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Sunday, April 7, 2013



तमिलों का कत्लेआम कर रहे श्रीलंका पर अंकुश लगाने के लिए आगे आये भारत व विश्व 


निर्दोष तमिलों का कत्लेआम व उपेक्षा करके नहीं की जा सकती है श्रीलंका की अखण्डता की रक्षा

6 मार्च को जब देश महात्मा गांधी के दांडी यात्रा की पावन स्मृति को नमन्कर रहा था वहीं दूसरी तरफ भारतीय संसद की चैखट , राष्ट्रीय धरना स्थल पर मानवता के लिए देश के विभिन्न प्रांतों के समर्पित विश्व विद्यालय के छात्रों ने श्रीलंका में तमिल समुदाय का आतंकवाद को खात्मे के नाम पर सरकार द्वारा किये जा रहे कत्ले आम के खिलाफ एक दिवसीय धरना प्रदर्शन किया। इन नोजवानो ं ने श्रीलंका सरकार पर लगभग डेढ़ लाख तमिलों की हत्या करने का आरोप लगाते हुए भारत सरकार सहित विश्व समुदाय से श्रीलंका में आतंकवाद की आड़ में तमिलों का निर्ममता से हत्या करने से रोका जाय और इस अपराध के दोषियों को कड़ी सजा दिलाने के लिए आगे आये। आज 73 प्रतिशत सिंहली जनसंख्या वाले श्रीलंका में तमिल 18.5 प्रतिशत है। वेसे भी धार्मिक आधार पर सिंहली समुदाय का बौध धर्म 70 प्रतिशत जनसंख्या का प्रतिनिधित्व करता है। वहीं हिन्दू 15, इसाई 8 व मुस्लिम 7 प्रतिशत जनसंख्या का प्रतिनिधित्व करते हैं। हालांकि बोध व तमिल दोनों भारतीय संस्कृति से जुडे हैं परन्तु स्थानीय स्वार्थो के टकराव के कारण आज दोनों के बीच का टकराव श्रीलंका की शांति पर ग्रहण लगाने का मूल कारण बना। बहुसंख्यक समुदाय सिंहला जब तक तमिलों को मन से स्वीकार व अधिकार नहीं देगा तब तक यह दूरियां कहीं दूर नहीं हो सकती। विश्व समुदाय आज तमिलों के मानवाधिकार की निर्ममता से हत्या होते नहीं देख सकता है।
यह मांग केवल चंद छात्र ही नहीं अपितु संयुक्त राष्ट्र संघ में भी अमेरिका के प्रस्ताव के रूप में पारित किया जा चूका है। भारत में भी सप्रंग सरकार की प्रमुख सहयोगी दल द्रुमुक ने इसी मुद्दे पर सरकार की श्रीलंका में हो रहे तमिलों पर अत्याचार पर मजबूत कदम न उठाने से नाराज हो कर न केवल मंत्रीमण्डल से इस्तीफा दे दिया अपितु 9 साल से चले आ रहे सप्रंग गठबंधन को भी त्याग दिया। यही नहीं पूरा तमिलनाडू सड़कों पर आंदोलित है। आज सबसे अहम सवाल यह है कि भारत सरकार क्यों इस अन्याय के खिलाफ प्रमुखता से विरोध नहीं कर रही है। श्रीलंका को अपनी एकता व अखण्डता की हर कीमत पर रक्षा करने का अधिकार है परन्तु उसे किसी भी अल्पसंख्यक समुदाय को उसके लोकतांत्रिक अधिकारों व हक हकूकों से वंचित करके पक्षपात करके कत्लेआम करने का कोई हक नहीं है। आतंक को कुचलने के नाम पर श्रीलंका को आम तमिल समुदाय का कत्लेआम करने की इजाजत कम से कम आज की दुनिया में हरगिज नहीं दी जा सकती है। श्रीलंका को याद रखना होगा कि अलगाववाद से केवल श्रीलंका ही नहीं अपितु संसार में भारत सहित अधिकांश देश झुझ रहे हैं। परन्तु आतंकियों के दमन के नाम पर भारत ने कभी आम कश्मीरी समाज पर दमन नहीं किया। अपितु भारत में कश्मीर के लोगों को समानता के अधिकार से बढ़ कर विशेषाधिकार भी हासिल है। जो यहां के बहुसंख्यक समाज को कहीं दूर दूर तक नसीब नहीं हैं।
गुलामी के दिनों में श्रीलंका में चाय के बगानों में काम करने के लिए श्रमिकों को भारत से श्रीलंका लाया गया था। आजादी के बाद भी जिन तमिलों ने देश की प्रगति में भागीदारी की, उन्हीं तमिलों को बहुसंख्यक सिंहला समुदाय अपना मानने के लिए तैयार नहीं हुआ।
इसी समस्या को सुलझाने के लिए 1962 में भारत और श्रीलंका के बीच एक संधि हुई जिसके अंतर्गत अगले पंद्रह वर्षों में छः लाख तमिलों को भारत भेजा जाना था और पौने चार लाख तमिलों को श्रीलंका की नागरिकता देनी थी। लेकिन ये तमिल श्रीलंका से भारत नहीं लौटे। बिना नागरिकता, बिना अधिकार वे श्रीलंका में ही रहते रहे। वर्ष २००३ तक उन्हें श्रीलंका की नागरिकता नहीं मिली। यही कारण है कि तमिलों को पीढ़ी-दर-पीढ़ी निर्धनता व सरकारी उत्पीडन को झेलने के लिए विवश होना पड़ा। बहुसंख्यक समुदाय की यही मनोवृति श्रीलंका में जातिय संघर्ष व अलगाववाद का मूल कारण बना।
भले ही कहने को श्रीलंका में गृहयुद्ध 23 जुलाई 1983 को श्रीलंका में अलग तमिल ईलम के गठन की मांग को लेकर लिट्टे के साथ हुआ। 25 साल तक चले इस गृहयुद्ध में करीब डेढ़ लाख तमिलों को मौत के घाट उतारा जा चूका है। खुद श्रीलंका की सरकार 80 हजार लोगों के मारे जाने की बात स्वीकार करता है।
श्रीलंका सरकार द्वारा जिस अमानवीय व क्रूरता पर भले ही विश्व समुदाय केवल संयुक्त राष्ट्र में श्रीलंका में हो रहे युद्ध अपराधों के खिलाफ हल्का प्रस्ताव पारित करके अपना कत्र्तव्य इति मान रहा हो, परन्तु भारत से केवल 31 किमी दूरी पर ढाई करोड़ जनसंख्या वाले देश श्रीलंका में हो रही इस हैवानियत पर भारत किसी भी कीमत पर मूक नहीं रह सकता। हालांकि वर्तमान मनमोहन सरकार ने इस मामले में जब शर्मनाक मौन रखा तो पूरा तमिलनाडू आक्रोशित हो कर सड़क से लेकर संसद तक आंदोलनरत है।
श्रीलंकाई गृहयुद्ध श्रीलंका में बहुसंख्यक सिंहला और अल्पसंख्यक तमिलो के बीच २३ जुलाई, १९८३ से आरंभ हुआ गृहयुद्ध है। मुख्यतः यह श्रीलंकाई सरकार और अलगाववादी गुट लिट्टे के बीच लड़ा जाने वाला युद्ध है। ३० महीनों के सैन्य अभियान के बाद मई २००९ में श्रीलंकाई सरकार ने लिट्टे को परास्त कर दिया।ख्1,
लगभग २५ वर्षों तक चले इस गृहयुद्ध में दोनों ओर से बड़ी संख्या में लोग मारे गए, और यह युद्ध द्वीपीय राष्ट्र की अर्थव्यस्था और पर्यावरण के लिए घातक सिद्ध हुआ। लिट्टे द्वारा अपनाई गई युद्ध-नीतियों के चलते ३२ देशों ने इसे आतंकवादी गुटो की श्रेणी में रखा जिनमें भारतख्2,, ऑस्ट्रेलिया, कनाडा, यूरोपीय संघख्3, के बहुत से सदस्य राष्ट्र और अन्य कई देश हैं। एक-चैथाई सदी तक चले इस जातीय संघर्ष में सरकारी आँकड़ों के अनुसार ही लगभग ८०,००० लोग मारे गए हैं।
श्रीलंका सरकार भले ही देश में आतंकवाद के लिए तमिल समुदाय को गुनाहगार बता कर उनका सफाया करने को राष्ट्रहित में न्यायोचित बताये परन्तु हकीकत यह है कि 4 फरवरी 1948 को ब्रिटेªन की दासता से आजाद हुए श्रीलंका की जनसंख्या 2012 में 2 करोड़ 14 लाख 81 हजार 334 है। यहां अलगाव के बीज स्वतंत्रता के प्राप्ति के समय ही 1948 को उस समय पड़ गये थे जब सिलोन नागरिकता कानून में तमिलों को नागरिकता नहीं देने व उन्हें श्रीलंका का नागरिक मानने के बजाय भारतीय नागरिक बताते हुए उनको श्रीलंका की नागरिकता से वंचित करने वाला कानून बनाया गया। हालांकि इस विवादस्थ कानून को मान्यता नहीं मिली परन्तु इस से श्रीलंका के हुक्मरानों की मानसिकता पूरी तरह बेनकाब हो गयी कि वे तमिलों को श्रीलंका के अन्य नागरिकों की तरह अधिकार देने के लिए दिल से तैयार नहीं है। यही नहीं 1956 में श्रीलंका सरकार ने तमिल अल्पसंख्यकों की भाषा को नजरांदाज करके केवल सिंहली भाषा को राष्ट्र भाषा का दर्जा दिया। सिंहला केवल अधिनियम -के द्वारा श्रीलंका की राष्ट्रभाषा सिंहला ही होगी। इससे गैर-सिंहलियों को रोजगार मिलना लगभग असंभव हो गया। जो पहले से नौकरी में थे, उन्हें नौकरी से निकाला जाने लगा। प्रधानमंत्री एसडब्ल्यूआरडी भंडारनायके द्वारा यह कानून लाया गया था। तमिल राष्ट्रवादी पार्टी ने इसका विरोध किया और उसके सांसद सत्याग्रह पर बैठ गए। बाद में इस विरोध ने हिंसक रूप ले लिया। इस हिंसा में दर्जनों लोग मारे गए और हजारों तमिलों को बेघर होना पड़ा। इसके बाद 1957 में तमिल विरोधी दंगो में सेकडों लोग मारे गये और हजारों लोगों को उजाड दिया गया। तमिल राष्ट्रवादी पार्टी पर प्रतिबंध लगा दिया गया।इसके बाद श्रीलंका के बहुसंख्यक सिंहला लोगों को तमिल बाहुल्य पूर्वी प्रांत में बसाने से भी तमिलों के मन में असुरक्षा की भावना जागृति हो गयी। यही कारण श्रीलंका में सशस्त्र संघर्ष के प्रमुख कारण रहे। इसके बाद सरकार ने तमिल साहित्य के आयात पर ही प्रतिबंध लगा दिया।
हालांकि १९७२ अंग्रेजों द्वारा थोपा गया सिलोन नाम को बदल कर अपना असली नाम श्रीलंका रख लिया और देश के धर्म के रूप में बौद्ध धर्म को प्राथमिकता दी। 1973 में शिक्षा के मानकीकरण के नाम पर तमिलों को फिर से हाशिये पर धकेला गया। इससे श्रीलंका की जनसंख्या की दृष्टि से बहुसंख्यक सिहलां व उपेक्षित अल्पसंख्यक समुदाय के बीच अलगाव की खाई और गहरी हो गयी। इसके बाद राष्ट्रवादी तमिल राजनैतिक दलों ने भी अलग तमिल राष्ट्र की मांग 1976 में कर दी। सरकार की लगातार तमिलों के दमन व उपेक्षा से आक्रोशित हो कर बेलुपिलई प्रभाकरन ने तमिल समुदाय को अलग राष्ट्र (तमिल इलम) बनाने के उदेश्य से 5 मई 1976 में इलटीटीई(लिबरेशन टाइगर्स आफ तमिल एलम) का गठन किया। 1983 में 13 सैनिकों को मारने से अपनी उपस्थित दर्ज कराने वाला लिट्टे इन 25 सालों में संसार का सबसे खुखार आतंकवादी गुटों में जाना गया। इसके बाद 1977में जाफना के महापौर अल्फ्रेड दुरैअप्पा , 1985 में अनुराधापुरम में 146 नागरिको, 1987 में आत्मघाती हमले में 40 सैनिकों, 1993 में लिट्टे ने एक आत्मघाती हमले में राष्ट्रपति रनसिंघे प्रेमदासा, व 1987 में कोलम्बों सैंट्रल बैक में आत्मघाती हमले में 90 लोगों की हत्या की।
सन् 2001 में कोलाम्बों हवाई अड्डे पर हमला कर 12 विमान नष्ट, १९८३ में सेना पर लिट्टे के हमले के बाद सिंहलियों ने तमिलों पर सुनियोजित हमले किए। इन हमलों में एक हजार से अधिक तमिल मारे गए। १९८७ सेना ने ऑपरेशन लिबरेशन आरंभ किया परन्तु प्रभाकरण बचने में सफल । यह घटना 5 जून, १९८७ को जब श्रीलंका सरकार ने दावा कर रही थी कि सेना जाफना पर अधिकार करने के निकट हैं, तभी भारत ने पैराशूट के द्वारा जाफना में राहत सामाग्रियां गिराई। भारत की इस सहायता को लिट्टे की प्रत्यक्ष सहायता भी माना गया। इसके बाद 29जुलाई, १९८७ को तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी और तत्कालीन श्रीलंकाई राष्ट्रपति जयवर्द्धने के बीच एक समझौते पर हस्ताक्षर हुआ। इस समझौते के अंतर्गत श्रीलंका में तमिल भाषा को आधिकारिक दर्जा दिया गया। साथ ही, तमिलों के कई अन्य मांगें मान ली गईं। वहीं, भारतीय शांति रक्षक बलों के सामने विद्रोहियों को हथियार डालना पड़ा।अधिकतर विद्रोही गुटों ने भारतीय शांति रक्षक बलों के सामने हथियार डाल दिए थे, लेकिन लिट्टे इसके लिए तैयार नहीं हुआ। भारतीय शांति रक्षक सेना ने लिट्टे को तोड़ने का पूरा प्रयास किया। तीन वर्षों तक दोनों के बीच युद्ध चला। इसके बाद श्रीलंका सरकार ने भारत से शांति रक्षकबलों को वापस बुलाने की मांग की, लेकिन राजीव गांधी ने इससे मना कर दिया। १९८९ के संसदीय चुनाव में राजीव गांधी की हार के बाद नए प्रधानमंत्री वीपी सिंह ने श्रीलंका से शांति रक्षक बलों को वापस 1990 में बुलाया गया। इन तीन वर्षों में श्रीलंका में ग्यारह सौ भारतीय सैनिक मारे गए, वहीं पांच हजार श्रीलंकाई भी मारे गए थे। 1991 में लिट्टे ने आत्मघाती हमले से राजीव गांधी की निर्मम हत्या कर दी। २००२रू श्रीलंका और लिट्टे ने नार्वे की मध्यस्थता से संघर्ष विराम पर हस्ताक्षर किए।
२००४लिट्टे में विद्रोह और लिट्टे कमांडर करुणा ने अपने समर्थकों के साथ भूमिगत हो गए। लिट्टे ने 2005 में श्रीलंका के विदेश मत्री की निर्मम हत्या की। इसके बाद संघर्ष में सेना ने 2009 में लिट्टे की राजधानी समझी जाने वाली त्रिलिनोच्चिच्प व मुल्लाइतिवु पर कब्जा करने के बाद 17 मई 2009, को विद्रोही आधिकारिक सेल्वारासा पथ्मनाथान ने एक ईमेल के द्वारा यह बयान दिया कि यह लड़ाई अपने कड़वी अंत तक पहुँच गया हैष् कई विद्रोही लड़ाकों ने घेरे जाने पर आत्महत्या कर ली। 18 मई को इस बात की पुष्टि दी गयी कि विद्रोही नेता वेलुपिल्लई प्रभाकरन के साथ-साथ कई अन्य उच्च स्तर के तमिल अधिकारी मारे गए। .सरकारी रिपोर्टों के अनुसार प्रभाकरन एक कवचित सवारी गाडी में कई शीर्ष प्रतिनिधियों और विद्रोही सेनानियों के साथ श्रीलंका की ओर बढ़ रहे थे. एक दो घंटों की लडाई के बाद गाडी एक रॉकेट से उड़ा दी गयी और सभी सवारी नहीं तो ज्यादातर सवारी मार डाले गए.सैनिकों को हटा दिया गया और प्रभाकरण के शव के साथ-साथ कर्नल सूसयी (सी टाइगर्स के प्रमुख) और पोट्टू अम्मान (खुफिया कमांडर) की पहचान की गयी।
लिट्टे की हार के बाद आतंकवाद को जड़ से खत्म करने के नाम पर जो दमन तमिल समुदाय का किया गया उससे श्रीलंका सरकार खुद अन्तरराष्ट्रीय समुदाय के समक्ष कटघरे में है। तमिल सुत्रों के अनुसार हजारों तमिलों को तबाह कर दिया गया। इसी अमानवीय दमन के खिलाफ आज संयुक्त राष्ट्र में अमेरिका एक प्रस्ताव लाने के लिए विवश हुआ। परन्तु तमिल इस प्रस्ताव को नाकाफी मान रहे है। तमिलों के प्रति जो दुराग्रह व क्रूरता श्रीलंका सरकार में है उसको दूर किये बिना तमिल समस्या का समाधान भले की कुछ समय के लिए होता दिखे परन्तु यह मामला सुलगता ही रहेगा। श्रीलंका की एकता अखण्डता की रक्षा जरूरी है पर उससे जरूरी है वहां पर अल्पसंख्यक निर्दोष तमिलों के कत्लेआम व मानवाधिकार की निर्मम हत्या को रोकना। इसके बिना भारतीय उपमहाद्वीप में शांति की आश लगाना भी बेईमानी है। शेष श्रीकृष्ण कृपा। हरि ओम तत्सत् । श्रीकृष्णाय् नमो।

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