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Saturday, December 10, 2011

-लोकशाही के कुरूक्षेत्र राष्ट्रीय-धरना स्थल ‘जंतर मंतर’ पर फिर पधारने पर अण्णा का हार्दिक स्वागत


--लोकशाही के कुरूक्षेत्र राष्ट्रीय-धरना स्थल ‘जंतर मंतर’ पर फिर पधारने पर अण्णा का हार्दिक स्वागत/
-देश में केवल जंतर मंतर पर ही जीवंत है लोकशाही/
-लोकशाही के पुरोधाओं के लिए सबसे बड़ा तीर्थ है जंतर मंतर /

देश की लोकशाही को भ्रष्टाचार के शिकंजे से बचाने के लिए जनांदोलन का नेतृत्व कर रहे अण्णा हजारे का  दिल्ली के जंतर मंतर पर 11 दिसम्बर 2011 को स्वागत है। अण्णा हजारे भ्रष्टाचार के शिकंजे में दम तोड़ रही भारतीय व्यवस्था को बचाने के लिए सरकार से जनलोकपाल कानून बनाने की मांग को लेकर निरंतर कई महिनों से विश्व को झकझोरने वाला शांतिपूर्ण व्यापक जनांदोलन का नेतृत्व कर रहे है। इसी जंतर मंतर पर मैने भी अपने साथियों के साथ पृथक उत्तराखण्ड राज्य गठन के लिए निरंतर 6 साल (अगस्त 1994 से 16 अगस्त 2000) तक व्यापक सफल जनांदोलन एव धरना प्रदर्शन  किया था। देश के राज्य गठन के संघर्ष में उत्तराखण्ड राज्य गठन के लिए हमारे ‘उत्तराखण्ड जनता संघर्ष मोर्चा ’ के 6 साल के जंतर मंतर के का यह संघर्ष अब तक का संसद की चैखट राष्ट्रीय धरना स्थल जंतर मंतर दिल्ली में चलने वाला सवसे लम्बा एकलोता संघर्ष रहा।  इस लिए जंतर मंतर मेरे लिए ही नहीं देश की लोकशाही पर विश्वास करने वाले जनसंघर्षों के सिपाईयों के लिए भी सर्वोच्च पावन तीर्थ स्थल है। देश में जनता गांधीवाद ढ़ग से अपनी मांग को सुनवाने के लिए जब अपने क्षेत्र, जनपद, व प्रदेश में कहीं सुनवायी नहीं होती है तो जनहितों के लिए अंतिम संघर्ष करने के लिए सरकार व जनता उनकी मांगों की तरफ ध्यान देगी, इस आश के साथ यहां पर धरना प्रदर्शन, रेली, आमरण अनशन, क्रमिक अनशन आदि करते हैं।
द्वापर में कोरव पाण्डवों के बीच राज्य के बंटवारे का अंतिम फेसला करने के लिए हुए निर्णायक महाभारत युद्व का जंग-ए-मैदान हरियाणा का कुरूक्षेत्र रहा हो परन्तु कलयुग में संसार की सबसे बड़े लोकशाही भारत में लोकशाही की रक्षा करने के लिए जन महाभारत का कुरूक्षेत्र हरियाणा में नहीं अपितु देश की राजधानी दिल्ली में लोकशाही के सर्वोच्च मंदिर ‘संसद’ की चैखट  राष्ट्रीय
 धरना स्थल जंतर मंतर बन गया है। ईसा सन् 1710 में जयपुर के महाराजा सवाई जयसिंह द्वितीय ने  जंतर मंतर नामक यत्र को इस स्थान में स्थापित करते समय यह कल्पना भी नहीं की होगी कि उनके द्वारा स्थापित यह स्थल के समीप कभी संसार को झकझोरने वाले जनांदोलनों के लिए विख्यात रहेगा। देश की सरकार ने आजादी के समय 1948 में खगोलीय पिण्डों की जानकारी को जानने के लिए स्थापित महाराजा सवाई जयसिंह के इस जंतर मंतर यंत्र को राष्ट्रीय पुरातत्व धरोहर घोषित किया। दिल्ली में संसद के समीप इस यंत्र से  200 मीटर की दूरी पर यह धरना स्थल देश में लोकशाही का तीर्थ स्थल व देश का राष्ट्रीय धरना स्थल बन गया है।
भले ही द्वापर से लेकर कलयुग के लोकशाही के उदय से पहले राजा या समुह अपने हितों के लिए जब बात चीत से समाधान नहीं निकलता तो युद्व करके निर्णय करते थे। परन्तु आज लोकशाही में शांति पूर्ण तरीके से लोग धरना, बंद, जलूस, अनशन, प्रदर्शन या रेलियां आदि करके अपनी मांगो को सरकार के समक्ष रखते हैं।  फिरंगियों के जाने के बाद देश में लोकशाही स्थापित होने के बाद देश की सरकारें जब कोई देश का नागरिक संसद की चैखट राष्ट्रीय धरना स्थल जो पहले संसद व इण्डिया गेट के बीच में वोट क्लब के नाम से विख्यात रहा, अपनी मांगों को लेकर धरना, प्रदर्शन, अनशन या प्रदर्शन करता तो आजाद भारत की सरकारें उसकी मांग पर गंभीरता से विचार करती थी। इंदिरा गांधी के शासन तक यह प्रथा धीरे धीरे कम होती रही। इस प्रथा ने नरसिंह राव की सरकार के कार्यकाल व उसके बाद दम ही तोड़ दिया। वोट क्लब से राष्ट्रीय धरना स्थल मुरली मनोहर जोशी की अध्यक्षता वाली भाजपा के भारत बंद के वोट क्लब रेली के चलते यहां प्रतिबंध कर दिया गया। वोट क्लब पर चैधरी महेन्द्र सिंह टिकैत के नेतृत्व वाली किसान रेलियां, आदि करते है। अण्णा हजारे व उसकी टीम में कुछ कमियां भले ही हो परन्तु देश को भ्रष्टाचार की चंगुल से बचाने के लिए उनके समर्पण पर कोई प्रश्न नहीं उठा सकता है। हालांकि अण्णा ने अपने साथियों की कमजोरी का विरोध न करके तथा बिना पढ़े व समझे उत्तराखण्ड के मुख्यमंत्री द्वारा बेहद कमजोर लोकायुक्त की मुक्त कण्ठ से सराहना करके जनता के विश्वास को कमजोर करने का काम किया। परन्तु उनकी देश हित को समर्पण के देश के लोग आज भी कायल है।
देश के राष्ट्रीय धरना स्थल पर यहां पर अण्णा ही नहीं अण्णा की तरह देश के हित में काम करने वाले समाजसेवी यहां पर अपनी मांगों को लेकर आंदोलन करने आते है। लोकशाही का अदभूत नजारा व दर्शन यहां पर ही देखने को मिलता है। मैने अपने छह साल की जंतर मंतर पर लोकशाही की तपस्या के दौरान निरंतर इस विषय पर गंभीरता से विचार ही नहीं आत्मसात भी किया कि देश में लोकशाही पर विश्वास रखने वालों, छात्रों, समाजसेवियों, राजनेताओं, बुद्विजीवियों, समाजशास्त्रियों व पत्रकारों को अवश्य यहां पर गंभीरता से अध्यन करने के लिए आना चाहिए। देश की वर्तमान स्थिति को देखते हुए मेरा मानना है कि देश में अगर कहीं लोकतंत्र जींदा है तो वह केवल राष्ट्रीय धरना स्थल जंतर मंतर पर ही। हालांकि सरकार ने लोकशाही में जनसमस्याओं का तत्काल से समाधान करने के बजाय अब लोकशाही के इन वीरों को ही प्रताडित करना प्रारम्भ कर दिया हैं। विश्व की सबसे बड़ी लोकशाही का दम्भ भरने वाले भारत के हुक्मरानों के निकम्मेपन्न के कारण आज देश के इस सर्वोच्च धरना स्थल पर आने वाले देश के दूर दराज और कोने-कोने से आने वाले आंदोलनकारियों को यहां आ कर देश की व्यवस्था के जिस निरंकुश व मृतप्राय प्रवृति का सामना करना पड़ता है उससे उनका मन न केवल आक्रोशित हो जाता है अपितु अचम्भित भी रहते हैं कि आजादी के 64 साल बाद भी देश की सरकारों ने देश की जनता द्वारा देश के सवो्रच्च धरना स्थल पर आने वाले लोकशाही के पुरोधाओं की समस्याओं को सुनने तक का कोई अदना कर्मचारी तक नियुक्त नहीं किया है। देश के आंदोलनकारी लोग ठगे से रहते हैं कि देश के हुक्मरान न केवल गूंगे व बेहरे हैं अपितु वे देश की जनता से कहीं दूर दूर तक सरोकार तक नहीं रखते। यहां पर व्यवस्था के नाम पर संसद मार्ग पुलिस का यहां पर आंदोलन करने की अनुमति ले कर आंदोलन करने वालों का ज्ञापन सम्बंधित विभाग तक भेजने के लिए अपना वाहन व अधिकारी साथ देना मात्र है। देश की आम जनता के प्रति कितना निरंकुश रवैया यहां की सरकारों का है यह देखने के लिए लोगों को अपनी मांग को लेकर जंतर मंतर पर प्रदर्शन करने एक सप्ताह आना चाहिए। मेरा शौभाग्य रहा कि हमारी मांगे सरकार ने भगवान की कृपा की बदोलत या व्यापक जनदवाब व दलीय स्वार्थो के कारण पूरा कर दिया, नहीं तो मेने अपने कई आंदोलनकारी साथियों को दम तोड़ते या निराश हो कर लोटने या गुजरात की आंदोलनकारी पार्वती व उनके पति की तरह इसी जंतर मंतर के आस पास व्यथित हो कर मूक रहते हुए देख कर दिल में गहरी टीस लगती है। अण्णा हजारे के आंदोलन में जिस प्रकार से देश की मीडिया ने आगे बढ़ कर हाथों हाथ ही नहीं अपितु आंदोलन को आसमान पर ही उठा दिया जैसा व्यवहार देश की तथाकथित राष्ट्रीय मीडिया का नहीं रहा। हमारे आंदोलन के समापन के समय ही देश में इलेकट्रोनिक मीडिया का उदय हुआ । परन्तु आज सबसे शर्मनाक बात यह है कि देश की मीडिया भी इस लोकशाही के सर्वोच्च स्थल पर देश के कोने कोने से आये जनहितों को लेकर आंदोलन करने वालों की घोर ही नहीं शर्मनाक उपेक्षा करता है। इससे लोकशाही के इन सिपाहियों को मीडिया से विश्वास ही उठ जाता है। अण्णा के एक दिन 11 दिसम्बर 2011 के सांकेतिक उपवास धरने में सम्मलित होने के 12 घण्टे पहले में जंतर मंतर धरना स्थल पर गया तो वहां पर पहले से ही इलोक्ट्रोनिक मीडिया की बड़ी बड़ी वेनें व मीडिया कर्मी बड़ी संख्या में डट गये थे। जबकि प्रायः देखने में यह आता है कि यही मीडिया आंदोलनकारियों द्वारा आमंत्रण पत्र देने के बाबजूद उनकी तरफ झांकने भी समय पर नहीं आता। अण्णा के आंदोलन के लिए लगने वाले मंच के करीब तेलांगना राज्य के लिए आंध्र प्रदेश में पुलिस के डीसीपी पद से त्यागपत्र देने वाली नलिनी के तेलांगना पृथक राज्य गठन करने की मांग को लेकर 9 दिसम्बर से प्रारम्भ किये गये  आमरण अनशन को समर्थन करने के लिए मैं उनके मंच पर गया। तेलांगना की महान सुपुत्री नलिनी को अपना पूरा समर्थन देते व नमन् करते हुए मैं साढ़े छह बजे जंतर मंतर से अपने निवास पर आ गया। परन्तु देश में लोकशाही का कुरूक्षेत्र बन चूका राष्ट्रीय धरना स्थल जंतर मंतर देश के अन्य आंदोलनकारियों की तरह अण्णा हजारे का 11 दिसम्बर को स्वागत करने के लिए तत्पर है। केवल यही आश यह कुरूक्षेत्र रखता है कि अन्याय के समर्थन में मेरे  किसी सिपाई का सर न झुके।

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