस प्रकार के अपराधियों को फांसी नहीं दी जाती है तब तक इस प्रकार के घृर्णित अपराधों पर अंकुश नहीं लगाया जा सकेगा। स्वयं प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह, सप्रंग प्रमुख सोनिया गांधी से लेकर देश का हर जागरूक इंसान इस प्रकरण पर अपनी कड़ी भत्र्सना व्यक्त कर चूका है। यही नहीं स्वयं इन काण्ड के छहः दरिन्दों में से एक दरिंदे ने अपने लिए फांसी की सजा की मांग कर चूका है। यही नहीं इन दरिंदों के परिजन भी इनके लिए फांसी की सजा की मांग कर चूके है। परन्तु क्या मजाल है कि भारत सरकार क्यों इन दरिंदों पर रहम कर इनके लिए फांसी की सजा की मांग करने के बजाय मृत्यृदण्ड की सजा की मांग करने जा रही है। ऐसे दरिंदों को और जिन्दगी किस बात के लिए सरकार देना चाहती है। सरकार को या तो देश की आम जनता की भावनाओं व आक्रोश का भान नहीं या सरकार को इस प्रकार के अपराधों की गंभीरता को कम कर आंक रही है। देश में तो रहा दूर राजधानी दिल्ली में 4 साल की बच्ची से लेकर बुजुर्ग महिलाओं पर निरंतर इस प्रकार के दरिंदों द्वारा बलात्कार किया जा रहा है। ऐसे में जब अपराधियों में कानून का भय समाप्त हो गया। ऐसे अपराधियों को जीवन दे कर यानी उम्रकेद दे कर सरकार क्यों ऐसे अपराधियों को कानून का खौप कम करने जा रही है। इस समय ऐसे अपराधों पर अंकुश लगाने के लिए मृत्युदण्ड भी देश की आक्रोशित जनता को कम नजर आ रहा है।
परन्तु भारत सरकार इस काण्ड के दोषियों को मृत्युदण्ड के बजाय उनकी जान बचाते हुए केवल उम्रकेद की ही मांग करने जा रही है। कम से कम गृह सचिव आर के सिंह के  शुक्रवार 21 दिसम्बर, को दिये गये बयान से सरकार का चेहरा पूरी तरह से बेनकाब हो गया। आजतक सहित तमाम मीडिया में गृह सचिव के बयान को प्रमुखता से दिखाया गया कि दोषियों को उम्रकैद दिलाने की कोशिश होगी।  गृह सचिव के बयान से पहले लोगों को आशा थी कि जिस प्रकार से गृह मंत्री बयान दे रहे थे कि कड़ी सजा देने का प्रावधान किया जायेगा।
समझ में नहीं आ रहा है कि इस सामुहिक बलात्कार की हैवानियत देख कर पत्थर दिल इंसान भी आंसू बहा रहे हैं परन्तु देश की सरकार इन दरिंदों को जीवन दे कर क्यों जनभावनाओं से खिलवाड़ कर रही है। सरकार का बयान 21 दिसम्बर को उस समय आया जब महिलाओं ने राष्ट्रपति भवन पर प्रचण्ड प्रदर्शन किया। जब दिन भर राष्ट्रीय धरना स्थल जंतर मंतर पर अरविन्द केजरीवाल की आम आदमी की पार्टी के अलावा कई प्रदर्शन हुए। गुस्से में आक्रोशित लोगों ने इंडिया गेट में मोमबत्ती जला कर प्रदर्शन किया। सभी एक स्वर में बलात्कार करने के दोषियों को तुरंत दो महिने के अंदर फांसी की सजा देने की मांग कर रहे थे। परन्तु देश की सरकार बेशर्मी से इन दरिंदों पर दया करते हुए इनको मृत्यु दण्ड देने की मांग करने के बजाय इनको उम्रकेद देने की मांग करने जा रही है। अब तक बलात्कार की घटना पर घडियाली आंसू बहाने वाली सरकार का यह बयान अपने आप सरकार को बेनकाब करता है।

Thursday, December 20, 2012


मोदी के गुजरात विजय से कांग्रेस ही नहीं भाजपा नेताओं की भी उड़ी हवाईयां


वीरभद्र की ताजपोशी में विध्न डाल कर आत्म हत्या करने से बाज आये कांग्रेस



20 दिसम्बर को गुजरात व हिमाचल प्रदेश के विधानसभा चुनाव 2012 के चुनाव परिणाम घोषित होने से साफ हो गया कि नरेन्द्र मोदी जहां आज देश के सर्वोच्च जनप्रिय नेता हैं तो वीरभद्र कांग्रेस के सबसे बडे जनाधार वाले नेता हैं।गुजरात विधानसभा चुनाव में मोदी ने अपने दम पर भाजपा को फिर से सत्तारूढ़ करने में सफल रहे वहीं हिमाचल में पूरे देश में कांग्रेस के खिलाफ बने भारी माहौल के बाबजूद अपने दम पर कांग्रेस को पूरे बहुमत से सत्तासीन करने में वीरभद्र सफल रहे। जिस प्रकार मोदी को प्रधानमंत्री का दावेदार बनाने के लिए भाजपा के आला नेता व संघ-विहिप के कई नेता अवरोधक बने हुए हैं वहीं हिमाचल में वीरभद्र के करिश्माई नेतृत्व के कारण मिली विजय के वाबजूद कांग्रेस के दिल्ली दरवारी उनकी राह में हिमाचल के मुख्यमंत्री बनने की राह में ही कांटे बिछाने में लगे हुए है। केन्द्रीय नेतृत्व के आत्मघाती सलाहकार अगर वीरभद्र के बजाय किसी अन्य को हिमाचल का मुख्यमंत्री बनाते हैं तो यह कांग्रेस की ताबूत का कील ही साबित होगा। वहीं गुजरात के मुख्यमंत्री ने जीत के बाद 20 दिसम्बर को ही अपनी माता जी व अपने प्रबल विरोधी केशुभाई पटेल से घर जा कर आर्शीवाद लेने के बाद जिस स्पष्टता से सांय 5 बजे धन्यवाद सभा को संबोधित करते हुए गुजरात के 6 करोड़ लोगों को अपनी जीत का हीरो बताया वह उनके आम आदमी से राष्ट्र का महानायक बनने के रहस्य को जगजाहिर करता है।
  गुजरात व हिमाचल विधानसभा  चुनाव 2012 सम्पन्न हुआ गुजरात में 182 सीटों में भाजपा 115 कांग्रेस 61 व 6 अन्य विजयी रहे। हिमाचल में 68 सीटों में भाजपा 26, कांग्रेस 36 व अन्य 6 है। हालांकि अधिकांश चुनावी समीक्षक व पूर्वानुमान था कि गुजरात में फिर से मोदी व हिमाचल में भाजपा की विजय होगी। परन्तु प्याउ में मैने चुनाव से पहले ही यह विचार प्रकट किया था कि गुजरात में जहां नरेन्द्र मोदी की विजय व हिमाचल में वीरभद्र के नेतृत्व में विजयी होने की बात कही थी। परन्तु मेरे भी मन में इस बात की आशंका थी कि हिमाचल में अगर कांग्रेस यह चुनाव में हारती है तो इसका कारण मनमोहन सरकार द्वारा देश के लोगों का जीना हराम करने वाली बेलगाम मंहगाई ही जिम्मेदार मानी जायेगी। गुजरात में 182 विधानसभा क्षेत्रों के लिए कुल 71.32 फीसदी मतदान हुआ. राज्य में 13 और 17 दिसंबर को दो चरणों में चुनाव हुए हैं, जिनमें 44 हजार 579 इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों का इस्तेमाल हुआ. गुरुवार को राज्य में 33 जगहों पर मतगणना हुई। इस चुनाव परिणाम में पूरे देश की नजरें लगी हुई थी। क्योंकि आम जनता को ही नहीं राजनीति के विशेषज्ञों को भी भरोसा था कि  गुजरात के चुनाव परिणाम देश की भावी राजनीति का निर्धारण करने वाली ताकत रखती है। कुल मिला कर मोदी देश के वर्तमान सभी नेताओं में अधिक स्वीकार्य नेता के रूप में उभर चूके हैं। प्रधानमंत्री के रूप में वे देश की सबसे अधिक जनता के पहली पसंद है अगर तमाम अटकलों व चुनावी सर्वेक्षणों को मात दे कर अगर हिमाचल में कांग्रेस सत्तासीन होती है तो वह देश में कांग्रेस के सबसे जनाधार वाले नेता निर्विवाद साबित होंगे, जिनको कमजोर करने की कोशिश कांग्रेस पार्टी के दिल्ली में बेठे आका करते है। यही हालत मोदी की है जिनको भाजपा के दिल्ली आका ही कमजोर करने में तुले थे।
हिमाचल में तमाम चुनावी रूझान से साबित हो गया कि चुनाव से पूर्व व बाद में तथाकथित सर्वेक्षणों करने वाले समाचार चैनलों व ऐजेन्सियों की करारी हार हुई। वही प्यारा उत्तराखण्ड शतः प्रतिशतः विगत दो दशक से सच साबित हो रहा है। प्याउ ने इस बार चुनाव घोषणा के साथ भविष्यवाणी की थी कि गुजरात में मोदी व हिमाचल में वीरभद्र के नेतृत्व में विजय मिलेगी।
मोदी की ऐतिहासिक जीत पर नरेन्द्र मोदी की माॅ   हीरा बाॅ ने इस विजय पर प्रसन्नता प्रकट करते हुए कहा कि मेरा बेटा पीएम बनेगा और बढ़ता ही जायेगा। मोदी के भाई पंकज मोदी ने भी खुशी जाहिर की।
  गुजरात में विजय की तिकडी बनाने वाले गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी  5बजे संबोधित किया।  गुजरात में नरेन्द्र मोदी मणिनगर विधानसभा सीट से 86373 मतों से विजयी हो गये है तथा  भाजपा नेता  अमित शाह भी 72 हजार मतों से जीत गये।  गुजरात में कांग्रेस को बडा झटका लगा । कांग्रेसी के प्रदेश अध्यक्ष अर्जुन मोडवाडिया पोरबंदर विधानसभा सीट से व विधानसभा में प्रतिपक्ष शक्ति ंिसह गोविल भावनगर ग्राम से चुनाव हार गये । वहीं मोदी सरकार के चार मंत्री भी चुनाव हारे। केशुभाई पटेल भी विजयी रहे।
गुजरात चुनाव में मोदी की बम्पर जीत से इस आशंका को भी निराधार साबित कर दिया जो लोग फिल्मी दुनिया के महानायक अमिताभ वच्चन जहां का ब्रांड एम्बेस्डर बनते है वहां सरकार की करारी हार होती है। जिस प्रकार मुलायम सिंह सरकार में उप्र के ब्रांड एम्बेस्डर रहने पर सपा को उप्र की विधानसभा में भी करारी हार मिली थी। अब लोग कायश लगा रहा थे कि इस बार मोदी ने अमिताभ बच्चन को गुजरात का ब्रांड अम्बेस्डर बना रखा था, उससे कई लोग मोदी सरकार के पतन होने से आशंकित थे।
हिमाचल में भावी मुख्यमंत्री व कांग्रेसी नेता वीरभद्र विजय हुए। हमीरपुर सीट से मुख्यमंत्री व भाजपा नेता प्रेम कुमार धूमल जीते।
इस चुनाव में सबसे चैकान्ने वाली बात यह रही कि मुस्लिम समाज ने भी बड़ी संख्या में समर्थन दे कर कांग्रेस की आशाओं पर व दुष्प्रचार पर पानी फेर दिया। गुजरात में  १२ ऐसी सीट पर बीजेपी जीती जहाँ मुस्लिम 70 प्रतिशत तक थे . इसमें से सबसे जोरदार जीत अहमद पटेल के गृह जिले भरूच की वागरा सीट पर हुई है ,, जहाँ आजादी के बाद आज तक सिर्फ कांग्रेस जीतती आई है ,,इस सीट पर ८० प्रतिशत मुस्लिम है .. इस बार यहाँ कांग्रेस के प्रत्यासी इकबाल पटेल जो तीन बार से जीते थे, उनकी बुरी तरह हार हुई .. यहाँ भी बीजेपी जीती।  इस प्रकार मोदी ने न केवल अपने विरोधी दल कांग्रेस के मनसूबों पर पानी फेरा अपितु उन्होंने विधानसभा चुनाव  पूर्ण बहुमत से अपने दल को विजय दिला कर अपने दल के दिग्गज नेताओं की चैहरे की हवाईयां उडा दी है। गुजरात चुनाव विजय ने मोदी को देश के प्रधानमंत्री के भाजपा को प्रमुख दावेदार घोषित करने के लिए भारी दवाब बड़ रहा है। इससे भाजपा के नेता बेहद बेचैन ही नहीं परेशान भी हैं।
गुजरात व हिमाचल की जनता को दोनों प्रदेशों में अपने जननायकों को विजयी बनाने पर हार्दिक बधाई। आशा है जनभावनाओं के अनरूप दोनों नेता अपनी, अपने प्रदेश व देश को सफल नेतृत्व दे कर लोकशाही को मजबूत करेंगे।

Tuesday, December 18, 2012




पेरामेडिकल की 23 वर्षीय छात्रा से सामुहिक बलात्कार से शर्मसार हुआ भारत



राजनीति के अपराधिकरण से बढ रहा है अपराध

देश की राजधानी दिल्ली में पेरामेडिकल की 23 वर्षीय छात्रा से रविवार को हुए सामुहिक बलात्कार की घटना से सवा करोड़ से अधिक दिल्लीवासी ही नहीं अपितु पूरा देश शर्मसार है। देश की राजधानी दिल्ली में विगत 11 दिनों में बलात्कार के 8 मामले प्रकाश में आये। जिसमें 16 दिसम्बर को चांदनी महल तुर्कमान गेट क्षेत्र की  अबोध बच्ची से लेकर 6 दिसम्बर को तिमारपुर क्षेत्र में विदेशी युवती से हुआ सामुहिक बलात्कार है। जब देश की राजधानी जहां राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री से लेकर सेनाध्यक्ष सहित तमाम सर्वोच्च अधिकारी रहते हैं वहां यौन अपराध का इतना खौपनाक स्थिति है तो देश के दूर दराज के क्षेत्रों की हालत का सहज ही अनुमान लगाया जा सकता। इसमें यह तथ्य भी सर्वविदित है लोकलाज के कारण इस अपराध के दस फिसदी मामले भी पुलिस के समक्ष नहीं आते है।
उत्तराखंड के एक संस्थान से फीजियोथेरेपिस्ट का कोर्स करने के बाद वह दिल्ली के एक अस्पताल से इंटर्नशिप ले रही पेरामेडिकल की छात्रा जब रविवार 17 दिसम्बर की देर रात दक्षिण दिल्ली के वसंत विहार से चार्टर्ड बस से अपने मित्र के साथ द्वारका स्थित घर जा रही थी। इस दौरान चाटर्ड बस ड्राइवर व उसके साथियों ने सामुहिक बलात्कार करके महिपालपुर के पास फेंक दिया। दोनों पीडि़तो को पीसीआर द्वारा चिकित्सालय में भर्ती किया गया। पीडि़ता को सफदरजंग चिकित्सालय के सघन चिकित्साकक्ष में भर्ती किया गया। उसकी हालत बेहद खराब है मंगलवार 18 दिसम्बर को उसकी तबियत ज्यादा बिगड जाने से उसको जीवन रक्षक यंत्रों (वेंटिलेटर)पर रखा गया है। उसके सिर का आप्रेशन किया गया, इसके साथ उसकी रीड़ की हड्डी व कूल्हे में फेक्चर के साथ पूरे शरीर जख्मी है। उसको 23 टांके लगाये गये। उसके मित्र को भी बुरी तरह से घायल अवस्था में चिकित्सालय के सघन चिकित्सा कक्ष में भी भर्ती किया गया है।  पीडि़ता के परिजन व रिश्तेदार बेहद आहत हैं। इस घटना से दिल्ली की आम जनता ही नहीं संसद भी उद्देल्लित व आक्रोशित हो गया। आक्रोशित छा़त्र-छात्राओं ने वसंत बिहार थाने पर प्रदर्शन किया। चारों तरफ दिल्ली सरकार व दिल्ली पुलिस के खिलाफ लोगों में आक्रोश है। इसे देखते हुए दिल्ली पुलिस के आयुक्त नीरज कुमार ने 18 दिसम्बर मंगलबवार को दोपहर एक विशेष प्रेस कांफ्रंेस करके घटना को बयान किया कि रविवार रात करीब साढ़े नौ बजे पीडि़त लड़की और उसका दोस्त मुनिरका बस स्टैंड पर बस का इंतजार कर रहे थे। रविवार को छुट्टी होने के कारण मस्ती के मूड में निकले चार्टर्ड बस के ड्राइवर राम सिंह और उसके साथियों ने दोनों को आवाज देकर बस में बैठा लिया। दोनों आम बस समझकर बैठ गए।
पुलिस कमिश्नर के मुताबिक बस में राम सिंह के भाई मुकेश के अलावा उनके दोस्त विनय शर्मा, पवन गुप्ता, अक्षय ठाकुर और एक अन्य बैठे हुए थे। उन्होंने दोनों से 10-10 रुपये बस का किराया लिया। करीब 10 मिनट बाद छेड़छाड़ शुरू हो गई। लड़के ने ऐतराज जताया तो उसको मारा पीटा गया। उसने बहादुरी से लड़ने की कोशिश की। इस बीच लड़की ने भी बीच-बचाव की कोशिश की। लड़के को बेसुध कर युवती को बस के पीछे ले जाया गया। जहां उससे गैंगरेप किया गया। बस का पिछला गेट सील था। आगे वाले गेट से दोनों को बाहर गिरा दिया गया।
घटना की गंभीरता को देखते हुए दिल्ली पुलिस ने अपराधियों को शिकंजे में जकडने के लिए 13 टीमें जांच मे ंलगायी । बसंत बिहार से  रास्ते के एक पेट्रोल पंप और दो होटलों के बाहर लगे सीसीटीवी से मिले घटना में प्रयुक्त चार्टर्ड बस के फुटेज की सहायता ली गयी। पुलिस कमिश्नर के अनुसार बस की सीसीटीवी फुटेज से आरोपियों को पकड़ने में काफी मदद मिली। बस पर यादव नाम लिखा हुआ था। इसके बाद करीब 370 बसों की जांच की गई। आखिरकार यह बस आर.के. पुरम सेक्टर 6 में मिली। पुलिस आयुक्त ने बताया कि आरोपियों ने अपने बचाव के लिए सबूत मिटाते हुए बस को धोने की चालाकी भी काम नहीं आयी। बस मिलने के बाद इसके ड्राइवर राम सिंह को उठाया गया। उसने शुरू में घटना से इनकार किया, लेकिन बाद में स्वीकार कर लिया। उसने अपने दूसरे साथियों के नाम भी उगल दिए। रामसिंह के अलावा उसका भाई मुकेश ,दिनेश शर्मा और फल विक्रेता पवन गुप्ता को पुलिस ने दबोच लिया। दो फरार आरोपियों को दबोचने में पुलिस जुटी हुई है। इसमें से एक बिहार के ओरंगाबाद का है। लोकसभाध्यक्ष, गृहमंत्री, नेता प्रतिपक्ष सुषमा स्वराज, दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित सहित तमाम नेताओं ने इस प्रकरण के दोषियों को कड़ी सजा की मांग की। वहीं उत्तराखण्ड के मुख्यमंत्री बहुगुणा ने पीडि़ता के इलाज के लिये पांच लाख रूपये की आर्थिक सहायता देने की घोषणा की. सफदरजंग अस्पताल में 6 सदस्यीय चिकित्सकों का विशेष दल पीडि़ता की स्थिति पर बराबर नजर रखे हुए है।
इस प्रकरण ने पूरे देश के बुद्धिजीवियों को अंदर तक हिला कर रख दिया। देश में तमाम प्रकार के अपराधों का निरंतर बढ़ते ग्राफ से एक ही बात स्पष्ट हो रहा है कि हमारा समाज में नैतिक मूल्यों के ह्रास के साथ साथ अपराधी दिन प्रति दिन बेखौप हो रहे है। उनको न तो कानून व्यवस्था का भय है व नहीं समाज का। पूरी तरह से समाज अनैतिक ताकतों के शिकंजे में जकड़ा हुआ है। इसका सबसे बडा कारण एक तरफ तो शिक्षा में नैतिक मूल्यों का ह्रास जिम्मेदार है दूसरी तरफ शासन प्रशासन में नैतिक ताकतों का कमजोर होना भी इसका बडा कारण है। जब लोग देखते हैं अपराधिक प्रवृति के लोग भ्रष्टाचार, अपराध व रातों रात अकूत सम्पति ऐन केन प्रकार से अर्जित करके समाज व शासन में महत्वपूर्ण पदों पर आसीन होते हैं या राजनैतिक दलों में महत्वपूर्ण पदों पर आसीन हो जाते हैं या बडे नेता व नौकरशाहों के करीबी बने होते हैं तो आम आदमी का कानून व नैतिकता से मोह भंग हो जाता है और वह भी किसी भी प्रकार से धन अर्जित करके तमाम प्रकार के अपराधों को बेखोप करता है। जब समाज में एक बार अपराधिक प्रवृति व दागदार छवि के लोगों को जनप्रतिनिधि बनते देखता है या किसी संरक्षण प्राप्त अपराधी को अकूत दौलत के साथ ऐशो आराम करते देखता है और जब वह भ्रष्ट व अपराधियों को कानून को धत्ता बता कर खुले आम घूमते देखता है तो समाज में कानून व्यवस्था का खौप अपराधिक प्रवृति के लोगों के दिलो दिमाग से उठ जाता है। इससे बचने के लिए जरूरत है देश में राजनीति का सुधिकरण करने की। आज जब अपराधी ही माननीय, उद्यमी व भाग्य विधाता बन जाते है तो कौन अपराधी इस रास्ते को अपनाने से दूर रहेगा। जब अपराधी देखेंगे की मंत्री से संतरी तक सभी आर्थिक अपराध व हत्यारे जनप्रतिनिधी बन कर मौज मा रहे हैं तो कानून का आदर कौन करेगा। जरूरत है आज देश में नैतिक मूल्यों पर आधारित शिक्षा, राजनीति व समाज की। इसके बिना कोई कानून अपराध को रोकने से सबल नहीं होगा।  इसके लिए अपराधियों को कडे दण्ड व समाज के हित में सलंग्न व्यक्तियों को पुरस्कार जब तक नहीं मिलता देश व समाज को इसी प्रकार से निरंतर शर्मसार होते रहने पडेगा।

Sunday, December 16, 2012


शंकराचार्य के पद पर आसीन होने के 19 वर्ष पूरे होने पर 

शंकराचार्य माधवाश्रम जी महाराज को भव्य अभिनन्दन 

 विश्व के सबसे प्राचीन व शास्वत हिन्दू धर्म के सर्वोच्च धर्माध्यक्ष ‘शंकराचार्य ’ के पद पर आसीन हुए 19 वर्ष पूरे   होने पर देश की राजधानी दिल्ली में रविवार, 16 दिसम्बर को राजनेताओं व धर्माचार्यो सहित हजारों श्रद्धालुओं ने शंकराचार्य माधवाश्रम जी का भव्य अभिनन्दन किया। गौरतलब है कि आज से 19 साल पहले हिन्दू धर्म के 4 शंकराचार्य पीठ में से प्रमुख ज्योतिष पीठ पर शंकराचार्य के पद पर शंकराचार्य श्रीकृष्णबोध आश्रम जी के परम शिष्य, गोरक्षा आंदोलन के ध्वजवाहक, हिन्द धर्म के मर्मज्ञ माधवाश्रम जी महाराज को आसीन  किया गया था।  16 दिसम्बर को  दिल्ली के सिविल लाइन क्षेत्र में 7 शंकराचार्य मार्ग स्थित श्रीकृष्णवोध आश्रम में प्रातः काल से ही धर्माचार्यो, राजनेताओं व श्रद्धालुओं का तांता लगा रहा। प्रातःकाल से ही विशाल भव्यमंच पर सैकडों साधु संतों के मध्य  धर्मध्वजा व छत्र युक्त ऊंचे सिहासन पर विराजमान ज्योतिषपीठाधीश्वर जगतगुरू शंकराचार्य माधवाश्रम जी महाराज का वैदिक परंपरा के अनुसार धर्माचार्यो की दिव्य स्तुति मंत्रों व श्रद्धालुओं की हर हर महादेव व जय राम श्री राम, जय जय राम आदि के गगनभेदी नारों से गूंजायमान हो रहा था। शंकराचार्य माधवाश्रम जी महाराज अभिनन्दन समिति के मुख्य यजमान व शंकराचार्य माधवाश्रम जी महाराज धर्मार्थ न्यास (चिकित्सालय कोटेश्वर उत्तराखण्ड ) के अध्यक्ष प्रमोद महाजन अपने सपरिवार श्रद्धालुओं के स्वागत व भण्डारे के प्रबंध में लगे रहे। शंकराचार्य माधवाश्रम जी महाराज के श्रीचरणों को नमन् करने के लिए कांग्रेस के वरिष्ठ नेता व पूर्व मंत्री जगदीश टाइटलर, भाजपा नेता व उत्तराखण्ड के पूर्व मुख्यमंत्री भुवनचंद खण्डूडी, व शीर्ष धर्माचार्य उपस्थित थे। शंकराचार्य माधवाश्रम जी महाराज के परम शिष्य श्री वशिष्ट के अनुसार यहां ,उद्यमी प्रमोद महाजन, उनकी धर्मपत्नी, पुत्र, पुत्री व दामाद, उद्यमी आनन्द कुमार बंसल, ज्योतिष्पीठ के श्री महंत ब्रह्मचारी जी, कोटेश्वर मठ के श्रीमहंत शिवानन्द जी, दिल्ली संस्कृत अकादमी के उपाध्यक्ष श्रीकृष्ण सेमवाल, श्रीकृष्ण विश्व कल्याण भारती के देवसिंह रावत, पत्रकार डा गोविन्द बल्लभ जोशी, उत्तराखण्ड पत्रकार परिषद के पूर्व महासचिव दाताराम चमोली, भारत पाण्डे व सुन्दरियाल, समाजसेवी प्रकाश बिष्ट, आचार्य सेमवाल, उद्यमी राजेंन्द्र जगवान व समाजसेवी दीनदयाल सहित अनैक प्रमुख श्रद्धालुओं ने शंकराचार्य का भव्य अभिनन्दन किया। इस अवसर पर यहां पर विशाल भण्डारे का भी आयोजन किया गया था। गौरतलब है कि देश के वर्तमान शंकराचार्यो में माधवाश्रम जी महाराज ही एक मात्र ऐसे शंकराचार्य हैं जो पांच दशकों से गो हत्या के विरूद्ध व्यापक जनांदोलन में सड़कों पर आंदोलन करके जनता में व्यापक जागरूकता लाने के लिए पूरे हिन्दू समाज में वंदनीय है।

Friday, December 14, 2012


अमेरिका व चीन के विद्यालय में 14 दिसम्बर की हिसंक हमलों से स्तब्ध विश्व

नैतिक शिक्षा व अनैतिक विकास के कारण विक्षिप्त हिंसक हो रहा है आधुनिक विकसित समाज

विश्व को कल्याणकारी देने में नकाम रहा अमेरिका की विकसित पश्चिमी व्यवस्था व चीन का साम्यवाद भी 


14  दिसम्बर को दुनिया के सबसे विकसित व महाशक्ति बने अमेरिका व चीन के प्राथमिक स्कूलों में अबोध विद्यार्थियों पर हमलावर द्वारा अकारण किये गये हमलों से पूरा विश्व स्तब्ध है। अमेरिका के प्राथमिक विद्यालय में हमले में 20 बच्चों सहित 27 लोगों की दर्दनाक मौत हो गयी। वहीं चीन में एक महिला सहित 22 बच्चों को हमलावर ने चाकू से ताडबतोड़ हमला करके घायल कर दिया।  एक ही दिन संसार के सबसे विकसित,सभ्य, शिक्षित व महाशक्ति होने का दम्भ भरने वाले इन दो देशों में इस प्रकार की हिंसक घटना से पूरे विश्व को सोचने के लिए विवश कर दिया कि आखिर हम पूरी दुनिया को किस दिशा में ले जा रहे हैं? अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा स्तब्ध हो कर आंसू बहा रहे हैं वहीं चीन ऐसी खबरों को दबाने में लगा है। क्या आज हमारा तथाकथित विकसित दुनिया की शिक्षा व्यवस्था व विकास का ढांचा इतना अनैतिक हो गया कि कोई भी आदमी अपनी सनक अबोध बच्चों का कत्लेआम करने के लिए उतारू हो जाता है? 14 दिसम्बर को अमेरिका व चीन में घटित इस प्रकार की घटना ने पूरे विश्व के प्रबुद्ध लोगों को इस विषय पर सोचने के लिए मजबूर कर दिया। चीन के हमलावर के पास अगर अमेरिकी हमलावर की तरह बंदूकें होती तो वह भी इन बच्चों को मौत के घाट उतार देता। चीन में अवैध हथियारों पर कडा नियंत्रण होने से अमेरिकी की तरह आसानी से लोग हथियारों को नहीं रख सकते है। दोनों के इरादों में यही समानता थी कि दोनों हिंसक मनोवृति का शिकार अबोध बच्चों की निर्मम हत्या करने के लिए आमदा थे। परन्तु दोनों घटनाओं ने इन देशों के हुक्मरानों, बुद्धिजीवियों को अपने विकास व शिक्षा व्यवस्था पर सोचने के लिए विवश कर दिया।  काले शुक्रवार 14 दिसम्बर की प्रातः को दुनिया के इन दोनों वर्तमान व भविष्य समझी जाने वाले देशों में ऐसी घटनायें घटी जिसने विश्व को सोचने के लिए मजबूर कर दिया कि  यह शिक्षा, सभ्यता व विकास वर्तमान संसार को किस दिशा में ले जा रहा है?  क्या हमारी शिक्षा व्यवस्था व समाज इतना कमजोर व असुरक्षित हो गया कि वह यकायक अकारण ही निर्दोष बच्चों का भी सामुहिक हत्या करने के लिए उतारू हो जाता हैं।

अमेरिका के लिए काला शुक्रवार यानी ब्लेक फ्राइडे साबित होने वाला 14 दिसम्बर की प्रातः 9.41 बजे 2 स्वचालित बंदूक लिए इस विक्षिप्त आतंकी व्यक्ति ने इस विद्यालय में पढ़ाने वाली अपनी माॅं, स्कूल की प्रद्यानाचार्या, मनोचिकित्सक  सहित स्कूल में पढ़ने वाले बच्चों को अपनी गोली का शिकार बनाने के बाद खुद को भी गोली मार कर आत्महत्या कर ली। पहली से चोथी कक्षा तक की शिक्षा प्रदान करने वाले इस विद्यालय में 600 विद्यार्थी पढ़ते थे इसी स्कूल में हमलावर का बेटा भी पढ़ता था।  इस खबर से पूरा अमेरिका स्तब्ध है। अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा अपने समाज में बढ़ रही इस प्रकार की त्रासदी की खबर पर अपनी प्रतिक्रिया देते हुए अपने आंसू नहीं रोक पाये। सवाल यह है कि क्यों आद्युनिक शिक्षा, विकसित सम्भ्यता के चकाचैध में भी अमेरिकी और अन्य विकसित समाज आज विक्षिप्तता की तरफ बढ़ रहा है।
अमेरिका में 14 सितम्बर शुक्रबार की प्रातः 9.41 बजे एक  24 वर्षीय युवा द्वारा क्नेक्टीकट राज्य के एक विद्यालय में अंधाधुंध गोली चला कर 20 बच्चों सहित 27 लोगों की निर्मम हत्या करके खुद की भी जीवन लीला समाप्त कर दी। इस घटना से अमेरिकी राष्ट्रपति सहित पूरा विश्व स्तब्ध है। क्यों आधुनिक विकसित समाज में भी लोग अचानक इतने हिंसक हो रहे हैं जो निर्दोष लोगों को अपनी सनक का शिकार बनाने के लिए उतारू हैं।
मध्य चीन के हेनन प्रांत के चेंनपेंग गांव में प्राथमिक स्कूल के मुख्य गेट के पास एक 36 वर्षीय हमलावर ने  चाकू से ताडब तोड हमला करके एक बुजुर्ग महिला सहित 22 बच्चों को घायल कर दिया। निर्दोष अबोध बच्चों पर चाकू से ताडबतोड हमला कर रहे इस स्थानीय हमलावर को स्कूल के सुरक्षा गार्डो ने दबोच कर पुलिस के हवाले कर दिया। घायल बच्चों को निकटवर्ती अस्पताल में भर्ती कराया गया। बीबीसी के अनुसार एपी व शिन्हुआ द्वारा इस सम्बंध में प्राप्त जानकारी के अनुसार चीन में कुछ समय से बच्चों पर लगातार हमले की घटनाओं में बढ़ोतरी हो रही है।  2010 में भी पूर्वी चीन में बच्चों के एक स्कूल में एक व्यक्ति ने 28 छोटे बच्चों, उनके दो शिक्षकों और एक सुरक्षा गार्ड पर चाकू से हमला करने की घटना के बाद विद्यालयों में सुरक्षा गार्डो की तैनातगी कर दी गयी थी। अमेरिका में एक 24वर्षीय युवा रायन लांजा ने क्नेक्टीकट प्रांत कें एक विद्यालय में अंधाधुंध गोलीवारी करके 20 बच्चों सहित 27 लोगों की निर्मम हत्या की।

संसार स्तब्ध है विकसित दुनिया की शिक्षा व्यवस्था व विकास का ढांचा इतना अनैतिक हो गया कि कोई भी आदमी अपनी सनक अबोध बच्चों का कत्लेआम करने के लिए उतारू हो जाता है? यह समस्या केवल अमेरिका व चीन की ही नहीं अपितु पूरा संसार इस समस्या से जुझ रहा है। चारों तरफ हिंसक समाज दिन प्रतिदिन मजबूत हो रहा है। कोई राष्ट्र के नाम पर तो कोई धर्म के नाम पर अपने वर्चस्व को स्थापित करने के लिए संसार में कत्लेआम कर रहा है। देशों में धर्म, जाति, क्षेत्र, दल व व्यक्ति के नाम पर लोग समाज में आपस में एक दूसरे का शोषण करने के लिए हिंसा को ही हथियार बना रहे है। पश्चिमी देशों सहित भारत छोड कर अधिकांश दुनिया में दिशाहीन सत्तालोलुपु शासकों ने कभी सिकंन्दर, हिटलर , कभी विक्टोरिया, कभी चंगेज, कभी मुगलिया तो कभी बुश  के रूप में दुनिया को अपनी हिंसक मनोवृति का शिकार बनाया। आज भी अमेरिका जहां अफगानिस्तान, इरान, लीबिया में भारी तबाही मचाये हुए है। 70 से अधिक देशों में अपनी सामरिक ताकत के बल पर वहां की लोकशाही पर अंकुश लगाये हुए है। एक तरफ अतिवादी  इस्लामिक  हिंसा से पूरा विश्व त्राही त्राही कर रहा है। वहीं दूसरी तरफ अमेरिका व चीन जैसे देशों की विस्तारवादी शोषक प्रवृति विश्व शांति पर ग्रहण लगाये हुए है।
दिशाहीन व अनैतिक शासकों के कुशासन के कारण चारों तरफ अमर्यादित व असुरक्षित समाज हो गया है। एक तरफ चंद लोगों के पास अकूत सम्पति की अटालिकायें खड़ी हो रही है तो वहीं दूसरी तरफ अरबों लोग जीवन बसर करने के लिए मोहताज है। संसार को अनादिकाल से दिव्य ज्ञान, विकास व कल्याणकारी समाज से आलौकित करने वाला भारत भी पश्चिमी फिरंगी समाज का अंधानुशरण करके आज अमेरिका व चीन की तरह अनैतिकता के दंश से पीडि़त है। अपनी दिव्य सनातन मूल्यों को छोड़ कर पश्चिमी समाज के अंधानुशरण के कारण भारत में भी मनमोहन, मोंटेक, चिदम्बरम जैसे शासकों द्वारा किये जा रहे कुशासन से देश के आम जनता से न केवल शिक्षा, चिकित्सा, न्याय व रोजी रोटी से एक प्रकार से वंचित हो गये हैं। हालत यह है कि इनके कुशासन से जहां मंहगाई, आतंकवाद व भ्रष्टाचार से पूरी व्यवस्था पतित हो गयी है वहीं आम आदमी का जीना ही दूश्वार हो गया है। परन्तु आम आदमी की बात कहने वाली कांग्रेस पार्टी की मुखिया सोनिया गांधी व उनकी सरकार के प्रधानमंत्री मनमोहन सहित किसी के कानों में जूं तक नहीं रेंग रहा है। यही हालत अन्य दलों की हो रखी है। आम आदमी से देश के शासक वर्ग ही नहीं  आम राजनैताओं, बुद्धिजीवियों, पत्रकारों व समाजसेवियों का कहीं दूर दूर तक सरोकार नहीं रहा। इससे आम आदमी अपने आप को बेहद असुरक्षित पा रहा है। ऐसे में ही विक्षिप्ता व हिंसक मनोवृति जन्म लेती है। हमारे समाज व देश में खुद को समर्पित कर सर्वजन सुखाय व सर्वजनहिताय का समाज रहा था। व्यक्ति हमेशा समाज व राष्ट्र के साथ नैतिक मूल्यों के लिए अपने आप को कुर्वान कर देता था। परन्तु आज उल्टा हो गया, देश व समाज के हितों को दाव पर लगा कर व्यक्ति अपने निहित स्वार्थ, पद व तिजेारी को वरियता दे रहा है। आज जरूरत है विश्व शांति व अमन के लिए कि हमें नैतिक मूल्यों जिसमें सर्वभूतहितेरता यानी सबके कल्याण के लिए कार्य करने वाला शासन व्यवस्था व शिक्षा व्यवस्था हो उसको आत्मसात करने की। आज संसार भ्रष्टाचार से नैतिकता विहिन शिक्षा से ऐसा दंश झेल रहा है कि तमाम विकास के बाबजूद समाज व व्यक्ति घोर हिंसा से आक्रांत हो रखा है। व्यक्ति आज या तो अपने आप को घोर अकेला व असुरक्षित समझ रहा है या अन्य समाज को हेय समझ कर उनको कत्लेआम करने के लिए उद्दत है। आज जरूरत है विश्व को प्राणीमात्र के कल्याण की राह दिखाने वाली व शास्वत दिव्य ज्ञान का बोध कराने वाली भारतीय संस्कृति का अनुशरण करने की। इसी पथ में जा कर ही विश्व का भौतिक विकास समाज के शांति पर ग्रहण लगाने वाला कारक नहीं बनेगा। आज स्पष्ट हो गया कि चीन के साम्यवाद व अमेरिका का पश्चिमीवाद दोनों मानव  समाज को एक चिर कल्याणकारी व्यवस्था देने में नकाम है। इन व्यवस्था में व्यक्ति अपने आप में अकेला व असुरक्षित महसूस करता है। इन समाजों में परिवार नाम संस्था इतनी गौण हो गयी कि व्यक्ति को अपने बच्चों व परिजनों का कोई महत्व नहीं है। जबकि भारतीय संस्कृति में व्यक्ति खुद से बढ़कर अपने परिवार, समाज, देश व मूल्यों के साथ जुडा पाता है। यहां पर अपनत्व का समावेश है जबकि अन्य में व्यक्ति हर मोड़ में अपने आप को अकेला पाता है। भारत में भी पश्चिमी शिक्षा व समाज का अंधानुशरण करने से यह विकास काफी पैर पसार रहे है। इससे समाज में टूटन दिख रही है। परन्तु  इस विश्व में केवल भारतीय प्राचीन जातिवाद रहित व्यवस्था की चिर कल्याणकारी साबित हो सकती है। जिस संस्कृति को भारत के वर्तमान शासक, राजनेता व बुद्धिजीवी हेय समझ रहे है वही प्राचीन भारतीय संस्कृति ही भटके व हिंसक मनोवृति से ग्रसित भौतिक विकास का मद में चूर समाज को कल्याणकारी मूल्यों युक्त व्यवस्था दे सकता है। शेष श्री कृष्णाय् नमो। हरि ओम तत्सत्। श्रीकृष्णाय् नमो।

Monday, December 10, 2012


जमीनी नेताओं को हासिये पर डालने वाले भाजपा नेतृत्व को सिखाया येदियुरप्पा ने करारा सबक

येदियुरप्पा प्रकरण से सहमी भाजपा कर सकती है विधानसभा भंग

 भाजपा के अपने अपने राज्यों में उमा भारती, मदनलाल खुराना, कल्याणसिंह व गोविन्दाचार्य जैसे दिग्गज जनाधार वाले नेताओं को एक एक कर हासिये में डाल कर वहां पर अपने प्यादों को आसीन करके देश का एकक्षत्र नेता बनने की भाजपा नेतृत्व व उसकी चैकड़ी को  कर्नाटक में भाजपा का सत्तासीन करने वाले जमीनी दिग्गज नेता पूर्व मुख्यमंत्री येदियुरप्पा ने जमीन सुंघा दी।  पहली बार दक्षिण भारत के अग्रणी राज्य  कर्नाटक में पूर्व मुख्यमंत्री येदियुरप्पा ने कड़ी मेहनत से भाजपा को सत्तासीन किया था। परन्तु दिल्ली में बेठे दिग्गज मठाधीशों ने उनको भी उमा भारती, कल्याण सिंह व मदनलाल खुराना की तरह हाशिये में डाल कर वहां पर अपने हवाई प्यादे  को स्थापित करने की मंशा से बार बार उनकी सरकार को अस्थिर करने की हरकतें की। केन्द्रीय नेतृत्व की मंशा पर भी भाजपा की मातृ संगठन संघ की मूकता से आहत हो कर येदियुरप्पा ने भााजपा को ऐसी पटकनी दे डाली जिससे न केवल प्रदेश भाजपा सरकार के अस्तित्व पर ग्रहण लग गया अपितु दिल्ली में इन्हीं कुटिल षडयंत्रों के दम पर देश में प्रधानमंत्री बनने की भाजपा आला मठाधीशों की हसरत पर एक प्रकार का ग्रहण सा लग गया है। कर्नाटक के मुख्यमंत्री येदियुरप्पा ने  भाजपा से इस्तीफा दे कर अपनी नयी पार्टी ‘’कर्नाटक जनता पार्टी बना कर एक प्रकार भाजपा में भूकम्प ही ला दिया । जिससे भाजपा नेतृत्व ही नहीं अपितु भाजपा की मातृ संस्था संघ भी भोंचंक्की है। येदियुरप्पा ने अपनी पहली रेली की उसमें सम्मलित भाजपा सरकार के मंत्री, सांसद व कुछ विधायकों पर जब भाजपा ने कार्यवाही की तो येदियुरप्पा ने े अपने समर्थकों पर भाजपा द्वारा कार्यवाही करने से आक्रोशित हो कर भाजपा नेतृत्व व मुख्यमंत्री जगदीश शेट्टार को पद से इस्तीफा देने एवं विधानसभा भंग करने की चुनौती दी। उन्होंने अपने समर्थक भाजपा विधायकों से अभी तक भाजपा से इस्तीफा न देने का कहा था। कर्नाटक भाजपा की आशाओं पर ग्रहण लगाने वाले येदियुरप्पा ने कहा कि भाजपा के 60 विधायक जब वे कहेंगे उनकी पार्टी में सम्मलित हो जायेंगे। गौरतलब है कि  224 सदस्यीय विधानसभा में भाजपा के 118 सदस्य हैं और कांग्रेस के 71 और जनता दल एस के 26 विधायक हैं। सदन में सात निर्दलीय तथा दो पद रिक्त हैं। राज्य में विधानसभा चुनाव अगले साल अप्रैल-मई तक प्रस्तावित हैं।

येदियुरप्पा ने अपनी पार्टी कर्नाटक जनता पार्टी (केजेपी) की घोषणा के अवसर पर आयोजित विशाल रैली को सम्बोधित करते हुए कहा, मैं शेट्टार को मेरे समर्थक विधायकों एवं मंत्रियों के बिना विधानसभा में बहुमत सिद्ध करने की चुनौती देता हूं। यदि मुख्यमंत्री में हिम्मत है तो मेरे समर्थकों के खिलाफ कार्रवाई करें। नहीं तो उन्हें इस्तीफा देकर जल्द चुनाव कराने के लिए विधानसभा भंग कर देनी चाहिए।
येदियुरप्पा ने कहा, शेट्टार एवं ईश्वरप्पा (उपमुख्यमंत्री) को मालूम होना चाहिए कि वे भाजपा एवं केजेपी की गठबंधन सरकार चला रहे हैं क्योंकि उनकी पार्टी के आधे से अधिक विधायक मेरे साथ हैं और नई पार्टी में कभी भी शामिल होने के लिए तैयार हैं।
उन्होंने कहा कि केजीपी अगले साल मई में प्रस्तावित विधानसभा चुनाव में सभी 224 सीटों पर चुनाव लड़ेगी।
पूर्व मुख्यमंत्री ने कहा, 50-60 विधायक भाजपा छोड़कर उनकी पार्टी में शामिल होने के लिए तैयार हैं। लेकिन मैंने उन्हें ऐसा नहीं करने एवं विधानसभा चुनावों को देखते हुए राज्य में राजनीतिक संकट न पैदा करने के लिए कहा है।
यदि भाजपा रैली में भाग लेने वाले विधायकों के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई करती है तो 225 सदस्यीय विधानसभा में शेट्टार सरकार अल्पमत में आ जाएगी।
येदियुरप्पा प्रकरण से कर्नाटक भाजपा सरकार के पास समय से पहले विधानसभा चुनाव कराने के अलावा अब कोई विकल्प नहीं रह गया है। येदियुरप्पा प्रकरण पर भले ही दिल्ली में आसीन भाजपा के मठाधीश व संघ नेतृत्व येदियुरप्पा को खलनायक समझ रहा हो परन्तु हकीकत यह है कि भाजपा के दिल्ली मठाधीशों ने अपनी अंधी सत्तालोलुपता व एकक्षत्र राज के लिए भाजपा के जनाधार वाले मदनलाल खुराना, उमा भारती, कल्याण सिंह व गोविन्दाचार्य जैसे जमीनी व समर्पित नेताओं को एक एक कर हाशिये पर डाल कर अपने प्यादों को इन के स्थान पर आसीन किया, जिससे कांग्रेस के इतने कुशासन के बाबजूद भाजपा दिन प्रति दिन जनता की नजरों में हाशिये में चली गयी है। आज भाजपा में आडवाणी जेसे सत्तालोलुपता व सुषमा -जेटली जैसे जनाधार विहिन  अवसरवादिता के कारण एक तरफ संघ ने गडकरी जेसे कमजोर नेतृत्व थोपा हुआ है वहीं मोदी जैसे जनप्रिय नेता को देश का नेतृत्व करने से रोकने के लिए तमाम तिकडम किये जा रहे है। इस तमाम प्रकरणों पर भाजपा में जब समर्पित व जनाधार वााले नेताओं को  हाशिये में डालने का कार्य करे तो सभी नेता भगतसिंह कोश्यारी व मोहनसिंह ग्रामवासी की तरह चुपचाप नहीं सहते कोई येदियुरप्पा बन कर ऐसे मठाधीशों का जमीन सुंघाने वाला भी निकलता है।

आजादी के 65 साल बाद भी फिरंगी भाषा की गुलामी का कलंक क्यों ढो रहे हैं भारतीय 

सर्वोच्च न्यायालय में कब मिलेगा भारतीय भाषाओं में न्याय




सर्वोच्च न्यायालय में भारतीय भाषाओं को लागू करने के लिए सोनिया के दर पर पुलिसिया दमन के बाबजूद 4 दिसम्बर से  श्यामरूद्र पाठक व साथियों का सत्याग्रह जारी

आजादी के 65 साल बाद भी देश में अंग्रेजी गुलामी ढोना किसी देशद्रोह से कम नहीं


भले ही देश को अंग्रेजों की गुलामी से मुक्ति मिले 65 साल हो गये हैं परन्तु आज भी भारत के सर्वोच्च न्यायालय में भारतीय भाषाओं में नहीं अपितु अंग्रेजों की भाषा में दिया जाता है। इसी कलंक को दूर करने की मांग को लेकर यानी देश के सर्वोच्च न्यायालय में भारतीय भाषाओं को लागू करने की मांग को लेकर सप्रंग सरकार की मुखिया सोनिया गांधी के आवास 10 जनपत नई दिल्ली पर देश के अग्रणी वैज्ञानिक व भारतीय भाषा आंदोलन के पुरोधा श्यामरूद्र पाठक के नेतृत्व  भारतीय भाषाओं के लिए समर्पित आंदोलनकारियों का सत्याग्रह 4 दिसम्बर के बाद पुलिसिया दमन के बाबजूद निरंतर जारी है। परन्तु न तो कांग्रेस प्रमुख सोनिया गांधी एक सप्ताह से अपने दर पर आंदोलन कर रहे आईआईटी दिल्ली के विख्यात शौध छात्र रहे वैज्ञानिक श्यामरूद्र पाठक, गीता मिश्रा व विनोद पाण्डे जैसे समर्पित गांधीवादी आंदोलनकारियों की सुध ले पायी व नहीं देश का तथाकथित जागरूक मीडिया को भी  सप्रंग सरकार की अध्यक्षा के आवास पर कई दिनों से चल रहे इस आंदोलन की सुध तक नहीं ली। 65 सालों में देश में देश से अविलम्ब अंग्रेजी को शासन प्रशासन से दूर करने का संकल्प लेने वाले महात्मा गांधी के नाम पर शासन करने वाली कांग्रेस का लम्बा शासन रहा। इस देश में जनवाद व समाजवाद की दुहाई देने वाले तीसरे मोर्चे की सरकारें रही। इस देश में भारतीय संस्कृति व राष्ट्रवाद के स्वयंभू झण्डेबरदार रहे अटल आडवाणी की ‘हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान’का जाप करने वाली सरकार भी रही। परन्तु किसी ने इसे देश के माथे से गुलामी के इस कलंक को दूर करने का अपना प्रथम दायित्व तक नहीं निभाया।
लोकतंत्र में पूरा तंत्र स्वतंत्र से संचालित होना चाहिए। परन्तु भारत का दुर्भाग्य यह है कि यहां देश की राष्ट्रभाषा या राजभाषा हिन्दी सहित किसी भी भारतीय भाषाओं में देश की सबसे बडी अदालत में न्याय ही नहीं मिलता है। वहां पर भाारतीय भाषाओं पर उसी फिरंगी भाषा अंग्रेजी की गुलामी की बेडियां लगी हुई हैं जिससे मुक्ति के लिए देश के लाखों शहीदों ने अपनी शहादतें दी। उनकी शहादत से आजादी हासिल करने के बाबजूद देश के साथ इतना बडा विश्वासघात देश के हुक्मरानों ने किया कि देश की राष्ट्र भाषा हिन्दी सहित किसी भी भारतीय भाषाओं में न तो देश में न्याय ही मिलता है व नहीं सम्मान। पूरा तंत्र एक प्रकार से अंग्रेजी भाषा की गुलामी आजादी के 65 साल गुजर जाने के बाद भी बेशर्मी से ढो रहा है। वह भी वह देश जो स्वयं को विश्व की सबसे बडा लोकतंत्र होने का दंभ भरता है । वह देश जो विश्व की आर्थिक व सामरिक महाशक्ति बनने के लिए स्वभू हंुकार भर रहा है।
देश की आजादी को अंग्रेजी की गुलामी से मुक्त करने के लिए संसद से सडक तक सरकार को धिक्कारने के लिए मैने  भाारतीय मुक्ति सेना के प्रमुख के रूप में 1989 से आज तक निरंतर देश की आजादी को अंग्रेजी की गुलामी से मुक्ति दिलाने के लिए समर्पित हॅू। 21 अप्रेल 1989 को संसद की दर्शक दीर्घा में मैने इसी आशय की नारेबाजी भी की थी। उसके बाद संघ लोकसेवा आयोग पर चले  राजकरण सिंह व पुष्पेन्द्र चोहान के नेतृत्व वाले आंदोलन में भी भाग लिया था । तत्कालीन आई आईटी दिल्ली के शोध छात्र रहे श्याम रूद्र पाठक के अनशन आंदोलन में भी सहभागिता निभायी थी।  परन्तु इतने साल बीत जाने के बाद भी अभी इस दिशा में कए कदम भी गुलामी के कलंक को मिटाने के लिए देश के हुक्मरान कुछ करने के लिए तैयार नहीं। इसमें सरकार गांधी व भारतीय संस्कृति की दुहाई लेने वाली कांग्रेस व भाजपा की भी रही। अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार ने भी इस मुद्दे पर देश को निराश किया।
आज सोनिया मनमोहन की सरकार देख कर अफसोस हो रहा है कि देश के वरिष्ट वैज्ञानिक व भाषा आंदोलनकारियों के इस आंदोलन की जो शर्मनाक उपेक्षा हो रही है उसके लिए जहां सप्रंग सरकार की अध्यक्षा सोनिया गांधी व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की जिम्मेदार हैं वहीं देश के तमाम राजनैतिक दल व बुद्धिजीवी भी कम दोषी नहीं है।  डा श्यामरूद्र पाठक को आशा थी कि  देश की मीडिया, भारतीयता के पक्षधर राष्ट्रभक्त उनके आंदोलन का समर्थन करने के लिए आगे आते। परन्तु सब जमीन पर उतने में असफल रहे।  प्यारा उत्तराखण्ड से अपने आंदोलन के बारे में जानकारी देते हुए भारतीय भाषाओं के समर्पित पुरोधा व वैज्ञानिक श्यामरूद्र पाठक ने बताया कि वे व उनके साथी विगत कई महिनों से लेकर भाजपा के पूर्व अध्यक्ष राजनाथ सिंह व ओम प्रकाश कोहली, राजद के लालू प्रसाद यादव व डा रघुवंश प्रसाद सिंह, सपा प्रमुख मुलायम सिंह, कांग्रेस के दिग्विजय सिंह व आस्कर फर्नाडिस, वामदलों व दु्रमुक नेताओं सहित अनैक वरिष्ट नेताओं से इस सर्वोच्च न्यायालय में भारतीय भाषाओं का प्रयोग किये जाने की मांग को लेकर भेंट कर चूके हैं। इसी मांग को लेकर वे 45 दिनों से सप्रंग प्रमुख सोनिया गांधी से मिलने का प्रयास कर रहे हैं परन्तु सोनिया गांधी के दरवारियों ने उनसे मिलने का समय तक नहीं दिया। वहीं इन 45 दिनों में आस्कर फर्नाडिस से 5 बार मिल चूके हैं परन्तु सोनिया गांधी से मिलना तो रहा दूर उनके यहां से इस आशय का सामान्य शिष्टाचार निर्वाह किया जाने वाला जवाब तक नहीं आया। सप्रग सरकार व प्रमुख द्वारा इस मुद्दे पर शर्मनाक चुप्पी रखी देख कर भारतीय भाषाओं के पुरोधा श्यामरूद्र पाठक व उनके दो भाषा आंदोलनकारियों गीता मिश्रा व विनोद पाण्डे ने 4 दिसम्बर से सोनिया गांधी के 10 जनपत स्थित आवास पर सत्याग्रह प्रारम्भ किया। गांधी का नाम जपने वाली कांग्रेस की प्रमुखा ने गांधीवादी सत्याग्रहियों से मिलने के बजाय पुलिस से उनको प्रताडित करके तुगलक रोड थाने में गैरकानूनी ढ़ग से बिठाये रखते है। आंदोलनकारी गीता मिश्रा के अनुसार वे डा श्यामरूद्र पाठक के नेतृत्व में पुलिस द्वारा छोडे जाने के बाद फिर से 10 जनपत सोनिया गांधी के आवास पर सत्याग्रह के लिए बैठ जाते है। 4 दिसम्बर के बाद निरंतर पुलिस व सत्याग्रहियों में यही प्रक्रिया चल रही है। पुलिस उनको 10 जनपत से थाना ले जाते समय उनको जेल भेजने के नाम पर उठाती है और फिर घण्टों थाने में बंद करने के बाद फिर छोड़ देती है। शायद न तो सोनिया गांधी व नहीं उनके किसी नेता तथा वर्तमान पत्रकारों को इस बात का भान है कि डा श्याम रूद्र पाठक ने दिल्ली आईआईटी के प्रतिभाशाली शौध छात्र के साथ साथ देश के अग्रणी अंतरिक्ष वैज्ञानिक भी रहे। उन्होंने आईआईटी दिल्ली में अपना शौध पत्र हिन्दी भाषा में ही स्वीकार करने के लिए ऐतिहासिक अनशन किया था जिस पर संसद ने उनसे अपना अनशन समापन करने की संयुक्त अपील की थी। उनके आंदोलन की बदोलत हिन्दी भाषा में लिखा उनका शौध पत्र को दिल्ली आईआईटी ने स्वीकार किया। राजीव गांधी के शासनकाल में तत्कालीन विपक्ष के नेता अटल बिहारी वाजपेयी ने श्यामरूद्र पाठक का लम्बा अनशन का समापन कराया था।  भाषा आंदोलनकारी श्यामरूद्र पाठक ने ऐलान किया कि सरकार जब तक उनको देश की सर्वोच्च न्यायालय में भारतीय भाषाओं को लागू करने के लिए ठोस कदम नहीं उठाती तब तक उनका आंदोलन अब जारी रहेगा। उन्होंने सोनिया गांधी सहित तमाम राजनेताओं से पुरजोर अपील की कि अविलम्ब देश की सर्वोच्च न्यायालय में भारतीय भाषाओं को लागू करने के लिए कदम उठा कर लोकशाही को जीवंत बनाने के अपने दायित्व का निर्वहन करें। मैं भारतीय भाषाओं के सम्मान के लिए समर्पित रहे अपने आंदोलनकारी साथी ओम प्रकाश हाथपसारिया से भी इस मुद्दे पर काफी विचार विमर्श करके इस नतीजे पर पंहुचा की, इस देश में नेताओं, नौकरशाहों व बुद्धिजीवियों तथा तथाकथित समाजसेवियों के दिलो व दिमाग पर फिरंगी भाषा अंग्रेजी के गुलामी का शिकंजा पूरी तरह कस गया है। वे अंग्रेजी मोह में इतने अंधे हो गये हैं कि उनको देश के स्वाभिमान व लोकशाही का इतना अपमान कहीं दिखाई तक नहीं देता। आज जरूरत है देश में एक नये आंदोलन की जो इस देश से गुलामी की जंजीरों को उखाड़ फेंक सके। तभी न्यायालय से लेकर कार्यपालिका व विधायिका से अंग्रेजी भाषा की गुलामी दूर होगी और भारतीय भाषाओं को देश अंगीकार करेगा। नहीं तो आज देश में पूरी तरह फिरंगी गुलामी का शिकंजा कस गया है। देश में सबसे बडा भ्रष्टाचार देश की लोकशाही को फिरंगी जुबान से संचालित करना है। देश कब मुक्त होगा इस गुलामी से। इसी आश में इसी दिशा में एक मजबूत आंदोलन के लिए खुद को तैयार कर रहा हूॅ। शेष श्री कृष्ण कृपा। हरि ओम तत्सत्। श्री कृष्णाय् नमो।