अनशनास्त्र के संधान से हरीश रावत ने किया चार पालों को पस्त



अनशनास्त्र के संधान से हरीश रावत ने किया चार पालों को पस्त
ें किशोर के अनशन से हरीश रावत ने फिर मात दी अपने विरोधियों को
विधायक ने अपना 14 दिन पुराना अनशन समाप्त किया
देहरादून(प्याउ)। उत्तराखण्ड की राजनीति में अपने आंदोलनों व अनशन से आये दिन हलचल मचाने वाले कांग्रेसी विधायक किशोर उपाध्याय ने आखिरकार अपना 14 दिन से चला अनशन सोमवार 4 अप्रेल को मुख्यमंत्री के आश्वासन पर समाप्त कर दिया। इस अनशन से जहां टिहरी की राजनीति में एक प्रकार का उबाल सा आ गया था वहीं टिहरी में कई स्थानों में कांग्रेस व भाजपा सडकों में एक दूसरे के विरोध में उतर गये थे।इस अनशन से जहां प्रदेश कांग्रेस की राजनीति में भी हडकंप सा मचा दिया था। इस अनशन को भले ही सरसरी तौर पर लोग टिहरी के विकास के साथ जोड़ रहे हों पर इस इसमें टिहरी के विकास से अधिक प्रदेश में क्षत्रपों का आगामी विधानसभा चुनाव को देखते हुए मची बर्चस्व की जंग  भी है। इस अनशन से अब तक चार पालों के साथ जंग में पिछड़ रहे कांग्रेसी दिग्गज ने अपने सेनानायक किशोर उपाध्याय के अनशनास्त्र संघान से अपने विरोधियों को पस्त कर दिया है।
देहरादून के बीजापुर अतिथि गृह में 4 अप्रैल को मुख्यमंत्री निशंक ने उपाध्याय को जूस पिलाकर उनका अनशन तुड़वाया। निशंक ने उपाध्याय को आश्वस्त किया कि उनकी मांगों पर राज्य सरकार जल्द ही कार्यवाही करेगी और उपायाय द्वारा अपने विधानसभा क्षेत्र के विकास के लिए रखी गयी 25 मांगों को मान लिया जाएगा। माना जा रहा है कि मुख्यमंत्री ने आश्वासन दिया कि टिहरी के रानी चोरी क्षेत्र में एक कृषि विश्वविद्यालय या वानिकी वनौषधि संस्थान स्थापित किया जाएगा । इससे पहले  उपाध्याय से गत एक अप्रैल को कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी के विशेष दूत के रुप में राजस्थान के सांसद जितेन्द्र भंवर ने मुलाकात की थी। उपाध्याय पिछले 14 दिनों से आमरण अनशन पर बैठे हुए थे।
गौरतलब है कि राजनैतिक क्षेत्रों में किशोर उपाध्याय को कांग्रेसी दिग्गज व केन्द्रीय कृषि मंत्री हरीश रावत का खासमखास सिपाहे सलाहकार माना जाता है। परन्तु जिस प्रकार किशोर के धरने में हरीश रावत के घोर राजनैतिक विरोधी धुरी के दिग्गज नेता नारायणदत्त तिवारी ने भी समर्थन दे कर नये समीकरणों को हवा देने की पहल की वहीं इस अनशन को अपनी प्रतिष्ठा का प्रश्न बना कर इसको मुख्यमंत्री से गरीमामय ढ़ग से समापन कराने में टिहरी, देहरादून व दिल्ली की परिक्रमा करने में हरीश रावत ने भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा कर अपने विरोधियों को पछाड़ने सफल रहे। टिहरी की राजनीति में जहां किशोर ने अपने तमाम प्रतिद्वंदियों को पछाड़ते हुए अपने आप को टिहरी का सबसे बड़ा जननेता साबित कर दिया है जिसे अपने पद की नहीं अपितु जनहितों की राजनीति से लगाव है। इस मामले में किशोर ने टिहरी के सांसद विजय बहुगुणा सहित तमाम नेताओं को एक प्रकार से बोना सा साबित कर दिया है। वही प्रदेश की राजनीति में किशोर के अनशन के बहाने हरीश रावत, अपने विरोधियों को एक बार फिर मात देने में सफल रहे। भले ही यह अनशन टिहरी की 25 मांगों को लेकर था। परन्तु जिस प्रकार से प्रदेश विधानसभा चुनाव में इन दिनों कांग्रेसी राजनीति का धुव्रीकरण हरीश रावत के विरोध में चार पालों ने मजबूत चक्रव्यूह बना कर हरीश रावत को एक प्रकार से पुरी तरह से घेर लिया था, उसी चक्रव्यूह से बाहर निकलने के लिए हरीश रावत ने अब जिस राजनैतिक कुशलता व पराक्रम से अपने सेनानायक समझे जाने वाले किशोर उपाध्याय को आगे कर अनशनास्त्र का संधान किया उससे कांग्रेस में उनके चार पालों वाला मजबूत खेमा भी भौचंक्का सा रह गया है। कांग्रेसी चार पालों के नाम से विख्यात प्रदेश कांग्रेस की हरीश रावत विरोधी समझे जाने वाली वर्तमान प्रदेश कांग्रेस में हरीश रावत के इस अनशनास्त्र प्रहार से एक प्रकार से खलबली सी मची हुई है। चार पालों में प्रदेश राजनीति के प्रमुख क्षत्रप सतपाल महाराज, उनके खेमे के प्रमुख सेनानायक यानी प्रदेश कांग्रेस के वर्तमान अध्यक्ष यशपाल आर्य, नैनीताल के पूर्व सांसद महेन्द्रसिंह पाल के अलावा चोथे पाल के रूप में अब कांग्रेसी नेता प्रदेश युवक कांग्रेस के प्रदेश उपाध्यक्ष रहे व कभी हरीश रावत के खासमखास रहे राजपाल बिष्ट का नाम लिया जा रहा है। सुत्रों के अनुसार एक दशक से अधिक समय तक हरीश रावत की छाया की तरह रहने वाले वर्तमान में राहुल गांधी की युवा टीम के प्रमुख सदस्यों में से एक राजपाल सिंह बिष्ट को  अब प्रदेश की राजनीति में सतपाल महाराज व यशपाल खेमे के करीब समझा जा रहा है। राजपाल बिष्ट के हरीश रावत खेमे से दूर होने के कारण प्रदेश भर से उनके सम्पर्क में रहे तमाम युवा भी वर्तमान पाल ब्रिगेड़ से जुड़ गये है। सुत्रों के अनुसार कुछ समय से हरीश रावत खेमें में अपनी उपेक्षा से आहत हो कर प्रदेश के प्रमुख क्षत्रप सतपाल महाराज खेमें के करीब से चला गये हैं। देखना यह है कि अब विधानसभा चुनाव के मुहाने में खड़ी कांग्रेस की यह आपसी जंग 2011 में विधानसभा चुनाव फतह करने के केन्द्रीय कांग्रेस कमान की आशाओं में कहां तक खरी उतरती है। यह बात स्पष्ट है कि अगर आलाकमान ने इन क्षत्रपों पर अंकुश नहीं लगाया तो प्रदेश में गत विधानसभा चुनाव में जनादेश के न मिलने पर भी  भाजपा को फिर से प्रदेश की सत्ता में आसीन होने से नहीं रोका जा सकता है। वहीं कांग्रेस में मचे मैं मुख्यमंत्री मैं मुख्यमंत्री बनने के द्वंद देख कर प्रदेश की सत्ता में आसीन निशंक खेमें में काफी उत्साह बना हुआ है।



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