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Thursday, November 10, 2011

लोकपाल के संधान से मनमोहन सरकार ही नहीं अपितु टीम अण्णा भी हुई मर्माहित/


लोकपाल को ठगपाल बनाने में तुले हुए हैं भ्रष्टाचारी /
-लोकपाल के संधान से मनमोहन सरकार ही नहीं अपितु टीम अण्णा भी  हुई मर्माहित/
2011 में एक षब्द लोकपाल ने देष के जनमानस को पूरी तरह उद्देल्लित करके रखा हे। न केवल जन मानस को अपितु देष की पूरी  व्यवस्था को इस षब्द ने एक प्रकार से अपने आगोष में लिया  हे। इसी षब्द का मुकुट पहन कर राणेसिद्वी में रहने वाले समाजसेवी अण्णा हजारे पूरे विष्व के मानसपटल पर अण्णा नहीं आंधी है यह आज का गांधी  है के गगनभेदी नारों से महानायक की तरह स्थापित हो गया। संसार के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देष भारत की मनमोहनी सरकार ही नहीं  पूरी व्यवस्था को झकझोर कर रख दिया है। इस  षब्द के फांस के दंष से मनमोहन सिंह व उनकी सरकार बाहर निकलने के लिए जो भी हर संभव कोषिष कर रही है उससे ंअधिक वह इस में और अधिक उलझ कर फंस जाती है। कई लोकपाल नामक षब्द की उत्पति कब हुई पर इतना निष्चित है कि यह लोकपाल षब्द का अस्तित्व गणतंत्र के बाद में ही ंआया होगा। जहां  गणतंत्र यानी लोकतंत्र हो। भले ही आजादी को आधुनिक भारतीय इसे फिरंगियों से मिली आजादी के बाद के षाषन को लोकतंत्र या गणतंत्र समझ रहे हों परन्तु ंइतिहास के विद्यार्थी भली भांति समझते हैं कि भारत में प्राचीन  समय में गणतंत्र विद्यमान था। भारतीय संस्कृति के प्राचीन मंत्रों में भी गण ंनन्ता गण पतिं.....गंग हवा महे...जैसे मंत्र स्तुतियां है। वेसे भी लोकपाल नामक षब्द द्वारपाल के प्रति भी कई जगह किया जाता रहा। यही नहीं लोकपाल को  भगवान के स्वरूप को भी कहा जाता रहा। जो ंसारे लोकों का पालन करे उसे लोकपाल कहा जाता है। भगवान राम के छोटे भाई भगवान लक्ष्मण को भी लोकपाल के नाम से जाना जाता रहा। वेसे लोकपाल यानी लक्ष्मण को ंषेशनाग का अवतार भी माना जाता है। आज फिरंगियों से मिली देष की आजादी के बाद  स्थापित तंत्र को भारत में लोकंतंत्र के नाम से जाना जाता है। उसी तंत्र को पूरी तरह झकझोरने वाले लोकपाल षब्द को सबसे पहले संसद में प्रयोग एक सदस्य, लक्ष्मी मल सिंघवी ने 1963 में दिया गया था। शिकायत निवारण तंत्र के बारे में संसद में एक बहस के दौरान उन्होंने यह प्रस्तावना दिया था ।  अब 2011 में जब यह षब्द अण्णा हजारे के कंधे में सवार हो कर ेदेष में व्याप्त भ्रश्टाचार के मुक्तिदाता के नाम से छा गया तो देष की सत्ता में आसीन कांग्रेसी नेतृत्ववाली मनमोहनी सरकार को उबारने के लिए इस लोकपाल षब्द के  संसद में प्रथम प्रयोगकत्र्ता  लक्ष्मी मल सिंघवी के पुत्र डॉ. अभिषेक मनु सिंघवी जो कांग्रेसी नेता होने के साथ साथ वर्तमान में संसदीय स्थायी समिति  की  अध्यक्षता  में यह बिल ंप्रदेष में कानून बना  कर लागू करने के लिए  संसद की बाट जोह रहा है।  संसद में  देष  में व्याप्त भ्रश्टाचार पर अंकुष लगाने हेतु यह   लोकपाल बिल पहली बार 1968 में शांति भूषण द्वारा संसद में पेश किया गया था। इसके बाद 1969 में 4 लोकसभा पारित कर दिया,   लेकिन पहले यह राज्य सभा द्वारा पारित किया जाये उससे पहले लोक सभा भंग किया गया और बिल व्यपगत हुआ। बाद में इस बिल को पुनरावर्तित करके पुनः 1971 , 1977, 1985, 1989, 1996, 1998, 2001, 2005 और 2008 में पेश किये गए , लेकिन उनमें से कोई भी पारित कर दिया।  अब इस बिल को देष की संसद द्वारा किसी ंभी हाल में पारित करने के लिए अण्णा हजारे के नेतृत्व में जंतर मंतर ंसे रामलीला मैदान में  हुए ंऐतिहासिक जनांदोलन ने पहली बार पक्ष विपक्ष सहित  पूरे राजनैतिक दलों को कटघरे में खड़ा  करने का ऐतिहासिक काम किया है। आषा है कि इसी व्यापक जनदवाब के कारण सरकार देर न सबेर इस बिल को कानून बना ही देगी। हालांकि इस लोकपाल को जिस अण्णा हजारे ने जनलोकपाल के रूप में देष में बनाने के लिए व्यापक जनांदोलन किया। उसमें देष की पूरी व्यवस्था को दीमक की तरह चट करने वाले तथाकथित स्वयं सेवी संगठन जिन्हें गैर सरकारी संगठन यानी एनजीओ के नाम से जाना जाता है, को इस विधेयक से बाहर रख कर लोगों के नजरों में स्वयं को कटघरे में  ही खडा कर दिया है। वहीं टीम अण्णा के सदस्यों के कारण अण्णा हजारे उत्तराखण्ड के कमजोर लोकायुक्त का मुक्त कंठ से सराहना भी करके, कानून के जानकारों की नजरों में अपनी छवि ही धूमिल कर चूके है। ंपरन्तु इसके बाबजूद अण्णा हजारे की सरलता व राश्ट्र के प्रति निश्छल समर्पण से देष  के लोगों के दिल में ंटीम अण्णा के लोगों के लिए भले ही वह सम्मान न हों परन्तु अण्णा हजारे के लिए तो पूरा सम्मान है। ंअब ंसबसे बड़ा सवाल यह है कि अण्णा हजारे व उनके समर्थक कैसे पदलोलुपता व प्रभुता के मद से भ्रमित हो कर लोकषाही का चोला पहन कर थोकषाही ंके रूप में देष में स्थाति हो गये। भले ही अण्णा हजारे लाख दुहाई दें कि वे लोकतंत्र में विष्वंास रख्ंाते हैं परन्तु जंतर मंतर से रामलीला मैदान का इतिहास ही चीख चीख कर कह रहा है कि  अण्णा हजारे व उनकी टीम का व्यवहार चाहे आमरण अनषन के दौरान रहा या बाद में अधिनायकवादी रहा।
सवाल जहां ंजंतर मंतर परं आमरण ं अनषन का हो या रामलीला मैदान में हुआ आमरण अनषन। अण्णा सदैव अपने अनषनकारी साथियों से खुद को ंविषेश जताने के लिए  ऊंचे व अलग स्थान पर आसीन थे। जंतर मंतर से रामलीला मैदान तक पंहुचते पंहुचते यह दूरी कम होने के बजाय निरंतर बढ़ती रही। चंदे के हिसाब देने में हुई अनावष्यक देरी के कारण  इंडिया अगेंस्ट करप्पषन के कार्यकत्र्ताओं को केजरीवाल हिसाब दो व अण्णा हजारे टीम अण्णा से सावधान के नारे के साथ जंतर मंतर पर धरना देने के लिए विवष रहे। राजनैतिक कारण रहे हों या यही दवाब उसके बाद अण्णा हजारे की इस टीम ने अपने चंदे के हिसाब को सार्वजनिक कर ही दिया।  यहां पर आज बात विशयान्तर न जाये इसके लिए मै इस बात को फिर ंलोकपाल पर आता हॅू। हमारे षास्त्रों में  क्षेत्रपाल को भीं ईश्ट के रूप  में या  देवता के रूप में पूजा जाता  है। पर ंभारतीय लोकषाही में भ्रश्टाचार को रोकने के लिए व लोकपाल नामक षब्द के फेरे में फंस कर देष के न केवल प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह व उनकी कांग्रेस सरकार सहित तमाम राजनैतिक दल, नेता बेनकाब हुए अपितु इस आंदोलन को चलाने वाले बाबा रामदेव, आचार्य बालकृश्ण,  अण्णा हजारे, स्वामी अग्निवेष, अरविन्द केजरीवाल, किरण वेदीं सहित अनैक झण्डेबरंदार भीं स्वयं इसके भंवर की चप्पेट में आ कर व्यथित संा हो गये। सच में लोकपाल का सफरनंामा अपनी मंजिल तक पंहुचते पंहुचते बहुत ही रंोचक रहा। देखंना है यह कब  साकार होता है? साकार होने के बाद यह भ्रश्टाचारियों पर ग्रहण ंलगाता है या भ्रश्टाचारी इस पर ग्रहण ंलगाते है। जिस प्रकार से ंअण्णा हजारे व उनकी टीम ने भाजपा की उत्तराखण्ड सरकार द्वारा अभी हाल में बनाये गये अपंग लोकायुक्त की मुक्त कंठ से सराहना की, उससे यह अहसास होता है कि अगर इसी तरह का लोकायुक्त केन्द्र सरकार ने बना दिया तो अण्णा हजारे व उसकी टीम किस मुंह से विरोध करेगी? भाजपा तो कर ही नहीं पायेगी? फिर लगता है कि भ्रश्टाचार को अंकुष लगाने के लिए बडे ही जिद्दोजहद से बनाया गया लोकपाल कानून भी भ्रश्टाचार  के मगरमच्छो से निपटने में एक प्रकार से गैरअसरदार ही साबित होगा। फिर जनता किससे आषा करेगी। अण्णा को चाहिए कि वह जनता के उन पर अटूट विष्वास की रक्षा करते हुए अपनी टीम के मोह में फंस कर आंख बंद कर किसी का समर्थन या विरोध न करे, अपितु निश्पक्ष विषेशज्ञों की सलाह लेकर इस पर अपनी राय दे, क्योंकि देष की भ्रश्टाचार से त्रस्त जनता को आषा की एकमात्र किरण सी दिखााई दे रही है। अण्णा को चाहिए कि एक बात समझ लेनी चाहिए कि भ्रश्टाचार के व्यापक जनांदोलन में लोगों का विष्वास उन पर है न कि उनकी टीम पर। इसलिए उनको बहुत ही ंनिर्ममता से यह निर्णय लेना चाहिए कि वह किसी भी गलत का समर्थन नहीं करेंगे चाहे वह उनकी  टीम का सदस्य ही क्यों न हो। दलगत राजनीति से उपर उठ कर  निर्ममता से भ्रश्टाचार पर प्रहार करके ही अण्णा जनता के विष्वास को बरकरार रख पायेंगे । अगर उन्होंने हिसार, अपनी टीम के सदस्यों की ंछोटी भूलों पर पर्दा डालने व  उत्तराखण्ड सरकार द्वारा  विधायकं, मंत्री-मुख्यमंत्री को बचने का साफ रास्ता देने वाले कमजोर लोकायुक्त का समर्थन करने जैसे कार्य भविश्य में किया तो जनता ंउनंको अपने हृदय से हटा कर राणेसिद्वि में उतारने में तनिक सी भी देर नहीं करेगी।

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