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Tuesday, April 30, 2013


कांग्रेसी दिग्गज तिवारी द्वारा विजय बहुगुणा के इस्तीफे की मांग से कांग्रेस आला कमान पर बढा मुख्यमंत्री को हटाने के लिए भारी  दवाब 


निकाय चुनाव में कांग्रेस, भाजपा से ही नहीं स्वतंत्र प्रत्याशियों ने चटाई धूल,

 6 नगर निगमों में कांग्रेस का पूरा सफाया, 4 भाजपा व 2 निर्दलीय

इस शर्मनाक हार को भी मुख्यमंत्री बहुगुणा व यशपाल की जीत बता रहे हैं चाटुकार कांग्रेसी 


उत्तराखंड में टिहरी संसदीय उपचुनाव के बाद नगर निकाय चुनावों में भी कांग्रेस को करारा झटका लगा है। कांग्रेस के दिग्गज नेता व उत्तराखण्ड के पूर्व मुख्यमंत्री नारायणदत्त तिवारी ने इन चुनावों में करारी हार के लिए मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा से इस्तीफा मांग कर सबको चैंका दिया। हालांकि कांग्रेस ही नहीं प्रदेश के अधिकांश लोग विजय बहुगुणा को एक पल के लिए भी मुख्यमंत्री के पद पर आसीन नहीं देखना चाहते। परन्तु तिवारी के समर्थन की बदोलत दिल्ली दरवार के प्यादों ने कांग्रेस आला कमान को गुमराह करके जिस प्रकार से मुख्यमंत्री बनाया वह अब तिवारी द्वारा इस्तीफा मांगने की मांग के बाद प्रदेश की राजनीति में जबरदस्त दवाब कांग्रेस आला नेतृत्व पर विजय बहुगुणा को हटाने का पडने लगा है। जिस प्रकार से सतपाल महाराज ने सरकार व संगठन दोनों को इस हार के लिए दोषी ठहराया और उसके बाद आये चुनाव परिणामों पर तिवारी की इस्तीफे की मांग ने प्रदेश की राजनीति में एक जबरदस्त बदलाव के संकेत दिये है। हालांकि इस हार के बाबजूद कांग्रेस का एक ऐसा आत्ममुग्ध तबका है जो प्रदेेश की इस हार के बाबजूद भी विजय बहुगुणा और यशपाल आर्य की आरती उतारने में लगा है और चुनाव परिणाम को कांग्रेस की जीत बताते हुए प्रदेश मुख्यालय में मिष्ठान वितरित करने में लगा हुआ था। यही नहीं इस आशय की प्रेस विज्ञप्ति भी कांग्रेस के प्रवक्ता धीरेन्द्र प्रताप ने जारी करके इन चुनावों को विजय बहुगुणा व यशपाल आर्य के नेतृत्व की जीत बताया था।
 प्रदेश के सभी 6 नगर निगमों में कांग्रेस का पूरी तरह सफाया हुआ। अभी तक 5 नगर निगम चुनाव परिणामों में देहरादून, हरिद्वार, हल्द्वानी व रूद्रपुर जैसे प्रतिष्ठित चार भाजपा  तथा काशीपुर व रूड़की निर्दलीय की झोली में गये।
काशीपुर नगर निगम चुनाव में भी निर्दलीय प्रत्याशी ऊषा चैधरी ने कांग्रेसी प्रत्याशी रूखसाना अंसारी को 7418 मतों से पराजित किया। यहां निर्दलीय प्रत्याशी को 23958 मत मिले वहीं कांग्रेसी प्रत्याशी को 16540 मत मिले।
 रूद्रपुर नगर निगम के मेयर के पद पर भाजपा ही विजयी रही। यहां भाजपा की सोनी कोहली को 25465 मत मिले वहीं कांग्रेस के प्रत्याशी ममता रानी को 21423 मत मिले। भाजपा प्रत्याशी को यहां 4042 मतों से विजय मिली। देहरादून, हल्द्वानी व हरिद्वार भी भाजपा ने फतह कर ली है।
 रूड़की नगर निगम के चुनाव में निर्दलीय प्रत्याशी ने भाजपा व कांग्रेस को धूल चटायी। देहरादून नगर निगम में भाजपा को फतह मिली। यहां  कुल 196750 वोट पड़े - विनोद चमोली को 80530 मत मिले व कांग्रेस के  सूर्यकांत धस्माना को 57618 तथा बसपा की  रजनी रावत को - 46689 मत मिले।  मेयर पद के लिए अन्य सातों प्रत्याशियों की जमानत ही जब्त हो गयी।  उक्रांद प्रत्याशी मनमोहन लखेड़ा को 3302, निर्दलीय प्रत्याशी सरदार खान को 2192, संजय गोयल -2191,मकबूल अहमद -1777 मत व राजेन्द्र प्रसाद को 1520 मत ही मिले। वहीं  क्षेत्रीय गठबंधन का संयुक्त प्रत्याशी राजीव कोठारी को 500 वोट और शिवदर्शन सिंह रावत को 430 वोट मिले।
वहीं हल्द्वानी नगर निगम में कुल 64441वोट पड़े। यहां भाजपा के  डा. जोगेंद्र सिंह को  22023, सपा के अब्दुल मतीन सिद्दकी को 20614 तथा कांग्रेस के प्रत्याशी हेमंत बगड़वाल को 13803 मत मिले।
हरिद्वार नगर निगम चुनाव में कुल 100393 वमत पड़े। यहां भाजपा के प्रत्याशी मनोज गर्ग  को 48958,  कांग्रेस के ऋषिश्वरानंद को 31803 एवं निर्दलीय प्रत्याशी  मुरली मनोहर को 9744 मत मिले।
ं रुड़की नगर निगम चुनाव में कुल 52652 वोट पडे। यहां निर्दलीय प्रत्याशी यशपाल राणा को 15763 मत मिले व भाजपा के महेंद्र कुमार अरोड़ा को 15653 तथा बसपा प्रत्याशी अख्तरी बेगम को 4253 मत मिले।
प्रदेश की सबसे प्रतिष्ठित देहरादून नगर निगम के मेयर पद के साथ साथ नगर निगम में भी भाजपा ने देहरादून स्पष्ट बहुमत हासिल कर लिया। देहरादून नगर निगम में 60 में से 33 वार्डों पर भाजपा परचम फहरा कर स्पष्ट बहुमत हासिल कर गयी। वहीं कांग्रेस -24,बसपा -1 व 2 स्थानों पर निर्दलीय विजयी रहे। जबकि पिछले कार्यकाल में भाजपा के पास केवल 28 पार्षद थे।
पालिकाओं व नगर पंचायतों के घोषित 69 नतीजों में भी कांग्रेस तीसरे नम्बर में रही । सबसे ज्यादा निर्दलीय व दूसरे पर भाजपाइ्र व तीसरे पर कांग्रेस रही।  पालिकाओं व नगर पंचायतों में 22 पर भाजपा,, 21 पर कांग्रेस, एक बसपा, एक उक्रांद और 24सीटें निर्दलीयों के हिस्से में गई हैं।
जिन नगर पालिकाओं व नगर पंचायतों में भाजपा विजयी रही उनमें रुद्रप्रयाग, अगस्तमुनि जोशीमठ,नंदप्रयाग, गैरसैंण, कीर्तिनगर, मुनिकी रेती,अल्मोड़ा, पिथौरागढ़, नैनीताल, बागेश्वर और चंपावत  प्रमुख है। वहीं जिनमें कांग्रेस विजयी रही उनमें ऋषिकेश, चमोली, श्रीनगर, टिहरी, देवप्रयाग व उत्तरकाशी में निर्दलीय तथा चिन्यालीसौड़, नरेंद्रनगर, पुरोला और गौचर आदि प्रमुख है।
कांग्रेस के विजयी नगर पालिका व नगर पंचायत अध्यक्ष में विजयी प्रत्याशियों में बागेश्वर -गीता रावल, अल्मोड़ा से प्रकाश जोशी, लालकुआं -रामबाबू मिश्रा  लोहाघाट -लता वर्मा, पिथौरागढ़ -जगत सिंह खाती, पुरोला - प्यारेलाल हिमानी ,बड़कोट -कांग्रेस के अतोल रावत ,नरेन्द्रनगर -दुर्गा राणा,  मसूरी -मनमोहन सिंह मल्ल, गौचर -मुकेश नेगी, सितारगंज -कांता प्रसाद सागर,खटीमा -सुरैया बेगम,किच्छा -पप्पू चावला,बाजपुर -जसवीर कौर, शक्तिफार्म -सुक्रांत ब्रह्म, टनकपुर -लक्ष्मी पांडेय , विकासनगर -नीरज अग्रवाल 6 मतों से विजयी रहे है।  ऊखीमठ में कांग्रेस की रीता पुष्पवाण ने भाजपा प्रत्याशी बबीता भट्ट को चार मतों के अंतर से हराया।

भाजपा के विजयी नगर पालिका व नगर पंचायत अध्यक्ष में डोईवाला - कोमल कन्नौजिया,भीमताल -राजेश नेगी,भवाली -नीमा बिष्ट, कालाढूंगी -पुष्कर कत्यूरा,चंपावत - प्रकाश तिवारी, गंगोलीहाट -विमल रावत,डोईवाला -कोमल कन्नौजिया, मुनीकीरेती -शिवमूर्ति कंडवाल, कीर्तिनगर -कल्पना कठैत,जोशीमठ -रोहिणी रावत,रुद्रप्रयाग -राकेश नौटियाल, अगस्त्यमुनि -अशोक खत्री, स्वर्गाश्रम जौंक -शकुंतला देवी राजपूत,गदरपुर -अंजू भुड्डी  आदि प्रमुख है।
निर्दलीय-,पौड़ी में यशपाल बेनाम, कफकोट से कांग्रेस के बागी चंपा देवी,  द्वाराहाट -विमला साह,हरबर्टपुर -वीना शर्मा ,टिहरी -उमेशचरण गुसाई (भाजपा के बागी),देवप्रयाग -सुभांगी कोटियाल,चंबा -विक्रम पंवार,पोखरी -सुशीला रावत,कर्णप्रयाग -सुभाष गैरोला, उत्तरकाशी -जयेंद्री राणा,लोहाघाट -लता वर्मा
कुमाऊं मंडल मुख्यालय नैनीताल में उत्तराखंड क्रांति दल खाता खोलने में सफल रहा। यहां नगर पालिका अध्यक्ष पद पर उत्तराखंड क्रांति दल के श्यामनारायण विजयी रहे हैं। उक्रांद निकाय चुनाव में केवल इसी प्रतिष्ठित में गरीमामय स्थान हासिल कर पायी। वहीं बसपा, कोटद्वार नगर पालिका अध्यक्ष पद पर बसपा कब्जा करने में सफल रहे।
वहीं गढ़वाल मण्डल मुख्यालय पौड़ी की नगर पालिका के अध्यक्ष पद पर बेनाम निर्दलीय प्रत्याशी व पूर्व विधायक यशपाल 1250 मतों से विजय रह कर भाजपा व कांग्रेस को धूल चटाने में सफल रहे। यही नहीं पौड़ी नगर पालिका के सभी 11 वाडरें में निर्दलीय उम्मीदवारों ने बाजी मारी है।
वहीं गैरसैंण नगर पंचायत में भी भाजपा प्रत्याशी विजय रहे।
नगर पालिका ऋषिकेश में तीसरी बार दीप शर्मा ने 13738 मत हासिल कर पालिकाध्यक्ष का ताज पहनकर कांग्रेस व भाजपा को करारा सबक सिखाया। वहीं ऐसे जमीनी नेता को नजरांदाज करने का करारा तमाचा खा कर कांग्रेस को अपने ऐसे दुर्दिन देखने पडे। उन्होंने अपने प्रतिद्वंद्वी भाजपा की स्नेहलता (8472 मत) को धूल चटाई । यहां से कांग्रेसी प्रत्याशी विनय सारस्वत केवल 4981 मत प्राप्तने के बाबजूद अपनी जमानत भी नहीं बचा पाये। यहां से बसपा के राजेश कुमार को 660 मत मिले। वहीं देवभूमि पार्टी के प्रत्याशी गोपाल कृष्ण शर्मा को 663 मत प्राप्त हुए।

निकाय चुनाव में कांग्रेस की शर्मनाक पराजय के लिए इस्तीफा दें मुख्यमंत्री बहुगुणा को तुरंत हटाये कांग्रेस आला कमान


बहुगुणा को बलात मुख्यमंत्री बनाने से आक्रोशित जनता ने कांग्रेस को निकाय चुनाव में किया दण्डित 


कांग्रेस नेतृत्व को प्रदेश में बहुगुणा को मुख्यमंत्री बनाने के लिए दवाब डालने वाले आत्मघाती प्यादों को भी हटाना चाहिए


उत्तराखण्ड प्रदेश में मेयर के हुए चुनाव में सबसे महत्वपूर्ण समझे जाने वाले प्रदेश के 6 नगर निगमों में पहला चुनाव परिणाम 30 अप्रैल को 11 बज कर 10 मिनट पर रूड़की नगर निगम का आया। मेयर ने रूड़की के मेयर बने निर्दलीय प्रत्याशी यशपाल राणा। हालांकि पहले खबर आयी कि भाजपा के महेन्द्र काला को विजय घोषित किया गया। श्री राणा ने भाजपा के महेन्द्र काला को पुन्न मतगणना के बाद 110 मतों से पराजित किया। निर्दलीय प्रत्याशी यशपाल राणा ने प्रदेश की राजनीति में काबिज कांग्रेस, भाजपा, बसपा, उक्रांद सहित सभी दलों को धूल चटाते हुए विजयी। हरिद्वार संसदीय सीट व रूड़की विधानसभा सीट पर काबिज कांग्रेस को यहां पर हार का मुंह देखने से आगामी लोकसभा चुनाव में कांग्रेस के लिए किसी खतरे की घण्टी से कम नहीं है। हरिद्वार संसदीय सीट में भाजपा व कांग्रेस के साथ साथ बसपा का भी काफी प्रभाव साफ देखने को मिलता है। परन्तु इस चुनाव में निर्दलीय प्रत्याशी जीतना व हरिद्वार में भी भाजपा द्वारा बाजी मारने से हरिद्वार संसदीय सीट से वर्तमान सांसद व मनमोहन सरकार के कबीना मंत्री हरीश रावत के लिए खतरे की घण्टी तो है ही। वहीं कांग्रेस आला नेतृत्व को एक प्रकार की साफ चेतावनी है कि जिस उत्तराखण्ड की जनता ने विधानसभा चुनाव में भाजपा को हरा कर सत्तासीन किया था उस जनादेश का सम्मान करने के बजाय विजय बहुगुणा जैसे जनता की जनरों में पहले से उतरे हुए नेता को बलात अपने विधायकों की इच्छा के बाबजूद बलात थोप कर रौदने की कुचेष्टा की उसका जवाब प्रदेश की जनता न केवल आगामी लोकसभा चुनाव में कांग्रेस का सफाया करके देगी अपितु वर्तमान निकाय चुनाव में जनता ने अपनी मंशा जग जाहिर कर दी। प्रदेश की सबसे महत्वपूर्ण 6 नगर निगम के चुनाव के साथ साथ 28 नगरपालिकाएं, 35 नगर पंचायतें यानी कुल 69 नगर निकाय मेयर, नगर पालिका अध्यक्ष, नगर पंचायत प्रमुख व पार्षदों व सदस्यों के कुल 3898 प्रत्याशी चुनावी दंगल में थे। इसमें कांग्रेस के 67 तो भाजपा के 63 निकायों के अध्यक्ष या प्रमुख पद पर प्रत्याशी चुनावी समर में उतरे थे। अब तक के रूझान के अनुसार देहरादून, हरिद्वार हल्द्वानी में जिस प्रकार से अधिकांश नगर निगमों में कांग्रेस के प्रत्याशी हार रहे है। उससे जनाक्रोश कांग्रेस के खिलाफ साफ झलकता है। खासकर जिस प्रदेश की जनता ने भाजपा ही नहीं स्वामी रामदेव व अण्णा-अरविन्द केजरीवाली के भारी विरोध के बाबजूद भी कांग्रेस को प्रदेश की सत्ता सौंपी उस प्रदेश की जनता के जनादेश का सम्मान करते हुए साफ छवि के जनप्रिय नेता को मुख्यमंत्री बनाने के बजाय विजय बहुगुणा जैसे जनता व कांग्रेसी विधायकों में अलोकप्रिय नेता को मुख्यमंत्री बनाने का जनविरोधी कार्य किया। उससे प्रदेश की जनता ने अपना अपमान समझा। इस आपमान का कम करने के बजाय मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा ने जिस प्रकार से जनहितों पर अपने कार्यो से प्रहार किया उससे जनता ने कांग्रेस को सबक सिखाने का मन बना लिया है। हालांकि तमाम शासन तंत्र को झोंकने के बाबजूद अपनी शर्मनाक हार को नहीं बचा पाये विजय बहुगुणा। कांग्रेस आला कमान को अगर कांग्रेस व उत्तराखण्ड से जरा सा भी लगाव है तो उन्हें विजय बहुगुणा को तत्काल मुख्यमंत्री की कुर्सी से हटा कर कांग्रेस के और पतन से बचाना चाहिए। इसके साथ कांग्रेस आला नेतृत्व को अपने उन आत्मघाती सलाहकारों से दो टूक शब्दों में पूछना चाहिए कि जिन्होंने जनादेश को रौंद कर प्रदेश में बलात विजय बहुगुणा को मुख्यमंत्री बना कर प्रदेश के साथ साथ कांग्रेस की जडों में मट्ठा डाला। ऐसे आत्मघाती सलाहकारों से कांग्रेस जितना जल्द किनारा करेगी उतना कांग्रेस व देश के हित में होगा।
केन्द्रीय जांच ब्यूरों के हलफनामे से सर्वोच्च न्यायालय आक्रोशित, सरकार व सीबीआई बेनकाब 

केन्द्रीय जांच ब्यूरों को सरकारी नियंत्रण के पक्ष में है सर्वोच्च न्यायालय 


नई दिल्ली(प्याउ)। सर्वोच्च न्यायालय देश में निष्पक्ष जांच के लिए केन्द्रीय जांच ब्यूरों को सरकार के नियंत्रण से मुक्त कराना चाहती है। सीबीआई के हलफनामें पर अपनी प्रतिक्रिया करते हुए न्यायालय ने कहा कि सरकार ने हमारा भरोसा तोड़ा है। इस हलफनामे की बातें बहुत ही चिंताजनक हैं। जिस तरह से स्टेटस रिपोर्ट को सरकार के लोगों से शेयर किया गया है उससे पूरी प्रक्रिया को झटका लगा है। कोर्ट ने कहा कि स्टेटस रिपोर्ट सरकार से साझा करने से हमारी जांच की बुनियाद हिल गई है।कोयला घोटाले पर सीबीआई के हलफनामे को लेकर सरकार की किरकिरी और बढ़ गई है। सुप्रीम कोर्ट ने हलफनामे में सरकारी दखल को लेकर सख्त टिप्पणियां की हैं। इसे लेकर हो रही सुनवाई के दौरान कोर्ट ने सरकार से सीबीआई को सियासी दवाब से मुक्त करने को कहा।इस प्रकरण से सरकार पर लगने वाले इन आरोपों की पुष्टि ही हुई कि सरकार अपने विरोधियों को डराने व धमकाने के लिए सीबीआई का दुरप्रयोग करती है। गौरतलब है कि सीबीआई ने कोयला घोटाले में सर्वोच्च न्यायालय ने सीबीआई से रिपोर्ट को सरकार सहित किसी को नहीं दिखाने व सीधे न्यायालय में पेश करने का दो टूक निर्देश दिया था। परन्तु इस निर्दश के बाबजूद सीबीआई ने जो हलफनामा बाद में सर्वोच्च न्यायालय में पेश किया कि कोयला घोटाले की जांच मामले की रिपोर्ट को न केवल कानून मंत्री अपितु प्रधानमंत्री कार्यालय सहित सचिवों से भी सांझी की गयी। इस हलफनामें ने केन्द्र सरकार को पूरी तरह से बेनकाब कर दिया वहीं न्यायालय को भी आक्रोशित कर दिया। वहीं सीबीआई की निष्पक्षता भी तार तार हो गयी। इस प्रकरण से प्रधानमंत्री व कानून मंत्री को इस्तीफा देना चाहिए परन्तु बलि का बकरा महाधिवक्ता को बनाया जा रहा है। जिस प्रकार से बार बार सरकार पर आरोप लग रहा है कि वह अपने विरोधियों को ही नहीं सहयोगियों को भी सीबीआई के डंडे से अंकुश में रखती है। खासकर ममता बनर्जी व द्रुमुक द्वारा सरकार से समर्थन वापस लेने के बाद जिस प्रकार से बसपा व सपा दोनों एक दूसरे के घोर विरोधी दल भी बिना शर्म कांग्रेस गठबंधन की सरकार को बाहर से समर्थन दे कर अल्पमत सरकार को गिरने से बचा रही है। खुद सरकार को समर्थन देने वाले सपा प्रमुख मुलायम सिंह व बसपा की प्रमुख मायावती ने कांग्रेस सरकार पर यह आरोप लगाया कि वह अपने विरोधियों को सीबीआई के डण्डे के बल पर अंकुश लगाती है। गौरतलब है कि मायावती व मुलायम सिंह दोनों पर ज्ञात स्रोतों से अधिक सम्पति का मामलों की सीबीआई जांच कर रही है। जिसकी कछुवा गति से हो रही जांच पर खुद कानून के जानकार भी प्रश्न उठा चूके हैं। ऐसा नहीं कि केवल कांग्रेस ही सीबीआई का दुरप्रयोग कर रही है । अभी तक जो भी सरकार केन्द्र की सत्ता में आसीन रहती है उस पर सीबीआई का दुरप्रयोग अपने राजनैतिक विरोधियों को प्रताड़ित व दण्डित करने का काम करते है। ऐसा आरोप सभी दलों की सरकारों पर उस समय की विपक्षी दलों ने लगाया। अब इस बार सीबीआई के हलफनामे के बाद इस प्रश्न पर गंभीरता से विचार किया जाना चाहिए। खासकर जिस प्रकार से सर्वोच्च न्यायालय इस प्रकरण से काफी आहत है उसके बाद अब समय आ गया कि देश में न्याय व्यवस्था की निष्पक्षता बनाये रखने के लिए सीबीआई को सरकार के अंकुश से दूर रखा जाय। ऐसी ही मांग भ्रष्टाचार के खिलाफ चले अण्णा हजारे आंदोलन व बाबा रामदेव के साथ साथ केजरीवाल सहित तमाम आंदोलनकारी बार बार करते आये है। इस हलफनामें के बाद अब सीबीआई को सरकार के अंकुश में रखना एक प्रकार न्याय का गला घोंटना ही होगा। नहीं तो जनता का न्याय प्रणाली से विश्वास पूरी तरह से उठ जायेगा।
कांग्रेस के कुशासन व भाजपा में नेतृत्वहीनता से व्यथित 

केजरीवाल की पार्टी को दिल्ली राज्य की बागडोर सौंपना चाहती है जनता 


प्यारा उत्तराखण्ड की विशेष रिपोर्ट

कांग्रेस की शीला सरकार के कुशासन व भाजपा में नेतृत्वविहिनता को देख कर व्यथित आम जनता आगामी विधानसभा चुनाव में सुशासन देने का वादा करने वाले अरविन्द केजरीवाल की आम आदमी पार्टी को एक अवसर देना चाहती है। जिस प्रकार से डेढ़ दशक से दिल्ली की सत्ता में काबिज दिल्ली की कांग्रेसी सरकार की मुखिया शीला दीक्षित ने सत्तांध हो कर बिजली व पानी के बिलों में भारी बढ़ोतरी करने के साथ दिल्ली की परिवहन व्यवस्था को एक प्रकार से मृतप्रायः करके दिल्ली की आम जनता का जीना दूश्वार कर दिया है। उससे मुक्ति की आश लगा कर भाजपा की तरफ निहार रही दिल्ली की जनता की आशाओं में मुख्य विपक्षी दल भाजपा मंे मदन लाल खुराना के बाद दिल्ली में नेतृत्वहिनता को देख कर गहरी निराशा छायी है। इस सत्तापक्ष के कुशासन व विपक्षी दल की नेतृत्वहिनता को देख कर व्यथित जनता को अब केवल दिल्ली में बिजली व पानी के बिलों में भारी बढोतरी व लूट खसोट के खिलाफ सड़कों पर विगत एक साल से संघर्ष करने वाले अरविन्द केजरीवाल के नेतृत्व वाली ‘आम आदमी पार्टी’ को दिल् ली की बागडोर सौंपने का मन बना रही है। हालांकि अभी उनको अरविन्द केजरीवाल की पार्टी पर पूरा भरोसा नहीं है परन्तु पार्टियों की भरमार होने के बाबजूद दिल्ली की जनता को अरविन्द के अलावा दिल्ली सरकार के कुशासन से मजबूती से जनहितों के लिए संघर्ष करने वाला कोई अन्य दूर दूर तक नहीं दिखाई दे रहा है। जिस प्रकार से अरविन्द केजरीवाल ने शीला सरकार के कुशासन को सडकों पर बेनकाब करने के संघर्ष किया वेसा तेवर व निष्टा दिल्ली की जनता को कहीं दूर दूर तक भाजपा में नहीं दिखाई दे रही है। दिल्ली भाजपा का नेतृत्व अगर अरूण जेटली व सुषमा करती तो जनता में जरा विश्वास करती। परन्तु अरूण जेटली व सुषमा की नजर देश के प्रधानमंत्री की कुर्सी पर है। दिल्ली से उनका कितना लगाव व नजता से कितनी दूरी है यह गत लोकसभा चुनाव में दिल्ली से इन दोनों नेताओं द्वारा लोकसभा चुनाव की ताल ठोकने का साहस तक न जुटा सकने से उजागर हो गयी है। दिल्ली में मदन लाल खुराना जैसे जमीनी नेतृत्व को उखाड़ने का दण्ड आज भी भाजपा भोग रही है। ऐसा नहीं है कि भाजपा में नेताओं की कमी है परन्तु दिल्ली के मठाधीश पर मण्डल व कमंडल के बाद देश में आये व्यापक राजनीति के क्षेत्र में बदलाव के बाद भी दिल्ली की राजनीति में एकाधिकार समझने वाली भाजपा अपने 60 साल पुराने समीकरण को ही थोपने की नापाक कोशिश करती है। भाजपा नेतृत्व भूल गया कि उत्तराखण्ड, उत्तरप्रदेश व बिहार से आये लोगों की दिल्ली में इन 30 सालों में जनसंख्या का 60 प्रतिशत हो गया है। इनको नजरांदाज करके केवल अपने 6 दशक पुराने राजनीति समीकरण को ही नेतृत्व में थोपना भाजपा के लिए आत्मघाती साबित हो रहा है। खासकर जिस प्रकार ने भाजपा में नगर निगम की स्थाई समिति के पूर्व अध्यक्ष रहे जगदीश मंमगाई ने जब भाजपा नेतृत्व से दिल्ली में नये बदलाव के अनरूप नेतृत्व देने की मांग की तो भाजपा ने उनका अपमान किया इसी कारण उन्होंने एक दर्जन से अधिक भाजपा के दूसरी पंक्ति के नेताओं को साथ ले कर दिल्ली में प्रोग्रेसिव पार्टी को दिल्ली की राजनीति में उतार दिया है। दिल्ली नगर निगम चुनाव में इस दल को भी हर सीट पर भाजपा के लिए गले की हड़डी साबित हुई। अब विधानसभा चुनाव की भी यह पार्टी ताल ठोक रही है। परन्तु दिल्ली की जनता का ध्यान अभी इस दल से अधिक अरविन्द केजरीवाल की आप पार्टी पर है।
हालत यह है कि दिल्ली में चुनावी दंगल में उतरने वाले हर तेज तरार उम्मीदवार की कोशिश यह है कि अगर उसको भाजपा या कांग्रेस से टिकट नहीं मिलता तो वह बसपा सहित अन्य तमाम दलों के बजाय अरविन्द केजरीवाल की आप पार्टी से चुनाव लड़ना पसंद कर रहा है। इसी कारण जनांदोलनों में अण्णा के अलग होने के बाद आम जनता का उतना विश्वास अरविन्द केजररीवाल की साथ नहीं रहा। जनता का समर्थन भी उतना नहीं दिखा। परन्तु राजनीतिक पार्टी बनाये जाने के बाद व दिल्ली की वर्तमान राजनैतिक हालतों को देखने के बाद आप पार्टी की रैलियों में भारी जन समर्थन इन दिनों दिखाई दे रहा है। इसका एक ही कारण है कि जनता आप पार्टी को भाजपा व कांग्रेस से बेहतर अब अरविन्द केजरीवाल की आप पार्टी नजर आ रही है। इसका कारण खुद अरविन्द केजरीवाल का जनहितों को प्रमुखता से उठाना व उनका प्रशासनिक क्षमता पर लोगों को इतना विश्वास है कि अगर अरविन्द केजरीवाल की पार्टी दिल्ली में सत्तासीन होती है तो वह जरूर अपने वादे के अनुसार लोगों को बिजली व पानी के आसमान को छूते हुए बिलों से राहत देगी अपितु शिक्षा, चिकित्सा, परिवहन जैसे पटरी से उतर चूके संस्थानों को भी ठीक करेगी। इसके साथ दिल्ली में बिल्डर माफिया व पुलिस प्रशासन के साथ नेताओं के नापाक गठजोड़ पर अंकुश लगायेगी। देखना यह है कि अरविन्द आने वाले दिनों में जनता के इस विश्वास को अपने कार्यो से कितना मजबूत करते है। भले ही आज जनता का एक बड़ा वर्ग अरविन्द के जनांदोलन में भूमिका से पूरी तरह सहमत नहीं है परन्तु दिल्ली की वर्तमान राजनीति में जनता के पास अरविन्द से बेहतर कोई नेतृत्व नहीं है। सबसे अहं सवाल यह है कि दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित ने जिस प्रकार दिल्ली में बिजली, पानी के बिलों के अंधी मार से लोगों का जीना दूश्वार कर दिया है और चिकित्सा, शिक्षा व परिवहन को पूरी तरह ध्वस्थ करते हुए आम आदमी की पंहुच से कोसों दूर कर दिया है। उससे जनता को मुक्ति की आश अब केवल अरविन्द केजरीवाल में ही दिखाइ्र दे रही है। हालांकि लोगों में यह भी धारणा बन रही है कि कांग्रेस व अरविन्द दोनों का मिला जुला खेल चल रहा है परन्तु दिल्ली में भाजपा की नेतृत्वहिनता के कारण जनता के पास अरविन्द केजरीवाल के अलावा कोई ऐसा सशक्त विकल्प कहीं दूर दूर तक नहीं दिखाइ्र दे रहा है। देखते है कि विधानसभा चुनाव होने तक अरविन्द अपनी इस विश्वसनीयता को कहां तक बनाये रखते है। यह बात उन्हें भी समझनी चाहिए कि जनता कहीं दूर दूर तक छलावा व धोखेबाजों को माफ नहीं करती।

Monday, April 29, 2013

अंधेरों में दिल लगाने वालो, उजालों से ना डरा करो

कुंये से बाहर निकल खुले आकाश का तो नजरा लो


तुम्हारी लक्ष्मण रेखाओं से कहीं बढ़ कर है ये दुनिया 


जरा अज्ञानता की केचुली से बाहर निकल कर देखो



-देवसिंह रावत

चीन की गुण्डागर्दी के आगे, भारतीय नेतृत्व का शर्मनाक व राष्ट्रघाती आत्मसम्र्पण


चीन सीमा पर सबसे कमजोर उत्तराखण्ड की सीमा पर 65 साल से रेल मार्ग नहीं बना पाया भारत


चीन द्वारा भारतीय सीमा के अंदर 19 किमी आ कर बलात काबिज हो कर इसे अपना हिस्सा ही मान रहा है व बडी बेशर्मी से चीन अपने इस कृत्य को जायज ठहरा रहा है। यही नहीं चीन ने भारत नेतृत्व की कायरना गुहार को नजरांदाज करते हुए इस क्षेत्र में न केवल कब्जा किया है अपितु यहां पर अपने कई टेण्ट भी लगा कर भारत के स्वाभिमान व अखण्डता को रौंदते हुए खुली गुण्डागर्दी दिखा रहा है।  वहीं की मनमोहन सरकार चीन से एक घण्टे में यह क्षेत्र मुक्त कराने के बजाय ममना बन कर उससे कठोरता से दो टूक शब्दों की चेतावनी देने का साहस तक नहीं जुटा पा रहा है। क्या ऐसी अक्ष्मय हरकत संसार का कोई भी देश स्वीकार कर सकता है। कभी नहीं। अभी उत्तर कोरिया ने अपने एकता व अखण्डता के लिए न केवल दक्षिण कोरिया अपितु अमेरिका को भी जिस लहजे में धमकाया था उससे अमेरिका ही नहीं अपितु पूरा विश्व सहम गया था। परन्तु भारतीय हुक्मरानों ने चीन से ही नहीं पाक से भी भारत के हजारों वर्ग किमी क्षेत्र को अपनी नपुंसकता के कारण गंवा दिया। वहीं बांगलादेश भी भारत को आंखे दिखा रहा है।
हालत इतनी शर्मनाक है कि भारतीय नेतृत्व इस समस्या पर चिंता प्रकट कर रही भारतीय जनमानस को इस मुद्दे को ही तुल न देने की सीख दे रहा है। तमाम फलेग बैठकों में भारत गुहार लगा रहा है कि यह क्षेत्र भारत का हे और चीन ने इस पर कब्जा कर लिया परन्तु चीन भारत के दावे को नकारते हुए इसे अपना हिस्सा बता कर यहां से हटना तो रहा दूर अपितु चीन ने यहां ंपर कई तम्बू गाड कर अपनी सैनिक चोकी का ही निर्माण कर दिया है। देश की जनता इस बात से हैरान है कि भारत सरकार,  चीन से सम्बंध तोड़ने के बजाय बेशर्म व ताकत में अंधे चीन से बार बार गिडगिडा रही है और अब बेशर्म हो कर अपने विदेश मंत्री को चीन भेज रही है। भारत सरकार भूल गयी कि चीन बातों की नहीं ताकत की भाषा को समझता है। भारत की नाक को कटाने के लिए उतारू भारत सरकार की नपुंसकता को देख कर आम जनता जहां स्तब्ध है वहीं भारत की जांबाज सेना व सैन्य समीक्षक भी हैरान है।
सबसे हैरानी की बात यह है कि भले ही चीन लद्दाख वाले क्षेत्र में इस समय घुसपेट कर रहा है परन्तु उसके लिए सबसे आसान उत्तराखण्ड से लगी 330 किमी सीमा है। यहां 12 दरें हैं जहां से चीन को भारत में घुसना अन्य जगहों के बजाय आसान है। उत्तराखण्ड में चीन से लगे सीमान्त जनपद चमोली व पिथौरागढ़ की सीमा से लगे 12 ऐसे दर्रे हैं जो प्रायः बर्फ की मोटी चादर से ढके होने के बाद भी सुरक्षित  नहीं हैं। ये दर्रे मुलिंग ला से लेकर लिपूलेख तक हैं। पहले इन्हीं दर्रो से चीन व तिब्बत के साथ स्थानीय व्यापारिक लेनदेन होता था। जहां हिमालयी सीमा पर चीन ने सीमा के नजदीक रेल व मोटर मार्ग युद्ध स्तर पर बना कर पूरे विश्व को अपनी ताकत का अहसास करा दिया है वहीं भारत ने इस सीमा को पूरी तरह से नजरांदाज कर दिया है।
चीन द्वारा भारतीय धरती पर कब्जा करने की घटना पर भारतीय हुक्मरानों ने जिस प्रकार शर्मनाक कायरता प्रदर्शित की जा रही है उससे पूरे विश्व में भारत की जगहंसाई हो रही है। दो सप्ताह हो गये हैं परन्तु भारत सरकार को इस बात की हिम्मत तक नहीं जुटा पा रही है कि वह चीन को चंद घण्टे में भारत की जमीन छोड़ने की दो टूक चेतावनी दे रही है। महाशक्ति बनने के भारत का दावा तार तार हो गया है। सरकार की इस शर्मनाक कायरता को देख कर आम भारतीय जनमानस  स्तब्ध व शर्मसार है। वहीं सरकार की इस आत्मघाती सम्पर्ण से जांबाज भारतीय सेना का मनोबल को भी आंच आ रही है।
गौरतलब है कि इन दिनों  लद्दाख में भारतीय इलाके में चीन की घुसपैठ का मामला बड़ा विवाद बन सकता है। यह इलाका पूर्वी लद्दाख के दौलत बेग ओलदी में वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) से दस किलोमीटर भीतर है। दौलत बेग ओल्दी इलाके में की है, जहां उन्होंने अपने टेंट लगा दिए हैं। यह इलाका करीब 17 हजार फीट की ऊंचाई पर है। ऐसा नहीं की यह पहली बार हो रहा है। चीन न केवल लद्दाख व अरूणाचल अपितु उत्तराखण्ड से लगी सीमाओं पर बार बार अतिक्रमण कर करता है। परन्तु क्या मजाल की कैलाश मानसरोवर सहित हजारो वर्ग मील भारतीय भू भाग को 1962 व उसके बाद काबिज चीन से संसद द्वारा चीन द्वारा बलात कब्जायी हजारों किमी वर्ग भारतीय भू भाग  को  दो बार हर हाल में वापस लेने के संकल्प के बाबजूद भारतीय हुक्मरान चाहे किसी भी दल के हों चीन से इस भू भाग को मांगने का साहस तक नहीं जटा पा रहे है। यही नहीं भारतीय हुक्मरानों की इसी कायरता से पाक ने भी कब्जाये कश्मीर का एक बडा भू भाग चीन को खैरात समझ कर दे दिया है परन्तु भारत के हुक्मरान इस का प्रचण्ड विरोध करने का साहस तक नहीं जुटा पा रहे है।
आजादी के बाद चीन से लगे सबसे संवेदनशील सीमान्त उत्तराखण्ड में रेलमार्ग निर्माण के नाम पर केवल सर्वेक्षण व रेल लाइनों की मंजूर करने की घोषणायें करने के अलावा इन 65 सालों में आजाद भारत की सरकारें कुछ महत्वपूर्ण कार्य अभी तक नहीं कर पायी। विगत कुछ साल पहले सीमा पार चीन द्वारा रेल व सडक मार्ग बनाने के कारण जो पहल भारत सरकार ने देश की सुरक्षा के लिए युद्धस्तर पर करना था वह कार्य करने में अभी तक भारत सरकार व रेल मंत्रालय पूरी तरह से असफल रहे। देश की सुरक्षा के नाम पर चीन से लगी उत्तराखण्ड की सीमा पर रेल व मोटर मार्ग बनाने के सबसे सर्वोच्च दायित्व को पूरा करने में भारत के हुक्मरान कितने ईमानदार है यह देश विगत 65 सालों से देख रहा है परन्तु विगत पांच साल से देश के हुक्मरानों की लोगों के आंखों में धूल झोंकने के कृत्य से उपेक्षित उत्तराखण्डियों सहित पूरा देश भौचंक्का है। देशवासी ही नहीं विश्व के रक्षा विशेषज्ञ देश की सुरक्षा के प्रति इस प्रकार की आत्मघाती उपेक्षा को देख कर हैरान है कि भारत कैसे चीन का मुकाबला करेगा।
इस बजट में इस राष्ट्रीय सुरक्षा की दृष्टि से सबसे महत्वपूर्ण रेल निर्माण के बारे में कोई उल्लेख तक नहीं है। परन्तु इस पर देश की बागडोर संभालने के लिए बेताब हो रही मुख्य विपक्षी दल भाजपा ने भी कभी इसे मुख्य मुद्दा बना कर सरकार को कटघरे में खड़ा करने की पहल तक नहीं की। इससे साफ हो गया है कि देश के हुक्मरानों को ही नहीं हुक्मरान बनने के लिए बेताब दलों को भी कहीं दूर दूर तक चिंता तक नहीं है। भाजपा कि देश की सरकार का इस बारे में कितनी ईमानदारी से कार्य कर रही है।  यह केवल सतपाल महाराज या भगतसिंह कोश्यारी की मांग नहीं अपितु यह देश की सामरिक सुरक्षा की सबसे बड़ी मांग है। परन्तु उत्तराखण्ड में भाजपा व कांग्रेस सहित सभी नेताओं को एक स्वर में केन्द्रीय सरकार पर निरंतर दवाब बनाना चाहिए। इसके बारे में एक  बात का उल्लेख करना भी जरूरी है कि यह रेल मार्ग निर्माण को केवल किसी नेता विशेष की प्रतिष्ठा, जीत या हार का प्रश्न न बना कर देश के सुरक्षा का गंभीर जरूरत मान कर इसको तत्काल युद्धस्तर पर निर्माण करना चाहिए। सप्रंग सरकार की प्रमुख सोनिया गांधी ने इस रेलमार्ग के उदघाटन समारोह में न जा कर साफ कर दिया कि उनको व उनके सलाहकारों में राष्ट्रीय सुरक्षा के प्रति न तो दूरदर्शिता व नहीं समझ। इससे एक बात साफ हो गयी कि कांग्रेसी नेतृत्व को इंदिरा गांधी की तरह देश, पार्टी व आम जनता के हितों के प्रति सटीक निर्णय लेने की कुब्बत नहीं है और नहीं उनके पदलोलुपु सलाहकार जो उनको आम जनता व पार्टी कार्यकत्र्ताओं से अपने निहित स्वार्थ की पूर्ति के लिए षडयंत्र के तहत दूर रखे हुए है, में है।
इससे साफ है कि  देश के हुक्मरानों को न चीन द्वारा किये गये सन् 1962 के आक्रमण की तरह न तो देश की चिंता है व नहीं देश के जांबाज सैनिकों की कुछ चिंता। हजारों जांबाज सैनिक हमने 1962 की लडाई में देश के तत्कालीन हुक्मरानों की लापरवाही के कारण मजबूरी में खोया । बिना तैयारी के सैनिकों को चीन के आगे झौंक दिया। अब भी इसी प्रकार के कृत्य किये जा रहे है। बिना सामरिक तैयारी के कैसे देश की सुरक्षा होगी। जबकि अमेरिका व चीन दोनों भारत को युद्ध की भट्टी में धकेलने के लिए पाक सहित सभी पडोसी देशों में अपने टिकाने बना खतरनाक षडयंत्र रच रहे हैं परन्तु भारत सरकार ठोस रणनीति बनानी तो रही दूर सामान्य ढ़ग से सीमान्त प्रदेश में बनने वाली रेल मार्ग को भी बनाने के लिए कछुवे की गति से चला कर देश को सामरिक ताकत को कुंद करने का काम कर रही है।  अगर इनको रत्ती भर भी चिंता रहती तो यह रेल मार्ग अब तक कबका बन जाता। अब देश की प्रबुद्ध जनता को चाहिए कि वह अपने निहित स्वार्थो में डूबे हुक्मरानों सहित तमाम राजनेताओं को इस राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए महत्वपूर्ण व सीमान्त प्रदेश के चहुमुखी विकास के लिए जरूरी ऋषिकेश-कर्णप्रयाग रेलमार्ग का निर्माण । देश की हुक्मरानों को एक बात साफ याद रखनी चाहिए कि देश में हर चीज बडे नेताओं के चुनाव क्षेत्र में ही हो तो देश का विकास नहीं हो सकता। सभी जगह रायबरेली, इटवा व दिल्ली जैसा विकास होना चाहिए तभी देश का समग्र विकास होगा। परन्तु विकास से अधिक महत्वपूर्ण है देश की सुरक्षा, जिसकी उपेक्षा करने वाले हुक्मरान कभी देश के हितैषी तो हो नहीं सकते । इनकी यह उदासीनता देश को नहीं अपितु देश के दुश्मन को ही फायदा पंहुचाता है।
शेष श्री कृष्ण कृपा।
हरि ओम तत्सत। श्रीकृष्णाय् नमो।

कांग्रेस की लुटिया डूबोने के लिए काफी है मनमोहन का 9 सिलेंडर का तुगलकी फरमान 


जनता की नजरों में पूरी तरह बदरंग हो चूकी  मनमोहन सिंह सरकार का एक फेसला जो कांग्रेस के लिए आगामी 2014 के लोकसभा चुनाव में सबसे आत्मघाती साबित होगा वह है साल में गैस के 12 सिलेण्डर के बजाय 9 सिलेण्डर करने का तुगलकी फरमान है।   इस निर्णय से पूरे देश में सरकार की भारी किरकिरी हुई। मनमोहन सरकार का यह फेसला सत्तारूढ़ कांग्रेस के प्रति लोगों के दिलों में गहरा आक्रोश है। इसका खमियाजा कांग्रेस को न केवल आगामी लोकसभा चुनाव में चूकाना होगा अपितु उसे इस का दण्ड विधानसभा चुनावों में भी भुगतना पड रहा है। कांग्रेसी आम कार्यकत्र्ता ही नहीं बडे नेताओं के गले भी सरकार की यह योजना आत्मघाती सी लग कर गले से नीचे नहीं उतर रही है। इसी को भांपते हुए इस योजना में सुधार करके साल में 12 सिलेण्डर एक परिवार को करने के बजाय 9 करना और अब अपनी नाक ऊंची रखने के लिए सब्सिडी को धारकों के खातों में जमा करने का लम्बा माध्यम बना कर सरकार ने अपने दल कांग्रेस की जडों में जहां मट्ठा डाल दिया है वहीं आम लोगों को बेवजह परेशानी के गर्त में धकेल दिया है। इस 9 सिलेण्डर के मानक से क्या इन कम्पनियों का घाटा पूरा हो गया या नहीं यह तो सरकार ही जाने परन्तु इस योजना से मनमोहन सिंह ने न केवल कांग्रेस की जड्डों में मट्ठा डाल दिया है अपितु आम लोगों का जीना ही दूश्वार कर दिया है। न जाने कांग्रेस आलाकमान की ऐसी कौन सी मजबूरी रही जो वह मनमोहन की जनविरोधी इस योजना को आंख बंद करके लागू करने में मनमोहन का साथ दे रही है।  देश व जनहितों से खिलवाड़ करने वाली सरकार की नादिरशाही व तुगलकी फरमानों को ढोने के लिए मजबूर नहीं हैं। सप्रंग सरकार आगामी 1अक्टूबर से 14 करोड़ एलपीजी ग्राहकों को सब्सिडी सीधे उनके बैंक खातों में डालने की योजना का शुभारंभ होगा। एलपीजी सब्सिडी के अंतरण के लाभार्थियों की संख्या करोड़ों में होने के कारण इनके लिए बैंक खाते खोलने के साथ साथ इनको  आधार से जोड़ने की भी सरकार की मंशा है।  इस योजना के अन्तर्गत  हर उपभोक्ता को सालाना 4,000 रुपए की सब्सिडी मिलेगी। प्रत्येक उपभोक्ता को सालाना सब्सिडी वाले 9 सिलेंडर मिलेंगे। इस योजना के तहत उपभोक्ताओं को मौजूदा बाजार मूल्य पर खरीदना पडेगा और जो सब्सिडी उसे मिल रही है वह सीधी उसके खाते में सरकार द्वारा जमा की जायेगी। जैसे दिल्ली में इस समय एक सिलेण्डर का बाजार मूल्य 901.50 रुपए प्रति सिलेंडर है जो सरकारी सब्सिडी के कारण 411 रूपये में मिलता है।

Wednesday, April 24, 2013


भारतीय भाषा आंदोलन  अब संसद की चैखट जंतर मंतर पर 


1988 से 14 साल संघ लोकसेवा आयोग पर भारतीय भाषाओं में संघ लोकसेवा आयोग की प्रमुख परीक्षायें आयोजित कराने व अंग्रेजी भाषा की अनिवार्यता का समाप्त करने की मांग को लेकर देश में भारतीय भाषाओं की अस्मिता व सम्मान के संघर्ष के रूप में जाना गया।
इसमें जहां पूर्व राष्ट्रपति ज्ञानी जेल सिंह की सरपरस्ती में भाषा आंदोलन के क्रांतिकारी पुरोधा पुष्पेन्द्र चैहान व स्व. राजकरण सिंह जी एवं अनैक साथियों के ऐतिहासिक संघर्ष को समर्थन देने के लिए संघ लोकसेवा आयोग में 14 साल तक चले इस धरने के समर्थन देने के लिए पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी,व वीपीसिंह, आडवाणी सहित देश के चार दर्जन से अधिक सांसद, पूर्व राज्यपाल ही नहीं देश के अग्रणी पत्रकार, समाजसेवी व जागरूक देश भक्त भी सम्मलित हुए। परन्तु दुखद है यहां के शासकों ने सत्तासीन होते ही राष्ट्र को उसकी जुबान में सम्मान, शिक्षा, रोजगार व प्रतिष्ठा देने की सुध तक नहीं रही।
आज इसी से आक्रोशित है कर भाषा आंदोलनकारी संसद की चैखट राष्ट्रीय धरनास्थल जंतर मंतर पर 21 अप्रैल से धरना दे रहे है।
आज शर्मनाक बात यह है कि आज भी संघ लोकसेवा आयोग ने अपनी प्रमुख परीक्षाओं में भले ही अंग्रेजी की अनिवार्यता का फंदा देश के गले से भारी विरोध के बाद हटा तो दिया है परन्तु अप्रत्यक्ष रूप से वह और खतरनाक ढ़ग से बनाया हुआ हैं। सिविल सेवा की परीक्षा के अलावा अन्य प्रमुख परीक्षाओं जो भारतीय तंत्र की रीढ़ समझी जाती है उनमें आज भी बेशर्मी से अंग्रेजी भाषा में जारी है।
अंग्रेजी भाषा में रंगे परीक्षा
सम्मलित चिकित्सा सेवा परीक्षा
इंजीनियरिंग सेवा परीक्षा
भारतीय वन सेवा परीक्षा
स्पेशल क्लास रेलवे अप्रेंटिस परीक्षा
भारतीय आर्थिक सेवा
भारतीय सांख्यिकी सेवा परीक्षा
भूविज्ञानी परीक्षा 
सहित अन्य प्रमुख परीक्षाओं में अंग्रेजी का एकाधिकार शर्मनाक ढ़ग से जारी है।
प्रस्तुत है देश के अग्रणी राष्ट्रवादी नेता अटल बिहारी वाजपेयी जी का 6 जनवरी 1989 को लिखा संघ लोकसेवा आयोग पर चल रहे भारतीय भाषाओं के आंदोलन के समर्थन के लिए भाषा आंदोलनकारी ओम प्रकाश जी के लिए लिखा पत्र। दुर्भाग्य यह रहा कि इस पत्र को लिखने वाले अटल बिहारी वाजपेयी जो स्वयं इस आंदोलन में सम्मलित हुए और संसद ही नहीं संयुक्त राष्ट्र में गरजे । परन्तु जब सत्ता में आये और प्रधानमंत्री बने तो वे भारतीय भाषाओं की बात भूल गये। उनकी सरकार में ही संसार का सबसे लम्बा चले इस भाषा आंदोलन को संघ लोकसेवा आयोग से उखाड़ फेंका गया। हिन्दी के महानायक समझे जाने वाले वाजपेयी जब प्रधानमंत्री बने तो उनकी सरकार ने ‘इडिया इज राइजिंग व साइनिग नाउ’ का कांग्रेस से भी बदतर राग छेड़ दिया। इस विश्वासघात से आज भी  देश भक्त भाषा आंदोलनकारी उबर नहीं पाये। 
आज फिर 21 अप्रैल 2013 को भाषा आंदोलनकारियों ने भारतीय भाषा आंदोलन के पुरोधा पुष्पेन्द्र चैहान व भाषा आंदोलन के महासचिव देवसिंह रावत अपने तमाम राष्ट्रभक्त साथियों के साथ संसद की चैखट-राष्ट्रीय धरना स्थल-जंतर मंतर में देश को अंग्रेजी की गुलामी (संघ लोकसेवा आयोग की परीक्षाओं व सर्वोच्च न्यायालय -उच्च न्यायालय) से मुक्त करा कर देश की जनता को उनकी भाषा में शिक्षा, सम्मान, रोजगार व न्याय दिलाने के लिए आंदोलन का अलख जगाये हुए है। सभी देशभक्तों से अनुरोध है कि आजादी के 65 साल बाद भी देश की आजादी को अंग्रेजी की गुलामी से मुक्त करने के लिए भाषा आंदोलन में सम्मलित होने की कृपा करें।
जय हिन्द ! वंदे मातरम् 

जय बजरंग बली हनुमान


जय बजरंग बली हनुमान, हे राम भक्त श्रीकृपा निधान
आज पुकार रहे हैं तुमको  आओ अजंनी पुत्र हनुमान
रावण से बदतर बने  हुए है जग के सत्तांध हुक्मरान
जाति धर्म व स्वार्थ के अंधे, लूट मार ही इनका इमान
मंहगाई व भ्रष्टाचार बढाये देश लूट व्यभिचार फेलाये
सुनलो दीन दुखियों की पुकार है बंजरंगीबली हनुमान 
आओ दुष्टों को सबक सिखाओ, लंका फिर से ढाह दो
आतंक से अब मुक्ति दिला दा,े है बजरंगबली हनुमान
राम कृष्ण के तुम्ही प्यारे दीन दुखियों को सदा सहारे
अब तो प्रकट हो बीर बजरंगी माता अंजना के लाल
जय बजरंग बली हनुमान, हे राम भक्त श्रीकृपा निधान
आज पुकार रहे हैं तुमको  आओ अजंनी पुत्र हनुमान

    देवसिंह रावत

(हनुमान जयंती के पावन पर्व पर श्रीचरणों में सादर समर्पित 25 अप्रैल 2013 प्रात 8.40 बजे)

Tuesday, April 23, 2013


बागियों ने छूटाये भाजपा व कांग्रेस को पसीने 


उत्तराखण्ड विरोधी, दागदार व कांग्रेसी प्रत्याशी को निकाय चुनाव में भारी मतों से पराजित कर


देहरादून (प्याउ)। उत्तराखण्ड हो रहे निकाय चुनाव में भले ही कांग्रेस व भाजपा अपनी अपनी जीत के दावे कर रहे हैं परन्तु हकीकत यह है कि दोनों दलों की तमाम कोशिशों के बाबजूद विद्रोही उम्मीदवारों ने दोनों दलों की जीत की आशा पर एक प्रकार का ग्रहण सा लगा दिया है। विद्रोहियों ने दोनों दलों के ही नहीं उक्रांद जैसे दल के पसीने छुडवा दिये। केवल उत्तराखण्ड रक्षा मोर्चा एक ऐसा दल है जो इससे उबरा हुआ है। पर उसकी भी हकीकत यह है कि इस दल से चुनाव लडने वालों का ही अकाल सा पड़ गया। हालांकि कांग्रेस व भाजपा ने अपने विद्रेाहियों को दल से निष्कासित करने की धमकी दी परन्तु इसका असर किसी विद्रोही पर नहीं पडा। अपनी लाज बचाने के लिए कांग्रेस ने निकाय चुनावों में अधिकृत प्रत्याशी के खिलाफ चनाव मैदान में डटे पांच दर्जन बागी उम्मीदवारों को छह साल के लिए कांग्रेस से निष्कासित कर दिया है। इसमें नगर निगम हल्द्वानी से मेयर के बागी उम्मीदवार राजेंद्र सिंह बिष्ट व रुड़की से राकेश अग्रवाल को भी पार्टी से बाहर का रास्ता दिखाया गया। इसके अलावा पांच दर्जन नेताओं को पार्टी को बाहर का रास्ता दिखाया परन्तु सबको मालुम है कि आगामी लोकसभा चुनाव से पहले सभी दल अपने विद्रोहियों को वापस ले लेंगे। इसी स्थिति को भांपते हुए अपना खेल बनाने व विरोधियों का खेल बिगाडने के लिए विद्रोही किसी भी कीमत पर चुनावी दंगल से हटने के लिए तैयार नहीं है। अब 30 अप्रैल को इन चुनावी महारथियों के भाग्य के फेसला होने के बाद भी पता चलेगा कि कौन कितने पानी में था। वहीं राज्य गठन के प्रमुख संगठन उत्तराखण्ड जनता संघर्ष मोर्चा ने प्रदेश की जनता से अपील की है कि किसी उत्तराखण्ड विरोधी, दागदार व कांग्रेसी प्रत्याशी को निकाय चुनाव में भारी मतों से पराजित कर जनहितों के समर्पित साफ छवि के प्रत्याशी को विजय बनाये।

चीन के दुशाहस के आगे कायर बना भारतीय हुक्मरान 


नई दिल्ली(प्याउ)। चीन द्वारा भारतीय सीमा के अंदर 10 किमी आ कर काबिज होने की घटना पर भारतीय हुक्मरानों ने जिस प्रकार शर्मनाक मौन रखा है, उससे भारतीय जनमानस स्तब्ध व शर्मसार है। गौरतलब है कि इनदिनों लद्दाख में भारतीय इलाके में चीन की घुसपैठ का मामला बड़ा विवाद बन सकता है। यह इलाका पूर्वी लद्दाख के दौलत बेग ओलदी में वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) से दस किलोमीटर भीतर है। दौलत बेग ओल्दी इलाके में की है, जहां उन्होंने अपने टेंट लगा दिए हैं। यह इलाका करीब 17 हजार फीट की ऊंचाई पर है। ऐसा नहीं की यह पहली बार हो रहा है। चीन न केवल लद्दाख व अरूणाचल अपितु उत्तराखण्ड से लगी सीमाओं पर बार बार अतिक्रमण कर करता है। परन्तु क्या मजाल की कैलाश मानसरोवर सहित हजारो वर्ग मील भारतीय भू भाग को 1962 व उसके बाद काबिज चीन से संसद द्वारा चीन द्वारा बलात कब्जायी हजारों किमी वर्ग भारतीय भू भाग को दो बार हर हाल में वापस लेने के संकल्प के बाबजूद भारतीय हुक्मरान चाहे किसी भी दल के हों चीन से इस भू भाग को मांगने का साहस तक नहीं जटा पा रहे है। यही नहीं भारतीय हुक्मरानों की इसी कायरता से पाक ने भी कब्जाये कश्मीर का एक बडा भू भाग चीन को खैरात समझ कर दे दिया है परन्तु भारत के हुक्मरान इस का प्रचण्ड विरोध करने का साहस तक नहीं जुटा पा रहे है।
जब यह मामला संसद में उठा तो रक्षा मंत्री ए. के. एंटनी ने 22 अप्रैल को संसद भवन को आश्वासन दिया कि हम अपने हितों की रक्षा के लिए हर कदम उठा रहे हैं। वहीं दूसरी तरफ चीन भारतीय आरोपों को सिरे से नकार कर इसे चीनी सैनिकों की नियंत्रण रेखा पर केवल गश्त बता रहा है। वहीं उल्टा चीन नैतिकता की दुहाई देते हुए कह रहा है कि वह दोनों देशों के बीच नियंत्रण रेखा को लेकर हुई सहमति का आदर करता है। उत्तराखण्ड के पूर्व मुख्यमंत्री भगतसिंह कोश्यारी ने भी सरकार की चीन की इस दुशाहस पर शर्मनाक मौन रखने की कड़ी भत्र्सना करते हुए सरकार से देश की सुरक्षा की रक्षा करने के दायित्व का बोध कराया।

Friday, April 19, 2013


ऐसे कामुक व हैवान व्यवस्था परोसने से केसे होगी मासुम दामिनियों की  रक्षा 


गुनाहगारों पर अंकुश लगाने के बजाय दामिनी  गुहार लगाने वाले आंदोलनकारियों का जंतर मंतर से टेण्ट उखाडने व अस्पताल में आंदोलनकारी को थप्पड़ मारने में लगी पुलिस 

कामुकता व दुराचारी को बढ़ावा देने वाली फिल्म, धारावाहिक, विज्ञापन, कार्यक्रमों  व नेता व अधिकारियों पर लगे अंकुश 

देश को शराब का गटर बना कर व राजनीति का अपराधिकरण करके किया जा रहा है देश को तबाह 

यौन नहीं नैतिक शिक्षा का हो प्रसार




एक तरफ भारत में ही नहीं विश्व में नवरात्रे के पावन पर्व में कन्याओं को जगतजननी माॅ भगवती का दिव्य स्वरूप मान कर उनकी पूजा आराधना की जा रही थी वहीं दूसरी तरफ देश की राजधानी दिल्ली के गांधी नगर में 5 साल की मासूम दामिनी को उसी का कामांध पड़ोसी 15 से 17 अप्रैल को अपने कमरे में बंधक बना कर दरंदगी की सारी हदे पार कर उस पर जुल्म ढा रहा था।  इस जघन्य काण्ड की खबर सुन कर देश ही नहीं विदेशी स्तब्ध है कि संसार के सबसे प्राचीन संस्कृति के देश भारत की राजधानी दिल्ली में 5 साल की अबोध बालिकाओं से लेकर वृद्धाओं के साथ जो आये दिन जघन्य हैवानियत का काण्ड हो रहे हैं उस पर अंकुश रखने में देश की व्यवस्था क्यों बौनी पड़ रही है। आज न केवल पुलिस प्रशासन ही नहीं पूरा तंत्र कटघरे में है कि  आखिर मातृदेव भव व कन्याओं को देवी का स्वरूप मानने वाले संस्कारवान देश भारत का इतना शर्मनाक पतन कैसे हो गया। यही नहीं 19 अप्रैल को रामनवमी के दिन जब लोग नवरात्रे में कन्याओं की पूजन के इस पर्व का समापन कर रहे थे उसी दिन दिल्ली के गांधी नगर में घटित इस मानवता को शर्मसार करने वाली इस घटना की पीड़िता मासूम दामिनी का इलाज जिस दयानंद अस्पताल में चल रहा था, उस अस्पताल में इस मासूम दामिनी के लिए न्याय की मांग कर रहे महिला आंदोलनकारी को पुलिस का सहायक उपायुक्त बीएस अहलावत सरेआम मीडिया के केमरे के आगे भी थप्पड़ बरसा रहे थे।  इसी 19 अप्रैल को दिल्ली में इस प्रकार के हैवानों से बचाने में असफल रही पुलिस संसद की चैखट जंतर मंतर पर 16 दिसम्बर की दामिनी प्रकरण पर न्याय की गुहार लगाने के लिए 24 दिसम्बर से निरंतर धरना प्रदर्शन करने वाले 16 दिसम्बर क्रांति आंदोलन के शमियाने को उखाडने में अपने पुलिसिया शौर्य दिखा रही थी। 16 दिसम्बर को हुए दामिनी प्रकरण से सहमी व्यवस्था ने भले ही अपनी खाल बचाने के लिए गांधी नगर की इस 5 वर्षीया मासूम बच्ची के गुनाहगार मनोज को उसके बिहार स्थित मुजफ्फरपुर के चिकनौता गांव ससुराल से गिरफतार कर दिया हो तथा अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान में बेहतर इलाज के लिए दाखिल करके इस प्रकरण में गांधीनगर दिल्ली के थाना प्रमुख, जांच अधिकारी के अलावा महिला पर थप्पड मारने वाले सहायक उपायुक्त को तुरंन्त निलंबित कर दिया हो, परन्तु इस प्रकार की घटनाओं पर अंकुश लगाने के प्रति उदासीन रहने से पूरे देश की जनता आक्रोशित है। देश को शर्मसार करने वाले इस प्रकरण में हैवान मनोज के साथ प्रकरण में सम्मलित एक और हैवान प्रदीप को भी बिहार से गिरफतार करके दिल्ली लाया जा चूका है। प्रधानमंत्री आवास, सोनिया निवास, गृहमंत्री आवास, इंडिया गेट, जंतर मंतर व दिल्ली पुलिस मुख्यालय सहित देश के कोने कोने में जनता इस शर्मनाक प्रकरण का विरोध में धरना प्रदर्शन कर रहे हैं।  सरकार को न जाने क्यों जनभावनाओं का सम्मान करना व भांपना तक नहीं आता उसे अविलम्ब दिल्ली पुलिस के आयुक्त को पदमुक्त करना चाहिए था।
पीड़िता के परिजनों द्वारा 15 अप्रैल से लापता बच्ची की खोज खबर करने में सहायता मांगने पुलिस के पास गयी तो ,पुलिस उस मासूम की खोज खबर करना तो रहा दूर उसकी गुमशुदी की रिपोर्ट तक लिखने के लिए तैयार नहीं हुई। जब 17 अप्रेल को बच्ची को बेहद गंभीर रूप से घायल हालत मेंउसी पडोसी के कमरे से रोने की आवाज आने के बाद बरामाद किया गया तो पुलिस अपना दायित्व का ईमानदारी से निर्वाह करने के बजाय उस पीड़िता के परिजनों को रूपये दे कर मूक रहने की पुलिसिया सलाह देती रही। वहीं हैवान मनोज उस बालिका को अपनी हैवानियत का शिकार भी बना रहा था और उसके परिजनों के साथ बालिका की खोज खबर करने का ढोंग भी कर रहा था।
16 दिसम्बर 2012 को दिल्ली में दामिनी प्रकरण से इडिया गेट से राष्ट्रपति भवन सहित पूरे विश्व में उमड़े जन आक्रोश से सहमे देश के हुक्मरानों ने भले ही दिल्ली के गांधी नगर की इस मासूम 5 बर्षीया बच्ची के साथ हुए हैवानियत की कड़ी भत्र्सना करके दिल्ली पुलिस के संवेदनहीनता के लिए उसको फटकार लगायी हो। परन्तु हकीकत यह है 16 दिसम्बर के बाद घटित हुई विश्व में भारत को शर्मसार करने वाले प्रकरण के बाद भले ही प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह व सप्रंग प्रमुख सोनिया गांधी सहित तमाम पक्ष विपक्ष के नेताओं के घडियाली आंसू बहाने के बाद आये दिन निरंतर हो रही इस प्रकार की शर्मसार करने वाली घटनाओं में कोई कमी नहीं आयी है। इसका मूल कारण यह है कि इस देश की पूरी व्यवस्था ही दम तोड़ चूकी है। देश के हुक्मरानों का असली चैहरा 16 दिसम्बर को दामिनी प्रकरण के कुछ ही दिन बाद दिल्ली में घटित हुआ लाजपत नगर की दामिनी प्रकरण से बेनकाब हो गया जहां इस बहादूर 16 वर्षीय बालिका के मुंह में हैवान ने राड ही घुसेडने का कृत्य किया। परन्तु 16 दिसम्बर पर घडियाली आंसू बहाने वाले मनमोहन व सोनिया व शीला ही नहीं नेता प्रतिपक्ष सुषमा तक को भी अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान में इलाज करा रही इस बालिका की सुध लेने की होश नहीं रही।
इसके बाद कई महिने बाद तुरंत कठोर कानून बनाने की मांग के लिए निरंतर हो रहे देश ही नहीं विश्व व्यापी आंदोलन के बाद जब सरकार ने यौन हिंसा पर कानून बनाया तो उस पर उनकी चिंता यौन अपराधों को रोकने के बजाय योन सम्बंध बनाने की उम्र कम करने की रही। इस काण्ड के सबसे हैवान को दण्डित करने के लिए उसको नाबालिक का ढाल से बचाया जा रहा है।
देश में सड़ चूकी व्यवस्था को सुधारने के लिए व्यवस्था में आमूल सुधार करने के बजाय मात्र कोरे कानून बनाने मात्र से सुधार होने का दिवास्वप्न देख रहे हुक्मरान व पुलिस प्रशासनिक तंत्र ही इस व्यवस्था को पथभ्रष्ट करने का असली खलनायक रहा है।
हमारे देश में विधायिका, न्याय पालिका, कार्यपालिका ही नहीं आम समाज कितना पथभ्रष्ट व संवेदनहीन हो गया है इसको जीता प्रमाण हर रोज घटित हो रही दुराचारी हैवानियत घटनायें ही हैं। दशकों तक ऐसे मामले न्यायालयों  में दम तोड़ने के आंकड़े व सिंघवी केसेट प्रकरण ही न्यायपािलका की हकीकत को उजागर करने के लिए काफी है। इसके साथ देश में राजनैतिक नैतृत्व कितना पतित हो चूका है इसके लिए हेदरावाद राजभवन में घटित तिवारी प्रकरण, राजस्थान का भंवरी, हरियाणा का वयोवृद्ध नेता का प्रकरण, उप्र के मंत्री का जिलाधिकारियों व हेमामालनी के प्रति कुविचार रखने व मध्य प्रदेश के मंत्री का मुख्यमंत्री की ही पत्नी व बच्चियों पर कांमांध टिप्पणी करने से देश की वर्तमान राजनीति को पूरी तरह बेपर्दा करती है।
जिस देश का प्रधानमंत्री मनमोहन व उनकी सरकार मंहगाई, भ्रष्टाचार व आतंकवाद से त्रस्त जनता के दुख दूर करने के बजाय उनके जख्मों पर पदलोलुपता,उपेक्षा व उदासीनता का संवेदनहीन नमक छिडके और जिस देश में नैतिक शिक्षा के बजाय यौन कुण्ठाओं को और भडकाने के लिए यौन शिक्षा के नाम से जहर अबोध बच्चों को शिक्षा के नाम पर परोसा जाय वहां की जनता में इस प्रकार के दुराचार नहीं पनपेगा तो कहां पनपेगा। यही नहीं देश में जिस प्रकार से फिल्मों, धारावाहिकों, विज्ञापनों के द्वारा हर घर में हर पल लोगों को टीवी के माध्यम से परोस कर पूरे समाज में कामुकता को बढ़ावा दिया जा रहा है, उससे समाज में ऐसे हैवानियत उभर कर सामने नहीं आयेगी तो क्या आयेगी। जिस प्रकार से राजनीति,नौकरशाही, समाजसेवा के साथ साथ धार्मिक संस्थानों का अपराधिकरण हो गया है उससे देश को इसी प्रकार के अपराध का दंश झेलना पडेगा।
देश को जिस प्रकार से शराब, गुटका सहित नशीले पदार्थो का गटर बनाया जा रहा है और भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने का काम करने के बजाय अपराधियों व दागदार लोगों को राजनीति, नौकरशाही, समाजसेवा व धार्मिक संस्थानों में बढावा दिया जा रहा है उससे इस दमतोड़ चूकी व्यवस्था को मात्र कठोर कानून के दम पर नहीं सुधारा जा सकता। इसके लिए व्यवस्था में आमूल सुधार के साथ शिक्षा में नैतिक मूल्यों का समावेश करके देश में नैतिक मूल्यों के फिल्म, धारावाहिक, विज्ञापनों व कार्यक्रमों को बढावा देना होगा। कामुकता परासने वाले तमाम कार्यक्रमों पर तत्काल अंकुश लगाना होगा। इसके साथ देश की जनता दुराचारी, भ्रष्टाचारी नेतृत्व के बजाय जनहितों के लिए समर्पित नेतृत्व को ही चुनावों में बढावा दें। तभी समाज में इस प्रकार के अपराधों से मुक्ति मिलेगी।
शेष श्रीकृष्ण कृपा। हरि ओम तत्सत्। श्रीकृष्णाय् नमो।

Thursday, April 18, 2013


मुशर्रफ हुए गिरफतार, न्यायपालिका अहं भरे कदम से पाक में मंडराया फिर आतंकवाद व सेना की तानाशाही का बादल 


मुशर्रफ अपने तानाशाही के दौरान 3नवम्बर 2007 को मुचय न्यायाधीश सहित 60 न्यायाधीशों को गिरफतार करने के जुर्म में पाकिस्तान के पूर्व राष्ट्रपति जनरल मुशर्रफ को इस्लामाबाद स्थित उनके फार्म हाउस से 19 अप्रैल को गिरफतार किया गया। मजिस्टेट के सामने लाल मस्जिद प्रकरण पर भी उनकी पेशी हुई।  क्या इस गिरफतारी को आंख मूद कर समर्थन देगी पाक की सबसे शक्तिशाली सेना। क्योंकि सेना अपने पूर्व प्रमुख को गिरफतार करने को क्या मूक बन कर सहेगी? पाक में भले ही मुशर्रफ तानाशाह रहे परन्तु वर्तमान समय में मुशर्रफ से अधिक तेज तरार व पाक को मजबूत करने वाला कोई नेता दूर-दूर तक दिखाई नहीं दे रहा है। न्यायपालिका को लोकशाही की शरण में गये तानाशाह को सुधरने का मौका देने के बजाय अपने अहं के लिए पाक को नेतृत्वहीन की गर्त में धकेलना न तो पाक के लिए हितकारी रहेगा व नहीं शेष दुनिया के लिए। न्याय पालिका को चाहिए था कि वह मुशर्रफ के भविष्य का फेसला पाक के अवाम को करने देते। लोकतंत्र की हवा में सांस लेने की अभ्यास कर रही पाक की सबसे मजबूत फोज को पाकिस्तानी न्याय पालिका का यह कदम उसके कदमों को फिर तानाशाही की तरफ बढ़ाने का कारण भी बन सकता है। क्योंकि पाकिस्तान में एक भी बड़ा नेता ऐसा नहीं है जिन पर अगर सही ढ़ग से न्यायपालिका काम करे तो वह देश के वर्तमान कानूनों के अनुसार चुनाव लडने के काबिल हो या जिसको मुर्शरफ की तरह गिरफतार न किये जायं। इसलिए पाक की यह नियति को और बिगाडने के बजाय न्यायपालिका को पाक में अराजकता और न बढाने के लिए काम करना चाहिए। पाकिस्तान में मुशर्रफ ही है जो आतंकी गुटों को भी चाहे तो अंकुश लगा सकते हैं। अमेरिका व चीन के शिकंजे में जकडे पाकिस्तान में बिना मजबूत नेतृत्व के यहां पर आतंकवादी विनाशकारी भारत विरोधी व अमन चैन के दुश्मन बने पाकिस्तानी तालिवानी राज का शिकंजा कसने या फौजी दखल बढ़ने के आसार बढ़े गये है। हालांकि पाकिस्तान में असरदार तबका मामले की नजाकत समझते हुए मुशर्रफ को उसके फार्म हाउस में ही अस्थाई जेल के रूप में तब्दिल करने की कोशिश में लगा है ताकि मुशर्रफ प्रकरण से अपमानित हुई सेना के गुस्से को शांत करने का प्रसास किया जाय।

Wednesday, April 17, 2013


संकीर्ण दलगत स्वार्थो से उपर उठ कर अमेरिकी तर्ज पर कुचले आतंक को भारतीय हुक्मरान 


मात्र आतंक के प्यादों को  रौदने से नहीं अपितु आतंक की फेक्टरी पाक को  समूल नष्ट करके होगा आतंकवाद का खात्मा

 15 अप्रैल को अमेरिका के बोस्टन में मेराथन के दौरान हुए तीन बम विस्फोटों से के बाद 17 अप्रेल को साढ़े दस बजे भारत के बंगलोर में भाजपा मुख्यालय के समीप हुए बम धमाकों की दहशत से दुनिया उबर भी नहीं पायी थी कि 18 अप्रैल को अमेरिका के टेक्सास की फर्टिलाइजर फेक्टरी में हुए धमाकों से से पूरी दुनिया बुरी तरह से सहम गयी है। भले ही तीनों विस्फोटों में ज्यादा लोग मारे नहीं गये परन्तु इसके बाबजूद पूरा विश्व इन घटनाओं से आतंकित है। जहां बोस्टन में तीन लोग मारे गये और 180 से अधिक लोग घायल हैं वहीं बंगलोर में 11 पुलिस वाले घायल हो गये है। इसके अलावा 18 अप्रैल को टेक्सास में फर्टिलाइजर फेक्टरी में हुए धमाके में सेकडों लोग घायल हो गये है।
इस हमले के बाद जहां अमेरिका के राष्ट्रपति ओबामा सहित पूरा अमेरिकी शासन प्रशासन इस काण्ड के गुनाहगारों को हर किमत पर ढूढ कर 9/11 की आतंकी घटना के गुनाहगारों की तरह दण्डित करने की ऐलान करके इन दोषियों को ढूढने में लगे है। वहीं भारत में बंगलोर में हुए धमाके के गुनाहगारों को दण्डित करने के बजाय यहां के हुक्मरान इसकी मात्र कोरी भत्र्सना व एक दूसरे को फायदा लेने का गैरजिम्मेदाराना व अमानवीय आरोप प्रत्यारोप करने में ही नष्ट कर रहे है। अमेरिका के हुक्मरान देश पर आतंकी हमले करने के दोषियों को उनके घर में जा कर मार गिराने का जो काम कर रहे हैं उसी के कारण 9/11 के बाद 15 अप्रेल 13 को यह घटना को आतंकी बहुत ही मुश्किल से अंजाम दे सके। अमेरिका ने  आतंक के आका लादेन ही नहीं अफगानिस्तान को पूरी निर्ममता से रौंद दिया। यही नहीं आतंक की फेक्टरी बन चूके पाक में निरंतर वह अमेरिका पर हमले करने वाले आतंकियों पर ड्रोन हमले करके उनको चून चून कर खात्मा कर रहे है। परन्तु भारत में कारगिल व संसद पर आतंकी हमला हुआ इसके गुनाहगारों को दण्डित करने का साहस तक भारतीय हुक्मरान नहीं कर सके। मुम्बई से लेकर दिल्ली, पुणे, हेदराबाद  से लेकर इस देश में एक के बाद एक विस्फोट करके आतंकियों ने भारत के स्वाभिमान व अखण्डता को तार तार करके यहां खून की नदियां बहा दी परन्तु क्या मजाल है यहां के नपुंसक हुक्मरान इन आतंकियों को अमेरिका की तर्जं पर उसकी मांद पाकिस्तान में जा कर आतंक का खात्मा करने का साहस जुटा पा रहे हैं वहीं सुरक्षा बलों द्वारा अपनी जान को जोखिम में डाल कर गिरफतार किये गये आतंकियों को दण्डित करने के बजाय उनको माफ करने का राष्ट्रघाती कार्य कर रहे है।
जहां एक तरफ भारतीय हुक्मरान कश्मीर के आतंकियों को रौंदकर अमेरिका व पाक के सह पर पाकिस्तान में इन आतंकियों को संरक्षण व प्रशिक्षण दिये जाने वाले केम्पों को तबाह करने का काम नहीं कर रहे है। वहीं कश्मीर में सुरक्षा बलों का मनोबल उनको प्रताड़ित व बिना हथियार का रख कर उनकी जान से खिलवाड किया जा रहा है। उप्र में आतंकियों को कोर्ट से रिहा करा रही है सरकार। पंजाब में आतंकियों को दबोचने व खात्मा करने वाले पुलिस प्रशासन को ही नहीं राजनेताओं पर आतंकी हमले करने वालों को बचाने व संरक्षण देने का काम बेशर्मी से किया जा रहा है। भारत में आतंकवादियों को संरक्षण कैसे दिया जा रहा है यह आतंकवाद विरोधी मोर्चे के बिट्टा के बयानों से साफ जाहिर हो रहा है कि कैसे कांग्रेसी नेता व प्रशासन मिल कर गुनाहगारों को बचाने का काम कर रहे है।
जिस प्रकार से भारत के हुक्मरान आतंकियों को दण्डित करने के बजाय उनको शर्मनाक संरक्षण देने का काम कर रहे हैं उससे लाख कोशिश करने के बाबजूद आतंकवाद घटने के बजाय बढ़ेगा ही। देश में आतंकवाद के खात्मा के लिए कोई ठोस नीति संसद से लेकर मुम्बई तक हुए आतंकी हमले के बाबजूद सरकारें नहीं बना पायी। यहां पर आतंक को खुलेआम संरक्षण देने वाले नेताओं को जब तक सलाखों में आतंकियो से अधिक दण्ड नहीं दिया जायेगा तब तक आतंकवाद मिटने का नाम नहीं लेगा। भारत में असम से लेकर बंगाल, से लेकर उत्तराखण्ड तक सरकारें अपने दलीय स्वार्थ के लिए बंगलादेशी घुसपेटियों को बसा रही है और जिस प्रकार बंगलादेशी घुसपेटिये बहुत खतरनाक रणनीति के तहत इसे आतंकिस्तान बनाने में तुले है उससे भारत के आने वाले दिन सुखद नहीं है। जिस प्रकार से आतंक का तांडव पाकिस्तान अमेरिका व चीन के सह पर भारत में मचा रहा है उसको देख कर भारतीय हुक्मरानों ने अगर दो टूक बात अमेरिका व चीन से नहीं की तो आने वाले समय में यह समस्या बेहद विकराल हो जायेगी। पाकिस्तान से अविलम्ब पूरे सम्बंध भारत को आतंक के खात्मा तक बंद कर देने चाहिए और अमेरिका को साफ बताना होगा कि आतंकवाद पर दोहरामापदण्ड किसी भी रूप से स्वीकार नहीं किया जा सकता है। जिस प्रकार से अमेरिका ने अपने ऐजेन्ट हेडली को संरक्षण दिया उससे साफ हो गया कि अमेरिका पाक के साथ मिल कर भारत में आतंकवाद को बढावा देता रहा। इसलिए अमेरिका को अपने इस नापाक कृत्य पर अंकुश लगाना होगा और अविलम्ब पूरे विश्व की शांति को तहस नहस करने वाले आतंक की फेक्टरी बन चूके पाक से आतंकहीन किये बिना विश्व में शांति होने की आशा करना भी एक प्रकार अपने आप को धोखे में रखना होगा। पाकिस्तान जिस प्रकार से आज आतंक का पर्याय बन चूका है उसको इस स्थिति में बनाने वाले ओर कोई नहीं अमेरिका ही है। अमेरिका को दूसरे देशों में इस प्रकार की आतंकी गतिविधियों पर अंकुश लगाना होगा तभी अमेरिका, भारत सहित पूरा विश्व शांति में सांस ले सकेगा।
भारतीय हुक्मरान की आतंकबाद के खिलाफ कैसी सोच है यह कांग्रेसी नेता शकील के कर्नाटक में हुए आतंकी हमले पर दिये गये बयान से जगजाहिर हो गया है। भारत में जब तक देशहित में सोचने व काम करने वाला नेतृत्व नहीं होगा तब तक आतंकवाद पर अंकुश नहीं लगाया जा सकता। खासकर जब तक मनमोहनसिंह जैसे अमेरिका व पाक के हमदर्द नेता सत्तासीन रहेगें तब तक आतंकवाद घटने के बजाय बढ़ता ही जायेगा।

Tuesday, April 16, 2013


भूकम्प से बढ़ कर तबाही मचा रहा है भ्रष्टाचार भारत में 



आज सांय  4.22 बजे को राजधानी क्षेत्र दिल्ली में, 4.28 बजे पाकिस्तान में, 4.31 बजे इरान में व 4.35 बजे अफगानिस्तान में चंद मिनट के आये, भूकम्प की झटकों ने एशिया के इन देशों के लाखों लोगों को भयभीत कर दिया। इस चंद समय के लिए आये जलजले का केन्द्र  जमीन के 15 किमी नीचे ईरान व पाकिस्तान के सीमावर्ती क्षेत्र खश मे ंथा। 7.5 तीव्रता के इस भूकम्प से ईरान में भारी नुकसान हुआ। इससे ईरान, अफगानिस्तान, पाकिस्तान सहित भारत में जो जलजला आया उससे लोग सहम गये। भारत में भले ही जान माल का कोई विशेष नुकसान तो नहीं हुआ परन्तु पाकिस्तान में करीब 40 लोग मारे गये और ईरान में 40 साल में आये इस सबसे खतरनाक भूकम्प ने भारी तबाही मचाई सुत्रों के अनुसार ईरान में सैकडों लोग इस भूकम्प के शिकार हो सकते है। ईरान व पाकिस्तान में हजारों मकान ध्वस्थ हो गये। जिस समय दिल्ली में यह भूकम्प आया उस समय मेें देश की राजधानी दिल्ली में सप्रंग सरकार की मुखिया सोनिया गांधी के आवास व कार्यालय के बाहर ‘सर्वोच्च न्यायालय व उच्च न्यायालयों ’में भारतीय भाषाओं में न्याय की मांग को ले चल रहे श्यामरूद्र पाठक व साथियों के साथ आंदोलन को ओर तेज करने की मंत्रणा करने में व्यस्त थे। उस समय धरने में श्यामरूद्र पाठक, गीता मिश्रा व विनोद पाण्डे  के अलावा पुष्पेन्द्र चैहान, मैं, मायावती सरकार में दर्जाधारी मंत्री यशवंत निकोसे व लोकहित मोर्चे के अध्यक्ष ईश्वर भारद्वाज आदि उपस्थित थे।  उस समय हमें भूकम्प का अहसास तक नहीं हुआ बाद में
जब मैने खबरें सुनी तो दंग रह गया। दिल्ली ही नहीं भारत में अधिकाश भवन, पुल व बांधों की स्थिति किसी से छुपी नहीं है। भ्रष्टाचार ने इन सबकी नींव पूरी तरह खोखली कर रखी है। कभी भी हल्का सा झंझावत दिल्ली सहित अधिकांश भारत के शहरों को कब्रिस्तान में तब्दील कर सकता है। यहां बने हुए अधिकांश बांध ऐसे प्रलयंकारी भूकंप की चपेट को सह पायेंगे इसमें मुझे ही नहीं अधिकांश सुरक्षा विशेषज्ञों को भी संदेह है। यहां पर सबका जीवन बचा हुआ है तो परमात्मा की कृपा से, नहीं तो भ्रष्टाचार में डूबी इस चंगेजी व्यवस्था ने दिल्ली सहित अधिकांश शहरों व क्षेत्रों को यहां की जीर्ण शीर्ण बहुमंजिली भवनों, पुलों व बांधो से ऐसे झंझावतों से होने वाली तबाही सामुहिक कब्रिस्तान में तब्दील कब कर दे कहा नहीं जा सकता। अगर देश में अविलम्ब भ्रष्टाचार पर अंकुश कडाई से देश की व्यवस्था नहीं लगा पायी तो इस प्रकार की अनहोनी कब घटित हो जाय कहा नहीं जा सकता।


बोस्टन में हुए तीन बम धमाकों से 9/11 के बाद फिर आतंकी हमले से दहला अमेरिका 


15 अप्रैल को आयोजित बोस्टन मेराथन के दोरान हुए तीन बम विस्फोटों ने 9/11 के आतंकी हमले से जख्मी अमेरिका को एक बार फिर आतंक से दहला दिया। अमेरिका के बोस्टन मैराथन स्थल पर हुये दो विस्फोटों में तीन लोगों की मौत हो गयी और 140 से अधिक लोग घायल हो गये। हालांकि इस विस्फोट होने से पहले अधिकांश तेज धावक अपनी दोड़ पूरी कर चूके थे, परन्तु इसके बाबजूद अनैक धावक दोड़ पूरी कर ही रहे थे। अमेरिका में हुए इस बम विस्फोटों की संयुक्त राष्ट्र के महासचिव बान की मून सहित अधिकांश देशों ने कड़ी भत्र्सना की।
1897 से ही अप्रैल के तीसरे सोमवार को पैट्रियट्स डे पर बॉस्टन मैराथन का आयोजन होता है। 117 सालों से चल रहे अमेरिका के सबसे अधिक लोकप्रिय मेराथनों में से अग्रणी इस मेराथन में करीब 5 लाख दर्शक जुटते हैं। इस मेराथन दोड़ में 26 देशों के 20 हजार धावक भी भाग ले रहे थे। मेराथन समापन रेखा के पास ही विस्फोट आतंकियों ने शायद इसी आशय से किये गये कि ज्यादा से ज्यादा लोग इनकी चपेट में आ सकें। दस सेकेंड के अंतराल पर हुए इन दो धमाके एक दूसरे से करीब पचास से सौ मीटर की दूरी पर हुए। इन धमाकों के बाद लोगों के बीच अफरा-तफरी फैल गई। 9/11 के बाद इसको अमेरिका में सबसे बड़ा धमाका बताया जा रहा है। बोस्टन मैराथन 117 वर्षो से लगातार आयोजित की जाती रही है। 42 किमी लंबी मैराथन में यह विस्फोट भारतीय समय के अनुसार रात के 12.20 बजे हुआ। विस्फोट से करीब 15 मीटर ऊंचा धुंए का गुब्बार उठा। इसके बाद लोगों की चिखने व चिल्लाने की आवाज से पूरा माहौल ही गमगीन हो गया। इसके एक घण्टे बाद पहले हुए विस्फोटों से 3 किमी दूर जॉन. एफ. केनेडी प्रेजिडेंशल लाइब्रेरी के पास रात के 1 बज कर 20 मिनट पर हुआ। हालांकि इसमें कोई घायल नहीं हुआ।
भले ही अमेरिका के राष्ट्रपति ने इस धमाकों को आतंकी नाम प्रारम्भ में नहीं दिया परन्तु एफबीआई ने इसे आतंकी हमला बताया। अमेरिका के राष्ट्रपति ओबामा ने ंने दो टूक शब्दों में कहा कि गुनाहगारों को किसी भी हालत में दण्डित किया जायेगा। उन्होंने कहा कि हमलोग इसकी जड़ तक जाएंगे और खोज निकालेंगे कि ये किसने और क्यों किए हैं।
पुलिस ने तीन विस्फोटों के बाद एक जिंदा बम भी बरामद किया, जिसको बाद में निष्क्रय कर किया। धमाके के बाद न्यूयार्क समेत कई बड़े शहरों में हाई अलर्ट घोषित किया गया है। वहीं बोस्टन में हवाई सेवा को भी कुछ समय के लिए रोक दिया गया है।

इन नेताओं से भगवान ही बचाये देश को



जनसेवक नहीं लफंगे बन गये है देश के भाग्य विधाता


महाराष्ट्र का उप मुख्यमंत्री सूखे से पीड़ित आंदोलनकारी किसानों की पानी की मांग पर मै पिशाब करू क्या? कहते हो, जिस देश का प्रधानमंत्री मंहगाई को रोकने के बजाय मै ज्योतिषी हॅू क्या का जुमला बोल कर महंगाई से त्रस्त आम जनता का उपहास उड़ता हो, जिस देश के सबसे बड़े प्रांत उप्र में सपा व बसपा एक दूसरे पर गुण्डा व गुण्डी होने का आरोप लगाते हो। उप्र में सत्तासीन सपा के मुखिया मुलायम सिंह पर केन्द्रीय मंत्री ही आतंकियों का संरक्षक व भ्रष्टाचारी का आरोप लगाये, तथा जिस देश में न्यायाधीश बनाने के लिए अपने प्रभाव का इस्तेमाल करने के लिए कांग्रेस का एक नेता सीड़ी प्रकरण में देश की व्यवस्था को शर्मसार करता हो, वहीं जिस देश में भारतीय संस्कृति व राष्ट्रवाद के ध्वजवाहक कहलाने वाली पार्टी का आला नेता आडवाणी इस देश के विभाजन के व 10 लाख निर्दोष भारतीयों की निर्मम हत्या का दोषी जिन्ना को धर्म निरपेक्ष का पुरोधा बता कर उनकी कब्र पर सीस नवाता हो।
उस देश का पतन होने से अगर कोई बचा सकता है तो केवल भगवान ही। इस देश का राम ही मालिक है। इस देश में कब ठाकरे बंधु, कब बुखारी, कब गिलानी और कब कोई नेता देश को अराजकता की गर्त में धकेलने वाला बयान दे डाले कहा नहीं जा सकता है।
देश की व्यवस्था में जिन अपराधियों को जेल की सलाखों में बद रहना चाहिए था वे मंत्री व राजनेता बन कर देश के लोकतंत्र व समाज के ताने बाने को तहस नहस करने में लगे हुए है। यह केवल व्यवस्था से आक्रोशित लोगों की खीज भरी टिप्पणी नहीं है अपितु देश के राजनेताओं के एक दूसरे पर लगाये गये खुले आरोप है। जिस प्रकार से महाराष्ट्र के उप मुख्यमंत्री अजीत पवार ने महाराष्ट्र के कई जिलों में सुखे से पीड़ित लोगों की पानी की मांग को जिस संवेदनहीनता के साथ उपहास उडाते हुए मैं पिशाब करू क्या कहा उससे पूरे देश के राजनेताओं का मुखोटा बेनकाब हो गया है। हालांकि इस अमानवीय बात के लिए खुद अजीत पवार व उनके चाचा शरद पवार ने माफी मांगी परन्तु देश भौचंक्का है कि इस देश का भविष्य जिन के हाथों पर जनता ने सोंप रखा है वे इंसान है या हैवान। जनता के आक्रोश से अपनी कुर्सी जाने के भय से भयभीत अजीत पवार ने प्रायश्चित का जो नाटक उपवास करके किया उससे भी जनता के आक्रोश में कोई कमी नहीं है।
ऐसा नहीं कि यह केवल महाराष्ट्र में राकांपा के नेता की बात है। इससे संवदेनहीन बयान देश के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह तो बार बार देते रहते है। जब भी उनके कुशासन से मंहगाई, भ्रष्टाचार व आतंकवाद से त्रस्त भारत की आम जनता उनसे जानना चाहती या पत्रकार प्रश्न करते कि मंहगाई पर अंकुश कब लगेगा? तो बेहद अमानवीय व गैरजिम्मेदाराना ढ़ग से मनमोहन सिंह व उनके खाद्य मंत्री शरद पंवार, देश की पीड़ित जनता के जख्मों में ‘मैं ज्योतिषि नहीं हूॅ’ कह कर नमक डालने का कृत्य करते है। यह देश के सबसे तथाकथित ईमानदार व शालिन समझे जाने वाले प्रधानमंत्री की हालत तो औरों की स्थिति क्या होगी इसका सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है। उप्र का एक मंत्री जन समस्याओं के निदान के लिए चिंतन न करके सार्वजनिक मंच से बेशर्मो की तरह महिला जिलाधिकारियों के रूप की प्रशंसा करने में जरा सा भी लज्जाते नहीं। हालांकि इस वयोवृद्ध मंत्री को मोटर रोडों को हेमामालनी के गाल की तरह बनाने की बात कह कर अपनी विभत्स मानसिकता ही उजागर की। ऐसी मानसिकता लालू ही नहीं शरद यादव भी कई बार सार्वजनिक बेठकों व संसद में भी बयान कर चूके हैं।
इसी में कांग्रेस मंत्रियों व नेताओं की तो लम्बी लिस्ट है। तिवारी से लेकर हरियाणा व राजस्थान में सरकार में मंत्री रहे नेताओं की लम्बी लिस्ट है। उत्तराखण्ड में तो तिवारी जैसे नेताओं की लम्बी लिस्ट बढ़ती जा रही है। वहीं मध्य प्रदेश के आदिवासी कल्याण मंत्री विजय शाह ने रविवार 14 अप्रेल को हद ही कर दी। उन्होंने झाबुआ में एक कार्यक्रम में सैकड़ों छात्राओं और टीचरों की मौजूदगी में अश्लील भाषण दे डाला। यही नहीं उन्होंने मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चैहान को भी नहीं बख्शा। मतिमंद शाह ने कहा कि एक बार उन्होंने चैहान की पत्नी से कहा, ‘भइया के साथ तो रोज जाती हो, कभी देवर के साथ भी चली जाया करो।’ इसके बाद जब कांग्रेस ने राज्यपाल से शाह को मंत्रिमंडल से बर्खास्त किए जाने की मांग की है तो पद खोने के भय से मंत्री बोले मैं इसके लिए 10 बार माफी मांगता हूं। आज कोई नीतीश, सुषमा, राहुल सोनिया, माया, मुलायम, लालू, पासवान या किसी भी नेता को अपना आदर्श मान सकता है। जिस भी नेता की जन्मपत्री को खंगालों तो देश में ना के बराबर ऐसे नेता मिलेंगे जो अपने सर्वस्व देश के लिए निछावर करने के लिए हर पल तैयार रहते है। नहीं तो ये नेता अपने पद व अहं के लिए क्या क्या गिरगिटी रंग न बदल जाय कहा नहीं जा सकता है।
आज के नेताओं की शर्मनाक स्थिति देख कर आज की जनता क्या इन नेताओं को अपना आदर्श मान सकती है। इनकी शर्मनाक हालत को देख कर व जान कर एक ही बात दिल से उठती है कि भगवान भरोसे ही यह देश चल रहा है। नहीं तो इस देश को जंगेजों व फिरंगियों से अधिक तबाह करने में यहां के नेताओं ने कोई कसर नहीं छोड़ी।


मोक्ष भूमि उत्तराखण्ड के दर्शन को बेताब है विश्व भर के श्रद्धाुल


16 को तुंगनाथ व 20 मई को खुलेंगे मद्महेश्वर के कपाट 

मोक्ष भूमि उत्तराखण्ड को अपनी सत्तालोलुपता से तबाह करने में लगे लोगों को लगेगा अभिशाप 


रुद्रप्रयाग(प्याउ)। मई माह के दूसरे सप्ताह में प्रारम्भ होने वाली विश्व की एकमात्र दिव्य मोक्ष भूमि उत्तराखण्ड के पावन तीर्थ यात्रा के लिए संसार के लाखों श्रद्धालु बेसब्री से इंतजारी कर रहे है। इस साल पंच केदारों में द्वितीय केदार के नाम से विख्यात भगवान मदमहेश्वर के कपाट भक्तों के लिए 20 मई को खोल दिये जायेंगे। वहीं तृतीय केदार भगवान तुंगनाथ के कपाट 16 मई को खोल दिये जायेंगे।
गौरतलब है कि चार धाम के अलावा पंच बदरी व पंच केदार की इस दिव्य धरती में कई प्रकृति के मनोहारी रहस्यमय स्थल है जिसको देखने के लिए विश्व भर के प्रकृति प्रेमी यहां हर साल आते हैं। यहां फूलों की घाटी, रूप कुण्ड, स्वर्गारोहण, वेदनी बुग्याल, कुबैर की अलकापुरी सहित अनैक मनोहारी स्थल हैं। विश्व की सबसे प्राचीन व विलक्षण सनातन ‘हिन्दु ’धर्म के सर्वोच्च भगवान हरि व हर के पावन धाम श्रीबदरीनाथ व केदारनाथ के साथ पतित पावनी गंगा व यमुना की इस पृथ्वी पर अवतरण धाम गंगोत्री व यमुनोत्री धामों की चार धाम यात्रा के नाम से विख्यात तीर्थ यात्रा हर हर सनातनी श्रद्धालु अपने जीवन में एक बार करना चाहता है। विक्रमी सम्वत् 2070 में यानी सन् 2013 में चार धाम यात्रा का शुभारंभ 13 मई को अक्षय तृतीया के पावन पर्व पर गंगोत्री व यमुनोत्री धाम के कपाट खुलने से होगी। 14 मई को भगवान केदारनाथ धाम के कपाट व 16 मई को भगवान श्रीबदरीनाथ धाम के कपाट 6 माह के लिए खोल दिये जायेंगे। वहीं शीतकाल में यह चार धाम के नाम से विख्यात तीर्थ यात्रा प्रायः हर साल 6 माह के लिए इस हिमालयी क्षेत्र में भारी हिमपात होने के कारण बंद कर दिये जाते हैं। इस साल चार धाम यात्रा के दौरान होने वाली(29 अगस्त से 16 सितम्बर ) विश्व विख्यात माॅं भगवती स्वरूपा ‘नन्दादेवी राजजात यात्रा के आयोजन होने से इस यात्रा में भी भारी संख्या में देश विदेश से श्रद्धालुओं उमड़ंेंगे। भगवान विष्णु का सर्वोच्च धाम श्री बदरीनाथ धाम, के अलावा सप्त बदरी के नाम पर आदि बदरी, भविष्य बदरी, वृद्ध बदरी, योगध्यान बदरी, ध्यान बदरी, अर्ध बदरी व नरसिंह बदरी प्रमुख हैं। भगवान श्री दिव्य आलौकिक धाम केदारनाथ के साथ साथ मदमहेश्वर, तुगनाथ, कलपेश्वर व रूद्रनाथ प्रमुख है। इसके साथ कई ऐसे प्रमुख तीर्थ व आलौकिक धाम है जो अभी प्रदेश शासन व प्रशासन के नक्शें में ही नहीं है। इनमें भगवान शिव के प्रमुख दिव्य मंदिर जिसमें रावण द्वारा भगवान शिव की अखण्ड तपस्या व अपने सीस हवन करने वाला तीर्थ बैराश कुण्ड, है। वहीं 9 बहिन नाग कन्याओं की नन्दा देवी की तर्ज पर निकलने वाली नैणी की यात्रा। माॅं भगवती के दिव्य धाम सुरकण्डा, पूर्णागिरी, द्रोणागिरी, बूंखाल कालिंका, धारी देवी, चंद्रवदनी, मनसा देवी, चण्डिका देवी ही नहीं कदम कदम पर माॅं भगवती के दिव्य मंदिरों की भरमार है।
भगवान शिव के परम धाम नीलकण्ठ, बागेश्वर, जागेश्वर, ताडकेश्वर,कोटेश्वर, कोठुलेश्वर, गोपेश्वर, विनसर, आदि प्रमुख है। वहीं भगवान शिव के दिव्यांश भैरव भगवान के असंख्य मंदिर अपने आप में विलक्षण है। अल्मोड़ा में ग्वेल देवता का चितई ग्वेल मंदिर हो या लाटू व दाणू के मंदिर अपने आप में विलक्षण है। उत्तराखण्ड के हर कण में शंकर भगवान का वास माना जाता है। संसार भर में उत्तराखण्ड ही एक मात्र ऐसा दिव्य व पावन स्थान है जहां नर व रीषि मुनियों की तपस्थली ही नहीं अपितु नारायण व भगवान शिव -शक्ति की तपस्थली भी रही है। यही नहीं विष्णु व शिव की महान धरती व हरि हरिद्वार की नगरी उत्तराखण्ड ही इस महान भारत देश के प्रतीक महाराजा भरत जिनके नाम से इस देश का नाम भारत है, उनकी जन्म स्थली कर्णाश्रम भी उत्तराखण्ड में है। इस विख्यात धरती पर भारत धाम बनाने के बजाय यहां शराब के गटर बनाने वाले उत्तराखण्ड के हितैषी नहीं दुश्मन ही है।
आज भले ही यहां के शासकों ने इस दिव्य मोक्ष भूमि की पावनता की रक्षा करने के बजाय इसको शराब, भ्रष्टाचार, सत्तालोलुपु वुराचारियों की धरती बनाने में लगे है। उत्तराखण्ड जो अपनी दिव्य औषिधियों, अपने दिव्य धामों व मनोहारी स्थलों से विश्व के असंख्य लोगों को बरबस अपनी तरफ आकृष्ठ कर उत्तराखण्ड को पर्यटन व औषिधि आदि संसाधनों से अर्जित आय से समृद्ध बना सकती है परन्तु यहां के दिशाहीन भ्रष्टाचारी, जातिवादी व संकीर्ण मानसिकता के हुक्मरानों ने इसे बर्बादी के कगार पर पंहुचा दिया है। उत्तराखण्ड की धरती को नमन् करने के बजाय ये यहां के संसाधनों को विदेशों में सैरसपाटा करने में बर्बाद कर रहे है। इनको उत्तराखण्ड की दशा व दिशा पर चिंतन करने व यहां की जनांकांक्षाओं को साकार करने ंकी फुर्सत ही नहीं है। इनको प्रदेश के संसाधनों की लूट खसोट कर अपनी तिजौरियां भरने व अपनी व अपने परिजनों तथा प्यादों को आसीन करने के अलावा कुछ दूसरा सुझता ही नहीं। इसी कारण आज यह दिव्य भूमि के अभिशाप से इसको अपनी संकीर्ण कुण्ठाओं से तबाही के गर्त में धकेलने वाले नेता, नौकरशाह व माफिया तथा इनके प्यादे अभिशापित हो रहे है। कई बार मेने इन कुकृत्यों में लगे लोगों को अपने लेखों से सचेत किया परन्तु दुर्भाग्य है इनका इनको चोट खाने के बाद भी अपने कुकृत्यों का भान नहीं है। परन्तु इनको एक बात गांठ बांध लेना चाहिए उत्तराखण्डी जनमानस की जनांकांक्षाओं व सम्मान को तबाह करने वाले मुलायम, राव व तिवारी जैसे दिग्गज नेता कहीं के नहीं रहे तो खण्डूडी, निशंक व बहुगुणा कहां बच पायेंगे मोक्ष भूमि के अभिशाप से। उत्तराखण्ड दिव्य पावन भूमि है इसको शराब व भू माफिया बन कर रोंदने वालों की क्या दुर्गति होती है यह जगजाहिर है।
आडवाणी व नीतीश के चक्रव्यूह में फंसा भारत

मोदी के नेतृत्व से वंचित रखने का आत्मघाती षडयंत्र





देश की जनता जहां एक तरफ मनमोहन सिंह सरकार के कुशासन से मुक्ति के लिए जहां मोदी जेसे मजबूत दिशावान नेतृत्व की तरफ आशा भरी निगाह से देख रही है। वहीं दूसरी तरफ भाजपा के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी व नीतीश कुमार अपनी सत्तालोलुपता के लिए देश को मनमोहनी कुशासन से मुक्ति दिलाने के लिए जनता की आशाओं के पूंज बन चूके नरेन्द्र मोदी की राह में अवसरवादी अवरोध खडा करने का काम कर रहे है। इसी सप्ताह दिल्ली में सम्पन्न हुए जनता दल यू के राष्ट्रीय अधिवेशन में जो धर्म निरपेक्षता का मुखोटा पहन कर नीतीश व उनकी मण्डली ने नरेन्द्र मोदी पर प्रहार किये उससे जनता की नजरों में न केवल नीतीश बेनकाब हुए अपितु उनका आडवाणी स्वीकार्य का दाव से आडवाणी व उनकी मण्डली की नीतीश को आगे करके मोदी की राह रोकने का षडयंत्र बेनकाब हो गया। यही नहीं शिव सेना ने जिस प्रकार का बयान मोदी के सन्दर्भ में दिया उससे इस षडयंत्र की व्यापकता का अहसास खुद व खुद हो रहा है।
देश की जनता हैरान है कि क्यों 2002 में राजग सरकार में वाजपेयी के मंत्रीमण्डल में रेलमंत्री के पद पर आसीन नीतीश कुमार ने क्यों उस समय मोदी को हटाने की मांग नहीं की। क्यों उनके मंत्रालय ने गोधरा प्रकरण पर स्वतंत्र जांच करायी। क्यों उनको 2007 के बाद ही मोदी दागदार नजर आये। क्या इससे नीतीश की अवसरवादी राजनीति बेनकाब नहीं होती। वहीं लाल कृष्ण आडवाणी व उनके साथी जो स्वयं भारतीय संस्कृति के ध्वजवाहक कहलाते है। क्या उनको इस बात का भान नहीं कि भारतीय संस्कृति वयोवृद्ध होने पर वानप्रस्त व नये नेतृत्व को बागडोर सोंपने की सभ्यता से आंखे क्यों मोड रहे है। आडवाणी का भाजपा के मजबूत करने में बहुत योगदान है परन्तु पद के लिए जिन्ना प्रकरण ने उनको अटल की तरह पूरी तरह बेनकाब कर दिया। प्रधानमंत्री का उम्मीदवार न बनाये जाने के बाद उनको लगा कि देश की जनता का भाजपा से मोह भंग हो गया। क्यों अब उनको लगने लगा कि वह पार्टी अब उनके सपनो ंकी पार्टी नहीं। यह हकीकत भी है परन्तु आडवाणी यह बात केवल अंगूर खट्टे होने के कारण बोल रहे है। हालांकि पार्टी की इस स्थिति में पंहुचाने के लिए अगर कोई जिम्मेदार है तो वह संघ व आडवाणी ही है। जिन्होंने सुषमा, वेंकटया व अनंत तथा जेटली जैसे बंद कमरोे में आसीन रहने वाले नेताओं को बढावा दे कर उमा भारती, कल्याण सिंह, मदन लाल खुराना व गोविन्दा चार्य जैसे नेताओं को हाशिये में डाल कर भाजपा को कांग्रेस से बदतर बना डाला। आज भाजपा में जातिवाद, भ्रष्टाचार व अवसरवाद भाजपा व संघ के सिद्धांतों पर भारी पड चूका है। यहां पर जनसमर्पित नेताओं के बजाय तिकडमी व संकीर्ण नेताओं को सत्ता व संगठन में महत्व दिया जा रहा है। इन सबके बाबजूद आज देश के पास मोदी जैसे नेता अंधेरे में रोशनी की किरण के समान है, जिस पर देश की जनता को विश्वास है परन्तु भाजपा व जदयू की महत्वकांक्षी नेताओं की टोली इसको बर्बाद करके देश को पतन के गर्त में धकेलने के चक्रव्यूह रच रही है। क्योंकि इन सभी नेताओं को लग रहा है कि इस बार जनता का कांग्रेस से मोह भंग है और वे प्रधानमंत्री बन सकते है। इसी अंधी लालशा से आडवाणी, नीतीश ही नहीं, सुषमा, जेटली, गडकरी, जोशी व शरद यादव भी प्रधानमंत्री बनने का दिवास्वप्न को साकार करने के लिए मोदी का खेल बिगाडने में लगे हुए है। इसमे ं यशवंत सिंन्हा, जसवंत सिंह, शिवराज चोहान ही नहीं संघ व भाजपा के एक मजबूत तबका लगा हुआ है। परन्तु देश की जनता भले ही माफ कर दे परन्तु इनके षडयंत्र को महाकाल कभी माफ नहीं कर सकता। देश की एकता व अखण्डता की रक्षा के लिए आज मोदी जैसे नेतृत्व की नितांत आवश्यकता है। इसलिए मोदी की राह रोकने के लिए जो भी षडयंत्र किये जायेंगे वे निस्तेज व बेनकाब होते रहेंगे।
हम भारतीय परायों (विदेशियों/दूसरों) की खानपान, पहनावा, भाषा, रीतिरिवाज, धर्म व नेतृत्व को,( चाहे ये बेहद खराब क्यों न हो)तो आंख बंद कर स्वीकार कर लेते हैं तो बेहतरी से कर लेते हैं परन्तु अपनी भाषा, अपनी संस्कृति, अपने खानपान, रीति रिवाज, संस्कार व सही नेतृत्व को अपनी अज्ञानता, छुद्र अहं व संकीर्ण स्वार्थ के कारण दिल से स्वीकार नहीं कर पाते हैं। हम हंस बुद्धि से अच्छाई कहीं की भी हो उसको ग्रहण करने के बजाय दूसरों के गलत को भी स्वीकार और अपने अच्छे व हितकारी चीजों का तिरस्कार कर रहे हैं। हमारी इसी प्रवृति से आज संसार का सर्वश्रेष्ठ संस्कृति व ज्ञान विज्ञान की प्रखर मेधा का समृद्ध भारत आज संसार का सबसे बड़ा आत्मघाती देश बन गया है। यही हमारी पतन की शताब्दियों की कहानी रही है। जो दुर्भाग्य से आज भी जारी है। हम आज निहित स्वार्थो में अंधे हुए व्यक्तिवादी सोच से ग्रसित हो कर राष्ट्र को मिल कर पतन के गर्त में धकेल रहे हैं। जिस दिन हम भारतीय संस्कृति के मूल तत्व सर्वभूतहितेरता व सत्यमेव जयते को आत्मसात कर लेंगे उस दिन भारत पूरे विश्व में कल्याणकारी व्यवस्था का परचम फेहराने में सफल होगा। अपने निहित स्वार्थो में डूबे हुक्मरानों ने सदा इस देश के मजबूत नेतृत्व को उभरने से पहले ही उसको चक्रव्यूह में घेर कर जमीदोज करने का शर्मनाक कृत्य किया। राजस्थान की धरती ही नहीं भारत की धरती आज भी जयचंदों व मीरजाफरों के दंश से अपने महान युगान्तकारी महाराणा प्रताप व पृथ्वीराज चैहान महान नेतृत्व से वंचित होने से वंचित होना पडा। महाराणा प्रताप व पृथ्वीराज चैहान की तरह ही भारत को नेताजी सुभाष से भी वंचित होना पडा। आज भारत संकीर्ण, भ्रष्ट व पदलोलुपु नेताओं से व्यथित भारत को बचाने के अगर थोडा बहुत कंही कोई आशा की किरण दिखाई दे रही है तो वह है मोदी। आज मोदी जैसे नेतृत्व की भारत में नितांत जरूरत है जो देश को तबाही के गर्त में धकेल चूके बेलगाम भ्रष्ट नौकरशाही, अपनी कुर्सी व तिजारी भरने के लिए देश के हितों को रौंद रहे पदलोलुपु राजनेताओं व धर्मान्ध हैवानों तथा अमेरिका-चीन व पाक के प्यादों को रौंद कर भारत की रक्षा कर सके। परन्तु अफसोस है कि देश की जनता की इस जरूरत को पूरा करने के लिए मार्ग में कांटे विरोधी दलों की तरफ से नहीं अपितु भाजपा के बौनी मानसिकता के मठाधीशों की तरफ से बिछाये जा रहे हैं। इनको देश से अधिक अपनी पदलोलुपता की चिंता सता रही है। परन्तु ये आज नहीं संभले तो आने वाले समय में देश अपना रास्ता खुद ही तय कर लेगा। वर्तमान राजनेताओं में प्रधानमंत्री के सर्वश्रेष्ठ दावेदार हैं नरेन्द्र मोदी

मोदी के कई अच्छे गुण है तो कई कमजोरियां भी हो सकती है। ऐसा भी नहीं कि मोदी सर्वगुण सम्पन्न बता रहे है। मोदी के हर काम सही हो ऐसा भी हम दावा नहीं कर रहे है। आखिरकार मोदी भी हमारे पतनोमुख समाज का ही एक अंग है। हो सकता है उनमें भी कई कमियां होगी। परन्तु वर्तमान में देश में आडवाणी, नीतीश, राहुल व मनमोहन आदि जितने भी नेताओं के नाम भावी प्रधानमंत्री के नाम से चर्चाओं में हैं उनमें से मोदी सब पर इक्कीस साबित होते है। सवाल इस घनघोर पतन के गर्त में डूबे इस देश को इस पतन से निकालने का है। इसलिए हमें जो भी वर्तमान में सहारा मिलेगा अब उसी का सदप्रयोग करके इस पतन से देश को उबारने के लिए इस प्रकार के तिनके को ही पतवार बना कर इस भ्रष्टाचारी गटर से देश से बाहर निकालना होगा। हमारे पास केवल दो ही विकल्प हैं या तो हम इन अमेरिका, चीन व पाक के हाथों देश को लुटवा कर देश को आतंकवाद, भ्रष्टाचार , आरजकता रूपि कुशासन के गर्त में धकेलने वालों को चुने या देश के आत्मसम्मान की रक्षा करने वाले, आतंकियों को रौंदने वाले, भ्रष्टाचारी तंत्र को भयभीत करने वाले दृढ़ इच्छा शक्ति सम्पन्न मोदी का सहारा ले कर देश की रक्षा करें। आज हमारे समाज का इतना पतन हो गया है कि लोग अपने संकीर्ण स्वार्थ, जाति, धर्म, क्षेत्र, लिंग व नस्लवाद में अंधे हो कर किसी के अच्छे कामों को भी स्वीकार करने की हिम्मत तक नहीं जुटा पाते है। जब तक देश में अच्छे कार्यो का स्वीकार करके समर्थन करने व गलत कार्यो का विरोध करने की हंस प्रवृति नहीं होगी तब तक देश, समाज व व्यक्ति किसी का नैतिक उत्थान हो ही नहीं सकता। हमे आत्मनिरीक्षण करना चाहिए। लकीर के फकीर बनके व छदम् धर्मनिरपेक्षता के नाम पर देश, समाज, मानवता के साथ साथ भारतीय संस्कृति का गला घोंटने की इजाजत किसी को नहीं दी जा सकती। भारतीय संस्कृति कभी मानव तो रहा दूर जीव मात्र ही नहीं सकल सृष्टि को प्रभुमय मान कर उसका सम्मान करने की सीख देती है। वह कभी किसी से पक्षपात, शोषण व अन्याय करने की इजाजत नहीं देती। अज्ञानता के कारण लोग कुंए के मैढ़क बन कर भारतीयता को साम्प्रदायिकता का पर्याय मानने की भूल कर राष्ट्र का अहित कर रहे है। क्या जड़ चेतन के कल्याण के लिए समर्पित संस्कृति की ध्वज वाहक भारतीय संस्कृति की बात करना साम्प्रदायिकता और भारतीय मूल्यों को रौंदने वाले धर्म निरपेक्ष है तो ऐसी धर्मनिरपेक्षता का लानत है। इसकी आड़ में भारत को कमजोर करने का जो षडयंत्र चल रहा है वह कभी अपने लक्ष्य पर नहीं पंहुच पायेगा। यह षडयंत्र मानवता ही नहीं सृष्टि के नियमों के प्रतिकूल है। एक मोका इस देश में नरेन्द्र मोदी जेसे दृढ़ इच्छा शक्ति सम्पन्न नेता को प्रधानमंत्री के रूप में मिलना ही चाहिए। अगर मोदी भी जनांकांक्षाओं को साकार करने में असफल रहेंगे तो देश की जनता अटल व वीपीसिंह सहित तमाम पूर्ववर्ती नेताओं की तरह सत्ता से उखाड़ फेंकने में देर नहीं लगायेगी।

Tuesday, April 9, 2013


दो टके के लिए कत्लघर बना देते हैं


स्वार्थ में अंधे नेता वतन को भूल जाते हैं
धरती ही नहीं ये जमीर भी बेच देते है। 
दो टके के लिए कत्लघर बना देते हैं
स्वार्थ में ये बाप का नाम बदल देते है। 
मत चुराना तुम इस शहर की एक शाम
यहां तो हर सांस भी अब चंगेजी हुूई ।।
जो ख्ुाद लूट रहे हैं और लुटवा रहे हें
वहीं  आज वतन के बने हुए है रहनुमा ।।

देवसिंह रावत
(10 अप्रेल 2013 प्रात 10 बज कर 20 मिनट )