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Sunday, March 31, 2013


राज्य गठन आंदोलनकारी केशर सिंह पटवाल नहीं रहे 


उत्तराखण्ड राज्य गठन के लिए संसद की चैखट जंतर मंतर पर 16 अगस्त 1994 से 16 अगस्त 2000, राज्य गठन तक ऐतिहासिक धरना प्रदर्शन करने वाले उत्तराखण्ड जनांदोलन के प्रमुख संगठन ‘उत्तराखण्ड जनता संघर्षमोर्चा के समर्पित आंदोलनकारी व समाजसेवी 68 वर्षीय केशर सिंह पटवाल का 29 मार्च की रात 11.30 बजे आकस्मिक निधन हो गया। राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली के प्रताप नगर (गाजियबाद) में अपने छोटे बेटे के साथ सेवा निवृत के बाद रह रहे केशरसिंह पटवाल का अंतिम संस्कार गाजियाबाद के हिन्डन घाट पर किया गया। समाजसेवी केशरसिंह पटवाल के निधन की सूचना प्यारा उत्तराखण्ड के सम्पादक व उत्तराखण्ड जनता संघर्ष मोर्चा के अध्यक्ष देवसिंह रावत को उनके बडे बेटे विनोदसिंह पटवाल ने मोबाइल नम्बर 9717650084 से अभी कुछ देर पहले दी।
दिवंगत समाजसेवी व राज्य गठन आंदोलनकारी केशरसिंह पटवाल के निधन पर उत्तराखण्ड राज्य गठन के प्रमुख संगठन ‘उत्तराखण्ड जनता संघर्ष मोर्चा ने गहरा शोक प्रकट करते हुए शोकाकुल परिवार को अपनी संवेदना प्रकट की। मोर्चा के अध्यक्ष देवसिंह रावत ने बताया कि उत्तराखण्ड राज्य गठन आंदोलन में दिवंगत पटवाल अपनी नोकरी के साथ साथ राज्य गठन आंदोलन में सदैव समर्पित रहे। पौड़ी जनपद के नैनीडाण्डा विकासखण्ड के कोच्चियार गांव के निवासी दिवंगत पटवाल सेवाकाल में विनोद नगर दिल्ली में अपने दोनों बेटे विनोद सिंह पटवाल व अनूप सिंह पटवाल के साथ रहते थे। शोकाकुल परिवार में उनकी धर्मपत्नी जानकी देवी पटवाल व उनके दोनों बेटे है। अपने क्षेत्र व उत्तराखण्ड के लिए सदैव समर्पित रहने वाले केशरसिंह पटवाल अनैक सामाजिक संगठन से भी जुडे हुए थे। उत्तराखण्ड जनता संघर्ष मोर्चा के अध्यक्ष देवसिंह रावत ने कहा दिवंगत पटवाल राज्य गठन के समर्पित संगठनों, आंदोलनकारियों व राज्य गठन की जनांकांक्षाओं की प्रदेश की अब तक की सरकारों ने जो घोर उपेक्षा की उससे वे बेहद आहत रहते थे। श्री पटवाल को इस बात से भी आहत थे कि राज्य गठन आंदोलनकारी व समाज के लिए रचनात्मक कार्य करने वाले समर्पित समाजसेवियों के बजाय आज के राजनैतिक दल व जनप्रतिनिधी निहित स्वार्थी जनविरोधी तत्वों को ही प्राथमिकता देते है। उनका एक ही सपना था कि प्रदेश का गठन जिन जनांकांक्षाओं के लिए किया गया उसको प्रदेश की सरकारें साकार करें। जिससे उत्तराखण्ड के लोग उनकी तरह ताउम्र पलायन की त्रासदी का दंश झेलने के लिए अभिशापित न होना पडे।

भारतीय भाषाओं में भी न्याय के लिए सोनिया गांधी के मुख्यालय पर धरने के 118वें दिन जोरदार प्रदर्शन 


सर्वोच्च न्यायालय व उच्च न्यायालय में भारतीय भाषा में न्याय देने की मांग को लेकर चल रहे श्यामरूद्र पाठक के आंदोलन के 118वें दिन अग्रणी भाषा आंदोलनकारियों ने किया प्रदर्शन


नई दिल्ली 31 मार्च ।
सर्वोच्च न्यायालय व उच्च न्यायालयों में न्याय की भाषा के रूप में भारतीय भाषाओं को स्थापित करने की मांग को लेकर सप्रंग सरकार की मुखिया सोनिया गांधी के 24 अकबर रोड दिल्ली स्थित कांग्रेस मुख्यालय पर, 4 दिसम्बर से निरंतर धरना प्रदर्शन कर रहे  न्याय एवं विकास अभियान के संयोजक श्री श्याम रूद्र पाठक के नेतृत्व में चल रहे आंदोलन के 118 वें दिन, 31 मार्च को संघ  लोकसेवा आयोग पर भारतीय भाषाओं के लिए 14 साल का एतिहासिक धरना  देने वाले पुष्पेन्द्र चैहान, देश के अग्रणी पत्रकार राहुल देव, माखनलाल चतुर्वेदी विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति अच्युतानन्द मिश्र व हबीब अख्तर के साथ अग्रणी भारतीय भाषाओं के समर्थकों ने धरना दिया। धरने के समापन के अवसर पर आंदोलनकारियों ने देश में भारतीय भाषाओं में न्याय देने की मांग व अंग्रेजी की गुलामी थोपने के खिलाफ गगनभेदी नारों से कांग्रेस मुख्यालय व सोनिया का आवास गूंजायमान कर दिया।
गौरतलब है कि दिल्ली आईआईटी में हिन्दी के लिए ऐतिहासिक सफल संघर्ष करने वाले श्यामरूद्र पाठक के नेतृत्व में न्याय एवं विकास अभियान की गीता मिश्रा, विनोद कुमार पाण्डेय, राकेश कुमार पाठक, व कुंवर प्रमोद बिहारी आदि आंदोलनकारी 4 दिसम्बर से निरंतर सप्रंग सरकार की मुखिया सोनिया गांधी के मुख्यालय 24 अकबर रोड़ दिल्ली पर अपनी एक सुत्री मांग को लेकर 4 दिसम्बर से निरंतर धरना दे रहे है। इस अनवरत धरने के 118 दिन 24  अकबर रोड स्थित कांग्रेस मुख्यालय के दर पर देश के अग्रणी भाषा आंदोलनकारियों ने समर्थन में धरना प्रदर्शन करके राष्ट्रहित में अविलम्ब न्यायालयों में भारतीय भाषाओं में न्याय देने की मांग को स्वीकार करने की पुरजोर मांग की।
31 मार्च रविवार को  धरने में समर्थन देने आये आंदोलनकारियों को संबोधित करते हुए श्यामरूद्र पाठक ने बताया कि वे व उनके साथ सर्वोच्च न्यायालय व उच्च न्यायालयों में भारतीय भाषाओं में न्याय दिलाने की मांग को लेकर संविधान के अनुच्छेद ३४८ में संशोधन की मांग कर रहे है । श्यामरूद्र  ने कहा कि मात्र अंग्रेजी भाषा में न्याय होने से जहां भारतीय लोकशाही के साथ साथ न्याय का भी घोर अपमान हो रहा है। जबतक हमारे देश की जनता को भारतीय भाषा में भी न्याय प्राप्त न हो तब तक वे इस आंदोलन को जारी रखेंगे। उन्होंने आम भारतीय जनमानस से इस महत्वपूर्ण आंदोलन से जुड़ कर देश में न्याय का द्वार आम जनमानस के लिए खोलने में अपने दायित्व का निर्वहन करे। उन्होंने जोर दे कर कहा कि तमिलनाडू में तमिल में, हिन्दी राज्यों में हिन्दी, कर्नाटक में कन्नड, उड़िसा में उडिया, बंगाल में बंगाली , गुजरात में गुजराती सहित तमाम राज्यों में अपने राज्य की भाषा में न्याय मिलेगा तो यह देश में न्याय के साथ साथ लोकशाही भी मजबूत होगी।
आंदोलनकारियों को संबोधित करते हुए  वरिष्ठ पत्रकार राहुल देव ने कहा कि आज इस मुद्दे को रोजगार से जोड़ते हुए युवाओं को जोड़ कर ही इसे व्यापक जनांदोलन बनाया जा सकता है। वहीं पूर्व कुलपति वरिष्ठ पत्रकार अच्युतानंद मिश्र ने कहा कि इससे देश के अधिवक्ताओं व बार कोेंसिलों को जोड कर व्यापक बनाना चाहिए। अपने संबोधन में भारतीय मुक्ति सेना के प्रमुख देवसिंह रावत ने कहा कि इस देश में जानबुझ कर अंग्रेजी की गुलामी थोपी हुई है ।यह मात्र न्यायालय या संघ लोकसेवा आयोग की परीक्षाओं में अंग्रेजी भाषा की अनिवार्यता की ही समस्या नहीं अपितु यह देश की लोकशाही, आत्मसम्मान व न्याय का गलाघोंटने का खतरनाक देशद्रोही षडयंत्र है। इससे मुक्ति तभी मिलेगी जब तक इसे दामिनी आंदोलन की तरह व्यापक व प्रचण्ड न बना दिया जाय। इसके लिए लोगों के दिलों में फिर से राष्ट्र भक्ति का जज्बा पैदा करना होगा।
 संघ लोकसेवा आयोग  पर भारतीय भाषाओं के लिए चैदह सालों से धरना देने का ऐतिहासिक कार्य करने वाले पुष्पेन्द्र चोहान ने कहा कि अब हमें आंदोलन के साथ साथ देश के वरिष्ठ नेताओं का घेराव करके आंदोलन को तेज करना होगा। वहीं वरिष्ठ साहित्यकार डॉ बलदेव वंशी ने अफसोस प्रकट किया कि देश पर अंग्रेजी की गुलामी इस कदर जकड़ी हुई है कि संघ लोक सेवा आयोग की परीक्षाओं में भारतीय भाषायें लागू करने व अंग्रेजी की अनिवार्यता को रद्द करने के लिए संसद ने दो दो बार संकल्प पारित किया है और पौने चार सौ के लगभग सांसदों ने हस्ताक्षर युक्त प्रस्ताव इस मांग के समर्थन में दिया हुआ है परन्तु आश्चर्य है कि इस देश की 65 साल की कोई सरकारें अभी तक देश को अंग्रेजी की गुलामी से मुक्ति नहीं दिला पायी।
सभा को संबोधित करते हुए शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास के सचिव अतुल कोठारी ने सुझाव दिया कि हमें पूरे देश की बार कोंसिलों को इस आंदोलन से जोड़ने के साथ साथ आम आदमियों को भी इससे जोड़ना चाहिए। धरने को संबोधित करते हुए यमुना आंदोलन के नेता श्रीओम ने कहा कि हमें इसे जनांदोलन बनाने के साथ साथ हिन्दी सहित भारतीय भाषाओं के सरलीकरण करना चाहिए। इसके साथ कानून, इंजीनियरिग, चिकित्सा शास्त्र की किताबों को क्लिष्ट भाषा के बजाय सरल व सहज भाषा में बनानी चाहिए। इस धरने को संबोधित करते हुए इंजीनियर विनोद गौतम ने आंदोलनकारियों से अपने अहं से उपर उठ कर मुद्दे के लिए ईमानदारी से एकजूट हो कर कार्य करने की अपील की। वहीं इस आंदोलन से जुड़े दिल्ली विश्वविद्यालय के प्राध्यापक विनोद कुमार पाण्डे ने बताया कि देश तमाम अग्रणी नेता आस्कर फर्नाडिस, दिग्विजय सिंह, मोतीलाल वोरा, भाजपा अध्यक्ष राजनाथ सिंह व राम विलास पासवान सहित अनैक वरिष्ठ राजनेता इस मुद्दे का खुले मन से इस मुद्दे समर्थन कर रहे हैं परन्तु आखिर वह कौन सी मजबूरी है जो यह मांग को पूरी करने में सरकार ही नहीं तमाम राजनैतिक दल बगले झांक रहे हैं। वहीं 118 दिन से इस आंदोलन में प्रमुख भूमिका निभाने वाली एकमात्र महिला आंदोलनकारी गीता मिश्रा ने सभी आंदोलनकारियों से इस आंदोलन को जनांदोलन बनाने में अपना सहयोग देने की अपील की।
सभा का संचालन हरपाल राणा ने किया। आंदोलन में वरिष्ट पत्रकार हबीब अख्तर की धर्मपत्नी, रमेश कुमार आर्य, चैतन्य चन्दन, हरीश चैधरी, श्याम जी भट्, लोकहित मोर्चे के अध्यक्ष ईश्वर भारद्वाज, पूर्व निदेशक भाषा-नाहर सिंह वर्मा, नरेश शांडिल्य, महावीर शास्त्री, संजीव शर्मा, शमशेर नहरा, हरीश कुमार चैधरी, जगवीरसिंह राठोर, श्री कृष्ण, श्री विश्नोई व शशिकांत आदि भाषा समर्थकों ने भाग लिया।

Friday, March 29, 2013


शतः शतः वन्दन तुम्हे वीर भगत सिंह


जिन्होंने लड़ी थी जंगे आजादी की, उन्हे देश ने भूला दिया
शहीद हुए जो अमर सैनानी उनके आदर्शो को मिटा दिया
भारतवासी बने नहीं हम, देश जाति धर्म में देश बांट दिया 
लोकतंत्र आज परिवारतंत्र बन, देखो लूटतंत्र ही
 बना दिया
देशहित की परवाह नहीं, ये है अमेरिका के ही अंध भक्त
चंगेजो की तरह देश लुट रहे, जो बने हुए है आज रहनुमा
आजादी के 66 साल बाद भी गुलाम बनी हुई है माॅं भारती
नाम देश का भारत मिटा कर अब बन गया है देश इडिया
भारतीय भाषाओं को दास बना कर राज कर रही है अंग्रेजी
शतः शतः वन्दन तुम्हे वीर भगत सिंह, चन्द्रशेखर, नेता जी
हम दिलायेंगे भारत माॅ को आजादी इंडिया की गुलामी से
उठो जागो, वीर जवानो, माॅं भारती की 125 करोड़ संतानों 


-देवसिंह रावत(भारतीय आजादी के महान नायक अमर शहीद वीर भगतसिंह, सुखदेव व राजगुरू की शहादत की याद में शहीदों की पावन शहादत की स्मृति को शतः शतः नमन् शहीदी दिवस, 23 मार्च 2013 की 11.43 बजे )

सुबह डट कर खायें, दोपहर को थोडा कम और रात को सबसे कम खाना खाना ही सर्वेश्रेष्ठ


सूर्योदय के दो घण्टे के अंदर ही खाया खाना सबसे लाभकारी होता हैः बागवट-

राजीव दीक्षित 

हमारे देश मे 3000 साल पहले एक ऋषि हुए जिनका नाम था बागवट जी ! वो 135 साल तक जीवित रहे ! उन्होने अपनी पुस्तक अशटांग हिरद्यम मे स्वस्थ्य रहने के 7000 सूत्र लिखे ! उनमे से ये एक सूत्र राजीव दीक्षित जी की कलम से आप पढ़ें !


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बागवट जी कहते है, ये बहुत गहरी बात वो ये कहते है जब आप भोजन करे कभी भी तो भोजन का समय थोडा निश्चित करें । भोजन का समय निश्चित करें । ऐसा नहीं की कभी भी कुछ भी खा लिया । हमारा ये जो शरीर है वो कभी भी कुछ खाने के लिए नही है । इस शरीर मे जठर है, उससे अग्नि प्रदिप्त होती है । तो बागवटजी कहते है की, जठर मे जब अग्नी सबसे ज्यादा तीव्र हो उसी समय भोजन करे तो आपका खाया हुआ, एक एक अन्न का हिस्सा पाचन मे जाएगा और रस मे बदलेगा और इस रस में से मांस,मज्जा,रक्त,मल,मूत्रा,मेद और आपकी अस्थियाँ इनका विकास होगा ।

हम लोग कभी भी कुछ भी खाते रहते हैं । ये कभी भी कुछ भी खाने पद्ध्ती भारत की नहीं है, ये युरोप की है । युरोप में doctors वो हमेशा कहते रहते है की थोडा थोडा खाते रहो, कभीभी खाते रहो । हमारे यहाँ ये नहीं है, आपको दोनों का अंतर समझाना चाहता हूँ । बागवटजी कहते है की, खाना खाते का समय निर्धरित करें । और समय निर्धरित होगा उससे जब आप के पेट में अग्नी की प्रबलता हो । जठरग्नि की प्रबलता हो । बागवटजी ने इस पर बहुत रिसर्च किया और वो कहते है की, डेढ दो साल की रिसर्च के बाद उन्हें पता चला की जठरग्नि कौन से समय मे सबसे ज्यादा तीव्र होती है । तो वो कहते की सूर्य का उदय जब होता है, तो सूर्य के उदय होने से लगभग ढाई घंटे तक जठरग्नि सबसे ज्यादा तीव्र होती है । 

मान लो अगर आप चेन्नई मे हो तो 7 बजे से 9 बजे तक जठरग्नि सबसे ज्यादा तीव्र होगी । हो सकता है ये इसी सूत्रा अरूणाचल प्रदेश में बात करूँ तो वो चार बजे से साडे छह का समय आ जाएगा । क्यांे कि अरूणाचल प्रदेश में सूर्य 4 बजे निकल आता है । अगर सिक्कीम मे कहूँगा तो 15 मिनिट और पहले होगा, यही बात अगर मे गुजरात मे जाकर कहूँगा तो आपसे समय थोडा भिन्न हो जाएगा तो सूत्रा के साथ इसे ध्यान मे रखे । सूर्य का उदय जैसे ही हुआ उसके अगले ढाई घंटे तक जठर अग्नी सबसे ज्यादा तीव्र होती है । तो बागवटजी कहते है इस समय सबसे ज्यादा भोजन करें । 

बागवटजी ने एक और रिसर्च किया था, जैसे शरीर के कुछ और अंग है जैसे हदय है, जठर,किडनी,लिव्हर है इनके काम करने का अलग अलग समय है ! जैसे दिल सुबह के समय सबसे अधिक काम करता है ! 4 साढ़े चार बजे तक दिल सबसे ज्यादा सक्रीय होता है और सबसे ज्यादा heart attack उसी समय मे आते है । किसी भी डॉक्टर से पूछ लीजीए, क्योकि हदय सबसे ज्यादा उसी समय में तीव्र । सक्रीय होगा तो हदय घात भी उसी समय होगा इसलिए 99 % हार्ट अॅटॅक अर्ली मॉनिंग्ज मे ही होते है । इसलिए तरह हमारा लिव्हर किडनी है, एक सूची मैने बनाई है, बाहर पुस्तको मे है । संकेतरूप मे आप से कहता हूँ की शरीर के अंग का काम करने का समय है, प्रकृती ने उसे तय किया है । तो आप का जठर अग्नी सुबह 7 से 9.30 बजे तक सबसे ज्यादा तीव्र होता है तो उसी समय भरपेट खाना खाईए । 


ठीक है । फिर आप कहेगे दोपहर को भूख लगी है तो थोडा और खा लीजीए । लेकीन बागवट जी कहते है की सुबह का खाना सबसे ज्यादा । अगर आज की भाषा में अगर मे कहूँ तो आपका नाष्टा भरपेट करे । और अगर आप दोपहर का भोजन आप कर रहे है तो बागवटजी कहते है की, वो थोडा कम करिए नाश्ते से थोडा 1/3 कम कर दीजीए और रात का भोजन दोपहर के भोजन का 1/3 कर दीजीए । अब सीधे से आप को कहता हूँ । अगर आप सवेरे 6 रोटी खाते है तो दोपहर को 4 रोटी और शाम को 2 रोटी खाईए । अगर आप को आलू का पराठा खाना है आपकी जीभ स्वाद के लिए मचल रही है तो बागवटजी कहते है की सब कुछ सवेरे खाओ, जो आपको खानी है सवेरे खाओ, हाला की अगर आप जैन हो तो आलू और मूली का भी निषिध्द है आपके लिए फिर अगर जो जैन नहीं है, उनके लिए ? आपको जो चीज सबसे ज्यादा पसंद है वो सुबह आओ । रसगुल्ला , खाडी जिलेबी, आपकेा पसंद है तो सुबह खाओ । वो ये कहते हे की इसमें छोडने की जरूरत नहीं सुबह पेट भरके खाओ तो पेट की संतुष्टी हुई , मन की भी संतुष्टी हो जाती है । 


और बागवटजी कहते है की भोजन में पेट की संतुष्टी से ज्यादा मन की संतुष्टी महत्व की है। 
मन हमारा जो है ना, वो खास तरह की वस्तुये जैसे , हार्मोन्स , एंझाईम्स से संचालित है । मन को आज की भाषा में डॉक्टर लोग जो कहते हैं , हाला की वो है नहीं लेकिन डाक्टर कहते हैं मन पिनियल गलॅंड हैं ,इसमे से बहुत सारा रस निकलता है । जिनको हम हार्मोन्स ,एंझाईम्स कह सकते है ये पिनियल ग्लॅंड (मन )संतुष्टी के लिए सबसे आवश्यक है , तो भोजन आपको अगर तृप्त करता है तो पिनियललॅंड आपकी सबसे ज्यादा सक्रीय है तो जो भी एंझाईम्स चाहीए शरीर को वो नियमित रूप मंे समान अंतर से निकलते रहते है । और जो भोजन से तृप्ती नहीं है तो पिनियल ग्लॅंड मे गडबड होती है । और पिनियल ग्लॅंड की गडबड पूरे शरीर मे पसर जाती है । और आपको तरह तरह के रोगो का शिकार बनाती है । अगर आप तृप्त भोजन नहीं कर पा रहे तो निश्चित 10-12 साल के बाद आपको मानसिक क्लेश होगा और रोग होंगे । मानसिक रोग बहुत खराब है । आप सिझोफ्रनिया डिप्रेशन के शिकार हो सकते है आपको कई सारी बीमारीया ,27 प्रकार की बीमारीया आ सकती है , । कभी भी भोजन करे तो, पेट भरे ही ,मन भी तृप्त हो । ओर मन के भरने और पेट के तृप्त होने का सबसे अच्छा समय सवेरे का है । 


अब मैने(राजीव भाई ने ) ये बागवटजी के सूत्रों को चारो तरफ देखना शुरू किया तो मुझे पता चला की मनुष्य को छोडकर जीव जगत का हर प्राणी इस सूत्रा का पालन कर रहा है । मनुष्य अपने को होशियार समझता है । लेकिन मनुष्य से ज्यादा होशियारी जीव जगत के प्राणीयों मे है । आप चिडीया को देखो, कितने भी तरह की चिडीये, सबेरे सुरज निकलते ही उनका खाना शुरू हो जाता है , और भरपेट खाती है । 6 बजे के आसपास राजस्थान, गुजरात में जाओ सब तरह की चिडीया अपने काम पर लग जाती है। खूब भरपेट खाती है और पेट भर गया तो चार घंटे बाद ही पानी पीती है । गाय को देखिए सुबह उठतेही खाना शुरू हो जाता है । भैंस, बकरी ,घोडा सब सुबह उठते ही खाना खाना शुरू करंगे और पेट भरके खाएँगे । फिर दोपहर को आराम करेंगे तो यह सारे जानवर ,जीवजंतू जो हमारी आँखो से दीखते है और नही भी दिखते ये सबका भोजन का समय सवेरे का हैं । सूर्योदय के साथ ही थे सब भोजन करते है । इसलिए, थे हमसे ज्यादा स्वस्थ रहते है । 

मैने आपको कई बार कहा है आप उस पर हँस देते है किसी भी चिडीया को डायबिटीस नही होता किसी भी बंदर को हार्ट अॅटॅक नहीं आता । बंदर तो आपके नजदीक है ! शरीर रचना मे बस बंदर और आप में यही फरक है की बंदर को पूछ है आपको नहीं है बाकी अब कुछ समान है । तो ये बंदर को कभी भी हार्ट अॅटॅक, डासबिटीस ,high BP ,नहीं होता । 


मेरे एक बहुत अच्छे मित्रा है, डॉ. राजेंद्रनाथ शानवाग । वो रहते है कर्नाटक में उडूपी नाम की जगह है वहाँपर रहते है । बहुत बडे ,प्रोफेसर है, मेडिकल कॉलेज में काम करते है । उन्होंने एक बडा गहरा रिसर्च किया ।की बंदर को बीमार बनाओ ! तो उन्होने तरह तरह के virus और बॅक्टेरिया बंदर के शरीर मे डालना शुरू किया, कभी इंजेक्शन के माध्यम से कभी किसी माध्यम से । वो कहते है, मैं 15 साल असफल रहाँ । बंदर को कुछ नहीं हो सकता । और मैने कहा की आप ये कैसे कह सकते है की, बंदर कुछ नहीं हो सकता , तब उन्हांने एक दिन रहस्य की बात बताई वो आपको भी ,बता देता हूँ । की बंदर का जो है न RH factor दुनिया में ,सबसे आदर्श है, और कोई डॉक्टर जब आपका RH factor नापता है ना ! तो वो बंदर से ही कंम्पेअर करता है , वो आपको बताता नहीं ये अलग बात है । कारण उसका ये है की, उसे कोई बीमारी आ ही नहीं सकती । ब्लड मे कॉलेस्टेरॉल बढता ही नहीं । ट्रायग्लेसाईड कभी बढती नहीं डासबिटीस कभी हुई नहीं । शुगर कितनी भी बाहर से उसके शरीर मे डंट्रोडयूस करो, वो टिकती नहीं । तो वो प्रोफेसर साहब कहते है की, यार ये यही चक्कर है ,की बंदर सवेरे सवेरेही भरपेट खाता है । जो आदमी नहीं खा पाता । 



तो वो प्रोफेसर रवींद्रनाथ शानवागने अपने कुछ मरींजों से कहा की देखो भया , सुबह सुबह भरपेट खाओ ।तो उनके कई मरीज है वो मरीज उन्हे बताया की सुबह सुबह भरपेट खाना खाओ तो उनके मरीज बताते है की, जबसे उन्हांने सुबह भरपेट खाना शुरू किया तो , डासबिटीस माने शुगर कम हो गयी, किसी का कॉलेस्टेरॉल कम हो गया, किसी के घटनों का दर्द कम हो गया कमर का दर्द कम हो गया गैस बनाना बंद हो गई पेट मे जलन होना, बंद हो गयी नींद अच्छी आने लगी ..... वगैरा ..वगैरा । और ये बात बागवटजी 3500 साल पहले कहते ये की सुबह की खाना सबसे अच्छा । माने जो भी स्वाद आपको पसंद लगता है वो सुबह ही खाईए । 

तो सुबह के खाने का समय तय करिये । तो समय मैने आपका बता दिया की, सुरज उगा तो ढाई घंटे तक । माने 9.30 बजे तक, ज्यादा से ज्यादा 10 बजे तक आपक भोजन हो जाना चाहिए । और ये भोजन तभी होगा जब आप नाश्ता बंद करेंगे । ये नाष्ता हिंदुस्थानी चीज नहीं है । ये अंग्रेजो की है और आप जानते है हमारे यहाँ क्या चक्कर चल गया है , नाष्टा थोडा कम, करेंगे ,लंच थोडा जादा करेंगे, और डिनर सबसे ज्यादा करेंगे । सर्वसत्यानाष । एकदम उलटा बागवटजी कहेते है की, नाष्टा सबसे ज्यादा करो लंच थोडा कम करो और डिनर सबसे कम करो । हमारा बिलकूल उलटा चक्कर चल रहा है !


ये अग्रेज और अमेरिकीयो के लिए नाष्टा सबसे कम होता है कारण पता है ??वो लोग नाष्टा हलका करे तो ही उनके लिए अच्छा है। हमारे लिए नाष्टा ज्यादा ही करना बहूत अच्छा है । कारण उसका एकही है की अंग्रेजो के देश में सूर्य जलदी नही निकलता साल में 8-8 महिने तक सूरज के दर्शन नहीं होते और ये जठरग्नी है । नं ? ये सूरज के साथ सीधी संबंध्ति है जैसे जैसे सूर्य तीव्र होगा अग्नी तीव्र होगी । तो युरोप अमेरिका में सूरज निकलता नहीं -40 तक . तापमान चला जाता है 8-8 महिने बर्फ पडता है तो सूरज नहीं तो जठरग्नी तीव्र नहीं हो सकती तो वो नाष्टा हेवियर नही कर सकते करेंगे तो उनको तकफील हो जाएँगी !

अब हमारे यहाँ सूर्य हजारो सालो से निकलता है और अगले हजारो सालों तक निकलेगा ! तो हमने बिना सोचे उनकी नकल करना शुरू कर दिया ! तो बाग्वट जी कहते है की, सुबह का खाना आप भरपेट खाईए । ? फिर आप इसमें तुर्क - कुतुर्क मत करीए ,की हम को दुनिया दारी संभालनी है , किसलिए ,पेट के लिए हीं ना? तो पेट को दूरूस्त रखईये , तो मेरा कहना है की, पेट दुरूस्त रखा तो ही ये संभाला तोही दुनिया दारी संभलती है और ये गया तो दुनिया दारी संभालकर करेंगे क्या?

मान लीजिए, पेट ठीक नहीं है , स्वास्थ ठीक नहीं है , आप ने दस करोंड कमा लिया क्या करेंगे, डॉक्टर को ही देगे ना ? तो डॉक्टर को देने से अच्छा किसी गोशाला वाले को दिजीए ;और पेट दुरूस्त कर लिजिए । तो पेट आपका है तो दुनिया आपकी है । आप बाहर निकलिए घरके तो सुबह भोजन कर के ही निकलिए । दोपहर एक बजे में जठराग्नी की तीव्रता कम होना शुरू होता है तो उस समय थोडा हलका खाए माने जितना सुबह खाना उससे कम खाए तो अच्छा है। ना खाए तो और भी अच्छा । खाली फल खायें , ज्यूस दही मठठा पिये । शाम को फिर खाये । 

अब शाम को कितने बजे खाएं ???

तो बाग्वट जी कहते हैं हमे प्रकति से बहूत सीखने की जरूरत हैं । दीपक । भरा तेल का दीपक आप जलाना शुरू किजीए । तो पहिली लौ खूप तेजी से चलेगी और अंतिम लव भी तेजी से चलेगी माने जब दीपक बूजने वाला होगा, तो बुझने से पहले ते जीसे जलेगा , यही पेट के लिए है । जठरग्नी सुबह सुबह बहूत तीव्र होगी और शमा को जब सूर्यास्त होने जा रहा है, तभी तीव्र होगी, बहुत तीव्र होगी । वो कहते है , शामका खाना सूरज रहते रहते खालो; सूरज डूबा तो अग्नी भी डूबी । तो वैसे जैन दर्शन में कहा है सभी भोजन निषेध् है बागवटजी भी यही कहते है ,तरीका अलग है ,बस । जैन दर्शन मे अहिंसा के लिए कहते है,वो स्वास्थ के लिए कहेते है । तो शाम का खाना सूरज डुबने की बाद दुनिया में ,कोई नहीं खाता । गाय ,भैंस को खिलाके देखो नहीं खाएगी ,बकरी ,गधे को खिलाके देखो, खाता नहीं । हा बिलकूल नहीं खाता । आप खाते है , तो आप अपने को कंम्पेअर कर लीजीए किस के साथ है आप ? कोई जानवर, जीवटाशी सूर्य डूबने के बाद खाती नही ंतो आप क्यू खा रहे है ? 

प्रकृती का नियम बागवटजी कहते है की पालन करीए माना रात का खाना जल्दी कर दीजिए । 
सूरज डुबने के पहले 5.30 बजे - 6 बजे खायिए । अब कितना पहले ? बागवट जीने उसका कॅल्क्यूलेशन दिया है, 40 मिनिट पहले सूरज चेन्नई से शाम 7 बजे डूब रहा है । तो 6.20 मिनट तक हिंदूस्थान के किसी भी कोने में जाईए सूरज डूबने तक 40 मिनिट तक निकलेगा । तो 40 मिनिट पहले शाम का खाना खा लिजीए और सुबह को सूरज निकलने के ढाई घंटे तक कभी भी खा लीजीए । दोनो समय पेट भरके खा लिजिए । फिर कहेंगे जी रात को क्या ? तो रात के लिए बागवटजी कहेते है की, एक ही चीज हैं रात के लिए की आप कोई तरल पदार्थ ले सकते है । जिसमे सबसे अच्छा उन्होंने दूध कहा हैं । बागवटजी कहते है की, शाम को सूरज डूबने के बाद ‘हमारे पेट में जठर स्थान में कुछ हार्मोन्स और रस या एंझाईम पैदा होते है जो दूध् को पचाते है’ । इसलिए वो कहते है सूर्य डूबने के बाद जो चीज खाने लायक है वो दूध् है । तो रात को दूध् पी लीजीऐ । सुबह का खाना अगर आपने 9.30 बजे खाया तो 6.00 बजे खूब अच्छे से भूक लगेगी ।

फिर आप कहेंगे जी, हम तो दुकान पे वैठे है 6 बजे तो डब्बा मँगा लीजिए । दुकान में डिब्बा आ सकता है । हाँ दुकान में आप बैठे है, 6 बजे डब्बा आ सकता है और मैं आपको हाथ जोडकर आपसे कह रहाँ हूँ की आप मेरे से अगर कोई डायबिटीक पेशंट है, कोई भी अस्थमा पेशंट है, किसी को भी बात का गंभीर रोग है आज से ये सूत्रा चालू कर दिजीए । तीन महिने बाद आप खुद मुझे फोन करके कहंगे की, राजीव भाई, पहले से बहुत अच्छा हूँ sugar level मेरा कम हो रहा है । 
अस्थमा कम हो रहा है। ट्रायग्लिसराईड चेक करा लीजीए, और सूत्रा शुरू करे, तीन महीने बाद फिर चेक करा लीजीए, पहले से कम होगा, LDL बहुत तेजी से घटेगा ,HDL बढ़ेगा । HDL बढना चाहिए, LDL VLDL कम होना ही चाहिए । तो ये सूत्रा बागवटजी का जितना संभव हो आप ईमानदारी से पालन करिए वो आपको स्वस्थ रहने में बहुत मदद करेगा !!

राजीव दीखित के भारतीय खानपान पर बेबाक उपरोक्त विचारों को सुनने व देखने के लिए  click  कर देखें 

https://www.youtube.com/watch?v=TkJXNYHIWBg

Thursday, March 28, 2013


आखिर कब तक जारी रहेगा भारत की आजादी को अंग्रेजी का गुलाम बनाये रखने का राष्ट्रघाती षडयंत्र!


अंग्रेजी की गुलामी के थोपने का भारी विरोध के कारण संघ लोकसेवा आयोग ने वापस ली अंग्रेजी अनिवार्यता का नियम 


नई दिल्ली (प्याउ)। आजादी के बाद पहली बार देश में अंग्रेजी सम्राज्य को आजादी के 65 साल बाद भी बनाये रखने वाले अंग्रेजों के स्वयंभू गुलाम हुक्मरानों को अपने नापाक मंसूबों को देश में मजबूत करने के कारण मुंह की खानी पड़ी। देश की लोकशाही, आजादी व स्वाभिमान को रौंद रही फिरंगी भाषा अंग्रेजी भाषा को  भारतीय शासन प्रशासन को संचालित करने वाले सबसे महत्वपूर्ण सेवाओं (संघ लोक सेवा आयोग की सिविल सेवा परीक्षा ) में केवल अंग्रेजीदा वर्ग का बर्चस्व और मजबूत करने तथा भारतीय भाषाओं के बढ़ते हुए भागेदारी पर अंकुश लगाने के लिए खतरनाक व राष्ट्रघाती षडयंत्र सिविल सेवा परीक्षा में सुधार के नाम पर जो 5 मार्च को अंग्रेजी भाषा की अनिवार्यता व इस के अंक मैरिट में जोडने तथा भारतीय भाषाओं को वनवास देने का जो तुगलकी फरमान जारी किया था उसका तमिलनाडू, गुजरात, मध्यप्रदेश की सरकारों के साथ साथ संसद में तमाम दलों ने भारी विरोध किया था। इसके विरोध में भारतीय भाषा आंदोलन ने 15 मार्च को ही संघ लोक सेवा आयोग के द्वार पर विरोध धरना दिया। आजाद देश में विदेशी भाषा को बलात थोपने के इस शर्मनाक कदम का पूरे देश में भारी विरोध को विकराल होने से पहले अंग्रेजी भाषा को भारत में थोपे रखने वालों ने अपने इस नापाक कदम को वापस लेने में ही अपनी भलाई समक्षी। स्थिति को भांपते हुए सरकार ने इस पर 15 मार्च को रोक लगाने का ऐलान किया।
अंग्रेजी की गुलामी को देश में बनाये रखने वाले  आयोग ने इसी पखवाडे को एक शुद्धिपत्र जारी करके किसी भी एक भारतीय भाषा और अंग्रेजी पेपर में अर्हता प्राप्त करने की पुरानी व्यवस्था बहाल कर दी। इसके साथ स्पष्ट किया कि इसमें प्राप्त अंकों को रैंकिंग के लिए जोड़ा नहीं जाएगा। हालांकि संघ लोकसेवा आयोग दावा करता है कि भारतीय भाषाओं और अंग्रेजी के पेपर मैट्रिक या उसके समकक्ष स्तर के होते है और यह अर्हता प्रकृति के ही होंगे। इसको वह भारतीय भाषाओं और अंग्रेजी में प्रश्नपत्र का उद्देश्य अभ्यर्थियों की पढ़ने और गंभीर तर्कमूलक गद्य समझने की उनकी क्षमता और विचारों को स्पष्ट और सही तरीके से व्यक्त करने की परीक्षा लेना बताता है। परन्तु हकीकत यह है कि अंग्रेजी का स्तर माध्यमिक स्तर से बहुत ऊचे स्तर का है।
इस नये घटनाक्रम में संघ लोक सेवा आयोग ने 26 मई को होने वाली सिविल सेवा (प्रारंभिक) परीक्षा के स्वरूप में कोई परिवर्तन न करने की घोषणा भी की। परन्तु इस परीक्षा में उत्तीर्ण होने वाले परीक्षार्थियों को मुख्य परीक्षा में इस बार जो परिवर्तन किया गया है। उसके अनुसार इस बार मुख्य परीक्षा में नैतिकता, सत्यनिष्ठा और एपीट्यूड और निबंध के ढाई-ढाई सौ अंक के अलग अलग प्रश्नपत्र होंगे। अब कोई भी अभ्यर्थी साहित्य को वैकल्पिक विषय के रूप में ले सकेगा। इस मामले अब अभ्यर्थी पर यह शर्त नहीं होगी कि वह जिस भाषा के साहित्य को अपना वैकल्पिक विषय बना रहा है उस विषय में उसका स्नातक होना अनिवार्य है। परीक्षार्थियों को एक विशिष्ट विषय और अपनी पसंद की अंग्रेजी या भारतीय भाषा में निबंध लिखना होगा। आयोग द्वारा पेश नए नियम के तहत एक भाषा को परीक्षा के माध्यम के रूप में तभी स्वीकार किया जाएगा जब न्यूनतम 25 अभ्यर्थी ऐसा चाहें।
गौरतलब है कि इस कदम को उठा कर यकायक वापस लेने के पीछे देश में अंग्रेजी का वर्चस्व सदा बनाये रखने वाले नापाक गुट को इस बात की आशंका थी कि भारतीय भाषाओं को अंग्रेजी भाषा के लिए दिया जा रहे  इस वनवास की खबर से अंग्रेजी गुलामी को बलात सह रहा आम भारतीय जनमानस जाग गया तो वह अंग्रेजी के इस एकछत्र सम्राज्य को ढ़ाह कर भारतीय भाषाओं का राज देश में न कर दे। इसी आशंका से सरकार ने  इस बार संघ लोकसेवा आयोग (यूपीएससी) ने सिविल सेवा की मुख्य परीक्षा में उसके द्वारा सुझावे गए परिवर्तनों को वापस लेते हुए अनिवार्य अंग्रेजी भाषा परीक्षा की आवश्यकता समाप्त कर दी है। गौरतलब है कि भारत के पूरे शासन प्रशासन को संचालित करने में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले भारतीय प्रशासनिक सेवा (आईएएस), भारतीय पुलिस सेवा (आईपीएस) और भारतीय विदेश सेवा (आईएफएस) अधिकारियों का चयन करने के लिए प्रतिष्ठित सिविल सेवा परीक्षा , संघ लोक सेवा आयोग (यूपीएससी ) लेता है। यही नोकरशाही देश में अंग्रेजी भाषा की इतनी गुलाम बन गयी कि वह आजादी के 65 साल बाद भी उसी फिरंगी भाषा अंग्रेजी से इस देश की लोकशाही, स्वाभिमान व आजादी को रौद कर इस देश में बलात अंग्रेजी का सम्राज्य थोपे हुए है। हालत इतनी शर्मनाक हो गयी कि देश में आज आजाद भारत में भी देश की भाषाओं में नहीं अपितु केवल अंग्रेजी भाषा में ही शिक्षा, न्याय, रोजगार व सम्मान मिल रहा है। आज भी देश के सर्वोच्च न्यायालय व उच्च न्यायालयों में अंग्रेजी भाषा का राज चल रहा है। हालत इतनी शर्मनाक हो गयी कि सर्वोच्च न्यायालय व उच्च न्यायालय में भारतीय भाषाओं में भी न्याय की मांग को लेकर 2012 के दिसम्बर माह से ही श्याम रूद्र पाठक व साथी सप्रंग सरकार की अध्यक्ष सोनिया गांधी के निवास के बाहर निरंतर धरना दे रहे हैं परन्तु क्या मजाल है कि सत्तारूढ़ सप्रंग व विपक्ष में बेठी भाजपा के कानों में जूं तक नहीं रेंग रहा है। वहीं संघ लोक सेवा आयोग के देश की नौकरशाही में अंग्रेजी को बनाये रखने के षडयंत्र के खिलाफ व भारतीय भाषाओं से कार्यपालिका को संचालित करने की मांग को लेकर पुष्पेन्द्र चैहान व उनके भारतीय भाषा आंदोलन के साथी विगत 1988 से निरंतर आंदोलनरत है। इसी संघर्ष में भारतीय भाषा आंदोलन के एक महान पुरोधा राजकरण सिंह जी शहीद हो गये। परन्तु देश के राजनेताओं में ही नहीं देश की जनता में अंग्रेजी गुलामी का ऐसा खुमार चढ़ा है कि यह उनके सर से उतरने का नाम ही नहीं ले रहा है।

देखना यह है कि इस प्रकार अपने ढह चूके फिरंगी सम्राज्य को बनाये रखने के लिए जिस प्रकार से देश के शासन प्रशासन में आजादी के बाद से काबिज हो चूके स्वयंभू फिरंगी गुलामों ने भारत में आजादी का सूर्योदय अपनी भारतीय भाषाओं में न होने दे कर देश में बलात उन्हीं अंग्रेजों की भाषा अंग्रेजी को थोप कर देश की आजादी को एक प्रकार से बंधक बना दिया है। इसी अंग्रेजी भाषा की गुलामी को धिक्कारने के लिए 1989 को (जिस दिन कर्नाटक के मुख्यमंत्री हेगड़े की सरकार बर्खास्त की गयी थी उसी दिन ) संसद दीर्घा से नारे बाजी करके भारत की आजादी को अंग्रेजी की गुलामी से मुक्ति करने का भारतीय मुक्ति सेना के संघर्ष का शंखनाद देवसिंह रावत ने किया था। सबसे हैरानी की बात यह है कि संसार के चीन, स्पेन, जर्मनी, फ्रांस, रूस, इटली, जापान व इस्राइल तमाम विकसित देश ही नहीं अपितु टर्की, इरान, इंडोनेशिया आदि देश भी अपनी भाषा में पूरे विश्व में विकास की परचम फहरा रहे है। संसार में चीनी भाषा के बाद सबसे अधिक बोली जाने वाली भारतीय भाषा हिन्दी आज अन्तरराष्ट्रीय भाषा बननी तो रही दूर अपने देश में अंग्रेजी की गुलामी करने के लिए अभिशापित हो रखी है। वहीं संसार की सबसे प्राचीन व वैज्ञानिक समृद्ध भाषा संस्कृति इसी अंग्रेजी गुलामी मानसिकता के हुक्मरानों के कारण आज मृत प्राय हो चूकी है। संसार में सबसे प्राचीन संस्कृति व दो दर्जन से अधिक समृद्ध भारतीय भाषाओं के होने के बाबजूद आज भारत में बलात फिरंगी भाषा अंग्रेजी, आजादी के 65 साल बाद भी शासन प्रशासन पर काबिज है। इसके बाबजूद देश में दर्जनों राजनैतिक दलों ,बुद्धिजीवियों व समाजसेवियों के कानों में जूं तक नहीं रेंग रही है। सबसे हैरानी की बात यह है अंग्रेजी गुलामी ओढ़े रहने की भारतीय हुक्मरानों व जनमानस की इस आत्मघाती प्रवृति से न केवल लोकतंत्र का अपितु देश की आजादी के लिए शहीद हुए लाखों शहीदों की शहादत का घोर अपमान हो रहा है।

विश्व की एकमात्र रहस्यमय ‘फूलों की घाटी ’
Unique Gift of nature  VALLEY OF FLOWER
प्यारा उत्तराखण्ड बेबसाइट सेवा -
विश्व की रहस्यमय व प्राकृतिक  फूलों का एक बडी घाटी भारत में हिमालय की गोद में उत्तराखण्ड में स्थिति है। यह उत्तराखण्ड में सीमान्त जनपद चमोली में विश्व प्रसिद्ध श्री बदरीनाथ धाम क्षेत्र में भूण्डार घाटी में स्थित है। नवम्बर से मई के अंतिम सप्ताह तक वर्फ से छादित रहने वाली यह फूलों की घाटी दिल्ली से 517 किमी दूरी पर स्थित है। समुद्र तल से इसकी ऊंचाई 11000 से 14 000 फुट पर स्थित है। इस फूलों की घाटी का असली नजारा देखने का समय 21 जुलाई से 10 अगस्त के बीच का समय सर्वोत्तम होता है। इन दिनों इस घाटी में अधिकांश फूल खिले रहते है। हालांकि पर्यटक सितम्बर तक यहां पर नजारा देखने के लिए आते रहते हैं। 
भारतीय जनमानस में यहां के बारे में दो प्राचीन कहानियां प्रचलित हैं एक तो भगवान शिव ने इस स्थान पर कामदेव को भष्म किया था। दूसरी इसी स्थान पर महावीर हनुमान जी संजीवनी बूटी को लेने के लिए आये थे। यहां पर 500 से अधिक प्रजातियों के प्राकृतिक फूलों की घाटी है। संसार में अपने आप में अदभूत इस प्राकृतिक फूलों की यह घाटी 3 किमी लम्बी व आधा किमी चैडी है। विश्व के इस अदभूत फूलों की घाटी को 1931 में एक अंग्रेज फ्रेंक एस स्मिथ व आर एल होल्डसवर्थ ने विश्व को इस प्रकृति की  अनमोल धरोहर से परिचित कराया था। इसकी महता को देखते हुए यह युनेस्कों ने इसे विश्व की धरोहर घोषित कर दी है। वहीं भारत सरकार ने इसे 87.50 किमी वर्ग क्षेत्र में फेली घाटी को नन्दादेवी राष्ट्रीय उद्यान की तरह युनेस्कों का अनुसार ही इसे संरक्षित उद्यान मानते हुए इसे राष्ट्रीय उद्यान भी घोषित किया है।  यहां पर ब्रह्मकमल,गेंदा, प्रिभुला, तारक, हिमालयी नीला पोस्त, बछनाग,  इन्डुला, सौसुरिया, कम्पानुला, स्ट्राबेरी, एनीमोन, रोडोडियोड्रान, जर्मेनियम, पोटेन्टिला, जिउम, लिलियम,  डेलफिनियम, रानुनकुलस, कोरिडालिस,पेडिक्युलरिस, मोरिना, इम्पेटिनस, बिस्टोरटा, लिगुलारिया, अनाफलिस, सैक्सिफागा, लोबिलिया, थर्मोपसिस, ट्रौलियस, एक्युलेगिया, कोडोनोपसिस, डैक्टाइलोरहिज्म, साइप्रिपेडियम, एवं  मार्श, इत्यादि प्रमुख  अतिदुर्लभ प्राकृतिक फूलों की सैकडों प्रजातियां पायी जाती है। 
 दिल्ली से यहां पहुचने के लिए 200 किमी दूरी पर हरिद्वार है। हरिद्वार से ऋषिकेश बदरीनाथ मार्ग पर( ऋषिकेश से 70 किमी पर देवप्रयाग, देवप्रयाग से 34 किमी श्रीनगर, श्रीनगर 19 किमी रूद्रप्रयाग, रूद्रप्रयाग से 52 किमी नन्द प्रयाग, नन्द प्रयाग से 21 किमी चमोली, चमोली से 33 किमी जोशीमठ, 19 किमी गोविन्द घाट ) बदरीनाथ धाम से 23 किमी पहले गोविन्द घाट स्थित है। इसी गोविन्द घाट से एक रास्ता बदरीनाथ को तथा दूसरा रास्ता यहां से फूलों की घाटी व हेमकुण्ड साहिब की तरफ जाता है। गोविन्द घाट से दूसरी तरफ 14 किमी  पैदल मार्ग पर घंघरिया स्थित है। घंघरिया से जहां 8 किमी दूरी पर एक रास्ता सिखों के प्रसिद्ध तीर्थस्थल हेमकुण्ड साहिब के लिए जाता है तथा घघंरिया से ही 3 किमी दूरी पर विश्व प्रसिद्ध फूलों की घाटी स्थित है। 


विहार में एक हेक्टर में 22.4 टन धान पैदा कर साधारण किसान ने बनाया विश्व रिकार्ड
पटना, मार्च 28 (प्याउ)।
बिहार के नालंदा जिले के दरवेशपुरा गांव के एक किसान सुमंत कुमार के खेत में एक हेक्टयर में 22.4 टन धान पैदा करके विश्व रिकार्ड बना कर कृषि वैज्ञानिकों को भी आश्चर्य में डाल दिया है। इस की भनक लगते है पूरे विश्व के कृषि वैज्ञानिकों , स्वयं सेवी संस्थाओं और मीडिया का जमघट इस किसान के खेत में लग गया है। इसके बारे में सबसे पहले विश्व जगत को जानकारी देते हुए ब्रिट्रेन के 160 पुराने प्रतिष्ठित समाजचार पत्र गार्डियन ने एक लेख में कहा गया था कि बिहार के नांलदा जिले के दरवेशपुरा गांव में एक किसान के खेत में उतनी धान पैदा हुई जितनी इससे पहले दुनिया भर में कहीं नहीं हुई थी। बीबीसी के अनुसार इस लेख में गार्डियन के पर्यावरण संपादक जॉन विडाल ने लिखा है कि किसान सुमंत कुमार के खेत में एक हेक्टयर में 22.4 टन की दर से हुई उपज उन तीन अरब से अधिक लोगों के लिए श्बहुत बड़ी खबर है। जिनका मुख्य भोजन चावल है.। यह खबर भले ही भारत की राजधानी दिल्ली के तथाकथित बुद्धिजीवियों के बीच चर्चा की खबर भले ही न  बन पायी हो परन्तु दरवेशपुरा गांव इन दिनों विश्व भर के  कृषि वैज्ञानिकों, स्वंयसेवी संस्थाओं और मिडिया का तीर्थ बन गया है। इस चमत्कार को साकार करने वाले किसान सुमंत से मिलने अमेरिका ही नहीं चीन व नीदरलैंड्स सहित दुनिया भर के लोग पंहुच रहे है। इससे पहले धान का प्रति हेक्टयर विश्व रिकार्ड चीन के किसान यूअन लोगपिन के नाम 19.4 टन प्रति हेक्टर का था। गत वर्ष सुमंत ने 13.-14 टन प्रति हेक्टर का धान उत्पादन किया था। 
बीबीसी के अनुसार अपनी उपज के प्रति विश्व भर के लोगों की इस भारी उत्सुकता को देख कर जहां साधारण किसान सुमंत कुमार अचंभित है वहीं पूरा गांव ही नहीं क्षेत्र के लोग भी यहां आने वाले लोगों की जमघट को किसी अजूबे से कम नहीं मान रहे हैं। खुद किसान व इस क्षेत्र के लोगों को यह जान कर हैरानी है कि दुनिया में धान और आलू का कोई रिकॉर्ड भी होता हैं। सामान्य से अतिविशिष्ट बने यह किसान की किस्मत व मेहनत को क्षेत्र के लोग मुक्त कंठ से सराहना करके इसे कुदरत का खेल ही बता रहे है। वहीं प्रति हैक्टयर 72.9 टन आलू का भी रिकार्ड तोड़ उत्पादन करके लोगों का ध्यान बरबस भ्रष्टाचार में बर्बाद हो चूके बिहार की तरफ आकृष्ठ करने का महत्वपूर्ण कार्य किया। 

कैसे खेलें अब खुले मन से रंगों की होली 


जिस देश के खेवनहार ही खेल रहे हों यहां भ्रष्टाचार की होली,
आप ही बताओं हम कैसे खेलें अब खुले मन से रंगों की होली ।।
पाक, चीन व अमेरिका मिल कर खेल रहे हों आतंक की होली
आप ही बताओं हम कैसे खेलें अब खुल
े मन से रंगों की होली ।।
जिस देश की आजादी व तंत्र को गुलाम बना रही हो अंग्रेजी
आप ही बताओं हम कैसे खेलें अब खुले मन से रंगों की होली ।।
जहां न्याय, प्रतिष्ठा शिक्षा, रोजगार पर बेठी हों फिरंगी बोली
आप ही बताओं हम कैसे खेलें अब खुले मन से रंगों की होली ।।
लाखों बच्चें भूखे, नंगे दर दर भटकें खेलें अरमानों की होली
आप ही बताओं हम कैसे खेलें अब खुले मन से रंगों की होली ।।
शिक्षा, स्वास्थ्य,न्याय रोजगार से वंचित जनता मंहगाई की मारी
आप ही बताओं हम कैसे खेलें अब खुले मन से रंगों की होली ।।
केवल आसरा श्रीकृष्ण का है ,बजाओ अब परिवर्तन की रणभेरी
मिटे संताप जनजन का साथी, चारों तरफ हो प्रेम की होली।।

देवसिंह रावत 

(होली के पावन पर्व बुद्धवार,27 मार्च को दिन के 11.42 बजे)

सत्तांधों के कुशासन के कारण अपराध की भी राजधानी बन रही है दिल्ली!


दिल्ली में एक और अरबपति दीपक भारद्वाज की उसके ही फार्म हाउस में हत्या

दिल्ली में आज मंगलवार 26 मार्च को जिस प्रकार से 2009 के  लोकसभा चुनाव में 604 करोड़ की सम्पति घोषित करने वाले पश्चिमी दिल्ली संसदीय सीट से बसपा के प्रत्याशी के रूप में उतरे उस लोकसभा चुनाव के देश में सबसे धनिक प्रत्याशी के रूप में विख्यात रहे 62 दीपक भारद्वाज को आज 26 मार्च की प्रातः 9.15 बजे को उनके बसंत कुंज फार्म हाउस नितीश कुंज में 3 हमलावरों ने गोली मार कर हत्या कर दी।
उल्लेखनीय है कि 1951 में साधारण परिवार में जन्में बसपा नेता 20 साल पहले दीपक भारद्वाज बाढ़ डिपार्टमेंट में एक लिपिक  थे। चंद सालों में वे जाने माने करोबारी के रूप में स्थापित हो गये। मारे गये दीपक भारद्वाज के कारोबार में रियल स्टेट, द्वारका में स्कूल, रियल स्टेट के तहत हरिद्वार में एक टाउनशिप प्रोजेक्ट और दिल्ली गुड़गांव में उनके होटल आदि में करीब अब 2000 करोड़ सम्पति का सम्राज्य भी छोड गये है। दीपक भारद्वाज की उनके बसंतु कुंज स्थित फार्म हाउस में हत्या की घटना ने कुछ महिने पहले नवम्बर 2012 में दिल्ली में एक फार्म हाउस में जिस प्रकार से रियल स्टेट व शराब के बडे करोबारी पौंटी चढ़ढा व उसके भाई की उनके ही दिल्ली के फार्म हाउस में हुई हत्या के प्रकरण को लोगों के जेहन में जिंदा कर दी।
दिल्ली में कानून व्यवस्था की हालत दिन प्रति दिन बद से बदतर हो रही है। यहां पर आये दिन हो रही बलात्कार की घटनाओं से देश विदेश में आम भारतीयों का सर शर्म से झुक रहा है। अपितु यहां पर नवधनाड्य अरबपतियों की जिस प्रकार से दिन दहाडे हत्या हो रही है उससे भी दिल्ली को अपराधियों की राजधानी के रूप में कुख्यात हो रही है। दिल्ली में अपराध की ताड़बतोड़ हालत इतनी दयनीय हो गयी कि यहां पर 15 सालों से राज करने वाली दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित यह बात खुद ही स्वीकार करती कि उनकी बेटी भी खुद को दिल्ली में सुरक्षित नहीं समझती है। यही नहीं वह दिल्ली की सुरक्षा में लगी दिल्ली पुलिस की कार्यप्रणाली से कई बार नाखुशी जाहिर कर चूकी है। यही नहीं दिल्ली में 16 दिसम्बर को हुई 23 वर्षीया छात्रा के साथ चलती हुए विभत्स बलात्कार के बाद ताड़ब तोड़ बलात्कारों की घटनाओं से अमेरिका सहित विश्व के कई देशों को अपने नागरिकों को भारत में सावधानी बरतने का निर्देश देना पडा। इन तमाम घटनाओं के बाद देश में कानून व्यवस्था में सुधार करने के लिए कठोर कानून बनाने व आरोपियों को तुरंत कडा दण्ड देने के लिए पूरे तंत्र में सुधार करने के बजाय सरकार जनभावनाओं के अनुरूप समय पर कदम उठाने को तत्पर नहीं है। शर्मनाक हालत यह है कि दिल्ली की दामिनी को अमेरिका की सरकार तो पुरस्कृत करती है परन्तु दामिनी प्रकरण पर घडियाली आंसू बहाने वाली सोनिया व मनमोहन की सरकार ही नहीं अपितु दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित को दिल्ली की जलविहार की 17 वर्षीया 11वीं कक्षा की गरीब बहादूर दामिनी की सुध लेने की होश तक नहीं रही। ऐसे शर्मनाक सत्तासीनों के कुशासन के कारण देश में दिन प्रति दिन जहां मंहगाई, भ्रष्टाचार, आतंकवाद से आम आदमी का जीना दुश्वार हो रखा है वहीं अपराधियों में कानून व्यवस्था का भय समाप्त हो कर यहां पर न केवल बलात्कार व हत्या हो रही है अपितु देश के हितों को बेशर्मी से रौंदा जा रहा है।


निशंक की धमकी से सहमें विजय बहुगुणा, भाटी आयोग भंग और त्रिपाठी बने अध्यक्ष


देहरादून 26 मार्च(प्याउ)। 25 मार्च को भाजपा मुख्यालय में प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री रमेश पोखरियाल निशंक ने प्रेसवार्ता करके प्रदेश की विजय बहुगुणा सरकार को सीधे चुनौती देते हुए कहा कि अगर सरकार ने 15 दिन के भीतर भाटी आयोग को भंग करने की मांग पर अमल नहीं किया तो भाजपा अगला कदम उठाएगी।’ भाजपा नेता निशंक की धमकी के कुछ ही घण्टे के अंदर प्रदेश सरकार ने भाटी आयोग भंग करके उप्र के पूर्व आईएएस अधिकारी सुशील चंद्र त्रिपाठी को भाजपा शासनकाल में हुए कथित घोटालों की जांच के लिए गठित आयोग के अध्यक्ष बनाया। इससे पहले इसी आयोग के अध्यक्ष केआर भाटी ने तराई विकास बीज निगम में भाजपा शासन काल में हुए घोटाले की रिपोर्ट पेश करके प्रदेश की राजनीति में एक प्रकार का तूफान ही मचा दिया था। भाटी आयोग की रिपोर्ट में पूर्व मुख्यमंत्री रमेश पोखरियाल निशंक व टीडीसी के तत्कालीन अध्यक्ष हेमंत द्विवेदी सहित तत्कालीन प्रमुख सचिव व एफआरडीसी को अनियमितता का दोषी ठहराया गया है। इससे पूरे प्रदेश की राजनीति गरमा गयी। भले ही कांग्रेसी नेता इशारे इशारों में निशंक को शिकंजे में लेने के दम भरते रहे पर असलियत तब सामने आयी जब प्रदेश सरकार के इशारे पर इस मामले को पुलिस में बिना नाम के दर्ज किया गया। हालांकि भाटी आयोग ने सीधे सीधे नाम ले कर आरोप लगाये थे। इसके बाद निशंक ने जब अपने तैवर दिखाये तो विजय बहुगुणा सरकार की हवाईयां उड गयी और आनन फानन में भाटी ने इस आयोग से इस्तीफा दे दिया और उप्र के पूर्व अधिकारी को इस आयोग का अध्यक्ष बना दिया गया। इस प्रकार निशंक के आगे बहुगुणा सरकार पूरी तरह दण्डवत हो गयी। क्योंकि बहुगुणा सरकार के कई कार्यो पर भाजपा पहले ही प्रश्न उठा चूकी है। इसलिए बहुगुणा सरकार ने निशंक से सीधे टकराव न लेने का निर्णय ले लिया हो। अब ये घोटाले पूर्व भाजपा की सरकारों जिन्होंने तिवारी शासन काल के घोटालों की जांच को कछुये की गति से करा कर जनता की आंखों में धूल झोंकने के लिए किया था, उसी तर्ज पर चले तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए। इस प्रकार एक दूसरे पर कार्यवाही न करने का अघोषित समझोता लगता है कांग्रेस व भाजपा के बीच हो गया है।

मुजफरनगर काण्ड पर शर्मनाक मौन व राष्ट्र भक्त रामदेव को सीबीआई से प्रताडित क्यों ?


देश की संस्कृति व सम्मान तथा विकास के लिए वर्षो से देश विदेश में लाखों लोगों का नेतृत्व करने वाले बाबा रामदेव को प्रताडित करने के लिए जो जांच सीबीआई को उत्तराखण्ड के मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा ने सोंपी है वह अपने आप में केवल अपने निहित स्वार्थ की पूर्ति के लिए व अपनी आका सोनिया गांधी की नजरों में सबसे बडा वफादार साबित करने के लिए किया गया कृत्य है। इसमें न्याय का कहीं दूर दूर तक वास्ता नहीं। अगर विजय बहुगुणा को न्याय से जरा सा भी वास्ता रहता तो वे तुरंत मुजफरनगर काण्ड-94 के दोषियों को सजा देने के लिए ऐसे कदम उठाते, स्टर्जिया प्रकरण सहित उत्तराखण्ड की जल जमीन व जंगल आदि संसाधनों की बंदरबांट करने वालों की जांच कराते, उत्तराखण्ड को शराब का गटर बनाने वाले राजनेताओं व नौकरशाहों के गठजोड़ को बेनकाब करने के लिए कराते। गंगा में अवैध खनन करने वालों को रोकने के लिए आमरण अनशन करने वाले बाबा को मौत के मुंह में धकेलने वालों को बेनकाब करने के लिए सीबीआई की जांच करते तो उत्तराखण्ड की जनता उसे स्वीकार करती। परन्तु विजय बहुगुणा को न्याय व उत्तराखण्ड से कहीं कुछ नहीं लेना उनको केवल अपने स्वार्थ की पूर्ति के लिए बाबा रामदेव जैसे देशभक्त को प्रताडित करने के लिए सीबीआई का दुरप्रयोग कर रहे है। जहां तक शंकरदेव जी का सवाल है उनका जो भी दोषी होगा उसको दण्ड अवश्य मिलेगा। पर न्याय देने के नाम पर राष्ट्रभक्तों को जलील करना सबसे बडा अधम है।
रामदेव के गुमशुदा गुरू की जांच सीबीआई से कराने की मांग करने वाले उत्तराखण्ड के मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा तथा केन्द्र में आसीन सोनिया मनमोहन की सरकार को शायद मुजफरनगर काण्ड-94 में भारतीय संस्कृति को शर्मसार करने वाले गुनाहगारों को आज 18 साल बाद भी दण्डित करने की सुध नहीं रही। विजय बहुगुणा तो इस काण्ड के मुख्य खलनायक रहे मुलायम सिंह यादव व उनके प्यादों को गले लगाने में तनिक सी भी लज्जा नहीं आता। उत्तराखण्ड का धरती आज शर्मसार है इस प्रकार के निहित स्वार्थ में डूबे सत्तालोलुपुओं को देख कर ।

Sunday, March 24, 2013


निशंक पर शिकंजा कस कर अपनी डूबती नौका पार लगायेंगे बहुगुणा?


-मुख्यमंत्री के चक्रव्यूह से उबर पायेंगे क्या निशंक

-निशंक पर मामला दर्ज करने की मांग कर लेकर कांग्रेस विधायक ने दिया धरना

प्रदेश के तमाम सियासी समीक्षकों के बीच इन दिनों एक खास चर्चा है कि आगामी 2014 के लोकसभा चुनाव में भाजपा को जनता की नजरों में पूरी तरह से बदरंग करने के लिए प्रदेश के मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा क्या भाजपा के पूर्व मुख्यमंत्री निशंक पर शिकंजा कसेंगे?  जिस प्रकार से आगामी लोकसभा चुनाव से पहले कांग्रेसी आला नेतृत्व पर उत्तराखण्ड के मुख्यमंत्री बहुगुणा को पार्टी के लिए कमजोर मानते हुए मुख्यमंत्री के पद से हटाने का भारी दवाब बढ ़रहा है।  इन्हीं सियासी दवाब को कमजोर करने के लिए मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा भाजपा की सबसे
संवेदनशील कड़ी समझे जाने वाले पूर्व मुख्यमंत्री निशंक पर शिकंजा कस कर अपनी व कांग्रेस की स्थिति मजबूत करने का मन बना चूके है।
सुत्रों के अनुसार कांग्रेसी रणनीतिकारों को इस बात का पूरा भरोसा है कि अगर प्रदेश सरकार निशंक पर शिकंजा कसती है तो प्रदेश की जनता में भाजपा के तमाम विरोध का कोई असर नहीं पडेगा और कांग्रेस के प्रति जनता में समर्थन बढेगा। क्योंकि लोगों को भले ही कांग्रेस भी दुध की धुली नजर नहीं आ रही है परन्तु जिस प्रकार से अपने कार्यकाल में भाजपा की निशंक सरकार स्टर्जिया, जल विद्युत परियोजनाओं , कुम्भ सहित कई प्रकरणों में आये दिन विवादों में घिरी रही उससे आम जनता को उस समय बेहद निराशा हाथ लगी जब सत्तासीन होने के बाद खण्डूडी ने निशंक के कार्यकाल में विवादस्थ रहे तमाम प्रकरणो पर एक प्रकार से मूकता साधी रही। जनता की मनोभावनाओं को समझने में न केवल खण्डूडी असफल रहे, परन्तु दूसरी तरफ कांग्रेस के वर्तमान मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा ने जनभावनाओं को समझ कर जनभावनाओं  के अनुरूप निशंक की तरफ अपना शिकंजा बढा रहे हैं।
गौरतलब है कि पूर्व मुख्यमंत्री के सबसे चेहते तराई बीज विकास निगम के तत्कालीन अध्यक्ष हेंमंत द्विवेदी पर जिस प्रकार से भाटी आयोग में शिकंजा कस रहा है, उससे साफ हो गया कि प्रदेश सरकार का असली निशाना हेंमंत द्विवेदी नहीं अपितु भाजपा के पूर्व मुख्यमंत्री निशंक ही है। यह केवल सियासी कायस लगाना नहीं अपितु पूर्व मुख्यमंत्री निशंक पर मामला दर्ज करने के लिए न केवल एक कांग्रेसी विधायक ने विधानसभा गैलरी में इसी सप्ताह धरना दिया अपितु प्रदेश कांग्रेस के प्रवक्ता धीरेन्द्र प्रताप ने तो सीधे इसका संकेत देते हुए कहा कि भ्रष्टाचार के मामले में भाजपा के पूर्व मुख्यमंत्री, मंत्री व नौकरशाह भी हरियाणा के भ्रष्टाचारी पूर्व मुख्यमंत्री चोटाला की तरह जेल जायेंगे। ऐसा नहीं कि प्रदेश भाजपा के नेताओं इसका भान नहीं है। बहुगुणा के अप्रत्याशित कदमों से भाजपा नेता आशंकित है। क्योंकि प्रदेश के अब तक के मुख्यमंत्रियों में बहुगुणा ही अपने निर्णयों से प्रदेश की राजनीति में न केवल विपक्षियों व अपनी पार्टी के बीच ही नहीं आम जनता में भी काफी उथल पुथल मचाते रहे। जिस विवादस्थ ढंग से मुख्यमंत्री की ताजपोशी हुई, उसके बाद उनका खुद को बंगाली मूल का बताना,  भू मालिकाना पट्टे देने, गैरसैंण में विधानसभा के भवन की नीव रखना, सरकार से राहत मांगने वाले उत्तरकाशी के प्राकृतिक आपदा पीडि़तों को भजन करने की नसीहत देने वाले, भू उपयोग परिवर्तन का कानून बनाना, मूल निवास प्रमाणपत्र, अपने बेटे को टिहरी संसदीय सीट से उप चुनाव में उतारना, उत्तराखण्ड के मुख्यमंत्री होने के बाबजूद दिल्ली में आये दिन डेरा डालना, प्रदेश में अपने चेहतों को भारी विरोध के बाबजूद महत्वपूर्ण पदों पर आसीन करना आदि ऐसे कदम है जिसकी जनता में भी भारी प्रतिक्रिया सुनाई दी।
अपनी राजनैतिक कदमों से प्रदेश की राजनीति में भारी हलचल मचाने वाले प्रदेश के मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा क्या प्रदेश में अपनी व कांग्रेस की पकड़ 2014 में होने वाले लोकसभा चुनाव के लिए मजबूत बनाने के लिए रमेश पोखरियाल निशंक पर शिंकंजा कस कर करने का दाव चलेंगे। इसी आशंका से भयभीत भाजपा ने भी सरकार के खिलाफ पूरी तरह से कमर कस
ली है।
पूर्व मुख्यमंत्री रमेश पोखरियाल के खिलाफ मुकदमा दर्ज करने की मांग को लेकर सत्तारूढ़ कांग्रेस के विधायक डा शैलेन्द्र मोहन सिंघल ने विधानसभा की गैलरी में धरना दिया। विधानसभा सत्र के दौरान आयोजित इस धरने को उन्होंने मुख्यमंत्री के द्वारा हर दोषी के खिलाफ कार्यवाही करने के आश्वासन के बाद समाप्त किया। गौरतलब है कि तराई बीज विकास निगम से जुड़ी भाटी आयोग की रिपोर्ट सदन में पेश करने से एक दिन पहले व बाद में प्रदेश की राजनीति में एक प्रकार से उबाल ही आ गया। इस घोटाले के निशाने पर भले ही तत्कालीन इस निगम के अध्यक्ष हेमंत द्विवेदी हों परन्तु प्रदेश की राजनीति के जानकारों को इस बात का भली भांति भान है इस प्रकरण का असली निशाना भाजपा के पूर्व मुख्यमंत्री निशंक ही है।
राजनैतिक क्षेत्रों में उठ रहे इस बबंडर को अपने धरने से हवा दे कर कांग्रेसी विधायक ने पूरी तरह से उजागर कर दिया। सत्तापक्ष के विधायक व मंडी परिषद के अध्यक्ष डा. शैलेंद्र मोहन सिंघल ने विधानसभा गैलरी में धरना देते हुए पुरजोर मांग की कि भाटी आयोग की रिपोर्ट  के अनुसार निगम के अध्यक्ष द्वारा बरती गई गंभीर अनियमितताएं और अवैधानिक ढंग से उन्हें अध्यक्ष बनाए जाने का अनुमादेन करने वाले तत्कालीन मुख्यमंत्री डा. रमेश पोखरियाल निशंक के खिलाफ मुकदमा दर्ज करने की मांग की। उनके धरने में कांग्रेस के दो विधायक शैलारानी रावत, उमेश शर्मा भी उपस्थित थे। यह धरना भले ही मुख्यमंत्री के आश्वासन के बाद समाप्त हो गया हो परन्तु इसकी गूंज 2014 तक साफ सुनायी देगी। यह तो आने वाला समय ही बतायेगा कि जनभावनाओं का विजय बहुगुणा सम्मान करके क्रियान्वयन करते हैं या खण्डूडी की तरह वे जनभावनाओं की उपेक्षा ़करके जनाक्रोश का भागी बनते है। सबसे हैरानी की बात यह है कि  गंगा यमुना का उदगम स्थली रही देवभूमि उत्तराखण्ड आज तक के मुख्यमंत्रियों के कुशासन के कारण शराब का गटर बना कर तबाही के गर्त में घंस चूका है। इस पूरे प्रकरण में लोग इस बात पर भी नजर गढ़ाये हुए हैं कि क्या निशंक इस भंवर से अपने दावों से स्टर्जिया सहित तमाम प्रकरणों से उबर पायेंगे ? क्या निशंक, खण्डूडी की तरह विजय बहुगुणा को भी संकटकाल में अपने पक्ष में रखने में कामयाब हो पायेगे? वहीं कांग्रेस निशंक प्रकरण से भाजपा की गुटबाजी को हवा दे कर उसकी एकजूटता को तार तार करना चाहती है। क्योंकि कांग्रेस को मालुम है कि भले ही निशंक व खण्डूडी दोनों इस समय एकजूट दिखे परन्तु खण्डूडी के समर्थक अंदर से कोटद्वार में मिली करारी पराजय के लिए निशंक से बेहद खपा है। शेष श्री कृष्णाय् नमो। हरि ओम तत्सत्। श्रीकृष्णाय् नमो।

Wednesday, March 20, 2013


 सीबीआई के हंटर से सरकार तो बचा सकती है कांग्रेस पर 2014 के चुनाव नहीं जीत पायेगी

स्टालिन को सीबीआई का हंटर चला कर मुलायम व माया से सरकार बचायेगी सरकार 

कांग्रेस सीबीआई के हंटर से अपनी सरकार तो बचा सकती है, परन्तु आगामी 2014 का चुनाव किसी प्रकार से नहीं जीत पायेगी। द्रुमुक के वरिष्ट नेता व द्रुमुक आलाकमान करूणानिधी के बेटे एम के स्टालिन के घर पर 21 मार्च की प्रातः साढ़े पांच बजे सीबीआई का छापा पड़ने के कदम को राजनैतिक क्षेत्रों में समर्थन के लिए आंखे दिखा रहे सपा प्रमुख मुलायम सिंह यादव व बसपा आला कमान मायावती को मजबूती से साथ देने का कांग्रेसी संदेश के रूप में देखा जा रहा है। सत्ता के लिए देश के राजनेता कितने निर्मम होते हैं इसका स्टालिन के घर पर पडा सीबीआई के छापे प्रत्यक्ष उदाहरण है। एक दिन पहले तक सप्रंग  सरकार की प्रमुख सोनिया व प्रधानमंत्री मनमोहन ही नहीं पूरी सरकार जिन करूणानिधि के लिए हर समय लाल कालीन बिछा कर स्वागत करने में दण्डवत रहती थी वह समर्थन वापस लेते ही कितनी निरंकुश व निर्दयी हो जाती है कि करूणानिधि के राजनीति के वारिस स्टालिन के घर पर हीं स्टालिन के फिल्म निर्माता बेटे उदयनिधी की एक विदेशी कार की आयात शुल्क डयूटी न चूकाने का बहाना बना कर सीबीआई का छापा डाल कर समर्थन वापस लेने का हंटर चलाने में जरा सी भी देरी नहीं की। यह कार कल ही नहीं खरीदी होगी यह पहले खरीदी होगी। सीबीआई की निष्पक्षता पर सवाल यही है कि सीबीआई को तब ही तुरंत क्यों यह गलती नजर आयी जब सरकार से दु्रमुक ने समर्थन वापस ले लिया। कांग्रेसी राजनीति के मर्मज्ञों का साफ मानना है कि सीबीआई द्वारा  स्टालिन के बेटे पर चलाया गया यह हंटर  स्पष्ट रूप से अस्तित्व की रक्षा में जुटी कांग्रेस सरकार को बेनी प्रकरण का बहाना बना कर आंखे दिखा रहे मुलायम को साधने में साहयक ही होगा। इसके साथ माया सहित उन तमाम दलों के नेताओं को यह एक साफ संदेश होगा कि सबकी जन्मपत्री कांग्रेस के पास है जरा भी किसी ने उन्नीस बीस की तो उसका हस्र भी करूणानिधि की तरह होगा। गौरतलब है कि मुलायम सिंह यादव के ही नहीं मायावती के खिलाफ भी कई मामले चल रहे हैं। जो इन दिनों कछुये की चाल से चल रहे हैं। अगर  इन दोनों ने जरा भी कांग्रेस को आंखे दिखाने की कोशिश की तो कांग्रेस कहां तक जा सकती है यह करूणानिधी प्रकरण पर कांग्रेस नेतृत्व ने सभी समर्थकों व विरोधियों को दिखा दिया। ऐसा नहीं कि केवल कांग्रेस अपने समर्थकों को ही इस हंटर से सबक सिखाती है। कांग्रेस अपनी ऐजेन्सियों से कांग्रेस के सबसे बड़े विरोधी बने बाबा रामदेव व भाजपा के पूर्व अध्यक्ष गडकरी को भी इसका स्वाद चखा चूकी है। हालांकि यह सच्चाई है कि कांग्रेस अकेले ऐसी पार्टी नहीं जो सत्तारूढ़ हो कर इस प्रकार की ऐजेन्सियों का हंटर अपनी सत्ता को बनाये रखने के लिए करती है। इस देश में अधिकांश राजनेतिक दल जब भी सत्तासीन हुए उनके काम कांग्रेस से हट कर अलग नहीं रहे। परन्तु कांग्रेस की यह कार्यवाही द्रुमुक राजनीति के गढ़ तमिलनाडू में भी ठीक ऐसा ही आत्मघाती साबित हो सकती है जैसे आंध्र प्रदेश में जगनमोहन रेेड्डी पर पडे सीबीआई के छापों के बाद वहां लोगों के दिलों में कांग्रेस के लिए नफरत बढ़ गयी। लोग जगन के गुनाह को साथ देने तक नजरांदाज करने वाली कांग्रेस को जगन से  अधिक गुनाहगार मान रहे है। कांग्रेस ने जगन पर सीबीआई का हंटर चला कर उसे प्रदेश का सबसे चेहता राजनेता बना कर कांग्रेस की सबसे समर्थक राज्य से अपनी कब्र ही खोद दी। 

Tuesday, March 19, 2013


नीतीश को चन्द्रशेखर बनना कर मोदी को प्रधानमंत्री 

बनने से रोकेगी कांग्रेस ?

मूर्ति प्रेम ने  किया नीतीश को माया की तरह  बेनकाब


 

प्यारा उत्तराखण्ड का विशेष लेख-
क्या नीतीश कुमार कांग्रेस के लिए अगले चरणसिंह या चन्द्रशेखर  बन कर देश का प्रधानमंत्री बनने की हसरत पूरा कर पायेंगे? यह सवाल देश की राजनीतिक पंडितों के मानस पटल पर कई दिनों से रह रह कर उठ रहा है। गौरतलब है भाजपा में  गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी को भावी प्रधानमंत्री के दावेदार के रूप में तेजी से उभर रहे हैं उससे प्रधानमंत्री बनने के लिए राजग के दूसरे बडे साझेदार जदयू के नेता व बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार व कांग्रेस के बीच दूरियां कम होते जा रही है। कांग्रेस को इस बात का भान हो चूका है कि मनमोहन की सरकार से देश की जनता बेहद खपा हैं और 2014 के लोकसभाई चुनाव में कांग्रेस को सत्ता से दूर होना पडेगा। भाजपा सत्ता में आसीन न हो पाये इसके लिए वह ऐसे नेता को सामने रखना चाहती है जिससे उसको ज्यादा नुकसान भी न हो और नरेन्द्र मोदी जैसे तेजतरार घोर कांग्रेस विरोधी भाजपा नेता को प्रधानमंत्री बनाने से रोका जा सके। इसके लिए कांग्रेस के लिए नीतीश कुमार चन्द्रशेखर साबित हो सकते हैं। कांग्रेस के मठाधीशों इस बात से भयभीत हैं कि अगर  2014 में  नरेन्द्र मोदी प्रधानमंत्री बन गये तो देश में कांग्रेस को निकट 15-20 सालों तक सत्ता में वापसी के दरवाजे बंद हो जायेंगे। इसी कारण कांग्रेस राजग गठबंधन के सबसे मजबूत घटक जदयू के नेता व विहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की प्रधानमंत्री बनने की प्रबल महत्वकांक्षा को हवा देने का काम कर रही है। 
जहां तक नीतीश कुमार के विकास व सुशासन के दावे को उनके द्वारा पटना के ऐतिहासिक गांधी मैदान में 10 करोड़ की लागत से बनायी गयी गांधी की 72 फीट ऊंची मूर्ति से ही बेनकाब हो जाती है। किस प्रकार नीतीश कुमार विकास के संसाधनों को मायावती की तरह मूर्ति लगाने में लगा कर अपनी अहं की पूर्ति कर सकते हैं। हकीकत यह है कि गांधी मैदान में गांधी जी की एक 16 फीट ऊंची मूर्ति पहले से लगी है जिसको 22 साल पहले लालू यादव के शासनकाल में केवल 2 लाख 10 हजार रूपये की लागत से लगी हुई है। अब नीतीश कुमार जनता को बतायें कि अगर कोई अन्य मुख्यमंत्री अगले चुनाव में जीत कर आये और वह 100 करोड़ से गांधी की 100 फीट ऊंची मूर्ति बनाये तो उसका विरोध क्या करके करेंगे नीतीश। क्या जनता के विकास का पैसा माया व नीतीश की तरह मूर्ति बनाने में ही खर्च करने के लिए किया जा सकता है। गांधी स्वयं जनता के धन की फिजूलखर्ची के विरोध में थे ऐसे में गांधी के नाम पर जनता का धन को अपनी अहं की तुष्टिकरण के लिए बर्बाद करने वाले देश में क्या आदर्श शासन देंगे?
हालांकि मोदी को अभी तक भाजपा ने प्रधानमंत्री का दावेदार घोषित नहीं किया। वे अघोषित दावेदार हैं। आम कार्यकत्र्ता ही नहीं देश के अधिकांश जनमानस आज मोदी को प्रधानमंत्री के रूप में वर्तमान तमाम उमीदवारों से बेहतर मान कर उनको एक बार प्रधानमंत्री के रूप में देखना चाहता है। परन्तु राजग में ही नहीं खुद उनकी अपनी पार्टी भाजपा में भी मोदी का काफी विरोध है। संघ व भाजपा की एक मजबूत गुट मोदी को नापसंद करता है। भाजपा के सबसे बडे नेता लालकृष्ण आडवाणी का तो रूख स्पष्ट विरोध में है, जिस प्रकार से भाजपा में उनकी वरिष्ठता को नजरांदाज करके उनको प्रधानमंत्री पद के दावेदार भी नहीं समझा गया इससे से झुझला कर उन्होंने दो टूक शब्दों में बयान दिया कि कांग्रेस से ही नहीं भाजपा से भी लोगों को मोह भंग हो गया है। आडवाणी के अलावा भाजपा में सुषमा स्वराज, अरूण जेटली, मुरली मनोहर जोशी, राजनाथ, गडकरी भी प्रधानमंत्री के पद के लिए अपनी अपनी गोटियां गुपचुप ढंग से चला ही रहे है।  इस तरह खुद भाजपा में भी मोदी की राह आसीन नहीं है परन्तु जनता व भाजपा कार्यकत्र्ताओं के बीच में मोदी ही आज पूरे देश में सबसे मजबूत प्रधानमंत्री के दावेदार है। ऐसा नहीं कि जदयू में कोई दूसरा नेता प्रधानमंत्री का दावेदार नहीं है। जदयू के अध्यक्ष शरद यादव जो वर्तमान में राजग के संयोजक भी है मोदी व नीतीश के आपसी द्वंद से काफी आशान्वित हैं कि बिल्ली के भाग का छीटा कहीं उनके नाम से न गिर जाय। भाजपा के सत्तालोलुपु नेताओं के कारण ही भाजपा नेतृत्व अभी मोदी को प्रधानमंत्री का दावेदार घोषित नहीं कर पाया। जितनी देर वह मोदी को प्रधानमंत्री का दावेदार घोषित करने में लगायेंगे उतना नुकसान उन्हें आगामी कोकसभा चुनाव में होगा। देश की जनता इस समय मजबूत प्रधानमंत्री देखना चाहती है जो देश को मनमोहनी कुशासन, भ्रष्टाचार, आतंकवाद से मजबूती से रक्षा कर विश्व में भारत की शान बढ़ा सके। हालंांकि कांग्रेस की इस दयनीय हालत में धकेलने के लिए कोई दूसरा नहीं अपितु कांग्रेसी नेतृत्व ही जिम्मदार है जिसने कुशासन के प्रतीक मनमोहन सिंह को जनता के भारी विरोध के बाबजूद बनाये रखा। अगर कांग्रेस मनमोहन को समय पर हटा देती तो देश की जनता उसकों फिर से अवसर दे सकते थे । परन्तु सोनिया व राहुल गांधी ने मनमोहन का अंध समर्थन करके न केवल देश की जनता के घावों पर नमक छिडका अपितु कांग्रेस का भविष्य भी जमीदोज कर दिया। इसका दण्ड जनता आगामी चुनाव में कांग्रेस को सत्ता से दूर हटा कर देगी।
 
दिल्ली में गत वर्ष हुए राष्ट्रपति के चुनाव से लेकर कांग्रेस गठबंधन वाली सप्रंग सरकार से द्रुमुक का समर्थन वापसी के मामले में नीतीश व उनकी पार्टी का रूख इस बात की तरफ साफ इशारा कर रहा है कि नीतीश व कांग्रेस के बीच कुछ ऐसा पक रहा है जो आगामी 2014 में होने वाले लोकसभा चुनाव के लिए तैयार हो रहा है। नीतीश द्वारा मोदी को भाजपा द्वारा भावी प्रधानमंत्री बनाने की पहल पर नीतीश का पुरजोर विरोध पर भाजपा व जदयू के नेताओं के बीच पक रहा खटराग के बीच प्रधानमंत्री मनमोहन व उनकी यूपीए सरकार द्वारा नीतीश सरकार के विकास की यशोगाथा गाना यकायक नहीं हुआ। यह सब आगामी 2014 में लोकसभा चुनाव में सप्रंग व राजग गठबंधन की मिली जुली सरकार बनाने  की रणनीति का एक महत्वपूर्ण चाल ही है। जिसके सहारे स्पष्ट बहुमत न मिलने के बाद केन्द्र में बनने वाली सरकार के संभावित गठबंधन की इमारत बनने जा रही है। कांग्रेस के पास यह मजबूरी है कि उनको वर्तमान में नीतीश के अलावा कोई ऐसा नेता दिखाई नहीं दे रहा है जिसे वह प्रधानमंत्री का ताज चरणसिंह या चन्द्रशेखर की तरह पहना कर भविष्य की राह आसान करी जाय। मुलायम सिंह, मायावती, ममता या जया किसी पर कांग्रेस का भरोसा नहीं है। ये सब कांग्रेस के लिए भविष्य के लिए कांटे बिछा सकते हैं। कांग्रेस के लिए आज सबसे बडी चुनौती राजग के वर्तमान गठबंधन में सेंघ लगा कर मोदी को आंधी को रोकने की है। इस रणनीति के तहत कांग्रेस के लिए नीतीश के अलावा कोई दूसरा ऐसा राजग का नेता नहीं जो उसके राजग गठबंधन में मजबूती से दरार पैदा करके मोदी को रोकने के लिए कांग्रेसी के साथ ताल से ताल मिला कर आगामी लोकसभा चुनाव के बाद कांग्रेस के बनवास को आसान बना सके। 

Monday, March 18, 2013


भ्रष्टाचार में रंगे सत्तालोलुपु भैडिये खेल रहे हैं जनहितों के गला घोंटने की होली

बहुगुणा से तत्काल मुक्ति दे कांग्रेस आला कमान 


रंगो के इस पावन त्यौहार होली कें रंगों में रंगी हुई उत्तराखण्ड की धरती में इन दिनों यहां के सत्तासीन कांग्रेसी हुक्मरान व विपक्षी भाजपा एक दूसरे का भ्रष्टाचार किचड से मुुंह काला करने में लगे हुए है।  वहीं सत्तापक्ष विपक्षी दल भाजपा के पूर्व हुक्मरानों पर भ्रष्ट्राचार में बदरंग उनकी भाटी आयोग द्वारा तैयार किया गया आइना दिखा रहा है। वहीं विपक्षी प्रदेश में सिडकुल सहित कई प्रकरणों में लिप्त प्रदेश की बहुगुणा सरकार पर भ्रष्टाचार का आरोप लगा रहे है। प्रदेश में सत्तासीन मुख्यमंत्री के उत्तराखण्ड विरोधी कार्यों को देखते हुए प्रदेश की जनता इस बात से हैरान है कि आखिर प्रदेश व कांग्रेस की लूटिया डुबाने में लगे मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा को क्यों अब तक मुख्यमंत्री के पद पर कांग्रेस नेतृत्व ने बनाये रखा है। आखिर क्यों कांग्रेसी नेतृत्व को यहां पर आसीन मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा की तार तार हो चूकी लोकप्रियता दिखाई नहीं दे रही है। आगामी लोकसभा चुनाव के लिए 2014 में क्या कांग्रेस पार्टी ऐसे की मुख्यमंत्री को यहां पर बनाये रखेगी जो अपनी लोकसभाई सीट टिहरी पर अपने मुख्यमंत्री रहते हुए अपने बेटे को नहीं जीता पाया तो कैसे वह व्यक्ति प्रदेश की पांचों लोकसभा सीट के साथ साथ देश में 35 उत्तराखण्डी प्रभावित लोकसभाई सीटों पर कांग्रेस की चुनावी नौका को पार लगायेगा। वेसे भी देश की राजनीति में माहौल बनाने के लिए प्रसिद्ध देश विदेश में रहने वाले सवा करोड़ से अधिक जागरूक उत्तराखण्डी समाज बहुगुणा को उत्तराखण्ड के मुख्यमंत्री बनाये जाने से बेहद खपा है। प्रदेश में कांग्रेसी विधायकों की इच्छा के विरूद्ध भी जा कर विजय बहुगुणा को मुख्यमंत्री के रूप में बलात थोप कर कांग्रेस आला नेतृत्व ने उन उत्तराखण्डियों को नाराज किया जिन्होंने भाजपा, अण्णा-केजरीवाल व रामदेव के तमाम विरोध के बाबजूद भाजपा के भ्रष्टाचारों से मुक्ति दिलाने के कांग्रेस पर भरोसा किया था।
उत्तराखण्ड को कम कर समझने की भूल कांग्रेसी नेतृत्व को ही नहीं भाजपा के नेतृत्व को भी कई बार आत्मघाती साबित हुई। मुलायम सिंह 1994 के मुजफरनगर काण्ड के कृत्य के अभिशाप से आज तक भी तमाम तिकडम करने के बाबजूद नहीं उबर पाया। उत्तराखण्ड में कभी क्षेत्रवाद नहीं राष्ट्रवाद व न्यायवाद ही विजय रहता है। अपना सर्वस्व राष्ट्र, मानवता व भारतीयता के लिए समर्पित करना ही उत्तराखण्ड की मूल प्रकृतिदत्त प्रवृति है। यह सदियों से विश्व संस्कृति का उदगम स्थली रही। इस सीमान्त प्रदेश जो गंगा यमुना व भगवान बदरीनाथ व केदारनाथ की पावन देवभूमि को आज यहां के हुक्मरानों ने शराब का गटर बना दिया। यहां पर वर्तमान बहुगुणा सरकार जो गांवों में पानी, बिजली, चिकित्सा व शिक्षा तथा रोजगार उपलब्ध नहीं करा पा रही है वह अब शराब को गांव गांव व कस्बे कस्बे तक पंहुचा कर इसको तबाह करने को तुली है। वेसे भी उत्तराखण्ड का समाज शराब के माफियाओं के मकड़ जाल में फंस कर त्रस्त है। अब सरकारें इन्हीं शराब के माफियाओं से प्रदेश को लुटवाने के लिए पूरे प्रदेश को शराब का गटर बना कर यहां के नौनिहालों का भविष्य चोपट करना चाहती है। भू माफियाओं से यहां की बहुकीमती जमीने कोडियों के भाव लुटवायी जा रही है। यहां पर जिस प्रकार से घुसपेटियों को मात्र वोटों के लालच में बसा कर इस सीमान्त प्रदेश को भी असम, बंगाल व उप्र की तरह तबाह करना चाह रहे है। प्रदेश के अब तब के हुक्मरानों ने यहां पर पहले ही जनसंख्या पर आधारित विधानसभाई परिसीमन थोप कर प्रदेश के राजनैतिक ताकत को कुंद कर दिया। अब मूल निवास प्रमाण पत्र, मुजफरनगर काण्ड, स्थाई राजधानी गैरसैंण व प्रदेश में बाहरी प्यादों को महत्वपूर्ण पदों में आसीन करके यहां के हक हकूकों को रौंदा जा रहा है। यहां पर केवल कमिशन के खातिर अंधाधुंध बांध बना कर यहां के लोगों के जीवन को नारकीय गर्त में धकेलने की कुचैष्टायें की जा रही है। इन सबके लिए यहां के निर्वाचित मुख्यमंत्री रहे तिवारी, खण्डूडी, निशंक व बहुगुणा पूरी तरह से जनता के हितों का गला घोंटने वाले साबित हुए।
प्रदेश की जनता यह देख कर ठगी महसूस कर रही है। वह समझ नहीं पा रही है कि इन नेताओं की अक्ल आखिर कहां घास चरने चले गयी। ये कल तक स्वयं को सबसे बडे जनसेवक व प्रदेश के हितैषी बता रहे थे। परन्तु जैसे ही इनको सत्ता मिलती है वे सबकुछ भूल कर केवल प्रदेश के संसाधनों को लूटने व लुटवाने में क्यों लग जाते है। ये क्यों भूल जाते हैं कि सत्ता का रंग होली की रंग की तरह ज्यादा समय नहीं चढ़ने वाला।
उत्तराखण्ड का दुर्भाग्य देश की तरह ही रहा। जनहितों को साकार करने के बजाय यहां के हुक्मरान अपने निहित स्वार्थ व अपने आकाओं के लिए प्रदेश का दोहन व शोषण करते रहे। प्रदेश में सत्तारूढ़ मुख्यमंत्री न जाने केवल 12 साल में ही इतनी जल्दी कैसे भूल गये कि जिस उत्तराखण्ड राज्य का गठन ही प्रदेश के विकास, सम्मान व संस्कृति को बचाने के लिए किया गया था। जिस राज्य गठन के समय से ही उत्तराखण्ड की  आंदोलनकारी जनता उत्तराखण्ड की जल, जंगल व जमीन को बचाने के लिए यहां पर हिमाचल की तरह यहां पर अंकुश लगाने की मांग कर रहे थे। उसी उत्तराखण्ड में आज ऐसी जनविरोधी कांग्रेसी सरकार विजय बहुगुणा के नेतृत्व में आसीन हो गयी है वह जनता की यह मूल भावना का गला घोंटते हुए पूरे प्रदेश को ऐसे बिल्डरों के रहमों करम पर झोंक रहा है।
इस पखवाडे उत्तराखण्ड, ब्रज ही नहीं देश विदेश में रहने वाले करोड़ों भारतीय होली का पावन पर्व को मना रहे है। वहीं प्रकृति भी बसंत के रूप में होली का त्यौहार मना कर पूरी सृष्टि के हर रंग में रंगीन करने में जुटी हुई है। प्रकृति जहां सृजन व विनाश के अदभूत रंगों से अपनी अदभूत सृष्टि को नया संदेश देती है। परन्तु प्रकति के इस स्पष्ट संदेश के बाबजूद इस सृष्टि में मानव रूपि जीव सारी सृष्टि का अपने निहित स्वार्थो के लिए जहां अंधाधुंध दोहन करके इस अदभूत सृष्टि के सौन्दर्य पर ग्रहण लगाने की कुचेष्टा कर रहा है। पूरी सृष्टि में इन दिनों जहां पैड पोधे नयी कोंपले, पत्तियों व फूलों से नयी नवेली दुल्हन की तरह सजी हुई है। वहीं इस पृथ्वी ग्रह के हुक्मरान जनहित के नाम पर भ्रष्टाचार, आतंक व शोषण के रंग में रग कर पूरे विश्व के अमन चैन, विकास व जन जीवन पर अभिशापित कर रहे है। ऐसा ही शर्मनाक प्रकरण  संसार की एकमात्र फूलों की धाटी व इस सृष्टि के दिव्य समाधानखण्ड की पावन धरती उत्तराखण्ड में भी घटित हो रहा है। भगवान श्रीकृष्ण ही रक्षा करेंगे उत्तराखण्ड का। शेष श्रीकृष्ण कृपा। हरि ओम तत्सत्। श्रीकृष्णाय् नमो।

Saturday, March 16, 2013


हथनी कुण्ड से यमुना मुक्ति के लिए जंतर मंतर पर आमरण अनशन जारी 


यमुना मुक्तिकरण समझोते के विरोध में व हथनी कुण्ड से यमुना को मुक्त करने के लिए 




नई दिल्ली 17 मार्च ।
भले ही सरकार ने मथुरा से दिल्ली कूच करने वाले हजारों यमुना भक्तों को समझोते का झुनझुना पकडा कर केन्द्र सरकार ने इस आंदोलन से लोगों को वापस मथुरा अपने घर भिजवाने में सफलता हासिल कर इसका श्रेय हासिल करने के कसीदे पढ़ रहा हो परन्तु इस समझोते को इस आंदोलन से विश्वासघात बताते हुए यमुना मुक्ति आंदोलनकारियों ने जंतर मंतर पर 15 मार्च आमरण अनशन शुरू कर दिया है। यमुना मुक्ति अभियान के बैनर तले जंतर मंतर पर चल रहे इस आंदोलन के संयोजक मथुरा के अग्रणी समाजसेवी चिंतक श्रीओम ने प्यारा उत्तराखण्ड के सम्पादक देवसिंह रावत को जंतर मंतर पर बताया कि जिस हथनी कुण्ड सेे यमुना को मुक्ति दिलाने के लिए हजारों यमुना भक्तों ने मथुरा से दिल्ली के लिए कूच किया था, सरकार से हुआ तथाकथित समझोता यमुना भक्तों की मांग को कहीं दूर-दूर तक पूरा नहीं करता है। यमुना नदी को बचाने व देश को न्याय दिलाने के लिए जंतर मंतर पर आंदोलन शुरू किया है। यमुना मुक्ति के लिए अनशन में बेठे लोगों में प्रबल प्रताप, श्याम, राम शंकर व स्वयं इस आंदोलन के संयोजक श्रीओम है। वहीं इस आंदोलन को सफल बनाने में गुलशन आनन्द, धनंजयसिंह, अश्वनी, गणेश गौतम, कल्पना भारद्वाज, सुश्री मोहनी, चतुर्वेदी, विनोद कुमार शर्मा उर्फ वालिया व रामकुमार अत्री सहित अनैक समाजसेवी दिन रात जुटे हुए है। इन आंदोलनकारियों ने 16 मार्च की सांयकाल इस समझोते के विरोध में पुतला दहन भी किया।
इस आंदोलन से हुए समझोते से न केवल जंतर मंतर पर अनशन व आंदोलन कर रहे यमुना मुक्ति के आंदोलनकारी ही नहीं कर रहे हैं अपितु देश के अधिकांश लोग भौचंक्के थे कि केन्द्र सरकार हथनीकुण्ड में रोकी गयी यमुना के जल की बहने वाली 70 प्रतिशत पानी यमुना जी में छोडने पर कोई कैसे संतोषजनक मान कर अपनी सफलता पर मिठाइयां बांटी जा रही है। सरकार देश के व्यापक हित में न्याय करते हुए हथनी कुण्ड में यमुना के अधिकांश जल पर कुण्डली मारने की हरियाणा की तानाशाही से मुक्त कराने के बजाय इसमें किसी नहर से गंगा का पानी डालने या का टोटके को समाधान के नाम पर परोस रही है।   इस समझोते के तहत सरकार ने यमुना के दोनों तरफ दिल्ली आदि तटवर्ती नगरों से निकलने वाले गंदे नालों का पानी यमुना न जा पाये इसके लिए बनाया जायेगा। इसके साथ एक समिति बनायी जायेगी जो इस समस्या का समाधान सुझायेगी। परन्तु शर्मनाक बात यह है कि सरकार इस समस्या का मूल विन्दू ‘हथनीकुण्ड’ में रोका हुआ यमुना को मुक्त करना तो दूर रहा इस पर चर्चा करने से भी बचती रही। केंद्रीय जल संसाधन मंत्रालय में सरकार ने दिल्ली, हरियाणा और उत्तर प्रदेश सरकार के प्रतिनिधियों के साथ तीन दौर की बैठक हुई। इसमें हरियाणा के प्रतिनिधियों ने यमुना अकॉर्ड- 1994 का हवाला देकर साफ कह दिया कि हथनी कुण्ड से और पानी नहीं छोड सकता । हरियाणा का दावा रहा कि वे इस समझौते के मुताबिक पानी पहले से ही छोड़ा जा रहा है। वहीं आंदोलनकारी ही नहीं आम जनता भी जानती है कि हथनी कुण्ड में यमुना का अधिकांश पानी हरियाणा ने रोका हुआ है। इसी कारण यह समस्या उत्पन्न हुई। आंदोलनकारी व देश की आम जनता इस बात से हैरान है कि कैसे सरकार ने 1994 को यमुना समझौता-1994 करके यमुना का अधिकांश जल पर हरियाणा को अधिकार दे दिया जबकि यमुना के तटवर्ती क्षेत्रों के अन्य राज्यों के करोड़ों लोगों के मूलभूत अधिकार को नजरांदाज किया गया।
गौरतलब है कि बुधवार 13 मार्च  की रात यमुना आंदोलनकारी और केंद्र सरकार के बीच सहमति बन गई। इसके तहत केंद्र सरकार ने यमुना में दिल्ली का गंदा पानी मिलने से रोकने के लिए इसके समानांतर नाला बनाने का वादा किया है। नदी का प्रवाह बढ़ाने के विकल्प मिलकर तलाशने की बात पर यमुना आंदोलनकारी भी सहमत हो गए हैं। आंदोलनकारियों व सरकार के बीच हुए समझौते के अनुसार कि दिल्ली में यमुना में गिरने वाले गंदे नालों को अलग रखने के लिए यमुना के समांतर एक नाला बनाया जाएगा। इसका पूरा खर्च केंद्र सरकार देगी। इसी तरह इसकी योजना ढाई महीने के अंदर तैयार कर ली जाएगी। योजना बनाने वाली समिति में यमुना रक्षक दल के भी दो प्रतिनिधि शामिल होंगे। इसी तरह यमुना में स्वच्छ जल के प्रवाह को बढ़ाने के लिए राज्य सरकारों के साथ मिलकर विकल्पों को तलाशा जाएगा। हथिनी कुंड से जल छोड़े जाने के मुद्दे पर हरियाणा से बातचीत होती रहेगी। भले  ही इस समझोते को यमुना रक्षक दल के अध्यक्ष जय कृष्ण दास अपनी आंशिक उपलब्धी बताते हुए अपना आंदोलन स्थगित कर दिया। जो यमुना भक्त दिल्ली आने के लिए मथुरा से चले थे वे दिल्ली के बदरपुर के गांव आली में डाले डेरा से ही वापस अपने घरों को चले गयें। इससे एक बडा आंदोलन को कुंद करने में सरकार ने सफलता हासिल की उससे देश हित में लगे लोग चिंतित है।  वहीं इस प्रकरण से इस आंदोलन के नेतृत्व मान मंदिर बरसाना के रमेश बाबा, यमुना रक्षक दल के प्रमुख जय कृष्ण  दास के नेतृत्व पर भी आंदोलनकारी आज प्रश्न उठा रहे है। जंतर मंतर पर आंदोलनकारी ही नहीं यमुना रक्षक दल के राष्ट्रीय सलाहकार उदयन शर्मा, गुजराती पुष्टि मार्गी सम्प्रदाय, चतुर्वेदी समाज ही नहीं सम्पूर्ण ब्रजवासी भी अपने आप को ठगे महसूस कर रहे हैं। सबसे हैरानी की बात है जिस उत्तराखण्ड से यमुना नदी निकलती है वो हथनीकुण्ड पर जिस प्रकार से यमुना के जल पर हरियाणा अधिकार जता रहा है उस प्रकार का कहीं अधिकार उत्तराखण्ड ने जता दिया तो कैसे देश चलेगा? इसलिए अन्तरराष्ट्रीय नदी जल वंटवारे के मानको के अनुसार ही इस समस्या का समाधान होना चाहिए।


विदेशी शासकों की गुलामी से खतरनाक है अंग्रेजी भाषा की गुलामी

आखिर कब तक भारतीय जार्ज पंचम व उसके वंशजों की जय हे जय है करते रहेंगे ?


देश में अंग्रेजी की अनिवार्यता के विरोध व भारतीय भाषाओं में शिक्षा, रोजगार, सम्मान व न्याय दिलाने का संघर्ष  मात्र भाषा की लडाई नहीं अपितु  हम सभी भारतीयों की अपने स्वाभिमान व लोकशाही की है। अपनी भाषा के बिना व्यक्ति ही नहीं समाज व राष्ट्र भी गूंगा व गुलाम होता है। भाषा की गुलामी विदेशी शासकों की गुलामी से बदतर होता है। भाषा की गुलामी से व्यक्ति, समाज व राष्ट्र अपने संस्कृति, अपनी जमीन व अपने इतिहास से कट कर उसी बलात थोपी गयी भाषा की मूल संस्कृति का की अंधा गुलाम बन जाता है। इस प्रकार व न तो अपनी मूल संस्कृति से जुडा रहता है व नहीं वह उस बलात आत्मसात की गयी भाषा की संस्कृति का ही बन पाता है। उसकी स्थिति रंगे हुए सियार की तरह दयनीय हो जाती है।
जिस विदेशी तंत्र से मुक्ति के लिए हमारे लाखों देशवासियों ने अपनी शहादत देते हुए सैकडों सालों का संतत् संघर्ष किया था उस आजादी को एक बार फिर उसी फिरंगी गुलामी के स्वयंभू गुलामों ने अपनी संकीर्ण मानसिकता व स्वार्थ के कारण पूरे देश में उन्हीं की भाषा अंग्रेजी को बलात थोप कर बंधक बना लिया है। शर्मनाक स्थिति यह है कि आज भारत में न तो विद्यालयों में भारतीय भाषा में शिक्षा ही मिल पा रही है व नहीं सही रोजगार व न्याय तथा सम्मान ही भारतीय भाषाओं में मिल पा रहा है। देश के अंग्रेजी भाषा के इन गुलाम कहारों ने पूरे देश में ऐसा तंत्र थोप दिया है कि इस देश में अच्छी शिक्षा, रोजगार, न्याय व सम्मान केवल अंग्रेजी भाषा की झोली में बंधक बना दिया है। आज जो बच्चे भारतीय भाषाओं के माध्यम से शिक्षा ग्रहण करते हैं उनको न तो रोजगार ही मिल सकता है व नहीं सर्वोच्च न्यायालय में भारतीय भाषाओं में न्याय ही मिल सकता है। इन सब पर फिरंगी भाषा अंग्रेजी की लक्ष्मण रेखा खीच कर वंचित कर दिया गया है। देश के नीति निर्माताओं को यानी नौकरशाही का चयन करने वाली संस्था ‘संघ लोकसेवा आयोग’ने इसी अंग्रेजी अनिवार्यता व जबरन ज्ञान होने की फांस डाल कर पूरे देश को अंग्रेजी का गुलाम बना कर भारत में अंग्रेजी का अघोषित गुलाम बना दिया है।
 अंग्रेजी को अंतरराष्ट्रीय भाषा व ज्ञान विज्ञान की भाषा बता कर पूरे देश के स्वाभिमान व लोकशाही को गुलाम बनाने वाले अंग्रेजी भाषा के गुलाम व भारत की लोकशाही से बलात्कार करने वाले देशद्रोही जयचंदों को इस बात का भान होना चाहिए कि चीन, जर्मन, फ्रांस, इटली, जापान, रूस, इस्राइल, इंडोनेशिया व टर्की आदि विकसित देशों ने अपनी अपनी भाषा में विकास की कूचालें भरी ना की अंग्रेजी का गुलाम बन कर। भाषा अभिव्यक्ति का माध्यम होता है। वैज्ञानिक भी इस बात को स्वीकार करते हैं कि मातृभाषा में ही जो प्रतिभा का चहुमुखी विकास हो सकता है वह किसी दूसरी भाषा में नहीं। आजादी के बाद इन्हीं अंग्रेजी की जूठन खा कर स्वयंभू गुलाम बन कर अंग्रेजी से पूरे देश के स्वाभिमान व आजादी को रौंद कर इन जयचंदों ने न केवल भारतीय  लोकतंत्र का गला घोंटा  अपितु संसार की सबसे प्राचीन, समृद्ध व वैज्ञानिक भाषा संस्कृत सहित तमाम भारतीय भाषाओं को भी संस्कृत की तरह मृतप्राय बनाने का राष्ट्रद्रोही कृत्य किया। इनके इस कृत्य से भारतीय न केवल अपनी संस्कृति, अपनी भाषा से इसी षडयंत्र से वंचित कर दिया गया अपितु हर साल करोड़ों नौनिहालों को फिरंगी गुलामी के कहारों की आत्मघाती फौज तैयार हो गयी कि जिनको न तो अपनी मूल संस्कृति, इतिहास व नहीं सम्मान का भान रहता है वे केवल बलात थोपी गयी भाषा के बंधुआ मजदूर या तोते बन कर रह जाते है। संसार में ऐसा अभागा देश भारत के अलावा कोई दूसरा नहीं है जो अपनी भाषा, अपना नाम व अपनी संस्कृति को केवल इसी अंग्रेजी गुलामी का कहार बनने के कारण खुद ही गला घोंट रहा है। किसी व्यक्ति, समाज व राष्ट्र के लिए सबसे खतरनाक गुलामी  जेल या विदेशी शासक नहीं अपितु उससे उसकी भाषा से वंचित करने की गुलामी है। किसी भी भाषा में शिक्षा, रोजगार, सम्मान व न्याय न मिलने से वह भाषा मृतप्रायः हो जाती है। यही देशद्रोह आजादी के नाम पर भारत में 66 सालों से निरंतर हो रहा है। यह देश की आजादी को बंधक बनाने के सम्मान है। इसी के खिलाफ मेने संसद दीर्घा से अंग्रेजी गुलामी के खिलाफ 1989 में जिस दिन कर्नाटक में हेगडे की सरकार को बर्खास्त किया गया  था नारे बाजी करके खुली चुनौती दी थी। इसी के खिलाफ निरंतर संघर्ष चल रहा है। बलात विदेशी भाषा थोपना, किसी देश में सबसे बडा अपराध, जनद्रोह, सबसे बडा भ्रष्टाचार व सबसे बडा मनावाधिकार हनन का मामला है।  गांधी जी सहित देश के चिंतक इसी लिए आजादी के तुरंत बाद विदेशी भाषा अंग्रेजी से मुक्त करना चाहते थे। भाषा अपनी संस्कृति की वाहिका भी होती है। भारतीय भाषा भारतीय संस्कृति व अंग्रेजी अंग्रेजों की संस्कृति की वाहिका है। भाषाओं का ज्ञान होना अच्छा है। देश में कोई किसी भी देशी या विदेशी भाषा को सीखना चाहता है यह स्वागतयोग्य है। चंद लोगों की सनक के कारण पूरे देश की लोकशाही, स्वाभिमान व संस्कृति को गुलाम नहीं बनाना एक अक्षम्य अपराध है।  भारतीय भाषाओं को निरादर करके बलात भारत में अंग्रेजी में शासन प्रशासन चलाना सबसे बडी गद्दारी है। सबसे हैरानी है कि अंग्रेजी गुलामी में भारतीय हुक्मरान, बुद्धिजीवी व नौकरशाही ही नहीं आम प्रबुद्ध लोग इतने अंधे बने हुए है कि उनको विदेशी शासकों द्वारा बार बार इनको अपनी भाषाओं में बोलने का करारा तमाचा खा कर भी इनके गुलामी का खुमार दूर नहीं होता। आज शर्मनाक स्थिति यह है कि भारत में भारतीय भाषाओं के लिए संघर्ष करने वाले व अंग्रेजी की गुलामी पर प्रश्न उठाने वालों को विकास के मार्ग में सबसे बडा अवरोधक व संकीर्ण मान कर उपेक्षा की जा रही है। मुझे समझ में नहीं आ रहा है कि आखिर यह देश कब तक जार्ज पंचम व उसके वंशजों की जय हे जय हे कहता रहेगा? कब तक स्वयंभू गुलाम बनता रहेगा ? जरूरत है आज देश की आजादी को अंग्रेजी भाषा की गुलामी की दासता से मुक्त कराने की। जिससे भारत में सच्चे अर्थो में लोकशाही का उदय हो सके और भारतीय संस्कृति  पूरे विश्व को अपने ज्ञान व संस्कारों से आलौकित कर एक गूगा राष्ट्र अपनी भाषा में विश्व से संवाद कर सच्ची लोकशाही में जी सके।