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Wednesday, November 2, 2011

माॅ भारती के चरणों में ताउम्र समर्पित रहे भाषा आंदोलन के पुरोधा राजकरण सिंह


माॅ भारती के चरणों में ताउम्र समर्पित रहे भाषा आंदोलन के पुरोधा राजकरण सिंह
‘राजकरण जी का निधन हो गया’ रंविवार 30 अक्टूबर की दोपहरी में ंजैसे ही भाषा आंदोलन के साथी व दैनिक जागरण रूद्रपुर के प्रभारी रविन्द्र सिंह धामी का फोन आया तो मुझे सहसा विश्वास ही नहीं हुआ। विश्वास होता भी कैसे ं29 अक्टूबर की सांय 4 व 5 बजे की बीच मेरी राजकरण सिंह से दूरभाष पर बात हुई । वे दीपावली के त्यौहार अपने परिजनों से मिलने अपने गांव, विष्णुपुरा-बाराबंकी उंत्तर प्रदेश गये थे। 29 अक्टूबर को सायं 4 व 5ंबजे के बीच उनसे दूरभाष पर बात हुई वे उस समय पूरे स्वस्थ व किसी काम से लखनऊं जाने की  बात कह रहे थे,, श्री  रावत के अनुसार उनका 5-6 नवम्बर को दिल्ली सीता राम बाजार आर्य समाज के किसी पदाधिकारी के बेटे की शादी में सम्मलित होने के लिए आने की बात कह रहे थे।ंमुझे कह रहे थे आप ं6 नवम्बर तक 9 नवम्बर को उत्तराखण्ड  राज्य स्थापना के अवसर पर निकलने वाले  अंक की पूरा मेटर तैयार  रखना। इस अंक को प्रकाशित करने के लिए प्यारा उत्तराखण्ड के प्रबंध सम्पादक बडे भाई महेश चन्द्रा जी ने उनका विशेष अनुरोध किया था। महेश जी  जानते थे राजकरणसिंह जी मेरे अनन्य मित्र ही नहीं सुख दुख के साथी भी है। मेरे हर  कार्य में में मेरे बडे भांई व सहयोगी की तरह खडे रहते थे। मेरे ही नहीं मेरे परिवार के ंसाथ भीं उनका एक संरक्षक की तरह का रिश्ता रहा। महेश जी इस बात से बहुत चिन्तित थे कि मै  अखबार में बहुत ही  निर्ममता व बेबाक ढ़ग से अपनी बात रख रहा  हूॅ। जिसके कारण चाह कर भी महेश जी प्यारा उत्तराखण्ड समाचार पत्र को अन्य पत्रों की तरह मजबूत नहीं ंबना पा रहे है। ंवे कई बार मुझसे भी कहते छोटे भाई अखबार की भाषा मुलायम रखा। मै चाह कर भी अपने स्वभाव के कारण ऐसा नहीं कर पाता। तो महेश जी ने कई बार राजकरण सिंह जी से कहा आप ही देवसिंह को समझाओ, यह मानता नहीं, दुनियादारी नहीं समझता, जो कुछ नहीं थे वे कितने समृद्व व सफल बन गये । इसने अपना पूरा जीवन समाज के लिए ंबर्बाद कर दिया, फकीर का फकीर बना हुआ है, दुनिया मे उसी की इज्जत होती जो आर्थिक ंमजबूत है ,  आप देवसिंह केे सबसे करीब  हो, इसे सम झाओं, आप ही समझा सकते है। इसके बाद  राजकरण जी बार बार मुझे समझाते रहते। परन्तु मै उनकी सलाह के बाबजूद भीं वह नहीं  बन सकता जो भाई महेश व स्वयं राजकरण सिंह जी चाहते थे। महेश जी  व राजकरण सिंह  जी की इच्छा
थी   कि मै प्यारा उत्तराखण्ड को सरकारी  विज्ञापनों में पंजीकृत करूं। वे कहते रहते आप समझ क्यों नहीं रहे हैं जो 50 सौ प्रतियां छपा रहे है ं वे लाखों विज्ञापन कूट  रहे हैं। आप तो 19  साल से निरंतर प्रकाशित कर रहे हैं ंआखिर आप क्यों नहीं करा रहे हो विज्ञापन को पंजीकन। ंइसके लिए वे खुद ंकई बार दिल्ली  सचिवालय में ंनियमित प्रकाशन का पंजीकरण लेने तक गये। पर मै अपने विचारों की लक्ष्मण रेखा के नीचे ही ंबंधा रहा और ंअभी भी विज्ञापनों के लिए समाचार पत्र को पंजीयन नहीं करा पाया। संसद में भारतीय भाषाओं के लिए नारा लगाने के 21 अप्रेल 1989 के बाद में भारतीय भाषा आंदोलन से जुडा। वहां मेरी  भैंट राजकरण सिंह,ं पुष्पेन्द्र चैहान सहित अन्य साथियों के साथ हुई । उसी आंदोलन के ंदंौरान मैं उत्तराखण्ड र ाज्य गठन आंदोलन के लिए अपने आप को समर्पित करने का मन बना कर प्यारा उत्तराखण्ड समाचार पत्र का 1993  से प्रकाशन किया। राजकरण सिंह ंकें साथ मेरे दोे दशक के करीब का साथ रहा। ंभाषा आंदोलन के दौरान उनके तैवर,  संगठन प्रबंधन क्षमता, वैचारिक  ंप्रबुद्वता व ंसंहृदय को देख कर मैने उनको अपने बडे भाई व साथी के रूप में तब से आज तक पाया। यादें ंरह रह कर मुझे उद्देल्लित कर रही है। चाहे भाषा आंदोलन में जब वे जेल से  न्यायालय लाये गये तो न्यायाधीश के सम्मुख्ंा उनकी  सिंह  गर्जना, उप प्रधानमंत्री देवीलाल से जब हम दोनों उनके ंरंाष्ट्रपति भवन परिसर में मिले आवास में मिलने की घटना हो, ज्ञानी जैलसिंह, अटल बिहारी वाजपेयी आदि के संग धरने पर मुद्दंे पर समर्पण आदि सैकडों यादों का सहभागी रहा मैं  आज जान कर भी ंयह मानने के लिए तैयार नही हूॅ कि राजकरण सिंह जी यहां नहीं रहे। उनके निधन की  खबर  के बाद अपने बलाग ूूूण्तंूंजकमअेपदहीण्इसवहेचवजण्बवउ के द्वारा सेकडों प्रबुद्व जनों तक शोक समाचार  पंहुचाते  हुए उनकी तस्वीर मुझे भाव विभौर  करती। गांव जाने से  पहले दिन मैने व राजकरण सिंह ने भाई महेश जी के साथ सांय 7. 30 बजे मंडी हाउस के  बंगाली स्वीट में दोनों ने खाना खाया। उसके बाद महेश जी ने मुझे व राजकरण सिंह दोनों को दीपावली की मिठाई दी। अगले दिन वे गांव रेल से चले गये। ंपिछले रविवार  को ही मै  व इंजीनियर विनोद गौतम, राजकरण सिंह को मिलने उनके सीताराम बाजार स्थित आर्य समाज मंदिर  में मिलने गये। पहली बार वहां पंहुचा था मैं। विनोद गौतम के लिए भी वे बडे भाई के रूप में सदा उनके साथ खडे रहे।  वहां उन्होंने कहा कि उन्होंने अपना जो थोडा  बहुत सामान सब अलमारी में ंरख दिया है। ताकि उनके गांव जाने के दौरान इसं ंखाली कमरे में संस्था वाले किसी अतिथि को यह कमरा ंनिवास हेतु दे सके। बहुत सादगी भरा उनका जीवन, भारत माता के सच्चे सिपाई । उससे एक पखवाडे पहले ही मै , विनोद गौतम भाई राजकरण के साथ ओमप्रकाश हाथ पसारिया की माता जी के श्राद्व में सम्मलित होने गये थे।  ंइसी  पखवाडे ंमहेश जी व मै उनसे मजाक कर रहे थे कि अब  आपकी शादी कराते है? वे हंसने लगे बोले 57 साल का हो गया हॅू। अब इस दिशा में पहले की तरह  सोचा भी नहीं। माता जी स्वर्गवास होने के बाद  भी मै अपने  छोटे भाई के साथ रहता हॅू। वो पिता जी की तरह मेरा सम्मान व सेवा करता है। अपना शेष जीवन माॅं भारती की सेवा के लिए पहले की तरह अर्पित करना ही उनका ंउदेश्य रहा। जब मैं व राजकरण सिंह ंबाबा रामदेव के आन्दोलन में जाते  या अण्णा हजारे सहित देश के आंदोलन में जाते तो वे कहते मेरा मन करता कि एक बार फिर  29 दिन वाली ऐतिहासिक भूखहड़ताल करूं। वरिष्ठ पत्रकार बनारसीसिंह व भाई महेश जी के साथ मिल कर बातें करते करते चाय पीते पीते अनैक ज्वलन्त विषयों पर चर्चा करनंा हम  दोनों की दिनचर्या का एक अंग बन  गया था। आये दिन हम ंएक दूसरे से मिलते  रहते, अगर कारणवश मिले नहीं तो दूरभाष पर अवश्य बात होती। वे अपने अनुभवों को याद करते हुए ंकहते रहते अब तक छोटे लक्ष्य व सोच वाले लोगों ंका साथ इंसान को किसी भी हालत में नहीं करना चाहिए।वे अवसरवादी इन्सानों को पहचानने के बाद उनसे ंदूर ही रहते। वे भाषा आंदोलन  के साथियों के तो बडे भाई व संरक्ष्ंाक के रूप में थे पर अपने सभी परिचितों के साथ वे परिवार के एक जिम्मेदार सदस्य के रूप में ंसदा खडे रहते। चाहे विजय गुप्त जी के साथ हो या मेरे। हर ंकाम को वे बहुत ही ंईमानदारी व जिम्मेदारी से निभाते। ंवे सदा अहं को छोड़ कर निष्छल सेवा भाव से हर काम को मजिल तक अंजाम दे कर पूरा करने में विश्वास रखते। उनका व मेरा एक मित्र व एक भाई की तरह  अनन्य साथ कई वर्षो से निरंतर बना हुआ था। आज हर जगह हर मोड़ व हर अवसर  पर मुझे लगता है कि  राजकरण जी अभी आते तभी आते... .। मुझे इस बात का संतोष है व भगवान श्रीकृष्ण की अपार कृपा मान रहा हॅू कि राजकरण  सिंह जी की इस  सांसारिक यात्रा का समापन अपने गांव व हंसते ंखेलते बिना किसी को परेशानी में डाले अपने घर में ही गये। मैने सोचा भी नहीं था कि मुझे अपने मित्र को इतनी जल्द ही इस प्रकार से श्रद्वांजलि देनी पडेगी। जैसे मेने यह समाचार उसी दिन अपने बडे भाई महेश जी को दिया तो वे कुछ ही घंटों में तत्काल मेरे पास आये क्योंकि वे जानते थे राजकरण का विछोह  मेरे लिए असहनीय व है । ंबार बार आंखों में उमडते  आंसुओं कोे मानो वो ही धीरज देते हुए से प्रतीत होते कि इसी का नाम जीवन है। यह सोच कर की हर जीवन की यात्रा का यही मुकाम है,। उनकी यादे ही मेरे शेष जीवन पथ की धरोहर है।  मै उनकी पावन स्मृति को शतः शतः नमन् करता हॅू।

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