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Tuesday, July 31, 2012


राज्य गठन के प्रखर आंदोलनकारी व प्रसिद्ध रंगकर्मी  खुशहाल सिंह बिष्ट हुए सेवानिवृत

नई दिल्ली(प्याउ)। उत्तराखण्ड राज्य गठन जनांदोलन के प्रमुख संगठन उत्तराखण्ड जनता संघर्ष मोर्चा के दिल्ली प्रदेश के पूर्व अध्यक्ष व उत्तराखण्ड रंगमंच के अग्रणी कलाकार खुशहाल सिंह बिष्ट 31 जुलाई 2012 को दिल्ली जल संस्थान की लम्बी सेवा के बाद जेआरओ के पद से सेवानिवृत हुए। इस अवसर पर दिल्ली जल संस्थान के अधिकारियों व कर्मचारियों ने श्री बिष्ट को भावभीनी विदाई दी। सेवानिवृत होने के बाद उनके सहयोगी उनको गाजे बाजों के साथ उनके निवास जल विहार-लाजपत नगर आये। वहां पर श्री बिष्ट ने अपने सहयोगियों, मित्रों, आंदोलनकारी साथियों व रंगमंच के कलाकारों को एक सम्मान भोज का आयोजन किया। इस आयोजन में उत्तराखण्ड रंगमंच व टेली फिल्मों की नायिका कुसुम बिष्ट, मंजू बहुगुणा, लक्ष्मी रावत, व श्रीमती धीमान सहित अनैक कलाकारों तथा उत्तराखण्ड राज्य गठन जनांदोलन के अग्रणी संगठन ‘जनता संघर्ष मोर्चा’ के उपाध्यक्ष इंजीनियर रवीन्द्र बत्र्वाल व मोर्चा के कोषाध्यक्ष देशबंधु बिष्ट के साथ श्री बिष्ट जी ने ‘लीला घसियारी....,  नौछमी नारैण, आजी खा माच्छा आदि उत्तराखण्डी गीत पर मनमोहक नृत्य किया।  इस अवसर पर उत्तराखण्ड जनता संघर्ष मोर्चा के अध्यक्ष देवसिंह रावत, महासचिव जगदीश भट्ट, उपाध्यक्ष विनोद नेगी व उद्यमी महेन्द्र रावत के अलावा बडी संख्या में श्री बिष्ट जी के परिजन व सहयोगी सपरिवार इस आयोजन का आनन्द ले रहे थे।
उत्तराखण्ड के पौड़ी जनपद के बदलपुर क्षेत्र के मूल निवासी खुशहाल सिंह बिष्ट दिल्ली में उत्तराखण्डी रंगमंच के कलाकारों की सबसे प्रतिष्ठित व पुरानी संस्था ‘हाई हिलर संस्था’ के अध्यक्ष भी है। इसके साथ श्री बिष्ट दर्जनों नाटकों के अलावा अनैकों टेली फिल्मों में  अपनी प्रदर्शन क्षमता की अमिट छाप छोड़ चूके है। बहुमुखी प्रतिभा के सहृदय व हंसमुख श्री बिष्ट जी सदैव अपने समाज के हित में दिन रात समर्पित रहते हैं। सभी उपस्थित लोगों ने श्री बिष्ट को सेवानिवृत होने पर हार्दिक बधाई देते हुए उनके व उनके परिजनों की कल्याणकारी भविष्य की कामना की।


-नया राजनैतिक दल बना कर नहीं अपितु राजनीति की दिशा बदलने से होगा देश में भ्रष्टाचार का खात्मा 

-सरकार नहीं जनता करेगी पथभ्रष्ट हो चूकी देश की राजनीति की सफाई

-योगेन्द्र यादव से दिखाया टीम अण्णा को दिशा व दशा का जन आईना


अण्णा के आंदोलन को गांधी के आंदोलन की तरह नैतिक शक्ति का पूंज बताते हुए देश के अग्रणी सामाजिक व राजनैतिक चिंतक योगेन्द्र यादव ने 31 जुलाई को दो टूक शब्दों में टीम अण्णा को देश की पूरी तरह से पथभ्रष्ट हो चूकी राजनीति का अंग बनने (नया राजनैतिक दल बनाने )से आगाह करते हुए कहा कि देश के मुख्यधारा की 25 राजनैतिक दलों के साथ 26 वां बनने से न तो देश का कोई कल्याण होगा व नहीं देश से भ्रष्टाचार पर ही अंकुश लगेगा। भारतीय राजनीति के प्रख्यात विश्लेषक योगेन्द्र यादव ने कहा कि जिस प्रकार गंदगी से नाला बन चूकी नदी की गंदगी को एक दो बाल्टी पानी डालने या निकालने से साफ नहीं होती है, उसकी सफाई के लिए जिस प्रकार बाढ़ की जरूरत होती है, उसी प्रकार अब भ्रष्टाचार से पथभ्रष्ट हो चूकी भारतीय राजनीति का अब यहां पर 25 स्थापित मुख्य धारा की राजनैतिक दलों में एक बढोतरी करके नहीं अपितु इस राजनीति का चरित्र ही बदलना होगा। इसके साथ सरकार के समझ जनलोकपाल बना कर देश में व्याप्त भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने के लिए आमरण अनशन करने वाले अण्णा व टीम अण्णा के प्रमुख सदस्यों सहित उपस्थित आंदोलित जनसमुदाय को दो टूक शब्दों में कहा कि यह सरकार ही नहीं अपितु देश की मुख्यधारा की तमाम सभी दो दर्जन से अधिक पार्टियां इस मांग को कभी पूरा नहीं करेगी। इसलिए टीम अण्णा के रणनीतिकारों को निर्णायक संघर्ष करने के लिए अपने अनशन को त्याग देना चाहिए।
देश के अग्रणी चिंतक योगेन्द्र यादव ने देश की सरकार सहित तमाम दलों को भी जनहितों पर मूक बने रहने की आत्मघाती प्रवृति को धिक्कारते हुए कहा कि भारत में यह सनातन परंपरा रही है कि जब यहां के हुक्मरान जनहितों पर मूक रहते हैं तो यहां की जनता ही इसका समाधान करती है। उन्होंने स्पष्ट किया कि भारत के समक्ष भारत सरकार बहुत छोटी है। भारत का अवाम देश की तमाम राजनैतिक दलों का भ्रष्टाचारी रूप देख चूका है। ये सभी दल देश के किसी न किसी भू भाग में शासन में है। शासन में रहते हुए इन सबका भ्रष्टाचारी मुखोटा अब जनता के समझ पूरी तरह से बेनकाब हो चूका है। उन्होंने कहा कि ये सभी दल खो खो खेल रहे है। इस देश में विकास के लिए शासन के बजाय भ्रष्टाचार के लिए खो खो जैसा निकृष्ठ खेल खेला जा रहा है।
श्री यादव ने अण्णा सहित टीम अण्णा के सदस्यों को भी लोकशाही के प्रति अपने विराट दायित्व के निर्वहन करने के लिए तैयार रहने के लिए आगाह किया। उन्होंने कहा कि एक साल से देश की जनता को अण्णा पर विश्वास जगा है। इसलिए इस विश्वास की रक्षा के लिए अगर टीम अण्णा वर्तमान राजनेताओं की तरह खो खो के खेल में सम्मलित होगी तो देश की जनता उनको कभी माफ नहीं करेगी। उन्होंने साफ कहा कि इन स्थापित 25 मुख्य धारा की पार्टियों मेे 26 वां बन कर देश में भ्रष्टाचार न तो कभी दूर होगा व नहीं देश का राजनैतिक चरित्र ही बदला जा सकता। इसलिए अगर अण्णा हजारे ने इस समय देश का राजनैतिक चरित्र बदलने के लिए मजबूत पहल नहीं की तो देश की जनता कभी माफ नहीं करेगी। श्री यादव ने कहा कि नैतिक शक्ति से सम्पन्न इस आंदोलन के कर्णधारों को अपनी आलोचना को सहज ही स्वीकार करने की क्षमता होनी चाहिए। उन्होने इस आंदोलन में पत्रकारों व अन्य आलोचकों पर किये दुरव्यवहार की कड़ी भत्र्सना करते हुए इसे अलोकशाही प्रवृति बताया।
जिस समय देश के प्रखर चिंतक योगेन्द्र यादव अपने युगान्तर संबोधन करते हुए टीम अण्णा व उनके समर्थकों के समक्ष जोर दे कर कह रहे थे कि आज भी देश का शोभाग्य है कि देश में कलम के सिपाईयों की कलम जनहितों के प्रति समर्पित है, उनकी कलम नहीं बिकी और उनका समाज का सही राह दिखाने में महत्वपूर्ण योगदान है। अपने टीम अण्णा के वर्तमान आंदोलन में तीसरे बार इस मंच से  अपने औजस्वी संबोधन को हजारों लोगों ने ही नहीं देश के राजनेताओं ने भी अपने अपने सुत्रों से इस भाषण को दंतचित हो कर सुना। राजनीति के समीक्षक योगेन्द्र यादव के इस भाषण को इस आंदोलन के कर्णधारों, देश के राजनेताओं व जनता को दिशा व दशा दिखाने वाला आईना बन गया है। देखना है अण्णा हजारे व उनकी टीम जनता की आशाओं के योगेन्द्र यादव द्वारा बताये गयी आशाओं पर कहां तक खरा उतरते है। जिस दो टूक शब्दों में योगेन्द्र यादव ने अनशन से इन राजनेतिक दलों का दिल न पसीजने वाला बताते हुए निर्णायक संघर्ष के लिए अनशन समाप्त करके आंदोलन तेज करने की बात कही , दिन भर बूंदा बांदी के बाबजूद हजारों की संख्या में उपस्थित जनसमुदाय ने ताली बजा कर उसका करतल ध्वनि से स्वागत किया।

Monday, July 30, 2012


ओलंपिक में नहीं, भ्रष्टाचार के खेल में रहता भारत विश्व का सरताज

लंदन ओलंपिक में चीन आसमान और भारत पाताल?

लंदन (प्याउ)। 30 जुलाई को सोमवार का दिन लंदन ओलंपिक में भारत का बड़ी ही मुश्किल से पदक तालिका में खाता खुला। वह भी स्वर्ण पदक से नहीं अपितु कांस्य पदक  से। उसी दिन चीन जहां पदक तालिका में अमेरिका को पछाड़ कर सर्वोच्च स्थान पर था वहीं चीन के बाद जनसंख्या की दृष्टि से दूसरा बड़ा देश भारत जो पूरे विश्व की जनसंख्या का सातवें भाग का प्रतिनिधित्व करता है वह एक कांस्य पदक ले कर खुशियां मनाने के लिए मजबूर था। वह भी पुरूषों की 10 मीटर की एयर राइफल स्पर्धा में भारत के दिग्गज निशानेबाज गगन नारंग ने  700.1 अंक बनाकर यह कांस्य पदक जीता। इस स्पर्धा का स्वर्ण पर रोमानिया के एजी मोल्डोवीनू (702.1) और रजत पदक पर इटली के कैंप्रियानी (701.5) ने कब्जा जमाया। कांस्य पदक विजेता गगन नारंग की उपलब्धी में पूरा देश खुशियां मना रहा है। गगन नारंग भारत के लिए ओलंपिक पदक जीतने वाले तीसरे निशानेबाज हैं। इससे पहले 2004 के एथेंस ओलंपिक में राज्यवर्धन सिंह राठौड़ ने रजत और 2008 के बीजिंग ओलंपिक में अभिनव बिंद्रा ने स्वर्ण पदक जीता था। परन्तु इस बार अभिनव विंद्रा 16 स्थान पर ही रह पाये। गगन के अलावा कई खिलाड़ी हैं जो अपनी प्रतिभा के दम पर भारत की लाज बचाने के लिए दिन रात एक किये हुए है। नहीं तो हमारे देश के खेल मठाधीशों व हुक्मरानों ने देश की नाक कटाने में कोई कसर नहीं रखी है। आज देश के हुक्मरानों को इस बात को गंभीरता से सोचना होगा कि क्यों भारत इन खेलों में फिसड्डी और चीन श्रेष्ठ बना हुआ है। चीन में जहां राष्ट्र के लिए खेला जाता है वहीं भारत में भ्रष्टाचार के लिए ही इन खेलों के सरपरस्त बने लोग प्रतिभाओं के बजाय अपने निहित स्वार्थी प्यादों को जहां खेलों में भरते हैं वहीं उनका ध्यान खेलों में पदक जीतने से अधिक अपने निहित स्वार्थो की पूर्ति करने में लगा रहता है। जब तक भारत में खेलों को राजनेताओं के शिंकंजे से मुक्त नहीं किया जायेगा तब तक देश व खेल की ऐसी ही शर्मनाक दुदर्शा होगी। भारतीय खेलों की दुर्दशा पर सबसे सटीक टिप्पणी यही है कि अगर विश्व में कहीं भ्रष्टाचार के मामले में प्रतियोगिता होती तो भारत के भ्रष्टाचार के महारथी विश्व में पहले स्थान में रहते। क्योंकि देश के हुक्मरानों व खेल मठाधीशों सहित अधिकांश संस्थानों के महारथी देश की लुटिया डुबों कर अपने स्वार्थ पूर्ति करने में विश्व में सबसे तेज हे। इस शर्मनाक खेल में भारत का कोई जवाब नहीं।


चकबंदी से ही होगा उत्तराखण्ड से पलायन सहित तमाम समस्याओं का समाधानःगरीब 

गोष्ठी में गैरसेंण राजधानी व वरिष्ठ राज्य आंदोलनकारियों की उपेक्षा से आहत आंदोलनकारी 

उत्तराखण्ड के समग्र विकास के लिए एक गोष्ठी का आयोजन

नई दिल्ली(प्याउ)। उत्तराखण्ड की ज्वलंत समस्याओं पर दिल्लीवासी उत्तराखण्डियों का ध्यान आकृष्ठ करने के लिए उत्तराखण्ड से कुछ युवाओं के मार्गदर्शन व सहयोग से दिल्ली के पॅंचकुइयाँ रोड स्थित गढ़वाल भवन में रविवार 29 जुलाई को दिन भर एक विचार गोष्ठी का आयोजन किया। गोष्ठी में सम्मलित अग्रणी राज्य आंदोलनकारी जगदीश भट्ट व विनोद नेगी ने दो टूक प्रश्न किया कि प्रदेश के ज्वलंत मुद्दों पर इस प्रकार की गोष्ठी का प्रयास हालांकि नये युवाओं का सराहनीय प्रयाश के बाबजूद इस गोष्ठी में गैरसेंण राजधानी जैसे ज्वलंत मुद्दे के साथ साथ उपस्थित वरिष्ट राज्य आंदोलनकारियों व समाजसेवियों की उपेक्षा करना समझ से परे की बात रही। यह आंदोलनकारियों का अपमान ही है वहीं यह आयोजकों की निष्पक्षता पर भी प्रश्नचिन्ह लगाता है।
गोष्ठी के घोषित विषय. कृषि-भूमि की खरीद-फरोक्त पर रोक लगाना  2. पर्वतीय क्षेत्र में आवश्यक चकबंदी कानून बनवाना । 3. राज्य की शिक्षा, कृषि, रोजगार तथा चिकित्सा नीति घोषित करवाना । 4. पर्वतीय राज्य की संकल्पना को परिभाषित करने के लिए गैरसैण को राजधानी घोषित किया जाना रहा। परन्तु सांय 5 बजे तक अधिकांश वक्ताओं ने इन मुद्दों पर खासकर राजधानी गैरसैंण पर प्रकाश डालना तो रहा दूर इस विषय को छेडना भी उचित नहीं समझा। आयोजकों ने खुद इस विषय पर अपनी तरफ से चर्चा को गोष्ठी के घोषित विन्दुओं की तरफ मोड़ने का प्रयास तक नहीं किया। इस गोष्ठी का संचालन इसके आयोजक हल्द्वानी से आये अधिवक्ता चन्द्र शेखर करगेती, भूपाल सिंह बिष्ट व शेखर शर्मा ने किया। इस गोष्ठी के मुख्यवक्ता व दिल्ली से अपना व्यवसाय - मकान बेच कर अपने गांव जा कर विगत 35 सालों से चकबंदी करके कृषि करके लोगों को स्वालम्बन होने की प्रेरणा देने वाले अग्रणी समाजसेवी गणेश सिंह नेगी ‘गरीब’ ने दो टूक शब्दों में कहा कि चकबंदी किये बीना पहाड़ की समस्याओं का निदान नहीं हो सकता। चकबंदी को पहाड़ में पलायन सहित तमाम समस्याओं के समाधान का मूल मंत्र बताने वाले समाजसेवी श्री गरीब ने कहा कि उत्तराखण्ड की शिक्षा में प्राथमिक कक्षा से ही कृषि को अनिवार्य विषय की तरह पढ़ाया जाना चाहिए। उन्होंने कहा जब से हमारी शिक्षा से कृषि को दूर किया तब से हमारे युवा बेरोजगार ही नहीं बेकार हो गये।
इस गोष्ठी में का शुभारंभ करते हुए हल्द्वानी से आये सूचना अधिकार के कार्यकत्र्ता गुरविंदर सिंह चड्ढा, ने जनता से आवाहन किया कि अपने गांव व क्षेत्र के विकास को सुनिश्चित करने व उसमें हुए भ्रष्टाचार को रोकने के लिए मात्र दस रूपये का पोस्टल आर्डर से सूचना के अधिकार के तहत सूचना मांग कर विकास किया जा सकता है।
वहीं इस गोष्ठी में अग्रणी समाजसेवी मुजीब नैथानी ने प्रदेश में कुशासन के बारे में विस्तार से सूचना के अधिकार के तहत प्राप्त आंकडों के द्वारा अब तक की सरकारों द्वारा किये गये विकास को बेनकाब किया। वहीं प्रख्यात पत्रकार राजीव नयन बहुगुणा ने प्रदेश को बांधों में डुबोने का उतारू प्रदेश की सरकारों को आडे हाथ लिया। इसके साथ उन्होंने प्रदेश के मुख्यमंत्री बहु्रगुणा का सीधा नाम न लेते हुए इशारों इशारों में उन पर करारा प्रहार किया। उनके अनुसार प्रदेश में अनैक हवाई पट्टियां बनाने की वर्तमान मुख्यमंत्री की घोषणा पर कटाक्ष करते कहा कि लगता है मुख्यमंत्री प्रदेश की जनता को सड़क से जोड़ने के बजाय नेपाल के शासकों की तरह धन्नासेठों के लिए हवाई पट्टियां बनाने की चिंता ज्यादा सता रही है। इसके साथ जमीनी पत्रकार श्री बहुगुणा ने कहा कि प्रदेश में वर्तमान सत्तासीन सरकार के मुखिया ने विधायकों की खरीद फरोख्त की संस्कृति स्थापित की  है वह लोकशाही के लिए काफी खतरनाक है। उन्होंने कहा कि पहले प्रदेश में लोकशाही को दुषित करते हुए राजनैतिक दल आम मतदाताओं को प्रभावित करने के लिए शराब व रूपये बांटते थे, अब इस संस्कृति से और शर्मनाक ढ़ग से चुने हुए प्रतिनिधियों को खरीदने की प्रथा प्रदेश की लोकशाही पर एक प्रकार से ग्रहण ही लगा रही है। इसके लिए प्रदेश की वर्तमान सरकार की जितनी भी निंदा की जाय उतनी कम है।
इस गोष्टी के आयोजन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले म्यर उत्तराखण्ड के महासचिव भूपाल सिंह बिष्ट के अनुसार इस गोष्ठी में चकबंदी के लिए विगत 30-40 वर्षों से कार्यरत गणेश सिंह नेगी गरीब के सहयोगी कपिल डोभाल,  मुजीब नैथानी, डा. आशुतोष पन्त, वरिष्ठ पत्रकार राजीव नयन बहुगुणा, सामाजिक कार्यकर्ता अरण्य रंजन,  हरीश आर्य, नाबार्ड के सेवानिवृत्त महाप्रबंधक जगत सिंह बिष्ट, दूरदर्शन में समाचार वाचक ‘एंकर नदीम अंसारी, राजेंद्र भट्ट, सुभाष डबराल, समाजसेवी और कोयला मंत्री के ओ एस डी एस के नेगी, विमला रावत, पूर्व ब्लाक प्रमुख सल्ट कमला रावत, सुप्रसिद्ध गीतकार-गायक चन्द्र सिंह राही, त्रिभुवन चन्द्र मठपाल, प्रदीप नौडियाल,  शैलेन्द्र सिंह नेगी, संजय बिष्ट, अनिल कुकरेती, दयाल पाण्डे आदि लोगों ने अपने विचार व्यक्त किये । इसके अलावा इस गोष्ठी में वरिष्ठ समाजसेवी प्रेम सुन्दरियाल, उत्तराखण्ड जनता संघर्ष मोर्चा के महासचिव जगदीश भट्ट व उपाध्यक्ष विनोद नेगी, राज्य आंदोलन के दौरान गोली से घायल हुए श्री रावत, जितेन्द्र ेवलियाल, कैलाश बेलवाल,धीरज जोशी, नीरज पवार, हिमांशु बिष्ट, हिमांशु पुरोहित, दीपक बिष्ट आदि भी उपस्थित थे ।
इस मुहिम को लक्ष्य-प्राप्ति तक जारी रखने के आह्वाहन के बाद स्वर्गीय श्गिर्दाश् के प्रसिद्द गीत ‘जैंता इक दिन ता आलो उ दिन यौ दुनी माँ के साथ गोष्ठी का समापन हुआ ।
गोष्ठी के सफल आयोजन के लिए सर्वश्री सुदर्शन रावत, भूपालसिंह बिष्ट,  धीरेन्द्र अधिकारी, देवेन्द्र बिष्ट, भारत रावत, शेखर शर्मा, त्रिलोक रावत, हरीश रावत, नन्दन सिंह मेहता इत्यादि को उपस्थित लोगों ने बहुत-बहुत बधाई । वहीं इस समारोह में म्यर उत्तराखण्ड के अग्रणी मोहन बिष्ट की अनुपस्थिति सभी को खल रही थी। वहीं उपस्थित आंदोलनकारियों ने आशा प्रकट की कि भविष्य में आयोजक अपनी इन भूलों को सुधार कर इसे सच्चे अर्थो में उत्तराखण्ड की विचार गोष्ठी बनायेंगे। सबसे हैरानी की बात यह है कि गैरसैंण राजधानी बनाने की मांग के लिए जहां राज्य गठन आंदोलनकारी संगठन निरंतर इस मुद्दे को हवा देते रहते वहीं तेजी से उभरा म्यर उत्तराखण्ड संगठन भी इस मांग को लेकर गैरसेंण तक मार्च कर चूका है। इसके बाबजूद म्यर उत्तराखण्ड के सहयोग से आयोजित गोष्ठी में इस मुद्दे पर विशेष जोर न दिया जाना अपने आप में गहरे प्रश्न खडे करता है। जबकि इस गोष्ठी का संचालन आधे समय म्यर उत्तराखण्ड के पदाधिकारी के हाथों में भी रहा।

Sunday, July 29, 2012


- टीम अण्णा अहं का टकराव करने बजाय भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने के लिए लोकपाल बनाये सरकार

-ठोस लोकपाल शीघ्र पारित करनेे के लिए संसद का आपातसत्र बुलाये 

-टीम अण्णा के सबसे प्रमुख सदस्य अरविन्द गौड़ मंच पर दो दिन से क्यों नहीं?  जनता अण्णा से कर रही है सवाल


देश में सत्तारूढ़ सप्रंग सरकार की मुखिया सोनिया गांधी सहित तमाम राजनैतिक दलों को देश के प्रति अपने दायित्व को बोध करते हुए भ्रष्टाचार से तबाह हो रहे भारत को बचाने के लिए टीम अण्णा से संकीर्ण अहं का टकराव करने के बजाय अविलम्ब ठोस लोकपाल कानून बनाने का काम करे। अभी तक सरकार सहित भारत के तमाम राजनैतिक दल इस कार्य को देश का कार्य न समझ कर इसे केवल अण्णा या टीम अण्णा का कार्य समझ कर इसको ठण्डे बस्ते में डालने की धृष्ठता करने में लगे हुए है। टीम अण्णा के तमाम वरिष्ठ सदस्य अण्णा हजारे, केजरीवाल, मनीष सिसौदिया व गोपाल राय इन दिनों अनशन में बैठे हुए है। हजारों देशवासी इस मांग के समर्थन में सडकों में उतर रहे हैं परन्तु क्या मजाल सरकार ही नहीं विपक्ष के कानों में जूं तक रेंगे। सरकार सहित तमाम पार्टियों को चाहिए कि तत्काल अपने झूठे अहं के टकराव को छोड़ कर देश के हितार्थ इस कानून को बना कर देश की रक्षा करें। सांसदों सहित हुक्मरानों को यह बात समझना चाहिए कि जब देश बचेगा तभी वे राजनीति भी कर पायेंगे। अगर कल देश में कोई राजनीति तभी कर पाओगे जब यह देश का अस्तित्व भ्रष्टाचार से बचेगा। भ्रष्टाचार के कारण आज पूरे देश की अस्मिता खतरे में पड़ गयी है। टीम अण्णा के प्रखर सदस्यों को अगर अनशन में कुछ होता है तो इससे पूरे देश में आक्रोश फेलेगा, जो देश के लिए हानिकारक ही है।
टीम अण्णा भले ही टीम अण्णा में लाख कमियां हो या टीम अण्णा के अनशन में लोग राष्ट्रीय धरना स्थल जंतर मंतर में पहले की तरह उमडे या न उमड़े, परन्तु आज देश का हर देश भक्त चाहता है कि देश की सरकार व तमाम राजनैतिक दल देश की पूरी व्यवस्था पर दीमक की तरह तबाह कर रहे भ्रष्टाचार पर अविलम्ब अंकुश लगाने के लिए कठोर लोकपाल कानून बनाये। इस कानून को बनाने में कांग्रेस नेतृत्व व सप्रंग सरकार के लोग या अन्य विपक्षी दल मात्र अण्णा हजारे या टीम अण्णा की ही मांग मात्र समझ कर नजरांदाज करने की अक्षम्य भूल करके राष्ट्रीय हितों को जमीदोज करने की धृष्ठता न करें। क्योंकि भ्रष्टाचार ने आज देश की पूरी व्यवस्था को पूरी तरह पंगू बना दिया है देश के आम आदमी से न्याय, चिकित्सा, शिक्षा व सुरक्षा दूर हो गयी है। देश के हुक्मरानों की राष्ट्रीय हितों के प्रति उदासीनतापूर्ण रवैये व घोर सत्तालोलुपता से देश का शासन प्रशासन का तंत्र इतना जरजर हो गया है कि इसके कारण देश में इन हुक्मरानों केें कुशासन से मंहगाई, भ्रष्टाचार व आतंकवाद ने लोगों का जीना ही दूश्वार कर दिया है। इस लिए देश की रक्षा के लिए सरकार ही नहीं अपितु सभी दलों को तत्काल युद्धस्तर पर इस गंभीर ही नहीं विस्फोटक समस्या के निदान के लिए संसद का आपात व विशेष सत्र बुला कर इसे पारित करें। इसमें जरूरी नहीं की टीम अण्णा के अनरूप ही लोकपाल बने परन्तु सरकार इसमें यह अवश्य ध्यान रहे कि देश में भ्रष्टाचार का मुख्य कारण आज दम तोड़ रही लचर न्याय व्यवस्था व एनजीओ है। इन दोनों को हर हाल में इसके अन्तगर्त रखना चाहिए। प्रधानमंत्री हो या कोई मंत्री या जनप्रतिनिधि भ्रष्टाचार का आरोप जिस पर भी लगे उसे कानून की तरफ से किसी प्रकार का संवैधानिक विशेषाधिकार संरक्षण नहीं मिलना चाहिए। अगर न्याय पालिका में व्याप्त भ्रष्टाचार दूर हो जाता है तो देश का आधे से अधिक भ्रष्टाचार स्वतः ही समाप्त हो जायेगा।
सरकार को टीम अण्णा या अनशन में कम या ज्यादा लोगों को आने का ढाल बना कर देश की व्यवस्था को तबाही के कगार पर धकेल रहे भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने के अपने प्रथम दायित्व से न तो देश की सरकार को व नहीं किसी राजनैतिक दल को मुंह मोड़ना चाहिए। यह देश केवल टीम अण्णा की मांग भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने के लिए जन लोकपाल बनाने की है। इस मांग से देश का आम देश भक्त जो भले टीम अण्णा या इस जनलोकपाल के स्वरूप से अक्षरशः सहमत न भी हो परन्तु सभी चाहते हैं कि देश के हित में अविलम्ब कठोर लोकपाल बनाना चाहिए।
मैं जंतर मंतर पर 25 जुलाई से चल रहे टीम अण्णा के अनशन को समर्थन देने के लिए अपने साथियों के साथ सदैव जुटा रहा।  मुझे वहां पर न केवल इससे पहले अण्णा द्वारा जंतर मंतर व रामलीला मैदान में चलाये गये तीनों आंदोलनों में सहभागी रहने के कारण इस बार लोगों के उत्साह में कभी कमी और कभी तेजी साफ दिख रही है। रामदेव से आने से पहले भीड़ काफी कम थी। उसके बाद शनिवार व रविवार को जैसे समाचार पत्रों व समाचार चैनलों में कम भीड़ के समाचार प्रकाशित हुए। उससे लोगों में आक्रोश फेल गया। अण्णा हजारे द्वारा रविवार 29 जुलाई को प्रातः से अनशन में बैठने की खबरों ने एक बार लोगों को इस अनशन के समर्थन में जंतर मंतर पर उमड़ने के लिए विवश कर दिया। लोगों में इस बात का भी आक्रोश रहा कि सरकार व देश में भ्रष्टाचार को अंकुश लगाने की अण्णा की मांग का विरोध करने वाले लोग इस आंदोलन में कम लोगों के आने से प्रसन्न हैं, और वे इसे अण्णा के आंदोलन की हार मान रहे है। इसी को देख कर फिर से देश की जनता सड़कों पर उमड़ गयी और रविवार 29 जुलाई को उसने पूरा जंतर मंतर खचाखच भर कर सरकार को एक प्रकार की चेतावनी दे दी कि देश रक्षा में संघर्ष कर रहे अण्णा को कमजोर न समझे सरकार। इसके साथ 28 जुलाई को शनिवार को कुछ आंदोलनकारियों ने सैकड़ों की संख्या में छापामार दस्ते के रूप में प्रधानमंत्री आवास 7 रेसकोर्स पंहुच कर वहां पर मनमोहन सिंह की धृतराष्ट्रवृति के लिए धिक्कारते हुए अविलम्ब देश में लोकपाल ला कर भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने की मांग की। इस प्रदर्शन पर दिल्ली पुलिस ने प्रधानमंत्री आवास परकोयले के टूकडे फेकने व प्रधानमंत्री आवास की दिवारों पर आपत्तिजनक नारे लिखने का भी आपरोप लगाया। गौरतलब है कि टीम अण्णा प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह पर कई लाख करोड़ रूपये के कोयले घोटाले का आरोप भी लगा रही है। शायद इसी कारण प्रदर्शनकारियों ने कोयले घोटाले में प्रधानमंत्री की भूमिका पर प्रश्न उठाने के प्रतीकात्तमक कोयले के टूकड़े उनके निवास में फेंके हों। वहीं इस आंदोलन के मंच का संचालन करने वाले कुमार विश्वास के अनुसार उन को दिल्ली पुलिस ने इन आंदोलनकारियों को भडकाने व आंदोलन में देश में महत्वपूर्ण व्यक्तियों पर असंसदीय टिप्पणियां करने के साथ साथ इस आंदोलन में टीम अण्णा को अनशन आंदोलन की शर्तो को तोड़ने का भी आरोप लगाया।
 जंहां सरकार की अलोकतांत्रिक रूख से देशवासी दुखी थे वहीं  टीम अण्णा में आपसी मनमुटाव से देशवासियों को काफी हैरानी हो रही थी। लोगों को यह समझ में नहीं आ रहा था कि टीम अण्णा के प्रमुख सदस्य क्यों टीम को इस निर्णायक क्षणों में भी एकजूट नहीं रख रहे है। सबसे हैरानी लोगों को इस बात से हो रही है कि टीम अण्णा के सबसे जमीनी सदस्य अरविन्द गौड, जो अपनी नाट्य मंडली के सैंकडों सदस्यों के सहयोग से पूरे देश में इस आंदोलन को सफल बनाने में अग्रणी रहे, उनको क्यों इस बार टीम अण्णा ने मंचों से दूर रखा। उनकी प्रतिबद्धता इस बात से उजागर होती कि वे भले ही मंच से दूर है परन्तु वे निरंतर आंदोलन स्थल में जनता के बीच में आम आदमियों की तरह आंदोलन से जुडे रहे। यहीं नहीं रविवार को जब अण्णा आमरण अनशन में जंतर मंतर में बैठ रहे थे उस समय वे बिहार में आम जनता को इस आंदोलन में जोड़ने के लिए आंदोलित कर रहे थे। वे दो दिन के बिहार दौरे पर है। परन्तु बाकी दिन वे निरंतर अपनी मंडली के साथ इस आंदोलन में जुटे रहते है। उनका इस बार के आंदोलन में मंच से दूर रह कर जनता के बीच ही बेठे रहना, इस बात का साफ इशारा करता है कि टीम अण्णा में सबकुछ ठीक नहीं चल रहा है। मै कल भी उनसे मिला और आज भी जब उनसे इस मामले में मैने दो टूक सवाल किया तो वे बोले मैं आम लोगों के बीच ही अच्छा लगता हॅू। परन्तु मैने कहा आप इससे पहले तीन आंदोलनों में जंतर मंतर व रामलीला मैदान में मंच में जिस प्रकार से सक्रिय नजर आते थे वह इस बार क्यों नहीं? वे हंसते हुए बोले भई मैं जनता के बीच रहने का आदी हूॅ परन्तु उनके मंच पर न जाने से एक बात साफ हो गयी कि वे टीम अण्णा के कर्णधारों से उस प्रकार से अपने आप को सहज नहीं पाते हैं जिस प्रकार पहले थे। न जाने टीम के प्रमुख अण्णा हजारे को यह बात क्यों नहीं खल रही है कि अरविन्द गौड़ जैसे जमीनी व मुद्दे से प्रतिबंद्ध प्रमुख सदस्य क्यों मंच पर नहीं आ रहे हैं? टीम अण्णा के प्रमुख होने के कारण अण्णा हजारे का यह प्रथम दायित्व बनता है कि वे टीम के महत्वपूर्ण सदस्यों को मंच पर एकजूट दिखायें। यहां अरविन्द गौड़ के अलावा न्यायमूर्ति हेगडे का न दिखाई देना लोगों के जेहन में कई भ्रम पैदा करता है। इन्हीं भ्रमों के कारण ही निंरंतर जनता का मोह भंग हो रहा है, इसी कारण इस मांग से सहमत होने व भ्रष्टाचार से निजात पाने की प्रचण्ड इच्छा होने के बाबजूद आम जनमानस टीम अण्णा के अनशन आंदोलन में पहले तीन समय के आंदोलनों की तरह आंदोलन में भाग लेने के लिए नहीं उमड़ रहा है। वहीं सरकार की मंशा भी टीम अण्णा को इस बार थकाने की रणनीति की है। सरकार को मालुम है कि टीम अण्णा के तीन सदस्यों में से दो सदस्य अरविन्द केजरीवाल व मनीष सिसोदिया अपने स्वास्थ्य कारणों से लम्बे समय तक अनशन नहीं कर सकते हैं। केवल गोपाल राय ही दस दिन की सीमा को पार कर सकते है। हाॅं अगर अनशन करने में महारथ हासिल अण्णा हजारे अगर अपनी घोषणा के तहत अनशन पर बेठ जाते है। तो सरकार को जरूर असहज स्थिति का सामना करना पडेगा। सरकार को यह जरूर समझ लेना चाहिए कि यह केवल टीम अण्णा या चंद लोगों का मामला नहीं अपितु यह देश के वर्तमान व भविष्य की रक्षा के लिए जरूरी है कि भ्रष्टाचार पर तत्काल अंकुश लगाने के लिए कठोर लोकपाल कानून बनाया जाय। आज अनशन आंदोलन के समर्थन में जहां मेरे साथ मोहन बिष्ट, जगदीश भट्ट, मोहनसिंह रावत, जगमोहन रावत, परमवीर रावत, महेन्द्र रावत, जगदीश भाकुनी, वरिष्ठ पत्रकार महिपाल सिंह व पाण्डे आदि थे वहीं इस आंदोलन में अग्रणी उद्यमी गजेन्द्र रावत को मैं अन्ना हॅॅू की टी शर्ट व टोपी पहने देख कर सुखद आश्चर्य हुआ। उन्होंने कहा कि रावत जी सवाल टीम अण्णा की अच्छाई व बुराई का नहीं, सवाल देश को तबाह करने पर तुले भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने के लिए सही व्यवस्था का बनाने का। उन्होंने कहा मैं दुनिया के 45 से अधिक देशों में भ्रमण कर चूका हूॅ परन्तु दुनिया के गरीब से गरीब नामीबिया जैसे मुल्क से हमारे यहां व्यवस्था कही बदतर है। हमारी व्यवस्था यहां एक आम नागरिक के हितों के प्रति कहीं दूर दूर तक जागरूक नहीं है। 29 जुलाई को मेरे साथ प्यारा उत्तराखण्ड के प्रबंध सम्पादक महेश चन्द्रा व समाजसेवी अनिल पंत सम्मलित रहे। इसके साथ इस आंदोलन में अपनी निरंतर भागीदारी निभाते हुए अग्रणी पत्रकार विजेन्द्रसिंह रावत, कंझावला के चैधरी व मजदूर नेता हरी ओम तिवारी भी निरंतर बने रहे। शेष श्रीकृष्ण कृपा। हरि ओम तत्सत्। श्री कृष्णाय् नमो।

Saturday, July 28, 2012


-दंगा नहीं यह भारत पर बंगलादेशी आंतकियों का हमला है:-भारतीय मुक्ति सेना

-कारगिल हमले से खतरनाक है देश पर बंगलादेशी आतंकियों का यह  हमला 

-असम दंगे हुक्मरानों व राजनैतिक दलों द्वारा किया गया अक्षम्य राष्ट्रद्रोह है

नई दिल्ली(प्याउ) । भारतीय मुक्ति सेना के प्रमुख देवसिंह रावत ने दो टूक शब्दों में कहा कि यह न तो जातीय दंगा है नहीं धार्मिक दंगा है, अपितु यह देश के हुक्मरानों की सह पर बंगलादेशी घुसपेटिये आतंकियों का भारत में काबिज हो कर भारत पर किया गया सीधा हमला है। भारतीय मुक्ति सेना प्रमुख श्री रावत ने स्पष्ट किया कि यह मात्र कलंक या दंगे नहीं अपितु यह दंगों ने देश के हुक्मरानों व राजनैतिक दलों द्वारा देश में बंगलादेशी आतंकियों की घुसपेट को नजरांदाज करके उनको राष्ट्र की एकता व अखण्डता पर इस तरह से हमला करके देश के भू भाग पर कब्जा करने के पाक आतंकियों द्वारा कारगिल हमले से भी खतरनाक हमला है। श्री रावत ने कहा कि दंगा या संघर्ष मान कर प्रधानमंत्री न केवल अपनी जिम्मेदारी से बचने की नापाक कोशिश कर रहे है। देश के हुक्मरानों के साथ देश की राजनैतिक पार्टियां ने आज तक इस समस्या को गंभीरता से नहीं लिया। केवल कुछ समय राजनैतिक लाभ उठाने के लिए इस प्रकार के मुद्दों को हवा में उठाने का काम किया गया परन्तु कभी ंगंभीरता से इसको किसी भी दल ने नहीं लिया। आज जो लोग इसे मात्र दंगा मान रहे हैं वे भी इस समस्या पर पर्दा डालने में सहभागी है।
असम में इस पखवाडे हुए दंगांे को ‘राष्ट्र पर कलंक बताने वाले प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के बयान पर कड़ी भत्र्सना करते हुए भारतीय मुक्ति सेना के प्रमुख देवसिंह रावत ने दो टूक शब्दों में कहा कि इसे केवल दंगा मान कर देश के माथे पर कलंक करार दे कर मनमोहन सिंह अपनी जिम्मेदारी से बच नहीं सकते व नहीं वे यह बयान दे कर इसके खतरनाक कारणों पर राहत रूपि 300 करोड़ रूपये का पर्दा डाल कर राष्ट्र को गुमराह नहीं कर सकते है।
गौरतलब है कि एक सप्ताह से असाम के कोकराझार क्षेत्र में हुआ दंगा असाम के कई जनपदों में फेलने के बाद प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने शनिवार 28 जुलाई को प्रभावित क्षेत्रों को दौरा किया और कई पीड़ित लोगों से मिलने के बाद इस दंगे को देश के माथे पर कलंक बताते हुए पीड़ित लोगों की राहत के लिए 300 करोड़ रूपये का ऐलान भी किया। उन्होंने लोगों को सुरक्षा देने व दोषियों को दण्डित करने का करार देते हुए प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने शनिवार को कहा कि सभी प्रभावित क्षेत्रों के लोगों के बीच सुरक्षा प्रदान करने के आश्वासन के साथ साथ की दोषियों को सजा दिलाने का आश्वासन भी दिया।
गौरतलब है कि असमवासी बोडो जनजाति के लोगों व मुस्लिमों ं के बीच हुई व्यापक मारकाट में कम से कम 5 दर्जन से अधिक लोग मारे गए हैं और 2 लाख से अधिक लोगों को आततायियों से जान बचाने के लिए अपना घर बार छोड़कर शिविरों में शरण लेने के लिए मजबूर होना पडा। । भारतीय मुक्ति सेना ने इस बात पर गहरा आक्रोश प्रकट किया कि प्रधानमंत्री ने इस समस्या की मूल कारण बंगलादेशी आतंकी घुसपेट पर अपनी जुबान न खोलते हुए उल्टा ‘घुसपेटियों को भी इस देश का नागरिक बता कर उनको भी देश के नागरिकों की तरह सुुरक्षा व संरक्षण देने की बात कह डाली। प्रधान मंत्री ने कहा था ‘हम सब एक जन और एक राष्ट्र हैं तथा हमें इसी तरह एक साथ रहना है। हमें पूरे इलाके में निश्चित तौर पर अमन और शांति बहाल करनी चाहिए और मैं आप सभी से यह सुनिश्चित करने के लिए सरकार के साथ मिलकर काम करने का आह्वान करता हूं।’ उन्होंने कहा कि यह समय मरहम लगाने का है। जबकि प्रधानमंत्री को दो टूक शब्दों में कहना था कि भारत की धरती में घुस कर भारतीयों पर हमला करने वाले आतकियों को भारत पर हमला करने के अपराध की सजा मिलेगी। उनको बंगलादेशी घुसपेटियों की युद्धस्तर पर जांच का ऐलान करने व उनको अविलम्ब धरपकड करने के लिए असम सरकार को स्पष्ट निर्देश देने चाहिए थे। परन्तु वोट बैंक के मोह में प्रधानमंत्री ने न केवल देश पर हुए इस हमले को नजरांदाज किया अपितु इस पर पर्दा डालते हुए घुसपेटियों को भी एक प्रकार का शर्मनाक संरक्षण दे डाला।
असम के मूल निवासियों में प्रमुख बोडो आदिवासी क्षेत्रों में जिस प्रकार से देश व प्रदेश की सरकारों की देशद्रोही लापरवाही के कारण लाखों की संख्या में बंगलादेशी आतंकी घुसपेटियों ने देश में रहने वाले देशद्रोही राजनैतिक आकाओं के संरक्षण के सह पर यहां पर कब्जा कर भारतीयों को इन क्षेत्रों से खेदेड़ने का काम कर रहे है। इसी कारण से यह समस्या आज विस्फोटक बन गयी है। आज असम की राजनीतिक शक्ति भी काफी हद तक बंगलादेशी आतंकी घुसपेटियों के हाथों में आ गयी है। राजनैतिक दलों के सत्तालोलुपु देशद्रोही नेताओं की शह पर बंगलादेशी आतंकी न केवल असम में अपितु बंगाल, दिल्ली, उत्तराखण्ड सहित देश के कई भागों में अपना राशन कार्ड व वोटर कार्ड बना चूके है। परन्तु वोट बैंक के लालच में देश व प्रदेश की सरकारें इस समस्या का ईमानदारी से तत्काल समाधान खोजने के बजाय अधिकांश राजनैतिक दल इस समस्या पर मूक कर कर देश के साथ देशद्रोह कर रहे है। आज जो हमला बंगलादेशी आतंकियों ने असम के भारतीयों पर किया वह कल आने वाले दिनों में देश के जिस जिस प्रदेशों में वे बसाये गये हैं वहां पर हो तो कोई आश्चर्य नहीं होगा। अपने आप को धर्म निरपेक्ष कहलाने की अंधी होड़ में न तो राजनैतिक दल व नहीं पत्रकार या बुद्धिजीवी भी इस खतरनाक समस्या पर मुंह खोलने के लिए तैयार है। इसी कारण आज कश्मीर के बाद असम भी काबू से बाहर हो गया है। कश्मीर में जहां पाक आतंकियों का राज चलता तो असम में अब बंगलादेशी आतंकियों का राज चलने लगा है। देश के हुक्मरानों, राजनेताओं, बुद्धिजीवियों व पत्रकारों का यही हालत धीरे धीरे देश के अन्य प्रदेशों की होने वाली है। देश के हुक्मरान जहां वोट बैंक के लोभ में देश में कट्टवादी राष्ट्रद्रोहियों को न केवल देश के कानून से अपितु देश की एकता व अखण्डता से शर्मनाक खिलवाड़ करने की शह दे रहे हैं जो किसी प्रकार राष्ट्रद्रोह से कम नहीं है। अगर देश की जनता इस गंभीर समस्या के प्रति अभी से जागृत नहीं हुई तो आने वाले समय में पाक से अधिक बंगलादेशी आतंकी देश को तबाह करने के कारण बनेंगे। अगर देश के प्रति देश के हुक्मरानों को जरा सा भी प्यार है या अपनी जिम्मदारी को वहन करना चाहते हैं तो अविलम्ब देश से बंगलादेशी आतंकियों को देश से बाहर खदेड़ने का काम युद्ध स्तर पर करना चाहिए। वह भी एक पल गंवाये बीना। अगर इसमें देर कर दी गयी तो आने वाले समय में इस दिशा में कदम उठाने की कोई सरकार सोचने की ताकत भी नहीं रहेगी और देश की सत्ता बंगलादेशी आतंकियों व पाक आतंकियों के सहयोग से देश में रह रहे इनके संरक्षक देशद्रोहियों के हाथों में आ जायेगी। जिससे भारत का राष्ट्रांतरण हो जायेगा। आज तमाम सामाजिक संगठनों, बुद्धिजीवियों व पत्रकारों को देश की रक्षा के लिए बंगलादेशी आतंकियों से रक्षा करने के लिए सरकार व राजनैतिक दलों पर दवाब बनाने के लिए व्यापक जनदवाब बनाने के लिए आगे आना चाहिए। आज देश के खिलाफ तमाम सरकारों व राजनेताओं द्वारा किये गये भ्रष्टाचार से बडी समस्या है यह। इसका निदान करना ही देश का प्रथम धर्म है।

Friday, July 27, 2012


-रोहित व उज्जवला के ही नहीं देश के भी गुनाहगार हैं तिवारी

-भगवान के घर अंधेर नहीं है तिवारी जी, 

-न्यायमूति रीवा खेत्रपाल के ऐतिहासिक फेसले से मजबूत हुआ आम जनता का न्यायपालिका पर विश्वास


आज अपने अवैध सम्बंधों से उत्पन्न पुत्र के बारे में न्यायालय का दो टूक फेसला आने पर तिवारी जी इस प्रकरण के आज भी अपने कुकर्मो पर माफी मांगने के बजाय लोगों को ही उनके व्यक्तिगत जीवन में दखल न देने की नसीहत देने की धृष्ठता करने वाला बयान दे कर अपनी कलुषित मानसिकता व अपनी ऊंची पंहुच की हनक का परियच दे रहे है। डीएनए की रिपोर्ट के सार्वजनिक होने से पहले तक इस मामले को सिरे से नकारने व न्यायालय को भी उसकी सीमाओं के अतिक्रमण का आईना दिखाने की निरंतर हरकत करते हुए इस सच्चाई पर पर्दा डालने की अंतिम समय तक कोशिशें करते रहे। श्री तिवारी जैसे नेताओं को बेनकाब करने वाली उज्जवला व उनके अधिवक्ता बेटे रोहित ने जिस अदम्य साहस का परिचय दे कर पूरे देश के सामने तिवारी के विकास पुरूष का असली चेहरा दिखाने का सराहनीय कार्य किया, इसके लिए उनको कोटी कोटी धन्यवाद। क्योंकि हमारे पुरूष प्रधान समाज में पुरूष के ऐसे गुनाहों को तो कटघरे में करने के बजाय महिलाओं पर ही अंगुली उठाने का काम होता है। ऐसे समाज में कितने सामाजिक ताने व उपहास सहने के बाद भी माॅं बेटा दोनों ने बहुत ही साहस से तिवारी जैसे बहुत ऊंची पंहुच रखने वाले कुटिल राजनेता को उनकी तमाम कुटिल चालों का मुहतोड़ जवाब दे कर लम्बी लड़ाई के बाद बेनकाब किया उसके लिए उन दोनों माॅं बेटा को कोटी कोटी नमन्। अगर आज सभी शोषित महिलायें ऐसा साहसिक कार्य करके ऐसे समाज में तथाकथित बडे नेताओं को बेनकाब कर दे तो यह देश की बहुत बड़ी सेवा होगी। मैने खुद रोहित जी की माता उज्जवला से कहा था कि आप भी तिवारी की तरह इस प्रकरण में दोषी हो परन्तु शेखर निर्दोष हैं, उनको हर हाल में न्याय मिलना ही चाहिए। इसके साथ आपने इस मुद्दे को उठा कर तिवारी को कटघेरे में खडा करके अपने कृत्यों का एक प्रकार से पश्चाताप ही कर दिया। तिवारी पर तरस खा कर पाक साफ बताने वाले लोगों से मेरा एक ही सवाल है कि क्या तिवारी ने मुख्यमंत्री या देश का मंत्री बनते हुए शपथ अवैध सम्बंधों को बनाने की ली थी या देश व प्रदेश को मजबूत बनाने की। तिवारी कुशल राजनेता, बुद्धिजीवी, स्वतंत्रता सैनानी होने के साथ महत्वपूर्ण संवैधानिक पदों में देश के संविधान व मर्यादा की रक्षा करने के दायित्व को निर्वहन करने की आश देश की जनता उन्हीं से नहीं अपितु देश के सभी महत्वपूर्ण पदों पर आसीन व्यक्तियों से करती है। परन्तु तिवारी जैसे नेताओं ने देश के संसाधनों को अपने ऐसे ही सम्बंधों व प्यादों पर तबाह किये इस लिए वे न केवल शेखर का ही नहीं अपितु देश का भी अपराधी हैं। तिवारी जैसे हुक्मरानों के कारण ही देश की पूरी व्यवस्था पथभ्रष्ट हो जाती है। देश की प्रतिभाओं के बजाय ऐसे राजनेता अपने अनैतिक सम्बंधों व प्यादों पर ही देश के विकास के संसाधनों को पानी की तरह बहाते है। आज उत्तराखण्ड मात्र दस सालों में देश के सबसे भ्रष्टत्तम राज्य बन गया तो इसका काफी हद तक गुनाहगार तिवारी ही है। तिवारी के कुशासन में प्रदेश की लोक मर्यादाओं, शासन व्यवस्थाओं व विकास के संसाधनों की किस प्रकार से रौंदा गया इसका प्रत्यक्ष उदाहरण रहा तिवारी कुशासन को कटघरे में खड़ा करने वाला ‘उत्तराखण्ड के महान गायक नरेन्द्रसिंह नेगी का नौछमी नारेण नामक गीत। आज तिवारी अगर चाहते तो उत्तराखण्ड में जनप्रतिनिधियों व शासन प्रशासन की सही दिशा रख सकते थे, उनमें प्रतिभा थी परन्तु उन्होंने उत्तराखण्ड के भविष्य को पतन के गर्त में डालने के अलावा कुछ नहीं किया। परन्तु इन सबके बाबजूद उन काठ के उल्लूओं को क्या कहा जा सकता जो तिवारी के कुशासन के कारण तबाह हो रहे उत्तराखण्ड की दुर्दशा पर आंसू बहाने के बजाय तिवारी के पक्ष में घडियाली आंसू बहा कर उनका यशोगान कर रहे हैं।
शेखर की पीड़ा व भावना का सम्मान करते हुए जिस मजबूती से उच्च न्यायालय की महान न्यायाधीश रीवा खेत्रपाल ने निष्पक्ष न्याय करके यह साबित कर दिया कि भारत में न्यायपालिका को अपनी सत्ता हनक से नहीं हांका जा सकता है। उसकी जितना भी प्रसंशा की जाय वह बहुत कम है। महान न्यायाधीश रीवा खेत्रपाल द्वारा दिये गये इस ऐतिहासिक फेसले से लोगों का विश्वास न्याय पालिका पर और मजबूत हो गया है।
देश के सबसे वरिष्ट व अनुभवी नेता नारायण दत्त तिवारी के कृत्यों के कारण उनकी मनोवृति इतनी पतित हो चूकी है कि उनको देश की संस्कृति, संवैधानिक मर्यादाओं व लोकलाज को अपने कृत्यों से शर्मसार करने वाले तिवारी के ये ही निहित स्वार्थी प्यादे उनसे अपने निहित स्वार्थो की पूर्ति कराने के लिए उनको विकास पुरूष कह कर भाट वृर्ति करके देश के संसाधनों की खुले आम लूट मचाते हुए अपनी तिजोरियां भरते रहे। अगर तिवारी के कार्यकाल व उनके साथ जुड़े हुए अधिकांश लोगों की सीबीआई से निष्पक्ष जांच की जाय तो पूरे देश की आंखें फट्टी की फट्टी रह जायेगी कि कैसे उनके करिबियों के लिए विकास के संसाधनों को लुटवाया गया।
दुसरों का जीवन बर्बाद करके, जिस संविधान के तहत देश व राज्य के विकास करने की कसमें खायी थी उसी संविधान की धज्जियां उडाते हुए तिवारी जैसे राजनेताओं ने जब अपने पद की गरीमा को ताउम्र हर कदम पर तार तार किया। आखिर बकरे की माॅं कब तक खेर मनाती, परमात्मा के घर अंधेर नहीं है तिवारी जी। दिल्ली व लखनऊ में ही नहीं देश के हर कोने कोने में घटित हुए तिवारी के किस्सों को लोग जिस चटकारा लेते हुए ठहाके लेते थे, उस तिवारी को जब सोनिया गांधी ने पावन देवभूमि उत्तराखण्ड का मुख्यमंत्री बना कर आत्मघाती निर्णय लिया, वहां जिस प्रकार से तिवारी ने सत्ता का खुलेआम दुरप्रयोग जनांकांक्षाओं व विकास का गला घोंटने के लिए किया उससे पूरे प्रदेश में तिवारी व कांग्रेस की लोग थू थू करने लगे। परन्तु इसके बाबजूद दिल्ली स्थिति कांग्रेस के मठाधीश बने धृतराष्ट्र व गंधारी जैसे नेतृत्व ने जनता द्वारा कांग्रेस को सत्ता से उखाड़ फेंकने के बाबजूद सोनिया गांधी ने लोकलाज व संविधानिक संस्थाओं की पावनता की रक्षा करने के बजाय तिवारी जैसे जनता की आंखों के आगे पूरी तरह से बेनकाब हो चूके व्यक्ति को आंध्र प्रदेश का राज्यपाल बनाने का हिमाकत की। परन्तु भगवान तिरूपति ऐसे कुकृत्यों को करने वालों को कहां माफ करने वाले, तिवारी जी जिस ढ़ग से हेदारबाद राजभवन में पूरे देश के सामने बेनकाब हुए उसने तिवारी ही नहीं अपितु उसको संरक्षण देने वाले कांग्रेस नेतृत्व की पूरे देश में थू थू होने लगी। इसी कारण तिवारी ने यहायक राज्यपाल के पद से इस्तीफा दे कर वापस आने का निर्णय लिया। परन्तु उत्तराखण्ड का दुर्भाग्य यह रहा कि ताउम्र उत्तराखण्ड राज्य गठन का घोर विरोधी रहे तिवारी जी को जब लखनऊ व दिल्ली में अनुकुल माहोल की आश नहीं रही तो उन्होंने उत्तराखण्ड के देहरादून में कदम रखा। एक तरफ हेदराबाद में राजनिवास को पतित करने का आरोप लगाते हुए आंध्र प्रदेश के लोग उनको राजभवन से बर्खास्त करो के लिए आंदोलन कर अपनी संस्कृति व स्वाभिमान का परिचय दे रहे थे वहीं कुछ बेशर्म लोग देहरादून में उनकी हेदराबाद के बेशर्म काण्ड करने के बाद देहरादून बेंरंग आने पर स्वागत करके पूरे देश के सामने उत्तराखण्डी सम्मान की जग हंसाई करा रहे थे। इसके बाद भी प्रदेश के कुछ कांग्रेसियों ने विधानसभा चुनाव में तिवारी को असरदार बताते हुए कांग्रेस आलाकमान को फिर गुमराह करते हुए फिर से उनके कुछ प्यादों को विधानसभा की टिकटें तक झटक गये। उस समय भी हालत यह थी कि अपने पहले मुख्यमंत्री के कार्यकाल में व हेदारबाद प्रकरण में प्रदेश या देश का कोई भी सम्मानजनक आदमी या इज्जतदार आदमी तिवारी को अपने घर में ले जाने के लिए तैयार नहीं था। यह प्रदेश का शौभाग्य रहा व जनता की बुद्धिमता जो एक भी तिवारी समर्थक प्रदेश के विधानसभा की देहरी पर नहीं पंहुच पाया। हाॅं फिर दिल्ली में बैठे तिवारी के चंद दलालों ने कांग्रेस आला नेतृत्व को गुमराह करके प्रदेश के भविष्य को रौंदते हुए तिवारी के चेहते को ही प्रदेश के मुख्यमंत्री के पद पर आसीन करके प्रदेश कांग्रेस के अधिकांश विधायकों व जनता दोनों को आक्रोशित कर दिया। प्रदेश की जनता हैरान इस बात से थी कि पहले तिवारी के कृत्यों व उनके शासन काल में प्रदेश में हुए 56 घोंटालों पर घडियाली आंसू बहा कर प्रदेश की सत्ता में आसीन हुए भाजपा के खण्डूडी व निशंक दोनों मुख्यमंत्री के कार्यकाल में तिवारी के राज में हुए 56 तथाकथित घोटालों में से पूरे पांच साल में एक भी घोटाले के दोषियों पर न गाज ही गिरी व नहीं इन काण्डों पर कोई त्वरित कार्यवाही ही की गयी। इससे शर्मनाक बात रही कि भाजपा सरकार के मुख्यमंत्री खण्डूडी व निशंक के साथ मंचों पर तिवारी का विकास पुरूष बता कर स्वागत ही किया जाता रहा। भगवान राम के नाम को लेकर राजनीतिक रोटियां सेकने वाले भाजपा के नेताओं को यह भान तक नहीं रहा कि भगवान राम ने लोक लाज व जनमत का सम्मान करना प्रत्येक हुक्मरान के लिए सर्वोच्च कर्तव्य बताया था। इसका दण्ड जनता ने भाजपा को प्रदेश की सत्ता से दूर करके दिया। परन्तु फिर सोनिया गांधी ने तिवारी के प्यादों की आत्मघाती सलाह पर जिस तिवारी के पंसदीदा व्यक्ति को ही मुख्यमंत्री बनाया उससे उत्तराखण्डी ठगे के ठगे रह गये। जीतने व मुख्यमंत्री बनने के बाद जिस प्रकार मुख्यमंत्री तिवारी से मंत्रणा करने बार बार जाते है। परन्तु इसी को कहते हैं भगवान के घर कभी अन्याय नहीं होता।
 

जन शैलाव न उमडने की खाज मीडिया पर उतारने के बजाय आत्मनिरीक्षण करे टीम अण्णा 

देश की मीडिया व इलेक्ट्रोनिक चैनलों द्वारा जंतर मंतर में 25 जुलाई से चलाये जा रहे टीम अण्णा के आंदोलन में जनता की कम भागेदारी की खबरों को दिखाये जाने के बाद  कई लोग मीडिया पर अपनी खाज उतारने में लग गये है।  आंदोलन स्थल की हकीकत को नजरांदोज व पूर्व में जंतर मंतर में हुए अण्णा के इस प्रकार के आंदोलनों में उमड़ी भीड़ की तुलना ईमानदारी से करके आत्म निरीक्षण करके उसे सुधारने के बजाय मीडिया को े बिकाउ या नीच कहने वालों को पहले उन तमाम आंदोलनकारियों से पूछना चाहिए कि जितना प्रचार अण्णा के आंदोलन को मीडिया ने दिया क्या उसका एक हजारवां अश भी किसी अन्य महत्वपूर्ण आंदोलन को नहीं मिला। जंतर मंतर पर 6 साल उत्तराखण्ड राज्य गठन के लिए निरंतर 1994 से 2000 तक आंदोलनरत रहने के कारण मुझे ज्ञात है हमें ही नहीं यहां पर अधिकांश देश के कोने कोने से आंदोलनकरने वालों को मीडिया एक झलक दिखाने के लिए भी बहुत ही मुश्किल से तैयार होती है। हकीकत तो यह है कि अण्णा के आंदोलन को प्रारम्भ से कई महिनों तक सातों आसमान पर चढ़ा  कर  देश विदेश में विख्यात करके उसे व्यापक जनांदोलन में तब्दील करने में  मीडिया का महत्वपूर्ण हाथ रहा और इसका खुद गुणगान खुद टीम अण्णा के तमाम बडे सदस्य सार्वजनिक मंचों से अपने आंदोलन के दौरान इसके लिए मीडिया का धन्यवाद करते हुए उनका यशोगान करते रहे। परन्तु 25 जुलाई से निरंतर इस आंदोलन में भागीदार रहते हुए मैने देखा कि वह स्वयं स्फर्फत  लोगों का हजूम इस बार कहीं नहीं दिखाई दे रहा है। यही नहीं इस बार टीम अण्णा के सबसे प्रखर जमीनी सदस्य अरविन्द गौड़ भी इन तीन दिनों में मंच के उपर एक पल के लिए नहीं गये। हाॅं वे अपने सेकडों नाट्य मण्डली के कलाकारों के साथ आंदोलन म एक आम आदमी की तरह दिखाई दे रहे थे। आज 27 जुलाई को आंदोलन के तीसरे दिन टीम अण्णा के आंदोलन स्थल पर बहुत कम लोगों के होने के कारण खुद टीम अण्णा के लोग ही मंच पर पौने ग्यारह तक उपस्थित नहीं हुए। आज अगर बाबा रामदेव अपने हजारों समर्थकों के साथ नहीं सम्मलित नहीं होते तो आंदोलन में चैनल कहां से लोगों के हजूम दिखाते। आज समारोह शुरू होने से पहले व रात सवा आठ बजे कार्यक्रम के समापन से पहले आयोजन में जुड़े कार्यकत्र्ताओं व मीडियाकर्मियों में नौंक झोंक होती रही। लगता है टीम अण्णा व कार्यकत्र्ताओं को भ्रष्टाचार से लड़ने के साथ गांधीवादी नेता अण्णा हजारे ने इन दोनों को लोकशाही का प्रथम पाठ ही सही ए़ग से नहीं सिखाया। टीम अण्णा व उनके कार्यकत्र्ताओं को यह समझ लेनी चाहिए की भीड़ जुटाना आयोजकों की विश्वसनीयता व उनकी क्षमता पर निर्भर करता है न की मीडिया का यह दायित्व है। अण्णा हजारे व उनकी टीम देश में व्याप्त भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने के लिए देश की सरकार से अविलम्ब जनलोकपाल कानून बनाने की मांग से देश के हित में कार्य करने वाला कोई अदना भी व्यक्ति गलत नहीं बतायेगा, सभी समर्थन करेंगे। परन्तु टीम अण्णा को भी जनता का विगत आंदोलनों की तर्ज पर कम संख्या में इस बार के आंदोलन में उतरने पर मीडिया को कोसने के बजाय खुद अपना आत्म निरीक्षण करना चाहिए और देश की जनता को चाहिए कि वह टीम अण्णा के अवगुणों या उनसे मतभेदों को दरकिनारे करते हुए सरकार पर व्यापक दवाब डालने के बजाय खुद आत्मनिरीक्षण करना चाहिए कि क्यों उनके समर्पित सदस्य ही नहीं आम जनता भी उनसे दूर हो रही है। आज बाबा रामदेव के साथ आये उनके हजारों समर्थकों के आने से किसी तरह टीम अण्णा की इज्जत रखी परन्तु मीडिया चैनल ही नहीं आज आंदोलन में उपस्थित आम आदमी भी इस सच्चाई को को जानता व समझता है। परन्तु उसका विश्वास टीम अण्णा से कहीं अधिक अण्णा हजारे जैसे महान समाजसेवी व समाज के लिए सर्वस्व निछावर करने वाले युगान्तकारी महापुरूष पर है। इसके साथ सभी लोग प्रायः देश की वर्तमान स्थिति से व्यथित है और इसको हर हाल में दूर करने के लिए व सरकार के कुशासन से मुक्ति के लिए अण्णा पर आशा लगाये हुए हैं। अब देखना यह है कि यह आंदोलन क्या करवट लेता है।

Thursday, July 26, 2012


-जंतर मंतर पर कम भीड़ या टीम अण्णा को ढाल बना कर भ्रष्टाचार पर आंखे न मूदे सरकार

-भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने के लिए ठोस लोकपाल शीघ्र पारित करनेे के लिए संसद का आपातसत्र बुलाये 

-टीम अण्णा के सबसे प्रमुख सदस्य अरविन्द गौड़ मंच पर दो दिन से क्यों नहीं?  जनता अण्णा से कर रही है सवाल

मैं आज व कल जंतर मंतर पर चल रहे टीम अण्णा के अनशन को समर्थन देने के लिए अपने साथियों के साथ जंतर मंतर पर दोपहर से सांय आठ बजे तक था। मुझे वहां पर न केवल इससे पहले अण्णा द्वारा जंतर मंतर व रामलीला मैदान में चलाये गये तीनों आंदोलनों में सहभागी रहने के कारण इस बार लोगों के उत्साह में कमी साफ दिखी। कल के मुकाबले आज भीड़ कम थी। परन्तु टीम अण्णा के सबसे जमीनी सदस्य अरविन्द गौड, जो अपनी नाट्य मंडली के सैंकडों सदस्यों के सहयोग से पूरे देश में इस आंदोलन को सफल बनाने में अग्रणी रहे, उनका इस बार के आंदोलन में मंच से दूर रह कर जनता के बीच ही बेठे रहना, इस बात का साफ इशारा करता है कि टीम अण्णा में सबकुछ ठीक नहीं चल रहा है। मै कल भी उनसे मिला और आज भी जब उनसे इस मामले में मैने दो टूक सवाल किया तो वे बोले मैं आम लोगों के बीच ही अच्छा लगता हॅू। परन्तु मैने कहा आप इससे पहले तीन आंदोलनों में जंतर मंतर व रामलीला मैदान में मंच में जिस प्रकार से सक्रिय नजर आते थे वह इस बार क्यों नहीं? वे हंसते हुए बोले भई मैं जनता के बीच रहने का आदी हूॅ परन्तु उनके मंच पर न जाने से एक बात साफ हो गयी कि वे टीम अण्णा के कर्णधारों से उस प्रकार से अपने आप को सहज नहीं पाते हैं जिस प्रकार पहले थे। न जाने टीम के प्रमुख अण्णा हजारे को यह बात क्यों नहीं खल रही है कि अरविन्द गौड़ जैसे जमीनी व मुद्दे से प्रतिबंद्ध प्रमुख सदस्य क्यों मंच पर नहीं आ रहे हैं? टीम अण्णा के प्रमुख होने के कारण अण्णा हजारे का यह प्रथम दायित्व बनता है कि वे टीम के महत्वपूर्ण सदस्यों को मंच पर एकजूट दिखायें। यहां अरविन्द गौड़ के अलावा न्यायमूर्ति हेगडे का न दिखाई देना लोगों के जेहन में कई भ्रम पैदा करता है। इन्हीं भ्रमों के कारण ही निंरंतर जनता का मोह भंग हो रहा है, इसी कारण इस मांग से सहमत होने व भ्रष्टाचार से निजात पाने की प्रचण्ड इच्छा होने के बाबजूद आम जनमानस टीम अण्णा के अनशन आंदोलन में पहले तीन समय के आंदोलनों की तरह आंदोलन में भाग लेने के लिए नहीं उमड़ रहा है। वहीं सरकार की मंशा भी टीम अण्णा को इस बार थकाने की रणनीति की है। सरकार को मालुम है कि टीम अण्णा के तीन सदस्यों में से दो सदस्य अरविन्द केजरीवाल व मनीष सिसोदिया अपने स्वास्थ्य कारणों से लम्बे समय तक अनशन नहीं कर सकते हैं। केवल गोपाल राय ही दस दिन की सीमा को पार कर सकते है। हाॅं अगर अनशन करने में महारथ हासिल अण्णा हजारे अगर अपनी घोषणा के तहत अनशन पर बेठ जाते है। तो सरकार को जरूर असहज स्थिति का सामना करना पडेगा। सरकार को यह जरूर समझ लेना चाहिए कि यह केवल टीम अण्णा या चंद लोगों का मामला नहीं अपितु यह देश के वर्तमान व भविष्य की रक्षा के लिए जरूरी है कि भ्रष्टाचार पर तत्काल अंकुश लगाने के लिए कठोर लोकपाल कानून बनाया जाय। आज अनशन आंदोलन के समर्थन में जहां मेरे साथ मोहन बिष्ट, जगदीश भट्ट, महेन्द्र रावत, जगदीश भाकुनी, महिपाल सिंह व पाण्डे आदि थे वहीं इस आंदोलन में अग्रणी उद्यमी गजेन्द्र रावत को मैं अन्ना हॅॅू की टी शर्ट व टोपी पहने देख कर सुखद आश्चर्य हुआ। उन्होंने कहा कि रावत जी सवाल टीम अण्णा की अच्छाई व बुराई का नहीं, सवाल देश को तबाह करने पर तुले भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने के लिए सही व्यवस्था का बनाने का। उन्होंने कहा मैं दुनिया के 45 से अधिक देशों में भ्रमण कर चूका हूॅ परन्तु दुनिया के गरीब से गरीब नामीबिया जैसे मुल्क से हमारे यहां व्यवस्था कही बदतर है। हमारी व्यवस्था यहां एक आम नागरिक के हितों के प्रति कहीं दूर दूर तक जागरूक नहीं है।

टीम अण्णा भले ही टीम अण्णा में लाख कमियां हो या टीम अण्णा के अनशन में लोग राष्ट्रीय धरना स्थल जंतर मंतर में पहले की तरह न उमड़ रहे हों, परन्तु आज देश का हर देश भक्त चाहता है कि देश की सरकार व तमाम राजनैतिक दल देश की पूरी व्यवस्था पर दीमक की तरह तबाह कर रहे भ्रष्टाचार पर अविलम्ब अंकुश लगाने के लिए कठोर लोकपाल कानून बनाये। इस कानून को बनाने में कांग्रेस नेतृत्व व सप्रंग सरकार के लोग या अन्य विपक्षी दल मात्र अण्णा हजारे या टीम अण्णा की ही मांग मात्र समझ कर नजरांदाज करने की अक्षम्य भूल करके राष्ट्रीय हितों को जमीदोज करने की धृष्ठता न करें। क्योंकि भ्रष्टाचार ने आज देश की पूरी व्यवस्था को पूरी तरह पंगू बना दिया है देश के आम आदमी से न्याय, चिकित्सा, शिक्षा व सुरक्षा दूर हो गयी है। देश के हुक्मरानों की राष्ट्रीय हितों के प्रति उदासीनतापूर्ण रवैये व घोर सत्तालोलुपता से देश का शासन प्रशासन का तंत्र इतना जरजर हो गया है कि इसके कारण देश में इन हुक्मरानों केें कुशासन से मंहगाई, भ्रष्टाचार व आतंकवाद ने लोगों का जीना ही दूश्वार कर दिया है। इस लिए देश की रक्षा के लिए सरकार ही नहीं अपितु सभी दलों को तत्काल युद्धस्तर पर इस गंभीर ही नहीं विस्फोटक समस्या के निदान के लिए संसद का आपात व विशेष सत्र बुला कर इसे पारित करें। इसमें जरूरी नहीं की टीम अण्णा के अनरूप ही लोकपाल बने परन्तु सरकार इसमें यह अवश्य ध्यान रहे कि देश में भ्रष्टाचार का मुख्य कारण आज दम तोड़ रही लचर न्याय व्यवस्था व एनजीओ है। इन दोनों को हर हाल में इसके अन्तगर्त रखना चाहिए। प्रधानमंत्री हो या कोई मंत्री या जनप्रतिनिधि भ्रष्टाचार का आरोप जिस पर भी लगे उसे कानून की तरफ से किसी प्रकार का संवैधानिक विशेषाधिकार संरक्षण नहीं मिलना चाहिए। अगर न्याय पालिका में व्याप्त भ्रष्टाचार दूर हो जाता है तो देश का आधे से अधिक भ्रष्टाचार स्वतः ही समाप्त हो जायेगा।
सरकार को टीम अण्णा या अनशन में कम लोगों को आने का ढाल बना कर देश की व्यवस्था को तबाही के कगार पर धकेल रहे भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने के अपने प्रथम दायित्व से न तो देश की सरकार को व नहीं किसी राजनैतिक दल को मुंह मोड़ना चाहिए। यह देश केवल टीम अण्णा की मांग भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने के लिए जन लोकपाल बनाने की है। इस मांग से देश का आम देश भक्त जो भले टीम अण्णा या इस जनलोकपाल के स्वरूप से अक्षरशः सहमत न भी हो परन्तु सभी चाहते हैं कि देश के हित में अविलम्ब कठोर लोकपाल बनाना चाहिए।

-जनप्रतिनिधी ही नहीं सामाजिक संगठन भी जिम्मेदार हैं महापुरूषों के अनादर के लिए
-अमर शहीद श्रीदेव सुमन के बलिदान दिवस 

25 जुलाई को सांय गढ़वाल भवन पंचकुया रोड़ दिल्ली में देश की आजादी व टिहरी में राजशाही से मुक्ति के लिए अपना बलिदान देने वाले महान क्रांतिवीर श्रीदेव सुमन का बलिदान दिवस मनाया गया। उत्तराखण्ड का दुर्भाग्य है कि यहां जो महान क्रांतिकारी हुए उनको यहां के नेताओं ने समाज कहीं जागृत न हो कर उनको लोकशाही को रौंदने से खदेड़ न दें इसी भय से व अपनी संकीर्ण अज्ञानता के कारण यहां के महापुरूषों के विराट व्यक्तित्व को गुमनामी में रखने का षडयंत्र रचते हैं वहीं दूसरी तरफ हमारे समाज की अधिकांश सामाजिक संस्थाओं में ऐसे लोग काबिज रहते हैं जिनका न तो मानसिक स्तर ऐसा होता है व नहीं इनके जीवन की राह ही इन महापुरूषों की महता को समझने में सक्षम होता है। इसके कारण ये अधिकांश संस्थायें प्रायः अपने महापुरूषों को न तो याद करते हैं अगर कोई एकाद ने उस महापुरूष को याद भी कर लिया तो वे समाज में जनहित के कार्यो में लगे वर्तमान क्रांतिकारियों को सम्मान देने के बजाय महापुरूषों के आदर्शो को रौंदने वाले राजनेताओं, धनपशुओं आदि को मंचासीन करके महापुरूषों को ही एक प्रकार से अपमान करने का कार्य एक प्रकार से कर देते है। इसी कारण देवभूमि व मनीषियों की भूमि समझी जाने वाली उत्तराखण्ड में राज्य गठन के बाद ऐसी जनविरोधी व सत्तालोलुपु हुक्मरान सत्तासीन हुए जिनके कृत्यों व कुशासन से विश्व में अपनी ईमानदारी व कर्मठता का परचम फेहराने वाले उत्तराखण्ड आज इन 12 सालों में देश का सबसे भ्रष्टत्तम राज्यों में एक हो गया है।
25 जुलाई को गढ़वाल भवन दिल्ली में दिल्ली की सबसे पुरानी संस्थाओं में से एक टिहरी उत्तरकाशी जनविकास परिषद ने श्रीदेव सुमन का बलिदान दिवस मनाया। संस्था के अध्यक्ष गंभीर सिंह नेगी व सभा के संचालक दाताराम जोशी के अनुसार उन्होंने इस कार्यक्रम में प्रदेश के मुख्यमंत्री व चंद दिन पहले तक टिहरी उत्तरकाशी के सांसद रहे विजय बहुगुणा व केन्द्रीय राज्य मंत्री हरीश रावत सहित अनैक जनप्रतिनिधियों को आमंत्रित किया गया था।  परन्तु इस आयोजन में उत्तराखण्ड क्रांतिदल के शीर्ष नेता काशीसिंह ऐरी, प्रताप नगर के विधायक विक्रम नेगी, समाजसेवी जोध सिंह बिष्ट, रेल के अधिकारी श्री लोहानी सहित अन्य समाजसेवियों ने अपनी श्रद्धांजलि अर्पित की। संस्था के पदाधिकारी सभा में आश्वासन देते रहे कि हमारे नेता आने ही वाले है परन्तु अंतिम समय तक इनके स्वनाम धन्य मुख्यमंत्री ने इस सभा में आ कर श्रद्धेय सुमन को अपनी श्रद्धांजलि देने की जरूरत नहीं समझी। या तो नेता भी श्रीदेव सुमन की महता को अभी तक न समझे हों या वे आयोजकों की महता जानते हों। हालांकि मुझे विश्वास था कि मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा अगर दिल्ली में हैं तो यहां पर अवश्य आयेंगे क्योंकि उन्होंने चंद महिनों के अंदर ही टिहरी उत्तरकाशी संसदीय क्षेत्र से लोकसभा उप चुनाव में अपने कांग्रेसी प्रत्याशी को चुनावी समर में उतारना है। परन्तु वे भी नहीं  आये। हाॅं सभा में अंतिम समय पर केन्द्रीय राज्य मंत्री हरीश रावत व अन्तरराष्ट्रीय निशानेबाज जसपाल राणा  दिल्ली कांग्रेस के सचिव रहे हरिपाल रावत के साथ सभा में श्रीदेव सुमन को श्रद्धांजलि देने पंहुचे। परन्तु सभा में उत्तराखण्ड राज्य गठन जनांदोलन के अग्रणी आंदोलनकारी संगठन उत्तराखण्ड जनता संघर्ष मोर्चा के अध्यक्ष देवसिंह रावत, महासचिव जगदीश भट्ट, उत्तराखण्ड क्रांतिदल के उपाध्यक्ष प्रताप शाही, उत्तराखण्ड राज्य लोकमंच के अध्यक्ष बृजमोहन उपे्रती, उत्तराखण्ड जनमोर्चा के वरिष्ट पदाधिकारी डा एस एन बसलियाल, उत्तराखण्ड महासभा के रामेश्वर गोस्वामी, पत्रकार चारू तिवारी, म्यर उत्तराखण्ड के अध्यक्ष रहे मोहन बिष्ट, आर्य समाज से जुड़े व साहित्यकार रमेश हितैषी, ओम प्रकाश आर्य व गिरीश चन्द्रा भावुक, कई अग्रणी आंदोलनकारी व समाजसेवी चिंतक थे परन्तु सभा के आयोजकों को उनकी सुध लेने की फुर्सत तक नहीं। लगता है ये आयोजक  श्रीदेव सुमन को स्थान विशेष तक उनको सीमित रखना चाहते। जबकि श्री देव सुमन क्षेत्र, जाति, धर्म से उपर उठ कर पूरे मानवीय समाज व देश की लोकशाही के लिए समर्पित रहे। यहां सवाल केवल टिहरी उत्तरकाशी जनविकास परिषद का नहीं अपितु अधिकांश उत्तराखण्डी संस्थाओं का है। श्रीदेव सुमन को समझने वाला और मानने वाला आदमी कभी लोकशाही को थोपशाही का तथा लोकशाही को अपने निहित स्वार्थो -सत्तालोलुपता के लिए रौंदने वालों को उनके बलिदान दिवस पर कभी अतिथि बनाने व सम्मानित करने की अक्षम्य भूल नहीं करता। परन्तु देखने में यह आ रहा है कि हमारे समाज के अधिकांश सामाजिक संगठनों में को श्रीदेव सुमन या चन्द्रसिंह गढ़वाली या बाबा मोहन उत्तराखण्डी जैसे अमर सूपतों के विराट व्यक्तित्व से नहीं अपितु लोकशाही व जनहितों को रौंदने वाले नेताओं के गले में माला डाल कर व उनके साथ तस्वीर खिंचा कर अपने तुच्छ अहं को तुष्ट करने के अलावा किसी से कुछ सरोकार नहीं है। सामाजिक संगठन तो एक तरफ हमारे बुद्धिजीवी समझे जाने वाले पत्रकार संगठन व प्रथम श्रेणी के अधिकारियों की तथाकथित बड़ी संस्थाओं की इस प्रकार की शर्मनाक ेप्रवृति देख कर समाज के इस घोर पतन का सहज ही अहसास हो जायेगा। जिस समाज में समाज व मूल्यों के लिए समर्पित लोगों के बजाय समाज के हितों को रौंदने वाले गुनाहगारों को सम्मानित करने की प्रवृति रहती वह समाज कभी न तो सम्मान अर्जित कर पाता है व नहीं आगे बढ़ पाता है। यही कारण है कि उत्तराखण्ड राज्य गठन के बाबजूद 12 सालों में उत्तराखण्ड के अब तक के सत्तालोलुपु हुक्मरानों ने न तो प्रदेश के सम्मान को मुजफरनगर काण्ड में रौंदने वाले राव-मुलायम के प्यादों को दण्डित करा पाये व नहीं प्रदेश के हक हकूकों की ही रक्षा कर पाये। उल्टा प्रदेश के सम्मान को रौंदने के लिए जनता के दिलों में खलनायक बन गये मुलायम व उनके कहारों के साथ गलबहियां करके प्रदेश के जख्मों को कुरेद कर रौदने का अक्षम्य अपराध करने का दुशाहस जरूर करने की होड़ कर रहे हैं। दुर्भाग्य यह है कि हमारे लोगों में  ऐसे गुनाहगारों की आरती उतारने की होड़ लगी है।  इसी कारण आज उत्तराखण्ड शराब, बांध व बाघों से बर्बाद किया जा रहा है और हमारे सामाजिक संगठन इन्हीं गुनाहगारों को माल्यार्पण करके उनकी जनगणमन करने में लगे हैं। इस कार्यक्रम में गढ़वाल हितैषिणी सभा के उपाध्यक्ष रहे अषाड़ सिंह अधिकारी व समाजसेवी के के पुरोहित, टिहरी उत्तरकाशी जनविकास परिषद के वरिष्ट श्री राम रतूड़ी, प्रताप सिंह राणा, प्रताप सिंह असवाल, लाखीराम डबराल, महादेव प्रसाद बलूनी, पीड़ी तिवारी, देवेश्वर जोशी, जवाहर सिंह नेगी, रामचन्द्र भण्डारी, ज्ञानचंद रमोला, समाजसेवी धर्मपाल कुमंई, लखपत सिंह भण्डारी, पत्रकार सतेन्द्र रावत सहित अनैक महत्वपूर्ण समाजसेवी भी उपस्थित थे।

Tuesday, July 24, 2012


पाक आतंकियों से बेहद खतरनाक हैं बंगलादेशी घुसपेटियों (आतंकियो ) को देश से खदेड़े सरकार 

असम को शीघ्र सेना के हवाले करके बंगलादेशी घुसपेटिये आतंकियों से देशवासियों की रक्षा करे सरकार 

कोकराझार में बंगलादेशी घुसपेटियों ने जिस बेरहमी व दुसाहसपूर्ण ढ़ग से भारत में भारतवासियों पर संगठित हमला बोल कर कत्लेआम का तंांडव मचाया, उन देश उस पर वोट बैंक के मोह में प्रदेश व केन्द्र की कांग्रेस सरकार नुपुंसकों की तरह मूक रहने के कारण असाम के 21 जिलों में दंगा फेल गया है, इस कारण वहां पर 50 हजार से अधिक लोग अपनी जान बचाने के लिए लोग  राहत केम्पों में किसी तरह अपनी जान बचा कर जी रहे है।
सबसे हैरानी की बात यह है कि पूर्वोत्तर के राज्यों में गत कुछ दशकों से बंग्लादेशी घुसपेटिये आतंकियों ने बड़ी संख्या में घुसपेट करके षडयंत्र के तहत आसाम के दो दर्जन के करीब जनपदों को बंगालादेशी घुसपेटिये आतंकी बाहुल्य जिलों में तब्दील करके आसाम पर एक प्रकार का कब्जा कर लिया है और प्रदेश सरकार व केन्द्र सरकार दोनों ने राष्ट्र विरोधी चुप्पी बना कर अक्षम्य अपराध किया। हालांकि वर्तमान दंगों में सरकार की तरफ से दंगाईयों को देखते ही गोली मारने के आदेश दे कर कई जनपदों में सेना ने भी मार्च किया परन्तु स्थिति ज्यों की त्यों है। जो खबरे आसाम से अखबारों आदि माध्यमों से आ रही है वह स्थिति को चिंताजनक ही नहीं विस्फोटक बता रही है। खुद प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह असाम से प्रतिनिधी रहे उनको इसका शायद ही भान होगा, सर्वोच्च न्यायालय द्वारा कई बार घुसपेटिये मुद्दे पर सरकार को मिली फटकार के बाबजूद वोट बैंक के लालच में इस समस्या का ठोस हल निकाल कर इन बंगलादेशी घुसपेटियों को आतंकी मानते हुए इनको देश से खदेड़ने का काम नहीं कर रही है। सरकार को चाहिए कि इन पाक आतंकियो ंसे खतरनाक देश के लिए साबित हो चूके बंगलादेशी आतंकियों को देश की एकता व अखण्डता की रक्षा करने के लिए एक राष्ट्रीय नीति बना कर इनको यहां से खदेड़ा जाय। जो सरकारें या राजनैतिक दल इसको सामान्य घुसपेट मानती है उनको असाम में बंगलादेशी घुसपेटिये आतंकियों से यहां पर किये गये कब्जे व यहां के मूल निवासियों को अल्पसंख्यक बना कर खदेड़ने को देख कर इसकी गंभीरता को समझना चाहिए। पाक आतंकी तो देश राजनैतिक सत्ता व भू भाग पर कब्जा नहीं करते परन्तु बंगलादेशी घुसपेटिये आतंकी चुपचाप षडयंत्र की तरह टिड्डी दल की तरह काबिज हो कर प्रदेश में कब्जा कर वहां के मूल निवासियों को खदेड़ देते है।
देश के हुक्मरानों की इसी शर्मनाक नपुंसकता, सत्तालोलुपता व अदूरदर्शिता के कारण देश ने पहले कश्मीर खोया, अब आसाम खो रहे हैं, यही नहीं जिस प्रकार से सीमान्त प्रदेश उत्तराखण्ड में भी इसी प्रकार घुसपेटियों को संरक्षण व प्रदेश के मूल लोगों के हितों को रौंद कर उनको बसाया जा रहा है उससे वह दिन दूर नहीं जब उत्तराखण्ड में भी असाम व कश्मीर की तरह घुसपेटियों का सम्राज्य हो जायेगा। इस लिए देश के तमाम सीमान्त क्षेत्रों में किसी भी सूरत में बाहरी लोगों के बसने पर प्रतिबंध लगाने के लिए राज्यों व संसद में ‘भारत सुरक्षा कानून’ का निर्माण करने के साथ देश में घुस गये बंगलादेशियों को अविलम्ब बंगलादेश में वापस भेजा जाय। इसे सामान्य घुसपेट न मानते हुए देश पर कब्जा करने वाले आतंकी घुसपेट मान कर सरकारें देश रक्षा के लिए कठोर निर्णय लें और जलते हुए असाम को बचाने के लिए तुरंत सेना के हवाले कर दिया जाना चाहिए। इसके साथ उन अधिकारियों व नेताओं की लिस्ट बना कर उनको दण्डित करने का काम करें जो इन देशद्रोही घुसपेटियों को देश में बसाने का राष्ट्रद्रोही कार्य में संलग्न है। इसके अलावा जनता को इस बात का भान होना चाहिए कि यह हिन्दू या मुस्लिम दंगा नहीं अपितु देश पर कब्जा करने का बंगलादेशी आतंकियों का भारत के खिलाफ संगठित षडयंत्र है। देश के प्रत्येक नागरिक को इसका विरोध करना चाहिए।

-भ्रष्टाचार के खिलाफ संघर्ष करने के साथ  लोकशाही का सम्मान करना भी सिखायें अण्णा अपने कार्यकत्र्ताओं को

-कार्यकत्र्ताओं ने शहीद जवान को न्याय दिलाने के लिए शहीद की माता जी द्वारा चलाये जा रहे आंदोलन का तम्बू समेटने के लिए किया मजबूर 


25 जुलाई 2012 से देश की संसद की चैखट, राष्ट्रीय धरना स्थल जंतर मंतर दिल्ली पर देश में भ्रष्टाचार के खिलाफ आर पार का संघर्ष का ऐलान करते हुए अण्णा व उनकी टीम अपने हजारों कार्यकत्र्ताओं के साथ आंदोलन का श्रीगणेश करेंगे। पूरा देश भ्रष्टाचार के मुहिम में अण्णा के साथ है। सभी चाहते हैं कि भ्रष्टाचार पर अंकुश लगे। परन्तु उनके कार्यकत्र्ताओं द्वारा जंतर मंतर पर जिस प्रकार से देश के अन्य भू भागो ंसे आ कर अपनी मांगों को ले कर आंदोलनकर रहे आंदोलनकारियों से जिस प्रकार से तानाशाही पूर्ण व्यवहार एक दिन पहले ही कर रहे थे, उस पर अनैक समाजसेवियों, पत्रकारों व राजनेताओं ने प्रश्न किया कि भ्रष्टाचार के आंदोलन को चलाने से पहले अण्णा को अपनी टीम व कार्यकत्र्ताओं को लोकशाही का पाठ सिखाना चाहिए। नागपुर से आये शहीद फोजी सुरज सुधाकर मेश्राम  की माता  श्रीमती रेखा मेश्राम अपने दर्जनों समर्थकों के साथ दूसरी बसरी पर न्याय की अंतिम आश लिये जंतर मंतर पर 22 जुलाई से 25 जुलाई तक पुलिस अनुमति के साथ सांकेतिक भूख हडताल कर रही थी। अनशनकारी शहीद की माता रेखा की तबीयत खराब होने पर शहीद सुरज सुधाकर मेश्राम की बहिन व अन्य आंदोलनकारी आंदोलन जारी रखे हुए थे, परन्तु 24 तारीक की सांय को ही भ्रष्टाचार के खिलाफ 25 जुलाई तक ही अनशनादि आंदोलन करने वाली  अण्णा के कार्यकत्र्ताओं ने 22 जुलाई 2010 को मृतक बताये गये फौजी जवान सुरज मेश्राम न. 4581779 । की हत्या की जांच करने की मांग को लेकर चलाये गये आंदोलन को एक दिन पहले ही अण्णा कार्यकत्र्ताओं के अलोकशाही दवाब के कारण समेटने के लिए विवश किया गया। क्योंकि सुरज मेश्राम को न्याय दो का आंदोलन स्थल पर जनता दल यू के पट के बांई तरफ ही अण्णा टीम का मुख्य पंडाल लगाया जा रहा था। हालांकि ऐसे ही अलोकतांत्रिक दवाब टीम अण्णा के कार्यकत्र्ता इससे पूर्व में किये गये जंतर मंतर पर तमाम आंदोलनों के दौरान कर चूके थे।
इसके साथ 25 जुलाई से ध्वनि प्रसारक यंत्र यानी माईक की स्वीकृति लेने वाली टीम अण्णा के बन रहे मंच से निरंतर जंतर मंतर पर गाडियों को वहां पर से हटाने का हूकम ट्रेफिक पुलिस की तरह हांका जा रहा था। यह देख कर समाजसेवी संजय कुमार, पत्रकार साबर कुमार, जगजीवन राम जैसे दिग्गज नेताओं के साथ आपातकाल के खिलाफ संघर्ष करने वाले ताराचन्द्र गौतम व समाजसेवी मोहम्मद आजाद आदि लोगों ने न केवल टीम अण्णा की लोकशाही प्रवृति व दिल्ली पुलिस का पक्षपात व्यवहार पर कई प्रश्न किये। इन आंदोलनकारियों ने कहा कि पुलिस आम आंदोलनकारियों को सुबह से सांय तक की आंदोलन की अनुमति देती है तो टीम अण्णा को एक दिन पहले ही टीम अण्णा के कार्यकत्र्ता आंदोलन स्थल पर अन्य आंदोलनकारियों से अलोकतांत्रिक व्यवहार कैसे कर रहे थे और कैसे ध्वनि प्रसारक यंत्र का प्रयोग कर रहे थे।  टीम अण्णा को जहां दूसरे आंदोलनकारियों का सम्मान करना चाहिए और उनके अधिकारों का अतिक्रमण नहीं करना चाहिए। इसके अलावा टीम अण्णा की गतिविधियों के जानकार समाजसेवी हरि ओम ने कहा कि टीम अण्णा अगर वास्तव में ईमानदारी से भ्रष्टाचार के खिलाफ आंदोलनकरना चाहती है तो वह क्यों एनजीओ को जन लोकपाल के अन्तगर्त करने से क्यों धबरा रहे है। यही नहीं हरि ओम ने कहा कि टीम अण्णा के सदस्य क्यों इंडिया अगेन्सट करप्शन संस्था को पंजीकृत नहीं कर रही है तथा एसएमएस कार्डो का जिस प्रकार से थोक के भाव में बेचा जा रहा है उसको सार्वजनिक किया जाना चाहिए।
सांय 6 बजे के करीब जब मैं जंतर मंतर धरना स्थल पर पंहुचा तो वहां पर अण्णा टीम के कार्यकत्र्ता जहां टेण्ट व मंच को व्यवस्था ठीक करा रहे थे वहीं पर मीडिया द्वारा मंच के सामने इसकी कवरेज करने के लिए अपने अपने छोटे मंच बनाये जा रहे थे। उसके बाद पुलिस का उच्चाधिकारी भी वहां का जायजा लेने पंहुचे। इसके बाद टीम अण्णा के प्रमुख सदस्यों में एक मनीष सिसोदिया भी तैयारियों को दिशा देने वहां पर पंहुचे। जंतर मंतर पर देश के कोने कोने से अपने प्रदेशों में न्याय न मिलने पर न्याय की आश ले कर भारत की सरकार के दर पर जंतर मंतर पर आंदोलन करने के लिए पंहुचते है। वहां पर पुलिस प्रशासन के अलोकतांत्रिक फरमानों के बीच आंदोलनकारी प्रातः से सांयकाल तक आंदोलन करते है। वह भी पुलिस की अनुमति मिलने पर। अण्णा के भ्रष्टाचार के खिलाफ आंदोलन को पूरा देश का समर्थन हैं परन्तु जिस प्रकार से टीम अण्णा के लोग एनजीओं को जनलोकपाल में सम्मलित करने से कतरा रहे हैं और विवादस्थ टिप्पणियां कर रहे हैं उससे लोगों का मोह धीरे धीरे इस आंदोलन से भंग हो रहा है। इसके बाबजूद देश की जनता मनमोहन सिंह नेतृत्व वाली सप्रंग सरकार के भ्रष्टाचार से मुक्ति चाहने के लिए अण्णा के आंदोलन को सफल होना देखना चाहते है। परन्तु अण्णा को चाहिए कि वह अपनी टीम व कार्यकत्र्ताओं को लोकशाही का पाठ भी सिखाये की नागरिक अधिकारों का सम्मान किया जाना चाहिए। लोकशाही में सबसे बड़ा भ्रष्टाचार विशेषाधिकार समझते हुए आम नागरिकों के अधिकारों का हनन करना है। अण्णा हजारे को अपनी टीम व कार्यकत्र्ताओं को समझाना चाहिए कि देश में हर नागरिक को उनकी तरह ही संघर्ष करने का अधिकार है। किसी के संघर्ष को रौंदने की प्रवृति लोकतंत्र में तानाशाही ही समझी जाती है।

Monday, July 23, 2012


आजादी की महान वीरांगना केप्टन लक्ष्मी सहगल के षर्मनाक अपमान के लिए जिम्मेदार हैं सभी राजनैतिक दल

राश्ट्रपति के पद पर नेता जी की इस केप्टन को आसीन नहीं कर पाया कृतज्ञ राश्ट्र

एक तरफ देष के राजनेता प्रणव मुखर्जी को राश्ट्रपति पद के चुनाव में विजयी होने के लिए बधाई दे रहे थे वहीं दूसरी तरफ उसी समय आजादी के महान वीरांगना व आजाद हिन्द फोज की केप्टेन लक्ष्मी सहगल कानपुर के चिकित्सा लय में दम तोड़ रही थी। देष की आजादी की इस महान वीरांगना केप्टन लक्ष्मी सहगल के निधन के बाद उनको श्रद्धांजलि देने के नाम पर आज देष के तमाम राजनेता भले ही घडियाली आंसू बहा रहे हैं परन्तु जब भारतीय आजादी की इस महानायिका ने अपने लिए देष के सर्वोच्च पद पर निर्वाचित इच्छा जाहिर की तो इस देष के तमाम राजनैतिक दलों ने अपनी बौनी सोच व अदूरदर्षिता दिखाते हुए उनको न केवल चुनावी समर में पराजित कराया अपितु उसके बाद भी दूसरी या तीसरे बार उनको इस पद पर आसीन करने की तरफ सोचने का अपना प्रथम नैतिक कत्र्तव्य का पालन तक नहीं किया।  जिन महान क्रांतिकारियों ने देष को आजाद करने के लिए अपना सर्वस्व बलिदान किया, उनके आदर्षो व सपनों के साथ उनके बलिदान व संघर्श के बदोलत आजाद हुए देष के हुक्मरानों ने कितना निर्मम व षर्मनाक व्यवहार किया, इसको देख कर आज उन हुतात्माओं की आत्मा भी इन हुक्मरानों को धिक्कार रही होगी।देष न तो देष की आजादी के लिए युगान्तकारी नेतृत्व देने वाले महात्मा गांधी के सपनों के भारत की कल्पना को आजाद भारत में उतार पाये व नहीं देष की आजादी के लिए आजाद हिन्द फोज की स्थापना करके अंग्रेजी हुकूमत र्की इंट से ईंट बजाने वाले नेताजी सुभाश चन्द्र बोस को ही उचित सम्मान दे पाया। गांधीवाद के नाम पर देष में कांग्रेस के कुषासन से आज देष का कितना बुरा हाल है यह आज किसी को बताने की जरूरत नहीं है। परन्तु देष को फिरंगी हुक्मरानों से आजादी के लिए भारत माता के महान सपूत नेताजी सुभाश चन्द्र बोस के नेतृत्व में सषस्त्र क्रांति करके फिरंगी सम्राज्ञी का तख्तोताज हिलाने वाले  आजाद हिन्द फोज की केप्टन लक्ष्मी सहगल को भी उचित सम्मान तक देष के वर्तमान तमाम राजनैतिक दल नहीं दे सके।
जिसकी वह हकदार थी। वे देष की राश्ट्रपति के चुनाव में मिली करारी हार की चोट को अपने सीने में चुपचाप संजाये हुए 23 जुलाई को आजादी के महान सपूत चन्द्रषेखर आजाद व बाल गंगाधर तिलक के पावन जन्म दिवस पर अंतिम सांस ले कर नष्वर देह को सदा के लिए छोड़ गयी। गौरतलब है कि वाम दलों के अनुरोध सन् 2002 में वाम दलों का प्रत्याषी बन कर राश्ट्रपति का चुनाव लडी थी। इस चुनाव में जहां कांग्रेस व भाजपा द्वारा समर्थिक महान वैज्ञानिक अब्दुल कलाम राश्ट्रपति के पद पर निर्वाचित हुए थे। परन्तु उसके बाद 2007 में व अब 2012 में भीदेष के राजनीतिज्ञों को इस भयंकर भूल का अहसास तक नहीं हो पाया कि देष की इस महान स्वतंत्रता सैनानी के प्रति कृतज्ञ राश्ट्र का कुछ फर्ज भी है। देष के राजनेताओं को 2007 या अब 2012 में नेताजी को अपनी श्रद्धाजलि के प्रतिरूप उनकी आजाद हिन्द फोज में रानी लक्ष्मीबाई ब्रिगेड़ की केप्टन रही  लक्ष्मी सहगल को हर हाल में देष का राश्ट्रपति बनाना चाहिए था। परन्तु अपने नैतिक कत्र्तव्यों व अपने महान नायकों को कैसे सम्मान दिया जाता है इसका अहसास सायद देष के वर्तमान राजनेताओं को आजादी के 65 साल बाद भी नहीं हुआ।  अगर उनको श्रीमती प्रतिभा पाटिल या प्रणव की जगह पर राश्ट्रपति बना दिया गया होता तो राश्ट्र को आज इस भयंकर अपराध से मुक्ति मिल जाती। कानपुर को अपना क्लीनिक बना कार्यक्षेत्र बनाने वाली पेषे से डाक्टर कैप्टन लक्ष्मी सहगल ने 1971 में माकपा की सदस्यता ग्रहण की और राज्यसभा में पार्टी का प्रतिनिधित्व किया। हालांकि उनको  वर्ष 1998 में उन्हें पद्म विभूषण से नवाजा गया था। कैप्टन सहगल की बेटी  माकपा नेता सुभाषिनी अली हैं। जीवन भर गरीबों और मजदूरों के लिए संघर्ष करने वाली इस देष की आजादी की महान वीरांगना केप्टन लक्ष्मी सहगल की मौत के समय उनके ही आदर्षों के लिए अपना जीवन अर्पित करके देष में अपना नाम स्थापित कर चूकी उनकी पुत्री सुभाषिनी अली भी जीवन की अंतिम बेला पर अपने माॅं के ही संग थी।
कानपुर को अपनी कर्मस्थली बनाने वाली आजादी की इस विरांगना की जन्म भूमि मद्रास रही। 24 अक्टूबर 1914 में मद्रास जन्मी केप्टन लक्ष्मी के पिता एस स्वामीनाथन मद्रास उच्च न्यायालय के जाने माने वकील थे,। परन्तु  गरीबों की सेवा के लिए लक्ष्मी स्वामीनाथन ने डॉक्टरी का पेशा चुना और 1938 में मद्रास मेडिकल कॉलेज से एमबीबीएस की डिग्री प्राप्त की। वे षुरू से ही देष के स्वाभिमान व आजादी के लिए समर्पित होना चाहती थी। 1940 में लक्ष्मी सिंगापुर गईं और वहां पर भी उन्होंने भारतीय गरीब मजदूरों के इलाज के लिए क्लिनिक खोला। उन दिनों नेताजी सुभाष चंद्र बोस जब दो जुलाई 1943 को सिंगापुर आए और आजाद हिंद फौज के महिला रेजीमेंट की स्थापना की बात की तो लक्ष्मी स्वामीनाथन ने खुद को आगे किया और लक्ष्मीबाई ब्रिगेड की कैप्टन बनीं। परन्तु दुर्भाग्य रहा कि आजादी के लिए संघर्श करने वाले आजाद हिन्द फोज को दूसरे विष्व युद्ध में अपने सहयोगी जापान व जर्मनी की करारी पराजय के बाद 1942 में अंग्रेजी सेना ने जापानी फौज के सामने समर्पण कर दिया। आजादी के बाद भी उन्होंने निरंतर गरीबों व असहाय लोगों के हितों के लिए काम किया और इसी लिए 1971 में उन्होंने माकपा की सदस्यता ग्रहण की । वे राज्य सभा की सांसद भी रही।
आजादी के लिए उनका महान योगदान को देखते हुए ही वामपंथी दलों ने उनको 2002 में राष्ट्रपति पद के चुनाव में वामपंथी दलों का प्रत्याषी बनाया। हालांकि इस चुनाव में एपीजे अब्दुल कलाम विजयी हो कर भारत के 11 वें राश्ट्रपति बने। यह हार वामपंथियों की नहीं अपितु कृतज्ञ राश्ट्र की थी जिसने अपने उस महान आजादी की वीरांगना को इतना सा सम्मान मांगने पर भी नहीं दिया जिसने अपना सारा जीवन देष की आजादी के लिए कुर्वान कर दिया था। हालांकि केप्टन लक्ष्मी सहगल पहली ऐसी वीरांगना नहीं थी जिनका अपमान देष के हुक्मरानों ने किया, इससे पहले देष की महान स्वतंत्रता सैनानी दुर्गा भाभी की भी देष के तमाम राजनेताओं ने षर्मनाक उपेक्षा की।  आने वाली पीड़ी देष के इन सत्तांध हुक्मरानों व तमाम राजनैतिक दलों को देष के महानायकों के साथ किये गये इस षर्मनाक व्यवहार के लिए कभी माफ नहीं करेगी। षेश श्रीकृश्ण कृपा। हरि ओम तत्सत्। श्री कृश्णाय् नमो।

Sunday, July 22, 2012


उत्तराखण्ड जैसे गरीब प्रदेष के मुख्यमंत्री बहुगुणा ने दिया पंचतारा अषोका होटल में पत्रकारों को भव्य भोज

रविवार 22 जुलाई को दोपहर एक बजे जैसे ही मैं अपने पत्रकार मित्रों के साथ उत्तराखण्ड के मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा के पत्रकारों के सम्मान में दिये गये दोपहर के भोज में सम्मलित होने के लिए प्रधानमंत्री आवास के समीप बने देष के सबसे चर्चित पंचतारा ‘अषोका होटल’ में पंहुचा तो मेरे कानों में एक राश्ट्रीय दैनिक समाचार पत्र में कार्यरत मेरे वरिश्ठ पत्रकार साथी ने बिना भूमिका बंधाते हुए अपने महाराश्ट्र मूल के साथी पत्रकार का परिचय कराते हुए बताया कि महाराश्ट्र जैसे देष के सबसे समद्ध प्रदेष के मुख्यमंत्री भी पत्रकारों को ऐसे भव्य पंचतारा होटल में पत्रकारों को भोज नहीं देते हैं तो अपने उत्तराखण्ड जैसे संसाधनों की कमी से विकास की पहली सीढ़ी चढ़ रहे नौनिहाल प्रदेष के मुख्यमंत्री या नेताओं को यह कहां षोभा देता है कि वह ऐसे पंचतारा होटलों में ऐसे आयोजन करे।
मेरे आंदोलनकारी पत्रकार मित्र केे षब्दों ने मुझे सोचने के लिए मजबूर कर दिया । वेसे जब से दो दिन पहले यह आमंत्रण मुझे इस मिला था तो मैं बहुत दुविधा में था कि मै इस आयोजन में सम्मलित हॅू या नहीं। मै इस विचार का पक्षधर हूूॅ कि संवैधानिक पदों पर आसीन जनप्रतिनिधियों को हमेषा देष के विकास के संसाधनों को अपनी छवि बनाने में खर्च नहीं करना चाहिए और उनको सादा जीवन के गांधी जी के आदर्ष को आत्मसात करना चाहिए। परन्तु मैने निर्णय लिया कि मुझे इस आयोजन में जा कर इस आयोजन को अपने आंखों से देखना ही नहीं इसमे ंसम्मलित सभी आयोजकों व सम्मलित होने वालों के भी विचारों को भी टटोलना चाहिए।
मुझे लग रहा था कि या तो यह आयोजन मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा ने अपनी सितारगंज विजय से खुष हो कर दे रहे हैं या तीन दिन पहले यानी 19 जुलाई को उनके प्रबल विरोधी माने जा रहे केन्द्रीय राज्य मंत्री हरीष रावत द्वारा अपने आवास में ही उत्तराखण्डी पत्रकारकारों, समाजसेवियों व रंगकर्मियों को दी गयी  चर्चित ‘आम पार्टी’ का करारा जवाब दे रहे है। हालांकि मेरे इलेक्ट्रोनिक मीडिया के प्रखर संवाददाता मित्र ने बताया कि मुख्यमंत्री ने यह आयोजन राश्ट्रीय मीडिया के पत्रकारों के अनुरोध पर किया था।
इस आयोजन में जहां मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा स्वयं मेजवान थे तो उनके साथ सांसद सतपाल महाराज भी मुख्यमंत्री के साथ इस भोज में सम्मलित होने वाले प्रदेष के 5 कांग्रेसी सांसदों व दो राज्य सभा सांसदों में केवल एक मात्र राजनेता थे। यह जुगलबंदी भी प्रदेष में कांग्रेसी क्षत्रपों के आपसी द्वंद से इन दिनों सतपाल महाराज व मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा के गठजोड़ की कहानी को खुद ही बयान कर रही है।
इस दोपहरी भोज में जहां देष व उत्तराखण्ड के करीब 5 दर्जन के करीब पत्रकार थे। इनमें आधे इलेक्ट्रोनिक मीडिया के पत्रकार थे। इनमें उत्तराखण्ड में सबसे ज्यादा चलने वाला इलेक्ट्रोनिक मीडिया में ईटीवी के पवन लालचंद, सहारा समय के मनजीत नेगी,  जीटीवी, साधना टीबी, सहित तमाम अग्रणी इलेक्टोनिक मीडिया के नामी पत्रकार उपस्थित थे। देष के अग्रणी पत्रकारों में विजेन्द्र रावत, उत्तराखण्ड पत्रकार परिशद के अध्यक्ष देवेन्द्र उपाध्याय, महासचिव अवतार नेगी, हिन्दुस्तान के मदन जैडा व व्योमेष जुगरान, पूर्व मुख्यमंत्री खण्डूडी के मीडिया सलाहकार रहे वरिश्ट पत्रकार उमाकांत लखेडा, समाचार पत्रों से राश्ट्रीय सहारा के रोषन गोड़,  अमर उजाला के हरीष लखेड़ा, सहित दर्जनों नामी पत्रकार सम्मलित हुए। इसके अलावा प्रदेष के दिल्ली में वरिश्ठ प्रषासनिक अधिकारी मट्टू, एस डी षर्मा, वरिश्ठ व्यवस्थाधिकारी रंजन मिश्रा, सूचनाधिकारी कार्यालय के अधिकारी व सुरक्षा दस्ते के उच्चाधिकारी भी उपस्थित थे।
इस आयोजन में मुख्यमंत्री से पहले जहां सांसद सतपाल महाराज पत्रकारों से मिलने व भोज ग्रहण करने के बाद चले गये, उसके बाद मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा सभी पत्रकारों से विदा ले कर चले गये। उनके चेहरे में जहां सितारगंज की विजय से भरी आत्म विष्वास साफ झलक रहा था परन्तु कहीं भी दूर दूर उनके चेहरे या हाव भाव से यह नजर नहीं आ रहा था कि उनके मन में इस गरीब प्रदेष उत्तराखण्ड का मुख्यमंत्री होते हुए भी देष के सबसे ख्यातिप्राप्त पंचतारा होटल अषोका होटल में भोज देने की सिकन तक दिख रही थी। मुझे लग रहा था कि मुख्यमंत्री को यह आयोजन अगर करना ही था तो वे अषोका होटल के निकट ही बने उत्तराखण्ड निवास में किया जा सकता था। इससे जहां प्रदेष का लाखों रूपया बचता। उत्तराखण्ड निवास के केंटीन से सटे इस सभागार में पहले भी कई बार मुख्यमंत्रियों द्वारा पत्रकार वार्ता के बाद भोजन व अल्पाहार का कार्यक्रम बहुत ही सहजता से किया जा सकता था।
इसके साथ मैं उस समय दंग रह गया कि मेरे एक पत्रकार मित्र ने कहा कि उत्तराखण्ड के मुख्यमंत्री ‘ प्रेस क्लब’ दिल्ली को 10 लाख रूपये देने की दरियादिली भी दिखा सकते है। उन्होंने खुद ही प्रष्न किया कि इस गरीब प्रदेष के संसाधनों से ऐसी दरियादिली पंचतारा संस्कृति के लिए तो बेहतर हो सकती है परन्तु उत्तराखण्ड जेसे गरीब प्रदेष जहां के लोग षिक्षा, चिकित्सा व पेयजल आदि सुविधाओं के लिए तरस रहे हैं वहां का मुख्यमंत्री जिसके कंधों पर यह सब सुविधाओं को प्रदान करने का दायित्व है वह ही खुद पंचतारा भोज व दरियादिली में संसाधनों को बहाने लगे तो प्रदेष कहा जायेगा। प्रदेष के महत्वपूर्ण पदों पर आसीन व्यक्ति अगर इस प्रकार की परंपरा का षुरूआत करेंगे तो वहां के अन्य नेता व नौकरषाह इसी बात का अनुसरण करके प्रदेष को कहां ले जायेंगे यह तिवारी षासन के काले अध्याय के पन्नों को पलट कर देखने से साफ ही उजागर हो जायेगा। हो सकता है मुख्यमंत्री जिनको खुद से ज्यादा विष्वास तिवारी जी के करीबी उन कारिंदो पर है जिनके कारण विकास पुरूश के रूप में ख्यातिप्राप्त तिवारी को आज तिवारी को न केवल हेदराबाद के राजभवन से त्यागपत्र देने के लिए मजबूर होना पड़ा अपितु कांग्रेसी नेतृत्व को भी अपने इस वरिश्ठ नेता को किनारे लगाने के लिए मजबूर होना पडा। पर जो भी हो लोकतंत्र में विकास के लिए तरस रहे देष-प्रदेष के हुक्मरानों द्वारा पंचतारा मोह न तो समाज के हित में है व नहीं प्रदेष के विकास के हित में। खर्चा सरकार का हो या मुख्यमंत्री का खुद का मुख्यमंत्री को लोकषाही में ऐसे पंचतारा आयोजन से प्रायः दूर ही रहना चाहिए।

13वें राश्ट्रपति के रूप में 25 जुलाई को षपथ लेंगे प्रणव मुखर्जी 
चुनाव हार करके भी पूर्वोत्तर के पहले राश्ट्रीय नेता बने संगमा

राश्ट्रपति चुनाव के अधिकारी वी के अग्निहोत्री ने बताया कि कांग्रेस नेतृत्व वाले सप्रंग गठबंधन के प्रत्याषी प्रणव मुखर्जी देष के 13 वें राश्ट्रपति होंगे उनको 7,13,763 वोट मिले और उनके विरोधी व भाजपा नेतृत्व वाली राजग गठबंधन के प्रत्याषी पीए संगमा को 3,13,987 वोट मिले। यानी कुल मतदान को प्रणव को जहां 69 प्रतिषत मत हासिल हुए और संगमा को 31 प्रतिषत मत। हालांकि प्रणव मुखर्जी को सप्रंग गठबंधन के अलावा राजग गठबंधन के मजबूत सहयोगी जदयू व षिव सेना के मत भी हासिल हुए। इसके अलावा सपा व बसपा ने भी उनका अपना खुला समर्थन दिया। प्रणव मुखर्जी देष के 13वें राश्ट्रपति होंगे। भले ही वे किसी भी अंध विष्वास पर विष्वास नहीं करते हैं परन्तु 13 का अंक उनके जीवन में बहुत ही लाभकारी रहा। उनका निवास भी 13 तालकटोरा रोड़ है। वे 25 जुलाई को राश्ट्रपति पद की षपथ ग्रहण करेंगे। वे राश्ट्रपति के पद से सेवानिवृत हो रही श्रीमती प्रतिभा देवीसिंह पाटिल का स्थान ग्रहण करेंगे। वहीं संगमा भले ही राश्ट्रपति का चुनाव हार गये हों परन्तु वे पूर्वोत्तर के ऐसे पहले नेता हो गये जो देष के चर्चित नेताओं में अपना स्थान बना दिया है।

-उत्तराखण्ड के हुक्मरानों को बेनकाब करता है मुख्यमंत्री बहुगुणा व गणेष गोदियाल प्रकरण 

-12 साल में लोकषाही का पहला पाठ भी नहीं सीख पाये उत्तराखण्ड के हुक्मरान
बेषाखियों के सहारे चल रही कांग्रेस नेतृत्व वाली उत्तराखण्ड सरकार के मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा से जहां कांग्रेसी विधायक नरेन्द्र गोदियाल की आहत होने की खबरे आज कल कांग्रेसी नेताओं की ही नहीं अपितु प्रदेष के राजनीति के मर्मज्ञों के बीच चर्चा का विशय बनी हुई है। वहीं दूसरी तरफ कफकोट के कांग्रेसी विधायक ललित फर्सवाण भी इन दिनों नाखुष हैं। सुत्रों के अनुसार मुख्यमंत्री विजय और विधायक गणेष गोदियाल के बीच इस तनातनी का मूल कारण पौड़ी जनपद के जिलाििधकारी द्वारा जनप्रतिनिधियों की उपेक्षा से आहत गणेष गोदियाल जब मुख्यमंत्री के दरवार में अपनी फरियाद सुनाने गये तो उनको अपने मुख्यमंत्री द्वारा जो जवाब मिला उससे गणेष गोदियाल काफी आहत हैं। अखबारों में छन कर आ रही खबरों के अनुसार प्रदेष के क्षत्रप इस विवाद को सुलझाने में लगे हुए है। गणेष गोदियाल कितने आहत हैं इसका अहसास उनके अखबारों में प्रकाषित इन बयानों से ही लगाया जा सकता है कि ‘पद के हिसाब से चाहे कोई कहीं भी बैठा हो, सभी का मान-सम्मान रखना चाहिए।’। इन बयानों से साफ झलकता है कि मुख्यमंत्री के व्यवहार से कहीं न कहीं उनकी भावनायें आहत हुई है। एक विधायक या मंत्री नौकरषाही द्वारा खुद की उपेक्षा की षिकायत आखिर मुख्यमंत्री से नहीं करेगा तो किससे करेगा। परन्तु विजय बहुगुणा को भले ही कांग्रेसी आला नेता सोनिया गांधी व उनके आत्मघाती सलाहकारों ने मुख्यमंत्री बना दिया हो परन्तु मुख्यमंत्री बनने के बाद विजय बहुगुणा अपने व्यवहार में लोकषाही के इस गरीमामय पद के अनुसार तब्दीली नहीं कर पाये। गौरतलब है कि मुख्यमंत्री बनने के बाद उनके विरोध में मोर्चा खोले हुए कांग्रेसी नेता के आवास पर गये तो वहां पर पंहुच कर मुख्यमंत्री ने जो फटकार वहां पर बेठे विधायकों व समर्थकों को अपने मुख्यमंत्रित्व की हनक दिखाने की कोषिष की तो उनको वहां पर उनको जो लोकषाही का करारा जवाब किसी स्वाभिमानी नेता ने दिया, उस पर भले ही मीडिया ने पर्दा डाल दिया हो पर मुख्यमंत्री के दिलों व दिमाग में उस जवाब की गूंज लम्बे समय तक गूंजेगी।
यहां पर सवाल केवल मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा का ही नहीं अपितु प्रदेष के तमाम राजनेताओ ंका भी है जो लोकषाही में जनप्रतिनिधी बन कर जनसेवा के बजाय अपनी अंधी सत्तालोलुपता के लिए प्रदेष की लोकषाही को हांकते है। आज प्रदेष बनने के बाद यहां के अधिकांष जनप्रतिनिधियों की सम्पति में इन 12 साल में हुए इजाफा का अगर निश्पक्ष जांच हो तो इनके जनसेवा का असली चेहरा सामने आ जायेगा। मुख्यमंत्रियों, मंत्रियों व विधायकों को नहीं नहीं नौकरषाहों को जनता के विकास के संसाधनों को अपनी मौज मस्ती, अपने प्यादों को लुटाने या अपनी छवि को संवारने के लिए पार्टियों, नाहक के कार्यक्रमों या अनावष्यक सैर सपाटे में बर्बाद नहीं करना चाहिए। प्रदेष को कभी अपनी जागीर समझ कर दागदार व आला नेताओं के प्यादों को महत्वपूर्ण पदों में आसीन करके व्यवस्था को बर्बाद नहीं करना चाहिए। पर सच्चाई यह है कि उत्तराखण्ड की अब तक की तमाम सरकारों व जनप्रतिनिधियों ने कभी न तो उत्तराखण्ड के आत्मसम्मान को रौंदने वाले गुनाहगारों र्को इंमानदारी से दण्डित करने का काम कर पाये व नहीं जनांकांक्षाओं के अनुसार प्रदेष के हितों की ही रक्षा कर पाये। प्रदेष के हुक्मरानों व नजप्रतिनिधियों को गली मुहल्ले में कागचों में बनी संस्थाओं के स्वयंभू आकाओं के दिषाहीन पदाधिकारियों की तरह प्रतिभाओं की उपेक्षा कर अपने प्यादों को गणेष बनाने की प्रवृति से उपर उठना होगा। जिससे लोग यह कहने से बचें कि अंधे बांटे रेवड़ी अपने अपने दे।
लोकषाही का पहला पाठ ही जनप्रतिनिधियों के लिए यही होता है कि वे खुद को जनसेवक व जनता को स्वामी समझे। जनप्रतिनिधियों को इस बात का भी अहसास रहना चाहिए कि लोकषाही में जनप्रतिनिधी को जनभावनाओं का सम्मान करना चाहिए। लोकषाही में मुख्यमंत्री, मंत्री, सांसद या प्रधानमंत्री आदि जो भी महान पद हैं उन पर आसीन लोगों को समझना चाहिए कि यह पद उनकी सत्तालोलुपुता की अंधी पूर्तिे के लिए नहीं अपितु जनभावनाओं का सम्मान करते हुए जनता के विकास करने के लिए मिला हुआ है। भले ही उत्तराखण्ड राज्य गठन हुए 12 साल गुजर गये परन्तु आज भी यहां के हुक्मरानों नेे लोकषाही के अनुरूप प्रदेष के षासन प्रषासन की दिषा तय करना तो रही दूर की गात वे खुद ही अपने आप को लोकषाही के अनुकुल नहीं ढाल पायें हैं। जनव्यवहार में आम जनता को ही नहीं अपितु सत्तारूढ़ पार्टी के विधायक व मंत्रियों को ही इनके अलौकषाही प्रवृति की घोर षिकायत रही। मुख्यमंत्री के पद पर आसीन व्यक्ति न जाने कैसे भूल जाता कि वह जनप्रतिनिधी व जनसेवक है न की मालिक। प्रदेष के लोगों को तिवारी व निषंक की कार्य प्रणाली से भले ही अनैक षिकायतें रही हों परन्तु उनके आम जनता से लोकषाही के अनुकुल व्यवहार से किसी को षिकायत नहीं थी। वहीं बहुत कम समय मुख्यमंत्री रहे नित्यानन्द व कोष्यारी का व्यवहार भी लोकषाही के अनरूप ही रहा। परन्तु भुवन चंद खण्डूडी व विजय बहुगुणा का व्यवहार से आम जनता ही नहीं अपितु विधायक भी आहत रहे। जहां तक मुख्यमंत्री खण्डूडी के खिलाफ उनके इस जनरली हनक को दिखाने के खिलाफ खुद उनके दल के विधायक व कई मत्रियों ने दिल्ली स्थित भाजपा आला नेतृत्व के समक्ष दिल्ली आ कर फरियाद तक कर डाली। अब भाजपा के आंखों के तारे खण्डूरी सरकार को सत्ता से बेदखल करने के बाद जनता उस समय ठगी सी रह गयी जब कांग्रेसी मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा के व्यवहार से कांग्रेसी विधायक के आहत होने की खबरें चर्चाओं में है। सच्चाई क्या हैं यह तो विजय बहुगुणा व विधायक गोदियाल या इस प्रकरण के साक्षी रहे लोग ही जान सकते है। परन्तु इतना जरूरी है कि जनप्रतिनिधियों को लोकषाही का पाठ जनता को पढ़ाने से पहले खुद भी सीखना चाहिए। यही नहीं जनभावनाओं का सम्मान करना भी चाहिए। जिस प्रकार प्रदेष के वर्तमान मुख्यमंत्री उत्तराखण्ड की आम जनता के दिलों में खलनायक के रूप में विराजमान होने वाले मुलायम व उनके प्यादों के साथ बड़ी आत्मीयता से मिलते दिखाई देते उससे जनता की भावनाओं को ही नहीं षहीदों की षहादत भी अपमान होती है। मुख्यमंत्री को ही नहीं अधिकाष जनप्रतिनिधियों को जनभावनाओं का सम्मान करना भी सीखना चाहिए और पद की गरीमा की रक्षा भी करनी चाहिए।
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भारतीय संस्कृति के मूल तत्व को नजरांदाज करके नहीं बचेगी गंगा, उत्तराखण्ड व विष्व 

बांध के लिए नहीं अपितु जनकल्याण के लिए बनाया गया है उत्तराखण्ड

षनिवार 21 जुलाई को दिल्ली के गांधी प्रतिश्ठान में ‘ जल विद्युत परियोजनायें व उत्तराखण्ड का भविश्य’ नामक विशय पर एक विचार संगोश्ठी का आयोजन , आधा दर्जन के करीब संस्थाओं ने मिल कर किया। इस विचार गोश्ठी में प्रमुखता से जहां एक विचार सामने आया कि किसी भी हालत में उत्तराखण्ड में बांध नहीं बनने चाहिए। इसके लिए मजबूती से संघर्श को और तेज करने की आवष्यकता पर बल दिया।
वहीं बांध का विरोध करने वाले वक्ताओं व आयोजकों को इस बात का भान रखना चाहिए कि यह केवल उत्तराखण्ड के भू भाग या प्राकृतिक संसाधनों का सवाल नहीं अपितु विष्व संस्कृति की पावन गंगोत्री उत्तराखण्ड के सनातन मूल्यों का सवाल है भी है। इसको नजरांदाज करके केवल संसाधनों, जल, जंगल आदि की दुहाई दे कर बांध का विरोध करना भी अधूरा सत्य सा होगा। उत्तराखण्ड भारतीय संस्कृति की उन परम सनातन मूल्यों की हृदय स्थली भी है, जो दया, धर्म, त्याग व न्याय आदि महत्वपूर्ण सनातन मूल्यों की संवाहिका भी है। इस लिए उसका जमीदोज करके प्रकृति व मानवीय संस्कृति का एक प्रकार से गला घोंटने के समान है। इसके साथ इसका भी भान रखना चाहिए कि जो भी संसाधन है वह मनुश्य, प्राणीमात्र के कल्याण के साथ साथ प्रकृति के हित में संलग्न होने चाहिए। केवल मनुश्य के हित के लिए करोड़ों जीवों, लाखों पैड़ पौधों की निर्मम हत्या करना भी एक प्रकार से विनाष ही है। इसकी इजाजत भारतीय संस्कृति नहीं देती है। भारतीय संस्कृति के अनुसार यह सारी सृश्टि न केवल यहां के अरबों खरबों जीव जन्तुओं व चर अचर सबके लिए समान है। जीवो और जीने दो के सिद्धान्त को आत्मसात करने वाले भारत में इन दिनों लाखों जीवों का कत्लेआम करके भारत को संसार का सबसे बड़ा कत्लगाह बना दिया है, उसका एक छोटा सा रूप है कि यहां पर बांध बना कर पूरी घाटी में रहने वाले करोड़ों जीव जन्तुओं व असंख्य बनस्पति की निर्मम हत्या करना। वहीं जब स्थानीय लोग अपने विकास के लिए कहीं नहर, सड़क, अस्पताल आदि बनाना चाहते हैं तो उस समय सरकार के सर पर पर्यावरण का भूत सवार हो कर इस विकास के लिए तडफ रहे लोगों की राह को रोक दिया जाता है। परन्तु इसके साथ अगर इन नेताओं व नौकरषाहों के साथ-साथ चंद ठेकेदारों की तिजोरियां भरने के लिए बनने वाले बांध से लाखों पैड़ पौधे सहित पूरी की पूरी घाटी डुबो कर तबाह करने का समय आये तो सरकारी सारे कायदे काननू इतने लचर हो जाते हैं। सरकार का यह सोतेला व्यवहार ही जनता की आंखे खोलने के लिए काफी है।
समाज में जागरूक सामाजिक संगठनों व जागरूक लोगों को सरकार पर बांध से बनायी जा रही विद्युत ऊर्जा के बजाय पवन, भूतापीय, सोर ऊर्जा सहित अन्य बैकल्पिक माध्यम को तलाषने के लिए सरकार पर निरंतर दवाब बनाना चाहिए। इस के साथ यह भी याद रखना चाहिए कि उत्तराखण्ड राज्य का गठन उत्तराखण्ड को बांध व बाघों के लिए तबाह करने के लिए नहीं किया गया, अपितु यहां के निवासियों के हितों की रक्षा करने व इनका विकास करने के लिए किया गया। हिमालयी पर्यावरण की रक्षा करने के लिए किया गया। यहां के जल जमीन व जंगल जैसे संसाधनों की हो रही अंधी लूट से बचाने के लिए किया गया। यहां के लोगों की विलुप्त प्रायः हो रही संस्कृति का संरक्षण करने के लिए किया गया है। बांध मनुश्य के लिए बनते हैं न की मनुश्य बांधों के लिए बना है।
21 जुलाई की सांय कालीन सत्र में प्रारम्भ हुई इस कार्यक्रम की अध्यक्षता अग्रणी साहित्यकार पंकज बिश्ट ने की। वहीं इसका संचालन माले से जुडे प्रकाष चैधरी ने की। सभा में उत्तराखण्ड जनांदोलनों के प्रणेता डा षमषेर सिंह बिश्ट, भाजपा नेता मोहनसिंह ग्रामवासी, भाकपा-माले के नेता गिरजा पाठक, बांध विरोधी आंदोलन के अग्रणी नेता त्रेपन सिंह चैहाना( यमुना घाटी उत्तरकाषी), आदि मंचासीन नेताओं के अलावा आयोजकों की तरफ से पत्रकार चारू तिवारी, एनडीटीवी के सुषील बहुगुणा, सुनील नेगी, हल्द्वानी से इस कार्यक्रम में भाग लेने आये हुए अधिवक्ता चन्द्रषेखर करगेती, प्रेम सुन्दरियाल, भूपेन सिंह, महेष चंद्रा व जगदीष चंद्रा आदि वक्ताओं ने बांध न बनाये जाने के समर्थन में अपने विचार संगोश्टी में रखे।
समारोह में उपस्थित महत्वपूर्ण लोगों में हिन्दी अकादमी (दिल्ली सरकार) के सचिव हरीष बिश्ट, भाजपा नेता पूरणचंद नैनवाल, प्रवासी प्रकोश्ट के संयोजक बचन राम टम्टा, विनोद तिवारी, उत्तराखण्ड जनता संघर्श मोर्चा के अध्यक्ष देवसिंह रावत व महासचिव जगदीष भट्ट, उक्रांद के पूर्व केन्द्रीय प्रवक्ता एस के षर्मा, उत्तराखण्ड परिवर्तन पार्टी के पत्रकार सुरेष नौटियाल, वरिश्ट पत्रकार व्योमेष जुगरान, अल्मोड़ा से आये समाजसेवी रघु तिवारी, पत्रकार गोविन्द बल्लभ जोषी, कवि पूरण काण्डपाल, रमेष हितैशी व पृथ्वीसिंह केदारखण्डी, भारत रावत, पवन मेठानी, प्रदीप वेदवाल, अर्जुन रावत, हुक्मसिंह कण्डारी, मोहन सिंह रावत, पत्रकार अनिल पंत, सूर्यप्रकाष सेमवाल सहित अनैक प्रमुख समाजसेवी उपस्थित थे।
कार्यक्रम को सफल बनाने में म्यर उत्तराखण्ड संस्था के अध्यक्ष सुदर्षन रावत, मोहन बिश्ट, हरीष रावत, सार्थक प्रयास के उमेष पंत, आदि समाजसेवियों ने महत्वपूर्ण सहयोग दिया।

Friday, July 20, 2012


सत्तालोलुपु हुक्मरानों के कारण हर साल काल की भैंट चढ़ती है लाखों सुनीता व कल्पना

-दूसरी अंतरिक्ष यात्रा पर रवाना हुई अमेरिकी अंतरिक्ष यात्री सुनीता व कातिल डाक्टर के कारण भारत में दम तोड़ गयी इन्दू राणा
जिस समय रविवार को भारतीय मूल की अमेरिकी अंतरिक्ष यात्री सुनीता बिलियम्स वाइकोनूर अतरिक्ष केन्द्र से अपने अंतरिक्ष यान द्वारा अंतरिक्ष में उडान भर रही थी, उस समय उत्तराखण्ड के अग्रणी लोक गायक हीरासिंह राणा की 17 वर्षीय बालिका इन्दु राणा, देश की राजधानी दिल्ली में विनोद नगर स्थित एक प्राइवेट नर्सिग होम के डाक्टर के हाथों शल्य चिकित्सा करने के नाम पर किये गये कत्ल के कारण, एक पखवाडे के लगभग जीवन संग्राम के बाद लोकनायक जय प्रकाश नारायण अस्पताल के गहन चिकित्सा कक्ष में दम तोड़ गयी। उसका शव मानो देश की दम तोड़ चूकी व्यवस्था को धिक्कार रहा था। अगर देश में चिकित्सा सहित अन्य व्यवस्था सुदृढ़ होती तो यह प्रतिभाशाली बालिका इस प्रकार दम नहीं तोड़ती। यह मात्र एक इन्दु राणा की बात नही अपितु इस देश के दिशाहीन हुक्मरानों के कारण आज भारत में लाखों सुनीता व कल्पना सी प्रतिभाशाली बालिकायें या तो कन्या भ्रूण के कारण ऐसे ही कातिल डाक्टरों के कारण जन्म लेने से पहले ही मारी जाती है, जो जीवित रह जाती है उनको या तो उनके परिजन शिक्षा से वंचित कर देते हैं या उनके परिजनों की स्थिति इतनी सुदृढ़ नहीं होती कि वह सुनीता व कल्पना चावला की तरह शिक्षा ग्रहण कर अपनी प्रतिभा को निखार सके। जो चंद प्रतिशत पढ़ लिख भी जायें तो उनको भारत में प्रतिभा की गला घोंटने वाली व्यवस्था अंधेरे में अपने अरमानों का गला घोंटने के लिए विवश कर देती है। देश के हुक्मरानों की अदूरदर्शिता व देश भक्ति के अभाव के कारण आज आजादी के 65 साल बाद भी देश में ऐसी व्यवस्था नहीं बन पायी कि जहां अमेरिका की तरह प्रतिभावान लोगों को सुनीता व कल्पना चावला की तरह अपनी प्रतिभा को दिखाने के लिए देश की व्यवस्था का सहारा मिल पाये। भारत में प्रतिभावान व्यक्ति के बजाय जाति, धर्म, क्षेत्र व भ्रष्टाचार को प्राथमिकता दे कर देश की प्रतिभाओं को अपमानित करके देश को उनकी प्रतिभा से लाभान्वित होने से शर्मनाक ढ़ग से प्रायः वंचित किया जाता है। इस कारण देश की अधिकाश महत्वपूर्ण संस्थान आज प्रतिभाओं के अभाव में दिशाहीन व पतन के कारण बन गये हैं। वहीं अमेरिका में हो या चीन में दोनों देशा में प्रतिभावान को देश सेवा का पहला अवसर दे कर उनकी प्रतिभा का पूरा लाभ देश ही नहीं विश्व उठाता है। अगर कल्पना या सुनीता भारत में रहती तो उनको शायद ही इस क्षेत्र में अपनी प्रतिभा को दिखाने का अवसर देश की व्यवस्था दे पाती। देश में लाखों कल्पना व सुनीता जैसी बालिकायें पहले तो आर्थिक बदहाली के कारण स्कूल का मुंह ही नहीं देख पाती या अपनी प्रतिभा व अरमानों का देश के हुक्मरानों के नक्कारेपन के कारण नियति का फल मान कर चुपचाप दम तोड़ते देखने के लिए मजबूर होती है।
वहीं अमेरिका में कल्पना व सुनीता ही नहीं हर प्रतिभावान को उचित सम्मान मिलता है। चीन में तो देश की प्रतिभाओं को तरासने का दायित्व खुद सरकार उठाती है। अमेरिका में धनबल पर अपनी प्रतिभा को निखारने वालों को अवसर मिलता है। परन्तु भारत में तो प्रतिभावान को अवसर मिले यह जरूरी नहीं। यहां व्यवस्था पर एक प्रकार से भ्रष्टाचार का दीमक ही लग गया है।
अमेरिका में प्रतिभा को आगे बढ़ने का मौका मिलता है। जैसे ही भारतीय मूल की 46 वर्षीय अमेरिकी अंतरिक्ष यात्री सुनीता विलियम्स रविवार 15 जुलाई प्रातः 8 बज कर 10 मिनट पर कर्जाखिस्तान के बाइकोनूर अंतरिक्ष केंद्र से रूसी अंतरिक्ष यान सोयुज टीएमए-05एम से रूसी अंतरिक्ष एजेंसी के फ्लाइट इंजीनियर यूरी मालेनशेनको और जापान एयरोस्पेस एक्सप्लोरेशन एजेंसी के आकिहितो होशिदे के साथ 4 महिने के अपने दूसरे अंतरिक्ष अभियान के तहत अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन (आईएसएस) के लिए रवाना हुई तो करोड़ों भारतीय सहित संसार भर के अरबों लोगों के चेहरे खुशी से खिल उठे।
भारतीय संस्कृति को आत्मसात करने वाली अंतरिक्ष गामनी सुनीता के पिता भारतीय गुजरात मूल व माॅ स्लोवानियाई मूल की हैं। सुनीता दूसरी बार अंतरिक्ष की यात्रा कर रही हैं, इससे पहले वो 2006 में अंतरिक्ष में जा चुकी है। पहली अंतरिक्ष यात्रा के दौरान सुनीता छह महीने तक स्पेस में रही थीं। अमेरिकी अंतरिक्ष कार्यक्रम के तहत अंतरिक्ष में जाने वाली सुनीता दूसरी भारतीय मूल की अंतरिक्ष गामनी है। इससे पहले कल्पना चैहान भी अमेरिकी अंतरिक्ष अभियान की सदस्य रही। हालांकि एक अंतरिक्ष अभियान के तहत वह शहीद हो गयी, परन्तु आज भी उसकी अमिट छाप भारतीय जनमानस पर जींदा है। अपने पहले मिशन में भारतीय संस्कृति की प्राण समझी जाने वाली पावन ’ गीता’ को अपने संग अंतरिक्ष में ले जाने वाली सुनीता भगवान गणेश की परमभक्त है।
सुनीता का जन्म ओहायो के यूक्लिड में हुआ था और मैसाचुसेट्स में वह पली बढ़ीं। अंतरिक्ष गामनी सुनीता अंतरिक्ष यात्रा एक्सपिडिशन-32 के चालक दल में एक फ्लाइट इंजीनियर के तौर पर गई हैं और अंतरिक्ष केंद्र पहुंचने पर अंतरिक्ष यात्रा एक्सपिडिशन-33 की कमाडर होंगी।
प्रतिभाशाली सुनीता को पद्म भूषण के साथ नेवी कमांडेट मेडल, नेवी एंड मरीन क्रॉप्स अचीवमेंट मेडल, हयूमेटेरियन सर्विस मेडल से सम्मानित किया जा चुका है। गौरतलब है कि अमेरिकी नौसैनिक अकादमी से शिक्षा प्राप्त सुनीता लड़ाकू विमान की कुशल पायलट भी हैं।
सुनीता की सफलता को देख कर मुझे लगता है कि अगर भारत की सरकार देश की प्रतिभाओं का सम्मान करती या देश की बालिकाओं को उनकी प्रतिभा को निखारने में संरक्षण देती तो आज भारत विश्व में अमेरिका या पश्चिमी देशों का पिछलग्गू देश होने के बजाय विश्व का नेतृत्व करने वाला देश होता। परन्तु दुर्भाग्य है भारत में जहां प्रतिभाओं की कहीं कमी न होने के बाबजूद यहां के दिशाहीन नेतृत्व के कारण आज यहां पर हर कदम पर लाखों कल्पना व सुनीता जैसी प्रतिभायें दम तोड़ रही है। जरूरत है देश की प्रतिभाओं को संरक्षण व अमेरिका-चीन की तरह संरक्षण
देने की।
शेष श्रीकृष्ण कृपा। हरि ओम तत्सत्। श्रीकृष्णाय् नमो।