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Tuesday, December 6, 2011

अपने लिये नहीं अपितु प्रदेश के लिए सोंचे राज्य आंदोलनकारी


-अपने लिये नहीं अपितु प्रदेश के लिए सोंचे राज्य आंदोलनकारी/
-जब घर में तबाही की ज्वाला धधक रही हो तो उस समय उस ज्वाला को समाप्त करने के लिए पानी की बाल्टी डालने के बजाय अपनी रोटी के लिए आंसू बहाना कोई बुद्विमता नहीं है। /
इस सप्ताह खबर आयी कि ऋषिकेश उत्तराखंड राज्य आंदोलनकारी संघर्ष समिति ने सरकार पर आंदोलनकारियों की उपेक्षा का आरोप लगाते हुए गत शुक्रवार से शहीद स्मारक में अनिश्चितकालीन धरना प्रदर्शन शुरू कर दिया है। आंदोलनकारी खपा थे कि सरकार उनकी मांगे नहीं मान रही है। उनकी सुध नहीं ले रही है। आंदोलनकारियों को सरकारी सुविधाएं दिए जाने की मांग को लेकर संयुक्त संघर्ष समिति द्वारा लगातार सरकार को अवगत कराया जा रहा था, लेकिन इस संबंध में कोई कार्रवाई न होता देख आंदोलनकारियों ने विरोध स्वरूप धरना प्रदर्शन शुरू कर दिया है।
इस खबर को पढ़ कर मेरे मन में सदा की तरह एक ही सवाल गूंजा कि क्या हमने अपने हकों के लिए या अपने सम्मान के लिए यह राज्य आंदोलन में भाग लिया था। मेरा तो मानना रहा है कि सरकार हमारा मान करे या अपमान, हमें उससे कोई शिकायत नहीं। शिकायत ही नहीं आश भी नहीं। मेरी तो हमेशा एक ही आश रहती हे कि सरकार प्रदेश के हितों की रक्षा करे। उन सपनों को साकार करे जिसके लिए मेरे जेसे हजारों आंदोलनकारी ने अपना सर्वस्व निछावर कर प्रदेश गठन के सपने को साकार किया था।
ऐसा नहीं कि ऐसी मांगे या आंदोलन केवल ऋषिकेश में ही की जा रही हो। ऐसी मांग प्रदेश में ही नहीं दिल्ली सहित हर उस स्थान के आंदोलनकारी शहर से की जा रही हे जहां लोगों ने उत्तराखण्ड राज्य गठन के लिए ऐतिहासिक आंदोलन किया था। आंदोलनकारी भी आम आदमी की तरह इन्सान ही तो हैं। उनके भी परिवार है, उनको भी ससम्मान जीने का हक है। उन्होंने ऐतिहासिक कार्य भी किया। एक आम आदमी या नेताओं की तरह उन्होने अपना घर परिवार के लिए धन या सम्पति जुटाने के बजाय पूरे प्रदेश व देश के विकास के लिए उत्तराखण्ड राज्य गठन के लिए अपना जीवन दाव पर लगाया था। इसी लिए प्रदेश का गठन करने के लिए तत्कालीन सरकारें मजबूर हुई थी। उनका सम्मान करना सरकारों का दायित्व भी हे। परन्तु आंदोलनकारी ऐसी मांग करे, यह मुझ जैसे अदने आंदोलनकारी के लिए कभी स्वीकार नहीं होगी। क्योंकि मेरा साफ मानना हे कि आंदोलनकारी अपने हितों से अधिक प्रदेश के उन जनांकांक्षाओं को साकार करने के लिए जुटना चाहिए जिसके लिए प्रदेश का गठन किया गया था। जिसके लिए हमारे साथियों ने अपनी शहादते दी थी। जिसके लिए हमने अपना जीवन इस पर कुर्वान कर दिया था। वह सपना आज भी अधूरा है। उस सपने पर प्रदेश के हुक्मरान ग्रहण लगा चूके है। राजधानी गैरसेंण हो या मुजफरनगरकाण्ड के अभियुक्तों को सजा दिलाने वाली बातें अभी नहीं पूरी हुई। परिसीमन से प्रदेश का भविष्य तबाह हो चूका है। प्रदेश के हुक्मरानों ने अपनी संकीर्ण सत्ता लाोलुपता के खातिर प्रदेश को जातिवाद व क्षेत्रवाद तथा भ्रष्टाचार के गर्त में धकेल कर प्रदेश के उन सपनों व आशाओं की निर्मम हत्या कर दी है जिसके लिए प्रदेश का गठन किया गया था। प्रदेश का दुर्भाग्य रहा कि यहा पर तिवारी जेसे उत्तराखण्ड विरोधी व खण्डूडी -निशंक जेसे अदूरदर्शी व तिकडमी नेता रहे। प्रदेश की जनता यहां पर हिमाचल के भाग्य विधाता रहे यशवंत सिंह परमार जैसे नेतृत्व की आज भी बाट जोह रही है। संसद की चैखट जंतर मंतर पर राज्य गठन के लिए मैने अपने साथियों के साथ जिस उत्तराखण्ड राज्य गठन के लिए ऐतिहासिक धरना प्रदर्शन रूपि तपस्या की। पुलिस की लाठियां, दमन, विरोधियों के षडयंत्र सह कर भी अपने लक्ष्य से नहीं भटके, । आज उस राज्य के गठन के बाद गत 11 सालों में यहां के हुक्मरानों ने जो दुर्दशा की उससे मन बहुत आहत है। हमारे साथियों ने अपनी वेदना प्रकट की, कई मुझसे दूरभाष पर भी अपनी वेदना प्रकट करते है। कई पत्रों से । पर मेरा साफ मानना है कि जब घर में तबाही की ज्वाला धधक रही हो तो उस समय उस ज्वाला को समाप्त करने के लिए पानी की बाल्टी डालने के बजाय अपनी रोटी के लिए आंसू बहाना कोई बुद्विमता नहीं है। हमारा पहला दायित्व है प्रदेश की जनांकांक्षाओं को साकार करना जिसके लिए राज्य गठन के बाद भी बाबा मोहन सिंह उत्तराखण्डी व भाई कठैत को अपनी शहादत देनी पड़ी।

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