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Thursday, June 16, 2011

स्वामी रामदेव को बर्बाद करने पर क्यों उतारू हैं सरकार?

-स्वामी रामदेव को बर्बाद करने पर क्यों उतारू हैं सरकार?
-भारत को मजबूत बनाने के बाबा के आंदोलन को रौंदने के लिए राष्ट्रीय ही नहीं अंतरराष्ट्रीय षडयंत्र
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देश की सत्ता में पक्ष-विपक्ष व पूरी व्यवस्था के विभिन्न महत्वपूर्ण संस्थानों में काबिज मजबूत तबका देश की संसद पर हमला सह सकता है! उसके अपराधियों को न्यायालय द्वारा फांसी दिये जाने के बाबजूद वर्षो तक उसकी खातिरदारी कर सकता है। वह देश के तबाह करने पर तुले अमेरिका व पाक के आतंकियों पर रहम कर सकता है। यही नहीं देश को मंहगाई व भ्रष्टाचार से तबाह करने वाले देशद्रोहियों को देश की छाती पर मूंग दलते हुए देख सकता है परन्तु देश का यह तबका किसी भी हालत में यह सहन नहीं कर सकता है कि उनके द्वारा दशकों से देश से कमाये गये अकूत काले धन पर जो उन्होंने बहुत ही पापड़ बेल कर विदेशी बैंकों में अपने बुरे दिनों के लिए सुरक्षित रखा है उस पर कोई नजर भी उठाये। उस पर नजर उठाने वाले हालांकि सुब्रमणयम स्वामी जेसे बहुत हैं परन्तु बाबा रामदेव जैसे जनबली व धनबली अब तक एक भी न था। बाबा द्वारा देश हित में उनके माल पर नजर रखने की हिमाकत करने के कारण देश का यह तबका हर हाल में उसको जमीदोज करने के लिए उतारू है।
बाबा रामदेव जैसे मजबूत व लाखों जनता को आंदोलित करके उस धन को जब्त करने की बात दिल्ली में आकर उनकी छाती पर चढ़ कर करने लगे तो यह देश के उन लोगों को कतई बर्दास्त नहीं हुआ जिनकी अकूत सम्पति विदेशों में इन बैंकों में रखी हुई है। यह नहीं की ये लोग केवल कांग्रेस पार्टी के हैं ये भारत के तमाम अग्रणी राजनैतिक दलों में ही महत्वपूर्ण पदों में आसीन नहीं हैं अपितु ये लोग नौकरशाह, व्यवसायी, कलाकार, खिलाड़ी, कानूनविद्,तस्कर, माफिया, साधु-संत, उद्यमी और समाजसेवी सहित व्यवस्था के तमाम महत्वपूर्ण तबके को अपने शिकंजे में जकडने वाले लोग है। ’ ऐसे लोग कैसे सहन करे की उनकी उम्र भर की कमाई को , जो उन्होंने कितने ही कुकर्म करके बचते छुपाते विदेशी बैंकों में छुपाई हैं, इस कमाई को बाबा रामदेव द्वारा देश के लिए जब्त करने की मांग को सुनते ही उनकी दिन का चैन व रातों की नींद ही उड गयी। उन्होंने मिल कर दवाब डाल कर बाबा रामदेव को ऐसा सबक सिखाने का रणनीति बाबा के दिल्ली आगमन से पहले ही तय कर ली थी। वे हर हाल में बाबा रामदेव की जुबान को सदा के लिए बंद करने के लिए भी उतारू है। इसी कारण सरकार ने इतनी कमजोरी व आवभगत बाबा रामदेव के सम्मुख दिखाई कि उसे देख कर पूरा देश हैरान था। सरकार किसी भी कीमत पर बाबा को दिल्ली में आमरण अनशन क्या इस मुद्दे को लेकर किसी प्रकार का योग शिविर की भी इजाजत नहीं दे रही थी। परन्तु बाबा ने जिस प्रकार से चार मंत्रियों को अपनी बातों में फंसा कर 4 जून को रामलीला मैदान में आमरण अनशन करने में सफलता हासिल की उससे विदेशी बैंकों में अकूत धन रखने वालों की त्योरियां चढ़ गयी। उन्होंने अपने प्रभाव से किसी भी कीमत पर बाबा रामदेव को ऐसा सबक सिखाने का मन बना लिया कि जिससे आने वाले समय में कोई इस मुद्दे को उठाने की हिम्मत तक न कर पाये। इसी के तहत आधी रात को सोते हुए आंदोलनकारियों व बाबा रामदेव को पुलिसिया दमन का शिकार होना पड़ा। वह बाबा रामदेव का शौभाग्य रहा कि वे सुरक्षित बच गये। अगर उस भगदड में बाबा रामदेव भी वहां पर शहीद हो जाते तो इन धन पशुओं के चेहरे पर तनिक सी भी सिकन नहीं आती। इसके बाद जिस प्रकार से बाबा रामदेव को बदनाम करने का एक जबरदस्त प्रचार कांग्रेस व सरकार ने मीडिया के सहयोग से किया उससे साफ हो गया कि बाबा रामदेव जिंदा भी हैं तो यह देश के लोगों के लिए शौभाग्य व भगवान की कृपा से। नहीं तो जो निष्ठुर व्यवस्था रात के अंधेरे में सोते हुए हजारों अनशनकारी महिला, बुजुर्ग व बच्चों पर जलियावाले बाग से अधिक शर्मनाक दमन कर सकती है तो उसके लिए अपने निहित स्वार्थ के लिए बाबा रामदेव को रामलीला मैदान की भगदड़ में ही जमीदोज करने में कितनी मेहनत करनी पड़ती। देश की जनता को ही नहीं पूरे विश्व के चिंतकों को एक बात समझ में नहीं आ रही है कि भारत सरकार शांतिपूर्ण ढंग से लाखों लोगों के समर्थन से देश के हित में आंदोलन कर रहे योग गुरू बाबा रामदेव को कुचलने के लिए इतनी क्यों अधीर है? क्यों भारत सरकार ने 4 मई की रात को सोते हुए अनशनकारी रामदेव व पच्चीस हजार अनशनकारियों को बर्बर पुलिसिया दमन से क्यों रौंदा? उसके बाद भी केन्द्र सरकार व सत्तासीन कांग्रेस पार्टी दोनों ने ही जिस गैर जिम्मेदाराना ढ़ग से बाबा रामदेव के अनशन का उपहास ही नहीं उपेक्षा की उससे देश के लोगों के जेहन मे ं केवल एक ही सवाल बार बार उभर रहा है कि आखिर बाबा रामदेव ने ऐसी क्या गलती कर दी जो उसके साथ देश के दुश्मनों से भी बदतर व्यवहार करने के लिए सरकार उतारू हैं? क्यों सरकार देशहित में चल रहे इन शांतिपूर्ण आंदोलनों को तो हर हाल में लाठी गोली चलवा कर पुलिसिया दमन से रौंदने के लिए उतारू हैं परन्तु वहीं दूसरी तरफ यही सरकार देश की संसद से लेकर भारत को अपने आतंकियों से तबाह करने पर दशकों से संलिप्त अमेरिका व पाक से मैत्री की पींग बढ़ा रही है तथा उनके आतंकी गुर्गो को तमाम न्यायालयों द्वारा सजा दिये जाने के बाबजूद भी शर्मनाक संरक्षण दे रहे हैं।
कुछ महिनों से देश की राजनीति में यकायक तब उबाल आया जब बाबा रामदेव व अन्ना हजारे ने देश में बेलगाम भ्रष्टाचार से व्यथित हो कर इसके खिलाफ गांधीवादी आंदोलन चलाने के लिए कमर कसी। रामदेव तो पूरे भारत में भारतीयों द्वारा विदेशों में जमा करायी गयी अकूत दौलत को भारत में वापस लाने की मांग करते हुए आंदोलन चला रहे थे। वहीं अन्ना हजारे भी अपने साथियों के साथ ‘जन लोकपाल’ की नियुक्ति के लिए कानून बनाने के लिए आंदोलन कर रहे थे। पूरे देश ने देखा कि अण्णा हजारे के आंदोलन को सरकार ने हाथों हाथ लेकर उनके साथ समझोता करके नया इतिहास रचा। लोगों को लगा कि केन्द्र सरकार जनदवाब में आ कर लोकशाही का सम्मान करने के लिए मजबूर हो गयी है। जन लोकपाल कानून बनाने के लिए सरकार ने तत्काल मंत्रीमण्डल समुह की समिति और एक अण्णा हजारे वाले दल की नागरिक समिति गठन का ऐलान कर दिया। इसकी एक दो बैठकें भी आयोजित हुई। सरकार पहले अण्णा हजारे की प्रधानमंत्री से लेकर न्यायपालिका को इस कानून के अन्तर्गत रखने के लिए सहमत हुई परन्तु चंद महिने में ही सरकार ने अपना रंग दिखाना शुरू कर दिया। किन्तु परन्तु ऐसे लगाये कि समिति के औचित्य पर ही प्रश्न चिन्ह लगाना शुरू कर दिया। इसके साथ ही बाबा रामदेव ने भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने के लिए जन लोकपाल को नाकाफी बताते हुए साफ शब्दों में अपनी पहली मांग के रूप में विदेशी बैंको में भारतीयों द्वारा रखे गये तथाकथित 400 लाख करोड़ रूपये को वापस भारत मे ं लाने की मांग को लेकर अपने ऐतिहासिक अनशन का ऐलान कर दिया।
4 जून को प्रारम्भ हुए इस आमरण अनशन में सम्मलित होने के लिए बाबा ने पूरे देश का भ्रमण करते हुए इसमें देश भर के लाखों लोगों को जोड़ने में जैसे ही सफलता हासिल की, उससे केन्द्र सरकार के हाथ पांव फूलने लगे। इस आंदोलन को जिस प्रकार से संघ परिवार का खुला समर्थन हासिल हुआ, सरकार के पांवों के नीचे से मानों जमीन ही खिसक गयी। सरकार ने इस बात का निश्चय कर लिया कि किसी भी कीमत पर बाबा रामदेव को दिल्ली में आमरण अनशन तो क्या कुछ भी करने के लिए इस समय घुसने ही न दिया जाय। जब बाबा अपने जनजागरण अभियान के अंतिम पड़ाव महाकाल की नगरी उज्जैन में हजारों लोगों को संबोधित करके 3 जून को दिल्ली से पालम हवाई अड्डे पर उतरे ही थे कि वहां पर केन्द्र सरकार के चार मंत्री उनसे अपना आमरण अनशन स्थगित करने की गुहार लगाने को पंहुच गये। इन चारों मंत्रियों ने बाबा रामदेव से कहा कि सरकार ने कालाधन को देश में लाने की मांग व मेडिकल -इंजीनियरिंग सेवाओं की परीक्षायें भारतीय भाषाओं में कराने की मांग को सिद्वांत रूप में स्वीकार कर लिया है। 3 जून को भी बाबा रामदेव के साथ भारत सरकार के मंत्रियों की दिल्ली के एक पंचतारा होटल में बैठक हुई। िह हालांकि इन बातों को उजागर नहीं किया गया। बाबा ने देश भर से आये अपने लाखों समर्थकों के साथ रामलीला मैंदान में आमरण अनशन का अपना वचन निभाने की मजबूरी शायद केन्द्र सरकार के मंत्रियों सके समक्ष रखी। बाबा की मजबूरी को समझते हुए शायद सरकार ने इसको भी मान लिया। परन्तु जब 4 जून तक बाबा के अनशन पर लाखों लोग पंहुच रहे थे तथा वहां पर देश के कौने कौने से लाखों और लोगों के पंहुचने की आशंका से केन्द्र सरकार के लोगों की त्योरियां चढ़ने लगी।
वैसे भी बाबा रामदेव को मनाने की गुहार जिस प्रकार से केन्द्र सरकार ने अपने चार -चार मंत्रियों को भेज कर की उससे पूरे कांग्रेसी जगत में सरकार की कड़ी भत्र्सना हुई। इसके साथ ही पूरे देश में एक संदेश गया कि मनमोहन सिंह सरकार पूरी तरह से बाबा रामदेव के रहमों करम पर टिकी हुई है। कांग्रेसी रणनीतिकारों को आशा थी कि वह बाबा को भी अण्णा हजारे की तरह अपने कमेटी इत्यादि के जाल में फंसा ही लेंगे। परन्तु जिस प्रकार से बाबा रामदेव के हाथों अपनी मिटियामेट होते देख कर कांग्रेसी रणनीतिकारों ने 4 जून की रात को बाबा रामदेव पर अनशन समाप्त न करने व वादा खिलाफी करने का आरोप लगा कर ुपलिस के दमन के बल पर आंदोलन को तहस नहस कर दिया। इसकी कड़ी भ्रत्र्सना पूरे देश ही नहीं विदेशों में भी हुई। परन्तु देश के इस तबके को इससे क्या लेना, वह तो बाबा रामदेव को ऐसा सबक सिखाने को उतारू हैं और इसके लिए उसने अपनी सारी ताकत झोंक दी है। उसकी एक ही कोशिश है कि बाबा को इतना करारा सबक सिखाया जाय कि कोई दूसरा भूल कर भी इस दिशा में मुंह खोलने की हिम्मत तक न कर सके।
बाबा को सबक सिखाने के बाद अब अण्णा हजारे को भी सरकार मूक रहने के लिए विवश कर रही है। इसी के तहत अण्णा हजारे को संघ का आदमी और तानाशाह आदि बताया जा रहा है। बाबा रामदेव के पास तो धनबल व जनबल था सरकार को मालुम है कि अण्णा के पास ऐसा कुछ नहीं है। केवल जनता के दिलों में जरूर अण्णा हजारे के लिए जगह है परन्तु अण्णा के पास वर्तमान में केवल एनजीओ की टीम के अलावा कोई ऐसा समर्पित तबका नहीं है जो सरकार के दमन के बाद अपने आप को विरोध में झोंक दे। इसलिए सरकार जानती है कि एनजीओ तो सबसे भ्रष्ट व अवसरवादी तबका होता है, वह लम्बा संघर्ष किसी भी कीमत पर नहीं कर सकता है। ऐसे में बाबा रामदेव के बाद अण्णा का मुंह बंद कर देश को भ्रष्टाचार का चारागाह बनाने के लिए देश की व्यवस्था पर काबिज मजबूत तबका उतारू है। इसी तबके के इशारों पर पक्ष विपक्ष ही नहीं पूरी व्यवस्थायें संचालित होती है। सरकार किसी की भी रहे इसी मजबूत तबके का राज देश में
चलता है।
जो लोग बाबा रामदेव व अण्णा की चंद भूलों के कारण इस आंदोलन का विरोध कर रहे हैं उनको यह बात समझ लेना चाहिए कि अण्णा व बाबा की भूलों को तो सुधारा जा सकता है परन्तु व्यवस्था में काबिज इन खूंखार भेडियों से देश बचाने के लिए इन दोनों को निजी अहं भूला कर एकजूट हो कर सांझी लडाई लडनी जरूरी है। इस लडाई में भले ही संकीर्ण मानसिकता के नेता, भ्रष्ट नेताओं को अग्रणी न भी बनाया जाय परन्तु इस आंदोलन में सबका सहयोग लेना नितांत आवश्यक है। एक हिंसक तबके व देश को लूटने में दशकों से लगे तबके से देश की व्यवस्था को बचाने के लिए तथा भ्रष्टाचार पर ईमानदारी से अंकुश लगाने के लिए समाज के सभी तबकों की भागेदारी को स्वीकार करना पडेगा। इसमें संघ या मुस्लिम लीग या अकाली सभी तबके का जो भी व्यवस्था की भलाई में सहयोग देना चाहता हो उसका सहयोग लेना चाहिए। अगर हमने इन खूंखार तबके के जाल में फंस कर संघ या मुस्लिम इत्यादि लक्ष्मण रेखाओं को अपनी चारों तरफ खिंचा तो इस लडाई को किसी भी सूरत पर तमाम कोशिशों के बाबजूद नहीं जीता जा सकता है। जो लोग बाबा रामदेव के हजारों करोड़ रूपये की सम्पति के कारण उनका विरोध कर इस आंदोलन को कमजोर कर रहे हैं उनको यह नहीं भूलना चाहिए कि बाबा रामदेव की तरह इस देश में हजारों ऐसे संत व महंत हैं जिनके पास उनसे भी अधिक सम्पति है। परन्तु बाबा रामदेव ने यह सम्पति देश का नाम रोशन करके अर्जित की। हो सकता है कानूनों का कुछ उलंधन हुआ हो परन्तु उनके कार्यो से देश को हजारों करोड़ का लाभ व अरबों रूपये का अर्थव्यवस्था को लाभ हुआ। हाॅं जिन बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के खिलाफ बाबा रामदेव पेप्सी, कोक इत्यादि को रोकने के लिए प्रचार कर रहे थे उनके आर्थिक सम्राज्य को बाबा ने गहरा नुकसान पंहुचाया था। इसकारण हो सकता है बाबा के खिलाफ यह अंतरराष्ट्रीय साजिश भी हो। क्योंकि बाबा रामदेव जिस प्रकार से भारत के स्वाभिमान व विकास के लिए देश की जनता को जागृत कर रहे थे उसको देख कर विदेशी ताकतें किसी भी सूरत पर बाबा के अभियान को रौंकना चाहती थी। इस तरह बाबा के भारत को मजबूत बनाने के इस अभियान को रोंकने व रौंदने में राष्ट्रीय ही नहीं अंतरराष्ट्रीय साजिश भी है। देश के स्वाभिमानी देशभक्तों को इस बात को समझना चाहिए कि बाबा के आंदोलन से देश मजबूत ही होगा। देश की न्यायपालिका को भी यह बात समझ में आ ही गयी कि बाबा के आंदोलन को कुचला गया है। आज देशवासियों का पावन कर्तव्य है कि वे बाबा व अण्णा हजारे के देश को महान बनाने के आंदोलन को कुचलने पर आमदा सरकार के मंसूबों पर आगे आ कर पानी फेर दे। शेष श्री कृष्ण कृपा। हरि ओम तत्सत् । श्री कृष्णाय् नमो।

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