Pages

Thursday, February 24, 2011

निशंक को हटाने के लिए भाजपा नेतृत्व पर भारी दवाब


निशंक को हटाने के लिए भाजपा नेतृत्व पर भारी दवाब
निशंक को बनाये रखने से होगा भाजपा का उत्तराखण्ड में लोक सभा की तरह सफाया
नई दिल्ली। दिल्ली में जिस प्रकार से कभी घोर विरोध्ी रहे भाजपा के वरिष्ठ नेताओं कोश्यारी व खडूडी के गठजोड़ के बाद दिल्ली में शुरू किये गये निशंक हटाओं अभियान से एक बार पिफर उत्तराखण्ड के मुख्यमंत्राी निशंक के चुनाव से पहले मुख्यमंत्री की कुर्सी से हटाने की अटकलें लगाये जाने लगी। सुत्रों के अनुसार दिल्ली में निशंक को मुख्यमंत्राी के पद पर आसीन रखने के मजबूती घेराबंदी को देख कर कभी एक दूसरे के घोर राजनैतिक विरोध्ी रहे भाजपा 
नेता भगतसिंह कोश्यारी व खंडूडी ने प्रदेश में भाजपा की निरंतर गिरती हुई छवि को बचाने के लिए दिल्ली दरवार में संयुक्त रूप से निशंक हटाओं भाजपा बजाओ अभियान शुरू कर दिया हे। दोनों नेता हालांकि पूर्व मुख्यमंत्राी रहने के साथ साथ मुख्यमंत्राी के मजबूत दावेदार भी माने जा रहे है। परन्तु जब प्रदेश की निशंक सरकार के एक के बाद एक घोटालों में घिरे होने से से जनता के बीच में भाजपा की छवि को निरंतर गिरते देख कर दोनों नेताओं ने प्रदेश में भाजपा बचाने व प्रदेश के विकास को बचाने के लिए अपने मतभेदों को विराम देते हुए गठजोड करने का निर्णय लिया। इसकी भनक लगते ही निशंक खेमें में हड़कम्प ही मचा हुआ है। निशंक के सरपरस्त नेताओं ने भी दिल्ली में कमान संभाली हुई है। परन्तु सबसे दिक्कत यह आ रही है कि प्रदेश में एक के बाद जो घोटालों की परत खुल रही है उसमें भले ही न्यायालय कीदेहरी में निश्ंाक सरकार किसी तरह अपना दामन बचा ले परन्तु जनता की नजरों में भाजपा की छवि निरंतर ध्ूमिल हो  रही है। इससे प्रदेश में पिफर से सत्तासीन होने की आश पर ग्रहण लग गया हे। इसी कारण संघ भी  भ्रष्टाचार में आकंठ पफंसे निशंक सरकार से खुश न होने से निशंक के दिल्ली में बैठे हुए संरक्षकों को निशंक का बचाव करना भारी पड़ रहा है। 
इसके तहत निशंक को चुनाव से पहले ठीक उसी तरह स्वामी की तरह हटाने की भी रणनीति पर भाजपा के दिग्गज विचार कर रहे है। भाजपा के जमीनी नेताओं को इस बात का अहसास हो गया है कि निशंक के कारण अब प्रदेश में पिफर से सत्तासीन होने की आशाओं पर बज्रपात ही होगा। 
वहीं दूसरी तरह दिल्ली में एक मजबूत तबका अपने निहित स्वार्थाे के कारण निशंक के बचाव में कमर कसे हुए हे।। भले ही निशंक मोह में बशीभूत हो कर भाजपा के आला नेताओं में विधनसभा चुनाव की दहलीज में खडे अपनी पार्टी की उत्तराखण्ड सरकार के मुखिया को अभयदान देने की होड़ लगी हो परन्तु प्रदेश सरकार के मुखिया निशंक से प्रदेश की जनता का पूरी तरह से मोह भंग हो गया है। चुनाव से पहले ही प्रदेश की जनता के मंसुबों को भांप कर व आगामी विधनसभा चुनाव में भाजपा के बचे खुचे आधर को बचाने के लिए भाजपा के दो ध्ुर विरोध्ी रहे वरिष्ठ नेता व पूर्व मुख्यमंत्राी भगतसिंह कोश्यारी व भुवनचंद खंडूडी ने एकजूट हो कर दिल्ली में भाजपा बचाओं अभियान छेड़ दिया है। जनता की इसी गहरी नाराजगी को भांपते हुए दोने घुर विरोध्ी समझे जाने वाले कोश्यारी व खंडूडी ने संघ से लेकर भाजपा के तमाम वरिष्ठ नेताओं से इस मामले में अपने दो टूक रूख का वयान कर दिया है। सुत्रों के अनुसार दोनों नेताओं ने दिल्ली में भाजपा के आला नेताओं को दो टूक शब्दों में बता दिया है कि उत्तराखण्ड की जनता किसी भी कीमत पर भ्रष्टाचार को सहन नहीं करती है। वह आगामी विधनसभा चुनाव में किसी भी सूरत में निशंक के सरपरस्ती में भाजपा के पक्ष में मतदान नहीं करेगी। 
सरकार के में आम जनता में प्रदेश की भाजपा सरकार के मुखिया निशंक के खिलापफ पनप रहा जबरदस्त जनाक्रोश न दिखाये दे रहा हो, परन्तु प्रदेश में जिस प्रकार से प्रदेश के विभिन्न भागों से भाजपाई नेता पार्टी को छोड़ कर दूसरे दलों का दामन थाम रहे हैं उससे आगामी विधनसभा चुनाव से पहले ही प्रदेश में बड़ी तेजी से बह रही भाजपा विरोध्ी लहर के सापफ संकेत मिलने लग गये है। यह संकेत उसी प्रकार के हैं जिस प्रकार लोकसभा चुनाव से पहले भाजपा के आलाकमान ने प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्राी भुवनचंद खंडूडी को जनभावनाओं को नजरांदाज कर बलात थोपे रखा। इससे आक्रोशित जनता ने लोकसभा चुनाव में पूरी तरह से भाजपा का सपफाया ही कर दिया। इस समय भी कई भ्रष्टाचारों में आकंठ घिरी प्रदेश की निशंक सरकार भले ही न्यायालय के दर पर अपने आपक को किसी तरह बचाने में सपफल हो गयी हो परन्तु जनता की नजरों में निशंक सरकार अपने पूर्ववर्ती खंडूडी सरकार से बदतर लगने लगी है। जनता उत्तराखण्ड के हितों की घोर उपेक्षा करने वाली किसी भी सरकार को किसी भी सूरत में बर्दास्त नहीं करेगी। अब निर्णय भाजपा के आला नेताओं को करना है कि वह प्रदेश में लोकसभा चुनाव की तर्ज पर प्रदेश से भाजपा का सपफाया करने की इंतजारी करते हैं या पिफर अविलम्ब जनता में बेनकाब हो चुके प्रदेश के मुख्यमंत्राी निशंक को हटा कर प्रदेश में भाजपा के बचे खुचे जनाधर को बचाने का काम करते है। देखना यह है कि अब भाजपा आलाकमान प्रदेश में लोकसभा चुनाव से पहले निशंक को हटाने की बु(िमता पूर्ण कदम उठाता है या पिफर अपनी हेकड़ी में निश्ंाक को बनाये रखकर लोकसभा चुनाव की तरह पूरे प्रदेश से भाजपा का सपफाया होते देखने का कृत्य करता है। वैसे निशंक सरकार के कारनामों को देख कर उत्तराखण्डी राजनीति के जानकारों को इस बात का पूरा भरोसा है कि उत्तराखण्ड की जनता कभी किसी जनविरोध्ी सरकार को किसी भी हालत में स्वीकार नहीं करती है। चाहे वह इंदिरा गांध्ी द्वारा बहुगुणा को चुनौती देना रहा हो या तिवारी द्वारा प्रदेश के हितों को रौंदने का कारनामा हो, प्रदेश की जनता ने तमाम प्रलोभनों को दरकिनारे करते हुए जिस प्रकार से सत्तांधे को सत्ता से उखाड़ पफैंका उसके सामने निशंक सहित तमाम जन विरोध्ी नेताओं के मनसूबे कहां सपफल होंगे। इसी आशंका से आशंकित भाजपा का नेतृत्व चुनाव से पहले निशंक को हटा कर भाजपा मे ंसुशासन के पर्याय रहे भगतसिंह कोश्यारी को एक बार पिफर चुनाव के लिए मुख्यमंत्राी की कुर्सी पर आसीन कर सकता है तथा पूर्व मुख्यमंत्राी भुवनचन्द्र खडूडी को प्रदेश के अध्यक्ष के पद पर आसीन किया जा सकता है। क्योंकि खंडूडी के बाद निशंक की ताजपोशी करने के बाद कुमाऊं मण्डल में लोगों की नाराजगी भाजपा से कापफी बड़ गयी है। इस कारण संगठन व जनता में व्याप्त तमाम नाराजगी दूर करने के लिए भाजपा के 
रणनीतिकारों ने यह पफामूर्ला भाजपा नेतृत्व के सामने रखा है। 
अब देखना हे भाजपा नेतृत्व भाजपा व 
प्रदेश के हितों की रक्षा का निर्णय लेता है या पिफर अपने निहित स्वार्थों में मूक रहते हुए 
प्रदेश से लोकसभा चुनाव की तरह विधनसभा चुनाव में भी भाजपा का सपफाया होते देखना चाहता। कुल मिला कर भाजपा नेतृत्व के पास समय ज्यादा नहीं है। अगर इसी माह बजट से पहले भाजपा ने प्रदेश सरकार का मुखिया  नहीं बदला तो पानी सर से गुजर जायेगा। 

स्वयं को पाक साफ रखते हुए बाबा रामदेव करें भ्रष्टाचारियों के खिलाफ कुरूक्षेत्र का ऐलान



स्वयं को पाक साफ रखते हुए बाबा रामदेव करें भ्रष्टाचारियों के खिलाफ कुरूक्षेत्र का ऐला
बाबा रामदेव के द्वारा देश में भ्रष्टाचार के खिलाफ प्रखर मोर्चा खोलने से बौखलाये कांग्रेसिंयो ने बाबा रामदेव पर जो उनकी अकूत 1100 करोड़ रूपये से अधिक की सम्पतियों का आरोप लगाया, उससे पूरा देश हैरान है कि सच क्या है। इस मामले में एक बात साफ है कि देश में चंद लोगों के पास अरबों खरबों की अकूत सम्पति है। जो अधिकांश कालाधन के रूप में है। इस मामले में एक ही बात देश की जनता चाहती है कि बाबा का भ्रष्टाचार के खिलाफ अभियान तो अच्छा हैं, परन्तु बाबा रामदेव भी भ्रष्टाचारियों से स्वयं से दूर रखे व अपने अभियान की पावनता की भी रक्षा करें। वे कांग्रेसी या अन्य भ्रष्टाचारियों से न घबरायें अगर वे पाक साफ रहेंगे तो पूरा देश उनके साथ हैं अगर उन्होंने भी नेताओं की तरह दोहरा आचरण किया तो महाकाल सबकों बेनकाब करता है। बाबा रामदेव को निर्भीक हो कर अपने आप को भ्रष्टाचारियों के खिलाफ निर्मम प्रहार करते हुए भ्रष्टाचार से त्रस्त इस देश की जनता को सही दिशा देनी चाहिए। जब बाबा रामदेव को भ्रष्टाचार में आकंठ घीरे उत्तराखण्ड के मुख्यमंत्री ईमानदारी का सर्टिफिकेट देंगें तो जनता कैसे विश्वास करेगी। बाबा रामदेव को जिस प्रदेश में उनका मुख्यालय स्थित हैं उस प्रदेश के भ्रष्टाचार पर भी बेझिझक खुला विरोध करना चाहिए, जिसके कुशासन के खिलाफ देश की मीडिया ने भी शर्मनाक मूकता साध रखी है। जनता उनके द्वारा उत्तराखण्ड में हो रहे भ्रष्टाचार पर उनकी मूकता पर हैरान है। जनता सब जानती है इसलिए बाबा रामदेव को अपना दामन साफ रखते हुए कांग्रेस या किसी भी दल या व्यक्ति के भ्रष्टाचारियों से दूरी बनाते हुए देश को भ्रष्टाचार से मुक्ति देनी चाहिए। देश की जनता को इस बात से कोई शिकवा नहीं है कि बाबा के पास 1100 करोड़ की सम्पति है। बाबा के पास जो सम्पति है वह देश के हित में काम आ रही है, जग कल्याण के लिए काम आ रही है। बाबा को अपने आपपास अपने तथाकथित समर्थकों के आचरण से भी सजग रहना चाहिए। देश की जनता के विश्वास को बनाये रखें।  अन्याय के खिलाफ सदैव कुरूक्षेत्र में रत रहने वाला  भगवान श्रीकृष्ण की अपारकृपा का सदा भागी  मैं उनके उज्जवल भविष्य की कामना करता हूॅ। केशव केशव कूकिये मत कूकिये अषाड......पर भी विश्वास करता हूूॅ।  जिस प्रकार से अरूणाचल में बाबा रामदेव पर कांग्रेसी सांसद ने अपशब्द कह कर शब्दवाणों का हमला किया, उसके बाद कांग्रेस के रणनीति महासचिव दिग्गी राजा ने कटघरे में रखने की कोशिश की, उसके बाद बाबा राम देव पर और इस प्रकार के सियासी हमले की आशंका निरंतर बढ़ गयी है। बाबा राम देव को चाहिए कि वे इन भ्रष्टाचारियों को पोषक करने वाले तमाम राजनैतिक दलों के मंसूबों को भांपते हुए किसी भी कीमत पर देश को इन तत्वों के रहमोकरम पर छोड़ कर पलायन न करे। पूरा देश उनके साथ है। जरूरत है सही दिशा में सही नियत से काम करने की। मेने तो पहले भी दो टूक शब्दों में कहा है।  शाबास बाबा रामदेव जी! जो आपने मात्रा अपनी मुक्ति या मठ से आगे जनकल्याण व राष्ट्र कल्याण के महान कार्य करने का संकल्प लिया। प्राणीमात्रा के कल्याण के लिए भारत को महान राष्ट्र बनाने के लिए देश को एक सशक्त राजनैतिक विकल्प देने का मन बनाया। देश के गौरवशाली अतीत को पिफर से हासिल करने के लिए जनता को जागृत कर भारत स्वाभिमान संगठन बनाने का काम किया। आकण्ठ भ्रष्टाचार में डूब चूके इस देश को बचाने के लिए जनकल्याण के लिए समर्पित संतों को आगे आना ही चाहिए। जो देश व प्राणीमात्रा की इस दुदर्शा को भी देख कर मूक अपने मठो व गुपफाओं में मस्त हैं उनकी संतई पर मुझे शंका है? आज देश का दुर्भाग्य यह है कि सनातन ध्र्म की ध्र्मध्वजा का वाहक आदि गुरू शंकराचार्य जी ने जिन चार पीठों के आचार्य को शंकराचार्य नाम की पदवी दे कर विभूषित किया है वे आज अपने अपने मठों , पदों व जातिवाद में इस कदर पफंस गये हैं कि उन्हें न तो देश की इस त्रासदी की चिंता है व नहीं देश में इस चंगैजी प्रवृति का विरोध् प्रकट करने का साहस तक रहा है। नहीं तो क्या कारण है कि आज देश में नामधरी दर्जनों स्वयंभू शंकराचार्यों के बाबजूद देश की लोकशाही में आज प्रतिदिन हजारों बेगुनाह गौवंश की निर्मम हत्या हो रही है। अपने पदों, मठों व चरणपादुकाओं को पुजावनें में डूबे भगवाधरियों को एक बात सापफ समझ लेनी चाहिए कि इस देश में संतों की पूजा पदों से नहीं उनके व्यक्तित्व व संतई से होती है। यहां पर ज्ञानदेवजी, कबीरदास जी, रैदास जी, गुरू गोविन्द सिंह जैसे महान संतों की अमर व्यक्तित्व किसी पद या मान्यता की मोहताज नहीं है। अन्याय के खिलापफ चन्द्रगुप्त को तैसार करने वाले चाणाक्य व शिवाजी महाराज को तैयार करने वाले समर्थ गुरू रामदास की आज भारत को नितांत जरूरत है। आज भारतीय संस्कृति से अनजान जनवादी विचारकों व यो(ाओं को इस बात का भान तक नहीं है जिस जनवाद की कल्पना माक्र्स व माओं ने की थी वह अपने आप में अध्ूरा हैं, समग्र जनवाद युगो पहले भगवान श्रीकृष्ण ने इसी पावन ध्रती भारत में उद्घोष किया है कि जड़ चेतन सभी में परमात्मा है यानी सभी परमात्मा के स्वरूप है। सभी में खुद को व परमात्मा को देखने, समझने व जानने का मूल मंत्रा दिया था। इससे बड़ा सत्यवाद व जनवाद दूसरा क्या हो सकता है। इसको समझे बिना भारत में जनवाद लाने का प्रयत्न करना भी अपना संघर्ष खुद कमजोर करना है।
 स्वामी रामदेव बधई के पात्रा इस लिए भी है कि उन्होंने भगवान श्रीकृष्ण के परम वचनों को सिरोधर्य कर अन्याय के खिलापफ लोकशाही के कुरूक्षेत्रा में शंखनाद करके भारतीय संस्कृति की प्राचीन संत परमपरा को जीवंत करने का कार्य किया।   इस देश व मानवता का दर्द को समझते हुए देश की राजनीति को सही दिशा देने का काम किया। नहीं तो देश के संतों में एक कुविचार ने जकड़ रखा है। संतन को सिकरी क्या काम! इस विचार के लोगों ने देश को, मानवता को जिनता नुकसान पहुंचाया उसका वर्णन नहीं किया जा सकता है। जबसे इस देश को संतों व महात्माओं ने इस देश के हुक्मरानों के हाथों छोड़ी तब से देश की यह दुर्दशा हुई। देश को शताब्दियों की गुलामी का दंश सहना पड़ा। देश को आजादी के बाद राजनैताओं व नौकरशाहों के चंगैजी दंश झेलना पड़ रहा है। संतों ने जब से सिकरी क्या काम वाली प्रवृति को अंगीकार किया, तबसे देश पतन की गर्त में ध्ंस गया है। संत केवल अपनी मुक्ति या अपने मठो तक सीमित नहीं होता है। वह तो जगत कल्याण के लिए संत बनता है। नहीं तो इस देश में संतों ने कभी समाज व मानव को इन निरंकुश, सत्तालोलुप हुक्मरानों के भरोसे नहीं छोड़ा। संतों ने हमेशा हुक्मरानों पर हमेशा नैतिक अंकुश में रख कर सददिशा देने का महत्वपूर्ण कार्य किया। अनाचारी व निरंकुश हुक्मरानों से समाज की रक्षा के लिए कभी विश्वामित्रा बन कर तो कभी परशुराम बन कर संतों ने सद्दिशा देने का काम किया। संत मानवता को निरंकुश हुक्मरानों के रहमोकरम पर छोड़ कर उनकी चैंगेजी जुल्मों व अनाचार को देख कर कभी मूक नहीं रहा। यही इस देश की सनातन परंपरा रही।
जब-जब संतों व ध्र्म गुरूओं ने द्रोणाचार्य, कृपाचार्य की तरह अपने निहित स्वार्थों में अंध्े हो कर अधर््म का साथ देने का कृत्य किया तब-तब भारत को पतन का दंश झेलना पड़ा। संत वही जो परम् सत्य को जान कर जन-जन के कल्याण के लिए अपना जीवन समर्पित करे। अपने मठ व अपनी मुक्ति के लिए ही जीने वाले लोग कभी सच्चे संत नहीं कहलाये। इसी लोककल्याण के लिए समर्थ गुरू श्रीरामकृष्ण परम्हंस ने अपनी परम् मुक्ति की लालशा से शिष्य बनने के लिए अपनी शरण में आये स्वामी विवेकानन्द को कड़ी पफटकार लगाते हुए कहा था कि तुम पशुवृति से उपर उठो! मात्रा अपनी मुक्ति के लिए मै तुम्हें अपना शिष्य नहीं बनाऊंगा? मैने तुम्हे जगत कल्याण के लिए अपना शिष्य बनाने के लिए चुना है। मैं तुम्हारी मुक्ति से तब तक तुम्हें वंचित करता हॅू जब तक तुम एक संत का सबसे बड़ा कार्य जनकल्याण के कार्य को पूरा नहीं करोगे। यही तुम्हारी गुरू दक्षिणा होगी यही तुम्हारा जीवन का परम् मुक्ति है। अपने गुरू का परम् अर्थ समझने वाला मुमुक्षु का चिर अभिलाषी नरेन्द्र को जगतकल्याण के कार्य में लगा कर स्वामी रामकृष्ण जी ने सारे संसार में स्वामी विवेकानन्द बना कर अमर कर दिया। यही जीवन व भारतीय संस्कृति का परम् रहस्य है। भगवान श्रीकृष्ण ने जिस परम सत्य को कुरूक्षेत्रा में अपनत्व के मोह में जकड़े हुए महायो(ा अर्जुन को गीता के परम ज्ञान से दूर किया, वह ज्ञान ही यही है कि संसार में जड़ चेतन में परमात्मा है। प्राणी को किसी भी हालत में असत् , अध्र्म, अत्याचारी का साथ नहीं देना चाहिए। असत् का साथ देने वाला चाहे भीष्म पितामह व महादानी कर्ण जैसे कितना भी महान परमयो(ा क्यों न हो वह ध्र्म-अध्र्म के कुरूक्षेत्रा में सदा सत् के आगे नष्ट हो जाते है। इसलिए अन्याय का मूक समर्थन करने वाले भी अन्यायी के पक्ष में खड़े होते है। इसलिए आज देश व प्राणीमात्रा के कल्याण के लिए स्वामी रामदेव सहित सभी संतों व प्रबु( जनों का प्रथम कत्र्तव्य यही है कि वह जीवन के कुरूक्षेत्रा में वर्तमान सत्तालोलुप ध्ृतराष्ट्र के दुर्योध्नो व दुशासन जैसे हुक्मरानों का विरोध् करके जनता को सद विकल्प प्रदान करें।
आज देश की  जनता अपने आप को ठगी सी महसूस कर रही है। यहां के राजनेताओं व नौकरशाहों के चंगैजी व काले कारनामों से वे हैरान हैं। देश में विकासपुरूष के नाम से देश के सबसे वरिष्ठ अनुभवी राजनेता नारायणदत्त तिवारी का आंध््रप्रदेश के राजभवन में जो रूप देखा उससे राजनेताओं पर उनका रहा सहा विश्वास पूरी तरह से डिगा दिया। इससे पहले कांग्रेस से छले गयी भारत के आम जनमानस की आशाओं पर जब संघ के वरिष्ठ स्वयंसेवक अटल -आडवाणी के कुशासन ने अपनी पदलोलुपता का बज्रपात किया तो लोगों को भगवान राम व राष्ट्रवाद के नाम पर राजनीति करने वाले भी कालनेमी के कलयुगी अवतार लगे। राष्ट्रवाद व भारतीयता की झण्डेबरदार संघ पोषित भाजपा के पदलोलुप मठाध्ीशों के आगे संघ की विपफलता व पंगुता देख कर लोग हैरान है।  जनता राजनेताओं व देश के नौकरशाहों से निराश हो ही चूकी है। परन्तु इस सप्ताह  जिस प्रकार से साध्ु संतों का एक के बाद एक विकृत चेहरा सामने आ रहा है उससे जनता दंग है कि अब कौन करेगा मेरे देश की रक्षा?  किस पर करे देश की जनता विश्वास। कौन करेगा भगवान श्रीकृष्ण की ‘संभवामी युगे...युगे वाली अमरवाणी को साकार।  इस पखवाड़े  इच्छाधरी सांई बाबा, दक्षिण भारत के बड़े संत स्वामी नित्यानन्द,  सहित कई संत रंग रंगेलियां व अनैतिक कृत्यों में सरेआम बेनकाब हुए। ऐसे में देश की जनता को एक आशा की किरण दिखाई दे रही है योग गुरू बाबा रामदेव। जिन्होंने अपने योग कार्यक्रमों को राष्ट्रवाद की सद् दिशा दी है।
सन् 2014 के लोकसभा चुनाव में योगगुरू रामदेव द्वारा भारत की रक्षा व मजबूती के लिए राजनीति के दंगल में उतरने की मंशा से देश के तमाम राजनैतिक दलों में एक प्रकार का हड़कम्प मचा हुआ है। जिस तेजी से योगुरू बाबा रामदेव की कीर्ति पूरे विश्व में लहरा रही है तथा जिस प्रकार से वे देश की व्यवस्था के शु(िकरण करते हुए इसे मजबूत बनाने के लिए जनता से खुला आवाहन कर रहे हैं उससे भारतीय लोकशाही को दलों की दलदल में जमीदोज कर चूके राजनैतिक दलों के मठाध्ीशों की रातों की नींद व दिन का चैन पर ग्रहण सा लग गया है। उनको यह भय सताने लगा है कि बाबा रामदेव अगर इसी प्रकार से लोगों को जागृत करके भारत की शताब्दियों से मृतप्रायः आत्मा को जागृत करने का काम करने में सपफल हो गये तो उनका देश को दोनों हाथों से लुटने व लुटाने का राजनीति की आड़ में पफल पफूल रहा चंगैजी ध्ंध चैपट हो जायेगा। खासकर जिस प्रकार से अपने निहित स्वार्थों की पूर्ति के लिए देश की अध्किांश राजनैतिक पार्टियां जाति-ध्र्म व क्षेत्रावाद का संकीर्ण जहर के गटर में देश की लोकशाही को ध्केलकर पूरी व्यवस्था को भ्रष्ट कर लूट रहे है। उससे देश में आम जनता के लिए लोकशाही एक स्वप्न बन गया है। यहां पर आम आदमी जहां एक तरपफ मंहगाई, भ्रष्टाचार से पूरी तरह से त्रास्त है वहीं आज आम आदमी से वर्तमान तंत्रा दूर हो गया है। आम आदमी से शिक्षा, चिकित्सा व न्याय तथा रोजगार इन लोकशाही के स्वयंभू ठेकेदारों ने षडयंत्रा के तहत दूर कर दिया है। ऐसे में आज देश का आम आदमी अपनी रोजी रोटी के लिए इतना व्यथित है कि उसे इस समस्या के निदान के मूल व उसके निदान के बारे में सोचने तक की पफुर्सत तक नहीं है।
मुझे आशा हैं कि स्वामी रामदेव जी अपने संकल्प व अपने नैतिक दायित्व का निर्वहन करते हुए आगामी 2014 के लोकसभा चुनाव में चुनावों में अपने दल को उतारेंगे। वे इन राजनेतिक दलों की चंगेजी से भारत की रक्षा करने के लिए लोकशाही के कुरूक्षेत्रा के मैदान से पलायन नहीं करेंगे। भगवान श्री कृष्ण ने प्राणीमात्रा को यह दिशा दी है कि सत पुरूष जय व पराजय, हानि व लाभादि के द्वंद से उपर उठ कर अन्याय के खिलापफ कुरूक्षेत्रा में उतरना चाहिए। यही मानव जीवन का सबसे बड़ा ध्र्म है। क्योंकि इसी में ध्र्म व मानवमात्रा का कल्याण है। हालांकि राजनीति में कई संत उतरे हैं, वे किसी पार्टी या अपने पदों के लिए इन दलों के कहार बन कर रह गये हैं। सतपाल महाराज कांग्रेसी बन कर रह गये। कई संत भाजपाई। महेश योगी ने अजय पार्टी बना कर कुछ इस दिशा में कदम बढ़ाने चाहे परन्तु वे इसमें सपफल नहीं हो सके। अब शंखनाद बाबा रामदेव जी कर रहे हैं।  दलगत राजनीति से उपर उठ कर देश व प्राणीमात्रा के कल्याण के लिए राजनीति में उतरने की हुंकार भरने के लिए लोकशाही के कुरूक्षेत्रा में भगवान श्रीकृष्ण के सुदर्शन चक्र के प्रतीक ‘प्यारा उत्तराखण्ड’ की बाबा रामदेव को लख-लख बधईयां। मेरा भी मानना है कि केशव-केशव कुकये मत कुकये अषाड़.......। आशा है बाबा रामदेव जी लोकशाही के कुरूक्षेत्रा से पलायन नहीं करेंगे। केवल उनकों इस बात का ध्यान रखना होगा कि मुर्दों से नगर नहीं बसते हैं कब्र्रे ही सजती है। जो लोग पदलोलुप, जातिवादी, क्षेत्रावादी व निहित स्वार्थों में अंध्े होते हैं वे मुर्दों से बदतर होते है। हरिद्वार की जिस पावन नगरी में आपने पातंजलि योगाश्रम बना रखा है वह पावन नगरी भी जिस राज्य उत्तराखण्ड में है वहां के शासक बने तिवारी, खंडूडी व निशंक ने किस प्रकार से उन जनांकांक्षाओं को रौंदा है जिनको साकार करने के लिए यहां के असंख्य आंदोलनकारियों ने भारतीय लोकशाही का विश्व में परचम पफेहराने के उद्देश्य से राव-मुलायम सिंह दुशासनों का दमन सह कर भी राज्य का गठन करने के लिए सरकार को विवश किया था। सत्पुरूष असत को त्याग कर सत को आत्मसात करता है। इसलिए कुरूक्षेत्रा को पफतह के लिए हजारों मुर्दों की नहीं पांच ही पांच पांड़वों की ही जरूरत होती है।
शेष श्रीकृष्ण कृपा। हरि ओम तत्सत्। श्रीकृष्णाय् नमों।

Thursday, February 17, 2011

भगवान राम नहीं विकास पुरूश तिवारी की छत्राछाया चाहिए भाजपा को



भगवान राम नहीं विकास पुरूश तिवारी की छत्राछाया चाहिए भाजपा को
क्हां गयी भाजपा की नेतिकता
देश की राजनीति में कब कौन किसके साथ होगा यह कहा नहीं जा सकता। कब कौन किसका दूश्मन व कब कोन किसका मित्रा बन जाय। कब किसको पार्टियां भ्रष्टाचारी बताये व कब किसको विकास पुरूष बता दे। ऐसा ही अजीबो गरीब नजारा उत्तराखण्ड में भी दिखाई दे रहा है। वहां पर प्रदेश सरकार के दीन दयाल उपाध्याय की जयंती पर जिस प्रकार से 11 पफरवरी को एक भव्य समारोह का आयोजन किया गया। इसमें भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नीतिन गड़करी, प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्राी तिवारी व प्रदेश के मुख्यमंत्राी सहित तमाम बड़े नेता आसीन थे। जो प्रदेश सरकार की गरीबों को सस्ता अनाज देने की योजना का शुभारंभ कर रहे थे।
गडकरी जी तो शायद नये थे परन्तु
प्रदेश भाजपा के नेताओ ंको तो इस बात का भान होगा ही कि जिस तिवारी का वह सार्वजनिक मंच से आरती उतार रहे हैं उसी तिवारी के राज को कुशासन का प्रतीक बता कर उनकी प्रदेश भाजपा सरकार ने उनके चार दर्जन से अध्कि घोटालों की जांच करने के लिए एक आयोग का गठन कर रखा है।  जिस तिवारी को प्रदेश भाजपा ने जनविरोध्ी बता कर प्रदेश में उनको लाल बत्तियों का डोला वाला व प्रदेश के विकास के संसाध्नों को विवेकाध्ीन कोष के द्वारा लुटाने का आरोप लगा कर जनता से जनादेश मांगा था। आज उस तिवारी को महान विकास पुरूष बताने की भाजपा के नेताओं की कोन सी विवशता थी। खासकर तिवारी को जिनके शासन प्रशासन में प्रदेश की जनांकांक्षाओं, आत्मसम्मान को बहुत ही निर्ममता से रौंदा गया था उस तिवारी को मंचासीन करके भाजपा ने जनता को कौन सा संदेश दिया। संदेश तो जनता में चले ही गया। आखिर प्रदेश की जनता जानती है कि किस प्रकार से विवेकाध्ीन कोष का बंदरबांट तिवारी के शासन में हुआ।  किस प्रकार से प्रदेश के आत्मसम्मान को रौंदने वालों को प्रदेश से शर्मनाक संरक्षण दिया गया। मुजफ्रपफरनगर काण्ड-94 के अभियुक्तों को संरक्षण हो या प्रदेश की राजधनी जनभावनाओं को रौंदकर षडयंत्रा के तहत देहरादून में बलात थोपनी हो या जनसंख्या पर आयारति
परिसीमन को प्रदेश में थोप कर जनता की राजनैतिक शक्ति को सदा के लिए कुंद करने वाला कृत्य भाजपा द्वारा सार्वजनिक मंच से महिमामण्डित किये जाने वाले तिवारी के राज में ही हुआ। यही नहीं तिवारी के शासन में प्रदेश में जिस प्रकार से भ्रष्टाचार, व्यभिचारव जातिवाद-क्षेत्रावाद की गर्त में प्रदेश का निर्ममता से ध्केला गया। उसका दंश आज भी प्रदेश झेल रहा है।
इतना होने के बाबजूद भाजपा को शायद ही भारतीय संस्कृति के प्रतीक भगवान राम की जरा सी भी याद आयी हो जिन्होंने लोक लाज को सर्वोच्च मानते हुए अपने जीवन में कई बलिदान दिये थे। परन्तु भाजपा में लगता है अब मर्यादाओं पर चलना सुहाता ही नहीं अगर सुहाता तो वह कभी भाजपा में अपने उन नेताओं को किनारा नहीं करते या वनवास नहीं देते जिन्होंने भगवान राम की जन्म भूमि आंदोलन में भाजपा का ही नहीं देश की आम जनमानस का नेतृत्व किया था। ऐसे प्रखर नेत्राी उमा भारती व देश के जनमानस के मर्म को जानने वाले गोविन्दाचार्य को वनवास नहीं देते। भाजपा अगर मर्यादा पुरूषोत्तम राम या संघ के घोषित उद्देश्यों के प्रति जरा सा भी लगाव होता तो वह उत्तराखण्ड प्रदेश की राजसत्ता से कभी संघ प्रिय कोश्यारी, अनुभवी नेता पफोनिया व ग्रामवासी को दूध् में से मक्खी तरह बाहर निकाल कर नहीं पफेंक कर प्रदेश की राजसत्ता निशंक जैसे ख्याति प्राप्त नेताओं के हाथ में नहीं सोंपते।
भाजपा में लगता है अब भगवान श्री राम की मर्यादाओं वाला जीवन आत्मसात करने की सामथ्र्य नहीं रही। लगता है भाजपाईयों का मन भी  राजनीति की बैतरणी को पार करने के लिए तिवारी के विकासपुरूष वाले मार्ग को ही आत्मसम्मान करने के लिए हिल्लोरें मार रहा है। नहीं तो सार्वजनिक जीवन में भगवान राम की तरह लोकहित व लोक मर्यादाओं का तो अंगीकार करते। जिस तिवारी को हैदराबाद राजनिवास प्रकरण के बाद उनकी अपनी पार्टी ने लोकलाज को ध्यान में रखते हुए तिवारी से दूरियां बना ली। इससे क्रोध्ति हो कर तिवारी कांग्रेस को सबक सिखाने के लिए कभी भाजपा प्रदेश कार्यालय में ध्मक रहे हैं, तो कभी निरंतर विकास संगठन बनाने की बात कर रहे है। अब सारी स्थितियां प्रतिकुल देखते हुए तिवारी ने भाजपा के कार्यक्रमों में जाना शुरू कर दिया है। परन्तु भाजपा को लोकशाही व मर्यादाओं का भान तो होना चाहिए।
खासकर भगवान राम ने तो विभिषण को शरण दी परन्तु वह मर्यादाओं में रहने वाला था। जो व्यक्ति जनहितों को रोंदने का दोषी ही रहा हो उस व्यक्ति के बिना प्रायश्चित के उसको सार्वजनिक सम्मान देना एक प्रकार से देश की संस्कृति व मर्यादाओं पर कुठाराघात करना ही है। खासकर एक तरपफ भाजपा संसद पर भ्रष्टाचार के कारण संयुक्त जांच संसदीय समिति से कराने की बात कर र ही है। वही भाजपा जब इस प्रकार का आचरण करेगी तो किसको विश्वास होगा इनके चरित्रा व इन पर। भगवान राम ने बाली को लोक लाज का मर्म समझाते हुए कहा कि अनुज बध्ु भगनी सुत नारी , सुन सठ ये कन्या सम चारी.......। इसके बाबजूद अगर भाजपा देश की संस्कृति की दुहाई दे कर उनको आत्मसात करती है तो ऐसी भाजपा संघ को व गडकरी को ही मुबारक हो। वैसे भी भगवान राम को वनवास देने के बाद भाजपा से लोगो को मोह एक प्रकार से भंग हो ही गया। वहीं कांग्रेस से तो पहले से मोह भंग है। रही काबी कसर वह गांध्ी के सपनों को राजघाट में ही दपफना देने से जनता इनसे भी दूर हो गयी है।

काश उत्तराखण्ड में भी एक नेता होता



काश उत्तराखण्ड में भी एक नेता होता
मध्य प्रदेष के मुख्यमंत्री चैहान से सबक लें उत्तराखण्डी राजनेता 

काश उत्तराखण्ड में भी एक नेता होता। आप कहेंगे रावत जी क्या कह रहे हो? यहां तो देश के दूसरे भागों से अध्कि बड़े नेता हैं। यहां तो नेताओं के अलावा दूसरा कोई हैं ही नहीं। नेतागिरी तो यहां की माटी में कण कण में भरी हुई है।कहने को उत्तराखण्ड में नेताओं की कमी नहीं हैं। यहां एक दो नहीं आध दर्जन से अध्कि  अखिल भारतीय नेताओं की जमात है। देश के सबसे वरिष्ठ राजनेता नारायणदत्त तिवारी हैं, केन्द्रीय मंत्राी हरीश रावत हैं, विश्वविख्यात संत व राजनेता सांसद सतपाल महाराज हैं, भाजपा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष भगतसिंह कोष्यारी व  भुवनचंद खंडूडी हैं जैसे दिग्गज राष्ट्रीय नेता हैं। कहने को तो भाजपा के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष मुरली मनोहर जोशी भी उत्तराखण्डी मूल के नेता हैं परन्तु उनका केवल मुख्यमंत्राी के पद पर कोन आसीन हो इसमें हस्तक्षेप करने के अलावा किसी मामले में अपने आप को उत्तराखण्डी मामने को तैयार नहीं है। नेता तो दूसरे भी हैं जो प्रदेश में अपने आप के मुख्यमंत्राी के सबसे बड़े दावेदार मानते हैं, इनमें वर्तमान मुख्यमंत्राी रमेश पोखरियाल निशंक, नेता प्रतिपक्ष डा. हरकसिंह रावत। इसके अलावा सांसदों, विधयकों व मंत्रियों तथा भूतपूर्वों की एक लम्बी जमात हें जो अपने आप को प्रदेश का सबसे वरिष्ठ व जमीनी नेता मानते हैं। भाजपा व कांग्रेस के नेताओं के अलावा कहने को यहां पर बसपा व उक्रांद के नेता हैं जो दल प्रदेश विधनसभा में अपनी उपस्थिति दर्ज करा रहे हें। बसपा में तो पूरे भारत में एक ही नेता होती हैं वह उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्राी सुश्री मायावती। बसपा के संस्थापक स्व. काशीराम के बाद अब बसपा में केवल एक ही व एकछत्रा नेता है। रही बात उक्रांद की उसमें काशीसिंह ऐरी व दिवाकर भट्ट हैं। जिनके कारण विरोध्ी दलों को कमजोर करने के बजाय अपने ही दल को विखराव करने का एक लम्बा इतिहास रहा।  परन्तु मैं तो यहां पर प्रदेश के विकास की बंदरबांट के लिए नेतागिरी करने वाले नेताओं की बात नहीं कह रहा हूॅ। मैं तो उत्तराखण्ड के हितों के लिए संघर्ष करने वाले नेता की बात कर रहा हॅू। अपने मध्य प्रदेश के हितों के लिए अनशन करते हुए मध्य प्रदेश के तेजतरार मुख्यमंत्राी शिवराज चैहान को देख कर मेरे मन में एक टीस सी उठी कि काश! उत्तराखण्ड में भी एक भी शिवराज चैहान जैसा नेता होता तो आज उत्तराखण्ड देश का भ्रष्टत्तम राज्य बनने की दिशा में बढ़ने के बजाय विश्व को लोकशाही का आदर्श पाठ पढ़ाने वाला राज्य के रूप में स्थापित हो जाता। अगर उत्तराखण्ड में एक भी नेता शिव राज की तरह होता तो वह उत्तराखण्ड राज्य के आत्मसम्मान व भारत के माथे पर कलंक लगाने वाले ‘मुजफ्रपफरनगर काण्ड-94 के दोषियों को’ सीबीआई, मानवाध्किार आयोग व इलाहाबाद उच्च न्यायालय द्वारा दोषी ठहराने के बाबजूद 17 साल बाद भी सजा न होने पर इस तरह नकटों की तरह मूक नहीं रहते। इनमें जरा सा भी जमीर होता तो ये सामुहिक रूप से भारत के प्रधनमंत्राी से उसी प्रकार की पुरजोर गुहार करते जिस प्रकार 1984 के सिख विरोध्ी दंगों व गुजरात दंगों में कई बार जांच की जा रही है। ये मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्राी की तरह अगर सरकारें व न्यायालय नहीं सुनते तो अनशन करते। परन्तु करता कौन वह कांग्रेसी सरकार जिसके मुख्यमंत्राी नारायणदत्त तिवारी की सरकार में इस काण्ड के आरोपी को न्याय प्रक्रिया को ध्त्ता बता कर बरी करने का जघन्य कुकृत्य किया जाये या वह भाजपाई सरकार जिसके मुख्यमंत्राी खंडूडी के कार्यकाल में इस काण्ड के आरोपी को उत्तराखण्ड में लालकालीन बिछाने की ध्ृष्ठता की गयी हो। आरोपियों को दण्डित देना तो रहा दूर इस काण्ड के अभियुक्तों को शर्मनाक संरक्षण देने वालों को प्रदेश में महत्वपूर्ण पदों पर आसीन किया गया। कहां गयी इनकी गैरत? सबसे ज्यादा हैरानी व आश्चर्य यह है कि जिस काण्ड को इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने नाजी अत्याचारों के समकक्ष माना, जिस काण्ड के लिए इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने तत्कालीन केन्द्र की राव तथा उप्र की मुलायम सरकार को दोषी मानते हुए वहां के प्रशासन पर भारतीय संविधन व मानवता को गला घोंटने का अपराध्ी माना था, जिस काण्ड पर सीबीआइ्र ने जिनको दोषी ठहराया था । उस काण्ड पर भाजपा सहित देश के तमाम संगठन घडियाली आंसू बहा रहे थे, आज उस मानवता व महिलाओं पर हुए इस निर्मम राज्य की संगठित बर्दी धरी गुण्डों के शर्मसार करने वाले अपराध् पर क्यों मूक हैं? आज इस काण्ड ने न केवल उत्तराखण्ड के नेताओं की अपितु देश की न्याय पालिका सहित पूरी व्यवस्था पर प्रश्न चिन्ह लगा दिया है। यह काण्ड आज भी ध्क्किार रहा है देश के हुक्मरानों को, यहां के तथाकथित मानवाध्किार के पुरोधओं को यहां के तथाकथित न्याय के पेरोकारों को। आज जिन लोगों को आरूषि हत्याकाण्ड दिखाई दे रहा है उन काठ के उल्लूओं को मुजफ्रपफरनगर काण्ड क्यों नहीं दिखाई दे रहा है इस बात का सबसे बड़ा अपफसोस है। निशंक सरकार से आशा ही करनी क्या? उनको तो प्रदेश का शर्मनाक दोहन करने के लिए उनके आकाओं ने जनभावनाओं को रौंद कर  मुख्यमंत्राी बना रखा है। उनको तो शायद ही इस आत्म सम्मान का जरा भी भान हो? अगर होता तो वे अपने पूर्ववर्ती मुख्यमंत्रियों तिवारी, कोश्यारी, स्वामी व खंडूडी की तरह इस मामले में नपुंसकों की तरह मौन नहीं रहते। इनमें जरा सी भी आत्मसम्मान होता तो वे अविलम्ब शिवराज चैहान की तरह अनशन करने का कदम उठाते? परन्तु यहां तो दुर्भाग्य यह है कि यहां पर किसे लगी है प्रदेश के हितों की इन सबको प्रदेश की सत्ता की बंदरबांट में खुद को चैध्री बनने की अंध्ी दौड का नायक बनना है। 
केवल मुजफ्रपफरनगर काण्ड ही नहीं अपितु यहां पर प्रदेश की स्थाई राजधनी ंिजसको प्रदेश की उस जागरूक जनता ने राज्य गठन आंदोलन के प्रारम्भ में ही गैरसैंण के रूप में स्वीकार कर दिया था। जिसे राज्य गठन से पहले मुलायम सरकार की समिति ने गैरसेण को राजधनी के रूप में मान्यता दे दी थी  परन्तु क्या मजाल राज्य गठन के बाद यहां के विकास के बजट पर बंदरबांट करने के लिए राजनीति करने वाले तथाकथित राजनेताओं को लोकशाही के प्रति जरा सी भी ईमानदारी व नैतिकता को अंगीकार किया। अगर इनमें जरा सी भी नैतिकता होती तो ये अब तक अविलम्ब गैरसैंण में राजधनी गठित कर लोकशाही का सम्मान करते। 
दुर्भाग्य यह रहा कि उत्तराखण्ड में आज भी एक भी नेता ऐसा नहीं है जो मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्राी शिवराज चैहान की तर्ज पर प्रदेश के हितों के लिए अनशन जेसे कदम तक उठाने के लिए तैयार हो। तैयार होना तो रहा दूर वे इस दिशा में आवाज उठाने का साहस तक नहीं जुटा पाते हैं। एक तरपफ मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्राी  शिवराज चैहान प्रदेश के किसानों के हितों की केन्द्र सरकार द्वारा की जा रही उपेक्षा से आहत हो कर प्रदेश में स्वयं अनशन पर बैठ गये। वहीं दूसरी तरपफ भाजपा शासित प्रदेश उत्तराखण्ड के मुख्यमंत्राी रमेश पौखरियाल निशंक  11 पफरवरी को दीन दयाल उपाध्याय की जयंती पर देहरादून में गरीबी की रेखा के नीचे रह रहे परिवारों को सस्ता राशन देने का ऐलान कर रहे थे। सरसरी तोर पर देखने में दोनों बहुत ही कल्याणकारी योजनायें लग रही थी। दोनों ही जनता को लुभावनें के कार्य कर रहे थे परन्तु जिस प्रकार से मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्राी अपने प्रदेश के किसानों के हितों की रक्षा के लिए केन्द्र सरकार से सीध्े मोर्चा ले रहे थे वहीं उत्तराखण्ड के मुख्यमंत्राी प्रदेश के महत्वपूर्ण हितों को नजरांदाज करते हुए केवल आगामी 2012 के चुनावों को नजर में रखते हुए जनता को एक प्रकार से चुनावी प्रलोभन में जनता को मोहने का काम कर रहे थे।  लोकशाही में जनहित के लिए शिवराज की तरह  ऐसी नोटंकी करना भी हितकारी होता है।  परन्तु उत्तराखण्ड में जहां प्रदेश के भविष्य पर इन निहित स्वार्थी नेताओं के कारण जनसंख्या पर आधरित परिसीमन थोपा गया, इससे प्रदेश का राजनेतिक भविष्य सदा के लिए दपफना ही गया है। परन्तु इन्होंने अभी तक उपफ तक नहीं की। प्रदेश में विकास के बजाय भ्रष्टाचार, जातिवाद व क्षेत्रावाद की आड़ में प्रदेश के विकास की बंदरबांट का अंध्ी आंध्ी चली हुई है। ऐसे में केवल एक ही टीस मन में उठती है है प्रभु मेरे उत्तराखण्ड को इन पाखण्डी व जनहितों को अपने निहित स्वार्थ के लिए रौंदाने वाले नेताओं से बचाओ। काश मेरे प्रदेश में कोई यशवंत सिंह परमार होता तो प्रदेश में विकास होता, कोई शिवराज चैहान जैसा मुख्यमंत्राी होता तो प्रदेश के हितों की रक्षा  होती, यहां पर विशेष राज्य का दर्जा हासिल होने पर भी उस पर ग्रहण लग गया, न तो ट्टषिकेश में एम्स बन पाया व नहीं यहां घोषित हुई रेल लाइनें, इन मुद्दों के लिए राजनीति करते तो प्रदेश का कुछ भला होता। परन्तु करेगा कौन इनको तो केवल बंदरबांट के लिए यहां पर केवल बजट और बजट चाहिए। प्रदेश में शिक्षा, स्वास्थ्य व नैतिकता का मापदण्ड निरंतर गिर रहा है। परन्तु इसकी चिंता कौन करे। इन्हें केवल बजट चाहिए। प्रदेश व जनता जाय भाड़ मे। शेष श्रीकृष्ण कृपा। हरि ओम  तत्सत्। श्री कृष्णाय् नमो।

कब मिलेगा राश्ट्र को अपना भारत धाम



  कब मिलेगा राश्ट्र को अपना भारत धाम
भारत को सर्वोच्च धाम से वंचित रखने वाले हुक्मरानों जवाब दो
इससे बड़ा दुर्भाग्य किसी देश का और दूसरा क्या होगा कि उसके गौरवशाली सर्वोच्च धम व विरासत से वहां की सरकारें जानने के बाद भी वंचित रखे। यह सरकारों का दूसरा क्या होगा किसी भी अर्थ में राष्ट्रवादी कार्य नहीं माना जा सकता है यहां की सरकारों ने देश की आम जनता से देश के उस गौरवशाली सर्वोच्च धम से देश की जनता को जानबुझ कर वंचित रखा, जिसके नाम से देश को भारत के नाम से जाना जाता है। हाॅं मैं महाराजा भरत जिनके नाम से इस देश का नाम भारत पड़ा उनके जन्म स्थान ‘भारत धम’ के बारे में आज पिफर दो टूक सवाल देश के हुक्मरानों के साथ उत्तराखण्ड प्रदेश की सरकारों से कर रहा हूॅ।  उस भाजपा की उत्तराखण्ड प्रदेश सरकार से भी कर रहा हॅू जो संघ पोषित भाजपा अपने आप को राष्ट्रवादी होने का दंभ भरती है। कांग्रेस से आशा ही क्यों करें। उसे लगता है देश की संस्कृति व इतिहास से ही कहीं कोई लेना देना नहीं है। उसके लिए तो उस मुर्गे की तरह सुबह तभी लगती है जबसे उसने बाग देना शुरू किया हो। इसी तरह कांग्रेस को भी भारत का इतिहास या तो पिफरंगी तबकों का जुठन लगता है या पिफरंगी हुक्मरानों के खिलापफ गांध्ी नेहरू के संघर्ष का ही लगता है। परन्तु राष्ट्रवाद की उद्घोष करने का दंभ भरने वाली भाजपा भी भारतीय गौरवशाली इतिहास व विरासत की इतनी उपेक्षा करेगी, यह देख कर बहुत दुख होता है। यह मात्रा किसी राजा महाराजा का जन्म स्थान नहीं यह भारत देश के लिए सर्वोच्च स्थान है। यह भारत के लिए सर्वोच्च धम है। यह आम भारतीयों के लिए काशी व काबा की तरह पावन है। यहां की रज हर देशवासियो के लिए पावन है। यहां के दर्शन व स्मरण मात्रा से आम भारतवासी अपने प्राचीन गौरवशाली अतीत को आत्मसात कर इस देश को पुन्न गौरवशाली देश बनाने का संकल्प लेते। यह देश के लिए राजधट या इंडिया गेट से पवित्रा सर्वोच्च धम है। इस देश का हर नागरिक अपने जीवन में उसी प्रकार दर्शन करना चाहता जिस प्रकार यहां का आम आदमी अपने जीवन में मंदिर, मस्जिद, गुरूद्वारे या चर्च में जा कर अपना शीश झुकाना चाहता। भारत धम देश में एकता अखण्डता व जगद्गुरू बनने की अक्षुण्ण ऊर्जा को संचारित करने का सूर्य है। परन्तु देश के हुक्मरानों ने इसे अब तक देश की आम जनता से वंचित कर रखा है।
देश के हुक्मरानों के इस गुनाह के कारण आज देश की जनता को ही नहीं हुक्मरानों को भी आज इस बात का ज्ञान नहीं है कि देश का सर्वोच्च धम कौन है। कोई देश का सर्वोच्च धम राजघाट तो कोई इंडिया गेट समझे परन्तु इस देश का सर्वोच्च धम भारत धम है। जो देवभूमि व मोक्ष भूमि के नाम से विख्यात उत्तराखण्ड के पौड़ी जनपद के कोटद्वार के समीप महर्षि कण्व ट्टषि के आश्रम कण्वाश्रम में महाराजा भरत की जन्म स्थली भारत धम है। यही वह पावन भारत धम है जहां महाराजा भरत जिनक नाम से इस देश का नाम भारत प्रसि( हुआ, उनकी जन्म स्थली है। भले ही भगवान राम व भगवान श्री कृष्ण की जन्म स्थली की तरह ही यह आम भारतीयों के लिए पवित्रा है। सरकार की उदासीनता के कारण यह पावन धम उपेक्षा व अतिक्रमण का शिकार हो रखा है।  ं
भले देश की जनता से  भले ही भाजपा अपने आप को राष्ट्रवादी कहे परन्तु जिस महाराजा भरत के नाम से देश का नाम भारत पड़ा उसकी जन्म स्थली पर आज भी कई बार गुहार लगाने के बाबजूद भी वह भारत धम बनाने के लिए जरा सी भी उत्सुक नहीं है। गौरतलब है कि महाराजा भरत की जन्म स्थली उत्तराखण्ड के पौड़ी जनपद के कोटद्वार के समीप कर्णवाश्रम में है। परन्तु देश की संस्कृति व गौरवशाली आत्मसम्मान स्वरूप इस प्राचीन विरासत से देश के आम जनमानस के समक्ष रखने में अब तक की तमाम सरकारें विपफल रही। मैने खुद इस आशय से विशेष निवेदन प्रदेश के वर्तमान मुख्यमंत्राी रमेश पोखरियाल निशंक के समक्ष किया। उन्होंने मुझे इस स्थान पर भारत धम बनाने का वचन दिया था। यह वचन उन्होंने मुझे अकेले में नहीं अपितु देश के डेढ़ दर्जन पत्राकारों, उत्तराखण्ड सरकार के सलाहकार जोशी, दर्जाधरी पी सी नैनवाल व बलूनी के समक्ष दिल्ली स्थित उत्तराखण्ड निवास में मुख्यमंत्राी निशंक नेे एक घण्टे लम्बी गहन विशेष वार्ता के दौरान दिया था। परन्तु खेद है वे भी इस विषय की गंभीरता को समझने में पूरी तरह से नकाम रहे। हालांकि इससे पहले मैने इस पावन भारत धम से भारत के आम जनमानस से साकार कराने के लिए उत्तराखण्ड के प्रथम पर्यटन मंत्राी ले. जनरल तेजपाल सिंह रावत से भी की थी। परन्तु लगता है जनरल रावत की तरह मुख्यमंत्राी निशंक  न तो इस भारत के सर्वोच्च धम ‘भारत धम’ की महता ही समझ पाये व नहीं अपने राष्ट्रीय दायित्व को ही समझ पाये।
नहीं तो इस देश के सर्वोच्च धम ‘भारत धम’ से देश की जनता आजादी के 64 साल बाद भी वंचित नहीं रहती। इस देश की अब तक की किसी भी सरकार ने इसकी महता नहीं समझी। समझते ही कहां से लगता है कि इनको भारत देश की महता का ही आत्म ज्ञान नहीं। अगर होता तो ये आज तक इस दिशा में अपना कत्र्तव्य तो पूरा कर देश का ‘भारत के सर्वोच्च धम भारत धम से वंचित नहीं करते।
इस पावन धम के बारे में जब मेने बचपन में सुना तो तभी से मैने इस पावन धम की दुर्दशा को देख कर मेरा मन व्यथित होता था। इसी लिए भारत को ही विश्व को महान विरासत से अवगत कराने सहित अन्य दिव्य उद्देश्यों के लिए मैने उत्तराखण्ड राज्य गठन के लिए प्यारा उत्तराखण्ड समाचार पत्रा का प्रकाशन भगवान श्रीकृष्ण की अपार कृपा से शुरू किया। जो राज्य गठन के साथ ही अनेक उपलब्ध्यिों को हासिल करने में सपफल रहा। आज विश्व को दिव्य समाधन खण्ड के रूप में उत्तराखण्ड को उसकेे असली स्वरूप में साकार करने के लिए प्रयत्नशील हो कर यहां के जनविरोध्ी व भ्रष्ट राजनेताओं केे जनविरोध्ी कृत्यों को बेनकाब कर रहा हॅू । भले ही संकीर्ण जातिवादी, भ्रष्ट, जनविरोध्ी नेता व उनके प्यादे नाखुश हों परन्तु आम जनता का जो प्यार, स्नेह व सहयोग मुझे मिल रहा है वह मेरे लिए असली सम्पति है। मैं सच व न्याय के पथ पर श्रीकृष्ण भगवान के अपार कृपा से लोकशाही के इस कुरूक्षेत्रा में एक सिपाई की तरह सदैव रत हॅू। यही मेरी मंजिल एवं मेरा मिशन है। मेरा सापफ मानना है कि इस विश्व में किसी भी हुक्मरान को जनहितों व सत्य को रौंदने की इजाजत किसी भी कीमत पर नहीं दी जा सकती हे। वे संसार की अदालतों से भले ही बच जायें परन्तु महाकाल की इस अदालत से कभी नहीं बच सकते। श्रीकृष्ण की परम कृपा से हरपल सौभाग्यशाली मुझे अब इस संसार के किसी पद या अन्य चीज की आकांशा तक नहीं है। केवल यही है कि सभी प्राणियों को सदैव न्याय व उचित अवसर मिले। अन्याय कहीं न हो। सबको जीने व अपनी प्रतिभा को प्रपुफल्लित करने का अवसर बिना किसी जाति, ध्र्म, क्षेत्रा, नस्ल के भेदभाव रहित समान रूप से मिले। मेरे लिए पूरा विश्व ही नहीं जड़ चेतन श्रीकृष्ण स्वरूप है। इसलिए मैं तो केवल विनय ही कर सकता हॅू परन्तु जो उचित विनय को नहीं मानता उसको मैं महा समर्थ योगी काला बाबा का वचन ही स्मरण कराना अपना पफर्ज समझता हॅू कि काल कभी किसी को लाठी ले कर मारता नहीं, कारण बनाता है। यही बातें में अपने लेखों से राव, मुलायम, बुश, वाजपेयी व मनमोहन को समझाता रहा। यही बातें में तिवारी, खंडूडी व अब निशंक जी से करता रहा। मेरा कोई अपना स्वार्थ नहीं परमार्थ ही मेरा मिशन है। मैने निशंक जी को भी यही विनय की थी कि तिवारी व खंडूडी की तरह आप भूल न करें, परन्तु सत्य को पहचाने की सामथ्र्य न तो कुरूसभा के सत्तांधें को रही व नहीं आज के हुक्मरानों को। ये जन विरोध्ी कृत्य कर अपना व जनता के भविष्य को रोंदने को उतारू हैं तो महाकाल इनको कहां मापफ करेगा। तिवारी के पतन से सबक लें..... सत्तांध्। भगवान श्रीकृष्ण का अमर वचन का स्मरण कराने के बाद इस लेख को पुन्न श्रीकृष्ण चरणों में समर्पित करता हॅू कि असत्य की कभी सत्ता नहीं रही व सत्य का कभी ह्रास नहीं हुआ। जहां तक भारत धम का सवाल है वह तो बनेगा ही बनेगा परन्तु इन अभागे सत्तांध् शायद ही इसके श्रेय के
भागी बने।
शेष श्रीकृष्ण। हरि ओम तत्सत्। श्री कृष्णाय् नमो।

गणतंत्र को तरसता भारत




गणतंत्र को तरसता भारत 
भले ही भारत को अंग्रेजों की दासता से 15 अगस्त 1947 को आजादी मिल गयी हो परन्तु आजादी के 64 साल बाद भी सदियों तक गुलामी की बदनुमा जंजीरों में रौंदा गया यह भारत आज भी अपने गणतंत्रा को तरस रहा है। जिस देश का तंत्रा अपनी भाषा को रौंदते हुए  गुलामी की भाषा में ही संचालित होता हो उस देश में गणतंत्रा कहना एक प्रकार से गणतंत्रा का अपमान हो। जिस देश का तंत्रा में देश के आत्मसम्मान को रौंदते हुए गुलामी के बदनुमा दागों को आत्मसात किया जाता हो उस देश को गणतंत्रा या स्वतंत्रा कहना एक प्रकार से गणतंत्रा का गला घोंटना ही है?। जिस देश में उसकी अपनी  संस्कृति व इतिहास को रोंद कर देश के दुश्मनों द्वारा षडयंत्रा के तहते उसे गणतंत्रा कहना एक प्रकार से गणतंत्रा का अपमान करना ही है। हकीकत में आज देश के आम गण के लिए इस तंत्रा में एक रत्ती भर जगह नहीं है। आम आदमी को न केवल कार्यपालिका, विधयिका अपितु न्यायपालिका में कहीं अपना वजूद दिखाई नहीं दे रहा है। हालत इतनी शर्मनाक हो गयी है कि देश के अंदर ही देश की प्रमुख राजनीति पार्टी भाजपा को श्रीनगर के लाल चैक में 26 जनवरी को झण्डारोहण करने में सहयोग देने के बजाय प्रदेश सरकार की पूरी ताकत लालचैक में झण्डा न पफेहरा पाये इस पर लगी हुई है। वहीं केन्द्र सरकार बहुत ही शर्मनाक ढ़ंग से इस तमाशा देख कर देश के सम्मान को रौंदवा रही है। वहीं बेलगाम हुई मंहगाई, भ्रष्टाचार व आतंक के दंश से कराह रहे आम आदमी को कहीं सरकार नाम की कोई चीज देखने को नहीं आ रही है। देश में चारों तरपफ भ्रष्टाचारियों, आतंकियों, माओवादियों, अमेरिकी ऐजेन्टों का आतंक छाया हुआ है। देश का आम आदमी कितना सुरक्षित है यह देश की संसद पर हुए पाक-अमेरिकी आतंकियों द्वारा किये गये हमले से पूरी तरह उजागर हो गया है।
भारतीय गणतंत्रा की 61 वीं वर्षगांठ पूरे देश में बहुत ही ध्ूमधम से मनायी जा रही है। वहीं इस देश में परन्तु मैं दशकों से  भारतीय गणतंत्रा को वर्षों से चिराग ले कर ढूंढ रहा हॅू। क्या इस चंगेजी व भारतीय अस्मिता को मिटाने वाले राज को आजादी कहते है? क्या आम जनता को लुटने वालों को गणतंत्रा के सेवक कहते है? क्या देश को गुलामी से बदतर गुलाम बनाने वाले तंत्रा को गणतंत्रा कहते है? मेरा भारत आजादी के छह दशक बाद भी आज अपनी आजादी को तरस रहा है। आजादी के नाम पर पिफरंगी नाम इंडिया व पिफरंगियों की जुबान अंग्रेजी तथा देश को जी भर कर लुटने की पिफरंगी प्रवृति के अलावा इस देश को क्या मिला? आज भारत को न तो विश्व में कोई उसके नाम से पहचानता है व नहीं उसकी जुबान से। आज भी भारतीय पहचान व सम्मान को उसी बदनुमा पिफरंगी गुलामी के कलंक के नाम से जाना जा रहा है। आजादी के छह दशक बाद हमारी स्वतंत्राता के समय ही अपना सपफर नये ढ़ग से शुरू करने वाले इस्राइल, चीन व जापान आज विश्व की महाशक्तियां बन गयी है। परन्तु हम कहां खड़े हैं गुलामी के कलंक को ढोने को ही अपनी प्रगति समझ कर इतरा रहे हैं? आजादी के नाम पर यह कैसा विश्वासघात मेरे देश के साथ? अगर आज देश की शर्मनाक स्थिति को अमर शहीद सुभाषचन्द्र बोस, चन्द्र शेखर आजाद, भगतसिंह, वीर सवारकर, महात्मा गांध्ी देख रहे होते तो उनकी आत्मा भी खून के आंसू बहाने के लिए विवश होती? देश को दिया क्या यहां के हुक्मरानों ने?  देश को अमेरिका, चीन, पाकिस्तान के षडयंत्राकारियों के लिए आखेड़ का मैदान बना दिया है। आज चीन व अमेरिका अपने प्यादे पाकिस्तान, बंगलादेश व नेपाल के द्वारा हमारी गैरत को रौंद रहे है? परन्तु देश के हुक्मरान कहां सोये है?   उसी समय कुछ खबरों ने मुझे और बैचेन कर दिया। पूरे देश में मंहगाई से त्राही-त्राही मची हुई है परन्तु देश के हुक्मरान नीरो बन कर भारतीय स्वाभिमान को कलंकित करने वाले राष्ट्रमण्डलीय खेल  की तैयारियों में ही जुटे हुए है। उनको मंहगाई से त्रास्त जनता की वेदना कहीं दूर तक भी नहीं सुनाई दे रहा है। देश में सरकार व विपक्ष नाम की कोई चीज ही नहीं रह गयी है। जनता मंहगाई, भ्रष्टाचार  से त्रास्त है। देश सेवा का दायित्व जिन नेताओं व नौकरशाहों के कंध्े पर रहा वे देश की सेवा के बजाय चंगेजों की तरह देश के विकास के  लाखों सौ करोड़ रूपये दोनों हाथों से लूट कर स्विस बैंकों में दबा कर रखें तो देश का गणतंत्रा का चेहरा खुद ही बेनकाब हो रहा हे। जिस प्रकार से सेना के उच्चाध्किारी आये दिन भ्रष्टाचार में लिप्त पाये जा रहे हैं उससे और भी भयानक तस्वीर सामने आ रही है कि इस देश की रक्षा करेगा कौन?
भ्रष्टाचार के आरोपों से बदरंग हुए देश के एक उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाध्ीश को बचाने के लिए जातिवाद की दुहाई दी जाती हो। इलाहाबाद उच्च न्यायालय पर सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाध्ीश की टिप्पणी वहां पर न्याय की दयनीय स्थिति को खुद उजागर करती है।  देश के वरिष्ठ राजनेता के कृत्यों ने न केवल राज्यपाल की गरीमा को ध्ूल में मिटा कर बहुत ही निर्लज्जता से अपने आप को बेकसुर बता रहा है।
हमारी संसद में सत्तारूढ़ दल का एक वरिष्ठ सांसद की नागरिकता पर देश की सर्वोच्च जांच ऐजेन्सी सीबीआई ही प्रश्न उठा रही है?  देश के सबसे बड़े राज्य उप्र की विधनसभा के एक सम्मानित विधयक का घर चोरी की गाडियों को छुपाने का अड्डा निकला?  बिहार व उत्तर प्रदेश में जब विधयक पर ही अबलाओं के अस्मत लूटेरे का आरोप लगेगा। इनसे पीड़ितों को न्याय के दरवाजे बंद लगे। उप्र के  विधयक पर पुलिस वाहन चोरी का सतराज होने का आरोप लगे?  हमारे नौकरशाहों के पास ही नहीं हमारे सेना के कई वरिष्ठ अध्किारी, इंजीनियर व चिकित्सकों के पास भी भ्रष्टाचार से सन्ना अकूत सम्पदा का भण्डार बना हुआ है। देश के अध्किांश मंत्राी ही नहीं संतरी अपने निहित स्वार्थो में लिप्त रह कर भारतीय हितों को दाव पर लगाने का आत्मघाति कृत्य भी कर रहे है। यही नहीं देश के करोड़ों बच्चों को न तो समुचित शिक्षा, चिकित्सा, सम्मान तथा न तो न्याय ही मिल रहा है? देशद्रोहियों को न्यायालय द्वारा मौत की सजा सुना देने के बाबजूद देश के हुक्मरानों का हाथ इतना कमजोर है कि वे निशाचरों को सजा नहीं दे पा रहे है। यह सब देख सुनने के बाद एक ही सवाल उठता है कि हमारा देश वास्तव में स्वतंत्रा हैं या देश में हकीकत में गणतंत्रा है?
े   परन्तु उपरोक्त कविता की पंक्तियों मेरे जेहन में दशकों से रह रह कर सर उठा कर मुझे बेचैन करती है। कहां है भारतीय गणतंत्रा? यह सवाल मुझें कापफी कचोटता है। मैं अपने आप से सवाल पूछता हॅू कि यह गणतंत्रा किसके लिए है? मैने अपनी जिन्दगी के 45 सालों में जो देखा व समझा तथा जाना उससे एक ही बात मुझे समझ में आयी कि यह भारतीय गणतंत्रा नहीं हे? इसके लिए कौन जिम्मेदार...... और कोई नहीं हम सब है। इसी आक्रोश को प्रकट करने के लिए मेने 21 अप्रेल 1989 को संसद की दर्शक दीर्घा से देश के हुक्मरानों को ध्क्किारा था। परन्तु इसके बीस साल बाद हालत बद से बदतर हो गयी है। संघ के राष्ट्रवाद का नकाब ओढ़े स्वयं सेवक ;रूपि कालनेमी वाजपेयी व आडवाणी जैसेद्ध जब राजग के कार्यकाल में इंडिया राइजिंग व साइनिंग का तोता रटन लगाने लगे तो देश भोंचंक्का व ठगा सा रह गया। कांग्रेस ने तो लगता है भारतीय स्वाभिमान को गांध्ी जी के सपनों के भारत के साथ राजघाट में दपफना दिया था। लोग कांग्रेस से निराश थे परन्तु जब जनता से संघ के स्वयं सेवको ने राष्ट्रवाद के नाम पर पदलोलुपता व जातिवाद का कलुषित तांडव एनडीए के शासक के रूप में मचाया तो देश की आम जनता की आशाओं पर बज्रपात हुआ। आज दुर्भाग्य यह है कि देश की आम जनता को देश की जुबान में सर्वोच्च न्यायालय में न तो न्याय ही मिल सकता है व नहीं सम्मान। इस देश में आज आम जनता की पंहुच से न्याय, रोजी रोटी, चिकित्सा  व शिक्षा सब बाहर हो गयी है। सबकी सब महत्वपूर्ण संस्थानों पर थैलीशाहों चंगेजों का बर्चस्व हो गया है। कौन दिलायेगा भारतीय जन को उसका अपना गणतंत्रा? हम सब उस दीमक के समान हो गये हैं जो जिस पेड़ पर निवास करता है उसी को खोखला करने में लगा रहता है? युगान्तकारी तत्वदर्शी व आजादी के परम यो(ा काला बाबा सच ही कहते थे कि देवी इस देश में अब विद्या व्यापार, सत्ता व्यापार व  ध्र्म व्यापार में तब्दील हो गया है। देश के चिकित्सालय आम आदमी को स्वास्थ्य लाभ देने के नाम पर लूट खसोट के अड्डे बन गये है। आज यहां देश व देशवासियों के स्वाभिमान की किसे चिंता आज यहां व्यवस्था के हुक्मरानों को अपने पद व अपनी तिजोरी की चिंता हर पाल सताये रहती है। आज इस देश में देश के लिए सोचने व काम करने वाले तंत्रा व हुक्मरानों की नितांत जरूरत है। यहां तो जो तंत्र देश में काबिज है उसमें तो प्रतिभा के बजाय जाति, ध्र्म व क्षेत्रा के नाम पर दागदारों व प्यादों को आसीन करके राष्ट्रीय हितों के बजाय अपने हितों की पूर्ति में जुटा हुआ है।
यहां आजादी तो गुलामी से बदतर हो गयी है?  कैसे मिलेगी देश की आजादी को इन चंगेजो के शिकंजे से मुक्ति? क्या आज भारत में साठ प्रतिशत लोग जो गरीबी की रेखा से नीचे जीवन बसर करने के लिए विवश है उनके लिए इस देश की आजादी का क्या अर्थ रह गया है? देश की सुरक्षा पूरी तरह से जहां विदेश शत्राु से खतरे में पड़ी हुई हैं वहीं इन हुक्मरानों से पूरी तरह लुटी जा रही है। एक नया सवेरा होगा.....विश्वास है भगवान श्री कृष्ण के बचनों पर यदा यदा ही ध्र्मस्य........। इसी आश में मैं निरंतर इन चंगैजी हुक्मरानों के खिलाफ जन जागरूकता का प्यारा उत्तराखण्ड रूपि शंखनाद कर रहा हॅॅू। शेष श्री कृष्ण कृपा, हरि ¬ तत्सत्। श्रीकृष्णाय् नमो।




नेताजी का अपमान क्यों कर रही है भाजपा


नेताजी का अपमान क्यों कर रही है भाजपा

संघ प्रमुख मोहन भागवत जी व भाजपा अध्यक्ष गड़करी जी अब आप ही बताये कि भाजपा शासित प्रदेश उत्तराखण्ड में आजादी के महानायक नेताजी सुभाष चंद बोस का अपमान  करना कौन सी राष्ट्र भक्ति है? आखिर एक तरपफ भाजपा देश के सम्मान के प्रतीक तिरंगा झण्डे को पफहराने के लिए कश्मीर की राजधनी श्रीनगर के आतंक प्रभावित क्षेत्रा में जाने के लिए तिरंगा यात्रा करने में अपनी ताकत लगा कर अपने आप को देशभक्त पार्टी बता रही थी। वहीं 23 जनवरी को नेताजी सुभाष चन्द्र बोस की जयंती पर हिन्दु ध्र्म की राजधनी समझी जाने वाले पावन हरिद्वार में जिलाध्किारी व कचहरी के सामने वाले चैराहा पर नेताजी सुभाष चन्द्र बोस की प्रतिमा के अनावरण करने की दो पल की फुर्सत भाजपा शाशित उत्तराखण्ड के मुख्यमंत्राी रमेश पोखरियाल निशंक को नहीं मिली। मुख्यमंत्राी के आने के पूर्व निर्धरित कार्यक्रम के अंतिम समय पर रद्द करने से न तो नेताजी सुभाष चन्द्र बोस की आदम कद प्रतिमा का अनावरण ही किया गया। इस कारण आजादी के महानायक की कपटे में लिपटी हुईआदमकद मूर्ति इस देश के हुक्मरानों सहित सभी देश के नागरिकों की गैरत को ध्क्किार रही है। जिस मूर्ति के अनावरण की स्वीकृति 17 जनवरी 2011 को हरिद्वार जनपद के जिलाध्किारी डा आर मीनाक्षी सुन्दरम ने अपने पत्रांक 1855/पीए 2011 में दी हो। जिस कार्यक्रम में पधरने के लिए 23 जनवरी 2011 को नेताजी की जयंती पर हरिद्वार में राष्ट्रीय सैनिक संस्था को प्रदेश के मुख्यमंत्राी के अध्किारी बरगलाते रहे। ऐसा नहीं कि मुख्यमंत्राी रमेश पोखरियाल निशंक को इस कार्यक्रम की सूचना नही थी। इस आयोजक संस्था के महासचिव एस के शर्मा के अनुसार मुख्यमंत्राी का सुरक्षा अमला ही नहीं कुत्ता दल भी कई बार इस दिन भी इस कार्यक्रम स्थल की जांच करने में जुटा हुआ था। यही नहीं इस महान मूर्ति पर लगे शिलापट पर मुख्यमंत्राी रमेश पोखरियाल का नाम भी अनावरण करने वाले नाम से खुदा हुआ तथा मूर्ति के नीचे बने स्तम्भ में स्थापित किया हुआ था।  परन्तु अंत में हरिद्वार में चुनाव आचार संहिता के नाम व अन्य बहाना बना कर मुख्यमंत्राी ने इस कार्यक्रम में आने का दौरा रद्द किया। यही नहीं निमंत्राण कार्ड में भी प्रमुखता से उनका नाम छपा हुआ था।
इस कार्यक्रम का आयोजन देशभक्त नागरिकों व पूर्व सैनिकों के प्रमुख संगठन राष्ट्रीय सैनिक संगठन ने नेताजी सुभाष चंद्र बोस की जयंती पर नेताजी जयंती को मनाते हुए उनकी मूर्ति स्थापित करने के लिए बड़े स्तर पर किया था।  7वें राष्ट्रीय अध्विेशन में मूर्ति का अनावरण प्रदेश के मुख्यमंत्राी रमेश पोखरियाल निशंक के हाथों से व केन्द्रीय राज्य मंत्राी हरीश रावत की अध्यक्षता में आयोजित समारोह में होना था। परन्तु राष्ट्रवाद की दुहाई देने वाली भाजपा के मुख्यमंत्राी को देश के लिए अपना सर्वस्व निछावर करने वाले नेताजी की मूर्ति का अनावरण करने व उनके नाम से मुख्यमंत्राी आवास से मात्रा चंद घंटे की दूरी पर आयोजित इस समारोह में सम्मलित होने का समय तक नहीं रहा। बहाना बनाया गया हरिद्वार जनपद में हो रहे त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव की आदर्श आचार संहिता का। अगर आचार सहिंता तो विकास की घोषणायें करने आदि के लिए होती है। नेता जी की मूर्ति स्थापना उनकी जयंती पर किसी भी आचार संहिता के दायरे में कदापि नहीं आती। अगर आती तो हरिद्वार जिलाध्किारी इस कार्यक्रम को कैसे अनुमति देता। संगठन के महामंत्राी श्री शर्मा का तर्क उचित है कि अगर  हरिद्वार में चुनाव आदर्श आचार संहिता लागू थी तो मुख्यमंत्राी व उनका प्रशासन अंतिम समय तक आ रहे हैं का झांसा क्यों देते रहे। अगर आदर्श आचार संहिता लागू थी तो कैसे हरिद्वार 21 जनवरी को शंकराचार्य चैक से सिंहद्वार तक सौन्दर्यकरण की घोषणा का कार्य प्रारम्भ व शिलान्यास किया गया। इसमें प्रदेश के कबीना मंत्राी मदन कौशिक के साथ जिलाध्किारी भी साथ थे। जटवाड़ा से रानीपुर रोड तक गंग नहर पटरी सिंह द्वार से डाम कोठी तक कावंड पटरी का सौन्दर्यकरण किया गया। इसके साथ अनैक ऐसे कार्यक्रमों में प्रदेश के मंत्राी के हाथों से किये गये। कारण जो भी हो जिस प्रकार से हरिद्वार में जिलाध्किारी व न्यायालय के सम्मुख नेताजी की प्रतिमा कपडे में लिपट कर अनावरण के लिए तरस रही है यह देश के आत्मसम्मान को रौंदने व गैरत को ध्क्किारने वाला ही कृत्य है। इसके लिए भाजपा के मुख्यमंत्राी व प्रशासन सीध्े गुनाहगार हैं ही साथ में आयोजक भी कम दोषी नहीं है। आयोजकों को चाहिए था कि वे नेताजी की प्रतिमा को तभी अनावरण कर देते जब उन्होंने मुख्यमंत्राी के न आने की खबर सुन कर उस पर लगा मुख्यमंत्राी के नाम वाला शिलापट को आक्रोश में उखाड पफेंका। आयोजन में जहां संस्था के राष्ट्रीय अध्यक्ष वीर चक्र विजेता कर्नल तेजेन्द्र पाल त्यागी, संयोजक विरेन्द्र भारद्वाज, चेयरमेन दीपक भारद्वाज, सलाहकार आदेश त्यागी, सचिव राजेन्द्र बंगासी जिला बार ऐसोशिएसन, पूर्व राज्यपाल ले जनरल बी के एन छिब्बर सहित अनैकों वरिष्ठ पूर्व सैनिक अध्किारी सहित सम्मानित समाजसेवी व गणमान्य लोग उपस्थित थे। आयोजकों सहित देशभक्त जनता को इस बात का भान रखना चाहिए कि राष्ट्र भक्तों की किसी पवित्रा प्रतिमा या कायक्रमों में पदलोलुप नेताओं को कहीं दूर-दूर तक न बुलायें। नेताजी की प्रतिमा का अनावरण खुद अगर संगठन के प्रमुख महासचिव करते या शहीदों के परिजनों या महान समाजसेवियों के हाथों से करते तो कम से कम नेताजी का इस कदर अपमान होने से बच जाता।  देश की आजादी के लिए अपना सर्वस्व निछावर करने की सजा इस तरह अपमानित करने का किसी को हक नहीं है। उनकी प्रतिमाओं के अनावरण के लिए जब ऐसे पदलोलुप नेताओं की राह आयोजक ताकते रहेंगे तो तब तक इसी प्रकार से प्रतिमा का ही नहीं उनकी शहादत व राष्ट्रभक्ति का अपमान होगा। रही बात भाजपा की हो या कांग्रेस की जिनको कुर्सी मिलने पर भगवान राम व गांध्ी तथा देश की कसमें वादे याद नहीं रहते तो उन्हें शहीदों का भान कहां होगा।
शेष श्रीकृष्ण कृपा। हरि ¬ तत्सत्। श्री कृष्णाय् नमो।

देवसिंह रावत

Thursday, February 10, 2011

अटल सरकार ने पाक अध्किृत कश्मीर में क्यों नहीं फहराया तिरंगा


 लाल चैक पर तिरंगा फेहराने का प्रकरण पर
अटल सरकार ने पाक अध्किृत कश्मीर में क्यों नहीं फहराया तिरंगा
भाजपा ही नहीं केन्द्र व जम्मू कश्मीर सरकार दोषी
मेरा स्पष्ट मानना है कि अगर भाजपा गठबंध्न की अटल बिहारी वाजपेयी सरकार ने पाक अध्किृत कश्मीर में तिरंगा पफेहराने का काम किया होता तो उसको आज भारतीय भू भाग वाले कश्मीर में तिरंगा पफेहराने के लिए इतना जिद्दोजहद नहीं छेड़ना पड़ता। इसके  लिए देश की जनता से भाजपा को मापफी मांगनी चाहिए। क्योंकि देश की जनता इस मुद्दे पर पहले ही कांग्रेस को गुनाहगार मानती है। जब भाजपा के हाथ में देश की बागडोर थी तो उसने क्यों पाक अध्किृत कश्मीर को हासिल नहीं किया। क्यों धरा 370 को समाप्त नहीं किया। क्यों कश्मीर में अलगाववादी केन्द्र तहस नहस किये। अब सत्ता से बाहर आने के बाद मात्रा अपनी राजनीति चमकाने के लिए तिरंगा श्रीनगर में फेहराने की ऐलान करने से देश को क्या हासिल होगा?
यह देश का दुर्भाग्य है कि अपने ही देश में देश के राष्ट्रीय झण्डे को देश में ही पफेहराने के नाम पर जो गंदी राजनीति हुई उससे देश का  जो अपमान देश विदेश में हो रहा है उसका भान न तो श्रीनगर के लाल चैक में 26 जनवरी के दिन झण्डा पफेहरान के लिए आंदोलनरत भाजपा का ेथा व नहीं देश की कांग्रेस गठबंध्न वाली सप्रंग सरकार को। जम्मू कश्मीर की सरकार से तो राष्ट्र के सम्मान की आश करना भी ऐसे में नादानी ही होगी। यह सब देश के सम्मान की रक्षा के लिए नहीं अपितु अपनी राजनीतिक रोटियां सैकने के लिए देश के सम्मान से खिलवाड़ किया जा रहा है। देश के सम्मान के प्रतीक तिरंगे झण्डे को पफहराने से रोकने के लिए जहां दलगत विरोध् में अंध्े हो कर केन्द्र व प्रदेश सरकार ने पूरी ताकत झोंकी, वहीं भाजपा ने इस बेमोसम के इस झण्डा राग छेड़ कर एक प्रकार से राष्ट्रीय तिरंगे के अपमान में भागीदार बनी। हजारों की संख्या में सुरक्षा बलों व भाजपा के हजारों कार्यकत्र्ता आमने सामने रहे। देश का कितना आर्थिक व सम्मान की हानि हुई इसका भान न तो भाजपा को रहा व नहीं कांग्रेस को। 26 जनवरी पर इस हाय तौबा के अलावा राष्ट्र को कुछ भी हासिल नहीं हुआ।
जहां तक भाजपा के युवा मोर्चे द्वारा 26 जनवरी जम्मू कश्मीर की राजधनी श्रीनगर के लाल चैक पर देश का राष्ट्रीय झण्डा पफेहराने के ऐलान इस अभियान के औचित्य का सवाल है, उसका जवाब देश की जनता के साथ साथ बिहार के मुख्यमंत्राी नीतीश कुमार ने सही शब्दों में दिया कि इसका इस समय कोई औचित्य ही नही हे। ऐसा नहीं कि श्रीनगर में 26 जनवरी के दिन तिरंगा नहीं लहराया जाता। श्रीनगर में हर साल पूरी शान से तिरंगा पफेहराया जाता है। सबसे बड़ा सवाल यह है कि आज देश में चारों तरपफ मंहगाई व आतंकवाद तथा भ्रष्टाचार से त्राही -त्राही मची है तो ऐसे समय में वे केन्द्र सरकार का दिल्ली में पुरजोर विरोध् करने के बजाय आतंकवाद ग्रसित कश्मीर में अपनी पूरी ताकत लगा कर क्या हासिल करना चाहते।
श्रीनगर में झण्डा पफेहराने के लिए अभियान चलाने वाली भाजपा से देश की जनता का एक ही सवाल है कि भाजपा को लाल चैक पर झण्डा पफेहराने की सुध् तब क्यों नहीं आयी जब उसकी सरकार केन्द्र में आसीन थी। तब उसकी सरकार को न तो श्रीनगर में सुरक्षित झण्डा पफेहराने की सुध् रही व नहीं देश की संसद पर हमला करने वाले आतंकियों के आका पाक व अमेरिका को करारा सबक सिखाने की ही सुध् रही। भाजपा अगर अपने शासनकाल में श्रीनगर कश्मीर में नहीं पाक द्वारा कब्जाये कश्मीर में झण्डा पफेहराने का अभियान अपने शासन काल के दोरान छेडती तो पूरे देश की जनता उनका साथ देती। अपने शासनकाल में तो भाजपा कारगिल ही नहीं संसद की सुरक्षा तो समय पर नहीं कर पायी। अटल बिहारी वाजपेयी के कार्यकाल में अमेरिकापरस्ती नीतियों के चलते उनको देश के सम्मान का ध्यान ही कहां रहा। यहां तक की उनके रक्षा मंत्राी जार्ज पफर्नाडिस के कपड़े तक अमेरिका में जांच के नाम पर उतराये गये परन्तु क्या मजाल की वाजपेयी सरकार ने उपफ तक की हो। तब न तो भाजपा को धरा 370 के बारे में याद रही व नहीं समान नागरिक संहिता के बारे में ही याद रहा। भगवान राम तो उनको सत्तासीन होते ही भूल गये। हिन्दी हिन्दु हिन्दुस्तान की भी याद उनको सत्तासीन होने के बाद नहीं रही। भारतीय भाषाओं के लिए संघर्ष करने वाले पुरोधओं को इन्हीं राष्ट्रवादियों के राज में खदेड़ा गया।
भाजपा का सबसे बड़ा शर्मनाक प्रवृति यही रही कि जब भी वह विपक्ष में रहती है तो उसे राष्ट्रवाद याद रहता है। सत्ता में आते ही वह सब कुछ भुल कर कांग्रेस की तर्ज पर देश के संसाध्नों की बंदरबांट करने में जुट जाती है। पूरे देश में रथ यात्रा जिस भगवान राम के मंदिर के निर्माण के नाम पर भाजपा ने चलायी उसको भी सत्ता में आते ही भुला दिया गया। जहां शहीद हुए मुखर्जी वह कश्मीर हमारा है का नारा कह कर समान नागरिक संहिता लागू करने के सब्जबाग जनता को दिखाने वाले भाजपाई सत्ता पाते ही सब कुछ भुल गये। उनको केवल याद रहा तो लाभप्रद नवरत्न उद्यमों को औनेपौने दामों पर अपने चेहतों को निजीकरण के नाम पर देना।
सुशासन व भ्रष्टाचार रहित शासन देने का भाजपा का मुखोटा आज देश की जनता के सामने कांग्रेस की तरह ही बेनकाब हो चूका है। आज भाजपा की उत्तराखण्ड की सरकार के साथ साथ कर्नाटक की सरकार के कारनामें भले ही भाजपा के नेताओं को दिखाई नहीं दे रहे हों परन्तु देश की जागरूक जनता इनके रामराज्य व सुशासन का असली चेहरा देख कर हैरान है। कांग्रेस को बेनकाब होने में दशकों लगे परन्तु भाजपा तो सत्ता के चंद सालों की गलबहियों में पूरी तरह बेनकाब हो गयी। जनता वायदों पर नहीं करनी पर विश्वास करती है।
केन्द्र सरकार व जम्मू कश्मीर सरकार ने भाजपा के इस अभियान को रौकने के लिए जो नाहक कदम उठाये उससे भी देश का अपमान हुआ। इनके नेताओं को सुरक्षा बलों की सुरक्षा में सीध्े लालचैक पर ले जाया जाता और वहां इनसे तिरंगा लहराया जाता या खुद प्रशासन इनसे पहले तिरंगा लालचैक पर पफेहरा देता। भाजपा के अब तक के कार्यकाल से सापफ नजर आता है कि उनको राष्ट्रवाद से नहीं अपनी राजनीति चमकाने से है। भाजपा को एक बात समझ लेनी चाहिए कि अगर उन्होंने केन्द्र में सत्ता में रहते हुए पाक अध्किृत कश्मीर में भारतीय झण्डा पफेहराने का ऐतिहासिक कार्य किया होता तो आज उनको भारतीय श्रीनगर में झण्डा पफेहराने के लिए आंदोलन चलाने के लिए इतना जैहाद नहीं छेडना पड़ता। कुल मिला कर देश का दुर्भाग्य यही है कि यहां की राजनैतिक दलों को देश व देश की जनता की सुध् केवल सत्ता से बाहर रहने पर ही आती है। सत्ता में रहते हुए इनको न तो देश की भान रहती है व नहीं देश की जनता का। वे सब मनमोहन व अटल की तरह सत्तालोलुपता में इतने अंध्े हो जाते हैं कि उनको अमेरिका के अलावा भारत कहीं दिखाई तक नहीं देता। शेष श्रीकृष्ण कृपा। हरि ¬ तत्सत्। श्रीकृष्णाय् नमो।

Sunday, February 6, 2011

चीन से खतरनाक है नपुंसक भारतीय हुक्मरान



चीन से खतरनाक है नपुंसक भारतीय हुक्मरान

-भारतीय हुक्मरानों की नपुंसकता देख चीन उतरा दादागिरी पर
-चीन द्वारा अरुणाचल व कश्मीर में नत्थी वीजा देने की हटध्र्मिता

जनवरी माह में भारत सरकार ने पिफर अरूणाचल प्रदेश पर चीन के रूख पर पिफर हो हल्ला मचाना शुरू कर दिया। इस बार मामला चीन द्वारा अरूणाचल प्रदेश के अध्किारी को उसकी चीन यात्रा के लिए ठीक उसी प्रकार का विवादस्थ नत्थी वजी देने का का दुराग्रही व कपटपूर्ण तथा शत्राुतापूर्ण कार्य जारी रखा। ऐसा नहीं है कि यह  यह ध्ृष्ठता चीन ने पहली बार करके भारत की प्रभुसत्ता को अपने नापाक कृत्यों से रौंदने का कुकृत्य किया हो। वह ऐसी ध्ृष्ठता 1962 से निरंतर करता आ रहा है। कभी चीन द्वारा भारत की हजारों वर्ग किमी भू भाग कब्जा कर तो कभी तिब्बत पर काबिज हो कर। कभी भारत को तबाह करने में जुटे अमेरिका के प्यादे पाकिस्तान को संरक्षण व प्रोत्साहित कर भारत में आतंकी गतिविध्यिों को संचालित कर। परन्तु क्या मजाल है कि भारतीय हुक्मरान संसद द्वारा पारित चीन द्वारा हड़पे गये भारतीय भू भाग को वापस मांगने का प्रथम दायित्व को उठा सकने का साहस जुटा पा रहे है। इसी नपुंसकता व राष्ट्रघाती प्रवृति को देश कर चीन निरंतर भारत विरोध्ी कृत्य कर रहा है। वह न केवल अरूणाचल में अपितु कश्मीर में भी इसी प्रकार की भारत से शत्राुतापूर्ण व्यवहार कर रहा है। परन्तु क्या मजाल है भारतीय हुक्मरान दो टूक सीध्ी बात चीन से करने का साहस तक जुटा पाये। न तो भारतीय हुक्मरान चीन द्वारा हडपे भू भाग की वापसी की मांग कर रहे हैं व नहीं भारतीय हुक्मरान पाक द्वारा कब्जाये कश्मीर के उस भू भाग की मांग ही कर पा रहे हैं जो पाक ने अपनी बपौती समझ कर चीन को खरात में दे दिया है। भारतीय हुक्मरानों को चाहिए कि चीन से दो टूक वार्ता करे। जब भारतीय हुक्मरानों भारतीय प्राचीन संस्कृति के आदर्शों का गला घोंट कर बलात हडप्पे गये तिब्बत को चीन का भू भाग मान कर एक प्रकार से चीन के आगे आत्म सम्र्पण ही कर दिया। इससे चीन का दुसाहस बढ़ गया। वह निरंतर भारतीय आत्मसम्मान व प्रभुसत्ता को चुनौती दे रहा है। आज चीन की जरूरत भारत को है तो उससे अध्कि जरूरत चीन को भारत की भी है। मामला चाहे व्यापार का हो या चीन को विश्व विरादरी में पांव रखने का। अगर भारतीय हुक्मरान चीन को इसी प्रकार देश के आत्मसम्मान को रौंदवाते रहे तो वह दिन दूर नहीं जब चीन पशुपति से तिरूपति तक लालबुझकडों के दिवास्वप्न को साकार करने में देर नहीं लगायेगा। कुछ समय पहले भी चीन द्वारा भारतीय भूभाग पर कब्जा करने की खबरों आयी थी। इससेे देश की आम जनता जहां भौंचंक्की रही। वहीं देश के हुक्मरान इसका तत्काल खण्डन करने का भी साहस तक नहीं जुटा पा रहे र्है। परन्तु मेरा मानना है कि चीन से बड़ा खतरनाक कोई दुश्मन भारत का कोई हैं तो उसके अपने हुक्मरान। जिनके हाथों में देश के नवनिर्माण व देश के भविष्य को संवारने का महत्वपूर्ण दायित्व देश की जनता ने सोंप रखा है। परन्तु ये लोग देश का विकास करने के बजाय अपने दोनों हाथों से देश को लूट रहे है। चीन से कैसे हम लड़ेंगे। चीन ने तिब्बत बोर्डर तक रेल पंहुचा दी, हमारे देश की सरकारें देश की जरूरतों व सीमान्त प्रदेश तक रेल पंहुचा कर देश की सुरक्षा को मजबूत करने के बजाय यहां के हुक्मरान अपने संसदीय क्षेत्रा में ही पूरे देश के विकास का पैंसा लुटाने में लग कर देश की सुरक्षा व विकास के साथ खिलवाड़ कर रहे है। देश के वीर सैनिक जहां देश के लिए मर मिटने के लिए हर पल तैयार हैं वहीं उसी सेना के कई बडे अध्किारी;ले. जनरल, मेजर जनरल, ब्रिगेडियर, कर्नल जैसेद्ध भूमि से लेकर हर प्रकार के घोंटालों में लिप्त हैं। सेना के साजोसमान की स्थिति कैसी होगी, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि जब इसी सप्ताह केन्द्रीय गृहमंत्रालय ने अध््रसैनिकों के लिए 59000 बुलेट प्रूपफ जैकेट के खरीद के लिए जारी किया गया टेंण्डर इन जैकटों में हुए भारी भ्रष्टाचार की आशंका से रद्द कर दिया। सेना के लिए मंगाये गये समान का तो राम ही भरोसा है। जब इस देश में वीर सैनिकों के ताबूत जैसे पवित्रा चीज पर भ्रष्टाचार करने वाले जंतू देश को कलंकित कर रहे हैं तो अन्य चीजों को वे कहां छोड़ने वाले। जम्मू कश्मीर के मुख्यमंत्राी उमर व केन्द्रीय पफारूख अब्बदुला हैरान हैं कि चीन के कब्जे पर भारत सरकार ने कायराना रूख क्यों अपना रखा हे। चीन भारत का परंपरागत दुश्मन है।  वेसे भारत चारों तरपफ से दुश्मनों से घिरा हुआ है। अमेरिका, उसका प्यादा पाक ही नहीं बंग्लादेश, नेपाल व श्रीलंका भी उसे जब चाहे तब आंखे दिखाने में लगे रहते है। इस्लामी आतंकी जैहाद के नाम पर भारत को तबाह करने पर तुले हुए है। इन आतंकियों को जहां अमेरिका व पाकिस्तान बचाने में लगा हुआ है। वहीं चीन भी मौके की नजाकत भांप कर भारत द्रोहियों को संरक्षण व पोषण करने से पीछे नहीं रहता। अमेरिका ने तो भारतीय हुक्मरानों को पाकिस्तान की तरह अपना प्यादा ही बना दिया है।  मेने गतांक में भ्रष्टाचार में मरणासन्न हुई भारतीय व्यवस्था व विकास के नये विश्वकीर्तिमान स्थापित करते हुए चीन के बारे में इसी सम्पादकीय में लिखा था। गत सप्ताह जिस दिन यह खबर आयी कि चीन ने विश्व की सबसे तेज रेल सेवा का परिचालन किया उसी दिन भारत में कोटा में चंबल नदी में निर्माणाध्ीन पुल ढ़ह गया, दिल्ली में मेट्रो के खम्बे में दरार की खबर आयी व दिल्ली विश्वविद्यालय में निर्माणाध्ीन स्टेडियम ढहने सहित देश के हर प्रदेश से निर्माणाध्ीन बिल्डिंग, पुल, स्टेडियम, नहरें, सड़क इत्यादि ढहने की खबरे आती रहती। देश के सबसे सुरक्षित व संवेदनशील भाभा परमाणु संस्थान के वैज्ञानिकों की जिन रहस्यमय परिस्थितियों में जल कर व अन्य कारणों से मौत हो रही है उससे एक बात सापफ हो जाती है कि देश के बाहरी दूश्मनों के साथ देश को दीमक की तरह चाटने वाले हुक्मरान मिल गये हैं। जो देश के लिए सबसे बड़ा खतरा है।
350 किमी की गति से यह रेल हांगकांग के नजदीक चीन के व्यापारिक हब ग्वांगझाओं से राजधनी बीजिंग तक का 1069 किमी का सपफर मात्रा तीन घंटें में तय करेगी। वहीं भारत में योजनायें देश के विकास के नाम पर भले ही बनती दिखती हों पर हकीकत यह है कि यहां पर योजनायें कमीशन के लिए ही बन रही है। देश में सरकारी कार्यालयों में जो विभाग जिस काम के लिए बना है वह उस काम को अवरू( करने में ही संलग्न है। नौकरशाही व जनप्रतिनिध्यिों का यह भ्रष्ट जुगलबंदी देश को कहां ले डुबेगा इसका अहसास हमारे देश के हुक्मरानों को कहीं नहीं है।
भले ही पद्म विभूषण से सम्मानित देश के प्रख्यात वैज्ञानिक डा आर.ए. मशेलकर शताब्दियों से भारतीय ज्ञान की राजधनी रहे काशी में काशी विद्यापीठ के दीक्षांत समारोह में अपने संबोध्न में 21वीं सदी को भारत के ज्ञान की सदी होने की भविष्यवाणी कर रहे हों या पूर्व राष्ट्रपति डा अब्दुल कलाम अगले दशक में ही भारत विश्व मेें अपना परचम पफेहराने की भविष्यवाणी कर रहे हों परन्तु जमीनी हकीकत यह है कि चाहे हम ज्ञान में संसार में आज भी सर्वश्रेष्ठ भी हैं पर देश के शासन प्रशासन में काबिज आत्मघाति हुक्मरानों ने भ्रष्टाचार की अंध्ी गर्त में देश को ध्केल कर अगली सदी में विश्व की महाशक्ति बनने की कुब्बत रखने वाले देश भारत की पूरी व्यवस्था को अंदर ही अंदर से एकदम खोखला कर दिया हे। वहीं दूसरी तरपफ चीन अपनी संसार की सबसे बड़ी मानवशक्ति व उपलब्ध् प्राकृतिक संसाध्नों तथा अपने उद्यमियों, वैज्ञानिकों व हुक्मरानों की सांझे प्रयासों से चीन को अमेरिका को पछाड़ते हुए विश्व की सर्वोच्च महाशक्ति बनने जा रहा है।
भ्रष्टाचार में महाशक्ति बनता भारत व विकास की महाशक्ति बनता चीन! आप इस बात को स्वीकारे या ना स्वीकारें परन्तु यह सोलह आने सच है। भले ही यह लिखते समय मुझ जैसे देशभक्त को भी यह पंक्तियां कचोट रही है। सच कितना कडुवा होता है। परन्तु देश की व्यवस्था की मैं हल्की सी तस्वीर आपके सामने रख दूॅ तो आप को भी समझ में आ जायेगा। देश की व्यवस्था की हालत यह हे कि देश की सर्वोच्च संस्था संसद पर हमला करने वाले जिसे सर्वोच्च न्यायालय ने दोषी पाते हुए पफांसी की सजा दे दी है उसे देश की सरकार सजा देने के बजाय मेहमान नवाजी में जुटी हुई है। उसको पफांसी देने की हिम्मत देश के हुक्मरान खुद भी नहीं जुटा पा रहे हैं। देश की सुरक्षा का भार जिन जांबाज सेना पर हैं उसके ले. जनरल, मेजर जनरल सहित कई  शीर्ष अध्किारी राशन, शराब, कपड़े, जमीन सहित अनैक घोटालों में लिप्त पाये गये है। देश की एकता व अखण्डता को तबाह करने वाले खालिस्तानी, कश्मीरी व अन्य आतंकियों को दण्डित करने के बजाय उनकी मेहमान नवाजगी की जा रही है।  कर्नाटक उच्च न्यायालय के न्यायाध्ीश महोदय के भ्रष्टाचार में इतने आकंठ डूबे हुए हैं कि उन पर महाभियोग चलाने के लिए सांसदों ने हस्ताक्षर अभियान तक चलाये, उनका बचाव करने वाले जाति के नाम पर उनकी ढाल बन रहे हैं। देश के विकास का पैसा नौकरशाहों, नेताओं व दलाल बने ठेकेदारों की जेबों में जा रहा है। देश के दूरस्थ भू भाग के करोड़ों लोग विकास की राह जोह रहे हैं परन्तु दिल्ली की अच्छी भली सड़कों, पफुटपाथों, मंत्रियों व सांसदों की कोठियां-कार्यालय सजाने संवारने के नाम पर  अरबों रूपये पानी की तरह बहाये जा रहे है। यह सब कमीशन के खातिर किया जा रहा है। आखिर कौन है इस सबके लिए जिम्मेदार।
चीन में अध्किारी से लेकर नेता व बाल से लेकर बृ( तक सब चीन को संसार की सर्वोच्च महाशक्ति बनाने के सपने को साकार करने के लिए समर्पित है।  परन्तु भारत में शर्मनाक ढ़ग से चंगैजी प्रवृति चली रहा है। देश की चिंता किसे है? देश की संसद पर हमला होता है, उस समय देश की संस्कृति व भाषा की स्वयंभू झण्डाबरदार, भाजपा के अटल बिहारी वाजपेयी  सत्तारूढ़ थे, परन्तु क्या मजाल की वह अमेरिका के इशारे के अलावा कुछ भी न तो दिखाई दे रहा है व नहीं सुनाई देता। चीन ने अपनी सीमाओं खासकर हिमालय से लगे राज्य उत्तराखण्ड व तिब्बत तक रेल लाइन्स बिछा दी। परन्तु इस देश के हुक्मरानों को मात्रा अपनी संसदीय सीट व अपनी तिजोरी के अलावा कहीं कुछ दिखाई नहीं देता। दशकों से देश के सीमान्त प्रदेशों के लोग देश की सुरक्षा के लिए यहां पर रेल व मोटर मार्ग की मूलभूत सुविधओं की निरंतर मांग कर रहे हैं परन्तु देश के हुक्मरान चाहे भाजपा नेतृत्व वाला राजग सरकार रही हो या कांग्रेस गठबंध्न वाली सप्रंग सरकार रही हो दोनों को बिहार व बंगाल के अलावा कहीं भारत दिखाई नहीं दे रहा है। अब समझ में नहीं आ रहा है कि इस देश का क्या होगा। अमेरिका ने दशकों से पाकिस्तान की तरह ही भारत के हर महत्वपूर्ण संस्थान में अपना शिकंजा कस लिया है। प्रधनमंत्राी मनमोहन रहे या वाजपेयी दोनों की सरकारे भले ही अलग अलग व्यक्तियों व दलों की रही हों परन्तु दोनों ने देश के हित को दाव पर लगा कर अगर कोई काम किया तो वह अमेरिका के हितों की पूर्ति का। यही नहीं देश में चारों तरपफ भ्रष्टाचार का बोलबाला हैं, अमेरिका व पाकिस्तान द्वारा पोषित आतंकवाद का। इसका जवाब कौन देगा? जनता इनके षडयंत्रा को कहां तक समझ पायेगी। चीन भी अमेरिका की तरह भारत को तबाह करने में तुला है जबकि देश का मेहनतकश व ईमानदार वर्ग चीन से कापफी आशा करता है। परन्तु चीनी हुक्मरान भी भारत में गलत तत्वों का साथ दे कर भारत के मेहनतकश वर्ग पर ही मार मार रहे है। देश की रक्षा कैसे होगी?
यहां पर ढ़ोगी बाबा भारतीय संस्कृति को भ्रष्टाचारी नेता व नौकरशाहों की तरह ही नष्ट करने में तुले है। भगवान श्रीकृष्ण ही इस भारत की रक्षा करे। मेरा सभी ईमानदार व देशभक्त लोगों से अनुरोध् है कि देश पर आये इस संकट के समय आप लोग अपने सामने हो रहे भ्रष्टाचार व अनैतिक का विरोध् करें इसी से देश की रक्षा का महासंग्राम मजबूत होगा। देश की रक्षा होगी तभी मूल्यों व ध्र्म तथा समाज-व्यक्ति का गौरव बचेगा। शेष श्रीकृष्ण कृपा। हरि ओम तत्सत्। श्रीकृष्णाय् नमो।

    देवसिंह रावत
यू 203 विकास मार्ग दिल्ली 92
मो 9910145367



भारत की लुटिया डुबो देगा प्रधानमंत्री _अनर्थशास्त्री है मनमोहन



जंतर मंतर      देवसिंह रावत
 अर्थशास्त्री नहीं अनर्थशास्त्री है मनमोहन
 भारत की लुटिया डुबो देगा प्रधानमंत्री मनमोहनसिंह

सब्जी की दुकान से प्याज की खरीददारी करने के बाद दिन दुगुनी रात चैगुनी महंगाई को देख कर ताई क्रोध से तिलमिलाते हुए बोली....ऐसा घोर अंध्ेर कभी नहीं देखा।.. मैने कहा ताई यह अर्थशास्त्राी का राज है अंध्ेर नहीं। ताई गुर्राई अरे अर्थशास्त्री नहीं अनर्थशास्त्राी कहो। मंहगाई से आम लोगों का जीना हराम हो रखा है यह कैसा अर्थशास्त्राी है जो लोगों का जीना हराम कर रहा है। आखिर उसे ऊपर वाले की मार का डर नहीं है, जो ऐसा अनर्थ होने दे रहा है। मैने कहा ताई ऊपर वाला तो उसके साथ है। ताई बोली अरे कैसी बात करता है ? ऊपरवाला कभी अनर्थ  के साथ नहीं रहता। तू किस ऊपर वाले की बात कर रहा है?  मैने कहा ताई आज ऊपर वाला अमेरिका के शासक  को ही समझते हैं भारत के हुक्मरान। पहले जार्ज बुश था आज कल ओबामा है। यह सुनते ही ताई भिनभिनाई। अरे मेने दुनिया देखी है ऊपर वाला कभी अमेरिका नहीं हो सकता है। उसकी मार से ऐसे कई अमेरिका व उसके शासक पानी भी नहीं मांगते। कहां है अब वह बुश .... उसको डिस्चार्ज किसने किया?  मैने कहा ताई इस देश में तो वहीं होता है जो अमेरिका चाहता। ताई बोली लगता है तूने भी पिफरंगियों का जूठा खा लिया जो तू भी उनके गुण गा रहा है। ...राम..राम क्या घोर कलयुग आ गया है। यहां अब दीन दुखियों की कोई सुध् लेने वाला भी नहीं रहा। इस घोर अनर्थ को देख कर  लगता है अंध्ेर नगरी चोपट राजा। .....अरे बेटे जरा एक बात बता...ओ इंदिरा गांध्ी की बहू कहां है? मैने कहा ताई सोनिया जी तो मनमोहन सरकार की मुखिया है। यह सुनते ही ताई झल्लाई अरे वह सोनिया है या मोनिया वह क्या देख सुन नही रही है...... उसकी सास इंदिरा जी तो तुरंत ही गरीबों के लिए अब तक इन जल्लादों को सलाखों में बंद कर देती......। वह क्यों मौन बेठी है बेटा....... अरे अकेली महिला है चारों तरपफ लुटेरों की जमात है वह डर क्यों रही है बेटा...... उसे नहीं पता की पूरा देश उसके साथ है..... देश के गरीब उसके साथ है गरीबों का सहारा कांग्रेस थी। अरे बेटे जब यह मनमोहन नामक अर्थशास्त्राी काम नहीं कर पा रहा हे तो वह उसे बदल कर वह क्यों खुद क्यों नहीं बन जाती है देश की प्रधनमंत्राी...इंदिरा जी का पोता राहुल कहते हैं काफी होशियार है....वह गरीबों का हितैषी है उसे ही क्यों नहीं बना देती है सोनिया प्रधनमंत्री? क्या मनमोहन या अमेरिका उसे डरा रहा है? वह डरे नहीं इंदिरा गांधी की बहु है वह पूरा देश उसके साथ है....जिस प्रकार से इंदिरा गांधी ने पाकिस्तान को ही नहीं अमेरिका को भी ठंेगा दिखाया था उससे देश की जनता को इंदिरा पर नाज था। बेटा ....इंदिरा की बहु हो कर वह अमेरिका या मनमोहन से क्यों डरती है.....पूरा देश उसके साथ है.....यह मनमोहन अब देश को नहीं चाहिए। उसे अमेरिका ही भेज दो........या वे विश्व बैंक या अमेरिका के किसी अन्य संयुक्त राष्ट्र में सेवा करें। देश को अपने हाल पर छोड़ दो। .....ताई क्या बोल रही है ....तू तो बिलकुल पढ़े लिखे  नेताओं की तरह भाषण दे रही है। वह बोली अरे बेटे इस देश के पढ़े लिखे व नेताओं को देख कर लगता है कि हम अनपढ़ ही बेहतर ....हमारे अंदर दया, ध्र्म व मानवता तो रहती। इन पढ़े लिखे अपफसरों व नेताओं के अंदर तो अनर्थ के अलावा कुछ ही देखने को नहीं मिलता.... आखिर देश को लूट कर ये कहां ले जायेंगे। जिसके यहां छापा पढ़ रहा है उसके यहां अरबों खरबों की दौलत मिल रही है। कितनी बेनामी दौलत होगी। कोई जानता नहीं। इनकी ध्न दौलत की अंध्ी भूख ने इनको लगता है हैवान हीं बना दिया। इनको न तो दीन दुखियों का दर्द सुनाई देता व नहीं अपना पफर्ज का ही इनको भान होता। भगवान ही बचाये इन नेताओं व इन अनर्थशास्त्राी के चैपट राज से। यह कहते हुए ताई रोने लगी.........ताई का दर्द देख कर मैं मेरा हृदय भी द्रवित हो गया... मैं बोला ताई रो नहीं। ताई चिल्लाई खबरदार जो घडियाली आंसू बहाये...बड़ा हमदर्द बना है .....अगर तुम जैसे कलम घिस्सू देश व जनता का सही दर्द अपनी कलम से लिखते तो आज देश में ऐसी अंध्ेरगर्दी नहीं होती। इन अनर्थशास्त्राी का राज नहीं होता......यह कहते हुए ताई ने अपनी लाठी उठा कर मेरे सर पर ऐसी मारी की मै दर्द से चिल्ला पड़ा। बचाओ...... बचाओ......बचाओ.......। मैं भाग रहा था.....और ताई मेरे पीछे पड़ी हुई थी......इसी भागमभाग में यकायक मेरी नींद खुल गयी.......। मै डर के मारे थरथर कांप रहा था। मेरी नजरें ताई को ढूूॅंढ रही थी.......परन्तु ताई कहीं नहीं थी........तब मुझे समझ में आया कि मैं अभी तक सपना देख रहा था। तब मुझे जरा शांति हुई। तभी मेरी नजर टेबल पर रखे एक अखबार पर पढ़ी जिसमें खबर थी कि  संसद में मंहगाई पर विपक्ष के मर्माहित प्रहारों से पूरी तरह बेनकाब हुई मनमोहनसिंह सरकार के वित्तमंत्री प्रणव मुखर्जी ;जिनकी सरकार मंहगाई पर अंकुश लगाने में पूरी तरह असपफल ही नहीं अपितु पूरी तरह से मंहगाई बढ़ाने में सहभागी रहते हुए मंहगाई बढ़ाने के लिए एकमात्रा दोषी है।द्ध ने अपनी नाकामयाबी को छुपाते हुए देश की जनता व विपक्षी दलों की आंखों में धूल झोंकने के लिए उनको अर्थशास्त्रा का ज्ञान ही देने लगे।
केन्द्रीय वित्त मंत्री का यह कहना की अर्थशास्त्र इस तरह से नहीं चलता। देश की जनता देश को तबाह करने वाले अर्थशास्त्र व अर्थशास्त्री दोनों की इस देश को कतई जरूरत नहीं। देश में वही अर्थशास्त्रा व अर्थशास्त्री जनता को स्वीकार है जो चाणाक्य की तरह लोककल्याणकारी हो, न की मनमोहनसिंह जैसे अर्थशास्त्री का देश को तबाह करने वाला अर्थशास्त्र। शायद इसी लिए मेरे सपने में ताई भी कह रही थी कि यह अर्थशास्त्रा नहीं अनर्थशास्त्र है।  देश के प्रबुद्ध
 जनों की जुबान पर भी यही है कि भगवान बचाये इस देश को मनमोहन जेसे अर्थशास्त्री से। अगर यह अर्थशास्त्र है तो अनर्थशास्त्र किसे कहते हैं? आज देश के गांव देहातों में आम लोग मंहगाई को देख कर अपना सर पीट रहे हैं कि ऐसा अनर्थ कभी नहीं हुआ।

देवसिंह रावत

नेताजी का अपमान क्यों कर रही है भाजपा


नेताजी का अपमान क्यों कर रही है भाजपा
उत्तराखण्ड के  मुख्यमंत्री का एक और  कानरामा
संघ प्रमुख मोहन भागवत जी व भाजपा अध्यक्ष गड़करी जी अब आप ही बताये कि भाजपा शासित प्रदेश उत्तराखण्ड में आजादी के महानायक नेताजी सुभाष चंद बोस का अपमान  करना कौन सी राष्ट्र भक्ति है? आखिर एक तरपफ भाजपा देश के सम्मान के प्रतीक तिरंगा झण्डे को पफहराने के लिए कश्मीर की राजधनी श्रीनगर के आतंक प्रभावित क्षेत्रा में जाने के लिए तिरंगा यात्रा करने में अपनी ताकत लगा कर अपने आप को देशभक्त पार्टी बता रही थी। वहीं 23 जनवरी को नेताजी सुभाष चन्द्र बोस की जयंती पर हिन्दु ध्र्म की राजधनी समझी जाने वाले पावन हरिद्वार में जिलाध्किारी व कचहरी के सामने वाले चैराहा पर नेताजी सुभाष चन्द्र बोस की प्रतिमा के अनावरण करने की दो पल की फुर्सत भाजपा शाशित उत्तराखण्ड के मुख्यमंत्राी रमेश पोखरियाल निशंक को नहीं मिली। मुख्यमंत्राी के आने के पूर्व निर्धरित कार्यक्रम के अंतिम समय पर रद्द करने से न तो नेताजी सुभाष चन्द्र बोस की आदम कद प्रतिमा का अनावरण ही किया गया। इस कारण आजादी के महानायक की कपटे में लिपटी हुईआदमकद मूर्ति इस देश के हुक्मरानों सहित सभी देश के नागरिकों की गैरत को ध्क्किार रही है। जिस मूर्ति के अनावरण की स्वीकृति 17 जनवरी 2011 को हरिद्वार जनपद के जिलाध्किारी डा आर मीनाक्षी सुन्दरम ने अपने पत्रांक 1855/पीए 2011 में दी हो। जिस कार्यक्रम में पधरने के लिए 23 जनवरी 2011 को नेताजी की जयंती पर हरिद्वार में राष्ट्रीय सैनिक संस्था को प्रदेश के मुख्यमंत्राी के अध्किारी बरगलाते रहे। ऐसा नहीं कि मुख्यमंत्राी रमेश पोखरियाल निशंक को इस कार्यक्रम की सूचना नही थी। इस आयोजक संस्था के महासचिव एस के शर्मा के अनुसार मुख्यमंत्राी का सुरक्षा अमला ही नहीं कुत्ता दल भी कई बार इस दिन भी इस कार्यक्रम स्थल की जांच करने में जुटा हुआ था। यही नहीं इस महान मूर्ति पर लगे शिलापट पर मुख्यमंत्राी रमेश पोखरियाल का नाम भी अनावरण करने वाले नाम से खुदा हुआ तथा मूर्ति के नीचे बने स्तम्भ में स्थापित किया हुआ था।  परन्तु अंत में हरिद्वार में चुनाव आचार संहिता के नाम व अन्य बहाना बना कर मुख्यमंत्राी ने इस कार्यक्रम में आने का दौरा रद्द किया। यही नहीं निमंत्राण कार्ड में भी प्रमुखता से उनका नाम छपा हुआ था।
इस कार्यक्रम का आयोजन देशभक्त नागरिकों व पूर्व सैनिकों के प्रमुख संगठन राष्ट्रीय सैनिक संगठन ने नेताजी सुभाष चंद्र बोस की जयंती पर नेताजी जयंती को मनाते हुए उनकी मूर्ति स्थापित करने के लिए बड़े स्तर पर किया था।  7वें राष्ट्रीय अध्विेशन में मूर्ति का अनावरण प्रदेश के मुख्यमंत्राी रमेश पोखरियाल निशंक के हाथों से व केन्द्रीय राज्य मंत्राी हरीश रावत की अध्यक्षता में आयोजित समारोह में होना था। परन्तु राष्ट्रवाद की दुहाई देने वाली भाजपा के मुख्यमंत्राी को देश के लिए अपना सर्वस्व निछावर करने वाले नेताजी की मूर्ति का अनावरण करने व उनके नाम से मुख्यमंत्राी आवास से मात्रा चंद घंटे की दूरी पर आयोजित इस समारोह में सम्मलित होने का समय तक नहीं रहा। बहाना बनाया गया हरिद्वार जनपद में हो रहे त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव की आदर्श आचार संहिता का। अगर आचार सहिंता तो विकास की घोषणायें करने आदि के लिए होती है। नेता जी की मूर्ति स्थापना उनकी जयंती पर किसी भी आचार संहिता के दायरे में कदापि नहीं आती। अगर आती तो हरिद्वार जिलाध्किारी इस कार्यक्रम को कैसे अनुमति देता। संगठन के महामंत्राी श्री शर्मा का तर्क उचित है कि अगर  हरिद्वार में चुनाव आदर्श आचार संहिता लागू थी तो मुख्यमंत्राी व उनका प्रशासन अंतिम समय तक आ रहे हैं का झांसा क्यों देते रहे। अगर आदर्श आचार संहिता लागू थी तो कैसे हरिद्वार 21 जनवरी को शंकराचार्य चैक से सिंहद्वार तक सौन्दर्यकरण की घोषणा का कार्य प्रारम्भ व शिलान्यास किया गया। इसमें प्रदेश के कबीना मंत्राी मदन कौशिक के साथ जिलाध्किारी भी साथ थे। जटवाड़ा से रानीपुर रोड तक गंग नहर पटरी सिंह द्वार से डाम कोठी तक कावंड पटरी का सौन्दर्यकरण किया गया। इसके साथ अनैक ऐसे कार्यक्रमों में प्रदेश के मंत्राी के हाथों से किये गये। कारण जो भी हो जिस प्रकार से हरिद्वार में जिलाध्किारी व न्यायालय के सम्मुख नेताजी की प्रतिमा कपडे में लिपट कर अनावरण के लिए तरस रही है यह देश के आत्मसम्मान को रौंदने व गैरत को ध्क्किारने वाला ही कृत्य है। इसके लिए भाजपा के मुख्यमंत्राी व प्रशासन सीध्े गुनाहगार हैं ही साथ में आयोजक भी कम दोषी नहीं है। आयोजकों को चाहिए था कि वे नेताजी की प्रतिमा को तभी अनावरण कर देते जब उन्होंने मुख्यमंत्राी के न आने की खबर सुन कर उस पर लगा मुख्यमंत्राी के नाम वाला शिलापट को आक्रोश में उखाड पफेंका। आयोजन में जहां संस्था के राष्ट्रीय अध्यक्ष वीर चक्र विजेता कर्नल तेजेन्द्र पाल त्यागी, संयोजक विरेन्द्र भारद्वाज, चेयरमेन दीपक भारद्वाज, सलाहकार आदेश त्यागी, सचिव राजेन्द्र बंगासी जिला बार ऐसोशिएसन, पूर्व राज्यपाल ले जनरल बी के एन छिब्बर सहित अनैकों वरिष्ठ पूर्व सैनिक अध्किारी सहित सम्मानित समाजसेवी व गणमान्य लोग उपस्थित थे। आयोजकों सहित देशभक्त जनता को इस बात का भान रखना चाहिए कि राष्ट्र भक्तों की किसी पवित्रा प्रतिमा या कायक्रमों में पदलोलुप नेताओं को कहीं दूर-दूर तक न बुलायें। नेताजी की प्रतिमा का अनावरण खुद अगर संगठन के प्रमुख महासचिव करते या शहीदों के परिजनों या महान समाजसेवियों के हाथों से करते तो कम से कम नेताजी का इस कदर अपमान होने से बच जाता।  देश की आजादी के लिए अपना सर्वस्व निछावर करने की सजा इस तरह अपमानित करने का किसी को हक नहीं है। उनकी प्रतिमाओं के अनावरण के लिए जब ऐसे पदलोलुप नेताओं की राह आयोजक ताकते रहेंगे तो तब तक इसी प्रकार से प्रतिमा का ही नहीं उनकी शहादत व राष्ट्रभक्ति का अपमान होगा। रही बात भाजपा की हो या कांग्रेस की जिनको कुर्सी मिलने पर भगवान राम व गांध्ी तथा देश की कसमें वादे याद नहीं रहते तो उन्हें शहीदों का भान कहां होगा। 
शेष श्रीकृष्ण कृपा। हरि ¬ तत्सत्। श्री कृष्णाय् नमो।

देवसिंह रावत