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Thursday, March 31, 2011

शांतिपूर्ण आंदोलनों की नहीं उग्र आंदोलनों की ही सुनती है सरकारे


शांतिपूर्ण आंदोलनों की नहीं उग्र आंदोलनों की ही सुनती है सरकारे
कूच बिहार व तेलांगना जेसे शांतिप्रिय आंदोलनों की शर्मनाक उपेक्षा से उभरे उग्र आंदोलन


भले ही सर्वोच्च न्यायालय देश में हो रहे उग्र आंदोलनों पर गहरी चिंता प्रकट कर सरकार से इनको रोकने के लिए कह रही हो। परन्तु इसके मूल में एक ही कारण है कि देश के हुक्मरान चाहे सरकारें किसी भी दल की हों वे शांतिपूर्ण आंदोलनों की निरंतर उपेक्षा कर रही हे। शांतिपूर्ण आंदोलनों की कैसे उपेक्षा होती है इसके जीते जागते उदाहरण तेलांगना राज्य गठन व कूच बिहार राज्य गठन जैसे आंदोलन है।  इसे देश में शांतिपूर्ण आंदोलनों की क्या दशा होती है या सरकारों का इस पर केसे अलौकतांत्रिक व गैरजिम्मेदाराना रवैया रहता है, इसके लिए कहीं दूर जाने की जरूरत नहीं, यह सर्वोच्च न्न्यायालय से एक किमी दूरी पर व संसद की चैखट पर स्थित राष्ट्रीय धरना स्थल जंतर मंतर पर आ कर देख सकते है। यहां पर देश के तमाम आंदोलनकारी जब अपने क्षेत्र व स्थानीय राज्य सरकार से न्याय न मिलने के बाद यहां पर देश के हुक्मरानों से न्याय की आश ले कर यहां पर आते हैं तो उनको यहां आ कर पता चलता है कि इस देश में गांधीवादी आंदोलनों को कोई जगह ही नहीं है। जिस देश की आजादी के लिए गांधी जी के नेतृत्व में अनैकों आमरण अनशन व निरंतर धरना प्रदर्शनों के लिए कोई जगह ही नहीं है। राष्ट्रीय धरना स्थल पर आकर जब देश के न्याय व सामाजिक न्याय के फरियादियों को सांय पांच बजे जब उनको वहां से पुलसिया धमकियो व जलालत के बाद अपमानित करके खदेड़ दिया जाता हैं। वहीं दूसरी तरफ सरकारें हिंसक आंदोलनकारियों के आगे दण्डवत नमन करती रहती है। चाहे उग्र आंदोलन कश्मीर का हो या पूर्वोतर का। देश में  आक्रमक आंदोलनकारियों के आगे सरकार मनोगुहार करती नजर आती है। यहां पर गुजर व जाट आंदोलन इसके जीते जागते सबूत है। किस तरह से देश की राजधानी से लेकर देश की प्राणवायु समझी जाने वाली रेलमार्ग उजाडे व अवरोध किये जाते है। किस प्रकार से संसद पर हमला करने वालों को सरकारें किन्तु परन्तु के नाम पर संरक्षण दे रही है। इन सबसे लोगों का विश्वास शांतिपूर्ण आंदोलनों से उठ जाता हैं तथा लोगों में यह धारणा बन जाती है कि यहां पर उग्र आंदोलन की ही आवाज सरकारें सुनती हे। कम से कम  राष्ट्रीय धरना स्थल पर हजारों की संख्या में शांतिपूर्ण आंदोलन कर रहे कूच बिहार के शांतिप्रिय आंदोलनकारियों को देख कर तो यही लगता। इस आंदोलन की उपेक्षा सरकारें किस तरह से कर रही है। सरकार ही नहीं देश की तथाकथित मीडिया  की नजरों में ऐसे शांतिप्रिय आंदोलनों की कोई इज्जत नहीं है। देश के प्रमुख अखबारों ने सोमवार 28 मार्च को हजारों में कूच बिहार के गणवेश धारियों के मौन जलूस-धरना उपेक्षा को एक पंक्ति का स्थान न दे कर कम से कम यही साबित कर दिया है कि सरकार ही नहीं देश की मीडिया भी आज शांतिप्रिय आंदोलनकारियों की उपेक्षा करती हे। इसी कारण देश में हिंसक व उग्र आंदोलन करने के लिए लोग विवश हो जाते है। आंदोलनों के दौरान रेल और सड़क यातायात बाधित करने और सार्वजनिक संपत्ति नष्ट करने पर 28 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने गहरी चिंता और नाराजगी जताई। इतना ही नहीं, कोर्ट ने हरियाणा सरकार से पूछा है कि रेलवे को हुए नुकसान की भरपाई क्यों न उससे कराई जाए? न्यायाधीश जी. एस. सिंघवी व ए.के. गांगुली की पीठ ने सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाने और रेलवे ट्रैक बाधित करने के मामले में सख्त टिप्पणियां कीं। ज्ञात हो कि हरियाणा में मिर्चपुर कांड के आरोपियों के खिलाफ कार्यवाही के विरोध में उच्च जाति के लोगों ने आंदोलन किया था जिसमें 11 दिनों तक रेल ट्रैक बाधित रहा था। इससे रेलवे को करीब 34 करोड़ का नुकसान हुआ था। पीठ इस आंदोलन से हुए नुकसान और सरकार की जवाबदेही के मुद्दे पर विचार कर रही है।
पीठ ने कहा कि ऐसी परिस्थिति में कानून-व्यवस्था बनाए रखने की जिम्मेदारी राज्य सरकारों की है और इसमें विफल रहने पर उनकी जवाबदेही बनती है। कोर्ट ने कहा कि इस तरह सार्वजनिक संपत्ति नष्ट नहीं की जा सकती और न ट्रेनें रोकी जा सकती हैं। जो ऐसा करते हैं उनके खिलाफ कानूनी कार्रवाई होनी चाहिए क्योंकि वे अराजकता फैला रहे हैं। कोर्ट ने कहा कि अधिकार की बात तो दूसरे नंबर पर आती है पहले नंबर पर तो कर्तव्य आता है।
जब कोर्ट ने हरियाणा सरकार से रेलवे को हुए नुकसान की भरपाई करने को कहा तो राज्य सरकार की दलील थी कि यह तो प्रदर्शनकारियों से वसूला जाना चाहिए। पीठ ने कहा कि प्रदर्शनकारियों को कानून के समक्ष लाकर उन पर मामला चलाना राज्य की जिम्मेदारी है। या तो राज्य प्रदर्शन कारियों से पैसा वसूले या खुद कुछ भरपाई करे। राज्य सरकार ने फिलहाल इस मुद्दे पर जवाब देने के लिए कोर्ट से समय मांग लिया है।
इस समस्या का स्थाई निदान यही है कि यहां सरकार का कोई अपना उतरदायित्व ही समझ में नहीं आ रहा है। देश के लोगों को शांतिप्रिय आंदोलनकारियों को तो 12 घण्टे में राष्ट्रीय धरना स्थल जंतर मंतर से खदेड़ दिया जाता परन्तु उग्रआंदोलनकारियों  के प्रति सरकारें व पुलिस प्रशासन कैसे हाथ पर हाथ बैठी रहती है यह सरकार पर सर्वोच्च न्यायालय की टिप्पणी से ही उजागर हो जाती है। इसी जंतर मंतर पर जब जाट आंदोलनकारी आये तो उनके लिए पुलिस प्रशासन ने सांय 5 बजे के बाद भी आंदोलन जारी रखने की इजाजत दे दी परन्तु अन्य शांतिप्रिय आंदोलनकारियों को यहां से खदेड़ दिया जाता हे। देश की सुरक्षा के लिए सीमान्त प्रदेश उत्तराखण्ड के बागेश्वर में टनकपुर से रेल लाइनें बिछाने की मांग करने वाले सैकड़ों किमी दूर से आने वाले चार दर्जन से अधिक आंदोलनकारियों को तो पुलिस ने वहां से 12 घंटे बाद खदेड़ने के लिए विवश कर दिया ।ये आंदोलनकारी मजबूरी में हजारों रूपये खर्च करके रात को पहाड़ गंज के होटलों में रहे। यह देश में लोकतंत्र की हालत है। आम जनता के लिए इस देश में सुविधायें तो रही दूर फरियाद करने की इजाजत तक सम्मानजनक तक नहीं है। वहीं ंउग्र आंदोनलनकारियों के आगे सरकारें दण्डवत हो जाती है। इसी से देश में उग्र आंदोलन फल फूल रहे है।

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