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Wednesday, August 29, 2012


भाजपा ही नहीं संघ भी है जिम्मेदार भाजपा के शर्मनाक पतन का

अरूण प्रताप सिंह जैसे जमीनी नेताओं की उपेक्षा का दंश झेल रही है भाजपा 

उत्तर प्रदेश में रामजन्मभूमि आंदोलन के पहले व बाद में प्रदेश की राजनीति में परचम फेहराने वाली भाजपा की आज दुर
्गति कांग्रेस से बदतर हो गयी है। इसके लिए और कोई दूसरा नहीं अपितु भाजपा का शीर्ष नेतृत्व अटल-आडवाणी व उनकी कटोरी के रूप में भाजपा को जनता की नजर में बेगाना बनाने वाली मण्डली ही जिम्मेदार है। जिस जनता ने देश में कांग्रेस के कुशासन को उखाड़ फैंक कर भाजपा के रामराज्य रूपि सुशासन पर विश्वास करके देश व प्रदेश में जनादेश दिया, उस जनादेश का सम्मान करने के बजाय भाजपा के आला नेताओं ने जनांकांक्षाओं व जनविश्वास को इस कदर रौंदा कि जनता ने भाजपा को ऐसा सबक सिखाया कि भाजपा उप्र में अपने कल्याणसिंह के नेतृत्व वाले दिनों के लिए तरस रही है। हालांकि उत्तराखण्ड में भी भाजपा ऐसा ही कार्य करती रही वहां के जमीनी व वरिष्ट संघ समर्पित जनप्रिय नेता भगतसिंह कोश्यारी की उपेक्षा कर जबरन जनता की नजर में उतरे हुए नेताओं को बार बार थोप कर भाजपा की ऐसी दुर्गति कर रहे हैं कि लोगों को इनकी जातिवादी मानसिकता पर तरस आ रहा है और राष्ट्रवादी दंभ पर हंसी आती है।

भाजपा के जिन जमीनी नेताओं व समर्पित कार्यकत्र्ताओं ने दिन रात मेहनत करके भाजपा को जनता के दिलों में आसीन करा था, उन एक एक नेताओं व कार्यकत्र्ताओं को गोविन्दाचार्य, कल्याणसिंह, उमा भारती, मदन लाल खुराना आदि की तरह उपेक्षित व अपमानित किया। भाजपा में काबिज इस कटोरी गिरोह ने एक एक कर जमीनी व समर्पित साफ छवि के जननेताओं को उपेक्षित व अपमानित कर भाजपा से बाहर होने के लिए मजबूर किया। वहीं ऐसा ही काम भाजपा नेतृत्व के प्यादे देश के तमाम प्रदेशों में वहां के जमीनी नेताओं की उपेक्षा कर अपने हवाई प्यादों को आसीन करके भाजपा की जड़ों में मट्ठा डाल रहे थे। ऐसा ही एक आत्मघाती कृत्य भाजपा के नेताओं ने सुलतानपुर में भी किया। भाजपा नेतृत्व ने छांट छांट कर सुलतानपुर से दो बार विधायक रहे संघ के वरिष्ठ समर्पित जमीनी साफ छवि के नेताओं को अपमानित कर दागदार छवि के लोगों को यहां से पार्टी का प्रत्याशी बनाया। भले ही अरूण प्रताप सिंह संघ व भाजपा के नेता रहे परन्तु जनता में हर वर्ग व हर धर्म के लोगों के वे प्रिय थे। दो बार बिधायक होने के बाबजूद वे सरकारी बसों में सफर करके लखनऊ व अपने क्षेत्र में भ्रमण करते थे। सुलतानपुर के समाजसेवी मोहम्मद आजाद के अनुसार प्रातः काल अपने खेतों में खुद काम करके आम जनता के सुख दुख में सदा समर्पित रहने वाले अरूण प्रताप सिंह के सदव्यवहार के कारण संघ के समर्पित कार्यकत्र्ता होने के बाबजूद वे आम जनता की तरह ही इस क्षेत्र में रहने वाले मुसलिमों के भी चेहते रहे। परन्तु भाजपा के नेतृत्व ने जनता को अपनी शक्ति मान कर सुरक्षा बल भी न लेने वाले जनप्रिय विधायक को महत्वपूर्ण जिम्मेदारी देने के बजाय उनकी विधायक की टिकट से वंचित करके ऐसे लोगों को यहां पर टिकट दिया गया जिनको जनता ने हराया ही नहीं अपितु भाजपा को तीसरे व चोथे नम्बर पर धकेल कर सबक सिखाया। कई बार पार्टी को यहां पर मिली पराजय के बाबजूद भाजपा के मठाधीशों ने अपनी भूल को सुधारने की कोशिश तक नहीं की। वहीं जनता की पुरजोर मांग के बाबजूद भाजपा नेतृत्व ने अपने इस जमीनी नेता की कोई सुध नहीं ली। अरूण प्रताप सिंह की लोकप्रियता व भाजपा द्वारा उनकी उपेक्षा की जाने के कारण कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी ने अरूण प्रताप सिंह को कांग्रेस में जोड़ने की असफल कोशिश की। परन्तु अरूण प्रताप सिंह कांग्रेस में नहीं सम्मलित हुए। भाजपा व कांग्रेसी नेताओं आत्मघाती प्रवृति का लाभ उठाते हुए समाजवादी पार्टी के प्रमुख मुलायमसिंह ने सुलतान के लोगों के दिलों में राजकरने वाले जमीनी नेता अरूण प्रताप सिंह को सम्मानित करने खुद उनके घर गये और उनको अपने दल में सम्मलित होने का न्योता दिया। यही कारण है कि आज तमाम कमियों के बाबजूद मुलायम सिंह प्रदेश में भाजपा, कांग्रेस व बसपा को धकेल कर अपने ही दम पर सत्तासीन हो गये है। सपा प्रमुख के इस कार्य से सुलतानपुर के लोगों में एक ही चर्चा है कि जहां भाजपा कांग्रेस के मठाधीश अपने जमीनी नेताओं की उपेक्षा करके अपमानित करते हैं वहीं मुलायम सिंह जमीनी नेताओं व कार्यकत्र्ता को खुद गले लगा कर उनको सम्मानित करते है। सुत्रों के अनुसार उप्र में कांग्रेस व भाजपा के पतन का कारण और कोई नहीं कांग्रेस व भाजपा के खुद मठाधीश रहे जो जातिवाद में इतने अंधे हैं कि उनको जमीनी कार्यकत्र्ता व अपने समर्थक जनता ही दिखाई नहीं देती। भाजपा का उप्र में पतन में राजनाथ सिंह व केशरीनाथ त्रिपाठी का सहयोग रहा वहीं कांग्रेस के पतन में खुद सोनिया गांधी के दरवारियों का रहा जो रीता बहुगुणा व निर्मल खत्री जैसे हवाई लोगों को प्रदेश की कमान सौंप कर पार्टी की आशाओं पर खुद बज्रपात करते नजर आते। हालत यह है कि जातिवाद व व्यक्तिवाद के अंध मोह में भाजपा ही नहीं संघ को भी अपने समर्पित कार्यकत्र्ताओं की हो रही दुर्गति पर उफ करने या उनकी सुध लेने की होश तक नहीं है। संघ इतना कमजोर व निश्तेज हो गया कि भाजपा के आला नेतृत्व के समर्पित नेताओं को अपमानित करके हाशिये में डालते समय भी वह भीष्म पितामह की तरह बेवश नजर आता। इसी कारण आज भाजपा भी कांग्रेस की तरह चंद नेताओं की जागिर बन कर रह गयी है।
 

तेरी ये खामोशी से देश तबाह हो रहा हे
रहम कर अरे खुदगर्ज अब तो शर्म कर

कायले घोटाले प्रकरण में ‘ मेरी खामोशी ’नामक तुकबंदी का सहारा लेने वाले प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह द्वारा इस घोटाले में उनकी सरकार पाक साफ बताये जाने की परतें खुद ही बेनकाब
 हो रही है कभी उनके कबीना मंत्री सुबोधकांत की चिट्ठी से तो अब 57 कोयला ब्लाकों में से 8 कोल ब्लाक नागपुर के किसी मनोज जायसवाल की कम्पनियां को आवंटन के नाम पर ए हालांकि इस खुलासे के बाद वर्तमान कोयला मंत्री उनको अपना दूर का रिश्तेदार बता रहे है।
आज देश का आम देशभक्त जानता है कि मनमोहन सिंह के कुशासन में देश के हितों पर कितना कुठाराघात हो चूका है। क्यों मनमोहन सिंह देश की आम जनता की आशाओं पर बज्रपात व अमेरिका की आंखों के तारे बने है। दुर्भाग्य यह है कि जिस कांग्रेस आला नेतृत्व में देश की जनता ने इंदिरा व राजीव की सी छवि देख कर उनको देश की बागडोर संभालने का जनादेश दिया है, उन्होंने उस जनादेश को मनमोहन नाम अमेरिका के प्रिय प्यादे को सोंप दिया है। आज देश की जनता मनमोहन सिंह सरकार के कुशासन से मंहगाई, भ्रष्टाचार, आतंकवाद सहित सभी क्षेत्रों में हो रही भयंकर त्रासदी से त्राही-त्राही कर रही है परन्तु भारत का यह नीरो ‘मेरी खामोशियों की बेसुरा राग सुना कर देश के जख्मों को और कुरेदने की धृष्ठता कर रहे हैं। देशहित में मनमोहन सिंह इतनी ही कृपा करे, देश के प्रधानमंत्री पद से इस्तीफा दे कर तुरंत अमेरिका जा कर वहीं की सेवा करां।
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Sunday, August 26, 2012


अरविन्द केजरीवाल के प्रधानमंत्री व गडकरी के आवास प्रदर्शन से कांग्रेस को मिली बड़ी राहत

-कोयला घोटाले में केजरीवाल टीम द्वारा भाजपा को भी बराबर का दोषी बताने से कोयला घोटाले में आकंठ घिरी मनमोहन सरकार ने प्रसन्न हो कर दी टीम केजरीवाल को सोनिया, मनमोहन व गडकरी के आवास तक प्रदर्शन की इजाजत

देश में व्याप्त भ्रष्टाचार से मुक्त करने के लिए टीम अण्णा के नेतृत्व में चलने वाला ‘जनलोकपाल’ रूपि देशव्यापी आंदोलन ने जहां केन्द्र में सत्तासीन कांग्रेस पार्टी की नींद हराम कर दी थी। वहीं इसी टीम के राजनैतिक विकल्प देने के प्रणेता व टीम अण्णा के सर्वशक्तिमान सेनापति अरविन्द केजरीवाल के नेतृत्व में कोयला घोटाले के खिलाफ देश की राजधानी दिल्ली में 26 अगस्त रविवार को चलाया गया ‘‘प्रधानमंत्री मनमोहन व भाजपा के  अध्यक्ष नितिन गडकरी के आवास का घेराव का  आंदोलन, कांग्रेस के लिए वरदान साबित हुआ। अरविन्द केजरीवाल की टीम ने कोयला घोटाला में कांग्रेस के साथ भाजपा व अन्य दलों को भी दोषी मान कर एक प्रकार कांग्रेस को राहत दे दी। इस प्रदर्शन से देश की जनता में एक साफ संदेश चला गया कि कोयला घोटाले में केवल कांग्रेस ही नहीं अपितु कांग्रेस पर आरोप लगाने वाली भाजपा, व अन्य पार्टियां भी बराबर की दोषी है। इसी से खुश हो कर 26 अगस्त को टीम केजरीवाल को न केवल सप्रंग सरकार की प्रमुख सोनिया गांधी, व भाजपा अध्यक्ष नितिन गडकरी के आवास पर प्रदर्शन करने दिया गया अपितु इन के सैकडों आंदोलनकारियों को सुरक्षा की दृष्टि से देश के सबसे संवेदनशील क्षेत्र प्रधानमंत्री आवास पर भी प्रदर्शन करने दिया गया। केवल लोगों की आंखों में धूल झोंकने के लिए सोनिया व प्रधानमंत्री के आवास पर हल्का लाठी चार्ज किया गया।  इस आंदोलन से सरकार कितनी खुश थी यह प्रातः उसी समय पता चल गया था जब छापामार ढंग से इन तीनों अतिमहत्वपूर्ण व्यक्तियों के आवास पर प्रदर्शन के इरादे से पंहुचे केजरीवाल, कुमार विश्वास, मनीष, संजयसिंह व गोपाल राय आदि आंदोलनकारियों को प्रातः नो बजे के करीब मंदिर मार्ग थाने से नाटकीय ढंग से रिहा किया गया। उसके बाद उनको अपने सैकडों आंदोलनकारियों के साथ जंतर मंतर बहुत ही सहजता से कूच करने दिया गया। जंतर मंतर में चार घण्टे की सभा करने के बाद पुलिस ने फिर से प्रधानमंत्री, सोनिया व गडकरी की आवास की तरफ कूच करने वाले इन आंदोलनकारियों को न तो संसद मार्ग थाने पर रोकने की कोशिश की। नहीं तो पुलिस अधिकांश बडे से बडे हजारों से संख्या में आये आंदोलनकारियों को यहां से एक इंच भी आगे नहीं बढ़ने देती। संसद मार्ग थाने पर पुलिस ने न तो पानी की बोछार से रोका, न ही आंसू गैस ही छोड़ा व नहीं लाठी चार्ज ही करके इनको रोकने की कोशिश की । वैसे यहां से 100 मीटर दूरी पर गोल मेथी चैक पर पंहुचने पर ही पुलिस ने सैकडों संतों पर गोलियां चला दी थी। यहां पर प्रदर्शनकारियों को रौकने के लिए पुलिस रब्बर की गोलियां, घुड सवार पुलिस से लेकर तमाम हथकण्डा अपनाती है। जो पुलिस ने टीम केजरीवाल के साथ यहां पर कतई नहीं अपनाया। 6 साल तक मैने खुद उत्तराखण्ड राज्य गठन आंदोलन का एक सक्रिय सिपाई रहने व जंतर मंतर की राजनैतिक धरना प्रदर्शनों का विगत 20 साल से नजदीक से दृष्टा रहने के कारण मैं सरकार की मंशा को  पूरी तरह से उस समय भांप गया जब बिना आंसू गैस, पानी की बौछार किये व लाठी चार्ज किये पुलिस ने मात्र 2000 से कम आंदोलनकारियों को प्रधानमंत्री जैसे अतिविशिष्ठ लोगों के आवास की तरफ कूच करने यों ही जाने दिया। मुझे मालुम है कि दिल्ली पुलिस बिना उपरी आकाओं के इशारे के संसद मार्ग थाने से लाखों की भीड़  को भी एक इंच भी आगे किसी भी कीमत पर नहीं बढ़ने देती है। परन्तु सरकार लगता है कि इस बात से खुश थी कि कोयले के घोटाले में भाजपा को भी बराबर का दोषी बताने वाले बैनर व नारे इस रैली के देश व्यापी खबरों के प्रकाशन से पूरे देश में पंहुच रही है। इस लिए सरकार ने इनको प्रधानमंत्री आवास तक कूच करने दिया। हां वहां पर केवल थोड़ी सी पानी की बोछार, लाठी चार्ज व आंसू गैस का प्रयोग कर आंदोलनकारियों को गिरफतार बता कर वहां से बसों में भर कर संसद मार्ग थाने में ला कर मुक्त किया गया। हाॅं खाना पूर्ति के लिए 5 मुकदमें भी केजरीवाल टीम पर दर्ज किये गये।
अब कांग्रेसी कह रहे हैं कि भाजपा व अन्य दल भी हमारे साथ हैं। जो काम कांग्रेस के बडे बडे प्रबंधक विगत एक पखवाडे से नहीं कर पाये वह काम केजरीवाल की टीम ने कांग्रेस के साथ भाजपा को कोयले घोटाले का दोषी बता कर, कर दिया। क्योंकि भाजपा जिस प्रखरता से संसद से सड़क पर कोयले घोटाले के लिए प्रधानमंत्री मनमोहनसिंह को दोषी बताते हुए अविलम्ब इस्तीफे देने की मांग कर रहे है। उससे कांग्रेस पार्टी काफी असहज महसूस कर रही है। अब टीम केजरीवाल ने भाजपा को भी कांग्रेस की तरह कोयला घोटाले का दोषी बता कर कांग्रेस को एक प्रकार से बड़ी राहत दी। भले ही केजरीवाल व उनके साथियों ने यह प्रदर्शन कोयला घोटाले में कांग्रेस की केन्द्र सरकार व भाजपा के प्रदेश सरकारों, सहित अन्य दलों को भी इस प्रकरण में आरोपी मानते हुए सभी राजनैतिक दलों का असली चैहरा जनता के सामने रखते हुए अपने राजनैतिक दल की भूमिका को मजबूत करने के लिए यह घेराव आंदोलन किया हो, परन्तु उनके इस आंदोलन से भले ही टीम केजरीवाल की अघोषित पार्टी का कितना जनाधार मजबूत होगा यह तो भविष्य के गर्त में छुपा है परन्तु इससे तत्काल कांग्रेस को काफी राहत मिली।
इस पखवाडे जब कैग की रिपोर्ट संसद में प्रस्तुत होने के बाद भारतीय जनता पार्टी ने देश में अब तक के हुए सबसे बड़े घोटाले यानी कोयले के घोटाले में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को सीधे दोषी बताते हुए उनके इस्तीफे की मांग को लेकर संसद की कार्यवाही को नहीं चलने दे रही है। जबकि कांग्रेस, इस मामले में भाजपा को संसद में बहस करने की चुनौती दे रही है परन्तु भाजपा संसद में बहस से बचते हुए सीधे प्रधानमंत्री के इस्तीफे की मांग करके संसद की कार्यवाही नहीं चलने दे रही है।
हालांकि देश में राजनैतिक विकल्प देने के नाम पर टीम अण्णा द्वारा नयी राजनैतिक पार्टी बनाने की हुंकार भरने के 24 घण्टे के अंदर इस आंदोलन के प्राणु पुरूष अण्णा हजारे द्वारा किसी प्रकार की राजनैतिक पार्टी में सम्मलित नहीं होने या उससे जुड़ने से दो टूक मना करने से एक प्रकार से टीम अण्णा के असली कत्र्ताधत्र्ता अरविन्द केजरीवाल सहित पूरी टीम को गहरा झटका लगा। इसी से उबरने के लिए शायद केजरीवाल ने 26 अगस्त को प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह, कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी व भाजपा अध्यक्ष नितिन गडकरी के आवास का घेराव करने का ऐलान कर दिया। इस ऐलान को रौंदने के लिए जहां दिल्ली पुलिस ने मेट्रो से लेकर बसों को सीधे  अवरोध खडे करके आंदोलनकारियों को किसी प्रकार का दुशाहस न करने की चेतावनी दे दी थी। इससे ऐसा लगता था कि 26 अगस्त को टीम केजरीवाल का प्रदर्शन कहीं जंतर मंतर तक ही सीमित न रह जाय। परन्तु जिस ढ़ंग से दिल्ली पुलिस ने इन आंदोलनकारियों को प्रधानमंत्री आवास तक कूच करने दिया उससे साफ हो गया कि केन्द्र सरकार में सत्तासीन कांग्रेस अरविन्द केजरीवाल की टीम द्वारा कोयला घोटाले में भाजपा को भी दोषी ठहराने से प्रसन्न है और वह इनकी खबरों का देशव्यापी प्रसारण खबरिया चैनलों द्वारा प्रसारण को देखते हुए इस प्रदर्शन को दिन भर संचालित कराते रहे। टीम अण्णा के सबसे जमीनी सदस्य व देश के नाट्य मंचों के प्रखर निर्देशक अरविन्द गौड़ ने जब मुझसे जंतर मंतर पर इस प्रदर्शन के बारे में पूछा तो मैने दो टूक शब्दों में यही बताया कि यह घेराव कांग्रेस के लिए वरदान साबित हो रहा है इसी लिए कांग्रेस सरकार ने प्रधानमंत्री आवास तक इनको प्रदर्शन करने की खुली इजाजत दे कर अपनी मंशा का इजहार किया।  टीम केजरीवाल के आंदोलन से भाजपा को बेनकाब होते देख कर कांग्रेस के वरिष्ट नेता ताराचंद गौतम, मो. आजाद सहित कई नेता प्रसन्न थे। वहीं इस आंदोलन के साक्षी रहे मेरे आंदोलन के साथी जगदीश भट्ट, जगमोहन रावत, मोहन बिष्ट आदि कई आंदोलन के साथी  उपस्थित थे। केजरीवाल की टीम के इस आंदोलन ने जहां देश की जनता को देश के तमाम राजनैतिक दलों का भ्रष्टाचारी चेहरा बेनकाब करके रख दिया, परन्तु कोयला घोटाले में भाजपा द्वारा संसद में कोयला घोटाले के आरोपी बताने से परेशान कांग्रेस को इस घोराव आंदोलन से एक प्रकार से डूबते को तिनके का सहारा मिल गया। हालांकि भाजपा को कोयला घोटाले का आरोपी बता कर भाजपा अध्यक्ष के आवास पर प्रदर्शन करने के केजरीवाल के निर्णय से असहमत किरण वेदी इस प्रदर्शन में सम्मलित नहीं हुई।  वहीं दूसरी तरफ अण्णा हजारे ने इस प्रदर्शन की खुल कर सराहना की।

Thursday, August 23, 2012


सत कमे करो तुम

ईश्वर हैं कण कण के वासी, 
फिर भी क्यों छायी है उदासी।
क्यों जीवन जप तप में गंवाते
धन दौलत पद के पीछे भागते । 
फिर भी मिले न सुख अविनाशी
सुख  है श्रीकृष्ण कृपा की गंगा ।
क्यों ढ़ूढ रहे उसे जग एैश्वर्य में
लूट खसोट से दौलत कमा कर ।
राग द्वेष से ये पद नाम कमा कर
सोच रहे यहां सुख शांति मिलेगी ।
प्रभु स्वरूप प्राणी को दुख दे कर 
सुख शांति कभी नहीं यहां मिलती ।
सुख शांति की चाहत है तो साथी
जड़ चेतन को मन से अपना लो।
किसी निदोर्ष का कभी शोषण करके 
सुख शांति  जग में नहीं मिल पाती ।
प्रभु को पाना है तो सुनो मनमोहन
जगहित में जीवन समर्पित कर दो।।
देवसिंह रावत
(24 अगस्त 2012 प्रात 8 .55)

Wednesday, August 22, 2012


वक्त के मोहरे है यहां सभी अण्णा हो या रामदेव

वक्त के मोहरे है यहां सभी ं अण्णा हो या रामदेव
सबको जमीन सुंघाता है सिकंदर हो या जार्ज बुश
इतना न गिरो साथी जग में दो कदम चलने पर
तुम्हारी तस्वीर ही तुमको उजाले में भी डराने लगे
तुम्हारे शब्द ही तुम्हारी राह के कांटे बन कर डसे
आरती जिनकी उतारने चले वे कहां थे कहां खडे
स्वार्थ के पुतलों को न मशीहा बताओ तुम तो जरा
यहां काल पल में इन पुतलों को बेनकाब करता है 
देवसिंह रावत
(23 अगस्त 2012 प्रातः 9.47)

Tuesday, August 21, 2012


वो दिन तो आयेगा गिर्दा ...

चले थे साथ हम इसी राहों में साथ,
तुम चले गये तो तुम बरबस याद आये
जिन्दगी है एक सफर इस जहां में
किस मोड़ पर मिल कर कोन बिछुड़ जाये।
तुम भी कहते थे अपनी की धून में
एक दिन तो आलो दिन या दुनि माॅं
पर हमें क्या मालूम था कि कि वो दिन
दलालों, राजनीति के गिरगिटों के लिए 
चैदवीं का चांद बन कर आयेगा
हमारे संघर्षो व बलिदान से गठित 
राज का ताज सजे न द्रोहियों के सर
पर साथी आंसू न बहा सपनों को लुटते हुए
भगवान बदरीनाथ का आशीष रहते हुए
इन दलालों को भी राव मुलायम की तरह
उत्तराखण्ड द्रोह का दण्ड भुगतना पडेगा
तिवारी, खण्डूडी व निशंक ने तो भुगत लिया
बहुगुणा भी इनकी राह चलेगा तो जायेगा
उत्तराखण्ड की जनांकांक्षाओं को रौंदने का 
जो भी करेगा दुशाहस उसको महाकाल 
कभी सपने में भी माफ नहीं करेगा।
शहीदों व आंदोलनकारियों का संघर्ष
व्यर्थ कभी नहीं जायेगा मेरे साथियों 
तुम्हारा वो दिन तो आयेगा इस दुनि मैं
जिसके हम सबने सपने देखे थे कभी।।
देवसिंह रावत 
(उत्तराखण्ड राज्य गठन जनांदोलन के अपने वरिष्ठ आंदोलनकारी साथी व अग्रणी जनकवि, की पावन पुण्यतिथि पर उनकी स्मृति को शतः शतः नमन्।  उन्हीं की स्मृति पर समर्पित यह श्रद्धांजलि रूपि कविता 22 अगस्त 2012 प्रात 9 .14 )


रामदेव पर प्रतिशोध में जुल्म ढाने से सरकार खुद हो रही है जनता में बेनकाब

-बंगलादेशी घुसपैटियों व अपने एक सांसद पर शर्मनाक मूक रखने वाली सरकार का रामदेव के सहयोगी बालकृष्ण पर कहर क्यों?

एक तरफ भारत सरकार देश में भ्रष्टाचार व काले धन के खिलाफ खुद कार्यवाही का दम भर रही है परन्तु देश की जनता यह देख कर हैरान है कि सरकार काले धन के खिलाफ व भ्रष्टाचार के खिलाफ कड़ी कार्यवाही करने के बजाय जो व्यक्ति देश की जनता को कई सालों से इस मांग के खिलाफ व्यापक जनांदोलन छेड़े हुए है उसी व्यक्ति बाबा रामदेव के खिलाफ आयकर सहित तमाम सरकारी ऐजेन्सियां ताड़व तोड़ कार्यवाही कर रहे है। वह भी उस बाबा रामदेव के खिलाफ जिसके राष्ट्रहित में की जा रही सेवाओं को देख कर देश विदेश की तमाम सरकारें व खुद मनमोहनसिंह की यह यूपीए सरकार के चार मंत्री हवाई अड्डे पर जा कर स्वागत करते है।
स्वामी राम देव कोई देशद्रोही कार्य या कानून के खिलाफ कार्य कर रहा था तो उनको पहले अब तक क्यों छोड़ा गया। भारतीय संस्कृति व भारतीय योग, भारतीय वस्तुओं का बडे स्तर पर जनता को रोजगार देते हुए बडा कार्य करना कहां कानून का उलंधन है। क्या कानून का उलंघन सरकार को तब नजर नहीं आता जब देश का मंत्री ही खुद इंडियन एयर लाइन्स को कैग की रिर्पोट के अनुसार चूना लगा रहे थे। बाबा रामदेव पर सरकार की कार्यवाही आंदोलन के बाद कुल मिला कर प्रतिशोध से प्रेरित लग रही है। जिन रामदेव को भारतीयता का नाम पूरे विश्व में रोशन करने के लिए देश की सरकारों ने भारत रत्न देना चाहिए था उन रामदेव को इस प्रकार से प्रताडित करके सरकार जनता की नजरों में खुद गुनाहगार हो गयी है। देश का आम जनमानस को मनमोहनी सरकार का तर्क समझ में नहीं आ रहा है कि देश के हित में कहां रामदेव ंगलत कर रहे है। अगर वास्तव में वे गलत कर रहे हैं तो उन पर सरकार ने अब तक क्यों कार्यवाही नहीं की। इसका मतलब यही नजर आ रहा है कि सरकार केवल प्रतिशोध से बाबा रामदेव को देशहित में आंदोलन करने के लिए सबक सिखाने का कृत्य कर रही है। जो निंदनीय ही नहीं अति दुर्भाग्यपूर्ण भी है। बाबा रामदेव के सहयोगी आचार्य बालकृष्ण के खिलाफ कार्यवाही को भी देश की जनता बाबा को सबक सिखाने की सरकार की नापाक कृत्य ही मान रही है। देश की सरकार देश में घुसे करोड़ांें बंगलादेशियों को सर्वोच्च न्यायालय की कड़ी फटकार के बाबजूद देश से बाहर करने के बजाय उनका मौन रह कर शर्मनाक संरक्षण दे रही है। वहीं बंगलादेशी आज असम सहित देश के अनैक राज्यों में भारतीयता पर हमला कर देश की एकता व अखण्डता पर हमला कर रहे हैं। परन्तु क्या मजाल देश की सरकार इन आतंकी घुसपेटियों को और उनके संरक्षकों पर कार्यवाही करने का साहस तक करे। वहीं भारतीय संस्कृति व भारतीय प्राचीन चिकित्सा प्रणाली आयुर्वेद को विश्व में सराहनीय ढ़ग से स्थापित करने में संलग्न आचार्य बालकृष्ण को तमाम प्रकार से प्रताडित सरकार प्रताड़ित कर रही है। वहीं ऐसे ही मामले में अपने एक सांसद सुब्बा पर सीबीआई से लेकर कोर्ट के दखल के बाबजूद सरकार कोई कार्यवाही करने के बजाय उनको सांसद तक बनवा कर देश में कानून को अपने हितों के लिए दुरप्रयोग कर रहे है। गत सप्ताह नैनीताल उच्च न्यायालय ने फर्जी पासपोर्ट मामले में योगगुरु बाबा रामदेव के सहयोगी आचार्य बालकृष्ण को जमानत दे दी है। गौरतलब है उच्च न्यायालय ने गत सप्ताह आचार्य बालकृष्ण को जमानत दस-दस लाख रूपये के दो जमानती भी कोर्ट में पेश करने को कहा है। इसके साथ ही जेल में बंद आचार्य बालकृष्ण को भारी राहत मिल गई है ।
हकीकत तो यह है कि बाबा रामदेव ने अरबों खरबों की सम्पति व देश विदेश में अकल्पनिय सम्मान अर्जित करने के बाबजूद अन्य धनपशुओं या आत्मकेन्द्रीत व्यक्तियों की तरह अपने तक सीमित न रह कर देश के सवा सो करोड़ जनता के भविष्य को संवारने व बनाने के लिए देश की निरंकुश सत्तासीनों से टकराने का तथा दशकों से सुप्तप्राय भारत की जनता को अपने प्राचीन गौरव को आत्मसात करने का जो विश्व को झकझोरने वाला ऐतिहासिक जनांदोलन किया उसके लिए बाबा रामदेव को कोटी कोटी नमन्। भले ही बाबा रामदेव व अण्णा हजारे कई कार्यो से मैं खुद सहमत नहीं हॅू परन्तु उनके भारतीय संस्कृति व भारतीय जनमानस को जागृत करने वाले कार्य व विदेश में जमा भारतीयों के कालाधन को भारत में वापस लाने के लिए चलाये गये जनांदोलन के लिए मैं उनको हार्दिक बधाई देता हॅू। वहीं इसी प्रकार पूरे देश में भ्रष्टाचार के खिलाफ जनलोकपाल बनाने की मांग को लेकर जनांदोलन का नेतृत्व करने वाले अण्णा हजारे को भी शतः शतः प्रणाम।?

काला बाबा के मक्कर से नहीं बच पायेगी मनमोहनी सरकार



-भारत के नियंत्रक और महालेखा परीक्षक (कैग) की रिपोर्ट में हुआ खुलाशा

 ‘देवी काल कभी किसी को डण्डा लेकर मारने नहीं आता है वह कारण बनाता है। आदमी दुनिया के चक्करों से तो बच सकता हॅ परन्तु काले के मक्कर से नहीं बच सकता है। दुनिया में काला धन मसहूर है और मैं अपनी गुनाहगारी में प्रसिद्ध हॅू। बक्त पर सारा काला धन काला का होता है।’ भारतीय संस्कृति व राजनीति को रहस्यमय ढ़ग से पर्दे के पीछे रह कर देश व दीन दुनिया की सेवा करने काला बाबा की बरबस यादें मुझे रह रह कर इन दिनों उद्देल्लित करती है। वे देश, दुनिया, समाज को सत्तामद से रौदने वालों के लिए साक्षात काल थे। देश में व्याप्त भ्रष्टाचार व कुशासन के खिलाफ वे कई बार व्यथित हो कर प्रकृतिदत्त अपनी रहस्यमय शक्तियों के बल पर दुशासन बने कुशासकों को करारा सबक भी सिखाते थे।
 इन दिनों देश का आम नागरिक देश में व्याप्त भ्रष्टाचार, मंहगाई, आतंकवाद व कुशासन से पूरी तरह त्रस्त है। एक तरफ आज अण्णा हजारे के जनांदोलन व दूसरी तरफ बाबा रामदेव का काले धन के खिलाफ आंदोलन को देख कर बाबा भले ही पाखण्ड का तो विरोध करते परन्तु वे अवश्व देश को भ्रष्टाचार के गर्त में धकेल रही इस सरकार को उखाड़ फेकने का ही काम करते।  अगर आज काला बाबा सदेह होते तो कहते देवी जिस, अटल बिहारी वाजपेयी के कुशासन से मुक्त कराने का कई महिने पहले से ताल ठोक कर जिस कांग्रेस प्रमुख सोनिया को देश में सुशासन चलाने के लिए सत्तारूढ़ कराया, आज उस सोनिया के भरत बने मनमोहन सिंह के कुशासन में आम जनता का जीना हो रखा है, और संसद में इसी पखवाडे रखी गयी भारत के नियंत्रक और महालेखा परीक्षक (कैग) की रिपोर्ट में हुआ खुलाशा, जिसमें प्रधानमंत्री के अन्तर्गत कोयला आवंटन में 1.86 लाख करोड़ रुपये का घोटाला, इंडियन एयरलाइंस की लुटिया डूबोने में ही मंत्री प्रफुल्ल पटेल व रिलायंस पावर को 29033 करोड़ का अनुचित लाभ दिलाने आदि के खुलाशे से देश का आम जनमानस स्तब्ध है। लोग हैरान है कि जब बाड़ ही खेत चरने लगे तो किस पर विश्वास करे। अपनी तमाम ताकत लगा कर देश में भाजपा के कुशासन से मुक्ति दिला कर सोनिया पर विश्वास करके कांग्रेस को सत्तारूढ़ कराने वाले काला बाबा आज रहते तो वे  एक ही शब्द कहते लगता है देवी इनको भी इंदू की तरह सबक सिखाना पडेगा। गौरतलब है इंदिरा गांधी के करीबी और इंदिरा को बहन मानने वाले ‘इंदू’ कहने वाले काला बाबा ने इंदिरा गांधी के कुशासन को भी एक बार उखाड़ फेंकने के लिए कार्य किया था। आजादी के बाद देश के तमाम रामनेताओं से करीबी रहे काला बाबा हमेशा सत्य, न्याय व पीड़ितों के साथ देने के लिए तत्पर रहते है। वे भाजपा के धर्म भेद की राजनीति से बेहद आक्रोशित थे। वे लोगों को सदा जाति, धर्म, क्षेत्र व अंध विश्वास तथा पाखंड से दूर रहने का आवाहन करते थे। गांधी, नेहरू, सुभाष, सहित सभी क्रांतिकारियों के करीबी होने की बात कह कर बाबा आज के नेताओं को जब भी कोई उनसे आशीर्वाद लेने आते तो एक ही फटकार लगाते कि क्यों देश को लूटने के लिए ही राजनीति में आ रहे हो। देश के हुक्मरानों को कड़ी फटकार लगाते हुए बाबा कहते थे कि आज देश में आम आदमी के लिए यह सरकारें कुछ नहीं कर रही है। यहां तो धर्म व्यापार, विद्या व्यापार, राजनीति व्यापार व चिकित्सा सहित पूरी व्यवस्था व्यापार में तब्दील हो गयी है। आम आदमी यहां बेहाल हैं क्या इसी लिए हमने आजादी का ये आंदोलन चलाया। कांग्रेसी नेताओं की भी कड़ी खबर लेने वाले काला बाबा मुरारजी, हेमवती नन्दन बहुगुणा, नरसिंह राव, वीपीसिंह, अटल बिहारी वाजपेयी व काशीराम सहित देश के अग्रणी नेताओं के करीबी रहे। वे बहुगुणा व राव की ताजपोशी के सुत्रधार रहे। हमेशा पर्दे के पीछे रहने वाले काला बाबा दिल्ली में कनाट प्लेस में इंदिरा गांधी द्वारा स्थापित बाल सहयोग के खण्डरों में उत्तराखण्ड राज्य गठन तक रहे। उनको कानपुर में गोविन्द नगर में नाले के पास आश्रम था, जिसमें एक तरफ बसपा व एक तरफ आरएसएस समर्थकों का कब्जा है। इलाहाबाद के कोरांव तहसील के मूल निवासी काला बाबा प्रायः खण्डरों में बहुत कम कपड ों में सर्दी, गर्मी व बरसात में धूनि में रमे रहते थे। अपने रहस्यमय शक्तियों की ताकत से वर्षा व तुफान को लाने व रोकने का कारनामा करने वाले काला बाबा के भक्तों में बाल सहयोग के सचिव व दिल्ली आर्ट कालेज के प्राद्यानाचार्य शर्मा, इलाहाबाद के मिठाई लाल, नुसरत, संसद के चिकित्सक डा. जयप्रकाश, हरियाणा के कांग्रेस नेता उमेद सिंह राठी, चित्रकुट उप्र के राजकीय चिकित्सक डा राव,  जगजीवन राम के करीबी नेता प्रताप बिष्ट व ताराचंद गौतम, गाजी नरूल हसन सहित कई लोग थे।
भले ही अण्णा व रामदेव के द्वारा चलाये गये जनांदोलन को सत्तांध हुई कांग्रेस सरकार कुचल रही है या उसकी उपेक्षा कर रही है परन्तु यह निश्चित है कि काला बाबा की आध्यात्म शक्ति से चलाये गये किसी प्रहार को कोई सरकार या व्यक्ति नहीं झेल पाता। वे भले ही सदेह नहीं परन्तु मुझे प्रायः कहा करते थे कि देवी मेरा नाम ही काफी है। अन्याय के खिलाफ सदैव संघर्ष करो। यही देश व समाज की सबसे बड़ी भक्ति है। अपनी रहस्यमय शक्तियों से सत्तामद में चूर हो कर जब प्रधानमंत्री राव को अमेठी के समीप एक कांग्रेसी सम्मेलन बाबा के मना करने पर भी कराने की कोशिश की तो बाबा ने आंधी तुफान से कांग्रेस का पूरा टेण्ट तहस नहस कर दिया। इस कारण यह सम्मेलन रद्द कराना पडा। बाबा को इस बात का गुस्सा था कि राव अपनी सत्ता की हनक सोनिया गांधी को दिखाना चाह रहा है। जो बाबा को किसी भी कीमत पर सहन नहीं था। जब वाजपेयी सरकार को मध्यप्रदेश आदि चार राज्यों के विधानसभाचुनाव के बाद छह माह लोक सभा भंग करने व देश में सोनिया का शासन 350 सांसदों के बल पर कराने तथा सपा बसपा से किसी भी सूरत में समझोता कांग्रेस के साथ नहीं होने देने को मैने उस समय थोड़ा गलत अर्थ लगा कर सोनिया को 350 सांसदों के बल पर प्रधानमंत्री बनाना अपने प्यारा उत्तराखण्ड के उक्त अंक में प्रकाशित कर दिया था। जो बाद में सोनिया के शासन व उनके भरत मनमोहन के रूप में अक्षरशः
सामने आया।
इस घोषणा के बाद काला बाबा के पास सोनिया के साहयक माधवन आये थे। परन्तु उनको धवन व पुराने नेताओं की तरह बाबा की परमशक्ति का अहसास नहीं था। बाबा के कार्यो व उनकी समाज के प्रति समर्पिता को देख कर मैं कई सालों तक उनके साथ आये दिन रहा। आज भी भगवान श्री कृष्ण की परम कृपा व काला बाबा की इसी सीख से मैं जीवन के कुरूक्षेत्र में अन्याय के खिलाफ उतरा हॅू। उत्तराखण्ड व उप्र सहित राज्यों के चुनाव से कई महिने पहले ही उप्र से बसपा, उत्तराखण्ड से भाजपा व 2014 में केन्द्र से कांग्रेस के सफाये का जो ऐलान किया है, उसके पहला चरण उप्र व उत्तराखण्ड में सत्य साबित हो गया। अब 2014 में केन्द्र की सत्ता से कांग्रेस व भाजपा के सफाये के साथ मुलायम नहीं अन्य किसी नेता के नेतृत्व में तीसरे मोर्चे की सरकार बनने का ऐलान किया है। जो घटनायें घटित हो रही है उससे मुझे एक ही बात काला बाबा की याद आ रही है कि ‘देवी, काल कभी किसी को डण्डा ले कर मारने नहीं आता। वह कारण बनाता है। आज जो कांग्रेस व भाजपा के नेताओं की जो जुबान व स्थितियां निरंतर इनके खिलाफ हो रही है वह इसी दिशा में हो रहा है। अन्याय के खिलाफ ही सभी देश वासियों को एकजूट होना चाहिए देश में कबीर जैसे क्रां्रतिकारी व सांई से अधिक रहस्यमय शक्तियों का स्वामी काला बाबा अन्याय को देख कर चूपचाप नहीं अपितु उसकी जड़ों में मठ्ठा डालने वाले कार्यो के लिए मेरे लिए अनुकरणीय हैं। आज भगवान श्रीकृष्ण का परम आशीर्वाद व काला बाबा यही प्रेरणा मेरी शक्ति बनी हुई हैं ।

Monday, August 20, 2012


कब मिलेगी  भारतीय सेना को अंग्रेजी दमनकारी अफसरी राज से मुक्ति

भ्रष्ट व अमानवीय फिरंगी मानसिकता के अधिकारियों से सेना को मुक्त कर भारतीय व मानवीयकरण करे सरकार 

देश भले ही आजाद हो गयी परन्तु फोज में आज भी वहीं फिरंगी कालीन अफसरी शासन चलता है। जरा भी इसमें परिवर्तन नहीं आया। वहीं फिरंगी भाषा अंग्रेजी आज भी देश के अफसरों की जुबान में चढ़ कर देश के लिए कुर्वानी देने वाले जाबांज जवानों को अपमानित व दमन करने का हथियार बना हुआ है। देश के हुक्मरानों को देश के लिए अपना सर्वस्व निछावर करने वाले जांबाज जवानों की सुध लेने की कहां फुर्सत हें। वहां अधिकारी आज भी उनके साथ वही दमनकारी व्यवहार करते थे जैसे ब्रिटिश काल में होता था।
इसी पखवाडे संसद में जब पाकिस्तान सीमा पर तैनात भारतीय सेना की एक टुकड़ी में सेना के जवानों व अधिकारियों के बीच हुए चंद मिनटों के संघर्ष पर गहरी चिंता प्रकट करके सरकार से भविष्य में इस प्रकार की किसी घटना के न होने को कह रहे थे। सरकार की तरफ से रक्षा मंत्री ने इसे गंभीर मामला बताते हुए सभी सदस्यों से इस संवेदनशील मामले को ओर तुल न देने की अपील की। उन्होंने जोर दे कर कहा कि विश्व में भारतीय सेना अपने अनुशासन के लिए विख्यात है। रक्षा मंत्री के संसद  में दिये इस बयान को एक सप्ताह भी नहीं हुए थे कि देश की राजधानी दिल्ली के नई दिल्ली रेलवे स्टेशन के समीप रेलवे के एक टेलीफोन टावर पर भारतीय सेना का एक जवान चढ़ कर ‘भारतीय सेना में अधिकारियों द्वारा सैनिकों के बिट्रिश कालीन तर्ज पर ही हो रहे शोषण के खिलाफ आवाज उठायी।   1998 में भारतीय सेना में खेल कोटे से भर्ती हुआ ने तमिलनाडु निवासी के. मुथू ने सौ फुट ऊंचे टावर पर चढ़कर   भारतीय सेना के अधिकारियों पर मनमानी करने व छुंट्टी न देने का आरोप लगाते हुए एक फौजी नई दिल्ली रेलवे स्टेशन के समीप स्थित रेलवे के टेलीफोन टावर पर चढ़कर उसने अपना मांग पत्र लोगों को दिया। मांग पत्र में उसने सेना के अधिकारियों द्वारा प्रताड़ना की कहानी लिखी है।
फोन से बात करने पर जवान ने बताया कि भले ही देश आजाद हो गया परन्तु सेना में आज  भी ब्रिटिश राज ही चलता हैं। अधिकारियों की वहां हिटलरशाही चलती है। उनकी बात न मानने पर जवानों पर तरह-तरह के सितम ढाए जाते हैं। इससे परेशान होकर उसने यह कदम उठाया है। उसने जोर दे कर कहा कि जब तक रक्षा मंत्री इस मामले में हस्तक्षेप नहीं करते, वह टावर से नहीं उतरेगा। बहुत ही दुखी मन से उस जवान ने आरोप लगाया कि उसे उसकी पत्नी की डिलीवरी के वक्त काफी जद्दोजहद के बाद छुंट्टी दी गई। पिता की मौत होने पर उसने तीन दिन की छुंट्टी मांगी थी, लेकिन मात्र एक दिन की छुंट्टी प्रदान की गई थी। वापस लौटने पर उसका स्थानांतरण करने के साथ ही तरह-तरह से परेशान किया जाने लगा।
वह पांच वर्ष तक ग्रुप स्पोर्ट्स कंपनी रूड़की में तैनात रहा। वहां उसने भारोत्तोलन में आर्मी चैंपियनशिप भी जीती। वर्तमान में वह राजस्थान के कोटा में तैनात है। वह बेंगलूर से स्पाइस जेट के विमान से दिल्ली भारतीय सेनिकों के हो रहे शोषण से मुक्ति दिलाने के लिए आया। इसी रणनींित के तहत वह  मिंटो रोड स्थित रेलवे के टावर पर चढ़ गया।
उसने पांच पन्ने के मांग पत्र में के. मुथू ने सेना के अधिकारियों पर गंभीर आरोप लगाए हैं। उसका कहना है कि बेंगलूर पोस्टिंग के दौरान अधिकारियों ने उसके साथ काफी गलत व्यवहार किया। पिछले चार वर्ष में उसकी पांच पोस्टिंग की गईं। उसने अपने पत्र में अधिकारियों द्वारा मारपीट की बात भी लिखी है। उसका कहना है कि वह जब इसकी शिकायत लेकर उच्च अधिकारी के पास गया तो उन्होंने भी कोई कार्रवाई नहीं की।
यह सवाल केवल एक ही जवान का नहीं। इस प्रकार की अनैक घटनायें सेना के हर यूनिट में होती रहती है। सैनिक अपने भाग्य को कोस कर सेना के इन फिरंगी मानसिकता अधिकारियों के जुल्मों को देश भक्ति व अपने भाग्य की नियति मान कर सह लेते है।
इस प्रकार के दमन से अवसादग्रस्त हो कर कई घटनाओं में सैनिकों की आत्म हत्या या शोषक अधिकारी की हत्या करने जैसी घटनायें भी प्रकाश में आती है। सेना में अनुशासन व गोपनीयता के पर्दे में से जब से न्यायालयों ने झांक कर देखने का कार्य किया तो सेना में एक के बाद एक ऐसे घोटाले प्रकाश में आ रहे हैं कि जिससे देशवासियों का सर शर्म से झुक जाता है। ऐसे में देशवासियों के दिलों में एक ही प्रश्न उठता है कि क्या होगा हमारे देश का, जहां  की सुरक्षा में ऐसे अधिकारी तैनात है। सेना में बड़े स्तर पर हो रहे घोटालों में  अधिकांश बडे सैन्य अधिकारी ही पकडे गये। मेजर जनरल ही नहीं ले. जनरल जैसे  उच्च अधिकारियों का मुखोटा बेनकाब होने पर पूरा देश दंग हे। हालांकि सेना में अधिकांश जांबाज ईमानदार व देशभक्त जनरल वी के सिंह जेसे भी अधिकारी है। परन्तु चंद बेईमानों व निरंकुश अधिकारियों ने आज देश के लोगों के मन में जो शंका के बादल उमडे हैं उनको दूर करना सरकार का पहला कर्तव्य है। सैनिक अपने परिजन के अंतिम समय या सुख दुख में भी सम्मलित होने के लिए सामान्य समय में भी ये फिरंगी मानसिकता के अधिकारी अपनी हिटलरी दिखाने के लिए छूट्टी तक देने में जवानों को कितना जलील करते हैं यह सैनिकों को ही मालुम होता है या उनकी राह ताक रहे उनके परिजनों को।
देश के हुक्मरानों को चाहिए कि सेना में अनुशासन व भ्रष्टाचार दूर करे। परन्तु हुक्मरान करे भी कैसे, सेना में भी बडे पदों पर सरकार इ्रमानदार अधिकारियों के बजाय अपने मुंह लगे अधिकारियों के नियुक्त करने की आत्मघाती परंपरा चल रही है। जिस प्रकार से देश के हुक्मरानों का दामन  आये दिन घोटालों से दागदार होता जा रहा है, उसका व्यापक असर सेना पर भी पड़ रहा है। देश में जरूरत है आज सामूल भ्रष्टाचार के खिलाफ सफाई की। नहीं तो न तो सीमायें सुूरक्षित रहेगी व नहीं देश की व्यवस्था। क्योंकि देश के हुक्मरान जिस प्रकार से सैन्य सामाग्री में ही नहीं अपितु शहीद सैनिकों के ताबूत में भी घोटाले कर रहे हैं उससे देश की हकीकत ही वयान हो रही है। आज जरूरत है भारतीय सेना में फिरंगी दमनकारी प्रवृति के बजाय भारतीयकरण करने की। जो अपने जांबाजों को अनुशासन के साथ देश भक्ति का ज़जबा ही सिखाये, मनोबल बढ़ाये। जो भी सेना में अमानवीय अधिकारी व फिरंगी मानसिकता के दमनकारी भ्रष्ट अधिकारी है उनको तत्काल सेवानिवृत करके देश की रक्षा की जाय। फिर किसी जाबंाज को किसी  अधिकारी से विवाद करने या किसी टावर में चढ़ने की जरूरत महसूस न हो। सेना में मानवीय व भारतीय करण करना नितांत आवश्यक है। शेष श्रीकृष्ण। हरि ओम तत्सत्। श्रीकृष्णाय् नमो।

Saturday, August 18, 2012




 असम प्रकरण के लिए पाक से अधिक गुनाहगार हैं देश के हुक्मरान

-अपनी असफलता के लिए सोशल मीडिया के सर पर दोष न मंढ़े सरकार 

-हुक्मरानों द्वारा देश के हितों व ज्वलंत समस्याओं को नजरांदाज करने व देशद्रोही तत्वों को संरक्षण देने से हुई देश की स्थिति विस्फोटक





असम में बंगलादेशी आतंकी घुसपेटियों द्वारा किये गये हिंसक हमले के बाद जिस प्रकार से मुम्बई, लखनऊ, इलाहाबाद सहित उत्तर प्रदेश के कई शहरों में हुए  हिंसक प्रदर्शनों व इन घटनाओं के बाद जिस प्रकार से बंगलोर, हेदराबाद सहित देश के कई भागों से पूर्वोत्तर के छात्रों व लोगों ने पलायन के  लिए भारत सरकार ने पाकिस्तान व उसके अतिवादियों द्वारा संचालित सोशल मीडिया को जिम्मेदार ठहराया वह अपने आप में सरकार द्वारा अपनी जिम्मेदारी से बचने का गैरजिम्मेदाराना कृत्य ही है। सरकार को चाहिए था कि उस की मूल जड़ में जा कर दोषियों को सजा दे ओर इस समस्या का ठोस निदान करे। परन्तु सरकार लगता है इस सभी प्रकरण के लिए पाकिस्तान के अतिवादी तत्वों द्वारा संचालित सोशल मीडिया को जिम्मेदार बता कर फिर इस गंभीर समस्या से आंख मूंदना चाहती है। सरकार की यही कृत्य आने वाले समय में देश के लिए इससे भी अधिक विकराल होगा।
 यह सही भी है परन्तु सरकार पाक को बलि का बकरा बना कर अपनी जिम्मेदारी से नहीं बच सकती। पाकिस्तान हमारा मित्र नहीं अपितु जन्मजात दुश्मन है, दुश्मन सदैव ऐसी हरकत करेगा यह जग जाहिर है परन्तु इसकी नापाक कृत्यों को रोंकने के लिए सरकार ने क्या किया। न तो सरकार ने सर्वोच्च न्यायालय व अपनी खुफिया ऐजेन्सियों की इस आशय की चेतावनी पर ही ध्यान दिया। केवल अपने वोट बंेक के लिए उन लोगों पर कोई कार्यवाही नहीं की गयी। जो मस्जिदों में नमाज के बाद आम जनता की धार्मिक भावनाओं को भड़का कर इन हिंसक आंदोलनकरने के लिए गुमराह करके देश की एकता अखण्डता व शांति को भंग कर रहे है। अगर सरकार ने असम प्रकरण पर वहां के सांसद व हेदराबाद के सांसद पर समय रहते कार्यवाही की होती तो इस प्रकार की कार्यवाही न मुम्बई में होती व नहीं लखनऊ मे। सरकार को म्यामार की सरकार या चीन की सरकार से सबक लेना चाहिए कि घुसपेटियों के साथ कैसा व्यवहार करे। देश में कोन बंगलादेशी आतंकी घुसपेटियों को बार्डर पार कराकर उनको बसा रहा है? कौन उनके मतदाता कार्ड व राशन कार्ड बना रहा है? जब तक देश के हुक्मरान अपने निहित स्वार्थ से उपर उठ कर देश हित में काम नहीं करेंगे तब तब ऐसी समस्यायें दिन प्रतिदिन ओर बिकराल बनती जायेंगी। इसका दायरा केवल असम ही नहीं दिल्ली, उप्र, बंगाल, और उत्तराखण्ड सहित देश के तमाम उन प्रदेशों में बढ़ जायेगा जहां वोट की राजनीति के कारण ऐसे आतंकी घुसपेटियों को शर्मनाक संरक्षण खुद सत्तासीन नेता देते है।
असम में बंगलादेशी घुसपेटियों को अंध समर्थन देने के कारण उपजी हिंसा का विरोध करने के बजाय  जिन सांसदों व नेताओं ने समाज में तनाव फैलाने वाली धार्मिक टिप्पणियां या बयान दिये उनके खिलाफ सरकार अभी तक कार्यवाही क्यों नहीं कर रही है? जिन नेताओं ने बंगलादेशी आतंकी घुसपेटियों को देश में शर्मनाक संरक्षण दे रखा है उनके खिलाफ कार्यवाही के साथ पूर्वाेत्तर के छात्रों व कामगारों को पूरे देश में सुरक्षा देने के लिए देश के तमाम राजनैतिक दलों व प्रबुद्ध जनता को आगे आना चाहिए। मनमोहन सरकार इसको दलगत राजनीति से उपर उठ कर राष्ट्र रक्षा के लिए अपने दायित्व के रूप में कार्य करे। जनता भी तमाम प्रकार की अफवाहों को न तो फैलाये व नहीं उस पर कहीं ध्यान दें। पूर्वोत्तर के लोगों को भी इस बात का भरोसा रखना चाहिए कि पूरा राष्ट्र उनके साथ है उनको किसी प्रकार से इन अफवाहों से घबरा कर पूर्वोत्तर की तरफ कूच नहीं करना चाहिए। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह व सप्रंग प्रमुख सोनिया गांधी को उन बंगलादेशी घुसपेटियों के संरक्षक बन कर देश में अशांति फेलाने वाले सांसद व नेताओं पर कड़ी कार्यवाही करनी चाहिए जिससे पूर्वोत्तर के भारतीयों को सुरक्षा का विश्वास लोट सके।
असम में बगलादेशी आतंकी घुसपेटियों के कारण कोकराझार इलाके में हुई हिंसा के कारण आज देश के कई हिस्सों में तनाव का माहौल है। इस समस्या पर संसद से लेकर आम आदमियों में चर्चायें हो रही है। सरकार ने  इस प्रकार की विवादस्थ 254 वेबसाइटों को बंद कर दिया है। जहां सरकार व राजनेता इस समस्या के लिए सोसल मीडिया को जिम्मेदार ठहरा रहे हैं। वहीं अधिकांश प्रबुद्ध लोग इसके लिए देश के हुक्मरानों सहित देश की तमाम राजनैतिक दलों को इसके लिए जिम्मेदार मान रहे है। इन प्रबुद्ध लोगों का मानना है कि देश के हुक्मरान देश के हितों व ज्वलंत संवेदनशील मुद्दों को जिस तरह से नजरांदाज करने की प्रवृति आजादी के बाद से अब तक देखी गयी है उसके कारण आज देश में कई समस्यायें बेकाबू ही नहीं बिकराल हो गयी है। आज भी समस्या के मूल में जाने के बजाय उसके विकारों पर केवल घडियाली आंसू बहाने का काम किया जा रहा है। वहीं सरकार अपनी नाकामयाबी को स्वीकार करके इसमें गभीर सुधार करने के बजाय जब देश के हुक्मरान अपने कृत्यों से इस विवाद को और हवा देने का काम करते से प्रतीत हो रही है। इसलिए सरकार को चाहिए कि वह अपनी इस हिमालयी भूलों को तत्काल हल निकालना होगा। परन्तु सरकार लोगों का ध्यान बटाने व अपनी नालायकी को बचाने के लिए सोशल मीडिया पर अपनी खाज उतार रहे है। जो लोकशाही में नितांत गलत है। अफवाहों, झूठी खबरे फेलाने वालो पर कड़ा कानून बनाना चाहिए। परन्तु इस घटना की आड़ में सोसल मीडिया पर बंदिशें लगाने के बजाय उनकी जिम्मेदारी सुनिश्चित करनी चाहिए। सोशल मिडिया को भी अपनी जिम्मेदारी व देश की एकता अखण्डता के साथ सामाजिक सौहार्द के दायित्व निर्वहन करने से मुंह नहीं मोड़ना चाहिए।
संसद की चैखट जंतर मंतर पर 16 अगस्त को अनैक सामाजिक व राजनैतिक चिंतकों के साथ मैरी इस समस्या पर चर्चा हुई। इस चर्चा में देश के वरिष्ठ राजनेता रहे जगजीवन राम के निकट सहयोगी
ताराचंद गौतम, सुलतानपुर से समाजसेवी मोहम्मद आजाद तथा इस चर्चा में 17 अगस्त को जनांदोलनों से जुडे सर्वोच्च न्यायालय के वरिष्ठ अधिवक्ता अवतार सिंह रावत, उत्तराखण्ड राज्य गठन के प्रखर आंदोलनकारी जगदीश भट्ट व राकांपा से जुड़े रहे समाजसेवी पाण्डे आदि सभी ने एक स्वर में देश वासियों से देश में शांति बनाये रखने व एक दूसरे की भावनाओं का सम्मान करने की खुली अपील की। वहीं बंगलोर सहित देश के अन्य भागों में शिक्षा व रोजगार के लिए रहने वाले पूर्वोत्तर क्षेत्र के निवासियों से अफवाहों के कारण वापस पूर्वोत्तर न  लोटने का अनुरोध किया।
इसके साथ सभी ने एक स्वर में सरकार से देश के संवेदनशील समस्याओं को तत्काल समाधान खोजने की जरूरत बताते हुए कहा कि  निहित स्वार्थ के लिए सामाजिक सौहार्द को रौंदने वाले असामाजिक तत्वों पर कड़ी कार्यवाही करने की जरूरत बताया।
चर्चा में भाग लेते हुए मोहम्मद आजाद ने कहा कि सरकार को दंगो में अनाथ हुए बच्चों व लोगों को सहारा देना चाहिए जिससे वे कट्टरपंथियों के हाथों के मोहरे न बन पाये। वहीं सरकार को अपने निहित स्वार्थ के लिए समाज में अशांति फैलाने वाले तत्वों को सर उठाने से पहले शक्ति से कुचल देना चाहिए। इसके साथ मोहम्मद आजाद का कहना था कि सरकार को मदरसे आदि शिक्षा संस्थानों में दीन की शिक्षा देने के साथ दुनिया की शिक्षा के साथ उर्दू के अलावा अन्य भारतीय भाषाओं में भी दिलाने की व्यवस्था करनी चाहिए। श्री आजाद ने कहा कि हमारी सरकार व आम लोगों को यह समझना चाहिए कि हमारे लिए राष्ट्र सर्वोच्च है, उसके बाद धर्म, प्रांत, जाति आदि है। राष्ट्रवादी विचारों के समाजसेवी मोहम्मद आजाद ने कहा कि हमें ध्यान रखना चाहिए हमारे किसी काम देश कमजोर न हो, हमारे देश के अमन शांति पर ग्रहण न लेगे। अगर देश में शांति होगी तभी देश उन्नति करेगा तथा देश के आम  आदमियों का जीवनस्तर सुधर सकता है।
इस चर्चा में भाग लेते हुए सर्वोच्च न्यायालय के वरिष्ठ अधिवक्ता अवतार सिंह रावत ने भी देश में पूर्वाेत्तर के छात्रों व लोगों के पलायन को दुर्भाग्यपूर्ण बताते हुए उन्होंने कहा कि सरकार को तत्काल इस प्रकार देश के माहौल को खतरे में डालने वालों को दण्डित करना चाहिए। इसी प्रकार के विचार जगदीश भट्ट के रहे। वहीं राजनैतिक विचारक व नेता ताराचंद गौतम ने कहा कि देश में शांति भंग करने व यहां की प्रगति को रोकने के लिए कुछ विदेशी तत्व तथा इस देश में असामाजिक लुटेरे टाइप के लोग इस प्रकार का वातावरण इस देश में बनाते हैं सरकार को जहां इनसे शक्ति से निपटना चाहिए वहीं लोगों को इस प्रकार के अवसरवादी लोगों की अफवाहों पर किसी प्रकार से ध्यान नहीं देना चाहिए ।
इस चर्चा  में भाग लेते हुए मैने कहा कि सरकार को चाहिए कि संवेदनशील समस्याओं का समाधान करना चाहिए तथा देश के हितों से खिलवाड़ करने वाले तत्वों से शक्ति से निपट लेना चाहिए। रामजन्म भूमि, मथुरा काशी विवाद का समाधान सरकार को पहले तो देश के विभाजन के समय ही कर देना चाहिए। नहीं तो इसको यथाशीघ्र करना चाहिए। इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि देश में बहुसंख्यक समाज ही नहीं देश की युगों से आत्मा रहे भगवान राम, कृष्ण व भगवान शिव के आस्था के मूल केन्द्रों पर विदेशी हुक्मरानों ने जो बलात निर्माण किये हैं उसको तत्काल सरकार को देश को सोंप देना चाहिए। वहीं सुभाष पार्क में बलात ढांचा बनाने वाले तत्वों से सरकार को अपनी वोट  व सत्ता के लालच में किसी प्रकार से नजरांदाज नहीं करना चाहिए। इस प्रकार के कृत्यों को करने वालों को तुरंत कडा दण्ड देना चाहिए।
इसके साथ असम की वर्तमान समस्या का मूल कारण यहां पर देश के हुक्मरानों ने बंगलादेश से आने वाले करोड़ों घुसपेटियों को देश से बाहर करने कोई ठोस कदम आज कई दशक गुजर जाने के बाद भी नहीं उठाये। अभी भी इतने भीषण दंगों के बाबजूद सरकार इस समस्या का ठोस निर्णय नहीं ले रही है। किसी को भी अपने पक्षधर मतदाता बनाने की अंधी होड़ में आज देश में बंगलादेशी घुसपेटियों ने खतरनाक हालत बन गये है। सत्तारूढ़ दल ने कभी भी देशहित को प्रमुखता से रख कर कोई निर्णय लेती तो आज यह हालत देश में नहीं होती। सबसे हैरान करने वाली बात यह है कि आजादी के बाद अब तक 65 सालों में  देश की एक भी सरकार ऐसी नहीं रही जो इन बंगलादेशी घुसपेटियों पर  कठोर कार्यवाही करके इनको देश से बाहर खदेड़े।  हमारा भ्रष्ट्र शासन प्रशासन तंत्र  इनको देश से बाहर खदेड़ना तो रहा दूर उल्टा इनको राशनकार्ड, मतदाता कार्ड  से  नवाज पर भारत की छाती पर मूंक दलने के लिए छोड़ देते है। जिस प्रकार से असम आज हालत शर्मनाक हो रखे हैं वहीं अगर सरकार ने इसी प्रकार से ज्वलंत समस्याओं के प्रति उपेक्षापूर्ण व पक्षपात पूर्ण रवैया बनाये रखा तो देश की सुरक्षा व एकता अखण्डता को गंभीर खतरा उत्पन्न हो जायेगा। देश की सरकार को देश के संवेदनशील मुद्दों का तत्काल ठोस समाधान करना चाहिए और देश के हितों को रौंदने वाले तत्वों को शक्ति से निपटना चाहिए तभी देश की एकता अखण्डता अक्षुण्ण रहेगी और देश में अमन शांति व प्रगति की गंगा बहेगी।
दुर्भाग्य है कि सरकार असम दंगों से नासूर बन चूकी समस्या का स्थाई निदान खोजने में ईमानदारी से कदम उठाने के बजाय इस मामले को हवा दे रहे तत्वों द्वारा मुम्बई, लखनऊ, आदि शहरों में जो तथाकथित उग्र प्रदर्शन आयोजित कर अन्य समाजों व देश के सम्मान को ठेस पंहुचाने का काम किया गया। इस प्रदर्शनों केे आयोजकों व असामाजिक तत्वों को शक्ति से दमन करनी चाहिए। आज अभी तक देश की सरकारें देश हित से अधिक अपनी व्यक्तिगत हितों व दलीय हितों के पूर्ति के लिए देश का तानाबाना तहस नहस करने वाले तत्वों के कृत्यों पर आंखे मूदे रहती है । इसी कारण आज देश में असम व कश्मीर जैसी समस्यायें  विकराल बन कर देश के अमन शांति के लिए एक प्रकार का ग्रहण लगा देते है।
शेष श्रीकृष्ण कृपा। हरि ओम तत्सत्।
श्री कृष्णाय् नमो। 

Thursday, August 16, 2012


बंगलादेशी घुसपेटियों के संरक्षक बन कर देश में अशांति फेलाने वाले सांसद व नेताओं पर कड़ी कार्यवाही करे सरकार 


असम में बंगलादेशी घुसपेटियों को अंध समर्थन देने के कारण उपजी हिंसा का विरोध करने के बजाय  जिन सांसदों व नेताओं ने समाज में तनाव फैलाने वाली धार्मिक टिप्पणियां या बयान दिये उनके खिलाफ सरकार अभी तक कार्यवाही क्यों नहीं कर रही है? जिन नेताओं ने बंगलादेशी आतंकी घुसपेटियों को देश में शर्मनाक संरक्षण दे रखा है उनके खिलाफ कार्यवाही के साथ पूर्वाेत्तर के छात्रों व कामगारों को पूरे देश में सुरक्षा देने के लिए देश के तमाम राजनैतिक दलों व प्रबुद्ध जनता को आगे आना चाहिए। मनमोहन सरकार इसको दलगत राजनीति से उपर उठ कर राष्ट्र रक्षा के लिए अपने दायित्व के रूप में कार्य करे। जनता भी तमाम प्रकार की अफवाहों को न तो फैलाये व नहीं उस पर कहीं ध्यान दें। पूर्वोत्तर के लोगों को भी इस बात का भरोसा रखना चाहिए कि पूरा राष्ट्र उनके साथ है उनको किसी प्रकार से इन अफवाहों से घबरा कर पूर्वोत्तर की तरफ कूच नहीं करना चाहिए। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह व सप्रंग प्रमुख सोनिया गांधी को उन बंगलादेशी घुसपेटियों के संरक्षक बन कर देश में अशांति फेलाने वाले सांसद व नेताओं पर कड़ी कार्यवाही करनी चाहिए जिससे पूर्वोत्तर के भारतीयों को सुरक्षा का विश्वास लोट सके।

Tuesday, August 14, 2012


मेरी बर्बादी का जश्न

(भारत माता की भारत पाक के सत्तांधों से करूण फरियाद)


कितने ना समझ हो तुम..
कितनी खुशी से कह रहे हो मुझसे
आओ! जश्ने आजादी का मनाओ।।

तुम्हें याद हो या न हो.......
क्योंकि तुम तो डूबे रहते हो सत्तामद में,
इसी दिन मेरे जिस्म के टुकडे किये थे तुमने,
मेरी संतानों का कत्ले आम कराया था तुमने,
मैं तड़फ रही थी, मैं बिलख रही थी,
पर तुम और तुम्हारे साथी,
जश्न मना रहे थे।।

गुलामी में मैं जिंदा तो थी...
इसी आश में..,
कि कभी तो मैं भी आजाद हॅूगी,
परन्तु आजाद होने से पहले ही
मुझे कत्ल किया तुमने ।
आज में जिंदा लांश हॅू और
मेरे जख्म नासूर बन गये।
मेरी जुबान पर लगा दिया 
तुमने फिर अंग्रेजी का ताला।
और तो और तुमने तो 
मेरा नाम ही मिटा दिया।।

अब तो मेरी इस हालत पर तो तरस खाओं
मेरे नाम से मेरी बर्बादी के दिन पर 
मेरे बेटो जश्न तो न मनाओ।
पर तुम क्या जानो माॅं की ममता का दर्द!
तुम्हें तो सत्ता चाहिए केवल सत्ता
चाहे इसके लिए खून की दरिया क्यों न बहे।।

-देवसिंह रावत
(एक दशक पूर्व लिखी अपनी इस कविता को आज फिर भारत माॅं के चरणों में सादर समर्पित कर रहा हॅू।www.rawatdevsingh.blogspot.com)

आखिर कब होगा भारत में आजादी का सूर्याेदय

हम भारतीय विगत 65 सालों से फिरंगियों से मिली स्वतंत्रता को स्वतंत्रता दिवस के रूप में पूरे देश में बहुत ही धूमधाम से मनाते हैं, परन्तु मै छह ं दशकों से आज भी भारत अपनी आजादी के सूर्योदय को देखने के लिए भी तरस रहा है। क्या इसी चंगेजी व भारतीय अस्मिता को मिटाने वाले राज को आजादी कहते है? क्या आम जनता को लुटने वालों को गणतंत्र के सेवक कहते है? क्या देश को गुलामी से बदतर गुलाम बनाने वाले तंत्र को गणतंत्र कहते है? मेरा भारत आजादी के छह दशक बाद भी आज अपनी आजादी को तरस रहा है। आजादी के नाम पर पिफरंगी नाम इंडिया व पिफरंगियों की जुबान अंग्रेजी तथा देश को जी भर कर लुटने की पिफरंगी प्रवृति के अलावा इस देश को क्या मिला? आज भारत को न तो विश्व में कोई उसके नाम से पहचानता है व नहीं उसकी जुबान से। आज भी भारतीय पहचान व सम्मान को उसी बदनुमा पिफरंगी गुलामी के कलंक के नाम से जाना जा रहा है। आजादी के छह दशक बाद हमारी स्वतंत्राता के समय ही अपना सपफर नये ढ़ग से शुरू करने वाले इस्राइल, चीन व जापान आज विश्व की महाशक्तियां बन गयी है। परन्तु हम कहां खड़े हैं गुलामी के कलंक को ढोने को ही अपनी प्रगति समझ कर इतरा रहे हैं? आजादी के नाम पर यह कैसा विश्वासघात मेरे देश के साथ? अगर आज देश की शर्मनाक स्थिति को अमर शहीद सुभाषचन्द्र बोस, चन्द्र शेखर आजाद, भगतसिंह, वीर सवारकर, महात्मा गांध्ी देख रहे होते तो उनकी आत्मा भी खून के आंसू बहाने के लिए विवश होती? देश को दिया क्या यहां के हुक्मरानों ने? देश को अमेरिका, चीन, पाकिस्तान के षडयंत्रकारियों के लिए आखेड़ का मैदान बना दिया है। आज चीन व अमेरिका अपने प्यादे पाकिस्तान, बंगलादेश व नेपाल के द्वारा हमारी गैरत को रौंद रहे है? परन्तु देश के हुक्मरान कहां सोये है? उसी समय कुछ खबरों ने मुझे और बैचेन कर दिया। पूरे देश में मंहगाई से त्राही-त्राही मची हुई है परन्तु देश के हुक्मरान नीरो बन कर भारतीय स्वाभिमान को कलंकित करने वाले राष्ट्रमण्डलीय खेल की तैयारियों में ही जुटे थे । उनको मंहगाई से त्रस्त जनता की वेदना कहीं दूर तक भी नहीं सुनाई दे रहा है। देश में सरकार व विपक्ष नाम की कोई चीज ही नहीं रह गयी है। जनता मंहगाई, भ्रष्टाचार से त्रास्त है।
भ्रष्टाचार के आरोपों से बदरंग हुए देश की एक उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाध्ीश को बचाने के लिए जातिवाद की दुहाई दी जा रही है। देश के वरिष्ठ राजनेता के कृत्यों ने न केवल राज्यपाल की गरीमा को ध्ूल में मिटा कर बहुत ही निर्लज्जता से अपने आप को बेकसुर बता रहा है। हमारी संसद में सत्तारूढ़ दल का एक वरिष्ठ सांसद की नागरिकता पर देश की सर्वोच्च जांच ऐजेन्सी सीबीआई ही प्रश्न उठा रही है? देश के सबसे बड़े राज्य उप्र की विधानसभा के एक सम्मानित विधयक का घर चोरी की गाडियों को छुपाने का अड्डा निकला? विधयक पर पुलिस वाहन चोरी का सतराज होने का आरोप लगा रही है? हमारे नौकरशाहों के पास ही नहीं हमारे सेना के कई वरिष्ठ अध्किारी, इंजीनियर व चिकित्सकों के पास भी भ्रष्टाचार से सन्ना अकूत सम्पदा का भण्डार बना हुआ है। देश के अध्किांश मंत्राी ही नहीं संतरी अपने निहित स्वार्थो में लिप्त रह कर भारतीय हितों को दाव पर लगाने का आत्मघाति कृत्य भी कर रहे है। यही नहीं देश के करोड़ों बच्चों को न तो समुचित शिक्षा, चिकित्सा, सम्मान तथा न तो न्याय ही मिल रहा है? देशद्रोहियों को न्यायालय द्वारा मौत की सजा सुना देने के बाबजूद देश के हुक्मरानों का हाथ इतना कमजोर है कि वे निशाचरों को सजा नहीं दे पा रहे है। यह सब देख सुनने के बाद एक ही सवाल उठता है कि हमारा देश वास्तव में स्वतंत्र हैं या देश में हकीकत में गणतंत्र है?
े परन्तु उपरोक्त कविता की पंक्तियों मेरे जेहन में दशकों से रह रह कर सर उठा कर मुझे बेचैन करती है। कहां है भारतीय गणतंत्र? यह सवाल मुझें काफी कचोटता है। मैं अपने आप से सवाल पूछता हॅू कि यह गणतंत्र किसके लिए है? मैने अपनी जिन्दगी के 48 सालों में जो देखा व समझा तथा जाना उससे एक ही बात मुझे समझ में आयी कि यह भारतीय गणतंत्र नहीं हे? इसके लिए कौन जिम्मेदार...... और कोई नहीं हम सब है। इसी आक्रोश को प्रकट करने के लिए मेने 21 अप्रेल 1989 को संसद की दर्शक दीर्घा से देश के हुक्मरानों को ध्क्किारा था। परन्तु इसके बीस साल बाद हालत बद से बदतर हो गयी है। संघ के राष्ट्रवाद का नकाब ओढ़े स्वयं सेवक रूपि कालनेमी वाजपेयी व आडवाणी जैसेद्ध जब राजग के कार्यकाल में इंडिया राइजिंग व साइनिंग का तोता रटन लगाने लगे तो देश भोंचंक्का व ठगा सा रह गया। कांग्रेस ने तो लगता है भारतीय स्वाभिमान को गांधी जी के सपनों के भारत के साथ राजघाट में दपफना दिया था। लोग कांग्रेस से निराश थे परन्तु जब जनता से संघ के स्वयं सेवको ने राष्ट्रवाद के नाम पर पदलोलुपता व जातिवाद का कलुषित तांडव एनडीए के शासक के रूप में मचाया तो देश की आम जनता की आशाओं पर बज्रपात हुआ। आज दुर्भाग्य यह है कि देश की आम जनता को देश की जुबान में सर्वोच्च न्यायालय में न तो न्याय ही मिल सकता है व नहीं सम्मान। इस देश में आज आम जनता की पंहुच से न्याय, रोजी रोटी, चिकित्सा व शिक्षा सब बाहर हो गयी है। सबकी सब महत्वपूर्ण संस्थानों पर थैलीशाहों चंगेजों का बर्चस्व हो गया है। कौन दिलायेगा भारतीय जन को उसका अपना गणतंत्रा? हम सब उस दीमक के समान हो गये हैं जो जिस पेड़ पर निवास करता है उसी को खोखला करने में लगा रहता है? युगान्तकारी तत्वदर्शी व आजादी के परम सिद्वहस्त संत काला बाबा सच ही कहते थे कि देवी इस देश में अब विद्या व्यापार, सत्ता व्यापार व धर्म व्यापार में तब्दील हो गया है। आज अटल व मनमोहन सिंह की सरकारों की घोर पदलोलुपता के कारण देश अमेरिका का अघोषित उपनिवेश पाकिस्तान की तरह बन गया है। मनमोहन जैसे प्रधनमंत्राी के कुशासन में देश की आम जनता का मंहगाई, आतंकबाद व भ्रष्टाचार के कारण जीना दूश्वार हो रखा है। देश में लोकशाही की हालत इतनी शर्मनाक है कि संसद की चैखट राष्ट्रीय धरना स्थल जंतर मंतर पर देश भक्तों को देश हित में 12 घंटे लगातार भी आंदोलन करने की इजाजत यहां की लोकशाही की दंभ भरने वाली सरकार नहीं दे रही है। देश हित की बात करने वाले बाबा राम देव व अण्णा हजारे को प्रताडित व दमन करने में यहां की सरकार जरा सी भी शर्म महसूस नह ीं कर रही है।
यहां आजादी तो गुलामी से बदतर हो गयी है? कैसे मिलेगी देश की आजादी को इन चंगेजो के शिकंजे से मुक्ति? क्या आज भारत में साठ प्रतिशत लोग जो गरीबी की रेखा से नीचे जीवन बसर करने के लिए विवश है उनके लिए इस देश की आजादी का क्या अर्थ रह गया है? देश की सुरक्षा पूरी तरह से जहां विदेश शत्रु से खतरे में पड़ी हुई हैं वहीं इन हुक्मरानों से पूरी तरह लुटी जा रही है। एक नया सवेरा होगा.....विश्वास है भगवान श्री कृष्ण के बचनों पर यदा यदा ही धर्मस्य........। इसी आश में मैं निरंतर इन चंगैजी हुक्मरानों के खिलापफ जन जागरूकता का प्यारा उत्तराखण्ड रूपि शंखनाद कर रहा हॅॅू। शेष श्री कृष्ण कृपा, हरि ओम तत्सत्। श्रीकृष्णाय् नमो।

Monday, August 13, 2012


-जनविरोधी हुक्मरानों व राजनेताओं को बेनकाब करने में सफल रहे बाबा रामदेव


  -महाजनक्रांति के लिए देशव्यापी आंदोलन का शंखनाद करके संसद कूच करते हुए गिरफ्तार हुए बाबा रामदेव के तैवरों से सरकार व पुलिस के छूटे पसीने






गत वर्ष अपने रामलीला मैदान के आंदोलन में सरकारी दमन व अपनी रणनीति की कमियों से सबक ले कर बाबा रामदेव ने 9 अगस्त 2012 से  रामलीला मैदान में ‘ कालेधन को देश में वापस लाने व देश को भ्रष्टाचार मुक्त बना कर फिर से विश्व की महाशक्ति बनाने ’  चलाये जा रहे व्यापक जनांदोलन रूपि सांकेतिक उपहास का सम्मानजनक दिशा देते हुए 13 अगस्त 2012 की सुबह संसद कूच का ऐलान किया। वे संसद की चैखट पर धरना देने के लिए संसद कूच कर रहे है। वहीं दूसरी तरफ दिल्ली पुलिस उनको  जंतर मंतर या संसद तक मार्च करने के  बजाय गिरफतार करने की रणनीति बनायी है। वहीं रामदेव ने भी पहले ही ऐलान कर दिया कि जहां पर भी पुलिस रोकेगी वहीं पर वे गिरफ्तारी देंगे। स्वामी रामदेव इसे सत्ता परिवर्तन का नहीं अपितु व्यवस्था परिवर्तन का महान जनक्रांति रूपि जनांदोलन बता रहे हैं। बाबा रामदेव खुली जीप में सवार हो कर रामलीला मैदान की तरफ अपने समर्थकों के साथ कूच किया। पुलिस ने काली पट्टियां बांध कर मैदान से बाहर निकल कर संसद की तरफ कूच करने के लिए  खुली जीप में निकले बाबा रामदेव व उनके हजारों समर्थकों के साथ निकले। 250 मीटर आगे जा कर  रणजीत सिंह पुल पर पुलिस ने बेरिकेट लगा कर रोक दिया। इसके विरोध में समर्थकों ने रणजीत सिंह पुल पर बैठ कर विरोध धरना दिया और गिरफ्तारी दी। पुलिस ने बसों में भर कर आंदोलनकारियों को अस्थाई जेल भेज कर गिरफ्तार किया। बाबा रामदेव को भी पुलिस ने गिरफ्तार कर दिया। वे वंदे मातरम गाते हुए गिरफ्तार हुए।  बाबा रामदेव को उनके समर्थकों को साथ बवाना स्थित राजीव गांधी स्टेडियम के बजाय रामलीला मैदान के समीप दिल्ली गेट स्थित अम्बेड़कर स्टेडियम में अस्थाई जेल बना कर रखा है। पुलिस ने रात 8 बजे सभी आंदोलनकारियों को रिहा कर दिया, लेकिन बाबा ने समर्थकों के साथ स्टेडियम में ही डटे रहने की घोषणा कर दी।  बाबा के तैवरों से पुलिस प्रशासन ही नहीं सरकार के भी पसीने छूट गये है। बाबा ने अपना अनशन भले ही 14 अगस्त को अम्बेडकर स्टेडियम में अपने ही शर्तों पर तोड़ दिया हो परन्तु रामलीला मैदान से शुरू हुआ उनका अब देश व्यापी जनांदोलन जारी है।
हालांकि जनांदोलन व दमनकारी सरकारों का मर्म न जानने वाली मीडिया व विरोधी  भले ही रामदेव के इस आंदोलन का खाली हाथ समापन मान कर कुप्रचार कर रहे हैं, उनको समझना चाहिए कि आंदोलनकारियों के लिए निरंतर आंदोलन में संघर्ष करते हुए दमनकारी सरकार के आगे समर्पण करने के बजाय जेल जाना सर्वश्रेष्ठ माना जाता है। बाबा रामदेव के आंदोलनकारियों को रोकने के लिए सरकार ने 10 हजार से अधिक पुलिस के जवान रामलीला मैदान व उसके आसपास तैनात करे हुए है। देश के कोने कोने से आये हजारों आंदोलनकारी बाबा के आवाहन पर संसद कूच करने व जेल जाने के लिए तैयार है। बाबा रामदेव ने पहले ही ऐलान कर दिया है कि उनका अनशन अब रामलीला मैदान में नहीं अपितु जेल में टूटेगा। इसके साथ रामलीला मैदान में विजू जनता दल, अकाली दल बादल, आदि दलों ने अपना समर्थन बाबा के आंदोलन को दे दिया है। बाबा रामदेव ने साफ किया कि  कांग्रेस न तो देश में विदेशों मे रखे भारतीय काला धन को ही देश में वापस लेना चाहती है और नहीं देश में व्याप्त भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने के लिए लोकपाल जैसा मजबूत कानून बनाने के लिए भी तैयार नहीं है। उन्होंने देश की राजनैतिक दलों को खासकर सप्रंग सरकार को समर्थन दे रहे दलों को भी कांग्रेस को डूबता हुआ जहाज मानते हुए तुरंत साथ  छोड़ने का अपील की। उन्होंने वीर रस  का क्रांतिकारी गीत ‘समय वो आगया है........’ गा कर समस्त आंदोलनकारियों को देश की रक्षा के लिए आंदोलन में समर्पित होने का ऐलान किया। बाबा रामदेव ने इससे पहले सरकार को आगाह किया कि यह आंदोलन केवल रामलीला मैदान में नहीं अपितु देश के कोने कोने में यह आंदोलन होगा। बाबा रामदेव ने कहा कि उन्होंने देशभर में 11 लाख किमी भ्रमण कर 11 करोड़ लोगों को देश में व्याप्त भ्रष्टाचार के खिलाफ जागृत कर इस आंदोलन को राष्ट्रव्यापी आंदोलन का ऐलान किया है। उन्होंने कहा कि सरकार वेंटिलेटर पर बेहोश पड़ी है अब इस भ्रष्ट सरकार की तेरहवीं आज 13 अगस्त को करने के लिए वे तैयार हैं। बाबा रामदेव ने अमेरिका सहित देश विदेश में इस आंदोलन के समर्थन में आंदोलन कर रहे करोड़ों लोगों को बधाई दी।
देश के करोड़ों लोगों को इस बात की खुशी हुई कि बाबा रामदेव ने अपने आंदोलन को सही दिशा देते हुए पूरे जोशों खरोख के साथ जेल जाने का आवाहन करके न केवल अपनी गत वर्ष रामलीला मैदान में हुई भूल को सुधारते हुए इस बार संसद कूच व जेल तक जाने का ऐलान करके प्रेरणादायक कार्य किया।
वहीं इसी पखवाडे बलिदान देने के नाम पर चलाये गये अण्णा हजारे की टीम का आंदोलन के राजनैतिक दल बनाने के ऐलान के साथ अनशन समापन को लोगों ने कायरपन का प्रतीक मान कर आंदोलन का अपमान मान रहे है और इस आंदोलन में भ्रष्टाचार से देश को मुक्त करने के लिए जुडे देश के लाखों लोग निराश है । ऐसे निराश लोगों के लिए भी बाबा के आंदोलनकारी तैवर एक प्रकार से आशा के सूर्य से कम नही । वहीं बाबा रामदेव ने स्पष्ट किया कि हम किसी प्रकार की ंिहंसा नहीं कर करेंगे हाॅं विरोधी राजनैतिक पार्टी के कुछ आसामाजिक तत्व उनके आंदोलन को बदनाम करने के लिए कोई भी हथकण्डा अपना सकते है। उन्होंने कहा कि एक बाबा रामदेव को मार सकते हो परन्तु हजारों रामदेव के द्वारा चलाये गये आंदोलन को सरकार अब नहीं कुचल सकती यह राष्ट्रव्यापी आंदोलन शुरू हो गया है।
संसद कूच से पहले आंदोलनकारियों को संबोधित करते हुए जनता पार्टी के अध्यक्ष सुब्रमण्यम स्वामी ने सीधा आरोप लगाया विदेशों में अधिकांश जो धन जमा है उसमें कांग्रेस का अधिक है। उन्होंने सोनिया गांधी सहित कांग्रेसी नेताओं पर सीधे देश में भ्रष्टाचार के गर्त में धकेलने का आरोप लगाया। उधर बाबा रामदेव के आंदोलन को निपटने के लिए केन्द्रीय गृह सचिव व कैबिनेट सचिव में मंत्रणा हो रही है। पुलिस ने बवाना में राजीव गांधी स्टेडियम में अस्थाई जेल को आंदोलनकारियों को बंद रखने के लिए बना दी है। संसद कूच से पहले भाजपा अध्यक्ष नितिन गडकरी व एनडीए के संयोजक-जद यू के अध्यक्ष शरद यादव , अकाली, तेलगू देशम पार्टी , असम गणसंग्राम परिषद, भाजपा महासचिव विजय गोयल, के रामलीला मैदान में बाबा रामदेव के आंदोलन को समर्थन देने पंहुचे। मंचासीन लोगों ने पुलिस द्वारा संसद कूच करने की इजाजत न दिये जाने के खिलाफ काली पट्टी बांध कर विरोध प्रकट किया। राजग संयोजक शरद यादव ने देश की जनता को जागृत करने में जो ऐतिहासिक योगदान दिया। उन्होंने दो टूक शब्दों में कहा कि इस देश को 1 प्रतिशत फिॅरंगी जुबान अंग्रेजी बोलने वाले लूट रहे है । देश को गुलाम बना रखा है। देश की भाषाओं को अपमान व तिरस्कार किया जा रहा है। उन्होने कहा देश के इन बेइमानों ने देश की हड्डियां तक भ्रष्ट कर दी है। खून तो साफ किया जा सकता हे पर हड्डियों को साफ नहीं किया जा सकता है। दिल्ली से गांव तक गुलाम बना दिया है। उन्होंने कहा मु्िठ्ठ भर भ्रष्ट लोगों ने देश के शासन प्रशासन पर काबिज हो रखा है। सभा को संबोधित करते हुए देश में व्याप्त भ्रष्टाचार के लिए कांग्रेस को जिम्मेदार ठहराते हुए आरोप लगाया कि वह सीबीआई का दुरप्रयोग करके अपनी डगमगाती सत्ता को बचाने के लिए कर रही है। उन्होंने रामदेव के आंदोलन को दबाने के लिए की रही दमनकारी रवैये का भारी विरोध किया। उन्होंने कहा कि रामदेव के आंदोलन के कारण ही सीबीआई ने उनके सहयोगी बालकृष्ण को गिरफ्तार किया हुआ है।  इसके साथ ही बाबा रामदेव ने आंदोलनकारियों ने संसद कूच करने का ऐलान किया। वहीं रामदेव के आंदोलन पर केन्द्रीय सरकार के मंत्रीमण्डल की बैठक हुई शायद उसके बाद बाबा रामदेव प्रकरण में सरकार ने सावधानी बरतते हुए दमनकारी कार्यवाही के बजाय संयमित ढं़ग से रामदेव व उनके समर्थकों को गिरफतार किया। बाबा रामदेव  ने भी विगत वर्ष के प्रकरण से सीख लेते हुए पुलिस से किसी भी प्रकार के टकराव से दूर रहने का समझदारीपूर्ण निर्णय लिया, इसका पूरे देश के लोगों ने उनके आंदोलन की मुक्त कंठों से सराहना की।

Saturday, August 11, 2012


देशद्रोहियों के  जघन्य कृत्यों पर भी मौन रखना देशद्रोह है

क्यों नपुंसकों की तरह मूक बनी हुए है सरकार, बुद्धिजीवी, पत्रकार व  कथित धर्मनरिपेक्षवादी समाजसेवी

एक तरफ असम में बंगलादेशी घुसपेटिये आतंकियों ने देश में छुपे हुए अपने आस्तीन के सांप संरक्षकों की शह पर असम के बडे भू भाग पर कब्जा करने के बाद भारतीयों का नरसंहार करके देश की एकता अखण्डता को रौंद रहे हैं, दूसरी तरफ उनके कृत्यों को जायज ठहराने के लिए धर्म के नाम पर उनको खुला समर्थन देने के लिए मुम्बई में शनिवार 11 अगस्त को हिंसा का तांडव मचाने का दुशाहस किया गया, उस पर देश की सरकार, मुम्बई की सरकार, मीडिया, बुद्धिजीवी व तथाकथित धर्मनिरपेक्षवादी समाजसेवी क्यों दोषियों के कृत्यों पर नपुंसकों की तरह मूक बने हुए है।
इनकी मूकता के कारण दिल्ली में सुभाष मैदान में न्यायालय के आदेशों की खुले आम अवेहलना करके बनाया जा रहा विवादस्थ ढांचा बनाने का दुशाहस कट्टरपंथियों ने की। परन्तु क्या मजाल की पुलिस, प्रशासन, राजनेता, पत्रकार व धर्मनिरपेक्षता का लबादा ओड़ने वाल समाजसेवियों ने उफ तक की हो।
देश में जनभावनाओं  को रौंदने की इजाजत व देश की संस्कृति, मान्यताओं, आराध्य का अपमान करने की इजाजत किसी को नहीं है। देश की आस्थाओं व संविधान को रौंदने की इजाजत किसी को नहीं है। जिन संस्थाओं पर देश की कानून व्यवस्था व संविधान का  पालन कराने की जिम्मेदारी है वे अगर इनके उलंघन व सरेआम अपमान होने पर शर्मनाक मूक रहेगे तो यह देश के साथ इनका घोर विश्वासघात ही होगा। आज जरूरत है देश की पुलिस प्रशासन बंगलादेश के आतंकी घुसपेटियों, उनके संरक्षकों, मुम्बई में हिंसक तांडव मचाने वाले असामाजिक तत्वों व दिल्ली के सुभाष मैदान में देश के कानून को ठेंगा दिखा कर जबरन शांति भंग करने वालों पर कड़ी कार्यवाही करने की। देश में लोकशाही व मजबूत व्यवस्था को जीवंत रखने के लिए देशद्रोही व आतंकी गतिविधियों पर अंकुश लगाना जरूरी है। आज सरकार के शर्मनाक मौन के कारण देश में देशद्रोही ताकतें व उनको शह देने वाले आस्तीन के सांप बने सत्ता के सौंदागरों की शह से देश में देशद्रोही सरेआम देश की एकता व अखण्डता को चुनौती देने की हिम्मत कर रहे है।

जनहितों व जनांदोलनों को जानबुझ कर उपेक्षा करने वाली सरकार होती है लोकतंत्र की दुश्मन 




अण्णा व रामदेव के नेतृत्व में चले शांतिपूर्ण आंदोलन की उपेक्षा से व्मनमोहनी सरकार ही नहीं व्यवस्था के खिलाफ लोगों में भड़का असंतोष


जिस शर्मनाक ढ़ग से द
ेश की वर्तमान मनमोहनी सरकार अण्णा व बाबा रामदेव के नेतृत्व में देश को भ्रष्टाचार मुक्त व देश को मजबूत बनाने के लिए लिए चलाये गये राष्ट्रवादी शांतिपूर्ण जनांदोलनों की घोर उपेक्षा कर रही है उससे न केवल लोगों का मनमोहनी कांग्रेस सरकार के खिलाफ आक्रोश भड़क रहा है अपितु देश की वर्तमान व्यवस्था से भी मोह भंग हो रहा है। यह देश में लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए सबसे खतरनाक संकेत है। देश की जनता हैरान है कि आखिर देश में व्याप्त भ्रष्टाचार से देश की पूरी व्यवस्था मृतप्राय सी हो गयी है, उस पर अंकुश लगाने के लिए ठोस कानून लोकपाल के रूप में बनाने की अण्णा हजारे की मांग को स्वीकार करने में सरकार क्यों कतरा रही है? इसके साथ देश के तमाम भ्रष्टाचारियों ने दशकों से जो भ्रष्टाचार की काली कमायी विदेशी बैंकों में जमा की है उसको देश में वापस लाने के लिए चलाये जा रहे बाबा रामदेव के आंदोलन की मांग मानने में सरकार को क्या परेशानी हो रही है? देश की जनता जानना चाहती है कि देश की सरकार व राजनेता क्यों देशहित की इन मांगों को स्वीकार नहीं कर रहे है? आखिर देश की सरकारें व राजनेता किसके हितो ंकी पूर्ति के लिए ये जनांदोलनों की उपेक्षा कर रहे हैं।
एक तरफ सरकार जहां जनहितों के लिए चल रहे शांतिपूर्ण आंदोलनों की या तो उपेक्षा कर रही है या उनको निरंकुशता से कुचल रही है वहीं दूसरी तरफ सरकार असम में बंगलादेशी घुसपेटियों के कारण विकराल हुई समस्या के स्थाई निदान के बजाय उसे सामान्य जातीय हिंसा या विवाद मान कर उस पर पर्दा डालने की आत्मघाती भूल करके देश के हितों पर कुठाराघात कर रही है। कश्मीर में देश के संविधान, झण्डा व भारत विरोध नारे लगा कर अर्ध सैनिक व सैनिक बलों पर हमला करने वाले पाकिस्तानी झण्डा फहराने वालों के आगे सरकार गूंगी बहरी बनी रहती है। देश में कानून व लोकशाही पर विश्वास करने वाले हैरान है कि क्यों दिल्ली सरकार व पुलिस सुभाष पार्क में न्यायालय के आदेशों की घोर अनदेखी कर कुछ मुसलिम कट्टपंथियों को वहां पर विवादस्थ ढांचे को जबरन बनाने दे रही है। यही नहीं देश के हुक्मरान देश की संसद पर हमले करने के दोषी को देश की सर्वोच्च न्यायालय द्वारा भी सजा-ए-मोत दिये जाने पर भी वर्षो से उसको फांसी देने के बजाय बहाने वना कर टाल रही है।
देश मे ंसत्तासीन कांग्रेसी नेता जहां जनहितों व भ्रष्टाचार के खिलाफ व काले धन को विदेशों से देश में लाने की मांग करने के समर्थन में आंदोलन का नेतृत्व करने वाले बाबा रामदेव व अण्णा हजारे के खिलाफ अनाप शनाप आरोप लगाने के साथ उनके आंदोलनों को कमजोर करने के लिए तमाम षडयंत्र कर रहे हैं, वहीं विपक्ष भी ईमानदारी से अपने राष्ट्रीय दायित्व का निर्वहन करते हुए इस आंदोलन का समर्थन करने के बजाय इन आंदोलनों को कमजोर करने का इंतजार कर रहे हैं।
सरकार व विपक्ष की इस राष्ट्रीय हितों पर शर्मनाक मौन के कारण आज देश की आम जनता का मोह देश की वर्तमान व्यवस्था से भंग हो रहा है। संसार में भारत ही एकमात्र ऐसा अभागा देश हे जहां राष्ट्रहित व कानून का सम्मान करने वाले शांतिपूर्ण आंदोलनकारियों को रौंदा जाता है और देशहितों व कानून को रौंदने वालों के सामने सरकार नतमस्तक है। अमेरिका सहित तमाम देशों में देश हितों को रौंदने वालों को दण्डित किया जाता है परन्तु भारत में उल्टी गंगा ही बहायी जा रही है। यह मात्र कुर्सी के लिए देश के राजनेता कर रहे है। इनको इस बात का अहसास होना चाहिए कि देश में जब तक राष्ट्रवादी मजबूत रहेंगे तभी देश में लोकशाही व मानवता जीवंत रहेगी। अगर देश में शांतिपूर्ण आंदोलनों की उपेक्षा होगी तो देश में लोकतंत्र कहां जीवंत रहेगा। इसके लिए जिम्मेदार अगर कोई हैं तो सरकार सहित तमाम राजनेतिक दल है। अगर सरकारों की ऐसी ही प्रवृति रही तो देश में राष्ट्रद्रोही तत्व, अलगाववादी तत्व व नक्सलियों के शिंकजे में जकड़ जायेगी और लोकशाही इस देश में दम तोड़ती नजर आयेगी।
 

जनहितों को रौंदने वाले कंस व दुशासनों को हर हाल में स्वयं दण्डित करता है महाकाल 

अण्णा व रामदेव आंदोलनों के हस्र से निराश न हो अपितु इन जनांदोलनों में खुल कर भाग लें जनता

‘अण्णा हजारे व बाबा रामदेव के नेतृत्व मे अलग अलग ढ़ग से ंचल रहे भ्
रष्टाचार के खिलाफ देश व्यापी जनांदोलन को निरंकुश व अलोकतांत्रिक ढंग से देश की सरकार व राजनैतिक दलों द्वारा शर्मनाक उपेक्षा को अपनी जीत मान कर अहंकार में उपहास उडाने वाले देश के हुक्मरानों व उनके प्यादों को एक बात गांठ बांध लेनी चाहिए कि उनके कुशासन की लंका का हर हाल में ढहेगी और उन सभी दुशासन रूपि कंशों व रावणों को उनके जनविरोधी कुशासन का दण्ड महाकाल स्वरूप भगवान श्री कृष्ण स्वयं देंगे।’ इसके साथ देश की भ्रष्टाचारी मनमोहनी कुशासन व भ्रष्टाचार को बनाये रखने में अपना राजनैतिक धर्म ईमानदारी से नहीं निभाने वाले राजनैतिक दलो सहित पूरी व्यवस्था से त्रस्त देश की जनता को देश में चल रहे भ्रष्टाचार के खिलाफ जनांदोलनों के हस्र को देख कर निराश नहीं होना चाहिए। क्योंकि दुनिया की अदालतें भले ही इन गुनाहगारों को कटघरे में खड़ा करने में असहाय रहे परन्तु महाकाल किसी भी शोषक को माफ नहीं करता।’
यह विचार मेरे मन में उस समय बिजली की तरह क्रोंधे जब मैं भगवान श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के दिन सांयकाल दिल्ली के रामलीला मैदान में बाबा रामदेव के नेतृत्व में 9 अगस्त चलाये जा रहे जनांदोलन में सम्मलित होने गया था। भले ही बाबा रामदेव व अण्णा हजारे के सारे विचारों व कार्यो से मैं सहमत न होने पर भी देश में व्याप्त कुशासन के खिलाफ उनके नेतृत्व में चलाये जा रहे जनांदोलनों में मैं सदैव भगवान श्री कृष्ण के उस परमादेश को आत्मसात करके भाग लेता हूॅ कि अन्याय के खिलाफ चलने वाले संघर्ष में हर प्राणी को अपना योगदान देना चाहिए। वेसे भी भगवान श्रीकृष्ण का असली भक्त वहीं है जो वर्त, उपवास, जप, तप, पाठ, पूजा में एकांत जीवन अपनी मुक्ति या परमात्मा प्राप्ति के लिए गुजारने के बजाय अन्याय के खिलाफ चल रहे संघर्ष में स्वयं को जोड़ दे। हर पल कुरूक्षेत्र में असत के खिलाफ संघर्ष का सिपाही बने यही भगवान श्रीकृष्ण की सर्वोच्च भक्ति है।
मेरा मानना है कि बाबा रामदेव व अण्णा हजारे या उनकी टीम में लाख बुराईयां क्यों न हो फिर भी वे उन सब बुद्धिजीवियों, राजनेताओं, नौकरशाहों, समाजसेवियों आदि से लाख गुना अधिक श्रेष्ट हैं जो इस अन्याय को जानते हुए भी अपने निहित स्वार्थो के अंध मोह में इन लोकशाही को रोंदने वाले अन्यायी कुशासकों के जुल्मों का मूक समर्थन करते है।
मैं अण्णा हजारे के दिल्ली में चलाये गये जंतर मंतर से लेकर रामलीला मैदान वाले जनांदोलनों तथा रामदेव के दिल्ली में चलाये गये आंदोलनों में भाग लेने के कारण मै इस बात का साक्षी रहा हॅू कि वर्तमान में अण्णा आंदोलन के आत्मघाती समापन के बाद लोगों में घोर निराशा ही नहीं अपितु एक प्रकार से विश्वासघात सा भी महसूस हो रहा है। इसकी स्पष्ट छाप बाबा रामदेव के 9 अगस्त से रामलीला मैदान में चल रहे जनांदोलन में दिखायी दे रहा है। भले ही यहां पर हजारों की संख्या में देश भर के आंदोलनकारी भाग ले रहे हैं परन्तु जो उत्साह व आम जनता का स्वयं स्र्फुत भागेदारी विगत आंदोलनों में देखने को मिल रहा था वह कहीं दूर तक नहीं देखने को मिल रहा हैं। लोगों को ही नहीं मीडिया को भी ऐसा लग रहा है यह सब सरकार की विजय व आंदोलनकारियों की हार है। मुझे फेसबुक पर मेरे देश विदेश के मित्रो ने इस आशय के बारे में जानना चाहा। वे सभी दुखी थे इन आंदोलनों का हस्र देख कर और सत्तासीन दुशासनों की अठ्ठाहसों को सुन कर।
मैने अपने सभी मित्रों को कहा वे निराश न हों, महाकाल का न्याय का अपना अलग ही विधान है। वह निमित बनाता है इस अन्याय से मुक्ति के लिए। उसके तरकस में न जाने अनादिकाल से गांधी, अण्णा या रामदेव से बढ़कर भी जैसे कितने तीर हैं। अण्णा हजारे की टीम व रामदेव का भ्रम व अहंकार भी महाकाल को दूर करना था और सत्तांध राजनेताओं को भी भ्रम में रखना जरूरी हैं। क्योंकि मां बाप अपने गलत राह पर चल रहे अबोध बच्चे को भी सही राह पर चलने को सिखाने के लिए कई बार स्वयं दण्डित करना पड़ता है। टीम अण्णा जो अपनी कई भूलों से भी सीख नहीं ले रही थी, रामदेव भी संगठन व धनादिमद में कई भूले कर गये। इनको भी राह दिखाने का काम स्वयं परमंपिता करता है।
इसलिए देश की जनता को निराश नहीं होना चाहिए। यह देश कोई टीम अण्णा के उदघोष की तरह आजादी की दूसरी लड़ाई नहीं लड़ रहा है अपितु इस देश में अन्याय के खिलाफ अनादिकाल से निरंतर कुरूक्षेत्र का संघर्ष जारी रहता है। इसलिए टीम अण्णा या किसी तथाकथित बुद्धिजीवियों को यह देश 1857 या 1947 का ही नहीं मानना चाहिए कि आजादी की दूसरी या तीसरी जंग है। बाबा रामदेव, अण्णा हजारे व टीम अण्णा सबने अन्याय के खिलाफ आवाज उठा कर अच्छा कार्य किया परन्तु इस मार्ग में अपनी अज्ञानता के कारण कई ऐसी भूलें कर दी जिसके कारण उनको आज का दिन देखना पडा। परन्तु इसके बाबजूद उनका अन्याय के खिलाफ संघर्ष श्रेष्ठ है। देश की सोई हुई जनता को जो जागृत करने का ऐतिहासिक कार्य बाबा रामदेव व अण्णा हजारे के नेतृत्व में चले आंदोलन ने किया उसके लिए उनको शतः शतः नमन्। केजरीवाल व किरण वेदी जैसे आंदोलनकारियों को आत्मनिरीक्षण करना चाहिए देश की जनता को दोनों से काफी आशा है। अपनी भूलों को सुधारें और फिर से अपने अहं को छोड़ कर राष्ट्र रक्षा के लिए अण्णा, बाबा रामदेव सहित तमाम आंदोलनकारी ताकतों को एकजूट करके जनांदोलन छेडें। यही अपनी भूलों को सुधारने का प्रायश्चित होगा।
रही बात देश के सत्तांध मनमोहनसिंह की सरकार व विपक्षी भाजपा आदि दलों को। ये कितनी भी कोशिश करलें, देश का खजाना चाहे गरीबों को मोबाइल फोन देने के नाम पर अपने वोटों के खातिर लुटा दें परन्तु महाकाल उनके किसी भी तिकड़म को सफल नहीं होने देगा। जिस प्रकार राव, अटल, मुलायम , माया व तिवारी आदि को दूध में से मक्खी की तरह दूर पटका है उसी प्रकार से वर्तमान कांग्रेस व भाजपा के मठाधीशों को सत्ताच्युत हर हाल में करेगा। संसार की कोई ताकत 2014 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस व भाजपा को देश की सत्ता में नहीं आसीन कर सकती। मुलायम सिंह पहले ही अपने कृत्यों से सत्ता से दूर हो गये है। इन दोनों दलों व मुलायम को छोड़ कर तीसरे मोर्चे का कोई प्रधानमंत्री बनेगा। परन्तु जो भी बने उसे इस बात का ऐहसास होना चाहिए कि जो महाकाल इन भाजपा व कांग्रेस जैसे मजबूत दलों को सत्ता से बेदखल कर सकता है वह उस जेसे पतवार को कहां पटकेगा। इसलिए इनको जनहित के कार्य करने चाहिए। एक बात देश की जनता को देश के इन सत्तासीन चंगेजों से भयभीत होने की कोई जरूरत नहीं, ये सब अपने ही कुकृत्यों के समान खुद अपनी कब्र खोद चूके है। इनका पतन निश्चित है। महाकाल को इन दुशासनों को हटाने के लिए किसी आंदोलन करने की जरूरत नहीं पड़ती वह इनकी कब्र तैयार करता है इनकी मतिभ्रमित करके। जैसे कांग्रेसी व भाजपाई नेताओं की उसने वर्तमान में कर दी है, ये देश के हितों पर कुठाराघात करते करते खुद अपने ही पांवों पर भी कुल्हाड़ी भी मार रहे हैं। देश के हित में हमें जाति, धर्म, क्षेत्र, नस्ल, स्व और पर से उपर उठ कर केवल न्यायार्थ कार्य करना चाहिए। इसके साथ जहां भी हो सके अन्याय के खिलाफ सत्त संघर्ष करना चाहिए और कुशासन के खिलाफ संघर्ष में सहभागी रहना चाहिए। शेष श्रीकृष्ण कृपा। हरि ओम तत्सत्। श्री कृष्णाय् नमो।
 

Thursday, August 9, 2012


प्रकट भये हरि,  कृष्ण स्वरूपा

प्रकट भये हरि,  कृष्ण स्वरूपा
सकल सृष्टि के भाग्य ही जागे 
कृष्ण कृष्ण हरि जप ले मन मेरे 
अन्याय, असत से जंग कर प्यारे
दया, सत्य को मन में कर धारण
यही कृष्ण भक्ति का मर्म है प्यारे
श्रीकृष्ण कृष्ण हैं हर कण-कण में
तभी मिलेगें यहां मेरे श्रीकृष्ण कृपालु
जब जड़ चेतन को कृष्णमय देखोगे
तभी मिलेगी परम शांति की श्रीगंगा
-देवसिंह रावत
 ( बृहस्पतिवार 9 अगस्त 2012 रात्रि के 11.00 बजे)


-राजधानी गैरसेंण बनाने के लिए 8 अगस्त को शहादत देने वाले महान शहीद बाबा मोहन उत्तराखण्डी की पावन शहादत को शतः शतः नमन्

-गैरसैंण राजधानी न बनाने वाले हुक्मरानों को धिक्कार रही और जनता से निर्णायक संघर्ष के लिए आवाहन कर रही है बाबा की शहादत



बाबा मोहन उत्तराखण्डी की 8 अगस्त 2004 को शहादत आज भी प्रदेश के तमाम हुक्मरानों व राजनेताओं को धिक्कार रही है। वहीं प्रदेश के लोगों को अपने सम्मान व विकास के प्रतीक गैरसेंण राजधानी बनाने के लिए निर्णायक संघर्ष करने के लिए आवाहन कर रही है। आज भी मेरी आंखों में उनकी अंतिम यात्रा में उमडे उत्तराखण्डियों का जनशैलाव का दृश्य बार-बार मुझे उद्देल्लित कर रहा है। भले ही उनकी शहादत के बाद आज 2012 तक भी प्रदेश के हुक्मरानों को गैरसेंण राजधानी बनाने की सुध नहीं है परन्तु उनकी शहादत से हजारों नोजवानों ने 
प्रदेश की राजधानी गैरसेंण बनाने का संकल्प ले लिया है। उनकी शहादत को नमन् करते हुए प्रदेश के आंदोलनकारियों ने शपथ लिया कि हर हाल में प्रदेश की राजधानी गैरसेंण बनाने के लिए अंतिम सांस तक समर्पित रहेंगे। 
2 अक्टूबर 94 को राव मुलायम की अलोकतांत्रिक सरकारों की सह पर जिस पुलिस प्रशासन ने मुजफरनगर स्थित रामपुर तिराहे में उत्तराखण्ड राज्य गठन की मांग के समर्थन में दिल्ली रेली में शांतिपूर्ण ढ़ंग से सम्मलित होने आ रहे उत्तराखण्ड आंदोलनकारियों के साथ भारतीय संविधान व मानवता को शर्मसार करने वाला मुजफ्फरनगर कांड किया उससे व्यथित हो कर बाल दाड़ी न काट कर व भगवा वस्त्र धारण कर अपना जीवन उत्तराखण्ड के लिए पूर्ण रूप से ऐसा समर्पित किया कि लोग उन्हें मोहन सिंह नेगी के बजाय बाबा मोहन उत्तराखण्डी के नाम से पुकारने लगे। उत्तराखण्ड राज्य व अपने क्षेत्र के विकास के लिए समर्पित रहने वाले बाबा मोहन उत्तराखण्डी ने 13 बार अनशन किया। जब उन्होंने देखा कि राज्य गठन के बाबजूद प्रदेश की सत्तासीन भाजपा व कांग्रेस की सरकारें उत्तराखण्ड की जनांकांक्षाओं का सम्मान करते हुए प्रदेश की स्थाई राजधानी गैरसेंण बनाने के बजाय देहरादून में ही थोपने का षडयंत्र कर रही है तो उन्होंने 2जुलाई 2004 से गैरसेंण के समीप बेनीताल -आदिबदरी में आमरण अनशन शुरू किया जिसमें वे आठ अगस्त 2004 को शहीद हो गये। परन्तु तत्कालीन प्रदेश के मुख्यमंत्री नारायणदत्त तिवारी में इतनी नैतिकता नहीं रही कि वे राज्य गठन के इस महान आंदोलनकारी की सुध लेने के लिए उनके आंदोलनस्थल तक जा कर उनकी मांग पूरा करने व उनका जीवन बचाने के लिए अपने संवैधानिक दायित्व का निर्वाह करते। स्वयं बाबा माोहन उत्तराखण्डी ने अपनी इस शहादत के लिए अपने बयानों में अनशन स्थल पर ही तत्कालीन मुख्यमंत्री नारायणदत्त तिवारी को गुनाहगार ठहराया था। 
3 दिसम्बर 1948 में पौड़ी जनपद के एकेश्वर विकासखण्ड के ग्राम बंठोली में मनवर सिंह नेगी व सुलोचना के सपूत के रूप में जन्में बाबा मोहन उत्तराखण्डी ने प्राथमिक शिक्षा प्रावि मौदाड़ी व जूहा सतपुली से मिडिल करने के बाद दुगड्डा इंटर कालेज से 12वीं व आईटीआई श्रीनगर से रेडियो मैकेनिक का डिप्लोमा की शिक्षा ग्रहण की। इसके बाद वे अपने सूबेदार पिता के पद चिन्हों के चल कर 1970 में बंगाल इंजीनियरिंग में लिपिक के रूप में भर्ती हो गये। पांच साल की नौकरी के बाद उनको लगा कि उन्हें अपनी जन्म भूमि की सेवा करनी चाहिए। वे अपने गांव में प्रधान भी रहे। वहां विकास के कई कार्य किये। क्षेत्र में उनके परिवार का अच्छा सम्मान था। उनके दादा ब्रिटिश काल में रेंजर थे । 
वे पृथक राज्य आंदोलन में सक्रिय हो गये। वर्ष 1987 में उक्रांद द्वारा आहुत दिल्ली के रैली में उन्होंने में चढ़बड कर भाग लिया। उन्होंने सतपुली में उन्होंने 200 दिन का बेमियादी धरना दिया। जनवरी 1997 में लैंसडौन के देवीधार में राज्य निर्माण के लिए अनशन, उसके बाद 12 दिन तक सतपुली के सती मन्दिर में अनशन, अगस्त 1998 में दस दिन तक गुमखाल के पास सती मन्दिर में अनशन, नन्दा ढौकी में गैरसैंण को राजधानी बनाने के लिए आंदोलन,पौड़ी बचाओ आंदोलन,गैरसैंण राजधानी के मुद्दे पर 13 दिसम्बर 2003 चैंदकोट में, 2 से 23 अगस्त 2003 तक कनकपुर गढ़ी थराली में अनशन, दो से 21 फरवरी तक कोडियाबगड़ गैरसैंण में अनशन किये उसके बाद उन्होंने अपना अंतिम व शहादती अनशन भी गैरसेंण मुद्दे पर गैरसेंण से सट्टे बेनीताल में 2 जुलाई से 8 अगस्त 2004 तक किया। इसी बीच उनका स्वास्थ बिगडने के पर उनको अनशन में ही कर्णप्रयाग चिकित्सालय ले गये परन्तु इस महान सपूत ने गैरसेंण के लिए अपना बलिदान दे दिया। आज सभी आंदोलनकारियों व जनता को उनकी शहादत से प्रेरणा ले कर प्रदेश के हुक्मरानों पर जबरदस्त दवाब बना कर गैरसेंण राजधानी बनाना ही उनके बलिदान को सार्थक व सच्ची 
श्रद्धांजलि होगी।
 

Monday, August 6, 2012


पलायन नहीं, भ्रष्टाचार के खिलाफ नये सिरे से जनांदोलन का नेतृत्व करे अण्णा 

सरकार नहीं जनता करेगी पथभ्रष्ट हो चूकी देश की राजनीति की सफाई

नया राजनैतिक दल बना कर नहीं अपितु राजनीति की दिशा बदलने से होगा देश में भ्रष्टाचार का खात्मा  

देश की तमाम राजनैतिक दलों की तमाम सरकारों के कुशासन से व्याप्त भ्रष्टाचार, मंहगाई, आतंकवाद से गत डेढ़ दशक से व्यथित देश की जनता को गांधी व जय प्रकाश नारायण के बाद तारनहार बन कर उभरे महान समाजसेवी अण्णा हजारे ने जैसे ही  6 अगस्त को  देश में भ्रष्टाचार के खिलाफ जनलोकपाल कानून बनाने के लिए गत डेढ़ वर्ष से हुए देश व्यापी जनांदोलन का नेतृत्व करने वाली टीम अण्णा को भंग करने का ऐलान करके देश की जनता को गहरा सदमा पंहुचाया। देश को भ्रष्टाचार की गर्त में धकेल रहे तमाम राजनैतिक दलों में अण्णा की इस घोषणा से चारों तरफ खुशी का जश्न झलक रहा है।
देश में भले ही भ्रष्टाचार के प्रतीक विदेशों में जमा काला धन वापस लाने के नाम पर बाबा रामदेव भी आंदोलन कर रहे हैं परन्तु जो विश्वास देश की जनता को अण्णा हजारे के नेतृत्व वाले आंदोलन में रहा वह न तो बाबा रामदेव के आंदोलन में है व नहीं किसी अन्य राजनैतिक दल पर ही आज के दिन है। देश की आम जनता अण्णा हजारे के नेतृत्व में देश को भ्रष्टाचार मुक्त करके आम जनता की आशाओं को साकार करने वाले लोकतंत्र की स्थापना करने के लिए खुद को समर्पित करने के लिए तैयार है। जब से अण्णा हजारे जैसा ईमानदार नेतृत्व देश की आम जनता को मिला सबने जाति, धर्म, क्षेत्र आदि संकीर्णता को छोड़ कर अण्णा हजारे के देशभक्ति
से समर्पित व्यक्तित्व को दिल से स्वीकार कर देश हित में इस जनांदोलन में समर्पित हो गये थे। अब जब इस आंदोलन के निर्णायक समय देश की जनता को अण्णा हजारे के नेतृत्व की जरूरत है उस समय अण्णा हजारे द्वारा इस आंदोलन से मुंह मोड़ना एक प्रकार से जनता की आशाओं पर बज्रपात ही है। अण्णा हजारे को लगता है कि अगर टीम अण्णा के कुछ सदस्य उनके नाम व व्यक्तित्व की आड में अपनी महत्वकांक्षाओं की पूर्ति करने के लिए दुरप्रयोग कर रहे हैं तो अण्णा हजारे को इन सदस्यों को हटा कर नयी टीम का गठन कर जनता की आशाओं को नई दिशा देनी चाहिए। अण्णा हजारे को इस बात को इस बात को नहीं भूलना चाहिए कि देश की आंदोलनकारी अवाम किसी टीम अण्णा के साथ नहीं अपितु साफ छवि व देशभक्त सदचरित्र अण्णा हजारे के साथ है। अण्णा हजारे को चाहिए कि वह या तो रामदेव के आंदोलन का नेतृत्व करे या सीधा युवाओं व समाजसेवियों की टीम बना कर आंदोलन का नेतृत्व करे। परन्तु भगवान श्रीकृष्ण के परमसंदेश गीता के उपासक रहे अण्णा हजारे से इस देश के सवा सौ करोड़ भारतवासी एक ही आशा करते हैं कि वे देश को भ्रष्टाचार, मंहगाई व आतंकवाद रूपि कुशासन से मुक्ति दिलानेे के लिए इस राष्ट्रव्यापी जनांदोलन से किसी भी सूरत में पलायन न करते हुए जनांदोलन का अंतिम सांस तक नेतृत्व करे।
भले ही 6 अगस्त को टीम अण्णा के प्रमुख अण्णा हजारे ने टीम अण्णा के भंग करते हुए ऐलान किया कि वह न तो कोई राजनैतिक दल बनायेंगे व नहीं चुनाव लडेंगे। हालांकि अण्णा हजारे की इस घोषणा के बाद टीम अण्णा के असली नीति निर्धारक अरविन्द केजरीवाल ने कहा कि वे राजनैतिक दल बनाने के लिए नयी कमेटी का गठन अपने साथियों के साथ मिलकर कर रहे हैं। अण्णा हजारे की घोषणा के बाद न केवल जनलोकपाल आंदोलन पर अपितु जंतर मंतर पर देश को राजनैतिक विकल्प देने की घोषणा पर भी एक प्रकार से ग्रहण लग गया है। इस आंदोलन को जो आईना अग्रणी सामाजिक चिंतक योगेन्द्र यादव ने 31 जुलाई को दिखाया था अगर उसी पर टीम अण्णा चलती तो आज उसको ऐसा दिन नहीं देखना पड़ता। हालांकि स्वयं योगेन्द्र यादव भी अपनी 31 जुलाई के ऐतिहासिक घोषणा पर ज्यादा समय तक टीक नहीं पाये और उन्होंने भी 3 अगस्त को अण्णा हजारे की सहमति से अनशन समाप्ति पर देश में वर्तमान राजनीति की विकल्प देने के नाम पर जिस नयी राजनैतिक दल के गठन की घोषणा की गयी, उसके समर्थन में कसीदे पढ़ कर जनता में प्रचलित यह कहावत को चरितार्थ किया कि कुशल उपदेश बहु तेरे। हमारे बुद्धिजीवी अपने उपदेशों पर खुद ही अमल नहीं करते। परन्तु इतना निश्चित है कि देश की वर्तमान हालत का सही समाधान की तरफ खुद योगेन्द्र यादव ने 31 जुलाई को इशारा किया था वह आज भी अपनी जगह शतः प्रतिशतः सही है।
अण्णा के आंदोलन को गांधी के आंदोलन की तरह नैतिक शक्ति का पूंज बताते हुए देश के अग्रणी सामाजिक व राजनैतिक चिंतक योगेन्द्र यादव ने 31 जुलाई को दो टूक शब्दों में टीम अण्णा को देश की पूरी तरह से पथभ्रष्ट हो चूकी राजनीति का अंग बनने (नया राजनैतिक दल बनाने )से आगाह करते हुए कहा कि देश के मुख्यधारा की 25 राजनैतिक दलों के साथ 26 वां बनने से न तो देश का कोई कल्याण होगा व नहीं देश से भ्रष्टाचार पर ही अंकुश लगेगा। भारतीय राजनीति के प्रख्यात विश्लेषक योगेन्द्र यादव ने कहा कि जिस प्रकार गंदगी से नाला बन चूकी नदी की गंदगी को एक दो बाल्टी पानी डालने या निकालने से साफ नहीं होती है, उसकी सफाई के लिए जिस प्रकार बाढ़ की जरूरत होती है, उसी प्रकार अब भ्रष्टाचार से पथभ्रष्ट हो चूकी भारतीय राजनीति का अब यहां पर 25 स्थापित मुख्य धारा की राजनैतिक दलों में एक बढोतरी करके नहीं अपितु इस राजनीति का चरित्र ही बदलना होगा। इसके साथ सरकार के समझ जनलोकपाल बना कर देश में व्याप्त भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने के लिए आमरण अनशन करने वाले अण्णा व टीम अण्णा के प्रमुख सदस्यों सहित उपस्थित आंदोलित जनसमुदाय को दो टूक शब्दों में कहा कि यह सरकार ही नहीं अपितु देश की मुख्यधारा की तमाम सभी दो दर्जन से अधिक पार्टियां इस मांग को कभी पूरा नहीं करेगी। इसलिए टीम अण्णा के रणनीतिकारों को निर्णायक संघर्ष करने के लिए अपने अनशन को त्याग देना चाहिए।
देश के अग्रणी चिंतक योगेन्द्र यादव ने देश की सरकार सहित तमाम दलों को भी जनहितों पर मूक बने रहने की आत्मघाती प्रवृति को धिक्कारते हुए कहा कि भारत में यह सनातन परंपरा रही है कि जब यहां के हुक्मरान जनहितों पर मूक रहते हैं तो यहां की जनता ही इसका समाधान करती है। उन्होंने स्पष्ट किया कि भारत के समक्ष भारत सरकार बहुत छोटी है। भारत का अवाम देश की तमाम राजनैतिक दलों का भ्रष्टाचारी रूप देख चूका है। ये सभी दल देश के किसी न किसी भू भाग में शासन में है। शासन में रहते हुए इन सबका भ्रष्टाचारी मुखोटा अब जनता के समझ पूरी तरह से बेनकाब हो चूका है। उन्होंने कहा कि ये सभी दल खो खो खेल रहे है। इस देश में विकास के लिए शासन के बजाय भ्रष्टाचार के लिए खो खो जैसा निकृष्ठ खेल खेला जा रहा है।
श्री यादव ने अण्णा सहित टीम अण्णा के सदस्यों को भी लोकशाही के प्रति अपने विराट दायित्व के निर्वहन करने के लिए तैयार रहने के लिए आगाह किया। उन्होंने कहा कि एक साल से देश की जनता को अण्णा पर विश्वास जगा है। इसलिए इस विश्वास की रक्षा के लिए अगर टीम अण्णा वर्तमान राजनेताओं की तरह खो खो के खेल में सम्मलित होगी तो देश की जनता उनको कभी माफ नहीं करेगी। उन्होंने साफ कहा कि इन स्थापित 25 मुख्य धारा की पार्टियों मेे 26 वां बन कर देश में भ्रष्टाचार न तो कभी दूर होगा व नहीं देश का राजनैतिक चरित्र ही बदला जा सकता। इसलिए अगर अण्णा हजारे ने इस समय देश का राजनैतिक चरित्र बदलने के लिए मजबूत पहल नहीं की तो देश की जनता कभी माफ नहीं करेगी। श्री यादव ने कहा कि नैतिक शक्ति से सम्पन्न इस आंदोलन के कर्णधारों को अपनी आलोचना को सहज ही स्वीकार करने की क्षमता होनी चाहिए। उन्होने इस आंदोलन में पत्रकारों व अन्य आलोचकों पर किये दुरव्यवहार की कड़ी भत्र्सना करते हुए इसे अलोकशाही प्रवृति बताया।
जिस समय देश के प्रखर चिंतक योगेन्द्र यादव अपने युगान्तर संबोधन करते हुए टीम अण्णा व उनके समर्थकों के समक्ष जोर दे कर कह रहे थे कि आज भी देश का शोभाग्य है कि देश में कलम के सिपाईयों की कलम जनहितों के प्रति समर्पित है, उनकी कलम नहीं बिकी और उनका समाज का सही राह दिखाने में महत्वपूर्ण योगदान है। अपने टीम अण्णा के वर्तमान आंदोलन में तीसरे बार इस मंच से  अपने औजस्वी संबोधन को हजारों लोगों ने ही नहीं देश के राजनेताओं ने भी अपने अपने सुत्रों से इस भाषण को दंतचित हो कर सुना। राजनीति के समीक्षक योगेन्द्र यादव के इस भाषण को इस आंदोलन के कर्णधारों, देश के राजनेताओं व जनता को दिशा व दशा दिखाने वाला आईना बन गया है। देखना है अण्णा हजारे व उनकी टीम जनता की आशाओं के योगेन्द्र यादव द्वारा बताये गयी आशाओं पर कहां तक खरा उतरते है। जिस दो टूक शब्दों में योगेन्द्र यादव ने अनशन से इन राजनेतिक दलों का दिल न पसीजने वाला बताते हुए निर्णायक संघर्ष के लिए अनशन समाप्त करके आंदोलन तेज करने की बात कही , दिन भर बूंदा बांदी के बाबजूद हजारों की संख्या में उपस्थित जनसमुदाय ने ताली बजा कर उसका करतल ध्वनि से स्वागत किया।
अण्णा हजारे को देश की सवा सौ करोड़ जनता की दुर्दशा व अपने संकल्प की रक्षा करते हुए पुन्नः देशव्यापी जनांदोलन का नेतृत्व करना चाहिए। शेष श्री कृष्ण कृपा। हरि ओम तत्सत। श्री कृष्णाय् नमो।