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Thursday, June 16, 2011

-गंगा भक्त स्वामी निगमानन्द की उपेक्षा से लगाया निशंक सरकार ने देश के माथे पर कलंक

-गंगा भक्त स्वामी निगमानन्द की उपेक्षा से लगाया निशंक सरकार ने देश के माथे पर कलंक
-भाजपा के प्रदेश मुख्यमंत्री निशंक इस्तीफा दें

उत्तराखण्ड में गो गंगा व गीता की दुहाई देने वाले संघ पोशित भाजपा का षासन है वहां पर गंगा की निर्मलता की रक्षा व इसमें अवैध खनन को रौंकने की मांग करने वाले हरिद्वार के महान संत स्वामी निगमानन्द की आमरण अनषन की सरकार ने इतनी षर्मनाक उपेक्षा की कि उनका देहान्त ही हो गया। उनकी षहादत के बाद भी न तो भाजपा के मुख्यमंत्री निषंक को षर्म आयी व नहीं संघ व भाजपा के अध्यक्ष गडकरी को ही षर्म आयी। अगर समय पर प्रदेष सरकार जागती तो स्वामी निगमानन्द का जीवन बचाया जा सकता था। हरिद्वार में गंगा की पावनता को अक्षुण्ण खने व इसमें अवैध खनन को रोकने की मांग को लेकर अनिष्चित कालीन अनषनकारी संत स्वामी निगमानन्द की 13 जून को सोमवार को दर्दनाक मौत हो जाने से भारतीय हुक्मरानों प देष की जनता के माथे पर एक षर्मनाक कलंक लग गया है। इस देष की सरकारें आजादी हासिल करने के मात्र 64 साल में ही इतनी संवेदनहीन हो गयी हैं कि वे जनहित के मुद्दे पर सरकार का ध्यान आकृश्ठ करने वाले की इस कदर उपेक्षा करे की वह दम तोड़ने के लिए विवष हो जाये। इस प्रकरण से भाजपा जनता पार्टी के षासन पर भी कांग्रेस की तरह संवेदनहीनता का कलंक लग गया। गौरतलब है कि इसी पखवाड़े इन महान संत के स्वास्थ्य की कुषल क्षेम पूछने के लिए उमा भारती भी स्वयं देहरादून के उसी हिमालय अस्पताल गयी जहां अनषनकारी स्वामी रामदेव को भी स्वास्थ्य लाभ के लिए भर्ती किया गया।
प्रदेश सरकार की संवेदनहीनता का सबसे निकृष्ठ रूप यह दिखा की वह बाबा रामदेव के चंद दिनों के आमरण अनशन पर जहां समर्पित दिखी वहीं गंेगा भक्त निगमानन्द के लम्बे आमरण अनशन की उसने इस कदर शर्मनाक उपेक्षा की कि बाबा को अपनी शहादत देने के लिए मजबूर होना पड़ा। महान गंगा भक्त निगमानन्द की शहादत से आज पूरे देश के सभ्य समाज को हिला कर रख दिया है कि हमारी सरकारें चाहे किसी भी दल की हो उसमें जरा भी न तो देश व नहीं प्रदेश के हितों के प्रति जरा सी भी संवेदनशीलता रह गयी है। भारतीय संस्कृति की प्राण समझी जाने वाली गंगा की पावनता के लिए अपनी शहादत देने वाले महान संत निगमानन्द अमर होगये वहीं भाजपा शासन में देवभूमि समझी जाने वाली उत्तराखण्ड प्रदेश में निशंक जैसे संवेदनहीन मुख्यमंत्री में अगर जरा सा भी जमीर होता तो वे तत्काल उसी तरह से इस्तीफा देते जिस प्रकार से देश के लोकप्रिय प्रधानमंत्री रहे लाल बहादूर शास्त्री ने अपने रेलमंत्री के कार्यकाल में रेल दुर्घटना पर इस्तीफा दिया था परन्तु ऐसी नेतिकता की आशा न तो देश को भाजपा के मुख्यमंत्री निशंक से है व नहीं भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष गडकरी से ही है।

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