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Thursday, December 1, 2011

भारतीय लोकशाही पर ग्रहण लगाता परिवारवाद

भारतीय लोकशाही पर ग्रहण लगाता परिवारवाद /
-नेहरू गांध्ी वंश पर परिवारवाद का आरोप लगाने वाले भी परिवारवाद फैलाने में बदतर /
मैं भी दशकों से एक ही तोता रटन लगाये हुए था कि भारत विश्व की सबसे बड़ी लोकशाही है। मुझे भी भ्रम था कि देश में लोकशाही विद्यमान हैं। परन्तु कुछ समय पहले देश के अग्रणी चिंतक व प्यारा उत्तराखण्ड के प्रबंध् सम्पादक ने प्रतिभाशाली युवा उद्यमी व भाजपा नेता डा विनोद बछेती व उत्तराखण्ड राज्य आंदोलन के प्रखर आंदोलनकारी अनिल पंत के साथ  एक बेठक में हंसी मजाक में कहा कि भई को तो चंद परिवारों द्वारा संचालित किया जा रहा है। मैने सोचा भाई साहब कहीं संघ परिवार या अमेरिका के नाटो परिवार या राजग-सप्रंग गठबंध्न की बात तो नहीं कर रहे है। पिफर थोड़ी देर अपने माथे पर जोर दे कर मैने सोचा कहीं भाई साहब गांध्ी-नेहरू परिवार की तो बात नहीं कर रहे है। मैं इसी उलझन में उलझा हुआ था कि उन्होने अपनी बात से रहस्य के पर्दों को खुद ही  पर्दा हटाते हुए कहा कि देखो इस देश में गांध्ी नेहरू परिवार के छह वयस्कों में से चार सांसद है। सोनिया, राहुल, मेनका व वरूण। दो वयस्क प्रियंका  व वढ़ेरा भी सांसद होते अगर वे जरा सी भी इस तरपफ चाहत रखते। वे अपनी खुशी से अभी सांसद न बनने का मन बनाने के कारण देश में सांसद नहीं है। नहीं तो क्या मजाल की वे संसद सदस्य नहीं होते। उनकी कृपा से अन्य दो भारतीयों को संसद में जाने का दुर्लभ अवसर मिल गया। नहीं तो प्रियंका व वढ़ेरा भी नेहरू परिवार के अन्य वयस्क सदस्यों की तरह देश की संसद के घोषित सदस्य होते। हालांकि संसद सदस्य न होते हुए भी उनका रूतवा आज भी देश के प्रधनमंत्राी से कम नहीं है। वे कुछ न होने के बाबजूद सबकुछ हैं नेहरू परिवार की अन्य सदस्यों की तरह देश के सम्मानित नेता हैं। देश की आम जनता ही नहीं देश के अध्किांश नेता भी उनको अपना नेता मान चूके हैं। यह उन दोनों का बढ़पन है कि दोनों ने सांसद बनना अपनी मर्जी से कहो या रणनीति से तहत स्वीकार नहीं किया है। नेहरू गांध्ी वंश की प्रमुख झण्डेबरदार सोनिया गांध्ी व राहुल गांध्ी जहां देश की सरकार के सरपरस्त है, तो वहीं गांध्ी नेहरू वंश के मेनका व वरूण गांध्ी मुख्य विपक्षी दल भाजपा के प्रमुख नेताओं में कमान संभाले हुए हैं। पक्ष व विपक्ष दोनों दलों में आज नेहरू गांध्ी परिवार का ही झण्डा पफहरा रहा है। उन्होंने चंद उदाहरण दिये। परन्तु घर आने के बाद मैने इस विषय पर पिफर सोचा तो मेरी आंखें पफटी की पफटी रह गयी। हालांकि इस मुद्दे पर मैने प्यारा उत्तराखण्ड में एक लम्बा लेख लिखा था।
इस देश में केवल ऐसा नहीं कि गांध्ी नेहरू परिवार के लोग ही सांसद है। वंशवाद के लिए कुछ दशक पहले गांध्ी नेहरू परिवार को पानी पी पी कर गाली देने वाले जनता पार्टी परिवार के विखरे कुनबे के क्षत्राप सपा के मुलायम सिंह यादव का परिवार का दूसरा नाम सपा है। वे व उनके सुपुत्रा ही नहीं उनके भाईयों ने भी संसद से लेकर विधनसभा में अपने परिवार का झण्डा बुलंद कर रखा है। इंदिरा गांध्ी को वंशवाद के कोसने वाले स्व. चरणसिंह के सुपुत्रा चै. अजित सिंह की अध्यक्षता वाली राष्ट्रीय लोकदल में उनके पुत्रा जयंत भी चैध्री वंश का झण्डा बुलंद किये हुए है। बसपा में अन्य जमीनी नेताओं के मुकाबले काशी राम ने मायावती को आगे किया। उप्र में जमीन से उखड चूकी कांग्रेस को पिफर से पेर जमाने के उद्देश्य से ही वरिष्ठ व समर्पित कांग्रेसियों को दरकिनारे करके समाजवादी पार्टी से जुड़ी रही  रीता बहुगुणा को भी उनके दिग्गज नेता रहे पिता स्व. हेमवती नन्दन बहुगुणा की अपार ख्याति की पफसल को काटने के लिए ही अध्यक्ष बनाया गया। वहीं स्व. बहुगुणा के नाम को भुनाने के खातिर उनके बड़े बेटे विजय बहुगुणा को कांग्रेस ने गढ़वाल से राजनीति में उतारा तथा शेखर को उप्र की राजनीति में।
 वहीं हरियाणा में तो कांग्रेस हो या अन्य विपक्षी दल सभी में परिवारवाद ही चल रहा है। चैध्री देवीलाल जो परिवारवाद पर इंदिरा गांध्ी को कोसते थे उन्होंने ने भी चोध्री चरणसिंह की तरह अपने दल में अपना उतराध्किारी अपने बेटे चोटाला को ही बनाया। चैटाला ने अपने दोनों बेटों अजय व अभय को अपना सेनापति बना कर अपने परिवार का झण्डा बुलंद कर रखा है। इस मामले में स्व. वंशी लाल भी पीछे नहीं रहे। जब हरियाणा के तीन लालों ने इस दिशा में अपने परिवार का झण्डा बुलंद किया तो हरियाणा का तीसरा प्रसि( लाल भजनलाल कैसे पीछे रहते। उन्होंने ने भी अपने हरियाणा विकास कांग्रेस की बागडोर अपने सुपुत्रा के हाथों में सौंप दी। सोनिया गांध्ी के आशीवार्द से हरियाणा के चार लालों के युग समाप्ति का शंखनाद करने वाले भूपेन्द्रसिंह हुड्डा ने भी अपने सुपुत्रा को सांसद बना कर अपने परिवार का झण्डा अन्य तीनों लालों की तरह बुलंद ही रखा है। हिमाचल में तो राजशाही ही दशकों तक चली, परन्तु राजशाही के प्रतीक वीरभद्र सिंह ने राजा होते हुए भी इसे बहुत ही लोकशाही के रंग में हिमाचल का विकास हिमाचल के शिल्पी समझे जाने वाले प्रथम मुख्यमंत्राी यशवंत सिंह परमार की तरह ही किया। जिसे लोकशाही की आड़ में नये शासक बने नेताओं को सबक लेना चाहिए। हालांकि राजा वीरभद्र ने भी अपनी रानी साहिबा को भी सांसद बनाया। भाजपा के वर्तमान मुख्यमंत्राी ध्ूमल ने तो अपने बेटे को आगे बढ़ा कर अपने परिवार का झण्डा भाजपा में भी बुलंद किया हुआ है। उन्हीं ध्ूमल के सांसद बेटे को भाजपा ने युवा मोर्चा की राष्ट्रीय कमान सौंपी है। 
    इसी तरह महाराष्ट्र में तो ठाकरेशाही इसी परिवारवाद के मोह मंें पफंस कर मजबूत पकड़ होने के बाबजूद अपनी आत्महत्या को उतारू है। भाजपा नेता प्रमोद महाजन के स्वर्गवास होने पर उनके परिवार को ही भाजपा ने आगे किया है। वहीं कांग्रेसी नेताओं ने तो बाजी ही मार रखी है। देशमुख हो या राणे, शिंदे हो या अन्य नेता सभी ने अपनी परिवार की डोर को आगे बढ़ाने का ही काम किया। वर्तमान मुख्यमंत्राी चव्हाण को तो मुख्यमंत्राी की कुर्सी उनके स्व. पिता चव्हाण की गांध्ी नेहरू परिवार की वपफादारी को देखते ही सोनिया गांध्ी ने प्रदान की। परिवारवाद के महाराष्ट्र में सबसे बड़े पोषक बन कर उभरे राकांपा के शरद पवार ने अपने भतीजे के बाद अब अपनी बेटी को संसद में भेज कर लोकशाही की आड़ में छुपाया अपना मुखौटा खुद ही बेनकाब कर दिया।
    तमिलनाडू में तो लोकशाही पर परिवारवाद ही इतना हावी है कि यहां लोग इससे आगे देखने के लिए भी तेयार नहीं हैं। द्रविण परिवार की राजनीति के बंटने के बाबजूद तमिलनाडू की सत्ता करूणानिध्ी व जयललिता के बीच ही हिलोरे लेती है। करूणानिध्ी के कुनबे का तमिलनाडू की राजनीति में ऐसा बर्चस्व है कि जिसकी कल्पना ही करना सहज नहीं है। सत्ता के सभी प्रमुख संस्थानों पर उनका शिकंजा है। करूणानिध्ी की दो तीन पत्नियों व उनके आध दर्जन बच्चों में अध्किांश महत्वपूर्ण पदों पर आसीन है। जो संसद से लेकर विधनसभा में करूणानिध्ी परिवार का झण्डा बुलंद कर रहे है। परन्तु वयोवृ( करूणानिध्ी के उत्तराध्किारी कौन होगा इसमें उनके मंझे हुए राजनेता साबित हो रहे स्टालिन व दूसरी पत्नी के बेटे के बीच बर्चस्व का विवाद चरम पर है। वहीं दूसरी तरपफ जयललिता भले ही अपने नायक के प्रति पूरी तरह से एकनिष्ट रही हो परन्तु उन पर अपनी सहेली के पुत्रा को आगे बढ़ाने का आरोप लगता ही रहता है।
इसके साथ आंध््र प्रदेश में कहना ही क्या। वहां पर लोकशाही पर परिवारवाद कितना हावी है इसका नजारा पूर्व मुख्यमंत्राी रेड्डी के पुत्रा जगनमोहन की प्रदेश के मुख्यमंत्राी पद पर आसीन होने की प्रबल इच्छा ने कांग्रेसी सरकार पर ग्रहण लगा दिया हे। कांग्रेसी ही नहीं तेलगू देशम के जनक एनटी रामाराव के दामाद चन्द्र बाबू नायडू के नेतृत्व में चल रहा दल वास्तव  में लोकशाही की नहीं परिवारशाही का ही प्रतीक हे।
उडीसा में बीजू पटनायक के सुपुत्रा वर्तमान मुख्यमंत्राी नवीन पटनायक एक प्रकार से लोकशाही के नहीं परिवारवाद के प्रतीक है। इसी तरह परिवारवाद की आग में यहां के पूर्व मुख्यमंत्राी गिरध्र गोमांग का परिवार ही बिखर गया। उन्होंने मुख्यमंत्राी की कुर्सी पर आसीन होने के खातिर अपनी संसदीय सीट बचाने के लिए अपनी पत्नी हेमा गोमांग को दिल्ली सांसद बना कर क्या भेजा, उससे उनका परिवार ही बिखर गया। उनकी पत्नी ने अगले चुनाव में उनके लिए अपनी सीट छोड़ने से ही मना कर दिया। इस कारण उनके परिवार में विखराव ही हो गया।
वहीं पंजाब में तो लोकशाही को रोंद रहे परिवारशाही की कहने ही क्या। अकाली प्रमुख प्रकाशसिंह बादल का परिवारवाद अकाली दल के विस्तार पर ग्रहण लगा चूका है। उनका बेटा व उनकी पुत्रा बध्ु भी राजनीति में उतर चूकी हे। संसद से विधनसभा में प्रकाशसिंह बादल का परिवारवाद ही अकाली दल के नाम पर लहरा रहा है। वहीं कांग्रेसियों के तो कहने ही क्या। महाराजा पटियाला के वंशज पूर्व मुख्यमंत्राी अमरिन्दर सिंह व उनकी पत्नी संसद से विधनसभा में अपने परिवार की पताका लहरा रहे है।
अविभाजित मध्य प्रदेश में कांग्रेस में शुक्ला बंध्ुओं के बाद अजित जोगी तथा अर्जुनसिंह , दिगविजय तथा अब मोती लाल वोरा के परिवार का परचम पफहरा रहा है। मध्य प्रदेश में भाजपाई भी इसी रंग में रगंने की हौड़ कर रहे है। भाजपा कांग्रेस में सिंध्यिा परिवार का झण्डा दोनों पार्टियों में बहुत ही शान से पफहराया जा रहा है।
दिल्ली में तो मुख्यमंत्राी शीला दीक्षित ने दिल्ली के जमीनी कांग्रेसी दिग्गजों का पत्ता काटवा कर जिस प्रकार से अपने बेटे संदीप दीक्षित को सांसद बनाया। भाजपा के कई नेता अपने बेटों को आगे बढ़ाते रहे। कांग्रेसी व भाजपाई नेता इसी होड़ में यहां जुटे हुए है।
    इस मामले में बिहार की बात न हो तो सब कुछ अध्ूरा ही रह जायेगा। पिछड़ों के नाम पर राजनीति करने वाले लालू का कुनबा कैसे पूरे विहार को डेढ़ दशक तक लोकशाही को रौंदता रहा। दलित की नाम की राजनीति करने वाले राम विलास पासवान ने भले ही लालू की तरह अपनी गांव की पत्नी को आगे नहीं किया, परन्तु उन्होंने अपने भाईयों को राजनीति में जरूर आगे बढ़ाया। नितीश व शरद यादव इसके अपवाद जरूर रहे। परन्तु समाजवादी नेता जार्ज ने भले ही अपने परिवार को राजनीति में आगे नहीं बढ़ाया परन्तु अपनी विशेष चहेती जया जेटली को सांसद ही नहीं अपितु अपने दल की अध्यक्षा तक बना दिया था। कांग्रेस ने भी दिग्गज कांग्रेसी नेता रहे बाबू जगजीवन राम के नाम की पफसल काटने के लिए उनकी सुपुत्राी मीरा कुमार को कांग्रेसी राजनीति का झण्डाबरदार बनाया। 
    पूर्वोत्तर के राज्यों में मेघालय में जिस प्रकार से पी के संगमा ने अपनी नव युवती बेटी अगाध संगमा को केन्द्रीय राज्य मंत्राी बनाने में सपफलता हासिल की। असम, त्रिपुरा, मणिपुर व सिक्कम की स्थिति कुछ अलग नहीं है। गुजरात में भले ही वर्तमान भाजपा मुख्यमंत्राी नरेन्द्र मोदी का शासन चल रहा है परन्तु कांग्रेसी नेताओं का यहां लोकशाही की आड़ में चल रहा परिवारवाद बेशर्मी से निरंतर बढ़ता ही जा रहा है। यही प्रवृति राजस्थान सहित अन्य प्रदेशों में देखने में मिल रही है। राजस्थान में भाजपा की पूर्व मुख्यमंत्राी वसुंध्रा राजे सिंध्यिा हो या जसवंत सिंह या विद्रोही कांग्रेसी नेता नटवर सिंह सभी परिवार के वंशवेल को आगे बढ़ाने में लगे हुए है। कश्मीर में तो शेख अब्दुला वंश का तीसरा मुख्यमंत्राी प्रदेश की वर्तमान में कमान संभाले हुए है। शेख अब्दुला, पफारूख अब्दुला के बाद अब उमर अब्दुला परिवार वाद का झण्डा लोकशाही में भी बहुत ही शान से पफहरा रहे है। वही मुफ्रती मोहम्मद सईद ने अपनी बेटी महबूबा मुफ्रती को अपने परिवार की कमान सौंपी हुई है।  वहीं राजवंश के अंतिम चिराग समझे जाने वाले राजा कर्णसिंह कांग्रेसी राजनीति में वनवास भोगने के लिए अभिशापित हो रहे है।
    वहीं नवोदित उत्तराखण्ड राज में सत्ता अध्किांश कांग्रेस के हाथों में रही। इनके नेताओं में परिवारवाद कूटकूट कर भरा हुआ है। गोविन्द बल्लभ पंत के बेटे कृष्णचंद पंत व पुत्रा बध्ु इला पंत दोनों ही कांग्रेस व भाजपा की नेता रहे। इन दिनों भाजपा में हैं। नारायणदत्त तिवारी भले ही अपने घोषित परिजनों को न लाये हों परन्तु अपनी चेहतों को सदैव आगे लाने में वे पीछे नहीं रहे। उत्तराखण्ड में जहां देशभक्त राजनेताओं के शिरोमणि वीर चन्द्रसिंह गढ़वाली जैसे महानायक रहे हों, जिन्होंने जवाहर लाल नेहरू द्वारा केन्द्रीय मंत्राी पद पर आसीन करने के तमाम प्रलोभनों को ठुकराते हुए कांग्रेस से नहीं जुडें हों।  यहां के कांग्रेसी नेताओं में जहां नेहरू जी के केन्द्रीय मंत्राी मंडल से समाज सेवा के लिए सक्रिय राजनीति से भी इस्तीपफा देने वाले शिक्षाविद भक्तदर्शन जी जैसे नेता रहे हों परन्तु अब के नेताओं में जिस प्रकार से मैं व मेरा परिवार तक ही सीमित दृष्टिकोण हो गयी उससे उत्तराखण्ड की लोकशाही  ने यहां के राजशाही के ध्वंशावशेषों को भी पछाड़ दिया है। विश्व में ध्र्म ध्वजा पफहराने वाले सिरमौर सतपाल महाराज जहां सांसद हैं वहीं उनकी ध्र्मपत्नी श्रीमती अमृता रावत प्रदेश में वर्तमान में विधयक रहने से पहले प्रदेश सरकार में राज्यमंत्राी के पद पर भी आसीन रही है। वहीं उत्तराखण्ड के सबसे दिग्गज नेता हरीश रावत जो स्वयं केन्द्रीय राज्यमंत्राी हैं उनकी ध्र्मपत्नी श्रीमती रेणु रावत भी अल्मोड़ा संसदीय क्षेत्रा से कांग्रेस की प्रत्याशी रह चूकी हैं। वे अपने समकालीन नेताओं को मात देते हुए अपने मंझोले बेटे आनन्द रावत को प्रदेश युवक कांग्रेस के अध्यक्ष पद पर आसीन करा चूके है। इसके साथ उनकी बेटी व बेटे भी आगामी विधनसभा चुनाव में विधयक प्रत्याशियों के रूप में चुनावी दंगल में उतर जायें तो किसी को आश्चर्य नहीं होगा। इसके साथ कांग्रेसी राजनीति में प्रदेश में क्षत्राप बने विजय बहुगुणा या भाजपा की राजनीति में क्षत्राप बने भुवनचंद खंडूडी आज भले ही नेता हों परन्तु इनको स्थापित करने में स्व. हेमवती नन्दन बहुगुणा के नाम का ही एकमात्रा सहारा रहा। पूर्व केन्द्रीय मंत्राी ब्रह्मदत्त के सुपुत्रा हों या जौनसार  क्षेत्रा के एकक्षत्रा दिग्गज नेता रहे स्व गुलाब सिंह के सुपुत्रा प्रीत्तम सिंह हो या अन्य,  अपने परिवार का ही झण्डा बुलंद किये हुए है। यही स्थिति जिला पंचायत से लेकर क्षेत्रापंचायत व ग्राम प्रधन की है। यहां पर भी परिवारवाद का की वंशवेल भारतीय लोकशाही को पूरी तरह से जकड़ चूकी है।
    परिवारवाद की राजशाही से बूरी तरह से जकड़ चूकी भारतीय लोकशाही के अस्तित्व पर आज प्रश्नचिन्ह लग गया है। अगर पहले के नेता भी नेहरू गांध्ी सहित इन परिवार के पोषकों की तरह अपने अपने परिवारों को बढ़ावा देते तो भारतीय राजनीति में  विशाल आकाश में मुलायम-लालू, शरद पासवान, पवार, बादल व अजित इत्यादि कहीं दूर-दूर तक भी नहीं देखने को मिलते।  सबसे खतरनाक बात यह हे कि इसी तरह की प्रवृति देश के अन्य महत्वपूर्ण संस्थानों में देखने को मिल रही है। इस देश के पूरे तंत्रा पर करीब 300 परिवारों का कब्जा है। किन्हीं परिवारों का शिक्षा जगत पर तो किन्हीं परिवारों का चिकित्सा जगत में, किसी परिवारों का उद्योग जगत में तो किन्हीं परिवारों का न्याय जगत तथा मीडिया-मनोरंजन पर कब्जा है।  अब तो इस देश में खेल जगत पर भी किन्हीं परिवारों का कब्जा है। यही नहीं नौकरशाही में भी कई परिवारों का बर्चस्व बना हुआ है। ध्र्म के क्षेत्रा में तो सदियों से वंशवाद का ही वर्चस्व रहा। यही नहीं इस देश में लोकशाही में भी शोषित भी पीढ़ी दर पीढ़ी शोषित होने का ध्र्म निभा रहे हैं। कुल मिला कर इस देश में लोकशाही का कहीं दूर-दूर तक नामोनिशान देखने को नहीं मिल रहा है। इस मैं और मेरे परिवारवाद की प्रवृति ने जहां देश की प्रतिभावान नेतृत्व से वंचित किया वहीं देश की लोकशाही पर ग्रहण भी लगा दिया। आज इनके समर्थक इनको प्राइवेट लिमिटेड कम्पनी की तर्ज पर बोस कह कर आपसी बातचीत में वयान करते है। जिन कार्यकत्ताओं की सांझी मेहनत व त्याग से वे इतने बड़े पद पर पंहुचे होते हैं, उस पद पर पंहुचने के बाद योग्य कार्यकत्र्ता को आगें बढ़ाने के बजाय जब कोई नेता अपने परिवार व अपने रिश्तेदारों को ही आगे बढ़ाये तो समझ लो नेता का पतन हो गया। देश मे ंचाहे कितना ही आरक्षण व संरक्षण दे दो। महिलाओं को मिल रहे आरक्षण के नाम पर अध्किांश दलों के बड़े नेता पार्टी की समर्पित योग्य महिला नेत्री को आगे करने के बजाय अपनी पत्नी, बेटी, पुत्राबध्ु, रिश्तेदार व सहेली इत्यादि को ही आगे करते है। यही स्थिति युवाओं को आगे करने के मामले में देखी जा रही है। नेताओं के बेटे, भाई, रिश्तेदार या चारण ही आगे बढ़ रहे है। प्रतिभावान व निष्टावान समर्पित कार्यकत्ताओं के हिस्से दरी बिछाना व नेताओं के नारे लगाना तक सीमित रह गया है। पफट्टे  हाल नेता आज चंद सालों में ध्नकुवैर बन गये है। कार्यकत्र्ता निरंतर बदहाली  की गर्त में ध्ंसता ही जा रहा है।

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