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Friday, November 18, 2011

काम्बली के बयान पर हायतौबा मचाना भारतीय पत्रकारिता का मानसिक दिवालियापन


-काम्बली के बयान पर हायतौबा मचाना भारतीय पत्रकारिता का मानसिक दिवालियापन
-देश की ज्वलंत मुद्दों पर शर्मनाक मौन रखने वाले  विदेशी व पैंसों वालों के खेल पर हायतौबा क्यों
लगता है खबरिया चैनलों के पास देश की तमाम ज्वलंत समस्याओं को देखने, समझने व दिखाने का कोई समय तक नहीं हे व नहीं सुध। जो उनको देश को तबाह कर रही मंहगाई, भ्रष्टाचार व आतंक जेसे ज्वलंत मुद्दो पर अपना दायित्व निभाने के बजाय 15 साल पुराने खेले गये विदेशी मूल के 15 साल पहले खेल क्रिकेट के एक अदने से मेच पर एक खिलाड़ी काम्बली के बयान पर इतना हाय तौबा मचा रहे है।  अगर कुछ सच था तो काम्बली क्या 15 साल से मच्छर मार रहे थे वे कुम्भकरण की तरह क्यों सोये हुए थे। अब क्या बिली ने छींक मारी या उनको किसी को बदनाम करने का सबसे अच्छा मोका अब मिला। अगर उनमें जरा सी भी नैतिकता रहती तो वे तुरंत 15 साल पहले ही उस मैच के बाद में अपना मूंह खोलते। नहीं तो 15 साल बाद बोल कर लोगों का समय नष्ट करने के लिए देश से माफी मांगते।
सबसे पहली बात यह है कि क्या देश में कभी इन क्रिकेट के लिए देशवासियों का समय बर्बाद करने के लिए जिम्मेदार इन दिशाहीन मीडिया ने कभी इसका एकांश भी देशी खेलों कुश्तियों, कब्बड़ी इत्यादि को इस विदेशी व मात्र पैंसे के लिए खेले जाने वाले इस खेल के लिए अपने तथाकथित खबरिया चैनलों के प्रसारण में दिया हो। क्रिकेट खेला ही पैंसों के लिए जाता है, देश के लिए तो संघर्ष या तो सैनिक, मजदूर, किसान व गरीब आम आदमी प्रायः करता है, धनिकों का तो प्रायः पूरी दुनिया मुट्ठी में होती है वे न तो मतदान करते परन्तु पूरा तंत्र उनकी सेवा व उनके लिए ही समर्पित रहता है। अगर मैच फिक्स नहीं हुआ तो यह आश्चर्य की बात हे। जिस देश में राजनेता से अधिकारी तक भ्रष्टाचार के गर्त में आकंठ फंसे हो उस देश व दुनिया में एक क्रिकेट में ऐसा हो गया हो तो इसमें आश्चर्य कैसा। यह कोई देश हित के लिए नहीं अपितु अपने निहित स्वार्थो के लिए धनिकों का चैचला है जिसमें देश के आम अवाम को इन खबरिया चैनलों ने अपने प्रसारणों के सहारे अफीम की सी लत लगा कर देश की श्रमशक्ति व ऊर्जा को बर्बाद कर देश के विकास की रही सही संभावनाओं को दफन कर दिया है। संसार के कोई वर्तमान मजबूत देश अमेरिका, रूस, चीन, जापान व जर्मनी, इस्राइल, फ्रांस आदि इस क्रिकेट को नहीं खेलते है। यही नहीं संसार के 5 प्रतिशत देश ही इस खेल को खेलते है और बेशर्मो की तरह डींग हांक कर कहा जाता है विश्व कप क्रिकेट। क्रिकेट कुल मिला कर प्रायः अंग्रेजों व उनके गुलामों का खेल है। परन्तु देश का दुर्भाग्य देखिये इस गुलामों के खेल के खिलाडियों को इन देशों में बेशर्मी से महानायक व देवता जैसे जुमलों से भी नवाजा जाता है। देश के इस नक्कारपन को अंगीकार कराने के लिए इन दिशाहीन समाचार पत्रों व खबरिया चैनलों का सबसे खतरनाक हाथ रहा। इनको अपनी इस भूल के लिए पूरे देश से माफी मांगते हुए अपने बनाये गये इस भष्मासुर को पुन्न चुहिया भव की तरह अपने दायित्व का निर्वहन करना चाहिए।

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