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Thursday, August 2, 2012


अण्णा का राजनैतिक विकल्प देने के नाम पर अनशन तोड़ने से समर्थक भी भौचंक्के

नयी पार्टी बना कर नहीं अण्णा जी , नई व्यवस्था दे कर ही मिटेगा देश से भ्रष्टाचार

सत्ता परिवर्तन के लिए नहीं अपितु व्यवस्था परिवर्तन के लिए संघर्ष तेज करे अण्णा

अण्णा हजारे के नेतृत्व में देश की जनता को आशा थी कि वे भ्रष्टाचार, मंहगाई, आतंकवाद से त्रस्त भारत की जनता को देश की दम तोड़ चूकी व्यवस्था से मुक्ति दिलाते हुए जनहितकारी व्यवस्था की स्थापना करेगी। परन्तु 25 जुलाई को जंतर मंतर पर अण्णा की उपस्थिति में उनके सबसे करीबी सिपाहेसलार अरविन्द केजरीवाल, मनीष सिसौदिया व गोपाल राय तीनों निर्णायक संघर्ष व बलिदान देने का ऐलान करते हुए आमरण अनशन पर बैठ गये। 8 वें दिन जब दिल्ली पुलिस की तीनों अनशनकारियों के गिरते हुए स्वास्थ्य को ध्यान में रखते हुए जब अस्पताल में भर्ती होने की सलाह को पुलिस द्वारा जबरन उनको उठा कर अनशन तुडवाने की मंशा मानते हुए अरविन्द, मनीष व गोपाल राय के देश के लिए बलिदान होने वाले क्रांतिकारी भाषण दिये। तीनों ने एक स्वर में कहा कि पुलिस भले ही जबरन दमन करके उनके शरीर को तो अस्पताल में दाखिल कर सकती है परन्तु पुलिस प्रशासन जबरन उनका अनशन नहीं तुडवा पायेगा। मुझे लगा कि 1 अगस्त की रात को ही पुलिस कार्यवाही करके तीनों अनशनकारी प्रमुख नेताओं को अस्पताल में दाखिल कर देगी। परन्तु जैसे 2 अगस्त को दोपहर को अण्णा हजारे ने जनता द्वारा राजनैतिक विकल्प देने की मांग को स्वीकार करते हुए 3 अगस्त को सांय 5 बजे अनशन तोड़ने का ऐलान किया तो हर हाल में इस दमतोड़ चूकी व्यवस्था को बदलने के लिए हर बलिदान देने के लिए उतारू युवा सन्न रह गये। इस ऐलान के दस मिनट बाद ही अण्णा के सम्बोधन के बाद आधे के करीब लोग वहां से चले गये। वहां पर उपस्थित आंदोलनकारियों को नया राजनैतिक दल बना कर इस देश की भ्रष्ट व्यवस्था में किसी प्रकार के बदलाव की कोई आशा नजर नहीं आ रही थी। देश की जनता में इस भ्रष्ट व्यवस्था के अधिकांश दलों से मोह भंग हो चूका है। इसीलिए जब कहीं उनको इस व्यवस्था को टक्कर देने वाला कोई मजबूत व्यक्ति या समुह नजर आता है तो वे अपना सबकुछ छोड़ कर उस आंदोलन में समर्पित हो जाते। परन्तु आजादी के बाद से अब तक कोई भी नेता जनता की इस भावनाओं के अनरूप इस भ्रष्ट व्यवस्था का सही अर्थो में विकल्प नहीं दे सका। देश ने आजादी के बाद जय प्रकाश नारायण के नेतृत्व में संघर्ष किया परन्तु इसमें देश की जनता ने पाया कि वह इंदिरा गांधी से बेहतर शासन देने के बजाय लालू, मुलायम, पासवान, नितीश आदि के रूप में देश के सामने मिला। देश की जनता इस विकल्प को देख कर इंदिरा गांधी के शासन को बेहतर मानने के लिए विवश हो गये। इसके बाद विश्वनाथ प्रताप सिंह के मण्डल व रामजन्म भूमि के कमण्डल के पुरोधाओं ने भी देश की जनता की आशाओं पर केवल बज्रपात ही किया। ये लोग सत्ता परिवर्तन करने में भले ही सफल हों परन्तु ये देश की भ्रष्ट व्यवस्था का विकल्प देने में नितांत असफल रहे। इसके बाद अण्णा हजारे पर देश के लोगों ने भरोसा किया। परन्तु अण्णा हजारे अपनी टीम की बैसाखियों के सहारे देश को विकल्प देने में नितांत असफल रहे। हाॅं भले ही वे भी नयी पार्टी बना कर कुछ स्थानों में अपनी उपस्थिति दर्ज कराने में सफल रहे। परन्तु देश में सही भ्रष्टाचार रहित व्यवस्था देने में अब तक के कार्यो व आंदोलन से कहीं नहीं लगता कि वे भी असफल रहे है। आज 2 जुलाई को भारत के महान वैज्ञानिक व भारतीय भाषा आंदोलन के पुरोधा डा. श्याम रूद्र पाठक, गीता मिश्रा, व श्री पाण्डे ने दो टूक शब्दों में अण्णा हजारे के आंदोलन का ही विरोध किया वहीं  मोहन बिष्ट, मनीष सुन्दरियाल, श्री बिष्ट के अलावा अग्रणी समाजसेवी व उद्यमी डा विनोद बछेती आदि सभी मजबूत राजनैतिक विकल्प देने की पुरजोर मांग कर रहे थे।  समाजसेवी मोहन बिष्ट व दिल्ली विश्वविद्यालय के लेक्चरर के अनुसार अण्णा हजारे के 3 जुलाई को अनशन का समापन करने के ऐलान से सैंकड़ों की संख्या में गृहमंत्री के आवास पर छापामार दस्ते के रूप में जाने के लिए तैयार आंदोलनकारियों में गहरा रोष था।
जिसने भी सुना भले ही वह आंदोलनकारियों की जान बचाने के लिए आमरण अनशन की समाप्ति के ऐलान का करतल ध्वनि से स्वागत किया परन्तु बिना कुछ उपलब्धी हासिल किये जिस प्रकार से आंदोलन का सम्मानजनक समापन कराने के बजाय उसको अपनी तरफ से समापन करना उन लोगों के गले सहज नहीं उतर रहा था जो निर्णायक संघर्ष के नाम  पर यहां पर आंदोलन मे ंसम्मलित हुए थे। उन सबको देश के राजनैतिक चिंतक व समीक्षक योगेन्द्र यादव की दो दिन पहले इसी मंच से दी गयी चेतावनी बार बार गूंज रही थी कि देश में नयी राजनैतिक दल बनाने से इस समस्या का समाधान नहीं होने वाला। इस देश के अवाम को तो अब इस पूरी दम तोड़ चूकी भ्रष्ट व्यवस्था को बदल कर नया राजनैतिक विकल्प की आवश्यकता है। अधिकांश लोगों का मानना है कि टीम अण्णा भी बाबा रामदेव की तरह अपने समर्थकों के विश्वास से खिलवाड़ न करें। लोगों का मानना था कि अपने आप अनशन तोड़ने से बेहतर होता अरविन्द, मनीष व गोपाल राय के साथ अण्णा हजारे व उनके सैंकडों अनशनकारी साथी खुद अनशन तोड़ने के बजाय पुलिस कार्यवाही का सामना करते तो जनता में उनका और सम्मान बढ़ता और लोग दुगुने जोश से इस आंदोलन की अंतिम संास तक साथ देते। अब देखना हे कि कल अपनी घोषणा के अनरूप गरिमामय ढ़ग से इस आंदोलन का समापन करते।

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