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Saturday, March 31, 2012

कामरेड़ चन्द्रशेखर को सलाम


कामरेड़ चन्द्रशेखर को सलाम
31 मार्च को राष्ट्रीय धरना स्थल जंतर मंतर पर जैसे ही मैं पंहुचा वहां पर सीपीआई माले के बेनर लगे सेकडों आंदोलनकारी दिखे, वे शहीद हुए कामरेड़ चन्द्रशेखर की तस्वीरें हाथों में लिये व कामरेड़ चन्द्रशेखर को लाल सलाम के गगन भेदी नारे लगा रहे थे। एक पल के लिए मेरी आंखों में लोकशाही के लिए शहीद हुए जवाहर लाल नेहरू विश्व विद्यालय के छात्र संघ के पूर्व अध्यक्ष का चेहरा छा गया। कामरेड़ चन्द्र शेखर उत्तराखण्ड राज्य गठन जनांदोलन में 1994 में कई बार आंदोलन को समर्थन देने के लिए अपने साथियों के साथ धरने में आये थे। कई बार उन्होंने अपने क्रांतिकारी विचारों से राज्य गठन जनांदोलन को उद्देलित किया था। उनसे हुई इन मुलाकातों के बाद जब हमने यह खबर सुनी की बिहार में उनकी लोकशाही के दुश्मनों ने गोली मार कर हत्या कर दी तो पूरा देश अपने होनहार नौजवान नेता की हत्या पर स्तब्ध रह गया।
आज भले ही कामरेड़ चन्द्रशेखर हमारे बीच में सदेह न हों परन्तु उनकी पावन स्मृति हमारे मानस पटल पर आज भी जीवंत है। उनकी पावन स्मृति को मेरा शतः शतः प्रणाम।

राम नाम बोले सभी, पर मर्म न समझे सब कोय
राम नाम सत्य, न्याय का राम नाम पथ त्याग का
राम नाम की आड़ ले जो भी करे जग में पापाचार
उनको दण्डित स्वयं करे राम भक्त वीर हनुमान
राम नाम हैं प्रेम का, राम नाम करे जग कल्याण
राम नाम परम तारक है आत्मसात करों हरि नाम।
राम नाम परमब्रह्म है,  राम परम मुक्ति का है द्वार।
हर पल जपते रहो, पावन श्री राम कृष्ण हरि नाम।।
        -देवसिंह रावत
(प्रातः9 बजे, पहली अप्रेल 2012 रामनवमी के पावन पर्व पर)

आप सभी को भगवान राम के पावन प्रकटोत्सव
रामनवमी की हार्दिक शुभकामनाएॅ

प्रभु के हो तुम,

प्रभु के हो तुम,
प्रभु के हो तुम,
ना बनो किसी और के आदमी।।
ना किसी दल के, ना किसी बल के
बनो ना मोहरे तुम किसी के स्वार्थ के।।
सत्य, न्याय के लिए रहो समर्पित
दो दिन के सफर के तुम हो राही।।
छोड़ो ममत्व, स्वार्थ व संकीर्णता
बनो सदा सतपथ के राही।।
मूक न रहो अन्याय को देख कर
सिपाई ही बनो सदा कुरूक्षेत्र के ।।
हो सबेरा सबके लिए जग में
इसी मार्ग पर जीवन समर्पित करो।।
देश, धर्म व स्वहितों के लिए भी
कभी सत्य-न्याय को गला न घोंटना।।
सवमें प्रभु है जान ले
सबकी खुशी में जीना सदा।।
प्रभु के हो तुम
ना बनो और किसी के आदमी।।
-देवसिंह रावत(1अप्रेल 2012, प्रातः सवा आठ बजे)
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Thursday, March 29, 2012

-कहां गुम हो गयी हरीश रावत व हरक सिंह की हुंकार


-उत्तराखण्ड को  पदलोलुपु नेताओं से नहीं अपितु भगवान बदरीनाथ से मिलेगा न्याय/
-कहां गुम हो गयी हरीश रावत व हरक सिंह की हुंकार /
उत्तराखण्ड प्रदेश में कांग्रेस आला कमान द्वारा थोपे गये मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा की सरकार द्वारा  आज 29 मार्च को विश्वास मत में विजय बासिल करने से एक बात साफ हो गयी हैं कि कांग्रेस पार्टी में एक भी ऐसा नेता नहीं रहा जो उत्तराखण्ड की लोकशाही व जनसम्मान के लिए आवाज उठाने की हिम्मत रखता है। सबके सब पदलोलुपु है। प्रदेश गठन के लिए जिन आंदोलनकारियों ने संघर्ष किया था और जिन्होंने इसके गठन की शहादतें दी उनकी आत्मा प्रदेश की लोकशाही के लिए जिस प्रकार का शर्मनाक खिलवाड कांग्रेस व भाजपा के आलाकमानों ने तिवारी, खण्डूडी, निशंक व विजय बहुगुणा जेसे नेताओं को थोपने से रो रही होगी। 12 साल में अब तक के हुक्मरानों ने जिस प्रकार से प्रदेश की जनांकांक्षाओं को रौदने का कार्य किया उससे प्रदेश आज भी गैरसेण राजधानी न बनाये जाने, मुजफरनगर काण्ड के अभियुक्तों को दण्डित न किये जाने, प्रदेश में जनसंख्या पर आधारित विधानसभाई परिसीमन थोपने, तथा प्रदेश में जातिवाद-क्षेत्रवाद व भ्रष्टाचार की गर्त में धकेलने वाला कुशासन से प्रदेश की आशाओं पर एक प्रकार से बज्रपात ही कर दिया है।
आज जिस प्रकार से सोनिया गांधी ने प्रदेश व पार्टी के हितों को नजरांदाज करके विजय बहुगुणा को थोपा था, उस का विरोध में जिस प्रकार से दिग्गज कांग्रेसी नेता हरीश रावत ने न्याय का विगुल बजाया व इसके विरोध में जिस प्रकार से कांग्रेसी नेता हरक सिंह रावत ने हुंकारें भरी थी, वह आज विश्वास मत में न जाने कहां गायब हो गयी। कांग्रेसी आला नेतृत्व ने अपने मोहरे को यहां पर आसीन करने के लिए पहले कांग्रेस के उत्तराखण्डी दिग्गजों को आपस में लडवाया, अब विजय बहुगुणा की सरकार को विश्वास मत हासिल करने के बाद फिर भी एक दूसरे से उलझा कर अपना उल्लू सीधा कर रहे हैं सतपाल महाराज तो पहले ही आला कमान की पसंद के समर्थन में ही उतर चूके थे। उन्हें भी अपने अहं से उपर उठ कर प्रदेश की लोकशाही व सम्मान की रक्षा की बात नजर नहीं आयी।  प्रदेश की जनता जिसने भाजपा के थोपशाही को प्रदेश से उखाड फेकने का काम किया था वह अब कांग्रेस की थोपशाही को ढोने के लिए कहार बन गये अपने इन पद लोलुपु नेताओं हरीश रावत, सतपाल महाराज व हरक सिंह रावत से जरा आश लगाये बैठी थी वह आशा आज इनके कहार बनने से टूट गयी। यशपाल आर्य आदि अन्य नेताओं से विरोध की आश करना भी नाइंसाफी होगी। परन्तु भगवान बदरीनाथ न्याय करता है। देश ने देखा केसे तिवारी, खण्डूडी व निशंक के कुशासन से प्रदेश की रक्षा की गयी, आखिर भगवान जरूर न्याय करते है। गलत काम कोई भी करे भगवान के दरवार में कभी न्याय नहीं होता। कांग्रेस को भाजपा की तरह उत्तराखण्ड की लोकशाही से खिलवाड करने का दण्ड 2014 के लोकसभा चुनाव में देश के सत्ता से बनवास झेल कर चूकाना होगा। सबसे शर्मनाक बात यह है कि प्रदेश में भाजपा की तरह ही कांग्रेस में भी कोई ऐसा नेता नहीं हैं जो अपने संकीर्ण हितों से उपर उठ कर प्रदेश के हितों के लिए इन सत्तांध आलाकमानों के दंभ को ताड़ने के लिए इनको लोकशाही का आईना दिखाने का साहस कर सके। इन पदलोलुपु नेताओं को एक बात का भान रहना चाहिए कि जिस आत्म सम्मान की रक्षा के लिए हमारे पूर्वजों ने शताब्दियों का संघर्ष किया, मुगलों व फिरंगियों का अत्याचार के आगे सर न झुकाते हुए अपने आत्मसम्मान की रक्षा के लिए सत्ता को ठोकर मार कर उत्तराखण्ड की पथरिली वादियों में हर बदहाली में भी जीते रहे, परन्तु आज प्रदेश में लोकशाही के हितों व हक हकूकों की रक्षा के निर्णायक समय पर ये तथाकथित नेता अपने निहित व दलीय छुद्र स्वार्थो में अंधे हो कर अन्याय की पालकी ढोने के लिए कहार बने हुए है। इनको एक बात समझ लेनी चाहिए कि उत्तराखण्ड का समाज आत्मसम्मान की रक्षा के लिए अपना सर्वस्व बलिदान देने वाले राणा प्रताप को तो सर आंखों में रखता हैं परन्तु सत्ता के लिए अपना आत्मसम्मान रौदने वाले मानसिंहों को सदा धिक्कारता है। सबसे हेरानी व शर्मनाक बात यह है कि भाजपा की तरह कांग्रेस में भी एक भी ऐसा नेता नहीं रहा जो जनरल टीपीएस रावत की तरह कांग्रेस व भाजपा के आलाकमानों को लोकशाही का पाठ पढ़ाने के लिए ठुकराने की हिम्मत रखते हुए प्रदेश के हितों की रक्षा के लिए उत्तराखण्ड का ही दल गठित कर सके। जबकि भाजपा व कांग्रेस के तथाकथित बडे नेता धन व जनबल में टीपीएस से कई गुना बडे हैं परन्तु इनमें नैतिक बल व प्रदेश के हितों के लिए आला कमान को ठुकराने का साहस तक नहीं है।

Tuesday, March 27, 2012

सेना में चल रहे भ्रष्टाचार को बेनकाब करने पर सेना प्रमुख को कोटी कोटी नमन्


सेना प्रमुख को कोटी कोटी नमन्
-सेना में चल रहे भ्रष्टाचार को बेनकाब करने पर
नई दिल्ली (प्याउ)। देश में भ्रष्टाचार किस प्रकार से अपनी जडें मजबूती से यहां जमा चूके है। इसका प्रत्यक्ष उदाहरण है देश की सेना के प्रमुख को भी भ्रष्टाचारी घूस का प्रलोभन देने से घबराते नहीं है।  इसका खुलाशा अगर जनरल सिंह स्वयं नहीं करते तो देश को शायद ही इस भयानक स्थिति का पता चलता।
जब स्वयं जनरल सिंह ने इसका खुलाशा किया कि रक्षा सोदा को मंजूर करने के लिए उसको सेना के एक अधिकारी ने ही 14 करोड़ की धूस देने का प्रलोभन दिया तो पूरा देश सन्न रह गया। उन्होंने बताया कि उन्होंने इसकी शिकायत देश के रक्षा मंत्री से लेकर रक्षा मंत्रालय से कर दी थी। परन्तु देाषियों पर कहीं कोई कार्यवाही नहीं हुई। जब जनरल सिंह ने इस को सार्वजनिक खुद कर दिया तो पूरे देश में इसकी जबरदस्त प्रतिक्रिया हुई। सरकार सकते में आ गयी। संसद के दोनों सदनों में कोहराम मच गया। अन्ततः रक्षा मंत्री ने इस काण्ड की सीबीआई द्वारा जांच करने की घोषणा की। सेना प्रमुख ने बताया कि उस व्यक्ति ने कहा कि यह यहां का दस्तूर है। पहले भी धुस सब लेते रहे व उनके बाद भी लेते रहेगे। देश को इस रहस्य से अवगत कराने के लिए जांबाज सेना प्रमुख जनरल सिंह का कोट कोटी नमन्। कम से कम उनके इस साहस व देश भक्तिपूर्ण काम से देश की सेनाओं में व्याप्त रिश्वत खोरी पर गलाम लगेगी। देश की सुरक्षा से हो रहे खिलवाड पर अंकुश लगेगा।
देश के ईमानदार अधिकारियो को भी किस प्रकार  नौकरशाह परेशान करते हैं इसका सबसे शर्मनाक उदाहरण है देश के सेना प्रमुख जनरल वी के सिंह को कदम कदम पर रक्षा मंत्रालय के नौकरशाहों द्वारा अपमानित करना। उम्र के विवाद के बाद लगता था कि जनरल से अब कोई विवाद रक्षा मंत्रालय का नहीं होगा। परन्तु जिस प्रकार से असम रायफल्स व उसके बाद जनरल सिंह द्वारा उनको घूस देने की कोशिश करके अपमानित करने का खुलाशा किया तो पूरा देश स्तब्ध ही रह गया।  जनरल सिंह द्वारा नौकरशाही द्वारा किये जाने वाले अपमानजनक व्यवहार को उजागर करने के बाद पूरे देश में नौकरशाही की कड़ी भत्र्सना की जा रही है।  एक विवाद असम रायफल्स का नए महानिदेशक की तैनातगी को ले कर छिड़ गया है। वहीं सेना प्रमुख को रिश्वत देने की घटना इससे पूरा देश स्तब्ध है।
वही दूसरी तरफ असम राइफल्स गृह मंत्रालय के तहत आता है। सुत्रों के अनुसार मंत्रालय ने गृह मंत्रालय से कहा कि वह सेना प्रमुख के प्रस्ताव पर विचार नहीं करे क्योंकि इसमें उसकी अथवा किसी अन्य किसी सक्षम संस्था की अनुमति नहीं ली गई है। रक्षा मंत्रालय ने अब सेना से कहा है कि वह नियुक्ति के लिए अधिकारियों के नाम के नए पैनल का प्रस्ताव रखे, लेकिन इस संबंध में उसकी ओर से भेजे गए पत्र का कोई जवाब नहीं आया है। इससे पहले सेना ने लेफ्टिनेंट जनरल चैधरी और लेफ्टिनेंट जनरल जेपी नेहरा सहित तीन अधिकारियों का पैनल नामांकित किया था। आधिकारिक सूत्रों का कहना है कि यह बड़ी असमान्य बात है कि सेना प्रमुख रक्षा मंत्रालय को दरकिनार करके सीधे गृह मंत्रालय से संपर्क कर रहे हैं क्योंकि सामान्य तौर पर ऐसे प्रस्तावों का अनुमोदन पहले रक्षा मंत्रालय करता है और फिर इन्हें आगे भेजा जाता है।

-कुर्सी के लिए देश को तबाह करने से बाज आये हुक्मरान


-कुर्सी के लिए देश को तबाह  करने से बाज आये हुक्मरान/
-पंजाब को फिर आतंकबाद की गर्त में धकेलने का षडयंत्र/

 देश की हालत बहुत ही बद से बदतर हो रही है। एक तरफ संसद हमले के दोषी अफजल गुरू को फांसी देने में केन्ट्र सरकार के हाथ कांप रहे है। केन्द्र सरकार को भय है इससे मुस्लिम समाज नाराज हो जायेगा। बादल के नेतृत्व में अकाली सिखों को लुभाने के लिए बेअंत के हत्यारे को माफी का आंदोलन चला रहे है। वहीं तमिलनाडू में राजीव गांधी की हत्यारों को माफ करने की मांग रह रह कर उठ रही है। फिर भारत की रक्षा का दायित्व क्या अमेरिका पूरा करेगा? आज देशवासियों को यह सवाल मनमोहन सिंह, बादल व अब्दुला से पूछना चाहिए? यही सवाल भाजपा सहित हर दल के प्रमुख से पुछना चाहिए। कांग्रेस में जिस प्रकार से बटाला प्रकरण को राजनैतिक लाभ के लिए हवा देने का शर्मनाक कृत्य समय समय पर किया जाता है। भाजपा जिस प्रकार से पंजाब के आतंकवादियों को सम्मानित करने के प्रकरण पर मूकता रखती है, जिस प्रकार से जम्मू कश्मीर सरकार संसद हमले के दोषी अफजल को फांसी देने का विरोध करती, उससे साफ हो गया कि इन सभी राजनैतिक दलों को केवल कुर्सी की चिंता है देश की अखण्डता व एकता की कोई चिंता नहीं है। लालू, पासवान, मुलायम, माया आदि नेताओं से देश के हितों की सुरक्षा के लिए राजनीति करने की आश करना भी एक प्रकार बेईमानी ही होगी। आखिर देश के लिए राजनीति ये दल कब करेंगे।
जिस प्रकार से अकाली दल की समर्थक धार्मिक संस्था सिरोमणी गुरूद्वारा प्रबंधक समिति व अन्य धार्मिक संस्थाये पंजाब के पूर्व मुख्यमंत्री बेअंत सिंह के हत्यारे की फांसी की सजा को माफ करने के लिए आवाज उठा रही है, धरना प्रदर्शन कर रही हैं। उससे एक बार फिर पंजाब में आतंकवाद को सर उठाने के लिए अवसर मिल जायेगा। जब आतंकी घटनाओं में लिप्त लोगों को यह संदेश मिलेगा कि उनके कृत्यों के बचाव में उनका पूरा समाज व धर्म है तो वे देश के कानून की परवाह क्यों करेंगे। बेअंत सिंह ने अपनी शहादत दे कर भारत की रक्षा की, देश में आतंकवाद को कुचला। उनके हत्यारों को माफ करने की बात करने वालों को उस समय क्यों सांप सुंघ जाता है जब पंजाब में आतंकवाद की आड में हजारों निर्दोष हिन्दुआंें व सिखों को मारने वाले पाकिस्तान के समर्थक आतंकियों को दण्डित करने की बात उठती है। जब से पंजाब में अकाली सरकारें आये तब से आतंक को कुचलने में लगे जांबाज पुलिस अधिकारियों व देश के लिए समर्पित लोगों पर एक प्रकार से कहर ही टूटने लगा है। उनको प्रताडित किया जा रहा है। आतंकियों को सम्मानित करना, उनको शासन प्रशासन द्वारा संरक्षण देना एक प्रकार का देश के खिलाफ खतरनाक षडयंत्र है। इसको किसी जाति, धर्म या प्रदेश से नहीं जोड़ना चाहिए। पंजाब में जिस प्रकार से कांग्रेस व भाजपा ने इस मांग के खिलाफ अपना प्रचण्ड विरोध न किया जाना भी इन दोनों दलों की नपुंसकता का परिचय है। इसीकारण पंजाब में आज कांग्रेस को हाथ में आयी सत्ता भी फिर अकालियों के हाथ चले गयी। जिस प्रकार से पंजाब में तथाकथित खालिस्तानी राष्ट्रपति को विधानसभा में श्रद्धाजलि दी गयी। अनैक आतंकियों को माफी दी गयी, उससे देश की एकता व अखण्डता पर एक प्रकार का बज्रपात ही हुआ।
कांग्रेस का ढुलमुल रवैया व भाजपा का सत्तांध होने के कारण ही बादल को देश के प्रति अपनी जिम्मेदारी का अहसास तक नहीं किया गया। पंजाब में कांग्रेस की इस कायरना स्थिति को भांपते हुए बाबा राम रहीम ने इन चुनाव में कांग्रेस से अपना हाथ उठा दिया। क्योंकि गत विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को समर्थन देने के कारण अलालियों के कोप भाजन का जब शिकार बाबा राम रहीम हुए तो कांग्रेस ने उनका साथ देने के बजाय उनको उनके हाल में छोड दिया था। तब से बाबा को सबक मिल गया था कि भूल कर कांग्रेस का साथ किसी को भी नहीं देना चाहिए।
गौरतलब है कि 12 अक्टूबर, 2010 को पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने कांग्रेस नेता और पंजाब के तत्कालीन मुख्यमंत्री बेअंत सिंह की हत्या के मुख्य आरोपी हवारा के मृत्युदंड को उम्रकैद में तब्दील कर दिया था। इससे पहले आरोपी हवारा, राजोआणा सहित अन्य को निचली अदालत ने 2007 में मौत की सजा सुनाई थी लेकिन हाईकोर्ट ने अन्य आरोपियों के समान राजोआणा की सजा को कम नहीं किया। राजोआणा ने इस हत्याकांड को अकेले अंजाम देने का इकबालिया बयान दिया था। गौरतलब है कि 31 अगस्त, 1995 को हुए तत्कालीन मुख्यमंत्री के हत्याकांड के आरोपी हवारा की सजा कम करते हुए हाईकोर्ट ने कहा था कि उसे तब तक कैद की सजा दी जाती है, जब तक कि उसकी मौत न हो जाए। इसके बाद राजोआणा को छोड़कर अन्य सभी ने निचली अदालत की ओर से दी गई सजा को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी जबकि एजेंसी की ओर से भी हाईकोर्ट के आदेश को चुनौती दी गई थी।
पंजाब के पूर्व मुख्यमंत्री बेअंत सिंह की हत्या के जुर्म में पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट से मौत की सजा मिलने के बाद सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा नहीं खटखटाने वाले आतंकी बलवंत सिंह राजोआणा के मृत्युदंड पर रोक लगाने की मांग को लेकर सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की गई है। सुप्रीम कोर्ट में दायर विशेष अनुमति याचिका में कहा गया है कि जिस फैसले में राजोआणा को फांसी की सजा दी गई है उसी फैसले में मुख्य अपराधी जगतार सिंह हवारा की सजा को आजीवन कारावास में तब्दील किया गया है। हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ सीबीआई की अपील सर्वोच्च अदालत में लंबित है। ऐसे में राजोआणा को सूली पर चढ़ाया जाना गैरकानूनी होगा। यह हो सकता है कि हवारा को मौत की सजा देने की सीबीआई की अपील में सुप्रीम कोर्ट को यह महसूस हो कि अन्य आरोपियों को भी मृत्युदंड नहीं दिया जाना चाहिए। दोषी राजोआणा को 31 मार्च को फांसी दी जानी है। लायर्स फॉर ह्यूमन राइट इंटरनेशनल की ओर से दायर याचिका में कहा गया है कि राजोआणा को सूली पर चढ़ाने से पहले सुप्रीम कोर्ट के फैसले का इंतजार किया जाना चाहिए। भले ही मुजरिम की ओर से अपील दायर की गई हो या नहीं। याचिका में कहा गया है कि मृत्युदंड सुप्रीम कोर्ट की अनुमति के बिना नहीं दिया जाना चाहिए। हालांकि हाईकोर्ट की पुष्टि के बाद मौत की सजा का प्रावधान है लेकिन उसी केस से संबंधित अपील का निपटारा न होने तक मृत्युदंड उचित नहीं है। न्याय करने वालों के सर पर जब इस प्रकार का आतंक मंडराने लगे तो कोन निष्पक्ष न्याय देगा। आज अकाल तख्त को गुरू गोविन्द सिंह सहित गुरूओं के त्याग व बलिदान का अर्थ समझना चाहिए। परन्तु इस देश में अब इमान की बात करने वाले या सिद्धात के लिए मर मिटने वालों की कोई सुनवाई नहीं होती।
इन याविका लगाने वालों को पंजाब में खालिस्तानी आतंक से मारे गये हजारों निर्दोष लोगों की मौत का शायद कहीं कोई भान हो। इनकी नजरों में इन मारे गये निर्दोष लोगों का कहीं कोई मानवाधिकार का अहसास हो। इन मारे गये लोगों के शोकाकुल परिजनों की भावनाओं का जरा सा भी अहसास हो। पाकिस्तान की शह पर इस देश को तबाह करने वालों के पेरोंकारों को क्या नाम दिया जाय। अगर यही हाल रहा तो देश के लिए कौन कुर्वान होगा। क्या सोचकर लोग देश के दुश्मनों से लडने का साहस करेगा। जो देश व समाज अपने लिए कुर्वान होने वाले या समर्पित लोगों का सम्मान नहीं कर सकता है उस देश को तबाह होने से कोई रोक नहीं सकता। शेष श्रीकृष्ण कृपा। हरि औम तत्सत्। श्रीकृष्णाय् नमो।

राज्य गठन आंदोलनकारी जगदीश भट्ट को पत्नी शोक


राज्य गठन आंदोलनकारी जगदीश भट्ट को पत्नी शोक
आज 27 मार्च को साढ़े पांच बजे मैं दिल्ली प्रदेश कांग्रेस के प्रदेश सचिव व राज्य गठन आंदोलन के प्रमुख साथी हरिपाल रावत की कार में रेल भवन से केन्द्रीय मंत्री हरीश रावत के तीन मूर्ति लेन स्थित आवास की तरफ बढ़ रहे थे कि तभी यकायक मुझे अपने राज्य गठन आंदोलन के अग्रणी साथी जगदीश भट्ट का फोन आया और उन्होंने एक ही सांस में बताया कि पूजा की ममी का देहान्त हो गया हैं और 1 घण्टे के अंदर ही उनका अंतिम संस्कार निगम बोध घाट में किया जायेगा। भट्ट जी के फोन पर मुझे एक बार अपने ही कानों पर विश्वास नहीं हुआ। मैने फिर भट्ट जी को फोन किया तो उन्होंने यही बात दोहरायी। मैने हरपाल रावत को यह बात बतायी, वे भी सन्न रह गये। तब तक हम केन्द्रीय मंत्री के आवास पर पंहुच गये थे। वहां से मेने अपने अग्रणी समाजसेवी साथी व राष्ट्रीय जनांदोलनों के संयोजक भूपेन्द्रसिंह रावत सहित कई मित्रों को इस दुखद समाचार से अवगत कराया।
उसके बाद मैं हरीश रावत के आवास से उत्तराखण्ड जनमोर्चा के कोषाध्यक्ष हुकमसिंह कण्डारी व चम्पावत जनपद के निवासी गणेश दत्त जोशी के संग निगम बोध घाट पंहुचा। वहां पर भूपेन्द्र रावत, देश बंधु बिष्ट, जगमोहन रावत भी पंहुच गये। उसके आधा घण्टे बाद जगदीश भट्ट जी अम्बुलेंस में अर्थी ले कर पंहुचे। वहां पर जगदीश भट्ट ने भूपेन्द्रसिंह रावत सहित हम सब साथियों की सलाह पर की सीएनजी शवगाह में ही अंतिम संस्कार करने का निर्णय लिया। रात के साढ़े नो बजे दाह संस्कार व अस्थि का पावन यमुना जल में विसर्जन किया। इस अवसर पर आंदोलन के साथी रवीन्द्र बत्र्वाल, विनोद नेगी, सतेन्द्र रावत के अलावा जगदीश भट्ट जी के ईष्ट मित्र व परिजन उपस्थित थे। दिवंगत श्रीमती चन्द्रकला भट्ट को मैं 1994 के बाद निरंतर जगदीश भट्ट की धर्मपत्नी के रूप में परिचय था। सीमान्त जनपद पिथोरागढ़ के झूलाघाट के मूल निवासी जगदीश भट्ट जी की धर्मपत्नी चन्द्रकला भट्ट से मेरी मुलाकातें यदाकदा होती रहती थी। कई सालों से वो मुझसे एक ही शिकायत करती रहती थी कि आप हमारे जशोला बिहार घर में नहीं आये। मैने उनको वचन दिया था, जो उनके जीते जी मैं नहीं निभा सका। कभी कभार जगदीश भट्ट जी मुझसे उनकी बातें करा देते थे। उनकी यही शिकायत रहती थी। कुछ माह पहले भट्ट जी की पाॅलिटेक्निक कर रही बड़ी बेटी पूजा भट्ट जो मुम्बई में लिम्का बुक आॅफ वल्र्ड रिकार्ड में विजयी रहने पर बधाई देने के लिए भी बात हुई। उनसे मेरी अंतिम मुलाकात ज्योतिषपीठाधीश्वर शंकराचार्य माधवाश्रम जी महाराज के ज्योतिष्पीठ पर आसीन होने के अवसर पर उनके अभिनन्दन समारोह पर दिल्ली के सिविल लाइन्स स्थित शंकराचार्य आश्रम में हुए समारोह में सम्मलित होते हुए हुई थी। उस समय भी भट्ट जी सपरिवार साथ थे। उनके साथ पूजा की नानी भी थी।  उनके निधन से मै सन्न रह गया। राज्य गठन आंदोलन के दौरान भी भट्ट जी ने कई बार नौकरी को तिलांजलि दी तो वो कभी कभार शिकायत भी करती थी। कई सालों से जगदीश भट्ट जी इलेक्टीकल इंजीनियर के पद पर इंदिरागांधी कला केन्द्र में कार्य करने के बाद इन दिनों गुडगांव के समीप हरियाणा में कार्यरत है। भट्ट जी बहुत ही सुलझे हुए इंसान के साथ साथ सामाजिक चिंतक व ज्योतिषी भी हैं। मेरे करीबी मित्रों में भट्ट जी 1994 के बाद निरंतर मेरे प्रायः हर संघर्ष में आगे रहे। हमारे आंदोलन के साथी जगमोहन जो टिहरी के बडियार गढ़ क्षेत्र के निवासी हैं उनकी धर्मपत्नी भी एक साल पहले भरी जवानी में स्वर्गवास हो गयी थी। छोटे बच्चों के साथ पूरे परिवार की जिम्मेदारी जगमोहन सिंह रावत की तरह जगदीश भट्ट के कंधों में आ गयी है। जगदीश भट्ट जी की बेटियां बड़ी प्रतिभाशाली हैं। भगवान भट्ट जी व उनके परिवार को इस त्रासदी को सहने का साहस व धैर्य दे । भगवान को शायद यही मंजूर था। उनकी पावन स्मृति को मैं शतः शतः नमन् करता हॅू।
अपने मित्र भट्ट को मेने इस दुखद् स्थिति में बहुत ही शांत देखा। वो कह रहे थे शायद इतना ही उनका साथ होगा। श्री भट्ट जी की माता जी झूलाघाट से भट्ट जी के ससुर के साथ दिल्ली को चल दी हैं। वहीं जगदीश भट्ट जी के छोटे भाई जो भाभा परमाणु संस्थान के वैज्ञानिक हैं वे भी इस दुखद समाचार को सुन कर दिल्ली की तरफ कूच कर दिये है।
उत्तराखण्ड राज्य गठन जनांदोलन के अग्रणी संगठन उत्तराखण्ड जनता संघर्ष मोर्चा के महासचिव जगदीश भट्ट की धर्मपत्नी श्रीमती चन्द्रकला भट्ट का आज सोमवार 27 मार्च को सांय 5 बजे दिल्ली के जीवन नर्सिग होम में उपचार के दौरान आकस्मिक निधन हो गया। दिल्ली के बदरपुर क्षेत्र के समीप जशोला बिहार डीडीए फलेटस में रहने वाले पेशे से इलेक्ट्रीकल इंजीनियर जगदीश भ्ट्ट की 40 वर्षीय धर्मपत्नी को कल 26 मार्च को अचानक तबियत बिगडने से समीपवर्ती चिकित्सालय जीवन नर्सिंग होम में आपात स्थिति में भर्ती कराया गया। डाक्टरों ने उनके बचाव की सभी संभव कोशिश किया परन्तु उनके शरीर के अधिकांश अंगो ने काम करना बंद कर दिया। उन्होंने 27 मार्च को सांय 5 बजे के करीब जीवन नर्सिंग होम में अंतिम सांस ली। यहीं अस्पताल में दिवंगत  चन्द्रकला भट्ट की माता जी, दो बेटियों व अन्य सम्बंधियों ने अंतिम दर्शन किये। इसके बाद उनका अंतिम संस्कार दिल्ली के निगम बोध घाट में कर दिया गया।

Monday, March 26, 2012

काश भाजपा विधायक महाकाल के साथ पटवारी जी के भी दर्शन करते

-काश भाजपा विधायक महाकाल के साथ पटवारी जी के भी दर्शन करते
-महाकाल की नगरी में प्रकट हुए पटवारी


महाकाल की नगरी उज्जैन में अभी इसी पखवाडे भारतीय जनता पार्टी ने अपने सभी विधायकों को महाकाल के दर्शन कराने का भी काम किया था। मुझे पक्का यकीन है कि यहां पर वे महाकाल के ही दर्शन करने गये होगे। उन्होने उज्जैन के पटवारी के दर्शन तो कर ही नहीं पाये होंगे। करते कैसे किसी को इसी भनक तक नहीं लगी होगी। लगती कैसे सबका भला ही शरीर महाकाल की नगरी में था परन्तु मन में तो लड्डू उत्तराखण्ड में सत्ता की मलाई का छिंके पर होगा। काश विजय बहुगुणा के हाथों में आया यह प्रदेश की सत्ता की छिंक्का किसी तरह से छटक कर भाजपा के हाथों में आ जाय। उपर वाले ने भी भाजपा व कांग्रेस को कितना असहाह कर दिया 31 व 32 के चक्कर में फंसा कर। कभी बसपा की आरती करनी पड रही है तो कभी निर्दलीयों की तो कभी उक्रांद की। क्या क्या नजरे इनायत करने में प्रलोभनों की पूरी दुकान सजानी पड़ रही है। काश महाकाल भाजपा को एक और विधायक दे देता। 32 भाजपा को तो 31 कांग्रेस को कर देता तो फिर भी काम बन जाता। परन्तु लगता है महाकाल भाजपा से नाराज था। इसी लिए शायद भाजपा वाले महाकाल की शरण में अपने विधायकों को लाये थे। वैसे मैं इन अफवाओं में कतई विश्वास नहीं करता कि भाजपा का आला नेतृत्व कांग्रेसी मोहपाश से बचाने के लिए अपने विधायकों को एकजूट रख कर उज्जैन ले गये। सुनने में यह आ रहा था कि उत्तराखण्ड के मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा किसी भाजपा विधायक पर डोरे डाल रहे है। क्योंकि निर्दलीय सहित कांग्रेसी विधायक तो रहे उनके लिए अपनी सीट छोड़ने वाले। इस लिए वे भाजपाई नेता पर उसी तरह डोरे डाल रहे हैं जिस प्रकार उनके पुफेरे भाई भुवनचंद खंडूडी ने कांग्रेसी विधायक जनरल रावत पर डोरे डाले थे। परन्तु बहुगुणा पहाड़ से चुनाव लड़ने का साहस तो कम से कम कोटद्वार के चुनाव परिणाम के बाद करेंगे नहीं। इसलिए भाजपा के तराई क्षेत्र के विधायक पर ही वे डोरे डालेगे। यह विधायक कौन होगा लोग कायश लगा रहे है। कोई देहरादून का ही बता रहे है। भले ही हम इसे आशंका मान कर बेफ्रिक हो कर सौ रहे हों परन्तु गडकरी जी को नींद कहां आ रही है। खंडूडी के खिलाफ जब से उत्तराखण्ड के कोटद्वार की जनता का फतवा आया कि वे किसी भी रूप में यहां जरूरी नहीं है तब से गड़करी की दिन की नींद भी उड गयी है। हालांकि रात की नींद तो पहले ही कांग्रेसियों के भय से नहीं अपितु अपने आला नेताओं के भीतर घात के कारण उनकी उडी हुई है। शायद उनकी स्थिति देख कर ही भाजपा के उत्तराखण्ड के जनरल खंडूडी व भाजपा के सुशासन के गंगा नहाये हुए नेता निशंक ने एक दूसरे पर भीतरघात का आरोप लगा कर गड़करी के दुखती रग को छूने की कोशिश की।
हाॅं हम यहां बात कर रहे थे भाजपा के नेताओं के उज्जैन दौरे की। वे भक्ति भाव से तो कभी उज्जैन जाते नहीं। क्योंकि उत्तराखण्ड में 33 करोड़ देवी देवता सभी रहते है। खुद मध्य प्रदेश की दिग्गज नेत्री उमा भारती, जिनके भाजपा में पुन्न प्रवेश से भाजपा के कई आला नेताओं का स्वास्थ्य ही खराब हो गया है, उमा भारती पर जब भी राजनैतिक संकट के बादल उमडते तो वे अवश्य देवभूमि उत्तराखण्ड में भगवान शिव के पावन धाम केदारनाथ या मदमहेश्वर में तप करने चले जाती हे।
वैसे उन्हें तब तक उन्है महाकाल की नगरी के अदने से इस पटवारी या अन्य भ्रष्टाचारियों की भनक तक नहीं लगी होगी। मैं नहीं समझता कि वे भ्रष्टाचारियों के दर्शन करने गंगा के प्रदेश से यहां आते। उत्तराखण्ड में भी भ्रष्टाचारियों की कोई कमी नहीं। यहां कोई ऐसा संस्थान नहीं जहां इनका साक्षात दर्शन न हो जाता हो। क्या भगवान का धाम होे या श्मसान सभी जगह ये शक्तिमान की तरह विराजमान है। मुझे तो कुछ साल पहले भगवान शिव के पावन धाम केदारनाथ में हुए भ्रष्टाचार के मामले के खुलासे ने चैक्कना कर दिया। मुझे समझ में आ गया कि भगवान की तरह ही भ्रष्टाचार अब इस धरती के कण कण में विद्यमान है। यहां पर किसी को विश्वास नहीं तो ग्राम प्रधान से लेकर यहां के विधायक मंत्री बने नेताओं तथा सरकारी कर्मचारियों की चंद सालों की जन्मपत्री ही खंडाल लिजिये। प्रदेश के अधिकांश नेताओं को चंद सालों मे ंसडक पति से अरबपति जिन आंखों ने देखा होगा वह आंखे हर पल भ्रष्टाचारी देवी के साक्षात दर्शन के लिए तरस रही होगी।
मध्य प्रदेश में भ्रष्टाचार की ऐसी गटर बह रहा है, उसमें नेता क्या सरकारी कर्मचारी सहित सभी वर्ग के एक से एक भ्रष्टाचारी अपना एक अलग ही रिकार्ड बना रहे है। महाकाल की नगरी उज्जैन में इस सप्ताह जब भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने के लिए लोकायुक्त पुलिस ने एक पटवारी पर छापा मारा तो उसकी आंखे भी फट्टी की फट्टी रह गयी।
उज्जैन में ही नहीं मध्य प्रदेश में एक के बाद एक अदने से अधिकारी भी करोड़पति निकल रहे रहे है। कभी कोई लिपिक तो कभी कोई चपरासी, अधिकारियों लोकायुक्त पुलिस ने जिले के तराना तहसील मुख्यालय पर पदस्थ पटवारी के यहां सोमवार 26 मार्च को छापा मारकर आय के ज्ञात स्रेतों से अधिक अब तक लगभग चार करोड़ रुपए की सम्पत्ति का पता लगाया है,। जबकि छापे की कार्रवाई अभी जारी है। लोकायुक्त उज्जैन के पुलिस अधीक्षक अरुण मिश्र ने संवाददाताओं को बताया कि सूचना के आधार पर कार्रवाई करते हुए टीम ने तराना में पटवारी बाबूलाल कामरा के यहां छापा मारा, जिसमें आय के ज्ञात स्रेत से अधिक अब तक लगभग चार करोड़ रुपए की सम्पत्ति का खुलासा हो चुका है, जबकि 25 साल की नौकरी में उसका कुल वेतन 15 लाख रुपए से अधिक नहीं बनता है। उन्होंने बताया कि पटवारी के यहां से अब तक तराना एवं उज्जैन में दो मकान, उसके अपने, पत्नी एवं पुत्र के नाम पर दो गांवों में 22 एकड़ जमीन, चार पहिया दो वाहन, दो पहिया दो वाहन, लगभग 15 लाख रुपए मूल्य के स्वर्ण एवं चांदी के आभूषण, पांच लाख रुपए की जीवन बीमा पालिसियां, आठ बैंक खाते एवं कुछ लाकर शामिल हैं लेकिन लाकर अभी खोले नहीं गए हैं। वैसे महाकाल को नगर का कौतवाल भी कहा जाता है। पटवारी शब्द का प्रयोग भी इसी संदर्भ में फिरगी काल में किया जाता था, तब से यह शब्द भारतीय मानस पटल पर जम गया। पटवारी का किसी जमाने में ऐसा दबदबा था बैसे आज डीएम का दबदबा अपने जनपद में भी नहीं होता है। वेसे अपने मुख्यमंत्री के दादा जी भी शायद पटवारी ही थे। वे तो बहुत ही सज्जन व धार्मिक आदमी थे। वे कभी अन्याय को बर्दास्त नहीं करते। वे अपनों पर अपनों के द्वारा किये गये अन्याय से बहुत ही व्यथित थे। भाजपा के विधायकों व नेताओं को भले भान हो या न हो परन्तु महाकाल को जरूर ख्याल रहा। महाकाल की नगरी में पटवारी जी प्रकट हो गये। परन्तु ये तो भ्रष्ट पटवारी प्रकट हुए। वेसे यह कलयुग है। भारत भी विश्व के भ्रष्टतम देशों में अग्रणी पंक्ति के देश के रूप में उसी प्रकार सिरमोर बना है जिस प्रकार 12 साल के गठन के दौरान ही भारत में सबसे भ्रष्टतम राज्यों में उत्तराखण्ड विराजमान हो गया है। भहाकाल को भैरव के रूप में भी पूजा जाता है। भैरव तत्काल अपने भक्तों की फरियाद सुनता है। लगता है भाजपा भी उत्तराखण्ड की सत्ता को फिर से प्राप्त करने के लिए लालायित है। उसमें सब्र नहीं रह गया। इसी लिए महाकाल की शरण में गये। परन्तु जब महाकाल के प्रसाद से यहां की सत्ता हासिल की तो तब महाकाल के बजाय वे खण्डूडी के राग गाने लगे, शायद इसी कारण महाकाल इनके कारनामों को देख कर नाराज हो गया। उन्हीं को मनाने के लिए शायद भाजपा वाले उज्जैन गये परन्तु वहां पटवारी प्रकट हो गये। अब देखना है पटवारी के प्रकट होने का क्या प्रभाव उत्तराखण्ड सहित देश की राजनीति में पडता है।

-चीन से तिब्बत की आजादी के लिए मेरी आंखों के आगे एक और शहादत


-तिब्बत को खुद आजाद करे चीन!
-चीन से तिब्बत की आजादी के लिए मेरी आंखों के आगे एक और शहादत /
-तिब्बत की त्रासदी से सबक लें उत्तराखण्डी/
आज 26 मार्च सोमवार को  दोपहर बारह बजे के बाद जेसे ही कनाट प्लेस की तरफ से  आंदोलनकारियों से खचा खच भरे जंतर मंतर स्थित राष्ट्रीय धरना स्थल पर पंहुचा ही था, वहां पर चारों तरफ देश के विभिन्न हिस्सों से आये अनेक संगठनों के आंदोलनकारी अपने मंचों से अपनी अपनी मांग को लेकर आंदोलन के समर्थन में सभाये व नारेबाजी कर रहे थे। जैसे ही मैं संसद की चैखट राष्ट्रीय धरना स्थल जंतर मंतर पर पर पंहुचा तो यकायक वहां पर मैने आग की ज्वालाओं में घिरे एक व्यक्ति को वहां बीचों बीच सडक में आंदोलनकारियों की भीड़ में अपनी तरफ दौडते हुए देख कर स्तब्ध रह गया। मैं अचानक दिखे इस दृश्य को एक पल के लिए समझ भी नहीं पाया था कि तब तक चारों तरफ से लोग व पुलिस वाले उधर दौड पडें। हालांकि भारी भीड के कारण मैं उसका चेहरा नजदीक से नहीं देख पाया। दर्जनों मीडिया व इलेक्ट्रोनिक चैनलों के केमरे उस व्यक्ति की तरफ दोड़े तो तब मुझे समझ में आया ये तो किसी आंदोलनकारी ने यहां पर आत्मदाह कर दिया। उस पर पुलिस वाले व तिब्बती आंदोलनकारी पानी आदि फेंक व बचाव करने का प्रयाश कर रहे थे। बडी मुश्किल से उस काफी जलचूके आंदोलनकारी को 100 नम्बर वाली पुलिस की जिप्सी में चिकित्सालय ले जाया गया। तिब्बती ही नहीं मेरे जैसे सेकडों लोगों की आंखों से इस बलिदान पर बरबस आंसू निकल आये। चारों तरफ तिब्बती ही नहीं आम लोग भी चीन के हुक्मरानों द्वारा तिब्बत में किये जा रहे अन्याय के खिलाफ नारेबाजी व तिब्बत जिन्दाबाद के नारे से जंतर मंतर गूंज गया। पूरा राष्ट्रीय आंदोलन स्थल स्तब्ध रह गया। आत्मदाह करने वाला अपनी शहादत देगया तिब्बत की आजादी के लिए। वहां पर हजारों की संख्या में तिब्बती आंदोलनकारी उद्देल्लित थे। मुझे इस घटना ने झकझोर कर रख दिया। मेरे मानस पटल पर  चीन के सम्राज्यवादी प्रवृति पर गहरा आक्रोश उमड पडा। मुझे उत्तराखण्ड राज्य गठन आंदोलन के समय 1994 -95 के दौरान भी जंतर मंतर के तिकोने पार्के में प्रातःकाल तिब्बती आंदोलनकारी ने तिब्बत की चीन से मुक्ति के लिए इसी प्रकार से अपनी शहादत आत्मदाह करके दी। चीन ने तिब्बत पर बलात कब्जा करके तिब्बतों को अपना गुलाम बना दिया है। लाखों की संख्या में तिब्बती भारत सहित पूरे संसार में निर्वासित जीवन जीने के लिए अभिशापित है। भारत में
धर्मशाला में तिब्बत की निर्वासित सरकार आसीन है। तिब्बतों के सर्वोच्च धर्मगुरू व प्रशासक दलाई लामा भी भारत के धर्मशाला में ही निवास करते है। चीन इसी कारण भारत से नाराज है। आज की परिस्थितियों में जब चीन विश्व की महाशक्ति बन गया। वह अमेरिका सहित विश्व की आर्थिक सम्राज्य पर शिकंजा जकड़ चूका है। सामरिक ताकत इतनी की उसकी हुंकार से अब अमेरिका भी सहम सा जाता है। इस कारण निकट भविष्य में चीन से तिब्बत की मुक्ति की राह अगर कहीं से दिखाई देती तो वह केवल अमेरिका ही है। भारत से तिब्बती यह आश कर नहीं सकते है क्योंकि उनको मालुम है जो भारत अपनी हजारों एकड़ भू भाग चीन द्वारा बलात हडप जाने पर ही मुंह नहीं खोलने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहा हो वह चीन से तिब्बत की आजादी के लिए प्रश्न उठाने का साहस तो सपने में भी नहीं कर सकता। परन्तु आज चीन की स्थिति बहुत ही विचलित करने वाली है। वह महाशक्ति बन गया है। अमेरिका पर ही तिब्बतियों को पूरा भरोसा हैं कि एक न एक दिन अमेरिका उसको इस्राइल की तरह ही अपना देश दिला कर दम लेगा। परन्तु अरब देशों पर तो अमेरिका व ब्रिटेन का बस चल गया, परन्तु क्या चीन के साथ ताकत के बल पर अमेरिका व उसके मित्र राष्ट्र ऐसा जोखिम लेने की कोशिश करेंगे। यह भविष्य की बात है। परन्तु तिब्बत की आजादी काफी हद तक अमेरिका पर ही निर्भर कर रही है। मुझे तो भगवान श्रीकृष्ण पर परम् विश्वास है। चीन को न्याय का सम्मान करते हुए तिब्बत को स्वतंत्र कर देना चाहिए। तिब्बत की स्वतंत्रता अमेरिका के हस्तक्षेप से हो यह न तो चीन के लिए हितकर है व नहीं विश्व शांति के लिए। इसलिए चीन को चाहिए कि वह विश्व शांति के लिए अपनी प्रतिबंधता दिखाने के लिए स्वयं तिब्बत को स्वतंत्र कर दे। तिब्बत की आजादी के साथ चाहे तो चीन तिब्बत की सुरक्षा का दायित्व खुद भी उठा सकता है। परन्तु चीन को एक बात समझ लेनी चाहिए कि दमनकारी ताकत व सम्राज्य कितना भी शक्तिशाली क्यों न हो उसे एक न एक दिन अपने गुनाहों के कारण तबाह होना पडता है। इसलिए दमनकारी प्रवृति पर खुद ही अंकुश लगा कर तिब्बत को खुद ही स्वतंत्र करे चीन। यही इसका सबसे श्रेष्ठ समाधान होगा। चीन के इस कदम से इस क्षेत्र में अपना शिकंजा जकड़ने की अमेरिकी रणनीति पर पूरी तरह से अंकुश लग जायेगा।  परन्तु मुझे लगता है कि अमेरिका के भय से भयभीत चीन तिब्बतियों पर विश्वास नहीं करता है। परन्तु तिब्बतियों का दिल जीतने के लिए चीन खुद ही तिब्बत को स्वतंत्र इस शर्त पर दे कि उसमें अमेरिका सहित किसी अन्य विदेशी ताकत का कोई हस्तक्षेप न हो। चीन केवल इसकी सामरिक सुरक्षा का दायित्व खुद ही उठा सकता है।
तिब्बती शहीदों की शहादत को नमन् करता हॅू। जनभावनाओं के लिए अपना सर्वस्व न्यौछावर करने वाले महान सपूतों की भावनाओं को मैं समझता हॅू। यह भगवान श्री कृष्ण की अपार कृपा रही जो देश के सत्तांध हुक्मरानों ने उत्तराखण्ड राज्य बना दिया। नहीं तो मेरा क्या हाल होता मैं समझ सकता हॅू। उत्तराखण्ड राज्य के लिए मैने निरंतर 6 साल तक संसद की चैखट पर (1994 से 2000) राज्य गठन तक निरंतर धरना प्रदर्शन व रैलियां आदि करते हुए मैं भी कई बार निराश व आक्रोशित हो जाता था। उस समय मुझे याद है परम रहस्यमय शक्तियों के स्वामी काला बाबा जो कभी कभार हमारे उत्तराखण्ड धरने में मुझे आशीर्वाद व मेरा मनोबल बढ़ाने आते थे , वे अक्सर कहते थे देवी ये तेरे कारण मैं यह उत्तराखण्ड बनवा रहा हॅू। तु देखना उत्तराखण्ड राज्य गठन के बाद लुटेरों के शिकंजे में ही जकड़ जायेगा। तू भी मेरी तरह अपने समर्पण पर रोयेगा। मुझे बाबा अकसर कहते थे कि देवी मैने भी देश की आजादी के लिए अपने आप को तेरी तरह ही समर्पित कर दिया, आज यह आजादी लुटेरों के हाथों में जकड गयी। मुझे लगता कि अगर तेलांगना की तरह ये हुक्मरान उत्तराखण्ड राज्य नहीं बनाते तो हम भी आज भी उसी आंदोलन में जुटे रहते। परन्तु मेरा तो भगवान श्रीकृष्ण पर अपार विश्वास रहा। उन्हीं की कृपा से ये राज्य बन गया। नहीं तो आज क्या स्थिति होती इसकी कल्पना करके भी मै कई बार में विचलित हो जाता हॅू। आज जब मैं प्रदेश के हुक्मरानों द्वारा प्रदेश के हक हकूकों को रौंदते हुए देखता हूूॅ तो मुझे राज्य गठन के लिए अपने साथियों द्वारा सहा गया दमन, दी गयी शहादत व संघर्ष के वे विचलित करने वाले दिन व परिस्थितियां एक एक करके मुझे कई बार उद्देल्लित करती है। कई बार मेरे आंदोलन के साथी या जानकार लोग यह कह कर मुझे झकझोरने की कोशिश करते हैं कि क्या इसी के लिए हमने धूप, सर्दी बरसात, पुलिसिया, दलीय गुलामों व उत्तराखण्ड विरोधियों का दमन सहा। मैं चुप हो कर भगवान श्रीकृष्ण के न्याय पर विश्वास रखता हॅू। मुझे मालुम है कि उसने किस प्रकार उत्तराखण्ड से खिलवाड करने वाले राव, मुलायम, माया, वाजपेयी, तिवारी, खंडूडी, निशंक आदि को एक एक करके दण्डित किया। अब सोनिया गांधी ने जिस बेशर्मी से जनादेश का मजाक उडा कर विधायकों की भावना को नजरांदाज करते हुए विजय बहुगुणा को मुख्यमंत्री के रूप में थोपा उससे उनको भी 2014 में जहां देश की सत्ता से हाथ धोना पडेगा। वहीं बहुगुणा की सरकार भी अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर पायेगी।
तिब्बती अमर सपूत के देश की आजादी के लिए दिया गया शहादत से मुझे एक बात विचलित कर रही है कि अगर उत्तराखण्डियों ने अपने हक हकूकों के प्रति इसी प्रकार दलीय बंधुआ गुलाम बन कर उदासीन रहे तो वह दिन दूर नहीं जब उत्तराखण्डियों की स्थिति तिब्बतियों की तरह अपनी जन्म भूमि के लिए मोहताज हो जाये। जिस प्रकार उत्तराखण्डियों ने मूक रहते हुए गैरसैंण राजधानी गठन के विषय पर मूकता दिखाई, जिस प्रकार मुजफरनगर काण्ड के अभियुक्तों को दण्डित कराने के बजाय उनको शर्मनाक संरक्षण दिये जाने पर शर्मनाक मूकता दिखाई, जिस प्रकार जनसंख्या पर आधारित विधानसभाई क्षेत्रों का परिसीमन को शर्मनाक मूकता के साथ स्वीकार किया गया, जिस शर्मनाक ढ़ग से प्रदेश में भाजपा व कांग्रेस जातिवाद का जहर जबरन थोप रहे है, परन्तु इसको उजागर करके विरोध करने वालों का समर्थन करने के बजाय उनको ही जातिवाद का प्रतीक बताने का कृत्य किया जा रहा है। इन सब बातों से किसी भी स्वाभिमानी उत्तराखण्डी का सर शर्म से झुक जायेगा। प्रदेश में भ्रष्टाचार का तांडव ही मचा हुआ है। प्रदेश के संसाधनों को जिस प्रकार से लुटवाया जा रहा है उसको देख कर प्रदेश के जागरूक लोगों को एकजूट हो कर भाजपा व कांग्रेस की जबरन लूट पर अंकुश लगाने के लिए भारी जनदवाब बनाना चाहिए। नहीं तो वह दिन दूर नहीं जब उत्तराखण्डी तिब्बतियों की तरह दर दर की ठोकरे खाने के लिए अभिशापित हो जाय। शेष श्री कृष्ण । हरि औम तत्सत्। श्रीकृष्णाय् नमो।

Sunday, March 25, 2012

देव भूमि के अभिशाप से कांग्रेस की यह बहुगुणा सरकार भी नहीं बच पायेगी

चाहे कांग्रेसी दिग्गज हरीश रावत या हरक सिंह रावत सहित सभी कांग्रेसी विधायक अपने निहित स्वार्थो के मोह में उत्तराखण्ड के मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा की सरकार को समर्थन दे दें फिर भी उत्तराखण्ड की पावन धरती के भविष्य को रौदने का कुकृत्य कांग्रेस आलाकमान ने अपने आत्मघाती सलाहकारों के दम पर करने की हिमालयी भूल की, भगवान बदरीनाथ की यह पावन देव भूमि उत्तराखण्ड के साथ अपनी संकीर्णता व सत्तालोलुपता के लिए जो भी खिलवाड करने की भूल करता है उसका हस्र राव, मुलायम, वाजपेयी, तिवारी, खंडूडी व निशंक की तरह होता है। देव भूमि के अभिशाप से कांग्रेस की यह बहुगुणा सरकार भी नहीं बच पायेगी। उत्तराखण्ड राज्य का गठन उत्तराखण्ड के सपूतों ने अपना बलिदान व अमानवीय दमनकारी राव मुलायम सरकार से संघर्ष कर के हासिल किया है। इसलिए अभी भी कांग्रेस आला कमान अपनी भूल के लिए प्रायश्चित करते हुए प्रदेश में जनता के लिए समर्पित नेता को सत्ता सौंपे। नहीं तो 2014 में कांग्रेस का पूरे देश से लोकसभा चुनाव में भाजपा की तरह ही सफाया होगा। 

देव भूमि की पवित्रता की रक्षा करना हम सबका नैतिक फर्ज हैः महेश चन्द्रा



देव भूमि की पवित्रता की रक्षा करना हम सबका नैतिक फर्ज हैः महेश चन्द्रा
देवताओं की धरती पुस्तक का विमोचन 
नई दिल्ली(प्याउ)। ‘देव भूमि उत्तराखण्ड की पावनता की रक्षा करना हम सबका नैतिक फर्ज है और हमें न केवल उत्तराखण्ड का चहुमुखी विकास करना है अपितु पश्चिमी विकास की चकाचैध में भारतीय संस्कृति को भूल रहे नौनिहालों को विश्व संस्कृति की पावन गंगोत्री उत्तराखण्ड के सनातन मूल्यों को भी अक्षुण्ण रखना है।‘ यह आवाहन अग्रणी सामाजिक चिंतक व प्यारा उत्तराखण्ड समाचार पत्र के प्रबंध सम्पादक  महेश चन्द्रा जी ने कनाट प्लेस स्थित आर्य समाज मंदिर में 25 मार्च को ‘देवताओं की धरती’ नामक  पुस्तक के विमोचन के अवसर पर मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित जनसमुदाय को संबोधित करते हुए कही।  दिल्ली के कनाट प्लेस स्थित हनुमान रोड़ के आर्य समाज मंदिर के सभागार में सांय आयोजित इस पुस्तक विमोचन समारोह में बड़ी संख्या में आर्य समाज से जुड़े लोग, साहित्यकार, पत्रकार तथा विभिन्न सामाजिक संगठनों से जुड़े प्रबुध लोग उपस्थित थे। इस अवसर पर आर्य समाज के समर्पित कार्यकत्र्ता व देवताओं की धरती नाम पुस्तक के लेखक ज्ञानसिंह आर्य का विमोचन किया गया। इस अवसर पर अपने विचार प्रकट करते हुए देश के अग्रणी आर्य समाज के प्रकाण्ड विद्धान व देश के वरिष्ठ पत्रकार बनारसी सिंह, सत्येन्द्र प्रयासी, अग्रणी समाजसेवी देवसिंह रावत, आचार्य धर्मसिंह शास्त्री, साहित्यकार रमेश हितैषी, कवि दिनेश ध्यानी, देवेश्वर प्रसाद जोशी, साहित्यकार पूरन चंद काण्डपाल आदि ने अपने विचार प्रकट किये। इस अवसर पर सभागार में  विराजमान  गणमान्य प्रतिभाओं में सेवा निवृत उप सचिव जगदीश चंद्रा, प्रेम कुमाउंनी, प्रकाशक रवि, अधिवक्ता सुरेन्द्र कुमार, विश्ववंधु, एन डी लखेडा, साहित्यकार पृथ्वी सिंह केदारखण्डी, म्यर उत्तराखण्ड संस्था के अध्यक्ष मोहन बिष्ट, हरीश रावत एवं साथी, पत्रकार बिहारी लाल जलंधरी व सतेन्द्र रावत, प्रेम सिंह आदि उपििस्थत थे।

Friday, March 23, 2012

मेरी प्यारी फेसबुक



मेरी प्यारी फेसबुक
कितनी सुन्दर
लगती हो तुम
जब हंसाती हो तुम
जब दिल मिलाती हो तुम
मेरे दिल की धडकनों
की रानी बन गयी
है अब दिलरूबा
फेसबुक अपनी फेसबुक
तुमसे कितनी हसीनाये
जलती है तेरे इस योवन से
तेरे पर मंडराते हे भौंरे
रात और दिन दीवाने बन
फिर भी तुम सबका दिल
रखती हो मुस्कराती हो
अपना बनाती हो
बिछुडों को मिलाती हो
साथ निभाती हो तब तक
जब तक दौलत
खनकते रहे
बरसते रहे तुम पर
-देवसिंह रावत
(24मार्च 2012 प्रात 955 बजे)

24 अप्रैल को खुलेंगे गंगोत्री धाम के कपाट



24 अप्रैल को खुलेंगे गंगोत्री धाम के कपाट

उत्तरकाशी (प्याउ)। विश्व प्रसिद्ध गंगोत्री धाम के कपाट 24 अप्रैल को पूरे विधि विधान के साथ प्रातः 11.30 बजे खोल दिये जायेंगे। वहीं चार धाम यात्रा के नाम से विख्यात हिन्दुओं की सर्वोच्च धाम बदरीनाथ धाम जो भगवान विष्णु का परम धाम के रूप से सनातनियों का सर्वोच्च धाम है, के कपाट 29 अप्रेल, भगवान शिव के पदम दिव्य केदारनाथ धाम के कपाट 28  अप्रैल व यमुनोत्री के कपाट 24 अप्रैल को खुलेंगे का ऐलान पहले ही कर दिया गया।  इस सप्ताह गंगोत्री धाम के कपाट खोलने का ऐलान किया गया। 24 अप्रैल को देश विदेश के हजारों श्रद्धालु माॅं गंगा के प्रथम पावन दर्शन की बेशब्री से इंतजारी कर रहे है। कपाट खुलने की रस्म 23 अप्रैल, 11 गते संवत 2069 सोमवार को वैशाख शुक्ल पक्ष को शुभ मुहूर्तानुसार मां गंगा की डोली अपने शीतकालीन प्रवास मुखीमठ से 12 बजकर 15 मिनट दोपहर को भारी जलसे के साथ गंगोत्री धाम के लिए प्रस्थान करेगी।  मंगलवार 24 अप्रैल अक्षय तृतीया के पर्व पर मां गंगा की डोली प्रातःपवित्र गंगोत्री धाम पहुंचने पर प्रातःनौ बजे विधि विधान गंगा पूजन के बाद 10 बजे प्रातः गंगा सहस्रनाम पाठ व साढ़े 11 बजे को आम श्रद्धालुओं के लिए पावन कपाट खोल दिये जायेंगे। गौरतलब है कि हिमालय के आंचल में बसे इस पावन धामों के कपाट शीतकाल के दौरान ये क्षेत्र हिमाछादित हो जाने के कारण सदियों में बंद कर दिये जाते हैं और ग्रीष्मकाल में खोल दिये जाते है।

शहादत को शतः शतः प्रणाम


शहादत देने वाले महान सपूत, वतन के लिए मर मिट गये
पर खुदगर्ज हुक्मरान आज, दो टके के लिए वतन बेच गये 








आज शहीदे आजम भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव का शहीदी दिवस है। शहीदों की पावन शहादत को शतः शतः प्रणाम। आज ही के दिन 23 मार्च  1931 में इन तीन महान सपूतों ने देश की आजादी के लिए फिरंगी सम्राज्य के खिलाफ खुली जंग छेडने के आरोप में फांसी दे दी गयी थी.। परन्तु आज आजादी के बाद देश के हुक्मरानों ने अपनी कुर्सी व दो टके के खातिर देश को भ्रष्टाचार, आतंकवाद के गर्त में धकेल दिया है।

Thursday, March 22, 2012

उत्तराखण्ड कांग्रेस में भारी भरकम नेताओं की फौज ही है असंतोष का मूल कारण

-उत्तराखण्ड कांग्रेस में भारी भरकम नेताओं की फौज ही है असंतोष का मूल कारण/
-भाजपा कांग्रेस के निहित स्वार्थ में अधे नेताओं को नहीं रही कभी उत्तराखण्ड की चिंता
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उत्तराखण्ड कांग्रेस में इन दिनों भारी असंतोष है। इन अधिकांश नेताओं में विस्फोटक स्थिति में पंहुचा यह असंतोष का एक भी कारण प्रदेश की जनभावनाओं के प्रति न हो कर इन नेताओं की अपने निहित स्वार्थ ही है। नेता कांग्रेस के रहे हों या भाजपा के इन्होंने कभी प्रदेश के हितों के लिए अपनी एकजूटता नहीं दिखाई जितनी ये अपने पदों के लिए धरती आसमान एक कर देते हे। इन नेताओं की प्रदेश के हितों के प्रति उदासीन रवैये से भाजपा व कांग्रेस के इन 12 सालों के शासन में प्रदेश की स्थिति बद से बदतर हो गयी है।  प्रदेश के हक हकूकों की जो बंदरबांट चल रही है, उससे प्रदेश देश के सबसे भ्रष्टतम राज्यों में सुमार हो गया है। प्रदेश की स्थाई राजधानी बनाने के बजाय इसको देहरादून में ही थोपने के लिए प्रदेश के करोड़ों रूपये बहाये जा चूके है। यही नहीं जनसंख्या पर आधारित परिसीमन से लेकर मुजफरनगर काण्ड के अभियुक्तों को संरक्षण का शर्मनाक काम किया जा रहा है। अपने नकारेपन से जनता का ध्यान हटाने के लिए भाजपा व कांग्रेस यहां पर शर्मनाक जातिवाद का कार्ड खेल कर जनता का ध्यान इनके उत्तराखण्ड विरोधी हथकण्डों से हटाने का कुकृत्य कर रही है। इनके जातिवादी षडयंत्र में फंस कर यहा ंपर स्थापित मीडिया व बुद्धिजीवी भी इनके कुकर्मो पर पर्दा डाल कर इनकी जातिवादी राजनीति को बेपर्दा करने के बजाय इसको जायज ठहराने का कृत्य कर समाज को रसातल में धकेल रहे है।
कांग्रेस में असंतोष का मूल कारण कांग्रेस के नेताओं की भरमार है। वहीं भाजपा में नेताओं का अकाल है। कांग्रेस में आधा दर्जन से अधिक बडे नेताओं की फोज है, जो अब भी मुख्यमंत्री के दावेदार है। इसी कारण कांग्रेस में असंतोष बना रहता। एक बडा नेता माने तो बाकी नाराज हो जाते है। कांग्रेस के पास उत्तराखण्ड में जहां हरीश रावत व सतपाल महाराज जेसे राष्ट्रीय स्तर के बडे नेता है। तो सांसद के रूप में वर्तमान मुख्यमंत्री बिजय बहुगुणा, सांसद प्रदीप टम्टा व केसी बाबा है। वहीं जमीनी विधानसभाई स्तर के नेताओं में जो कांग्रेस के वर्तमान नेता भुवनचंद खण्डूडी, कोश्यारी व निशंक पर भारी पड़ते हैं उनमें डा हरक सिंह रावत ही नहीं यशपाल आर्य, इंदिरा हदेश, शूरवीरसिंह सजवान, महेन्द्र पाल, प्रीतम सिंह, दिनेश अग्रवाल, नव प्रभात  है जिनके आगे भाजपा की प्रथम पंक्ति भी फिकी पडती है। इसके अलावा भाजपा में जो दूसरी पंक्ति के नेता हैं उनके त्रिवेन्द्र रावत, अजय भट्ट, मदन कोशिक, हरवंश कपूर, प्रकाश पंत आदि भी वे कांग्रेस के हीरासिंह बिष्ट, तिलक राज बेहड़ व रणजीत रावत के आगे 19 ही साबित होते।  हालांकि भाजपा में कुछ बडे नेता है मोहन सिंह ग्रामवासी उनको भाजपा ने गुमनामी के गर्त में धकेलने का काम किया है।
इनके अलावा कांग्रेस के  विधानसभा चुनाव के बाद गठित विजय बहुगुणा का मुख्यमंत्री के लिए जब से नाम का ऐलान जबसे कांग्रेस आला कमान ने किया तब से असंतोष कम होने का नाम ही नहीं ले रहा है। मुख्यमंत्री बने विजय बहुगुणा को एक सप्ताह से अधिक समय हो गया मुख्यमंत्री की शपथ ग्रहण किये, उनका दिन का चैन व रातों की नींद हराम हे। मुख्यमंत्री का नाम घोषित होते ही हरीश रावत के समर्थकों के खुले विद्रोह से विजय बहुगुणा व उनके पैरोकारों के पसीने ही छूट गये। आलाकमान के दूतों से लेकर विज बहुगुणा के समर्थक सभी इस असंतोष को सुलझाने में दिन रात एक कर गये परन्तु क्या मजाल असंतोष कम होने का नाम ले। हरीश रावत के एक दर्जन से अधिक समर्थक विधायकों के साथ जैसे ही मुख्यमंत्री के एक प्रबल दावेदार डा हरक सिंह रावत ने भी बाॅलीबुड के फिल्मी डायलागों वाली  हुंकार क्या भरी तो कांग्रेस के बड़े बडे नेताओं के पसीने छूट गये। बड़ी मुश्किल से मुख्यमंत्री की एक और दावेदार इंदिरा हदेश को मनाने में विजय बहुगुणा सफल हुए। इतनी भी लाज विजय बहुगुणा की तब बची जब उनके साथ प्रदेश में हरीश रावत की तरह ही जमीनी मजबूत नेता सतपाल महाराज का पूरा साथ था। मुख्यमंत्री की शपथ ग्रहण से लेकर विधायकों की प्रथम शपथ ग्रहण में जो चंद विधायक उपस्थित दिखे उनमें अधिकांश सतपाल महाराज ग्रुप के विधायक थे।
विजय बहुगुणा व कांग्रेस आला कमान के सुत्रों का सारा ध्यान हरीश रावत के गुट को मनाने में लगा। उनकी मुख्यमंत्री बदलने से लेकर अधिकांश मांगे एक एक कर विजय बहुगुणा मानते रहे परन्तु फिर भी 11 विधायकों का विधायक की शपथ अभी तक भी ग्रहण न करना, विजय बहुगुणा व आला कमान की पतली हालत को ही बयान करती है। हालत यह हो गयी कि विजय बहुगुणा गुट के ही विधायक नवप्रभात, कुंवर प्रणव आदि मंत्री पद न मिलने से उनसे काफी खपा है। वे अब एक एक कर हरीश रावत के घर में भी दस्तक दे रहे हैं। वहीं सबसे पहले विजय बहुगुणा व कांग्रेस का समर्थन करने वाले निर्दलीय विधायक दिनेश धनै को वायदा करके भी मंत्री न बनाये जाने से नाराज धनै समर्थकों ने न केवल विजय बहुगुणा से खुली नाराजगी प्रकट की अपितु कांग्रेस के केन्द्रीय प्रभारी चैधरी बीरेन्द्र सिंह की भी सारी चैधराहट अपनी नाराजगी से उतार कर रख दी। वर्तमान हालतों में हरीश रावत को मुख्यमंत्री बना कर ही कांग्रेस इस स्थिति से उबर सकती है। परन्तु यहां पर जहां डा हरक सिंह मंत्री पद न लेने की हुंकार भर रहे हों, महाराज के ही नहीं स्वयं बहुगुणा के समर्थक मंत्री न बनने से असंतुष्ट नजर आ रहे हो, वहां कैसे कलह दूर हो पायेगा, यह विजय बहुगुणा के लिए बहुत ही दुखद स्थिति है। सबसे और दुखदाई सवाल यह भी है कि पर्वतीय जनपदों से कोई भी मंत्री नहीं बनाया गया। अधिकांश तराई क्षेत्र से ही बने है। कांग्रेसी पर्वतीय क्षेत्र के विधायकों में से चमोली, रूद्रप्रयाग, टिहरी उत्तरकाशी, पिथोरागढ़, चम्पावत, पौडी अल्मोडा से प्रतिनिधित्व नहीं दिया गया। जो दिया गया वह उक्रांद व निर्दलीय विधायकों के द्वारा है। इससे पर्वतीय क्षेत्रों में गहरा असंतोष है। सुरेन्द्रसिंह नेगी, अमृता रावत, इंदिरा हदेश व यशपाल आर्य सभी तराई क्षेत्र से है।
अब सबसे हास्यापद स्थिति कांग्रेस ने प्रदेश की बना दी है। यहां पर आपसी कलह दूर होने का नाम ही नहीं ले रहा है। इसका कारण आला नेतृत्व का अक्षम्य व निहित स्वार्थी सलाहकार। जिनकी आत्मघाती सलाह पर कांग्रेस राज्य गठन के बाद प्रथम सरकार से आज तक आपसी द्वंद में झुलस रही हे। तिवारी से लेकर बहुगुणा तक जिस प्रकार से यहां के जमीनी नेता हरीश रावत व सतपाल महाराज को दर किनारे करके थोपे गये उससे इस विवाद को और हवा दी। वहीं भाजपा भी कांग्रेस की तरह जातिवादी कार्ड ही खेलती रही। यहां पर भी भाजपा के जमीनी दिग्गज नेता भगतसिंह कोश्यारी व मोहनसिंह ग्रामवासी, केदारसिंह फोनिया के बजाय विधायको के राय को दर किनारे करके कभी भुवनचंद खंडूडी व कभी निशंक जेसे नेताओं को थोप कर चलाने की धृष्ठता ही करके प्रदेश की ऐसी कम तेसी करते रहे। भाजपा व कांग्रेस के इस जातिवादी कार्ड से ही नहीं मंत्रीमण्डल से लेकर शासन प्रशासन में इन चारों के राज में अधिकांश पदों पर केवल अपनी जाति के लोगो व बाहरी लोगों को थोपने के कारण प्रदेश के लोगों में यह भावना घर बना गयी कि प्रदेश में प्रतिभा व भागेदारी को वरियता देने के बजाय केवल जातिवाद ही चलाया जा रहा है। इससे समाज में विखराव की स्थिति हो गयी है। इससे ज्यादा शर्मनाक बात यह हो गयी कि मीडिया जनता को सच्चाई बताने के बजाय व कांग्रेस भाजपा के इस हथकण्डे को बेनकाब करने के बजाय इस बुराई को जगजाहिर करने वालों को ही जातिवादी बताने की धृष्ठता कर रहे हे। जनता को चाहिए कि इस स्थिति का खुलेआम विरोध करे। सरकार पर हर पल खतरा मंडरा रहा है। इसी कारण यह सरकार नौकरशाही पर भी अंकुश नहीं बना पायेगी। सरकार में जिस प्रकार से गैरउत्तराखण्डी लोग विजय बहुगुणा की कटोरी बन कर हावी हैं उससे सरकार की स्थिति बहुत ही भयावह है। कभी भी यह सरकार अपना दम तोड़ सकती है। जब तक कांग्रेस में बडे नेताओं को कांग्रेस से बाहर का रास्ता नहीं दिखाया जाता तब तक कांग्रेस में भी अंतरकलह दूर होने का नाम नहीं ले सकता। वहीं दूसरे और भाजपा व कांग्रेस के नेताओ ंको अभी सबसे अधिक लोकशाही का पहला पाठ सिखने की आवश्यकता भाजपा के नेताओं की तरह है।

-बहुगुणा की ताजपोशी प्रकरण से भाजपा की तरह कांग्रेस का आला नेतृत्व भी हुआ बेनकाब

-बहुगुणा की ताजपोशी प्रकरण से भाजपा की तरह कांग्रेस का आला नेतृत्व  भी हुआ बेनकाब

इस सप्ताह जैसे ही उत्तराखण्ड के मुख्यमंत्री के लिए सांसद विजय बहुगुणा के नाम का ऐलान कांग्रेस आला नेतृत्व के नाम पर 10 जनपत के दरवारियों ने किया गया, उससे न केवल उत्तराखण्ड अपितु पूरा देश ही भौचंक्का रहा । मुख्यमंत्री के रूप में बहुगुणा की ताजपोशी ने कांग्रेस आला नेतृत्व की जमीनी पकड़ व विवेक पर पूरी तरह उसी प्रकार से प्रश्न चिन्ह लगा दिया, जिस प्रकार सुशासन व रामराज्य की दुहाई देने वाली भाजपा ने भगतसिंह कोश्यारी जेसे संघ निष्ट साफ छवि के जननेता के बजाय निशंक को मुख्यमंत्री बनाने का ऐलान किया था। ।  जिस समय पांच राज्यों का चुनाव परिणाम आ रहे थे, उस समय पूरे देश में रामदेव व अण्णा हजारे के भ्रष्टाचार  के खिलाफ व्यापक देशव्यापी माहौल बना हुआ है, वहीं देश की आम जनता भ्रष्टाचार के खिलाफ कमर कसे हुए है ऐसे में प्रदेश के वरिष्ट सुलझे हुए जनाधार वाले नेताओं का दर किनारे करके विजय बहुगुणा जैसे नेता के हाथों में प्रदेश की कमान सौंपना यह साबित करता है कि कांग्रेसी आला नेतृत्व को न तो प्रदेश की जमीनी राजनीति का जरा सा भी ज्ञान है अपितु उनको अपनी पार्टी की के हितों का भी भान नहीं है।

Wednesday, March 21, 2012

2014 में लोकसभा में कांग्रेस को होगा देश से सफाया/

.2014 में लोकसभा में कांग्रेस को होगा देश से  सफाया/
-भाजपा की तरह कांग्रेस पर भी लगी महाकाल की वक्र दृष्टि/

  उत्तराखण्ड की लोकशाही से जिस शर्मनाक ढ़ग से कांग्रेस आलाकमान ने अपने संकीर्ण आत्मघाति प्यादों की सलाह पर विजय बहुगुणा को थोप कर खिलवाड़ करने का अलोकतांत्रिक कृत्य किया, उससे आगामी 2012 में भगवान बदरीनाथ की पावन देवभूमि कोे अभिशाप अब भाजपा के बाद कांग्रेस पर लगना तय है। कांग्रेस जहां इस भानुमति के कुनबे की सरकार को उत्तराखण्ड में नहीं चला पायेगी वहीं आगामी 2014 में होने वाले लोकसभा चुनाव में शर्मनाक ढ़ग से हार का मुंह देखेगी। हालांकि कांग्रेस के जनविरोधी कृत्यों से 2014 में लोकसभा चुनाव में कांग्रेस की पराजय की भविष्यवाणी मैने अपने 6 माह पुराने लेख में कर दी थी। क्योंकि जिस प्रकार से अंध हो कर कांग्रेस आला कमान जनविरोधी मनमोहन सरकार को समर्थन जारी रखे हुए है उससे मैने पहले भी साफ कर दिया था कि यह सरकार 2014 के लोक सभा चुनाव में किसी भी कीमत पर चुनाव नहीं जीतेगी। गौरतलब है कि मेने विधानसभा चुनाव के बारे में पहले ही इसी के साथ उल्लेख कर दिया था कि 2012 के विधानसभा चुनावों में उत्तराखण्ड से जनविरोधी भाजपा व उप्र से जनविरोधी मायावती के कुशासनों का भी अंत होगा। परन्तु कांग्रेस ने अब विधानसभा चुनाव में बड़ी कठिनाई से सत्ता के दर्शन करने के बाबजूद बहुत ही अपमानित ढ़ग से उत्तराखण्ड की जनभावनाओं के साथ खिलवाड़ किया। इससे मेरा ही नहीं अपितु लोकशाही में विश्वास करने वाले किसी भी आम आदमी की भावनायें जहां आहत हुई वहीं उत्तराखण्ड की लोकशाही को गहरा धक्का लगा। उत्तराखण्ड देवभूमि है मैने महान तपस्वी रहस्यमय शक्तियों के स्वामी रहे काला बाबा के आर्शीवाद से कई भविष्यवाणियों का अब तक शत प्रतिशत ऐलान किया,, प्यारा उत्तराखण्ड के सुधि पाठक इस बात के साक्षी है। आज भी 2014 में कांग्रेस की अपनी पूर्व में सत्ता से बाहर होने की घोषणा का फिर से इन सत्तांध हुक्मरानों की आंखे खोलने के लिए ऐलान करता हॅू।
‘जाको प्रभु दारूण दुख देही, ताकी मति पहले हर लेई’ यह उक्ति आजकल भाजपा व कांग्रेस पर सटीक बैठ रही है। भगवान भी कांग्रेस व भाजपा के कृत्यों पर अब अंकुश लगाने के लिए मन बना चूका है। लगता है कांग्रेस अब कांग्रेस के बुरे दिन आ गये, उन पर भी भाजपा की तरह महाकाल का वक्र दृष्टि लग गयी है। हर काम उल्टा पुलटा ही हो रहा है। उत्तराखण्ड में बड़ी कठिनाई से कांग्रेस ने विधानसभा में चुनावी मैदान मारा, परन्तु कांग्रेस आला नेतृत्व के आंख कान बने आत्मघाति संकीर्ण जनविरोधी भ्रष्ट सलाहकारों की सलाह पर सोनिया गांधी ने देश के सबसे वरिष्ठ जननेता हरीश रावत या जनहितों के लिए समर्पित सतपाल महाराज को मुख्यमंत्री बनाने के बजाय विजय बहुगुणा को मुख्यमंत्री बना कर प्रदेश की जनभावनाओं को रौंद ने का कृत्य करके पूरे प्रदेश में भूचाल ला दिया। इससे आक्रोशित केन्द्रीय मंत्री हरीश रावत के नेतृत्व में सांसद प्रदीप टम्टा,  सहित डेढ़ दर्जन विधायकों  ने विद्रोह कर दिया, वहीं देहरादून से खबर आयी है कि अपनी उपेक्षा से आहत प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष यशपाल आर्य ने भी अपने निवास पर गुरूवार 15 मार्च को विधायकों के समक्ष इस्तीफे देने की बात कह कर सबको हैरान कर दिया। समाचार पत्रों में छपी खबर के अनुसार बाद में यशपाल आर्य को मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा ने किसी प्रकार से मना कर विधानसभा में ले गये। कुल मिला कर कांग्रेस के भी दिन भाजपा की तरह इतने बुरे आ गये है कि उनके मठाधीशों की बुद्धि पर महाकाल ने पर्दा डाल दिया है ये अब आपसी द्वंद में उलझ कर खुद ही जनता की नजरों में इतना गिर जायेंगे कि जनता इनको प्रदेश की राजनीति में उप्र की तरह कुछ समय बाद हाशिये में डाल देगी। भले ही कांग्रेस ने अपने असंतुष्टों को निवाला दे कर कुछ समय के लिए इस संकट को हल करने का काम किया परन्तु उत्तराखण्ड के साथ खिलवाड करने वालों को महाकाल कभी माफ नहीं करता।
प्रदेश की जनता इस बात से हैरान है कि भाजपा व कांग्रेस का आला नेतृत्व क्या इतना बौना है कि उनको जमीनी सच्चाई तक नहीं दिखाई देती। या इतना निकम्मा और संकीर्ण है कि उनको जातिवाद और अपना निहित स्वार्थ के अलावा जनहित कहीं दूर-दूर तक नहीं दिखाई देता। जिस प्रकार से राज्य गठन के बाद प्रदेश में भाजपा व कांग्रेस के आला नेतृत्व ने प्रदेश में अपनी सरकार का मुखिया जननेताओं के बजाय अपनी जाति के लोगों स्वामी, तिवारी, खंडूडी, निशंक के बाद अब बहुगुणा थोपा, उससे पूरे प्रदेश में गहरा आक्रोश हैं। प्रदेश में लोकशाही को रौंदकर केवल जातिवाद फेलाने वाली भाजपा व कांग्रेस को भगवान हरि हर की पावन देवभूमि कभी माफ नहीं करेगी। इनको अभिशाप लग गया है देवभूमि का, भाजपा व कांग्रेस ने जो खिलवाड़ उत्तराखण्ड के समाज को जातिवाद के दंश से तबाह करने के लिए किया उससे यहां के लोगों को ब्राहमण, ठाकुर व अजा आदि में बांटने का कुकृत्य चला। उसका जवाब उत्तराखण्ड की जनता इन दोनों दलों का सफाया करके चुका रही हैं। दोनों दल व दोनों दलों के ये मोहरे उत्तराखण्ड की जनांकांक्षाओ ंपर अपनी संकीर्ण कुशासन से ग्रहण लगा रहे है। उत्तराखण्ड की जनता को चाहिए कि जो भी सरकार आये या जो भी व्यक्ति आये जो जनांकांक्षाओं को साकार करने के बजाय अपने निहित स्वार्थो व संकीर्णता से उत्तराखण्ड के हितों को रौंदे तो उस कुशासक को उखाडने के लिए एकजूट हों। आज इनके कुशासन से उत्तराखण्ड की स्थाई राजधानी गैरसेंण नहीं बन पायी, मुजफरनगर काण्ड के अभियुक्तों को दण्डित नहीं कर पाये, उत्तराखण्ड में जनसंख्या पर आधारित परिसीमन के दंश से नहीं बचा पाये, उत्तराखण्ड को भ्रष्टाचार का अड्डा बना दिया, उत्तराखण्ड की प्रतिभाओं को संवेधानिक पदों पर आसीन करने के बजाय दिल्ली के हुक्मरानों के प्यादों को आसीन करके उत्तराखण्ड के हक हकूकों से खिलवाड़ किया जा रहा है। इसके लिए जो लोग उत्तराखण्ड की भाषा, संस्कृति व लोगों से दूरी बताते है , जो कभी उत्तराखण्ड के हितों की रक्षा के संघर्ष में दूर दूर तक सामिल नहीं रहे ऐसे सत्तालोलुपुओं को उत्तराखण्ड का मुखिया बनने का कोई नैतिक हक नहीं है। कांग्रेस को कई सालों से मै इस आश से पक्ष ले रहा था कि क्योंकि भाजपा भी घोर जातिवाद के साथ दिशाहीन नेतृत्व का शिकार है। अब वही शर्मनाक कृत्य कांग्रेस कर रही है तो उसको एक पल के लिए देश की सत्ता में आसीन रहने का हक नहीं है। मेरी इच्छा है कि देश का नेतृत्व अब आगामी लोकसभा चुनाव में नीतिश कुमार या अन्य करें। मुलायम सिंह व भाजपा को इस सरकार का नेतृत्व करने का कोई हक महाकाल न दे। देश की लोकशाही को अपनी संकीर्णता से कलंकित करने का जो भी दुशाहस करे उसको देवभूमि कभी माफ नहीं करेगी। चाहे कांग्रेस हो या भाजपा या कोई अन्य। शेष श्रीकृष्ण कृपा। हरि औम तत्सत्। श्रीकृष्णाय् नमो।

-काला बाबा से सीख लें श्री श्री रविशंकर सहित पंचतारा संत/

-सरकारी विद्यालयों में पढ़ने वालों की मिले सरकारी नौकरी/
-काला बाबा से सीख लें श्री श्री रविशंकर सहित पंचतारा संत/

भले ही दुनिया में अरबों की दौलत व लाखों भक्तों से सम्पन्न विश्व प्रसिद्ध आध्यात्मिक गुरू रविशंकर जी अथाह दौलत व सौहरत पाने के बाद देश के 40 प्रतिशत गरीब लोगों के भविष्य पर कुठाराघात करते हुए ‘सरकारी स्कूलों को नक्सली विचार की फेक्टरी बता कर, सरकारी स्कूलों को बंद करके विद्या का व्यापार करने की बिना मांगे आत्मघाति सलाह सरकार को देने की हिमालयी भूल करते। एक तरफ में आज के इन पंचतारा तथाकथित स्वामियों को देखता हूूॅ तो मुझे बरबस याद आती है महान रहस्यमय शक्तियों के स्वामी काला बाबा की। जो देश की दुर्दशा पर कहते थे ‘ इस देश में विद्या व्यापार, धर्म व्यापार, राजनीति व्यापार व न्याय-चिकित्सा व्यापार बन गयी हे। इन देश के लूटेरे बने हुक्मरानों ने देश को मजबूत बनाने वाली हर संस्था व्यापार में तब्दील कर दी हे।’ काला बाबा आज के तथाकथित पंचतारा संस्कृति में जीने वाले तथाकथित साधुओं को भेसधारी कह कर उपहाश उडाते थे। काला बाबा हमेशा खण्डरों में, खुले आकाश के नीचे व धूनी में धूप, सर्दी व बारिश में अर्ध नग्न बदन, रूखा सुखा खाने वाले व जनहित व राष्ट्रहित के लिए गुनाहगारों को दण्डित करने का काम करते थे।  काला बाबा  से देश के इंदिरा, अटल, मुरार जी, राव बीपी सिंह सहित अधिकांश हुक्मरान ही नहीं चंद्रां स्वामी जेसे तांत्रिक भी भयभीत रहते थे। वे जनहितों पर कुठाराघात करने वाले हुक्मरानों को जहां जमीदोज करते थे वहीं जनहित के कार्यो में हर पल रत रहते थे।
 परन्तु आज भी देश की अधिसंख्यक जनता की आर्थिक स्थिति इतनी नहीं है कि वे अपने बच्चों को मोटी फीस लेकर अभिवाहकों को लूटने वाले निजी स्कूलों में पढ़ा पाये। लगता है कि आज इस देश के तमाम आध्यात्मिक लोग इस धरती पर नहीं अपितु स्वर्ग में रहते हैं, इनको इस दुनिया का तो कम से कम भान है ही नहीं। अगर इन्होंने अपनी आंखे व दिमाग खोल कर भारत का जमीनी दर्शन किया होता तो वे केवल यही कहते इस देश में विद्या का व्यापार करने वाले इन निजी स्कूलों को तत्काल बद करके केवल उन्हीं लोगों को सरकारी सेवाओं में लिया जाना चाहिए जो सरकारी विद्यालयों में ही पढ़ा हो।

Tuesday, March 20, 2012

भाजपा व कांग्रेस की नहीं जरूरत है आज उत्तराखण्ड में क्षेत्रीय दल की


-भाजपा व कांग्रेस की नहीं जरूरत है आज उत्तराखण्ड में क्षेत्रीय दल की/
-मुर्दो से कब्रिस्तान सजते हैं बस्तियां आबाद नहीं होती
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आज उत्तराखण्ड में भाजपा व कांग्रेस जैसे दिशाहीन आला कमान व उनके संकीर्ण प्यादों द्वारा चलाये जाने वाले राजनैतिक दलों की जरूरत नहीं अपितु प्रदेश के हितों के लिए राजनीति करने वाले क्षेत्रीय राजनैतिक दल की है। उत्तराखण्ड के सत्तासीन नेताओं ने अपनी संकीर्णता और पदलोलुपता के कारण प्रदेश के मान सम्मान व संसाधनो पर ग्रहण लगा दिया है। संकीर्ण दलीय स्वार्थ में अंधे इन नेताओं को न तो प्रदेश के शहीदों की शहादत का भान है व नहीं प्रदेश के हक हकूकों व मान सम्मान की रक्षा का। आज प्रदेश को तिवारी, खण्डूडी व निशंक के बाद बहुगुणा जेसे नेताओं को ढोना पड़ रहा है। आज इनके कारण ही राज्य गठन के 12 साल बाद भी प्रदेश में मुजफरनगर काण्ड के अभियुक्तों को दण्डित करने की ईमानदारी से पहल तक नहीं की गयी। प्रदेश की स्थाई राजधानी गैरसैंण को स्थापित न करके देहरादून में स्थापित करने का शर्मनाक षडयंत्र किया गया। विश्व में ईमानदारी के लिए विख्यात उत्तराखण्ड आज राज्य गठन के 12 सालों में ही देश का सबसे भ्रष्टत्तम राज्य बन गया है। इन उत्तराखण्ड विरोधी हुक्मरानों के शर्मनाक मौन के कारण ही राज्य में जनसंख्या पर आधारित परिसीमन थोप दिया गया जबकि पूर्वोत्तर के राज्यों व झारखण्ड की जागरूक सरकारों ने इसके दंश से अपने प्रदेश को बचा दिया। इन कुशासको ने प्रदेश में हिमाचल की भांति प्रदेश के संसाधनों पर गिद्द दृष्टि जमाये हुए भू-जल व जंगल माफियाओं से बचाने का स्थाई कानून तक नहीं बनाया। यही नहीं प्रदेश के महत्वपूर्ण पदों पर भी उत्तराखण्ड की प्रतिभाओं के बजाय दिल्ली दरवार के मठाधीश बने बाहर के नेताओं के प्यादों को आसीन करने की शर्मनाक होड़ देखी गयी। इस समय मुख्यमंत्री के लिए कांग्रेस के अंदर का असंतोष प्रदेश के हित में है। जिस प्रकार से चंद दिल्ली दरवार के दलालों ने कांग्रेस पार्टी व उत्तराखण्ड के हितों को दरकिनारे करके अधिकांश विधायकों के विरोध के बाबजूद प्रदेश का मुख्यमंत्री के पद पर कांग्रेसी सांसद विजय बहुगुणा को बना दिया। उससे कांग्रेस के नेताओं में उमडे असंतोष से उत्तराखण्ड की जनता चाहती है कि कांग्रेस पार्टी टूट कर यहां पर क्षेत्रीय दल का गठन किया जाय, जो प्रदेश की जनता के इस अंध विश्वास को बदल सकें कि केवल राज कांग्रेस व भाजपा ही चला सकती है। प्रदेश में मजबूत क्षेत्रीय दल का होना यहां पर भाजपा व कांग्रेस द्वारा इन 12 सालों मे कुशासन से मचाई गयी तबाही से उबारने के नितांत आवश्यक है। इसके लिए वर्तमान में तमाम क्षेत्रीय दल इन दलों का चक्रव्यूह नहीं तोड़ पा रहे हैं, इस लिए अब समय की यही पुकार है कि यह क्षेत्रीय दल भाजपा या कांग्रेस के असंतुष्टों द्वारा ही गठन किया जाय। भाजपा के असंतुष्टो द्वारा बनाया गया क्षेत्रीय दल उत्तराखण्ड रक्षा मोर्चा तो 4 माह में अपना स्थान बना चूका है। परन्तु अब इस समय कांग्रेस के असंतुष्ट जो कद्दावर नेता हरीश रावत के नेतृत्व में पार्टी नेतृत्व द्वारा थोपे गये प्रदेश के मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा के खिलाफ निंतरतर सोनिया गांधी से उत्तराखण्ड के लिए न्याय की गुहार लगा रहे है। इस मुहिम में हरीश रावत के साथ डेढ़ दर्जन कांग्रेसी विधायकों का समर्थन बताया जा रहा है। वहीं मुख्यमंत्री के प्रबल दावेदार रहे डा. हरक सिंह रावत किसी भी कीमत पर विजय बहुगुणा सरकार में मंत्री बनने के लिए तैयार नहीं है। सरकार में मंत्री कोन बने या न बने परन्तु हमारी दिलचस्पी यही है कि जो भी सरकार उत्तराखण्ड की बने उसमें साफ छवि के जनहितों के लिए समर्पित नेता ही मंत्री हो। इसके साथ यही प्रयास रहेगा कि भाजपा व कांग्रेस के जनविरोधी सरकारों को यहां से उखाड़ने के लिए मजबूत क्षेत्रीय दल यहां पर स्थापित हो। इसी प्रयास में मैं कार्यरत हॅू। मेरी इच्छा है भाजपा व कांग्रेस के नेताओं में आपसी सत्तासंघर्ष बढ़े इनके अपने निहित स्वार्थ के द्वंद के कारण इनकी जनविरोधी सरकारें व दल धरासायी हो। क्योंकि मुझे इस बात का पूरा भान है कि क्षेत्रीय दल को यहां पर अपना अस्तित्व बनाने के लिए स्थानीय मुद्दों को वरियता देनी पडेगी। यहां की जनांकांक्षाओं को अपनी राजनीति का हथियार बनाना पडेगा। प्रदेश के हितों के बारे में भाजपा व कांग्रेस जैसे राष्ट्रीय दलों का एक पाई का भी रूझान नहीं है।
आज उत्तराखण्ड में जनहितों का गला घोंटने के इन राष्ट्रीय दलों के कुकृत्यों को देख कर मुझे इस चीज का भान हो गया कि इनके इसी जनविरोधी प्रवृति के कारण आज देश के अधिकांश राज्यों में इन दोनों दलों का एक प्रकार से सूर्यास्त ही हो रहा है। हालांकि यह प्रवृति राष्ट्र की एकता व अखण्डता के लिए काफी खतरनाक है। परन्तु जब तक इस प्रकार के जनविरोधी दल सत्तासीन रहेंगे तब तक देश की एकता अखण्डता व विकास के लिए दुश्मन देश नहीं अपितु ये दल ही सबसे बडे दुश्मन साबित हो रहे है। इसलिए कुछ समय के लिए जब तक कोई दिशावान राष्ट्रीय दल देश की राजनीति में मजबूती से स्थापित न हो तब तक देश में जनहितों के लिए समर्पित क्षेत्रीय दलों का उदय भी देश के हित में ही है। भले ही संघ सहित तमाम संगठन क्षेत्रीय दलों के बढ़ते प्रभाव से चिंतित हैं परन्तु भाजपा व कांग्रेस के मूलाधार ये संगठन ही आज राष्ट्रीय दलों के पतन के कारण है। आज इन दोनों दलों के मूलाधार संघ व गांधी परिवार की पकड़ जनता में कमजोर हो गयी है। इसी कारण इन दोनों के द्वारा संचालित भाजपा व कांग्रेस जैसे दलों में आज जननेताओं के बजाय कटोरी के प्यादों को वरियता मिल रही है। इसी कारण देश के हर प्रदेश से इनका जनांधार निरंतर सिकुड़ता ही जा रहा है। उत्तराखण्ड इसका प्रत्यक्ष उदाहरण है। इसी कारण  दोनों दलों का आला नेतृत्व जननेता भगतसिंह कोश्यारी  व हरीश रावत तथा सतपाल महाराज को नजरांदाज करके कभी निशंक व कभी बहुगुणा जेसे नेताओं को पदासीन कर देता है। भले ही आज डा हरक सिंह आज प्रदेश सरकार में सम्मलित होने के लिए तैयार नहीं है। वहीं उनको मनाने के प्रयास चल रहे हैं। जनता राष्ट्रीय दलों से इतनी परेशान है कि उनको डा हरक सिंह के दो टूक धिक्कार ही पसंद आ रही है।
आज उत्तराखण्ड की जनता की दिली इच्छा है उत्तराखण्ड विरोधी कांग्रेस व भाजपा के शिकंजे से मुक्त होने का।
क्योंकि भाजपा व कांग्रेस का दिशाहीन नेतृत्व कभी जनहितों के लिए समर्पित नेताओं के बजाय थेलीशाहों को ही अपनी संकीर्ण स्वार्थों की पूर्ति के लिए वरियता देगा। इन दलों का आला नेतृत्व जनहितों के लिए समर्पित जननेता के बजाय संकीर्ण जातिवादी व अपनी तिजोरी भरने वालों को देश व प्रदेश के मंत्री -मुख्यमंत्री सहित महत्वपूर्ण पदों पर आसीन करते है। इस कारण इन पदासीन मुख्यमंत्रियों का सारा समय अपने आकाओ की जी हजूरी व उनकी तिजोरियां भरने में ही निपट जाता है। प्रदेश की जनांकांक्षाओं को साकार करना तो रहा दूर इस दिशा में सोचने के लिए उनके पास वक्त ही नहीं होता है। इसी कारण आज उत्तराखण्ड की यह दुर्दशा हो रखी है। इसी कारण लोग समझ गये हैं कि जनहितों को साकार करने के लिए आज प्रदेश में भाजपा या कांग्रेस की नहीं अपितु क्षेत्रीय दलों की जरूरत प्रदेश को है।  जरूरत है जनता को इस दिशा में गंभीरता से सोच विचार करके केवल साफ छवि के राजनेताओं को चुनावी जंग में विजय बनाने की। अगर प्रदेश की जनता ऐसे नक्कारे भ्रष्ट राजनेताओं को चुनावी जंग में ही हराने का काम करती है तो प्रदेश का काफी भला होगा। इसलिए आज उत्तराखण्ड के सामाजिक संगठनों, बुद्धिजीवियों, पत्रकारों व साहित्यकारों से आशा करता हॅू कि वे प्रदेश के हितों की रक्षा के लिए एक मजबूत क्षेत्रीय दल का गठन करें। शेष श्रीकृष्ण कृपा। हरि औम तत्सत्।श्रीकृष्णाय् नमो।

1947 में पाक से कश्मीर में आये लाखों लोगों को नागरिकता से वंचित रखना देश के हुक्मरानों का अक्षम्य अपराध व देश पर कलंक है।


1947 में पाक से कश्मीर में आये लाखों लोगों को नागरिकता से वंचित रखना देश के हुक्मरानों का अक्षम्य अपराध व देश पर कलंक है। 
आज 20 मार्च को मैं सांय को साढे तीन बजे जैसे  ही संसद की चैखट, राष्ट्रीय धरना स्थल, जंतर-मंतर पर पंहुचा तो वहां पर मेरी नजर एक धरने पर लगे बेनर पर गयी तो मेरा सर शर्म से झुक गया। आजादी हासिल करने के 64 साल बाद भी हम 1947 में देश में शरणार्थी हुए हजारों  लोगों को भारत की कश्मीर क्षेत्र की नागरिकता तक नहीं दी ।  सेकड़ों लोग इस धरने में बेठे थे। उस पर बैनर लगा हुआ था कि 1947 में पाकिस्तान से कश्मीर में आये लाखों लोगों को अभी तक भारत की नागरिकता तक प्रदान नहीं की गयी। इससे बड़ा भारतीयों के लिए दूसरी क्या बात शर्मनाक होगी। देश में  आजादी के 64 सालों में भले ही पांच दशक तक कांग्रेसी सरकारें देश की सत्ता में आसीन रही परन्तु देश की सत्ता में  जनता पार्टी, भारतीय संस्कृति के स्वयंभू ध्वजवाहक कहने वाले राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ द्वारा पोषित भाजपा नेतृत्व वाली अटल बिहारी वाजपेयी की सरकारें सहित अन्य तीसरे मोर्चे की सरकारें सत्तासीन रही। परन्तु किसी को भी पाकिस्तान से भारत के कश्मीर में 1947 को आये लोगों को आज आजादी के 64 साल बाद भी देश की नागरिकता नहीं मिली। इनका कसूर केवल यही है कि ये हिन्दू धर्मावलम्बी हैं। अगर ये मुस्लिम होते तो इनको बहुत पहले ही देश की  नागरिकता प्रदान कर लिया जाता। आज देश में 5 करोड़ से अधिक बंगलादेशी देश के नागरिक है। परन्तु क्या मजाल है कोई जनप्रतिनिधी इस दिशा में एक पल के लिए समर्पित हो। राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ अपनी सरकारों में यह काम क्यों नहीं बता पाये। सत्ता में रहते हुए अटल मनमोहन सरकार को अमेरिका का भान रहता है परन्तु देश की भाषा, संस्कृति, हक हकूकों और देश वासियों के आत्मसम्मान की रक्षा के दायित्व का कैसे भान नहीं रहा। मुझे लगा इसके लिए देश का हर नागरिक और हर राजनेतिक दल गुनाहगार है। आज इस मामले पर अण्णा हजारे क्यों मौन है? आज इस मुद्दे पर संघ व पोषित भाजपा के पास कोई जवाब है। कांग्रेस को तो केवल देश में अल्पसंख्यकों की चिंता के अलावा किसी अन्य लोगों की चिंता ही नहीं रही। देश की मीडिया व पूरी व्यवस्था की शर्मनाक मूकता पर यह बदनुमा कलंक है।

Friday, March 16, 2012

बचाओ दिल्ली दरवार के कुत्तों से

बचाओ दिल्ली दरवार के कुत्तों से
दिल्ली दरवार के कुत्ते भी ,
हमारे यहां शेर होते हैं.।
नौचते हैं वे हमी को,
पर हम बेखबर होते हैं
फरिश्ता मानते हैं हम उनको
जो चंगेज बन हमको लूटते हैं
हमारे सपनों को ही नहीं
ये वर्तमान को भी डंसते हैं।
अब जाग जाओं गुनाहगारों को
मशीहा मानने वाले साथियो ।
इन सत्तालोलुप भैडियों को
पहचान लो जरा साथियो।
जातिवाद भ्रष्टाचार के है पोषक
ये मानवता के दुश्मन है साथियो।
इन मायवी राक्षसों से देवभूमि
आओ मिल कर बचाओं साथियो।।
खदेड़ो दिल्ली दरवार के कुत्तों को
कहीं वतन लुट न जाये साथियो।।
अब मशीहा न बनाओं इन गुनाहगारों को
खुद मशीहा बनो देश की रक्षा के खातिर।।
-देवसिंह रावत(17मार्च 2012 सुबह 9.41)

(उत्तराखण्ड में जिस प्रकार से भाजपा कांग्रेस ने अपने सत्तालोलुपु यादों को मुख्यमंत्री के रूप में थोप कर देवभूमि को जातिवाद, भ्रष्टाचार रूपि कुशासन से दस सालों में भारत का सबसे ईमानदार क्षेत्र को सबसे भ्रष्ट बना दिया है। उसी पर कटाक्ष करने वाली यह कविता उत्तराखण्ड के आम जनमनानस को जागृत करने के लिए है कि है उत्तराखण्ड की महान जनता आप इन दिल्ली की भाजपा व कांग्रेस नामक सत्ता लोलुपु दलो के मोहपाश में न फंस कर खुद अपने भाग्य के विधाता बनो और देश की लोकशाही की रक्षा करो।)

Thursday, March 15, 2012

भाजपा के साथ कांग्रेस पर भी लगी महाकाल की वक्रदृष्टि

भाजपा के साथ कांग्रेस पर भी लगी महाकाल की वक्रदृष्टि/
हरीश रावत के बाद यशपाल ने भी दी इस्तीफे की धमकी
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‘जाको प्रभु दारूण दुख देही, ताकी मति पहले हर लेई’ यह उक्ति आजकल भाजपा व कांग्रेस पर सटीक बैठ रही है। भगवान भी कांग्रेस व भाजपा के कृत्यों पर अब अंकुश लगाने के लिए मन बना चूका है। लगता है कांग्रेस अब कांग्रेस के बुरे दिन आ गये, उन पर भी भाजपा की तरह महाकाल का वक्र दृष्टि लग गयी है। हर काम उल्टा पुलटा ही हो रहा है। उत्तराखण्ड में बड़ी कठिनाई से कांग्रेस ने विधानसभा में चुनावी मैदान मारा, परन्तु कांग्रेस आला नेतृत्व के आंख कान बने आत्मघाति संकीर्ण जनविरोधी भ्रष्ट सलाहकारों की सलाह पर सोनिया गांधी ने देश के सबसे वरिष्ठ जननेता हरीश रावत या जनहितों के लिए समर्पित सतपाल महाराज को मुख्यमंत्री बनाने के बजाय विजय बहुगुणा को मुख्यमंत्री बना कर प्रदेश की जनभावनाओं को रौंद ने का कृत्य करके पूरे प्रदेश में भूचाल ला दिया। इससे आक्रोशित केन्द्रीय मंत्री हरीश रावत के नेतृत्व में सांसद प्रदीप टम्टा,  सहित डेढ़ दर्जन विधायकों  ने विद्रोह कर दिया, वहीं देहरादून से खबर आयी है कि अपनी उपेक्षा से आहत प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष यशपाल आर्य ने भी अपने निवास पर गुरूवार 15 मार्च को विधायकों के समक्ष इस्तीफे देने की बात कह कर सबको हैरान कर दिया। समाचार पत्रों में छपी खबर के अनुसार बाद में यशपाल आर्य को मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा ने किसी प्रकार से मना कर विधानसभा में ले गये। कुल मिला कर कांग्रेस के भी दिन भाजपा की तरह इतने बुरे आ गये है कि उनके मठाधीशों की बुद्धि पर महाकाल ने पर्दा डाल दिया है ये अब आपसी द्वंद में उलझ कर खुद ही जनता की नजरों में इतना गिर जायेंगे कि जनता इनको प्रदेश की राजनीति में उप्र की तरह कुछ समय बाद हाशिये में डाल देगी।
प्रदेश की जनता इस बात से हैरान है कि भाजपा व कांग्रेस का आला नेतृत्व क्या इतना बौना है कि उनको जमीनी सच्चाई तक नहीं दिखाई देती। या इतना निकम्मा और संकीर्ण है कि उनको जातिवाद और अपना निहित स्वार्थ के अलावा जनहित कहीं दूर-दूर तक नहीं दिखाई देता। जिस प्रकार से राज्य गठन के बाद प्रदेश में भाजपा व कांग्रेस के आला नेतृत्व ने प्रदेश में अपनी सरकार का मुखिया जननेताओं के बजाय अपनी जाति के लोगों स्वामी, तिवारी, खंडूडी, निशंक के बाद अब बहुगुणा थोपा, उससे पूरे प्रदेश में गहरा आक्रोश हैं। प्रदेश में लोकशाही को रौंदकर केवल जातिवाद फेलाने वाली भाजपा व कांग्रेस को भगवान हरि हर की पावन देवभूमि कभी माफ नहीं करेगी। इनको अभिशाप लग गया है देवभूमि का, भाजपा व कांग्रेस ने जो खिलवाड़ उत्तराखण्ड के समाज को जातिवाद के दंश से तबाह करने के लिए किया उससे यहां के लोगों को ब्राहमण, ठाकुर व अजा आदि में बांटने का कुकृत्य चला। उसका जवाब उत्तराखण्ड की जनता इन दोनों दलों का सफाया करके चुका रही हैं। दोनों दल व दोनों दलों के ये मोहरे उत्तराखण्ड की जनांकांक्षाओ ंपर अपनी संकीर्ण कुशासन से ग्रहण लगा रहे है। उत्तराखण्ड की जनता को चाहिए कि जो भी सरकार आये या जो भी व्यक्ति आये जो जनांकांक्षाओं को साकार करने के बजाय अपने निहित स्वार्थो व संकीर्णता से उत्तराखण्ड के हितों को रौंदे तो उस कुशासक को उखाडने के लिए एकजूट हों। आज इनके कुशासन से उत्तराखण्ड की स्थाई राजधानी गैरसेंण नहीं बन पायी, मुजफरनगर काण्ड के अभियुक्तों को दण्डित नहीं कर पाये, उत्तराखण्ड में जनसंख्या पर आधारित परिसीमन के दंश से नहीं बचा पाये, उत्तराखण्ड को भ्रष्टाचार का अड्डा बना दिया, उत्तराखण्ड की प्रतिभाओं को संवेधानिक पदों पर आसीन करने के बजाय दिल्ली के हुक्मरानों के प्यादों को आसीन करके उत्तराखण्ड के हक हकूकों से खिलवाड़ किया जा रहा है। इसके लिए जो लोग उत्तराखण्ड की भाषा, संस्कृति व लोगों से दूरी बताते है , जो कभी उत्तराखण्ड के हितों की रक्षा के संघर्ष में दूर दूर तक सामिल नहीं रहे ऐसे सत्तालोलुपुओं को उत्तराखण्ड का मुखिया बनने का कोई नैतिक हक नहीं है।

ममता बनर्जी का विरोध छवि बनाने का हथकण्डा या जनहित समर्पित नेत्री


ममता बनर्जी का विरोध  छवि बनाने का हथकण्डा या जनहित समर्पित नेत्री 
ममता बनर्जी द्वारा अपने की दल के रेल मंत्री दिनेश त्रिवेदी द्वारा प्रस्तुत रेल बजट 2012 में की गयी रेल यात्री किराये में बृद्धि का प्रखर विरोध कर मनमोहनी सरकार को कटघरे में खड़ा करने के साथ-साथ जनता के बीच अपनी जनकल्याणकारी नेत्री की छवि बनाने में कामयाब हुई। परन्तु इस प्रकरण में दो बाते बहुत ही रहस्यमय लग रही है। इसका पहला कारण यह है कि यह रेल बजट खुद ममता बनर्जी की पार्टी तुणमूल कांग्रेस के कोटे से मंत्री बने दिनेश त्रिवेदी द्वारा  रेल बजट 2012 को प्रस्तुत किया गया। यह बात भी गले नहीं उतर रही है कि जिस ममता बनर्जी के तैवरों से आम आदमी आशंकित रहता है, उसी ममता बनर्जी की पार्टी का संासद सं मंत्री बना दिनेश त्रिवेदी ममता के व्यवहार से किस प्रकार अनविज्ञ रह सकता है। जबकि ममता बनर्जी खुद कई बार इस बात का ऐलान कर चूकी थी कि रेल किराया की बढ़ोतरी किसी कीमत पर स्वीकार नहीं की जायेगी। इस प्रवृति का जानकार मंत्री त्रिवेदी क्यों बंगाल की शेरनी को क्यों नाराज करेगे। आज इस बात का सुखद आश्चर्य है कि जनविरोधी राजनीति में ममता बनर्जी जैसी जनहितों के लिए राजनीति करने वाली नेत्री हमारे बीच में है। ममता बनर्जी ने चाहे किसी भी उदेश्य से इस जनहितों को मंहगाई से रौंदने वाली राजनीति में जीवंत है। काश ममता बनर्जी जेसे दबंग महिला हर प्रदेश में होता तो देश की तस्वीर ही बदल जाती।

Wednesday, March 14, 2012

उत्तराखण्ड की लोकशाही को कांग्रेस भाजपा के जातिवादी दलालों से बचाओ


उत्तराखण्ड की लोकशाही को  कांग्रेस भाजपा के जातिवादी दलालों से बचाओ 
मेरा तमाम बुद्धिजीवियों से निवेदन है कि उत्तराखण्ड की लोकशाही के लिए वे एकजूट हो कर इसको अपनी जातिवादी व पदलोलुपु संकीर्णता से तबाह कर रहे भाजपा व कांग्रेस के आला नेतृत्व के कुकृत्यों के खिलाफ एकजूट हो। तुम तीर पर तीर चलाओ कोई बात नहीं, हम जख्म भी दिखायें तो तुम रो पडे। उत्तराखण्ड राज्य गठन के बाद जिस प्रकार से भाजपा व कांग्रेस के आलानेतृत्व के थोपे गये तिवारी, खण्डूडी व निशंक जैसे पदलोलुपु उत्तराखण्ड विरोधी मोहरों ने भ्रष्टाचार, जातिवाद व क्षेत्रवाद से देश के सबसे भ्रष्टाचारी राज्य बना कर लोकशाही को ही तबाह कर दिया है। भाजपा व कांग्रेस के आला नेतृत्व ने यहां के जमीनी स्थापित नेतृत्व को दरकिनारे करके जिस प्रकार से अपने जातिवादी संकीर्णता को थोपते हुए यहां पर सदियों से स्थापित सामाजिक भाई चारे को तार तार करने का घृर्णित कृत्य किया है। उसको बेनकाब होने पर उत्तराखण्ड के कुछ लोगों को बुरा लग रहा है। होना चाहिए था कि तमाम बुद्धिजीवी एकजूट हो कर यहां पर भाजपा व कांग्रेस के इस षडयंत्र का विरोध करके उत्तराखण्ड की रक्षा में जनता को जागृत करते। परन्तु ये लोग भाजपा व काग्रेस का उत्तराखण्ड को तबाह करने वाला शैतानी चैहरा बेनकाब करने वालों का ही विरोध करने का काम करके समाज को फिर जातिवादी संकीर्णता के गर्त में धकेल रहे है। मै जाति, धर्म, क्षेत्र, भाषा, लिंग व नस्ल के नाम पर अपने को श्र्रेष्ट व दूसरों को हेय समझने वालों को मानवता का ही नहीं ईश्वरीय सृष्टि का दुश्मन मानता हॅू। यह विवाद व्यक्तियों का विवाद नहीं अपितु उत्तराखण्ड को अपनी जागीर समझ कर अपने नक्कारे प्यादों को थोपने वाले भाजपा व कांग्रेस के आलानेतृत्व के जातिवादी सकीर्ण अलोकशाही सोच के विरोध में लोकशाही को स्थापित करने के लिए है। जो लोग इस विवाद को हरीश रावत या विजय बहुगुणा का विवाद मानते है, उनको जनता को यह बताना चाहिए कि वे बताये विजय बहुगुणा को क्यों प्रदेश का मुख्यमंत्री बनाना चाहिए था, क्या ये इस थोपे गये मोहरे के समर्थन में जनता की आवाज को जातिवादी बताने वाले बतायें कि बहुगुणा जी की किस प्रतिभा से वे उतराखण्ड का विकास करना चाहते है। क्या मुम्बई हाईकोर्ट में न्यायमूर्ति रहते हुए उनके गौरवशाली सेवाओं के लिए या उत्तराखण्ड समाज के हितों पर मूक रहने के लिए? वे किस मुंह से प्रदेश में तिवारी की नियुक्ति का समर्थन कर रहे है? वे किस मुंह से निशंक को प्रदेश का भाग्यविधाता बनाने का समर्थन कर रहे है? वे क्यों बहुगुणा को बनाये जाने का समर्थन कर रहे है? जबकि हमारा संविधान साफ साफ कहता है कि मुख्यमंत्री बहुमत दल के विधायकों के नेता को बनाया जाता है। जब भाजपा व कांग्रेस में विधायकों की राय को नजरांदाज करके बलात जातिविशेष के लोगों को 12 साल से थोपा जाय तो उसे ये क्यो समर्थन कर रहे है? क्या इनके इन नपाक कृत्यों का विरोध करने वाले जातिवादी हो गये और प्रदेश में जातिवादी अलोकशाही के समर्थक मशीहा हो गये? कितना दुर्भाग्य हे कि ऐसे लोगों की आत्मा कहां दम तोड़ चूकी है? क्यों ये लोग अन्याय का विरोध करते है? हमारी संस्कृति को सिखाती है कि न्यायार्थ निज बंधु को भी दण्ड देना धर्म है और स्व व पर से उपर उठ कर अन्याय का विरोध करना। परन्तु स्व के गुनाहों का पक्ष लेना कभी समाज के हितकर नहीं है।
जिसके पास विधायकों का समर्थन ही नहीं है। यह उनके शपथ ग्रहण समारोह में उजागर हो गया कि उनके पास केवल आधा दर्जन विधायक है। जो भी विधायक शपथ ग्रहण में दिखे वे अधिकांश विधायक सतपाल महाराज के साथ है। 36 विधायको की समर्थन वाले कांग्रेसी इस सरकार में निर्दलीय व बसपा विधायकों को अगर हटा दिया जाय तो  शपथ ग्रहण में उपस्थित सरकार चलाने के लिए जरूरी विधायकों की संख्या के आधी भी वहां पर उपस्थित नहीं थी।  क्या सच्चाई उजागर करना गलत है? राज्य गठन के बाद उत्तराखण्ड विरोधी नारायण दत्त तिवारी को विधायक न रहते हुए थोपना क्या उत्तराखण्डियों व लोकशाही का गलाघोंटना नहीं था? जबकि उस समय भी अधिकांश विधापयक तत्कालीन प्रदेश अध्यक्ष हरीश रावत के समर्थन कर रहे थे। उसके बाद 2007 में अधिकांश विधायकों के समर्थन के बाद भी भगतसिंह कोश्यारी को मुख्यमंत्री बनाने के बाबजूद भाजपा नेतृत्व ने बलात उत्तराखण्ड में विधायक न रहते हुए भी खंडूडी जी को थोप दिया। उसके बाद लोकसभा चुनाव में जब पूरे प्रदेश से भाजपा का सफाया हो गया तो विधायकों की मांग पर कोश्यारी जी को मुख्यमंत्री बनाने के बजाय जिस तरह से निशंक को मुख्यमंत्री का ताजसोंपा गया उससे उत्तराखण्ड की लोकशाही पर आज भी प्रश्न चिन्ह लगा हुआ है। अब 2012 के विधानसभा चुनाव में 32 कांग्रेसी विधायकों में से 18 विधायक जब हरीश रावत को मुख्यमंत्री के रूप में देखना चाहते है तो वे कोन लोकशाही के दुश्मन है जिन्होंने लोकशाही का गला घोंट कर विजय बहुगुणा को प्रदेश का मुख्यमंत्री बनाया। यही नहीं इन तीनों मुख्यमंत्री के कार्यकाल में जिस प्रकार से प्रदेश के अधिकांश महत्वपूर्ण पदों पर जातिवादी वर्चस्व रहा उसके आंकडे चीख चीख कर इनके जातिवादी संकीर्णता को उजागर कर रहे हेै। ऐसे लोकशाही को रौंदने वालों का विरोध करने वालों को ही गलत बनाते वालों की आत्मा तब क्यों दम तोड़ जाती है जब प्रदेश में ऐसा अनर्थ हो रहा है। क्यों ये लोग अपनी संकीर्णता को बेनकाब होते देख कर तिलमिला कर लोगों को उत्तराखण्ड की लोकशाही बचाने  व उत्तराखण्ड के हक हकूकों की रक्षा करने वालों का विरोध करने के लिए अपनी प्रतिभा को दुरप्रयोग कर रहे है। मै किसी भ्रष्टाचारी, दुराचारी, जातिवादी व जनहितों को रौदने वाले को आदमी का भाग्य विधाता बनाये जाने के खिलाफ हूूॅ। मै नहीं चाहता हॅू कि कोई ऐसा व्यक्ति प्रदेश का भाग्य विधाता बन कर प्रदेश को तबाह करे। आज प्रदेश के गठन हुए 12 साल हो गये यहां पर यहां की जमीनों को दिल्ली दरवार के आकाओ व माफियाओं को लुटवाया गया, यहां पर जनसंख्या पर आधारित परिसीमन थोपा गया, प्रदेश की राजधानी गैरसेंण में बनाने के बजाय देहरादून में बलात थोपी गयी, मुजफरनगर काण्ड के अभियुक्तों को दण्डित करने के बजाय उनको शर्मनाक संरक्षण दिया गया, प्रदेश की प्रतिभाओं की उपेक्षा कर बाहर के लोगों को यहां पर थोपा गया। यह सब देखने के बाद भी ऐसे गुनाहगारों का विरोध करने के बजाय उनकी पराजय पर विधवा विलाप करने वालो को लोकशाही का दुश्मन ही कला जा सकता है। ऐसे लोग उत्तराखण्ड की जनता से माफी मांगे। वे बतायें कि क्यों उन्होंने लोकशाही पर जातिवादी व भ्रष्टाचारी ग्रहण लगाने वालो को बेनकाब करने वालों का विरोध करके उत्तराखण्ड के शहीदों की शहादत को कलंकित कर रहे है? मुझे आशा है मेरे सारे मित्र अपने इस विषय पर गंभीरता से विचार कर भाजपा व कांग्रेस के आला नेतृत्व की उत्तराखण्ड की लोकशाही को रौंदने वाली जातिवादी व भ्रष्टाचारी मानसिकता का विरोध करने के अपने दायित्व का विरोध करेंगे। जय श्री कृष्ण ।

Tuesday, March 13, 2012

उत्तराखण्ड में भाजपा कांग्रेस के गुलाम नहीं अपितु ममता जैसे नेताओं की जरूरत

उत्तराखण्ड में भाजपा कांग्रेस के गुलाम नहीं अपितु ममता जैसे नेताओं की जरूरत
जिस प्रकार से उत्तराखण्ड के लोगों ने अपने विकास व सम्मान की रक्षा के लिए दशकों लम्बा संघर्ष करके तथा तमाम शहादतें दे कर भी पृथक उत्तराखण्ड राज्य का साकार किया था। उस राज्य को मात्र 12 सालों में भाजपा व कांग्रेस के तिवारी, खंडूडी व निशंक जैसे संकीर्ण  सत्तालोलुपु प्यादों के कुशासन से देश का सबसे भ्रष्टतम राज्य बना दिया। इनके 12 साल के कुशासन में न केवल प्रदेश की राजनैतिक शक्ति को जनसंख्या पर आधारित परिसीमन से जमीदोज करने का अक्षम्य अपराध किया, अपितु उत्तराखण्ड के आत्मसम्मान को रौंदने वाले मुजफरनगरकाण्ड के अभियुक्तों को भी एक प्रकार से शर्मनाक संरक्षण दिया। वहीं प्रदेश के आमूल विकास के प्रतिक गैरसैंण राजधानी बनाने के बजाय लूट खसोट व अपनी अयाशी के लिए लोकशाही की हत्या करके जबरन राजधानी देहरादून में थोप दी गयी। भाजपा कांग्रेस ने यहां के जनहितों के लिए समर्पित व अनुभवी साफ छवि के नेताओं के बजाय यहां पर जातिवाद व दिशाहीन पदलोलुपुओं को सत्तासीन करके प्रदेश में जातिवाद-क्षेत्रवाद तथा भ्रष्टाचार का अंधा कुशासन दिया। आज पूरा उत्तराखण्ड त्राही त्राही मचा रहा है। परन्तु क्या मजाल है यहां के नेता प्रदेश के हितों व अपने सम्मान की रक्षा के लिए बंगाल की शैरनी ममता बनर्जी की तरह बंगाल के स्वाभिमान की रक्षा के लिए इन दलों को लात मार कर अपना ही एक दल बनाने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहे है। प्रदेश के हितों व यहां की लोकशाही का किस बेशर्मी से कांग्रेस व भाजपा के आला कमान अपमान नित्यानन्द स्वामी, तिवारी, निंशक और अब विजय को मुख्यमंत्री बना कर रहे है।  यहां पर भाजपा व कांग्रेस के आला नेतृत्व को ठुकरा कर जो राजनैतिक विकल्प उत्तराखण्ड रक्षा के लिए देने का सराहनीय प्रयास किया, आज उसको मजबूत करने की जरूरत है। आज प्रदेश को ये दोनों दलों द्वारा रौंदे जा रहे उत्तराखण्ड की रक्षा के लिए यहां के राजनेता ममता बनर्जी के मार्ग का अनुसरण करके प्रदेश को भाजपा व कांग्रेस के चुंगुल से बचायें। 

Monday, March 12, 2012

एक साल पहले से ले लिया गया था बहुगुणा को मुख्यमंत्री बनाने का निणर्य


एक साल पहले से ले लिया गया था बहुगुणा को मुख्यमंत्री बनाने का निणर्य
भले ही कांग्रेस आला कमान ने सांसद विजय बहुगुणा को उत्तराखण्ड का मुख्यमंत्री बनाने का ऐलान 12 मार्च 2012 की सांय 6.3 बजे के बाद किया हो परन्तु  विजय बहुगुणा को ही मुख्यमंत्री बनाने का फेसला कांग्रेस आला नेतृत्व के सबसे ताकतबर नेताओं ने एक साल पहले ही ले लिया था। इस रणनीति का खुलाषा प्यारा उत्तराखण्ड समाचार पत्र में मैने पहले भी किया था कि तिवारी के सबसे करीबी सलाहकार रहे आर्येन्द्र षर्मा को इसी रणनीति के तहत सहसपुर से कांग्रेसी टिकट का दावेदार बनाया गया। आर्येन्द्र षर्मा व विजय बहुगुणा की जुगलबंदी का मुख्य कथा ही मुख्यमंत्री का पद विजय बहुगुणा बनाने के लिए रची गयी। आर्येन्द्र को इसी आधार पर विजय बहुगुणा ने अपनी संसदीय सीट से विधानसभा का प्रत्याषी बनाया कि तिवारी जी की पकड़ का इस्तेमाल वे विजय बहुगुणा को मुख्यमंत्री बनाने के लिए करेंगे। नहीं तो आर्येन्द्र ने तो प्रदेष का मूल निवासी ही है व नहीं कांग्रेस का नेता ही रहा।  विजय बहुगुणा को मुख्यमंत्री बनाने की व्यूह रचना के तहत कांग्रेसी नेता विजय बहुगुणा की संसदीय सीट के अन्तर्गत आने वाली सहसपुर विधानसभा से कांग्रेसी नेताओं को दरकिनारे करके टिकट नवाजा गया। इस अभियान में प्रदेष प्रभारी व केन्द्रीय महासचिव चैधरी बीरेन्द्रसिंह का पूरी सहभागिता रही। इसी के तहत न केवल सहसपुर अपितु रायपुर की सीट भी कांग्रेसी वरिश्ट नेता की यहां से टिकट यहां से काट कर दिया गया। इसके साथ कांग्रेस के खिलाफ तिवारी के विद्रोह का भय दिखा कर तिवारी के कहने पर 4 टिकटें उनके भतीजे व समर्थकों को दी गयी।  तिवारी के समर्थकों को दी गयी अधिकांष सीटों पर कांग्रेस को मुंह की खानी पडी। परन्तु कांग्रेसी अन्य दिग्गजों को इस शडयंत्र का प्यारा उत्तराखण्ड द्वारा खुलाषा किये जाने के बाद भी तनिक सा भी भान नहीं लिया। विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के राहुल गांधी से लेकर अधिकांष नेताओं की सभायें भी इसी क्षेत्र में कराई गयी। जबकि प्रदेष के मुख्यमंत्री खंडूडी के खिलाफ कोटद्वार से चुनाव लड़ रहे कांग्रेसी प्रत्याषी की तमाम मांग के बाद बडे नेताओं को इस क्षेत्र में सभा करने के लिए नहीं लाया गया। गौरतलब है कि भुवनचंद खंडूडी , विजय बहुगुणा के पुफेरे भाई है। सहसपुर कांग्रेस की सबसे सरल सीट थी। दलित व मुस्लिम मतदाताओं की भारी संख्या के बाबजूद लोगों ने कांग्रेसी प्रत्याषी को नक्कार दिया।  कांग्रेसी नेता हरीष रावत, सतपाल महाराज, यषपाल आर्य व हरक सिंह रावत को चुनाव परिणाम आने के बाद भी मुख्यमंत्री बनाने की छदम् प्रतियोगिता में आपस में जानबुझ कर एक दूसरे से उलझाया गया।
कांग्रेसी नेताओं को भरमाया गया कि मुख्यमंत्री सांसदों में से नहीं बनाया जायेगा। एक दूसरे के विरोध कराने का काम कांग्रेस के आला नेतृत्व के करीबी सलाहकारों ने किया। पूरे 5 दिन तक इस प्रक्रिया में जहां विजय बहुगुणा के नाम के साथ आष्चर्यजनक से इंदिरा हेदेष का नाम भी चर्चा में चलाये रखा। जबकि विजय बहुगुणा अपने संसदीय सीट में आधे विधायक भी नहीं जीता पाये। वहीं इंदिरा हृदेष के समर्थन में तीन विधायक भी नहीं रहे। वहीं दूसरी तरफ 18 विधायकों के समर्थन हाषिल करने वाले हरीष रावत व 11 में से 10 विधायकों को विजयी बनाने वाले सतपाल महाराज को जानबुझ कर एक दूसरे से उलझाये रखा। उनको एक दूसरे के विरोध का हवाला देकर विजय बहुगुणा के करीब लाने का प्रयाष किया गया।
सोनिया गांधी के संकीर्ण पदलोलुपु दिल्ली दरवार के मठाधीषों ने प्रदेष में कांग्रेस के दिग्गज नेता हरीष रावत व सतपाल महाराज को दर किनारे करके विजय बहुगुणा को बनाने के लिए कांग्रेस के जड़ों में मटठा डालने का काम किया। उसका भान सोनिया गांधी को समय रहते न लगा यही उनकी असफलता का मूल कारण है। कांग्रेस आला नेतृत्व को अपने इन सलाहकारों को तलब करके पूछना चाहिए कि क्यों इस शडयंत्र का ताना बाना बुन कर कांग्रेस की जड़ों में मटठा डाला गया।

उत्तराखण्ड में बहुगुणा को बना कर जनादेष का अपमान किया कांग्रेस ने

उत्तराखण्ड में बहुगुणा को बना कर जनादेष का अपमान किया कांग्रेस ने/
जातिवादी कार्ड चल कर भाजपा की तरह  कांग्रेस ने की आत्महत्या! /
हरीष रावत, सतपाल महाराज, यषपाल
व हरक सिंह रावत सहित कांग्रेसी विधायक दें इस्तीफा/

उप्र व पंजाब की ं हाल में सम्पन्न हुए विधानसभा चुनाव में जनता द्वारा षर्मनाक रूप से नक्कारे जाने के बाद जिस उत्तराखण्ड प्रदेष ने सत्तासीन भाजपा को सत्ताच्युत कर कांग्रेस को सत्तासीन करने का काम करके उसकी लाज बचायी, उस उत्तराखण्ड प्रदेष में घोर जातिवादी मोह में भाजपा की तरह अंधे हो कर कांग्रेसी नेतृत्व ने भी विजय बहुगुणा को मुख्यमंत्री के रूप में थोप कर लोकषाही को रौंदने का कुकृत्य किया, उसने प्रदेष से व केन्द्र से कांग्रेस का 2014 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेसी ताबूत पर सफाया की कील ठोक दी। कांग्रेस की इस कृत्य से प्रदेष की आम जनता में इस धारणा को बल मिल रहा है कि भाजपा व कांग्रेस दोनों के राश्ट्रीय नेतृत्व की नजर में उत्तराखण्ड केवल ब्राहमण जाति के लिए आरक्षित कर रखा है। क्योंकि जिस प्रकार से भाजपा व कांग्रेस में सन् 2002 से लेकर 2012 तक हुए सभी विधानसभा चुनाव में विधायकों की राय को ठुकरा कर जिस प्रकार से पहले कांग्रेस ने 2002 की विधानसभा चुनाव में अधिकांष विधायकों की राय को दरकिनारे करके तिवारी को मुख्यमंत्री के रूप में बलात थोपा। उसके बाद 2007 में अधिकांष विधायकों की राय भगतसिंह कोष्यारी को नजरांदाज करके भाजपा ने खंडूडी जी को मुख्यमंत्री के रूप में थोपा। यही नहीं अब विधानसभा चुनाव 2012 में हुए विधानसभा चुनाव में अधिकांष विधायकों द्वारा वरिश्ट कांग्रेस नेता हरीष रावत व सतपाल महाराज को नजरांदाज करके जिस प्रकार से कांग्रेसी आला नेतृत्व सोनिया गांधी के संकीर्ण जातिवादी सिपाहेसलारों ने फिर मुख्यमंत्री पद के लिए विजय बहुगुणा को थोप दिया। उससे साफ लगता है कि भाजपा व कांग्रेस दोनों ने देवभूमि उत्तराखण्ड को जातिवाद की गर्त में धकेलने का कुकृत्य जानबुझ कर करके अपनी संकीर्णता की पूर्ति कर रहे है। विजय बहुगुणा अपने पिता हेमवती नन्दन की तरह जननेता बन कर प्रदेष की कमान संभालते तो प्रदेष के लोग उनके स्वागत में पलकें बिछा देते परन्तु उनको जिस प्रकार से कांग्रेसी जातिवादी नेताओं ने जातिवाद के मोहरे की तरह मुख्यमंत्री बनाया उसको कोई भी स्वाभिमानी उत्तराखण्डी स्वीकार नहीं कर पायेगा। प्रदेष में इन दलों द्वारा चलाये जा रहे जातिवाद व क्षेत्रवाद के दावों से उस उत्तराखण्ड के हितों का गला ही घोट दिया जा रहा है जिसने अपने विकास व स्वाभिमान की रक्षा के लिए पृथक राज्य के गठन के लिए ऐतिहासिक संघर्श व षहादत दी थी।
गौरतलब है कि प्रदेष के दिग्गज राश्ट्रीय जननेता हरीष रावत व सतपाल महाराज की षर्मनाक उपेक्षा कर विजय बहुगुणा को मुख्यमंत्र.ी बनाया, उससे साफ हो गया कि कांग्रेसी आला नेतृत्व को न तो प्रदेष के हितों की चिंता है व नहीं साफ छवि तथा कांग्रेस के हितों की। सोनिया गांधी व उनके सिपाहेसलार प्रदेष की जनता को क्या यह बताने कि हिम्मत कर सकती है कि विजय बहुगुणा को मुख्यमंत्री बनाने का निर्णय उन्होंने उनके मुम्बई उच्च न्यायालय के महान निर्णयों को देख कर किया या उत्तराखण्ड के विधानसभा में उनके लोकसभा क्षेत्र की विधानसभाओं में ऐतिहासिक सफलता को देख कर लिया। सोनिया गांधी को उनके आत्मघाति सलाहकारों ने यह बताया होगा कि प्रदेष की वर्तमान विधानसभा चुनाव में अधिकांष विधायक कांग्रेस के सबसे वरिश्ट जमीनी राश्ट्रीय नेता हरीष रावत एवं विधानसभा चुनाव में सबसे अधिक विधायक अपनी लोकसभा में जीताने वाले सतपाल महाराज जिनके पूरे देष में लाखों समर्थक विद्यमान है उनकी उपेक्षा क्यों की गयी। क्यों प्रदेष के भाजपा मुख्यमंत्री भुवनचंद खंडूडी को इन चुनाव में कोटद्वार विधानसभा सीट पर हराने वाले वरिश्ठ कांग्रेसी नेता सुरेन्द्रसिंह नेगी की जीत पर पीठ थपथपाने का साहस तक नही रहा। या खंडूडी जी की हार पर कांग्रेस आलाकमान व कांग्रेस के जातिवादी नेता स्वयं को अपमानित महसूस कर रहे थे क्योंकि भाजपा मुख्यमंत्री भुवनचंद खण्डूडी  उप्र में कांग्रेस अध्यक्षा रीता बहुगुणा व उत्तराखण्ड के पुफेरे भाई है। नेता प्रतिपक्ष हरक सिंह रावत को तो केवल कांग्रेसी आला नेताओं ने प्रदेष के जननेताओ ंको कमजोर करने का प्रयोग कर उनकी उपेक्षा की। वहीं यषपाल आर्य को केवल प्रदेष का अध्यक्ष बना कर दलितों की आंखों में धूल झोंकने का काम किया। अगर यषपाल आर्य को ही बनाया जाता तो समझा जा सकता था। उनकी पूरे प्रदेष में कांग्रेसी कार्यकत्र्ताओं व जनता में उपरोक्त प्रदेष के बडे चार नेताओं में स्वीकारोक्ति तो है। प्रदेष की जनता सदियों से जिस सामाजिक भाई चारे को अक्षुण्ण करने में लगी रही उस भाई चारे को भाजपा व कांग्रेस के इन जातिवादी नेताओं ने तार तार कर दिया। प्रदेष की जनता सदैव जागरूक रही। उसने कभी जातिवाद का कलुशित जहर यहां पर फेलने नहीं दिया। इसी कारण बहुसंख्यक ठाकुर समाज के होते हुए भी यहां पर गोविन्द बल्लभ पंत, नारायणदत्त तिवारी, हेमवती नन्दन बहुगुणा, षिवानन्द नौटियाल व खंडूडी जी जेसे नेता भी लम्बे समय तक प्रतिनिधित्व करते रहे। परन्तु राज्य बनने के बाद जिस प्रकार से भाजपा ने जानबुझ कर प्रदेष के नेतृत्व को कुद करके नित्यानन्द स्वामी को बलात थोपा। उसके बाद खण्डूडी व निषंक के राज में ही नहीं कांग्रेसी मुख्यमंत्री तिवारी के राज में अधिकांष महत्वपूर्ण मंत्रालय सहित षासन प्रषासन में अंध जातिवाद का पोशण किया गया, उससे प्रदेष के बहुसंख्यक समाज हस्तप्रद रह गया। इसी कारण जनता ने विधानसभा व लोकसभा चुनाव में भाजपा व कांग्रेस को दण्डित किया।
 गौरतलब हे कि प्रदेष गठन के बाद जिस प्रकार से भाजपा व कांग्रेस ने यहां के समाज को अपनी राजनैतिक सत्तालोलुपता को मिटाने के लिए जातिवादी मोहरे के रूप में नित्यानन्द स्वामी, खंडूडी व निषंक को थोपा वेसे ही अधिकांष विधायकों की राय को दर किनारे करके कांग्रेस ने नारायणदत्त तिवारी व अब विजय बहुगुणा को थोप दिया। यही नहीं प्रदेष के अधिकांष षासन प्रषासन के महत्वपूर्ण पदों से बहुसंख्यक समाज की षर्मनाक उपेक्षा की उससे प्रदेष की जनता का सदियों से चला आ रहा भाई चारा पर ग्रहण लग गया है। इसी कारण प्रदेष की जनता ने लोकसभा चुनाव में ही नहीं प्रदेष विधानसभा चुनाव में इन दलों को सत्ता से बेदखल किया है। प्रदेष गठन के बाद जिस प्रकार भाजपा व कांग्रेस ने जबरन जातिवाद का धृर्णित हथकण्डा थोप रखा है, उससे आक्रोषित हो कर जनता ने भाजपा व कांग्रेस को लोकसभा व विधानसभा चुनाव में समय समय पर उखाड फेंका हैं। जिस प्रकार ने प्रदेष गठन के बाद प्रदेष के नेतृत्व को नकार कर भाजपा ने जबरन नित्यानन्द स्वामी, खंडूडी व निषंक को जबरन थोपे कर बहुसंख्यक समाज व बहुसंख्यक विधायकों की उपेक्षा होगी।  प्रदेष के जागरूक लोगों को चाहिए कि वह भाजपा व कांग्रेस के जातिवाद के जाल को तबाह करने के लिए आगे आये। प्रदेष के हित में भाजपा व कांग्रेस में चलाये जा रहे जातिवाद के जाल को समझ कर उसको छिन्न भिन्न करने के लिए एकजूट हों।
प्रदेष को जातिवाद में अंधा हो कर भाजपा व कांग्रेस जो तांडव मचा रही है उसका जवाब जनता ने बहुत ही सयंमित से कोटद्वार में दे दिया। यही नहीं प्रदेष की अधिकांष जनता जातिवाद से कोसों दूर है इसका प्रत्यक्ष उदाहरण ठाकुर बाहुल्य सीट देवप्रयाग की जनता ने कांग्रेसी प्रत्याषी सूरवीरसिंह सजवाण को ठुकरा कर निर्दलीय मंत्री प्रसाद नैथानी तथा श्रीनगर सीट पर भाजपा के महामंत्री धनसिंह रावत को हरा कर कांग्रेस के गणेष गोदियाल को विजयी बनाया। यही नहीं प्रदेष की जनता हमेषा जातिवादी ताकतों व अन्यायी षक्तियों के विरोध में  रही। इसका स्पश्ट उदाहरण है गढ़वाल लोकसभा के ऐतिहासिक उपचुनाव में इंदिरा गांधी के प्रत्याषी चन्द्रमोहन सिंह नेगी को हरा कर  जिस प्रकार से यहां की जनता ने हेमवती नन्दन बहुगुणा को विजय बनाना। परन्तु राज्य गठन के बाद भाजपा व कांग्रेस नेतृत्व में कुण्डली मार कर बैठे जातिवादी प्रवृति के नैताओं ने प्रदेष में जातिवादी जहर घोलने का जो प्रयास किया उससे पूरे प्रदेष की जनता में आक्रोष है। जो अक्षम्य भूल भाजपा ने जननेता भगतसिंह कोष्यारी व यहां के अधिकांष विधायकों की राय को नजरांदाज करके जबरन खंडूडी व निषंक को थोप कर की, उससे अधिक अक्षम्य भूल सोनिया गांधी ने अपने आत्मघातिस जातिवादी सलाहकारों की सलाह पर हरीष रावत व सतपाल महाराज को नजरांदाज करके की। हरीष रावत प्रदेष के ही नहीं देष के वरिश्ट जननेता है, उत्तराखण्ड की जनता 2012 में ही नहीं 2002 में भी उनको प्रदेष का मुख्यमंत्री के रूप में देखना चाहती है। वहीं सतपाल महाराज जो राज्य गठन जनांदोलन से लेकर आज तक प्रदेष की जनभावनाओं के अनरूप व प्रदेष को सही दिषा में संचालित करने के लिए निरंतर समर्पित है ऐसे प्रदेष को विकास के नई दिषा देने में सक्षम नेता की उपेक्षा करके सोनिया गांधी ने अपने संकीर्णजातिवादी मठाधीषों की सलाह पर विजय बहुगुणा को मुख्यमंत्री बनाया, उससे प्रदेष की जनता के विष्वास को ही नहीं  अपितु लोकषाही को गहरा आधात लगा। लोगों को आष्चर्य हो रहा है कि कांग्रेस क्यों प्रदेष की भाई चारे को जातिवादी जहर में घोल कर आत्महत्या करने पर उतारू है। कांग्रेस के इस कृत्य का षायद प्रदेष का कोई स्वाभिमानी नेता विरोध करे, लगता है सबकी आत्मा पदलोलुपता के कारण दफन हो गयी। एक भी नेता ऐसा नहीं है जो अपने पद से जनरल तेजपाल सिंह की तरह इस्तीफा दे कर उत्तराखण्ड को जातिवादी भट्टी में झोकने के नापाक कृत्य से बचाने के लिए आगे आये। क्या हरीष रावत, सतपाल महाराज, यषपाल आर्य व हरकसिंह रावत सहित अधिकांष कांग्रेसी विधायकों की आत्मा दम तोड़ चूकी है।  परन्तु काला बाबा के षब्द मुझे आज भी याद है कि महाकाल कभी किसी गुनाहगार को माफ नहीं करता। भगवान बदरीनाथ प्रदेष के भाईचारा नश्ट करने वाली कांग्रेस को भी भाजपा की तरह अपनी ही तरह से दण्डित करेगी। षेश श्रीकृश्ण कृपा। हरि ओम तत्सत्। श्रीकृश्णाय् नमो।