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Tuesday, August 30, 2011

महाकाल का अदभूत न्याय- क्यों अण्णा बने महानायक व रामदेव को मिला अपयश

महाकाल का अदभूत न्याय-
क्यों अण्णा बने महानायक व रामदेव को मिला अपयश


‘आप सब भी हैरान होंगे कुदरत का अदभूत न्याय को देख कर। ‘आपने देखा कि भारत के दिल में बसी दिल्ली का वही रामलीला मैदान, वही अनशन व वही लाखों समर्थक । परन्तु इसका परिणाम देख कर आप सबकी आंखें फट्टी की फट्टी रह जायेगी। अण्णा हजारे जहां आमरण अनशन के बाद विश्व में लोकशाही के महानायक बन कर उभरे वहीं विश्व विख्यात बाबा रामदेव अपने आमरण अनशन से अर्श से फर्श पर ऐसे पटके गये कि वे ऐतिहासिक कार्य करने के बाबजूद भी अपयश के भागी बन गये। हालत यह है कि आज तक भी वे अनशन या दिल्ली में आंदोलन करने की हिम्मत तक नहीं जुटा पा रहे है। वहीं अण्णा हजारे को अपने इन दो आमरण अनशन से पहले बहुत कम प्रबुद्व लोग ही जानते थे, आज वे पूरे भारत की जनता के जहां जननायक हैं अपितु ंविश्व लोकशाही के चमकते सूर्य बन कर पूरे संसार को गांधी के बाद रोशन कर रहे हैं। जहां बाबा राम देव ंसंत भेषधारी होने के बाद 11000 करोड़ रूपये से अधिक सम्पति का सम्राट हैं वहीं अण्णा हजारे के पास कहने को अपना मकान तक नही ं है वे भेषधारी संत भले ही न हो परन्तु पूरे संतों की तरह एक मंदिर के छोटे से कमरे में रह कर जनहित के कार्यो में दशकों से समर्पित हैं। संतों को सम्पति संग्रह से दूर रहने का सिद्वान्त पर बाबा रामदेव नहीं अपितु अण्णा हजारे ही खरे उतरते है।
आमरण अनशन से पहले जहां बाबा रामदेव पूरे विश्व में विख्यात रहे, उनको लोग श्रद्वा से नमन् करते रहे, उनकी आगवानी में सरकारें पलकें बिछाये रहती। वहीं अनशन पर बैठने के एक सप्ताह के अंदर ही वे अर्श से फर्श पर आ गये। उन पर सरकार व पुलिस का कहर ढहा, समर्थकों पर लाठियां चली व अपने समर्थकों को पिटता छोड़ कर बाबा रामदेव अपनी जान बचाने के खातिर महिलाओं के वस्त्र पहन कर भाग रहे थे परन्तु काल कितना निष्ठुर उसने भागने भी नहीं दिया, महिलाओं का भेषधारण किये हुए बाबा रामदेव को पुलिस ने रामलीला मैदान के समीप ही पकड़ लिया और पुरी दुनिया के सामने टीबी चेनलों के माध्यम से उनका यह रूप जब पुरूष प्रधान समाज ने देखा तो वे पचा नहीं पाये, चारो तरफ बाबा रामदेव को देश हित में ऐतिहासिक कार्य करने के बाबजूद अपयश ही मिला। भले ही पूरे देश के लोगों की सहानुभूति उनके साथ व आंदोलनकारियों के साथ रही। परन्तु बाबा रामदेव के प्रकरण मेें महाकाल ने जहां मनमोहन सरकार ने अपना दमनकारी घिनौना चेहरा ऐसा बैनकाब किया कि देश के लोगों ने कांग्रेसी प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह व उनकी सरकार की पूरे विश्व में थू-थू हुई। कांग्रेसी भी अपनी सरकार के आत्मघाति कृत्य से खुद से नजर तक नहीं मिला पा रहे थे। अपनी ही नजरों में वे खुद को गुनाहगार समझने लगे।
यह एक अदभूत नजारा है महाकाल के महान्याय का। बलि इतने दानी थे, पाताल पठाये गये। कर्ण महाबली थे, वक्त ने अन्यायी कौरवों के साथ खड़ा किया। भगवान राम के हाथों रावण का बध एवं विभिषण को राजतिलक पर इस अदभूत लीला का वर्णन तत्वज्ञानी लोग इस प्रकार से करते हैं ‘ खिजो दिनों परमपद् रिझो दिनों लंक’। भगवान की दया को बहुत कम यानी तत्वज्ञानी लोग ही समझ पाते हैं उन्होंने क्रोधित हो कर जिस रावण का बध किया उसको परम मुक्ति प्रदान की और जिस विभीषण पर प्रसन्न हुए उसे इस सांसारिक जीवन यानी लंका का ताज दिया।
महाकाल के प्रतीक रहे काला बाबा अकसर मुझसे कहते रहते थे देवी काल कभी किसी को डण्डा लेकर मारने नहीं आता है कारण बनाता है। उनके राष्ट्र व मानवता के लिए समर्पित जीवन को देख कर मैं आज चमत्कृत हूॅ। वे कभी किसी सरकार से याचना नहीं करते थे वे खुद सरकारों को बनाते व गिराते थे। मैने अपनी आंखों ंसे उनको वाजपेयी की सरकार को रसातल में धकेलते देखा, सोनिया का देश का ताज सोंपने के लिए कारणों को बनाते देखा। आंधी, तूफान व वारिस को लाते व रोकने की अदभूत शक्ति थी। वे कई बार कहते थे देवी ये दो पेर का जानवर भले ही मेरा कहना ना माने परन्तु मै प्रकृति को डण्डा दे कर काम कराता हॅॅू। मैं संसार में भगवान श्रीकृष्ण के बाद जिससे सबसे अधिक प्रभावित रहा वो काला बाबा हैं जो पाखण्ड, भ्रष्टाचार, शोषण व गैरबराबरी के घोर विरोधी ही नहीं समय पर करारा सबक खुद ही दोषी को सिखाते थे।
यहां पर मैं उनका जिक्र संक्षिप्त में करूंगा। यहां मूल प्रश्न विषय बाबा रामदेव व अण्णा हजारे के राष्ट्रहित में किये गये आमरण्ंा अनशन से एक को मिली विश्वजयी कृति व एक को मिले अपयश पर में अपना चिंतन आपके सामने रख रहा था। दुनिया में एक से कार्य करने वाले सभी आदमियों को एक सी सफलता नहीं मिलती। खुद अण्णा हजारे अपने संबोधन में रामलीला मैदान में कहत हैं कि उन पर भगवान की अपार कृपा है। उनको सेना मे उस समय बचाया जब पाक के जंगी जहाज ने उनकी सारी टुकड़ी का खात्मा कर दिया। उनको सारी उम्र ब्रह्मचर्य का वरण करने का विचार ही नहीं संयोग भी दिया। अण्णा हजारे के अनुसार भगवान ने महान तपस्वी महर्षि विश्वामित्र का तप भंग किया परन्तु उनके ब्रह्मचार्य को बनाये रखने के लिए उन्होंने हमेशा लेश मात्र का भी विचलन नहीं दियंा। हर नारी उनके लिए माता व बहन के समान दिखी । परमात्मा की अपार कृपा से वे सांसारिक हो कर भी जड़ भरत की तरह हर पल भगवान के चरणों में समर्पित रहे। वे गांधी की तरह भगवान पर अटूट विश्वास करते थे। वे सांसारिक रिस्तों से अधिक भगवान पर विश्वास करते है। वही रामदेव, संन्यासी होने के बाबजूद सम्पतियों के संग्रह में व लोकेष्णा में जुट गये, वे महायोगी कह कर स्वयं 200 साल जीने का दंभ भरने लगे। शायद उनकी यही बात देख कर करूणामयी भगवान ने उनको ऐसा आयना दिखाया कि वे अभी तक उस तस्वीर को देख कर उभर नहीं पाये। मै दोनों के आंदोलन को करीब से देख ही नहीं रहा था अपितु उसका सहभागी भी रहा। यही अदभूत लीला देख कर प्रभु को शतः शतः नमन् करने का मन करता है वह कैसे तिवारी, अग्निवेश सहित तमाम लोगों को ंबेनकाब करते है। यही बात मैं सबको समझाता रहता हॅू कि महाकाल के न्याय से डरो, परन्तु सत्तांध कहां सुनने वाले, निशंक भी नहीं मान रहा था । अब चारों तरफ से घिर रहा है।

Saturday, August 27, 2011

भ्रष्टाचार को संरक्षण दे रही भाजपा से इस्तीफा दे कर जनरल रावत ने किया भाजपा सरकार को किया बेनकाब

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-श्रीनगर मेें जनरल रावत के समर्थन में हुई ऐतिहासिक रैली ने किया प्रदेश से भाजपा कांग्रेस के सफाये एक ऐलान/
-प्रदेश में एक सशक्त राजनैतिक विकल्प दे सकता है मोर्चा/
प्यारा उत्तराखण्ड की विशेष रिपोर्ट-

27 अगस्त को एक तरफ दिल्ली के रामलीला मैदान में पूर्व सैनिक से विश्व लोकशाही के महानायक बने अण्णा हजारे के ऐतिहासिक आमरण अनशन से सहमे राजनैतिक दल ने घुटने टेकते हुए उनकी मांगों को स्वीकार करने के लिए विवश कर चूके थे वहीं दूसरी तरफ भारतीय संस्कृति की पावन गंगोत्री उत्तराखण्ड मे भाजपा के पूर्व सांसद व प्रदेश के बहुसंख्यक पूर्वसैनिकों के सबसे कद्दावर नेता ले. जनरल तेजपाल सिंह रावत ने श्रीनगर में आयोजित विशाल रैली में भाजपा की प्रदेश निशक सरकार के भ्रष्टाचार को शर्मनाक संरक्षण दे रहे भाजपा के केन्द्रीय नेतृत्व से इस्तीफा देकर भाजपा को पूरी तरह बेनकाब कर दिया। उन्होंने प्रदेश को भाजपा व कांग्रेस के भ्रष्टाचारी व उत्तराखण्ड विरोधी चंगुल से बचाने के लिए उत्तराखण्ड रक्षा मोर्चा का गठन करके प्रदेश की राजनीति में जहां खलबली मचा दी है। उनके इस ऐतिहासिक ऐलान के साथ उनके करीबी सिपाहे सलार व प्रदेश भाजपा के दर्जाधारी नेता राजेन्द्र भण्डारी ने भी इस्तीफा दे दिया। इस रैली में प्रदेश में भ्रष्टाचार के कुशासन को उखाड़ फेंकने का संकल्प ले कर जनता को जागृत करने वाले प्रदेश के महान लोकगायक नरेन्द्र सिंह नेगी, सहित प्रदेश के अग्रणी समाजसेवी, व पूर्व वरिष्ठ आईएएस सुरेन्द सिंह पांगती, रघुवीर बिष्ट सहित हजारों लोग उपस्थित थे। श्रीनगर में ऐसी ऐतिहासिक रैली लोगों को दशकों से देखने को नहीं मिली थी। मोर्चा के गठन से प्रदेश की राजनीति में नये समीकरण बन गये है तथा 2 सितम्बर को हल्द्वानी रेली व 12 सिंतम्बर को टिहरी में विशाल आयोजन करने का ऐलान कर उत्तराखण्ड रक्षा मोर्चा ने अपनी जमीनी दमखम दिखा कर प्रदेश में नये राजनैतिक समीकरणों की जनआशाओं को नयी हवा दे दी है। उक्रांद व अन्य तमाम दलों को चाहिए कि वे वक्त ंकी नजाकत समझ कर मोर्चा के नेतृत्व में बन रहे इस नये विकल्प के साथ गठजोड कर प्रदेश से भाजपा व कांग्रेस के जनविरोधी कुचक्र को दूर करके जनाकांक्षाओं के आदर्श उत्तराखण्ड बनाने में अपना सकारात्मक योगदान दें।

सत्तांधों को लोकशाही का ऐेतिहासिक सबक सिखाने वाले जननायक अण्णा हजारे को शतः शतः नमन्

सत्तांधों को लोकशाही का ऐेतिहासिक सबक सिखाने वाले जननायक अण्णा हजारे को शतः शतः नमन्/
मनमोहन व देशमुख व एनजीओ प्रकरण द्वारा लगाये ग्रहण से उठे कई सवाल/


फिरंगियों से आजादी के जीत के महाजननायक महात्मा गांधी के बाद भ्रष्टाचार से त्रस्त मृतप्राय भारत की आत्मा को अपने विश्वविख्यात जनांदोलन से जागृत करने वाले दूसरे गांधी के नाम से विश्वविख्यात हुए अण्णा हजारे के 16 अगस्त 2011 से विश्व को झकझोरने वाले आमरण अनशन को 27 अगस्त को संसद द्वारा स्वीकार करने पर अण्णा हजारे ने अपना आमरण अनशन को 28 अगस्त 2011की सुबह 10.30 बजे समापन कर अपने संघर्ष को कानून बनाने तक जारी रखने का ऐलान किया। क्योंकि उनकी लोकपाल में तीनों मांगों को सम्मलित करने के प्रस्ताव को संसद के दोनों सदनों ने सर्वसम्मति से पारित करते हुए अण्णा हजारे से अपना आमरण अनशन समाप्त करने की पुरजोर अपील की थी। संसद की भावनाओं का सम्मान करते हुए अण्णा हजारे ने अपना आमरण अनशन 28 अगस्त को 10 बजे किया। क्योंकि अण्णा हजारे सांय सूर्यास्त के बाद अपना अनशन कभी नहीं तोड़ते। 27 अगस्त को जब संसद का सांझी अपील की थी तब तक सूर्यास्त हो गया था, इसी कारण अण्णा ने अपना आमरण अनशन 28 अगस्त 2011 को प्रातः 10.30 बजे खचाखच भरे विशाल जनसमुद्र की जयजयकार के बीच तोडा। अण्णा के इस आंदोलन के अंतिम दिनों में अण्णा के इस आंदोलन के प्रमुख सेना नायकों में अग्रणी रहे स्वामी अग्निवेश की अनुपस्थिति निरंतर आंदोलन पर बारीकी नजर रखने वालों को खल रही थी ।
इस ऐतिहासिक अवसर पर मैं पूर्व दिनों की तरह इस आंदोलन में भागेदारी निभाने के लिए रामलीला मैदान में मेडिकल कैम्प के समीप मस्जिद के समीप सुबह पौने दस बजे से ही ग्यारह बजे समापन समारोह में सहभागी रहा। हालांकि 30 अगस्त तक जनलोकपाल बनाओं या जाओ’ की हुंकार संसद के इस प्रस्ताव की गूंज के नीचे न जाने कहां दब कर रह गयी। परन्तु देश का आम अवाम भी अण्णा हजारे का आमरण अनशन तुडवा कर अण्णा हजारे के नेतृत्व में देश में व्यवस्था परिवर्तन के संघर्ष के सपने को पूरा करना चाहता है। देश के अधिकांश बच्चे, बुढ़े, जवान व स्त्री पुरूष सभी घरों में बंद लोगों को देश को बचाने वाले अपने आंदोलन में न केवल सम्मलित कराने में सफलता हासिल की अपितु सभी धर्मो व जातिपाति का भेदभाव भुला कर पूरे देश को अण्णा मय ही बना दिया। देश विदेश में 25000 से अधिक स्थानों में हुए जनांदोलन ने कुम्भकर्ण बने जनप्रतिनिधियों को ही नहीं अपितु जनता को भी लोकशाही का ऐसा सबक सिखाया कि पूरा देश ही अण्णामय हो गया। भले ही अण्णा हजारे इस जीत को आधी जीत बता रहे हैं परन्तु उन्होने अपने ऐतिहासिक संघर्ष से पूरे विश्व में लोकशाही की जो अहिंसक पताका फेहरायी उससे हिंसा से ग्रसित विश्व को अमन शांति का एक नई राह मिली है।
27 अगस्त को दिन भर इस आंदोलन में अपने मजदूरों व नदिनपा के कर्मचारियों के हितों के लिए कई सालों से निरंतर संघर्ष कर रहे कर्मचारी नेता हरिओम तिवारी के साथ सम्मलित होने के बाद में जब में घर पंहुचा तो टीबी पर मेने इस विश्व विख्यात आंदोलन का ऐतिहासिक सफलता को देख कर महानायक अण्णा हजारे व उन तमाम देशवासियों ने जो इस आंदोलन में सम्मलित रहे व जिन्होने इसको समर्थन दिया उनको शत शत नमन् करता हॅू। इस आंदोलन में मैं अपने भाषा आंदोलन के अग्रणी पुरोधा राजकरण सिंह व समाजसेवी साथी मोहन सिंह रावत के साथ हर रोज भागेदारी निभाता ही रहा।
भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने के लिए जनलोकपाल कानून बनाने के लिए 16 अगस्त 2011 से आमरण अनशन कर रहे गांधी के बाद अहिंसा के रास्ते में विश्वलोकशाही के जननायक बन कर उभरे अन्ना हजारे के पावन आंदोलन का जहां एक तरह मनमोहनसिंह की सरकार सहित तमाम राजनैतिक दलों ने इसे तत्काल संसद के इसी सत्र में पारित करने के बजाय केवल बिना समय अवधि निर्धारित किये हुए ऐसा कानून बनाने का संकल्प लेने का केवल प्रस्ताव ही पारित किया। वह भी अण्णा हजारे के भ्रष्टाचार के खिलाफ विश्वव्यापी जनांदोलन की पावनता का सम्मान करते हुए अण्णा हजारे के सम्मुख प्रधानमंत्री ने अपने पाक साफ छवि के किसी मंत्री भेजने के बजाय भ्रष्टाचार के आरोपों में घिरे देशमुख को भेजा जो एक प्रकार से अण्णा के आंदोलन का अपमान ही माना जायेगा। भले की इस विन्दू पर न अण्णा व नहीं उनकी टीम के किसी सदस्य ने प्रश्न न उठा कर कई सवाल खडे कर दिये हैं।
इससे बड़ा इस आंदोलन का दूसरा क्या हो सकता है कि देशमुख जैसे राजनेता जो भ्रष्टाचारों के आरोपों में घिरे है की मध्यस्थता करने से हुआ। जिस पावन मंच पर अण्णा हजारे राजनेताओं से दूर रखते (अण्णा के जनलोकपाल कानून बनाने के मांग के लिए जंतर मंतर पर चले आमरण अनशन में सम्मलित होने को पधारी उमा भारती जैसे राष्ट्रवादी नेत्री व हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री चोटाला को जिस प्रकार से अपमानित सा करके अण्णा के स्वयं सेवकों ने अनशन स्थल से बाहर जाने के लिए विवश किया। वहीं इस बार के आमरण अनशन के दौरान भाजपा के सांसद वरूण गांधी को भी अण्णा के मंच में नहीं मंच के नीचे लोगों के बीच में बैठना पड़ा।) उस पावन मंच पर देशमुख जैसे भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरे नेता व कांग्रेसी सांसद संदीप दीक्षित ससम्मान मंचासीन होते देख कर भ्रष्टाचार के खिलाफ सतत संघर्ष करने वाले मेरे जैसे असंख्य लोगों का सर शर्म से झुक गया। इस आंदोलन में देश में भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने के लिए जहां प्रधानमंत्री से न्यायपालिका को भी इसके दायरे में रखने के लिए सारा जोर लगाया जा रहा है परन्तु सबसे हस्तप्रद करने वाली बात यह है कि देश व समाज को भ्रष्टाचार से रसातल में धकेलने के लिए कुख्यात हो चुके अधिकांश गैरसरकारी स्वयं सेवी संगठनों(एनजीओ) को इसके दायरे से बाहर रखा गया। इसका एक ही कारण है कि कांग्रेस व भाजपा का शीर्ष नेतृत्व सहित अधिकांश राजनेताओं, नौकरशाहों, समाजसेवियों, पत्रकारों, कलाकारों व प्रबुद्व जनों आदि के देश से ही नहीं विदेशों से लाखों नहीं करोड़ों करोड़ का वारे न्यारे हर साल किये जा रहे हैं भारतीय व्यवस्था को भ्रष्टाचार के गर्त में धकेलने वालों की तरफ आंख उठा कर देखने वाला आज भारत में कोई नहीं है। अण्णा हजारे के आमरण अनशन को संसद या सरकार के आश्वासन के तहत समाप्त कराने के लिए सरकार तमाम तंत्र झोंक रही है। वहीं जबरन पुलिस से उठाने का भी तानाबाना भी पूरा कर दिया गया। अपने आमरण अनशन से पूरे देश को जागृत करने का ऐतिहासिक कार्य करने वाले महानायक बन कर उभरे अण्णा हजारे ने अपने दृढ़ निश्चय व साफ छवि से जहां देश के पूरे राजनेताओं को बेनकाब करने मे ं सफल रहे वहीं उन्होने देश में लोकशाही पर ग्रहण लगा रहे भ्रष्टाचार पर पूरे देश को लामंबद कर दिया है। अण्णा हजारे का आमरण अनशन चाहे सरकार पुलिसिया तंत्र के हाथों करने की आत्मघाति धृष्ठता करता है तो यह कांग्रेस की जड़ों में मठ्ठा डालने वाला ही काम होगा। परन्तु जनता का जागृत करके अण्णा हजारे ने ऐतिहासिक कार्य किया, उनको पूरा देश उनको नमन् करता है। सरकार को यह भी समझ लेना चाहिए कि अण्णा हजारे का आमरण अनशन को तोड़ने के बाद भी अण्णा का आंदोलन दम तोड़ने वाला नहीं अपितु निरंतर तेज होगा। कांग्रेस को मनमोहन सिंह, अपने राजनैतिक आका रहे नरसिंह राव की तरह अपनी पदलोलुपता व अकर्मण्यता के कारण बहुत ही आत्मघाति होगा। 25 अगस्त 2011 को सांय सात बजे में अण्णा के आंदोलन स्थल से अपने साथी मोहन सिंह रंावत के साथ वापस आया तो मुझे यह लगा कि अण्णा के इस पावन आंदोलन पर देशमुख व एनजीओ भी मनमोहन सिंह के साथ ग्रहण लगा रहे हैं। इसके साथ पहले की तरफ फिर इस बार भी अण्णा के आमरण अनशन को अपने झूठे आश्वासन से तुडवाने का तानाबाना बुन चूकी थी। वहीं दूसरी तरफ पूरे अनशन स्थल पर पुलिसिया शिकंजे के यकायक बढ़ जाने से साफ लगता था कि सरकार अण्णा के अनशन को जबरन अस्पताल में ले जाकर तुडवाने के लिए तानाबाना बुन चूकी थी। लोग आशंकित थे कि सरकार क्या फिर बाबा रामदेव के आमरण अनशन को तुड़वाने की तरह पूरे संसार में थू थू तो कराने की हिमालयी भूल तो नहीं करेगी। इस आंदोलन में सरकार द्वारा पोषित व संरक्षित भ्रष्टाचार पर गहरा कटाक्ष करते हुए अण्णा ने साफ कहा कि अब देश में ‘माल खाये मदारी व नाच करे बंदर’ नहीं चलेगा। उन्होंने आमरण अनशन के बीच में सरकार पर विश्वासघात का कड़ा आरोप लगाया। उन्होंने पूरी संसद की उनके स्वास्थ्य के बारे मेें चिंता करने पर कटाक्ष करते हुए कहा भी था कि देश के सांसदों व नेताओं को उनकी नहीं उनके मुद्दों के बारे में चिंता करो, देश के बारे में चिंता करनी चाहिए। उन्होंने स्थिति को भांपते हुए पहले ही ऐलान कर दिया थी कि वे सरकारी आश्वासन के बाद अनशन भले ही समाप्त कर देंगे परन्तु रामलीला मैदान से तब तक नहीं हटेंगे जब तक यह विधेयक पारित नहीं हो जाता है। अण्णा हजारे को पूरे विश्व में मिल रहे जनसमर्थन के बाबजूद भारतीय हुक्मरानों की कुम्भकर्णी नींद का ना खुलना अपने आप में एक बड़ा प्रश्न है। आखिर इन जनविरोधी नेताओं को देश हित की सोच कब आयेगी। शेष श्री कृष्ण कृपा। हरि ओम तत्सत्। श्रीकृष्णाय् नमो।

Thursday, August 25, 2011

अण्णा के इस पावन जनांदोलन पर ग्रहण लगा रहे मनमोहन, देशमुख व एनजीओ प्रकरण

अण्णा के इस पावन जनांदोलन पर ग्रहण लगा रहे मनमोहन, देशमुख व एनजीओ प्रकरण /
फिर झूठे आश्वास से अण्णा के अनशन समाप्त कराने का सरकारी षडयंत्र/


भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने के लिए जनलोकपाल कानून बनाने के लिए 16 अगस्त 2011 से आमरण अनशन कर रहे गांधी के बाद अहिंसा के रास्ते में विश्वलोकशाही के जननायक बन कर उभरे अन्ना हजारे के पावन आंदोलन का जहां एक तरह मनमोहनसिंह की सरकार सहित तमाम राजनैतिक दलों ने इसे तत्काल संसद के इसी सत्र में न रखने की सहमति दे कर की, वहीं इस आंदोलन का इससे भी बड़ा अपमान देशमुख जैसे राजनेता जो भ्रष्टाचारों के आरोपों में घिरे है की मध्यस्थता करने से हुआ। इस आंदोलन में देश में भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने के लिए जहां प्रधानमंत्री से न्यायपालिका को भी इसके दायरे में रखने के लिए सारा जोर लगाया जा रहा है परन्तु सबसे हस्तप्रद करने वाली बात यह है कि देश व समाज को भ्रष्टाचार से रसातल में धकेलने के लिए कुख्यात हो चुके अधिकांश गैरसरकारी स्वयं सेवी संगठनों(एनजीओ) को इसके दायरे से बाहर रखा गया। इसका एक ही कारण है कि कांग्रेस व भाजपा का शीर्ष नेतृत्व सहित अधिकांश राजनेताओं, नौकरशाहों, समाजसेवियों, पत्रकारों, कलाकारों व प्रबुद्व जनों आदि के देश से ही नहीं विदेशों से लाखों नहीं करोड़ों करोड़ का वारे न्यारे हर साल किये जा रहे हैं भारतीय व्यवस्था को भ्रष्टाचार के गर्त में धकेलने वालों की तरफ आंख उठा कर देखने वाला आज भारत में कोई नहीं है। अण्णा हजारे के आमरण अनशन को संसद या सरकार के आश्वासन के तहत समाप्त कराने के लिए सरकार तमाम तंत्र झोंक रही है। वहीं जबरन पुलिस से उठाने का भी तानाबाना भी पूरा कर दिया गया। अपने आमरण अनशन से पूरे देश को जागृत करने का ऐतिहासिक कार्य करने वाले महानायक बन कर उभरे अण्णा हजारे ने अपने दृढ़ निश्चय व साफ छवि से जहां देश के पूरे राजनेताओं को बेनकाब करने मे ं सफल रहे वहीं उन्होने देश में लोकशाही पर ग्रहण लगा रहे भ्रष्टाचार पर पूरे देश को लामंबद कर दिया है। अण्णा हजारे का आमरण अनशन चाहे सरकार पुलिसिया तंत्र के हाथों करने की आत्मघाति धृष्ठता करता है तो यह कांग्रेस की जड़ों में मठ्ठा डालने वाला ही काम होगा। परन्तु जनता का जागृत करके अण्णा हजारे ने ऐतिहासिक कार्य किया, उनको पूरा देश उनको नमन् करता है। सरकार को यह भी समझ लेना चाहिए कि अण्णा हजारे का आमरण अनशन को तोड़ने के बाद भी अण्णा का आंदोलन दम तोड़ने वाला नहीं अपितु निरंतर तेज होगा। कांग्रेस को मनमोहन सिंह, अपने राजनैतिक आका रहे नरसिंह राव की तरह अपनी पदलोलुपता व अकर्मण्यता के कारण बहुत ही आत्मघाति होगा। आज 25 अगस्त 2011 को सांय सात बजे में अण्णा के आंदोलन स्थल से अपने साथी मोहन सिंह रंावत के साथ वापस आया तो मुझे यह लगा कि अण्णा के इस पावन आंदोलन पर देशमुख व एनजीओ भी मनमोहन सिंह के साथ ग्रहण लगा रहे हैं। इसके साथ पहले की तरफ फिर इस बार भी अण्णा के आमरण अनशन को अपने झूठे आश्वासन से तुडवाने का तानाबाना बुन चूकी है। वहीं दूसरी तरफ पूरे अनशन स्थल पर पुलिसिया शिकंजे के यकायक बढ़ जाने से साफ लगता है कि सरकार अब अण्णा के अनशन को जबरन अस्पताल में ले जाकर तुडवाने के लिए तानाबाना बुन चूकी है। देखना है कि सरकार क्या फिर बाबा रामदेव के आमरण अनशन को तुड़वाने की तरह पूरे संसार में थू थू कराती है। अण्णा ने साफ कहा कि अब माल खाये मदारी व नाच करे बंदर। उन्होंने सरकार के विश्वासघात की आशंका भी प्रकट क र रही है। उन्होंने पूरी संसद की उनके स्वास्थ्य के बारे मेें चिंता करने पर कटाक्ष करते हुए कहा कि उनकी नहीं उनके मुद्दों के बारे में चिंता करो, देश के बारे में चिंता करो। उन्होंने कहा वे सरकारी आश्वासन के बाद अनशन भले ही समाप्त कर दें परन्तु रामलीला मैदान से तब तक नहीं हटेंगे जब तक यह विधेयक पारित नहीं हो जाता है। अण्णा हजारे को पूरे विश्व में मिल रहे जनसमर्थन के बाबजूद भारतीय हुक्मरानों की कुम्भकर्णी नींद का ना खुलंना अपने आप में एक बड़ा प्रश्न है। आखिर इन जनविरोधी नेताओं को देश हित की सोच कब आयेगी।

Wednesday, August 24, 2011

Flower of god bless 25 August 2011

Flower of god bless 25 August 2011

God is not only us but all universe too, so when we be selfish to hurt or hunt some one innocent being that time god is teach us great lesson to stop us to fall into hell.


Life is also same like mountain, so beautiful those who has wish and will to do right way and so hard like mountain those who has narrow wit and selfish wish


God bless to all love, sweet supreme gift of universe. lucky being respect its heartly and unfortunate being destroy its with own life too


Memories. only like dream, smile, see how much we got and how we lost, now where all. after some time all is dead in lap of time.


God already provide us peace, power ,wit and unvalueble body all are in our lap and heart , its depend upon us how we use and respect its.

Tuesday, August 23, 2011

27 अगस्त 2011 को श्रीनगर में भ्रष्टाचार का कलंक मिटांओ रेली



देवभूमि उत्तराखण्ड बचाओं, भ्रष्टाचार का कलंक मिटांओ रेली /
27 अगस्त 2011 को श्रीनगर उत्तराखण्ड व 2 सितम्बर 2011 को हल्द्वानी में/
प्यारा उत्तराखण्ड की विशेष रिपोर्ट-/

आकंठ भ्रष्टाचार से त्रस्त देवभूमि उत्तराखण्ड को मुक्ति दिलाने के लिए उत्तराखण्ड रक्षा मोर्चा का गठन करके इसकी कमान सर्वसम्मति से पूर्व सांसद ले.ं जनरल टीपीएस रावत को सौंपी गयी है। भष्ट्राचार मिटाओं का शंखनाद लोकगायक नरेन्द्रसिंह नेगी सहित तमाम उत्तराखण्ड के लिए समर्पित सपूत संयुक्त रूप से कर रहे है। इसकी पहली रैली 27 अगस्त 2011 को श्रीनगर उत्तराखण्ड में व दूसरी रैली 2 सितम्बर 2011 को हल्द्वानी में होगी। इससे पूरे प्रदेश की राजनीति में हडकंप मच गया है।
यह भी एक अदभूत संयोग है कि अपनी जान को दाव पर लगा कर देश के दूश्मनों को छक्का छुडाने वाले भारतीय सेना के जांबाज सैनिक सेवानिवृति के बाद देश को भ्रष्टाचार से तबाह कर रहे आंतरिक दुश्मनों से भी देश की रक्षा करने के लिए छेड़े गये जनांदोलन का नेतृत्व भी पूर्व सैनिक अण्णा हजारे कर रहे हैं वहीं पावन देवभूमि उत्तराखण्ड को सत्तासीन भाजपा की निशंक सरकार के भ्रष्टाचारों से त्राही-त्राही कर रही उत्तराखण्ड की जनता का नेतृत्व भाजपा के विद्रोही नेता व पूर्व सांसद सेवानिवृत ले. जनरल टीपीएस रावत कर रहे है। उनके नेतृत्व में गठित उत्तराखण्ड रक्षा मोर्चा में उत्तराखण्ड के शीर्ष लोक गायक नरेन्द्र सिंह नेगी एवं अनैक वरिष्ठ जनकवि, मोर्चा के संयोजक पूर्व आईएएस व उत्तराखण्ड विकास पार्टी के अध्यक्ष सुरेन्द्र सिंह पांगती व उत्तराखण्ड के वरिष्ठ पूर्व सैनिक मेजर जनरल शैलेन्द्र राज बहुगुणा सहित अनैक वरिष्ठ अधिकारी, समाजसेवी, राजनेता, छात्र नेता सम्मलित है।

भाजपा के गले का फांस बना नये जिलों का गठन

भाजपा के गले का फांस बना नये जिलों का गठन/
-कोटद्वार नहीं सलाण में हो जिला मुख्यालय/
-नये जनपदों के गठन के लिए सरक ार पर बढ़ा दवाब/

कोटद्वार/द्वाराहाट(प्याउ) । प्रदेष सरकार ने चुनावी वैतरणी में भाजपा की नैया पार लगाने के उदेष्य से जो चार जनपदों के गठन की घोशणा की थी वह सरकार के गले की फांस बन गयी है। प्रदेष में इस समय एक दर्जन से अधिक स्थानों पर नये जिले बनाने की मांग की जा रही है परन्तु सरकार ने केवल 4 जनपदों का गठन क र एक प्रकार पूरे प्रदेष के वंचित लोगों का आक्रोष भाजपा की तरफ मुड़ गया है । लोगों का आरोप है कि नये जनपदों का गठन करते समय सरकार ने न तो जिला गठन की मांगों का ईमानदारी से निर्णय लिया व नहीं दूरदर्षिता ही दिखायी। पुरानी मांगों दर किनारे किया गया उससे सरकार की स्थिति बहुत ही दयनीय हो गयी है। मुख्यमंत्री के गृह जनपद पौड़ी में कोटद्वार जनपद जिला बनाने पर लोग आक्रोषित है। लोगों का मानना है कि कोटद्वार जनपद बनाने से पर्वतीय क्षेत्र की जनता को कोई लाभ नहीं मिलेगा, वहीं जिला मुख्यालय व जिला का नाम कोटद्वार बनाये जाने पर कड़ी भत्र्सना करते हुए अग्रणी समाजसेवी महाबीर प्रसाद लखेड़ा व सूचना अधिकार कर्मी प्रधान भगतसिंह नेगी ने दो टूक षब्दों में कहा कि इस जिले का नाम कोटद्वार के बजाय सलाण होना चाहिए वहीं इसका मुख्यालय भी सलाण क्षेत्र में ही होना चाहिए। उन्होंने सुझाव दिया कि सलाण में द्वारीखेत बिकासखण्ड के देवीखेत स्थान पर जिला मुख्यालय बनाया जाना चाहिए। जिससे पर्वतीय क्षेत्र के लोगों के साथ न्याय होगा।
वहीं कोटद्वार जिला बनाने पर कड़ी प्रतिक्रिया प्रकट करते हुए धूमाकोट जिला बनाओं संयुक्त संघर्श समिति के संरक्षक महेषचंद्रा व कांग्रेस के वरिश्ठ नेता धीरेन्द्र प्रताप ने अन्याय के खिलाफ धूमाकोट जनपद बनाने की उपेक्षा करने पर गहरा क्षोभ प्रकट करते हुए जिला मुख्यालय को धूमाकोट में बनाने की पुरजोर मांग की। कांग्रेसी नेता धीरेन्द्र प्रताप ने इस पर प्रखर जनांदोलन छेडने की चेतावनी भी दी।
वहीं दूसरी तरफ द्वाराहाट जिले की मांग को लेकर चल रहा जिला बनाओ संयुक्त संघर्ष समिति ने 213 दिन पुराना आंदोलन को स्थगित करते हुए हाल में घोषित रानीखेत जिले का मुख्यालय द्वाराहाट में बनाए जाने की मांग उठाई गई। समिति ने सरकार को आगाह किया कि द्वाराहाट मे ं मुख्यालय नहीं बनाए जाने पर उग्र आंदोलन चलाने का ज्ञापन भी प्रदेष सरकार को प्रेशित किया।
इसी प्रकार रंवाई क्षेत्र की उपेक्षा कर यमुनोत्री को जिला बनाये जाने पर रंवाई में भी प्रचण्ड आंदोलन चल रहा है। रंवाई क्षेत्र की जिला बनाने में की गयी उपेक्षा से आहत रवांई की जनता सरकार को सबक सिखाने के पक्ष में लामबंद हो रही है। इसी के साथ काषीपुर, रूड़की, नरेन्द्र नगर व पिण्डर को जिला न बनाये जाने से यहां की जनता भाजपा को सबक सिखाने का मन बना चूकी है। जनता के मूड को देख कर चुनाव की चैखट में खड़ी भाजपा में हडकंप मचा हुआ है। प्रदेष भाजपा सरकार पर कुछ नये जनपदों के गठन का निरंतर दवाब बढ़ा रही है। सरकार इसी खतरे को कम करने के लिए कुछ नये जिला बनाने का कदम उठा सकती है।

shame to human race

Human is also a being who make all other being slave. human is so cruel who spoil freedom of all other being. , respect freedom of all beings to. www.rawatdevsingh.blogspot.com

-मनमोहन को अविलम्ब हटाकर व जनलोकपाल को स्वीकार कर प्रधानमंत्री बने राहुल

-मनमोहन को अविलम्ब हटाकर व जनलोकपाल को स्वीकार कर प्रधानमंत्री बने राहुल


देश को भ्रष्टाचार से मुक्त करने के लिए जन लोकपाल कानून बनाने की मांग को लेकर 16 अगस्त 2011 से दिल्ली के जय प्रकाश पार्क में आमरण अनशन करने का निकले देश के शीर्ष गांधीवादी नेता अण्णा हजारे व उनके हजारों समर्थकों को अलोकतांत्रिक ढंग से जेल में बंद करके लोकशाही का गला घोंटने को तुली मनमोहनी सरकार ने देश व्यापी जनाक्रोश के आगे घुटने टेकते हुए तिहाड में बंद अण्णा हजारे व साथियों को रात को तिहाड़ जेल से रिहा करने का ऐलान करने को मजबूर होना पड़ा। सरकारी दमन की हवा निकालते हुए अण्णा हजारे ने लोकषाही की ताकत दिखाते हुए कहा कि वे जेल से रिहा होने के बाबजूद बाहर तब आयेंगे जब उनको बिना षर्त अनषन की इजाजत दी जाय। जेल से अपनी मर्जी से सरकार द्वारा मजबूरी में दिया गया रामलीला मैदान में जब अण्णा हजारे आमरण अनषन की आगे की पारी खेलने के लिए आये तो देष की जनता को अपना सेवक समझने वाले राजनेताओं के पैरों के तले जमीन ही खिसक गयी ।
लोकशाही की इस जीत से गदगद अण्णा हजारे ने जेल से रिहा होने के बाद जब जय प्रकाष पार्क में ही जाने की हुंकार भरी तो मनमोहन सिंह सरकार के हाथ पांव ही फूलं गये। अपनी इस षर्मनाक पराजय को भांपते हुए देष व कांग्रेस को रसातल में धकेलने वाला साबित हो चूके मनमोहन सिंह की यूपीए सरकार ने अण्णा हजारे को जय प्रकाश पार्क के बजाय किसी प्रकार से रामलीला मैदान में आमरण अ नषन करने की इजाजत देने में अपनी इज्जत बचायी । अण्णा के आमरण अनषन ने अपनी सत्तामद में लोकषाही को रौंदने को उतारू मनमोहनी सरकार व उसके आत्मघाति सिपाहेसलारों ने अण्णा हजारे को भी बाबा रामदेव की तरह दिल्ली से बाहर भी भेजने की रणनीति पर भी विचार करने की जरूरत भी कर दी वह तो कांग्रेसी महासचिव राहुल गांधी ने न केवल अण्णा जेसे देष के बेदाग समर्पित गांधीवादी नेता पर । परन्तु सरकार को यह समझने की भूल कर रही हे कि अण्णा कोई बाबा रामदेव नहीं जो सरकारी दमन के आगे चुपचाप सर झुका देंगे। सरकार उनको जितना भी दमन करेगी वे उतने मजबूत हो कर सरकार के सामने कड़ी चुनौती खडी कर सकते हैं। इस चुनौती को निपटने में सरकार पूरी तरह असफल हो सकती है। मेरा यही आंकलन तब सही साबित हुआ जब अण्णा ने बिना षर्त रिहा होने से मना करके तिहाड जेल परिसर में ही अपना अनषन जारी रखा है। अण्णा बिना षर्त रिहा हो कर जे पी पार्क में आमरण अनषन करके प्रधानमंत्री सहित न्याय पालिका को भी जनलोकपाल के दायरे में लाना चाहती है। सरकार जितना बिलम्ब करेगी उतनी ही उसको भारी पडेगा। गौरतलब अण्णा के जेल में बंद करने की कांग्रेस सरकार की सरकारी दमनकारी कार्यवाही को देश की आम नजता ंही नहीं पूरे विश्व जनमत भौचंक्के हो कर देख रहा है। चैतरफे आक्रोश को देखते हुए कांग्रेस के आत्मघाति नीतिनिर्धारकों ने अण्णा को रिहा करने का मन बना लिया। सरकार की इस आत्मघाति कार्यवाहीं ने जहां कांग्रेस की जड़ों में मठ्ठा डालने का काम किया वहीं सरकार को पूरी तरह से जनता की नजरों में खलनायक ही बना दिया। अण्णा की गिरफतारी के विरोध में न तो संसद चल सका व नहीं देश का कोई अन्य संस्थान चारों तरफ कांग्रेसी सरकार की इस दमनात्मक कार्यवाही का कड़ी भत्र्सना। इस अवसर को भुनाते हुए भाजपा ने जहां देश व्यापी आंदोलन छेडने का मन बना लिया वहीं संघ भी इस आंदोलन में पूरी तरह से कूूद गया है। अण्णा के इस आंदोलन में सम्मलित होने के लिए में पूरी तरह से तत्पर रहा। परन्तु सुबह से समाचार पत्र प्रकाशित करने के कारण में इसमें सम्मलित चाह कर भी नहीं हो सका परन्तु उसके बाद निरंतर मैं अण्णा के रामलीला मैदान व अन्य आंदोलनों मे ंसम्मलित हो रहा हॅू। चाहे जंतर मंतर पर सरकारी दमन के खिलाफ मशाल जलूश में सम्मलित हो या इंडिया गेट पर आन्दोलनकारियोंका सम्मलित होने में अ पनी सहभागीता निभाने मे गर्व समझता हॅू ।
जिस प्रकार से तिहाड जेल से लेकर छत्रसाल स्टेडियम से लेकर पूरे देश में लोग जनाक्रोश में उमड़ रहे थे, उसे देख कर शायद राहुल गांधी ने जनता की नब्ज को समझते हुए प्रधानमंत्री को सलाह देकर अविलम्ब अण्णा को रिहा करने का निर्णय लिया। जो कांग्रेस की डूबते हुए जहाड को तिनके के सहारे के सम्मान होगा। राहुल गांधी को चाहिए कि वह देश की पूरी व्यवस्था को रसातल में धकलेने वाले प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को अविलम्ब हटा कर प्रधानमंत्री के पद पर आसीन हो कर जनभावनाओं का सम्मान करें तथा देश को इस भंवर से बचाने में अपने दायित्व का निर्वहन करें। राहुल गांधी को अण्णा की मांग को अविलम्ब स्वीकार कर देष को होनी वाली आरजकता से बचाना चाहिए व भ्रटाचार दूर करने के लिए अण्णा की मांग के तहत प्रधानमंत्री व न्यायपालिका को भी लोकपाल के दायरे लाने का आष्वासन देकर तथा मनमोहन को अविलम्ब प्रधानमंत्री के पद से हटा कर स्वयं प्रधानमंत्री बन देष की रक्षा करनी चाहिए। षेश श्री कृश्ण कृपा। ह िर ओम तत्सत्।

अण्णा को नोबल पुरस्कार देकर अपनी भूल सुधारेगी नोबल समिति?

अण्णा को नोबल पुरस्कार देकर अपनी भूल सुधारेगी नोबल समिति?/
-विश्व में अनोखा अहिंसक जनांदोलन करके दी नयी सीख/
-गांधी के बाद देश की जनता को जागृत करने का किया ऐतिहासिक कार्य /


हिंसा से ग्रस्त विश्व जनसमुदाय को अहिंसक आंदोलन करके अचंभित करने वाले भारत के अग्रणी समाजसेवी अण्णा हजारे ने विश्व मानवता को जो शांति व लोकशाही की जो किरण दिखायी, उसकी महता को देखते हुए विश्व शांति के लिए सर्वोच्च सम्मान देने वाली नोबल समिति केपास अण्णा हजारे को नोबल पुरस्कार देने के अलावा और कोई रास्ता नहीं रह गया है। अण्णा हजारे को शांति का नोबेल पुरस्कार दे कर नोबेल समिति अपनी उस शर्मनाक भूल को सुधार सकती है जो उन्होंने गत सदी के सबसे बड़े अहिंसक जनांदोलनों के महानायक महात्मागांधी को अपनी संकीर्ण मानसिकता के कारण नोबेल पुरस्कार न देकर अपनी समिति को खुद ही कटघरे में खडा कर दिया है। महात्मा गांधी के इस आंदोलन की अमिट छाप पूरे विश्व में जिस प्रकार से अमेरिका के महानायक मार्टिन लूथर किंग से लेकर ओबामा तक साफ दिखाई देता हैं वहीं अफ्रिका के जनांदोलनों के महानायक नेलशन मंडेला तक साफ दृष्टिगोचर होता है। विश्व प्रसिद्व वैज्ञानिक आईस्टिन ने गांधी की महता को देख कर जो शब्द कहे थे कि आनी वाली पीढ़ी को यह विश्वास भी नहीं होगा कि ऐसा अदभूत चमात्कारिक जननायक हमारी धरती पर कभी हुआ होगा जिसके आगे कभी सूर्यास्त न होने का दंभ भरने वाले फिरंगी सल्तनक की चूलें हिला दी। जिसने शताब्दियों से गुलामी की जंजीरों में पशुवत बने भारतीय जनमानस को फिरंगी तोप व बंदुकों के दमन के आगे फोलादी सीना तान कर विरोध करने की अदभूत शक्ति दी। आज महात्मा गांधी के सपनों के भारत को जमीदोज करने में आजादी के बाद की सरकारों ने जो लोकशाही का गला घोंटने का दुशाहस किया तो भारत में फिर भगवान श्री कृष्ण की अन्यास के खिलाफ सदा संघर्ष करने की अमर शंखनाद ने महाराष्ट के गांव के समाजसेवी अण्णा हजारे को विश्व लोकशाही का नया गांधी बना कर स्थापित कर दिया।
अण्णा के इस अदभूत जनांदोलन ने जहां जनांदोलनों को रौंदने पर उतारू भारत की मनमोहन सरकार का अहंकार जमीदोज कर दिया है वहीं देश की लोकशाही के लम्बरदार बने राजनैतिक दलों को लोकशाही का भी ऐसा पाठ पढ़ा दिया कि उनको अब देश की जनता ही देश की सच्ची भाग्य विधाता व खुद को जनता का सेवक लगने लग गया है। आमरण अनशन के आठवें दिन भी जनलोकपाल विधेयक को लेकर रामलीला मैदान में आमरण अनशन कर रहे देश क े विख्यात अग्रणी विश्व प्रसिद्व गांधीवादी अण्णा हजारे क े समर्थकों के देश विदेश में उमड़े जनशैलाव ने भारत की अब तक की सबसे जनहितों को रोंदने वाली मनमोहन सिंह की सरकार की नींद उडा दी है। पूरा विश्व अचम्भित है। अचम्भित होना भी सहज है जिस प्रकार से अमेरिका से लेकर अफगानिस्तान, इराक,रूस, चीन , पाक, सहित पूरा संसार आतंक से छलनी होने के भय से भयभीत है उसे देखते हुए अण्णा हजारे का अहिंसक आंदोलन विश्व को नयी दिशा देने का ऐतिहासिक योगदान दे रहे है। भले ही भारत की सरकार इसकों स्वीकार करे या न करें परन्तु अण्णा हजारे गांधी के बाद देश के आम अवाम को न केवल झकझोरने में सफल रहे अपितु वे देश की जनता को अपने हक हकूकों के बारे में जागृत कर दिया है। अ ब सरकार का भविष्य सांसदों के हाथों में नहीं अपितु देश की आम जनता के हाथों में सुरक्षित हो गया है। जनता देश हित में कार्य करने के लिए सरकारों को विवश कर सकती है। देश के जनप्रतिनिधियों को जो अब तक जनता के मतों का हरण करने के बाद केवल देश की निधि की बंदर बांट करने को अपना जन्मसिद्व अधिकार समझ रहे थे उनको उनकी सही जगह दिखाने का काम भी अण्णा हजारे ने किया। उसके लिए प्यारा उत्तराखण्ड समाचार पत्र की तरफ से अण्णा हजारे व उनके पूरी टीम सहित देश की जनता को मेरा शतः शतः प्रणाम।

Sunday, August 21, 2011

एनजीओं को लोकपाल के दायरे में क्यों छूट दी जा रही है?

एनजीओं को लोकपाल के दायरे में क्यों छूट दी जा रही है?
जब देष में प्रधानमंत्री से न्यायालय तक जनलोकपाल के दायरे लाने की मांग की जा रही है तो देष विदेष से अरबों रूपये बट ोरने वाले एनजीओं को लोकपाल के दायरे में क्यों छूट दी जा रही है?

देष का नहीं चंद षहरों का हुआ विकासः न्यायमूर्ति संतोश हेगड़े

देष का नहीं चंद षहरों का हुआ विकासः न्यायमूर्ति संतोश हेगड़े
सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व न्यायमूर्ति व कर्नाटक में भ्रश्ट्राचारी भाजपा सरकार के मुख्यमंत्री यदुरिप्पा को हटने के लिए मजबूर करने वाले, अण्णा हजारे के नागरिक समिति के प्रमुख सदस्य संतोश हेगडे ने आज 21अगस्त 2011 को देष को भ्रश्ट्राचार से मुक्तिदाता के रूप में जनता की आंखों के तारे बने ‘दिल्ली के रामलीला मैदान में सरकार से अविलम्ब जनलोकपाल विधेयक पारित करने की मांग को लेकर 16 अगस्त 2011 से आमरण अनषन कर रहे अण्णा हजारे के समर्थन में रामलीला मैदान में पधारे। पूर्व न्यायमूर्ति संतोश हेगड़े ने अण्णा हजारे के ऐतिहासिक जनांदोलन में अपना समर्थन देते हुए अपने संबोधन में दो टूक षब्दों में कहा कि आज ंदेष में विकास का जो डंका सरकारें बजा रही है वह मात्र चंद षहरों तक सीमित है। देष के अधिकांष ग्रामीण इलाके आज भी मूलभूत संसाधनों व सुविधाओं से वंचित है। उन्होने दो टूक षब्दों में कहा कि सरकार क्यों हटधर्मिता कर रही है। क्यों जनभावनाओं को रौंद रही है । भ्रश्टाचार ने देष के अवाम का जीना ही दूष्वार कर रखा है। इसी लिए आज देष में भ्रश्टाचार के खिलाफ कड़े कानून की आवष्यकता है। आज इसी भ्रश्टाचार से देष को मुक्ति देने के लिए जनलोकपाल विधेयक बनाने की सरकार से मांग कर रहे है। देष की जनता इसी से आक्रोषित है कि अण्णा हजारे के इस राश्ट्र को बचाने वाली मांग को अविलम्ब लागू करने के बजाय सरकार इसकी मांग करने वाले अण्णा हजारे को अपमानित व सरकारी आतंक से धमका भी रही है।
आज मैं जब अण्णा के आंदोलन में सहभागिता करने के लिए दिल्ली एनसीआर के सैकड़ों रेडियों टेक्सी के साथ जंतर मंतर पंहुचा तो उस समय वहां पर पूर्व न्यायमूर्ति संतोश हेगड़े रेली को संबोधित करने वाले थे। जिस एनसीआर टेक्सी में बैठ कर में रामलीला मैंदान में पंहुचा उस टेक्सी का चालक व मालिक जी एस बिश्ट भी उत्तराखण्ड के पौड़ी जनपद मूल के मयुर बिहार फेज -1 में ही निवास करता था। इनके अलावा छुट्टी के रोज यहां पर लाखों लोग जिस तरह से चारों तरफ से उमड़े उसे देष के हुक्मरानों सहित सभी दलों की सांसें थम सी गयी हैं । वहीं पूरा विष्व इसे भारतीय लोकषाही की अग्नि परीक्षा के रूप में अचम्भित हो कर देख रहा है।

Saturday, August 20, 2011

देवभूमि उत्तराखण्ड को भ्रश्टाचार से मुक्ति दिलाने की कमान संभाल रहे हैं जनरल रावत

भ्रश्टाचारियों से देष की रक्षा की जंग का नेतृत्व भी कर रहे है पूर्व सैनिक अण्णा/
देवभूमि उत्तराखण्ड को भ्रश्टाचार से मुक्ति दिलाने की कमान संभाल रहे हैं जनरल रावत/


यह भी एक अदभूत संयोग है कि अपनी जान को दाव पर लगा कर देष के दूष्मनों को छक्का छुडाने वाले भारतीय सेना के जांबाज सैनिक सेवानिवृति के बाद देष को भ्रश्टाचार से तबाह कर रहे आंतरिक दुष्मनों से भी देष की रक्षा करने के लिए छेड़े गये जनांदोलन का नेतृत्व भी कर रहे है। जहां देष का नेतृत्व पूर्व सैनिक अण्णा हजारे कर रहे हैं वहीं भारतीय संस्कृति की उदगम स्थली उत्तराखण्ड को भ्रश्टाचार से मुक्त करने के लिए पूर्व ले. जनरल टीपीएस रावत ने भाजपा नेतृत्व के तमाम राजनैतिक प्रलोभनों को ठुकराते हुए ‘उत्तराखण्ड रक्षा मोर्चा के बैनरतले प्रदेष में जनांदोलन का षंखनाद कर प्रदेष की राजनीति में स्थापित भाजपा व कांग्रेस में हडकंप मचा दिया है। भ्रश्टाचार के आरोपों से आकंठ घिरी प्रदेष की निषंक सरकार भले ही जनता का ध्यान बांटने के लिए देष में चल रहे अण्णा के जनलोकपाल आंदोलन को समर्थन देने का ऐलान कर रहे हो ं परन्तु भाजपा के पूर्व सांसद जनरल तेजपाल सिंह रावत ने अपनी ही सरकार के भ्रश्टाचारों से इतने व्यथित हुए कि उन्होंने ंदो टूक षब्दों में कहा कि प्रदेष की जनता व सेना ने मुझे इतना ज्यादा सम् मान दिया है, अब ऐसे समय जब प्रदेष के हुक्मरान षासन के नाम पर प्रदेष की जल, जंगल व जमीन को कोडियों केे भाव धनपषुओं को बेच रहे हैं तथा प्रदेष को भ्रश्टाचार के गर्त में धकेलने की धृश्ठता की जा रही है तो वे एक सैनिक होने के नाते अपनी मातृ भूमि की तबाही मूक हो कर नहीं देख सकते। उन्होंने कहा आज भाजपा व कांग्रेस सहित तमाम राजनैतिक दलों में जनहितों के लिए समर्पि त नेताओं के बजाय सत्तालोलुपता के लिए प्रदेष के हितों को दाव पर लगाने वाले तत्वों की भरमार है। इसी कारण प्रदेष की जनता जिसने प्रदेष गठन के लिए अपनी कुर्वानी दी थी वह इन नेताओं की खुली लुट खसोट देख कर ठगी सी महसूस कर रही है। उन्होंने कहा कि उन्होंने राजनीति में रहते हुए भी कभी अपने वसूलों से समझोता नही ं किया। कांग्रेस से भी उन्होंने त्यागपत्र इसी कारण दिया था कि संवैधानिक पदों पर कभी जनता की नजरों से उतर चूके हुए लोगों को आसीन नहीं करना चाहिए। उन्होंने तब भी कांग्रेस को छोड़ते समय कांग्रेस आलाकमान से अपनी इस दो टूक राय से अवगत करा दिया था। आज जब प्रदेष की दुर्दषा देख कर उनकी आत्मा उनको मूक नहीं रहने दे रही है। प्रदेष की भ्रश्ट सरकार से जनरल तेजपाल सिंह रावत काफी व्यथित है। अपनी पीड़ा से मर्मा हित हो कर उन्होने अपने दायित्व का निर्वाह करते हुए प्रदेष को भ्रश्टाचार के रसातल में धकेल रही निषंक सरकार को सीधे कटघरे में ख्ंाड़ा कर िदया है। भ्रश्टाचार के खिलाफ 14 अगस्त 2011 को देहरादून के अपने सम्मेंलन में उनको पूर्व सैनिकों व आम जनता का मिला अपार समर्थन से उनके हौसले काफी बढ़े हुए है। उनके समर्पण व लोकप्रियता को देखते हुए उत्तराखण्ड जनविकास पार्टी के प्रमुख पूर्व आईएएस सुरेन्द्रसिंह पांगती ंने जनरल रावत के नेतृत्व को सहज ही स्वीकार कर प्रदेष की रक्षा के लिए कमर कस ली है। यही नहीं प्रदेष के जनप्रिय लोक गायक नरेन्द्रसिंह ंनेगी ने जिनके गीत प्रदेष की जनजन की सांसों में बसे हुए है, ने खुल कर तेजप ाल सिंह रावत के समर्थन में प्रदेष को भ्रश्टाचार से बचाने की कमर कस ली है।
अपने वसूलों व दृढ़ निर्णयों के लिए बहुत कम समय में प्रदेष की राजनीति में महत्वपूर्ण स्थान बनाने वाले जनरल रावत के नेतृत्व में जहां पूर्व सैनिकों ने अण्णा हजारे के जनलोकपाल का खुला समर्थन कर रहे हैं वही ंउत्तराखण्ड की भ्रश्टाचार से रक्षा के लिए वे जनरल रावत के नेतृत्व में जुट गये है। आगामी 27 अगस्त को श्रीनगर व सितम्बर के प्रथम सप्ताह में हल्द्वानि में आयो िजत सम्मेलनों से इस आंदोलन को निर्णायक गति देने में जनरल तेजपाल सिंह रावत व उनकी टीम जुटी हुई है। जिस प्रकार से अण्णा हजारे के साथ उनकी टीम के रूप में स्वामी अग्निवेष, मेधा पाटेकर, किरण वेदी, अरविन्द केजरीवाल, षांति भूशण, प्रषांत भूशण व मनीश सिसोदिया आदि प्रमुख है। वहीं जनरल टीपीएस के नव रत्नों में लोक गायक नरेन्द्रसिंह नेगी, सुरेन्द्रसिंह पांगती, मेजर जनरल षैलेन्द्र राज बहुगुणा, पी सी थपलियाल, ब्रिगेडियर एस एस पटवाल, भाजपा नेता राजेन्द्र भण्डारी व रघुवीर सिंह बिश्ट आदि प्रमुख है। अब देखना यह है कि उत्तराखण्ड की तमाम जनता ठीक उसी तरह से भ्रश्टाचार मिटाने के लिए जनरल रावत के नेतृत्व में उसी प्रकार जुटने की बुद्विमता दिखाती है कि जिस प्रकार से देष की जनता ने अण्णा हजारे के प्रति अपनी एकजुटता प्रदर्षित की। आज जरूरत है तमाम प्रकार के मतभेदों व किन्तु परन्तु व संकीर्ण अहं को छोड़ कर प्रदेष को भ्रश्टाचार के खिलाफ जन आवाहन करने के लिए दलगत राजनीति को दरकिनारा करने वाले जनरल तेजपाल सिंह रावत के आंदोलन को मजबूती प्रदान कर प्रदेष को भाजपा की भ्रश्ट सरकार के चुंगल से बचाने की । आज प्रदेष के पूर्व मुख्यमंत्री खंडूडी भी जनरल तेजपाल सिंह रावत की निषंक को मुख्यमंत्री न बनाने की दो टूक सलाह को न मानने के लिए पछता रहे हैं। परन्तु प्रदेष की जनता व पूर्व सैनिक यह देख कर हैरान है कि खंडूडी पूर्व सैनाधिकारी होने के बाबजूद क्यों प्रदेष सरकार के भ्रश्टाचार पर मूक हैं? निषंक को प्रदेष की सत्ता सोंपने की जनरल खंडूडी की भूल का दण्ड जहां वे खुद भोग रहे हैं वही ं पूरे प्रदेष को भी भोगना पड़ रहा है उसके बाबजूद खंडूडी जी प्रदेष की रक्षा के लिए जनरल रावत की तरह सीधे आगे आने का साहस तक नहीं जुटा पा रहे हैं। प्रदेष की जनता आज प्रदेष के हितों की रक्षा के लिए दलगत राजनीति से उपर उठ कर हुंकार भरने के ऐतिहासिक साहस को नमन ही नहीं अपितु अण्णा के आन्दोलन की तर्ज पर उनके आंदोलन का भी समर्थन करने का मन बना चूकी है। अगर इसमे ं जरा सी भी चूक हुई तो आने वाले समय में उत्तराखण्डियों के लिए पष्चाताप के लिए भी अवसर नही ं मिलेग ा। आज प्रदेष का षौभाग्य है कि प्रदेष मे ं ंतेजपाल सिंह रावत जैसे जनरल उत्तराखण्ड का नेत्त्व करने के लिए आगे आया है । उनके कद का एक अदना भी दलीय नेता प्रदेष की रक्षा के लिए दलगत राजनीति से उपर उठ कर आवाज उठाने का साहस तक नहीं जुटा पा रहा है ।

स्वामी विवेकानन्द की प्रेरणा ने बनाया आत्म हत्या को उतारू अण्णा हजारे को महानायक

जन लोकपाल तक ही नहीं अपितु देष में लोकराज स्थापित करके दम लेगें अण्णा /
स्वामी विवेकानन्द की प्रेरणा ने बनाया आत्म हत्या को उतारू अण्णा हजारे को महानायक/


भ्रश्टाचार की चुगल में दम तोड़ रहे भारत को बचाने के लिए जनलोकपाल कानून बनाने की मांग ंको लेकर 6 अगस्त 2011 से जारी अपने विष्व विख्यात आमरण अनषन के सौ घण्टे पूरे होने पर आज 20 अगस्त 2011 की दोपहर में ऐतिहासिक संबोधन में भारत के इस नये गांधी अण्णा हजारे ने दो टूक षब्दों में ऐलान किया कि वे अपना संघर्श केवल जनलोकपाल कानून बनाने तक ही सीमित नहीं रखेंगे, अपितु वे अपने इस संघर्श को देष में लोकराज स्थापित करके ही दम लेंगे। अपने वर्तमान अनषन के घण्टों का षतक बनाने के अवसर पर आत्मविष्वास से भरपूर अण्णा हजारे ने देष के हुक्मरानों को देष की आजादी के 64 साल बाद भी लोकराज से वंचित रखने की कड़ी भत्र्सना की है। उन्होने कहा कि देष को बाहरी दुष्मनों से अधिक देष के सत्ता के पहरेदारों से (राजनेताओं) अधिक खतरा है तथा देष के खजाने को चोरों से नहीं अपितु इसके रखवालों से ही खतरा हो गया है।
बोलीबुड के विख्यात कलाकार मनोज तिवारी द्वारा इस अवसर पर गाये गये विषेश गीत ‘मैं अण्णा बोल रहा हॅू. ..’ने जहां रामलीला मैदान में उपस्थित हजारों लोगों को झूमने के लिए विवष कर दिया वहीं इस गीत व नौजवानों के जज्बे से अभिभूत हो कर अण्णा ने कहा कि वे देष के गरीब किसान, मजदूर व आम जनता का षोशण किसी हाल में नहीं होंने देंगे। अपने अनषन का षतक पूरा होने के अवसर पर अण्णा ने नौजवानों के जज्बें को विषेश रूप से सलाम करते हुए कहा कि जब वे 26 साल के थे तब वे देष में व्यापत भ्रश्टाचार से इतने व्यथित थे कि उनको आत्महत्या करने का मन करने लगता , परन्तु स्वामी विवेकानन्द के विचारों ने उनके जीवन में आमूल परिवर्तन ला दिया, उन्होंने अपना सारा जीवन देष व मानव सेवा के लिए समर्पित कर दिया। उन्होंने इस अवसर पर अपने इस लक्ष्य को पूरा करने के लिए अपना आजीवन अविवाहित रहने के निर्णय पर खुद ही टिप्पणी करते हुए कहा कि अगर वो षादी भी कर लेते तो केवल एक दो बच्चे होते व वे उनको पढ़ाने लिखाने में ही खप जाते, परन्तु आज मेरा सारा भारत ही अपना परिवार है। इतना बड़ा परिवार व इतना स्नेह व सम्मान पा कर वे अपने आप को षौभाग्यषाली समझते है। इस अवसर पर अण्णा की टीम की प्रमुख सेनापति किरण बेदी ने कहा कि सरकार सहित जो लोग अण्णा की टीम पर लोकषाही को कमजोर करने का आरोप लगा रहे हैं उनको लोकषाही के सदृढ़ ब्रिट्रेन, अमेरिका, फ्रांस, जापान, जर्मनी इत्यादि देषों से सीख लेनी चाहिए कि ये देष कानून बनाने से पहले जनता के समक्ष इस पर गहन सलाह मंथन करते है। परन्तु भारत में सरकार व कुछ राजनेता, भारत में कानून जनता के मतों के अनुसार बनाने को लोकषाही को कमजोर करने का हास्यास्पद आरोप गला कर लोकषाही को कमजोर कर रहे हैं। इस अवसर पर मंच का कुषल संचालन करने वाले डा विष्वास के औजस्वी षेर षायरी व सटीक गीतों से यहां पर आये हजारों नौजवान स्वर में स्वर मिला कर पूरे वातावरण को अण्णामय ही बना रहे है। चारों तरफ तू भी अण्णा, मैं भी अण्णा....जैसे गीतों ने तो इस आंदोलन की फिजा ही बदल कर रख दी है। वहीं मनीश सिसोदिया के पर्दे के पीछे रह कर इस आंदोलन को मीडिया के सहयोग से जनांदोलन बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं।
इससे पहले आज स्वामी अग्निवेष व मेधा पाटेकर के औजस्वी सारगर्भित भाशणों ने आंदोलनकारियों को उद्देलित कर दिया । वहीं जनलोकपाल व इस आमरण अनषन पर पत्रकारों के सटीक सवालों का जवाब देने में इस आंदोलन के मुख्य सुत्रधार अरविन्द केजरीवाल, प्रषांत भूशण व किरण वेदी ने अपनी बेबाक उतरों को जनता ने हर्शद ध्वनि से पूरा समर्थन किया। इस अवसर पर अनषनकारी अण्णा हजारे का स्वास्थ्य का निरंतर देखरेख कर रहे विष्व प्रसिद्व चिकित्सक त्रिहान ने जेसे ही अण्णा हजारे के अच्छे स्वास्थ्य का ऐलान किया तो पूरा रामलीला मैदान करतल हर्शध्वनि से गूंज उठा। आज घण्टों रामलीला मैदान में इस ऐतिहासिक जनांदोलन का सहभागी बनने के दौरान मेरे आंदोलनों के वरिश्ठ साथी व भाशा आंदोलन के राश्ट्रीय पुरोधा राजकरण सिंह, कर्मचारी यूनियन नेता हरि राम तिवारी व उत्तराखण्ड राज्य गठन जनांदोलन के साथी पत्रकार अनिल पंत व पवन गुप्ता साथ थे। 19 अगस्त को इस आंदेालन में मै अपने समाजसेवी साथी मोहन सिंह रावत के साथ सम्मलित रहा। यहां पर सबसे बड़ी आष्चर्य जनक बात यह है कि हजारों नौजवान दिन रात, कड़ी, धूप प्यास व वर्शा में भी इस आंदोलन में समर्पित हैं। जिस प्रकार से रामलीला मैदान व देष सहित विदेष में इस जनांदोलन को समर्थन मिल रहा है उसको जिस नासमझी व सत्तांध हो कर मनमोहन सिंह सरकार रौंदने की धृश्ठता कर रही है, वह कांग्रेस की ताबूत का कील ही साबित हो रहे हैं। राहुल गांधी को चाहिए कि अविलम्ब जनलोकपाल विधेयक पारित कराकर देष की रक्षा करें। नहीं तो यह जनांदोलन गांधी जी की इच्छा के अनुसार कांग्रेस को समाप्त करने का कारण बन सकता है।

Wednesday, August 17, 2011

जनविरोधी प्रधानमंत्री मनमोहन को अविलम्ब हटा कर व जनलोकपाल को स्वीकार कर प्रधानमंत्री बने राहुल

अब जनलोकपाल लागू करने व मनमोहन सिंह के इस्तीफे के कम देष को मंजूर नहीं है


सरकार में लगता में जनहितों के लिए रत्ती भर भी न इच्छा रही है व नहीं कोई विवेकषाली नेता ही है जिसके दिल में लोकषाही के लिए एकांष भी सम्मान हो। मनमोहनसिंह का कभी सामाजिक सरोकारों से रहा दूर अपने पडोसियों से भी सामान्य मानवीय रिस्ता नहीं रहा होगा। नही तो वे लोकषाही के प्राण जनता के आंदोलन के मूलभूत अधिकार पर षर्मनाक अंकुष लगा कर भारतीय लोकषाही को कलंकित करने का निककृश्ठ काम तो नहीं करते। पहले अण्णा को अनषन की इजाजत न देना व अब पूरे देषवासियों ने सरकार को धिक्कारा तो उनकी मांग मानने के साथ आंदोलन करने का अधिकार बहाल करने के बजाय सरकार लोकषाही को रोंदने वाली अपनी निकृश्ठ मानसिकता का परिचय देते हुए केवल 15 दिन का अनषन की अनुमति दी। अब देष केवल नक्कारे साबित हो चुके प्रधानमंत्री मनमा ेहन को एक पल भी सत्तासीन देखना नहीं चाहता जिन्होंने अपनी अहं के लिए भारतीय लोकषाही को कलंकित किया। भ्रश्टाचार से सड़ सी चुकी व्यवस्था के सुधारने के लिए जनलोकपाल स्वीकार करने में सरकार क्या मना कर रही है । इससे देष में एक स्पश्ट संदेष जा रहा है कि सरकार उच्च पदों पर आसीन व्यक्तियों को भ्रश्टाचार करने के लिए खुला छोड़ना चाहती है और उसे देष की कोई चिंता नंही है। राहुलं गांधी को अगर कांग्रेस व देष से एक रत्ती भर भी स्नेह है तो वे अविलम्ब नक्कारा साबित हो चूके प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह व उनके सिपाहेसलार कपिल सिब्बल को तुरंत पद मुक्त कर देष व कांग्रेस की बागडोर सम्भाले।

Tuesday, August 16, 2011

गैरसैण राजधानी के लिए युवाओं ने किया गैरसैंण में प्रचण्ड प्रदर्शन

गैरसैण राजधानी के लिए युवाओं ने किया गैरसैंण में प्रचण्ड प्रदर्शन
गैरसैंण (प्याउ )। जब प्रदेश के राजनेता जिन पर प्रदेश के भाग्य को संवारने का दायित्व जनता ने सौंपा है, वे जनहितों की शर्मनाक उपेक्षा करने लगे तो उत्तराखण्ड का कामकाजी प्रबुद्व युवा अपने प्रदेश के हितों की रक्षा के लिए सड़कों पर उतरने का ऐतिहासिक काम करता है। ऐसा ही हुआ जब प्रदेश गठन का जनांदोलन हुआ और अब प्रदेश की स्थाई राजधानी बलात देहरादून थोपने के पर भी सत्तासीनों द्वारा शर्मनाक मूक रहने पर अपनी रोजी रोटी के लिए देश विदेश में पलायन का दंश झेल रहे युवाओं से मूक नहीं रहा गया। वे अपनी जन्म भूमि के हितों क ी रक्षा करने व भविष्य को बचाने के लिए गैरसैंण राजधानी बनाने की मांग को सडकों पर उतर आये। इसी क्रम में समर्पित संगठन म्यर उत्तराखण्ड ने इस पहल का नेतृत्व करते हुए प्रदेश के राजनेताओं व जनता को एक नई दिशा देने का सराहनीय कार्य किया।
उत्तराखण्ड की स्थाई राजधानी गैरसैंण बनाने की मांग को लेकर ‘म्यर उत्तराखण्ड’ इंटरनेटी संस्था के बैनर तले सैकड़ों युवाओ ने स्वतंत्रता दिवस के एक दिन पहले 14 अगस्त को गैरसैंण में रेली का आयोजन किया। ंउत्तराखण्ड की जनांकांक्षाओं की प्रतीक व शहीदों के सपनों के आदर्श उत्तराखण्ड का साकार करने के लिए प्रदेश की स्थाई राजधानी गैरसैंण बनाने के लिए समर्पित प्रबुद्व उत्तराखण्डी युवाओं का संगठन ‘ म्यर उत्तराखण्ड’ गैरसैंण के रामलीला मैदान में विशाल रैली निकाली। इस रैली में देश के हर कोने कोने से आये उत्तराखण्ड के लिए समर्पित युवाओं ने भाग लिया। रैली का संचालन गणेश गिरी व शेखर शर्मा ने संयुक्त रूप से किया।
रैली को संबोधित करते हुए ‘म्यर उत्तराखण्ड’ के प्रमुख मोहन सिंह बिष्ट ने राज्य गठन के बाद अब तक की तमाम सरकारों को प्रदेश की राजधानी जनभावनाओं के अनरूप गैरसैंण न बनाने पर कड़ी फटकार लगाते हुए आगाह किया कि अब प्रदेश का युवा किसी भी कीमत पर प्रदेश के हितों के साथ खिलवाड़ नहीं होने देंगे। ‘म्यर उत्तराखण्ड’ के आवाहन पर अनैक संगठनों ने इसमें भागेदारी निभाई। इस राजधानी गैरसैंण बनाने की मांग को लेकर आयोजित रैली को संबोधित करने वालों में परिवर्तन पार्टी के केन्द्रीय अध्यक्ष पीसी तिवारी,उक्रांद के केन्द्रीय उपाध्यक्ष महेश परिहार, म्यर उत्तराखण्ड के महासचिव सुदर्शन रावत आदि ने संबोधित किया । रैली में उपस्थित प्रमुख आंदोलनकारियों में सतेन्द्र रावत, भुवन पाठक, हरपाल नेगी, सतेन्द्र रावत, भुवन पाठक, हरपाल नेगी, ज्योति गैरोला, मनीष सुंदरियाल, सुदर्शन रावत, हरेन्द्र अधिकारी, दरबान सिंह, दीपा किरमोलिया, पुष्पा बिष्ट, कैलाश बेलवाल, ज्योति गैरोला, मनीष सुंदरियाल, दरबान सिंह, सहित अनैक प्रमुख थे। रैली में देश भर से आये युवाओं का उत्साह देख कर स्थानीय लोगों में
प्रदेश की स्थाई राजधानी गैरसैंण बनने की दमतोड़ रही आशा एक बार फिर बलवती
हो गयी।

जनविरोधी प्रधानमंत्री मनमोहन को अविलम्ब हटा कर व जनलोकपाल को स्वीकार कर प्रधानमंत्री बने राहुल

जनविरोधी प्रधानमंत्री मनमोहन को अविलम्ब हटा कर व जनलोकपाल को स्वीकार कर प्रधानमंत्री बने राहुल/
जनाक्रोश से सहमी दमनकारी मनमोहन सरकार पर भारी पड़े अण्णा/


देश को भ्रष्टाचार से मुक्त करने के लिए जन लोकपाल कानून बनाने की मांग को लेकर 16 अगस्त 2011 से दिल्ली के जय प्रकाश पार्क में आमरण अनशन करने का निकले देश के शीर्ष गांधीवादी नेता अण्णा हजारे व उनके हजारों समर्थकों को अलोकतांत्रिक ढंग से जेल में बंद करके लोकशाही का गला घोंटने को तुली मनमोहनी सरकार ने देश व्यापी जनाक्रोश के आगे घुटने टेकते हुए तिहाड में बंद अण्णा हजारे व साथियों को रात के 9.15 मिनट पर तिहाड़ जेल से रिहा करने का ऐलान करने को मजबूर होना पड़ा। लोकशाही की इस जीत से गदगद अण्णा हजारे ने जेल से रिहा होने के बाद जय प्रकाश पार्क में जाने की योजना से मनमोहनी सरकार के हाथ पांव फूल से गये हे। इस लिए उन्हें सरकार बाबा रामदेव की तरह दिल्ली से बाहर भी भेजने की रणनीति पर भी विचार कर रही है। परन्तु सरकार को यह समझने की भूल कर रही हे कि अण्णा कोई बाबा रामदेव नहीं जो सरकारी दमन के आगे चुपचाप सर झुका देंगे। सरकार उनको जितना भी दमन करेगी वे उतने मजबूत हो कर सरकार के सामने कड़ी चुनौती खडी कर सकते हैं। इस चुनौती को निपटने में सरकार पूरी तरह असफल हो सकती है। मेरा यही आंकलन तब सही साबित हुआ जब अण्णा ने बिना षर्त रिहा होने से मना करके तिहाड जेल परिसर में ही अपना अनषन जारी रखा है। अण्णा बिना षर्त रिहा हो कर जे पी पार्क में आमरण अनषन करके प्रधानमंत्री सहित न्याय पालिका को भी जनलोकपाल के दायरे में लाना चाहती है। सरकार जितना बिलम्ब करेगी उतनी ही उसको भारी पडेगा। गौरतलब अण्णा के जेल में बंद करने की कांग्रेस सरकार की सरकारी दमनकारी कार्यवाही को देश की आम नजता ंही नहीं पूरे विश्व जनमत भौचंक्के हो कर देख रहा है। चैतरफे आक्रोश को देखते हुए कांग्रेस के आत्मघाति नीतिनिर्धारकों ने अण्णा को रिहा करने का मन बना लिया। सरकार की इस आत्मघाति कार्यवाहीं ने जहां कांग्रेस की जड़ों में मठ्ठा डालने का काम किया वहीं सरकार को पूरी तरह से जनता की नजरों में खलनायक ही बना दिया। अण्णा की गिरफतारी के विरोध में न तो संसद चल सका व नहीं देश का कोई अन्य संस्थान चारों तरफ कांग्रेसी सरकार की इस दमनात्मक कार्यवाही का कड़ी भत्र्सना। इस अवसर को भुनाते हुए भाजपा ने जहां देश व्यापी आंदोलन छेडने का मन बना लिया वहीं संघ भी इस आंदोलन में पूरी तरह से कूूद गया है। अण्णा के इस आंदोलन में सम्मलित होने के लिए में पूरी तरह से तत्पर रहा। परन्तु सुबह से समाचार पत्र प्रकाशित करने के कारण में इसमें सम्मलित चाह कर भी नहीं हो सका। अभी सांय में जब जंतर मंतर पर गया तो वहां पर सरकारी दमन के खिलाफ मशाल जलूश में सम्मलित हो कर मैरे दिल को शांति मिली। यहां पर इस मशाल जलूस में भले भाजपाईयों का था। ंपरन्तु विरोध सरकार की तानाशाही के खिलाफ व अण्णा के आन्दोलन के समर्थन में थाा। मुझे यहां पर भाजपा में दिल्ली के उत्तराखण्डियों के एकमात्र प्रतिनिधी विधायक मोहन सिंह बिष्ट व भाजपा युवा नेता डा विनोद बछेती भी मिले। इस मशाल जलूस का नेतृत्व भाजपा के पूर्व अध्यक्ष बेंकटया कर रहे थे। इसमें दिल्ली प्रदेश के तमाम बडे नेता भी सम्मलित थे। पूरा संसद मार्ग थाना मशाल व गगनभेदी नारों से गूंज रहा था। जिस प्रकार से तिहाड जेल से लेकर छत्रसाल स्टेडियम से लेकर पूरे देश में लोग जनाक्रोश में उमड़ रहे थे, उसे देख कर शायद राहुल गांधी ने जनता की नब्ज को समझते हुए प्रधानमंत्री को सलाह देकर अविलम्ब अण्णा को रिहा करने का निर्णय लिया। जो कांग्रेस की डूबते हुए जहाड को तिनके के सहारे के सम्मान होगा। राहुल गांधी को चाहिए कि वह देश की पूरी व्यवस्था को रसातल में धकलेने वाले प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को अविलम्ब हटा कर प्रधानमंत्री के पद पर आसीन हो कर जनभावनाओं का सम्मान करें तथा देश को इस भंवर से बचाने में अपने दायित्व का निर्वहन करें। राहुल गांधी को अण्णा की मांग को अविलम्ब स्वीकार कर देष को होनी वाली आरजकता से बचाना चाहिए व भ्रटाचार दूर करने के लिए अण्णा की मांग के तहत प्रधानमंत्री व न्यायपालिका को भी लोकपाल के दायरे लाने का आष्वासन देकर तथा मनमोहन को अविलम्ब प्रधानमंत्री के पद से हटा कर स्वयं प्रधानमंत्री बन देष की रक्षा करनी चाहिए।

Monday, August 15, 2011

उत्तराखण्ड में भाजपा की सरकार के खिलाफ जनरल रावत व नरेन्द्र ंिसंह नेगी का खुला ऐलान

उत्तराखण्ड में भाजपा की सरकार के खिलाफ जनरल रावत व नरेन्द्र ंिसंह नेगी का खुला ऐलान /
भाजपा व कांग्रेस के उडे होश, भ्रष्टाचार के खिलाफ श्रीनगर और हल्द्वानी में होगा सम्मेलन/
जनरल के तेवर देख भाजपा आलाकमान भी सहमे/


देहरादून (प्याउ)।उत्तराखंड में आकंठ व्याप्त भ्रष्टाचार के खिलाफ भाजपा नेता ले. जनरल तेजपाल सिंह रावत व प्रदेश के अग्रणी लोक गायक नरेन्द्रसिंह नेगी के उत्तराखंड रक्षा मोर्चा द्वारा घोषित सम्मेलन में हजारों पूर्व सैनिकों की उपस्थिति में प्रदेश में भ्रष्टाचार के खिलाफ खुली जंग का ऐलान करने से सत्तासीन भाजपा व प्रदेश की सत्ता में काबिज होने की दिवास्वप्न देख रही कांग्रेस में भारी हडकंप मच गया है।सम्मेलन में प्रख्यात गायक नरेन्द्र सिंह नेगी ने जन. रावत के अभियान को समर्थन देने की घोषणा करते हुए ‘ उठा जागो उत्तराखण्डियों, धै लगोना बगत ऐगे-मान सम्मान बचोनों वक्त ऐग, व सपोडा सपोड़ा... कमीशन की मीट भात..... जैसे गीतों से सम्मेलन गूंज उठा। इस अवसर पर उन्होंने जनरल रावत के भ्रष्टाचार के खिलाफ मुहिम को अपना खुला समर्थन देने के लिए बनाया गया विशेष गीत ‘ द्वि दिनों की और च, अब खैरी मुटि बटिक..’ के माध्यम से नेगी ने कहा कि जनरल के भ्रष्टाचारी अभियान का खुला समर्थन करने का ऐलान किया। भारी वर्षा के बाबजूद इस सम्मेलन में उमडी भारी भीड़ ने जहां प्रदेश की जनता की मंशा को जगजाहिर कर दिया वहीं इस सम्मेलन की सफलता से जहां आयोजकों के होशले बुलंद हैं वंही ं प्रदेश की राजनीति में नये युग के सुत्रपात का संकेत भी देखने को मिल रहा है।
इस सम्मेलन की हुंकार से थर्राई भाजपा के आला नेतृत्व में भी हडकंप मच गया है। सुत्रों के अनुसार भाजपा के उत्तराखंड चुनाव प्रभारी राजनाथ सिंह ने ले. जन. टीपीएस रावत से दूरभाष पर बात कर उन्हें दिल्ली आकर मुलाकात करने का आग्रह किया। इस बात की पुष्टि करते हुए टीपीएस रावत ने राजनाथ से भी भ्रष्टाचार से त्रस्त प्रदेश की जनभावनाओं को रूबरू करने का मन बना लिया है। इस बार टीपीएस अपने जीवन की इस निर्णायक लड़ाई को मजबूती से लड़ कर प्रदेश में नया इतिहास बनाने के लिए मन बना चूके हैं।
उत्तराखंड में होने वाले विधानसभा चुनावों से ऐन पहले भाजपा नेता तथा पूर्व सांसद तथा सेवानिवृत्त लेफ्टिनेंट जनरल टीपीएस रावत द्वारा भ्रष्टाचार के खिलाफ बिगुल बजाये जाने से राज्य में स्थापित राजनेतिक दलों की धडकनें बढ़ा दी है।
रावत ने गत दिनों भ्रष्टाचार के खिलाफ बिगुल बजाते हुये भारत के दंबंग सेना अधिकारी व राज्य गठन आंदोलन के सैन्य कमान संभालने वाले पूर्व ले. जनरल जगमोहन सिंह रावत, ले. जन. एचबी काला, ले. जन. एस कौशिक, मेजी जनरल शैलेन्द्र राज बहुगुणा, ब्रिगेडियर जे. रावत, सहित दर्जनों पूर्व सैन्य अधिकारियों तथा उत्तराखंड के अग्रणी आई ए एस अधिकारी रहे सुरेन्द्रसिंह ंपांगती के संरक्षक में बने इस मा ेर्चे में अनेक अग्रणी अधिका िरयों व समाजसे िवयों ने इस उत्तराखंड रक्षा मोर्चा का गठन किया था। 14 अगस्त रविवार को करीब हजार से अधिक पूर्व सैनिकों और सैन्य अधिकारियों की जो बैठक बुलायी गयी थी उसमें नरेन्द्रसिंह नेगी के उत्तराखण्डियों का भ्रष्टाचार के खिलाफ खुले ऐलान करने वाले युगान्तकारी गीतों से पूरा सम्मेलन गूंज गया। इस सम्मेलन में जनरल रावत तेजपाल के खासमखास सिपाहे सलार प्रदेश सरकार के दर्जाधारी राजेन्द्र भण्डारी, रधुवीर बिष्ट व ब्रिगेडियर पटवाल के मार्ग दर्शन में सम्पन्न हुए इस सम्मेलन का संचालन राज्य आंदोलन से जुडे पी सी थपलियाल ने किया । सम्मेलन में ंउत्तराखंड राज्य आंदोलन के प्रमुख आंदोलनकारी मोर्चा ‘ उत्तराखण्ड जनता संघर्ष मोर्चा के अध्यक्ष देवसिंह रावत , छात्र नेता डा एस पी सत्ती, कोशल्या ंब्रिगेड की प्रमुख, आंदोलनकारी नेत्री उषा नेगी, देहरादून गढ़वाल सभा ठाकुर सिंह असवाल , गोरखा समाज के नेता सूर्य प्रताप शाही, समाजसेवी व उद्यमी डा महावीर प्रसाद लखेड़ा, प्रदेश के विख्यात शिक्षक बलवंत सिंह नेगी व कांता प्रसाद सत्ती व प्रदेश प्रधान संघ के प्रमुख, प्रधान भगतसिंह नेगी, महिला नेत्री बि ष्ट, व पूर्व सैनिक संघ के जयवीरसिंह रावत सहित अनैक पूर्व प्रधान, ब्लाक प्रमुख व जनांदोलनों से जुडे लोग इस बैठक में सम्मलित थे।
उत्तराखंड रक्षा मोर्चे ने गत दिनों एक खुले पत्र में राज्य में पिछले दस सालों के दौरान राज्य की कथित बदहाल स्थिति के लिये दो प्रमुख राष्ट्रीय राजनैतिक दल भाजपा और कांग्रेस को जिम्मेवार ठहराया था जिससे सत्तारूढ़ भाजपा के माथे पर चिंता की लकीरें खिंच गयी थीं।
सम्मेलन को अपने संबोधन में जनरल रावत ने सीधे आरोप लगाया कि सरकार जहां ठेके प्रदेश से बाहर की एजेंसियों दे रही है वही वे पहाड़ के लोगों को कमीशन ठेकेदार बनाकर काम करवा रहे हैं। अपने विरोधिों क ी सत्ता लोलुपता के आरोपों का मुंहतोड़ जवाब देते हुए जनरल रावत ने कहा कि उन्होंने जीवन में काफी कुछ पा लिया है, अब जीवन के आखिरी दौर में हैं। कांग्रेस में रहते मुख्यमंत्री व राज्यपाल बनाने का भी आासन मिला था, लेकिन बात सिद्धांतों की थी तो सब कुछ ठुकरा दिया। उन्होंने भाजपा में सम्मलित ही भ्रष्टाचार के िखलाफ अभियान के तहत हुए थे, जब उन्हें यंहां भी ऐसा ही भ्रष्टाचार देखने को मिला तो वे मूक नहीं ंरह सकते इसी लिए इस बार फिर से नये अभियान शुरू किया है। इस अभियान का अंजाम क्या होगा इसकी उन्हें तनिक सी भी चिंता नहीं है। उन्होनें ऐलान किया कि 27 अगस्त श्रीनगर व पहली सितंबर को हल्द्वानी में ऐसे ही सम्मेलनो का आयोजन किया जाएगा। सम्मेलन मेंबड़ी संख्या में विभिन्न रैंकों के पूर्व सैनिक सहित दर्जन ब्लाक प्रमुखों व ग्राम प्रधानों की मौजूदगी अलग ही रंग ला रही थी।

सरकारी आतंक से लोकशाही के ध्वजवाहक अण्णा हजारे के आंदोलन व लोकशाही को रौंद रही है मनमोहनी सरकार

मनमोहन सरकार का दमनकारी चेहरा देख पूरा विश्व स्तब्ध/
सरकारी आतंक से लोकशाही के ध्वजवाहक अण्णा हजारे के आंदोलन व लोकशाही को रौंद रही है मनमोहनी सरकार/
लोकशाही के सर्वोच्च हृदय स्थल राष्ट्रीय धरना स्थल जंतर मंतर पर भी लगा मनमोहनी अंकुश/



देश के 65 वें स्वतंत्रता दिवस के एक दिन बाद 16 अगस्त 2011 को भारतीय हुक्मरानों का लोकशाही का दमन करने वाला ऐसा विकृत मनमोहनी चेहरा सामने आया उससे अमेरिका सहित पूरा विश्व स्तब्ध हो गया। अमेरिका ने पहले ही अण्णा हजारे के शांतिपूर्ण आंदोलन को करने की इजाजत देने की आशा प्रकट कर मनमोहन सरकार को दुविधा में डाल दिया था। अण्णा हजारे के आंदोलन के समर्थन में व मनमोहन सरकार के दमनकारी नीतियों के खिलाफ भारत में ही नहीं सुयंक्त राष्ट्र मुख्यालय की चैखट पर आंदंोलनकारी अपना विरोध प्रकट कर रहे है।
देश की व्यवस्था को भ्रष्टाचार से बचाने के लिए जनलोकपाल कानून बना कर प्रधानमंत्री से लेकर न्यायपालिका को इसके तहत लाने की मांग करके देश व्यापी जनांदोलन करने जा रहे देश के अग्रणी गांधीवादी नेता अण्णा हजारे को 16 अगस्त से दिल्ली में आमरण अनशन न करने देने पर दमन पर उतारू केन्द्र की मनमोहन सरकार ने देश की लोकशाही का एक प्रकार से गला ही घांेट दिया है। देश में शांतिपूर्ण ढंग से देश की रक्षा के लिए आंदोलन करेन वालों पर 4 ंजून को बाबा रामदेव के आंदोलन की तरह ही पुलिसिया दमन के बल पर कुचलने को उतारू मनमोहनी सरकार ने विश्व में भारतीय लोकशाही को कलंकित कर दिया है। पुलिस ने 16 अगस्त की सुबह ही न केवल अण्णा हजारे को दिल्ली मयूर विहार स्थित सुप्रीम इन्कलेव से बाहर कदम रखते ही गिरफतार करके अपनी दमनकारी मुखोटा खुद ही बेनकाब कर दिया। इसके साथ ही पुलिस ने अन्ना हजारे व उनके साथी अरविंद केजरीवाल, किरण बेदी व हजारों आंदोलकारियों को गिरफतार कर दिया है। आंदोलनकारियों को छत्रसाल स्टेडियम में अस्थाई जेल में बंद कर रखा गया है। इसके विरोध में अन्ना ने पूरे देश में जनांदोलन छेड़ने की खुली अपील की। सरकार के इस लोकशाही को रौंदने वाले कदम से पूरे देश में लोग प्रचण्ड विरोध कर रहे हैं। वहीं तमाम विरोधी दलों ने इसे अघोषित आपातकाल बता कर इसके पुरजोर विरोध का ऐलान किया।
अण्णा व साथियों की गिरफतारी से अधिक सबसे शर्मनाक बात तो यह है कि संसद की चैखट, राष्ट्रीय धरना स्थल जंतर मंतर दिल्ली में अब कोई 12घण्टे भी आंदोलन नहीं कर सकता। पुलिस उसे खदेड़ देती है। यह लोकशाही की निर्मम हत्या है। तानाशाही है जिसको लगाने वाले व सहने वाले देश की लोकशाही के दुश्मन है। देश के कोने कोने से लोग यहां पर न्याय की आश लेकर आंदोलन करने आते हैं यहां पर उन फरियादियों की समस्या का निराकरण करना तो रहा दूर देश के हुक्मरान उस फरियादियों को अपनी बात कहने या 12 घण्टे तक का भी आंदोलन करने की इजाजत तक नहीं दे रही है। इन दिनों 18 जुलाई से यहां पर पृथक राज्य कूच बिहार की मांग को लेकर 81 ंआंदोलनकारी आमरण अनशन पर बैठे हैं परन्तु क्या मजाल है कि सरकार उनकी मांग जरा भी सुने। सुनना तो रहा दूर सरकार सैकड़ों किमी दूरस्थ क्षेत्रा ें से आने वाले आंदोलनकारियों को सांय 5 बजे बाद वहां से खदेड़ देती है। यह एक प्रकार की तानाशाही ही नहीं सरकारी आतंकवाद है, जिस मनमोहनी सरकार अपनी पुलिस प्रशासन की लाठी व गोली के बल पर लोकशाही के समर्थकों को कुचल रही है। इसी सरकारी आतंकबाद के दम पर जनविरोधी मनमोहन सरकार ने विदेशों में छुपाये काले धन को वापस भारत लाने की हजारों देशभक्तों के साथ शांतिपूर्ण तरीके से आंदोलन कर रहे विश्व विख्यात योग गुरू स्वामीराम देव को मध्य रात्रि में पुलिसिया दमन से खदेड़ कर उनके आंदोलन को रौंद दिया । वहीं शांतिपूर्ण तरीके से देश में व्याप्त भ्रष्टाचार को व्यवस्था के सभी महत्वपूर्ण संस्थानों से दूर करने के लिए जनलोकपाल विधेयक बनाने की मांग कर रहे गांधीवादी नेता वयोवृद्व अण्णा हजारे के 16 अगस्त 2011 से जंतर मंतर पर आहुत आमरण अनशन के ऐलान पर उनकी मांग पर गंभीरता से ध्यान देने के बजाय सरकार उनको ही आंदोलन की इजाजत ही न देकर प्रताडित करने का निकृष्ठत्तम कार्य कर रही है। लगता है इस देश में सरकार जनतंत्र को सरकारी आतंक के दम पर गला घोंटने का कृत्य कर रही है। लगता है कांग्रेस अतीत में इंदिरा गांधी द्वारा लगाये गयी तानाशाही के बाद जनता के आक्रोश के परिणाम से सबक लेने के लिए तैयार नहीं है। इंदिरा गांधी ने तो जनहितों का सैदव ध्यान रखा वहीं मनमोहन को सपने में भी अमेरिका के अलावा किसी के हितों की भान तक नही ंरहती होगा। अगर उनमें जरा भी लेशमात्र भी देश भक्ति होगी तो वे देश के अपने हाल में छोड़ कर तत्काल राजनीति से स्तीफा देने का काम करना चाहिए। आने वाले लोकसभा चुनाव में कांग्रेस का पूरी तरह से सफाया होना निश्चित है। लोकशाही का गला घोंटने वाला कृत्य का विरोध करने वाली आम जनता, विपक्ष, मीडिया व जागरूक समाजसेवी को शतः शतः नमन्।।

चार जनपदों का गठन के बाबजूद विधानसभा चुनाव में होगा भाजपा का सफाया

भ्रष्टाचार के कलंक को हर हाल में दूर करेंगे उत्तराखण्डी/
चार जनपदों का गठन के बाबजूद विधानसभा चुनाव में होगा भाजपा का सफाया/


भले ही मुख्यमंत्री निशंक ने स्वतंत्रता दिवस के दिन महत्वपूर्ण घोषणा करते हुए प्रदेश में यमुनोत्री, कोटद्वार, डीडीहाट व रानीखेत नाम के 4 जनपदों के गठन का ऐलान करके भ्रष्टाचार में आरोपों से आकंठ घिरी अपनी सरकार की नौका को आगामी विधानसभाई चुनाव में पार लगाने का दाव मान कर चला हो। परन्तु स्वाभिमानी उत्तराखण्डी अपनी परंपरा व प्रदेश की रक्षा में इन तमाम प्रलोभनों को ठीक उसी तरह ठुकरायेगें जिस प्रकार गढ़वाल लोकसभा चुनाव में उत्तराखण्ड की स्वाभिमानी जनता ने इं िदरा गांधी के तमाम प्रलोभन व दमन को मुंहतोड ़ जवाब देते हुए हेमवती नन्दन बहुगुणा को भारी मतों से विजय बनाया। प्रदेश की जनता ने कभी भी किसी भी हालत में अपने सम्मान -स्वाभिमान, जनहितों व भविष्य को तबाह कर रहे भ्रष्टाचारी कुशासकों के तमाम प्रलोभनों का मुंह तोड़ जवाब देते हुए ऐसे कलंक के प्रतीकों को प्रदेश से उखाड़ फेंका है।
भाजपा का आला नेतृत्व जो आंख मूंद कर प्रदेश में आसीन भ्रष्टाचार को शर्मनाक संरक्षण देते हुए अपने असंतुष्ट नेता भगतसिंह कोश्या री, मेजर जनरल भुवनचंद खंडूडी व जनरल तेजपाल सिंह रावत पर डोरे डाल रही है, परन्तु उनको इस बात का भान होना चाहिए कि उत्तराखण्ड देवभूमि है व यहां के लोग किसी भी कीमत पर अपने स्वाभिमान व भविष्य को रौंदने वालों को ठीक उसी प्रकार जवाब देती है जिसं प्रकार उत्तराखण्ड प्रदेश के प्रथम विधान सभा चुनाव में प्रदेश की जनता द्वारा अपना नाम व संसाधनों की बंदरबांट करने से आहत हो कर प्रदेश गठन करने वाली भाजपा सरकार को ही प्रदेश की सत्ता से उखाड़ फेंका था । आज भी प्रदेश की जनता निशंक सरकार के भ्रष्टाचार व प्रदेश के हितो खिलवाड़ करने वाले कृत्यों से आक्रोशित हो कर प्रदेश की सत्ता से उखाड ़ फेकने के लिए विधानसभा चुनाव का बहुत ही बेसब्री से इंतजारी कर रहे हैं।

Friday, August 12, 2011

-आखिर कब होगा भारत में आजादी का सूर्योदय



हम भारतीय पिफरंगियों से मिली स्वतंत्राता की 64 वीं वर्षगांठ पूरे देश में बहुत ही ध्ूमधम से मनाने जा रहे है। परन्तु मै छह ं दशकों से आज भी भारत अपनी आजादी के सूर्योदय को देखने के लिए भी तरस रहा है। क्या इसी चंगेजी व भारतीय अस्मिता को मिटाने वाले राज को आजादी कहते है? क्या आम जनता को लुटने वालों को गणतंत्रा के सेवक कहते है? क्या देश को गुलामी से बदतर गुलाम बनाने वाले तंत्रा को गणतंत्रा कहते है? मेरा भारत आजादी के छह दशक बाद भी आज अपनी आजादी को तरस रहा है। आजादी के नाम पर पिफरंगी नाम इंडिया व पिफरंगियों की जुबान अंग्रेजी तथा देश को जी भर कर लुटने की पिफरंगी प्रवृति के अलावा इस देश को क्या मिला? आज भारत को न तो विश्व में कोई उसके नाम से पहचानता है व नहीं उसकी जुबान से। आज भी भारतीय पहचान व सम्मान को उसी बदनुमा पिफरंगी गुलामी के कलंक के नाम से जाना जा रहा है। आजादी के छह दशक बाद हमारी स्वतंत्राता के समय ही अपना सपफर नये ढ़ग से शुरू करने वाले इस्राइल, चीन व जापान आज विश्व की महाशक्तियां बन गयी है। परन्तु हम कहां खड़े हैं गुलामी के कलंक को ढोने को ही अपनी प्रगति समझ कर इतरा रहे हैं? आजादी के नाम पर यह कैसा विश्वासघात मेरे देश के साथ? अगर आज देश की शर्मनाक स्थिति को अमर शहीद सुभाषचन्द्र बोस, चन्द्र शेखर आजाद, भगतसिंह, वीर सवारकर, महात्मा गांध्ी देख रहे होते तो उनकी आत्मा भी खून के आंसू बहाने के लिए विवश होती? देश को दिया क्या यहां के हुक्मरानों ने? देश को अमेरिका, चीन, पाकिस्तान के षडयंत्रकारियों के लिए आखेड़ का मैदान बना दिया है। आज चीन व अमेरिका अपने प्यादे पाकिस्तान, बंगलादेश व नेपाल के द्वारा हमारी गैरत को रौंद रहे है? परन्तु देश के हुक्मरान कहां सोये है? उसी समय कुछ खबरों ने मुझे और बैचेन कर दिया। पूरे देश में मंहगाई से त्राही-त्राही मची हुई है परन्तु देश के हुक्मरान नीरो बन कर भारतीय स्वाभिमान को कलंकित करने वाले राष्ट्रमण्डलीय खेल की तैयारियों में ही जुटे थे । उनको मंहगाई से त्रस्त जनता की वेदना कहीं दूर तक भी नहीं सुनाई दे रहा है। देश में सरकार व विपक्ष नाम की कोई चीज ही नहीं रह गयी है। जनता मंहगाई, भ्रष्टाचार से त्रास्त है।
भ्रष्टाचार के आरोपों से बदरंग हुए देश की एक उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाध्ीश को बचाने के लिए जातिवाद की दुहाई दी जा रही है। देश के वरिष्ठ राजनेता के कृत्यों ने न केवल राज्यपाल की गरीमा को ध्ूल में मिटा कर बहुत ही निर्लज्जता से अपने आप को बेकसुर बता रहा है। हमारी संसद में सत्तारूढ़ दल का एक वरिष्ठ सांसद की नागरिकता पर देश की सर्वोच्च जांच ऐजेन्सी सीबीआई ही प्रश्न उठा रही है? देश के सबसे बड़े राज्य उप्र की विधानसभा के एक सम्मानित विधयक का घर चोरी की गाडियों को छुपाने का अड्डा निकला? विधयक पर पुलिस वाहन चोरी का सतराज होने का आरोप लगा रही है? हमारे नौकरशाहों के पास ही नहीं हमारे सेना के कई वरिष्ठ अध्किारी, इंजीनियर व चिकित्सकों के पास भी भ्रष्टाचार से सन्ना अकूत सम्पदा का भण्डार बना हुआ है। देश के अध्किांश मंत्राी ही नहीं संतरी अपने निहित स्वार्थो में लिप्त रह कर भारतीय हितों को दाव पर लगाने का आत्मघाति कृत्य भी कर रहे है। यही नहीं देश के करोड़ों बच्चों को न तो समुचित शिक्षा, चिकित्सा, सम्मान तथा न तो न्याय ही मिल रहा है? देशद्रोहियों को न्यायालय द्वारा मौत की सजा सुना देने के बाबजूद देश के हुक्मरानों का हाथ इतना कमजोर है कि वे निशाचरों को सजा नहीं दे पा रहे है। यह सब देख सुनने के बाद एक ही सवाल उठता है कि हमारा देश वास्तव में स्वतंत्रा हैं या देश में हकीकत में गणतंत्रा है?
े परन्तु उपरोक्त कविता की पंक्तियों मेरे जेहन में दशकों से रह रह कर सर उठा कर मुझे बेचैन करती है। कहां है भारतीय गणतंत्र? यह सवाल मुझें काफी कचोटता है। मैं अपने आप से सवाल पूछता हॅू कि यह गणतंत्र किसके लिए है? मैने अपनी जिन्दगी के 45 सालों में जो देखा व समझा तथा जाना उससे एक ही बात मुझे समझ में आयी कि यह भारतीय गणतंत्रा नहीं हे? इसके लिए कौन जिम्मेदार...... और कोई नहीं हम सब है। इसी आक्रोश को प्रकट करने के लिए मेने 21 अप्रेल 1989 को संसद की दर्शक दीर्घा से देश के हुक्मरानों को ध्क्किारा था। परन्तु इसके बीस साल बाद हालत बद से बदतर हो गयी है। संघ के राष्ट्रवाद का नकाब ओढ़े स्वयं सेवक ;रूपि कालनेमी वाजपेयी व आडवाणी जैसेद्ध जब राजग के कार्यकाल में इंडिया राइजिंग व साइनिंग का तोता रटन लगाने लगे तो देश भोंचंक्का व ठगा सा रह गया। कांग्रेस ने तो लगता है भारतीय स्वाभिमान को गांधी जी के सपनों के भारत के साथ राजघाट में दपफना दिया था। लोग कांग्रेस से निराश थे परन्तु जब जनता से संघ के स्वयं सेवको ने राष्ट्रवाद के नाम पर पदलोलुपता व जातिवाद का कलुषित तांडव एनडीए के शासक के रूप में मचाया तो देश की आम जनता की आशाओं पर बज्रपात हुआ। आज दुर्भाग्य यह है कि देश की आम जनता को देश की जुबान में सर्वोच्च न्यायालय में न तो न्याय ही मिल सकता है व नहीं सम्मान। इस देश में आज आम जनता की पंहुच से न्याय, रोजी रोटी, चिकित्सा व शिक्षा सब बाहर हो गयी है। सबकी सब महत्वपूर्ण संस्थानों पर थैलीशाहों चंगेजों का बर्चस्व हो गया है। कौन दिलायेगा भारतीय जन को उसका अपना गणतंत्रा? हम सब उस दीमक के समान हो गये हैं जो जिस पेड़ पर निवास करता है उसी को खोखला करने में लगा रहता है? युगान्तकारी तत्वदर्शी व आजादी के परम सिद्वहस्त संत काला बाबा सच ही कहते थे कि देवी इस देश में अब विद्या व्यापार, सत्ता व्यापार व धर्म व्यापार में तब्दील हो गया है।
आज अटल व मनमोहन सिंह की सरकारों की घोर पदलोलुपता के कारण देश अमेरिका का अघोषित उपनिवेश पाकिस्तान की तरह बन गया है। मनमोहन जैसे प्रधनमंत्राी के कुशासन में देश की आम जनता का मंहगाई, आतंकबाद व भ्रष्टाचार के कारण जीना दूश्वार हो रखा है। देश में लोकशाही की हालत इतनी शर्मनाक है कि संसद की चैखट राष्ट्रीय धरना स्थल जंतर मंतर पर देश भक्तों को देश हित में 12 घंटे लगातार भी आंदोलन करने की इजाजत यहां की लोकशाही की दंभ भरने वाली सरकार नहीं दे रही है। देश हित की बात करने वाले बाबा राम देव व अण्णा हजारे को प्रताडित व दमन करने में यहां की सरकार जरा सी भी शर्म महसूस नह ीं कर रही है।
यहां आजादी तो गुलामी से बदतर हो गयी है? कैसे मिलेगी देश की आजादी को इन चंगेजो के शिकंजे से मुक्ति? क्या आज भारत में साठ प्रतिशत लोग जो गरीबी की रेखा से नीचे जीवन बसर करने के लिए विवश है उनके लिए इस देश की आजादी का क्या अर्थ रह गया है? देश की सुरक्षा पूरी तरह से जहां विदेश शत्रु से खतरे में पड़ी हुई हैं वहीं इन हुक्मरानों से पूरी तरह लुटी जा रही है। एक नया सवेरा होगा.....विश्वास है भगवान श्री कृष्ण के बचनों पर यदा यदा ही धर्मस्य........। इसी आश में मैं निरंतर इन चंगैजी हुक्मरानों के खिलापफ जन जागरूकता का प्यारा उत्तराखण्ड रूपि शंखनाद कर रहा हॅॅू। शेष श्री कृष्ण कृपा, हरि ओम तत्सत्। श्रीकृष्णाय् नमो।

Tuesday, August 9, 2011

सरकारी आतंक से लोकशाही को रौंद रही है मनमोहनी सरकार

सरकारी आतंक से लोकशाही को रौंद रही है मनमोहनी सरकार/
राष्ट्रीय धरना स्थल जंतर मंतर पर लोकशाही पर लगा मनमोहनी अंकुश
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संसद की चैखट, राष्ट्रीय धरना स्थल जंतर मंतर दिल्ली में अब कोई 12घण्टे भी आंदोलन नहीं कर सकता। पुलिस उसे खदेड़ देती है। यह लोकशाही की निर्मम हत्या है। तानाशाही है जिसको लगाने वाले व सहने वाले देश की लोकशाही के दुश्मन है। देश के कोने कोने से लोग यहां पर न्याय की आश लेकर आंदोलन करने आते हैं यहां पर उन फरियादियों की समस्या का निराकरण करना तो रहा दूर देश के हुक्मरान उस फरियादियों को अपनी बात कहने या 12 घण्टे तक का भी आंदोलन करने की इजाजत तक नहीं दे रही है। इन दिनों 18 जुलाई से यहां पर पृथक राज्य कूच बिहार की मांग को लेकर 81 ंआंदोलनकारी आमरण अनशन पर बैठे हैं परन्तु क्या मजाल है कि सरकार उनकी मांग जरा भी सुने। सुनना तो रहा दूर सरकार सैकड़ों किमी दूरस्थ क्षेत्रा ें से आने वाले आंदोलनकारियों को सांय 5 बजे बाद वहां से खदेड़ देती है। यह एक प्रकार की तानाशाही ही नहीं सरकारी आतंकवाद है, जिस मनमोहनी सरकार अपनी पुलिस प्रशासन की लाठी व गोली के बल पर लोकशाही के समर्थकों को कुचल रही है। इसी सरकारी आतंकबाद के दम पर जनविरोधी मनमोहन सरकार ने विदेशों में छुपाये काले धन को वापस भारत लाने की हजारों देशभक्तों के साथ शांतिपूर्ण तरीके से आंदोलन कर रहे विश्व विख्यात योग गुरू स्वामीराम देव को मध्य रात्रि में पुलिसिया दमन से खदेड़ कर उनके आंदोलन को रौंद दिया । वहीं शांतिपूर्ण तरीके से देश में व्याप्त भ्रष्टाचार को व्यवस्था के सभी महत्वपूर्ण संस्थानों से दूर करने के लिए जनलोकपाल विधेयक बनाने की मांग कर रहे गांधीवादी नेता वयोवृद्व अण्णा हजारे के 16 अगस्त 2011 से जंतर मंतर पर आहुत आमरण अनशन के ऐलान पर उनकी मांग पर गंभीरता से ध्यान देने के बजाय सरकार उनको ही आंदोलन की इजाजत ही न देकर प्रताडित करने का निकृष्ठत्तम कार्य कर रही है। लगता है इस देश में सरकार जनतंत्र को सरकारी आतंक के दम पर गला घोंटने का कृत्य कर रही है। लगता है कांग्रेस अतीत में इंदिरा गांधी द्वारा लगाये गयी तानाशाही के बाद जनता के आक्रोश के परिणाम से सबक लेने के लिए तैयार नहीं है। इंदिरा गांधी ने तो जनहितों का सैदव ध्यान रखा वहीं मनमोहन को सपने में भी अमेरिका के अलावा किसी के हितों की भान तक नही ंरहती होगा। अगर उनमें जरा भी लेशमात्र भी देश भक्ति होगी तो वे देश के अपने हाल में छोड़ कर तत्काल राजनीति से स्तीफा देने का काम करना चाहिए। आने वाले लोकसभा चुनाव में कांग्रेस का पूरी तरह से सफाया होना निश्चित है। ऐसा लोकशाही का गला घोंटने वाला कृत्य पर मूक रहने वाला विपक्ष, मीडिया व जागरूक समाजसेवी को शतः शतः नमन्।।

जनरल रावत की हुंकार से भाजपा सरकार में हडकंप

जनरल रावत की हुंकार से भाजपा सरकार में हडकंप


नई दिल्ली। भाजपा नेता व सेवानिवृत ले. जनरल तेजपाल सिंह रावत ने प्रदेश में आकंठ व्यापत भ्रष्टाचार के खिलापफ खुली हुकार से जहां भ्रष्टाचार के आगोश में जनता की नजरों में कटघरे में घिरी निशंक सरकार सहम सी गयी है वहीं प्रदेश की राजसत्ता में सत्तासीन होने के कांग्रेसी मंसूबों पर भी मानो ग्रहण सा लग गया है। भाजपा व कांग्रेस की उत्तराखण्ड विरोध्ी कुनीति व उक्रांद की घोर आत्मघाति सत्तालोलुपता के कारण प्रदेश की राजनीति में तीसरे मोर्चा के भविष्य से निराश उत्तराखण्ड की जनता को भी प्रदेश की राजनीति में जनरल रावत के नेतृत्व में उभरे इस तीसरे विकल्प को आशा के प्रखर सूर्य की रूप में देख रहे है। आगामी 14 अगस्त को देहरादून में आहुत उत्तराखण्ड के प्रथम सम्मेलन पर पूरे प्रदेश के ही नहीं दिल्ली दरवार के राजनेताओं की नजरे गड़ी हुई है।
14 अगस्त को होने वाले इस महत्वपूर्ण सम्मेलन में जहां प्रदेश की संस्कृति व समाज को अपने स्वरों से नई दिशा देने वाले महान गायक नरेन्द्रसिंह नेगी सम्मलित हो रहे हैं। वहीं इसमें स्थापित कई राजनेताओं के अलावा उत्तराखण्ड राज्यगठन जनांदोलन व सामाजिक संगठनों के कई अग्रणी नेता पधर रहे है। प्रदेश की राजनीति में उत्तराखण्ड रक्षा मोर्चा के उदय ने कई स्थापित राजनेताओं की नींद जहां हराम कर दी है वहीं प्रदेश के राजनीति में भी भारी उथल पुथल मचा दी है। प्रदेश के मुख्यमंत्राी निशंक से लेकर प्रदेश भाजपा अध्यक्ष जनरल रावत से अपनी मुहिम पर भाजपा के हित में बिराम लगाने की गुराह लगा चुके हैं परन्तु जनरल रावत ने दो टूक शब्दों में सापफ कर दिया कि उनकी मुहिम अब किसी भी कीमत पर बंद नहीं होगी। उन्होंने कहा कि यह दलगत राजनीति से उपर उठ कर प्रदेश के अस्तित्व की रक्षा का सबसे बड़ा सवाल है। जनरल के कड़े तेवरों को देख कर जहां प्रदेश की जनता में भारी उत्साह है वहीं राजनैतिक दलों में भारी हड़कंप मचा हुआ है। इसकी गूंज दिल्ली दरवार में भी सापफ सुनाई दे रही है। गौरतलब है कि गत सप्ताह उत्तराखण्ड में घटित इस राजनैतिक घटना ने भाजपा को पूरे देश के समक्ष बेनकाब कर दिया है। भले ही निशंक के मीडिया मनेजमेंट के कारण यह घटना देश की मीडिया में स्थान हासिल नहीं कर पाया परन्तु उत्तराखण्ड की राजनीति के मठाध्ीशों के चेहरे के हवाईयों उडाने में कापफी हद तक कामयाब रहा। उनकी घबराहट का नतीजा यह है कि सारे नेता भ्रष्टाचार के खिलापफ संघर्ष करने के बजाय भ्रष्टाचार के खिलापफ हंुकार भरने वाले तेजपाल सिंह रावत के खिलापफ ही शब्द बाण चला रहे हैं । जिसे जनता पहली नजर में ही ध्क्किार रही है।
कर्नाटक में भ्रष्टाचार में पफंसी भाजपा की सरकार के शर्मनाक पतन प्रकरण से अभी भाजपा नेतृत्व उबर भी नहीं पाया था कि उत्तराखण्ड में आसीन भाजपा सरकार के मुखिया निशंक सरकार के कुशासन के खिलापफ पार्टी में ही व्यापक असंतोष की खबरों ने भाजपा मठाध्ीशों की नींद उडा दी। खासकर भाजपा नेतृत्व इन विश्वसनीय खबरों से भौचंक्का है कि उत्तराखण्ड भाजपा के कई वरिष्ठ नेता भ्रष्टाचार के खिलापफ प्रदेश व्यापी खुली जंग का ऐलान करने का मन बना चुके है। प्रदेश में भ्रष्टाचार के खिलापफ इस ऐलान का नेतृत्व कोई और नहीं अपितु भाजपा के पूर्व सांसद रहे ले. जनरल तेजपाल सिंह रावत कर रहे है। ले. जनरल तेजपाल सिंह रावत जो प्रदेश के पूर्व मंत्राी के रूप में पूर्व सैनिक प्रधन इस राज्य के लाखों पूर्व सैनिकों व आम जनता में अपनी अच्छी खासी पकड़ बना चूक है। उनके साथ भाजपा के कई नामी नेताओं के अलावा प्रदेश के सबसे बड़े लोक गायक नरेन्द्रसिंह नेगी, कई पूर्व सैनिक उच्चाध्किारी, समाजसेवी व राज्य गठन जनांदोलन के कई प्रमुख आंदोलनकारी इस भ्रष्टाचार के खिलापफ छेड़े जाने वाले ऐतिहासिक जंग में सम्मलित होने का मन बना चूके है। इस मोर्चे की बनने की खबर ने पूरे प्रदेश की राजनीति में उथल पुथल सी मचा दी है। एक तरपफ भाजपा व कांग्रेस के कुशासन तथा उक्रांद की दिशाहीनता से त्रास्त प्रदेश की जनता बहुत ही बेसब्री से तीसरे विकल्प की इंतजारी में पलके बिछाई हुई है। वह इस तीसरे विकल्प की दिशा की तरपफ बढ़ रहे इस ‘उत्तराखण्ड बचाओं मोर्चा ’ को खुले स्वागत के लिए तैयार है। ऐसे में जब प्रदेश के लोग प्रदेश के संसाध्नों की खुली लूट खसोट व गैर उत्तराखण्डियों के बढ़ते हुए दखल को देखते हुए जनता प्रदेश की निशंक सरकार को भी पूर्ववर्ती तिवारी सरकार की तरह जल्द ही मुक्ति चाहती है। इस दिशा में वह किसी भी मजबूत संभावित राजनैतिक विकल्प का स्वागत करने के लिए तत्पर है, जिसमें जरा सी भी राजनैतिक सुझबुझ व उत्तराखण्डी हितों का भान हो।
गौरतलब है कि भाजपा के दो वरिष्ठ जननेता पूर्व मुख्यमंत्राी भुवनचंद खंडूडी व भगतसिंह कोश्यारी वर्तमान मुख्यमंत्राी रमेश पोखरियाल सरकार के भ्रष्टाचार के कृत्यों से लम्बे समय से संतुष्ट है। वे दिल्ली दरवार में कई बार अपनी वेदना प्रकट कर चूके हैं । भाजपा के दोनों वरिष्ट नेता ही नहीं प्रदेश की आम जनता यह देख कर हैरान है कि सटर्जिया सहित कई भ्रष्टाचारों में पूरी तरह से घिर चूकी उत्तराखण्ड सरकार के मुखिया रमेश पोखरियाल को तलब करने के बजाय केन्द्रीय नेतृत्व न जाने किस लोभ में उनको शर्मनाक संरक्षण देने को उतारू है। यहां स्थिति कर्नाटक से शर्मनाक होने के बाबजूद शायद भाजपा नेतृत्व कर्नाटक सी पफजीहत होने देने का इंतजार कर रहे हैं। हालांकि भाजपा नेतृत्व प्रदेश में समय समय पर उभर रहे असंतोष को दबाने के लिए जुटा रहता है। परन्तु उनके दवाब के बाबजूद प्रदेश भाजपा के नेतृत्व को आम जनता तो रही दूर प्रदेश का भाजपा के नेता ही स्वीकार नहीं कर पा रहे है। हालत यह है कि तमाम दवाब के बाबजूद निशंक के साथ खड़े होने में खडंूडी व कोश्यारी ही नहीं केदारसिंह पफोनिया व मोहनसिंह ग्रामवासी भी अपने आप को सहज नहीं पा रहे है। यहीं नहीं जिस प्रकार से प्रदेश की राजनीति में भाजपा नेतृत्व पर सामाजिक सौहार्द के लिए विख्यात उत्तराखण्ड में जातिवादी संकीर्ण राजनीति करने का आरोपों में अब जनता को सच्च सा लग रहा है।
नई दिल्ली। भाजपा नेता व सेवानिवृत ले. जनरल तेजपाल सिंह रावत ने प्रदेश में आकंठ व्यापत भ्रष्टाचार के खिलापफ खुली हुकार से जहां भ्रष्टाचार के आगोश में जनता की नजरों में कटघरे में घिरी निशंक सरकार सहम सी गयी है वहीं प्रदेश की राजसत्ता में सत्तासीन होने के कांग्रेसी मंसूबों पर भी मानो ग्रहण सा लग गया है। भाजपा व कांग्रेस की उत्तराखण्ड विरोध्ी कुनीति व उक्रांद की घोर आत्मघाति सत्तालोलुपता के कारण प्रदेश की राजनीति में तीसरे मोर्चा के भविष्य से निराश उत्तराखण्ड की जनता को भी प्रदेश की राजनीति में जनरल रावत के नेतृत्व में उभरे इस तीसरे विकल्प को आशा के प्रखर सूर्य की रूप में देख रहे है। आगामी 14 अगस्त को देहरादून में आहुत उत्तराखण्ड के प्रथम सम्मेलन पर पूरे प्रदेश के ही नहीं दिल्ली दरवार के राजनेताओं की नजरे गड़ी हुई है।
14 अगस्त को होने वाले इस महत्वपूर्ण सम्मेलन में जहां प्रदेश की संस्कृति व समाज को अपने स्वरों से नई दिशा देने वाले महान गायक नरेन्द्रसिंह नेगी सम्मलित हो रहे हैं। वहीं इसमें स्थापित कई राजनेताओं के अलावा उत्तराखण्ड राज्यगठन जनांदोलन व सामाजिक संगठनों के कई अग्रणी नेता पधर रहे है। प्रदेश की राजनीति में उत्तराखण्ड रक्षा मोर्चा के उदय ने कई स्थापित राजनेताओं की नींद जहां हराम कर दी है वहीं प्रदेश के राजनीति में भी भारी उथल पुथल मचा दी है। प्रदेश के मुख्यमंत्राी निशंक से लेकर प्रदेश भाजपा अध्यक्ष जनरल रावत से अपनी मुहिम पर भाजपा के हित में बिराम लगाने की गुराह लगा चुके हैं परन्तु जनरल रावत ने दो टूक शब्दों में सापफ कर दिया कि उनकी मुहिम अब किसी भी कीमत पर बंद नहीं होगी। उन्होंने कहा कि यह दलगत राजनीति से उपर उठ कर प्रदेश के अस्तित्व की रक्षा का सबसे बड़ा सवाल है। जनरल के कड़े तेवरों को देख कर जहां प्रदेश की जनता में भारी उत्साह है वहीं राजनैतिक दलों में भारी हड़कंप मचा हुआ है। इसकी गूंज दिल्ली दरवार में भी सापफ सुनाई दे रही है। गौरतलब है कि गत सप्ताह उत्तराखण्ड में घटित इस राजनैतिक घटना ने भाजपा को पूरे देश के समक्ष बेनकाब कर दिया है। भले ही निशंक के मीडिया मनेजमेंट के कारण यह घटना देश की मीडिया में स्थान हासिल नहीं कर पाया परन्तु उत्तराखण्ड की राजनीति के मठाध्ीशों के चेहरे के हवाईयों उडाने में कापफी हद तक कामयाब रहा। उनकी घबराहट का नतीजा यह है कि सारे नेता भ्रष्टाचार के खिलापफ संघर्ष करने के बजाय भ्रष्टाचार के खिलापफ हंुकार भरने वाले तेजपाल सिंह रावत के खिलापफ ही शब्द बाण चला रहे हैं । जिसे जनता पहली नजर में ही ध्क्किार रही है।
कर्नाटक में भ्रष्टाचार में पफंसी भाजपा की सरकार के शर्मनाक पतन प्रकरण से अभी भाजपा नेतृत्व उबर भी नहीं पाया था कि उत्तराखण्ड में आसीन भाजपा सरकार के मुखिया निशंक सरकार के कुशासन के खिलापफ पार्टी में ही व्यापक असंतोष की खबरों ने भाजपा मठाध्ीशों की नींद उडा दी। खासकर भाजपा नेतृत्व इन विश्वसनीय खबरों से भौचंक्का है कि उत्तराखण्ड भाजपा के कई वरिष्ठ नेता भ्रष्टाचार के खिलापफ प्रदेश व्यापी खुली जंग का ऐलान करने का मन बना चुके है। प्रदेश में भ्रष्टाचार के खिलापफ इस ऐलान का नेतृत्व कोई और नहीं अपितु भाजपा के पूर्व सांसद रहे ले. जनरल तेजपाल सिंह रावत कर रहे है। ले. जनरल तेजपाल सिंह रावत जो प्रदेश के पूर्व मंत्राी के रूप में पूर्व सैनिक प्रधन इस राज्य के लाखों पूर्व सैनिकों व आम जनता में अपनी अच्छी खासी पकड़ बना चूक है। उनके साथ भाजपा के कई नामी नेताओं के अलावा प्रदेश के सबसे बड़े लोक गायक नरेन्द्रसिंह नेगी, कई पूर्व सैनिक उच्चाध्किारी, समाजसेवी व राज्य गठन जनांदोलन के कई प्रमुख आंदोलनकारी इस भ्रष्टाचार के खिलापफ छेड़े जाने वाले ऐतिहासिक जंग में सम्मलित होने का मन बना चूके है। इस मोर्चे की बनने की खबर ने पूरे प्रदेश की राजनीति में उथल पुथल सी मचा दी है। एक तरपफ भाजपा व कांग्रेस के कुशासन तथा उक्रांद की दिशाहीनता से त्रास्त प्रदेश की जनता बहुत ही बेसब्री से तीसरे विकल्प की इंतजारी में पलके बिछाई हुई है। वह इस तीसरे विकल्प की दिशा की तरपफ बढ़ रहे इस ‘उत्तराखण्ड बचाओं मोर्चा ’ को खुले स्वागत के लिए तैयार है। ऐसे में जब प्रदेश के लोग प्रदेश के संसाध्नों की खुली लूट खसोट व गैर उत्तराखण्डियों के बढ़ते हुए दखल को देखते हुए जनता प्रदेश की निशंक सरकार को भी पूर्ववर्ती तिवारी सरकार की तरह जल्द ही मुक्ति चाहती है। इस दिशा में वह किसी भी मजबूत संभावित राजनैतिक विकल्प का स्वागत करने के लिए तत्पर है, जिसमें जरा सी भी राजनैतिक सुझबुझ व उत्तराखण्डी हितों का भान हो।
गौरतलब है कि भाजपा के दो वरिष्ठ जननेता पूर्व मुख्यमंत्राी भुवनचंद खंडूडी व भगतसिंह कोश्यारी वर्तमान मुख्यमंत्राी रमेश पोखरियाल सरकार के भ्रष्टाचार के कृत्यों से लम्बे समय से संतुष्ट है। वे दिल्ली दरवार में कई बार अपनी वेदना प्रकट कर चूके हैं । भाजपा के दोनों वरिष्ट नेता ही नहीं प्रदेश की आम जनता यह देख कर हैरान है कि सटर्जिया सहित कई भ्रष्टाचारों में पूरी तरह से घिर चूकी उत्तराखण्ड सरकार के मुखिया रमेश पोखरियाल को तलब करने के बजाय केन्द्रीय नेतृत्व न जाने किस लोभ में उनको शर्मनाक संरक्षण देने को उतारू है। यहां स्थिति कर्नाटक से शर्मनाक होने के बाबजूद शायद भाजपा नेतृत्व कर्नाटक सी पफजीहत होने देने का इंतजार कर रहे हैं। हालांकि भाजपा नेतृत्व प्रदेश में समय समय पर उभर रहे असंतोष को दबाने के लिए जुटा रहता है। परन्तु उनके दवाब के बाबजूद प्रदेश भाजपा के नेतृत्व को आम जनता तो रही दूर प्रदेश का भाजपा के नेता ही स्वीकार नहीं कर पा रहे है। हालत यह है कि तमाम दवाब के बाबजूद निशंक के साथ खड़े होने में खडंूडी व कोश्यारी ही नहीं केदारसिंह पफोनिया व मोहनसिंह ग्रामवासी भी अपने आप को सहज नहीं पा रहे है। यहीं नहीं जिस प्रकार से प्रदेश की राजनीति में भाजपा नेतृत्व पर सामाजिक सौहार्द के लिए विख्यात उत्तराखण्ड में जातिवादी संकीर्ण राजनीति करने का आरोपों में अब जनता को सच्च सा लग रहा है।
नई दिल्ली। भाजपा नेता व सेवानिवृत ले. जनरल तेजपाल सिंह रावत ने प्रदेश में आकंठ व्यापत भ्रष्टाचार के खिलापफ खुली हुकार से जहां भ्रष्टाचार के आगोश में जनता की नजरों में कटघरे में घिरी निशंक सरकार सहम सी गयी है वहीं प्रदेश की राजसत्ता में सत्तासीन होने के कांग्रेसी मंसूबों पर भी मानो ग्रहण सा लग गया है। भाजपा व कांग्रेस की उत्तराखण्ड विरोध्ी कुनीति व उक्रांद की घोर आत्मघाति सत्तालोलुपता के कारण प्रदेश की राजनीति में तीसरे मोर्चा के भविष्य से निराश उत्तराखण्ड की जनता को भी प्रदेश की राजनीति में जनरल रावत के नेतृत्व में उभरे इस तीसरे विकल्प को आशा के प्रखर सूर्य की रूप में देख रहे है। आगामी 14 अगस्त को देहरादून में आहुत उत्तराखण्ड के प्रथम सम्मेलन पर पूरे प्रदेश के ही नहीं दिल्ली दरवार के राजनेताओं की नजरे गड़ी हुई है।
14 अगस्त को होने वाले इस महत्वपूर्ण सम्मेलन में जहां प्रदेश की संस्कृति व समाज को अपने स्वरों से नई दिशा देने वाले महान गायक नरेन्द्रसिंह नेगी सम्मलित हो रहे हैं। वहीं इसमें स्थापित कई राजनेताओं के अलावा उत्तराखण्ड राज्यगठन जनांदोलन व सामाजिक संगठनों के कई अग्रणी नेता पधर रहे है। प्रदेश की राजनीति में उत्तराखण्ड रक्षा मोर्चा के उदय ने कई स्थापित राजनेताओं की नींद जहां हराम कर दी है वहीं प्रदेश के राजनीति में भी भारी उथल पुथल मचा दी है। प्रदेश के मुख्यमंत्राी निशंक से लेकर प्रदेश भाजपा अध्यक्ष जनरल रावत से अपनी मुहिम पर भाजपा के हित में बिराम लगाने की गुराह लगा चुके हैं परन्तु जनरल रावत ने दो टूक शब्दों में सापफ कर दिया कि उनकी मुहिम अब किसी भी कीमत पर बंद नहीं होगी। उन्होंने कहा कि यह दलगत राजनीति से उपर उठ कर प्रदेश के अस्तित्व की रक्षा का सबसे बड़ा सवाल है। जनरल के कड़े तेवरों को देख कर जहां प्रदेश की जनता में भारी उत्साह है वहीं राजनैतिक दलों में भारी हड़कंप मचा हुआ है। इसकी गूंज दिल्ली दरवार में भी सापफ सुनाई दे रही है। गौरतलब है कि गत सप्ताह उत्तराखण्ड में घटित इस राजनैतिक घटना ने भाजपा को पूरे देश के समक्ष बेनकाब कर दिया है। भले ही निशंक के मीडिया मनेजमेंट के कारण यह घटना देश की मीडिया में स्थान हासिल नहीं कर पाया परन्तु उत्तराखण्ड की राजनीति के मठाध्ीशों के चेहरे के हवाईयों उडाने में कापफी हद तक कामयाब रहा। उनकी घबराहट का नतीजा यह है कि सारे नेता भ्रष्टाचार के खिलापफ संघर्ष करने के बजाय भ्रष्टाचार के खिलापफ हंुकार भरने वाले तेजपाल सिंह रावत के खिलापफ ही शब्द बाण चला रहे हैं । जिसे जनता पहली नजर में ही ध्क्किार रही है।
कर्नाटक में भ्रष्टाचार में पफंसी भाजपा की सरकार के शर्मनाक पतन प्रकरण से अभी भाजपा नेतृत्व उबर भी नहीं पाया था कि उत्तराखण्ड में आसीन भाजपा सरकार के मुखिया निशंक सरकार के कुशासन के खिलापफ पार्टी में ही व्यापक असंतोष की खबरों ने भाजपा मठाध्ीशों की नींद उडा दी। खासकर भाजपा नेतृत्व इन विश्वसनीय खबरों से भौचंक्का है कि उत्तराखण्ड भाजपा के कई वरिष्ठ नेता भ्रष्टाचार के खिलापफ प्रदेश व्यापी खुली जंग का ऐलान करने का मन बना चुके है। प्रदेश में भ्रष्टाचार के खिलापफ इस ऐलान का नेतृत्व कोई और नहीं अपितु भाजपा के पूर्व सांसद रहे ले. जनरल तेजपाल सिंह रावत कर रहे है। ले. जनरल तेजपाल सिंह रावत जो प्रदेश के पूर्व मंत्राी के रूप में पूर्व सैनिक प्रधन इस राज्य के लाखों पूर्व सैनिकों व आम जनता में अपनी अच्छी खासी पकड़ बना चूक है। उनके साथ भाजपा के कई नामी नेताओं के अलावा प्रदेश के सबसे बड़े लोक गायक नरेन्द्रसिंह नेगी, कई पूर्व सैनिक उच्चाध्किारी, समाजसेवी व राज्य गठन जनांदोलन के कई प्रमुख आंदोलनकारी इस भ्रष्टाचार के खिलापफ छेड़े जाने वाले ऐतिहासिक जंग में सम्मलित होने का मन बना चूके है। इस मोर्चे की बनने की खबर ने पूरे प्रदेश की राजनीति में उथल पुथल सी मचा दी है। एक तरपफ भाजपा व कांग्रेस के कुशासन तथा उक्रांद की दिशाहीनता से त्रास्त प्रदेश की जनता बहुत ही बेसब्री से तीसरे विकल्प की इंतजारी में पलके बिछाई हुई है। वह इस तीसरे विकल्प की दिशा की तरपफ बढ़ रहे इस ‘उत्तराखण्ड बचाओं मोर्चा ’ को खुले स्वागत के लिए तैयार है। ऐसे में जब प्रदेश के लोग प्रदेश के संसाध्नों की खुली लूट खसोट व गैर उत्तराखण्डियों के बढ़ते हुए दखल को देखते हुए जनता प्रदेश की निशंक सरकार को भी पूर्ववर्ती तिवारी सरकार की तरह जल्द ही मुक्ति चाहती है। इस दिशा में वह किसी भी मजबूत संभावित राजनैतिक विकल्प का स्वागत करने के लिए तत्पर है, जिसमें जरा सी भी राजनैतिक सुझबुझ व उत्तराखण्डी हितों का भान हो।
गौरतलब है कि भाजपा के दो वरिष्ठ जननेता पूर्व मुख्यमंत्राी भुवनचंद खंडूडी व भगतसिंह कोश्यारी वर्तमान मुख्यमंत्राी रमेश पोखरियाल सरकार के भ्रष्टाचार के कृत्यों से लम्बे समय से संतुष्ट है। वे दिल्ली दरवार में कई बार अपनी वेदना प्रकट कर चूके हैं । भाजपा के दोनों वरिष्ट नेता ही नहीं प्रदेश की आम जनता यह देख कर हैरान है कि सटर्जिया सहित कई भ्रष्टाचारों में पूरी तरह से घिर चूकी उत्तराखण्ड सरकार के मुखिया रमेश पोखरियाल को तलब करने के बजाय केन्द्रीय नेतृत्व न जाने किस लोभ में उनको शर्मनाक संरक्षण देने को उतारू है। यहां स्थिति कर्नाटक से शर्मनाक होने के बाबजूद शायद भाजपा नेतृत्व कर्नाटक सी पफजीहत होने देने का इंतजार कर रहे हैं। हालांकि भाजपा नेतृत्व प्रदेश में समय समय पर उभर रहे असंतोष को दबाने के लिए जुटा रहता है। परन्तु उनके दवाब के बाबजूद प्रदेश भाजपा के नेतृत्व को आम जनता तो रही दूर प्रदेश का भाजपा के नेता ही स्वीकार नहीं कर पा रहे है। हालत यह है कि तमाम दवाब के बाबजूद निशंक के साथ खड़े होने में खडंूडी व कोश्यारी ही नहीं केदारसिंह पफोनिया व मोहनसिंह ग्रामवासी भी अपने आप को सहज नहीं पा रहे है। यहीं नहीं जिस प्रकार से प्रदेश की राजनीति में भाजपा नेतृत्व पर सामाजिक सौहार्द के लिए विख्यात उत्तराखण्ड में जातिवादी संकीर्ण राजनीति करने का आरोपों में अब जनता को सच्च सा लग रहा है।

-शीला को अभयदान दे कर जनता की नजरों में गुनाहगार हुई कांग्रे


स/
-शीला के कुशासन में खून के आंसू बहा रही है आम जनता/
राष्ट्रमण्डल खेलों के नाम पर देश के संसाधनों की जो खुली लुट हुई उसके खलनायकों को बेनकाब करते हुए भारत के नियंत्रक और महालेखा परीक्षक यानी कैग की रिपोर्ट को देख कर पूरा देश स्तब्ध है। देश की जनता ने देखा कि किस प्रकार गुलामी के प्रतीक राष्ट्रमण्डल खेल कराने के नाम पर देश के विकास के संसाधनों की चंद नेताओं व नौकरशाहों ने मिल कर बंदरबांट की।
सबसे हैरानी की बात यह है कि जिस प्रकरण में इन खेलों के प्रमुख रहे कलमाड़ी को ऐसी ही अनिमियताओं के कारण जेल में बंद किया गया है ठीक उसी प्रकार की अनिमियताओं के लिए दोषी दिल्ली प्रदेश की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित को बचाने के लिए पूरी कांग्रेस तमाम प्रकार के कुतर्कों का सहारा क्यों ले रही है।
देश की जनता चाहती है कि जो कोई भी इन भ्रष्टाचारों के खिलाफ है उनकी सम्पति को जब्त किया जाना चाहिए। शीला दीक्षित अगर बेगुनाह है तो इसका पफैसला न्यायालय करे न की कांग्रेस। कांग्रेस को चाहिए कि जिस प्रकार से आदर्श घोटाले से लेकर अन्य प्रकरणों में उससने अविलम्ब हुक्मरानों को न्यायालय के दर पर न्याय के लिए सपुर्द किया ठीक उसी तरह शीला दीक्षित को भी न्यायालय के दर पर छोडना चाहिए। अगर शीला को इस प्रकार शर्मनाक संरक्षण कांग्रेस देगी तो यह साफसंदेश जायेगा कि कांग्रेस भ्रष्टाचार को संरक्षण दे रही है। कर्नाटक व उत्तराखण्ड में हो रहे भ्रष्टाचार से जहां भाजपा पूरी तरह जनता के समक्ष बेनकाब हो चूकी है वहीं कांग्रेस ने शीला व उनके मंत्री राजकुमार के मामले में जो रस्ता अखित्यार कर रखा है वह आत्मघाति है। शीला दीक्षित के कुशासन से दिल्ली की आम जनता जो दशकों से कांग्रेस का जनाधार रही थी वह आज कांग्रेस से दूर हो गयी है। कांग्रेस के इस कुशासन के प्रतीक बनी शीला के राज में लोग खून के आंसू बहाने के लिए विवश है। शीला राज में दिल्ली की परिवहन इस तरह से लोगों को खुली लूट रही है । दोपहर के समय वातानुकुलित बसों को ही प्रायः सडकों पर उतारा जाता है जिससे आम गरीब आदमी को या तो घंटों इंतजार करना पडता या उसको अपना पेट काट कर शीला की नादिरशाही परिवहन व्यवस्था का शिकार होना पडता है। दिल्ल्ली परिवहन निगम की हरी रंग की ये सामान्य बसें बारह बजे के बाद साढे तीन तक ऐसे गायब होती है जैसे सियार के सर से सींग।
न तो इसका भान विपक्षी दल भाजपा को है व नहीं देश की जनसमस्याओं व लोकशाही का चैथा स्तम्भ समझे जाने वाले मीडिया को। दोनों अब आम जनता के दुख दर्द को समझने की परिधी से कोसों दूर हो गये है। आम जनता इस कुव्यवस्था से किस प्रकार लूट रही है। दूसरी तरफ सरकार को इस बात तक का भान तक नहीं है कि सडकों पर ये बसे सही ढंग व सुचारू रूप में सही समय अंतराल से चल भी रही है यह नहीं। शीला सरकार ने किस प्रकार राष्ट्रमण्डल खेलों के नाम पर जनता के धन का जो खुला दुरप्रयोग किया वह अगर कांग्रेसी हवाई मठाधीश बने जनार्जन दिवेदी को सामान्य लगे तो लोग उनकी मानसिकता पर आंसू बहाने व कांग्रेसी नेतृत्व की बुद्वि पर तरस खाने के अलावा क्या कर सकते है।

आस्तीन के सांपों को भी रौंद कर राजधानी गैरसैंण बनायेंगे उत्तराखण्डी

-आस्तीन के सांपों को भी रौंद कर राजधानी गैरसैंण बनायेंगे उत्तराखण्डी/
-अस्मिता व लोकशाही का प्रतीक बना गैरसैंण/

उत्तराखण्ड की जनता ने अपने हकों को संवैधानिक तरीके से जब उत्तराखण्ड राज्य माँगा तो केवल अपने विकास व अपने आत्म सम्मान व संस्कृति की रक्षा के लिए। आज राज्य गठन को भले ही 11 साल हो गये हैं परन्तु लोग आज भी अपने आप को ठगा सा महसूस कर रहे हैं। न तो यह राज्य जनता को अपना पन का अहसास ही नहीं है व नहीं कहीं दूर तक विंकास की वह लहर जिसके लिए पृथक राज्य गठन की मांग की गयी , वह देखने को मिला, नहीं वह आत्मसम्मान ही बच पा रहा है जिसकी रक्षा के लिए इस राज्य गठन के लिए लोगों ने लम्बा संघर्ष करते हुए अपनी शहादत तो दी।
14 अगस्त को राजधानी गैरसैंण बनाने की मांग के समर्थन में रैली करने वाले ‘म्यर उत्तराखण्ड’ के नौजवानों का भी प्रदेश के जागरूक लोगों की तरह यह पूरा विश्वास है कि बिना अलग राज्य बने यहाँ की समस्याओं का समाधान नहीं होगा, तो पांच दशक से अधिक समय तक उत्तराखंड राज्य आन्दोलन चला। पांच दशक से अधिक सालों के संघर्ष के बाद उत्तराखंड राज्य भी मिल गया। 42 लोगों की शहादत और सरकारी दमन के खिलाफ सड़कों पर संघर्षरत रही जनता ने जिस राज्य का सपना देखा था वह आज भी पूरा नहीं हुआ। जिन समस्याओं को लेकर अलग राज्य की लड़ाई लड़ी गई थी वही समस्याएं आज भी पहाड़ में, पहाड़ की तरह पहले से अधिक विकराल हो गयी है। उत्तराखंड के लिए सरकार कोई ऐसी नीति नहीं बना पाई जिस से वहां से पलायन रुके और वहां बेरोजगारों को रोजगार मिले। जल, जंगल, जमीन पर लोगों का अपना अधिकार हो। हमारे प्राकृतिक संसाधनों पर मुनाफाखोरों का शिकंजा कसता चला जा रहा है। नदियों को बड़ी कंपनियों के हवाले कर सरकार ने जिस ऊर्जा प्रदेश का सपना देखा है उससे यहाँ के लोग पलायन करने को मजबूर हैं। अलग राज्य बनने के बाद भी यहाँ के लगभग 15 लाख लोग पहाड़ छोड़ चुके हैं। पौने दो लाख घरों में ताले पड़े हैं। अब नई तरह की बेचैनी जनता में है। वह है अपनी आकांक्षाओ, सपनो का राज्य बनाना। अभी भी आन्दोलनों का दौर थमा नहीं, आज भी यहाँ की जनता अपने हक हकूकों के लिए आंदोलनरत है। चाहे बांधों के खिलाफ प्रदर्शन, जल, जंगल, जमीन या फिर राजधानी गैरसैण आन्दोलन हो। जैसा कि आपको विदित है उत्तराखण्ड राज्य को बने 11 साल होने को है और इन 11 सालों में 5 मुख्यमंत्री बदल गए। कभी कांग्रेस कभी बीजेपी दोनों सत्ता बदलते रहे। और अस्थाई राजधानी देहरादून से ही अपना शासन चलाते रहे। मगर अपने इस कार्यकाल के दौरान किसी भी सरकार ने स्थाई राजधानी बनाने की जहमत नहीं उठाई। आजाद भारत में उत्तराखण्ड ऐसा अभागा प्रदेश है, जिसकी राजधानी जनता द्वारा तय किये जाने के बाबजूद सरकारें बलात 11 साल तक अस्थाई राजधानी देहरादून को ही स्थाई राजधानी में तब्दील करने के लिए प्रदेश की राजसत्ता व संसाधनों का खुला दुरप्रयोग कर रहे है। 11 वर्ष से स्थायी राजधानी गैरसैंण बनाने को जानबुझ कर लटकाने का राजनेताओं का षडयंत्र, उत्तराखंड की जनता को निराश करने वाला ही नहीं अपितु लोकशाही को दफन करने वाला भी है । । राज्य के बुद्धिजीवियों, हितचिंतकों, भूगोलवेत्ताओं, अर्थशास्त्रियों, वैज्ञानिकों ने पूरी समझ और शोध के बाद ही तय किया था कि यदि उत्तराखंड राज्य का गठन हुआ तो इसकी राजधानी के लिये गैरसैण से अधिक उपयुक्त स्थान कोई नहीं है।
सन् 1994 में मुलायम सिंह यादव के नेतृत्व वाली उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा उत्तराखंड राज्य गठन हेतु रमा शंकर कौशिक समिति का गठन किया गया और इस समिति ने उत्तराखंड राज्य का समर्थन करते हुए 5 मई 1994 को अपनी संस्तुति राज्य सरकार को दी। इस समिति ने पर्वतीय क्षेत्र में स्थान-स्थान पर जाकर लोगों के सुझाव लिए। कुमाऊँ एवं गढ़वाल के मध्य स्थित गैरसैंण (चंद्रनगर) नामक स्थान पर राजधानी बनाने की संस्तुति दी। उस समिति की रिपोर्ट के मुताबिक गैरसैंण को 60.21 फीसदी अंक मिले थे, जबकि नैनीताल को 3.40, देहरादून को 2.88, रामनगर-कालागढ़ को 9.95, श्रीनगर गढ़वाल को 3.40, अल्मोड़ा को 2.09, नरेंद्रनगर को 0.79, हल्द्वानी को 1.05, काशीपुर को 1.31, बैजनाथ-ग्वालदम को 0.79, हरिद्वार को 0.52, गौचर को 0.26, पौड़ी को 0.26, रानीखेत-द्वाराहाट को 0.52 फीसद अंक मिलने के साथ ही किसी केंद्रीय स्थल को 7.25 फीसद अन्य को 0.79 प्रतिशत ने अपनी सहमति दी थी। गैरसैंण के साथ ही केंद्रीय स्थल के नाम पर राजधानी बनाने के पक्षधर लोग 68.85 फीसद थे। उस रिपोर्ट में गैरसैंण (चन्द्रनगर) को राजधानी के लिये सबसे उपयुक्त माना। कौशिक समिति की संस्तुति पर 24 अगस्त 1994 को उत्तर प्रदेश विधानसभा ने उत्तराखंड राज्य बनाने का प्रस्ताव पारित कर दिया।
राज्य बनने के बाद भी वह दुर्भाग्य गया नहीं है। देश की तो दूर, गैरसैंण को राज्य की राजधानी न बनाने के लिये कितने कुतर्क, षडयंत्र और खेल खेले गए और खेले जा रहे हैं। उत्तराखंड की प्रथम सरकार नित्यानंद स्वामी की अगुवाई में बनी, उनकी सरकार ने राजधानी गैरसैण (चंद्रनगर) के नाम पर एक राजनैतिक षडयंत्र के तहत दीक्षित आयोग नाम की एक समिति गठित कर हमारे ऊपर थोप दिया और दीक्षित आयोग ने 11 बार अपना कार्यकाल बढ़ने के बाद वही रिपोर्ट दी जिसकी वहां की जनता को पहले ही आशंका थी। असल में दीक्षित आयोग का गठन ही गैरसैण को राजधानी न बनाने के लिए किया गया था। कौशिक समिति पहले ही राज्य के विभिन्न हिस्सों में जाकर गैरसैण के लिए लोगों की राय ले चुकी थी। एक कैबिनेट मंत्री की अध्यक्षता और वरिष्ठ सचिव के संचालन में इस समिति ने बुद्धिजीवियों, वकीलों, छात्र संगठनों, आन्दोलनकारियों आदि से बात कर अपनी रिपोर्ट तैयार की। इस समिति की सिफारिश को दरकिनार का राष्ट्रीय दलों ने गैरसैण का विरोध शुरू किया। कौशिक समिति की रिपोर्ट की उपेक्षा और दीक्षित आयोग का गठन पहाड़ की जनता के साथ छल था। एक सरकारी समिति जिसने आम लोगों की राय को सही माना उसके ऊपर आयोग बैठाना जनतांत्रिक भावनाओं का अपमान है। गैरसैंण को राजधानी न बनाने के लिये उन्होंने कुतर्क गढ़ने भी शुरू कर दिये। राजधानी के बारे में वे लोग भी तर्क देने लगे जिन्हें यहां का भूगोल पता नही है। जिन लोगों ने कभी गैरसैंण देखा नहीं वे भी उसके विरोध में बयान देने लगे। सरकार भी बार-बार लोगों का ध्यान इससे हटाने लगी। गैरसैंण के विरोध में वे लोग हैं, जो न आन्दोलन में थे और न उनकी कही आन्दोलन में भूमिका रही थी। राज्य आन्दोलन वहां की जनता ने छोटे छोटे तबकों में एकजुट होकर लड़ा था। राज्य के लिए 42 लोगों की शहादत और राजधानी गैरसैण (चंद्रनगर) के लिए बाबा मोहन उत्तराखंडी और छात्र कठैत की शहादत को हम नहीं भूलेंगे। राजधानी गैरसैंण घोषित करने को लेकर 38 दिनों तक आमरण अनशन करने के बाद बाबा मोहन उत्तराखंडी शहीद हुए थे। इन सब बातों को देखने के बाबजूद आज भी प्रदेश के तमाम राजनेताओं को इस बात की होश तक नहीं है कि प्रदेश की राजधानी बनाने से प्रदेश क ी उन लोगों की जनआकांक्षाओं को साकार करने की महत्वपूर्ण पहल होगी जिन्होंने पृथक राज्य गठन के लिए अपना सबकुछ कुर्वान कर दिया था। प्रदेश के उपेक्षित पर्वतीय क्षेत्र के विकास के लिए ही पृथक राज्य की मांग क ी गयी थी न की इन राजनेताओं व नौकरशा हों की ऐशगाह बनाने क े लिए। एक बात इन राजनेताओं को कान खोल कर आत्मसात करनी चा िहए कि राज्य का गठन तभी सार्थक होगा जब राजधानी गैरसैंण में बनेगी। गैरसैंण केवल स्थान हीं नहीं अपितु उत्तराखण्ड में लोकशाही के प्रतीक का भी केन्द्र बिन्दू है । जो जनता अपने आत्मसम्मान के लिए मुलायम व राव के दमनकारी कुशासन का मुहतोड़ जवाब दे कर पृथक राज्य का गठन कर सकती ह ै तो वह अपने भाग्य व लोकशाही पर ग्रहण लगाने वाले अपने ही आस्तीन के सांपों को कुचलने में क्यों मुंह मोड़ेगी। उत्तराखण्डियों के लिए देहरादून लखनऊ से बदतर साबित ह ो रहा है। आज जरूरत है उत्तराखण्डियों को जागरूक हो ने की।
जो जहां भी ह ै जिस संगठन में भी ही अगर प्रदेश व अपनी जन्म भूमि की रक्षा करनी है । अगर आपने अपने शहीदों व राज्य आंदोलनकारियों की शह ादत व संघर्षो का सम्मान करना है तो तमाम संगठन एक स्वर में हमारे राजनेता ब ने इन सत्ता के भैडियों का जो गैरसैंण राजधानी बनाने मे ं शर्मनाक मौन रखे हुए हैं उनका सामाजिक ही नही चुनाव में भी परास्त करने का काम करें। सामाजिक संस्थायें जनहितों कों रोंदने वाले इन भैडियों को फूलों की हार पहनाने मात्र को अपना दायित्व न समझे अपितु इनकी जनहितों क ो रौंदने वालों पर भी अंकुश लगाने का अपने दायित्व का निर्वहन करना चाहिए। नहीं तो आने वाला समाज हमें कभी मा फ नहीं करेंगा। शेष श्री कृष्ण। हरि ओम तत्सत्। श्रीकृष्णाय् नमो।