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Tuesday, December 20, 2011

-मुखोटे नहीं, मुख बने अण्णा हजारे

-मुखोटे नहीं, मुख बने अण्णा हजारे/
-मनमोहन सरकार की सत्तांधता व हटधर्मिता तोडने में सफल हुए अण्णा/

देश में जनविरोधी सरकारों के कुशासन के दंश  से मृतप्राय पड़ी देश की करोड़ों जनता को जनलोकपाल बनाओं आंदोलन से झकझोरने वाले गांधी के बाद देश के जननायक बनके उभरे अण्णा हजारे ने कांग्रेस गठबंधन की सप्रंग सरकार की हटधर्मिता व सत्तांधता को तोड़ने का  ऐतिहासिक कार्य करने के लिए उनको शतः शतः नमन्। महाराष्ट्र के एक सामान्य गांव राणेसिद्वी में रहने वाले भारतीय सेना के इस जांबाज पूर्व सेनिक ने न केवल अपने संकल्प व जुझारूपन से अपने गांव, क्षेत्र व प्रदेश के साथ साथ देश तथा विश्व को अपने को अचंम्भित कर दिया। इसके साथ देश की आम जनता के साथ देश के राजनेताओं व सरकार को लोकशाही का ऐसा पाठ पढ़ाया कि सरकार की सारी हटधर्मिता व सत्तांधता दूर हो गयी। ऐसे समय जब पूरी व्यवस्था भ्रष्टाचार के गर्त में दम तोड़ रही हो ऐसे समय में अण्णा हजारे के नेतृत्व में देश को भ्रष्टाचार से मुक्त करने के लिए जो जनलोकपाल बनाने का जनांदोलन चलाया उससे देश के हितों के प्रति लापरवाह बनी सरकार सहित तमाम राजनैतिक दलों की इस दिशा में सोचने व काम करने के लिए मजबूर कर दिया।  इसके लिए अण्णा हजारे व उनकी टीम को हार्दिक बधाई। हालांकि मेरा ही नहीं अधिकांश लोगों का मानना है कि केवल कानून बनाने से देश में व्याप्त भ्रष्टाचार पर समूल अंकुश नहीं लगेगा। परन्तु देश के आम अवाम की जो मानसिकता है कि भय बिन होय न प्रीत,, उससे देख कर यह लगता है कि यहां कानून का भी भय होना जरूरी है। नहीं तो मध्य प्रदेश के एक साधारण सा चपरासी व बाबू ने जिस प्रकार से करोड़ों रूपये की अकूत सम्पति अर्जित की थी , उसे देख कर आंखें जहां फट्टी की फट्टी रह गयी। 
देश में कडे कानून होने ही चाहिए। इससे अधिक देश में महत्वपूर्ण पदों पर आसीन लोगों का अपने पद के दायित्व का निर्वाह करने की ललक व दृढ़इच्छा होनी चाहिए। परन्तु देखने में यह आता है कि राजनैतिक दल अपनी संकीर्ण राजनैतिक स्वार्थो व दलीय हितों की पूर्ति के लिए संवैधानिक पदों पर ऐसे व्यक्तियों को आसीन करते हैं जो पद के दायित्व का ईमानदारी से निर्वाह करने के बजाय अपने राजनैतिक आकाओं व अपने संकीर्ण स्वार्थौ की पूर्ति करने में लगे रहते हे। इससे पूरी व्यवस्था जीर्ण हो जाती है। भारतीय व्यवस्था के महत्वपूर्ण संवैधानिक पदों पर ऐसे लोगों को आसीन किये जाने के कारण ही आज देश की स्थिति ऐसी दयनीय हो गयी हे। आज देश के नेताओं, नोकरशाहों व समाजसेवियों के पास ऐसी अकूत सम्पति है जिसका उनकी वैध आय से कहीं दूर दूर तक मेल नहीं खाता है।
इसी कारण न तो उनको देश के हितों की सुध रहती है व नहीं देश की आम जनता की। आज देश की आम जनता महंगाई, भ्रष्टाचार व आतंक से पूरी तरह से त्रस्त है। परन्तु सत्तासीन लोगों को इसके प्रति पूरी तरह से उदासीनता देश में अराजकता की गर्त में धकेलने वाला ही साबित हो रहा है।
ऐसे में हमारे देश की वर्तमान हालत में लोकपाल कानून बनने के बाद भी यकायक यह आशा करना कि भ्रष्टाचार पर अंकुश लगेगा। यह सोचना अपने आप में बेईमानी ही है। यहां पर जब तक लोगों के दिलों में देश हित से अधिक अपने निहित स्वार्थ अंधता अधिक रहेगी तब तक देश में भ्रष्टाचार पर अंकुश नहीं लग सकता। भ्रष्टाचार के मामले में सबसे चैकांने वाला उदाहरण दिल्ली में सरकारी विभाग में वर्षों से कार्यरत फर्जी हजारों कर्मचारी थे। जिनकों केवल हाजरी लगाने वाली मशीनों के लगने के कारण ही पकड़े गये व उजागर हो  पाया। यह देखा जा रहा है कि सर्वोच्च न्यायालय सहित उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों पर भी जिस प्रकार से भ्रष्टाचार के छींटे पड़ रहे हैं उसे देख कर लोकपाल व उसके सदस्यों का पाक साफ होने की संभावना बहुत कम है। वेसे भी देखने में यह आ रहा है कि अपराधों पर अंकुश लगाने के लिए खोले गये पुलिस के थानों के खुलने से उस क्षेत्र में अपराध कम होने के बजाय अपराधों का हकीकत में ग्राफ बढ़ जाता है, चाहे अपराधों को छुपाने से व्यवस्था उन पर नियंत्रण का दावे करे। परन्तु हकीकत में आज देश में जो व्यवस्धा जिस काम के लिए बनायी गयी है वह उस काम का ही तमाम करने में लगी हुई है।
देश की हालत इतनी दयनीय हो गयी हे कि देश के हुक्मरानों, व्यवस्था के कर्णधारों, नौकरशाहों व मीडियाकर्मियों को भी देश की आम जनता की बदहाली का भान तक नहीं हे। अगर किसी को मात्र भाषणों व लिखने लिखाने तक का भान हो परन्तु उनकी बदहाली को दूर करने के लिए देश को सही दिशा देने के लिए अपना दायित्व ईमानदारी से निर्वाह करने की कुब्बत व इच्छा
तक नहीं हे।
ऐसे विकट दशा में आज देश के अवाम में अण्णा हजारे एक आशा की किरण बन कर उभरे है। देश में हालांकि हजारों लोग देश को नई दिशा देने के लिए जुटे हुए हे। परन्तु ऐसे लोगों में बहुत कम है जिनका व्यक्तित्व व कृतित्व में अण्णा हजारे की तरह एक रूपता व सरलता है। वेसे भ्रष्टाचार के खिलाफ अण्णा हजारे से अधिक बाबा रामदेव ने देश में अपनी जनयात्राओं व भाषणों से जागृत करने की कोशिश की। परन्तु बाबा रामदेव की कथनी व करनी में काफी अंतर होने से लोगों में उनका प्रभाव अण्णा से कम नजर आ रहा है। बाबा रामदेव जहां देश में भ्रष्टाचार के खिलाफ व कालाधन के खिलाफ आंदोलन कर रहे हैं, वहीं वे अपनी अकूल सम्पति व बार बार भ्रामक बयानों से अपनी स्थिति को खुद ही कमजोर कर रहे है।  खासकर जिस प्रकार से बाबा रामदेव ने उत्तराखण्ड की भ्रष्ट भाजपा सरकार के खिलाफ मुंह खोलने की हिम्मत तक नहीं जुटायी तथा उसके बाद वे उत्तराखण्ड के उस मंत्री का नाम जग जाहिर करने में चूक गये जिस पर उन्होंने करोड़ रूपये घूस मांगने का आरोप लगाया था। इन दिनों ऐसा ही आरोप उन्होंने एक अनाम केन्द्रीय मंत्री पर उनको धन देने का प्रलोभन देने का आरोप लगा दिया। दिल्ली के रामलीला मैदान में घटित प्रकरण में सरकारी दमन के बाद बाबा रामदेव जिस प्रकार से  अपना आंदोलन चला रहे हैं उससे ऐसा लग रहा है कि अब उनका आंदोलन विदेश से काला धन भारत में लाना की आड में केवल कांग्रेस के खिलाफ प्रतिशोध के रूप में विरोध करने तक रह गया है। बाबा रामदेव ने भारतीय संस्कृति व देश की जनता को जागृति करने का महान कार्य किया परन्तु जिस प्रकार से वे अनुभवहिनता व अपार सम्पति के स्वामी होने कारण उसकी छाप अपने आंदोलन में नहीं छोड़ पाये जिसकी छाप अण्णा जैसे सम्पतिहिन, साधारण व बुजुर्ग आम समाजसेवी अपने चंद दिनों की भूख हडताल से छोड़ पाये। देश की जनता त्याग, सादगी व कथनी करनी में एक रूपता में समर्पित आम आदमी को भले ही महात्मा व महानायक का दर्जा दे सकती है परन्तु अकूत सम्पति के स्वामियों का दोहरा आचरण को कभी दिल से स्वीकार नहीं करते है।
आज देश की नैतिक स्थिति इतनी दयनीय है कि भ्रष्टाचार के खिलाफ जो अण्णा का जनांदोलन चलाने के अगुवा कई सदस्य है, उन  पर भी लोग शतः प्रतिशत ऐसा विश्वास नहीं कर पा रहे हैं जो विश्वास लोगों को आज अण्णा हजारे पर बना हुआ है।
देश का शौभाग्य है कि देश के पास ऐसे समय पर अण्णा जैसे महा नायक विद्यमान है जो अपना जीवन देश के लिए समर्पित करके देश की जनता को सही दिशा में समर्पित किया हुआ हो। देश की जनता आज उनको अपना आदर्श मानती हैं । ऐसे में अण्णा हजारे को चाहिए कि जो छोटी सी गलती करके बाबा रामदेव ने लोगों के दिलों से उतर गये , वह भूल अण्णा हजारे कम से कम न अपनाये। अण्णा हजारे ने भी अपने राष्ट्रीय पटल पर उभरने के कुछ महिनों में कर दी है उससे मुझे भय है उनकी स्थिति कहीं अपनत्व के मोह के कारण बाबा रामदेव की तरह न हो जाय। देश की जनता इस बात को आज भी पचा नहीं पा रही है कि क्यों अण्णा हजारे ने हवाई यात्रा बिल विवाद के घेरे मेे आयी किरण वेदी, अपने सरकारी विभाग की देनदारी के मामले में आये केजरीवाल तथा कश्मीर विवाद पर देश के हितों के प्रतिकूल बयान देने वाले प्रशांत भूषण पर एक सामान्य आदमी की तरह अपनी टीम के सदस्यों का पक्ष ले कर जनता के विश्वास पर कुठाराघात ही किया। ऐसा ही जनता के विश्वास को उन्होंने उत्तराखण्ड प्रदेश के कमजोर लोकायुक्त का खुलेआम समर्थन करके भी कमजोर किया। देश की जनता हैरान है कि अण्णा हजारे ने क्या सोच कर राजनैतिक मगरमच्छो को बचने की राह देने वाले लोकायुक्त विधेयक का समर्थन आखिर किस मजबूुरी से किया। एक दल से बंधे हुए नेता कोई ऐसा बयान देता तो जनता को कभी आश्चर्य नहीं होता परन्तु अण्णा हजारे जोखुद को देश के लिए समर्पित कर चूके हैं उनके द्वारा ऐसा समर्थन किया जाना देश की जनता के गले नहीं उतर रहा है। यही नहीं टीम अण्णा के सदस्य अरविन्द गौड भी एक अनौपचारिक वार्ता में मुझसे उत्तराखण्ड लोकायुक्त विधेयक के समर्थन करने पर पूरी तरह से सहमत नहीं थे। राणे सिद्वि गांव मे एक साल पहले अनशन के लिए दिल्ली आने वाले एक आम समाजसेवी अण्णा हजारे की मजबूरी टीम अण्णा हो सकती थी परन्तु आज देश के जननायक बने अण्णा हजारे की मजबूरी अब टीम अण्णा की बेशाखियों की लक्ष्मण रेखा में बंधने की कतई नहीं है। अण्णा हजारे को अपने विराट शक्ति का सम्मान हीं नहीं पहचान होनी चाहिए। देश की जनता आशा करती है कि उनमें गांधी जेसी इच्छाशक्ति व नैतिक बल हो कि वे अपनी टीम के सदस्यों की भी छोटी सी भूल के लिए भी उनको सुधार करने के लिए एक दिन का उपवास करने का आदेश सार्वजनिक दे सके। इससे जहां लोगों का विश्वास बढ़ता वहीं देश को सही दिशा मिलती। अण्णा हजारे द्वारा जिस प्रकार से एनजीओ को लोकपाल के दायरे रखने तक ही नैतिकता नहीं दिखाई उससे उन पर एनजीओ के शिकंजे में जकडे होने के आरोपों को ही हवा मिलती है। हालांकि अण्णा हजारे इसके बाबजूद देश के लिए सबसे बड़े जीवंत आदर्श के रूप में देश के जनमानस के हृदय में स्थापित हो चूके है। अब गैद सरकार के पाले में हे कि वह जल्द ही मजबूत लोकपाल बनाये। जिसमें एनजीओ, मीडिया, प्रधानमंत्री, नौकरशाह आदि हो। सरकार को चाहिए कि वह देश के जनमानष की भावनाओं का आदर करे। वहीं अण्णा को भी एक बात का ध्यान रखना चाहिए कि वे अपने आप को टीम अण्णा के ममत्व से उपर उठ कर निष्पक्ष रूप से देश की जनता को एक आदर्श स्थापित करने में अपना योगदान दें। नहीं तो इतिहास साक्षी है महान वीर, ज्ञानी व पुरोधा होने के बाबजूद भीष्म पितामह भी अनुकरणीय नहीं बन सके। अब फैसला अण्णा हजारे को करना है कि वे अपने व्यक्तित्व व देश की जनता की आशाओं में कहां तक खरे उतर पाते है। शेष श्रीकृष्ण कृपा। हरि ओम तत्सत्। श्री कृष्णाय् नमो।

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