Pages

Tuesday, October 30, 2012


सृष्टि को गुलाम बनाने की किसी के प्रयास को विफल करती है प्रकृति 
सैंडी जैसे प्राकृतिक व अमेरिका जैसे तानाशाही मनोवृति से पृथ्वी की रक्षा करने के लिए जरूरत है एक मजबूत विश्व सरकार की
विश्व मानवता व लोकशाही को अपनी जिस ताकत के दम पर अमेरिका द्वितीय विश्व युद्ध के बाद निरंतर रौंद रहा है वह ताकत प्रकृति के एक साधारण से थपेडों ‘सैंड़ी तूफान’ के आगे बेबस, असहाय व शक्तिहीन बना हुआ है। अपने आप को विश्व
की एकमात्र महाशक्ति बन कर अपने निहित स्वार्थ के लिए अफगानिस्तान, इराक व लीबिया जैसे देशों को तबाह कर तथा 75 देशों की शांति पर अपने सैन्य ताकत व नाटो व संयुक्त राष्ट्र आदि गिरोह से ग्रहण लगा कर लाखों लोगों को अकाल ही मौत की नींद सुलाने वाले अमेरिकी हुक्मरान इस समय प्रकृति के इस जरा से थेप्पेडों को आगे खुद को बेबश पा कर प्रकृति के रहमोकरम पर जी रहे हैं। यह प्रकृति द्वारा अत्याचारी अमेरिकी हुक्मरान को एक संदेश भी है कि अपने गिरेवान में झांक कर इंसानियत को न रौंदे।परन्तु इस समय अमेरिका के करोड़ों निर्दोष लोगों का जीवन भी संकट में घिरा हुआ है। विश्व जनसमुदाय प्रकृति से लोगों के अमन चैन की दुआयें कर रहा है। हालांकि अमेरिका ने अपने विकसित तंत्र के कारण इस आपदा का पूर्वाभाष लगा कर इन क्षेत्रों से लाखों लोगों को पहले ही सुरक्षित स्थानों में सुरक्षित पंहुचा दिया था। इसी कारण ना के बराबर संख्या में लोग हताहत हुए। केवल अरबों की सम्पति का नुकसान हुआ। इस प्रकार की आपदा पूरे विश्व में कहीं भी आये पूरे संसार को पीडि़त लोगों को इस प्रकार की त्रासदी से उबारने के लिए आपसी प्रयत्न व सहयोग करना चाहिए। अब पूरे मानव समाज को एक बात समझ लेना चाहिए कि वे अपने निहित स्वार्थ के लिए चाहे किसी भी प्रकार महाद्वीप, देश, प्रदेश, धर्म, जाति, भाषा, नस्ल या लिंग भेद की दिवारें बना कर मानव समाज को अपने निहित स्वार्थो की पूर्ति के लिए बांट तो सकते हैं परन्तु प्रकृति की आंखों में धूल नहीं झोंक सकते। प्रकृति के आगे इस सृष्टि के सभी आकाश गंगायें, सूर्य, चंद, तारे, ग्रह, पृथ्वी, जीव, जन्तु, स्थावर, जल थल व नभ सब समान है। यह सारी सृष्टि की एक जीव की अंध तृष्णा के लिए नहीं बनाया गया। मनुष्य को चाहिए कि वह पूरे सृष्टि को अपना गुलाम बनाने व दूसरे जीवों की निर्मम हत्या, शोषण आदि करके अपना एकक्षत्र सम्राज्य स्थापित करने की आत्मघाती प्रवृति को त्याग कर सबको जीवो व जीने दो के भारतीय संस्कृति के मूल तत्व वासुदेव सर्वम को आत्मसात करे। प्रकृति किसी भी जीव को दूसरे जीव के जीवन को अकारण ही नष्ट करने की इजाजत नहीं देती। एक दूसरे की स्वतंत्रता व जीने के अधिकार का सबको सम्मान करना चाहिए। इसके साथ ही मनुष्य को सृष्टि के अन्य ग्रहों या आकाश गंगाओं के जीवों से भविष्य में होने वाले किसी प्रकार के खतरे खतरे या प्रकृति के सैंडी जैसे तूफानों, भूकम्पों सहित अन्य प्रकार के तमाम आपदाओं से समुचित ढ़ग से निपटने के लिए अब इस प्रकार की वर्तमान 200 से अधिक देशों की अलग अलग सरकारों की कोई जरूरत नहीं रह गयी है। अब इस सृष्टि के इस अनुपम ग्रह पृथ्वी के सृष्टि चक्र को व्यवस्थित संचालित करने के लिए पूरे विश्व के लिए एक सर्व हितकारी सरकार की ही जरूरत है जो कल्याणकारी कार्यो में पूरे पृथ्वी के संसाधनों का समुचित सदप्रयोग करे और तमाम प्रकार की प्राकृतिक आपदाओं से भी पृथ्वी के जीवों की रक्षा कर सके। क्योंकि पूरी पृथ्वी की सुरक्षा का जिम्मा न तो अमेरिका जेसे शोषक व तथाकथित महाशक्ति ही निभा सकता है व नहीं विश्व के 200 के करीब दिशाहीन असहाय अन्य सरकारें। आज पूरे विश्व के हुक्मरान अपने अपने देशों में कल्याणकारी व्यवस्था बनाये जाने के बजाय भ्रष्टाचार व विनाशकारी हथियारों की खरीद फरोख्त व उत्पादन में ही सारी पृथ्वी के संसाधनों का दुरप्रयोग कर रहे है। एक ऐसी विश्व सरकार बने जो सैडी जैसी प्राकृतिक आपदा या अमेरिका जेसे तानाशाह देश के दंश से पूरी पृथ्वी के अमन चैन की रक्षा कर सके।
सैंडी आ कर चले गया परन्तु अमेरिका को ही नहीं अपितु पूरे विश्व को एक संदेश दे गया कि सृष्टि के तमाम जीव जन्तुाओं को अपना गुलाम बना कर पूरी सृष्टि पर अपना शिकंजो जकड़ने की तरह हरपल कृत्य करते हुए प्रकृति को चुनोती देने वाला मनुष्य खुद को प्रकृति की संतान समझे मालिक नहीं। इससे एक बात स्पष्ट हो गयी कि मनुष्य प्रकृति के हाथों का एक मोहरा है खुद को सरताज न समझे। प्रकृति अपने संसाधनों से मनुष्य सहित सभी जीव जन्तुओं व पैड़ पौधों का पालन पोषण तो कर सकती है परन्तु मनुष्य जैसे किसी भी अतिवादी जन्तु की पूरी सृष्टि को अपना गुलाम बना कर अपनी अंध तृष्णा को पूरी करने की इजाजत नहीं देती।
 

No comments:

Post a Comment