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Saturday, August 4, 2012


मूसलाधार वर्षा से काफर बांध टूटने ने लगा उत्तराखण्ड में बांध बनाने पर प्रश्न चिन्ह

उत्तराखण्ड में शुक्रवार से शनिवार तक हुई विनाशकारी मूसलाधार वर्षा से जनपद चमोली में धौलीगंगा पर एनटीपीसी द्वारा तपोवन में बनायी गयी विष्णु गाड़ बिजली परियोजना का काफर बांध टूटने से प्रदेश में बने व बनाये जाने वाले सभी बांधों पर ही प्रश्नचिन्ह लगा दिया है। वहीं इस 24 घण्टो ंसे अधिक समय तक हुई भारी वर्षा व बादल फटने से  उत्तरकाशी के असी गंगा क्षेत्र में 26 लोगों के मारे जाने व 100 से ज्यादा लोगों के लापता होने के साथ सेकडों मकान, अनैक पुलादि के बहने सहित करीब 600 करोड़ रूपये से अधिक की सम्पति का भारी नुकसान हो गया है। इस मूसलाधार वर्षा से प्रदेश की तमाम बिजला परियोजनाओं में एक प्रकार से बिजली का उत्पादन ही ठप्प हो गया। क्योंकि मूसलाधार वर्षा से नदियों में भारी मात्रा में पेड़, मिट्टी व पत्थर बहकर आने से उत्पादन पर गहरा संकट खड़ा हो गया। क्योंकि इतनी ज्याद सिल्ट आने से इस स्थिति में बिजली उत्पादन नहीं किया जा सकता। इस पर प्रदेश के जल विद्युत निगम ने इस पर अपनी लाचारी प्रकट करते हुए कहा कि प्रदेश में बिजली की मांग 33 मिलियन यूनिट है, राज्य में उत्पादन पूरी तरह ठप होने पर केंद्रीय पूल से मिल रही मात्र 10 मिलियन यूनिट बिजली से ही काम चलाया जा रहा है।इससे पूरे प्रदेश में बिजली में भारी कटोती करनी पड़ रही है।
 इस वर्षा में प्रदेश भर में हुए 700 करोड़ रूपये से अधिक के नुकसान से अधिक जो खतरनाक हादशा काफर बांध टूटने से हुआ। उससे भले ही जानमाल का नुकसान न हो परन्तु प्रदेश में बने व बनाये जाने वाले सभी बांधों पर ही प्रश्नचिन्ह लगा दिया है। सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब ये बांध मात्र 12 घण्टे की वर्षा से ही ढह रहे हैं तो सरकार के अनुसार भूकम्प व प्राकृतिक आपदाओं के लिए सबसे संवेदनशील इस हिमालयी राज्य उत्तराखण्ड में इस प्रकार के बांध बना कर सरकार यहां के पर्यावरण, जल संसाधन, जानमाल से क्यों खिलवाड़ करने को तुली हुई है। जबकि इनमें सिल्ट भरने से उत्पादन प्रभावित होता है। अधिकांश तमाम परियोजनायें अपने घोषित क्षमता से कहीं कम बिजली उत्पादन इसी कारण कर रही है। इस सिल्ट भरने से इनकी न केवल उत्पादन क्षमता अपितु इनकी उम्र भी कम होती है। हिमालयी क्षेत्र में नदियों के तीब्र वेग व भारी मात्रा में सिल्ट के आने के कारण ये बांध देश व प्रदेश के लिए सफेद हाथी ही साबित होते है। क्योंकि इन बांधों के निर्माण में हजारों करोड़ का संसाधन लुटाया जाता है जो कि केवल यहां की सरकारें व नौकरशाही मोटी कमीशन की लालच में सिल्ट व सुरक्षा मापदण्डों का खुली तरह से नजरांदाज करके करते है।
 मध्य हिमालय का यह क्षेत्र की पर्वत श्रंखला हिमालय की अन्य पर्वत श्रृखलाओं ने नयी व काफी कमजोर भी है। इस क्षेत्र में इस प्रकार के निर्माण पर वेसे भी पर्यावरणविद पहले ही प्रश्न लगाते है। वहीं प्रदेश की सरकार व उसके इशारे पर गठित राजधानी चयन आयोग जहां गैरसैंण जैसे स्थान पर जनता की भारी मांग पर भी राजधानी बनाने के लिए तो इस क्षेत्र को भूकम्पीय संवेदनशील क्षेत्र में होने से भावी ताबाही की आशंका से प्रश्न चिन्ह लगा दिया है वहीं प्रदेश की अधिकांश सरकारें इस प्रकार की तमाम भूकम्पीय व पर्यावरणीय चेतावनियों के साथ भारी जनविरोध के बाबजूद प्रदेश में सेकडों बांध बना कर संसार के सबसे रहस्यमय, प्राकृतिक संसाधनों व सौन्दर्य से भरपूर करोड़ों लोगों के आस्था के पावन मोक्षधाम  उत्तराखण्ड को जल विद्युत ऊर्जा के उत्पादन के नाम पर जलसमाधी दे कर तबाह करने में तुले है। देश की सुरक्षा की दृष्टि से इस भूकम्पीय अति प्राकृतिक प्रकोपों से प्रभावित  रहने वाले सीमान्त हिमालयी क्षेत्र में इस प्रकार के बांध बनाये जाना वेसे भी आत्मघाती कदम ही माना जा सकता है। क्योंकि एक तरफ प्राकृतिक त्रासदियों का यहां हर साल प्रचण्ड प्रकोप रहता है वहीं दूसरी तरह चीन की सीमा में इस प्रकार के निर्माण विनाशकारी साबित हो सकते है। क्योंकि यहां पर जिस विनाशकारी तरीके से पहाडों में डायनामाइटों से इस पर्वतों की छाती का भेदन करके मीलों लम्बी सुरंगों व मार्ग आदि निर्माण के काम में खतरनाक तरीके से किये गये हैं, उनसे इन पहाडों की एक प्रकार से चूलें पूरी हिल गयी है।  उससे इन बांधों की सुरक्षा के साथ साथ इस पूरे क्षेत्र की सुरक्षा पर बहुत बड़ा खतरा मंडराने लगा है।
वैसे तो भारत के हर शहर चीन के परमाणु मिस्राइलों की मारक क्षमता के अन्दर हैं परन्तु यह सीमान्त क्षेत्र में सीमा पर डटी चीनी फौज के लिए बहुत ही आसान व निकट भारत में तबाही मचाने वाले तारगेट है। इसके अलावा जिस प्रकार से भ्रष्टाचार के कारण इन बांधों सहित तमाम परियोजनाओं , पुलों व सड़कों आदि में मानकों की घोर उपेक्षा करके के निर्माण किया जा रहा है उससे इनके किसी भी समय इस प्रकार के प्राकृतिक आपदाओं में ढहने व जमीदोज होने का खतरा हर समय मंडराने लगता है। इन सबके होने के बाबजूद प्रदेश के हुक्मरान प्रदेश व देश की सुरक्षा पर आंखे मूद कर बने हुए बांधों से होने वाले विनाशकारी तबाही को रोकने व उसकी सुरक्षा में ठोस कार्य करने के बजाय प्रदेश में जल विद्युत परियोजनाओं में ऊर्जा उत्पादन के नाम पर सकडों बांध बनाने की आत्मघाती कृत्यों को करने की हट लगाये हुए है।
अपने निहित स्वार्थ व करोड़ों की कमीशन मिलने के लालच में प्रदेश के हितों को दाव पर लगाने के लिए तुले इन हुक्मरानों व बांध के समर्थकों को इस बात का अहसास तक नहीं है कि कभी ऐसी दुर्घटना से टिहरी सहित ये बांध अगर काफर बांध की तरह ढह गये तो उससे कितनी विनाशकारी तबाही पूरे उत्तर भारत में मचेगी। उससे जो पर्यावरण को जो नुकसान हो रहा है उसकी कल्पना करने की फुर्सत इन अपने स्वार्थ में अंधे लोगों को है ही नहीं। चमोली में भी दो बच्चे मकान ढहने व एक बच्चा गदेरे में बहने में मारे गये है।
वहीं दूसरी तरफ उत्तरकाशी की गंगाघाटी इलाके में मूसलाधार वर्षा व बादल फटने से सर्वाधिक नुकसान हुआ। यहां फायर ब्रिगेड सर्विस के तीन जवानों समेत 26 लोग असीगंगा और बरसाती नालों के उफान में बह गए। अभी तक दो शव बरामद हुए हैं। बाकी की तलाश की जा रही है।  वहां एक फायर स्टेशन मलवे के ढेर में तब्दील हो गया है। इसके अलावा 70 मकान और 10 होटल जमींदोज हो गए, जबकि उत्तरकाशी शहर की पूरी जोशियाड़ा बस्ती समेत करीब 200 मकान प्रशासन ने इस समय रहना खतरनाक बता कर इनको सुरक्षित स्थानों में बने शिविरों में भेज दिया है। गंगोत्री राजमाग्र में बने गगोरी का पुल के साथ सडक व गाडियां भी बह गयी। प्रशासन इस तहाबी में 600 करोड़ का नुकसान बता रहा है। ं इस प्रलयांकारी वर्षा डाट मंदिर से पहले पहाड़ खिसकने से दिल्ली-देहरादून राजमार्ग कई घण्टों तक यातायात अवरूद्ध रहा । वहीं टिहरी, अल्मोड़ा, पोड़ी, सहित तमाम पर्वतीय जनपदों में आयी मूसलाधार वर्षा से पूरा जीवन अस्तव्यस्त हो गया।
वहीं उत्तराखण्ड के उत्तरकाशी जनपद से सटे हिमाचल प्रदेश में भी मनाली के समीप सेरीनाला में बादल फटने से आई बाढ़ के कारण करीब सौ करोड़ रुपये की संपत्ति का नुकसान हुआ है। इसके अलावा इस मूसलाधार वर्षा से उत्तराखण्ड व हिमाचल ही नहीं जम्मू कश्मीर में भी भारी तबाही मचायी। इस प्रकार इस वर्षा से हुई तबाही ने एक बात साफ कर दी है कि भले ही हम अपनी सुविधा के लिए इनको तीन प्रदेशों में अलग अलग मानते है परन्तु प्रकृति इसको हिमालयी क्षेत्र ही मानता है और इस पूरे क्षेत्र में किसी प्रकार के विनाशकारी निर्माण की इजाजत नहीं देता। अगर मनुष्य प्रकृति के साथ अपने निहित स्वार्थ के लिए अंधा खिलवाड़ बांध जैसे विनाशकारी निर्माण करके करता है तो उसको भारी प्राकृतिक प्रकोप का भी भागी बनना पड़ता है।

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