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Friday, October 5, 2012


भारत की बदहाली का एक नमुना -बेहाल किंगफिसर, मदमस्त विजय मालिया और आत्मघाती सरकार

आज शुक्रबार 5 दिसम्बर सांय 6.30 बजे देश में नामी शराब कम्पनी के मालिक विजय माल्या के स्वामित्व में चलने वाली निजी एयरलाइन्स ‘‘किंगफिशर’ के 7 महिने से वेतन न मिलने से बदहाली झेल रहे सैकडों कर्मचारियों ने सरकार से अविलम्ब हस्तक्षेप करने की मांग को लेकर संसद की चैखट जंतर मंतर पर मौमबती जला कर न्याय मार्च किया। कर्मचारी इस बात के लिए आक्रोशित थे कि उनके वेतन रोक कर उनको व उनके परिवार के पेट पर लात मार रही है। परन्तु न तो सरकार लम्बे समय से अपने वेतन की मांग कर रहे सैकडों कर्मचारियों की सुध ले रही है व नहीं अपने सामाजिक दायित्व का निर्वहन करते हुए अपने ऐशा आराम में लाखों रूपये पानी की तरह बहा कर शाही जीवन जी रहे किंग फिशर कम्पनी के मालिक  विजय माल्या से कर्मचारियों का वेतन दिलाने के लिए सीधे हस्तक्षेप तक कर रही है। विगत 7 माह का वेतन देने की मांग को लेकर किंग फिशर एयरलाइन्स के कर्मचारी हडताल पर हैं। इसके कारण किंगफिशर ने अपनी उडाने तक बंद कर दी। कर्मचारियों के 7 महिने से वेतन रोके जाने से उनका व उनका परिवार कितनी बदहाली व असुरक्षा का दंश झेल रहा है, इसका अहसास देश के आम नागरिकों को भी उस समय हुआ जब 4 अक्टूबर को वेतन न मिलने की असुरक्षा से बुरी तरह से आशंकित किंग फिशर कम्पनी के एक कर्मचारी की पत्नी द्वारा आत्महत्या की खबर सामने आयी। इस घटना से निजी क्षेत्र में काम करने वाले करोड़ों कर्मचारी अपने भविष्य के प्रति आशंकित है। कर्मचारी आशंकित क्यों न हो जिस प्रकार से कर्मचारियों के हितों के प्रति सरकार की उदासीनता व निजी उद्यमों के मालिकों के प्रति सम्पर्ण की प्रवृति को देख कर कर्मचारियों में असुरक्षा का भय गहरा बैठ गया है। सरकार का रवैया कितना अलोकतांत्रिक व गैरजिम्मेदार है इसका एक ज्वलंत उदाहरण सप्रंग सरकार के पहले कार्यकाल में मनमोहन सरकार के मजबूत समझे जाने वरिष्ठ कांग्रेसी नेता आस्कर फर्नाडिस जो श्रम मंत्री  के रूप में अपने पद से केवल गुडगांव में कर्मचारी वर्ग में फेले असंतोष में कर्मचारियों के हित में एक बयान देने के कारण अपने पद से ही हाथ धोना पडा था। यही नहीं जिस प्रकार से हरियाणा में मारूति उद्यम के प्रबंधकों ने एक साथ पांच सौ से अधिक कर्मचारियों को जबरन नौकरी से बर्खास्त किया, उस पर भी सरकार मूक रही। इससे कर्मचारियों में असुरक्षा व्याप्त हो गयी है।
 किंग फिशर एयरलाइन्स में कर्मचारियों की हडताल के कारण इसकी उडाने कई बार पहले भी स्थगित हुई। इससे देश विदेश में भारतीय एयर लाइन्स की छवि पूरी तरह से प्रभावित हुई। परन्तु न तो सरकार को देश में संचालित निजी व सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों के तहत् चलने वाली एयरलाइन्सों को सही ढ़ग से संचालित कराने की सुध तक रही। सरकार में आसीन बौनी सौच के निहित स्वार्थी हुक्मरानों ने देश की पूरी व्यवस्था को किस प्रकार पतन के गर्त में धकेल कर निजी क्षेत्र के चंद उद्यमियों को अनुचित लाभ पंहुचाने का कृत्य किया, उसे कैग ने अपनी रिपोर्ट में पूरी तरह से बेनकाब किया है। खासकर जिस प्रकार से देश को निजी क्षेत्र में देश विदेश में गुणवत्ता व सेवा में विश्व स्तरीय मानक स्थापित करने वाले टाटा द्वारा निजी क्षेत्र में एयरलाइन्स चलाने की इजाजत देने के बजाय विजय मालया जैसे शराब के कारोबारी को एयर लाइन्स चलाने की इजाजत दी गयी। जिस देश में प्रतिभाशलियों को उचित दायित्व सौपने के बजाय अपने संकीर्ण स्वार्थो की पूर्ति को, जाति, धर्म, क्षेत्र, नस्ल या रंग आदि वरियता दी जाती हो तो उस देश व समाज को ऐसे ही शर्मनाक दिन देखने पड़ते है। उस देश व समाज का पतन निश्चित है। सरकार को चाहिए कि कर्मचारियों के हितों से शर्मनाक खिलवाड करने वाले मालिकों की सम्पति व अन्य उपक्रमों से वसूल करके कर्मचारियों का वेतन आदि दिलाया जाना चाहिए। इसके साथ देश में निजी क्षेत्र में व सरकारी क्षेत्रों में कर्मचारियों को ठेकेदारी प्रथा से हो रही नियुक्ति को तत्काल बंद किया जाय। भारत में ठेकेदारी के तहत रखे कर्मचारियों का बंधुवा मजदूर से बदतर शोषण किया जाता है न तो उनको जो वेतन नियोक्ता द्वारा जो वेतन दिया जाता है उसमें एक हिस्सा हर माह ठेकेदार हडप लेता है। यही नहीं ठेकेदार कर्मचारियों को 8 घण्टे के बजाय 10-12 घण्टे का काम ले कर कर्मचारियों का शोषण करता है। यही नहीं कर्मचारियों का हर प्रकार की कर्मचारी कल्याण की सुविधाओं से बरबस वंचित रखा जाता है। सबकुछ जानते हुए भी सरकार मूक बन कर कर्मचारियों के हितों को मालिकों के हितों की पूर्ति के लिए लुटवा रही है। सरकार के कुशासन से बेलगाम हुई मंहगाई में कर्मचारियों का इतना शोषण समाज की शांति को जहां भग करने का कारण बनता है वहीं व्यवस्था की प्रगति पर ग्रहण भी लगाता है।
किंग फिशर एयर लाइन्स के कर्मचारियों ने सरकार से न्याय की आश लगाते हुए अपने मोमबत्ती मार्च का समापन राष्ट्रीय धरना स्थल जंतर मंतर के समीप उसी तिकोने पार्क के उसी स्थल पर किया जहां पर उत्तराखण्ड राज्य गठन जनांदोलन 1994 से 1996 तक दिन रात ऐतिहासिक रूप से संचालित रहा। उस पानी के बंद पडे फुव्वारे के चकोर सीमेंट से बने चकोर पर सेकडों मौमबती से किंग फिशर के आंदोलनकारी रोशन कर रहे तो मेरे दिलो व दिमाग में राज्य गठन की स्मृतियां ताजी हो गयी। कैसे हमारे  आंदोलनकारी इस चैकोर में दिन में सभाये करते थे व रात को सोये रहते थे। आज किंग फिशर के कर्मचारियों की हालत देख कर व देश के एयर लाइन्स संस्थान को जिस प्रकार से सरकार में आसीन हुक्मरानों ने जानबुझ कर अपने निहित स्वार्थ के लिए बर्बाद किया, उससे मुझे भाजपा कांग्रेस द्वारा अपने प्संकीर्ण मानसिकता के उत्तराखण्ड विरोधी, जातिवादी, क्षेत्रवादी व संकीर्ण भ्रष्टाचार को बढावा देने वाले सत्तालोलुपु प्यादों को हुक्मरान बना कर यहां को बर्बाद करने का कृत्य राज्य गठन के इन 12 सालों में निरंतर किया जा रहा है। राज्य गठन जनांदोलन के तपस्थली पर प्रज्वलित हो रही मोमवतियों की रोशनी को देख कर आशा जगी कि सरकार को भगवान शायद सदबुद्दि दे ओर कर्मचारियों के साथ साथ अपने राष्ट्रहितों की रक्षा करने के दायित्व को निर्वाह करेगी।  परन्तु मनमोहन सरकार के कृत्यों को देख कर मुझे लगता है वह कोई देश हित में कार्य न करके पूर्व की तरह अमेरिका के हितों के पोषण में ही लगे रहेंगे। आशा यही है कि भगवान जहां 2014 में इस कांग्रेसी सरकार से देश को मुक्ति देगी ।

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