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Thursday, October 20, 2011

गद्दाफी की शहादत से फिर उजागर हुई संयुक्त राष्ट्र संघ व विश्व समुदाय की नपुंसकता


 -सद्दाम के बाद गद्दाफी भी हुआ आततायी अमेरिका के हमले में शहीद/
 -अकूत तेल सम्पदा को   कब्जाने के लिए किया अमेरिका ने सद्दाम व गद्दाफी का सफाया/
-गद्दाफी  की शहादत से फिर उजागर हुई संयुक्त राष्ट्र संघ व विश्व समुदाय की नपुंसकता /


तेल के अकूत भण्डारों को कब्जाने की अमेरिका व उसके आततायी मित्र देशों के हमले में इराक के स्वाभिमानी शासक सद्दाम हुसैन के बाद उत्तर अफ्रीका के अग्रणी देश लीबिया के प्रमुख कर्नल गद्दाफी भी अमेरिकी प्यादों के हमले में 20 अक्टूबर 2011 को 69 वर्ष की उम्र में जाबांजों की तरह आततायिों का मुकाबला करते हुए शहीद हो गये। दोनों का कसूर केवल यही था कि उन्होने अमेरिका ंको अपने देश  के अकूत तेल संसाधनों पर कब्जाने की इजाजत नहीं दी और अमेरिका के आतंक के आगे विश्व के अन्य देशों के हुक्मरानों की तरह सर झुकाने के बजाय जंगे मैदान में शहादत दे कर वीर गति हासिल की ।  7 जून 1942 में लीबिया के ंजिस सिर्ते शहर में मुअम्मर गद्दाफी ने जन्म लिया उसी में लीबिया के स्वाभिमान की रक्षा के लिए अपने प्राणों की शहादत भी दी।  सन् 1969 में हुई  लीबिया की क्रांति में सत्तासीन होने के बाद मुअम्मर गंद्दाफी पूर े विश्व में अपने प्रखर नेतृत्व के कारण कर्नल गद्दाफी के नाम से विख्यात हुए। कर्नल गद्दाफी ने 1969  से 2011 तक अपने 41 सालों के शासन में अमेरिका व उसके मित्र राष्ट्रों की लीबिया के संसाधनों पर कुण्डली मारने के हर नापाक कोशिश का मुहतोड़  जवाब देते हुए लीबिया को एक मजबूत राष्ट्र बनाया। कर्नल गद्दाफी ने ंदेश मे भले ही तानाशाही चलायी पर अमेरिका के सह पर चलाये जा रहे तमाम अभियानों को रौंदा। परन्तु वे फरवरी 2011 से हुए इस विद्रोह में जिसमें अमेरिका व उसके मित्र राष्ट्रों ने लीबिया में भारी बमबारी  कर वहां के शासक गद्दाफी को हटाने के लिए हजारों जनता का खात्मा किया। चारों तरफ से घिर जाने के बाबजूद कर्नल गद्दाफी ने  एक स्वाभिमानी वीर सैनिक की तरह जंग में शहीद हुए न की कायरों की तरह आत्मसम्र्पण किया। हो सकता  है कि अपने शासनकाल के दौरान अलौकतांत्रिक शासन के दौरान कुछ ज्यादतियां हो गयी  हो परन्तु उसका मुख्य उदेश्य अमेरिका के शिकंजे में जाने से अपने देश को बचाना था । कर्नल गद्दाफी चाहे लोकशाही के जमाने में एक तानाशाह हों परन्तु अमेरिकी सम्राज्यवाद  से उन्होंने लीबिया के संसाधनों व सम्मान की रक्षा की उसके लिए भविष्य के जांबाज स्वाभिमानी शासकों की तरह उन्हें याद किया जायेगा। 
जहां तक अमेरिका व उसके प्यादे नाटों के सह पर लीबिया में लोकशाही लाने के नाम पर जो तबाही मचाई गयी, उसके लिए इराक प्रकरण की तरह न केवल संयुक्त राष्ट्र  संघ  व विश्व के अन्य देशों के  हुक्मरानों  की अमेरिका व उसकी चैकड़ी के इन अत्याचारों के आगे नपुंसकता ही विश्व इतिहास को शर्मसार करती अपितु विश्व लोकशाही पर ग्रहण भी लगाती है। अमेरिका व उसके प्यादे जो इराक व लीबिया  में हमला करके बलात तख्ता पलट करते वे क्यों फिलिस्तीन व सीरिया,  सउदी अरब  सहित अन्य देशों में वहां के जनमत का सम्मान करने के लिए ठीक इसी प्रकार की कार्यवाही क्यों नहीं करते। अमेरिका ने दशकों तक पाकिस्तान की लोकशाही को अपने सैनिक तानाशाह प्यादों से कुचलाया। क्यों इस्राइल की तानाशाही को संरक्षण दे कर अमेरिका व उसंके प्यादे फिलिस्तीन को स्वतंत्र देश कीं मान्यता नहीं दे रहे हैं?  सद्दाम के बाद कर्नल गद्दाफी की शहादत जहां अमेरिका के लोकशाही समर्थक मुखोटे को बेनकाब करती है वहीं वह संयुक्त राष्ट्र संघ, रूस, चीन व भारत सहित पूरे विश्व समुदाय की  नपुंसकता को धिक्कार रही  है। जहां तक अमेरिका ने पूरे विश्व की शांति को रौंदने के लिए अलकायदा, ओसमा व तालिबान ही नहीं अपितु पाक जैसे अनैक आतंकी  संगठन व देश तैयार किये हैं, अब वह उनके नाम पर विश्व आतंकवाद से मुक्ति के नाम पर पूरे विश्व में अपना आतंकी सम्राज्य स्थापित कर रहा है। जो उसको चुनौती दे रहा है उसको सद्दाम व गद्दाफंी की तरह मौत की नींद बलात सुला दे रहा है। विश्व के अग्रणी राजनैतिक समीक्षक ब्ीतपेजवचीमत ठवससलद ने दो टूक  शब्दो में अमेरिका द्वारा लीबिया वालों को लोकशाही व गद्दाफी के तानाशाही के  विरोध के  नाम पर तबाह  किये गये लीबिया के चहुमुखी विकास की कहानी व विश्व में अन्य देशों की स्थिति से आज भी लीबिया के वे लांेग अनजान   हैं जो लीबियों में आज  जश्न मना रहे है। उनके द्वारा भेजे  गये मेल संदेश में बताया  गया कि आज लीबिया में सभी नागरिकों बिजली निंशुल्क मिलती है। वहां ब्याज रहित लोन मिलता है। ंप्रतेक  नवविवाहित दम्पति को  60 हजार दीनार यानी 50 हजार डालर घर खरीदने के लिए प्रदान किया जाता रहा। लीबिया में शिक्षा ही नहीं चिकित्सा भी निशुल्क दी जाती है । यदि किसी को लीबिया में उचित मेडिकल या पढाई के  लिए विदेश में  जांने की आवश्यकता होती ंहै तो उसका खर्चा  सरकार बहन करता है। इसके साथ उसे 2300  अमेरिकी डालर  प्रतिमाह  मकान व वाहन व्यय का भी प्रदान किया जाता है। गदाफी के शासन से पहले जहां लीबिया में शिक्षा का प्रसार केवल 25 प्रतिशत था वहीं गदाफी के  राज में 83 प्रतिशत लोग शिक्षित हैं। लीबिया के 2 5 प्रतिशत लोग स्नातक है। जो लीबिया में खेती को अपनी आजीविका ंशुरू करना चाहता उसे  जमीन, फार्म हाउस, यंत्र  आ िद निशुल्क प्रदान किया जाता। यदि लीबिया वाला कोई कार लेना  चाहता है कि सरकार उसे 50 अनुदान देती है साथ में लीबिया में पेटोल 0 . 14 डालर है। जहां अमेरिका सहित विश्व के  तमाम देशों पर  भारी विदेशी कर्ज है वहीं लीबिया पर कोई कर्ज तक  नहीं है। वहीं उसके पास 150 बिलियन डालर रिजर्व है। गदाफी ने लीबिया में पानी की कमी  को दूर करने के लिए विश्व में महत्वपूर्ण 27 बिलियन डालर किमत की  मनुष्य निर्मित नदी से  न केवल रेगिस्तान वाले  सूखे लीबिया को हरा भरा व सम्पन्न बनाया अपितु पूरे विश्व में एक  कीर्तिमान भी स्थापित किया। लीबिया में कोई  स्नातक शिक्षा ग्रहण करने के बाद  रोजगार  नही प्राप्त कर पाता तो उसे उसके स्तर का रोजगार न  मिलने तक ओसत वेतन सरकार  द्वारा दी जाती है।  लीबिया में एक निश्चित ंअंश (तेल बेचने से मिली  राशि का)  हर नागरिक के खाते में स्वतः ही जमा हो जाते। नवजात शिशु भी जन्म लेते ही  भारतीय मुद्रा के अनुसार 2.5 लाख यानी 5000ं डालर उसकी माता के खाते मे ं जमा हो जाती  है ।  लीबिया में 40 पीस वाली ब्रेड की कीमत 0 .15 डालर है। यानी भारत से कई गुना सस्ती। लीबिया को तेल भण्डारों पर गदाफी ने अमेरिका सहित तमाम विदेशी कम्पनियों का अपना शिकंजो नहीं कसने दिया, इसी कारण गदाफी  को वर्षो  से निरंतर हटाने का प्रयत्न किया  जाता  रहा। गदाफी  लोकशाही का स्थापित करना चाहते थे परन्तु लोकशाही के नाम पर  अमेरिकी दलालों जो ंलीबिया के  ंस्वाभिमान को व संसाधनों को अमेरिका के हाथों गिरवी रखने का षडयंत्र रच रहे थे  उनके हाथों में लीबिया सौंपने के 
लिए तैयार नही ं थे ।  इस बार ऐसे ही लोगों के साथ मिल कर अमेरिका व  नाटो ने गदाफी को मारने की सफलता हासिल की। अगर उपरोक्त बातें सच है तो ऐसे शासक को भारत के  लोग आजादी के 64 साल बाद भी  हासिल  नहीं कर  पाये। विश्व के किसी अन्य लोकतांत्रिक देश में क्या ऐसा किसी शासक ने किया। आज ंअमेरिका व संयुक्त राष्ट जो गदाफी की मौत को आजादी बता रहा है कि क्या अमेरिका के राष्टपति बुश ने जो कत्लेआम अफगानिस्तान व इराक में मचाया था क्या उनको  यह  सजा ंदेने का आवाहन तब इस विश्व संस्था ने क्यों नहीं की । क्यों ंपाक जो ंपूरे विश्व की  शांति को अमेरिका के शह  व संरक्षण में  तबाह कर रहा है  उस पर ऐसी कार्यवाही की गयी। क्यों चींन को ंतिब्बत पर कब्जा जमाने पर ऐसी कार्यवाही क्यों नहीं की गयी। इराक के बाद लीबिया पर हुई कार्यवाही अमेरिका व उसके प्यादों द्वारा वहां के ंतेल संसाधनों पर कब्जा जमाने व अपने ंविरोधी को सबक सिखाने के अलावा कुछ  भी नहीं है। नहीं इस कार्यवाही का लोकशाही से कोई लेना देना नहीं  हे। कुछ  समय बाद जब आम लीबि या के लंोगों को पूरे विश्व के देशों की ंस्थित का पता चलेगा तो  उनको अपने कृत्य पर अवश्य पछतावा होगा । हो सकता है कि  अमेरिका के  षडयंत्रों से आशंकित गदाफी ने विरोधियों का दमन किया हो परन्तु  उसके दिल में लीबिया के स्वाभिमान व विकास के लिए जो जब्जा व समर्पण था वह ंविश्व के अन्य शासकों में दूर तक नहीं दिखायी देता। एक महान योद्वा व जन विकास के लिए समर्पित गदाफी की शहादत को सादर  नमन् करते हुए मैं यह लेख श्रीकृष्ण चरणों में समर्पित करता  हॅू। 
 शेष श्रीकृष्ण कृपा। हरि ओम तत्सत्। श्रीकृष्णाय् नमो। 

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