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Saturday, April 28, 2012


-जब नेहरू के घर में आयी मुझे जिन्ना व नेहरू की याद

-नेहरू जी के दिल्ली स्थित तीन मूर्ति आवास में 


कल यानी 28 अप्रैल को सूर्य अपनी दैनिक यात्रा के अंतिम पडाव की तरफ था मैं भारत के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू के निवास रहे तीन मूर्ति भवन में नेहरू जी की स्मृर्तियों को जीवंत कर रहा था। वहां मै वहां देश के वरिष्ट पत्रकार मित्र विजेन्द्र सिंह रावत व डाक्टर जोशी जी के साथ दिल्ली में 35 साल रहने के बाबजूद कभी न तो नेहरू तारामण्डल में ही गया व नहीं इसके साथ सटे नेहरू जी के आवास रहे तीन मूर्ति रूपि विशाल भवन में गया था। वहां कल डा. जोशी के अनुराध पर संयोगवश अल्पाहार ग्रहण करने के लिए गया था। वहां के सुन्दर हरे भरे  मनोहारी वातावरण में मुझे नेहरू जी की यादें ताजा हो गयी। मेने इस अनुभूति को अपने दोनों मित्रों से भी प्रकट की।
मैं वहां की मनोहारी सौन्दर्य का आनन्द लेने के बजाय मेरे सामने भारत के महान स्वप्न दृष्टा व लोकतांत्रिक देश भारत को बनाने वाले कुशल शिल्पी नेहरू का विराट व्यक्तित्व उभरने लगा। हालांकि नेहरू से अधिक मुझे देश के अब तक के प्रधानमंत्रियों में से इंदिरा गांधी को मजबूत व कुशल प्रधानमंत्री मानता हॅू। पर यहां पर बात हो रही है नेहरू जी के विराट व्यक्तित्व की। नेहरू बनाम मोहम्मद जिन्ना, हिन्दुस्तान के इन दो बडे नेताओं ने 1947 के बाद हिन्दुस्तान के विभाजन के बाद बने भारत व पाकिस्तान नामक देशों का नेतृत्व किया। नेहरू जी से वैचारिक रूप से कई मुद्दों पर मतभेद हो सकते हैं परन्तु उनकी राष्ट्र की मजबूत नींव रखी। यहां पर बडे बडे सरकारी क्षेत्र के उद्यम स्थापित किये। यहां पर ऐसा शासन प्रशासन दिया कि उसका हाल पाकिस्तान की तरह लोकशाही का गलाघोंट कर फोजी तानाशाही की जकड़ में जीने का कलंक तक नहीं लगा। जो लोग आज भारत की हर समस्या के लिए नेहरू को पानी पी पी कर कोसते हैं उनको नेहरू के वैज्ञानिक व आधुनिक विकास की मजबूत सोच को जमीनी धरातल में स्थापित करने वाले लोकतांत्रिक देश भारत के समक्ष  पाकिस्तान को समाने रख कर तुलनात्मक विवेचन करना चाहिए। मेरा कश्मीर, भारतीय संस्कृति व भाषा आदि अनैक विषयों में नेहरू जी से वैचारिक मतभेद होने के बाबजूद मेरा मानना है कि पाकिस्तान की तुलना भारत इस लिए शौभाग्यशाली रहा कि उसका नेतृत्व नेहरू जैसे प्रगतिशील व्यक्ति के पास रहा । वहीं पाकिस्तान का दुर्भाग्य रहा कि उसका नेतृत्व जीना जैसे स्वार्थी व्यक्ति के पास रहा। क्योंकि सिद्धांत रूप में जीना पाकिस्तान का समर्थक नहीं था, वह केवल प्रधानमंत्री बनने की अंधी ललक में देश के विभाजन करने को न केवल तुला अपितु हिन्दुस्तान के दसों लाख लोगों के कत्लेआम का सबसे बड़ा गुनाहगार भी रहा। भले ही आडवाणी सहित कई नेता दलीय स्वार्थ के कारण आज जिन्ना भक्ति की चालिसा पढ़ते हों परन्तु इस सच को विश्व में कोई नहीं झुटला सकता है कि नेहरू द्वारा नींव रखे गये देश, भारत आज विश्व की एक मजबूत सामरिक व आर्थिक शक्ति बन कर अपना तिरंगा फहरा रहा है। वहीं मोहम्मद जिन्ना द्वारा नीव रखे गये देश, पाकिस्तान आज विश्व का सबसे बडा आतंकी व टूटने के कगार पर बीमार देश के रूप में विश्व शांति को  कलंकित कर रहा है। मैं नेहरू जी का अंध भक्त नहीं, परन्तु एक तटस्थ दृष्टि से नजर दौडाता हॅू तो वे एक बेहतर इंसान थे, जिसके पास उस समय संसार में भोग विलाश के अधिकांश साधन जिनके लिए भारत का मध्यम वर्ग भी आज भी तरस रहा है, के होने के बाबजूद वे देश की आजादी के जंग में कूदे थे। अनेक जेल यात्राये की थी। हाॅं उनकी जो सोच हे वह उनके पिता द्वारा उनको प्रदान किया गया परिवेश जिम्मेदार है। उनके पिता उनको भारतीय संस्कृति के पालक की तरह नहीं फिरंगी लाट साहबों की तरह पालन पोषण कर उनको भी लाट साहब बनाना चाहते थे। महात्मा गांधी पर भारतीय संस्कृति की अमिट छाप ताउम्र दिखी, उसमें उनकी माता जी द्वारा उनको बचपन में दिये गये संस्कार रहे।  जेसे गोविन्द बल्लभ पंत ने केसी पंत व हेमवती नन्दन बहुगुणा ने विजय बहुगुणा का पालन पोषण किया। इसी जरूरत से ज्यादा लाड़ प्यार के कारण आज केसी पंत ही नहीं विजय बहुगुणा चाह कर भी आम आदमी के साथ घुलमिल नहीं पाते है। आज इसी कारण के सी पंत व विजय बहुगुणा देश की जनता के साथ तो रहा दूर अपने समाज के अपने चाहने वालों से सहज रूप से घुल मिल नहीं सकते हे। वहीं नेहरू जी तमाम लाट साहब की तरह लालन पालन होने के बाबजूद जननेता व आम जनता से घुलमिलने वाले नेता रहे।
नेहरू जी द्वारा राष्ट्र को समर्पित किये गये इस तीन मूर्ति आवास में आधा घण्टे से कम व्यतीत किया गया समय की स्मृतियां अपने साथियों को जिस रूप में मैने प्रकट की वे विचार कई सालों से मेरे मन मस्तिष्क में क्रांेध रहे थे। भारत मे ंउस समय नेहरू व जिन्न ा के समान ही कई बडे नेता थे, जिनके विचार व कार्य किसी भी हालत में नेहरू व जिन्ना से कमतर नहीं थे, परन्तु जो सत्तासीन हुए उनकी तुलनात्मक हल्का सा विवेचन मेरे मन में उमडा। वैसे उस समय नेता जी सुभाष चन्द्र बोस, सरदार पटेल आदि कई वरिष्ट नेता थे। परन्तु इतिहास उसी की तुलना करता है जो मैदान में उतर कर अपने खेल का प्रदर्शन करने का अवसर पाता है।

Friday, April 27, 2012



संसार का सबसे बडा कत्लगाह बना भारत!




-संसार का सबसे बडा मांस उत्पादक देश बना कर भारत को कलंकित किया हुक्मरानों ने
-संसार की छटवां सबसे बडा   गो  मांस उत्पादक देश है भारत



आजादी के नाम पर देश की सरकारों ने 65 सालों में सदियों से गो माता की सेवा व पूजा करने वाले भगवान राम व भगवान श्रीकृष्ण के देश को संसार का सबसे गौ हत्यारा देश बना कर कलंकित किया। जिस देश में विदेशी आततायी ओरंजेब व फिरंगी हुक्मरानों ने जो भारत को पशु मांस उत्पादक यानी हत्यारा देश बनाने की धृष्ठता नहीं की वह कृत्य स्वतंत्र भारत की सरकारों ने मात्र 65 साल में इस देश को विश्व का सबसे बड़ा पशु-गो वंश पशु हत्यारा बना दिया। आज पूरे विश्व में भारत सबसे ज्यादा मांस उत्पादक देश बन गया है। इस जड़ चेतन में भगवान का अंश मान कर जीवो व जीने दो का अमर संदेश पूरे विश्व को देने वाला भारत, भगवान राम व भगवान श्रीकृष्ण को मानने वालों का देश भारत, दया के सागर महावीर जैन व गौतम बुद्ध तथा अन्याय के खिलाफ सर्ववंश कुर्वान करने वाले गुरू गोविन्द सिंह का देश भारत, अहिंसा का अमर घोष करने वाले गांधी को राष्ट्रपिता मानने वाला भारत को यहां के आत्मघाती हुक्मरानों ने विश्व का सबसे बड़ा मांस उत्पादक यानी कातिल देश बना कर देश की संस्कृति व लाखों शहीदों की शहादत का घोर अपमान किया है। वहीं  गौ वंश मांस का उत्पादन में भारत पाकिस्तान से दो गुना ज्यादा कर रहा है और पूरे विश्व में सबसे ज्यादा गौ वंश मांस उत्पादक यानी कातिल देश के रूप में भारत का छटवां स्थान है। इसके लिए देश के हर राजनैतिक दल गुनाहगार है। आजादी के बाद किसी भी सरकार ने ईमानदारी से भारत को कलंकित करने वाले पशु हत्यारे बनाने वाले कृत्य को रौकने का ठोस काम तक नहीं किया। देश में अपने वोट बैंक बनाने के लिए इसका विरोध या समर्थन करने का कृत्य राजनैतिक दलों ने किया। साधु संत भी कभी कभार इसका विरोध करके अपना कर्तव्य इति समझ रहे है। पत्रकार, बुद्धिजीवी व समाजसेवियों की अक्ल पर तो पत्थर ही पड गया। चंद लोग इन दिनों जंतर मंतर पर गो हत्या के खिलाफ आंदोलन चला रहे है। धरना दे रहे है। परन्तु पूरा भारतीय समाज व मीडिया को जिस प्रकार से इस मुद्दे पर शर्मनाक चुप्पी रखी है उससे लगता है देश में भारत ही मर चूका है केवल इंडिया बचा हुआ है।  प्रस्तुत है आपकी आंखे खोलने के लिए ये देश को कलंकित करने वाले आंकडे
TOP 10 CATTLE AND BEEF PRODUCING COUNTRIES[36]
CATTLE PRODUCTION (1000 Head)
Rank Country 2009 2010 %Chg
1 India 57,960 58,300 0.6%
2 Brazil           49,150 49,400                       0.5%
3 China 42,572          41,000 -3.7%
4 United States 35,819 35,300 -1.4%
5 EU-27 30,400 30,150 -0.8%
6 Argentina 12,300 13,200 7.3%
7 Australia 9,213 10,158 10.3%
8 Russia 7,010 6,970 -0.6%
9 Mexico 6,775 6,797 0.3%
10 Colombia 5,675 5,675 0.0%

BEEF PRODUCTION (1000 MT CWE)

Rank Country 2009 2010 %Chg
1 United States 11,889 11,789 -0.8%
2 Brazil 8,935 9,300 4.1%
3 EU-27 7,970 7,920 -0.6%
4 China 5,764 5,550 -3.7%
5 Argentina 3,400 2,800 -17.6%
6 India 2,610 2,760 5.7%
7 Australia 2,100 2,075 -1.2%
8 Mexico 1,700 1,735 2.1%
9 Russia 1,285 1,260 -1.9%
10 Pakistan 1,226 1,250 2.0%
[http://en.wikipedia.org/wiki/Beef)

जीवन है हरि मधु का प्याला

संयोग वियोग का खेल निराला, जिसने बनाया जीवन मधु का प्याला,
वो है हरि हर भगवान हमारे, हम हे उनकी सृष्टि के झिलमिल तारे।ं।
जन्म मृत्यु का सफर निराला, रोते है जो  इसका मर्म न जाने।
प्रभु की अदभूत माया है जीवन, आओ हंस कर जीयें ये जीवन ।।

देवसिंह रावत
(28 अप्रैल 2012 प्रातः 7 बज कर 44 मिनट)

Thursday, April 26, 2012



राज ठाकरे से मिल कर अण्णा ने किया जन भावनाओं का अपमान 


क्षेत्र के नाम पर महाराष्ट्र में उत्तर भारतीयों का दमन करने वाले राज ठाकरे से मिल कर अण्णा हजारे ने भ्रष्टाचार के खिलाफ संघर्ष करने वाले लाखों लोगों की भावनाओ से खिलवाड किया। देश की जनता चाहती है कि अण्णा हजारे अच्छा होता ऐसे लोगों से मिले ही नहीं, उनसे दूरी बनाये, परन्तु अगर भूल वश या परिस्थिति वश मिल भी गये तो उनको उनके कुकृत्यों के बारे में फटकार या नसीहत ही देनी चाहिए थी। ऐसा करने में अण्णा हजारे पूरी तरह असफल रहे । देश की जनता उनके इस कृत्य से निराश है। देश प्रेम की बात करने वाले अण्णा व उनकी टीम सहित तमाम लोगों को इस बात का भान होना चाहिए कि देश की एकता अखण्डता व सामाजिक तानाबाना को अपने संकीर्ण राजनीति के लिए तहस नहस करने वाले लोगों से मिल कर नहीं अपितु उनको अलग थलग करके ही देश का भला होगा। अण्णा हजारे को बाल ठाकरे द्वारा मिली नसीहत से प्रेरणा ले कर देश से माफी मांगनी चाहिए कि वे भविष्य में ऐसी कोई भूल नहीं करेंगे जिसके लिए देश का भाईचारा नष्ट करने वाले लोगों को मजबूती मिले व देश कमजोर हो।


धोनी को सांसद बनाने की मांग से प्रेरणा लेकर कांग्रेस ने बनाया सचिन को सांसद

‘झारखण्ड के नेताओं के धोनी को सांसद बनाओं ’भारतीय क्रिकेट टीम के विश्वविख्यात कप्तान महेन्द्र सिंह धोनी को सांसद बनाने की झारखण्डी नेताओं की मांग से प्रेरणा ले कर कांग्रेसी रणनीतिकारों ने विश्व क्रिकेट के मशीहा के रूप में विख्यात सचिन तेदुलकर को  250 सदस्यीय राज्य सभा का सदस्य मनोनीत कराया। 26 अप्रैल को भारतीय संविधान की धारा 80 के तहत राष्ट्रपति द्वारा खेल के क्षेत्र के महारथी सचिन तेंदुलकर, 4 दशकों से भारतीय सिनेमा जगत के अग्रणी अदाकारा रेखा व उद्यमी -समाजसेवी अनु आगा को मनोनीत राज्य सभा के सदस्य के रूप में मंजूरी प्रदान करा कर कांग्रेस ने  देशवासियों सहित सभी राजनेतिक दलों को अचम्भित कर दिया। भले ही झारखण्ड के नेता महेन्द्रसिंह धोनी को तो सांसद तो बना नहीं पाये, परन्तु ऐसा लगता है कि उनकी इस पहल से प्रेरणा ले कर कांग्रेस ने सचिन तेंदुलकर को राज्यसभा सदस्य मनोनीत करके बाजी ही मार ली। सचिन के खेल में भले इसका कोई प्रभाव पडे परन्तु राजनैतिक पार्टियों के लिए कांग्रेस के इस कदम का विरोध करने का साहस तक नहीं जुटा पा रहे है। परन्तु किसी धन पशुओं को बनाने के बजाय खेल व कलाकार के क्षेत्र के दो दिग्गजों को राज्य सभा में मनोनीत करा कर कांग्रेस ने बाजी ही मार ली। वेसे कई लोग मांग कर रहे हैं कि सचिन को सांसद नहीं भारत रत्न सरकार को प्रदान करना चाहिए।


भगवान बचाये उत्तराखण्ड को ऐसे समर्थकों से 
यह उत्तराखण्ड का दुर्भाग्य है कि एक तरफ सरकारें प्राकृतिक संसाधनों की भण्डार देवभूमि उत्तराखण्ड के जल, जमीन व जंगल तीनों को यहां पर सत्ता पर काबिज हुक्मरान अपने संकीर्ण निहित स्वार्थ के लिए विनाशकारी बडे बांधों से तबाह करने में तुली है वहीं दूसरी तरफ भूकम्प से संवेदनशील इस हिमालयी प्रदेश में कुछ तथाकथित बुद्धिजीवी, समाजसेवी व पत्रकार जो कल तक खुद टिहरी बांध जैसे बांधों का पुरजोर विरोध कर रहे थे, वे आज प्रदेश में जल विद्युत परियोजनाओं के नाम पर आनन फानन में बांध बनाये जाने का समर्थन कर रहे है। जबकी हकीकत यह है इस सीमान्त प्रदेश में ऊर्जा के नाम पर पूरी घाटी की घाटियां इन जल विद्युत परियोजनाओं के नाम पर डुबा कर बर्बाद करके प्रकृति से जहां खिलवाड़ कर महाविनाश का आमंत्रित किया जा रहा है, वहीं लाखों वृक्षों, करोड़ों जीवों की निर्मम जलसमाधि दे कर हत्या की जा रही है, इसी के साथ हजारों परिवारों को अपनी जड़ों से विस्थापित किया जा रहा है। प्रदेश को यहां के प्राकृतिक संसाधनों का दोहन का हक है परन्तु यहां की भौगोलिक व प्राकृतिक तथा सामाजिक तानाबाना को नष्ट करके ंकदापि नहीं। आज सरकार का इरादा अगर प्रदेश को केवल ऊर्जा प्राप्त करना रहता या जनकल्याण का रहता तो यहां पर किसी भी सूरत में बडे बांधों को बनाने की बात तक नहीं करते। वे यहां पर छोटे हाइड्रो बांध बनाते वह भी यहां के स्थानीय ग्रामीणों की सहभागिता से न की बाहर के माफिया टाइप के लोगों को इस सीमान्त प्रदेश में काबिज कर प्रदेश की शांति व्यवस्था व देश की सुरक्षा पर खतरा पैदा नहीं करते। जो विकास प्रदेश के विकास व देश की सुरक्षा को तबाह करे ऐसे विकास को किसी भी सूरत में हमारे देश व प्रदेश में कोई जगह नहीं होनी चाहिए।
मेरे लिए यह समझ से बाहर की बात है कि जो लोग अपने आप को उत्तराखण्ड के मान सम्मान व हक हकूकों के स्वयं भू ध्वजवाहक बनते हैं वे केसे मुजफरनगर काण्ड के अभियुक्तों को कानूनी संरक्षण देने वाले खलनायकों के हमदर्दो की स्तुतिगान व समर्थन कर रहे है। जिन लोगों के हाथ उत्तराखण्ड के खून से रंगे हों उनको अपने साथ रखने व उनको संरक्षण देने वाले के समर्थन में कैसे ये तथाकथित पत्रकार, समाजसेवी व बुद्धिजीवी खडे होने का शर्मनाक कृत्य कर रहे हे। जो लोग समाज की इस व्यवस्था के महत्वपूर्ण स्तम्भों को अपने कृत्यों से कलंकित कर चूके हैं उनका विरोध करना हर किसी जागरूक आदमी का प्रथम कर्तव्य होना चाहिए। जो लोग अपने निहित स्वार्थ के लिए इसके विपरित कार्य कर रहे हैं वे किसी भी सूरत में प्रदेश के हितैषी हो ही नहीं सकते।

जल विद्युत परियोजनाओ ंके नाम पर बडे बांध न बनायें मुख्यमंत्री बहुगुणा


उत्तराखण्ड के बुद्धिजीवियों, पत्रकारों सहित तमाम प्रबुद्ध लोगों को चाहिए कि जिस तेजी से मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा की सरकार प्रदेश के जल विद्युत ऊर्जा के नाम पर प्रदेश में बडी परियोजनाओं को संचालित करने के लिए दिन रात एक कर रही है उसका पुरजोर विरोध करे। ऐसा प्रतीत होता है कि निशंक सरकार की तरह ही  विजय बहुगुणा सरकार भी यहां की जल विद्युत परियोजना को बाहरी लोगों को देने का तानाबाना बुन रहे है।  उत्तराखण्ड की जनता को ऊर्जा का झुनझुना पकडाने के नाम पर यहां के जल, जंगल व जमीन को ओने पौने दामों पर राज्य गठन के बाद लुटाने का काम सरकारें करती रही है उस पर अविलम्ब अंकुश लगाया जाना चाहिए। विजय बहुगुणा सरकार बताये कि प्रदेश में प्रदेश की स्थाई राजधानी गैरसेंण, प्रदेश में निरंकुश व भ्रष्ट नौकरशाही पर अंकुश लगाना, मुजफरनगर काण्ड-94 के अभियुक्तों को दण्डित करने, प्रदेश में विकास की ठोस नीति बनाने आदि महत्वपूर्ण कार्यो को करने के बजाय केवल आनन फानन में जल विद्युत परियोजनाओं की ठोस नीति बनाये बिना इन परियोजनाओं को शुरू करने के लिए इतनी हायतौबा क्यों कर रहे हैं? गंगा यमुना की पावन अवतरण भूमि में गंगा की निर्मल व अविरल धारा को अवरूद्ध करना एक प्रकार से भारतीय संस्कृति व जीवन दर्शन से एक प्रकार का खिलवाड से कम नहीं है।
उत्तराखण्ड के हुक्मरानों को अब प्रदेश की प्रबुद्ध जनता सीधा सवाल करे कि वे दो टके के लिए उत्तराखण्ड को बांघ, बाघ और राष्ट्रीय पार्क व अभ्याहरण बना कर यहां के निवासियों व प्रदेश को उजाडना बंद करे। सीमान्त प्रदेश उत्तराखण्ड  जल विद्युत परियोजनाओं के नाम पर बडे बांघ बनाने के बजाय उत्तराखण्ड में स्थानीय ग्रामीणों व सरकार के सांझे प्रयास से छोटे हाईडो जल विद्युत परियोजनायें बनायी जाय। इससे प्रदेश का विनाश नहीं होगा, स्थानीय जनता को जहां विस्थापन नहीं अपितु रोजगार मिलेगा, वहीं इससे इस सीमान्त क्षेत्र में माफियाओं का शिकंजा नहीं जकडेगा।  परन्तु प्रदेश का दुर्भाग्य यह है कि यहां पर जो भी प्रदेश के मुख्यमंत्री बने या सरकार रही उन्होने यहां के दूरगामी विकास के लिए न तो ठोस शासन प्रशासन की दिशा तय की व नहीं इस दिशा में कोई पहल ईमानदारी से ही किया।



Wednesday, April 25, 2012


वाणी से नहीं कर्मो से पहचानों प्राणी को

मनुष्य को जीवन में मात्र प्रथम व्यवहार से मधुर व्यवहार करने वालों व कर्कश व्यवहार करने वालों के प्रति अच्छे व बुरे होने की धारना नहीं बनानी चाहिए अपितु उनके कर्मो को ध्यान में रखते हुए उनके प्रति धारणा बनानी चाहिए। सदैव ऐसी स्थिति भी नहीं रहती है। कई बार सामने अच्छे बोलने वाले मन के काले होते हैं और दो टूक व कडुवे बोलने वाले भी मन से साफ होते है। इसलिए केवल बोली पर नहीं अपितु उनके भाव व आचरण से ही किसी व्यक्ति की पहचान करनी चाहिएं। मीठा बोलने वाली कोयल को तत्वज्ञानी लोग अच्छी तरह से उसके कर्मो से भी जानते है। वहीं कर्कश बोलने वाला कौवा भी अपने अण्डो को नष्ट करके धूर्तता से अपने अण्डे कौअे के घोसले में रख देने वाली कोयल से भी सहज होता है। वह कोयल के अण्डों को भी अपने अण्डे समझ कर पालती है। -देवसिंह रावत

Tuesday, April 24, 2012



आओ  इस चमन को गुलजार करें

मिल कर बिछुड जाते हैं जो चंद दिनों में,
ऐसे दोस्तों को भी हम सदा याद करते हैं
तुम याद करो न करो इस राही को कभी,
हम तो खुदा की तरह तुम्हें भूल नहीं पाते।।
जिन्दगी नजर चुराने के लिए नहीं है साथी,
आओ  हंसी से इस चमन को गुलजार करें।
फिर ये पल इस जीवन में कभी रहे न रहे
आओ हर पल को जिंदादिली से जीयें साथी
फिर ये जीवन के हसीन पल रहे या न रहे।
हर किसी के खुशी में मुस्कराये हम साथी।।

-देवसिंह रावत

जहां सत्य, धर्म पर चलने वाले भी
अन्यायी को पोषण करते हैं
वही भीष्म, कर्ण, द्रोणाचार्य जेसे भी
कुरूक्षेत्र में मरते रहते है।।

-देवसिंह रावत


चार धाम यात्रा के शुभारंभ पर आप सभी को हार्दिक बधाई 


24 अप्रैल को गंगोत्री व यमुनोत्री के पावन कपाट के खुलने के साथ ही उत्तराखण्ड में हिन्दु धर्म के विश्वविख्यात चार धाम यात्रा का शुभारंभ विधिवत शुरू हो गया। हिन्दुओं के सर्वोच्च धामों में शीर्ष बदरी केदार नाथ धाम के कपाट भी इसी सप्ताह खुलेगे। भगवान शिव के परमदिव्य स्वरूप भगवान केदारनाथ धाम के कपाट 28 अप्रैल को व भगवान विष्णु के साक्षात स्वरूप श्री भगवान बदरीनाथ धाम के कपाट 29 अप्रैल को खुलेंगे। इस अवसर पर पूरे विश्व के लाखों लोग बेसब्री से इस पावन धाम की यात्रा करके अपना जीवन धन्य करेंगे।


भगवान ने तो इंसान बनाया, हम धर्म व देश में बंट गये
दो दिन के जीवन मे हम जात पात रंग भेद में मिट गये। 

-देवसिंह रावत


गंगोत्री से विधानसभा चुनाव लड सकते हैं बहुगुणा

देहरादून (प्याउ)। प्रदेश के मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा कहां से विधानसभा चुनाव लडेंगे। इस पर पूरे प्रदेश के राजनेताओं की टकटकी लगी हुई है। पक्ष व विपक्ष उनके इसी निर्णय के आधार पर अपनी राजनीति की भावी कदम उठाने के लिए रणनीति का तानाबाना बुन रहे है। सुत्रों के अनुसार वे पहले सहजपुर सीट से चुनाव मैदान में उतरने का मन बना रहे थे परन्तु वहां की वर्तमान राजनैतिक स्थिति अनुकुल न होने से उन्होंने अपना पूरा ध्यान सीमान्त जनपद उत्तरकाशी के गंगोत्री विधानसभा पर लगा दिया है। इसके लिए वे वहां पर अपनी स्थिति अनकुल बनाने के लिए विकास की कई महत्वपूर्ण घोषणायें भी कर रहे हैं व करने वाले है। इसी दिशा में बहुगुणा सरकार ने  यमुनोत्री घाटी की तरह गंगोत्री क्षेत्र को भी ओबीसी की श्रेणी में सूचिबद्ध करने का महत्वपूर्ण निर्णय लेने का भी मन बना लिया हे। इसके साथ जिस प्रकार से विजय बहुगुणा लुहारी नागपाला आदि जल विद्युत  परियोजनाओं को फिर से शुरू करने जैसे कदम उठाने की रणनीति बना ली है उससे साफ है कि वे हर हाल में  गंगोत्री घाटी की जनता का दिल जीतना चाहते है।  सीमान्त जनपद उत्तरकाशी  के गंगोत्री विधानसभा क्षेत्र से प्रदेश के मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा के विधानसभा चुनाव में उतरने की अटकले लगाये के बीच प्रदेश की बहुगुणा सरकार ने उत्तरकाशी जिले के यमुनोत्री धाम मार्ग पर स्थित चिन्यालीसौड़ विकासखण्ड के तहत चिन्यालीसौड़ को नगर पंचायत का दर्जा देने की अधिसूचना जारी करवा कर पूरे जनपद में अपने लिए अनकुल माहोल बना रहे है। हालांकि यह क्षेत्र सीधे गंगोत्री विधानसभा सीट मे ंनहीं आता फिर भी आसपास के क्षेत्र में भी विजय बहुगुणा अपने लिए अनकुल माहौल बनाने में जुटे हुए है।   प्रदेश शासन की ओर से अपर सचिव शहरी विकास राधिका झा ने इस बाबत अधिसूचना जारी कर दी है।  नगर पंचायत चिन्यालीसौड़ में बड़ेथी (बिष्ट) ग्राम पंचायत के राजस्व ग्राम का पूरा बड़ेथी ग्राम, ग्राम पंचायत नागणी बड़ी के नागणी बड़ी राजस्व ग्राम के नागणी बड़ी व धनपुर ग्राम और चिन्याली ग्राम पंचायत को शामिल किया गया है। गौरतलब है कि चिन्यालीसौड़ को नगर पंचायत बनाने की मांग लम्बे समय से की जा रही थी। सरकार के इस कदम से जहां इस मांग से जुड़े समाजसेवियों में खुशी की लहर फेल गयी।
गंगोत्री क्षेत्र विजय बहुगुणा के लिए अन्य क्षेत्रों से काफी सुरक्षित महसूस हो रहा है। वहीं सीमान्त जनपद के निवासी व देश के अग्रणी पत्रकार विजेन्द्र रावत के अनुसार अगर विजय बहुगुणा गंगोत्री क्षेत्र को ओबीसी  क्षेत्र यमुनोत्री की तरह बना देते हैं तो यह क्षेत्र उनके लिए काफी सुरक्षित होगा। हालांकि इसके बाबजूद विजय बहुगुणा के समर्थक उनको पर्वतीय क्षेत्र से चुनाव लडने का जोखिम न लेने की सलाह दे रहे है। उनको आशंका है कि वे भी इन क्षेत्रों में खंडूडी की तरह हार का मुह देख सकते हे। इसलिए उनको देहरादून को छोड कर कहीं दूसरी जगह चुनाव न लडने की सलाह दे रहे है।


शस्त्र से ही नहीं अपितु मजबूत नेतृत्व से महान बनेगा भारत

-भारत के अग्नि-5 मिसाइल का सफल परीक्षण से 

जैसे ही भारत ने 19 अप्रैल 2012 की प्रातः 8 बज कर 05 मिनट पर ओडिशा के व्हीलर द्वीप से अपने  अंतरमहाद्वीपीय बैलिस्टिक मिसाइल अग्नि-5 का  सफल परीक्षण किया है. तो देश गर्व से झूम गया। किसी सफलता पर गर्वित होने का सभी को हक हैं परन्तु हकीकत को भुला कर सामने खडे खतरनाक स्थिति को नजरांदाज करना किसी के लिए हितकर नहीं है। आज भारत चारों तरफ से न केवल अमेरिका, चीन व पाक जैसे विदेशी दुश्मनों से घिरा हुआ है अपितु स्वयं भारत अपने अंदर देश को भ्रष्टाचार व कुशासन से निरंतर कमजोर कर रहे हुक्मरानों, नौकरशाहों व माफियाओं के शिकंजे में पूरी तरह फंस गया हे। देश की वर्तमान हालत इतनी शर्मनाक है कि जिस दिन पूरा देश अग्नि मिसाइल-5 के सफल परीक्षण का गर्वोक्ति में फूले नहीं समा रहा था उसी दिन देश मे ंशासन प्रशासन की मजबूत कड़ी समझी जाने वाले जिलाधिकारी को यहां के नक्सली बंधक बना कर अपहरण कर चूके थे। हमारी विशाल पुलिस व सुरक्षा तंत्र देश के एक तिहाई क्षेत्र में अपना प्रभाव बढ़ा चूके नक्सलियों के आगे विवश व नपुंसक नजर आ रही है। वहीं देश की सरकारें कितनी बौनी व असहाय तथा खुदगर्ज है कि न्यायपालिका द्वारा भारत की सर्वोच्च संस्था संसद पर हमले के दोषी को वर्षो पहले फांसी की सजा दिये जाने के बाबजूद यहां की सरकार की इतनी हिम्मत व देशभक्ति नहीं रही कि वे इस देश के दुश्मन को फांसी की सजा दे सके। आज चारों तरफ देश में आतंक से अधिक खतरनाक यहां के भ्रष्ट नौकरशाह, नेता व उद्यमियों का भ्रष्ट गिरोह देश के अस्तित्व पर ग्रहण लगा रहा है।
हालांकि अग्नि मिसाइल-5 के सफल परीक्षण के साथ ही भारत, अमेरिका, रूस, फ्रांस और चीन के साथ उन चुनिंदा देशों के समूह में शामिल हो गया है जिनके पास आईसीबीएम की क्षमता है। इस मिसाइल के सफल प्रक्षेपण से भारत ने पेइचिंग सहित चीन, पूर्वी यूरोप, पूर्वी अफ्रीका और ऑस्ट्रेलियाई तट के लक्ष्यों को निशाना बनाने की क्षमता हासिल कर ली है। अग्नि -5 मिसाइल की ताकत की बदोलत भारत अमेरिका को छोड़ कर सारे संसार के देशों को अपने ही देश से अग्नि मिसाइल दाग कर अपने लक्ष्य को तबाह कर सकता है।  हालांकि चीन के विशेषज्ञों ने इसकी मारक क्षमता 8000 किमी तक माना। ेपरन्तु आज जिस प्रकार से देश की पूरी सीमा ही नहीं संसद तक आतंकियों ने अपने हमलों का निशाना बना दिया है। उस के बाबजूद देश का नेतृत्व देश की स्थिति में आमूल सुधार लाने के बजाय अपनी पदलोलुपु राजनीति में ही लिप्त हो कर देश को भ्रष्टाचार व कुशासन के रसातल में धकेल रहे है। स्थिति कितनी विकट है। चीन सीमा पर रेल व सडक का जाल बिछा चूका है। वह कभी भी भारत को अपने आगोश में ले सकता है। परन्तु भारत सरकार न तो सीमान्त प्रदेशों में रेल का युद्ध स्तर पर जाल बिछा रही है व नहीं मोटर मार्गो का ही सुध ले रही है। ऐसी स्थिति में देश की रक्षा कैसे होगी। पाकिस्तान व अमेरिका तथा चीन के तिकोने षडयंत्र का कैसे जवाब देगा भारत यह प्रश्न आज भी देशवासियों को उद्देल्लित कर रहा है। सीमान्त प्रदेश उत्तराखण्ड में मजबूत सरकार के बजाय वहां पर थोपे हुए नेतृत्व से प्रदेश में असंतोष बढ़ाने का कृत्य किया जा रहा है। जबकि उत्तराखण्ड में ही चीन के साथ 11 ऐसे संवेदनशील स्थान है जहां से चीन कभी भी भारत को 1962 की तरह अपना निशाना बना सकता है। चीन की लाल सेना उत्तराखण्ड के 11 स्थानों पर नजर गढ़ाये हुए है। ये स्थान है। 1. मुलिंग ला (उत्तरकाशी) 2. माणा पास (चमोली) 3. नीति पास (चमोली) 4. टुंजुला (चमोली) 5. मरफीला (चमोली) 6. सलसल ला (चमोली) 7. बल्च्याधुरा (पिथौरागढ़) 8. कुंगली बिली (पिथौरागढ़) 9. खटिया सूपना (पिथौरागढ़) 10. मन्साधूरा (पिथौरागढ़) 11. लिपूलेख (पिथौरागढ़) ।
भारत इसके साथ ही भारत उन चुनिंदा देशों की सूची में शामिल हो गया है जिनके पास अंतरमहाद्वीपीय बैलिस्टिक मिसाइल है।
इससे पहले बुधवार को इसका परीक्षण होना था लेकिन देर शाम बताया गया कि खराब मौसम के चलते परीक्षण टाला जा
रहा है।
विशेषज्ञों का कहना है कि 5000 किलोमीटर की मारक क्षमता वाली ये मिसाइल परमाणु क्षमता से लैस है।
इसका अर्थ ये है कि ये मिसाइल पाकिस्तान के अलावा पड़ोसी देश चीन के सभी हिस्सों तक पहुँचने की क्षमता रखती है.
इसके बाद भारत उन देशों की सूची शामिल हो जाएगा जिसके पास अंतरद्वीपीय बैलिस्टिक मिसाइल की क्षमता है। गौरतलब है कि अग्नि-5 को रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (डीआरडीओ) ने तैयार किया है। इस मिसाइल की कुल लंबाई 17.5 मीटर है और ये करीब 49 टन वजनी है.
भारतीय रक्षा अनुसंधान संस्थान के वैज्ञानिकों के अनुसार सन् 2010 में अग्नि 3 के सफल प्रक्षेपण और उसके बाद 2011 में अग्नि 4 के सफल प्रक्षेपण के बाद उसी डिजाइन को अग्नि 5 के लिए विकसित किया गया है। भारत की इंडरमीडियेट रेंज बैलिस्टिक मिसाइलों में अग्नि 1, अग्नि 2 और अग्नि 3 शामिल है जिनकी मारक क्षमता 700-800 किलोमीटर, 2000-2300 किलोमीटर और 3500 किलोमीटर से ज्यादा है।
इससे साफ हो गया कि देश को मजबूत करने के लिए भले ही अस्त शस्त्रों का महत्वपूर्ण योगदान होता है परन्तु उससे अधिक जरूरी किसी भी देश को मजबूत बनने के लिए कुशल नेतृत्व की जरूरत होती है। कुशल नेतृत्व के अभाव में सारा तंत्र व सामरिक हथियार व मजबूत अर्थव्यवस्था भी सोवियत संघ जैसे विश्व महाशक्ति का दर्जा हासिल देश भी रेत के महल की तरह तहस नहस हो जाता है।
भारत में आपार संसाधन, वैज्ञानिक व समारिक क्षमता के बाबजूद आज देश पूरे विश्व में उपहास का केन्द्र बना हुआ है तो यहां के नपुंसक आत्मघाती नेतृत्व के कारण। यहां पर जाति, क्षेत्र, धर्म व लिंग की संकीर्ण राजनीति यहां की प्रतिभा का गला घोंट देती है। हमारे जवान, वैज्ञानिक देश को महान बनाने में जुटा हुआ है परन्तु हमारा आत्मघाती नेतृत्व व भ्रष्ट तंत्र देश को पतन के गर्त में धकेल रहा है। ऐसे में आज देश को मनमोहन जैसे पदलोलुपु अमेरिकी भक्त की नहीं अपितु जरूरत है डा अब्दुल कलाम जैसे देशभक्त नेतृत्व की जो देश को मजबूत बना कर विश्व में उसका गौरव पुन्न प्रदान कर सकता है। शेष श्रीकृष्ण कृपा। हरि ओम तत्सत्। श्रीकृष्णाय् नमो।

Sunday, April 22, 2012



पेशावर काण्ड दिवस के महानायक चन्द्रसिंह गढवाली व साथियों को शतः शतः नमन्

23 अप्रैल पेशावर काण्ड दिवस पर इस काण्ड के महानायक वीर चन्द्रसिंह गढ़वाली व उनके 72 सैनिक साथियों की माॅं भारती की शान की रक्षा के लिए पूरी मानवता का शत् शत प्रणाण।
जालिम फिरंगी हुकुमत के दोरान 23 अप्रैल 1930 को  पेशावर के किस्साखानी बाजार के काबुली फाटक पर आंदोलन कर रहे अब्दुल गफार खाॅं के नेतृत्व में आंदोलन कर रहे खुदाई सिदमतगार सत्याग्रहियों पर अंग्रेजी कमांडर कैप्टन रिकेट द्वारा गढ़वाली के नेतृत्व वाले 2/13 राॅयल गढ़वाल रायफल को दिये गये गोली चलाने  के आदेश को मानने से मना करने से फिरंगी हुकुमत की चूले हिल गयी थी। भारतीय आजादी की जंग के इस ऐतिहासिक घटना ने फिरंगी हुकुमत की चूले हिला दी। 1857 के बाद यह फिरंगी हुकुमत के खिलाफ भारतीय सैनिकों का सबसे बड़ा विद्रोह के रूप में देखा गया। फिरंगी हुकुमत ने सभी महानायकों को उसी समय गिरफतार करके उन पर देशद्रोह का मुकदमा चलाया। माॅं भारती के लाल महानायक चन्द्रसिंह गढ़वाली को इस विद्रोह के लिए जहां आजीवन उम्रकेद की सजा हुई वहीं उनके 16 सैनिक साथियों को दस-दस साल की सजा मिली। वीर चन्द्रसिंह गढ़वाली के नेतृत्व में हुए इस विद्रोह से भारतीय आजादी की जंग में नई दिशा मिली। गांधी व उनके अनुयायियों को ही नहीं क्रांतिकारियों में भी पेशावर काण्ड ने नया जोश पेदा कर दिया। पौड़ी गढ़वाल के मासी-सैणीसेरा गांव के एक गरीब भण्डारी परिवार ने जन्म लेने वाले चंद्र सिंह गढ़वाली अपने क्रांतिकारी सिद्धांतो के पक्के थे, आजादी के बाद नेहरू जी उनको केन्द्रीय सरकार में महत्वपूर्ण पद पर आसीन करना चाहते थे परन्तु कम्युनिस्ट विचारों के कट्टर समर्थक रहे महानायक गढ़वाली जी ने न केवल नेहरू जी का यह अनुरोध ठुकरा दिया अपितु उन्होंने अन्य सुविधायें लेने से से मना कर दिया। यही नहीं अपने अंतिम समय में इलाज करने के तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के अनुरोध व सहायता को भी उन्होंने बहुत ही दृढ़ता से ठुकरा दिया। सबसे शर्मनाक बात यह हे कि देश की आजादी व सम्मान के लिए अपना व अपने साथियों का पूरा जीवन दाव पर लगाने वाले ऐसे क्रांतिकारी महानायक को भी उत्तराखण्ड की जनता नहीं पहचान पायी और उनको चुनाव में विजयी करने का दायित्व भी नहीं निभा पायी।



-अगर सांई बाबा आज के दिन होते तो क्या लोग निर्मल बाबा की तरह ही उन पर अंधविश्वास फेलाने आदि आरोप लगा कर अंगुलियां उठाते ?




-क्या देश के नागरिक निर्मल बाबा के भक्तों की तरह सत्तासीन राजनैतिक दलों पर वादे खिलाफी या ठगी का मामला दर्ज करने का काम कर सकते हैं क्योंकि अधिकांश राजनैतिक दल अपने घोषणा पत्र में किये गये वायदों को पूरा ही नहीं करते?



-सरकारी बैठकों का रिकार्डिग सार्वजनिक करने की मांग करने वाली टीम अण्णा ने खुद को किया बेनकाब  
-अण्णा के वचनों की रक्षा तक नहीं कर पायी टीम अण्णा 
टीम अण्णा ने 22 अप्रैल की बैठक में देश के सम्मुख खुद ही बेनकाब कर दिया। एक तरफ पूरा देश चाहता है कि भ्रष्टाचार के खिलाफ पूरे देश को आंदोलित करने वाले बाबा रामदेव व अण्णा हजारे अलग अलग अपनी ढपली न बजा कर एकजूट हो कर सांझा आंदोलन करे। परन्तु अण्णा की इस मामले में बाबा रामदेव से हुई सहमति के बाबजूद 22 अप्रैल को हुई टीम अण्णा ने बाबा रामदेव के साथ सांझा आंदोलन न चलाने की बात कह कर पूरे देश की उस जनता की आशाओं पर कुठाराघात कर दिया जो चाहते थे कि अण्णा हजारे व बाबा रामदेव दोनों मिल कर भ्रष्टाचार के खिलाफ मजबूत आंदोलन छेड़ कर देश को इससे मुक्ति प्रदान करे।  वहीं दूसरी तरफ जो टीम अण्णा सरकार से हो रही वार्ता का रिकार्ड कराकर सार्वजनिक करने की पुरजोर मांग कर खुद को लोकशाही का झण्डाबरदार बता रहा था वहीं टीम अण्णा इसी प्रकार की रिकार्डिग अपनी मीटिंग की करने का आरोप लगा कर बहुत ही बेशर्मी से अपने ही टीम के एक सदस्य मुफ्ती शमीन काजमी को टीम से बाहर करने की बात पूरे देश की मीडिया के सामने चिल्ला चिल्ला कर कह रहे थे। टीम अण्णा के झण्डेबरदार भूल गये कि चंद माह पहले उन्होंने भारत सरकार के साथ अपनी कमेटी की बैठकों की रिकार्डिंग करने की मांग पर कितना हायतोब्बा मचाया था, अब जब उनकी खुद की बैठक की रिकार्डिग अगर कोई सदस्य कर भी रहा था तो उन्होंने क्यों इतना हायतौबा मचाया कि अपनी टीम से उस सदस्य को निकाल दिया। क्या देश को यह जानने का हक नहीं कि टीम अण्णा के सदस्य क्यो सोचते हैं व देश से भ्रष्टाचार मिटाने के लिए अण्णा व रामदेव दोनों द्वारा सांझे रूप से आंदोलन चलाने की सहमति पर क्या विचार प्रकट कर रहे है। असल में टीम अण्णा को अपनी असलियत की पोल खुलने के भय से रिकार्डिग का भूत सता रहा है। टीम अण्णा के सदस्यों में इतनी भी नैतिकता नहीं रही कि वे अपनी ही बचनों की लाज रख सके, जिसको पूरा करने की वे मांग सरकार या दूसरों से करते हैं, उसका खुद पालन करने पर वे क्यों आग बबुला हो रहे है। हकीकत तो यह है कि टीम अण्णा की नैतिकता उसी समय बेनकाब हो गयी थी जब टीम अण्णा में प्रशान्त भूषण व शांति भूषण दोनों ही सदस्य के रूप में रखे गये। इसके साथ ही प्रशांत भूषण के कश्मीर वाले विवादस्थ बयान पर टीम अण्णा को सांप सुंध गया था।
ऐसी टीम अण्णा जो अपने ही वचनों की रक्षा नहीं कर पाती है और जो अपने टीम के प्रमुख अण्णा द्वारा स्वामी रामदेव के साथ एकजूट हो कर सांझा आंदोलन चलाने के वचन की रक्षा नहीं कर पाता है तो वह देश की सवा अरब जनता के हितों की रक्षा क्या कर पायेगा। सच यह है टीम अण्णा के सदस्यों की चैधराहट के लिए देशवासियों का सांझा संघर्ष चलाने की इच्छा का सम्मान क्या करेंगे। टीम अण्णा के इस नजरिये से अगर किसी को फायदा हुआ तो वह भ्रष्टाचारियों व उसको संरक्षण देने वाले मनमोहन सिंह की सरकार को ।

भ्रष्टाचार के खिलाफ जंग में कल कहीं अकेल न रह जायें अण्णा हजारे 
बाबा रामदेव व अण्णा हजारे के सांझा आंदोलन न होने से मनमोहन सरकार ने राहत की सांस 


जिस प्रकार से आज टीम अण्णा से  टीम के वरिष्ठ सदस्य मौलाना मुफ्ती शमीन काजमी ने टीम अण्णा की कार्यप्रणाली से खिन्न हो कर टीम अण्णा से अपना नाता तोड़ दिया। वहीं टीम अण्णा ने अपनी बैठकों की मोबाइल फोन से गुप्त क्लीपिंग बनाने का आरोप मुफ्ती शमीन काजमी पर लगाते हुए, उनको टीम से बाहर करने का ऐलान किया। टीम अण्णा के मुताबिक मुफ्ती शमीन काजमी को भी टीम अण्णा के पूर्व सदस्य स्वामी अग्निवेश की तरह टीम की जासूसी के आरोप के कारण बाहर किया गया। टीम अण्णा इस बात से भी जिस प्रकार से भ्रष्टाचार के खिलाफ राष्ट्र व्यापी आंदोलन करने वाले स्वामी रामदेव से दूरी बनाने में जिस प्रकार लगी हुई है उससे लगता है कि टीम अण्णा में असुरक्षा का भय सता रहा है कि कहीं बाबा रामदेव अपने विशाल नेटवर्क व लाखों समर्थकों के होते हुए टीम अण्णा को अपने आगोश में तो न ले ले। सुत्रों के अनुसार 3 जून को दिल्ली में होने वाले बाबा रामदेव के प्रचण्ड जनांदोलन में अण्णा हजारे ने भाग लेने की सहमति दी तथा लोगों में ऐसा संदेश दिया गया कि बाबा रामदेव व अण्णा हजारे दोनों मिल कर अब भ्रष्टाचार के खिलाफ जनांदोलन का संयुक्त रूप से मार्गदर्शन करेंगे। इससे शायद टीम अण्णा के बाकी सदस्यों को अपना अस्तित्व का खतरा महसूस होने लगा, क्योंकि बाबा रामदेव के साथ आंदोलन में टीम अण्णा के बाकी सदस्यों को ऐसी वरियता नहीं मिलेगी। शायद इसी कारण टीम अण्णा  ने बहाना बना कर सांझा आंदोलन करने के बजाय अपनी डफली अलग अलग बजाने में श्रेयकर समझा। दोनों में संयुक्त रूप से आंदोलन करने की घोषणा से जहां सरकार के हाथ पांव फूल गये थे वहीं देश के तमाम भ्रष्टाचार के खिलाफ संघर्ष करने वालों को नयी ऊर्जा का संचार हो गया था। इस आशा की किरण को टीम अण्णा के सदस्यों ने अपने अस्तित्व के लिए अलग अलग आंदोलन चलाने की ढपली बना कर एक प्रकार से बुझा दिया है। इसके लिए भावी इतिहास अवश्य टीम अण्णा को कटघरे में रखेगा। टीम अण्णा के कई कदमों व बयानों से जनविश्वास पर एक प्रकार से कुठाराघात करने का काम किया है। प्रशान्त भूषण का कश्मीर विवाद वाला बयान हो या टीम अण्णा का उत्तराखण्ड के पूर्व मुख्यमंत्री खंडूडी के कमजोर लोकपाल विधेयक की सराहना करना आदि प्रकरण से लोगों का भले ही अण्णा हजारे से विश्वास कम न हुआ हो परन्तु टीम अण्णा से जरूर कम हो गया है।
टीम अण्णा के अहं के कारण ही बाबा रामदेव व अण्णा हजारे के बीच दूरियां बढ़ी। अण्णा हजारे जिनको बाबा रामदेव में रामलीला मैदान के अपने आंदोलन में प्रमुखता से स्थान दिया, कुछ माह बाद ही टीम अण्णा के अहंकार के कारण बाबा रामदेव के साथ मंच सांझा न करने जैसे दंभपूर्ण बयान दे कर टीम अण्णा ने देश की जनता की भ्रष्टाचार के खिलाफ निर्णायक संघर्ष करने की आश पर एक प्रकार से बज्रपात ही किया। बाबा रामदेव व अण्णा अगर दोनों साथ आंदोलन करते तो न तो बाबा रामदेव का रामलीला मैदान में हुई त्रासदी का समाना करना पड़ता व नहीं अण्णा हजारे के आंदोलन से जनता का मोह भंग होने जेसी स्थिति का समाना करना पडता। अगर आज मीडिया का प्रचण्ड सहयोग न हो तो टीम अण्णा के आंदोलन में अब जो लोग रामलीला मैदान में पहली बार तिहाड़ से वापस आने के बाद जुडे थे उसका 10 अंश भी नहीं जुड़ता।
जिस प्रकार से टीम अण्णा के चंद सदस्य अपनी चैधराहट के खातिर बाबा रामदेव व अण्णा हजारे के साथ मिल कर सांझा आंदोलन चलाने से कतरा रहे है। इससे उन लोगों को गहरा आघात लगा जिनको विश्वास है कि अगर बाबा रामदेव व अण्णा मिल कर सांझा आंदोलन करते तो पूरा देश उनके आंदोलन में कूद जाता, इससे सरकार व सभी राजनैतिक दल विवश हो जाते जनता की इच्छा के अनुसार भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने के लिए। अब टीम अण्णा की हटधर्मिता के कारण लोगों को आशंका है कि टीम अण्णा के लोग अपनी चैधराहट के लिए एक दूसरे को अग्निवेश व काजमी की तरह आरोप प्रत्यारोप लगा कर बाहर करने में लगे रहेंगे और एक दिन इस टीम अण्णा में केवल अण्णा हजारे ही रह जायेगे।  दोनो ंके सांझा आंदोलन न होने की खबर से मनमोहन सरकार ने राहत की सांस ली वहीं देश के लोगों में गहरी निराशा छा गयी।

Saturday, April 21, 2012



खुद को खुदा समझते है लोग,
खुदा की मेहर से भी खुद को खुदा समझते है लोग,
जरा सी दौलत मिले तो आसमां पर उडते है लोग
शौहरत मिले तो औकात भी अपनी भूल जाते हैं लोग
अपनो की दुआ के फूल को भी पत्थर समझते हैं लोग
नादान ही नहीं बदनसीब हैं जो खुदगर्ज बने हैं लोग
दो दिन के इस सफर में जो नफरत फेलाते हैं लोग
देवसिंह रावत
(रविवार 22 अप्रैल 2012 प्रातः 8.17 बजे)


-सेक्सुअल फ्रिडम के लिए उमडी मीडिया और गो हत्या बंदी आंदोलन को किया नजरांदाज
-चोथे स्तम्भ का चेहरा बेनकाब


21 अप्रैल 2012 को संसद की चैखट राष्ट्रीय धरना स्थल जंतर मंतर पर सेक्सुअल फ्रिडम यानी योन स्वतंत्रता नामक आंदोलन ने  देश के चोथे स्तम्भ होने का दंभ भरने वाली मीडिया को पूरी तरह से बेनकाब ही कर दिया। इस कार्यक्रम के लिए भारतीय मीडिया में जिस प्रकार की उत्सुकता गत सप्ताह शनिवार से आज तक देखने को मिली, वह बेताबी ही भारतीय मीडिया को पूरी तरह से बेनकाब कर गयी।  जहां पर देश विदेश का मीडिया दो नाबालिक बच्चों को भारतीय संस्कृति का दुहाई देने वाले बेनर को थामे चार आदमी ही खडे थे। देश का मीडिया उस व्यक्ति के फोटों लेने के लिए एक प्रकार से उमड रहे थे। उसी स्थान से 5 मीटर की दूरी पर भारत में हो रही गो हत्या पर अंकुश लगाने की मांग को लेकर आंदोलन कर रहे साधु व उनके चार समर्थक बैठे हुए थे। यहां पर देश की स्वनाम धन्य मीडिया जो सेक्सुअल फ्रिडम वाले आंदोलनकारी पर सम्मोहित थी। वहीं वे गो हत्या पर अंकुश लगाने की मांग को लेकर कई दिनों से आंदोलन कर रहे हरियाणा के साधु व उनके साथियों की तरफ एक हिराकत भरी दृष्टि डाल कर नजरांदाज कर रहे थे।
हुआ यों कि पश्चिमी उन्मुक्त सेक्स सम्बंधों की स्वतंत्रता से प्रभावित हो कर भारत में भी इसी प्रकार की उन्मुक्तता की इजाजत देने की मांग को लेकर एक संगठन कई महिनों से विशाल प्रदर्शन करने का प्रचार कर रहा था। गत सप्ताह शनिवार को इस व्यक्ति की रेली को इस लिए इजाजत नहीं दी गयी कि उसका विरोध गोविन्दाचार्य व उनके संगठन ने किया। इसी आधार पर शासन ने इस रेली के आयोजन की ही इजाजत नहीं दी। इसके बाद 21 अप्रैल यानी शनिवार को इस प्रदर्शन का ऐलान किया गया। इसमें प्रचार किया गया कि दिल्ली की योनकर्मी व इस मांग का समर्थन करने वाले लोग भी बड़ी संख्या में इस प्रदर्शन में भाग लेंगे। इस प्रदर्शन की मीडिया ही नहीं आम लोग भी बड़ी उत्सुकता से इंतजारी कर रहे थे।  परन्तु गत सप्ताह की भांति इस सप्ताह भी आयोजक न तो दिल्ली पुलिस की अनुमति ही हासिल कर पाया व नहीं वह इस तथाकथित प्रदर्शन में अपने समर्थकों को ही जंतर मंतर तक ला पाया। आयोजक द्वारा इन दो सप्ताह में दो बार कार्यक्रम का आयोजन न किये जाने पर मीडियाकर्मी काफी परेशान व नाराज से लगे। परन्तु इनमें से किसी को भी राष्ट्रीय धरना स्थल पर कई दिनों से चल रहे गो हत्या पर अंकुश लगाने वाला आंदोलन हो या अपने को जीवित व्यक्ति घोषित करने के लिए महिनों से धरना दे रहे उप्र के संतोष कुमार की गुहार हो या 1995 से न्याय के लिए यायावरों की तरह जंतर मंतर के आसपास भटक रहे गुजरात की महिला अध्यापिका व उनके पति का वर्षो पुराना संघर्ष भी मीडिया को कहीं दूर-दूर तक दिखाई नहीं दिया। न तो उनको अपनी सामाजिक दायित्व का भान हुआ व नहीं उनको इंसानियत ही द्रवित कर पायी। उनको तो केवल 21 अप्रैल को सेक्सुअल फ्रिडम वालों को देखने की चाह थी। भारतीय मीडिया की भरमार देख कर जंतर मंतर पर लोग टिप्पणी कर रहे थे कि जनहित के कार्यक्रमों में लाख बुलाने के बाद भी मीडिया बहुत ही मुश्किल से एक दो मिनट के लिए वहां पर पधारते है। अधिकांश तो ये लोग आते ही नहीं। आते भी हैं तो ऐसे आते हैं जैसे इन्होंने कितना बड़ा अहसान कर दिया हो। वहीं दूसरी तरफ सेक्सुअल फ्रिडम वाले कार्यक्रम के लिए दोहपर बारह से 1 बजे तक अधिकांश मीडिया यहां पर बेशब्री से इतजार  कर रहे थे।

-दुग्ध उत्पादको का शोषण कर रहे दुग्ध बिचोलियों के काले कारोबार को खुला संरक्षण क्यों
-हर माह दूध के बढ़ते दाम पर कांग्रेस-भाजपा की शर्मनाक चुप्पी


नई दिल्ली(प्याउ)। हर माह दुग्ध की कीमतों में बढ़ोतरी करके देश की जनता को ही नहीं अपितु दुग्ध उत्पादकों का शोषण करने वाले दुग्ध कम्पनियों  के खिलाफ आखिरकार दुग्ध उत्पादकों ने 21 अप्रैल को देशव्यापी आंदोलन का शंखनाद ससंद पर प्रदर्शन करके  किया। सैकडों की संख्या में हजारों लीटर दुग्ध के साथ राष्ट्रीय धरना स्थल जंतर मंतर पर पंहुचे आक्रोशित देश के दुग्ध उत्पादकों ने सरकार व राजनैतिक दलों पर इन बिचोलियों की खुली लूट पर मूक रहने की कड़ी भत्र्सना की। दुग्ध उत्पादकों ने मांग की कि सरकार दुग्ध का मूल्य इन बिचोलियों के रहमोंकरम पर न छोड़ कर आम जनता व उत्पादकों के हितों की रक्षा के लिए खुद ही निर्धारित करे।
दुग्ध उत्पादक किसानों का यह भी आरोप था कि दुग्ध व्यापार मे ंलगे बिचोलिये जहां किसानों से 12 से 24 रूपये प्रति लीटर दुग्ध खरीद कर 40 रूपये प्रति लीटर बेच रही है।  वे न तो ये बिचोलिये दुग्ध कम्पनियां, किसानों को उनके दुग्ध का पिछला बकाया ही चूकता कर रहे हैं व नहीं उनको बढ़े रहे मूल्य का ही कुछ लाभ ही प्रदान करते है। किसानों ने दुग्ध बिचोलियों की खूली लूट  पर सरकार व राजनैतिक दलों की शर्मनाक चुप्पी के विरोध में जंतर मंतर पर हजारों लीटर दुग्ध ही होली खेल कर अपना आक्रोश प्रकट किया।
इस अवसर पर दुग्ध उत्पादकों ने दुग्ध व्यवसाय में लगे बिचोलियों व उनकी दुग्ध कम्पनी पर दुग्ध में मिलावट करने का आरोप लगाते हुए जनता के स्वास्थ्य से खिलवाड़ करने का भी आरोप लगाया। गौरतलब है कि देश में करोड़ों लीटर दुग्ध का हर दिन काला कारोबार नकली दुग्ध के नाम से किया जा रहा है। सुत्रों के अनुसार देश में वर्तमान समय में दुग्ध का उत्पादन 30 करोड़ लीटर हैं वहीं करोड़ों लीटर दुग्ध का प्रयोग हर दिन मिठाईयां, पनीर, खोया आदि बनाने में होता है। इसके बाबजूद देश में 35 करोड़ दुग्ध की खपत होने से देश में दुग्ध में मिलावट के आरोप न केवल लग रहे हैं अपितु इन आरोपों की उस समय पुष्टी हो रही है जब कभी इसको कसौटी में परखा जाता है। माना जा रहा है इस देश में कम से कम 5 करोड़ लीटर दुग्ध कहां से इस देश में आता जबकि देश में दुधारू  पशुओं की संख्या निरंतर कम होती जा रही है। सरकार की उदासीनता से हर माह दुग्ध बेचने वाली कम्पनियां दुग्ध की कीमत बढ़ा कर लोगों का जीना दुश्वार कर रही हे।  परन्तु क्या मजाल है कि न तो ये दुग्य कम्पनियां इस के लिए दुग्ध उत्पादकों को बार बार बढाई जा रही कीमत का ही लाभ दिया जा रहा है।  इस प्रदर्शन का समर्थन करते हुए आम आदमियों को इस बात का भी गुस्सा था कि तेल की कीमतें बढ़ने पर जहां राजनैतिक दल आये दिन विरोध प्रदर्शन करते हैं वहीं दुग्ध की कीमतें बढाये जाने पर भी न तो सरकार ही इस पर अंकुश लगाने का काम करती हैं व नहीं कोई विरोधी राजनैतिक दल इसका विरोध ही करते है।

Friday, April 20, 2012


वंश व जात को नहीं कर्म को महान मानती है भारतीय संस्कृति

कुछ लोग अपने जीवन का बहुमल्य समय इन दिनों भी वंशावली के आधार पर मिसी को डा या छोटा साबित करने में लगाने की भूल कर रहे है। नेहरू के वंशज कौन थे, हिन्दू थे या मुस्लिम इससे कोई फर्क नहीं पड़ने वाला, केवल यह इतिहासकारों के लिए ज्ञानार्जन व टांग खिचने वालों का एक बहाना हो सकता हे। वेसे भी धार्मिक दृष्टि से माने तो इस्लाम व ईसायत आदि धर्मो का भारतीय संदर्भ में यही कहा जा सकता है कि यहां पर अधिकांश लोग भारतीय संस्कृति के ध्वजवाहक हिन्दू धर्म के मानने वाले थे। बाद में चाहे कोई भय, प्रलोभन या अज्ञानता के कारण अपना धर्म परिवर्तन करके हिन्दू से मुस्लिम या ईसाई भले ही बन गये हों परन्तु मूल में सब एक ही है। वैसे भी पूरी मानवीय सृष्टि ही नहीं भारतीय इतिहास भी वर्णसंकरों से भरा हुआ है।महाभारत में ही वेद व्यास, वशिष्ट, विदुर, कर्ण आदि की श्रेष्ठता को क्या हम उनके जनकों के कारण कम कर आंक सकते है।   भारतीय मनीषी कभी आदमी के कुल, धर्म, रंग, लिंग या क्षेत्रादि के कारण नहीं अपितु व्यक्ति के अपने कर्मो के कारण ही वरियता देता है। क्या लेखक या हम कोई भी अपने पूर्वजों के कर्मो के अपने आप को जिम्मेदार मान सकते है। नहीं। टांग खिचने के लिए वंशावली का सहारा लेना उचित नहीं है। अपने जीवन का अमूल्य समय इसमें नष्ट करना कहीं भी उचित नहीं है। वैसे भी सारे हिन्दू नेक या सारे मुस्लिम-ईसाई गलत नहीं होते। यहां हिन्दुओं में भी जयचंद, मानसिंह, व आज के हुक्मरान जैसे लोग भी होते है। वहीं मुस्लिमों में डा अब्दुल कलाम व वीर हमीद जैसे राष्ट्र भक्त भी हो सकते है। हमें जाति, धर्म, क्षेत्र, रंग व नस्ल आदि के आधार पर किसी को अच्छा या बुरा नहीं मानना चाहिए अपितु हमें प्रत्येक व्यक्ति के अच्छे व बुरे कर्म के आधार पर ही उसका मूल्यांकन करना चाहिए और अपने दायित्वों का निर्वहन करना होगा। नेहरू या गांधी को गाली देने से ही देश का आज भला नहीं होने वाला, हमें मनमोहन सरकार के खिलाफ व वर्तमान के सभी दलों के कुकर्मी नेताओं को बेनकाब करके उनको देश की राजनीति से दूर हटाने का साहस भी होना चाहिए। तभी देश का भला होगा।

गांधी को गाली देने से नहीं बनेगा भारत महान

रात की बात न कर, रात तो गुजर गयी,
ऐ सुबह मुझे बता, तेरी रोशनी कहां गयी।।

अनाम शायर की उक्त पंक्तियां मेरे उन सभी साथियों के लिए है जो देश की समस्याओं का ईमानदारी से समाधान खोजने के बजाय केवल बीते जमाने के नेताओं, महापुरूषों व हुक्मरानों को कोसते है। देश में एक बड़ा वर्ग है जो भारत की बदहाली के लिए गांधी व उनके विरासत के वाहक नेहरू को जिम्मेदार मानते है। मैं नहीं कहता कि यह सही है या नहीं। मैं मानता हॅू कि कोई भी भूत चाहे कितना भी बडा हो वह वर्तमान से बड़ा नहीं हो सकता। आज भारत का दुर्भाग्य यह है कि जिन लोगों का समाजसेवा व चरित्र नाम की कोई चीज खुद भी न हो वे लोग भी बेशर्मी से गांधी को गाली दे कर खुद को बडे देशभक्त साबित करते है। हम वर्तमान हैं हमारा दायित्व है वर्तमान को संवारने व समाधान करने का। हम अपनी पूरी पीढी इसी निदंा में भी खपा दें तो भी इसका समाधान नहीं निकलेगा। हमे तो समस्या को पहचान कर उसका पूरी ईमानदारी से समाधान करना चाहिए। यह सही है कि जो समस्या का निदान प्रारम्भिक स्थिति में हो सकता था वह समाधान करने में आज काफी परेशानी उठानी पड़ सकती है।
गांधी महान थे या नहीं, आज इससे किसी समस्या का समाधान होने वाला नहीं। वर्तमान की समस्याओं का समाधान देश के वर्तमान जनता व देशवासियों को ही करना होगा। गांधी भगवान कृष्ण या भगवान राम नहीं जिनका आंख बंद कर अनुशरण किया जाय। गांधी जी आम इंसानों की तरह एक इन्सान ही थे, गलती इन्सानों से होती है। गांधी जी से भी कई गलतियां हो गयी होगी। परन्तु आज संसार के 200 सालों के इतिहास में पूरे विश्व के जनमानस को जिसने अपने विचारों व आंदोलन से प्रभावित किया उसमें भारत के महानायक महात्मा गांधी ही है। आज अफ्रीका का लोकशाही आंदोलन के महानायक मंडेला हो  या अमेरिकी लोकशाही के पुरोधा मार्टिन लूथर किंग या अमेरिका के वर्तमान राष्ट्रपति ओबामा या महान वैज्ञानिक आईस्टिन आदि। महात्मा गांधी में कई ऐसे चमत्कृत करने वाले विचार व कार्य थे जो आज भी पूरे विश्व का दिशा दे रही है। गांधी महामानव भी थे, उनके कई गुणों के आगे आज के नेता कहीं नहीं टिकते। जिस प्रखरता से गांधी अपने सिद्धांतों व कमियों को स्वीकारते वैसा करने का साहस आज कितने महापुरूषों को हैं, यह आप सभी जानते है। परन्तु इतना सच है जितना करीब से गांधी जी ने भारत को समझा वेसा आज के लोगों ने भी नहीं समझा। मैं नाथूराम गोडसे की पीड़ा को समझ सकता हॅू। मेने गांधी बध और मैं नामक पुस्तक भी पढ़ी। मुझे नाथू राम गोडसे के छोटे भाई गोपाल गोडसे से संक्षिप्त सी मुलाकात हुई। हिन्दु महासभा दिल्ली के एक कमरे में, मैं वहां पर भारतीय भाषा आंदोलन के पुरोधा व संघ लोकसेवा आयोग पर विश्व विख्यात आंदोलन करने वाले अखिल भारतीय भाषा संरक्षण संगठन के महासचिव स्व. राजकरण सिंह के साथ मिला था, उस समय राजकरण सिंह जी ने मेरा परिचय उत्तराखण्ड राज्य आंदोलनकारी के तौर पर भी गोपाल गोड़से से कराया, उस पर गोपाल गोडसे ने कहा कि वे छोटे राज्यों के पक्षधर नहीं हैं और अखण्ड भारत के पक्षधर हैं। परन्तु मैने उनको कहा कि उत्तराखण्ड राज्य गठन आंदोलन पूरी तरह से राष्ट्रवादी आंदोलन है उसको अलगाववादी मानना एक प्रकार भी हिमालयी भूल है।
पर मेरा साफ मानना है गांधी जी की हत्या नाथूराम गोडसे ने नहीं अपितु आजाद भारत की अब तक की तमाम सरकारों ने की। नाथू राम ने तो गांधी के शरीर यानी करमचंद मोहनदास गांधी की हत्या की थी, परन्तु गांधी जी जिनको पूरा देश मानता था, वह व्यक्ति ही नहीं एक सिद्धांतों का शक्तिपूूॅज था, जिसे देश की जनता महात्मा गांधी के रूप में मानती थी। गांधी जी के सिद्धातों खासकर भारतीय संस्कृति, भाषा, शराब, गो हत्या, कुटीर उद्योग, ग्रामीण जगत के प्रति गांधी जी का स्पष्ट सोच थी। उस सोच का गला जो देश के हुक्मरानों ने घोंटा वह गांधी जी के सपनों के भारत की ही निर्मम हत्या है नहीं थी अपितु यह गांधी जी की भी हत्या मानी जा सकती है। परन्तु हमें यह याद रखना होगा कि गांधी किसी राजा महाराजा की संतान नहीं थी, जो वे यकायक देश में महानायक बन गये। ना ही गांधी जी के आजादी के आंदोलन में कूदने से पहले भारतीय जनमानस को इस दिशा में आंदोलित करने में नेताओं की कोई कमी नहीं थी। गांधी जी से पहले कई अग्रणी नेता इस देश को आंदोलित करने में लगे थे। परन्तु गांधी ने अपनी कथनी व करनी में देश की आम जनमानस को इतना उद्देलित कर दिया कि गुलामी की जंजीरों में शताब्दियों से दबे हुए भारतीय जनमानस ने गांधी जी के सत्य अहिंसा आंदोलन को अंगीकार करके फिरंगी हुकुमत को ही नहीं पूरे विश्व को झकझोर कर रख दिया। गांधी को गाली देना या उनमें कमियां निकालना आसान है परन्तु उनकी तरह देश के आम जनमानस को उद्देल्लित करने वाले आजाद भारत में कितने नेता है। आज तो देश में आजाद भारत की हुक्मरान हैं इसके बाबजूद देश के कुशासन के खिलाफ क्यों देश के आम नेताओं व जनता संड़कों पर उतरने से कोई नेता क्यों नहीं रहुनुमा बन रहे हैे। आज सबसे जरूरत है अपनी जिम्मेदारी समझते हुए देश को तबाह कर रहे राजनेताओं, नौकरशाहों, बाबाओं, समाजसेवियों व उद्यमियों की जकड़ से बचाने के लिए सडकों पर उतने का। जो भी इंसान होगा वह किसी भी इंसान से घृणा करने की सीख दे ही नहीं सकता। वह जाति, धर्म, क्षेत्र, लिंग व भाषा के नाम पर बेगुनाह लोगों का शोषण, कत्ल या दमन करने की सहमति दे ही नही सकता।
गांधी ही शतः प्रतिशतः सही है ऐसा भी मैं नहीं समझता, भारतीय आजादी की जंग में हजारों महानायकों ने भी अपनी अपनी तरह से महान योगदान दिया। महानक्रांति वीर सावरकर, शहीद ऊधमसिंह,  महान शहीद भगतसिंह, चन्द्रशेखर आजाद, सुभाष चन्द्र बोस सहित असंख्य हुत्मात्माओं के योगदान को किसी भी सूरत में कम कर नहीं आंका जा सकता है। परन्तु गांधी ने भारतीय जनमानस के अंदर से जो गुलामी का भूत भगा कर उनको आजादी के आंदोलन में एकसुत्र में पिरोकर एक भारतीय बन कर संघर्ष में उतारा उस महान योगदान को भूलाने की कुचैष्ठा करने वाले खुद कहां खड़े हे। आज जरूरत है देश को बचाने के लिए गांधी की तरह खुद को देश हित के लिए समर्पित करके पूरे देश की जनता को जागृत करने की। शेष श्रीकृष्ण कृपा। हरि ओम तत्सत्। श्रीकृष्णाय् नमो।

   
   

Tuesday, April 17, 2012

सो जाओं अब मध्य रात हो गयी,


सो जाओं अब मध्य रात हो गयी, 

सो जाओं अब मध्य रात हो गयी,
पशु पक्षी सब जीव  सो रहे
आंखों में मेरी तु आये निंदिया
कृष्ण की सी श्याम वर्ण हो गयी
 सो जाओं अब मध्य रात हो गयी।
फिर होगी सुबह नव जीवन की
हर बाग में महकेंगे फूल कलियां
मेरे उपवन में भी खिलेंगे
तुम्हारी यादों के मधुर कलियां
 देवसिंह रावत
(17 अप्रैल  2012  रात के 11.49 बजे)

-देशद्रोह से कम नहीं है शिक्षा का निजीकरण


-देशद्रोह से कम नहीं है शिक्षा का निजीकरण
-शिक्षा, चिकित्सा व न्याय का देश की सुरक्षा की तरह निजीकरण किसी भी कीमत पर नहीं होना चाहिए


देश में शिक्षा का निजीकरण देश ही नहीं मानवता के साथ भी किया जाने वाला सबसे बड़ा अपराध है। मेरी बचपन से ही यह स्पष्ट धारणा रही है कि देश में ही नहीं पूरे विश्व में प्रत्येक शिशु को शिक्षा ग्रहण करने का जन्मसिद्ध अधिकार है। यह माता पिता का ही नहीं अपितु देश व संसार की तमाम सरकारों का प्रथम दायित्व है कि वह प्रत्येक बच्चे का उचित लालन पालन करने के साथ ही उसको उचित शिक्षा प्रदान करे। अगर संसार को एक भी व्यक्ति अशिक्षित व उचित शिक्षा से वंचित रह जाता है तो वह पूरे संसार की शांति व समाज के ताना बाना पर ग्रहण लगाने का कारण बन सकता है। इसलिए पूरे विश्व में एक मानक शिक्षा दी जानी चाहिए। शिक्षा देश व समाज के मानकों के हिसाब से दी जानी चाहिए। शिक्षा प्रदान करना प्रत्येक देश के लिए देश की सीमाओं की रक्षा करने की तरह ही परम आवश्यक है।
मेरा साफ मानना है कि कल्याणकारी व्यवस्था में सरकार को शिक्षा, चिकित्सा व न्याय का किसी भी हाल में निजीकरण के रहमोकरम पर छोड़ना एक प्रकार से देश ही नहीं पूरे मानव समाज के साथ खिलवाड़ है। जिस प्रकार देश की सुरक्षा व्यवस्था को निजी हाथों में नहीं छोड़ा जा सकता उसी प्रकार मानवीय समाज की प्राण समझे जाने वाली शिक्षा, चिकित्सा व न्याय को भी किसी भी सूरत में निजीकरण या बाजारीकरण के रहमो करम पर नहीं छोड़ा जाना चाहिए।
जो सरकारें शिक्षा, चिकित्सा व न्याय का निजी हाथों में छोड़ती है वह एक प्रकार से अपनी ही जड़ों में अपने ही हाथों से गला घोंटने का काम करती है। क्योंकि अगर एक भी बच्चा अशिक्षित रह गया तो उसका दण्ड न केवल वह भुगतता रहता है अपितु उसका परिवार के साथ साथ पूरा देश व विश्व समाज भी भोगने को विवश
होता है।
संसार में जितने भी दुर्दान्त अपराधी, कुशासक व भ्रष्टाचारी हुए उनके पीछे अगर कोई महत्वपूर्ण कारण समय पर उचित शिक्षा न मिलने के कारण उस अशिक्षित व्यक्ति के साथ पूरी व्यवस्था व विश्व समुदाय को भी भोगना पडता है। सही शिक्षा न मिलने के कारण ही इस विश्व में हिटलर, चंगैज, ओरंजेब, ओसमा, दाउद, बुश, इदी अमीन जैसे कुशासक व तानाशाह का दंश पूरे मानव समाज को झेलना पड़ा।
संसार के अग्रणी दार्शनिक काला बाबा भी देश की सरकारों पर इस बात के लिए फटकार लगाती थी कि इन सरकारों की नालायकी के कारण शिक्षा व्यापार, राजनीति व्यापार, धर्म व्यापार व चिकित्सा व्यापार में तब्दील हो कर पूरी व्यवस्था चैपट यानी तबाह हो चूकी है।
सरकार की पूरी व्यवस्था आज तबाही के कगार पर खड़ी है। देश के सत्तालोलुपु हुक्मरानों के कारण आम गरीब आदमी से शिक्षा, चिकित्सा व न्याय कोसों दूर हो गया है। एक गरीब आदमी न तो अपने बच्चों को इन पंचतारा संस्कृति के ध्वज वाहक बने निजी क्षेत्र के फाइव स्टारी स्कूलों में मोटी फीस व दाखिले का मकड़जाल रूपि गांधीवादी वातावरण को देख कर अधिकांश गरीब बच्चों की तो रही दूर उनके अभिभावकों की भी हिम्मत तक नहीं होती है, इन शिक्षा के व्यापारियों की स्कूलों की तरफ झांकने की। ऐसा ही हाल चिकित्सालय व न्यायालय का भी है। आम आदमी तो न्यायालय में न्याय मिलने की लम्बी व थका देने वाली प्रक्रिया से परेशान हो कर न्याय के दर पर फरियाद करने के बजाय मन मार कर केवल भगवान के नाम की गुहार लगाना ही बेहतर समझता है।
 मेरे इन दशकों से चिंतन मंथन के बाद परिष्कृत हुई इस धारणा को यहां पर कलमबद्ध कर रहा हॅू। हालांकि कई बार इन बिन्दुओं को मैं अपने लेखों में उजागर कर चूका हॅॅॅू। गत सप्ताह सुप्रीम कोर्ट ने भी  शिक्षा का अधिकार कानून 2009 की संवैधानिक वैधता को बरकरार रखते हुए फेसला दिया कि गरीब तबकों के बच्चों को देशभर के सरकारी और गैर सहायता प्राप्त निजी स्कूलों में 25 प्रतिशत सीटें निशुल्क मिलनी चाहिए। भारत के मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति एसएच कपाड़िया, न्यायमूर्ति केएस राधाकृष्णन व न्यायमूर्ति स्वतंत्र कुमार की पीठ ने शिक्षा का महत्व समझते हुए बहुमत के विचार से कहा कि यह कानून सरकारी और गैर सहायता प्राप्त निजी स्कूलों में समान रूप से लागू होगा। सिर्फ गैर सहायता प्राप्त निजी अल्पसंख्यक स्कूल इसके दायरे से बाहर होंगे। हालांकि न्यायमूर्ति राधाकृष्णन ने इससे असहमति जाहिर की कि यह कानून उन गैर सहायता प्राप्त निजी स्कूलों और अल्पसंख्यक संस्थानों पर लागू नहीं होगा जो सरकार से कोई सहायता या अनुदान हासिल नहीं करते। लेकिन न्यायमूर्ति राधाकृष्णन की राय को न्यायमूर्ति कपाड़िया व न्यायमूर्ति स्वतंत्र कुमार ने नहीं माना। उन्होंने कहा कि यह कानून गैर सहायता प्राप्त निजी स्कूलों पर भी लागू होगा। शीर्ष न्यायालय ने स्पष्ट किया कि उसका फैसला बृहस्पतिवार से ही प्रभावी होगा। इसका अर्थ है कि कानून बनने के बाद (बृहस्पतिवार से पहले) किए गए दाखिले पर यह लागू नहीं होगा। दूसरे शब्दों में शीर्ष अदालत ने कहा कि इस फैसला का प्रभाव पिछली तारीख से नहीं बल्कि इसके बाद से होगा। शीर्ष न्यायालय की तीन सदस्यीय पीठ ने पिछले वर्ष तीन अगस्त को गैर सहायता प्राप्त निजी संस्थानों द्वारा दाखिल याचिकाओं पर अपना फैसला सुरक्षित रखा था। इन याचिकाओं में कहा गया था कि शिक्षा का अधिकार कानून निजी शैक्षणिक संस्थानों को अनुच्छेद 19 (1) जी के तहत दिए गए अधिकारों का उल्लंघन करता है, जिसमें निजी प्रबंधकों को सरकार के दखल के बिना अपने संस्थान चलाने की स्वायतत्ता प्रदान की गई है। भले ही सर्वोच्च न्यायालय का शिक्षा पर आया फेसला क्रांतिकारी कदम माना जा रहा है।
भले ही सर्वोच्च न्यायालय ने जिस दिशा में यह लेख संकेत करता है उस विचार पर अपनी मुहर नहीं लगायी है। परन्तु इतना सर्वोच्च न्यायालय ने भी माना कि गरीब बच्चों को भी इस देश में अमीर बच्चों की तरह ही शिक्षा ग्रहण करने का अधिकार है। सर्वोच्च न्यायालय का फेसला अंधेरे में भटक रहे इस राष्ट्र के लिए भले ही जुगुनु की तरह राष्ट्र का मार्ग दर्शन करने वाला साबित हो। परन्तु जिस दिशा में मै संकेत कर रहा हूू अभी उस दिशा पर विचार व मनन करने के साथ कदम उठाने के लिए लगता है अभी इस देश में समय लगेगा। परन्तु इतना निश्चित है कि देश या विश्व में शिक्षा किसी भी हाल में निजी क्षेत्र के रहमोकरम पर नहीं छोड़ी जानी चाहिए।
शेष श्रीकृष्ण कृपा। हरि ओम तत्सत्। श्रीकृष्णाय् नमो।

देश की जनता का मनमोहन सरकार व कांग्रेस से मोह भंग


देश की जनता का मनमोहन सरकार व कांग्रेस से मोह भंग
-दिल्ली नगर निमग में भी कांग्रेस को जनता ने ठुकराया

दिल्ली के स्थानीय निकाय के चुनाव के तहत दिल्ली नगर निगम के चुनाव की 17 अप्रैल को हुई मतगणना में दिल्ली के तीन नगर निगमों में भाजपा ने बाजी मार ली है। महाराष्ट्र के स्थानीय निकायों के चुनाव व पांच विधानसभा चुनाव परिणामों में मुंह की खाने के बाद कांग्रेस को दिल्ली नगर निमग चुनाव में आशा थी कि दिल्ली के लोग उसकी लाज रख देंगे। परन्तु जिस प्रकार से लोग प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह नेतृत्व वाली कांग्रेस के कुशासन में भ्रष्टाचार, मंहगाई व आतंकवाद से त्रस्त है उससे लोग पूरे देश से कांग्रेस को उखाड फेंकने का मन बना चूके है। भले ही कांग्रेस के नेता अपनी नाक बचाने के लिए इसे मात्र स्थानीय निकायों का चुनाव बतायें परन्तु जिस प्रकार से पूरे देश में एक के बाद एक राज्यों में हो रहे चुनावों में जनता के रूझान का पता चल रहा है उससे साफ हो गया है कि जनता का अब पूरी तरह से कांग्रेस से मोह भंग हो गया है। कांग्रेस में इन चुनाव परिणामों से बडा वर्ग अब सोनिया गांधी अविलम्ब मनमोहन सिंह को बदल कर 2014 में होने वाले लोकसभा चुनाव में कांग्रेस की डुबने वाली नौका को बचाने का प्रयास करने के लिए गुपचुप दवाब बनाने का मन बना चूके है। यह हार मात्र दिल्ली के नगर निगम चुनाव में स्थानीय नेताओं की नहीं अपितु यह हार कांग्रेस की मुखिया सोनिया गांधी की है जो मनमोहन सिंह जैसे जनहितों पर कुठाराघात करने वाले मनमोहन सिंह को प्रधानमंत्री के पद से न हटा कर कांग्रेस व देश का रसातल में धकेलने के लिए गुनाहगार है।
गौरतलब है कि दिल्ली में भले ही केन्द्र व प्रदेश में कांग्रेस का शासन है परन्तु दिल्ली नगर निगम में वर्षो से भाजपा ही काबिज है। भाजपा की इसी पकड़ को तोडने के लिए इस बार कांग्रेस ने दिल्ली नगर निगम को तीन भागों में बांटा था परन्तु 15 अप्रैल को हुए मतदान व 17 अप्रेल को इन चुनाव के परिणामों के उजागर होने के बाद यह साफ हो गया कि कांग्रेस को यह दाव भी जनता ने पुरी तरह से ठुकरा दिया।। दिल्ली नगर निगम को तीन भागों में बांटने के बाद पहली बार नगर निगम के 272 सीटों यानी बार्डो के पार्षदों के चयन के लिए दिल्ली के 1 करोड़ 13 लाख 67 हजार 636 मतदाता इस चुनावी जंग में पार्षद बनने के लिए उतरे 2423 उम्मीदवारों के भाग्य का फैसला 17 अप्रैल को 33 मतगणना केन्द्रों में मतगणना हुई। दिल्ली नगर निगम के तीन हिस्सों में बांटा गया है। इसके तहत पूर्वी भाग में 64, पश्चिमी व उत्तरी भाग में 104-104 पार्षदों वाली नगर निगम होगी।
हालांकि दिल्ली की सत्ता में काबिज भाजपा व कांग्रेस दोनों तथाकथित राष्ट्रीय पार्टी में इनके जमीनी मजबूत नेताओं के बजाय केवल पैसें वाले लोगों को ही टिकट गलत ढ़ंग से दिया गया। इसके खिलाफ भाजपा व कांग्रेस दोनों में समाज सेवा में समर्पित लोग बडी संख्या में निर्दलीय प्रत्याशी बन कर चुनाव मैंदान में है।  जिस प्रकार से भाजपा ने अपने वरिष्ठ नेता जगदीश मंमगांई व हरीश अवस्थी सहित अनैक साफ छवि के जाने माने नेताओं की टिकट काट कर अपने प्यादों को टिकट दी है। उससे साफ हो गया कि दिल्ली में यहां के बहुसंख्यक उत्तराखण्डी, देहात, पूर्वांचल, बिहार आदि लोगों को नकार कर दिल्ली की सत्ता पर काबिज नेता मात्र अपने लोगों को टिकट दे कर लोकशाही का ही गला घोंट रहे हे। जिस प्रकार से कांग्रेस से जमीनी जनाधार वाले नेताओं को हाशिये में डाल कर सोनिया गांधी के आत्मघाती सलाहकार अपने हवाई प्यादों को महत्वपूर्ण संवेधानिक पदों में आसीन कर रहे हैं तथा मनमोहन सिंह सरकार के कुशासन से जनता त्रस्त है उससे आक्रोशित जनता अब कांग्रेस को करारा सबक सिखाने के लिए चुनावों में कांग्रेस का सफाया कर रही है।

Sunday, April 15, 2012

उत्तराखण्ड की राजधानी गैरसैंण ही बनेंः प्रदीप टम्टा


उत्तराखण्ड की राजधानी गैरसैंण ही बनेंः प्रदीप टम्टा
गैरसेंण ही उत्तराखण्ड की स्थाई राजधानी बने। यह दो टूक बात कांग्रेस के जमीनी नेता प्रदीप टम्टा ने प्यारा उत्तराखण्ड समाचार पत्र से अपने संसदीय आवास में इस सप्ताह एक विशेष भैंटवार्ता में कही। सांसद टम्टा ने कहा कि प्रदेश गठन के 12 साल बाद भी जनांकांक्षाओं के सम्मान करते हुए प्रदेश की स्थाई राजधानी गैरसैंण न बनाना लोकतंत्र को शर्मसार करने वाली बात हे। उन्होंने कहा जिन उदेश्यों की पूर्ति के लिए प्रदेश के लोगों ने पृथक राज्य गठन के लिए शहादतें दी और ऐतिहासिक संघर्ष किया वे सभी जनांकांक्षायें प्रदेश की स्थाई राजधानी गैरसेंण बनाने से ही साकार होंगी।
दशकों तक जनसंघर्षो में समर्पित रहे सांसद प्रदीप टम्टा ने कहा कि गैरसेंण आज उत्तराखण्डियों के लिए केवल स्थान मात्र तक सीमित नहीं है अपितु गैरसैण प्रदेश के स्वाभिमान, पहचान, लोकशाही व विकास का जीवंत प्रतीक भी बन गया हे। उन्होंने कहा यह शर्म की बात है कि गैरसेंण राजधानी बनाने की आंदोलनकारियों की सर्व सम्मत मांग को सरकारी समितियों द्वारा भी माने जाने के बाबजूद प्रदेश की सरकारें वहां पर राजधानी न बना कर प्रदेश की लोकशाही व शहीदों का अपमान करने में क्यों तुले है।
आज प्रदेश की जनता जानना चाहती है कि आखिर किसके हितों की पूर्ति के लिए प्रदेश की राजधानी गैरसेंण न बनाये जाने पर सरकारें तुली हुई है।
अपनी बैबाक टिप्पणी के लिए जाने जाने वाले सांसद प्रदीप टम्टा ने कहा कि यहां के राजनेताओं व नौकरशाहों को इस बात का भान होना चाहिए कि उनके इसी उत्तराखण्ड विरोधी प्रवृति के कारण प्रदेश में बड़ी संख्या में लोगों का पलायन हो रहा है। आज तो स्थिति और भी खतरनाक हो गयी है हमारे तथाकथित नेता भी प्रदेश के लोगों को अपने हाल पर छोड़ कर अपनी विधानसभा सीट भी पर्वतीय क्षेत्र से नहीं अपितु मैदानी क्षेत्र से चुनने के लिए हाथ पैर मार रहे है। यह सब प्रदेश के प्रति यहां के राजनेताओ ंकी उदासीन रवैये को ही उजागर करती है।
सांसद प्रदीप टम्टा ने कहा कि उत्तराखण्ड राज्य का गठन इन हवाई राजनेताओं व नौकरशाही की ऐशगाह बनाने के लिए नहीं अपितु जनता ने अपनी जनांकांक्षाओं व विकास के सपने को साकार करने के लिए किया था। उन्होनंें कहा कि अब धीरे धीरे उत्तराखण्ड की जनता को यह बात समझ में आ रही है कि गैरसैंण राजधानी बनाये बिना न तो प्रदेश में पलायन रूकेगा व नहीं प्रदेश का चहुमुखी स्थाई विकास ही हो पायेगा। सांसद प्रदीप टम्टा ने तमाम राजनैतिक व्यक्तियों के अलावा सामाजिक संगठनों सु खुला आवाहन किया कि प्रदेश में लोकशाही की रक्षा में लिए गैरसैंण राजधानी बनाने के लिए सरकार पर सामुहिक दवाब बनायें। उन्होंने कहा कि अगर हम अब भी मूक रहे तो आने वाली पीडियां हमें कभी माफ नहीं करेगी।

Saturday, April 14, 2012

निर्मल बाबा से अधिक गुनाहगार है निर्मल बाबा प्रचार करने वाले चैनल


निर्मल बाबा से अधिक गुनाहगार है निर्मल बाबा प्रचार करने वाले चैनल 
निर्मल बाबा का विज्ञापन प्रसारित करने वाले चैनलों पर लगे 100 गुना जुर्माना 

निर्मल बाबा को समाधान के नाम पर आम श्रद्धालुओं को ठगने का आरोप लगा कर अपने को पाक साफ बताने वाले देश के अधिकांश चैनल , निर्मल बाबा से अधिक गुनाहगार है। निर्मल बाबा तो भले ही ठग हो परन्तु इन खबरिया, धार्मिक व मनोरंजन चैनलों ने निर्मल बाबा से मिलने वाले धन के लालच में अपने चैनलों में इस बाबा का विज्ञापन प्रमुखता से प्रचारित करके लोगों को इस बाबा के झांसे में फंसाने में उसके प्यादे की तरह काम किया है। इन चैनलों की नैतिकता व सामाजिक दायित्व होता है कि ऐसा कोई खबर या विज्ञापन न प्रसारित न करें जिसके बारे में उनको खुद जनहित या विश्वास न हो। सच तो यह है निर्मल बाबा से अधिक गुनाहगार ये 35 चैनल हैं जिन्होंने बाबा के द्वारा डाले गये विज्ञापन के टुकडों के लालच में फंस कर देश के लाखों लोगों को इस बाबा के जाल में फंसाने का काम किया। लोगों को निर्मल बाबा से नहीं इन चैनलों की विश्वसनीयता पर विश्वास था। इन्हीं चैनलों के माध्यम से बाबा ने लोगों को अपने षडयंत्र का शिकार बनाया।
इन खबरिया चैनलों, मनोरंजन व धार्मिक चैनलों ने अपने समाज व देश के प्रति अपने नैतिक दायित्व का  बाबा के चांदी के टूकडों के लालच में गला ही घोंट दिया है। अगर कल कोई देश का दुश्मन इन चैनलों को अपने षडयंत्र का मोहरा बना कर देश की व्यवस्था को छिन्न भिन्न करने के लिए या देश में अस्थिरता फेलाने के लिए इसी प्रकार का विज्ञापन या पेड़ न्यूज से देश में अराजक बातावरण व असंतोष फेलाने का काम करे तो इन चैनलों को क्या हम इसी प्रकार से माफ कर देंगे। निर्मल बाबा से अधिक गुनाहगार हैं मीडिया, जिसकी विश्वसनीयता के फांस में फंस कर आम जनता निर्मल बाबा के चक्कर में फंसी। आज ये अधिकांश चैनल व मीडिया बाबा निर्मल को ठग या खलनायक बता रहे हैं परन्तु ये चैनल बाले जनता के दिलों दिमाग में निर्मल बाबा के पैंसों के लालच में उसका विज्ञापन प्रमुखता से दिखाने की होड़ कर रहे थे। तब इनकी नैतिकता कहां गयी थी। ये मीडिया देश की जनता से अपने अक्षम्य गुनाह के लिए माफी मांगे। भारत सरकार को चाहिए कि इन सभी चैनलों जिन्होंने निर्मल बाबा का विज्ञापन अपने चैनलों में दिखाया उन पर 100  गुना अधिक जुर्माना लगा कर वसूला जाय। इसके साथ इन सब चैनलों के लाइसेंस भी रद्द कर दिया जाय। निर्मल बाबा का माल खा कर मीडिया चली हज को ।

Friday, April 13, 2012

आखिर कब मिलेगी भारत को इंडिया से आजादी


आखिर कब मिलेगी भारत को इंडिया से आजादी
-विदेशी भाषा, विदेशी नाम, भारत आज भी है इंडिया का गुलाम

21 अप्रैल 1989 को संसद में अंग्रेजी मुर्दाबाद के नारे गूंजाने के बाद सुरक्षा कर्मियों ने संसद दीर्घा से मुझे गिरफतार किया गया तो मुझसे जो पूछताछ की गयी उसमें मैने साफ कहा कि इस संसद ने देश की आजादी को अंग्रेजी का गुलाम बना रखा है, इसी लिए इस संसद से भारत की आजादी को मुक्त करने की दो टूक बात कहने के लिए मेने यह नारेबाजी की। इसकी मुझे यदि फांसी की सजा भी दी जाय तो मुझे स्वीकार है। क्योंकि मेरा मानना है कि आजाद भारत मे देश के भाषाओं के बजाय उसी विदेशी भाषा से देश का पूरा तंत्र संचालित करना देश की आजादी को बंधक बनाने जैसा राष्ट्रद्रोह है। इस कलंक को ढोने के कारण भले ही फिरंगियों से 15 अगस्त की आधी रात में जो आजादी मिली थी उस आजादी का सूर्योदय ही आज भी भारत में नहीं हुआ। यह भारतीय आजादी के लिए अपनी शहादत देने वाले हजारों देशभक्तों की शहादत का अपमान है। यह अपमान है भारतीय स्वाभिमान के लिए अपना पूरा जीवन होम करने वाले लाखों आजादी के दिवानों के संघर्ष का। आज भी आजादी के 65 साल बाद भी देश के ये नपुंसक हुक्मरान देश को अपना नाम भारत, भाषा हिन्दी या भारतीय भाषा तक नहीं दे पाये, तो संस्कृति दिलाने की बात तो बहुत दूर की है। आज दुर्भाग्य यह है कि देश उसी फिरंगी गुलामी के प्रतीक इंडिया, इंग्लिश व काॅमनवेल्थ का बदनुमा कलंक देश के माथे पर ढो रहा है। सबसे शर्मनाक बात यह है कि देश की अधिकांश तथा कथित प्रबुद्धजन इस कलंकों को ढोने में ही देश का गौरव मान रहे हैं।
हिन्दी सहित भारतीय भाषाओं की आजादी की इस लडाई को मैने खुद संसद से लेकर सड़क में विगत 30 से अधिक सालों से लड रहा हॅू। देश की आजादी की मुक्ति के लिए मैं भारतीय मुक्ति सेना के प्रमुख होते हुए मैं अपनी आवाज को 1989 को संसद की दर्शक दीर्धा से व उसके बाद संघ लोकसेवा आयोग सहित भारतीय भाषा संरक्षण संगठन के पुरोधा पुष्पेन्द्र चैहान व राजकरण सिंह आदि साथियों के साथ संघर्ष करता रहा। इस संघर्ष में पूर्व राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह, पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी, वीपीसिंह, उप प्रधानमंत्री देवीलाल, आडवानी, पासवान सहित देश के तमाम वरिष्ठ सम्पादक पत्रकार व बुद्धिजीवियों के अलावा सेकडों समाजसेवी भी सम्मलित रहे। आई आईटी में भारतीय भाषाओं के सम्मान के लिए डा श्यामरूद्र पाठक के संघर्ष में भी साथी रहा। भारतीय स्वाभिमान के प्रतीक भारतीय भाषाओं के अपमान करने के लिए दिल्ली के विख्यात सेंट कारमल स्कूल के प्राद्यानाचार्य व राज्य सभा की उप सभापति नजमा हेपतुल्ला की गिरफतारी के लिए संसद की चैखट पर अंग्रेजी हुकुमत का झण्डा का दहन करते हुए फिरंगी सम्राज्ञी से अपने गुलाम कुत्तों को भारत से वापस बुलाने के लिए प्रदर्शन किया था। मैं समय समय पर जनमानस को इस दिशा में जागृत करने का प्रयास कर रहा हॅू। सर्वोच्च न्यायालय में भारतीय भाषाओं पर जो संकीर्ण नजरिया महान विचारक लक्ष्मीमल ंिसघवी की गुहार पर दिखाइ्र गया उससे उनकी पीड़ा को देख कर मुझे न्यायालय से कोई आशा नहीं दिखाई दे रही है । क्योंकि इस व्यवस्था में अधिकांश मैकाले के रक्तबीज की काबिज है आज राष्ट्रभक्तों का अभाव हो गया। फिर भी इस दिशा में जो भी साथी काम कर रहे हैं उनको शतः शतः नमन्।
अंग्रेजी भाषा, अंग्रेजी ही तंत्र
नहीं है भारत आज भी स्वतंत्र
भारत नहीं इंडिया हुआ आजाद
देश आज भी है क्यों परतंत्र
जनतंत्र में गुलामी के प्रतीक भाषा, नाम और संस्कृति को स्वतत्र देश में बलात थोपना लोकशाही का गलाघोटने के समान है। देश में  फिरंगी की भाषा थोपे रखना देश के स्वाभिमान, आजादी व संस्कृति से द्रोह है। इसके लिए आजादी के बाद से अब तक की सभी सरकारें जिसमें कांग्रेस, भाजपा व अन्य दल सम्मलित है, सभी इस देशद्रोह के लिए जिम्मेदार है।
आज भी इस संघर्ष को निरंतर छेड़े हुए है। संघर्ष के साथी भले ही बदल गये परन्तु मिशन जारी है भारत की आजादी को मुक्ति दिलाने का। भारतीय लोकशाही की स्थापना का। मुझे मालुम हे कि देश आज पूरी तरह से इस गुलामी में जकड़ गया है इसको मुक्ति दिलाने के लिए अब आजादी से बढ़ कर संघर्ष करना पडेगा। सबसे चिंता की बात यह है कि देश का आम जनमानस नहीं तथाकथित प्रबुद्ध वर्ग ही आज अंग्रेजी गुलामी का दास बन चूका है। हालत यह है कि देश में भ्रष्टाचार की बात करने वाले अण्णा हजारे व उनके साथी भी भारत की नहीं इंडिया की बात करता है और भाजपाई कालनेमियों की तरह इंडिया अगेस्ट करप्शन के नाम पर आंदोलन कर रहे है। केवल बाबा राम देव इसकी महता को समझे है। परन्तु वे भी कई मामलों में भ्रमित है। इसलिए मैं इस आंदोलन को आत्मबल पर लड़ रहा हॅू, जिसके आगे जन, धन व अन्य तमाम बल पानी भरते है। जीत हमारी निश्चित है। पहले भी हुई और आगे भी होगीं। क्योंकि जहां सत है वहीं जीत है। वहीं श्रीकृष्ण है वहीं श्री विजय है। शेष श्रीकृष्ण कृपा। हरि ओम तत्सत्। श्रीकृष्णाय् नमो।

मुलायम-राव से अधिक गुनाहगार निकले उत्तराखण्ड के सत्तालोलुपु हुक्मरान



मुलायम-राव से अधिक गुनाहगार निकले उत्तराखण्ड के सत्तालोलुपु हुक्मरान
अखिलेश व डिम्पल के विवाह को तुल देना उचित नहीं

मुलायम सिंह व राव, उत्तराखण्डियों की अस्मिता को रौंदने वाले दो दुर्दान्त कुशासक रहे, इनको व इनके कहारों को जो प्रदेश की अस्मिता को रौंदते देख कर भी इन के अंध समर्थक रहे वे भी उत्तराखण्ड के भी इनके समान ही खलनायक है। खासकर उत्तराखण्ड के आस्तीन के सांप जो मुलायम व राव के इस कुकृत्य के बाद भी उसके समर्थक रहे उनको उत्तराखण्ड के सपूत आज भी माफ नहीं कर सकता। यहां पर चर्चा मुलायम के बेटे व बहु की हो रही है। हमारा शास्त्र कभी बेगुनाह को दण्डित करने या उससे धृणा करने की इजाजत नहीं देता। अखिलेश उस समय न तो सपा का पदाधिकारी था व नहीं डिम्पल शायद इस मान अपमान का भान तक होगा। ये शायद उस समय बचपन यानी स्कूलों में होगे। हाॅं नैतिकता दोनों में नहीं रही होगी। जैसी नैतिकता प्रहलाद आदि बच्चों में रही। अगर रहती तो अखिलेश इस काण्ड के लिए जरूर अपने पिता की तरफ से माफी मांगते। मुझे तो मुलायम सिंह के बेटे से उत्तराखण्डी बेटियों की शादी होने पर जरूर दुख हुआ परन्तु इस बात का भी भान रहा कि दोनों बच्चे एक दूसरे से प्रेम करते थे, अखिलेश ने बडे परिवारों के आम बच्चों की तरह मात्र मित्र बदलने के बजाय डिम्पल से हुए अपने प्यार को शादी के बंधन में बंध कर निभाया, यह संतोषजनक है। मेरे आंदोलनकारी कई मित्रों ने इस शादी पर मुझे लिखने के कहा। मैने इस विषय पर बहुत मनन किया। राज्य गठन जनांदोलन का एक आंदोलनकारी के तौर पर मुझे मुलायम सिंह यादव के परिवार से किसी भी उत्तराखण्डी का शादी जेसा रिश्ते के बंधन में बंधना अपने मुंह पर कालिख पौछने के समान लगा। परन्तु एक सामान्य व्यक्ति के तौर पर मुझे लगा कि आज के समाज में जहां शिक्षित वयस्क बच्चों को आज के माॅं बाप अपनी इच्छा को उसी प्रकार से नहीं थोप सकते हैं जो आज से तीन या चार दशक पहले हमारे समाज में माॅं बाप ही बच्चों के रिश्ते जोड़ते थे। वेसे भी गुनाहगार तो मुलायमसिंह यादव है, उसका बेटा नहीं। हाॅं शिशुपाल व रामगोपाल ही नहीं विनोद बर्तवाल, सूर्यकांत धस्माना आदि लोग जो उस समय मुलायम के इन अत्याचारों के बाबजूद कहार बने हुए थे, उनको दोषी माना जा सकता। आज देहरादून में मुजफरनगर काण्ड के बाद भी मुलायम के कहार बने लोगों से गले मिलने वाले राजनेता व कांग्रेस भाजपा कहां पीछे है। विनोद बर्तवाल हो या सूर्यकांत धस्माना क्या इनसे मिलने को आज कांग्रेस भाजपा के नेता ही नहीं तथाकथित सामाजिक संगठनों के वे लोग भी तनिक सा भी नहीं संकुचाते जो अपने आप को उत्तराखण्डी आंदोलनकारी बनते है। क्या कांग्रेस पार्टी आज उत्तराखण्डी शहीदों के हत्यारों को गले लगाने में शर्म महसूस करती। क्या मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा हो या तिवारी इनको इन लोगों के साथ खडे होने में जरा सी भी अपराध बोध होता है। जो लोग मुजफरनगर काण्ड के अभियुक्तों के  संरक्षक रहे लोगों को प्रदेश में महत्वपूर्ण संवैधानिक पदों पर आसीन करने का काम बहुत ही निर्लज्जता से करते है उनकी स्तुतिगान जब यहां का मीडिया व समाजसेवी करते हैं तो मेरी आत्मा रोती है। राज्य गठन के बाद मुजफरनगर काण्ड पर घडियाली आंसू बहाने वालों के राज में मुलायम सिंह यादव ही नहीं अनन्त कुमार व बुआ सिंह जेसे लोगों की हिम्मत उत्तराखण्ड की धरती पर पांव रखने की हुई।
आज जिन लोगों ने उत्तराखण्ड की धरती को राज्य गठन के बाद भू माफियाओं के हाथों बेचने का कुकृत्य किया, जिन लोगों ने मुजफरनगर काण्ड के अभियुक्तों को दण्डित करने के बजाय शर्मनाक संरक्षण देने, प्रदेश की जनांकांक्षाओं व विकास के प्रतीक राजधानी गैरसैंण बनाने के बजाय षडयंत्र के तहत बलात देहरादून थोपने, उत्तराखण्डियों की राजनैतिक शक्ति को कुंद करने के लिए थोपे गये जनसंख्या के आधार पर विधानसभाई सीटों का परिसीमन कराने पर मूक रहना और प्रदेश में सुशासन देने के बजाय अपने निहित स्वार्थो के लिए जातिवाद, क्षेत्रवाद व भ्रष्टाचार की गर्त मे ंप्रदेश को बर्बाद करना आदि कार्यों में जो लिप्त हैं वे तमाम मुलायम व राव से बदतर उत्तराखण्डियों के गुनाहगार हैं।  आज उत्तराखण्ड राज्य गठन के 12 सालों में उत्तराखण्ड के स्वाभिमान व विकास के लिए गठित राज्य को यहां के कांग्रेस व भाजपा के हुक्मरानों ने इस संसार के सबसे ईमानदार समझे जाने वाले देवभूमि उत्तराखण्ड को अपने कुशासन से भारत का सबसे भ्रष्टतम राज्य बना दिया है। इसलिए आज केवल मुलायम व राव को अपराधी बता कर प्रदेश की हालात नहीं सुधरने वाली अपितु आज हमें प्रदेश के शासन पर बेठे दुशासनों पर अंकुश लगाने व प्रदेश में आसीन राजनेताओं पर जनहित में व्यापक कार्य करने के लिए जनदवाब बनाने से ही उत्तराखण्ड की दिशा व दशा सुधर सकती है। इसके लिए आज उत्तराखण्डियों को एक स्वर में प्रदेश में भाजपा व कांग्रेस द्वारा जातिवादी व भ्रष्टाचारी जो तानाबाना कर दागदार व बोने संकीर्ण मानसिकता के लोगों को उत्तराखण्डियों का भाग्य विधाता बना कर थोपा जाता है उस पर अंकुश लगाने का काम करना होगा । इसके साथ प्रदेश में दागदार छवि के नेताओं को प्रदेश की लोकशाही को कलंकित करने से रोकना होगा। जब तक प्रदेश की जनता जागृत नहीं होगी तब तक अब प्रदेश पटरी पर नहीं आने वाला।

Wednesday, April 11, 2012

उत्तराखण्ड द्रोही राव-मुलायम बनने की धृष्ठता न करें बहुगुणा व इंदिरा


उत्तराखण्ड द्रोही राव-मुलायम बनने की धृष्ठता न करें बहुगुणा व इंदिरा/
भू माफियाओं से मिल कर उत्तराखण्ड को कश्मीर बनाने की धृष्ठता न करे बहुगुणा सरकार/


उत्तराखण्ड के थोपे गये मुख्यमंत्री  बहुगुणा व कबीना मंत्री इंदिरा हृदेश प्रदेश की जनभावनाओं का सम्मान करते हुए प्रदेश की जनाकांक्षाओं व स्वाभिमान के प्रतीक राजधानी गैरसेंण में ही घोषित कर वहीं पर विधानसभा के भवन के निर्माण करें। उनको 88 करोड़ रूपये जो प्रदेश की स्थाई राजधानी बनाने के नाम से आये हुए हैं उनको बंदरबांट करने के लिए हडबड़ी में देहरादून में ही बनाने की धृष्ठता न करें। इसके साथ ही उत्तराखण्ड में प्रदेश की वित्तमंत्री इंदिरा हृदयेश द्वारा भू अधिनियम में संशोधन कर उसकी सीमा 250 वर्गमीटर से बढ़ाकर 500 वर्गमीटर करने के सुझाव दिया है, वह भू माफियाओं के हाथों प्रदेश की जमीन को लुटाने का आत्मघाती  कदम होगा। जो चंद सालों में उत्तराखण्ड को भी कश्मीर जेसा अशांत प्रदेश बनाने वाला हिमालयी भूल साबित होगी। उससे साफ हो गया कि इंदिरा हृदेश को राज्य गठन आंदोलनकारियों व शहीदों की उस भावना का तनिक सा भी भान नहीं हैं जो प्रदेश को भू माफियाओं से बचाने के लिए लिए प्रदेश  में प्रदेश की जमीन खरीद फरोख्त पर प्रतिबंध लगाते हुए यहां पर धारा 371 को लागू करने की मांग कर रहे थे। देश के इस सीमान्त प्रदेश की संवेदनशीलता को ध्यान रखते हुए यहां पर किसी बाहरी व्यक्तियों को बसाना  देश की सुरक्षा से खिलवाड होगा। जिस प्रकार से राज्य गठन के बाद यहां पर अनैक विदेशी व खुंखार आतंकी पकड़े गये उससे साफ हो गया कि यहां पर आतंकियों की सबसे सुरक्षित शरणस्थली बन गयी है। इसका एक ही कारण हे कि यहां पर प्रदेश के हितों को रौंदने वाले हुक्मरानों व भूमाफियाओं की मिली भगत से यहां की जमीन को ऐरे गैरों को बेचने की होड़ सी लगी रही। यहां पर ऐसे संदिग्ध लोगों ने अपने अड्डे बना दिये है जो इन आतंकियों के लिए पनाह उपलब्ध करने में लिप्त हैं। इसी की आशंका के कारण यहां पर लोग राज्य गठन से पहले से ही यहां के आंदोलनकारियों व प्रबुद्ध जनों ने यहां पर धारा 371 के प्रावधान की पुरजोर मांग की थी।  
उत्तराखण्ड के गठन के लिए जनता ने शहादतें दी। इस लक्ष्य की प्राप्ति के लिए अमानवीय दमन सहे। इस संघर्ष से उपजे उत्तराखण्ड  राज्य की स्थाई राजधानी जनभावनाओं के अनरूप गैरसेंण बनाने के बजाय देहरादून में थोपने वालों को प्रदेश की जनता उत्तराखण्ड द्रोही राव-मुलायम से अधिक गुनाहगार ही नहीं आस्तीन के सांप भी मानेगी। देवभूमि को अपनी संकीर्णता व सत्तालोलुपता के लिए रौंदने वालों को भगवान बदरीनाथ कभी माफ नहीं करता है। उनकी दुर्गति भी कोई नहीं टाल सकता है।

बांधों, बांघों व पार्को के लिए उत्तराखण्ड को उजाडने की इजाजत किसी को नहीं

बांधों, बांघों व पार्को के लिए उत्तराखण्ड को उजाडने की इजाजत किसी को नहीं
भारतीयता को उत्तराखण्ड से अलग करके देखने वाले ही भारतीय संस्कृति के मर्म को नहीं समझ पाये है। उत्तराखण्ड समाधान खण्ड है। जहां अनादिकाल से इस सृष्टि के तमाम समस्याओं का समाधान इस सृष्टि को मिला। देवताओं को ही नहीं रिषी मुनियों व मानवों को ही नहीं स्वयं भगवान की भी यह तपस्थली रही है। इसलिए उत्तराखण्डियों को अलगाववाद की दृष्टि से देखने वाले न तो भारतीयता को जान पाये तो उत्तराखण्ड को कहां पहचान पायेंगे। उत्तराखण्ड से तो हम भू माफियाओं, लोकशाही के गला घोंटने वालों व यहां के संसाधनों को लूटने के उदेश्य से यहां पर कालनेमी की तरह घुसपेट करने वालों से दूर रखना चाहते है। इस पर किसी को मिर्ची लगती है तो उसको हमारे पास राम राम कहने के अलावा कोई इलाज व जवाब नहीं है। एक बात देश के हुक्मरानों व यहां के शासकों को ध्यान में रखना चाहिये कि उत्तराखण्ड पावन देवभूमि है यहां पर संसाधनों को लुटने व लुटाने के लिए बांधों, बाघों व अभ्याहरणों-पार्को से यहां के वासियों को बलात उजाडने की धृष्ठता करने की कोई इजाजत किसी भी कीमत पर नहीं दी जासकती है।

Tuesday, April 10, 2012

सच्चा उत्तराखण्डी कौन


सच्चा उत्तराखण्डी कौन
उत्तराखण्डी केवल वो नहीं जो उत्तराखण्ड में पैदा हुआ हो या उत्तराखण्डी मूल का हो,असल में उत्तराखण्डी वही है जो जनहित में समर्पित हो, जो अन्याय के खिलाफ सतत् संघर्षरत होते हुए ज्ञान, दया व धर्म को आत्मसात करते हुए सदाचारी हो। उत्तराखण्ड का अर्थ ही जो हमेशा समाधान स्वरूप हो। जो स्वयं अखण्ड समाधान हो। मैं उत्तराखण्डी उन लोगों को नहीं मानता हूूॅ जो उत्तराखण्ड राज्य गठन आंदोलन को कुचलने वाले राव मुलायम के समर्थक थे, जो मुजफरनगर काण्ड के समय व उसके बाद भी मुलायम के बेशर्मी से समर्थक रहे। न हीं वे उत्तराखण्डी हें जिन्होंने मुजफरनगर काण्ड के हत्यारों को शर्मनाक संरक्षण देने की भूमिका निभाई। असली उत्तराखण्डी राज्य गठन का संकल्प लाल किले के प्राचीर से राष्ट्र के समक्ष लेने वाले प्रधानमंत्री देवेगोड़ा । असली उत्तराखण्डी रहा मुजफरनगर काण्ड में उत्तर प्रदेश पुलिस की कलंकित भूमिका को धिक्कारते हुए उत्तर प्रदेश पुलिस की नौकरी से इस्तीफा देने वाले बहादूर सिपाई रमेश। असली उत्तराखण्डी तो मैं मुम्बई के उन साहित्यकार व कलाकारों को मानता हॅू जिन्होंने मुजफरनगर काण्ड में तत्कालीन उप्र के मुख्यमंत्री मुलायम सिंह की भारतीय संस्कृति व मानवता को कलंकित करने वाली भूमिका के विरोध में उनके द्वारा उनको दिये जाने वाले सम्मान राशि के साथ मिलने वाले पुरस्कार को ठुकराने का काम किया, वहीं पूरे समाज को शर्मसार करने वाला कृत्य  तो उस समय के उत्तराखण्ड समाज के तथाकथित नामी कलाकार व साहित्यकार तथा सामाजिक संस्थायें रही जो मुलायम के हाथों उस समय पुरस्कार ले कर अपने समाज की नाक कटाने का काम किया।
मैं तो असली उत्तराखण्डी उन सत्तालोलुपुओं को भी नहीं मानता हूूॅ जिन्होंने भाजपा व कांग्रेस का प्यादा बन कर पृथक राज्य गठन के बाद प्रदेश की सत्ता की बागडोर संभाल कर प्रदेश की जनांकांक्षाओं व सम्मान के प्रतीक स्थाई राजधानी गैरसेंण बनाने के बजाय जबरन देहरादून में थोपने का काम किया। वे भी किसी भी हालत में सच्चे उत्तराखण्डी नहीं हो सकते जिन्होंने राज्य गठन के बाद प्रदेश में जनसंख्या पर आधारित विधानसभाई परिसीमन थोप कर राज्य गठन की मांग करने वालों पर बज्रपात किया। नहीं प्रदेश को जातिवाद, क्षेत्रवाद व भ्रष्टाचार की गर्त में धकेलने का कृत्य करने वाले कुशासक ही सच्चे उत्तराखण्डी ही कहलाये जा सकते हे। कम से कम एक सच्चे ईमानवाले इंसान को मैं सच्चा उत्तराखण्डी मान सकता हॅू परन्तु ऐसे हुक्मरानों को नहीं मान सकता जिन्होंने तिवारी, खण्डूडी, निशंक की तरह उत्तराखण्ड के हक हकूकों और जनांकांक्षाओं को रोंदने का काम किया हो। प्रदेश के वर्तमान मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा से किसी प्रकार की आश रखना भी अपने आप में नासमझी होगी।

Monday, April 9, 2012

उत्तराखण्ड के दूसरे नित्यान्नद बन सकते हैं तरूण विजय


उत्तराखण्ड के दूसरे  नित्यान्नद बन सकते हैं तरूण विजय/
उत्तराखण्ड की राजनीति में मजबूत पकड़ बनाने के लिए की जनदेव दर्शन यात्रा /
भाजपा के आडवाणी नहीं अटल बनना चाहेंगे तरूण /
नई दिल्ली(प्याउ)। ‘भाजपा के सर्वशक्तिमान नेता लालकृष्ण आडवाणी के आंखों के तारे भाजपा के राज्य सभा सांसद तरूण विजय देवभूमि उत्तराखण्ड में भाजपा के सत्तासीन होने पर दूसरे नित्यानन्द स्वामी बन सकते है। यानी निकट भविष्य में जब भी भाजपा उत्तराखण्ड में सत्तारूढ़ हों तो तरूण विजय, गैर उत्तराखण्डी मूल के होने के बाबजूद अपने केन्द्रीय आकाओं के दम पर प्रदेश की लोकशाही को धत्ता बताते हुए नित्यानन्द स्वामी की तरह तरूण विजय भी मुख्यमंत्री बन सकते हैं।’ यह विचार यकायक उस समय मेरे मानस पर फिर प्रबल रूप से क्रोंधने लगा जब मुझे भगतसिंह कोश्यारी के सांसद निवास पर भाजपा के राज्यसभा सांसद ने मेरे सामने उत्तराखण्ड में अगल साल होने वाली विश्वविख्यात नन्दा देवी राजजात की तैयारियों व सुविधा के सम्बंध में एक रिपोर्ट बनाने के लिए जनदेव दर्शन यात्रा का शुभारंभ हल्द्वानी से बेदनी तक करने के अपने कार्यक्रम को सफल बनाने के लिए भाजपा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष भगतसिंह कोश्यारी को निमंत्रण दे कर लोटते हुए भाजपा नेता पूरण चंद नैनवाल को इस कार्यक्रम को सफल बनाने के लिए सहयोग देने का अनुरोध किया। तरूण विजय द्वारा लाये गये मिष्ठान का खाते समय ही मेरे मुह से लम्बे समय से क्रोंध रहा यह विचार अचानक ही मुंह से निकल गया।
9 अप्रैल 2012 को सांय पांच बजे तरूण विजय के इस कार्यक्रम की व्यापकता को देख कर मैं हैरान रह गया। मुझे लगा कि चाहे तरूण विजय में कितनी भी कमियां हो परन्तु उनको मुद्दों को अपने हितों में भूनाना आता है। उनके आगे उत्तराखण्ड के तमाम नेता बौने साबित होते है। ऐसा नहीं कि उत्तराखण्ड में नेताओं की कोई कमी भाजपा में हो, परन्तु प्रदेश के विशेषता को पूरे राष्ट्र के सामने रख कर उनको गौरवान्वित करने की कला उत्तराखण्ड के किसी नेता में नहीं है। कम से कम मंडूबे पर अपना कार्यक्रम करने के बाद जिस प्रखरता से तरूण विजय ने नन्दादेवी राजजात पर अपनी तरह का कार्यक्रम बना कर नेतृत्व किया और इसमें भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष से लेकर उत्तराखण्ड भाजपा के तमाम वरिष्ठ नेताओं को अपने साथ खडा किया उससे उनके नेतृत्व का चमत्कारिक गुण ही सामने आता है जो तमाम उत्तराखण्डी नेताओं को उनके आगे बौना साबित करता हे। न केवल भाजपा के नेताओं को अपितु कांग्रेस सहित तमाम प्रदेश के नेताओं को तरूण विजय की इस पहल से सबक लेनी कि कैसे चीजों को देश व जनता के समक्ष रखने के लिए महिमा मण्डित करने का गुण होना चाहिए। हालांकि तरूण विजय का भाजपा व संघ नेतृत्व से कोई आज का रिश्ता नहीं है। वे भाजपा की मातृ संगठन के मुख पत्र, पांचजन्य के सम्पादक रहने के साथ साथ भाजपा के शिखर पुरूष अटल व आडवाणी के भी करीबी रहे। हालांकि यहां तरूण विजय के कार्यों से भले ही संघ खुश न रहा हो, उनको जिन परिस्थितियों में पांचजन्य से विदाई दी गयी, जिस प्रकार से उन्होने अपनी संस्थाओं के कार्य किये उस पर अनैक लोग अंगुलिया उठाये परन्तु उनपर अटल के बाद आडवाणी जी को आशीर्वाद रहा तो उनको न केवल संघ के वरिष्ठ भाजपाई स्वयं सेवक रहे शेषाद्रीचारी जेसे दिग्गज नेताओं को भी नजरांदाज करके मध्य प्रदेश का निवासी होने के बाबजूद उत्तराखण्ड से राज्यसभा सांसद बनाया गया। यही नहीं उनको भाजपा का राष्ट्रीय प्रवक्ता भी बनाया गया। हालांकि उन पर भाजपा शासनकाल में प्रथम उत्तराखण्डी मुख्यमंत्री नित्यानन्द स्वामी के कार्यकाल में ही तरूण विजय की संस्था के लिए करोड़ों की जमीनी कोडियों के भाव प्रदान की गयी। इसमें देहरादून का घंटाघर से लगभग 13-14 किलोमीटर पर झाझरा में करोड़ों की सरकारी भूमि कौड़ियों के दाम में ले ली। सुत्रों के अनुसार 9 नवंबर 2000 को उत्तराखंड राज्य बना। उसी समय तरुण विजय ने अपने पिता के नाम से एक संस्था बनाई ‘स्वतंत्रता सेनानी लोकबंध्ुा राम मूर्ति पावसे सेवा न्यास।’ संस्था में  घर के ही लोग हैं। संस्था ने अपने अधीन ‘इन्फोर्मेशन टेक्नोलोजी इंस्टीट्यूट फॅार दी ट्राइब्स ऑफ इंडिया,’ के नाम से 16 फरवरी 2001 को सरकारी जमीन पट्टे पर दिए जाने का आवेदन किया। उन दिनो ंपांचजन्य के सम्पादक के पद पर कार्यरत तरूण विजय को प्रदेश सरकार ने  23 अप्रैल 2001 को संस्था से अनुबंध करके 12 एकड़ यानी लगभग 60 बीघा जमीन प्रदान कर दी। यह केवल अकेला मामला नहीं तरूण विजय ने संघ व भाजपा के अपने ऊंचे सम्पर्को का हमेशा जी भर के अपनी संस्थाओं के लिए दोहन किया। वाजपेयी सरकार के कार्यकाल में उनके सिंधु दर्शन से लेकर अब नन्दादेवी राजजात की लोकप्रियता को भुनाने के लिए 9 अप्रैल को भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष गडकरी के आवास से उनकी सरपरस्ती में उत्तराखण्ड के भाजपा के तमाम  नेताओं को जोत जो जनदेव यात्रा का शंखनाद किया, वह अपने आप में उनक विलक्षण प्रतिभा को ही उजागर करता है। परन्तु अफसोस होता है तरूण विजय की यह प्रतिभा उत्तराखण्ड के हितों के लिए भी होते तो प्रदेश की जनता को उनको उत्तराखण्ड से राज्यसभा सांसद बनाये जाने का अफसोस नहीं होता। गौरतलब हे कि तरूण विजय को राज्य सभा सदस्य हुए लम्बा समय बित गया परन्तु उनके मुंह से कभी प्रदेश की जनांकांक्षाओं का सम्मान करने वाले गैरसेंण राजधानी बनाने या मुजफरनगरकाण्ड के अभियुक्तों को सजा दिलाने, प्रदेश में व्याप्त भ्रष्टाचार व कुशासन से त्रस्त जनता को राहत दिलाने वाला बयान तक नहीं आया। हालांकि वे जिस तेजी से काम कर रहे हैं उनकी नजर कहीं भी आडवाणी की ही भांति प्रधानमंत्री के पद पर भी हो तो किसी को आश्चर्य नहीं होना चाहिए। तरूण विजय को  आडवाणी का ही नहीं अपितु आडवाणी के परिवार में सबसे राजनैतिक रूप से ताकतवर सदस्य यानी उनकी बेटी प्रतिभा आडवाणी का भी आशीर्वाद हासिल है। हालांकि उंची पंहुच के साथ साथ तरूण विजय का हमेशा ही विवादों के साथ भी चैली दामन की तरह का रिश्ता रहा। मध्य प्रदेश मूल के होने के साथ साथ उनका नाम जिस प्रकार से भोपाल की सूचना के अधिकार के लिए काम करने वाली समाजसेविका जिसका रहस्यमय ढ़ग से हत्या हुई थी, उसके साथ तरूण विजय की मित्रता की खबरों से एक बार लगा की तरूण विजय के राजनैतिक जीवन पर ग्रहण लग गया। पर जिस बेदाग ढ़ग से वे इस झंझावत से भी बाहर निकले यह उनके कौशल का ही एक छोटा सा नमुना हे। देश में भाजपा व संघ के तमाम शीर्ष नेताओ ंके सानिध्य में काम करने से इसकी छाप उनके व्यक्तित्व पर साफ दिखाई देती है।  अब नन्दा राजजात की लोकप्रियता को भुनाते हुए तरूण विजय ने भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन गडकरी के हाथों से उनके ही आवास पर 9 अप्रेल सोमवार को दिल्ली में इस जनदेव दर्शन यात्रा का उद्घाटन कराया। इस अवसर पर तरुण विजय ने कहा कि नन्दादेवी राजजात यात्रा को सफल बनाने व इसकी तेयारी के लिए प्रारम्भ की जाने वाली इस जनदेव यात्रा में  विभिन्न क्षेत्रों से उत्तराखंड के नागरिकों को भी आमंत्रित किया जाएगा। इसके लिए विशेष वेबसाइट का निर्माण किया गया है। इस के तहत अगले वर्ष होने वाली नंदादेवी राजजात यात्रा की तैयारियों और सुविधा के संबंध में एक रिपोर्ट भी तैयार की जाएगी जो कि प्रधानमंत्री मनमोहन सिह व मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा को सौंपी जाएगी। इस अवसर पर सांसद भगत सिंह कोश्यारी, भाजपा के उत्तराखंड प्रभारी थावरचंद गहलौत, प्रदेश भाजपा अध्यक्ष बिशन सिंह चुफाल, पूर्व मुख्यमंत्री रमेश पोखरियाल निशंक, हरबंस कपूर, प्रकाश पंत, अजय भट्ट, दीपक मेहरा ,भाजपा नेता पूरण चंद नैनवाल, पंचायत राज प्रकोष्ठ के केन्द्रीय कार्यालय प्रभारी विजय सत्ती व उत्तराखण्ड प्रकोष्ठ के संयोजक श्याम लाल मंझेडा सहित अन्य अधिकारी उपस्थित थे। हालांकि इस कार्यक्रम में भाजपा नेता पूर्व मुख्यमंत्री भुवनचंद खंडूडी को भी आना था परन्तु वे नहीं आये।
अब देखना यह है कि एक सफल राजनेता की तरह तरूण विजय जिस तेजी व मजबूती से अपनी पकड़ राजनीति, सामाजिक, सांस्कृतिक व बौद्धिक जगत के साथ साथ पत्रकारिता के क्षेत्र में चहुमुखी कर रहे हैं उससे तरूण विजय को उत्तराखण्ड का दूसरा नित्यानन्द स्वामी बनने की आशंका सच में साकार होते प्रतीत होती है। मुझे उनकी गतिविधियों  पर एक नजर दोडाने व उनके चेहरे पर उनके भावों को पड़ने के बाद यह कहने में भी कोई संकोच नहीं होता कि तरूण विजय की नजर भाजपा में आडवाणी नहीं अपितु अटल बनने की है। यानी देश का प्रधानमंत्री बनने की भी  हो तो इसमें मुझे कोई संशय नहीं होगा। परन्तु उनको एक ही ध्यान रखना चाहिए कि वे निष्कपट ढ़ंग से यदि यह सब करते तो भगवान बदरीनाथ उन पर अवश्य कृपा करता। परन्तु देवभूमि के साथ खिलवाड़ करने की धृष्ठता करने वालों को महाकाल कभी माफ नहीं करता।