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Tuesday, April 30, 2013

कांग्रेस के कुशासन व भाजपा में नेतृत्वहीनता से व्यथित 

केजरीवाल की पार्टी को दिल्ली राज्य की बागडोर सौंपना चाहती है जनता 


प्यारा उत्तराखण्ड की विशेष रिपोर्ट

कांग्रेस की शीला सरकार के कुशासन व भाजपा में नेतृत्वविहिनता को देख कर व्यथित आम जनता आगामी विधानसभा चुनाव में सुशासन देने का वादा करने वाले अरविन्द केजरीवाल की आम आदमी पार्टी को एक अवसर देना चाहती है। जिस प्रकार से डेढ़ दशक से दिल्ली की सत्ता में काबिज दिल्ली की कांग्रेसी सरकार की मुखिया शीला दीक्षित ने सत्तांध हो कर बिजली व पानी के बिलों में भारी बढ़ोतरी करने के साथ दिल्ली की परिवहन व्यवस्था को एक प्रकार से मृतप्रायः करके दिल्ली की आम जनता का जीना दूश्वार कर दिया है। उससे मुक्ति की आश लगा कर भाजपा की तरफ निहार रही दिल्ली की जनता की आशाओं में मुख्य विपक्षी दल भाजपा मंे मदन लाल खुराना के बाद दिल्ली में नेतृत्वहिनता को देख कर गहरी निराशा छायी है। इस सत्तापक्ष के कुशासन व विपक्षी दल की नेतृत्वहिनता को देख कर व्यथित जनता को अब केवल दिल्ली में बिजली व पानी के बिलों में भारी बढोतरी व लूट खसोट के खिलाफ सड़कों पर विगत एक साल से संघर्ष करने वाले अरविन्द केजरीवाल के नेतृत्व वाली ‘आम आदमी पार्टी’ को दिल् ली की बागडोर सौंपने का मन बना रही है। हालांकि अभी उनको अरविन्द केजरीवाल की पार्टी पर पूरा भरोसा नहीं है परन्तु पार्टियों की भरमार होने के बाबजूद दिल्ली की जनता को अरविन्द के अलावा दिल्ली सरकार के कुशासन से मजबूती से जनहितों के लिए संघर्ष करने वाला कोई अन्य दूर दूर तक नहीं दिखाई दे रहा है। जिस प्रकार से अरविन्द केजरीवाल ने शीला सरकार के कुशासन को सडकों पर बेनकाब करने के संघर्ष किया वेसा तेवर व निष्टा दिल्ली की जनता को कहीं दूर दूर तक भाजपा में नहीं दिखाई दे रही है। दिल्ली भाजपा का नेतृत्व अगर अरूण जेटली व सुषमा करती तो जनता में जरा विश्वास करती। परन्तु अरूण जेटली व सुषमा की नजर देश के प्रधानमंत्री की कुर्सी पर है। दिल्ली से उनका कितना लगाव व नजता से कितनी दूरी है यह गत लोकसभा चुनाव में दिल्ली से इन दोनों नेताओं द्वारा लोकसभा चुनाव की ताल ठोकने का साहस तक न जुटा सकने से उजागर हो गयी है। दिल्ली में मदन लाल खुराना जैसे जमीनी नेतृत्व को उखाड़ने का दण्ड आज भी भाजपा भोग रही है। ऐसा नहीं है कि भाजपा में नेताओं की कमी है परन्तु दिल्ली के मठाधीश पर मण्डल व कमंडल के बाद देश में आये व्यापक राजनीति के क्षेत्र में बदलाव के बाद भी दिल्ली की राजनीति में एकाधिकार समझने वाली भाजपा अपने 60 साल पुराने समीकरण को ही थोपने की नापाक कोशिश करती है। भाजपा नेतृत्व भूल गया कि उत्तराखण्ड, उत्तरप्रदेश व बिहार से आये लोगों की दिल्ली में इन 30 सालों में जनसंख्या का 60 प्रतिशत हो गया है। इनको नजरांदाज करके केवल अपने 6 दशक पुराने राजनीति समीकरण को ही नेतृत्व में थोपना भाजपा के लिए आत्मघाती साबित हो रहा है। खासकर जिस प्रकार ने भाजपा में नगर निगम की स्थाई समिति के पूर्व अध्यक्ष रहे जगदीश मंमगाई ने जब भाजपा नेतृत्व से दिल्ली में नये बदलाव के अनरूप नेतृत्व देने की मांग की तो भाजपा ने उनका अपमान किया इसी कारण उन्होंने एक दर्जन से अधिक भाजपा के दूसरी पंक्ति के नेताओं को साथ ले कर दिल्ली में प्रोग्रेसिव पार्टी को दिल्ली की राजनीति में उतार दिया है। दिल्ली नगर निगम चुनाव में इस दल को भी हर सीट पर भाजपा के लिए गले की हड़डी साबित हुई। अब विधानसभा चुनाव की भी यह पार्टी ताल ठोक रही है। परन्तु दिल्ली की जनता का ध्यान अभी इस दल से अधिक अरविन्द केजरीवाल की आप पार्टी पर है।
हालत यह है कि दिल्ली में चुनावी दंगल में उतरने वाले हर तेज तरार उम्मीदवार की कोशिश यह है कि अगर उसको भाजपा या कांग्रेस से टिकट नहीं मिलता तो वह बसपा सहित अन्य तमाम दलों के बजाय अरविन्द केजरीवाल की आप पार्टी से चुनाव लड़ना पसंद कर रहा है। इसी कारण जनांदोलनों में अण्णा के अलग होने के बाद आम जनता का उतना विश्वास अरविन्द केजररीवाल की साथ नहीं रहा। जनता का समर्थन भी उतना नहीं दिखा। परन्तु राजनीतिक पार्टी बनाये जाने के बाद व दिल्ली की वर्तमान राजनैतिक हालतों को देखने के बाद आप पार्टी की रैलियों में भारी जन समर्थन इन दिनों दिखाई दे रहा है। इसका एक ही कारण है कि जनता आप पार्टी को भाजपा व कांग्रेस से बेहतर अब अरविन्द केजरीवाल की आप पार्टी नजर आ रही है। इसका कारण खुद अरविन्द केजरीवाल का जनहितों को प्रमुखता से उठाना व उनका प्रशासनिक क्षमता पर लोगों को इतना विश्वास है कि अगर अरविन्द केजरीवाल की पार्टी दिल्ली में सत्तासीन होती है तो वह जरूर अपने वादे के अनुसार लोगों को बिजली व पानी के आसमान को छूते हुए बिलों से राहत देगी अपितु शिक्षा, चिकित्सा, परिवहन जैसे पटरी से उतर चूके संस्थानों को भी ठीक करेगी। इसके साथ दिल्ली में बिल्डर माफिया व पुलिस प्रशासन के साथ नेताओं के नापाक गठजोड़ पर अंकुश लगायेगी। देखना यह है कि अरविन्द आने वाले दिनों में जनता के इस विश्वास को अपने कार्यो से कितना मजबूत करते है। भले ही आज जनता का एक बड़ा वर्ग अरविन्द के जनांदोलन में भूमिका से पूरी तरह सहमत नहीं है परन्तु दिल्ली की वर्तमान राजनीति में जनता के पास अरविन्द से बेहतर कोई नेतृत्व नहीं है। सबसे अहं सवाल यह है कि दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित ने जिस प्रकार दिल्ली में बिजली, पानी के बिलों के अंधी मार से लोगों का जीना दूश्वार कर दिया है और चिकित्सा, शिक्षा व परिवहन को पूरी तरह ध्वस्थ करते हुए आम आदमी की पंहुच से कोसों दूर कर दिया है। उससे जनता को मुक्ति की आश अब केवल अरविन्द केजरीवाल में ही दिखाइ्र दे रही है। हालांकि लोगों में यह भी धारणा बन रही है कि कांग्रेस व अरविन्द दोनों का मिला जुला खेल चल रहा है परन्तु दिल्ली में भाजपा की नेतृत्वहिनता के कारण जनता के पास अरविन्द केजरीवाल के अलावा कोई ऐसा सशक्त विकल्प कहीं दूर दूर तक नहीं दिखाइ्र दे रहा है। देखते है कि विधानसभा चुनाव होने तक अरविन्द अपनी इस विश्वसनीयता को कहां तक बनाये रखते है। यह बात उन्हें भी समझनी चाहिए कि जनता कहीं दूर दूर तक छलावा व धोखेबाजों को माफ नहीं करती।

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