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Thursday, August 9, 2012


-राजधानी गैरसेंण बनाने के लिए 8 अगस्त को शहादत देने वाले महान शहीद बाबा मोहन उत्तराखण्डी की पावन शहादत को शतः शतः नमन्

-गैरसैंण राजधानी न बनाने वाले हुक्मरानों को धिक्कार रही और जनता से निर्णायक संघर्ष के लिए आवाहन कर रही है बाबा की शहादत



बाबा मोहन उत्तराखण्डी की 8 अगस्त 2004 को शहादत आज भी प्रदेश के तमाम हुक्मरानों व राजनेताओं को धिक्कार रही है। वहीं प्रदेश के लोगों को अपने सम्मान व विकास के प्रतीक गैरसेंण राजधानी बनाने के लिए निर्णायक संघर्ष करने के लिए आवाहन कर रही है। आज भी मेरी आंखों में उनकी अंतिम यात्रा में उमडे उत्तराखण्डियों का जनशैलाव का दृश्य बार-बार मुझे उद्देल्लित कर रहा है। भले ही उनकी शहादत के बाद आज 2012 तक भी प्रदेश के हुक्मरानों को गैरसेंण राजधानी बनाने की सुध नहीं है परन्तु उनकी शहादत से हजारों नोजवानों ने 
प्रदेश की राजधानी गैरसेंण बनाने का संकल्प ले लिया है। उनकी शहादत को नमन् करते हुए प्रदेश के आंदोलनकारियों ने शपथ लिया कि हर हाल में प्रदेश की राजधानी गैरसेंण बनाने के लिए अंतिम सांस तक समर्पित रहेंगे। 
2 अक्टूबर 94 को राव मुलायम की अलोकतांत्रिक सरकारों की सह पर जिस पुलिस प्रशासन ने मुजफरनगर स्थित रामपुर तिराहे में उत्तराखण्ड राज्य गठन की मांग के समर्थन में दिल्ली रेली में शांतिपूर्ण ढ़ंग से सम्मलित होने आ रहे उत्तराखण्ड आंदोलनकारियों के साथ भारतीय संविधान व मानवता को शर्मसार करने वाला मुजफ्फरनगर कांड किया उससे व्यथित हो कर बाल दाड़ी न काट कर व भगवा वस्त्र धारण कर अपना जीवन उत्तराखण्ड के लिए पूर्ण रूप से ऐसा समर्पित किया कि लोग उन्हें मोहन सिंह नेगी के बजाय बाबा मोहन उत्तराखण्डी के नाम से पुकारने लगे। उत्तराखण्ड राज्य व अपने क्षेत्र के विकास के लिए समर्पित रहने वाले बाबा मोहन उत्तराखण्डी ने 13 बार अनशन किया। जब उन्होंने देखा कि राज्य गठन के बाबजूद प्रदेश की सत्तासीन भाजपा व कांग्रेस की सरकारें उत्तराखण्ड की जनांकांक्षाओं का सम्मान करते हुए प्रदेश की स्थाई राजधानी गैरसेंण बनाने के बजाय देहरादून में ही थोपने का षडयंत्र कर रही है तो उन्होंने 2जुलाई 2004 से गैरसेंण के समीप बेनीताल -आदिबदरी में आमरण अनशन शुरू किया जिसमें वे आठ अगस्त 2004 को शहीद हो गये। परन्तु तत्कालीन प्रदेश के मुख्यमंत्री नारायणदत्त तिवारी में इतनी नैतिकता नहीं रही कि वे राज्य गठन के इस महान आंदोलनकारी की सुध लेने के लिए उनके आंदोलनस्थल तक जा कर उनकी मांग पूरा करने व उनका जीवन बचाने के लिए अपने संवैधानिक दायित्व का निर्वाह करते। स्वयं बाबा माोहन उत्तराखण्डी ने अपनी इस शहादत के लिए अपने बयानों में अनशन स्थल पर ही तत्कालीन मुख्यमंत्री नारायणदत्त तिवारी को गुनाहगार ठहराया था। 
3 दिसम्बर 1948 में पौड़ी जनपद के एकेश्वर विकासखण्ड के ग्राम बंठोली में मनवर सिंह नेगी व सुलोचना के सपूत के रूप में जन्में बाबा मोहन उत्तराखण्डी ने प्राथमिक शिक्षा प्रावि मौदाड़ी व जूहा सतपुली से मिडिल करने के बाद दुगड्डा इंटर कालेज से 12वीं व आईटीआई श्रीनगर से रेडियो मैकेनिक का डिप्लोमा की शिक्षा ग्रहण की। इसके बाद वे अपने सूबेदार पिता के पद चिन्हों के चल कर 1970 में बंगाल इंजीनियरिंग में लिपिक के रूप में भर्ती हो गये। पांच साल की नौकरी के बाद उनको लगा कि उन्हें अपनी जन्म भूमि की सेवा करनी चाहिए। वे अपने गांव में प्रधान भी रहे। वहां विकास के कई कार्य किये। क्षेत्र में उनके परिवार का अच्छा सम्मान था। उनके दादा ब्रिटिश काल में रेंजर थे । 
वे पृथक राज्य आंदोलन में सक्रिय हो गये। वर्ष 1987 में उक्रांद द्वारा आहुत दिल्ली के रैली में उन्होंने में चढ़बड कर भाग लिया। उन्होंने सतपुली में उन्होंने 200 दिन का बेमियादी धरना दिया। जनवरी 1997 में लैंसडौन के देवीधार में राज्य निर्माण के लिए अनशन, उसके बाद 12 दिन तक सतपुली के सती मन्दिर में अनशन, अगस्त 1998 में दस दिन तक गुमखाल के पास सती मन्दिर में अनशन, नन्दा ढौकी में गैरसैंण को राजधानी बनाने के लिए आंदोलन,पौड़ी बचाओ आंदोलन,गैरसैंण राजधानी के मुद्दे पर 13 दिसम्बर 2003 चैंदकोट में, 2 से 23 अगस्त 2003 तक कनकपुर गढ़ी थराली में अनशन, दो से 21 फरवरी तक कोडियाबगड़ गैरसैंण में अनशन किये उसके बाद उन्होंने अपना अंतिम व शहादती अनशन भी गैरसेंण मुद्दे पर गैरसेंण से सट्टे बेनीताल में 2 जुलाई से 8 अगस्त 2004 तक किया। इसी बीच उनका स्वास्थ बिगडने के पर उनको अनशन में ही कर्णप्रयाग चिकित्सालय ले गये परन्तु इस महान सपूत ने गैरसेंण के लिए अपना बलिदान दे दिया। आज सभी आंदोलनकारियों व जनता को उनकी शहादत से प्रेरणा ले कर प्रदेश के हुक्मरानों पर जबरदस्त दवाब बना कर गैरसेंण राजधानी बनाना ही उनके बलिदान को सार्थक व सच्ची 
श्रद्धांजलि होगी।
 

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