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Sunday, February 6, 2011

भारत की लुटिया डुबो देगा प्रधानमंत्री _अनर्थशास्त्री है मनमोहन



जंतर मंतर      देवसिंह रावत
 अर्थशास्त्री नहीं अनर्थशास्त्री है मनमोहन
 भारत की लुटिया डुबो देगा प्रधानमंत्री मनमोहनसिंह

सब्जी की दुकान से प्याज की खरीददारी करने के बाद दिन दुगुनी रात चैगुनी महंगाई को देख कर ताई क्रोध से तिलमिलाते हुए बोली....ऐसा घोर अंध्ेर कभी नहीं देखा।.. मैने कहा ताई यह अर्थशास्त्राी का राज है अंध्ेर नहीं। ताई गुर्राई अरे अर्थशास्त्री नहीं अनर्थशास्त्राी कहो। मंहगाई से आम लोगों का जीना हराम हो रखा है यह कैसा अर्थशास्त्राी है जो लोगों का जीना हराम कर रहा है। आखिर उसे ऊपर वाले की मार का डर नहीं है, जो ऐसा अनर्थ होने दे रहा है। मैने कहा ताई ऊपर वाला तो उसके साथ है। ताई बोली अरे कैसी बात करता है ? ऊपरवाला कभी अनर्थ  के साथ नहीं रहता। तू किस ऊपर वाले की बात कर रहा है?  मैने कहा ताई आज ऊपर वाला अमेरिका के शासक  को ही समझते हैं भारत के हुक्मरान। पहले जार्ज बुश था आज कल ओबामा है। यह सुनते ही ताई भिनभिनाई। अरे मेने दुनिया देखी है ऊपर वाला कभी अमेरिका नहीं हो सकता है। उसकी मार से ऐसे कई अमेरिका व उसके शासक पानी भी नहीं मांगते। कहां है अब वह बुश .... उसको डिस्चार्ज किसने किया?  मैने कहा ताई इस देश में तो वहीं होता है जो अमेरिका चाहता। ताई बोली लगता है तूने भी पिफरंगियों का जूठा खा लिया जो तू भी उनके गुण गा रहा है। ...राम..राम क्या घोर कलयुग आ गया है। यहां अब दीन दुखियों की कोई सुध् लेने वाला भी नहीं रहा। इस घोर अनर्थ को देख कर  लगता है अंध्ेर नगरी चोपट राजा। .....अरे बेटे जरा एक बात बता...ओ इंदिरा गांध्ी की बहू कहां है? मैने कहा ताई सोनिया जी तो मनमोहन सरकार की मुखिया है। यह सुनते ही ताई झल्लाई अरे वह सोनिया है या मोनिया वह क्या देख सुन नही रही है...... उसकी सास इंदिरा जी तो तुरंत ही गरीबों के लिए अब तक इन जल्लादों को सलाखों में बंद कर देती......। वह क्यों मौन बेठी है बेटा....... अरे अकेली महिला है चारों तरपफ लुटेरों की जमात है वह डर क्यों रही है बेटा...... उसे नहीं पता की पूरा देश उसके साथ है..... देश के गरीब उसके साथ है गरीबों का सहारा कांग्रेस थी। अरे बेटे जब यह मनमोहन नामक अर्थशास्त्राी काम नहीं कर पा रहा हे तो वह उसे बदल कर वह क्यों खुद क्यों नहीं बन जाती है देश की प्रधनमंत्राी...इंदिरा जी का पोता राहुल कहते हैं काफी होशियार है....वह गरीबों का हितैषी है उसे ही क्यों नहीं बना देती है सोनिया प्रधनमंत्री? क्या मनमोहन या अमेरिका उसे डरा रहा है? वह डरे नहीं इंदिरा गांधी की बहु है वह पूरा देश उसके साथ है....जिस प्रकार से इंदिरा गांधी ने पाकिस्तान को ही नहीं अमेरिका को भी ठंेगा दिखाया था उससे देश की जनता को इंदिरा पर नाज था। बेटा ....इंदिरा की बहु हो कर वह अमेरिका या मनमोहन से क्यों डरती है.....पूरा देश उसके साथ है.....यह मनमोहन अब देश को नहीं चाहिए। उसे अमेरिका ही भेज दो........या वे विश्व बैंक या अमेरिका के किसी अन्य संयुक्त राष्ट्र में सेवा करें। देश को अपने हाल पर छोड़ दो। .....ताई क्या बोल रही है ....तू तो बिलकुल पढ़े लिखे  नेताओं की तरह भाषण दे रही है। वह बोली अरे बेटे इस देश के पढ़े लिखे व नेताओं को देख कर लगता है कि हम अनपढ़ ही बेहतर ....हमारे अंदर दया, ध्र्म व मानवता तो रहती। इन पढ़े लिखे अपफसरों व नेताओं के अंदर तो अनर्थ के अलावा कुछ ही देखने को नहीं मिलता.... आखिर देश को लूट कर ये कहां ले जायेंगे। जिसके यहां छापा पढ़ रहा है उसके यहां अरबों खरबों की दौलत मिल रही है। कितनी बेनामी दौलत होगी। कोई जानता नहीं। इनकी ध्न दौलत की अंध्ी भूख ने इनको लगता है हैवान हीं बना दिया। इनको न तो दीन दुखियों का दर्द सुनाई देता व नहीं अपना पफर्ज का ही इनको भान होता। भगवान ही बचाये इन नेताओं व इन अनर्थशास्त्राी के चैपट राज से। यह कहते हुए ताई रोने लगी.........ताई का दर्द देख कर मैं मेरा हृदय भी द्रवित हो गया... मैं बोला ताई रो नहीं। ताई चिल्लाई खबरदार जो घडियाली आंसू बहाये...बड़ा हमदर्द बना है .....अगर तुम जैसे कलम घिस्सू देश व जनता का सही दर्द अपनी कलम से लिखते तो आज देश में ऐसी अंध्ेरगर्दी नहीं होती। इन अनर्थशास्त्राी का राज नहीं होता......यह कहते हुए ताई ने अपनी लाठी उठा कर मेरे सर पर ऐसी मारी की मै दर्द से चिल्ला पड़ा। बचाओ...... बचाओ......बचाओ.......। मैं भाग रहा था.....और ताई मेरे पीछे पड़ी हुई थी......इसी भागमभाग में यकायक मेरी नींद खुल गयी.......। मै डर के मारे थरथर कांप रहा था। मेरी नजरें ताई को ढूूॅंढ रही थी.......परन्तु ताई कहीं नहीं थी........तब मुझे समझ में आया कि मैं अभी तक सपना देख रहा था। तब मुझे जरा शांति हुई। तभी मेरी नजर टेबल पर रखे एक अखबार पर पढ़ी जिसमें खबर थी कि  संसद में मंहगाई पर विपक्ष के मर्माहित प्रहारों से पूरी तरह बेनकाब हुई मनमोहनसिंह सरकार के वित्तमंत्री प्रणव मुखर्जी ;जिनकी सरकार मंहगाई पर अंकुश लगाने में पूरी तरह असपफल ही नहीं अपितु पूरी तरह से मंहगाई बढ़ाने में सहभागी रहते हुए मंहगाई बढ़ाने के लिए एकमात्रा दोषी है।द्ध ने अपनी नाकामयाबी को छुपाते हुए देश की जनता व विपक्षी दलों की आंखों में धूल झोंकने के लिए उनको अर्थशास्त्रा का ज्ञान ही देने लगे।
केन्द्रीय वित्त मंत्री का यह कहना की अर्थशास्त्र इस तरह से नहीं चलता। देश की जनता देश को तबाह करने वाले अर्थशास्त्र व अर्थशास्त्री दोनों की इस देश को कतई जरूरत नहीं। देश में वही अर्थशास्त्रा व अर्थशास्त्री जनता को स्वीकार है जो चाणाक्य की तरह लोककल्याणकारी हो, न की मनमोहनसिंह जैसे अर्थशास्त्री का देश को तबाह करने वाला अर्थशास्त्र। शायद इसी लिए मेरे सपने में ताई भी कह रही थी कि यह अर्थशास्त्रा नहीं अनर्थशास्त्र है।  देश के प्रबुद्ध
 जनों की जुबान पर भी यही है कि भगवान बचाये इस देश को मनमोहन जेसे अर्थशास्त्री से। अगर यह अर्थशास्त्र है तो अनर्थशास्त्र किसे कहते हैं? आज देश के गांव देहातों में आम लोग मंहगाई को देख कर अपना सर पीट रहे हैं कि ऐसा अनर्थ कभी नहीं हुआ।

देवसिंह रावत

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