Pages

Tuesday, March 15, 2011

कैसे गाऊं होली के गीत


चारों तरफ तबाही देख, रोता हैं न जाने क्यों मन

प्रभु की कृपा देख कर भी, बर्बादी पर रोता मेरा मन

हंसती खेलती दुनिया को तबाह होते देख रोता है मन

क्यों बना कर मिटा रहे हैं यही सोच कर रोता है मन 

तेरी माया तुही जाने दुस्वप्न से भी सहमा है मेरा मन

तबाही भारत में हो या जापान में बिलखता है मेरा मन

कैसे तुझको समझाऊं साथी विध्वंष से तड़फता है मन

कैसे गांऊ गीत मिलन के, अब नाचे कैसे मेरा तन मन

कैसे होली के गीत गाऊं अब कैसे बर्बादी में गाये मन।

(देवसिंह रावत-15मार्च 2011 रात 10.29)


2 comments: