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Thursday, November 10, 2011

करोडों दिलों में अमर रहेंगे महान गायक भूपेन हजारिका


करोडों दिलों में अमर रहेंगे महान गायक भूपेन हजारिका 
मुंबई।(प्याउ )ंभारतीय गीत संगीत को उस समय एक और गहरा झटका लगा जब दिल हूम हूम करे नामक गीत के महान गायक भूपेन हजारिका का स्वर्गवास इस सप्ताह हो गया। अभी हाल में महान गजल गायक जगजीत सिंह के देहान्त से  भारतीय संगीत प्रेमी अ भी उबर भी नहीं पाये थे कि यकायक लाखों दिलों में बसे स्वर सम्राट भूपेन हजारिका का निधन ने भारतीय संगीत की दुनिया  पर एक प्रकार से बज्रपात सा ही हुआ।  उनके निधन पर देष के राश्ट्रपति, प्रधानमंत्री सहित हर संगीत प्रेमियों , तमाम ंसंगीत दिग्गजों के साथ साथ उत्तराखण्ड के भूपेन हजारिका नरेन्द्रसिंह नेगी, ंचन्द्रसिंह राही, हीरासिंह राणा सहित अनैक चोटी के गायकों ने गहरा षोक प्रकट किया।
उनको श्रद्वांजलि देते हुए संगीत के दिग्गजों ने एक स्वर में मानों यह कहा हो कि ंजिन लोगों ने पानी में कंकड़ उछालते हाथों को देखा है, उन्हें शायद ही इस बात का यकीन आए कि कंकड़ों को पानी में तैराया भी जा सकता है। गीत- संगीत की दुनिया में इस जटिल खेल के उस्ताद थे भूपेन हजारिका, उनकी आवाज में ब्रतापुत्र जैसा वेग और संगीत में हिलोरें मारता असम का लोक जीवन। लेकिन इन सबसे ऊपर थे उनके सरोकार जिन्होंने उन्हें अलग और व्यापक पहचान दिलाई। लोक से लोग तक। ‘लोहित’के इस लाडले का पूरा संगीत संसार मुरीद था। भूपेन हजारिका ने मुंबई के कोकिलाबेन धीरूभाई अंबानी अस्पताल में उन्होंने शाम लगभग साढ़े चार बजे अंतिम सांस ली।
1926 में सादिया मंेें जन्में कवि, संगीतकार, गायक, अभिनेता, पत्रकार, लेखक, निर्माता और स्वघोषित यायावर हजारिका ने असम की समृद्ध लोक संस्कृति को अपनी विलक्षण आवाज से दिल हूम हूम करे और ओ गंगा बहती हो में गीतों के माध्यम से पूरी दुनिया में पहुंचाया। उनके निधन के साथ ही देश ने संस्कृति के क्षेत्र की एक ऐसी शख्सियत खो दी है, जो ढाका से लेकर गुवाहाटी तक में एक समान लोकप्रिय थी। असम के लोकसंगीत की गंगा को अपने स्वरों से  हिंदी फिल्मों में  अपनी जादुई असर पैदा करने वाली आवाज से ब्रह्मपुत्र के कवि भूपेन हजारिका ने देष विदेष में अपने लाखों प्रशंसक बना लिये।
दादा साहब फाल्के पुरस्कार से सम्मानित श्री हजारिका ने प्राथमिक शिक्षा गुवाहाटी से, बीए बनारस हिंदू विश्वविद्यालय से और पीएचडी जनसंचार कोलंबिया विश्वविद्यालय से की। उन्हें शिकागो विश्वविद्यालय से फैलोशिप भी मिली। उनके गीत व संगीत में आदिवासी संगीत के पुट ंके साथ असमिया संगीत का गहरी छाप साफ देखने को मिलती वे भी खुल कर अपनी सफलता का श्रेय इसी प्रादेषिक संगीत को देते थे। ं उन्होंने कई बार इसका खुल कर उल्लेख भी किया वे कहते थे कि मैं लोकसंगीत सुनते हुए ही बड़ा हुआ और इसी के जादू के चलते मेरा गायन के प्रति रुझान पैदा हुआ। मुझे गायन कला मेरी मां से मिली है, जो मेरे लिए लोरियां गातीं थीं। मैंने अपनी मां की एक लोरी का इस्तेमाल फिल्म रुदाली में भी किया है। अपना पहला गाना विश्व निजॉय नोजवान 1939 में 12 साल की उम्र में गाया। असमी भाषा के अलावा हजारिका ने 1930 से 1990 के बीच कई बंगाली और हिंदी फिल्मों के लिए गीतकार, संगीतकार और गायक के तौर पर काम किया। उनकी लोकप्रिय हिंदी फिल्मों में लंबे समय की उनकी साथी कल्पना लाजमी के साथ की रुदाली, एक पल, दरमियां, दमन और क्यों शामिल हैं। हजारिका ने अपना अंतिम गीत फिल्म ‘गांधी टू हिटलर’के लिए गाया। इसमें उन्होंने महात्मा गांधी के पसंदीदा भजन ‘वैष्णव जन’ के लिए अपनी आवाज दी।
हजारिका को चमेली मेमसाब के संगीतकार के तौर पर 1976 में सर्वश्रेष्ठ संगीतकार का पुरस्कार दिया गया। इसके अलावा उन्हें अपनी फिल्मों शकुंतला, प्रतिध्वनि, और लोटीघोटी के लिए राष्ट्रपति पुरस्कार भी दिया गया। साल 1967 से 1972 के बीच असम विधानसभा के सदस्य रहे हजारिका को 1977 में पद्मश्री से नवाजा गया। भले ही भूपेन हजारिका आज सदेह हमारे बीच न रहे हों पर वे गजलों के सम्राट की गजलों की तरह ही दिल हूम हूम करे के स्वरों से लाखों संगीत प्रेमियों के जेहन में सदा अमर हो कर बने रहेंगे।

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